कुम्भ लग्न (लग्नेश शनि) कुंभलग्न की चारित्रिक विशेषताएं कुंभलग्न का स्वरूप
कुम्भ लग्न (लग्नेश शनि) कुंभलग्न की चारित्रिक विशेषताएं कुंभलग्न का स्वरूप कुम्भ ईस्ट देवता का समूह कुम्भ राशि भचक्र की ग्यारहवें स्थान पर आने वाली राशि है । राशि का विस्तार 300 अंश से 330 अंश तक फैला हुआ है । धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरणों , शतभिषा के चरों चरण व् पूर्वा भाद्रपद के तीन चरणों से कुम्भ लग्न बनता है । जिस जातक के जन्म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज पर उदित होता हुआ दिखाई देता है , उस जातक का लग्न कुंभ माना जाता है. कुंभ: कुंभी नरो बभ्रुवर्णो मध्यतनुर्द्विपात् । ध्रुवीयों जलमध्यस्थो वातशीर्षोदयी तमः ॥ 21 ॥ शूद्र पश्चिमदेशस्यः स्वामी दैवाकरिः स्मृतः । - बृहत्पाराशरा होराशास्त्र अ. 4/ श्लो. 21 घड़ा लिये हुए पुरुष , भूरे वर्ण , मध्य देह , विपद , दिनबली , जलचारी , वायु तत्त्व , शीर्षोदय , तमोगुणी , शूद्र जाति , पश्चिमदिक् स्वामी है , इसका स्वामी शनि है।। 21 ।। करभगल: सिरालखररोमशदीर्घतनुः , पृथुचरणोरुपृष्ठजघनास्य कटिर्जरठः। परवनितार्थ पापनिरतः क्षयवृद्धियुतः , प्रियकुसुमानुलेपन सुहृद् घटजोऽध्वसहः॥...