कुम्भ लग्न (लग्नेश शनि) कुंभलग्न की चारित्रिक विशेषताएं कुंभलग्न का स्वरूप

 कुम्भ लग्न (लग्नेश शनि) कुंभलग्न की चारित्रिक विशेषताएं कुंभलग्न का स्वरूप



कुम्भ ईस्ट देवता का समूह   

कुम्भ राशि भचक्र की ग्यारहवें स्थान पर आने वाली राशि है । राशि का विस्तार 300 अंश से 330 अंश तक फैला हुआ है । धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरणों, शतभिषा के चरों चरण व् पूर्वा भाद्रपद के तीन चरणों से कुम्भ लग्न बनता है । जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज पर उदित होता हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न कुंभ माना जाता है.

कुंभ: कुंभी नरो बभ्रुवर्णो मध्यतनुर्द्विपात् ।

ध्रुवीयों जलमध्यस्थो वातशीर्षोदयी तमः ॥21

शूद्र पश्चिमदेशस्यः स्वामी दैवाकरिः स्मृतः ।

-बृहत्पाराशरा होराशास्त्र अ. 4/श्लो. 21

घड़ा लिये हुए पुरुष, भूरे वर्ण, मध्य देह, विपद, दिनबली, जलचारी, वायु तत्त्व,

शीर्षोदय, तमोगुणी, शूद्र जाति, पश्चिमदिक् स्वामी है, इसका स्वामी शनि है।।21।।

करभगल: सिरालखररोमशदीर्घतनुः,

पृथुचरणोरुपृष्ठजघनास्य कटिर्जरठः।

परवनितार्थ पापनिरतः क्षयवृद्धियुतः,

प्रियकुसुमानुलेपन सुहृद् घटजोऽध्वसहः॥11

-बृहज्जातकम् अ. 16/श्लो. 11

कुंभ में चंद्रमा रहने पर जातक लम्बी गर्दन वाला, दिखती नसों वाला, मोटे या

कठोर रोमों वाला, लम्बे चौड़े शरीर वाला, बड़े पैर, बड़ी जांघों, चौड़ी कमर, बड़ा

मुंह व मोटी कटि (बेल्ट बांधने की जगह) वाला, कठोर, दूसरे की स्त्री, दूसरे के

धन को चाहने वाला पाप कार्यों में लगा रहने वाला, घटती बढ़ती अर्थात् अस्थिर या

अनियमित आर्थिक स्थिति वाला, सजने-संवरने का शौकीन, मित्रों को प्यार करने

वाला तथा रास्ते की थकावट को सहन कर लेने वाला अर्थात् पैदल यात्राएं करने

में सक्षम होता है।

कुंभस्य लग्ने पुरुषोऽभिजातश्चलस्वभावः स्थिरसौहउश्चः

प्रभूतधान्यार्थयुतः प्रचण्डो लुब्धोऽन्यनारीरतिलालश्च॥॥1

- वृद्धयवन जातक अ. 24/श्लो.11/ पृ.289

यदि जन्म समय में कुंभलग्न का उदय हो रहा हो तो मनुष्य कुलीन, चंचल

स्वभाव वाला, पक्की मित्रता करने वाला, खूब धन धान्य से परिपूर्ण, प्रचण्ड स्वभाव

वाला, लोभी स्वभाव युक्त, अन्य स्त्री से रतिक्रिया की लालसा रखने वाला होता है।

अन्तःशठः परवधूरतिकेलिलोलः

कार्पण्यशीलधनवान् घटलग्नजातः ।

-जातक पारिजात श्लो. 11/ पृ. 678

जिसके हृदय में शठता हो, दूसरों की स्त्रियों से रमण करने के लिये जिसका

चित्त सदैव चंचल रहे, कृपण, धनी।

सीमानयशोभूतिः स्फीतप्रभवो घटस्याद्ये।

प्रांशुः कर्मसु निष्ठो धनवान्नृपसेवको जातः ॥

-सारावली श्लो. 10/ पृ. 466

यदि जन्म लग्न में कुंभ राशि व कुंभ राशि का प्रथम द्रेष्काण हो तो जातक

स्त्री, सम्मान, यश, ऐश्वर्य पराक्रम से युक्त, उन्नत, कर्मठ, धनी और राजसेवक

होता है।

कुंभलग्ने नरे जातोऽचलचित्तोऽति सौहृदः ।

परदाररतो नित्यं मृदुकायें महासुखी ॥

-मानसागरी अ. 1/ श्लो. 12

कुंभलग्न वाला जीव धरी गंभीर, स्थिर गतिशील, स्पष्टवादी, कामवासना से

पूर्ण परिपूर्ण मनोवृत्ति वाला, भौतिकतावादी, सुखभोक्ता, मित्रप्रेमी, आडम्बरशील

होता है।

लग्न स्वामी : शनि

लग्न चिन्ह : घड़ा

तत्व: वायु

जाति: शूद्र

स्वभाव : स्थिर

कुम्भन के इष्टमन्त्र  कुंभ राशि : इन्हें हरे गणेश,विष्णुदेव शरभ हनुमान शिव् माता काली या माता सिद्धिदात्री की उपासना करनी चाहिएl

ॐ गौरीपुत्राय नम:।ॐ नमो भगवते गजाननाय

ॐ दं यंवैष्णवे नमॐ ह्रींश्रींक्लींदुं दुर्गाय नमः

ॐ अर्धनारीश्वराय नमः ऊँ रुद्राय नम:

कुंभ राशि लग्न के जातक इस मंत्र का जप 108 बार रोज करें ।

ॐग्लौंदंहंफ्रौंह्रींग्रींह्रींऎंक्लींश्रींक्रींभ्रं कालिकायै नमः

उपेन्द्रायै अच्युताय नम:

माता काली कामाख्या तारा या माता सिद्धिदात्री की उपासना करनी चाहिए।

कुम्भ राशि एवं लग्न सम्पूर्ण विवरण

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नामाक्षर 👉 (गु, गे, गो, स, सी, सू, से, सो, द) 


यदि आपके पास अपने जन्म की तारीख वार समय मास आदि का विवरण नही है तो उपरोक्त नामाक्षर से अपनी राशि चयन कर सकते है।


कुम्भ लग्ने नरो जातः स्थिरः चित्तो तिसौहृद:।

परदाररतो नित्यं मृदुकायो महासुखी।।

प्रच्छन्न पापो घटतुल्यदेहो विघातदक्षो ध्वसहोल्पवित्तो।

उपहृतबन्धु: क्ष्यवृद्दियुक्तो घटोद्भव-स्यातप्रिय गन्ध पुष्प:।


अर्थात कुंभ लग्न में उत्पन्न जातक स्थिर बुद्धि मैत्री संबंध बनाने में कुशल, विशेषकर स्त्रियों से संबंध करने में प्रवीण, कामुक कोमल एवं सुंदर शरीर तथा सुखी होता है। ऐसा जातक कभी गुप्त रूप से कार्य करने में कुशल, अधिकाधिक धन प्राप्ति का इच्छुक, अत्यंत परिश्रमी, दूसरों को चोट आघात पहुंचाने में दक्ष होता है। उनका शरीर भी घड़े के आकार का होता है। आत्मीय भाई-बंधुओं के सुख में कमी, आर्थिक क्षेत्र में अस्थिरता अर्थात उतार-चढ़ाव अधिक रहते हैं।


कुंभ राशि राशि चक्र की 11वी राशि है। मेष संपत से इसका विस्तार क्षेत्र 300 अंश से 330 अंश देशांतर तक माना जाता है। इस राशि का स्वामी ग्रह शनि है। कुंभ राशि का प्रतीक कंधे पर कलश धारण किए हुए पुरुष है। यह स्थिर संज्ञक, वायु तत्त्व प्रधान, पुरुष राशि मानी जाती है। इस राशि के अंतर्गत धनिष्ठा के अंतिम दो चरण शतभिषा के चारों चरण तथा पूर्वाभाद्रपद के प्रथम तीन चरण आते हैं। ऊपर लिखे नक्षत्र चरण एवं नक्षत्र अक्षरों के आधार पर ही बच्चे का नाम रखने की परंपरा है। जन्म राशि अथवा लग्न राशि के अतिरिक्त जातक के व्यक्तित्व पर प्रसिद्ध नाम राशि तथा जन्म नक्षत्र का भी विशेष प्रभाव पड़ता है क्योंकि प्रत्येक नक्षत्र का स्वामी ग्रह अलग अलग होता है। जन्म नक्षत्र के संबंध में इतना अवश्य स्मरण रखना चाहिए कि किसी जातक के जन्म समय चंद्रमा जिस नक्षत्र चरण में होगा उसी के आधार पर मनुष्य को ग्रह दशा का प्रारंभ होगा तथा गोचर वर्ष भी जब कोई ग्रह नक्षत्र पर से संचार करता है। वह अपने गुणों स्वभाव अनुसार शुभ अशुभ फल प्रदान करता है।


कुंभ लग्न राशि के अंतर्गत आने वाले नक्षत्रों में धनिष्ठा नक्षत्र का स्वामी मंगल, शतभिषा का राहु तथा पूर्वाभाद्रपद का स्वामी ग्रह गुरु होता है। काल पुरुष में कुंभ राशि का संबंध दोनों पिंडलियों तथा जोड़ों नसों, श्वास एवं रक्त संचालन की प्रक्रिया से भी होता है।


शनि की यह मूल त्रिकोण राशि है। इसमें कोई ग्रह ना तो उच्च का होता है और ना ही नीच का होता है  नैसर्गिक ग्रह मैत्री चक्र अनुसार कुंभ राशि शुक्र ग्रह के लिए मित्र राशि तथा चंद्र, मंगल, बुध और गुरु के लिए सम राशि तथा सूर्य के लिए शत्रु राशि मानी जाती है। यह राशि लग्न में बनी होती है। निरयन सूर्य प्रतिवर्ष कुंभ राशि पर लगभग 13 फरवरी से 13 मार्च के मध्य संचार करता है। जबकि सायन पाश्चात्य मतानुसार सूर्य प्रतिवर्ष प्राय: 20 जनवरी से 18 फरवरी के मध्य संचारित होता है। पाश्चात्य मतानुसार राशियों का अध्ययन पद्धति के अनुसार ही किया जाता है। चैत्र मास में यह राशि दग्ध (शून्य) अर्थात शक्तिहीन मानी जाती है।


कुंभ राशि के अन्य पर्यायवाची नाम

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घट, तोपधर, पयोधर कुट, चित्तामय,  कुंभधर, घटधर, कलश, घट रूप इत्यादि। उर्दू में दिलों तथा अंग्रेजी भाषा में लोग इसको एक्वेरियस (Aquarius) नाम से बुलाते हैं।


कुंभ राशि द्वादश राशियों में सर्वाधिक मानवीय गुणों से भरपूर तथा अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदार और प्रतिबद्ध राशि है। यह स्थिर राशि, पुरुष संज्ञक, वायु तत्वप्रधान, दिवस बली, कृष्ण वरणा, तमोगुणी, विषम, त्रिदोष एवं उष्ण प्रकृति, शीर्ष उदयी, उष्ण एवं स्निग्ध प्रकृति, पश्चिम दिशा की स्वामिनी होती है। इस राशि के जातक धर्म प्रिय, अनुसंधानात्मक एवं नए नए विषयों के संबंध में जानने की विशेष प्रवृत्ति होती है। इस राशि का स्वामी ग्रह शनि प्रिय वार भी शनि तथा प्रिय रत्न नीलम है। इस राशि का प्रथम नवमांश तुला से प्रारंभ होता है तथा अंतिम नवमांश मिथुन का है।


संबंधित वस्तुएं👉 भूमि-जल, भूमि से उत्पन्न होने वाले शंख, जवाहरात, नीलम, पुष्प, सीपी, कोयला, लोहा, लोहापुर्जे, पेट्रोल व पेट्रोलियम पदार्थ, खनिज पदार्थ, बिजली से संबंधित कल पुर्जे, तिल, तैल, उड़द, पत्थर, ऊनी वस्त्र, रबड़, चमड़ा उद्योग, केमिकल, बिल्डिंग मैटेरियल इत्यादि। इसके अतिरिक्त समाज एवं राष्ट्रीय विकास में उन्नति के कार्यक्रमों, वायुयान से विदेशी यात्राओं का भी विचार कुंभ राशि से किया जाता है।


व्यवसाय विवाहादि विचार 

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उपयुक्त व्यवसाय

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कुंभ लग्न के जातकों पर शनि व गुरु दोनों बृहद ग्रहों का प्रभाव होने से सूक्ष्म एवं दूरदर्शी एवं व्यापक दृष्टिकोण रखते हुए ऐसे जातक व्यवसाय के संबंध में भी दूरगामी योजनाएं बनाने में कुशल होते हैं। कुंभ जातकों के लिए निम्नलिखित व्यवसाय विशेष उपयुक्त एवं लाभप्रद पाए गए हैं।


प्राध्यापन, प्रोफेसर, न्यायालय (वकील, जज) आदि गुप्तचर सेवा, वैज्ञानिक, पुरातत्व, राजनीति, नेता, दार्शनिक, अभिनेता, इंजीनियर, जौहरी, पत्थर, लोहा, लकड़ी, तांबा, रबड़ आदि धातुओं से संबंधित व्यवसाय। भूमि का क्रय-विक्रय, सेना, पुलिस, लेखन, प्रकाशन, प्रिंटिंग-प्रेस, पेट्रोलियम पदार्थ, ठेकेदारी, खेल, बिल्डिंग मेटेरियल, कोयला,  भट्टे, कृषि संबंधी कार्य, चिकित्सा एवं दवाई विक्रेता, कंप्यूटर, व्यापारी, वास्तु कला, ज्योतिषी, फोटोग्राफी, संगीत-गायन, बिजली, किराना व्यापारी, ड्राइविंग, डेयरी फार्म, शिक्षा संस्थान, रिसर्च एवं अनुसंधान के कार्य, उच्च पद प्राप्त पदाधिकारी, वाहन चालक एवं विक्रेता, दंत चिकित्सक, बेकरी, मिठाई विक्रेता, शेयर मार्केट से संबंधित कार्य, धर्माचार्य, समाजसेवक, सुधारक, सेल्समैन, डिजाइनिंग, वस्त्र उद्योग इत्यादि लघु विस्तृत उद्योग, कमीशन एजेंट, आढ़ती, मशीनरी, स्पेयर पार्ट्स, सीमेंट, उद्योग, तेल, तिल आदि पंसारी व मनिहारी के कार्य, मदिरा से संबंधित कार्य क्षेत्रों में लाभान्वित होने की संभावनाएं होती हैं।


भाग्योन्नति कारक वर्ष👉 28, 33, 36, 38, 42 एवं 48 होते है।


स्वास्थ्य एवं रोग

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 कुंभ लग्न के जातक की जन्म कुंडली में यदि शनि, गुरु, मंगल ग्रह शुभ हो नवमांश कुंडली में भी यह ग्रह बली हो एवं लग्न पर स्वग्रही या मित्र ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक का स्वास्थ्य उत्तम अथवा ठीक रहता है। तथा जातक आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होता है। इस संबंध में यदि कुंडली में शनि, गुरु, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु आदि ग्रह निर्बल एवं अशुभ स्थिति में हो तो जातक का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है। उसे वायु एवं कफ़ संबंधित रोग, स्नायु दुर्बलता, रक्तचाप, ह्रदय की कमजोरी, वात रोग (सन्निपात, लकवा) आदि, अधिक श्रम से मानसिक थकान, शीत प्रकोप, दांत, गले, टॉन्सिल, घुटनों एवं जोड़ों के दर्द, पिंडलियों में सूजन, रक्त की कमी या रक्त विकार, दाद, खाज, खुजली आदि चर्म रोग, नेत्र पीड़ा, गठिया, वातशूल, पथरी आदि रोगों का भय रहता है। यदि कुंडली में चंद्र, सूर्य, अशुभ हो तो जातक को उन्माद, अनिद्रा, नेत्र विकार, मस्तिष्क के विकार, मंदाग्नि, मेरुदंड में पीड़ा, शिर पीड़ा, कोष्ठबद्धता, उदर विकार आदि रोगों की संभावना होती है। कभी-कभी निराशा के कारण शराब, तंबाकू आदि व्यसनों का भी शिकार हो जाते हैं। शुक्र अशुभ हो तो पित्ताशय व मधुमेह आदि रोगों का भय होता है।


उपयोगी परामर्श👉 जातक को मदिरा आदि अत्यधिक मादक वस्तुओं का अथवा अत्यधिक ठंडी या गर्म वस्तुओं के सेवन से परहेज रखना चाहिए। संतुलित भोजन ग्रहण करना चाहिए। आशावादी, दृष्टिकोण के साथ नियमित व्यायाम एवं प्राणायाम अच्छे स्वास्थ्य एवं दीर्घायु जीवन के लिए लाभदायक होगा।


प्रेम सम्बन्ध एवं वैवाहिक सुख

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कुंभ लग्न के जातक कल्पनाशील एवं रहस्यमय प्रकृति के होते हुए भी प्रेम संबंधों का सूत्रपात प्राय: मैत्री भाव से करते हैं। उनका प्रेम ह्रदय की सूक्ष्म एवं गहन अनुभूतियों से प्रेरित होता है। इनके प्रेम में प्रदर्शन एवं दिखावटी पर नहीं होता फिर भी अपनी पत्नी को हरसंभव सुख सुविधाएं प्रदान कराने में प्रयत्नशील रहते हैं। कुंभ लग्न के जातक अपनी प्रेमिका अथवा जीवन साथी का चयन बौद्धिक योग्यता को ध्यान में रखते हुए करते हैं। यद्यपि उन्हें विपरीत योनि के प्रति विशेष सौंदर्यानुभूति एवं आकर्षण होता है। परंतु वह ऐसा जीवनसाथी पसंद करते हैं जो इन्हें बाहरी प्रेम आकर्षण के साथ साथ बौद्ध क्षेत्र में भी साथ दे। कुंभ जातक प्रेम के संबंध में सुनिश्चित धारणाएं रखते हैं। कुंडली में यदि सप्तमेश सूर्य तथा शुक्र मित्र क्षेत्र एवं शुभ स्थिति में हो तो जातक अपने अनुकूल जीवनसाथी पाने में सफल रहते हैं। तथा उनका दांपत्य जीवन प्रायः सुखी होता है। यदि सप्तमेश सूर्य बली हो अथवा सप्तम भाव पर अशुभ ग्रहों का योग दृष्टि आदि का संबंध हो तथा शुक्र व गुरु की स्थिति भी ठीक ना हो तो जातक के वैवाहिक सुख में कमी रहती है। यदि कुंभ लग्न के जातक की कुंडली का पत्नी के साथ नक्षत्र एवं गुण मिलान ठीक से ना हुआ हो तो पति-पत्नी दोनों अपने पूर्वाग्रह विचारों से मुक्त नहीं हो पाते तथा दोनों में स्वाभिमानी प्रकृति एवं अहमभाव में टकराव के कारण दोनों का दांपत्य जीवन सुखी नहीं रह पाता। सप्तम भाव में सूर्य मंगल के योग से तथा कुछ अन्य अशुभ योगों के कारण जातक में विवाह के बाद संबंध विच्छेद अथवा अविवाहित रहने की प्रवृत्ति भी पाई गई है।


उपयुक्त जीवन साथी 👉 कुंभ लग्न के जातक को वृषभ, मिथुन, सिंह, तुला, धनु एवं मीन लग्न की जातिका के साथ मैत्री संबंध व्यवसाय अथवा वैवाहिक संबंध शुभ एवं लाभदायक हो सकते हैं।


सावधानी👉 कुंभ राशि वायु तत्व प्रधान एवं स्थिर राशि होने के कारण कुंभ लग्न के जातक कई बार पूर्वाग्रही विचारों से ग्रस्त होकर आवेश एवं अति भावुकतावश दूसरों को स्पष्ट एवं कटु वचन भी कह देते हैं। जिससे कई बार लाभ की अपेक्षा हानि हो जाती है। इन्हें अति आलोचनात्मक प्रवृत्ति से भी बचना चाहिए अपने सामर्थ्य से अधिक परिश्रम करने की अपेक्षा संयोजित एवं योजनाबद्ध तरीके से पुरुषार्थ करना आपके लिए लाभदायक रहेगा।


कुम्भ लग्न गुण-स्वभाव 

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शारीरिक गठन एवं व्यक्तित्व👉 कुंभ लग्न कुंडली में यदि लग्नेश शनि शुभ हो तो जातक लंबे एवं ऊंचे कद का, सुगठित एवं संतुलित शरीर, पुष्ट कंधे, कुछ बादामी आकृति लिए सुंदर एवं आकर्षक नेत्र, मासल एवं गोरा बदन, अंडाकार सुंदर तेजस्वी चेहरा, लग्न पर गुरु का भी प्रभाव हो तो भूरे बाल, हंसमुख मोहक मुस्कान लिए चेहरा, बाहें लंबी तथा आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होगा। पिंडलियों या घुटनों पर तिल या चोट आदि का निशान होने की संभावना है। अधिक सूक्ष्म फलादेश के लिए जातक की चालित एवं नवांश कुंडली ग्रह दशा ग्रह गोचर आदि को भी ध्यान में रखना चाहिए।


चारित्रिक एवं स्वभावगत विशेषताएं

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कुंभ लग्न में शनि स्वक्षेत्रीय या उच्च अवस्था में हो तो जातक अत्यंत बुद्धिमान एवं तीव्र स्मरण शक्ति, दीर्घायु, परिश्रमी, पराक्रमी, उच्चाभिलाषी, स्वतंत्र एवं स्वाभिमानी प्रकृति का होता है। कुंडली में शुक्र-गुरु भी शुभ भाव में स्थित हो तो जातक भरोसेवान, ईमानदार, स्वाबलंबी, अर्थात निजी पराक्रम एवं उद्यम से जीवन में लाभ उन्नति प्राप्त करने वाला। न्याय प्रिय, गंभीर, तर्क-वितर्क करने में कुशल, धैर्यवान, व्यवहार कुशल, दृढ़निश्चयी, विद्वान, बाकपटू, संगीत, गायन, अभिनय, कला आदि साहित्य में कुशल एवं विख्यात होता है। ऐसा जातक जिस कार्य को करने का संकल्प कर ले उसे पूरे मनोयोग एवं निश्चय से करेगा। कुंभ जातक में मानवीय गुणों की बहुलता होती है। वह विचारशील परंतु हंसमुख, चतुर एवं अपने उद्देश्य के प्रति सतर्क एवं सावधान, धन, भूमि, जायदाद, वाहन आदि संपदाओं से संपन्न। लोगों के मनोभावों को समझने में कुशल। संवेदनशील, उदार, दयालु एवं परोपकारी स्वभाव अपने परिवार, सगे-संबंधियों, एवं मित्रों के प्रति हर प्रकार से सहायक होता है।


स्थिर एवं वायु तत्व प्रधान राशि होने से कुंभ लग्न जातक मिलनसार, स्पष्टवादी एवं निस्वार्थ भाव से सेवा करने में उद्धत रहते है। नएनए मित्र बनाने एवं उनसे स्थाई संबंध बनाने में कुशल होते है। कृतज्ञ स्वभाव होने से किसी मित्र या संबंधी द्वारा किए गए उपकार को नहीं भूलते तथा ना ही किसी के कपट पूर्ण व्यवहार को भी जीवन भर भुला पाते है तथा फिर प्रतिशोध लेने से भी नहीं हिचकीचाते है। कुंभ जातक में अनुसंधानात्मक एवं प्रबंधात्मक योग्यता भी विशेष होती है। वह दूसरों को उपदेश देने की अपेक्षा स्वयं कार्य करके दिखाते हैं।


यदि कुंभ जातक की कुंडली में द्वितीय, तृतीय भाव किसी पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो जातक का प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण एवं कठिनाइयों से भरा होता है। आर्थिक एवं व्यवसाय क्षेत्र में विशेष परेशानियां होती हैं। भाई-बंधुओं के सुख एवं सहयोग में भी कमी रहती है। कुंभ लग्न के जातक मनुष्यों के उत्तम गुणों से संपन्न और अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदार तथा प्रतिबद्ध होते हैं। कुंभ लग्न के जातक में सामाजिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में विकास की अनेक संभावनाएं छिपी होती हैं। यदि कुंडली में शनि, गुरु, बुध, शुक्र आदि ग्रह शुभ एवं योगकारक हो तो जातक इन ग्रहों की दशाओं में अभिनय, कला, साहित्य तथा व्यवसाय आदि के क्षेत्र में अभूतपूर्व लाभ उन्नति एवं सफलता प्राप्त करता है। देश-विदेशों में दीर्घ यात्राएं करने के अवसर प्राप्त होते हैं। इस संबंध में अभिनेता श्री अमिताभ बच्चन की कुंडली विशेष देखने लायक है।


कुंभ लग्न के जातकों में रहस्यात्मक, रचनात्मक एवं अनुसंधानात्मक प्रवृत्ति होने से ज्ञान प्राप्ति के लिए हमेशा जिज्ञासु एवं प्रयत्नशील रहते हैं। सामान्य भौतिक ज्ञान के अतिरिक्त आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति विशेष जिज्ञासा रहती है। योग, दर्शन, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, संगीत-गायन, अभिनय, साहित्य, कला आदि के क्षेत्र में भी विशेष रुचि रहती है। सामान्यतः 33 वर्ष की आयु के बाद विशेष भाग्योन्नति होती है। भाग्य स्थान पर यदि सूर्य, मंगल, गुरु, बुध आदि ग्रहों की दृष्टि हो तथा भाग्येश शुक्र पंचम में राहु युक्त हो तो जातक का भाग्य उदय स्वदेश की अपेक्षा विदेश में होता है।


शिक्षा एवं कैरियर

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कुंभ लग्न कुंडली में यदि बुध स्वग्रही या स्व उच्च होकर पंचम भाव, अष्टम या नवम भाव में शनि या शुक्र के साथ योग या दृष्टि संबंध करता हो तो जातक उच्च कोटि की विद्या ग्रहण करता है। इसके अतिरिक्त यदि पंचम में शुक्र तथा चतुर्थ में वृष राशि पर बुध अर्थात शुक्र-बुध में स्थान परिवर्तन योग हो तो भी जातक को उच्च विद्या की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त गुरु, मंगल के योग से जातक चिकित्सा के क्षेत्र में विशेष सफल होता है। गुरु, शनि, मंगल व बुध के योग, दशा एवं दृष्टि आदि के संबंध से जातक क्रय-विक्रय, रबड़, केमिकल के निजी व्यवसाय द्वारा विशेष लाभान्वित होता है। शुक्र व बुध के कारण कंप्यूटर के क्षेत्र में बैंकिंग कंपनी संस्थान, कॉमर्स, अभिनय, संगीत, कला, वकालत, अध्यापन आदि के क्षेत्र में सफल होता है। जातक चाहे व्यवसाय के किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो उसे धर्म, योग, दर्शन, ज्योतिष, मंत्र आदि विषयों के संबंध में अवश्य रुचि रहती है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्राय: सूक्ष्म दृष्टि एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं। किसी भी महत्वपूर्ण विषय या समस्या पर तत्काल निर्णय नहीं करते बल्कि गंभीर चिंतन एवं समस्या को भलीभांति सोच समझ कर ही अंतिम निर्णय पर पहुंचते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों एवं कठिन समस्याओं का समाधान गुप्त युक्तियों एवं धैर्य पूर्वक करते हैं। इनके संबंध बड़े-बड़े उच्च प्रतिष्ठित एवं श्रेष्ठ लोगों के साथ रहते हैं।


आर्थिक परिस्थितियां

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कुंभ लग्न की कुंडली में यदि गुरु, शुक्र, शनि एवं मंगल ग्रह शुभ भावस्थ हो तो जातक की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है। विशेषकर 35 वर्ष की आयु के बाद अथवा उपरोक्त ग्रहों की दशा-अंतर्दशा काल में अच्छे फल प्राप्त होते हैं। यदि कुंडली में शनि गुरु 3, 5, 6, 7, 8 या 10 वे भाव में हो तो जातक अच्छी नौकरी में रहकर समुचित धन लाभ एवं भाग्य में उन्नति के अवसर प्राप्त करता है। जन्म कुंडली में 1, 4, 9, एवं 11 वे भाव में शनि व गुरु होने की स्थिति में जातक स्वतंत्र व्यवसाय द्वारा धनसंपदा, भूमि, मकान, वाहन आदि सुख के साधन अर्जित करता है। परंतु विशेष वांछित धन लाभ 38 वर्ष की आयु के बाद ही मिल पाते हैं। तृतीय भाव में राहु, बुध, चंद्र, मंगल आदि अशुभ ग्रह हों अथवा गुरु, मंगल आदि भी अशुभ भावस्थ हो तो जातक को पारिवारिक एवं आर्थिक परेशानियां बनी रहती हैं तथा जीवन का पहला भाग आर्थिक दृष्टिकोण से संघर्ष पूर्ण एवं कठिनाइयों से युक्त रहता है। आर्थिक तंगी एवं व्यवसाय में उतार-चढ़ाव बहुत आते हैं। यदि द्वितीय भाव में गुरु स्वग्रही हो अथवा गुरु की शुभ स्वग्रही दृष्टि हो शनि भी शुभ भावस्थ हो तो जातक को पारिवारिक एवं धन संपदा आदि विशेष सुखों की प्राप्ति होती है।

कुम्भ लग्न की जातिकाये

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नामाक्षर 👉 (गु, गे, गो, स, सी, सू, से, सो, द) यदि आपके पास अपने जन्म की तारीख वार समय मास आदि का विवरण नही है तो उपरोक्त नामाक्षर से अपनी राशि चयन कर सकते है।


शारीरिक संरचना एवं स्वभावगत विशेषतायें

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कुंभ लग्न में उत्पन्न जातिका का ऊंचा अथवा मध्यम कद, संतुलित एवं सुगठित शरीर रचना, अंडाकार मुखाकृति, गोल एवं तेजस्वी वर्ण, सम्मोहक चुंबकीय मुस्कान लिए आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी होगी। बादामी आकार जैसी आकर्षक एवं सुंदर आंखें होंगी। जातिका तीव्र बुद्धिमती, अच्छी स्मरण शक्ति, परिश्रमी, दयालु एवं परोपकारी स्वभाव, संवेदनशील, अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार, व्यवहार कुशल, हंसमुख, मिलनसार, नए-नए मित्र बनाने में कुशल, परंतु इनके अंतरंग मित्रों की संख्या सीमित होती है।


कुम्भे च लग्ने वनिता सुजाता स्त्री जन्मदक्षा कुलाग्रजा।

नित्य गुरुणां सुविरुद्ध चेष्टा व्ययशीला पुष्यपरा कृतघ्ना।।


अर्थात कुंभ लग्न की जातिका अच्छे कुल में उत्पन्न, गुणी, अपने कुल में श्रेष्ठ, अपने गुणों द्वारा परिवार एवं समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाली, स्वतंत्र प्रिया, स्वाभिमाननी, उदार एवं धर्म परायण, शुभ कार्यों पर खर्च करने वाली तथा दूसरों का उपकार मानने वाली होगी, ऐसी जातिका दूसरों पर अधिकार पूर्ण वाणी का प्रयोग करने वाली, तर्क वितर्क करने में कुशल तथा किसी के साथ मैत्री स्थापित करने में कुशल होगी, किसी महत्वपूर्ण विषय पर निर्णय लेने से पूर्व यह उस विषय के संबंध में पर्याप्त गंभीरतापूर्वक विचार करती है। कई बार निर्णय करने में विलंब भी हो जाता है। कुंडली में यदि शनि, शुक्र एवं गुरु, शुक्र शुभस्थ हो तो जातिका वाक्पटु, विद्वान, वार्तालाप करने में कुशल, संगीत, गायन, अभिनय, नृत्य आदि कला में विशेष रूचि रखने वाली। जिस कार्य को करने का निश्चय करें उसे पूरे मनोयोग एवं ह्रदय से करेगी। आतिथ्य सत्कार एवं सेवा करने की भावना भी कुम्भ जातिका में विशेष रूप से प्रबल होती है। धर्म कार्य एवं घर परिवार में माता-पिता तथा बहिन, भाइयों की सेवा अपने उत्तरदायित्व की भावना से करेगी। स्वभाव से धैर्यवान, गंभीर, मितव्ययी एवं स्वनियंत्रित एवं उदार प्रवृति की होगी। प्रत्येक प्रकार के सामाजिक वातावरण में स्वयं को ढालने में सक्षम होगी।


शिक्षा एवं कैरियर

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कुंडली में गुरु, शुक्र, बुध एवं शनि आदि ग्रह शुभ हो तो जातिका उच्च विद्या प्राप्त करने में सफल होती है। तथा उच्च विद्या का समुचित लाभ भी जातिका को प्राप्त होता है। जातिका को सरकारी या अर्ध सरकारी क्षेत्रों में अच्छी सर्विस एवं प्राध्यापक आदि के क्षेत्र में उच्च सर्विस प्राप्ति के अवसर प्राप्त होते हैं। कुंडली में सूर्य और मंगल भी प्रबल हो तो जातिका सरकारी या अर्ध सरकारी शिक्षा संस्थानों में उच्च प्रतिष्ठित पद प्राप्त करने में सफल होती है। कुंभ लग्न जातिका को गुरु व शनि ग्रहों के प्रभाव स्वरूप उच्च शैक्षणिक विद्या के अतिरिक्त धर्म, अध्यात्म, योग, दर्शन, ज्योतिष, यंत्र-तंत्र आदि विद्याओं के प्रति भी विशेष रुचि रहती है। किसी भी विषय के गुण-अवगुण परखने के बाद ही संबंध या कार्य करती है। कुंभ जातिका केवल उपदेश ही नहीं देती बल्कि कार्य को स्वयं क्रियान्वित करके दिखाती है। अध्ययन की प्रकृति के अतिरिक्त खेलकूद, सैर, सपाटा अर्थात देश-विदेश की यात्राएं करने की भी आकांक्षाएं रखती है।


उपयुक्त व्यवसाय

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कुम्भ जातिका की कुंडली में बुध, शुक्र, गुरु व शनी आदि शुभस्थ हो तो जातिका उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त करके विज्ञान, प्रशासन, अध्यापन, कंप्यूटर, पत्रकारिता, भौतिक शास्त्र, मनोविज्ञान, कॉमर्स, फैशन डिजाइनिंग, ब्यूटी पार्लर, अभिनय, नृत्य, माडलिंग, बैंकिंग, वकालत, चिकित्सा, विदेश आदि के क्षेत्रों में अच्छी सफलता प्राप्त कर सकती है। इसके अतिरिक्त गत लेखों में दिए गए पुरुष व्यवसाय संबंधी विवरण का भी अवलोकन कर सकते हैं।


प्रेम एवं वैवाहिक जीवन

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कुंभ जातिकाये प्राय: प्रेम एवं विवाह संबंधों में ह्रदय की सूक्ष्म एवं गहन संवेदनाएं से प्रेरित होती है। फिर भी वह अपने भावी जीवनसाथी में बाहरी सुंदर व्यक्तित्व के साथ-साथ शैक्षणिक, बौद्धिक योग्यता एवं सामाजिक स्तर को भी अवश्य प्राथमिकता देती है। विवाह संबंधों में माता पिता की सहमति के अतिरिक्त स्वतंत्र निर्णय को भी अधिमान्यता देती है। विवाह के पश्चात वह अपने पति एवं परिवार के प्रति पूर्ण निष्ठावान एवं समर्पित होती है। तथा गृहस्थ के प्रति अपने उत्तर दायित्व को पूरी ईमानदारी से निभाने के प्रयत्न करती है। आर्थिक क्षेत्र में भी सहायक होती है। कुंडली के ग्रह नक्षत्र का मिलान अच्छी प्रकार से करके विवाह किया गया हो तो कुंभ जातिका का भावी दांपत्य जीवन सुखी एवं खुशहाल रहता है। यदि कुंडलियों का मिलान भली-भांति ना हुआ तथा सप्तम भाव पर राहु, सूर्य, मंगल, केतु, चंद्र आदि ग्रहों का अशुभ योग, दृष्टि हो तो जातिका को वैवाहिक सुख में कमी रहती है।


भाग्योन्नति कारक वर्ष👉 कुम्भ जातिका को 23, 25, 28, 32, 36, 38, 42 एवं 48 वां वर्ष भाग्योन्नति कारक रहता है।


स्वास्थ्य और रोग

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सामान्यत: बाहरी तौर पर कुंभ जातिका का स्वास्थ्य अच्छा दिखाई देता है। परंतु जन्म कुंडली में यदि शनि, सूर्य, मंगल, चंद्र, राहु आदि ग्रह अशुभ भाव (सप्तम, अष्टम) स्थान आदि में पड़े हो अथवा लग्न -लग्नेश को प्रभावित करते हो। अथवा शनी (लग्नेश) निर्बल हो तो जातिका का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। उसे जुकाम, खांसी, वायु जनित रोग, स्नायु दुर्बलता, दंत विकार, गले , टांसिल, घुटनों एवं जोड़ों के दर्द, पिंडलियों में सूजन, रक्त विकार अथवा रक्त की कमी, नेत्र विकार, मासिक धर्म की खराबी, मंदाग्नि, सिर पीड़ा, उदर विकार, अनिद्रा आदि रोगों का भय रहता है।


कुम्भ लग्न जातक/जातिकाओ का प्रेम-वैवाहिक सुख संक्षिप्त दशा-अन्तर्दशा फल एवं अन्य उपाय

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कुंभ लग्न के जातक कल्पनाशील एवं रहस्यमय प्रकृति के होते हुए भी प्रेम संबंधों का सूत्रपात प्रायः मैत्री भाव से करते हैं। इनका प्रेम हृदय की सूक्ष्म एवं गहन अनुभूतियों से प्रेरित होता है। प्रेम में प्रदर्शन व दिखावटी पर नहीं होता फिर भी अपनी पत्नी/पति को हरसंभव सुख सुविधाएं प्रदान करने कराने में प्रयत्नशील रहते हैं। कुंभ लग्न के जातक अपनी प्रेमिका या प्रेमी अथवा जीवन साथी का चयन बौद्धिक योग्यता को ध्यान में रखते हुए करते हैं। यद्यपि उन्हें विपरीत योनि के प्रति विशेष सौंदर्य अनुभूति एवं आकर्षण होता है। परंतु वह ऐसा जीवनसाथी पसंद करते हैं जो इन्हें बाहरी प्रेम आकर्षण के साथ साथ बौद्ध क्षेत्र में भी साथ दे। कुंभ जातक प्रेम के संबंध में सुनिश्चित धारणा रखते हैं। कुंडली में यदि सप्तम में सूर्य तथा शुक्र मित्र क्षेत्र एवं शुभ स्थिति में पड़े हुए हो तो जातक अपने अनुकूल जीवनसाथी पाने में सफल रहता है तथा उसका दांपत्य जीवन प्रायः सुखी होता है।


यदि सप्तम में सूर्य बली हो अथवा सप्तम भाव पर अशुभ ग्रहों का योग्य दृष्टि आदि का संबंध हो तथा गुरु और शुक्र की स्थिति भी ठीक ना हो तो जातक जातिका के वैवाहिक सुख में कमी रहती है। यदि कुंभ लग्न के जातक की कुंडली का पत्नी के साथ नक्षत्र एवं गुण मिलान ठीक से ना हुआ हो तो पति-पत्नी दोनों अपने पूर्वाग्रह विचारों से मुक्त नहीं हो पाते तथा दोनों में स्वाभिमानी प्रकृति एवं अहम भाव में टकराव के कारण दोनों का दांपत्य जीवन सुखी नहीं रह पाता। सप्तम भाव में सूर्य मंगल के योग में तथा कुछ अन्य अशुभ योगों के कारण कुम्भ जातक/जातिका में विवाह के बाद संबंध विच्छेद अथवा अविवाहित रहने की प्रवृत्ति भी पाई गई है।


उपयुक्त जीवन साथी

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कुंभ लग्न की जातिका को वृष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु एवं मीन लग्न के जातक के साथ विवाह अथवा व्यवसायिक संबंध अच्छे एवं लाभदायक हो सकते हैं। फिर भी जन्मपत्रीओं का पारस्परिक मिलान कराने के पश्चात ही महत्वपूर्ण निर्णय लेना चाहिए।


सावधानी👉 कुंभ राशि वायु तत्व प्रधान एवं स्थिर राशि होने के कारण कुंभ लग्न के जातक कई बार पूर्वाग्रही विचारों से ग्रस्त होकर आवेश एवं अति भावुकतावश दूसरों को स्पष्ट एवं कटु वचन भी कह देते हैं। जिससे कई बार लाभ की अपेक्षा हानि हो जाती है। अति आलोचनात्मक प्रवृत्ति से भी बचें अपने सामर्थ्य से अधिक परिश्रम करने की अपेक्षा संयोजित एवं योजनाबद्ध तरीके से पुरुषार्थ करना आपके लिए लाभदायक होगा।


कुम्भ लग्न में ग्रहों की दशा-अंतर्दशाओं का संक्षिप्त फल

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कुंभ लग्न के जातक/जातिका की जन्मपत्री में यदि शनि, गुरु, शुक्र एवं बुध ग्रह शुभ भागवत हो तथा इनमें से किसी ग्रह की महादशा एवं अंतर्दशा चल रही हो तो जातक अथवा जातिका को अपनी दशा या अंतर्दशा के मध्य मनोवांछित कार्यों में सिद्धि, धन लाभ, उन्नति, विद्या में सफलता, पदोन्नति अथवा व्यवसाय में लाभ, स्त्री या पुरुष का विवाह आदि का सुख, भूमि, जायदाद, मकान, वाहन एवं संतान आदि सुखों की प्राप्ति अथवा घर परिवार में मांगलिक कार्यों का आयोजन होता है।


जन्म कुंडली में यदि सूर्य, चंद्र, बुध, शनि, गुरु, शुक्र, राहु, केतु आदि ग्रह नीच राशि में स्थित हो, शत्रु राशिगत अथवा किसी अशुभ या क्रूर ग्रह से युक्त या दृष्ट होकर अशुभ भावो 6, 8 या 12 वें में पड़े हो तो विघ्नों एवं अड़चनों के बाद कार्यों में सफलता, धन हानि, आय के साधनों में रुकावटें, पारिवारिक कलह, भाई बंधुओं के साथ वैमनस्य तथा बनते कामों में अड़चनें पैदा होती हैं।


मंगल, राहु, चंद्र, गुरु, बुध ग्रह कुंभ लग्न कुंडली में शुभ होने पर भी अपनी दशा अंतर्दशा में शुभाशुभ दोनों अर्थात मिश्रित प्रभाव करते हैं। राहु-केतु अपनी दशा अंतर्दशा में भाव राशि की स्थिति तथा उस पर ग्रह योगों के योग दृष्टि आदि के अनुसार शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं।


कुम्भ लग्न संबंधित कुछ उपयोगी उपाय

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शुभवार👉 कुंभ लग्न राशि वाले जातक/ जातिका के लिए बुधवार, शुक्रवार एवं शनिवार शुभ एवं भाग्य कारक दिन होते हैं। बुध, मंगल तथा गुरुवार मिश्रित शुभाशुभ फल प्रदायक होते हैं। जबकि रविवार तथा सोमवार प्रायः साधारण अथवा अशुभ फल प्रदान करते हैं।


शुभरंग👉 नीला, काला, संतरी, आसमानी, भूरा रंग शुभ होंगे। पीला, हरा मिश्रित प्रभाव रखेंगे। जबकि सफेद व लाल रंग अशुभ रहेगा।


शुभ रत्न👉 नीलम सवा पांच रत्ती से सवा सात रत्ती का सोने या पंचधातु की अंगूठी में जड़वा कर मध्यमा अंगुली में शनिवार को किसी शुभ मुहूर्त में गंगा जल में धोकर मंत्र पूर्वक धारण करना चाहिए।


विशेष👉 धारण करने से पहले अन्य दशा ज्ञान हेतु किसी जानकार से परामर्श अवश्य लें।


शनि मंत्र👉 ॐ प्रां प्रीं प्रों स: शनैश्चराय नमः का 23 हजार संख्या में जाप करके विधि पूर्वक अभिमंत्रित करके धारण किया जावे तो और भी अधिक प्रभावी रहेगा। यदि नग धारण करना महंगा प्रतीत हो तो नाव की कील से लोहे का छल्ला बनवाकर शनिवार को नग की भांति ही विधि पूर्वक धारण करना लाभदायक होगा। यदि कुंडली में शनि ग्रह अशुभ हो तो शनिवार का व्रत रखना, विधि पूर्वक निर्मित शनि का यंत्र रखना, लोहे की कटोरी में सरसों का तेल डालकर छाया पात्र करना, औषधि स्नान तथा अंध विद्यालय या कुष्ठ आश्रम में असहाय लोगों को भोजन, मिठाई, फल, वस्त्र, धन, अनाज आदि के द्वारा सेवा एवं सहायता करना शुभ होता है। इसके अतिरिक्त शनि स्तोत्र का पाठ करना भी कल्याणकारी रहता है। ध्यान रहे शनिदेव के दान आदि के उपाय सायंकालीन किए जाने शुभ फलदायक माने जाते हैं।


भाग्यशाली अनुकूल वर्ष👉 20, 23, 25, 28, 33, 36, 38, 42, 48, 52, 56 वां वर्ष।


भाग्यशाली अंक👉 2, 3 व 9 अंक भाग्योन्नतिकारक रहते है।

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||#कुम्भ_लग्न||                                                                            कुम्भ लग्न वायु तत्व का लग्न है।इस लग्न का स्वामी शनि होता है।शनि के लग्नेश होने से शनि संबंधी गुण-अवगुण शनि की शुभ-अशुभ स्थिति के द्वारा व्यक्ति में पाए जाते है।शनि यदि केंद्रगत होने से कुम्भ लग्न के जातक लम्बे कद काठी के होते है।शनि के शुभ होने से कुम्भ लग्न के जातक शांत स्वभाव, गंभीर सोच-विचार के होते है।शनि नैसर्गिक रूप से पापी ग्रह है लेकिन यहाँ लग्नेश होने से यह अपने पापत्व स्वभाव में कमी कर देता है।शुक्र केंद्र चतुर्थ भाव त्रिकोण नवम भाव का अकेला स्वामी होने से प्रबल योगकारक और शुभ ग्रह होता है।मकर लग्न की तरह ही योगकारक शुक्र इस कुम्भ लग्न में रहता है।शुक्र भौतिक सुख-सुविधाओ का कारक भी है और इस कुम्भ लग्न में योगकारक होकर महत्वपूर्ण ग्रह भी इस तरह शुक्र का महत्व अपने आप में भौतिक सुखो का कारक होकर और इस लग्न में विशेष योगकारक होकर विशेष अनुकूल और मूल्यवान ग्रह होता है।इस कारण शुक्र की स्थिति का कुम्भ लग्न में अनुकूल होना विशेष आवश्यक होता है।शुक्र के बाद बुध त्रिकोण पंचम भाव का स्वामी होकर योगकारक होता है बुध जो जातक की बुद्धिबल, शिक्षा आदि का कारक स्वामी दोनों होता है साथ ही अष्टम भाव का स्वामी होने से कुछ नकारात्मक भी हो जाता है लेकिन बुध की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि बुध केंद्र त्रिकोण भाव में है या केंद्र त्रिकोण से बाहर।यदि बुध केंद्र त्रिकोण भाव या किसी शुभ/अनुकूल भाव में रहता है तो पंचमेश होने के और3, 6, 8, 12 भाव में होता है तो अष्टमेश होनेके विशेष ज्यादा फल करता है।सूर्य सप्तमेश होकर जातक के दाम्पत्य जीवन और व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है।चंद्र षष्टेश होकर जातक के लिए अकारक होता है चन्द्र 6, 8,12 भाव में होता है तब ठीक फल करता है अन्य भावो में ज्यादा ठीक फल नही करता।मंगल पराक्रम(तीसरे भाव) कर्म भाव(दसवे भाव) का स्वामी होकर तृतीयेश होकर  जातक के काम करने की गति, बल और साहस का प्रतिनिधित्व करता है तो वही दशमेश होकर जातक के कर्म से प्रभावित होकर कर्म के अनुसार फल करता है जातक की नोकरी, उच्च पद, प्रतिष्ठा, शासन, उच्चाधिकारो का संचालन करता है।गुरु द्वितीयेश, एकादशेश होकर साथ ही धन, सुख, उन्नति, सौभाग्य का कारक होकर जातक के लिए विशेष कल्याणप्रद और योगकारक ग्रह होता है।गुरु की अच्छी और बली स्थिति, योगकारक ग्रहो से सम्बन्ध जातक के लिए सुख, सम्पन्नंता, उन्नति और सौभाग्य को बढ़ाने वाली होती है।एक तरह से गुरु कुम्भ लग्न के जातको के लिए शुभ फल प्रदाता ग्रह है।राहु केतु अपनी स्थिति, भाव/राशि स्वामित्व, शुभ-अशुभ ग्रह योगो के अनुसार फल देते है।लग्न अनुसार ग्रहो की स्थिति बली और शुभ होना जरुरी होता है वरना अशुभ स्थिति होने पर भी योगकारक ग्रह, लग्नानुसार अनुकूल ग्रह भी अशुभ और दुखद फल देता है।

कुंभ के लग्न व्यक्तित्व विशेषता

कुंभ लग्न के शासक शनि ग्रह है। ऐसे में आपके पास चरित्र, बुद्धिमान दिमाग और अपरंपरागत सोच की मौलिकता है। लोग आपकी सुंदरता और आकर्षण से आकर्षित होते हैं। आपके पास जीवन का एक सार्वभौमिक सिंद्धांत है और विचारों, मूल्यों और आदर्शों के बौद्धिकता के माध्यम से दुनिया को देखना है।

कुंभ लग्न जातक के रूप में, आपके पास समाज का एक व्यापक दृष्टिकोण होने की संभावना है जो आपको विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ घुलने-मिलने की अनुमति देता है। आप एक सच्चे मानवतावादी व्यक्तित्व हैं, जो सामाजिक रूप से जिम्मेदार और विचारशील हैं। आप सामूहिक तरीके से लाभान्वित होंगे।

आप यात्रा के शौकीन हैं, उच्च अध्ययन में विश्वास करते हैं और गुणवत्ता, निष्पक्षता और सद्भाव में विश्वास करते हैं। आप संतुलित राय और समाधान के साथ समस्याओं का जवाब देते हैं। आप हमेशा बौद्धिक शौक के लिए आकर्षित होते हैं जैसे पढ़ना, लिखना, बहस करना, लंबी चर्चा करना, आदि। आप महान श्रोता हैं और समान रूप से अपनी बात कहने के लिए जाने जाते हैं।

कुंभ लग्न शारीरिक विशेषता

शारीरिक रूप से, कुंभ लग्न की सबसे आम विशेषता एक उच्च और अच्छी तरह से परिभाषित ललाट है। आपके पास आकर्षक चेहरा, स्वाभाविक रूप से सीधे बाल, और अक्सर सपने देखने वाली चमकदार आँखें हैं। आपके पैर मजबूत और सुडौल हैं और आमतौर पर कूल्हे और कंधे चौड़े होते हैं। कुल मिलाकर आप एक सुंदर व आकर्षक हैं।

कुंभ लग्न मानसिक विशेषता

कुंभ लग्न के लोग तेज गति से आगे बढ़ते हैं। आप लगातार खुद को व्यक्त करने की आवश्यकता महसूस करते हैं, और आप इसे कई बार जबरदस्ती करते हैं। आपका मन सदा सतर्क और बेचैन रहता है। आप चीजों को बड़े ही गंभीरता से लेते हैं परंतु कभी कभार जल्दबाजी भी कर बैठते हैं।

कुम्भ लग्न प्रेम व संबंध विशेषता

कुंभ लग्न के जातक प्यार और रोमांस के प्रति मजेदार दृष्टिकोण रखते हैं और विविधता की तलाश रहते हैं। आप ऐसे लोगों से आकर्षित होते हैं जिनके पास प्राकृतिक सुंदरता व शैली होती है, और जो अद्वितीय हैं। आप आपसी प्रेम, रोमांस, वफादारी और उदारता पर आधारित रिश्ते की इच्छा रखते हैं। आप ऐसे साथी की भी कामना करते हैं जो आत्मविश्वास से शक्तिशाली और उच्च हो।

कुंभ लग्न स्वास्थ्य विशेषता

कुंभ लग्न पैरों और टखनों पर समस्या  करती है, और इसलिए इन शरीर के अंगों के लिए जोखिम भरा परिणाम हो सकता है। जैसा कि आपका दिमाग हमेशा सतर्क रहता है जो आपको घबराहट से प्रभावित कर सकता है। आपका अत्यधिक सक्रिय तंत्रिका तंत्र आपको न्यूरोलॉजिकल विकारों, मिर्गी, मस्तिष्क ट्यूमर या पीड़ा से ग्रस्त कर सकता है। इस सब चीजों का अधिक जोखिम है।

कुम्भ लग्न के लिए शुभ/कारक ग्रहशनि लग्नेश होने से कुम्भ लग्न में एक कारक गृह बनता है ।

गुरु दुसरे व् ग्यारहवें का स्वामी होता है । अतः यहां एक कारक गृह है ।

शुक्र चौथे व् नवें भाव का स्वामी होने से कुम्भ लग्न में अति योग कारक गृह है ।

बुद्ध पांचवें , आठवें भाव का स्वामी होने से अति योग कारक गृह होता है ।

मंगल तीसरे व् दसवें का स्वामी है । कुम्भ लग्न में एक सम गृह होता है ।

शनि मंत्र- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:'

शनि का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:'

शुक्र मंत्र- 'ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:'

शुक्र का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शुं शुक्राय नम:'

गुरु मंत्र- 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:'

गुरु का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ ब्रं बृहस्पतये नम:'

भौम मंत्र- 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:'

भौम एकाक्षरी मंत्र- ॐ ॐ अंगारकाय नम:।

बुध मंत्र- 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:'

बुध का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ बुं बुधाय नम:'

कुम्भ लग्न के लिए अरुण, मंगल गुरु शनि, शुक्र व बुध योग कारक हैं अतः कटेला फ़िरोज़ा, मूंगा, नीलम, पुखराज,सुनहला, हीरा पन्ना धारण करें। शनि द्वादषेष भी है और बुध भी अष्टमश का दोष होने से ग्रसित है इसलिए रत्नों के साथ 3,4,5,6,7 मुखी रुद्राक्ष धारण करें।


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कुम्भ लग्न के लिए अशुभ/मारक ग्रह –

चंद्र छठे भाव का स्वामी होने से कुम्भ लग्न में एक मारक गृह बनता है ।

सूर्य सातवें भाव का स्वामी होने से यहां एक मारक गृह बनता है ।

जन्मकुण्डली के प्रथम भाव में कुम्भ राशि हो तो जातक कुम्भ लग्न का होताहै। कुम्भ राशि का स्वामी शनि ही कुम्भ लग्न का लग्नेश होता है। कुम्भ लग्न के जातक की प्रकृति का विवेचन करने के लिए लग्नेश शनि के गुण-स्वभाव तथाकुम्भ राशि के प्रतीक चिह्न 'घड़े' की विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए। कुम्भ राशि का अधिपति शनि है। शनि काले रंग का पाप ग्रह है ।

कुम्भ राशि का चिन्ह जल से भरा हुआ घड़ा है। अतः इस राशि वाले पुरूष की आकृति घड़े के समान गोल व वाणी घड़े के समान गम्भीर व गहरी होती है। ऐसे व्यक्ति प्रायः बाहरी दिखावे में ज्यादा विश्वास रखते हैं। ये भीतर से खोखले व बाहरी दिखावे में सुन्दर दिखलाई पड़ते हैं।इनके आधार पर कुम्भ लग्न के जातकों के विषय में सहज ही यह स्थूल निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं कि कुम्भ लग्न के जातक सीमित रहने वाले/संकीर्ण/संकोची मानसिकता वाले होते हैं। ये मेल-मिलाप को अधिक पसंद नहीं करते। शर्मीले होते हैं। मित्र जल्दी बना लेते हैं। औरों द्वारा प्राय: गलत समझे जाते हैं (अपने संकोची स्वभाव के कारण क्योंकि अपनी स्थिति को स्पष्ट नहीं कर पाते) । पारिवारिक जीवन से संतुष्ट नहीं होते। कुम्भ राशि वाला व्यक्ति का प्रायः मध्यम कद , गेहुए वर्ण, गोल सिर,  दीर्घकाय, तोंद-युक्त, गम्भीर वाणी बोलने वाला व्यक्ति होता है। यह राशि पुरूष जाति, स्थिर संज्ञक व वायु तत्व प्रधान होती है इसलिए कुम्भ  राशि वाले पुरूष का प्राकृतिक स्वभाव विचारशील, शांत चित्त, धर्मभीरू तथा नवीन आविष्कारों का प्रजनन है। कुम्भ राशि में जन्में जातक का चेहरा दर्शनीय तथा होंठ एवं कपोल सुन्दर होते है। इनकी विचारधारा दार्शनिक होती है। दूसरों की सहायता करके ऐसे जातक प्रायः प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। ऐसे जातक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी, सुदर्शन, हैंडसम, लम्बे शरीर वाले और इकहरे शरीर के होते हैं। किन्तु मध्यायु के आसपास इनका शरीर भर सकता है। ये प्रायः एकांतप्रिय होते हैं। ज्योतिष आदि में रुचि रखते हैं। अच्छे  अध्यापक/व्याख्याता/प्रोफेसर, ज्योतिषी, दार्शनिक या लेखक होते हैं। इन्हें छाती में दर्द की सम्भावनाएं रहती हैं। कुम्भ लग्न वालों का चेहरा प्राय: गोलाई लिए व बाल काले होते हैं। गम्भीर प्रकृति व चरित्र आचरण में भी गम्भीरता होती है। अपनी बात नाप-तोलकर बोलते हैं। मनन-चिंतनप्रिय होते हैं। गूढ़ ज्ञान तथा भविष्य के सम्बन्ध में इनका दृष्टिकोण/समझ/दूरदर्शिता/पूर्वानुमान प्राय: सटीक होते हैं। यदि इन्हें भविष्यदृष्टा कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। ये लोग आविष्कारी या शोध प्रवृत्ति के हो सकते हैं। किन्तु लग्न अशुभ प्रभाव में हो तो चुगलखोर, लगाई-बुझाई करने वाले तथा नीच स्वभाव के भी होते हैं। कुम्भ लग्न के जातक प्रगति शनैः शनैः ही करते हैं किन्तु स्थायी रूप से करते हैं। इन्हें काम निपटाने की जल्दी नहीं होती। ये बहुत धैर्य वाले होते हैं। कुम्भ लग्न के जातक राशि स्वामी शनि होने से धर्मपरायण , दूसरों की सहायता सहायता करने में आनंद पाने वाले होते हैं । वायु तत्व से स्वतंत्र विचारक होते हैं व् स्थिर स्वाभाव आपके विचारों में मौलिकता दर्शाता है । चिन्ह कुम्भ दर्शाता है की आपके भीतर की स्थिति क्या है ये कोई भांप नहीं पाता । कभी कभी तो कुम्भ राशि के जातक की बातें साथ में रहने वाले लोगों को असंभव सी जान पड़ती हैं , जो बाद में सही साबित होती हैं । इन जातकों में पूर्वभास की क्षमता गजब की होती है । किसी भी वक्तव्य के दूरगामी परिणाम को पहले ही भांप लेते हैं । इनका नजरिया दुसरे लोगों को कम ही भाता है । इनका नजरिया समझना सबके बस की बात नहीं है । इसलिए बहुत से विरोधी अनायास ही खड़े हो जाते हैं । इन तथ्यों के अलावा लग्नेश कुंडली में कहां या किसके साथ स्थित है , लग्न में कौन कौन से गृह हैं , ये काऱक हैं या मारक हैं , लग्न पर काऱक मारक ग्रहों की दृष्टि व् नक्षत्रों का विस्तृत विवेचन करने पर ही जातक के वास्तविक चरित्र के करीब पहुंचा जा सकता है


कुंभ लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. समस्त विश्व को प्रकाशित करने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है जबकि दशमेश होने के कारण यह जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्थेश होने के कारण यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का कारक होता है. एवम नवमेश होने के कारण धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. कुंभ लग्न में एक केंद्र और एक त्रिकोण का स्वामी होकर शुक्र अतीव शुभ और राजयोग कारक ग्रह बन जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में अतयंत शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से न्य़ून शुभ फ़लों के साथ अधिक अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. बुध पंचम भाव का स्‍वामी होकर जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. बृहस्‍पति एकादश भाव का स्‍वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के नाते यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व इत्यादि का प्रतिनिधि होता है जबकि द्वादशेश होने के कारण यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. राहु अष्टम भाव का स्वामी होकर यहां अष्टमेश होता है जिसके कारण उसे जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व मिलता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. केतु द्वितीय भाव का स्वामी होकर यहां जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

अच्छी एकाग्रता, दयालु, मानवीय, आत्म नियंत्रित, लगातार काम करने वाले , संरक्षण प्रदाता , खुश स्वभाव, आविष्कारशील स्वभाव वाली सोच के होते है। इनकी स्मरणशक्ति तथा मानसिक शक्ति बड़ी प्रबल हेाती है। कुम्भ राशि के जातक खरी-खरी कह देने में नहीं हिचकिचाते हैं और  ऐसा करते समय देश, काल और परिस्थिति का भी ध्यान नहीं रखते। इन्हें जीवन में अधिकतर विपदाओं का सामना करना पड़ता है। संघर्षरत रहकर ही इनके जीवन का निर्णय हो पाता है। कठिन से कठिन विपत्ति में भी ये घबराते नहीं। इनका दाम्पत्य जीवन साधारण ही होता है।

कुम्भ लग्न में जन्मे जातक अपने हृदय में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं रखते हैं तथा इनका  सांसारिक दृष्टिकोण भी  विशाल होता है । अध्ययन के प्रति इनकी रूचि रहती है तथा परिश्रम पूर्वक विभिन्न शास्त्रों का ज्ञान अर्जित करके एक विद्वान के रूप में सामाजिक मान-प्रतिष्ठा एवं सम्मान अर्जित करते है। दिल से कम और दिमाग से अधिक विचार करते हुए यह अपने जीवन में कई महतवपूर्ण कार्य करते हैं तथा धनैश्वर्य वैभव एवं भौतिक सुख संसाधानों को अर्जित करके आनन्दपूर्वक इनका उपभोग भी करते हैं।

शनि से प्रभावित होने के कारण मन में अस्थिरता का भाव रहेगा । आपकी दृष्टि छोटी से छोटी गलतियों को पकड़ने में सक्षम होती है, तथा अन्य जनों को प्रभावित करके उनके विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में आप अक्सर सफल होते हैं.कुम्भ लग्न में जन्मे जातक आकर्षक, पराक्रमी तथा तेजस्वी होते हैं परन्तु यदा-कदा उग्रता के प्रदर्शन से आपको अनावश्यक समस्याओं तथा परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

आर्थिक रूप से आपकी स्थिति सामान्यतया अच्छी रहेगी तथा आप आवश्यक मात्रा में धन एवं लाभ अर्जित करने में समर्थ होंगे। आपको नई जगहों पर जाना बेहद प्रिय है तथा अवसर मिलते ही  यात्रा आदि पर अपना समय व्यतीत करते हैं. । धन व्यय भी आप स्वतंत्र भाव से करते हैं लेकिन उत्तम आय होने के कारण इसका कोई विशेष दुष्प्रभाव नहीं होगा।

तमोगुणी राशि होने के कारण  इस राशि वालों को गुस्सा कम करते हैं और करते हैं तो फिर गांठ बांध लेते है। आप एकान्त प्रिय व्यक्ति है तथा कुछ हद तक स्वार्थी भी हैं. अगर आपका जन्म धनिष्ठा नक्षत्र में हुआ है तो आप  सरल स्वभाव वाले, उदार हृदय व स्नेहयुक्त व्यवहार  वाले  व्यक्ति है.

ऐसे जातक कल्पनाशील, भावुक एवं महत्वकांक्षी भी होते है, किन्तु  महत्वाकांक्षाऐं बहुत कम पूरी हो पाती है। एकान्त में पड़े रहना अथवा किसी पहाडी स्थान या वन्य प्रदेश में घूमने-फिरने की इनकी रूचि होती है। ऐसे जातक आवश्यक पड़ने पर ही किसी कार्य को करते हैं तथा इनकी उन्नति एवं अवनति आकस्मिक रूप से हुआ करती है।

धार्मिकता की भावना में अल्पता रहीत है एवं यह आधुनिक विचारों के होते है।धर्म के प्रति आपके मन में श्रद्धा रहेगी परन्तु धार्मिक कार्य-कलापों एवं अनुष्ठानों को कभी कभार ही सम्पन्न करेंगे। लेकिन  तीर्थ यात्रा पर जाने में सदा हे रूचि बनी रहती है।

लग्न में जन्मे लोगों के बहुत सारे मित्र होते है, और उनमे दूसरों के मन के विचार पढ़ने की अद्धभुत प्रतिभा होती है।  यह लोग बहुत गंभीर, काफी विचारशील और चिंतनशील प्रकृति के होते हैं।  इनका स्वभाव बुद्धिमान, सावधानी, विवेकपूर्ण, मितव्ययी  और व्यावहारिक होता है। यह लोग अत्यंत मुखर और निःस्वार्थ होते हैं। 

जातक बुद्धिमान, अच्छी स्मृति और तर्कशील शक्ति से परिपूर्ण, तथ्यों से निपटने में बहुत सक्षम होते है। ये व्यावहारिक रूप से तो बहुत सामाजिक होते है, लेकिन दोस्त बनाते समय बहुत सोच विचार करते हैं।  इनमे मेहनत करने, आयोजन की क्षमता, गहन विचारों की समझ , चतुर, स्पष्ट नेतृत्व, त्वरित और व्यापक सोच होती है। ये लोग नए विचारों और नयी सोच के प्रवर्तक होते है और नव विचारों का प्रवर्तन करने के लिए इनको आशीर्वाद प्राप्त होता है।  हर उस काम को करने को तत्पर रहते है। जो नैतिक रूप से इनको सही लगता है। उनकी अपनी व्यक्तिगत सोच  और विशेषता होती है।

दोस्ती के रिश्ते में हमेशा ईमानदार होकर अपने दोस्त का आजीवन साथ देने की प्रबल शक्ति इनमे होती है। अपनी पसंद और नापसंद में मजबूत होते हैं। थोड़े हठी स्वभाव के होते हैं, लेकिन मूर्ख नहीं होते हैं। दोस्ती में लगातार, एक सिद्धांत से चिपके रहते हैं। वे अपने भीतर अंतर्ज्ञान और अच्छी एकाग्रता के गुण को विकसित करते हैं।  वे केवल दूसरों को उपदेश नहीं देते बल्कि पहले  स्वयं वह कार्य करते हैं। ये अपनी उपवास और आत्म निरीक्षण की शक्ति के बल पर अच्छी वित्तीय स्थिति के संकेतों को भली भांति भांप सकते हैं। 

इस लग्न में जन्मे लोग संक्रामक रोगों के प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं। इनको अत्यधिक परिश्रम से बचना चाहिए और पूरा आराम लेना चाहिए।  इनको हृदय से संबंधित रोग जैसे हृदय गति बढ़ना,उच्च रक्तचाप जैसे समस्याएँ भी हो जाती है। सामान्यतः इनको दाँत, गले और टॉन्सिल, पैरों की सूजन, टखनों और बाएं कान से  जुडी हुई परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। सामान्यतया कुम्भलग्न में उत्पन्न जातक  स्वस्थ, बलवान एवं चंचल एवं  व्यक्तित्व आकर्षक होता है जिससे अन्य जन इनसे प्रभावित रहते हैं। ये स्वभाव से ही प्रगतिशील एवं क्रांतिकारी विचारधारा से युक्त होते है तथा पुराने रीति रिवाजों को कम ही स्वीकार करते हैं। अन्य जनों के प्रति इनके मन में स्नेह एवं सहानुभूति का भाव विद्यमान रहता है साहित्य एवं कला में रूचि के साथ-साथ ये उत्तम वक्ता भी होते हैं।

कुछ लोगों को आँखों से जुड़ी हुई बीमारियों का सामना करते हुए भी देखा जाता है,ऐसे में व्यक्ति को तुरंत डॉक्टर की सलाह लेना चाहिए और किसी गंभीर बीमारी की शुरुआत से पहले ही उसका इलाज शुरू कर देना चाहिए। 

इसके अलावा  दोषपूर्ण रक्त परिसंचरण एक्जिमा, त्वचा की परेशानी, अल्सर वाले मसूड़े आदि की समस्याएं भी इनमे देखी जा सकती हैं।  शोहरत और सम्मान जातक के पास खुद चलकर आता है। इसके लिए इनको कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता है।  इनको भाग्यशाली और दुर्भाग्यपूर्ण दोनों प्रकार का भाग्य भोगने का अवसर प्राप्त होता है। ये अपने भाग्य को चमकाने के लिए शुरुआती जीवन में ही बहुत परिश्रम कर लेते है। 

फिर आराम से बैठकर अपनी सफलता को भोगते हैं। पैसे को केवल सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ती का साधन भर मानते हैं।   यह स्वभाव से अत्यंत बुद्धिमान होते हैं, और हमेशा शिक्षित और समान रूप से बुद्धिमान जीवन साथी पसंद करते हैं। स्वभाव से तो बहुत स्वतंत्रता प्रिय होते हैं। परन्तु अपने विवाह सम्बन्ध पूरी सामाजिक विधि विधानों से पूरा करते है।

अपने जीवन साथी के साथ ये बहुत नम्र व्यव्हार करते हैं और उस पर कभी भी हावी होने का प्रयास नहीं करते।  इनमे एक कमी यह होती है, कि उनका साथी उनके हिसाब से खरा नहीं उतरता तो वो उसको बिना बताये उससे किनारा करने में एक बार भी नहीं सोचते।  यह लोग प्रेम प्रदर्शन में यकीन नहीं करते जिसकी वजह से अपनी असली भावनाओं को अपने साथी तक नहीं पहुंचा पाते। इसके कारण इनका साथी भावनात्मक रूप से खुद को अकेला पाता है।

वे अपने घर में जीवन साथी के साथ शांति, सद्भाव से रहना पसंद करते है, और उनकी हर खुशी की परवाह करते हैं।जो लोग कुम्भ लग्न से शादी करते हैं। उन्हें वह बहुत मानवीय, दयालु, सहानुभूतिपूर्ण और मिलनसार और उदार और अनुग्रहपूर्ण लगता है। मिथुन और तुला राशि के व्यक्तियों के साथ इनके वैवाहिक सम्बन्ध अच्छे रहते है। पति के रूप में कुम्भ लग्न के जातक बहुत गुणवान होते है। उनको अपने साथी की हर ख़ुशी को सिवाय प्रेम प्रदर्शन के पूरा करना आता है।

पत्नी को समय कम दे पाते है। क्योंकि उनको लगता है, कि जीवन साथी की भौतिक ज़िम्मेदारियाँ पूरी करने से वह उसको खुश कर सकते है।  पत्नी के रूप में इस लग्न की स्त्री अपने साथी के प्रति पूरी तरह समर्पित और निष्ठावान होता है। इनको दोस्तों का मनोरंजन करने और अधिक से अधिक प्राचीन वस्तुओं को इकट्ठा करने का बहुत शौक होता है। ग्रहणशीलता की भावना इनमे बहुत अधिक होती है। 

भले ही थोड़े अपरंपरागत लेकिन समय और परेशानी को बचाने के लिए आधुनिक तरीकों को सीखने में भी गुरेज़ नहीं करते हैं।  वे समाज और एकांत दोनों को पसंद करते हैं। अपने रिश्तेदारों के प्रति अधिक कर्तव्यनिष्ठ होते हैं। वे न तो ज्यादा आसक्त होते हैं, और न ही उनसे अलग होते है।

इस लग्न वाले स्वभाव से बहुत जीवंत, अच्छे विनोदी, उच्च उत्साही और हंसमुख होते हैं। कुंभ वाला जातक दार्शनिक विचारों का होता है. कुंभ लग्न वाले का हृदय कोमल होता है. ऐसा जातक किसी के दुखों को देख स्वयं ही दुखी हो जाता है. यह किसी को तड़पते नहीं देख सकता है. यह अपने शत्रुओं के हित में भी सोचता है. दूसरों के भावों से प्रभावित होकर सहज ही द्रवित हो जाता है. कुंभ वाले व्यक्ति में एक खास बात यह होती है कि दूसरों की सहायता करने को सदैव अग्रसर रहता है. इस लग्न वाले की बुद्धि प्रखर होती है. इसकी स्मरण शक्ति भी काफी अच्छी होती है. यह वक्त पड़ने पर दूसरों से बहुत चतुराई से अपना काम निकाल लेने में माहिर होता है.

यदि जातक की कुंडली में जब दुसरे घर का स्वामी बृहस्पति ग्रह होता है, तब ये लोग वैज्ञानिक, अच्छे कार्यकारी, बड़े कार्यालय में कार्य या सलाहकार, एक व्याख्याता, ज्योतिषी, कानूनी, वित्तीय या शिक्षा सलाहकार हो सकते हैं। 

जब व्यक्ति की कुंडली के 6 वें घर का  स्वामी चंद्रमा होता है। तो व्यक्ति  दवा, सामाजिक सेवा, शिपिंग, नाविक, पनडुब्बी, पंप सेट डीलर, तरल पदार्थों के निर्यात और आयात के व्यवसाय या नौकरी से जुड़ सकता है।इनकी कुंडली के 10 वें घर का स्वामी मंगल इनको भवन निर्माण, रसायन, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, ईंट भट्ठा मालिक, सीमेंट डीलर, सर्जन, सीसे में डीलर, तांबा और इस्पात या सी.आई.डी. अधिकारी बनने के लिए मौके दे सकता है। 

इन लोगों के लिए गुरुवार, शुक्रवार, मंगलवार और सोमवार अनुकूल और भाग्यशाली दिन होते हैं। इनके जीवन में बुधवार और शनिवार दुर्भाग्यपूर्ण दिन हो सकते हैं, जबकि रविवार मिश्रित परिणाम प्रदान करता है।

जातक के लिए  पीला, लाल, सफेद और क्रीम भाग्यशाली और अनुकूल रंग होते हैं। इनको जहाँ तक हो सके नारंगी, हरे और नीले रंग से बचना चाहिए।

जिन लोगों का जन्म कुंभ लग्न में होता है वह भाग्यशाली होते हैं. यदि कुंडली में ग्रह ठीक-ठाक स्थिति में हो तो जातक इतना धनी हो सकता है कि कह सकते हैं कि कुंभ वाला अपने इस जन्म में धन से घड़ा भरने आता है.

कुंभ धनिष्ठा के दो चरण, शतभिषा के चार चरण और पूर्वभाद्रपद नक्षत्र के तीन चरण से मिलकर बनती है. कुंभ का स्वामी शनि होता है. कुंभ के अलावा मकर वालों का भी शनि लग्नेश होता है. वैसे इस लग्न में जन्मे लोग मकर वालों से ज्यादा आध्यात्मिक होते हैं. एक बात समझ लेनी चाहिए कि किसी भी जीव को कुंभ तभी प्राप्त होती है जब उसका संचित कर्म फलित होने की स्थिति में होता है. यदि कुंडली में ग्रह स्थिति अच्छी हो तो कुंभ वाले धन के मामले में अन्य लग्नों से ज्यादा भाग्यशाली होते हैं. धनिष्ठा नक्षत्र में जन्मे कुम्भ राशी के जातक भीतर ही भीतर कष्ट सहते है परन्तु बाहर उसकी आह तक नहीं निकालते। ये पूरी तरह से  रहस्यवादी व्यक्ति होते है। व्यापारी क्षेत्र में अपनी पूंजी का फैलाव सही पूंजी से कई गुना अधिक करते हैं। इनकी वास्तविकता को पहचाना पाना बड़ा कठिन हो जाता है। ये बड़ा से बडा जोखिम लेने में नहीं हिचकिचाते।

कुंभ लग्न का व्यक्ति प्राय: सुंदर होता है उसके होंठ सुंदर होते है. कुंडली में केतु की स्थिति अच्छी हो जाए तो जातक सामान्य से ज्यादा लंबा हो जाता है. कुंभ में एकादश और द्वितीय अर्थात लाभ और कोष का स्वामी गुरु ही होते हैं. साधारण सी बात है कि जब आय और कोष का स्वामी एक ही होगा तो लाभ और उसे संचित करने का तारतम्य भी बहुत अच्छा होगा. चूंकि यह लाभ गुरु करा रहा है तो वह कुछ धन धर्म के कामों में खर्च करवाता है. जिन लोगों की कुंडली में गुरु बलवान स्थिति में होता है, ऐसे जातक करोड़पति होते हैं. कुंभ वाले जातक को अपनी बात को स्वीकार न किए जाने पर बड़ा क्रोध आता है.

इस लग्न वालों का क्रोध भी कुछ अजीबोगरीब तरीके का होता है. यह किस बात से नाराज हो गए हैं, पता लगाना मुश्किल होता है. फिर गुस्से में बहुत उग्र हो जाते है. अकसर देखा गया है कि यह लोग गुस्से में अपना ही नुकसान कर लेते हैं. इन सब बातों के बाद एक बात जरूर ध्यान देने वाली है कि इनका गुस्सा बहुत जल्दी ही ठंडा हो जाता है. कुंभ वाले को यदि किसी बात में शक हो जाए तो वह उस बात की सच्चाई की तह तक पहुंच कर ही दम लेते हैं. इस लग्न वाले व्यक्ति में सफलता प्राप्त करने का जुनून सा होता है और वह इस सफलता को पाने के लिए बहुत मेहनत कर सकता है.

कुंभ वाले व्यक्ति में लगन बहुत होती है. इस लग्न में जातक अपनी बात को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं. इस लग्न के लोग बातचीत में अपनी पूरी क्षमता प्रदर्शित करते हैं. इस लग्न वालों के लिए शुक्र बहुत शुभ फल देने वाला होता है. शुक्र नवम और चतुर्थ का स्वामी अर्थात भाग्य और सुख का स्वामी होता है. भाग्येश होने के कारण यह परमकारक ग्रह हो जाता है. जब कुंभ वाले को शुक्र की महादशा या अंतरदशा मिलती है तब उस समय कुंभ वाले को शुभ फल प्राप्त होता है. इस लग्न में मंगल दशमेश और तृतीयेश होने के काऱण यह अपने कर्म को साहस के साथ करते हैं. इस लग्न वाले जातक को अपने कर्म में सफलता जन्म स्थान से बाहर ही मिलती है और यह जन्म स्थान से दूर ज्यादा साहस के साथ काम करने में सक्षम होते हैं.

कुंभ वाले जातकों की सरकार से अच्छी बनती है या फिर सरकार या बॉस की नीतियों का समर्थन करते हैं. इसके पीछे कारण यह है कि कुंभ वाले का प्राकृतिक मित्र सिंह राशि वाला होता है और सिंह का अर्थ है राजा या सरकार. कुंभ लग्न वाले जातक भाग्य पर कर्म से ज्यादा विश्वास करते हैं. शनि लग्नेश होने के कारण इस लग्न वालों को नीलम रत्न धारण करना चाहिए. नीलम के धारण करने से इनमें समझदारी, प्रतिरोधक क्षमता और आत्मबल भी बढ़ जाता है. शुक्र परम योगकारक ग्रह है. इसलिए हीरा रत्न धारण करने से कुंभ वालों को बहुत लाभ होता है. हीरे को पहनने से भाग्य में वृद्धि तो होती ही है. साथ ही भौतिक सुखों में भी बढ़ोत्तरी होती है. पन्ना और माणिक को कुंडली के ग्रहों की स्थिति देखने के बाद ही धारण करना चाहिए.

सिंह, मिथुन व तुला लग्न के जातकों के साथ कुम्भ लग्न वालों की मित्रता शुभ व लाभकारी मानी गई है। यदि लग्न पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो सिर, पेट, गैस आदि के रोगों की इनको तीव्र सम्भावना रहती है। लग्न में शनि स्वयंविद्यमान हो तो ऐसा जातक काला, आलसी, मंथर गति से काम करने वाला होता है। दूसरे घर में शनि हो तो पिता के धन (पैतृक सम्पत्ति) के लिए अच्छा नहीं होता। नौवें घर में शनि हो तो जातक को सफर से यश एवं लाभ मिलता है।

कुम्भ लग्न का जातक मानसिक विकास तो करता ही है। अपनी बचपन की पारिवारिक स्थितियों से भी आगे बढ़ता है। ऐसे जातक सहयोग व सहायता करने

वाले तथा सौंदर्यप्रेमी होते हैं। किन्तु इनके विचार कभी भी परिवर्तित हो सकते हैं।

ये लोग समस्याओं या संकटों से जूझते हुए मार्ग निकाल लेने में दक्ष होते हैं और

किसी न किसी रूप से प्रसिद्धि अवश्य प्राप्त करते हैं। हां, यदि जातक का जन्म

अमावस्या का हो और प्रात:काल का हो तो ऐसा जातक अत्यधिक चालाक भी

होता है। लेकिन लग्न पर शुभ प्रभाव हो तो शिल्प, संगीत, चित्र, साहित्य आदि

कलाओं में से किसी में जातक की रुचि/दखल जरूर होता है। कुम्भ लग्न के

जातक कल्पनाशील होते हैं। इनका वैवाहिक जीवन पूर्णतः सुखमय नहीं होता।

बल्कि प्राय: क्लेशयुक्त ही रहता है, क्योंकि सातवें भाव का स्वामी सूर्य इनके

लग्नेश का प्रबल शत्रु होता है। प्रायः इनकी पत्नियां कर्कश बोलने वाली तथा

चिड़चिड़ी या क्रोध करने वाली होती हैं। कुम्भ लग्न के जातकों के सम्बन्ध अपने

भाइयों से भी मधुर नहीं रह पाते। आयु बढ़ने के साथ-साथ कुम्भ लग्न के जातकों

की आर्थिक स्थिति को सुधरते हुए पाया जाता है। ऐसा भी देखने में आता है कि 40 वर्ष की आयु के आसपास कुम्भ लग्न के जातकों के जीवन में कोई बड़ा परिवर्तन आता है और प्राय: उनकी जीवनधारा ही बदल जाती है।

मेरे अपने अनुभव के अनुसार कुछ और विशेषताएं भी कुम्भ लग्न के जातकों में देखने में आई हैं। मुश्किल परिस्थितियों से किसी कुम्भ लग्न के जातक को भय खाते मैंने कभी नहीं देखा। वे किसी अवसर को हाथ से जाने नहीं देते और प्राय: अपनी क्षमता से अधिक कार्यों में स्वयं को उलझाए रहते हैं। ये लोग विपन्न अवस्था में कभी नहीं मिलते। धन को सद्व्यय करने वाले किन्तु खर्चे का हिसाब- किताब न रखने वाले होते हैं। कुम्भ लग्न के जातकों को पिता का सुख भी पूर्ण रूप से नहीं मिल पाता। अक्सर उनके पिता की मृत्यु जल्दी हो जाती है। कुम्भ लग्न के जातकों का स्वभाव कुछ सनकी मिलता है। किन्तु इनकी अतीन्द्रीय क्षमता प्रायः बढ़ी हुई होती है। समाज के लिए इनको ठीक-ठीक समझना कठिन होता है। ये प्रायः जीवन के लक्ष्यों को बदलते रहते भी देखे गए हैं। तथापि दूसरों का धन, सलाह व सम्बन्धों द्वारा सहयोग करने वाले होते हैं।

कुंभराशि का अधिपति शनि है। शनि पाप ग्रह है तथा उसका रंग काला होता

है। कुंभ राशि वाला व्यक्ति प्रायः मध्यम कद का, गेहुएं वर्ण, गोल सिर, फूले हुए

नथुने व गाल वाला, दीर्घकाय तोंद-युक्त, गंभीर वाणी बोलने वाला व्यक्ति होता है।

यह राशि पुरुष जाति, स्थिर संज्ञक व वायुतत्त्व प्रधान होती है। सो इस राशि वाले

पुरुष का प्राकृतिक स्वभाव विचारशील, शान्त चित्त, धर्मभीरू तथा नवीन आविष्कारों

का प्रजनन है। कुंभ राशि का चिह्न जल से परिपूर्ण घट है। अत: इस राशि वाले पुरुष कीआकृति घड़े के समान गोल व वाणी घट के समान गंभीर व गहरी होती है। ऐसे व्यक्ति प्राय: बाहरी दिखावे में ज्यादा विश्वास रखते हैं। ये भीतर से खोखले व बाहरी दिखावे में सुंदर दिखलाई पड़ते हैं। यदि आपका जन्म धनिष्ठा नक्षत्र में है तो आप भीतर ही भीतर कष्ट सहते हैं परन्तु बाहर उसकी आह तक नहीं निकालते। ये पूर्णतः रहस्यवादी व्यक्ति होते हैं।

व्यापारी क्षेत्र में अपनी पूंजी का फैलाव सही पूंजी से कई गुना अधिक करते हैं।

इनकी वास्तविकता को पहचान पाना बड़ा कठिन हो जाता है। ये बड़ा से बड़ा जोखिम लेने में नहीं हिचकिचाते। सामान्यतया कुंभलग्न में उत्पन्न जातक स्वस्थ, बलवान एवं चंचल होते हैं परन्तु इनका व्यक्तित्व आकर्षक होता है जिससे अन्य जन इनसे प्रभावित रहते हैं।

ये स्वभाव से ही प्रगतिशील एवं क्रांतिकारी विचारधारा से युक्त होते हैं तथा पुराने रीति रिवाजों को कम ही स्वीकार करते हैं। अन्य जनों के प्रति इनके मन में स्नेह एवं सहानुभूति का भाव विद्यमान रहता है तथा धार्मिकता की भावना में अल्पता रहती है एवं यह आधुनिकता से परिपुष्ट विचारों के होते हैं। साहित्य एवं कला में रुचि के साथ-साथ ये उत्तम वक्ता भी होते हैं।

इनका सांसारिक दृष्टिकोण विशाल होता है तथा इनके हृदय में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं रहता है। अध्ययन के प्रति इनकी रुचि रहती है तथा परिश्रम पूर्वक विभिन्न शास्त्रों का ज्ञान अर्जित करके एक विद्वान के रूप में सामाजिक मान-प्रतिष्ठा एवं सम्मान अर्जित करते हैं। अवसरानुकूल इनको नेतृत्व का भी अवसर प्राप्त हो जाता है। ये भावुकता से कोई भी काम नहीं करते तथा बुद्धिमत्तापूर्वक सोच समझकर अपने कार्यों को सम्पन्न करते हैं। अतः धनैश्वर्य वैभव एवं भौतिक सुख संसाधनों को अर्जित करके आनन्दपूर्वक इनका उपभोग करते हैं।

अतः इसके प्रभाव से आप स्वस्थ्य एवं बलवान होंगे परन्तु मन में अस्थिरता का भाव होगा। आप अपनी विद्वता एवं बुद्धिमत्ता से शुभ एवं महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करके उनमें सफलता अर्जित करेंगे फलतः आपके उन्नति मार्ग प्रशस्त रहेंगे। आपकी दृष्टि भी सूक्ष्म रहेगी तथा अन्य जनों को प्रभावित करके उनके विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होंगे।आपका व्यक्तित्व आकर्षक होगा तथा अन्य जन आपसे प्रभावित रहेंगे। आप

में पराक्रम में तेजस्विता का भाव भी रहेगा। फलतः अपने सांसारिक महत्त्व के कार्य कलापों को आप परिश्रम से सम्पन्न करेंगे तथा उनमें सफलता प्राप्त करेंगे जिससे संसाधनों तथा अन्य ऐश्वर्य से आप युक्त रहेंगे तथा आनन्दपूर्वक इनका उपभोग करेंगे। लेकिन यदा-कदा उग्रता के प्रदर्शन से आपको अनावश्यक समस्याओं तथा परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।आर्थिक रुप से आपकी स्थिति सामान्यतया अच्छी रहेगी तथा आप आवश्यक

मात्रा में धन एवं लाभ अर्जित करने में समर्थ होंगे। आप भ्रमण या यात्रा के भी प्रिय होंगे तथा अवसरानुकूल भ्रमण तथा यात्रा आदि पर अपना काफी समय व्यतीत करेंगे। साथ ही व्यय भी आप मुक्त भाव से करेंगे लेकिन उत्तम आय होने के कारण इसका कोई विशेष दुष्प्रभाव नहीं होगा।

धर्म के प्रति आपके मन में श्रद्धा रहेगी परन्तु धार्मिक कार्य-कलापों एवंअनुष्ठानों को आप अल्प मात्रा में ही सम्पन्न करेंगे। लेकिन यदा-कदा तीर्थ यात्रा को आप सम्पन्न कर सकते है। इस प्रकार आप पराक्रमी बुद्धिमान एवं परिश्रमी पुरुष होंगे तथा भौतिक सुखों का उपभोग करते हुए आनन्दपूर्वक अपना समय व्यतीत करेंगे।

कुंभ राशि शीर्षोदय व तमोगुणी राशि है। इस राशि वाले गुस्सा कम करते हैं.और करते हैं तो फिर गांठ बांध लेते हैं। आप एकान्त प्रिय व्यक्ति हैं तथा कुछ स्वार्थी भावनाओं से परिपूर्ण हैं, अगर आपका जन्म धनिष्ठा नक्षत्र में हुआ है तो आप सर्वदा सरल स्वभाव वाले, उदार हृदय व स्नेहयुक्त व्यवहार से कीर्ति पाने वाले व्यक्ति हैं अगर आप व्यापार वर्गीय व्यक्ति हैं तो आपके हेतु निश्चित वाहन योग 36 वर्ष की अवस्था में बनता है।

कुंभलग्न दिवाबली व पश्चिम दिशा का स्वामी है। इस राशि से पेट के भीतरीभागों पर विचार किया जाता है। आपका स्वभाव मृदु व सरल एवं सद्गुणों से पूर्ण है परन्तु संकोचशीलता आपकी कमी है। आपको प्रतिपल एक वहम सा रहता है।आप ऐसा सोचते हैं कि अन्य व्यक्ति आपसे ईर्ष्या कर रहे हैं और आप अकारणअजनबी से उलझ पड़ते हैं। यदि आपमें यह आदत विद्यमान है तो यह कभी भी खतरनाक साबित हो सकती है। यदि आपको किसी प्रकार के गन्दे ख्वाब आते हैं


तथा अकारण खिन्नता महसूस होती हो एवं बनते कार्यों में दिक्कतें व रुकावट आती हो तो फौरन शनि मुद्रिका धारण करें। शनि मुद्रिका घोड़े के पैर की बनाई जाती है। यह लोहे की होती है। शनि का रत्न नीलम भी आपके लिए अत्यधिक घुड़नाल से अनुकूल व लाभप्रद रहेगा।

कुम्भ लग्न में जन्मे जातक प्रायः न्यायाधीश लेखक, वैज्ञाानिक, इंजिनियर, ज्योतिषी, अध्यापक, दार्शनिक, बिजली एवं प्रिटिंग उधोग में कार्य करने वाले एवं मशीनरी कारीगर आदि का कार्य करने वाले होते हैं। ऐसे जातक आवश्यकता पड़ने पर ही किसी कार्य को करते हैं तथा इनकी उन्नति एवं अवनति आकस्मिक रूप से ही हुआ करती है। कुम्भ लग्न में जन्मे जातकों को  जीवन में अधिक विपदाओं का सामना करना पड़ता है। कठिन से कठिन विपत्ति व परिस्तिथि आन पड़ने पर भी ये तनिक भी नहीं घबराते हैं। संघर्षरत रह कर ही इनके जीवन का निर्माण होता है। इनका भाग्योदय 25, 28, 36 या 42वें वर्ष में होता है। ऐसे जातक, मानसिक शक्ति के धनी होते ही हैं एवं इनकी स्मरण शक्ति भी बड़ी प्रबल होती है।

विशेष (रोग)- कुम्भ लग्न हो, चन्द्रमा निर्बल होकर शनि के साथ आठवेंघर में हो तो शत्रुकृत अभिचार या प्रेतबाधा से जातक को पीड़ा होती है। कुम्भ लग्न व लग्नेश (शनि) दोनों पापग्रहों के बीच हों, सातवें घर में भी पापग्रह हों और सूर्य निर्बल हो तो जातक जीवन से निराश होकर आत्महत्या करता है।

कुम्भ लग्न हो तथा लग्न या द्वादश भाव में शनि, सूर्य, राहू व मंगल के साथ हो तो जातक सदैव ही रोगी रहता है। अथवा लग्न में पापग्रह हों और लग्नेश निर्बल हो तो भी जातक रोगग्रस्त रहता है।कुंभ लग्न हो, बुध, शुक्र व शनि की युति दुःस्थानों में हो तो जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है।

कुम्भ लग्न में षष्ठेश (चन्द्र) पापग्रहों से दृष्ट हो तो जातक नेत्रों से

जलस्राव के कारण अन्धा हो सकता है (सूर्य, द्वितीय व द्वादश भाव भी विचारें)।

कुम्भ लग्न हो, चौथे भाव में पापग्रह हों, चतुर्थेश (शुक्र) पापग्रहों के

मध्य हो तो जातक हृदय रोगी होता है। अथवा चतुर्थेश (शुक्र) अष्टमेश (बुध) के

साथ अष्टमस्थ हो तो भी जातक हृदय रोगी होता है।

कुम्भ लग्न, दसवें भाव में सूर्य दो पापग्रहों के मध्य हो तो जातक को हार्ट

अटैक होता है। अथवा चौथे भाव में राहू अन्य पापग्रहों से दृष्ट हो तो भी जातक कोहार्ट अटैक होता है।

कुम्भ लग्न, चतुर्थेश शुक्र नीच का हो (कन्या राशि में अर्थात् कुम्भ लग्न

के आठवें भाव में), निर्बल या अस्त हो तो भी जातक हृदय रोगी होता है।

अतिविशेष-शनि पांचवें या नौवें घर का स्वामी हो अथवा लग्नेश हो

अथवा 3, 6, 11 भावों में से किसी का स्वामी होकर 5,9,3,6,11 भावों में से

किसी भाव में बैठा हो तथा मित्र ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक को धन प्रदान करने

वाला तथा धनवृद्धि कारक होता है (भले ही लग्न कोई भी हो)। ऐसे जातक को

शनि की महादशा/अन्तर्दशा/ढैया/साढ़ेसाती लाभकारी होती है। अतः शनि सभी

को अशुभ नहीं होता। विशेषकर वृष एवं तुला लग्न वालों को तो शनि योगकारक

भी होता है।विशेष-मकर या कुम्भ लग्न वालों को (जिनका लग्नेश शनि हो) सूर्य

को जल नहीं चढ़ाना चाहिए (अथवा शनि जिन्हें योगकारक व धनकारक हो उन्हें भी सूर्य को जल चढ़ाना लाभकारी नहीं रहता)। क्योंकि सूर्य एवं शनि में प्रबल

शत्रुता है। अतः सूर्य को प्रसन्न करने का प्रयास शनि को रुष्ट करने का कारण बन जाता है।

लग्नेश शनि, चौथे व् नवें भाव का स्वामी शुक्र व् पंचमेश बुद्ध कुंडली के कारक गृह हैं ! अतः इनसे सम्बंधित रत्न नीलम, हीरा रत्न पन्ना रत्न धारण किया जा सकता है! इस लग्न कुंडली में मंगल तीसरे व् दसवें का स्वामी होकर एक सम गृह बनता है! कुछ विशेष परिस्थियों में मूंगा भी धारण किया जा सकता है । ध्यान देने योग्य है की किसी भी कारक या सम गृह के रत्न को धारण किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए ये देखना अति आवश्यक है की गृह विशेष किस भाव में स्थित है ! यदि वह गृह विशेष तीसरे, छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित है या नीच राशि में पड़ा हो तो ऐसे गृह सम्बन्धी रत्न कदापि धारण नहीं किया जा सकता है । कुछ लग्नो में सम गृह का रत्न कुछ समय विशेष के लिए धारण किया जाता है, फिर कार्य सिद्ध हो जाने पर निकल दिया जाता है! इसके लिए कुंडली का उचित निरिक्षण किया जाता है! उचित निरिक्षण या जानकारी के आभाव में पहने या पहनाये गए रत्न जातक के शरीर में ऐसे विकार पैदा कर सकते हैं जिनका पता लगाना डॉक्टर्स के लिए भी मुश्किल हो जाता है 

कुंभ लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

समस्त विश्व को प्रकाशित करने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. 

मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है जबकि दशमेश होने के कारण यह जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्थेश होने के कारण यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का कारक होता है. एवम नवमेश होने के कारण धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. कुंभ लग्न में एक केंद्र और एक त्रिकोण का स्वामी होकर शुक्र अतीव शुभ और राजयोग कारक ग्रह बन जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में अतयंत शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से न्य़ून शुभ फ़लों के साथ अधिक अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध पंचम भाव का स्‍वामी होकर जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति एकादश भाव का स्‍वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के नाते यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व इत्यादि का प्रतिनिधि होता है जबकि द्वादशेश होने के कारण यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. 

राहु अष्टम भाव का स्वामी होकर यहां अष्टमेश होता है जिसके कारण उसे जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व मिलता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु द्वितीय भाव का स्वामी होकर यहां जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

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