ग्रहण योग वैदिक ज्योतिष के अनुसार
ग्रहण योग वैदिक ज्योतिष के अनुसार ग्रहण योग ग्रहण- विचार चन्द्र और सूर्य के ग्रहणों का ज्ञान भारत में वेदकाल से ही चलता आया है । यह सृष्टि का एक चमत्कार है। प्रायः सभी राष्ट्रों में ग्रहणों के फल बहुत अशुभ माने गये हैं। अब भी सर्वत्र वेधशालाओं में ग्रहणों के वेध लेने की बहुत कोशिश की जाती है। पश्चिमी ज्योतिषी भी ग्रहणों के फल अशुभ ही मानते हैं। चन्द्र का ग्रहण पौर्णिमा के पूर्ण होने पर हो सकता है। चन्द्र और राहु का अन्तर सात अंश से कम हो तो ग्रहण अवश्य होता है। सात से नौ अंशों तक अन्तर होने पर ग्रहण की सम्भावना होती है। इस से अधिक अन्तर हो तो ग्रहण नहीं होता। राहु की पात कक्षा में चन्द्र हो और उस का शर एक या डेढ़ अंशो में हो तो ग्रहण होता है। ऐसी स्थिति में पृथ्वी और सूर्य की विरुद्ध दिशा में चन्द्र होता है तथा पृथ्वीं की छाया से चन्द्र का कुछ भाग आच्छादित होता है- यही ग्रहण कहलाता है। जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्र आता है तब सूर्य का कुछ भाग दीखता नहीं है- यही सूर्य ग्रहण है । सूर्य ग्रहण में सूर्य, चन्द्र तथा राहु का विचार करना होता है। चन्द्रग्रहण मे...