ग्रहण योग वैदिक ज्योतिष के अनुसार

 ग्रहण योग  वैदिक ज्योतिष के अनुसार


ग्रहण योग 

ग्रहण- विचार


चन्द्र और सूर्य के ग्रहणों का ज्ञान भारत में वेदकाल से ही चलता आया है । यह सृष्टि का एक चमत्कार है। प्रायः सभी राष्ट्रों में ग्रहणों के फल बहुत अशुभ माने गये हैं। अब भी सर्वत्र वेधशालाओं में ग्रहणों के वेध लेने की बहुत कोशिश की जाती है। पश्चिमी ज्योतिषी भी ग्रहणों के फल अशुभ ही मानते हैं।


चन्द्र का ग्रहण पौर्णिमा के पूर्ण होने पर हो सकता है। चन्द्र और राहु का अन्तर सात अंश से कम हो तो ग्रहण अवश्य होता है। सात से नौ अंशों तक अन्तर होने पर ग्रहण की सम्भावना होती है। इस से अधिक अन्तर हो तो ग्रहण नहीं होता। राहु की पात कक्षा में चन्द्र हो और उस का शर एक या डेढ़ अंशो में हो तो ग्रहण होता है। ऐसी स्थिति में पृथ्वी और सूर्य की विरुद्ध दिशा में चन्द्र होता है तथा पृथ्वीं की छाया से चन्द्र का कुछ भाग आच्छादित होता है- यही ग्रहण कहलाता है। जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्र आता है तब सूर्य का कुछ भाग दीखता नहीं है- यही सूर्य ग्रहण है । सूर्य ग्रहण में सूर्य, चन्द्र तथा राहु का विचार करना होता है। चन्द्रग्रहण में चन्द्र और राहु का ही विचार होता है। अब हम कुण्डली के भावों के अनुसार ग्रहण फलों का विचार करेंगे।


प्रथम स्थान में ग्रहण के फल

प्रथम स्थान में मेष, सिंह या धनु में राहु चन्द्र हो तो यह व्यक्ति विक्षिप्त, साहसी, गुस्सैल, बुद्धिमान होता है । बचपन में नजर लगना, रक्तदोष आदि से कष्ट होता है। दांत जल्दी नहीं आते; बोलना सीखने में देर लगती है। वृषभ, कन्या तथा मकर में-मन के अनुसार चलनेवाला किसी के प्रभाव में न आनेवाला, स्वार्थी, अपनी ही फिक्र करनेवाला, घर के लोगों की भी चिन्ता न करनेवाला, पत्नी से सरल व्यवहार न करनेवाला, कुछ व्यभिचारी, धन का संचय करनेवाला होता है।

में, सुख मिलता है। मिथुन, तुला कुम्भ में- पूर्वार्जित सम्पत्ति नही होती। अपनी मेहनत से प्रगती करते हैं।

इस स्थान में सूर्यग्रहण हो तो- पूर्वार्जित सम्पत्ति होती है किन्तु बड़े व्यवसायों में नुकसान हो कर आयु के ४२ से ४८ वे वर्ष तक निर्धन अवस्था आती है। फिर अपनी मेहनत से कुछ प्रगति करते हैं। निडर स्वभाव होता है। कीर्ति के लिए कोशिश करते है, स्वभाव से कम बोलनेवाले किन्तु मौका पा कर अच्छा बोलते है। प्रवास बहुत होता है। यह ग्रहण शुभ युति मे हो तो बड़े व्यवसायों में अच्छा लाभ होता है। उपयुक्त संस्थाओं को दानधर्म बहुत करता है। माता- पिता का सुख कम तथा पारिवारिक सुख अच्छा मिलता है। इस की पत्नी की मृत्यु इस से पहले होती है। इस की कीर्ति अच्छी होती है। सन्तति अच्छी नहीं होती।

धनस्थान में ग्रहण अशुभ हो तो प्रसिद्ध खानदान की हालत बिगड़ती है। घर के कई लोगों की मृत्यु एक ही विशिष्ट ढंग से होती है। आखिरी समय संकट आते हैं। दो पीढ़ियों में ही खानदान उजड़ जाता है। शुभ ग्रहण हो तो अप्रसिद्ध घराना धीरे-धीरे अच्छी हालत में आता है। विद्वान, बुद्धिमान व्यक्ति होते है। इस योग में विद्या अथवा धन में एक की प्राप्ति होती है। कुल में पहले धन हो तो वह नष्ट हो कर विद्वत्ता आती है। विद्वत्ता हो तो वह कम हो कर धन मिलता है। 

तीसरे स्थान के फल

इस स्थान में चन्द्र ग्रहण शुभ हो तो यह व्यक्ति विद्या में आसक्त, शान्त, बुद्धिमान, बिना शोरगुल के काम करनेवाला होता है। यह बहनों के लिए घातक योग है- वे जीवित नहीं रहतीं अथवा विधवा होती हैं अथवा कुटुम्ब सुख नहीं मिलता । माता तथा भाईयों के लिए भी मारक योग है। इस व्यक्ति को कीर्ति मिलती है। ग्रहण अशुभ युति में हो तो यह बहुत बोलनेवाला, खर्चीला, अविश्वासी, निपुत्रिक, कई ब्याह करनेवाला होता है। इसे कान के रोग होते हैं। वृद्ध वय में दाहिना कान बेकार होता है। क्वचित दृष्टि में भी दोष होता हैं। इस स्थान में सूर्य ग्रहण शुभ युति में हो तो यह व्यक्ति बहुत साहसी, अपने पराक्रम से प्रगति करनेवाला, लोकप्रिय, मिलनसार, सात्विक स्वभाव का, उदार, बड़े व्यवसाय 

करनेवाला, संस्थाओं का संस्थापक होता है। यह ग्रहण अशुभ युति में भाईयों को मारक होता है। उन्हें धन या सन्तति का कष्ट रहता है। अपघात से भाई बहनों का अन्त होता है। यह तामसी, गुस्सैल, गुस्से में आ कर लोगों का नुकसान करनेवाला, आलसी, निरुद्योगी होता है। यह झगडालू, व्यसनी, लोगों पर आश्रित, समाज के लिये निरुपयोगी होता हैं। इसे मस्तिष्क के विकार होते हैं।

चतुर्थ स्थान के फल

इस स्थान में चन्द्रग्रहण हो तो माता की मृत्यु ७ वें वर्ष के पहले होती है। इस के मृत्यु के बाद पत्नी जीवित रहती है। कई व्यवसाय करता है। जन्मभूमि से दूर जाना पड़ता है। यह असफल, अपमानित, अविश्वसनिय होता है। क्वचित गोद जाने का योग होता है। इस का स्वभाव निग्रही, किसी को न माननेवाला, अपने ही मन से चलनेवाला व्यवसाय में गलती करनेवाला होता है। इस की स्थावर सम्पत्ति नष्ट होती है। स्थिति अस्थिर रहती है । अन्त में दारिद्र रहता है। मृत्यु के समय इस का अपना घर नही होता। इस के माता के कुल में वंशवृद्धि नहीं होती या बड़े रोग होते हैं। इस के कुल में किसी बड़े दोष से हालत बिगड़ कर अगली पिढ़ि दरिद्र होती है। यह ग्रहण शुभ युति में हो तो कीर्ति बहुत और पैसा कम मिलता है। आचरण अच्छा होता है। इस योग में दो माताएं, दो पत्नियां होती हैं। यह लोगों के लिए बहुत अच्छे कार्य करता है किन्तु अपने घर का बहुत कल्याण नहीं कर पाता । यह साहसी होता है। घरबार मिलता है किन्तु टिकता नही। वृध्द आयु में बच्चों से कष्ट होता है। अन्त दारिद्र्य में तथा चमत्कारिक रीति से होता है। इस स्थान में सूर्य ग्रहण शुभ युति में हो, तो पूर्वार्जित इस्टेट नहीं होती । हो तो नष्ट हो जाती है। ऐसे व्यक्ति अपनी मेहनत से प्रगति करते हैं। इनको पिता का सुख कम तथा माता का सुख अच्छा मिलता हैं। यह प्रामाणिक, विश्वासु, व्यवसाय में कुशल होता है। धन अच्छा मिलता है। दान बहुत करता है। सदाचारी, शीलवान, नियमित, स्वाभिमानी, मिलनसार, बलवान शरीर का, परोपकारी, लोगों के लिये कष्ट सहनेवाला होता है।

यह ग्रहण अशुभ युति में हो तो स्वभाव हलका, अविश्वासु, सच और झूठ की फिक्र न करनेवाला, शीलरहित, पापपुण्य से उदासीन होता है। माता को कष्ट होता है अथवा उसकी मृत्यु होती है। इसका किसी से बनता नही चतुर्थ स्थान में ग्रहण हो तो सन्तति नहीं होती अथवा पहली सन्तति के बहुत बाद दूसरी सन्तति होती हैं। वृध्दायु में अधिक सन्तति होती है

पाँचवें स्थान के फल

इस स्थान में चन्द्रग्रहण शुभ युति में हो तो यह बुद्धिमान, संशोधक, शान्त, स्त्रीभोग से कुछ उदासीन, कीर्तिमान होता है। मृत्यु के बाद इस की कीर्ति नहीं होती। पुत्र नहीं होते अथवा अल्पायु होते हैं। शीलवान होता है। माता की मृत्यु जल्दी होती है। यह उच्च दैवी प्रेम का इच्छुक होता है तथा पत्नी पर ऐसा ही उदात्त प्रेम करता है। ग्रहण अशुभ युति में हो तो यह बुद्धिभ्रष्ट, दुराचारी, परस्त्रियों में आसक्त, उद्योग में अस्थिर, सांसारिक सुख से वंचित तथा कुल की कीर्ति को नष्ट करनेवाला होता है। इस स्थान में सूर्य ग्रहण शुभ युति में हो तो अतिशय कीर्ति का योग होता है। इस के विवाह दो तथा पुत्र बहुत कम होते है। यह बड़े उद्योग कर के बहुत धन कमाता है। बहुत विद्या सीख कर विदेश में भी जाता है। संस्थाएं स्थापित करता है। शान्त, मिलनसार, दयालु, नियमित होता है। अशुभ युति में ग्रहण हो तो यह उदन्ड, किसी की परवाह न करनेवाला, जंगली जैसा, तामसी, गुस्सैल, निरुद्योगी, आलसी दूसरों के व्यवसाय में विघ्न लानेवाला, झूठी अफवाहें फैलानेवाला, व्यभिचारी होता है। इसकी पत्नी को सन्ततिप्रतिबन्धक रोग होते हैं। इस स्थान में ग्रहण से पेट के रोग, तथा गुप्त रोग होते है। स्त्रीसुख की चिन्ता रहती है।

छठवें स्थान के फल

इस स्थान में चंद्र ग्रहण शुभ युति में हो तो शरीर नीरोग रहता है। अकारण शत्रु बहुत होते हैं किन्तु शत्रुत्व कायम नहीं रहता। इस की नौकरी ठिक तरह चलती है, पेन्शन निर्बाध मिलती हैं। प्रगति होती है। लोगों पर प्रभाव रहता है। योगाभ्यास की ओर रुचि होती है। व्यवहार ठीक रहते हैं। अशुभ युति में ग्रहण हो तो हमेशा रोग होते है। रोगों की चिकित्सा डॉक्टर या वैद्य नहीं कर पाते रोगी अवस्था के कारण असमय में पेन्शन लेनी पड़ती है। योगाभ्यास में दोष होने से रोग होते है। इस के व्यवहार हमेशा उलझन भरे रहते है। उन्नति के लिये यह जो काम करता है। उस से अवनति ही होती है। लोगों में निन्दा का पात्र होता है। तरह तरह की अफवाहे फैलती हैं। अकारण विवाद करनेवाला, झगड़ालू,शत्रुओं से त्रस्त होता है। रोग अल्पकाल के होते हैं।


इस स्थान में सूर्यग्रहण शुभ युति में हो तो मेहनत से प्रगति होती है। नौकरी में प्रगति हो कर पेन्शन योग्य समय में मिलती है। वरिष्ठ अधिकारी से झगड़कर प्रगति होती है। शरीर नीरोग रहता है तथा शत्रु नष्ट होते हैं। सब व्यवहार सरल होते हैं। यह ग्रहण अशुभ युति में हो तो हमेशा रोग होते हैं। शत्रु बहुत होते हैं। व्यवसाय में नुकसान होता हैं। नौकरी ठीक नहीं चलती। असमय में पेन्शन लेनी पड़ती है। इस का स्वभाव दुष्ट, स्वार्थी वंचक होता है।

इस स्थान में ग्रहण का साधारण फल इस प्रकार है। मामा मौसियों का संसार ठीक नहीं होता- मौसियाँ विधवा होती हैं, मामा को पुत्र सन्तति नहीं होती । इस स्थान में ग्रहण से अनैतिक संम्बध-परस्त्री, परपुरुष से सम्बन्ध होना अथवा अविवाहित रहना या पुत्रहीन होना यह फल भी देखा है। किन्तु वसिष्ठ के कथनानुसार इस स्थान में ग्रहण शुभ फल देता है। यथा-त्रिषट्दशाविलग्ने नराणां शुभप्रदं स्यात् ग्रहणं रवीन्द्वो। द्विसप्तनन्देषु च मध्यमं स्यात् शेषष्वनिष्टं मुनयो वदान्ति । सूर्य अथवा चन्द्र का ग्रहण ३-६-१० इन स्थानों में शुभ होता है, २- ७-९ इन में मध्यम यथा बाकी स्थानों में अनिष्ट होता है।

सातवें स्थान के फल

इस स्थान में चन्द्र ग्रहण शुभ युति में हो तो सप्तम स्थान के विषय-स्त्री तथा उद्योग में किसी एक की हानि होती है। शुभ युति में स्त्री राशि में हो तो साधारण फल मिलते हैं। विवाह एक ही होना, पति पत्नी में अच्छा प्रेम रहना, नौकरी या धन्धा ठीक चलना आदि फल मिलते हैं। यह सदाचारी और समाधानी होता है। किन्तु भाग्योदय विशेष नहीं होता। वृध्द वय में पत्नी की मृत्यू पहले होती है। उस का स्वास्थ अच्छा नहीं रहता। ग्रहण पुरुष राशि में अशुभ युति में हो तो विवाह अधिक होते हैं। नौकरी स्थिर नहीं रहती। सन्तति बहुत कम होती है। आपत्तियां बहुत आती है। स्त्री का स्वभाव अच्छा न होने से संसार से उदासीन होता है। घर छोड़ने या देहत्याग की इच्छा होती है।

इस स्थान में सूर्य ग्रहण शुभ हो तो स्त्रीमुख साधारण अच्छा मिलता है। ४८ वे वर्ष में स्त्री का मृत्युयोग होता है। सन्तति १-२ होती है। यह अकाल के बाहर के धन्धे करता है। लोगों में कीर्ति पाता है। लोकोपयोगी कार्य करता है। अशुभ योग हो तो स्त्री सुख नहीं मिलता, नौकरी स्थिर नहीं होती, विवाह अनेक होते हैं, अपना घरबार कभी नहीं हो पाता, प्रवास से बहुत कष्ट होता है। आठवें स्थान के फल

इस स्थान में चन्द्र ग्रहण शुभ हो तो आयु ३८ वर्ष तक होती है। इसी अल्पकाल में कीर्ति मिलती है। स्त्रीधन मिलता है। अशुभ हो तो अल्पायु होता है, आयुष्य कष्टपूर्ण होता है। स्त्री या सन्तति का सुख नहीं मिलता। सूर्य ग्रहण शुभ हो तो ४८ वर्ष तक आयु होती है। स्त्री अच्छी मिलती है। विवाह जल्दी होता है। स्त्रीधन मिलता है। पुत्र एक ही होता है। स्वास्थ अच्छा रहता है किन्तु आयु के पूर्वार्थ में कष्ट रहता है। अशुभ हो तो विवाह में कठिनाई होती है। धनहानि होती है। आयु के उत्तरार्ध में शारीरिक कष्ट होता है। क्षय दमा या श्वास पण्डु रोगादि से कष्ट होता है।

नौवें स्थान के फल

इस स्थान में चन्द्र ग्रहण शुभ युति में हो तो इस की अगली पीढ़ी बहुत भाग्यवान होती है। लम्बे प्रवास, यात्राएं होती है। धार्मिक वृत्ति तथा शील अच्छा होता है। इसे छोटे भाई नहीं होते-बहनें रहतीं हैं। बहनों के पोषण की चिन्ता रहती है। यह बहुपत्नी योग है। इसे प्रथम कन्याएं होती है। वृध्दायु में पुत्र होता है। बचपन से मेहनत कर प्रगति करता है। नौकरी अच्छी तरह होती है। माता या पिता की बचपन में ही मृत्यु होती है। आयु के अन्तिम भाग में घरबार प्राप्त होता है। पूर्वार्जित सम्पत्ति को यह बढ़ाता है। ग्रहण अशुभ हो तो यह व्यभिचारी होता है। पिता की बचपन मे मृत्यु होती है। भाई बहनें नहीं होतीं। इज्जत नही होती । हीन स्त्रीयों से सम्बन्ध रखता है। यह परावलम्बी, बेकार भटकनेवाला, गप्पे हांकनेवाला, कुल की कीर्ति नष्ट करनेवाला होता है। इस स्थान में सूर्य ग्रहण शुभ युति मे हो तो यह कीर्तिमान, तेजस्वी, कार्यकुशल होता है। इस के पुत्र भाग्यवान होते हैं। किसी के मदद के बिना प्रगति करता है। दयालु, संस्थाओं का स्थापक, मिलनसार, शीलवान, विद्वान होता है। शिक्षा पूरी होती है। यह योग भाई बहनों के लिए मारक है। भाई रहे तो समझदारी से बटवारा होता है। एक साथ रहे तो भाई की प्रगति में बाधा रहती है। भाई बहनों से बनती नहीं। यह प्रीतिविवाह करता है किन्तु अपने धर्म को नहीं छोड़ता। शिक्षा या व्यवसाय के लिए विदेश में जाता है। इस योग में कीर्ति अधिक और धन कम मिलता है। ग्रहण अशुभ युति में हो तो आलसी, उद्योग रहित, परावलम्बी, व्यभिचारी, हमेशा भटकनेवाला होता है। विवाह न करने की प्रवृत्ति होती है। माता-पिता का सुख जल्दी नष्ट होता है। भाई-बहनें नहीं होती या उन से झगड़े होते हैं। बटवारे में झगड़े होते है। लोगों में अप्रिय होता है। नौकरी या व्यवसाय में अस्थिरता रहती है। नेत्ररोग या कान के रोग होते है। इस स्थान में ग्रहण के शुभफल का मुख्यसमय १९ व २१ वे वर्ष से तथा अशुभ फलों का मुख्य समय २८ व ३७ वे वर्ष से रहता हैं तब अपमान, धनहानि कुटुम्ब के लोगों की मृत्यु आदि होती है।

दसवें स्थान के फल

इस स्थान में चन्द्रग्रहण शुभ युति में हो तो पूर्वार्जित इस्टेट नहीं होती। खुद की कमाई सम्पत्ति उपयुक्त संस्थाओं को दान देता हैं बचपन से कष्ट कर प्रगति करता है। पिता दीर्घायु होता है। यह स्वतंत्र वृत्ति का, किसी का आश्रीत न रहने वाला होता है। इस की शिक्षा धनार्जन के काम नहीं आती। दूसरे ही व्यवसाय में कीर्ति मिलती है। तपस्वी, निग्रही, योगी, जनता का सेवक, राजनीतिक या सामाजिक आन्दोलन का नेता, सामाजिक तत्वों का पुरस्कर्ता तथा इन के प्रसार के लिए कष्ट सहनेवाला होता है। विचारशील, प्रगल्भ बुद्धि का, न्याय में कुशल, लोगों को अपने विचार समझाने में प्रवीण होता है। ग्रहण अशुभ युति में हो तो यह हलके धन्धे करनेवाला, गप्पें लड़ानेवाला स्वार्थी, व्याभिचारी, व्यसनों में पूर्वार्जित सम्पत्ति गमानेवाला, आलसी, निरुद्योगी, उपयोगी कार्यों में विघ्न लानेवाला, झगड़े बढ़ानेवाला होता है। यह किसी एक धन्धे में स्थिर नहीं रह पाता। शिक्षा पूरी नहीं होती।


इस स्थान में सूर्यग्रहण शुभ युति में हो तो माता पिता की मृत्यु बचपन में होती है। पूर्वार्जित इस्टेट नहीं होती। अपने कष्ट से धन, विद्या प्राप्त करता है तथा बड़ा अधिकारी अथवा अकल्पित व्यवसाय करनेवाला होता है। ग्रहण अशुभ युति में हो तो माता-पिता का सुख नहीं मिलता, पूर्वार्जित सम्पत्ति नही होती ।

इसे सन्तति नहीं होती । यह दत्तकपुत्र होता है अथवा दत्तक लेता है । आयुष्य में स्थिरता होती है, बहुत प्रगति नहीं होती। प्रवास बहुत होता है। यह द्विभार्या योग है। साधारणतः इस स्थान का सूर्यग्रहण उन्नति का सूचक है। जीवन समाधानपूर्ण रहता है।

ग्यारहवें स्थान के फल

इस स्थान में चन्द्र ग्रहण शुभ युति में हो तो लाभ बहुत होता है। कई व्यवसाय होते हैं। विधानसभा आदि में चुने जाते हैं तथा उस काम में कीर्ति मिलती हैं। इसे कन्याएँ अधिक होती है। पुत्र नहीं होते अथवा हो कर मृत होते हैं, गर्भपात होते हैं। इसे बड़े भाई के कुटुम्ब का पोषण करना पड़ता है। रिश्वत लेने से हानि नहीं होती। मृत्यु के समय सन्तुष्ट होता है। ग्रहण अशुभ युति में हो तो सन्तति नहीं होती । लाभ के समय विघ्न आते हैं वासना बुरी होती है। रिश्वत से हानि होती हैं। बड़े भारी के कुटुम्ब का पोषण करना पडता हैं। आंख या कान के रोग होते हैं। इस स्थान में सूर्यग्रहण शुभ योग में हो तो अचानक बहुत लाभ होते


। ३६ वे वर्ष में धन, कीर्ति, सन्मान मिलता है। पूर्व आयु में व्यवसाय सफल रहता है। पिता, भाई आदि नहीं रहते। यह अधिकार योग है। पुत्र एक होता है। तथा वह भाग्यवान होता है। कन्याएं बहुत होती हैं। अशुभ योग में ग्रहण हो तो सन्तति नहीं होती । पत्नी को आर्तवशूल मासिक धर्म अनियमित होना, आदि से कष्ट होता है। सन्तति हुई तो अल्पायु होती है। गर्भपात होते हैं। व्यवसाय मे लाभ नहीं होता । हमेशा मानहानी तथा आर्थिक अड़चनें रहती है। बुद्धिभ्रंश या मस्तिष्क के विकार होते हैं।

बारहवें स्थान के फल

इस स्थान में चन्द्रग्रहण शुभ योग में हो तो कीर्ति मिलती है। पूर्व वय में जीविका के लिए प्रवास करना पड़ता हैं। उत्तर आयु में स्थिरता रहती है। पति- पत्नी सम्बन्ध प्रेमपूर्ण रहते है। मन विरक्त रहता है किन्तु व्यवहारी होते हैं। अपवाद आते हैं किन्तु वे दूर भी होतें हैं। व्यवसाय में कुशल, साहसी, दुनिया में कहीं भी जाने को तैयार, लोकप्रिय, मिलनसार, नियमित, प्रसंगावधानी, उदार होते हैं। अकेले खाने को जी नहीं चाहता। दयालु, परोपकारी होता है। अशुभ योग में ग्रहण हो तो अकारण ही पति-पत्नी में वियोग होता है। व्यभिचारी होने से अपवाद फैलते है। मुलकी या फौजदारी कारणों से कारागृह का योग होता है। अनपेक्षित संकट आते हैं। पुत्र कम होते हैं। तथा वे पिता के प्रतिकूल आचरण करते हैं। दो विवाह होते है।

इस स्थान में सूर्य ग्रहण शुभ युति में हो तो प्रसिद्धि मिलती है। बड़े कार्य करता है। राजकीय या सामाजिक नेता होता है। नौकरी या व्यवसाय में लोकप्रिय होता है। बड़े अधिकारी की नौकरी या बड़े व्यवसाय करता है। इसे आप्तमित्र बहुत होते हैं। अनाथों की मदद करता है। मृत्यु के बाद भी नाम रहता है। पति पत्नी में प्रेम रहता हैं। किन्तु प्रेम के झगड़े भी रहते हैं। यह चुनाव में जीतता है। संस्थाए स्थापन करता है। उन्हें दान देता है। राजकीय या सामाजिक आन्दोलन में दण्ड, कैद या निर्वासन मिलता है। ग्रहण अशुभ योग में हो तो अयोग्य कामों मे धन गमाता है। बुरी प्रसिध्दि मिलती है। स्त्रीसुख कम मिलता है। दो विवाह होते हैं। व्यभिचारी, गुप्त रोग या कुष्ठ जैसे रोगों से कष्ट होता है। पुत्र कम होते हैं। अयोग्य कामों में दण्ड, कैद मिलते हैं। अविश्वासी, कोई भी काम अधूरा करता है। लोगों से अलग रहता हैं। व्यवसाय में अस्थिरता रहती है। कभी नौकरी, कभी व्यवसाय करता है। शुभ कार्य कभी नहीं करता ।

इस प्रकार ग्रहणों के भावफल बतलाये। ग्रहण आकाश में दृश्य हो अर्थात कुण्डली के लग्न, व्यय, लाभ, दशम, नवम तथा अष्टम स्थान में हो तो ये फल स्पष्ट होते है। द्वितीय से सप्तम स्थान तक के ग्रहण दृश्य नहीं होते अतः पंचांग में भी इन ग्रहणों का कोई वर्णन नहीं होता। किन्तु वराह, वसिष्ठ, नारद, लोमेश, भरत, आदि संहिताओं में तथा दैवज्ञकामधेनू, मुहर्तमार्तण्ड, मुहूर्तचिन्तामणि, मुहूर्तप्रकाश, मुहूर्तगणपति, मुहूर्तदिपक, मुहूर्तदर्पण, मुहूर्तमाला, धर्मसिन्धु, निर्णयसिंधू, शूद्रकमलाकर आदि ग्रन्थों में द्वितीय से सप्तम तक के ग्रहणों के फल भी संक्षेप मे दिये है। अतः हमने भी इन फलों का वर्णन दे दिया है। पाठक इस का अनुभव से मिलान करें।

जब सूर्य या चन्द्रमा की युति राहू या केतु से हो जाती है तो इस दोष का निर्माण होता है। चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण दोष की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है। चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है। माँ के सुख में कमी आती है। किसी भी कार्य को शुरू करने के बाद उसे सदा अधूरा छोड़ देना व नए काम के बारे में सोचना इस योग के लक्षण हैं। मैंने अपने 10 साल के छोटे से अनुभव में ऐसी कई कुण्डलियाँ देखी है जिनमे यह योग बन रहा था और जातक किसी न किसी फोबिया या किसी न किस प्रकार का डर से ग्रसित थे। जिन लोगो में दिमाग में हमेशा यह डर लगा रहता है, उदाहरण के लिए समझे कि "मैं पहड़ो पर जैसे मनाली या शिमला घूमने जाऊँगा तो बस पलट जाएगी। रेल से वहां जाऊंगा तो रेल में बम बिस्फोट हो जायेगा।" इस प्रकार के सारे नकारात्मक विचार इसी दोष के कारण मन में आते है। अमूमन किसी भी प्रकार के फोबिया अथवा किसी भी मानसिक बीमारी जैसे डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया आदि इसी दोष के प्रभाव के कारण माने गए हैं यदि यहाँ चंद्रमा अधिक दूषित हो जाता है या कहें अन्य पाप प्रभाव में भी होता है, तो मिर्गी ,चक्कर व पूर्णत: मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है। सूर्य द्वारा बनने वाला ग्रहण योग पिता सुख में कमी करता है। जातक का शारीरिक ढांचा कमजोर रह जाता है। आँखों व ह्रदय सम्बन्धी रोगों का कारक बनता है। सरकारी नौकरी या तो मिलती नहीं या उसको निभाना कठिन होता है डिपार्टमेंटल इन्क्वाइरी, सजा, जेल, परमोशन में रुकावट सब इसी दोष का परिणाम है।


ग्रहण योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में बनने वाला एक अशुभ योग माना जाता है जिसका किसी कुंडली में निर्माण जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं पैदा कर सकता है। वैदिक ज्योतिष में ग्रहण योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ राहु अथवा केतु में से कोई एक स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि किसी कुंडली में यदि सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु में से किसी ग्रह का दृष्टि आदि से भी प्रभाव पड़ता हो, तब भी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यदि किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु का स्थिति अथवा दृष्टि से प्रभाव पड़ता है तो कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाता है जो जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसे भिन्न भिन्न प्रकार के कष्ट दे सकता है। ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है खा जाना तथा इसी प्रकार यह माना जाता है कि राहु अथवा केतु में से किसी एक के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ स्थित हो जाने से ये ग्रह सूर्य अथवा चन्द्रमा का कुंडली में फल खा जाते हैं जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

जिन्दगी में कामयाबी के लिए सकारात्मक सोच का होना बहुत ही आवश्यक होता है। जो व्यक्ति आशावादी होते हैं वह मुश्किल से मुश्किल हालात का सामना आसानी से कर लेते हैं। लेकिन जो लोग निराशावादी होते हैं वह छोटी से छोटी समस्या को समाने देखकर घबरा जाते हैं। ऐसे लोग साहसिक कदम उठा नहीं पाते हैं इसलिए इनकी सफलता की रफ्तार धीमी होती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कई बार कुण्डली में ग्रहों की स्थिति व्यक्ति को आशावादी और निराशावादी बनाती है। इसके लिए चन्द्रमा एवं राहु विशेष रूप से जिम्मेदार होते हैं।

स्मरण क्षमता में कमी
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्रमा और राहु एक ही घर में साथ-साथ होते हैं। उनकी कुण्डली में ग्रहण योग बनता है। यह योग जिनकी कुण्डली में होता वह निराशावादी होते हैं। ऐसे व्यक्ति की याद्दाश्त कमज़ोर होती है। इनके अंदर आत्मविश्वास की कमी होती है जिससे छोटी-छोटी बातों को लेकर यह तनाव में आ जाते हैं। ऐसे लोगों को नेत्र संबंधी रोग होने की आशंका रहती है। अगर राहु के साथ चन्द्रमा पहले अथवा आठवें घर में होता है तो व्यक्ति को मिरगी एवं दूसरे मानसिक रोग होने की भी संभावना रहती है।

कैरियर में बाधक राहु
जिस व्यक्ति की कुण्डली में एक ही घर में सूर्य, चन्द्र एवं राहु साथ होते हैं उनकी कुण्डली में ग्रहण योग का प्रभाव अधिक होता है। इन्हें कैरियर में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अकारण ही किसी बात को लेकर भयभीत रहते हैं। जीवन में कई बार गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। सूर्य एवं चन्द्र के साथ जब भी राहु की दशा चलती है, वह समय इनके लिए कष्टकारी होता है।

पिता के सुख में कमी
कुण्डली में सूर्य के साथ राहु होने पर भी ग्रहण योग बनता है। यह ग्रहण योग जिनकी कुण्डली में होता है वह किसी विषय पर गंभीरता से विचार किये बिना कार्य बैठते हैं जिसका इन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे लोग भी विषयों को अधिक समय तक याद नहीं रख पाते हैं। पिता से प्राप्त होने वाले सुख एवं सहयोग में कमी आती है। ऐसे लोग पैतृक स्थान से दूर जाकर कैरियर बनाते हैं।

ग्रहण योग के घातक प्रभाव

  • कुंडली में ग्रहण योग बनने पर जातक के सभी कार्य रुक जाते हैं और कई बार कार्य पूरा होते होते अचानक बाधा पहुंचता है। ऐसी स्थिति में ग्रहण योग बनता है। कुंडली में ग्रहण योग निर्माण से गर्भधारण करने में समस्याएं आती हैं और इस योग में पैदा हुआ जातक हमेशा बीमार ही रहता है। इस योग की वजह से आपके घर या व्यापार में अचानक बाधा होती है।
  • ग्रहण योग के कारण व्यक्ति को सही करियर चुनने में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पुरानी बीमारियाँ व्यक्ति को घेर लेती हैं, निराशा और अवसाद व्यक्ति के जीवन को बर्बाद कर देते हैं।
  • यदि ग्रहण योग सातवें घर में बनता है तो यह जीवनसाथी के साथ मतभेद की स्थिति पैदा करता है। ग्रहण योग से जातक को समाज में अपयश और बेइज्जती का सामना करना पड़ सकता है।
  • यदि कुंडली में ग्रहण योग है तो जिस भाव में यह योग बना हुआ है उस भाव को पीड़ित करके उस भव से संबंधित वस्‍तुत या सुखों में कमी आती है। ग्रहण योग जिस ग्रह से बनता है वह ग्रह भी स्‍वयं पीड़ित हो जाता है क्‍योंकि राहु, चंद्रमा और सूर्य दोनों परम शत्रु हैं। ऐसे में राहु सूर्य और चंद्रमा दोनों को पीड़ित करता है।
  • जब सूर्य और राहु की युति ग्रहण योग बनता है तो व्‍यक्‍ति को जीवन में यश नहीं मिलता। प्रतिष्‍ठा और प्रसिद्धि नहीं मिल पाती। ऐसा व्‍यक्‍ति भले ही कितना भी अच्‍छा काम करे उसे प्रशंसा मिल ही नहीं पाती। इस ग्रहण से पीड़ित व्‍यक्‍ति को पिता के सुख की भी कमी रहती है। स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍यांए भी जीवन में बनी रहती हैं।
  • चंद्रमा और राहु के योग से बनने वाले ग्रहण योग से से व्‍यक्‍ति को मानसिक रूप से अनेक समस्‍याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को मानसिक शांति नहीं मिल पाती। ऐसे व्‍यक्‍ति पर नकारात्‍मक सोच हावी रहती है। ये लोग छोटी-छोटी बातों को लेकर बहुत परेशान रहते हैं।

आइए अब किसी कुंडली में ग्रहण योग के निर्माण का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करते हैं। राहु तथा केतु प्रत्येक राशि में लगभग 18 मास तक रहते हैं, सूर्य एक राशि में लगभग एक महीने तक रहते हैं तथा चन्द्रमा एक राशि में लगभग अढ़ाई दिन तक रहते हैं। मान लीजिए कि राहु एक समय में वृश्चिक राशि में स्थित हैं तथा केतु वृष राशि में स्थित हैं। जब जब सूर्य गोचर करते हुए इन दोनों राशियों में से किसी एक राशि में आएंगे तथा एक महीने तक इस राशि में रहेंगे, इस बीच संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक जातक की कुंडली में ग्रहण योग होगा क्योंकि सब जातकों की कुंडलियों में सूर्य राहु अथवा केतु के साथ ही स्थित होंगें। इसी प्रकार चन्द्रमा भी गोचर करते हुए जब जब इन दोनों राशियों में से किसी एक में आएंगे तो कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाएगा। सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों के ही 12 राशियों में से किन्ही दो विशेष राशियों में स्थित होने की संभावना 6 में से 1 अर्थात हर छठी कुंडली में होगी इसलिए हर छठी कुंडली में सूर्य तथा हर छठी कुंडली में ही चन्द्रमा के कारण बनने वाला ग्रहण योग बनेगा। सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों में से किसी एक के राहु केतु के साथ स्थित होने की संभावना लगभग हर तीसरी कुंडली में बनती है तथा यदि इस ग्रहण योग की परिभाषा में वर्णित राहु केतु के दृष्टि प्रभाव को भी गिन लिया जाए तो लगभग 75% कुंडलियों में ग्रहण योग बन जाता है। इसका अर्थ यह निकलता है कि संसार के लगभग सभी जातक ही ग्रहण योग से पीड़ित होते हैं तथा इस योग के कारण कष्टों का सामना करते हैं।

यह आंकड़े निश्चिय ही वास्तविकता से बहुत परे हैं तथा इसी लिए किसी कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण होने के लिए उपर बताए गए नियमों के अतिरिक्त अन्य नियम भी होने चाहिएं। किसी कुंडली में राहु अथवा केतु द्वारा ग्रहण योग का निर्माण करने के लिए सबसे पहले उस कुंडली में राहु तथा केतु का अशुभ होना अति आवश्यक है क्योंकि शुभ होने की स्थिति में ये ग्रह सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ स्थित होकर भी ग्रहण योग नहीं बनाएंगे बल्कि कुंडली में कोई शुभ योग भी बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त राहु, केतु तथा सूर्य चन्द्रमा की कुंडली में स्थिति, बल तथा इन सभी ग्रहों पर अन्य शुभ अशुभ ग्रहों का प्रभाव भी देखा जाता है जो ग्रहण योग के निर्माण तथा फलादेश में बहुत अंतर पैदा कर सकता है। इसके अतिरिक्त भी कुंडली में से कुछ अन्य आवश्यक तथ्यों का निरीक्षण किया जाता है तथा तत्पश्चात ही कुंडली में ग्रहण योग के निर्माण तथा फलों का निर्णय लिया जाता है।

मैने ऐसी अनेक कुंडलियों का अध्ययन किया है जिनमें ग्रहण योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार इस योग के बनने के पश्चात भी वास्तव में यह दोष कुंडली में या तो बनता ही नहीं है या फिर इसका बल बहुत कम होता है जिसके कारण यह योग जातक को कोई विशष अशुभ फल नहीं दे पाता। यहां पर इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी कुंडली में राहु अथवा केतु के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ बनने वाले कुछ संयोग कुंडली में ग्रहण योग न बना कर कोई शुभ अथवा बहुत शुभ योग भी बना सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में शुभ केतु का शुभ सूर्य के साथ संबंध जातक को किसी सरकारी संस्था में लाभ, प्रतिष्ठा तथा प्रभुत्व वाला पद दिलवा सकता है तथा यह योग जातक को बहुत योग्य तथा सक्षम पुत्र भी प्रदान कर सकता है जो जातक के लिए बहुत भाग्यशाली तथा शुभ सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार किसी कुंडली में शुभ राहु के चन्द्रमा के साथ स्थित हो जाने पर शक्ति योग बन सकता है तथा इस प्रकार का शक्ति योग जातक को ऐश्वर्य, सुख सुविधा, किसी सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्था में लाभ तथा प्रभुत्व वाला कोई पद आदि भी प्रदान कर सकता है। इस प्रकार चन्द्र राहु से बनने वाले शक्ति योग के प्रभाव में आने वाले जातक ग्रहण योग के अशुभ फलों से बिल्कुल विपरीत शक्ति योग के शुभ फल प्राप्त करते हैं जिससे एक बार फिर यह सिद्ध हो जाता है कि किसी कुंडली में राहु अथवा केतु का सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ संबंध कुंडली में केवल ग्रहण योग ही नहीं बनाता बल्कि यह संबंध कुंडली में किसी शुभ योग का निर्माण भी कर सकता है।

इसलिए किसी कुंडली में केवल राहु अथवा केतु के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ संबंध के आधार पर ही कुंडली में ग्रहण योग के बनने का निर्णय नहीं लेना चाहिए तथा कुंडली में राहु, केतु, सूर्य और चन्द्रमा के बल, स्वभाव तथा स्थिति का भली भांति निरीक्षण करने के पश्चात ही यह निर्णय लेना चाहिए कि कुंडली में इन ग्रहों के संयोग से ग्रहण योग बन रहा है अथवा शक्ति योग जैसा कोई शुभ योग।

 

चन्द्र व केतु की युति :-

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कुण्डली में चन्द्र के साथ केतु की युति होने पर व्यक्ति को समझ पाना कठिन होता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति कब क्या कर बैठे यह समझना मुश्किल होता है. अगर आपकी कुण्डली में यह युति बन रही है तो आपके लिए उचित होगा किसी भी कार्य को करने से पूर्व उस पर अच्छी तरह विचार कर लें अन्यथा अपने कार्यों के कारण आपका मन दु:खी हो सकता है. वैसेआपमें अच्छी बात यह है कि अपनी ग़लतियों से सबक लेंगे और अपने आस-पास की बुराईयों को दूर करने की कोशिश करेंगे.किसी एक स्थान पर केतु एवं चंद्रमा की स्थिति हो तो चंद्र ग्रहण योग योगों से कई प्रकार की ग्रह स्थिति का परिणाम बदल जाता है। इनके प्रभाव अत्यंत प्रबल होने के साथ ही जीवन को बहुत प्रभावित करते हैं।इन्हीं योगों में ग्रहण योग बहुत साधारण होकरभी विशेष प्रकार से असरकारी है।जन्म पत्रिका में किसी एक स्थान पर केतु एवं चंद्रमा की स्थिति हो तो चंद्र ग्रहण योग बनता है। इसमेंभी केतु एवं चंद्रमा के अंशों में नौ अंश से कम का अंतरहो तो ग्रहण योग बनता हैपरंतु नौ अंश से अधिक के फासले परयह योग प्रभावकारी नहीं होता है।

यदि दोनों ग्रहों की दूरी सात अंश से कम की हो तो इस योग का फल अधिक पड़ता है। केतु-चंद्रमा का अंतर डेढ़ अंश से कम होने पर यह योग पूर्णप्रभावकारी रहता है। यह योग

1.प्रथम भाव में हो तो खर्च दोषदाँत का देरी से आना एवं धन संचय का योग बनता है।

2.द्वितीय भाव में खुद के परिश्रम से धन प्राप्त करना,खाने के शौकीन होना एवं बचपन में कष्ट पाने का योगबनता है।

3.तृतीय स्थान में केतु-चंद्र की युति सेशांत प्रकृति वालेप्रसिद्धि पाने वाले एवं दाहिने कान में तकलीफ की संभावना आतीहै।

4.चतुर्थ स्थान में जन्मभूमि से दूर जाना पड़ता हैमेहनत सेप्रगति करते हैं। दान की प्रवृत्ति अधिक

होती है।

5.पंचम स्थान का ग्रहण जातक को बुद्धिमानईश्वर भक्त औरकामी बनाता है।

6.छठे भाव में शरीर निरोगी रहता है।शत्रु बहुत उत्पन्न होते हैंलेकिन जल्दीही समाप्त हो जाते हैं। मातृपक्ष कीचिंता होती है।

7,सप्तम भाव में ग्रहण योग दाम्पत्य जीवन कोअच्छा करता है। व्यापार में हानि का योग बनता है,पलायनवादी दृष्टिकोण को जन्म देता है।

8.आठवें स्थान में केतु-चंद्र की युति से अल्पायु मेंप्रसिद्धि मिलती हैस्त्री से धन प्राप्तहोता हैआर्थिक हानि उठाना पड़ती है।

9.नौवें घर में संतान की प्रगति होती है,लंबे प्रवास का योग बनता हैधार्मिक कार्य करते हैं और आलस्यआता है।

10.दशम भाव में योगीहल्का व्यापार करने वाला एवंसामाजिक कार्य में संलग्नता का फल देता है।

11.ग्यारहवें स्थान में चंद्र-केतु की युति काम सेप्रसिद्धि दिलाती है। अनैतिक तरीके से धनएकत्र करने पर परेशानी उठाना पड़ती है। आँख या कान के रोग उत्पन्न होते हैं।

12.बारहवें स्थान में इस योग का फल कुशल व्यवसायीके रूप में मिलन सारिता के रूप में एवं दाम्पत्य जीवन में तनाव की स्थिति उत्पन्न करता है।

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ग्रहण योग के निवारण के कुछ सामान्य उपाय
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सूर्य ग्रह दोष से उपाय

  • सप्ताह के प्रत्येक दिन सूर्य को जल अर्पित करें।

  • अविवाहित कन्या को लाल कपड़ा भेंट करें।

  • रविवार को नमक का सेवन न करें।

  • आदित्य हृदय स्तोत्र का जाप करें।

  • महा मृत्युंजय मंत्र का 1,25,000 बार जप करें।

  • यदि आपके पास एक गुरु है, तो आपको अपने गुरु का सम्मान करना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए।

  • राहु और केतु के नकारात्मक प्रभाव को शांत करने के लिए भगवान शिव और हनुमान की पूजा करें।

  • 5 रविवार, और अमावस्या के दिन, आप प्रातः 10 बजे से पहले एक पैकेट गेहूं के दाने और नारियल को बहते जल में अर्पित कर सकते हैं।

 

चंद्र ग्रहण दोष से उपाय

  • अविवाहित लड़की को सफेद कपड़ा दान करें।

  • कन्याओं को खीर अर्पित करें।

  • गायत्री मंत्र का जाप करें।

  • महा मृत्युंजय मंत्र का 1,25,000 बार जप करें।

  • आप पूर्णिमा के दिन उपवास कर सकते हैं और चंद्रमा को जल चढ़ा सकते हैं।

  • सोमवार को शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।

  • सोमवार के दिन सफेद खाद्य पदार्थों का दान करेंl

  • अन्य उपचार

  • आप अपने घर में पूजा स्थल पर सिद्धि यंत्र रख सकते हैं। आप घर पर महा मृत्युंजय यंत्र, हनुमान यंत्र, या राहु / केतु यंत्तर भी रख सकते हैं। ये उपाय पूरी तरह से इन दोषों की नकारात्मकता को दूर नहीं कर सकते हैं, लेकिन इसके प्रभावों की डिग्री को कम करने में निश्चित रूप से आपकी मदद करते हैं। इसके अलावा यदि कोई जातक ग्रहण योग से परेशान है तो उसे किसी अनुभवी ज्योतिषाचार्य से सलाह लेनी चाहिए, जो कुंडली विश्लेषण करके उचित सलाह दे सके

  • 👉 जब कभी सूर्य या चंद्र का ग्रहण हो उसी समय महामृत्युंजय मंत्र के जाप करे या करवाए।

  • 👉 ग्रहण की छांया पड़े हुए जल से नहाये

  • 👉 कपिला गाय का दान करे।

  • 👉 राहू सूर्य या राहू चंद्र के जाप करवाए।

  • 👉 समय समय पर शिवजी का रुद्राभिषेक करवाते रहे।

  • 👉 तीर्थ यात्रा में जाकर राहु-सूर्य-चंद्र के दान करे।

  • 👉 “ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्रमसे नम:” अथवा “ॐ सों सोमाय नम:” का जाप करना अच्छे परिणाम देता है। ये वैदिक मंत्र हैं, इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से किया जाएगा यह उतना ही फलदायक होगा।

  • 👉 नारियल, जौ, कच्चा कोयला, बादाम ला प्याज लहसुन काजल कील  काले सफ़ेद तिल सरसो उड़द आदि की पोटली बनाकर अपने ऊपर से ओवर कर बहते पानी में बहावे 

जातक कान- केतु है और सोना- गुरु ग्रह है। इसलिए कान में सोना धारण करने से गुरू कायम हो जाता है। गुरू ग्रह केतु ग्रह का मित्र है और चंद्रमा का भी मित्र है दोनों का मित्र गुरू अब चंद्र और केतु की भी मित्रता करा देगा। अर्थात् चंद्र केतु को ठीक रखेगा और आपस में समझौता करवा देगा जिससे पीड़ित जातक को सुख शान्ति मिलेगी।

👉 इस प्रकार के योग वाले जातक का पैसा लोग लेकर दबा लेते हैं और उनके पैसे मारे जाते हैं। चंद्र-केतु वाले जातक को सर्दी, जुकाम और नजला की शिकायत अधिक होती है। इन सबके लिए उपाय है कि चांदी के दो कडे़ बनवाकर अपने बच् के पैर में या गाय के बछडे के पैर में पहना दें। अब अगर प्रतीक रूप में देखे तो जातक का संतान केतु है, पैर भी केतु है। चांदी चंद्रमा है। उसकेपैर में पहनाने से चन्द्र-केतु का झगडा समाप्त हो जाता है जिससे बुरा प्रभाव भी शान्त होगा।

महादेव का नित्य पूजन और दर्शनस्वतः ही समस्याओ को और ग्रहों के क्रूर प्रभाव को कम करते है 

माणक मोती धारण करे एक, दो मुखी रुद्राक्ष धारण करे गोमेद लहसुनिया न पहने पानी में बहावे

सुलेमानी हक़ीक़ और टाइगर ऑय मध्यमा में पहने 

लक्षण अनुभव

जातक लोगों से छुपाकर अपनी दिनचर्या में काम करने लगता है .

किसी पर भी विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .

मन में सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .

अपने पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता हुआ लगता हैं .

डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती है .हर पल किसी अनिष्ट की

आशंका से उसका ह्रदय कांपता रहता है .

मिर्गी ,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्याईर्ष्यादेखादेखीतेज़ धड़कनतत्वों की कमी सोडियम की कमी नेट्रेमिआहाई BP, आदि के कारकों का जन्म होने लगता हैं

भावनाओं से सम्बंधित ,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं ।।

जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसे भिन्न भिन्न प्रकार के कष्ट दे सकता है।

-  जातक को शारीरिक-मानसिक पीड़ाअपमानअपनों से वैमनस्यरोगऋणशत्रुकलंक तथा राजदण्ड आदि का सामना करना पड़ सकता है।

-जिन-जिन भावों को राहु-केतु देख रहे होंवह भाव पीड़ित होकर अपने से संबंधित बुरा फल प्रदान करने लगते हैं।

व्यक्ति जीवनभर आर्थिक परेशानियों से जूझता रहता है। एक संकट टलते ही दूसरा आ जाता है।

आर्थिक और शुभ कार्य होते-होते रूक जाते हैं।

जिस प्रकार सूर्य या चंद्र ग्रहण होने पर अंधकार सा छा जाता हैउसी तरह कुंडली में ग्रहण दोष लगने पर जीवन में आर्थिकसामाजिकपारिवारिकनौकरी में प्रमोशनव्यापार में लाभ जैसी स्थितियों पर भी ग्रहण लग जाता है।

व्यक्ति की तरक्की बाधित हो जाती है। जब किसी के जीवन में अचानक परेशानियां आने लगेकोई काम होते-होते रूक जाए।

लगातार कोई न कोई संकटबीमारी बनी रहे तो समझना चाहिए कि उसकी कुंडली में ग्रहण दोष लगा हुआ है।

बीमारी में धन नाश फिर भी समाधान न हो

व्यक्ति को सबसे ज्यादा मन की समस्याएं परेशान करती हैं.

उसे मन और कल्पना की समस्याएं परेशान करती हैं .

व्यक्ति आम तौर पर भूत-प्रेत बाधा की शिकायत करता रहता है. जो उसका वहम होता है

कभी-कभी नींद न आने की भी गंभीर समस्या हो जाती है.

ग्रहण योग होने पर दाम्पत्य जीवन नर्क बन जाता है.

बिना किसी ठोस कारण के समस्याएं होने लगती हैं और कुछ समझ नहीं आता

ग्रहण योग के कारण ही पति पत्नी में शक जैसी चीजें भी पैदा होती हैं.

कभी कभी विवाहेत्तर सम्बन्ध की स्थितियां बन जाती हैं.

ग्रहण दोष होने पर व्यक्ति को विचित्र तरह की बीमारियां परेशान करती हैं.

कभी-कभी कुछ बीमारियों के लक्षण तो दिखते हैं लेकिन बीमारी नहीं होती है. आम तौर पर उनका कारण और निवारण समझ ही नहीं आता है.

चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण दोष की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है। चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है।

माँ के सुख में कमी आती है।  किसी भी कार्य को शुरू करने के बाद उसे सदा अधूरा छोड़ देना व नए काम के बारे में सोचना इस योग के लक्षण हैं।

जातक किसी न किसी फोबिया या किसी न किस प्रकार का डर  से ग्रसित थे। जिन लोगो में दिमाग में हमेशा यह डर लगा रहता हैउदाहरण के लिए समझे  कि "मैं   पहड़ो पर जैसे मनाली या शिमला घूमने जाऊँगा तो बस पलट जाएगी।  रेल  से वहां जाऊंगा तो रेल में बम बिस्फोट हो जायेगा।"

नकारात्मक  विचार  इसी  दोष के कारण मन में आते है। अमूमन किसी भी प्रकार के फोबिया अथवा किसी भी मानसिक बीमारी जैसे डिप्रेसन ,सिज्रेफेनिया आदि इसी दोष के प्रभाव  के कारण माने गए हैं यदि यहाँ चंद्रमा अधिक दूषित हो जाता है या कहें अन्य पाप प्रभाव में भी होता हैतो मिर्गी ,चक्कर व पूर्णत: मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है। 

-  मृत्यु भयबड़े रोग ही होंगे ये सोचेअत्यधिक  सचेत अकेले न रह सकेबिन बात की  लाचारीपशुव्रत व्यवहार  जड़ बुद्धि

सूर्य द्वारा बनने वाला ग्रहण योग पिता सुख में कमी करता है।  जातक का शारीरिक ढांचा कमजोर रह जाता है।  आँखों व ह्रदय सम्बन्धी रोगों का कारक बनता है। सरकारी नौकरी या तो मिलती नहीं या उसको निभाना कठिन होता है डिपार्टमेंटल इन्क्वाइरीसजाजेलपरमोशन में रुकावट सब इसी दोष का परिणाम है।     

चन्द्रमामन का स्वामी होता है और मन को प्रभावित करता है. जब भी चन्द्रमा दूषित होता हैमन और मन की समस्याएं व्यक्ति को खूब परेशान करती हैं. चन्द्रमा को सबसे ज्यादा दूषित राहु करता है. अगर राहु और चन्द्रमा का योग हो तो इसे शुद्ध रूप से ग्रहण योग कहना चाहिए. परंतु चन्द्रमा शनि या चन्द्रमा केतु के योग को ग्रहण योग नहीं कहा जा सकता है. ग्रहण योग जब भी कुंडली में हो यह सिर्फ समस्याएं ही पैदा करता है

-यदि प्राइवेट ऑफिस में कार्यरत हैं तो अपने अधिकारियों के कोप का सामना करना पड़ेगा।

-व्यापारियों को टैक्स आदि मुकदमे झेलने होंगे। सामान की बर्बादी होगी।

-मानसिक व्यथा का सामना करना पड़ता है। पिता से अच्छा तालमेल नहीं बैठ पाता।

जीवन में कम से कम एक बार किसी आकस्मिक नुकसान या दुर्घटना के शिकार होते हैं।

जीवन के अंतिक समय में जातक का पिता बीमार रहता है या स्वयं को ऐसी बीमारी होती है जिसका पता नहीं चल पाता।

विवाह व शिक्षा में बाधाओं के साथ वैवाहिक जीवन अस्थिर बना रहता है।

-वंश वृद्धि में अवरोध दिखाई पड़ते हैं। काफी प्रयास के बाद भी पुत्र/पुत्री का सुख नहीं होगा।

गर्भपात की स्थिति पैदा होती है।

-आत्मबल में कमी रहती है। स्वयं निर्णय लेने में परेशानी होती है।

-वस्तुतः लोगों से अधिक सलाह लेनी पड़ती है

परीक्षा एवं साक्षात्मार में असफलता मिलती है

ग्रहण दोष का निवारण

ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक संकट का निवारण भी बताया गया है। यदि आप ग्रहण दोष से परेशान हैं तो किसी ज्योतिषी से सलाह लेकर उसका उचित निवारण करवाना चाहिए। इस योग का पूर्ण निवारण केवल चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण के दिन ही किया जा सकता है। इसलिए पहले से किसी ज्योतिष से सलाह लेकर निवारण का दिन निश्चित कर लेना चाहिए। हालांकि तात्कालिक परेशानियों को कम करने के लिए कुछ उपाय अन्य दिनों में भी किए जा सकते हैं। जो इस प्रकार हैं:

1. यदि आपने कोई गुरु बना रखा है तो गुरु की सेवा करें। गुरु मंत्र का जाप करते रहें।

2. सूर्य के कारण ग्रहण दोष बना है तो नियमित सूर्य को जल चढ़ाएं। आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करें। रविवार को नमक का सेवन न करें। किसी कन्या को लाल वस्त्र दान करें।

3. यदि चंद्र के कारण ग्रहण दोष बना है तो श्वेत वस्त्र दान करें। सोमवार को किसी कन्या को केसर डालकर चावल की खीर खिलाएं।

4. महामृत्युंजय मंत्र के सवा लाख जाप करें।

5. राहु और केतु की शांति के लिए शिव और हनुमान की आराधना करें।

6. ग्रहण दोष का निवारण

 सिद्ध यंत्रों के जरिए भी किया जाता है। जिन लोगों को ग्रहण दोष लगा हुआ है उन्हें महामृत्युंजय यंत्रहनुमत यंत्र या राहु-केतु के यंत्रों में से किसी एक की स्थापना अपने घर के पूजा स्थान में करना चाहिए। यदि आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं तो अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान में भी महामृत्युंजय यंत्र लगाएं।

7.सफ़ेद चन्दन का टुकड़ा नीले धागे में लपेटकर गले में धारण करें.

8.जल में चन्दन की सुगंध मिलाकर स्नान करें.

9.शनिवार के दिन बताशा बांटें.

10. सूर्य से बने ग्रहण दोष में या कुण्डली में सूर्य देव के कमजोर होने पर हमे सूर्य देवता को प्रीतिदिन अर्घ्य देना चाहिए उसमे थोड़ा गुडकुमकुम तथा कनेर के पुष्प या कोई भी लाल रंग पुष्प डाले तथा सूर्य भगवान को यह मंत्र ॐ घृणि सूर्याय नमः ” या ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः” जप ते हुए अर्घ्य दे।

11. चन्द्रमा देवता के यन्त्र को घर में पूजा की जगह विराजित करे और अपनी पूजा के समय (सुबह और शाम) यन्त्र का भी धूप दीप से पूजन करे चन्द्रमा के मंत्र ॐ श्राम श्रीम् श्रोम सः चन्द्रमसे नमः ” का जाप करे ।

12.घर में नियमित रूप से शिव पार्वती की उपासना करें.

13. सोमवार को खीर जरूर खाएं.

14. बहुत ज्यादा मार्बल पत्थरों वाले घर में न रहें.

15.हर हाल में नशा करना और तीखी चीज़ें खाना बंद कर दें.

16.नित्य प्रातः 108 बार गायत्री मंत्र का जाप करें.

17.एक चांदी का छल्ला दाहिने हाथ के अंगूठे में पहनें.

18. 1 किलो जौ दूध में धोकर और एक सुखा नारियल चलते पानी में बहायें और 1 किलो चावल मंदिर में चढ़ा दे, अगर चन्द्र राहू के साथ है और यदि चन्द्र केतु के साथ है तो चूना पत्थर ले उसे एक भूरे कपडे में बांध कर पानी में बहा दे और एक लाल तिकोना झंडा किसी मंदिर में चढ़ा देवें।।

19. राहु नारियल है अगर उसका पानी जोकि चन्द्रमा है पिया जाये तो चंद्र बलवान होगा

20. 8 नारियल समुद्र में बहाये

21. नारियल की गिरी खाये मंदिर में फोड़े 

22. मंदिर में नारियल का गोटा होमे

ये भी करे

—गुरु के सानिध्य में रहे ,

— मंदिर आते जाते रहे ,

— हल्दी खाते रहे ,

— गाय के सानिध्य में रहे 

— सूर्य क्रिया एवं चन्द्र क्रिया दोनों नियमित करे ,

— घर के पश्चिमी हिस्से की सफाई करे ,मंगल वार शनिवार को श्रम दान करे ,

— चांदी का चौकोर टुकड़ा या 80 ग्राम चाँदी का हाथी अपनी जेब में रखे यदि माँ के हाथ से मिला हो तो और भी अच्छा है ,

— संपत्ति अपने नाम से न रखे किसी और को पार्टनर बना ले या किसी और के नाम पे रख दे ,

— कुत्ते की सेवा करे पैसा किसी शुभ काम मे खर्चकरे

_ गृह के रत्न चंद्र के लिए मोती या मूनस्टोन और सूर्य के लीए माणक या सन स्टोन या दोमुखी और एकमुखी रुद्राक्ष पहने 




ग्रहण योग या दोष कुंडली में बनने वाला एक अशुभ योग माना जाता है जिसका किसी कुंडली में निर्माण जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं पैदा कर सकता है।

ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है खा जाना तथा इसी प्रकार यह माना जाता है कि राहु अथवा केतु में से किसी एक के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ स्थित हो जाने से ये ग्रह सूर्य अथवा चन्द्रमा का कुंडली में फल खा जाते हैं जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

वैदिक ज्योतिष में ग्रहण योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में चंद्रमा या सूर्य राहु और केतु के प्रभावांतर्गत आते हैं यानि राहु-केतु का सूर्य-चंद्र से दृष्टि या युति संबंध बने तो निश्चित ही ग्रहण योग का सृजन हो जाता है में सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ राहु अथवा केतु में से कोई एक स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में ग्रहण योग बन जाता है

कुंडली में ग्रहण योग के निर्माण का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करते हैं। राहु तथा केतु प्रत्येक राशि में लगभग 18 मास तक रहते हैं, सूर्य एक राशि में लगभग एक महीने तक रहते हैं तथा चन्द्रमा एक राशि में लगभग अढ़ाई दिन तक रहते हैं। मान लीजिए कि राहु एक समय में वृश्चिक राशि में स्थित हैं तथा केतु वृष राशि में स्थित हैं। जब जब सूर्य गोचर करते हुए इन दोनों राशियों में से किसी एक राशि में आएंगे तथा एक महीने तक इस राशि में रहेंगे, इस बीच संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक जातक की कुंडली में ग्रहण योग होगा क्योंकि सब जातकों की कुंडलियों में सूर्य राहु अथवा केतु के साथ ही स्थित होंगें। इसी प्रकार चन्द्रमा भी गोचर करते हुए जब जब इन दोनों राशियों में से किसी एक में आएंगे तो कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाएगा। सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों के ही 12 राशियों में से किन्ही दो विशेष राशियों में स्थित होने की संभावना 6 में से 1 अर्थात हर छठी कुंडली में होगी इसलिए हर छठी कुंडली में सूर्य तथा हर छठी कुंडली में ही चन्द्रमा के कारण बनने वाला ग्रहण योग बनेगा।

सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों में से किसी एक के राहु केतु के साथ स्थित होने की संभावना लगभग हर तीसरी कुंडली में बनती है तथा यदि इस ग्रहण योग की परिभाषा में वर्णित राहु केतु के दृष्टि प्रभाव को भी गिन लिया जाए तो लगभग 75% कुंडलियों में ग्रहण योग बन जाता है। इसका अर्थ यह निकलता है कि संसार के लगभग सभी जातक ही ग्रहण योग से पीड़ित होते हैं तथा इस योग के कारण कष्टों का सामना करते हैं।

ऐसे में एक शर्त ये है कि चंद्र-सूर्य तथा राहु-केतु स्थान-बलादि से अशुभ और पीड़ित हो रहे हों। यानि पूर्ण रूपेण ग्रहण योग के निर्माण के लिए इन ग्रहों का स्वयं अशुभ स्थानों का अधिपति होना या फिर उनका अशुभ ग्रहों एवं बलादि से कमजोर होना आवश्यक है। यदि किसी जातक की कुण्डली में शुभ स्थानों के अधिपति होकर चंद्र-सूर्य बैठे हों तथा राहु-केतु का उनके साथ संयोग हो रहा हो, तो ऐसी दशा में शुभ फल प्राप्त होते हैं नाकि अशुभ फल।

ग्रहण योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार इस योग के बनने के पश्चात भी वास्तव में यह दोष कुंडली में या तो बनता ही नहीं है या फिर इसका बल बहुत कम होता है जिसके कारण यह योग जातक को कोई विशष अशुभ फल नहीं दे पाता। यहां पर इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी कुंडली में राहु अथवा केतु के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ बनने वाले कुछ संयोग कुंडली में ग्रहण योग न बना कर कोई शुभ अथवा बहुत शुभ योग भी बना सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में शुभ केतु का शुभ सूर्य के साथ संबंध जातक को किसी सरकारी संस्था में लाभ, प्रतिष्ठा तथा प्रभुत्व वाला पद दिलवा सकता है तथा यह योग जातक को बहुत योग्य तथा सक्षम पुत्र भी प्रदान कर सकता है जो जातक के लिए बहुत भाग्यशाली तथा शुभ सिद्ध होते हैं।

इसी प्रकार किसी कुंडली में शुभ राहु के चन्द्रमा के साथ स्थित हो जाने पर शक्ति योग बन सकता है तथा इस प्रकार का शक्ति योग जातक को ऐश्वर्य, सुख सुविधा, किसी सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्था में लाभ तथा प्रभुत्व वाला कोई पद आदि भी प्रदान कर सकता है। इस प्रकार चन्द्र राहु से बनने वाले शक्ति योग के प्रभाव में आने वाले जातक ग्रहण योग के अशुभ फलों से बिल्कुल विपरीत शक्ति योग के शुभ फल प्राप्त करते हैं

 जिससे एक बार फिर यह सिद्ध हो जाता है कि किसी कुंडली में राहु अथवा केतु का सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ संबंध कुंडली में केवल ग्रहण योग ही नहीं बनाता बल्कि यह संबंध कुंडली में किसी शुभ योग का निर्माण भी कर सकता है।

         इसलिए किसी कुंडली में केवल राहु अथवा केतु के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ संबंध के आधार पर ही कुंडली में ग्रहण योग के बनने का निर्णय नहीं लेना चाहिए तथा कुंडली में राहु, केतु, सूर्य और चन्द्रमा के बल, स्वभाव तथा स्थिति का भली भांति निरीक्षण करने के पश्चात ही यह निर्णय लेना चाहिए कि कुंडली में इन ग्रहों के संयोग से ग्रहण योग बन रहा है अथवा शक्ति योग जैसा कोई शुभ योग।

किसी कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण होने के लिए उपर बताए गए नियमों के अतिरिक्त अन्य नियम भी होने चाहिएं। किसी कुंडली में राहु अथवा केतु द्वारा ग्रहण योग का निर्माण करने के लिए सबसे पहले उस कुंडली में राहु तथा केतु का अशुभ होना अति आवश्यक है क्योंकि शुभ होने की स्थिति में ये ग्रह सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ स्थित होकर भी ग्रहण योग नहीं बनाएंगे बल्कि कुंडली में कोई शुभ योग "शक्ति योग" भी बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त राहु, केतु तथा सूर्य चन्द्रमा की कुंडली में स्थिति, बल तथा इन सभी ग्रहों पर अन्य शुभ अशुभ ग्रहों का प्रभाव भी देखा जाता है जो ग्रहण योग के निर्माण तथा फलादेश में बहुत अंतर पैदा कर सकता है। इसके अतिरिक्त भी कुंडली में से कुछ अन्य आवश्यक तथ्यों का निरीक्षण किया जाता है तथा तत्पश्चात ही कुंडली में ग्रहण योग के निर्माण तथा फलों का निर्णय लिया जाता है।

इसके इलावा यदि जन्म कुण्डली के लग्न भाव में राहू आ जाये तो भी ग्रहण योग बनता है अर्थात सूर्य, कुण्डली के किसी भी अन्य भाव में  बैठा हो तो भी शुभ फल की प्राप्ति नहीं हो पाती।

ज्योतिष का एक नियम है यदि किसी ग्रह के सामने उसका शत्रु ग्रह बैठ जाये तो वह ग्रह फ़लहीन हो जाता है । याने कि ना ही उसका शुभ फ़ल मिल पाता है और ना ही बुरा फ़ल। जैसे कई बार देखा जाता है कि किसी व्यक्ति की कुण्डली में राजयोग नजर नहीं आता परन्तु कुंडली में राजयोग उपस्थित होता है। कई बार आपने देखा होगा कि  व्यक्ति के पास उच्च शिक्षा नहीं होती परन्तु उसके अनुभव के आधार पर बडे-२ पदाधिकारी उनसे अनुभव अर्जित करने के लिये आते हैं ।

इसी प्रकार यदि यदि जन्म कुण्डली में सूर्य और शनि आमने सामने हो और लग्न भाव में राहू आ जाये तो गुप्त राजयोग का निर्माण हो जाता है ! ऐसी कुंडली में लग्न में बैठा हुआ राहू शुभ  फल देता है  और उस व्यक्ति के शत्रु कभी भी उस पर चाहते हुये भी हावी नहीं हो पाते। अर्थात उसके शत्रुओं का नाश हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को अक्सर देखा जाता है कि इनकी पहुंच बहुत ऊंचे पद तक होती है और ये लोग प्रतिष्ठा भी बहुत पाते हैं। मान,  सम्मान, यश और कीर्ति की इन लोगों के पास कोई कमी नहीं होती। राजनीति में भी ये लोग बहुत अच्छी पहचान रखते है। इनके मित्रों की सख्या भी बहुत अधिक होती है और मित्रों के सहयोग से भी ये बडे-२ कामों को अन्जाम दे जाते हैं। ऐसी कुंडली में भी लग्न में बैठा हुआ  राहु, ग्रहण योग का निर्माण करता है जो कहीं ना ना कहीं और किसी ना किसी मोड पर सम्मान को ठेस पहुंचाने का दम रखतािर्माण करता है जो कहीं ना ना कहीं और किसी ना किसी मोड पर सम्मान को ठेस पहुंचाने का दम रखता है।

किसी भी कुण्डली में ग्रहण दोष मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है एक सूर्य ग्रहण और दूसरा चन्द्र ग्रहण। सूर्य सम्बन्धि दोष का निवारण सूर्य ग्रहण के दिन और चन्द्र सम्बन्धि दोष का निवारण चन्द्र ग्रहण के दिन करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। अगर इस दोष की शान्ति शास्त्रीय पध्दत्ति से की जाय तो निश्चित रूप से जिस भाव में ये दोष बना हो उसके फ़ल में इजाफ़ा होता है। और पितृ सुख के साथ राज सुख की प्राप्ति होती है। इस दोष की सही जानकारी के लिये किसी विद्वान ज्योतिषी से ही कुण्डली का अवलोकन कराया जाना चाहिये।


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