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प्रकरण १ - सोलह संस्कार

    प्रकरण १ - सोलह संस्कार     मनुष्य में जो दोष होते हैं उन दोषों को दूर करना तथा कोई हीनांग हो तो उसको सहींकरना इसे संस्कार कहते हैं। (दोषापनोदपूर्वक गुणाधान संस्कारः हीनांग पूरण वा) प्राणिमात्रमें जो दोष हैं उसे दूर कर गुण निर्माण करने से मनुष्य सात्विक होता है। शास्त्रों में संस्कारों कीजो व्याख्या की गई हैं वह एकदम सटीक हैं। ईश्वर निर्मित प्रत्येक वस्तुपर संस्कार करके हीउपयोग में लिया जाता हैं। जैसे-धान्य को जैसा है वैसे ही उपयोग में नहीं लाते हैं, अपितु उसेसाफ सुथरा कर के ही उपयोग करते हैं। पूर्वजन्म के कर्म के अनुसार प्राप्त हुआ यह देह तथाउसके साथ का नित्य जीव इनपर संस्कार कर उनके सामर्थ्य को बढ़ाने हेतु ध्यान केंद्रित करनाचाहिए। संस्कार इसी जन्म में फलदायी होते हैं ऐसा नहीं हैं, अपितु वह जन्मजन्मांतर में भीफलदायी होते हैं। पूर्वजन्म में जो संस्कार हुए हैं उसी के अनुसार गुण एवं स्वभाव पुनर्जन्म मेंप्राप्त होते हैं।     यह देह सामर्थ्यसंपन्न होकर सात्विक तथा ब्रह्मपद प्राप्त करने हेतु योग्य बने इस हेतुधर्मशास्त्र में अर्थात् ऋषियों ने ४८ संस्कार वर्ण...