प्रकरण १ - सोलह संस्कार
प्रकरण १ - सोलह संस्कार
मनुष्य में जो दोष होते हैं उन दोषों को दूर करना तथा कोई हीनांग हो तो उसको सहींकरना इसे संस्कार कहते हैं। (दोषापनोदपूर्वक गुणाधान संस्कारः हीनांग पूरण वा) प्राणिमात्रमें जो दोष हैं उसे दूर कर गुण निर्माण करने से मनुष्य सात्विक होता है। शास्त्रों में संस्कारों कीजो व्याख्या की गई हैं वह एकदम सटीक हैं। ईश्वर निर्मित प्रत्येक वस्तुपर संस्कार करके हीउपयोग में लिया जाता हैं। जैसे-धान्य को जैसा है वैसे ही उपयोग में नहीं लाते हैं, अपितु उसेसाफ सुथरा कर के ही उपयोग करते हैं। पूर्वजन्म के कर्म के अनुसार प्राप्त हुआ यह देह तथाउसके साथ का नित्य जीव इनपर संस्कार कर उनके सामर्थ्य को बढ़ाने हेतु ध्यान केंद्रित करनाचाहिए। संस्कार इसी जन्म में फलदायी होते हैं ऐसा नहीं हैं, अपितु वह जन्मजन्मांतर में भीफलदायी होते हैं। पूर्वजन्म में जो संस्कार हुए हैं उसी के अनुसार गुण एवं स्वभाव पुनर्जन्म मेंप्राप्त होते हैं।
यह देह सामर्थ्यसंपन्न होकर सात्विक तथा ब्रह्मपद प्राप्त करने हेतु योग्य बने इस हेतुधर्मशास्त्र में अर्थात् ऋषियों ने ४८ संस्कार वर्णित किए हैं। वर्तमान परिस्थिति में वे सभी पूर्णहोना असंभव-सा हैं, इसलिए निम्नलिखित १६ संस्कार दिए हैं -
१) गर्भाधान २) पुंसवन ३) अनवलोभन ४) सीमंतोन्नयन ५) जातकर्म ६) नामकरण७) निष्क्रमण ८) अन्नप्राशन ९) चौल १०) उपनयन ११) महानाम्नि १२) वेदव्रत १३) उपनिषत्व्रत १४) समावर्तन (केशांत) १५) विवाह १६) अंत्येष्टि इन १६ संस्कारों के नामों में मतमतांतरहैं, अपितु यहा बहुमान्य सोलह संस्कार दिए हैं।
षोड़ष संस्कारों की संक्षिप्त जानकारी
१) गर्भाधान - विवाह के उपरांत गर्भाधान के लिए नक्षत्र, तिथि आदि का विचार करसुप्रजा प्राप्ति के उद्देश्य से यह संस्कार किया जाता है। बालक की बीज तथा गर्भावास की जन्ममलीनता नष्ट करना तथा क्षेत्रशुद्धिविधान यह इस संस्कार के मुख्य उद्दिष्ट हैं। अपितु माता-पिताकी आत्मा से हृदय और शरीर से संतति उत्पन्न होती है। अतः उनके स्थूल तथा सूक्ष्म देह केदोष निश्चित ही संतति में भी संक्रमित होते हैं। इन तत्त्वों के आधारभूत गर्भग्रहण योग्यता तथायोग्य काल के अनुसार गर्भधारणा के समय माता-पिता का मन तथा शरीर केवल पशुभाव सेयुक्त न होकर सात्विक भाव से परिपूर्ण रहे इस हेतु गर्भाधान संस्कार करना चाहिए। परंतु यहसंस्कार विवाह के दिन न करें।
२) पुंसवन - गर्भधारणा के बाद तीसरें तथा चौथें माह में तथा छठें माह से आठवें माह तकगर्भ को हानि पहुंचने की संभावना बनी रहती है। इस कारण जन्म लेनेवाला शिशु सामर्थ्यवानतथा बलवान हो इस हेतु यह संस्कार गर्भधारणा होने के दो माह पश्चात् तुरंत करते है।
३) अनवलोभन - गर्भस्थ शिशु में कुछ दोष (विकृति) हो तो उसके निवारण हेतु पुंसवन केपश्चात् यह संस्कार करते है।
४) सीमंतोन्नयन - गर्भस्थ शिशु के संरक्षण हेतु यह संस्कार छठे अथवा आठवे माह मेंकरते है।
(पुंसवन, अनवलोभन, सीमंतोन्नयन आदि संस्कार यदि उचित काल में न हो सके तोयह आठवें माह में भी कर सकते हैं।)
५) जातकर्म - शिशु के जन्म के बाद परंतु नाल छेदन के पूर्व यह संस्कार करना चाहिए।शिशु को शहद तथा घी में सुवर्ण घिस कर चटाया जाता है। वर्तमान समय में प्रसूति अस्पतालोंमें होने के कारण नाल छेदन के पूर्व यह संस्कार करना संभव नहीं होता है। अतः इसके पश्चात्शीघ्रातिशीघ्र संपन्न कराना चाहिए।
६) नामकरण - शिशु के जन्म के पश्चात् बारहवें दिन अथवा शुभ मुहूर्त देखकर ‘श्री गणेश’पूजनकर थाली में कच्चे चावल बिछाकर नवजात शिशु का नाम लिखें। नामकरण करते समयनक्षत्रनाम, भगवान का नाम, मास नाम तथा व्यावहारिक नाम रखने की प्रथा प्रचलित है। इसतरह से नामकरण संस्कार संपन्न करना चाहिए। (जन्म के बाद का विधिविधान पृ. ११ परदिया है।)
७) निष्क्रमण -प्रसूता तथा नवजात शिशु को तीन महीनें के बाद कमरे से बाहर लाते हैतथा कुछ दिन पश्चात् सूर्यप्रकाश में ले जाने की क्रिया को निष्क्रमण कहते है। तीद्र प्रकाश,वातावरण आदि को सहन करने की क्षमता बालक में जब आ जाती है, तब निष्क्रमण करनायह वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। परंतु वर्तमान में प्रसूति अस्पताल में होने के कारण यह संस्कारकालबाह्यम हो गया है। निष्क्रमण संस्कार का एक उपांग भूम्युपवेशन विधान अर्थात् शिशु कोजमीनपर बिठाना, यह उपसंस्कार सामान्यतः ५वें माह में संपन्न करते है।
८) अन्नप्राशन - शिशु छह माह का होनेपर उसे माँ के दूध के साथ अन्न खिलाना प्रारंभकरते है, यह अन्नप्राशन संस्कार विधिवत् करना चाहिए।
९) चौल (मुंडन)-शिशु के तीसरें अथवा पांचवें वर्ष में शिखा रखने के संस्कार को चौलकहते है। बच्चा संस्कारित रहे तथा साथ-साथ शिक्षा प्राप्त करने की योग्यता अर्जित करें इस
हेतु यह संस्कार किया जाता है। उपनयन अर्थात् जनेऊ धारण करने से पूर्व भी यह विधि करसकते है। (संदर्भ-धर्मसिंधु तृतीय परिच्छेद)
९०) उपनयन - उपनयन संस्कार को दूसरा जन्म माना जाता है। पहिला जन्म माता औरपिता के कारण होता है। उपनयन में गायत्री मंत्र का उपदेश करनेवाले आचार्य अर्थात् पिता कगायत्री माता के द्वारा दूसरा जन्म होता है, ऐसी मान्यता है। उपनयन हेतु आठ वर्ष की आयमहत्त्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया जाता है, अतः इसे व्रतबंध भीकहते है। मुंज की वनस्पति से डोर (रस्सी) बनायी जाती है तथा उसे कमर में बांधा जाता है इसकारण इसे "मौंजी बंधन" भी कहा जाता है (अधिक जानकारी "उपनयन" के अध्याय में देखं।
१९, १२, १३) महानाम्नि / वेदव्रत / उपनिषत् व्रत - यह व्रत वेदारंभ अध्ययन हेतु कियेजाते हैं।
१४) समावर्तन (केशांत) - अध्ययन समाप्ति के बाद तथा "गृहस्थाश्रम” स्वीकारने केपूर्व यह संस्कार किया जाता है। वर्तमान में विवाह के १०/१५ दिन पूर्व अथवा एक माह पूर्वसमावर्तन करना उचित है। परंतु उपनयन के तुरंत पश्चात् नहीं करना चाहिए। समावर्तन केपश्चात् सूतक आदि के नियमों का पालन करना होता है। जिनका जनेऊ संपन्न नहीं हुआ है, ।ेविवाह के पश्चात् सूतक आदि के नियमों का पालन करें।
१५) विवाह - विवाह के कारण सभी आश्रमों में श्रेष्ठ "गृहस्थाश्रम" का प्रारंभ होता है।अन्य तीन आश्रम गृहस्थाश्रमपर ही आश्रित है। गृहस्थाश्रम स्वीकारने हेतु विवाह संस्कार कीरीति जो हमारे धर्मग्रंथों में है, वह सर्वथा उचित है। (अधिक जानकारी हेतु "विवाह" नामकअध्याय देखें)
१६) अंत्येष्टि - प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में मृत्यु यह अंतिम घटना होती है। मृत्यु के पश्चातमृत शरीरपर संस्कार करना तथा दहन आदि संस्कार करना इसी को अंत्यकर्म कहते है, उसे हीअंत्येष्टि भी कहते है। (अधिक जानकारी हेतु "अंत्येष्टि" नामक अध्याय देखें)
(उपरोक्त संस्कार किस दिन - तिथि तथा नक्षत्र में करना चाहिए इस हेतु पंचांग, धर्मग्रंथदेखकर पंडितजी के मार्गदर्शन में करें।)