शनि की सम्पूर्ण सारगर्भित व्याख्यान
शनि शनि वेडूर्यकान्तिरमल: शुभदः प्रजानां बाणातसी कुसुमवर्णानिभश्च शरत: । पंचापि वर्णामुपगच्छति तत्सवर्णान् सूर्यात्मजः क्षपयतीति मुनिप्रवादः ॥ आचार्य वराहमिहिर- बृहत्संहिता शनि ग्रह वैडूर्य रत्न अथवा बाणफूल या अलसी के फूल जैसे निर्मल नीले रंग से प्रकाशित होता है. उस समय प्रजा के लिये शुभ फल देता है। यह अन्य वर्णों को प्रकाश देता हो तो उन वर्णों के लोगों का नाश करता है, ऐसा ऋषि मुनि कहते है। ग्रहविचार माला के इस पष्प में पुरातन ग्रहों में सातवें और अन्तिम शनि ग्रह का वर्णन करना है। फल ज्योतिषशास्त्र के प्रारंभ से ही इस ग्रह को मारक तथा अशुभ माना गया है। पश्चिमी ज्योतिषी भी इसे दुर्देव लानेवाला - Evil Fate Bringer काहते है। मराठी में तो महिपति नामक कवि ने ভনिমाहातय' नामक स्वतत्र ्र्थ ही लिखा है इस में शनि काम्ड्वावश भावफल, भहादशा तथा साढ़े सातके फलों का वर्णन किया है शनि न्स्वरूप, की दशि का परिणाम बतलाते हुए यह कवि कहता है -'शनि का जन्म हों ही उसकी हष्टि पिता (सूर्य ) पर पडी, उससे तत्काल ही सूर्य कुष्ट रोग से पीड़ित हुआ...