शनि की सम्पूर्ण सारगर्भित व्याख्यान
शनि
शनि
वेडूर्यकान्तिरमल: शुभदः प्रजानां
बाणातसी कुसुमवर्णानिभश्च शरत: ।
पंचापि वर्णामुपगच्छति तत्सवर्णान्
सूर्यात्मजः क्षपयतीति मुनिप्रवादः ॥
आचार्य वराहमिहिर- बृहत्संहिता
शनि ग्रह वैडूर्य रत्न अथवा बाणफूल या अलसी के फूल जैसे निर्मल
नीले रंग से प्रकाशित होता है. उस समय प्रजा के लिये शुभ फल देता है। यह
अन्य वर्णों को प्रकाश देता हो तो उन वर्णों के लोगों का नाश करता है, ऐसा
ऋषि मुनि कहते है।
ग्रहविचार माला के इस पष्प में पुरातन ग्रहों में सातवें और अन्तिम
शनि ग्रह का वर्णन करना है। फल ज्योतिषशास्त्र के प्रारंभ से ही इस ग्रह को
मारक तथा अशुभ माना गया है। पश्चिमी ज्योतिषी भी इसे दुर्देव लानेवाला
- Evil Fate Bringer काहते है। मराठी में तो महिपति नामक कवि ने ভনिমाहातय' नामक स्वतत्र ्र्थ ही लिखा है इस में शनि काम्ड्वावश भावफल, भहादशा तथा साढ़े सातके फलों का वर्णन किया है
शनि न्स्वरूप,
की दशि का परिणाम बतलाते हुए यह कवि कहता है -'शनि का जन्म हों ही उसकी हष्टि पिता (सूर्य ) पर पडी, उससे तत्काल ही सूर्य कुष्ट रोग से पीड़ित हुआ, उसका सारथी अरूण पंगु हुआ और उसके घोडे अन्ये हो
गये। इस प्रकार शनि की दृस्टि महा विनाशकारी है। किन्तु यही शनि कृपायुत्त
हो तो सब आनन्द भी प्राप्त होते है।' यह सारयंकाल के अस्तगामी सूर्व का
रूपकात्मक वर्णन है। अस्त होने के समय की निस्तेजता को कुष्ठरोग कहागया है तथा रात्रि में सूर्य की गति अदश्य होती है, उसे सारथी पंगु होना तब था घोड़े अन्धे होना कहा गया है। अन्य ग्रन्थों में भी शनि को यम, काल, दुःख,दैन्य, मन्द अआदि अशुभ सूचक नाम न दिये गये है। अंग्रेजों ने भी इसको शैतान Reaper आदि नाम दिया है। इस ग्रह के फल सचमुच सिरप्फ अशुभ ही हैं या महीपति के वर्णनानुसार आनन्दायक भी है,
सामान्य स्वरूप (ग्रहयोनिभेदाध्याय)
शनि के विषय मे प्राचीन लेखकों के वर्णन इस प्रकार है : -
कृशदीर्घतनुः शौरिः पिङ्गदुष्यानिलात्मकः।
स्थूलदन्तोऽलसः पङ्गुः खररोमकचो द्विजः॥
शनि अंतर्मन (भीतरी व्यक्तित्व) का स्वामी व कश्यप गोत्रीय है। इसकावाहन गिद्ध है।
शनि का शरीर दुबला किंतु लम्बा होता है। यह पिंगल वर्णी तथा वायु प्रधान प्रकृति का होता है। इसके दांत मोटे तथा स्वभाव आलसी होता है।इसके रोम और केश तीखे और कठोर होते हैं। शनि शूद्र वर्णी तथा तामसप्रकृति का है।
नभोमण्डल में बृहस्पति के पश्चात मंदगति शनि का स्थान माना गया है।दुख, कष्टों का कारक और ग्रह परिषद में इसे भृत्य का स्थान प्राप्त है।श्रमिकों और कार्यकर्ताओं का आश्रयदाता, दस्यु वृत्ति करने वालों का संरक्षकहै। मंद, छाया सुनु, सूर्यपुत्र, कोण, तरणि तनय, असित, अकि, छायासुत, पंगु,पंगुकाय, घुमणिसुत, पातंगी, मृदु, नील, कपिलाक्ष, कृशांग, दीर्घ छायात्मज,यम, अर्कपुत्र, सौरिः, क्रूरलोचन, दुख, काल आदि शनि के पर्याय नाम हैं।
जड़ता, आलस्य, रुकावट, घोड़़ा, हाथी, चमड़ा, आय, बहुत कष्ट, रोग,विरोध, मरण, दुख, दासी, गधा, चाण्डाल, विकृत अंगों वाले, दान, स्वामी,वनों में भ्रमण करने वाले, नपुंसक, अन्त्यज, खग, दासता का कर्म, पौरुषहीनता,मिथ्या भाषण, वृद्धावस्था, नसें, शिशिर ऋतु, मणि, लोहा, पापकर्म, कालेधान्य, कृषि द्वारा जीवन निर्वाह, नागलोक, युद्ध, शल्य विद्या, कुत्ता, चोरी,यमराज का पुजारी, निषाद आदि का कारक शनि है।
शनि का रंग-काला, प्रकृति-वात, वर्ण-शूद्र, त्व-वायु, लिंग-नपुंसक,गुण-तम, दिशा-पश्चिम, ऋतु-शिशिर, रस-कसैला, भावकारक-शत्रु,मृत्युभाव, राशि अवधि-30 माह, अधिष्ठाता-दरिद्रता, वस्त्र-काले, देवता-यम,धातु-लोहा, रत्न-नीलम है। मकर-कुम्भ राशि शनि की स्वराशियां हैं। तुलाउच्च राशि, मेष नीच राशि है। यह अपने स्थान से तीसरे, सातवें और दसवेंभाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। बुध, शुक्र इसके मित्र ग्रह, बृहस्पति सम तथासूर्य, चंद्र, मंगल शत्रु ग्रह हैं।
दांत, दाहिने कान का रोग, बुखार, शीत ज्वर, कोढ़़, पागलपन, जलोदर,संधिवात, उदरवात आदि रोगों पर भी शनि का अधिकार है। पुष्य, अनुराधाऔर उत्तरा भाद्रपद इसके नक्षत्र हैं। जन्म समय में इन नक्षत्रों पर शनि रहे तोशनि की महादशा विद्यमान रहती है।
आचार्य व गुणाकर - दुःखं दिनेशात्मज: । दुःखदायकः प्रेष्यः
सहस्त्रांशुज: । भास्करिः कृष्णदेहः । धातुः स्नायुः । वसति: क्षित्युत्कर: । वरख्ं
स्फाटितं। लोहधातु: । शिशिरतुँ: । क्षाररूचि: । यह सेवक, दुःखदायी, काले
वर्ण का है। स्नाय, कूडा करकट फेंकने की जगह, फटे जीर्ण वस्त्र, लोहा,
शिशिर ऋतु तथा नमकीन रूचि पर इस का अधिकार है।
कल्याण व्र्मा - दिशा-पश्चिम, प्रकृति-नपुसंक, नरक लोक।
वैद्यनाथ -- मन्दः पृष्ठेनोद्यति सर्वदा। चतुष्पदो भानुसुतः ।
मन्द: भरवन्ति। शैलाटविसचरन्तः । शताब्दसंख्या । मूलप्रधानौर्कंजः । कृष्णः
शनिः । देवता विरिंचि: । शनेर्नीलं । शनिः:स्थात तु हिमाचलान्तं ।
मन्दोन्त्यजांना पति; । शनि: तमःस्वामी । पवनतत्वं । कषायरसः ।
अघोऽक्षिपातः । वधू मन्दः । शनिः सुतीक्ष्ण: । अर्केण मन्दः शनिना महीसुतः ।
मन्दस्तुलाम करकुम्भगृहे कलत्रे याम्यायने निजदूगाणदिने दशायाम् । अन्ते
श्रहस्य समरे यदि कृष्णपक्षे क्रे समस्तभवनेषु बलाधिकः स्यात् ॥ शनी का उदय पृष्ठ भाग से होता हे। यह चौपाया, पर्वत तथा वनों में घूमनेवाला, सौ वर्ष की आयु का, मूलप्रधान, काले वर्ण का हैं। इस के देवता ब्रह्मा है।
नील रत्न, गंगा से हिमालय तक का प्रदेश, अन्त्यज लोग, तमगुष, वायु तत्त्व, कषैली रूचि, नीचे दृस्टि , स्त्रीस्थान, तीक्ष्ण स्वभाव इन पर इस का अधिकार है। रवि द्वारा शनि पराजित होता है तथा शनी द्वारा मगल पराजित होता है। यह तुला, मकर तथा कुम्भ राशि में स्त्री स्थान में, विषुव के दक्षिणअयन में, द्रेषकाण कुण्डली में स्वगृह में, शनिवार को अपनी दशा में, राशी के अन्तभाग में, युद्ध के समय, कृष्ण पक्ष में तथा वक्री हो, उस समय किसीभी स्थान में हो तो बलवान होता है।
पराशर -- शनिः शूद्रः। तमः । बली ज्ञेयों दिनशेषे। दर्भगायसूर्यपुत्रकः । नीरसान् सूर्यपुत्रश्च। गृहेषु मन्दो वृद्धोस्ति। यह शद्र र्ण का तमोगुणी ग्रह सन्ध्यासमय बलवान होता है। भाग्यहीनों तथा नीरस वस्तओं पर शनि का अधिकार है।
जयदेव -- सन्ध्या मन्दः । पक्षिणौ बुधरसौरी। शनिः प्रतिच्यः। मन्दःस्थविरो ग्रहः । सूर्यज: संकाराणामु् भूम्यधिपः । यह ग्रह पश्चिम दिशा का, वृद्ध, परक्षी स्वरूप, भूमि का स्वामी, संकर जाति का है। सन्ध्या के समय
बलवान होता है।
मंत्रेश्वर -- नीचश्रेण्यशुचिस्थलं वरूणदिक्शास्तुः:शनेण्तयः ।
लके वर्गों के लोगों के निवास स्थान, अपवित्र स्थान, पश्चिम दिशा के
स्वामी के स्थान (मद्रास और मैसूर प्रदेश के मुनीश्वर देवालय) इन पर शानि
का अधिकार है । स्पर्शेद्रिय, लोह धातु, सौ वर्ष की आयु, ज्ञान प्राप्ि प्रवास,
सौराष्ट्र और काठियावाड प्रदेश, तिल, कालदेवता, वायुतत्व ये शनि के
अधिकार के अन्य विषय है।
पुजराज --वर्ण: असित :- काला रंग होता है। यह ग्रह तीक्ष्ण उग्र तथा रविजस्तथाऽन्ते। सन्ध्या समय बलवान होता है।
विलीयम लिली
यह पुरातन ग्रहों में सब से दुर का যरहैं।
गुरू से भी इस की कक्षा बाद में है। यह बहत चमकीला, अथवा प्रकारन नहीं है तथा टिमटिमाता नही है। इस का रंग फीका, राख जैसा निस्तेज है।
इस की गति बहुत मन्द है। राशि चक्र की परिक्रमा यह २९ वर्ष ५ मास १७दिन ५ घंटों में पूरी करता है। इस की मध्यम गति २ कला १ विकला है।दैनिक गति ३ से ६ कला तक होती है। अधिकतम शिर उत्तर की ओर २अंश ४९ कला रहता है तथा दक्षिण की ओर २ अंश ४९ कला रहता है तथादक्षिण की २ अंश ४९ कला रहता है। यह १४० दिन वक्री रहता है तथावक्री होते. समय और मार्गी होते समय ५ दिन स्तंभित रहता है।
शनि के अधिकृत स्थानों में रेगिस्तान, जंगल अज्ञात घाटियाँ,गुहाएँ गव्हर, पर्वत, कब्रस्तान, चर्च का मैदान, खंडहर, कोयले की खदाने,मैली बदबूदार जगहें, कार्यालय आदि का समावेश होता है। इस ग्रह कास्वभाव शीतल, रूक्ष, उदासीन है। यह पुरूष ग्रह पृथ्वी तत्व का स्वामी है।दुर्ैव लाने वाला एकान्त प्रिय, पापग्रह है।शनि-शनि परिवर्तनशीलता, लोहा, नीलम, काले चने, गँ, तेल,दीपक, वात-विकार, जुआ, उत्सर्जनतन्त्र, ब्लैडर, निराशाबादी और निरुरसाही,दाँत, माँसपेशियाँ, माँसपेशीय में दर्द, दाँतो का दर्ष, दमा, टी. बी.(तपेदिका/क्षयरोग) मिर्गीं, हिस्टीरिया, जोड़ों का वर्द, अल्सर आदि,शूद्रवर्ण सेवा या नौकरी, सेवक, कुषि तथा खेतिहर मजदूरी का प्रतिनिधितवकरता है।
उपर्युंक्त वर्णन प्रायः शनि के दृश्य स्वरूपानुसार ही है। जहाँग्रन्थकारों के मत परस्पर विरूद्ध बतलाए गए है, उन का विचार करनाहै। वैद्यनाथ ने चतुष्पाद और जयदेव ने पक्षी स्वरूप कहा, इन में बहुतअन्तर है। अनुभव से वैद्यनाथ का मत ठीक प्रतीत होता है। जयदेव ने भूमितत्व कहा है और अन्य लेखक वायु तत्व बतलाते है। हमारे मत से वायुतत्व पर बुध का और भूमि तत्व पर शनि का अधिकार ठीक प्रतीत होताहै। वैद्यनाथ ने शनि द्वारा मंगल का पराजय होना लिखा है। किन्तु शनिमंगल की युति या प्रतियोग के समय मंगल के अशुभ गुणधर्म ही अधिकस्पष्ट होते है । अतः मंगल द्वारा ही शनि का पराजय कहना चाहिये । यहवक्री हो तो सब स्थानों में बलवान कहा गया है किन्तु यह शुभ फल के बारेमें ठीक नहीं है। हमारे अनुभव में वक्री शनि के फल अत्यन्त अशुभ,कष्ट्मय और दारिद्रयदायी प्रतीत हुए है। प्रवास अधिक होते हैं, यह अनुभवठीक है।
शनिस्वरूप का विस्तृत वर्णन
आचार्य - मन्दोलसः कपिलदूक्, कृशदीर्थगात्र: स्थूलद पुरुषरोम कचोऽनिलात्मा | शनिप्रधान पुरूष आलसी, दुबला तथा वात प्रकृति का होता है। इसकी दुष्टि पिंगल वर्ण की, अवयव लम्बे, दौँत बड़े और केश रूक्ष होते है।
गुणाकर -- पिंगे क्षण: कृष्णवपु: शिरालो मुखो लय स्थूलनखोऽनिलात्मा। क्रोधी जरावान् मलिन: कृशांग, स्नाय्वा तहः सूर्य सुतोऽतिदीर्घ : ॥ इस की आँखे पिंगट, शरीर काला, नख बडे, कद बहुतलम्बा और स्नायु विस्तृत होते है । यह कृश (शिराएं दीखनेवाला), मूर्ख,
आलसी, वात प्रकृती का, क्रोधी, वृद्ध जैसा दीखनेवाला और गन्दा रहनेवाला
होता है।
कल्याणवर्मा -- पिंगो निम्नविलोचन: कृशतु्दींयः शिरालोऽलसः कृष्णांग: पवनात्मकोऽतिपिशून: स्नाय्वाततो निष्षूणः । मूर्स्थू लनखद्धि जोऽतिमलिनो रूक्षोऽशुचिस्तामसो। रौद्र: क्रोधपरो जरापरिणहः कृष्णाबरों भास्करिः ॥ इस में आचार्य गुणाकर के वर्णन से अधिक भाष शरक प्रकार है - इस की हष्टि निम्न ( नीचे की ओर) होती है। यह दुष्ट, चुणलखा
तामसी और काले वस्त्र पहनने वाला होता है।
वैद्यनाथ -- काठिन्यरोमावयव: क शात्मा दूवसित कफमारूतात्मा । पीनद्विजश्चारूपिशंगद्टशि: सौरिस्तमोबद्धितोऽ लस: स्यात ll
इस के केश और अवयव कठिन होते है। शरीर दूर्वा जैसा काले रंग का होता है। प्रकृति कफवात की होती है। अन्य वर्णन पहले आ चुका है।
पराशर-- कृशदीर्घतनः शीरिः पिंगदृष्टयानिलात्मकः।स्थूलदन्तोलसः त्युंगखररोमकचो द्विजः | यह ब्राह्मण वर्ण का है। अन्यवर्णन पहले जैसा है।
महादेव -- क्रियास्वपटुः कातराक्षः कृष्णः कृशदीयाँगो बृहहन्तो रूक्ष तनूरूहो वातात्मा कठिनवाक् निन्द्यो मन्दः ।। यह अपने सभी कामों में कुशल होता है । दृष्टि से डरपोक प्रतीत होता है। कठोर बोलता है और
निन्दनीय होता है। अन्य वर्णन पहले जैसा है।
ढुंढिराज -- श्यामलोऽतिमलिनश्च शिराल: सालसश्च जटिलः कृशदीर्घः । स्थूलदन्तनखपिंगलनेत्रो युक् शनिश्च खलतानिलकोपैः ॥ इस वर्णन में पूर्व वर्णनों से जटायुक्त होना इतना विशेषण अधिक कहा है।
मन्त्रेश्वर -- इस में कल्याण वर्मा जैसा वर्णन कर पंगु होना इतना
जयदेव -- शनिः कृश: श्यामल दीर्घ देहो ऽलसो ऽनिलात्मा कपिलेक्षणश्च । पृथुद्विजः स्थूलनखौष्ठकेशः शठः शिरौजाः पिशुनः । इसवर्णन में होंठ बड़े होना इतना अधिक विशेषण है।
पुंजराज -- मूर्खोऽलसः कृष्णतनुः कृशांगः स्यात् स्नायुसारोमलिनोऽतिदीर्घः । क्रोधी जसतूपिंगद्टशोरडर्कसूनुः सपैत्यवायुः पृथुरोमदन्तः॥इस में प्रकृति पित्तवातात्मक होना इतना विशेष है।
विलियम लिली -- शनिप्रधान व्यक्ति का शरीर साधारणतः शीतल और रूक्ष होता है। मझला कद, फीका काला रंग, आंखे बारीक और काली, दृष्टि नीचे की ओर, भाल भव्य, केश काले और लहरीले तथा रूक्ष,कान बडे लटकते हुए होते है। भौहें झूकी हुई, होंठ और नाक दोनों मोटे होते है तथा दाढी पतली होती है। इस प्रकार का स्वरूप बतलाया जा सकता है।इस का चेहरा देखने से प्रसन्नता नहीं होती। सिर झुका हुआ और चेहराअटपटा सा लगता है। कन्धे चौडे, फैले और टेढेमढ़े होते है। पेट पतला,जंघाएं बारीक तथा घुटने और पैर भी टेढ़ेमेढ़े होते है। चाल शराबी जैसीलडखडाती प्रतीत होती है। घुटने एक दूसरे से सटे रख कर चलतें है। शनिपूर्व की ओर हो तो सुदृढ़ शरीर और मर्दानगी काफी हद तक होती है। कदनाटा होता है। पश्चिम की ओर हो तो कृश और अधिक काले रंग का होताहै। शरीर पर केश बहुत कम होते है। शनि के शर कम हों तो कृशताज्यादा होती है। शर अधिक हो तो मांसल शरीर होता है। दक्षिण शर हो तोमांसल शरीर होकर चाल तेज होती है। उत्तर शर हो तो केश बहुत और शरीरमांसल होता है। जिस समय शनि वक्री होता है, उस समय वह पाँच दिनों तकस्तंभित रहता है इस स्थिती में साधारण मोटापा होता है। मार्गी होते समयस्तंभित शनि मोटा, टेढ़ामेढ़ा और दुर्बल शरीर देता है।
कुण्डली में शुभ सम्बन्ध में हो तो -- गहरा विचार करना, कमबोलना, अति व्यवस्थित बरताव, परिश्रम बहुत करना, किसी भी विषय परगम्भीरता से बोलना, लेनदेन में खुले दिल से व्यवहार, जीवन का उत्तार्थसुखमय होना, व्यासंगी होना, अभ्यासशील वृत्ति ये इस व्यक्ति के विशेष गुणहोते है। सब तरह से व्यवस्थित स्वभाव होता है।
कुण्डली में अशुभ सम्बन्ध में हो तो -- लोगों से शत्रत्वकरना, लोभी मत्सरी स्वभाव, अविश्वासी वृत्ति, डरपोक होना, हमेशाकिसी संकट में होने जैसा बरताव, हीनसा, कंजूसी, अपना सच्चा स्वरूपछुपाना, आलसी वृत्ति, संशय लेना, स्वार्थपरता, स्त्रियों के बारे में तिरस्कार,झूठ बोलना, दुष्ता, असन्तोष, हमेशा रोनी सूरत रहना यह इस व्यक्ति केविशेष गुण होते है। साधारणतः ये व्यक्ति अपना कार्य धूर्तता से सिद्धकरते है। लोगों को अपना ही मत ठीक है ऐसा समझाते है, दुष्टता और प्रतिशोध की भावना से काम करते है, धर्म कि बिलकुल फिक्र नहीं करते,गाली गलौज खुल कर करते हैं, बीभत्स बोलते हैं, ठग, बहुत खानेवाले,झगडालू, लोभी होते है। यह क्वचित ही धनवान होते हैं।
ॲलनलिओ -- यह ग्रह शान्त, गम्भीर और विचारी प्रवृत्ति देताहै। निसर्गतः वृद्धावस्था पर इस का अधिकार है, तारूण्य बीत जाने तकइस के फलों का ठीक अनुभव नहीं मिलता। आत्मविश्वास, संकुचितवृत्ति, मितव्यय, सावधानता, धूर्तता ये इस के स्वभाव विशेष होते है। इच्छाशक्ति प्रबल होने से सहनशील, शान्त, स्थिर, दृढ़ प्रवृत्ति होती है। उल्लास,आनन्द, प्रसन्नता ये गुण क्वचित दिखाई देते है। समाज में किसी की श्रेष्ठतान मानना, हंसी मजाक का वातावरण बनाना यह प्रवृत्ति होती है। व्यवहारज्ञानऔर कुशलता अच्छी होने से लोगों के साथ बरताव में और व्यवसाय मेंचतुरता से व्यवस्था करते है। मनुष्य की योग्यता देख कर उस से काम करालेते है। महत्वाकांक्षी, दूर की सोचने वाले, योजनाएं बनाने वाले होते है।किन्तु किसी भी योजना की सफलता में बहुत समय लगता है। जगत में सच्चेऔर झूठे का भेद समझना यह इस का श्रेष्ठ गुण होता है।
हमारा अनुभव -- यह ग्रह कुण्डली में विकसित शुभ फल देताहो तो कौटुम्बिक प्रेम का विकास होता हैं। इन लोगों को सामाजिक औरआर्थिक क्रान्ति की इच्छा होती है और उस के लियें प्रयत्न भी करते हैं।उपभोग करते हुए भी त्यागी होते है। लोककल्याण के लिये प्रयत्नशील रहतेहै। अभिमान नही होता। मिलनसार, उदार, राष्ट्रोपयोगी कार्य में तत्पर,अनेकों के घर बसानेवाले, परोपकारी वृत्ति के होते हैं। विद्वान, संशोधक,मंत्री, आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने वाले पुरूष होते हैं। ज्ञान, विश्वबन्धुत्व,प्रेम, पवित्रता ये भावनाएं विकसित होती हैं। किसी भी शास्त्र में तह तकखोज करने वाले, अनासक्त, अधिकार की इच्छा न होते हुए भी अधिकारप्राप्त करने वाले होते है। गुढ़ शास्त्रों का अभ्यास, लेखन, ग्रंथ- प्रकाशन, त्ज्ञान का प्रसार इन प्रवृत्तियों में भाग लेते है। अपमानित स्थिती मेंदीर्घकाल न रह कर स्वाभिमान से दो दिन में मरना अच्छा समझते है।कीर्तिमान, संस्थाओं के स्थापक, अन्याय का प्रतिकार करने वाले, जुल्म नसहने वाले होते हैं। बहुत श्रीमान, अपने सुख की फिक्र करने वाले, लोगोंकी बातों से अलिप्त रहते हैं। इन को गोद लिये जाने का योग होता है। लोगोंपर उपकार या अपकार करने की इच्छा नही होती। इन्हें मित्र कम होते हैं। येउरपोक, कुछ धूर्त, संशयी, प्रतिशोध की भावना रखने वाले होते है किन्तु येदोष छिपाने की कोशिश भी करते है। सावधान, दीर्घोद्योगी, सौजन्ययुक्त,नियमित, व्यवस्थित, कार्य मे दृढ़, गंभीर, अंगीकृत काम बहुत प्रयत्ल सेपूर्ण करने वाला, हठी, दुराग्रही, लोगों का न सुन कर अपने दिल से कामकरने वाला, अपने विचार गुप्त रखने वाला, दीर्घद्वेषी, अकारण गलतफहमीकर लेने वाला ऐसा इस व्यक्ति का स्वभाव होता है। संसार में आसक्त औरदीर्घायू होते हैं । इन्हें अधिकार की बहुत लालसा होती हैं किन्तु इन काअधिकार कायम नहीं रहता। राष्ट्रीय कार्य में भाग लेना, कानून का अभ्यास,लेनदेन में चिकित्सा किन्तु लोगों का आदर सत्कार करना, मधुर बोलना येप्रवृत्तियां होती हैं।
यदि कुण्डली में शनि, अशुभ फल देता हो तो -- स्वार्थी,धूर्त, दुष्ट, मन चाहे वैसा बर्ताव करने वाला, दुर्बल मन का, आलसी, मन्दबुद्धि, उद्योग से पराङ्मुख, अविश्वासी, गर्वीला, नीच कामों में मप्न,घातपाती कृत्यों में आनन्द मानने वाला, झगड़ालू, झगड़े लगाने वाला,विरोध बढ़ाने वाला ऐसा व्यक्तित्व होता है। थोड़ी थोड़ी बचत करते हैंकिन्तु बड़े खर्च रोक नहीं सकते । व्यवसाय में चिकित्सक, सचझूठ में भेदन करने वाला, दूसरों की तरक्की में बुरा मानने वाला, कठोर बोलने वालायह इस व्यक्ति का स्वरूप होता है। विचित्र मनोवृत्ति, असन्तोष, व्यसनों मेंआसक्ति, स्त्रियों की अभिलाषा, पाप पुण्य की परवाह न करना, विषयममता, दुराचरण, अच्छे कामों में विध्न लाना, अपने सुख और फायदेकी ओर ही देखना, दूसरों की गलतियाँ ढूंढते रहना, बीभत्स बोलना,अविचारी बरताव, दुसरों के धन का अपहरण, धन की तृष्णा, सत्ता केलिये कोशिश, सत्ता मिलते ही जुल्म और दुराचार शुरू करना, अपने कोही सर्वश्रेष्ठ मानना, क्रोधी प्रवृत्ति, दांभिक बरताव, उपाधियों की प्राप्ति केलिये झूठ का आश्रय, गद्दारी, दारिद्रय ये गुणधर्म पाये जाते है।
सामान्यतः -- शनि के लिये मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक,मीन तथा मिथुन ये राशियां शुभ है। तुला और कुम्भ अशुभ हैं। वृषभ, कन्याऔर मकर बहुत अनिष्ट है। इन्हें उत्पात राशि कहा गया हैं।
शनि के कारकत्व के विषय में पुरातन लेखकों के विचार पहलेदेखिए -
कल्याण वर्मा--त्रपुसीसकाललोहककुधान्यमृतबंधभृतकानाम्।नीच स्त्रीपण्यकदासवृद्धजनदीक्षाप्रभुः सौरिः | टिन, सीसा, लोहा, हलकेधान्य, शव की अर्थी के वाहक, नीच, स्त्रियों का व्यापार, गुलाम, वृद्ध,दीक्षा इन विषयों का कारक शनि है।
गुणाकर -- दासों का कारक शनि है। यवन मत से वृद्धत्व भी इसीका कारकत्व है - "जरा यवनैस्तथैव।
वैद्यनाथ --आयुर्जीवनमृत्युकारणविपत्संपतप्रदाता शनिः। दारिद्रियदोषजनिकर्मपिशाचचौरै: क्लेशं करोति रविजः सह सन्धिरोगैः ॥ आयु,मृत्यु के कारण, संपत्ति और विपत्ति का विचार शनि से करना चाहिए। दारिद्य,पिशाच- बाधा, चोरी, सन्धिरोग ये दोष शनि के अधिकार के हैं।
पराशर -- आयुष्यं जीवनोपायं दुःखशोकमहद्भयम् । सर्वक्षयं-सर्वराज्यदार्वायुधगृहयुध्ध संचारशूद्रनीलमणि। विध्नकेश शल्यशूल-रोगदासदासीजनायु ष्यकारकः शनिः॥ शनि के स्वामित्व के विषय इस प्रकारहैं -- आयुष्य, जीवन के उपाय, दुःख, भय, शोक, नाश, मरण, भैंस,हाथी, तेल, कपडे, श्रुंगार, प्रवास, राज्य, लकड़ी के आयुध, घर के झगड़े,शूद्र, नीलरत्न, विध्न, केश, शल्य, शूलरोग, गुलाम।
सर्वार्थचिन्तामणि --लोभमोहविषमपरपीडानिर्धातनैष्ठु-दरशववचधजीवनोपायकारकः शनिः ॥ लोभ, मोह, विषमता, दूसरों को कष्ट देना,नाश करना, निषठुरता, दुष्ट बुद्धि, दरिदिता, बुरा क्रोध, वातरोग, ठगना, भैंस,पेज, काले धान्य (काले तिल, उड़द, चना आदि) आयुष्य तथा जीवन केउपाय इन विषयों का कारक शनि है।
मन्त्रेश्वर--तैलक्रयी भृतकनीचकिरातकायस्काराश्च दन्तिकरटाश्चपिकाः शनौ स्युः। बौध्धाहितुण्डिकखरा-जवृकोष्ट्सर्पध्वांतादयोमशकमत्कुणकृम्युलूकाः ॥वातश्लेष्मविकारपादविहंतिचापत्तितन्द्राश्रमान् । भ्रान्तिं कुक्षिरुगन्तरुष्णभृतकध्वंसं च पर्शवाहितिं।भार्यापुत्रविपत्तिमंगविहति। हत्तापमर्कात्मजो। वृक्षाश्मक्षतिमाह कश्मलगणैःपीडां पिशाचादिभिः॥ तेल के व्यापारी, नौकर, नीच, वनचर, लोहार, हाथी,कोकिल, सपेरे, बौद्ध, गधा, बकरा, भेड़िया, उंट, सांप, कौआ, मच्छर,खटमल, कृमि, उल्ू, आदि पर शनि का अधिकार है। वात, श्लेष्म (कफ),पैरों के रोग, आपत्ति, तन्द्रा, श्रम, भ्रम, पसलियों का दर्द, अन्दर की ऊष्णता, नौकरों का नाश, स्त्री पुत्रों पर विपत्ति, अवयव टूटना, हृदय को कष्ट,वृक्ष या पत्थर से आघात और पिशाचों की बाधा ये शनि के विषय हैं।विद्यारण्य -- आयुष्यं जीवनोपायं मरणं च शनैश्चरात् । इसका अर्थ पहले आ चुका है।
कालिदास - जाड्यादिप्रतिबन्धकाश्वगजचर्मायप्रमाणानिसंक्लेशोव्याविरोधदुःखमरणें स्त्रीसौख्यदासीखराः । चाण्डालाविकृताझगनो वनचरा बीभत्सदानेश्वरा। वायुर्दायनपुसकान्त्यजखगाःप्रेताभ्रिदासक्रियाः। आचारेतररिक्तपौरूषमृषावादित्वदार्वानिलावृष्दस्नायुदिनान्तवीर्यशिशिर्त्वत्यन्तकोपश्रमाः । कुक्षत्रोद्वितकुंडगोलकजनिर्मालिन्यवस्त्र गृहं ताहग्वस्तुमनोविचारखलमैत्री कृष्णपापानि च॥ क्रौर्य भस्म च नीलधान्यमणिलोहौदार्यसंवत्सराः। शूद्रो विद्पितृकारकोन्यकुलविद्यासंग्रहः पंगुता । तीक्षणं कंबलवस्त्रं पश्चिममुखेसंऽजीवनोपायका धोदृष्टी कृषिजीवनायुधगृहज्ञातिर्बहिःस्थानकाः ।ईशान्यप्रियनागलोकपतने संग्रामसंचारिता। शल्यं सीसकदुष्टविक्रमतुरूष्काजीर्णतैलेऽपि च । दासब्राह्मणतामसे च विषभूसंचारकाडिन्यकेभीतिर्दीर्षीनिषादवैकृतशिरोजाः सर्वराज्यं भयम्। छागाद्या महिषादयो रतिरतोंवस्त्रादिशुंगारता मृत्यूपासकसारमेयहरिणाः काठिन्यचितं शनै: ।।शनि से निम्नलिखित विषयों का विचार करना चाहिये - मुर्खता, कैद,घोड़ा, हाथी,आय, चर्म, प्रमाण, क्लेश, रोग, विरोध, दुःख, मरण, स्त्रीमुख,दासी, गधे, चाण्डाल, विकृत अवयव वाले (काने, लंगडे आदि), वनचर,बीभत्स, उदार, आयुष्य, नपुंसक, अन्त्यज, पक्षी, प्रेत, अग्नि, दास, आचार,पौरूष की कमी, झूठ बोलना, लकड़ी, वायु, वृद्ध, स्नायु, सन्ध्याकाल,वीर्य, शिशिर ऋतु, बहुत क्रोध, अतिश्रम, क्षत्रियों की अवैध सन्तान,मलिनता, घर, कपड़े तथा विचार अपवित्र होना, दुष्टों से मैत्री, बहुत बुरेपाप, क्रूरता, भस्म, काले धान्य, लोहा, उदारता, वर्ष, शूद्र, वैश्य, पिता,दूसरे कुलों के ज्ञान का संग्रह, लंगड़ापन, तीक्ष्णता, कम्बल, पश्चिम कीओर मुख, जीवन के साधन, नीचे ृष्टि, खेती, शस्त्र, जाति, बाहर के स्थान,ईशान्य दिशा, नागलोक, लड़ाई, प्रवास, शल्य, सीसा, बूरे पराक्रम, तुर्कलोग, पुराना तेल, ब्राह्मण, तामसी स्वभाव, विष, भूमिसंचार, कठिनता,डर, निषाद, विकृति, सुदृढ, धमनियाँ, सर्व राज्य, बकरे, भैसें आदि,रति, वस्त्रादि, श्रृंगार, मृत्यु की उपासना, कुत्ते, हरिण आदि तथा चित्त कीकठोरता।
विलीयम लिली -- शनिप्रधान व्यक्ति साधारणतः किसान,श्रमिक, वृध्ध, साधु, सांप्रदायिक, भिक्षुक, विदूषक, पुत्रपौत्रों से युक्त होतेहैं। व्यवसाय की दृष्टि से - चमार, रात के काम करने वाले श्रमिक, खदानों के
श्रमिक, टिन का काम, कुम्हार, झाडू बनाने वाले, नल लगाने वाले, इंटे बनानेवाले, रसोइये, चिमनी साफ करने वाले, प्रेतवाहक, खोदने वाले, नईस,कोयले के व्यापारी, गाडी चलाने वाले, माली, मोमबत्ती बनानेवाले, कालेकपडे, ग्वाल ये शनि के कारकत्व में आते हैं। रोगों का कारकत्व-दात,दाहिने कान के रोग, चौथे दिन का बुखार, शीतज्वर, ऊष्णता से और उदासीनतासे उत्पन्न ज्वर, कोढ़, रक्तपित्त, क्षय, कामला, अधागवायु, कंप, निर्र्थकभय, पागलपन, जलोदर, सन्धिवात, अति रक्तस्त्राव, हड्डियों का टूटनाआदि। यह सिंह या वृश्चिक में हो अथवा शुक्र की अशुभ दृष्टि में हो तो इनरोगों का उदय होता है।
हमारे अनुभव -- शनि के कारकत्व के बारे में हमने निम्न विषयोंका अनुभव देखा है - बैंक, व्याज का धन्धा, मिल, कारखाने, मिलों सेसम्बन्धित कानून, भूगर्भशास्त्र, मुस्लिम कानून, मिल मालिक, साझीदार,प्रिन्टिग प्रेस, कोयले का व्यापार, बड़ी कम्पनियां, जिनिंग प्रेसिंग फॅक्टरी,इस्टेट ब्रोकर, खदानों के कानून, बीमा व्यवसाय, लोहे की चीजें, वैद्यकीयकानून, कृषि विद्यालय, पूंजीपति, तेल के व्यापारी और कारखाने, इस्टेटसम्बन्धी कानून, भूमि सम्बन्धि कानून, रोमन कानून, पुरातत्व संशोधन,स्नायु शास्त्र, हठयोग, उच्च न्यायालय, न्यायाधीश, नगर निगम, जनपद,जिला परिषद, विधान सभा, आदि के सदस्य, जमींदार, खनिज पदार्थ, गुप्तबातें, दुष्टतापूर्ण काम, खलनायक, कैद, दण्ड, राजनीति और व्यवसाय मेंहानि, सरकार की ओर से मुकदमा चलाया जाना, छोटे भाई बहन, चोरी,जेलर, जेल सुपरिटेंडेंट, विदेश मन्त्री, विदेश नीति, सन्धि, शत्रुत्व या मैत्री,इन्जेक्शन, क्वार्टर मास्टर (सेना में ), (रोगों में ) - हड्डियों के व्रण, दाद,इसब, फोड़े, सन्धिवात, यकृत और प्लीहा रोग, पैर और घुटनों के रोग,मलमूत्रोत्सर्जक इन्द्रियों के रोग, हाथीपाँव, पसीने को दुर्गन्धि होना, गूंगापन।
शनि का शरीर दुबला किन्तु लम्बा होता है, यह पिंगल वूर्णदूष्टि का तथा वायु प्रधान प्रकृति का होता है। इसके दांत मोटेतथा स्वभाव आलसी होता है। इसके रोम और केश तीखे औरकठोर होते हैं। शनि शूद्रवर्णी तथा तामस प्रकृति का है।
नभोमण्डल में बूहस्पति के पश्चात मुंदगति शनि का स्थानमाना गया है। दुख, कष्टों का कारक और गरह परिषद में इसेभूत्य का स्थान प्राप्त है। श्रमिकों और कार्यकर्ताओं काआश्रयदाता, दस्यु बूत्ति करनेवालों का संरक्षक है। मन्द, सूर्यपुत्र,कोण, तरणि तनय, असित, अकि, छायासुत, पंगु, पंगुकाय,घुमणिसुत, पातंगी, मूदु, नील, कपिलाक्ष, कुशांग, दीर्षछायात्मज, यम्, अर्कपुत्र, सौरिः, क्रूरलोचन, दुख, काल आदिशनि के पर्याय नाम हैं।
जड़ता, आलस्य, रुकावट, घोड़ा, हाथी, चमडा, आय, बहुतकष्ट, रोग, विरोध, मरण, दुख, दासी, गधा, चाण्डाल, विकृतअंगोंवाले, दान, स्वामी, वनों में भमण करनेवाले, नपुंसक, अन्त्यज,खग, दासता का कर्म, पौरुषहीनता, मिथ्या भाषण, वूद्धावस्था,नसें, शिशिर ऋतु, मणि, लोहर, पापकर्म, काले धान्य, कृषि द्वारा,जीवन निर्वाह, नागलोक, युद्ध, शल्य विद्या, कुत्ता, चोरी, यमराजका पुजारी, निषाद आदि का कारक शनि है।
शनि का रंग-काला, प्रकृति-वात, वर्ण-शूद्र, त्त्व-वायु,लिंग-नपुंसक, गुण-तम, दिशा-पश्चिम, ऋतु-शिशिर, रस-कसैलाभावकारक-शत्रु, मृत्युभाव, राशि अवधि-30 मह, अधिष्ठाता-दरिद्रितावस्त्र-काले, देवता-यम, धातु-लोहा, रल-नीलम है। मकर-कुम्भशनि की स्वराशि है। तुला उच्च राशि, मेष नीच राशि है। यहअपने स्थान से तीसरे, सानवें और दसवें भाव कर पूर्ण दृष्टि सेदेखता है। बुध, शुक्र इसके मित्र ग्रह, बूहस्पति सम तथा सूर्य,चन्द्र, मंगल शत्रु ग्रह हैं।
दांत, दाहिने कल का रोग, बुखार, शीत ज्वर, कोढ,पागलपन, जलोदर, संधिवात, उदरवात आदि रोगों पर भी शनिका अधिकार है। पुष्य, अनुराधा और उत्तरर भादपद इसके नक्षत्रहैं, जन्म समय इन नक्षत्रों पर शनि रहे तो शनि की महरदशाविद्यमान रहती है।
रानि के राशिगत व स्थानगत फल
राशिगत फल
1. मेष-कुंडली में मेष रशि का शनि हो तो जातक मित्रहित, कफटी,कृतबन, दुष्ट, चिडचिड़ा, उपदरवी, दभी, जिदी एुरव आलसी होता है। जीवनका पूर्वार्ध परेशानियों से पूर्ण रहता है, कई उतार-चढात देखने पड़ते हैं। दपतयजीवन दुखमय रहता है।
2. वृषभ-कुंडली में वृषभ राशि का शनि हो तो जातक चतुर, ईप्पार,बंधु-बांधवों से पीड़ित, गुप्तरोगी, सदैव इंद्रियजन्य सुख का विचार करतवालाएवं परस्त्रीगामी रहता है।
3. मिधुन-कुंडली में मिधुन राशि का शनि हो तो जातक दुखखी, निर्नन,अल्पसंतानयुक्त, जेल-अधिकारी, रासायनिक, यंत्रविषयक शास्त्रों का जानकार,सुधारक, परिवार एवं अन्यों से द्वेष ईप्या पानेवाला, मं्दबुद्धि, रोगी होता है।4. कर्क कुंडली में कर्क राशि का शनि हो तो जातक शंकानु, धूर्त,उदररोगी, बार-बार व्यवसाय बदलनेवाला, समस्याओं और संतानविषयक चिंतासे ग्रस्त, निर्धन एवं अस्थिर बुद्धि का होता है। उसकी हर योजना अवरीध्रपूर्णहोती है।
5. सिंह-कुंडली में सिंह राशि का शनि हो तो जातक वाचाल, बौद्धिककार्य करनेवाला, लेखक, अध्यापक, स्वकार्यदक्ष, क्रूर, कठोर परिश्रमी, गुप्तशत्रुओं से पीड़ित एवं असफल रहता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि कुंडली में हो तो जातक उद्धग्न, दुष्ट,संतानहीन, संपादक एवं लेखक होता है। जीवन का पूर्वार्ध दुख एवं परेशानियोंमें बीतता है।
7. तुला-कुंडली में तुला राशि का शनि हो तो जातक सुंदर, प्रसिद्ध अभिनेता, संतानहीन, परस्त्री में आसक्त, लेखक, नेता, विचारक, डॉक्टर,वकील या वैज्ञानिक होता है।
8. वृश्चिक-कुंडली में वृश्चिक राशि का शनि हो तो जातक अतिक्रूर,वाचाल, चपल, कठोर, हिंसक, निर्दयी, घरेलू अड़चनों एवं चिंताओं से ग्रस्त,गुप्त संबंध रखनेवाला, परिश्रमी, असफल प्रेमी होता है। आकस्मिक रूप सेमृत्यु होती है।
9. धनु-कुंडली में धनु राशि का शनि हो तो जातक धनी, चतुर, श्रेष्ट,आचरणशौल, अभिनेता, कीर्तिवान, संतानयुक्त, परोपकारी एवं बुढ़ापे में सुखीहोनेवाला रहता है।
10. मकर-कुंडली में मकर राशि का शनि हो तो जातक विद्वान, शिल्पी,भोगी, झूठा, शक्की, ऐश्वर्यवान, सम्माननीय, प्रभावी, नीतिवान, दीर्घायु,पारिवारिक जीवन में सुखी होता है।
11. कुंभ-कुंडली में कुंभ राशि का शनि हो तो जातक परिश्रमी, दयालु,आकर्षक व्यक्तित्व का, दीर्घायु, गंभीर विचारक, नीतिवान, दार्शनिक, परस्त्रीएवं परधन युक्त, विद्वान, वकील, न्यायाधीश, प्रभावी वक्ता, हर एक के प्रतिसहानुभूति दिखानेवाला, सहयोग देनेवाला, सुखी एवं प्रगतिशील जीवनजीनेवाला होता है।
12. मीन-कुंडली में मीन राशि का शनि हो तो जातक निराश, खिन्न,आत्मघाती, अविचारी, मित्रों से धोखा खानेवाला, अधिक संतानयुक्त एवंधनसंपन्न होता है।
===========================
द्वादशा स्थानों में शानि के राशिगत फलप्रथम स्थान (लग्न भाव)
1) प्रथम भाव - प्रथम स्थान में शनि के फल
आचार्य -- अदृष्टार्थो रोगी मदनवशगोत्यन्तमलिनः शिशुत्वेपीडार्तः सवितृसुतलगेत्यलसवाक्। गुरूस्वर्षोच्चस्थे नृपतिसदशो ग्रापुरपःसुविद्वां्चार्वगो दिनकरसमोन्यत्र कथितः॥ शनि लग्न में हो वह व्यक्ति निर्धन,रोगी, कामुक, बहुत मलिन, बचपन में रोगों से पीड़ित तथा आलसी होताहै। यह शनि स्वगृह, उच्च या गुरू की राशि में (धनु, मीन,मकर, कुम्भयातुला में) हो तो वह व्यक्ति राजा जैसा सम्पन्न, नगर या गांव का प्रमुख,विद्वान, सुन्दर होता है। अन्य स्थानों में शनि के फल रवि के समान समझनाचाहिये । यही वर्णन गुणाकर, जयदेव, कल्याण वर्मा तथा मन्त्रेश्वर नेदिया है।
वैद्यनाथ -- दुर्नासिको वृद्ध कलत्ररोगी मन्दे विलग्नोपगतेंगहीनः।महीपतुल्यः सुगुणाभिरामो जातः स्वतुंगोपगते चिरायुः।। इस की नाक में दोषरहता है, स्त्री वृद्ध जैसी होती है। यह रोगी, अंगहीन (किसी अवयव मेंदोषयुक्त) होता है। शनि स्वगृह या उच्च में हो तो राजा जैसा, गुणवान तथादीर्घायु होता है।
गर्ग -- कंडूतिपूर्णांगकफप्रवृत्तिलग्ने शनौ स्यात् सततं नराणाम् ।हीनाधिकांगत्वमधःप्रदेशे कर्णांतरे वातगदः सदैव ॥ लग्ने मन्देडथवा दृष्टेकृशदेहश्च दुःखितः । मूर्खश्च मदनाचारो भिन्नवर्णस्तनौ भवेत् ॥ लोहादिभिः शिरःपीडा आत्मचिन्ता निरन्तर । तुलाकोदडमीनानां लम्नसंस्थे शनेश्चरे ।।करोति भूपरति जातमन्यराशी गतायुषं । स्थविरी सबली यस्य ग्रही स्यातांविलग्गौ। प्रकृत्या स भवेद् वृद्धो मान्यः सर्वजनेषु च ।। इस के सब शरीर मेंखुजली रहती है, कफ प्रवृत्त रहती है, नीचे के भाग में कोई अवयवकम या अधिक रहता हैं। कान में वातरोग होता हैं। शरीर कृश होता है।यह दुःखी, मूर्ख, कामुक और विवर्ण होता है। इसके सिर में लोहे की चीजके आघात से पीड़ा होती है। हमेशा अपने बारे में चिन्ता रहती है। यहअल्पायु होता है। तुला, धनु, या मीन लग्न में यह शनि राजा जैसी समृद्धीऔर दीर्घायु देता है। लग्न में वृद्ध ग्रह बलवान हों (गुरू और शनि) तो वहप्रौढ़ प्रकृति का और लोकमान्य व्यक्ति होता है।
आर्यग्रन्थ -- सततमल्पगतिर्मंदपीडितस्तपनजे तनुगेखलुचाधमः । भवति हीनकचः कृशविग्रहो निजसहृद्रिपुसद्यनि मानवः ॥। यहबहुत कम चलता है, अहंकारी और अधम होता है। इसे केश कम होते है।
बृहद्यवनजातक -- प्रसूतिकाले नलिनीश सूनौैस्वोच्चत्रिकोणर्क्षगते विलग्ने । कुर्यात्नर देशपुराधिनाथं शेषर्षसंस्थे सरूजंदरिद्रम् । शरार्किः अरिष्ट करोति भ्रुवम् । लमस्थ शनि स्वगृह, मूलत्रिकोणया उच्च राशि में हो तो देश या नगर की प्रमुखता मिलती है। अन्य राशियों मेंरोगी और दरिद्री होता है। यह ५ वें वर्ष में संकट उत्पन्न करता है। ढुंढिराज नेभी यही वर्णन किया है।
पराशर -- रवि और मंगल के सदृश फल बतलाये हैं अर्थात सिर
और इस का शरीर कृश होता है। यह शत्रुओं से मित्रता करता है। के रोग, बन्धुओं से विरोध तथा चपलता और फोड़े फुन्सी आदि होना येफल है।
वसिष्ठ -- बहुदुःखभाजं । सर्वनाशः । यह शनि बहुत दुःख देने वाला और सर्वनाश करने वाला होता है।
जागेश्वर--यदा मन्दतो वन्हिखेटा विलग्ने नरं दन्तुर दन्तरोगान्प्रकुर्युः । तथा काष्ठपाषाणजैश्चापि घातैः सलोहैः सदा दुखितो वायुरोगैः ॥शनिर्यस्य शीर्षे बलं चाधिकारं तथा सौष्ठवं कुत्र लभ्यं च तस्मात् । स्वयंमत्सरी क्रूरदृष्टिः सकोपः स्त्रिया संजितः स्त्रीप्रधानो भवेद वा॥ शनि आदितीन ग्रह लभ में हों तो दांत बड़े होते है । दांतों के रोग होते हैं। लकड़ी,पत्थर या लोहे के आघात से कष्ट होता है। वात रोग होते है। उसे बल,अधिकार, सौष्ठव प्राप्त नहीं होते । वह मत्सरी, क्रूर और स्त्री के अधीनहोता हैं।
नारायण भट्ट -- धनेनातिपूर्णोऽतितृष्णो विवादी विषादी ।तनुस्थेडर्कजे स्थूलदृष्टिर्नरः स्यात् । विषं दृष्टिजं त्वाधिकृद् व्याधि बाधाःस्वयंपीडितो मत्सरावेश एव॥ यह धनवान किन्तु बहुत लोभी, विवाद करनेवाला, स्थूल दृष्टि का होता है। इस की दृष्टि विषयुक्त होती है (अच्छी वस्तुपर इस की लोभी निगाह पड़े तो वह वस्तु नष्ट होती है) । यह रोगों औरचिन्ताओं से पीड़ित होता है। मत्सर के कारण खुद ही परेशान होता है।
लखनौ के नबाब -- ताले यदि स्याज्जुहलो बदअक्कलश्चलागरो मनुजः । शठकंबुरु बेदिलः वाममतिपूर्णः प्रभूर्भवति ॥ यह मूर्ख,दुर्बल, दुष्ट, कुरूप, निर्दय और टेढ़ी बुद्धि का व्यक्ति होता है।
हरिवंश -- स्वोच्चे जीवगृहे स्वालयस्थः शनिश्चेत् लग्ने कोणेभूपतुल्यं मनुष्य। कुर्याच्छेपें संस्थितो रोगयुक्तं दीनं हीनें दुःखभाजं दरि् ॥लग्न अथवा कोण में शनि तुला, धनु, मकर, कुम्भ या मीन में हो तो राजाजैसा पद मिलता है। अन्य राशियों में वह व्यक्ति रोगी, दीन, निर्धन औरदुःखी होता है।
काशीनाथ-- लग्ने शनौ सदा रोगी कुरूपः कृपणो नरः। कुशीलःपापबुद्धिश्च शठश्च भवति ध्रुवस् ॥ यह हमेशा रोगी रहता है। कुरूप,कंजूस, दुराचारी, पापबुद्धि और बदमाश होता है।
हिल्लाजातक -- इस स्थान में शनि के फल मंगल के समान बतलाए गए हैं।
गोपाल रलाकर -- यह पुत्रहीन, दुर्बुद्धि, मलिन, कामुक, रोगीऔर कुरूप होता हैं। यह दुष्टों की संगति में रहता है। राजा के क्रोध काकारण बनता है। वातपीड़ित होता है। उच्च में यह शनि हो तो गाँव का प्रमुखहोता है।
भृगुसूत्र -- दृष्टचैव रिपुनाशकः तनुस्थाने शनिर्यस्यधनीपूर्णतृषान्वितः स्थूलदेहो विषदृष्टिः वातपित्तदेहः । उच्चे पुस्ग्रामाधिपःधनधान्यसमृद्धिः । स्वर्कषे पितृधनवान् । वाहनेशकर्मेशभाग्यक्षेत्रे बहुभाग्यम्महाराजयोगः । चन्द्रम सादृष्टे परात्नभुक् । शुभद्ृष्टे निवृत्तिः ॥ यह धनवान,शत्रु का नाश करने वाला, लोभी, मोटा, वातपित्त प्रकृति का होता है। इस कीदृष्टि विषैली होती है। शनि उच्च में हो तो गांव या शहर का मुख्य हो करधनधान्य की समृद्धि रहती है। स्वगृह में हो तो पैतृक सम्पत्ति मिलती है। यहवाहनेश, दशमेश या भाग्येश की राशि में हो तो राजयोग होता है। चन्द्र कीदृष्टि हो तो दूसरों पर अवलम्बित रहना पड़ता है। अन्य शुभ ग्रह की दृष्टि होतो यह दोष दूर होता है।
लग्न में शनी जातक दीर्घसूत्री (धीरे-धीरे काम करने वाला) व्यसनी, नीच, शरीरपर अधिक रोमावलि वाला और दुबला-पतला होगा। यदि शनि शत्रक्षेत्रीहैं तो जातक अपने परिवार-जनों से अत्यधिक लगाव रखेगा।
-मानसागरी
यदि शनि स्वक्षेत्री या उच्चस्थ है तो जातक राजा के समान, मुखियाया किसी स्थान पर प्रभुत्व प्राप्त करेगा। यदि शनि किसी अन्य राशि मेंहै तो जातक बचपन से दुखी व दरिद्रता से पीड़ित होगा। वह जीर्ण क्षीर्णजीवन यापन करने वाला, अत्यन्त दरिद्र तथा निश्क्रिय होगा।
-फलदीपिका
यदि शनि लग्न में स्वक्षेत्री या उच्चस्थ है तो जातक राजा जैसेठाठ-बाट वाला होगा। अन्य राशियों में यह लड़कपन से ही प्रतिकूलताएँदेगा। उसका रहन सहन जीर्ण क्षीर्ण, दरिद्रतापूर्ण तथा निष्क्रिय होगा।-सारावली
व्यक्ति पित्त और वात अन्य रोगों से ग्रस्त होगा। यदि शनि स्वक्षेत्रीया उच्च राशि में है तो जातक शहर या गाँव का मुखियाँ और आर्थिकलाभ प्राप्त करेगा। जातक के पिता धनी होगें। यदि शनि चतुर्थेश यादशमेश की राशि में है तो जातक भाग्यशाली और महा राजयोग(नाम-यश-कीर्ति) का भोक्ता होगा। (जैसे-मीन लग्न के लिए शनिदशमेश की राशि में होगा)। यदि शनि लग्न में चन्द्रमा से दृष्ट हो औरकिसी शुभग्रह (शुक्र या गुरु) से दृष्ट न हो तो जातक भिखारी होजाएगा।
-भृगु
जातक विदेशी परम्परा व आदतों का आदी, अस्थिर मस्तिष्क, विकृतविचारों वाला, बुरे स्वभाव का तानाशाह, सुदृढ़ ऊरू भाग वाला, स्वस्थमस्तिष्क वाला, चालाक, चोर, गंदा, उत्सुक, विकृत, रोगी, अनेकइच्छाओं वाला, मोटा और निम्न जाति की महिलाओं के प्रति आसक्तहोगा।
-डॉ बा.वी. रमन
टिप्पणी
अपनी स्व या उच्चराशियों के अतिरिक्त लग्न में शनि की स्थितिअच्छी नहीं कही जाती। यह सेवक, निम्नजाति, नीच, दरिद्रता आदि काघोतक है। जातक लँगड़ा, विकृत हाथ पैरों वाला, दयनीय स्थिति वाला,नाक के रोगों से ग्रस्त, जुआरी, शराबी, व्यभिचारी और शत्रुहन्ता होगा।जातक सागर के मत से जातक भाग्यहीन परन्तु दीर्घजीवी, पल्ली से
अच्छे संबंध नहीं, यात्राओं का शौकीन, प्रसिद्ध नहीं होगा।
गर्ग ऋषि कहते हैं-लगनस्थ शनि सारे शरीर में खुजली, शरीर कफप्रधान, शरीर के अधोभाग में अधिकाङ्ग देने वाला है।
निष्कर्ष करने के लिए कह सकते हैं कि यदि शनि लग्न में स्व याउच्च राशि या गुरु की राशि के अलावा किसी अन्य राशि में स्थित हैं।तो वह शुभफलदायक नहीं होता।
शनि की शुभआशुभ, स्वक्षेत्री, शत्रुक्षेत्री, उच्च, नीच आदि स्थितितियो का विचार भी सिद्धांत लागू करते समय करना चाहिए l
पाश्चात्यमत -- यह शनि शुभ सम्बन्ध में हो तो भाग्योदय कराताहै। पूर्व आयु में संकट और मुसीबतें झेल कर दीर्घ उद्योग से औरआत्मविश्वास तथा धैर्य से आखिर सफलता प्राप्त होती है। शनि अशुभसम्बन्ध में हो तो वे लोग डरपोक, बडे कामों से दूर रहने वाले, दूसरों परविश्वास रखने वाले, दुष्ट,लोभी, मत्सरी, दीर्घद्वेषी, ठग, दुःखी, उद्धिम तथाएकान्तप्रिय होते है। लोगों में अप्रिय तथा जीवन में असफल होते हैं।निराशा, दुःख, कष्ट, कामों में विध्न यही इनका जीवनक्रम होता हैं। पूर्वआयु में रोगी रहते हैं। जुखाम, गिरने से सिर को चोट लगना आदि कष्ट होतेहै। वृश्चिक लग्न में बद्धकोष्ठ, सिंह में रक्ताभिसरण में दोष, कर्क में पाचनक्रिया के दोष, तुला में मूताशय के रोग होते है। साधारणतः लमस्थ शनि सेप्रवृत्ति उदासीन, हठी, निश्चयी, एकान्तप्रिय, लज्जाशील, एक ही बातपर अडे रहने की मनोवृत्ति होती है । यह हर तरह से स्वार्थ साधने वाला,लोभी किन्तु दुखी और ठग होता है। धार्मिक आचारविचार के बारे मेंइस के मत अजीब से होते है। लमस्थ शनि अग्निराशि में हो तो स्वभाव कुछमिलनसार, सरल तथा प्रामाणिक होता है। किन्तु साथ में साहस, क्रोध,झगडें और वादविवाद की रूचि होती है। पृथ्विराशि में और विशेषतः वृषभमें मन्दता, नीचता, दुष्ट और दीर्घद्वेषी वृत्ति रहती है । कन्या में जरूरत सेज्यादा पूछताछ करना, चिड़़चिड़ा मिजाज, संशयी वृत्ति यह स्वभाव होताहै। मकर में धूर्त, वादविवाद में कुशल, स्वार्थी, मतलबी, परिश्रमी, लोभी,कंजूस होता है। वायु राशि में शनि विचारी, अभ्यासी, व्यासंगी, मेहनती,उद्योगी, व्यवहारकुशल, पैसों के बारे में व्यवस्थित, अपने हित में दक्ष,धार्मिक, सच बोलने वाला, निष्कपट, आस्थापूर्ण, भाविक तथा कर्मठव्यक्तित्व देता है। मिथुन व कुम्भ में ये गुण अच्छी तरह देखे जाते हैं। तुलामें गर्विष्ठ, अपना ही मत सच मानने वाला, दुराग्रही, स्वार्थी, कंजूस स्वभावहोता है। शनि शुभ सम्बध में हो तो फलों में कुछ सुधार होता है किन्तुअशुभ सम्बध में हो तो अशुभ फल अत्यंत तीव्र होते है। कर्क या मीन मेंमन्दबुद्धि, दुःखी, बीभत्स, दुराचारी, पतित, अधर्मी होता है। क्वचित धर्मके बारे में अतिरिक्त उत्साह भी बतलाते हैं। वृश्चिक में अशुभ सम्बन्ध मेंशनि हो तो वह व्यक्ति अति धूर्त, दुष्ट, द्वेपी, प्रतिशोध की भावना रखनेवाला, विश्वास के अयोग्य और ठग होता है। वह मत्सरी, डरपोक औरसोचविचार करने वाला होता है। अग्नि राशि में काम में कुशल किन्तुहमेशा असन्तुष्ट रहता है। पृथ्वी राशि में मूर्ख, विचारशून्य होता है। कन्या मेंकहानियां सुनने का शौक होता है। वह संशयी, कंजूस और चोर होता है।हमारे विचार -- किसी अन्धियारी रात में निरभ्र आकाश में दूखबीन
से शनि की और देखें तो वह किसी शिवलिंग या तेलघानी जैसा प्रतीत होताहै। यह विशाल गोलाकार ग्रह कई रंगों से युक्त है। ध्रुवों पर नीला, अन्यत्रपीला सा और बीच में एक सफेद पट्टा दिखाई देता है। उस पर पिंगल, जामुनीया लाल रंग के धब्बे भी है। मध्य के ग्रहगोल को घेर कर तीन वलय है। उनमें बीच का वलय बहुत आकर्षक जामुनी रंग का है। ये वलय ग्रहगोल से सटेहुए नही हैं। इस प्रकार शनि इन वलयों के बीच में अलग सा स्थित है ।तदनुसार लग्नस्थ शनि के फलों में एकान्तप्रिय होना, आलस, निष्क्रियता,उदासीनता, प्रपंच से दूर रहमा, जड़ता इन का वर्णन किया है। दूसरे-पुरानीग्रहमाला में यह अन्तिम ग्रह है। सूर्य उत्पत्ति का, चन्द्र स्थिति का और शनिविनाश का कारक माना गया है। इसलिये मूलतः शनि के फल अशुभ औरमारक समझे गए हैं। नैसर्गिक कुण्डली में दशम और लाभस्थान का स्वामीहोने पर भी इसे शुभ नही माना गया। फिर भी हमारी समझ में शनि के अशुभफल मुख्यतः वृषभ, कन्या, मकर, तुला तथा कुम्भ राशियों में मिलते हैं।अन्य राशियों में शुभ फल प्राप्त होते हैं। तुला, मकर, कुम्भ में शनि के उत्तम(राजा जैसी समृद्धि) फल शास्त्रकारों ने दिये है किन्तु अनुभव में ये फल ठीकप्रतीत नही होते। यवनजातक में ५ वें वर्ष संकट का फल बतलाया गया है।इस समय शनि तृतीय स्थान में भ्रमण करता है, अतः उस का मारक फल नहींहोगा।
हमारा अनुभव -- इस स्थान में मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिकतथा मीन में शनि हो तो बहुधा वे व्यक्ति किसी ऑफिस में नौकर होते हैं। इन्हेंवरिष्ठों से झगडकर उन्नती करनी पडती है। पेन्शन के समय तक स्थिति अच्छीहो जाती है। अधिकार अच्छा रहता है। इन का विवाह एक होता है। पुत्रसन्तति कम होती है या नहीं होती। कन्याएं अधिक होती हैं। मेष, सिंह तथाधनु में आँखे बड़ी किन्तु सदोष होती हैं। शरीर प्रमाणबद्ध नहीं होता है।आवाज रौब से भरी और दृष्टिअधिकारपूर्ण होती है। जहाँ तक संभव होता है लोगों के कल्याण के लिये यत्न करते हैं। मिधुन में शनि दो विवाह कराताहै। सन्तति नहीं होती। पूर्व आयु में बहुत कष्ट सह कर उत्तर आयु में यश प्राप्तकरते हैं। ये सुशिक्षित, कानुन के ज्ञाता होते हैं। डाक्टर भी हुए देखे गये हैं।महाराष्ट्र में प्रख्यात सर्जन डॉक्टर मोने अच्छे सन्मानित अधिकारी हुए। इनके लग्न में मिथुनस्थ शनि था। सन्तति का अभाव रहा। कर्क, वृश्चिक, तथामीन में आवाज मधुर और मोहक होती है। मीठा बोल कर काम कर लेते हैं।बोलने में और युक्तिवाद में कुशल रहते हैं। सुख से जीवन यापन करने कीकोशिश करते हैं। किसी के कनिष्ठ के रूप में काम करना नही चाहते।वृषभ, कन्या, तुला, मकर और कुम्भ में नौकरी में सुख मानते हैं। व्यवसायके क्षेत्र में, बड़ी मिलों या फर्मों में अधिकारी होते हैं। इन का कौटुम्बिकजीवन ठीक नही रहता। पत्नी से नही बनती। दो विवाह होते हैं। मिलनसारनही होते । गुण न होते हुए भी अभिमानी होते हैं। नाटक या सिनेमा मेंखलनायक हो सकते हैं। यह विषैली दृष्टि का योग है। इन व्यक्तियों द्वाराप्रशंसित वस्तु या व्यक्ति का जल्दी ही विनाश होता है। मलिन स्त्रियों सेसंबंध होता हैं। पत्नी बीमार रहती है। बचपन में माता या पिता की मृत्यु होतीहै। अधिकतर पिता का मृत्युयोग होता है। सिर्फ तुला के शनि से माता पितादीर्घायुषी भी पाये गये हैं । शिक्षा अधुरी छोड़ कर आजीविका के लिये यत्नकरना पड़ता है। बड़ा व्यापार करने की इच्छा होती है किंतु वह जल्दी पुरीनही होती। साझीदारी से यश मिलता है। पैतृक संपत्ती नहीं होती। हुई तो भीट्रस्टीयों के अयोग्य व्यवहार से प्राप्त नहीं होती। स्थावर जायदाद का दलालीव्यवहार कर सकते हैं। माता पिता जीवित हों तो उन से सम्बन्ध ठीक नहींरहते। उन्हें आर्थिक मदद नहीं हो सकती। वे रहते हैं तब तक स्थिरता नहींमिलती। जीवन में असफलता मिलने पर भी ये लोग दीर्घोध्योगी होते हैं।प्राचीन संस्कृती की रूची रहती है। बरताव दम्भपूर्ण रहता है। स्त्रियों काआदर नहीं करते। मन की इच्छायें पुरी नहीं होतीं। स्वभाव दुष्ट, प्रतिशोधप्रिय, सहानुभुती से रहित होता है। जीवन में प्रगती का आरंभ २६ वें वर्ष से होताहै। ३६ वे वर्ष से अच्छी सफलता मिलती है। ५६ वें वर्ष तक सुस्थिती रहतीहै। २५ वें तथा ३१ वें वर्ष में आर्थिक नुकसान होता है। घर में २।, ७।,१७।।, २७ तथा ३२ वें वर्ष में किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति की मृत्यु होती है।लम्स्थ शनि शुक्र से दुषित हों तो विवाहसुख अच्छा नहीं मिलता - या तोविवाह होता नही, अथवा स्त्री की मृत्यु होती हैं। व्यभिचारी होते है, रखैल सेसंबंध रखते हैं । धनलाभ अच्छा हुआ तो पुत्र नहीं होते या हो कर मृत्यु होजाती है। कन्या संतती रहती है। साधारणतः व्यवसाय में हमेशा असफलरहता है, धन की कमी रहती है। क्वचित स्त्री एक ही हो कर कीर्ति अच्छीप्राप्त होने के उदाहरण भी देखे गये हैं। यह शनि मंगल से दुषित हो तोदुर्घटना होना, आकस्मिक मृत्यु, कारावास, घूस अथवा रिश्वत खाने के आरोपआदि कष्ट का अनुभव होता है। मेष, सिंह तथा धनु में पसीने की बदबू आतीहै। कपड़े अच्छे नहीं रहतें, फटे और मैले रहते हैं। प्रकृति निरोगी रहती है।कर्क, वृश्चिक तथा मीन में - सर्दी, जुकाम, खांसी से हमेशा कष्ट होता है।बुढ़ापे में बद्धकोष्ठ होता है। कभी कभी उन्माद, पागलपन, मुत्रोग, बहुमुत्रमेहआदि रोग होते हैं। मिथुन, तुला तथा कुम्भ में - साधारणतः प्रकृति अच्छीरहती है। वातरोग हो सकते हैं। वृषभ, कन्या तथा मकर में - मूत्रकृच्छ, कफरोग, उपदंश आदि की संभावना होती है।
प्रथम दर्शन में इन व्यक्तियों का प्रभाव अच्छा नही पड़ता। मेष,कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु तथा मीन में - स्वभाव बहुत अच्छा होता है किन्तुअच्छे परिचय बिना इस अच्छाई का अनुभव नहीं होता । अन्य राशियों में खलनायक की योग्यता होती है। कन्या, मकर, कुंभ तथा वृषभ में अपने स्वार्थके लिये दुसरों का नुकसान करते हैं। बोलने में संगती नही रखते । झूठ बोलतेहै। गंभीरता बतलाते हैं। धूर्त होते हैं ।
प्रथम स्थान (लग्न) में शनि नीच राशि का, शत्रक्षेत्र का या दुर्बल हो तोवह शुभ फलदायी नहीं होता। ऐसा जातक रोगी, आलसी, अल्पधनवान,कामातुर एवं गंदा रहता है। मां या पिता में से एक का सुख कम रहता है।नाक या शरीर के किसी हिस्से में विकार रहता है। पत्नी जातक से अधिकउम्र की होती है या दिखती है। शरीर का कोई अंग असमान रहता है, बालकम रहते हैं। खाज-खुजली या कफ प्रवृत्तिजन्य रोग से जातक पीड़ित रहताहै, दांत बड़े होते हैं। सिर पर आघात होने का डर रहता है। अहंकारी होतेहुए भी कामातुर होने से जातक पत्नी का गुलाम होता है। जिस वस्तु या व्यक्तिपर इसकी नजर पड़े, उस वस्तु या व्यक्ति का नाश होता है। धनवानहोते हुए भी जातक लोभी होता है। शनि पर चंद्र की दृष्टि हो तो पराधीनबनता है। शनि लग्न में बलवान, उच्च, धनु, मीन, तुला, मकर या कुंभ राशि काहो तो जातक प्रभावी, शत्रुहंता, संपन्न, सरकारी कर्मचारी, धनसंपत्ति से युक्त,प्रतिष्ठित, संपन्न पिता का पुत्र होता है। विद्वान, सुंदर, समाज का अगुआ, गंभीरऔर कुविचारों से ग्रस्त होता है। वह बचपन में या छोटी उम्र में बूढ़े जैसाशांत, गंभीर एवं समझदार रहता है। दीर्घायु होता है। यदि लग्न में बैठा शनिचतुर्थ या सप्तमेश राशि में हो जातक उच्च अधिकार एवं राजयोग प्राप्त करताहै। उदाहरण के लिए धनु लग्न हो तो चतुर्थेश शुरू होता है। यह एकराजयोग है।
यवन ज्योतिषविदों के अनुसार भी उपरोक्त फल प्राप्त होते हैं। पाश्चात्यविद्वानों की राय में लग्न में दुर्बल या पापी शनि हो तो अच्छे फल प्राप्त नहींहोते। शनि बलवान एवं शुभ हो तो बचपन कष्टमय होते हुए भी भावी जीवनसुखमय होता है।
प्रथम भाव-ला्न या प्रथम भाव में शनि का होना सामान्यतः शुभ नहीमाना गया है। क्योंकि यहां बैठकर यह तीसरे, सातवें और दसवें तीनों महत्त्वपूर्णभावों को खराब करता है। स्वयं लग्नेश न हो तो लगन को भी दूषित प्रभाव से युक्तकरता है। क्योंकि यह पापग्रह है।
लग्नस्थ शनि प्रायः जातक के शरीर को रूखा, कद को मंझोला तथा रंग कोकाला/सांवला बनाता है (शुक्र/चन्द्र/बुध/गुरु का भी लग्न पर दृष्टि/युति/राशि सेप्रभाव हो तो रंग गेहुंआ या साफ हो सकता है)। ऐसे जातक का सिर/गर्दन आगेकी ओर झुका रहता है। मानो कंधों पर कुछ बजन उठा रखा हो। कुल मिलाकरउसके चेहरे को देखकर प्रसन्नता नहीं होती। ऐसा प्रैक्टिकल अनुभव से देखने मेंआया है।
पाराशर ज्योतिष के प्रवर्तक मेरे सुयोग्य आचार्य श्री कौशिकजी के अनुसारमकर, कुम्भ या तुला लग्न में शनि बैठता है तो जातक हर प्रकार से धनवान होताहै। धनु या मीन लग्न में हो तो जातक को अत्यंत धनवान बनाता है। किन्तु शेषसभी लग्नों/राशियों में जातक निर्धन होता है। उसके विवाह में विलम्ब होता है।गृहस्थ सुखमय नहीं रहता, वियोग/तलाक सम्भव होता है। भाइयों से पटती नहीं।व्यवसाय/आजीविका में दिकतें आती हैं। पिता का सुख भी अल्प ही रहता है। याउनकी शीष्र मृत्यु हो जाती है।
लाल किताब के अनुसार शनि लग्नस्थ हो तो या तो जातक के बचपन,जवानी व बुढ़ापे के लिए शुभ होता है (यदि लग्नेश भी शनि हो) अथवा तीन गुनाअशुभ रहता है। अशुभ प्रभाव में पुत्र जन्म के बाद जातक के बुरे दिनों का आरम्भहो सकता है। दयालु स्वभाव का हो तो धन की दृष्टि से स्थिति ठीक रहती हैअन्यथा रोटी के भी लाले पड़ सकते हैं। आजीविका भी संदिग्ध हो जाती है।
शनि शुभ हो तो जातक लोकल्याण में तत्पर, वस्तुओं का भोग करने पर भीनिर्लिस व त्यागी, विद्वान तथा अध्यात्म ज्ञान प्रासि का इच्छुक होता है। जीवन केपूर्वार्ध में भारी कष्ट उठाकर आत्मविश्वास, धैर्य, संघर्ष व परिश्रम के बल परउत्तरार्ध में सफलता प्राप्त करता है। सिंह या धनु राशि में लग्नस्थ शनि जातक कोमलिनवेषी व गंदा रहने वाला बनाता है।मंगल से प्रभावित शनि अपघात, कारावास, रिश्वत के आरोप व आकस्मिकमृत्यु का भय देता है। कुम्भ या मिथुन राशि में वातजन्य रोग प्रदान करता है। वृष,कन्या, मकर व कुम्भ राशियों में दाम्पत्य सुख को नष्ट कर दुखी, बनाता है। ऐसेजातक की दृष्टि व जीभ काली होती है। वह जिसे प्रशंसा भरी दृष्टि से देखे उसे‘नजर' लग जाती है। जिसकी प्रशंसा करे वह शीष्र नष्ट हो जाता है। ऐसा जातकअपने छोटे लाभ के लिए भी दूसरे का बड़ा नुकसान कर देता है। ई्ष्या का भावउसमें विशेष रूप से बढ़ा हुआ होता है।
शनि लग्नेश हो (विशेषकर मकर लग्न में) या शनि 'योगकारक' हो (विशेषकरवृष लग्न में) अथवा दशम व एकादश स्थान का स्वामी हो (मेष लग्न) तथाबलवान स्थिति में लग्न, द्वितीय भाव, चतुर्थ, दशम या एकादश भाव में बैठा हो तोजातक को तेल, शराब, सीमेंट, लोहा, चमड़ा, कबाड़/पुरानी चीजों या कालीवस्तुओं (कम्बल, कोयला आदि) के व्यापार में अत्यंत शुभ फल देता है। विशेषकरग्यारहवें भाव का शुभ शनि जातक को अच्छा उद्योगपति बनाता है।
प्रथम भावः लग्नस्थ शनि प्रायः अशुभ फल ही देता है। अपवाद रूप मेंतुला और कुम्भ राशि में कुछ शुभ फलों का अनुभव होता है। ऐसे जातकउदासीन, हठी, एकान्तप्रिय, लज्जाशील, स्वार्थी, लोभी, अविश्वासी और ठगहोते हैं। धार्मिक आचार-विचार के विषय में उनका मत दूसरों से भिन्न होताहै। मेष, सिंह, धनु में शनि हो तो व्यक्ति मिलनसार, स्वभाव से सरल होता है, लेकिन झगड़ा, वाद-विवाद करने में भी उसकी रुचि होती है। पृथ्वी राशि मेंदूसरों से द्वेष करने वाला, व्यर्थ में पूछताछ करने की प्रवृत्ति, चिड़चिड़ास्वभाव, संशयी प्रवृत्ति वाला होता है। मकर में शनि होने पर जातक वाद-विवादमें कुशल, धूर्त, स्वार्थी, लोभी और कंजूस होता है। वायु राशि का शनि हो तोजातक मेहनती, व्यवहारकुशल, उद्यमी, अपने हित में दक्ष, धन के विषय मेंअस्थिर, सत्यवक्ता, धार्मिक आचार-विचारवान, भावुक तथा कर्मठ होता है।अशुभ संबंध में आया शनि तीव्रता से अनिष्ट फल देता है। दुर्घटना से सिर मेंचोट, प्रतिश्याय (जुकाम), बद्धकोष्ठता, पाचन क्रिया के विकार, वात विकार,मूत्राशय के रोगादि से पीड़ित करता हैl
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि लग्न में हो तो बचपन में जातक का स्वास्थ्यअच्छा नहीं रहता, आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं रहती। पर उसके बाद बढ़तीउम्र के साथ स्वास्थ्य एवं आर्थिक स्थिति सुधरती है। ऐसा जातक कवि बनताहै। माता-पिता के सुख में न्यूनता रहती है। महर्षि गर्ग के अनुसार मां काचरित्र दोषपूर्ण रहता है। जातक वाचाल एवं स्तुतिप्रिय रहता है। दोषपूर्ण चर्त्रके कारण ही जातक की मृत्यु होती है।
2. वृषभवृषभ राशि का शनि लग्न में हो तो जातक की स्मरणशक्तितीव्र रहती है। वह आस्तिक, मिताहारी, भोगी एवं कवि होता है। बचपन मेंदुखी बाद में सुखी बनता है। मां का चरित्र अच्छा नहीं रहता, पति की मृत्युके बाद वह पुनर्विवाह करती है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि लग्न में हो तो जातक के एक से अधिकविवाह होते हैं और फोड़े-फुन्सियां, खाज, कैन्सर जैसे रोगों से ग्रस्त रहता है।जातक नास्तिक, क्रोधी, झगड़ालू, दुखी एवं मिताहारी रहता है।
4. कर्क--कर्क राशि का शनि लग्न में हो तो जातक कामातुर, एक सेअधिक विवाह करने के बाद भी अन्यत्र गुप्त स्त्री संबंध रखनेवाला होता है।स्वभाव निष्टुर, गर्ममिजाज, उतावला होता है। इसके पेट में कोई बात नहींपचती। जातक विलासी एवं शत्रुभंजक होता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि लग्न में हो तो जातक अतिक्रोधी, उतावला,विलासी एवं परस्त्रीकामी रहता है। यह सांसारिक सुख एवं विषयभोगी होताहै। पुत्र सुख में बाधा रहती है। अपने पास के आप्त-इष्टों को एवं सहोदरोंको कष्टदायी रहता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि लग्न में हो तो जातक अभिमानी, धैर्यवान,शत्रुहंता, वाचाल, निर्भय, कंजूस, बहुरूपी, चुगलखोर, विद्वान, समय का पालनकरनेवाला होता है। अपने परिवार के लोगों से एवं भाइयों से उसके मधुर संबंधनहीं रहते। महर्षि लोमश के मतानुसार पुत्र सुख में बाधा रहती है।
7. तुला-तुला राशि का शनि लग्न में हो तो जातक विद्वान, चतुर, समयका पालन करनेवाला, समयानुकूल अपना काम निकालने में चतुर, कंजूस एवंकम बोलनेवाला होता है। पिता का अच्छा सुख मिलता है। चाचा से विरोधरहता है। पैतृक संपत्ति का भोग न करते हुए वह खुद के पैरों पर खड़ा होताहै। स्वपरिश्रम से प्रगति करता है और सुखी जीवन जीता है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का शनि लग्न में हो तो जातक अतिक्रोधी,कामातुर, परस्त्रीकामी, कटु एवं मितभाषी, क्रूर एवं विद्वान होता है। पिता केयश का लाभ पुत्र को मिलता है। चाचा से नहीं बनती। पैतृक संपत्ति का त्यागकरके स्वप्रयत्नों से प्रगति करता है। पिता का सुख उत्तम मिलता है।
9. धनु-धनु राशि का शनि लग्न में हो तो जातक कामातुर, परस्त्रीकामी,कठोर, अपने ही लोगों में फूट डालनेवाला, शत्रुहंता, पारिवारिक जिम्मेदारियांनिभानेवाला, संपन्न, परोपकारी, भोगी, विलासी, समाज में प्रसिद्ध होता है।उसकी आंखें सुंदर और पत्नी अच्छी रहती है। व्यापार-व्यवसाय करने पर उसमें प्रगति होती है।
10. मकर-मकर राशि का शनि लग्न में हो तो जातक निरोगी, उद्यमी, पुरुषार्थी, दीर्घायु, कामातुर, सामाजिक एवं राजकीय प्रतिष्ठा प्राप्त एवं संपन्न होता है। जातक के दो विवाह होते हैं या परस्त्री संबंध रहते हैं।
11. कुभकुंभ राशि का शनि लग्न में हो तो जातक शस्त्र विद्या में निपुण,तीरंदाज रहता है। पैरों में विकार रहता है। पत्नी सुख में न्यूनता रहती है, दोविवाह होते हैं या परस्त्री संबंध रहते हैं। यवनाचार्य के मतानुसार जातक केनपुंसक होने से पत्नी सुख से वंचित रहता है। जातक पुरुषार्थी, निरोगी,प्रतिष्ठित, सरकारी कर्मचारी, सशक्त एवं संपन्न होता है।
12. मीनमीन राशि का शनि लग्न में हो तो जातक अतिवाचाल,स्तुतिप्रिय, सरकारी कर्मचारी, लोकप्रिय एवं संपन्न होता है। महर्षि गर्ग केअनुसार वह अल्पायु होता है एवं प्यास के कारण उसकी मृत्यु होती है। शस्त्रविद्या में प्रवीण एवं तीरंदाज रहता है। महर्षि लोमश के अनुसार पत्नी सुखसे जातक वंचित रहता है। पैरों में विकार रहता है।
1. बंदर को खिलावें।
2. अंगीठी दान करें।
3. बरगद की जड़ से मिट्टीलाकर नित्य तिलक करें।
4. नीम के जड़ में सुरमा दबावें।
===========================
2) द्वितीय भाव -द्वितीय स्थान (धन भाव)
धनस्थान में शनि के फल
आचार्य-- भूरिद्रव्यो नृपहृतधनो वक्त्ररोगी द्वितीये । यह बहुत
धनवान किन्तु राजा के कोप से निर्धन होता है। मुखरोग होते है। यही वर्णन गुणाकर ने लिखा है।
कल्याण वर्मा -- विकृतवदनोऽर्थभोक्ता जनरहितो न्यायकृत् कुटुम्बगते । पश्चात् परदेशगतो जनवाहनभोगवान् सौरे। इस का मुख विकृत होता है। धन का उपभोग करता है। लोगों से मिल कर नहीं रहता। न्यायप्रिय होता है। आयु के उत्तरार्ध में विदेश जाता है। लोगों और वाहनों का सुख मिलता है।
वसिष्ठ - दुःखावहो धनविनाशकरः प्रदिष्टः । यह दुःख दे कर धन का नाश करता है ।
पराशर - धनहानिश्च । धन की हानि होती है।
गर्ग - काष्ठां गाराल्लोहधनःकुकार्याद्धनसंचयः । नीचविद्यानुरक्तश्च ॥ धने मन्दे धनैर्हीनो निष्ठुरो दुःखितो भवेत् । मित्रसौम्यैर्युते दृष्टे धर्मसत्यदयान्वितः । मृतवत्साभगिन्यादि गर्भस्त्रावादिकं वदेत् । प्रतिवेश्मादि बालानां विपत्तिरपि कथ्यते ॥ इसे लकडी, कोयले, लोहा आदि के व्यापार से तथा बुरे कामों से धन मिलता है। यह नीच विद्या का अभ्यास करता है। धनहीन, दुःखी तथा निष्ठुर होता है। इस की बहन की सन्तति जीवित नहीं रहती, गर्भपात होता है। घर तथा बच्चों की हानि होती है। इस शनि पर मित्र ग्रह या शुभ ग्रह की दृष्टि हो या उन के साथ हो तो वह व्यक्ति धार्मिक, दयालु और सत्यप्रिय होता है।
वैद्यनाथ -- असत्यवादि चपलोऽटनोऽधनः शनौ कुटुम्बोपगते तु वंचक: । यह झुठ बोलने वाला, चपल, प्रवास करने वाला, निर्धन तथा ठग होता है।
बृहद्यवनजातक -- अन्यालयस्थो व्यसनाभिभूतो जनोज्झितः स्यान्नानुजश्च पश्चात् । देशान्तरे वाहनराजमान्यो धनाभिधाने भवनेऽर्कसूनौ ।। यह दूसरों के घर रहता है, विपत्तियों से पीडित, लोगों द्वारा छोडा गया होता है। इसे छोटे भाई नहीं होते। विदेश में वाहनों का सुख तथा राजा द्वारा मान्यता मिलती है। यही वर्णन ढुंढिराज ने दिया है।
आर्यग्रन्थ -- धननिकेतनवर्तिनि भानुजे भवति वाक्यसुहास
धनान्वितः । चपललोचनसंचयने रतो भवति चौर्यपरो नियतं सदा । यह मधुर बोलता है तथा धनवान होता है। इस की दृष्टि चपल होती है। संग्रह में तत्पर तथा चोरी करने वाला होता है।
जयदेव -- स्वजनपदगतोऽस्वोऽसौ कुटुम्बोज्झितः स्यात् परजनपदयन्ता सर्वसौख्योंऽसिते स्वे ।। यह अपने देश में हो तब तक निर्धन और कुटुम्बरहित होता है। विदेश में सब सुख मिलते है।
काशिनाथ धने मन्दे धनैर्हीनो वातपित्तकफातुरः । देहास्थिपित्तरोगश्च गुणैः स्वल्पोऽपि जायते ॥ यह निर्धन, वात, पित्त, कफ तथा अस्थि रोग से पीडित और गुणहीन होता है।
मन्त्रेश्वर -- विमुखमधनमर्थेऽन्यायवन्तं च पश्चात् इतरजनपदस्थं यानभोगार्थयुक्तं । यह धनहीन, अन्यायी और विद्रुप चेहरे का होता है। विदेश में जाने पर वाहन, धन तथा उपभोग प्राप्त होते है ।
जागेश्वर -- धने पंगुना विद्यमाने सुखं किं कुटुंबात् तथा क्लेशमाहुर्जनानाम्। न भोक्ता न वक्ता वदे निष्ठुर वै धनं लोहजात न शत्रोर्भयं स्यात् । इसे कुटुंब से कोई सुख नहीं मिलता। लोगों से कष्ट होता है। यह वक्ता नहीं होता - निष्ठुर बोलता है । उपभोग प्राप्त नहीं होते। इसे लोहे के व्यापार से धनप्राप्ती होती है । शत्रु का भय नहीं होता।
नारायण भट्ट -- सुखापेक्षया वर्जितोऽसौ कुटुम्बात् कुटुम्बे शनौ वस्तु किं किं न भुक्ते । समं वक्ति मित्रेण तिक्तं वचोऽपि प्रसक्तिं विना लोहकं को लभेत् ।। यह सुख की इच्छा से कुटुम्ब छोड़ देता है। मित्रों से भी तीखा बोलता है। विविध वस्तुओं का उपभोग करता है। लोहे के व्यापार से फायदा होता है।
लखनौ के नबाब - यावागो बदहाल: कोतो दत्तश्च गुस्वरो जोहल । जरखाने यदि मनुजो नादयः परदेशगश्चापि ॥ यह निर्धन, क्रोधी, कु· स्थिति में रहने वाला तथा विदेश में जाने वाला होता है।
गोपाल रत्नाकर यह साधारणतः दरिद्री होता है। दो विवाह होते है। सुखरोग होते है। नेत्र दुर्बल होते है। इस की शिक्षा में रूकावटें आती है। क्ष्मी कम रहती है। इस शनि के साथ पाप ग्रह हीं तो बहुत अशुभ फल मिलते हैं।
पाश्चात्य मत -- इस शनि से धनहानी होती है तथा व्यापार में नुकसान होता है। शुभ संबंध में हो तो लोकोपयोगी कार्य, कंपनियां, शेअर, सहा, आदि में अच्छा लाभ होता है। अजीब चीजें (Curios) तथा पुरानी चीजों के व्यापार से फायदा होता है। शुभ संबंध में और विशेष कर तुला में यह शनि पैतृक सम्पत्ति अच्छी देता है। यह मितव्ययी, होशियार तथा दीर्घदर्शी होने से सम्पत्ती का विनियोग बड़े-बड़े सुरक्षित व्यवसायों के विकास में करता है। इस से सम्पत्ती में अच्छी वृध्दी होती है। व्यवसायों के लिये पूंजी देनेवाले श्रीमानों (Financers) कुंडलीयों में यह योग अक्सर पाया जाता है। यही शनि पीड़ित और निर्बल हो तो जीवनभर दरिद्री रहना पड़ता है। उदर निर्वाह भी बहुत कष्ट से होता है। आर्थिक कष्ट होता रहता है। व्यापार या व्यवसाय में हमेशा नुकसान होता है। बहुत श्रम करने पर भी लाभ नहीं होता। इस प्रकार इस स्थान में शनि के फल देखते समय शुभाशुभ सम्बन्ध देखना आवश्यक है। भृगुसुत्र -- द्रव्याभावः। द्वारद्वयम्। पापयुते दारवंचना। मठाधिपः अल्पक्षेत्रवान। नेत्ररोगी ॥ यह धनहीन होता है। दो विवाह होते है। आंखों के रोग होते है। खेती कम रहती है। मठाधीश हो सकता है। यह शनि पाप ग्रह से युक्त हो तो स्त्रियों की वंचना करने वाला होता है।
हमारे विचार - इस स्थान में कुछ लेखकों ने बहुत अशुभ और अन्य जादा तर लेखकों ने मिश्र फल बतलाए है। इन में पूर्वार्जित सम्पत्ती के बारे में विशेष विचार करना चाहिये। साधारणतः शुक्र और गुरू इन दो ग्रहों को सम्पत्तीकारक माना जाता है क्यों कि नैसर्गिक कुण्डली में शुक्र धनस्थान का स्वामी होता है और भावकारक कुण्डली में गुरू को धनभावकारक माना गया है। किन्तु नैसर्गिक कुण्डली में दशम स्थान का स्वामी शनि है और वैद्यनाथ तथा पाराशर ने शनि के कारकत्व में भी सर्व सम्पत्ती और जीवनोपाय यह विषय दिये है। गुरू धन का नहीं, ज्ञान का कारक है। इस का विवेचन गुरू विचार में किया गया है। तात्पर्य, हमारे मत से शुक्र और शनि ये दो ग्रह धनधारक है। उन में शुक्र को नगद रूपये, सोना, चांदी का और शनि को स्थावर घर, जमीन आदि का कारक समझना चाहिये। अतः धनस्थान में शुभ शनि पूर्वार्जित सम्पत्ती की प्राप्ति कराता है। इस स्थान में शनि के शुभाशुभ सम्बध देख कर फलों का वर्णन करना चाहिये ।
दूसरे भाव में शनि की स्थिति अच्छी नहीं है, क्योंकि यह जातक कोचोर बनाती है वह हमेशा दूसरे चोरों से दूर रहता है। वह दूसरों की बातसहन कर सकता है।
-मानसागरीजातक का चेहरा अनाकर्षक, असन्मार्गी, और विपन्न होगा। जीवनके उत्तरारद्ध में वह अपने जन्मस्थान से अन्यत्र जाएगा जहाँ जाकर वहधनी व सुखी होगा।
-फलदीपिका
जातक का चेहरा भद्दा, लौकिक सम्पत्ति का आनन्द लेने वाला, अपनेही लोगों द्वारा अपकृत, न्यायधीश, विदेश गमन से धनार्जन में सक्षम, धनीऔर वाहनों वाला होगा।
-सारावली
जातक को आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा। उसकी दोपलियाँ होंगी। पहली की मृत्यु के बाद दूसरी शादी करेगा। यदि शनिपापयुत है तो जातक महिलाओं को धोखा देने वाला व मठाधीश होगा।वह नेत्र कष्टु से पीड़ित और भूमिहीन होगा।
-भृगु
जातक के एकाधिक विवाह, अलोकप्रिय, नेत्रों में कष्ट, असामाजिक,शिक्षा में बाधाएँ, रोगी चेहरा, कटुभाषी या हकलाने वाला और शराबीहोगा।
-डॉ रामन
धन, वाणी, परिवार, चेहरा और दाँतों के प्रतिनिधि भाव द्वितीय मेंशनि की स्थिति अशुभ कही गई है। शनि अशुभ होने के कारणनकारात्मक प्रभाव देता है। चोरी, गरीबी, कटुता, उद्दण्ड्तादि के प्रतिनिधिग्रह शनि के फल उपरोक्त कथानानुसार ही होंगे।।
शनि के योगकारक होने पर फलों में परिवर्तन या सुधार की अपेक्षाकी जाती है। जैसे वृष या तुला लग्नों में। कन्या लग्न के लिए शनिपंचमेश और षष्ठेश होने पर दूसरे भाव में उच्च का हो जाता है। धनुलग्न के लिए यही शनि दूसरे भाव में स्वक्षेत्री होता है।
हमारा अनुभव - शनि जिस स्थान में हो उस के शुभ फल मिलते है और जिस पर उस की दृष्टी हो उस स्थान के फल नष्ट होते है। 'सौरिः स्वस्थानपालः परमभयकारी दिष्टरस्य प्रणष्टा' । इस नियम के अनुसार धनस्थान में शनि पूर्वार्जित सम्पत्ती का लाभ कराता है और उस की रक्षा कराता है। पूर्वसम्पत्ती नष्ट नहीं होती है। उपजीविका ठीक चलती है। संकट नहीं आते। इस व्यक्ति के जन्म से घर के अन्य व्यक्तियों का मृत्यु योग होता है। पिता जीवित हो तब तक यह स्वतन्त्र धनार्जन नहीं कर पाता। किसी का नष्ट धन इसे प्राप्त होता है। ये लोग बहुधा नौकरी करते हैं स्वतन्त्र व्यवसाय क्वचित ही होता है। ये विद्वान किन्तु अव्यवस्थित होते है। कम बोलते है । किन्तु लोकप्रिय होते है। वृषभ, कन्या लथा मकर में - पूर्वार्जित सम्पत्ती नहीं होती या होने पर भी उस का उपयोग नहीं होता। अपने श्रम से उपजीविका करनी पड़ती है । इन का यौवन सुखपूर्ण नहीं होता। विवाह एक ही होता है संशोधक होते है। घर में लोगों की परवाह नहीं करते, मुसाफिरों जैसा व्यवहार घर में करते है। सार्वजनिक और राष्ट्रीय कार्य में भाग लेते है। आकर्षक और बहुजन समाज के लिये मार्गदर्शक लेखन करने में ये कुशल होते है। कार्य में निपुण होते है। ये कुछ दुराग्रही, हठी, अपनी ही बात सच मानने वाले होते है। खाने पीने या कपड़ों की फिक्र नहीं करते। मेष, मिथुन, सिंह तथा धनु में दो विवाह होते है । सन्तति काफी होती है। धन और सन्मान प्राप्त होता है किन्तु धन का संग्रह नहीं हो सकता। घरबार या जमीन खरीदने में धन लगाते है। ये चंचल होते है, एक मत में स्थिर नहीं होते अतः सार्वजनिक कार्य में उपयोगी नहीं होते। इन्हें अच्छे भोजन की इच्छा होती है किन्तु उस के बारे में हमेशा असन्तुष्ट रहते है। अधिक खाते है। मीठा बोलने से दूसरों पर प्रभाव डालते हैं। लोगों से अपने काम जल्दी और आसानी से करा लेते है। धन का उपयोग लोगों के लिये करते रहते है। आत्मीय / स्वजनों के पोषण का भार उत्साह से वहन करते है। ये पत्नि की ओर विशेष ध्यान नहीं देते इसलिये घर में हमेशा तकरार होती रहती है । उपजीविका ठीक चलती है। इन्हें कई और बड़े बड़े व्यवसाय करने की इच्छा होती है । कर्क, वृश्चिक तथा मीन में यही फल कुछ कम अधिक मात्रा में देखे गये है । तुला तथा कुम्भ में विद्वत्ता का विशेष प्रभाव नहीं होता । सन्तती कम होती है। द्विभार्या योग होता है। व्याज के व्यवसाय में दूसरों का धन हडपने की प्रवृत्ती होती है। किसी को मदद नहीं करते। आयु के १५ वें तथा २० वें वर्ष में घर के किसी प्रमुख व्यक्ति की मृत्यु होती है। २२ से २४ वर्ष तक उपजीविका का प्रारम्भ होता है। इस के देर से विवाह का योग है। वर्तमान स्थिति में ३६ से ३८ वें वर्षों में विवाह का योग कहा जा सकता है। अशुभ सम्बन्ध में शनि के फल प्राचीन लेखकों ने विस्तार से बतलाए हैं। इन्हें स्वदेश में कभी तरक्की प्राप्त नहीं होती। देशान्तर से फायदा होता है। दो या अधिक विवाह होते है। देशान्तर की दृष्टी से मेष, सिंह तथा धनु में उत्तर की ओर वृषभ, कन्या तथा मकर में पश्चिम की ओर (अफ्रीका आदि में ), कर्क, वृश्चिक तथा मीन में पूर्व की ओर (जावा, मलाया, फिजी, सयाम आदि में) मिथुन, तुला तथा कुम्भ में उत्तर की ओर लाभ होता है। वृषभ, कन्या, मकर तथा कुम्भ में कुछ उदाहरणों में पैतृक सम्पत्ती बिलकुल नहीं होती। उलटे पिता का किया ऋण चुकाना पड़ता है। अपने कष्ट से धन मिलता है। किसी भी काम को सतत पुरा करते है। बोलना मीठा किन्तु वंचना से पूर्ण होता है। ये अपने ही विचार से काम करते है - दुसरों की सलाह नहीं मानते। इन्हें कोई पैसे की दृष्टी से ठग नहीं सकता। लोभी और चिकित्सक होते है। मेष, वृश्चिक तथा धनु में उदार प्रवृत्ति होती है।
व्यवसाय की दृष्टि से लकड़ी, कोयला, लोहा, खनिज पदार्थ, धातु, पत्थर, चुना, बालू इन का व्यापार लाभदायी होता है। खानों के व्यवसाय के लिये मध्यप्रदेश, विदर्भ मे चांदा जिला, बिहार, बंगाल, आन्ध्र, मैसूर, केरल, गोवा ये प्रदेश उपयुक्त है। अन्य प्रदेशों में उस की सम्भावना नहीं है। चतुर्थ स्थान के शनि के बारे में भी यही विचार करना चाहिये।
धनस्थान में शनि के प्रसिद्ध उदाहरण स्व. अण्णासाहेब लठ्ठे (बम्बई प्रदेश के अर्थमंत्री) (मीन), स्व. रावबहादुर रंगनाथ नरसिंह मुधोळकर, अमरावती (मिथुन), स्व. सूर्यनारायणराव (विख्यात जोतिषी, मद्रास) (मिथुन), श्री. बोरकर ज्योतिषी, बम्बई (मकर), स्व. दादाभाई नौरोजी, विख्यात राष्ट्रनेता (वृषभ), स्व. सर माधवराव बर्वे (कोल्हापूर रियासत के दीवान)(कन्या), बैरिस्टर पेठकर (मकर), स्व. बैरिस्टर मुकुंदराव जयकर (मकर), महात्मा गांधीजी (वृश्चिक), बैरिस्टर पंजाबराव देशमुख (वृश्चिक), जर्मनी के शाह विलियम कैसर (कर्क), डॉक्टर खरे, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री (मेष) ।
द्वितीय स्थान में शनि हो तो जातक को मुख रोग या नेत्र रोग होता है। आर्थिक दृष्टि से संपन्नता रहती है। जीवन सुख से बीतता है किंतु धोखाधड़ीया सजा के कारण धनक्षय होता है। जातक स्पष्टवक्ता एवं न्यायप्रिय होताहै। चापलूसी करना उसे नहीं भाता, फलस्वरूप मित्र कम होते हैं। परिवार केसदस्यों से संबंध स्नेहपूर्ण नहीं रहते। जन्म स्थान से दूर रहकर उसे अपनीआजीविका चलानी पड़ती है। धन स्थान में शनि अगर नीच का, दुर्वल यापापयुक्त हो तो जातक झूठा, चोर या ठग बन सकता है। पत्नी धोखा देती है।जातक शत्रुहता होता है और लोहा, लकड़ी, कोयला आदि वस्तुओं केव्यापार से लाभ कमाता है। खेती से लाभ प्राप्त नहीं होता, जमीन भी कमरहती है। वह मंदिर या धार्मिक संस्था का संचालक बन सकता है। महर्षिगर्ग के अनुसार जातक की बहन की संतान अल्पायु रहती है। तुला राशि काशनि धन स्थान में उत्तम फलदायी होता है।
महर्षि भृगु के मतानुसार जातक के दो पल्लियां रहती हैं। यवन ज्योतिषविदोंने भी ऐसे ही फल बताए हैं। जातक के छोटा भाई नहीं रहता, यह विशेषफलित भी बताया है।
पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार शनि के शुभ-अशुभ फल जन्मकुंडली मेंस्थित शनि की स्थिति पर अवलंबित रहते हैं। शनि यदि शुभयुक्त या शुभेष्टहो तो जातक व्यापार में प्रगति करता है, विचारपूर्वक खर्च करता है, दूरदर्शीएवं सुखी रहता है। इसके विपरीत शनि दुर्बल, पाप पीड़ित हो तो व्यापार मेंनुकसान या अन्य आर्थिक संकट जैसे फल मिलेंगे।
द्वितीय भाव-शनि यदि दूसरे भाव में लग्नकुंडली में हो तो जातककटुभाषी/गालियां देने वाला, परिवार/कुटुम्ब से कलह करने वाला तथा मुखरोग सेपीड़ित होता है (सूर्य की या द्वितीयेश की स्थिति खराब हो तथा शनि पाप प्रभावमें हो तो दाएं नेत्र का रोग भी सम्भव होता है)। ऐसा जातक दरिद्र, एकांतप्रिय वपापी होता है। स्वास्थ्य ठीक रहता है। वह दीखने में बुद्ध, पर वैसे समझदार वन्यायप्रिय होता है।
शुभ अवस्था में या उच्च का शनि हो तो जातक को अचल सम्पत्ति, न्यायप्रियता,सत्यवादिता, धार्मिक वृत्ति प्रदान करता है। किन्तु जातक को प्रवास में अधिकरहना पड़ता है। शमि अशुभ हो तो सगाई या विवाह के बाद जातक की ससुराल केलिए हानिकारक हो जाता है। जातक को गुदा से सम्बन्धी रोग या विश्वासघात काभय रहता है। जातक को आकस्मिक धनहानि होती है। लाल किताब के अनुसारघर में पानी का कुंभ स्थापित करना ऐसे जातक को शुभ रहता है।
द्वितीय भाव का शनि बलवान स्थिति में जुआ, सट्टा, लॉटरी, शेयर आदि केमाध्यम से आकस्मिक धन लाभ कराता है। धनसंग्रह भी कराता है। प्राचीन एवंदुर्लभ वस्तुओं की खरीद-फरोख्त भी लाभकारी होती है। फिजूलखर्ची नहीं होती।जातक को पैतृक सम्पत्ति मिलती है तथा अर्थव्यवस्था के मामलों में जातक दूरदर्शीहोता है।
लाल किताब के अनुसार वायुतत्त्व राशियों में शनि जातक को सूदखोर तथादूसरों का धन हथियाने में कुशल बनाता है। विवाह देर से होता है। अग्नितत्त्वराशियों में धन, मान तो मिलता है, परन्तु दाम्पत्य अच्छा नहीं होता, कब्ज भी रहती है। जलत्त्व राशियों में फल अग्नि राशियों के समान ही होता है परन्तु अपेक्षाकृतराहत मिल जाती है। पृथ्वीत्त्व राशियों में शनि जातक को SELFMADE बनाता
है। जातक की युवावस्था संघर्षपूर्ण होती है। वह हठी तथा दुराग्रही होता है। उसे
किसी के प्रति प्यार नहीं होता, स्वयं अपने प्रति भी वह लापरवाह व ठीक से ध्यानन रखने वाला होता है।
द्वितीय भावः धन भावस्थ शनि शुभ संबंध में हो तो पैतृक संपत्ति मिलतीहै। लोकोपयोगी कार्य, शेयर, सट्टा, लॉटरी, पुरानी चीजों के व्यवसाय सेअच्छा लाभ प्राप्त करता है। वह सोच-विचार कर व्यय करता है, बड़े-बड़ेउद्योगों, कायों में धन का विनियोग कर स्व-संपत्ति की वृद्धि करता है।व्यवसाय के लिए जो महाजन, साहूकार धन देते हैं या लगाते हैं उनकीकुण्डली में शनि इसी भाव में पाया गया है। तुला और कुम्भ राशि में यहस्थिति विशेष रूप से पाई जाती है। अग्नि राशि में शनि हो तो द्विभार्या योगबनता है। संतान, धन, संपत्ति का प्रचुर मात्रा में लाभ होने पर भी जातक धनसंचय नहीं कर पाता। ऐसे जातकों को उत्तर दिशा से अच्छा लाभ मिल सकताहै। पृथ्वी राशि का शनि हो तो पूर्वार्जित संपत्ति नहीं होती, स्वार्जित करनी होतीहै। धन भावस्थ शनि लोहा, खनिज पदार्थ, धातु, पत्थर, चूना, तेल, रेत,लकड़ी, कोयला आदि के व्यवसाय से लाभ देता है। अशुभ संबंध में हो तोदरिद्री बनाता है। यहां तक कि उदर पूर्ति करना भी संभव नहीं होता।
राशिगत फल
1. मेष-मेष राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक कटुभाषी, चोर,अल्पायु, आस्तिक और आर्थिक दृष्टि से दुर्बल रहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक गुणवान,स्वाभिमानी, कटुभाषी, कामातुर, मिताहारी एवं अल्पायु रहता है। चोरी करना,रिश्वत लेना, जैसे दुर्गण उसमें रहते हैं। माता-पिता का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है।
3. मिथुन मिथुन राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक पराक्रमी,संपन्न, विद्वान, लोकप्रिय, माता-पिता से सुखी एवं मिताहारी होता है। चेहरेपर विकृति रहती है। वाहन के कारण शरीर पर जख्म रहता है।
4. कर्ककर्क राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक के विद्वान होतेहुए भी उसमें चोरी करने की प्रवृत्ति पाई जाती है। उसे आर्थिक नुकसान होनेका डर बना रहता है। किसी को दिया रुपया-पैसा लौटकर नहीं आता। चेहरेपर जख्म या व्रण (फोड़ा) रहता है। यवनाचार्य के मतानुसार सजा के कारणमृत्यु होती है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक अल्पायु, सजाभोगनेवाला, आर्थिक संकट में फंसनेवाला, विद्वान होकर भी चोर, पत्नी सुखसे विमुख, प्रवास से लाभान्वित, सेल्स प्रतिनिधि या एजेंट की हैसियत सेसफल होता है। किसी को दिया धन वापस नहीं मिलता। पत्नी उम्र में बड़ी,क्रोधी एवं कलहप्रिय होती है। पत्नी से न बनने से जातक बहिर्मुखी होता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक अपने कुलमें प्रिय रहता है। अत्यधिक कामुकता के कारण अनेक स्त्रियों से उसकेशारीरिक संबंध रहते हैं। पत्नी अच्छी न होने से दांपत्य जीवन दुख से भरारहता है। स्वास्थ्य मध्यम रहता है।
7. तुला-तुला राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक संपन्न, मित्रोंसे घिरा, अपने परिवार का प्रमुख, गर्ममिजाज, उदर रोगी, कवि या गायक होताहै। परिवार के साथ मधुर संबंध नहीं रहते।
8. वृश्चिकवृश्चिक राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक विद्वानकिंतु क्रोधी होता है। जमीन से लाभ पाता है, आर्थिक स्थिति मजबूत रहती है।सहोदरों एवं परिवारजनों से उसकी अनबन रहती है किंतु मित्रों का सहयोग अच्छारहता है। यवनाचार्य के मतानुसार जातक के अपने पिता से मतभेद रहते हैं।9. धनु-धनु राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक विद्वान एवं संपन्नरहता है, जमीन-जायदाद से लाभान्वित रहता है लेकिन पिता से अनबन रहतीहै। यवनाचार्य के अनुसार जातक गुदा रोगी एवं अल्पायु रहता है।
10. मकर-मकर राशि का शन धन स्थान में हो तो जातक गुदा रोगी,अल्पायु, स्वाभिमानी, भोगी एवं संपन्न रहता है। संतान सुख बाधापूर्ण रहताहै अर्थात दो या तीन विवाह करने के बावजूद भी संतान नहीं होती।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, विद्वान,हट्टा-कट्टा, स्थूल एवं आर्थिक दृष्टि से संपन्न रहता है। जमीन-जायदाद सेलाभान्वित रहता है और समाज का अगुआ एवं अधिकारसंपन्न रहता है।
12. मीन-मीन राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, स्थूल,स्वाभिमानी, संपन्न एवं आस्तिक होता है। वह अनेक धार्मिक कार्य संपन्नकरता है। चोरी या सजा के कारण धनक्षय होता है।
1. सांप का पूजन व दूध पिलावें।
2. रविवार व शनिवार को तेल कादीपक पूजा में करें।
3. दूध का तिलक लगाकर बाहर जावें।
===========================3) तृतीय भाव -तृतीय स्थान (सहज भाव)
तृतीय स्थान में शनि के फल
आचार्य व गुणाकर - मतिविक्रमवान् तृतियगे । यह बुद्धिमान और पराक्रमी होता है।
कल्याण वर्मा - मलिनोऽसंस्कृतदेहो नीचोऽलसपरिजनो भवती सौरे। शूरो दानानुरतो दुश्चिक्यगते विपुलबुद्धिः ।। यह अस्वच्छ, गन्दे शरीर का, नीच, शूर, उदार और बुद्धिमान होता है। इस के परिवार के लोग आलसी होते है।
वैद्यनाथ - अल्पाशी धनशीलवंशगुणवान् भ्रातृस्थिते भानुजे सौरिस्तृतीयेऽनुजनाशकर्ता॥ यह कम खाता है। धनवान, सुशील, कुलीन, गुणवान होता है। इस के छोटे भाईयों के लिये यह योग मारक है।
पराशर - तृतीये मित्रवर्धनं धनलाभं । पृष्ठेजातं शनैश्चरः ॥ मित्र बढते है। धनलाभ होता है। छोटे भाई की मृत्यु होती है।
गर्ग - तथा तृतीयगे मन्दे स नरो भाग्यवान् भवेत् । भवेद् दोषस्थिता पीड़ा शरीरे तस्य सर्वदा ॥ भ्रातृगो मन्दगः कुर्याद् भ्रातृस्वसृविनाशनम् । नृपतुल्यं च सुखिनं सततं कुरूते नरम् ॥ सौरिः गर्भविनाशनं च नियतं मन्त्रीश्वरो नान्यथा ॥ यह भाग्यवान, राजा जैसा सुखी, मन्त्री होता है। इसके शरीर में दोष होने से पीडा रहती है। भाई बहनों का और संतति का नाश होता है।
जागेश्वर - यदा विक्रमे मन्दगामी कदुष्णं भवेन्मानसं भाग्यविघ्नः सदा स्यात् । भवेत् पालको वै बहूणां नराणां रणे विक्रमी भाग्यवान् हस्तरोगी ॥ भवेद् भ्रातृकष्टं विदेशे प्रयाणं गृहे नो विरामं लभेद् बन्धुतोऽपि । भवेन्निचसक्तो विरक्तौऽर्थधर्मे यदा विक्रमे सूर्यसूनुर्नराणां । इस का मन साफ नहीं रहता । भाग्योदय में विघ्न आते है । यह बहुतों को आश्रय देता है। युद्ध में वीरता बतलाता है। हाथ के रोग होते है। भाइयों का कष्ट रहता है। यह परदेशों में जाता है, घर में आराम नहीं पाता। भाईयों से अच्छा नाता नहीं रहता। यह नीचों की संगती में रहता है। धर्म तथा धन की फिक्र नहीं करताl
आर्यग्रन्थ -- सहजमन्दिरगे तपनात्मजे भवति सर्वसहोदरनाशकः । तदनुकूलनृपेण समो नरः स्वसुतपुत्रकलत्रसमन्वितः ॥ यह सभी भाईयों के भ
लिये मारक होता है। स्त्रीपुत्रों से युक्त और राजा जैसा भाग्यवान होता है। बृहद्यवनजातकः - राजमान्यशुभवाहनयुक्तो ग्रामपो बहुपराक्रमशाली। पालको भवति भूरिजनानां मानवो रविमुतेऽनुजसंस्थे ।। यह राजसभा में माननीय, उत्तम वाहनों से युक्त, गांव में मुख्य, पराक्रमी, बहुतों को आश्रय देनेवाला होता है। यही वर्णन ढुंढीराज ने किया है।
मन्त्रेश्वर- इस का वर्णन अब तक के कथन से विशेष भिन्न नही 1 वसिष्ठ - स्त्रीणां प्रियं रविजस्तृतीये। यह स्त्रियों को प्रिय होता है। काशिनाथ - छायात्मजे तृतीयस्थे प्रसन्नो गुणवत्सलः । शत्रुमर्दी नृणां मान्यो धनी शूरश्च जायते ॥ यह प्रसन्न, गुणवान, स्नेहिल, शत्रु का नाश करनेवाला, सम्मानित, धनवान तथा शूर होता है।
लखनौ के नबाब - जोरावरो यशीलः खुशदानों च मानवः सभ्यः ॥ अनुचरवृन्दसमेतो भवति यदा वै बिरादरे जोहलः । यह बलवान, विख्यात, प्रसन्न, बुद्धिमान, सभ्य तथा सेवकों से युक्त होता है।
नारायण भट्ट तृतीये शनी शीतलं नैव चित्तं जनादुद्यमाज्जायते युक्तभाषी । अविघ्नं भवेत् कर्हिचित् नैव भाग्यं दृढाशा सुखी दुर्मुखः सत्कृपोऽपि ॥ इसका चित्त शांत नहीं होता। यह उद्योगी और योग्य बोलनेवाला होता है। विघ्नों के बाद ही इसका भाग्योदय होता है। यह आशावादी, सुखी किन्तु असन्तुष्ट होता है। शनैश्चरस्तुलाकुम्भे मकरे च यदा भवेत् । आद्ये षष्ठतृतीये च तदारिष्टं न जायते ॥ तुला, कुम्भ या मकर लग्न हो और तृतीय या षष्ठ में शनि हो तो अरिष्ट नहीं आते।
हरिवंश - भूपात्सौख्यं चारू कीर्ति: सुकान्ति: वित्ताधिक्यं वाहनानां समृद्धिं । नैरूजागं पालनं मानवानां भ्रातृस्थाने भानुजः करोति ।। इसे राजा से सुख प्राप्त होता है। कीर्ति, धन, वाहन, सौंदर्य, आरोग्य तथा लोगों को आश्रय देने की शक्ति प्राप्त होती है।
घोलप - यह भाग्यवान होता है किन्तु भाग्योदय के समय की इसे कल्पना नहीं होती। धन, पुत्र, घरबार, बल, आरोग्य से सम्पन्न होता है । शत्रुओं में आपस में झगडे लगा कर उन का नाश कराता है। राजा की कृपा से बहुतों को आश्रय दे कर सुखी बनाता है। अपना इष्ट हेतु पूरा कराता है। गोपाल रत्नाकर - यह साहसी, दुष्ट, नौकर चाकरों से युक्त, धन धान्य से सम्पन्न, खेती में रूचि लेने वाला होता है। यह योग भाईयों के लिये हानिकर है।
भृगुसूत्र - भ्रातृहानिकारकः, अदृष्ट, दुर्वृत्तः । उच्चे स्वक्षेत्रे भ्रातृवृद्धिः । तत्र पापयुते भ्रातृद्वेषी। प्रतापवान ।। यह भाइयों को हानी पहुंचाता है। यह दुराचारी होता है। उच्च या स्वक्षेत्र में हो तो भाईयों की वृद्धि होती है। पाप ग्रह साथ हो तो भाइयों का द्वेष करता है। यह प्रतापी होता है।
पाश्चात्य मत - यह शनि शुभ सम्बन्ध में बलवान हो तो मन गम्भीर, स्थिर, शान्त, विवेकी, सौम्य तथा विचारशील होता है। चित्त की एकाग्रता जल्दी होती है। इसलिये विचार, मनन और एकाग्रता की जिन्हें जरूरत होती है ऐसे विषयों का अध्ययन अच्छी तरह से कर सकते है। शनि के प्रमुख शुभ लक्षण न्यायी, प्रामाणिक, चतुर होना - इन में पाए जाते है। बुद्धि गहरी और सलाह अच्छी होती है। यह शनि पीडित या निर्बल हो तो रिश्तेदार, भाईबन्द, पडोसी आदि से बनती नही, उन से सुख नहीं मिलता। शिक्षा पुरी नहीं होती। प्रवास में लाभ नहीं होता। लेखन, ग्रंथों का प्रकाशन आदि में रूकावटें आती है। । प्रवास में बरसात या ठण्डे मौसम के कारण अस्वस्थता होती है। मन पर विद्वत्ता या उदात्त विचारों का संस्कार नहीं होता। दुःखी विचारों से परेशान होते है। आप्तमित्रों से इन का बहुत नुकसान होता है। जोतिष आदि गूढ शास्त्रों में रूचि रहती है। इस शनि का मंगल से अशुभ योग विश्वासघात, वंचना, ठगों के काम में कुशलता का कारण होता है। बुध से अशुभ योग चोरी की प्रवृत्ति निर्माण करता है। शुक्र से शुभयोग हंसी मजाक की प्रवृत्ति बतलाता है।
एलनलिओ बन्धु या रिश्तेदारों से अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते। उन से मनमुटाव होता है और उन के कामों से नुकसान ही होता है।
हमारे विचार - तृतीय स्थान पाप ग्रहों के लिये निसर्गत: अच्छा समझा गया है इसलिये जागेश्वर को छोड़कर अन्य लेखकों ने प्रायः शुभ फल दिये है। सिर्फ भ्रातृनाश यह फल प्रायः सभी ने दिया है। उस में भी छोटे भाई की मृत्यु का उल्लेख किया गया है। यथा अग्रे जातं रविर्हन्ति पृष्ठे ज्ञातं शनैश्वरः । अग्रजं पृष्ठजं हन्ति सहजस्थो धरासुतः ।। तृतीयस्थ रवि से बडे भाई का, शनि से छोटे भाई का और मंगल से दोनों का मृत्युयोग होता है। पाश्चात्य विद्वानों ने इतना स्पष्ट वर्णन न कर मनमुटाव होना आदि साधरण फल बतलाए है। इस स्थान के शुभ फल मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशि के शनि के है एवं अशुभ फल वृषभ, कन्या, तुला, मकर तथा कुम्भ के है।
तृतीयस्थ शनि सहोदरों के लिए अशुभ व मारक है। जातक राजा केसमान और पत्नी व बच्चों की ओर से प्रसन्न व संतुष्ट होगा।
-मानसागरी
व्यक्ति बहुत प्रखर बुद्धि, चतुर तथा उदार होगा। वह अपनी पल्नी सेसंतुष्ट और प्रसन्न परन्तु स्वयं अपने में खिन्न तथा बेकार होगा।
-फलदीपिका
जातक सांवले वर्ण का, शारीरिक सफाई पसंद, उत्साही, निम्नकोटिका, दानवीर, बुद्धिमान् और कामचोर सेवकों वाला होगा।
-सारावली
तीसरे भाव का शनि भातृ हानिकारक है। आय व्यापार या अवांछितस्रोतों से होगी। यदि शनि स्वक्षेत्री या उच्च राशि में है तो जातक के कईभाई होंगे। यदि शनि पापयुत है, तो जातक के भाईयों से शत्रुतापूर्ण संबंधहोगें।
-भृगु
वह बुद्धिमान् सम्पन्न, चालाक, भातृ-हानि से ग्रस्त, विनम्र, महत्वाकांक्षी,बहादुर, अन्तर्मुखी, क्रूर उत्साही, उपकारक और कृषक होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
पाठकों से जुलाई 1985 के एस्ट्रोलॉजिकल मैगजीन के अंक में प्रकाशित डा. महेन्द्र नाथ केदार तथा न्यायधीश शंकर नाथ कपूर का‘तीसरे भाव में मंगल व शनि’ नामक शोध लेख देखने का अनुरोध है।लेख में यह प्रतिपादित व सिद्ध किया गया है कि तीसरे में शनि होनेपर जातक के तुरन्त बाद छोटी बहिन का जन्म हो सकता है परन्तुभाईका नहीं। तथा जातिका के तुरन्त बाद भाई का जन्म होगा व बहन का नहीं होगा।
हमारा अनुभव - इस स्थान में पुरूष राशि में शनि भाईयों के लिये अशुभ है। बडे और एक छोटे भाई की मृत्यु होती है। बहिनें विधवा होती है अथवा उन का कौटुम्बिक जीवन ठीक नहीं रहता इसलिये भाई के पास रहती है। स्त्री राशि में शनि भाइयों का मृत्युयोग नहीं करता लेकिन उन से मनमुटाव होता है। बँटवारा होता है। एकत्र रहे तो भाग्योदय में रूकावट आती है। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रहती। इस को जल्दी ही घर का बोझ सम्हालना पडता है। चाहे जिस मार्ग से प्रगति करता है। आवश्यकतानुसार दूसरों का नुकसान करके भी प्रगति करना चाहता है। स्वभाव दुष्ट और कुछ एकांतप्रिय होता है। यह विश्वासयोग्य नहीं होता। स्त्री राशी में संतती देर से होती है। पुरूष राशि में सन्तति जल्दी होती है किन्तु गर्भपात या एकाध सन्तति को मारक योग होता है। कन्या और तुला में - विवाह के बाद आर्थिक कष्ट होता है। व्यापार में नुकसान होता है। नौकरी में कष्ट होता है। मित्र नहीं रहते। स्वभाव आनंदमय एवं स्नेहिल होता है। उद्योगी वृत्ति होती है। इन में उत्साह और कुशलता होने पर भी इन के काम की कद्र नहीं होती। इन के आप्त मित्र ही उन्नति में बाधक होते है। आपत्तीयों में ये बहुत जल्दी घबरा जाते है। धैर्य नहीं रहता। गृहत्याग या आत्महत्या की कोशिश करते है। यह फल कन्या से में अधिक देखा गया है। कर्क में भी कुछ कुछ ऐसा ही अनुभव मिला तुला है। यह शनि पहले माता का और फिर पिता का मृत्युयोग कराता है। सौतेली मां होने की अधिक सम्भावना होती है। मकर और कुम्भ में दारिद्रय योग होता है। यह पिता का इकलौता पुत्र होता है। एक बहन हो सकती है। ये लोग साधारणतः नास्तिक होते हैं। अपने कर्तृत्व पर अधिक भरोसा रखते है। लोगों पर विश्वास नहीं करते। हलके वर्गों में १३ + १४ वें वर्ष से ही धनार्जन शुरू होता है। उत्तरोत्तर प्रगति होती है। यह शनि दीर्घायुत्व देता है। ये तेजस्वी होते हैं किन्तु प्रभाव नहीं पड़ता। बोलचाल में अधिकारी जैसे कुछ अलग- से रहते है। शांत, विचारी, साधकबाधक बातों पर ध्यान देने वाले होते है। यह शनि पूर्व आयु में स्थिरता नहीं देता। कर्क, वृश्चिक तथा मीन में प्रवास बहुत होता है। कारस्थानी वृत्ति होती है। लोभी होते है। स्वार्थ के लिये दुसरों का नुकसान करते है। स्वभाव दुष्ट, निर्दय होता है। मित्र विशेष नहीं होते। ये किसी के बहलावे में नहीं आते। सावधान रहते है। अपने परिश्रम से उन्नति कर अधिकारी होते है और लोगों पर प्रभाव जमाते है। पुरूष राशि में शिक्षा प्राय: नहीं होती। स्त्री राशी में शिक्षा अच्छी होती है। आत्मविश्वास बहुत रहता है।
तृतीयस्थ शनि के प्रसिद्ध उदाहरण- पण्डित मदनमोहन मालवीय जी (कन्या), श्रीमान भवानराव पन्त प्रतिनिधी (भूतपूर्व औध रियासत के राजा) (सिंह), स्व. श्रीमान चुन्नीलाल सरैय्या (चांदी के विख्यात व्यापारी) (सिंह), स्व. अण्णासाहेब कुरूंदवाडकर (मकर), येवला के नगरसेठ गंगाराम छबीलदास (मकर)।
‘तृतीयस्थ क्रूर ग्रह शुभ फलदायी होते हैं।' इस ज्योतिषशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार शनि तृतीय स्थान में होने पर शुभ फलदायक होता है।
जन्मकुंडली में तृतीय स्थान में शनि हो तो जातक पराक्रमी, दान-पुण्यकरनेवाला, ज्ञानी, मिताहारी, परोपकारी, अनेक मित्रों से युक्त रहता है।
भाई-बहनों के सुख में न्यूनता रहती है। संतान सुख में गर्भपात के कारण बाधाआती है। उसे जन्म स्थान से अन्यत्र रहकर आजीविका चलानी पड़ती है।समाज में और शासन में प्रसिद्धि पाता है। जातक की कामशक्ति प्रबल रहतीहै। व्यक्तित्व एवं कर्तव्य के कारण स्त्रियां उस पर मोहित रहती हैं लेकिनजातक संतुष्ट नहीं रहता। पारिवारिक माहौल एवं प्रत्येक कार्य में आनेवालीदिक्कतों के कारण जातक उलझन में रहता है। शनि उच्च, स्वक्षेत्र में शुभहो तो भाई-बहनों का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है।
आरोग्य की दृष्टि से तृतीयस्थ शनि अनिष्टनाशक होता है। तुला, मकर याकुंभ राशि का शनि तृतीय स्थान में हो तो और भी अधिक शुभ फलदायीहोता है अन्यथा हाथ में दोष रहता है।
यवन ज्योतिषविद उपरोक्त मतों से सहमत हैं। पाशचात्य विद्वानों के अनुसार
तृतीयस्थ शनि बलवान एवं शुभ होने पर जातक विवेकी, मननशील एवं शांत
चित्तवृत्ति का होता है। उसे अनेक विषयों का ज्ञान, व्यावहारिक चतुरता, लेखनएवं प्रकाशन के व्यवसाय से लाभान्वित होता है और गूढ़ शास्त्र में रुचि रहतीहै। इसके विपरीत शनि दुर्बल एवं पापयुक्त हो तो सहोदरों एवं मित्रों से मधुर संबंध नहीं रहते। शिक्षा में व्यवधान आता है, प्रवास में कष्ट होते हैं और वह विद्वता से वंचित एवं वात-वायुविकारों से पीड़ित रहता है।
है।
तृतीय भाव-लग्नकुंडली के तीसरे भाव में शनि बैठा हो तो जातकशत्रुजित, जल्दी काम करने वाला, स्वस्थ, योगी, विद्वान, दीर्घायु, ज्योतिषज्ञ तथासंन्यास की तरफ जाने वाला होता है। छोटे भाई के लिए तीसरा शनि घातक/मारकहोता है। पुरुष राशि में शनि हो तो भाई की मृत्यु तक सम्भव होती है। अथवा भाईहोता ही नहीं। स्त्रीराशि में शनि हो तो भाई मरता तो नहीं है, परन्तु जातक काउसके साथ सौमनस्य नहीं रहता। बंटवारे की नौबत आ जाती है, इकट्टे नहीं रहपाते। हठपूर्वक इकट्ठे रहें भी तो दोनों का भी भाग्योदय नहीं होता व क्लेश रहताहै। स्त्री राशि का शनि जातक को विलम्ब से सन्तान प्राप्त करता है। जबकि पुरुषराशि में संतान जल्दी मिलती है।
लाल किताब के अनुसार तीसरा शनि अशुभ हो तो दोगुना अशुभ प्रभाव देताहै। अन्यथा शुभ रहता है। ऐसा जातक आंखों का प्रसिद्ध डॉक्टर हो सकता है।मकान खरीदने-बेचने का कार्य या मकान बनाने आदि का कार्य उसे लाभ देते हैं।यदि वह शराब तथा मांस का सेवन न करे तो आयु भी लम्बी हो जाती है। ऐसेजातक को घर में कुत्ता पालना (काला हो तो अच्छा) शुभ प्रभाव देता है। शनि जबबलवान और शुभ हो तो तीसरे भाव में बैठकर जातक को गम्भीर, शांत, स्थिरचित्त,विवेकी, न्यायप्रिय, चतुर, धर्मपरायण तथा गुप्त विद्याओं में रुचि लेने वाला बनाताहै। शनि उच्च का हो तो विवाहोपरांत जातक को आर्थिक संकट में डालता है।परिश्रम करने पर भी लाभ नहीं होता। कुशलता व उत्साह होते हुए भी सफलतासंदिग्ध होती है। स्वराशि का शनि जातक को दरिद्र बनाता है। जलराशि में हो तोशिक्षा की दृष्टि से ठीक किन्तु स्वास्थ्य की दृष्टि से खराब होता है। जातक कोप्रवास भी अधिक करना पड़ता है।
विशेष-आयु की दृष्टि से तीसरा शनि अच्छा होता है। यदि केतु बारहवेंभाव में अकेला बैठे और शनि तीसरे स्थान में अच्छी स्थिति में हो तो जातक कीसंन्यासी होकर मोक्ष पाने की सम्भावनाएं बलवती बनती हैं।
तृतीय भावः शनि चूँकि नैसर्गिक पापी ग्रह है, तृतीय स्थान भी अशुभस्थान है। अशुभ स्थान में अशुभ ग्रह का स्थित होना अशुभ फल देता है-यहज्योतिष का मौलिक सिद्धान्त है। पुरुष राशि का शनि सहज भाव में हो तोभाइयों की मृत्यु होती है, बहिनों का वैधव्य अथवा दाम्पत्य जीवन में कटुताआदि दुख मिलते हैं। बहिनों के भरण-पोषण का दायित्व उठाना पड़ता है।स्त्री राशि में शनि हो तो भाइयों की मृत्यु नहीं होती लेकिन परस्पर झगड़े होतेरहते हैं। भाइयों में बंटवारे को लेकर झगड़े न्यायालय तक पहुंच जाते हैं।भाइयों के साथ रहने पर किसी का भी भाग्योदय नहीं होता। आर्थिक स्थितिबद से बदतर होती चली जाती है। संतान सुख देर से मिलता है। कन्या या तुलाराशि का शनि तृतीयस्थ हो तो विवाहोपरान्त अत्यधिक कष्ट उठाने पड़ते हैं,व्यवसाय में आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। उद्योग-उत्साह, संघर्ष से किएसभी कार्य निष्फल होते हैं। स्वराशिस्थ शनि दरिद्र योग बनाता है। जल राशिका शनि हो तो प्रवास अधिक करने होते हैं। जातक हृदयहीन, लोभी और दुष्टस्वभाव का होता है। मंगल के साथ अशुभ योग में हो तो जातक विश्वासघाती,ठग बनता है। अन्य अशुभ योग में हो तो शिक्षा पूर्ण नहीं हो पाती।
राशिगत फल
1. मेष-मेष राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक पराक्रमी, संपन्न,यशस्वी, सुखी एवं धार्मिक रहता है। भाई-बहनों के सुख-सहयोग में न्यूनता
रहती है। महर्षि लोमश के मतानुसार जातक के दो विवाह होते हैं।
2. वृषभवृषभ राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,पराक्रमी, हर कार्य में कुशल रहता है। भाई-बहनों का सुख कम मिलता है।जातक सिरदर्द का रोगी होता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक आर्थिक दृष्टिसे संपन्न एवं सुखी रहता है। संतान एवं मामा के सुख में न्यूनता रहती है।बचपन में ननिहाल का सुख मिलता है। शरीर दुर्बल एवं रोगी होने से जातकशारीरिक कष्ट सहन नहीं कर पाता।4. कर्ककर्क राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक उद्यमी, संपन्न,लोकप्रिय एवं सुंदर होता है। अपने कमों से मरणोपरांत नाम कमाता है। स्वास्थ्यकमजोर रहता है। जातक अल्पायु होता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि धन स्थान में हो तो जातक कटुभाषी एवंअल्पायु होता है, स्वास्थ्य मध्यम रहता है और शारीरिक दोष रहते हैं। सहोदरोंसे तीव्र मतभिन्नता रहती है। आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं होती।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि तृतीय स्थान में हो तो जातक के पुत्रसुखमें बाधा रहती है। प्रायः मृत संतान जन्म लेती है या कन्या संतान अधिक रहतीहै। पत्नी सुंदर रहती है पर उसका चरित्र अच्छा नहीं रहता। सप्तमस्थ पापग्रहहो तो चरित्र दोषपूर्ण रहता है। जातक कटुभाषी होता है, कोर्ट-कचहरी तकजाना होता है। आर्थिक स्थिति मध्यम रहती है, धन डूबने का भय रहता है।
7. तुलातुला राशि में शनि तृतीय स्थान में हो तो नास्तिक, चुगलखोर,संपन्न, पैतृक, संपत्ति का अपव्यय करनेवाला होता है। आंखें लाल एवं स्वभावतेज रहता है, स्वजनों से मधुर संबंध नहीं रहते, संतान अल्पायु रहती है। कन्यासंतान अधिक रहती है। पत्नी का अपने देवर से अनुचित संबंध रहता है। सप्तममें पापग्रह होने पर यह फल विशेष रूप से अनुभव में आता है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का शनि तृतीय स्थान में हो तो जातक कंजूस,अति चतुर, चुगलखोर, बहुरूपी, क्रोधी किंतु समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त रहता है।आंखें लाल होती हैं, कन्याएं कार्यकुशल रहती हैं। स्वकीय एवं अड़ोस-पड़ोसके लोगों के लिए जातक उपद्रवकारक रहता है।
9. धनुधनु राशि का शनि तृतीय स्थान में हो तो जातक कंजूस,व्यवहारकुशल, संपन्न, उदार, दानशील एवं पुरुषार्थी होता है। सहोदरों से मधुरसंबंध नहीं रहते परंतु उनके विषय में अपनी जिम्मेदारी को जातक निभाताहै। उसकी कन्याएं कर्तव्यपरायण रहती हैं। जातक एवं जातक के पिता समाजमें सम्मानित रहते हैं।
10. मकर मकर राशि का शनि तृतीय स्थान में हो तो जातक पुरुषार्थ,नौकर-चाकरों से युक्त, संपन्न सुखी एवं सरकारी कर्मचारी होता है। स्वपरिश्रमसे प्रगति करता है। पिता के समान जातक समाज में प्रतिष्ठित रहेता है।पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाते हुए भी सहोदरों के सुख में कमी रहती है।11. कुंभकुंभ राशि का शनि तृतीय स्थान में हो तो जातक पुरुषार्थी,विद्वान, आस्तिक, नौकर-चाकरों से युक्त, संपन्न एवं सुखी रहता है। उसकेपरस्त्री संबंध हो सकते हैं। महर्षि गर्ग के अनुसार जातक चोर रहता है।
12. मीन मीन राशि का शनि तृतीय स्थान में हो तो जातक पराक्रमी,संपन्न एवं विवेकपूर्ण रहता है। उसके दो विवाह होते हैं या परस्त्री संबंध रहताहै। चोरी रिश्वतखोरी की ओर प्रवृत्त रहता है।
1. शिव मंदिर पर ध्वजा चढ़ावें।
2. बिल्ल को दूध पिलावें।
3. कुत्ते कीसेवा करें।
4. खेजड़ी के वृक्ष के नीचे दीपक करें।
5. चौखट पर लोहेकी कीले गाढ़़े।
===========================4) चतुर्थ भाव - चतुर्थ स्थान (सुख भाव)
चतुर्थ स्थान में शनि के फल
आचार्य व गुणाकर - विसुखः पीडितमानसश्चतुर्थे। यह दुखी और चिन्तातुर होता है।
कल्याणवर्मा - पीडितहृदयो हिबुके निर्बान्धववाहनार्थं - मतिसौख्यः बाल्यै व्याधितदेहो नखरोमधरो भवेत् सौरे ।। इस के हृदय में पीड़ा रहती है। रिश्तेदार, धन, वाहन, बुद्धि या सुख की प्राप्ति नहीं होती। बचपन में रोगी रहता है। नख और केश अधिक होते है।
-
वैद्यनाथ आचारहीनः कपटी च मातृक्लेशान्वितो भानुसुते सुखस्थे। यह दुराचारी, कपटी होता है। माता का कष्ट होता है। सुखे मन्दे सुखक्षयः । इसे सुख नहीं मिलता।
वसिष्ठ - शनिः सुखवर्जितांग: । शरीर में सुख नहीं होता। पराशर - सुखे सौख्यं शत्रुभिश्च समागमम् । शत्रुओं से संपर्क हो कर सुख मिलता है।
गर्ग - भग्नासनोऽगृहो नित्यं विकलो दुःखपीडितः । स्थानभ्रंशनवाप्नोति सौरे बन्धुगतं नरः ॥ यह अच्छे आसन या घर में नहीं रह पाता। हमेशा अस्वस्थ और दुखी रहता है। इसे अपने स्थान से हटना पडता है। बृहद्यवनजातक - पित्तानिलं क्षीणबलं कुशीलमालस्ययुक्तं कलिदुर्बलांगम् । मलिन्यभाजं मनुजं विदध्याद्रसातलस्थौ नलिनीशजन्मा ॥ यह वात और पित्त के रोगों से युक्त, दुर्बल, व्यभिचारी, आलसी, मलिन और झगडालू होता है।
आर्यग्रन्थ - बन्धुस्थितो भानुसुतो नराणां करोति बंधोर्निधनं च रोगी । स्त्रीपुत्रभृत्येन विनाकृतश्च ग्रामान्तरे चासुखदः स वक्री ॥ इस के बांधवों की मृत्यु होती है। यह रोगी होता है। स्त्री, पुत्र, नौकरों से रहित होता है। वक्री हो तो विदेश में भी दुःख होता है।
नारायण भट्ट - चतुर्थे शनौ पैतृकं याति दुरं धनं मंदिरं बन्धुवर्गापवादः । पितुश्चापि मातुश्च सन्तापकारी गृहे वाहने हानयो वातरोगी ॥ इसे पूर्वार्जित धन या घर आदि नहीं मिलता। आप्तों द्वारा निन्दा होती है। घर तथा वाहनों का नाश होता है। इसे वातरोग होते है।
जागेश्वर - चतुर्थे शनौ बन्धुवर्गेश्च वैरं धनं नैव भुंक्ते पितुर्वाहनाद्यं । न गेहे तदीये तथा वायुरोगी न सौख्यं च पित्रोः स्वयं तप्यतेऽसौ ॥ यह वर्णन प्रायः नारायण भट्ट जैसा ही है।
मन्त्रेश्वर - दुःखी स्याद् गृहयानमातृवियुतो बाल्ये सरूग् बन्धुभे ॥ यह दुःखी, बचपन में रोगी तथा घर, वाहन और माता से विमुक्त होता है। काशिनाथ - सुखं मन्दे सुखैर्हीनो हतार्थो बांधवैर्नरः । गुणस्वभावो दुःसंगी कुजनैश्च न संशयः ॥ यह सुख रहित, गुणी, किन्तु बुरी संगत में रहने वाला होता है। इस के रिश्तेदार इसे धनहीन बनाते है।
जयदेव - बहुवित्तवातसहितो विबलोलसकार्श्यदुःखसहितः सुखगे ॥ यह धनयुक्त, वातरोगी, दुर्बल, आलसी, कृश और दुखी होता है। लखनौ के नबाब- मुतफक्किरो बेहोषः परितृप्तो मानसो जोहल: । मादरखाने यदि स्यात् कमजोरश्च लागरो भवति ।। यह चिन्तातुर, उद्विग्न, बलहीन, कृश और समाधानी वृत्ती का होता है।
घोलप - यह कृश, क्रुर, तामसी, तामसी संगत में रहने वाला, उर्ध्व वायु से बलहीन, अल्पवीर्य तथा दिन व्यर्थ गंवानेवाला होता है।
गोपाल रत्नाकर - इस से पिता को मारक योग होता है। सौतेली मां होती है। शुलरोगी, दुःखी, कपटी, राजा द्वारा पीडित, पूर्वार्जित सम्पत्ति से रहित, मजदूरी करने वाला, भूमि रहित होता है।
भृगुसूत्र - मातृहानिः । द्विमातृवान् । सौख्यहीनः । निर्धनः । उच्चे स्वक्षेत्रे न दोषः । अश्वान्दोलनावद्यवरोही। लग्नेशे मन्दे मातृदीर्घायुः सौख्यवान्। रन्ध्रेशयुक्ते मात्रारिष्टं सुखहानि: । माता की मृत्यु हो कर सौतेली मां होती है। यह सुखहीन, निर्धन होता है। शनि उच्च या स्वक्षेत्र में हो तो ये दोष नहीं होते। घोडे या पालकी की सवारी मिलती है। यह शनि लग्नेश हो तो माता दीर्घायु होती है और सुखी होता है। अष्टमेश से युक्त हो तो मां की मृत्यु कर कष्ट होता है।
चतुर्थ भाव में शनि जातक स्वयं अपने भाइयों के नाश का कारण हो जाता है और रोग, पल्लीतथा बच्चों के कारण कष्ट पाता है। नौकर भी उसका सम्मान नहीं करते। यदिशनि वक्री है तो वह गाँव में कष्ट और पत्नी की हानि करता है।
-मानसागरी
जातक को अपना घर तथा मान सम्मान नहीं मिलता। माँ की भीहानि होगी। वह बचपन में रोगग्रस्त और जीवनभर खिन्न रहेगा।
-फलदीपिका
व्यक्ति हृदय रोगी, संबंधियों से विलग, वाहन, संपत्ति, बुद्धिमानी वप्रसन्नता से रहित होगा। वह लड़कपन में (रोगग्रस्त और सुंदर नखशिखवाला होगा।
सारावलीचतुर्थ भाव में शनि माँ की मृत्यु का कारक होता है तथा जातक कीसौतेली माँ होती हैं। यदि शनि स्वक्षेत्री या उच्च राशि में है तो फल भिन्नहोगें। यदि शनि लग्नेश भी है तो जातक के अपने वाहन और चिरंजीवीमाँ तथा जीवन के सभी सुखों और प्रसन्नताओं को भोगने वाला होगा।यदि शनि अष्टमेश से युत है तो माँ की मृत्यु तथा अन्य मामलों में भीहानि होगी।
-भृगु
चतुर्थ भाव में चन्द्रमा से शनि की युति माँ के लिए भय दर्शाती है।जातक खिन्न, अचानक नुकसान झेलने वाला, पेट में दर्द से ग्रस्त, संर्कीणमानसिकता वाला, कलाकार, अच्छा चिंतक, विदेश में सफल, राजनीतिकपक्षपात व प्रतिकूलता का शिकार, निष्क्रिय और शिक्षा में बाधाओं कासामना करने वाला होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
चतुर्थ भाव में क्रूर शनि माँ के लिए अच्छा नहीं है। इससे संबंधियोंसे कटु संबंध और शत्रुओं से प्रसन्नता मिलती है। जातक सदैव तनावग्स्त,अच्छे घर के अभाव से पीड़ित एवं वातरोगी होगा। ऐसे जातक काँ को
छोड़कर अन्य किसी के द्वारा पाला जाता है।
शनि की समम्रस्थिति का विश्लेषण प्रभावों की ओर संकेतमात्र करता
है।
पाश्चात्य मत - यह शनि, मकर, कुम्भ या तुला में शुभ सम्बन्ध में हो तो पूर्वार्जित इस्टेट अच्छी मिलती है। जमीन, घरबार, खेती, खानों के व्यवहार में लाभ होता है। उत्तर आयु में अच्छा फायदा होता है। ये लोभी होते है । मृत्यु समय तक अधिकाधिक धन प्राप्त करना चाहते है। यह शनि निर्बल तथा पीड़ित हो तो माता या पिता का मृत्यु योग जल्दी होता है। गृहसौख्य नहीं मिलता। जमीन, खेती, इस्टेट का नुकसान होता है। जीवन के आखरी दिन बहुत अशुभ होते है। चतुर्थ में शनि शुभ हो या न हो - उत्तर आयु में एकांतप्रिय और संन्यासी वृत्ती होती है। यह कभी कभी अपने उन्नति के प्रतिकूल भी होता है। दैववशात् किसी एक ही स्थान में अटकना पडता है।
हमारे विचार - इस स्थान में प्राय: सभी ने जो अशुभ फल बतलाए है। वे मुख्यतः स्त्री राशियों के है । पुरूष राशियों में कुछ शुभ फल मिलते है। किंतु बचपन और बुढ़ापे में कष्ट ही होता है। इन को मानो पूर्वजन्म में सब सुख मिले होते है। और यह जन्म दुःख के लिये ही है ऐसा प्रतीत होता है। इसलिये मृत्यु के समय मानों ये मृत्यु का स्वागत ही करते है - इतनी दुखद स्थिति रहती है।
हमारा अनुभव - इस स्थान में पुरूष राशी में माता से पहले पिता का मृत्यु योग कराता है। क्वचित ही माता की मृत्यु पहले होती है। जिस की मृत्यु बाद में हो उससे सम्बन्ध ठीक नहीं रहते। उस के जीवित रहते भाग्योदय नहीं होता। मानसिक या शारीरिक कष्ट बना रहता है। मेष, कर्क, सिंह, तुला, धनु, वृश्चिक, मीन तथा मिथुन में यह शनि सरकारी नौकरी में यश देता है - मॅजिस्ट्रेट, सबजज, आइ.ए.एस., डॉक्टर, वकील आदि होते है। विज्ञान की उपाधियां - बी.एस-सी., एम.एस-सी., डी.एस-सी. आदि प्राप्त हो सकती है। यह शनि द्विभार्या योग कराता है। वृषभ, कन्या, मकर तथा कुंभ में व्यापारी होते हैं। नौकरी में तो बहुत समय एक ही स्थान में पड़े रहते है। तरक्की नहीं होती। यह प्रायः पिता का इकलौता लड़का होता है। पैतृक सम्पत्ती नही मिलती। व्यापार में शुरू में स्थिरता नहीं रहती। हमेशा दिवालिया होने का या गांव छोडने का डर बना रहता है। बेइज्जती होने के अवसर आते है। स्त्री राशि में यह शनि सौतेली मां का अस्तित्व बतलाता है। द्विभार्या योग होता है। पुरूष राशि में साधारणतः ४८ से ५२ वें वर्ष में पत्नि की मृत्यु होती है। ये लोग साधारणतः उदार, शांत, गम्भीर, उदात्त, सावधान, विपत्ती में धीरता रखने वाले, विरक्त प्रवृत्ति के होते है। इन के वस्त्र अच्छे नहीं रहते, जल्दी मैले होते है और फटते है। निर्लोभी, न्यायी, निर्व्यसनी तथा अतिथि सत्कार में दक्ष होते है। ये बडी संस्थाओं के लिये सम्पत्ति अर्पण करते है। इस योग के कुछ उदाहरण - बैरिस्टर चित्तरंजन दास, डाक्टर रासबिहारी घोष, डॉक्टर आशुतोष मुकर्जी, रावबहादुर डी. लक्ष्मीनारायण, बम्बई के श्री. अनन्त शिवाजी देसाई टोपीवाले, पुलगांव मिल तथा द्रविड हाईस्कूल (वाई) के संस्थापक श्री. भिकाजी कृष्ण द्रविड आदि । अति उदारता से कभी कभी उत्तर आयु मे दरिद्रता भी होती है। साधारणत: इन लोगों का घर में व्यवहार प्रेमपूर्ण नहीं होता। अधिकारी जैसे रौब से रहना चाहते है। इसलिये वृध्दावस्था में पत्नी तथा पुत्रों से इन्हें अच्छा बर्ताव नहीं मिलता। ये लोग अपनी जन्मभूमि में उन्नति नहीं कर पाते। सन्तति की दृष्टिसे मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक तथा मीन में विपुल । मिथुन, तुला, कुंभ में बहुत कम या नही होना और वृषभ, कन्या, मकर में मध्यम प्रमाण पाया गया है। यह शनि किसी तरूण पुत्र की मृत्यु का योग करता है। पूर्वार्जित इस्टेट नही होती। रही भी तो कायम नहीं रहती और वह नष्ट होने पर ही भाग्योदय हो सकता है। पूर्व आयु में ३६ वें वर्ष तक कष्ट रहता है। तदनन्तर ५६ वे ं वर्ष तक अच्छी स्थिती रहती है। यह दत्तक पुत्र होने का योग है। अपनी जन्मभूमि में इनकी प्रगति नहीं होती; किसी दूर के प्रदेश में तरक्की कर सकते है। वृषभ, कन्या, मकर में पश्चिम की ओर और अन्य राशियों, में उत्तर की ओर के प्रदेश अनुकुल होते है। विमान प्रवास में इन्हें डर रहता है। वृध्दावस्था में इनकी सम्पत्ति कायम नहीं रहती। दान में बहुत खर्च हो जाता है। फिर भी बड़े व्यवसाय करने की कोशिश करते है। उस मे नुकसान होता है। स्त्री-पुत्रों की सम्पत्ति कायम रह सकती है। चतुर्थ का शनि बहुत दूषित ५१हो तो पिता की मृत्यु बचपन में होना, सौतेली मां द्वारा कष्ट होना, अस्थिरता, हमेशा कर्ज रहना, कर्ज के लिये कारावास, पुत्रों से कष्ट होना, द्विभार्यायोग, धन का संचय न होना, जन्मभूमि में प्रगति न होना, ये सब फल मिलते है। किन्तु ये अपने विशिष्ट मित्र वर्ग में नेतृत्व प्राप्त करते है। इन की मृत्यु पूर्वआभास मिलकर समाधानपूर्वक वासना रहित स्थिति में होती है। ये दयालु होते है। मायावी नहीं होते। इन्हें आयु के ८।१८।२२।२८।४०।५२ वे वर्ष में शारीरिक कष्ट बहुत होता है। २२ वें तथा २७ वें वर्ष कुटुम्ब में मृत्युयोग होता
। २८ वे वर्ष जीविका का आरम्भ होता है । १६।२२।२४।२७/३६ ये भाग्यकारक वर्ष होते है। नौकरी मिलना, विवाह, सन्तति होना आदि शुभ योग इन वर्षों में देखना चाहिये। ये लोग माता की मृत्यु का विचार करते है,
प्रसिध्द उदाहरण-
बैरिस्टर रामराव देशमुख (भूतपूर्व मन्त्री, मध्यप्रदेश) (कन्या राशि में शनि), स्व. गंगाधरराव देशपांडे (कर्नाटक के काँग्रेस नेता) (धनु राशि में शनि), स्व. दादासाहेब करंदीकर (सातारा) (कर्क राशि में शनि), श्री. केशवराव गोधलेकर (जगतहितेच्छु प्रेस, पूना) (वृश्चिक राशि में शनि), प्रिन्सिपल आपटे (उज्जैन) (धनु राशि में शनि), रूस के झार निकोलस (वृश्चिक राशि में शनि) ।
चतुर्थ स्थान में स्थित शनि जातक को मानसिक तनाव, चिंता एवं दुख देताहै। शनि उच्च एवं स्वक्षेत्र का चतुर्थ स्थान में हो तो वह शुभ फलदायी होता है। मेष या वृषभ राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक दीर्घायु रहता
है एवं उसे माता का सुख कम प्राप्त होता है। जातक के सौतेली मां रहनेकी संभावना रहती है। शनि अष्टमेश के साथ चतुर्थ स्थान में हो तो निशचय ही जातक के मातृसुख का नाश होता है।जातक का स्वास्थ्य बचपन में मध्यम रहता है। वह वातरोग से पीड़ित रहताहै, नाखून एवं बाल बड़े होते हैं। चतुर्थस्थ शनि पापयुक्त या दुर्वल हो तोउसे हृदयरोग होने की पूर्ण संभावना रहती है। स्वजन एवं सहोदों से कम बनतीहै। शनि वक्री हो तो जातक को जन्म स्थान से दूर रहना होता है। वक्री शनिके अशुभ फल प्राप्त होते हैं, शत्रु अधिक होते हैं, पैतृक संपत्ति का भोग भी अल्प प्राप्त होता है।
यवन एवं पाश्चात्य ज्योतिषाचायों के मत चतुर्थस्थ शनि के फलों के विषयमें उपरोक्त मतों को पुष्ट करनेवाले हैं।
चतुर्थ भाव-शनि लग्न कुंडली के चौथे भाव में हो तो जातक माता केलिए अशुभ, शुष्क व रूखे/सांवले शरीर का, धोखेबाज, बदनाम, उदास रहने
वाला, क्रोधी तथा खराब पारिवारिक जीवन वाला होता है (लग्न में चन्द्र या बुध
शुभ स्थिति में हो या गुरु हो तो क्रोधी न होकर सौम्य होता है, तब धोखेबाज व
शुष्क रुखे शरीर वाला भी नहीं होता)। ऐसे जातक की बाल्यावस्था कष्ट में बीततीहै। मां-बाप के सुख, पत्नी के सुख में कमी रहती है। पत्नी से वियोग सम्भव होताहै। किन्तु शनि से सम्बन्धित कारोबार लाभकारी होता है। शनि पाप प्रभाव में होतथा चौथे घर में चन्द्रमा की युति हो तो जातक की माता ठसकी बाल्यावस्था में हीमर जाती है।
लाल किताब में चौथे शनि को 'पानी का सांप' कहा गया है। यदि ऐसेजातक का स्वास्थ्य ठीक न रहता हो तो शनि ग्रह की सम्बन्धित तरल वस्तुए-शराब, तेल आदि का प्रयोग उसे लाभकारी होता है। स्वराशि या उच्च्च का शनि होतो पूर्वजों की भारी सम्पत्ति जातक को मिलती है। जमीन-जायदाद या खदानों केकाम में विशेष रूप से लाभ प्रास होता है। धन के प्रति मोह अधिक रहता है। यदिशनि यहाँ निर्बल हो तो माता-पिता का सुख अल्प, स्थावर सम्पत्ति का नाश, घरका सुख नहीं तथा जीवन का अन्तिम समय बहुत बुरा-आदि दुण्प्रभाव जातकभोगता है। क्रोध बहुत आता है, चिन्ता रहती है। पुरुष राशि का शनि हो तो पिताकी मृत्यु पहले होती है। कन्या या स्वराशि का शनि हो तो व्यापार में जातक सफलहोता है। नौकरी में नहीं। किन्तु माता-पिता का भले ही इकलौता हो, पैतृक सम्पत्तिउसे नहीं मिलती। शेष राशियों में दासवृत्ति/नौकरी से ही जातक की उन्नति होतीहै, व्यापार में नहीं।
चौथा शनि शुभ हो या अशुभ जीवन के अन्तकाल में जातक को एकांतप्रियतथा साधुवृत्ति का बना देता है। प्रायः जजों/न्यायाधीशों के लिए चौथा शनि शुभफल देने वाला होता है।
चतुर्थ भावः चतुर्थ भावस्थ शनि स्वराशिस्थ अथवा उच्च का हो तोजातक को पूर्वार्जित संपत्ति मिलती है। जमीन, खेती, खानों के कायोँ से अच्छालाभ मिलता है। लेकिन जातक लोभी होता है, सदैव रुपया कमाने में ही ध्यानलगाए रखता है। पुरुष राशि का शनि माता-पिता दोनों के सुख को समाप्तकर देता है। पहले पिता की मृत्यु और बाद में माता की मृत्यु होती है। लेकिनजब तक माता जीवित रहे भाग्योदय नहीं हो पाता। प्रायः न्यायाधीशों कीकुण्डली में चतुर्थ स्थान का शनि अग्नि और जल राशि में देखा गया है। ऐसेजातक विज्ञान विषय में बी.एससी., एम.एससी. आदि उच्च उपाधियां भीप्राप्त कर लेते हैं। चतुर्थ भाव का शनि द्विभार्या योग बनाता है, पृथ्वी राशि काशनि व्यापार में उन्नति देता है, नौकरी करें तो सामान्य स्थिति में जीवन व्यतीतकरना होता है। पैतृक संपत्ति से वंचित करता है। यदि ऐसा जातक इकलौतापुत्र हो तब भी पूर्वार्जित संपत्ति नहीं मिलती। चतुर्थ भावस्थ शनि विमाता कासुख देता है। ऐसा जातक सामान्यतया उदार, शांत, गम्भीर होता है। दूषितशनि युवा पुत्र की मृत्यु का शोक देता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक को माता औरबंधुओं का सुख प्राप्त होता है। सरकारी कर्मचारी रहता है। जातक धनवान,दीर्घायु एवं कामातुर रहता है और परस्त्री के साथ संबंध रहता है।
2. वृषभवृषभ राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, संपन्नएवं सरकारी कर्मचारी रहता है। जातक को माता-पिता का पर्याप्त सुख मिलताहै, दो विवाह होने की संभावना रहती है। संतान सुख में बाधा आती है यासंतान से कष्ट पहुंचते हैं। महर्षि गर्ग एवं यवनाचार्य के मतानुसार संतान द्वाराजातक के जीवन को भय रहता है।
3. मिथुनमिथुन राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक सिरदर्द का रोगी, दृढ़प्रतिज्ञ एवं आर्थिक दृष्टि से संपन्न रहता है। दो पत्नियां रहती हैं लेकिनसंतान सुख का अभाव रहता है। संतान से प्राण हानि का भी भय रहता है।शूलरोग संभव रहता है।
4. कर्ककर्क राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,माता-पिता से सुखी, संपन्न, पराक्रमी, विद्वान एवं सरकारी कर्मचारी रहता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक अधिकारसंपन्न,संपन्न तथा सुखी रहता है। सरकारी कर्मचारी, पराक्रमी, आस्तिक, विद्वान, यशस्वी एवं आर्थिक दृष्टि से
6. कन्या-कन्या राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक पराक्रमी,आस्तिक, समाज कार्य में सफल, संपन्न एवं अधिकारयुक्त रहता है। पिता सेअनबन रहती है, पैतृक संपत्ति का नुकसान और रोगभय रहता है। माता-पिता एवं सहोदरों के सुख में न्यूनता रहती है।
7. तुला-तुला राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक वातरोग सेपीड़ित रहता है। माता-पिता के सुख में न्यूनता रहती है। जातक पैतृक संपत्तिअल्प मात्रा में भोगनेवाला, स्वपराक्रम से सुखी एवं संपन्न जीवन जीनेवालाहोता है। पत्नी सुशील एवं पतिव्रता रहती है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातकनास्तिक, अस्थिर, अभिमानी, गर्ममिजाज एवं चुगलखोर रहता है। आंखें लालहोती हैं, पिता से स्नेहपूर्ण संबंध नहीं रहते एवं पत्नी सुशील एवं आज्ञाकारिणीरहती है।
9. धनु-धनु राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक संपन्न किंतुगर्ममिजाज रहता है। स्वास्थ्य मध्यम और पारिवारिक सुख में न्यूनता रहती है।
10. मकर-मकर राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक सुखी, संपन्न,सरकारी कर्मचारी, उदार, दानशील, नौकर-चाकर एवं वाहन सुख से युक्त, ऐश्वर्यभोगनेवाला होता है। उसे माता-पिता का सुख पर्याप्त प्राप्त होता है।
11. कुंभकुंभ राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक सुखी, संपन्न,सरकारी कर्मचारी, यशस्वी, धन संपत्ति, वाहनादि ऐश्वर्य से परिपूर्ण रहता है।पारिवारिक सुख न्यून ही रहता है। पत्नी क्रोधी मिलती है।
12. मीन-मीन राशि का शनि चतुर्थ स्थान में हो तो जातक कामातुर होताहै। परस्त्री संबंध रहना संभव है, पत्नी क्रोधी मिलती है। पारिवारिक सुख मेंन्यूनता रहती है और आर्थिक स्थिति साधारण रहती है।
1. खाली कुऐ में शहद व दूध मिलाकर डाले। 2. कौवें को रोटी डाले।
3. शराब बहते पानी में बहावें।
===========================5) पंचम् भाव -पंचम स्थान (सुत भाव)
पंचम स्थान में शनि के फल
आचार्य व गुणाकर अपुत्रो धनहीनः । इसे सन्तति और सम्पत्ति
नहीं मिलती।
कल्याण वर्मा - सुखसुतमित्रविहीनं मतिरहितं चेतसं त्रिकोणस्थः। सोन्मादं रवितनयः करोति पुरूषं सदा दीनम् ।। यह दुखी, पुत्र रहित, मित्र रहित, बुध्दिहीन, उन्मत्त, और हमेशा दीन होता है।
वैद्यनाथ- मत्तश्चिरायुरसुखी चपलश्च धर्मी जातो जितारिनिचय: सुतगेऽर्कपुत्रे । यह उन्मत्त, दुःखी, चंचल, धार्मिक, शत्रुओं को जीतने वाला तथा दीर्घायु होता है।
पराशर - पंचमे पुत्रलाभं च बुद्धि मुद्यम सिद्धिकृत्। यह बुध्दिमान, उद्योगी तथा पुत्रों से युक्त होता है।
वसिष्ठ - शनिस्तनुजगोऽपुत्रम् ।। पुत्र नही होते।
गर्ग - सुतभवनगतोऽरिमन्दिरस्थः सकलसुतान् विनिहन्ति मन्दगामी । समुदितकिरणः स्वतुंगभस्थः कथमपि जनयेत् सुतीक्ष्णमेकपुत्रम् ॥
यह शनि शत्रु ग्रह की राशि में हो तो सब पुत्रों का नाश होता है। तेजस्वी, उच्च में या स्वराशि में हो तो किसी तरह एक पुत्र अच्छा होता है। बुध्दिः कुटिला मन्दः । बुध्दि कुटिल होती है। घटशनिः सुतगः सुतपंचकी मृगशनिश्च सुतात्रयदस्तथा। यह शनि कुम्भ राशि में हो तो पांच पुत्र होते है और मकर में हो तो तीन कन्याएं होती है।
बृहद्यवनजातक -- सुजर्जरं क्षीणतरं वपुश्च धनेन हीनत्वमनड़हीनम्। प्रसूतिकाले नलिनीशपुत्रः पुत्रास्थितः पुत्रभयं करोति ॥ इस का शरीर दुबला और जर्जर होता है। यह निर्धन और कामेच्छारहित होता है। पुत्रों को भय रहता है ।
आर्य ग्रन्थकार-- गर्ग के समान वर्णन है ।
जागेश्वर -- शनि: पंचमे सन्ततिर्दुःखिता स्यात् तथा मन्त्रदुःखी धनीनां विरोधी । भवेद् बुध्दिहीनस्तथा धर्मरोधी सदा मित्रतः क्लेशकारी नरः स्यात् ॥ इस की सन्तति दुःखित रहती है। धनवानों का विरोधक, बुद्धिहीन, नास्तिक, मित्रों से कष्ट पाने वाला तथा गलत सलाह से दुःखी होता है।
काशीनाथ -- पुत्रे मन्दे पुत्रहीनः क्रियाकीर्तिविवर्जितः । हीनकोशो विरूपश्च मानवो भवति ध्रुवम् ॥ इसे पुत्र, कीर्ति, धन, रूप इन का सुख प्राप्त नहीं होता ।
नारायण भट्ट -- शनौ पंचमे च प्रजाहेतुदुःखी विभूतिश्चला तस्य बुद्धिर्न शुद्धा । रतिर्दैवते शब्दशास्त्रे न तद्वत् कलिर्मित्रतो मन्त्रतः क्रोऽड पीडा । यह सन्तति के लिये दुखी रहता है। इस का वैभव अस्थिर और बुध्दि अशुद्ध होती है। धर्म और शास्त्रों पर श्रद्धा नहीं होती। मित्रों से झगडे होते है। हृदय या पेट में कष्ट होता है।
मन्त्रेश्वर -- भ्रान्तो ज्ञानसुतार्थहर्षरहितो धीस्थे शठो दुर्मतिः । यह ज्ञान, पुत्र, धन और आनन्द से रहित होता है। दुर्बुद्धि, भ्रमयुक्त और दुष्ट होता है।
जयदेव -- इस का वर्णन मन्त्रेश्वर तथा यवनजातक के समान है
लखनौ के नबाब - बदअक्लो मुत्फकिरः सुतसुख-रहितश्च काहिलो मनुजः। जोहल: पंजुमखाने कोतहदेहश्च जाहिलो भवति। यह निर्बुध्द, चिन्तित, पुत्र रहित, दुःखी, आलसी और नाटा होता है।
घोलप - यह हमेशा चिन्तित, निर्धन, श्रेष्ठ विद्वान हो कर भी दुष्टों के संसर्ग से नीचता प्राप्त करने वाला, कुटिल, मुत्सद्दी, कूटनीतिज्ञ, काम, क्रोध, मद, मत्सर से युक्त, दुर्जनों के आश्रय से हीन तथा स्त्री पुत्रों के सुख से वंचित होता है।
गोपाल रत्नाकर - सन्तति में विघ्न होता है। बुद्धि और विचार होते है। राजा का कोप होता है। मिथुन, कन्या, धनु या मीन में यह शनि हो तो गोद लेने या लिये जाने का योग होता है।
भृगुसूत्र -- पुत्रहीनः अतिदरिद्री दुर्वृत्तः दत्तपुत्रः । स्वक्षेत्रे स्त्रीप्रजासिध्दिः । गुरूदृष्टं स्त्रीद्वयम् तत्र प्रथमाऽपुत्रा द्वितीया पुत्रवती । बलयुते मन्दे स्त्रीभिर्युक्तः । यह पुत्रहीन, बहुत दरिद्री, दुराचारी, दत्तक पुत्र होता है। यह शनि स्वगृह में हो तो कन्याएं होती है। गुरू की दृष्टि हो तो दो विवाह हो कर दूसरी पत्नि को पुत्र होता है, पहली को सन्तति नहीं होती। शनि बलवान हो तो यह स्त्रियों से युक्त होता है।
पाश्चात्य मत -- गुरू या रवि से शुभ सम्बन्ध में हो तो यह शनि अपने कारकत्व के व्यवहारों- जमीन, खाने, घर आदि के व्यवहारों में सफलता देता है। सार्वजनिक अधिकार पद से लाभ होता है। विशेषतः शिक्षा के क्षेत्र में यह बहुत लाभप्रद है। यह शनि पीड़ित हो तो प्रेम प्रकरणों में असफल होना, अपने से अधिक आयु वाले व्यक्ति से प्रेम होना ये फल होते है। सन्तति नही होती अथवा हो कर दुर्लौकिक को कारणीभूत होती है। स्त्रियों को पेट में शूल होना, ऋतुप्राप्ति के बाद बहुत वर्षों के बाद सन्तति होना, दो सन्तानों में ५/७।९।११।१३ वर्षो जितना दीर्घ अन्तर रहना, प्रसुति का समय बहुत देर से होना ये फल शनि १।३।५।७।९।११ इन स्थानों में हो तो पाए जाते । ५/९/११ इन स्थानों में विशेषतः ये फल मिलते है । इस पीड़ित शनि से सट्टे के व्यवहार में, लॉटरी में, रेस में नुकसान होता है। इस व्यक्ति की मृत्यु हृदय विकार से या पानी में डूबने से होती है। सन्तति अनीतिमान, व्यसनी होती है।
पंचम भाव में शनि यदि शनि पंचमभाव में शत्रक्षेत्री है तो जातक निसंतान, दरिद्र तथा खिन्नमना होगा। यदि शनि स्वक्षेत्री या उच्च या मित्रक्षेत्री है तो जातक लंगड़़ा और एकमात्र पुत्र वाला होगा। अशिक्षित, निर्धन और अप्रसन्न होगा। वह निरूद्देश्य भ्रमण करेगा।
-मानसागरी
व्यक्ति गंदी मानसिकता वाला और चालाक होगा। वह निसंतान,
-फलदीपिका
शनि की इस भाव में स्थिति जातक को खिन्न, पुत्र-मित्रों का
वियोगी बनाती है। जातक मूढ़ तथा क्रूर स्वभाव वाला होगा। गरीब और हमेशा उत्तेजित व अशांत रहने वाला होगा।
-सारावलीजातक
निसंतान, नीच, दरिद्र, नीच किस्म के व्यापारों में संलग्न औरपुत्री को गोद लेगा। यदि शनि स्वक्षेत्री है तो वह कन्या को गोद लेने वालाहोगा। यदि शनि गुरु से दृष्ट है तो जातक की दो पलियाँ होगी। दूसरीपत्नी से केवल कन्या संतति होगी। बलवान शनि अनेक महिलाओं से प्रेमसंबंध बनाता है।
-भूगु
जातक संकीर्ण मानसिकता वाला, साधारण परन्तु समस्याओं से. घिरेजीवन वाला, निसंतान, परिवर्तनशील दृष्टिकोण वाला, सरकारी कोप काभाजन, स्पष्ट विचारों वाला और कहानियाँ सुनाने वाला होगा।
-डॉ रामन
गर्गाचार्य के मतानुसार यदि शनि पंचम भाव में शत्रक्षेत्री है तोजातक के सभी बच्चों का नाश करता है।
हमारे विचार -- पंचमस्थान बलवान शुभ त्रिकोण स्थान है अत: इसमें शनि जैसे पाप ग्रह के फल अशुभ ही होंगे। यह प्राचीन आचार्यों का मत प्रतीत होता है। किन्तु ये अशुभ फल मुख्यतः वृषभ, कन्या, तुला, मकर तथा कुंभ इन राशियों में मिलते है। अन्य शुभ फल - जैसे पराशर आदि ने कहे है अन्य राशियों में प्राप्त होते है।
हमारा अनुभव -- मेष और सिंह में पंचमस्थ शनि से शिक्षा पूरी होती है। पहले शनि के कारकत्व के विषय बतलाये गये है, उन में निपुणता प्राप्त होती है। धनु में शिक्षा पूरी नहीं होती । इन तीन राशियों में स्वभाव कुछ अविश्वासी, मन के विचार छुपाने वाला, अपने ही विचार से चलने वाला, संशयी होता है। किसी पर प्रेम नहीं होता। सिर्फ अपने सुख की फिक्र होती है। कुछ अहंकारी होता है। मुंह पर प्रशंसा कर पीछे निन्दा करता है। घर में पत्नी को बहुत चाहेंगे किन्तु बाहर जाने पर उस का स्मरण नहीं रहेगा। स्वभाव दृष्ट, प्रतिशोधपूर्ण होता है। किन्तु लोगों को इन से विशेष कष्ट नहीं होता। यें लोगों के बारे में गलतफहमी कर लेते है। मीठा बोलकर गप्पे लड़ाते है। आलसी होते है, कोई भी काम जल्दी नहीं करते। किन्तु हमेशा काम में लगे रहे जैसा बर्ताव इनका होता है। इन्हें सन्तति काफी होती है। कुछ पुत्र बड़े हो कर इन के पहले ही मृत होते है। आखिर एक या दो पुत्र और कन्याएं जीवित रहते है। विवाह एक ही होता है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन में सन्तति काफी और बहुत कम अन्तर से होती है। ये स्वभाव से दुष्ट, प्रतिशोधपूर्ण होते है। लोगों पर इन का असर भी अधिक होता है। ये बहुत झगडालू, हंसि है। ये रेल, बँक या बीमा कम्पनी, सार्वजनिक संस्थाएं, म्युनिसिपाल्टी, जनपद या जिला परिषद, विधानसभा, संसद आदि में अधिकारपद प्राप्त करते है। ये स्वार्थी हो कर भी शिक्षा संस्था आदि के लिये कुछ कार्य करते है। वृषभ, कन्या, मकर में स्वभाव निरूपद्रवी, अपने कामों मे तत्पर, दूसरी के व्यवहार में दखल न देने वाला होता है। आनन्दी मौजी, मित्रों के शौकिन, स्वभाव से साधारण अच्छे होते है। इन्हें सन्ततिसुख नहीं होता या बहुत कम मिलता है। पत्नी को गर्भाशय सम्बधी विकार, पेट मे शूल होना, मासिक स्त्राव अनियमित होना या बन्द होना, गर्भाशय आकुंचित होना या उस पर गांठे आना आदि से कष्ट होता है। इसलिये ये दूसरा और क्वचित तीसरा विवाह करते है। इन की शिक्षा कम होती है और व्यापार की ओर प्रवृत्ति होती है। इन का स्वभाव साधारण अच्छा होता है। मिथुन, तुला, कुम्भ में- शिक्षा पूरी होती है। ये वकील, न्यायाधिश हो सकते है। स्वभाव विश्वसनीय नहीं होता। अपने काम के समय खूब मीठा बोलते है किन्तु बाद में पहचान भी नही बतलातें। पंचमस्थ शनि का साधारण फल जनक, माता पिताओं का सुख नहीं रहता । गोद लिये जाने की संभावना रहती है। पूर्वार्जित इस्टेट मिलती है। वह बाद में नष्ट हो सकती है। मेष, सिंह, धनु, कर्क, वृश्चिक, मीन में भाग्योदय का योग होता है। अपने कष्ट से उन्नति करते है। वृषभ, कन्या, मकर में पूर्वार्जित इस्टेट मिलकर नष्ट होती है और बाद में किसी रिश्तेदार की इस्टेट वारिस के रूप में मिलती है। मिथुन, तुला, कुम्भ में अपने कष्ट से उन्नति करते है। पूर्वार्जित इस्टेट अधिक मिली तो कर्ज भी साथ में होता है। साधारणत: पंचमस्थ शनि आपत्तियों के साथ समृध्दि देता है। दूषित शनि के फल आचार्यों ने विशेषतः बतलाए है। सन्तति की मृत्यु होना, वृध्द आयु में सन्तति होना इस प्रकार सन्ततिसुख की कमी होती है। अपने जीवन में पुत्रों की प्रगति नहीं हो पाती । सन्तति से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहते। पुरूष राशि में
दो सन्तानों में अन्तर काफी अधिक ५-७-९-११ वर्षों तक का होता है। यह शनि अधिकार पद देता है। दया, प्रेम की भावना नहीं होती। अपना काम पहले देखते है। दूसरों के काम की फिक्र नहीं होती।
इन्डियन इन्स्टिटयूट ऑफ सायन्स, बेंगलोर, केरल में टाटापुरम् टाटा बैंक, नागपुर में एम्प्रेस मिल, लोणावला में जलविद्युत योजना, शहाबाद में सीमेन्ट कारखाना, आदि का प्रारम्भ इन्हीं की कम्पनी द्वारा हुआ। अन्य उदाहरण- - स्व. न्यायमूर्ति रानडे (धनु), स्व. धर्ममार्तंड भाऊशास्त्री लेले, वाई (कन्या), सर चन्द्रशेखर वेंकटरमन (कर्क), ज्योतिषी बाबासाहेब फणसलकर (मेष), इंग्लंड के भूतपूर्व मूख्य प्रधान लॉईड जॉर्ज (कन्या) ।
‘पंचम स्थान में शनि हो तो जातक पुत्रहीन रहता है।' ऐसा महर्षि वशिष्ठएवं कुछ आधुनिक ज्योतिषाचार्यों का मानना है। किंतु अन्य आचार्य व महर्षिइस मत से सहमत नहीं हैं। महर्षि गर्ग के मतानुसार उच्च एवं स्वगृही काशनि पंचमस्थ होने पर संतान सुख प्राप्त होता है। उच्च का शनि पंचम स्थानमें हो तो एक पुत्र, कुंभ का शनि पंचम स्थान में हो तो पांच पुत्र, मकर काशनि पंचम स्थान में हो तो तीन कन्याएं होती हैं। हमारी राय में दोनों आचायोंके मत परिपूर्ण नहीं हैं। संतान के विषय में निर्णय लेते समय जन्मकुंडली केअन्य योग भी देखने चाहिए। यदि पापाक्रांत या दुर्बल शनि पंचम स्थान मेंहो तो संतान की हानि होती है अन्यथा संतान सुख निश्चित रूप से प्राप्त होताहै। महर्षि वशिष्ठ एवं गर्ग के मत से अन्य विद्वानों का मत विपरीत है। उनकेअनुसार पंचम में शनि होने पर भी जातक के संतान होती है परंतु संतान कीओर से जातक सुखी नहीं रहता। हमारा भी यही मत है। प्रायः पंचमस्थ शनिउच्च या स्वगृही हो तो वह उत्तम फलदायी होता है। आर्थिक दृष्टि से जातक विशेष संपन्न नहीं होता। हमेशा त्रस्त, चिंताग्रस्त रहता है। बुद्धि एवं विवेक सही दिशा में कार्य नहीं करते। मित्र कम होते हैं, जीवन सुखी नहीं रहता किंतु जातक कूटनीतिज्ञ, शत्रुहंता एवंदीर्घायु रहता है। पंचमस्थ शनि पापाक्रांत हो तो हृदयरोग रहता है। जातक तंत्र-मंत्र में विश्वास रखता है एवं उसी के जाल में फंसकर धन का दुरुपयोग करता है।
महर्षि पाराशर का मत सबसे भिन्न है। उनके मतानुसार शनि पुत्रसुख, व्यापार में सफलता, कूटनीतिक यश जैसे शुभ फल प्रदान करता है। महर्षि भृगु के
मतानुसार स्वक्षेत्र में शनि हो तो लड़कियां होती हैं, गुरु दृष्ट शनि हो तो दोविवाह होते हैं। द्वितीय पत्नी के संतान होती है। प्रथम पत्नी निःसंतान रहती है।यवन ज्योतिषविदों के मतानुसार पंचम में शनि हो तो जातक कम धनवानहोता है। उसके दुर्बल पुत्र रहता है। स्त्री सुख में न्यूनता रहती है। कामेच्छामें कमी रहती है। पंचमस्थ शनि गुरु या सूर्य के साथ हो अथवा दृष्ट या युति में हो तो इसे
शुभ फलदायी मानते हैं। ऐसी स्थिति में जातक को पंचमस्थ शनि के शुभफल प्राप्त होते हैं। सामाजिक एवं शिक्षा के क्षेत्र में जातक सफल होता है।शनि दुर्बल या पाप पीड़ित हो तो प्रेम में असफलता, पत्नी की उम्र बड़ी होना,सट्टे-जुए में नुकसान होना, हृदयरोग उत्पन्न होना या पानी में डूबने का डररहता है। स्त्री जातक की जन्मकुंडली में पंचमस्थ शनि हो तो उदर पीड़ा,विलंब से संतान का होना, संतानोत्पादक शक्ति में न्यूनता रहना आदि फलप्राप्त होते हैं।
पंचम भाव-पांचवें भाव में शनि हो तो जातक वात रोगी, आवारागर्द,आलसी किन्तु विद्वान होता है। सन्तान से सुखी होता है। शरीर प्रायः दुर्बल, शुष्कव रोगी होता है। ऐसे जातक को स्वयं बनाए या खरीदे मकान अशुभ फल देते हैं।किन्तु सन्तान द्वारा बनाए या खरीदे मकान शुभ रहते हैं। ऐसा लाल किताब का मतहै। शनि अशुभ हो तो जातक को संतान, धन व स्वास्थ्य की दृष्टि से बुरा फल देताहै। ‘बृहद्यमान जातक’ के अनुसार कामशक्ति से भी हीन बनाता है।
स्त्री जातकों में पांचवां शनि मासिक धर्म में गड़बड़ी, प्रदर, मृतवत्सा (जिसकेबच्चे मर जाते हों/मरे हुए पैदा होते हों) सन्तान देर में होना या सन्तानों के बीचअन्तर बहुत अधिक होना आदि दुष्प्रभाव दिखाता है।
लाल किताब के अनुसार शनि यदि शुभ व बली हो तो जातक को भूमि,खदान, मकान आदि से सम्बन्धित कामों में लाभ देता है। पद प्राप्ति कराता है।किन्तु पाप प्रभाव में हो तो पुत्राभाव, जुआ, लॉटरी, रेस आदि में व्यर्थ ही धन नाशकराता है। जलराशि का शनि हो तो जातक को कन्याएं अधिक व जल्दी-जल्दीहोती हैं। जातक का पद छोटा होता है पर जातक उसी का प्रभाव डालने का प्रयासकरता है। अग्निराशि में शनि हो तो भाग्योदय में सहायक होता है। जातकSELFMADE परन्तु विलक्षण स्वभाव का होता है। अपने विचार सबसे छिपाना,सब पर संदेह करना मुंह पर तारीफ, पीठ पीछे बुराई करना व चापलूसी करनाउसकी आदत होती है। ऐसे जातक के संतान बहुत होती हैं, परन्तु उनमें जीवितकम ही रहती हैं। जातक की शिक्षा की दृष्टि से भी अग्निराशि का शनि शुभ नहींहोता।
वायुराशि में शनि जातक को उच्च शिक्षा दिलाकर कानूनविद्, वकील, जजआदि बनाता है। परन्तु जातक माता-पिता से अलग हो जाता है या दत्तक पुत्रबनकर उसे अलग होना पड़ता है। पूवार्जित सम्पत्ति जातक को मिलती है परंतुउसके जीवन काल में ही नष्ट भी हो जाती है। पंचमस्थ शनि प्रायः आपदा देकरशांति प्रदान करता है। हृदय रोग या जल में डूबकर मृत्यु की सम्भावना बनाता है।
पंचम भावः पंचम भाव में शनि हो तो शुभाशुभ फल मिलते हैं। अग्नि राशिका शनि जातक को पूर्ण शिक्षित बनाता है लेकिन धनु राशि में अपवादस्वरूप शिक्षापूर्ण नहीं होती। शनि के कारकत्व कायों में सफलता मिलती है। जातक विलक्षणस्वभाव का होता है, विचारों को दूसरों पर प्रकट नहीं करना, पत्नी की षरछाई बनेरहना, सभी पर संदेह करना, पीठ पीछे सभी की निंदा करना आदि दुर्गुण उसमें होतेहैं। संतान अधिक परंतु कोई भी जीवित नहीं रहती, यहां तक कि बड़ी होकर उसकेजीवित रहते कालकवलित हो जाती है। जल राशि में हो तो संतान जल्दी-जल्दीतथा अधिक संख्या में होती है, भाग्योदय का योग बनता है, भुजबल से संपत्तिअर्जित होती है। पृथ्वी राशि में शनि हो तो साधारण स्वभाव, अपने काम से कामरखने वाला, मित्रों का प्रिय, मौज-शौक में रहने वाला होता है। स्त्री रोगों से पीड़ितरहती है, दूसरा विवाह करना पड़ता है, शिक्षा कम और संतान सुख अल्प मिलताहै। वायु राशि का शनि हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त कर वकील, जज आदिबनता है। पंचमस्थ शनि माता-पिता का सुख नहीं देता।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक कृपण, दुखी, विलासी, संतान से दुख पानेवाला होता है। पत्नी का स्वभाव तेज रहता है। पिता के रिश्तेदारों से सुख प्राप्त होता है।
2. वृषभवृषभ राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक सरकारीकर्मचारी, दीर्घायु, संपन्न, धार्मिक, संगीतप्रेमी, संगीतज्ञ, चरित्रवान एवं ख्यातिप्राप्त रहता है। महर्षि लोमश के मतानुसार संतान सुख में न्यूनता रहती है,प्रथम संतान की हानि होती है। किंतु अन्य आचायों के अनुसार संतानकर्तव्यपरायण एवं सुखदायक होती है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,स्वाभिमानी, संगीतप्रिय एवं सरकारी कर्मचारी रहता है। प्रथम संतान का नाशहोता है।
4. कर्ककर्क राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक संतान सुखसे परिपूर्ण, आर्थिक दृष्टि से संपन्न एवं अल्पायु रहता है।
5. सिंहसिंह राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक संगीतकलामें दक्ष, अल्पायु, संतान के विषय में सुखी व सरकारी कर्मचारी होता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक यशस्वी,सरकारी कर्मचारी, चरित्रवान, सुखी, उदार, लोकप्रिय एवं संतान के विषय मेंसुखी रहता है।
7. तुला-तुला राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक आस्तिक,धार्मिक, शक्तिशाली, भाग्यवान, समाज में यशस्व्री एवं लोकप्रिय होता है।उसके पुत्र होते हैं किंतु उनका सुख कम मिलता है। जीवन संपन्न होकर भीपास में पैसा नहीं रहता। यवनाचार्य के मतानुसार ऐसा जातक धूर्त होता है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक धूर्तएवं पुत्रहीन रहता है। कन्याएं कर्तव्य परायण होती हैं।
9. धनु-धनु राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक आर्थिक दृष्टिसे मध्यम रहता है। इसे मित्रों का सहयोग प्राप्त नहीं होता, अपना स्वार्थ साधनेमें चतुर रहता है। कन्याएं आज्ञाकारिणी एवं सुखदायी होती हैं। पिता से अनबनरहने से पित्सुख से वंचित रहना पड़ता है।
10. मकर-मकर राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक लोकप्रिय,अधिकारसंपन्न, कुशल वक्ता, प्रतिष्ठित एवं धनवान रहता है। पुत्र अल्पायु होतेहैं या फिर होते ही नहीं। एक जातक की जन्मकुंडली में पंचम में मकर का शनिथा। तीन विवाहों के बाद भी उसे पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। बाद में भाई का लड़कागोद लेने पर लड़का हुआ। अत: जन्मकुंडली के अन्य योग भी देखने चाहिए।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जाતक पुरुषार्थी,सुखी, समाज में लोकप्रिय, धार्मिक, स्वाभिमानी, दीर्घायु एवं सफल लेखकबनता है। उसके हस्ताक्षर सुंदर होते हैं। महर्षि लोमश के अनुसार ऐसे जातक को पुत्र सुख नहीं मिलता।
12. मीन-मीन राशि का शनि पंचम स्थान में हो तो जातक पुरुषार्थी, सुखी,समाज में लोकप्रिय, धार्मिक, स्वाभिमानी, दीर्घायु एवं विद्वान होता है। महर्षिलोमश के अनुसार पत्नी तेज स्वभाव की रहती है।
1. शनिवार के दिन लोहे की वस्तु ने खरीदें।
2. अपना घर पचास बनावेंया खरीदे।
3. संतान जन्मे जब मिठाई बाटे पर नमक लगावें।
===========================
6) षष्टम् भाव -षष्ठ स्थान (रात्रु भाव)
षष्ठ स्थान में शनि के फल
आचार्य व गुणाकर -बलवान् व शत्रुजितश्च शत्रुयाते। यह बलवान हो कर शत्रुओं को जीतता है।
कल्याण वर्मा -- प्रबलमदनं सुदेहं शूरं बव्हाशिनं विषमशीलम् ।
बहुरिपुपक्षक्षपितं रिपुभवनगतोऽर्कजः कुरुते ॥ यह बहुत कामुक, सुन्दर, शूर, बहुत खाने वाला, अशुध्द शील का और बहुत शत्रुओं का क्षय करने वाला होता है।
वैद्यनाथ-- बव्हाशनी विषमशीलः सपत्नभीतः कामी धनी रविसुते शत्रुयाते । इस में धनी होना यह एक फल अधिक बतलाया गया है।
गर्ग--विद्वेषिपक्ष क्षपितः शूरो विषमचेष्टितः । बव्हांशी बहुकाव्यच्चारिदाहो रिपुगे शनौ।। षष्ठे नीचगतः सौरिर्जनयेन्नीचवैरिणम् अन्यथा वैरिणं हन्ति निवैरं स्वगृहे गतः ॥ इस में कवि होना यह अधिक फल कहा गया है। षष्ठ में शनि नीच में हो तो शत्रु भी नीच होते है। यह स्वगृह में हो तो शत्रु रहित होता है। अन्य राशियों में शत्रु का नाश होता है ।
वसिष्ठ -- पंगुर्नरं रिपुगृहेष्वतिपूजनीयं । इस का शत्रुओं से सन्मान होता है।
पाराशर -- षष्ठे धनं जयं कुर्यात् । यह धनी, विजयी होता है
जयदेव -- विबलारिवान् धनकुटुम्बयुतः सगणो बली रिपुगतेऽर्क सुते ॥ यह बलवान, सेवकों से युक्त, धनी और कुटुम्ब से समृध्द होता है। इस के शत्रु दुर्बल होते है।
बृहद्यवनजातक -- विनिर्जितारातिगुणे गुणज्ञः स्वज्ञातिजानां परिपालकश्च । पुष्टांगयष्टिः प्रबलोदराग्नि: नरोऽर्कपूत्रे सति शत्रुसंस्थे ॥ यह गुणों की कद्र करने वाला, अपने जातिबन्धुओं का पालक, शत्रुओं को जीतने वाला, प्रबल होता है। छायासुतो भवेच्चैव शत्रुमातुलनाशकृत् - यह शत्रु और मामा का नाश करता है।
ढुंढिराज --उपर्युक्त वर्णन में सुज्ञाभ्यनुज्ञा- परिपालकः स्यात् सूज्ञों का मत मानने वाला इतना अधिक कहा गया है।
आर्यग्रन्थ -- नीचो रिपौ नीचकुलक्षयं च षष्ठः शनिर्गच्छति मानवानां । अन्यत्र शत्रून् विनिहन्ति तुंगः पूर्णार्थकामाज्जनतां ददाति ॥ यह शनि नीच हो तो कुलक्षय होता है। अन्य राशियों में शत्रुओं का नाश होता है। उच्च में धन और कामसुख मिलता है ।
काशीनाथ -- शत्रुभावस्थिते मन्दे शत्रुहीनो महाधनी पशुपुत्रयशोयुक्तो नीरोगो जायते नरः ।। यह निरोग, पुत्रयुक्त, पशुओं से समृध्द, कीर्तिमान, धनी और शत्रु रहित होता है।
जागेश्वर -- शनौ शत्रुगे शत्रवः संज्वलन्ति प्रतापानले राजगेहेरि चारान् । बलैर्बुध्दियोगैर्भवेत् कस्तदग्रे परं वा प्रमेही स रोगी नितम्बे || इस के शत्रु या शत्रु के गुप्तचर नष्ट होते है। बलवान और बुध्दिमान होता है। प्रमेह और गुप्त रोग होते है।
मंत्रेश्वर -- बव्हांशी द्रविणान्वितो रिपुहतो धुष्टश्च मानी रिपौ । यह धनवान, उध्दत और अभिमानी होता है। बहुत खाता है तथा शत्रुओं का घात करता है।
नारायण भट्ट -- अरेर्भूपतेश्चोरतो भीतयः किं । यदीनस्य पुत्रों भवेद्यस्य शत्रौ । न युद्धे भवेत् संमुखे तस्य योध्दा । महिष्यादिकं मातुलानां विनाशः | इसे शत्रु, राजा या चोरी से कोई भय नहीं होता। यह अद्वितीय वीर होता है। भैस आदि पशु घर में होते है। मामा का नाश होता है।
हरिवंश -- पुष्टिर्देहे वीर्यमारोग्यता च भाग्यं भोगं भूषणं वाहनं तु । विद्यां वित्तं सौख्यवर्ग तनोति शत्रोर्हानिं शत्रुंगोशत्रु पुत्रः ।। प्रसादो भूमिं पालनः स्त्रीपुत्रजनित सौख्यं जन्मे षष्ठगते शनौ । इस का शरीर पुष्ट, निरोगी तथा वीर्यशाली होता है। यह भाग्यवान, भोगी, भूषणों तथा वाहनों से सम्पन्न, सुशिक्षित धनी, सुखी तथा शत्रुओं का नाश करने वाला होता है। इस पर राजा की कृपा रहती है तथा स्त्री पुत्रों से सुख मिलता है।
लखनौ के नबाब दानीश्वरं जलीलं जनयत्ति मनुजं मुकर्रवं नृपतिं । निर्जितवैरिसमुहं दुष्मनखाने स्थितो जौहलः ॥ यह बडा दानी, शत्रुओं को जीतने वाला, राजा जैसा समृद्ध किन्तु किसी दुःख से पीडित होता है।
घोलप - यह सर्वत्र पूज्य, कवि, पराक्रमी श्रेष्ठ लोगों का मित्र, दुष्ट और शत्रुओं का नाशक, स्वदेशप्रिय, खर्चीला तथा राजा जैसा शोभायुक्त होता है।
गोपाल रत्नाकर -- यह मूर्ख, अल्पज्ञ, बहरा, शत्रुरहित, धनधान्य की वृध्दि करने वाला, झगडालू और कम पुत्रों से युक्त होता है।
पाश्चात्य मत -- इस स्थान में अशुभ सम्बन्ध में निर्बल शनि बहुत अशुभ फल देता है। इस से दीर्घकाल चलने वाले, गन्दे रोगों से शरीर त्रस्त होता है। तबियत हमेशा रोगी तथा अशक्त रहती है। अन्न वस्त्र की कमी से अस्वस्थता रहती है। यहां स्थिर राशि में शनि हृदय विकार, घटसर्प, कण्ठविकार, मूत्रकृच्छ, खांसी, श्वासनलिका का दाह आदि रोग उत्पन्न करता है। द्विस्वभाव राशियों में फेफडों के विकार, दमा, आमांश और पांवों के विकार होते है। चर राशियों में पेट, छाती, सन्धिवात आदि के रोग होते है। तुला राशि में पित्ताशय, यकृत के विकार, कन्या में दीर्घकाल के रोगों से अपंगता होती है। षष्ठ में शनि से आहार के बारे में रूचि बहुत तीव्र होती है इन्हे नौकर अच्छे नहीं मिलते, नौकरों से नुकसान होता है। इन्हे नौकरी अच्छी नही मिलती तथा उस से विशेष फायदा भी नही होता। षष्ठ में बलवान, शुभ सम्बन्ध में शनि यशस्वी अधिकारी के गुण देता है। इन्हे नौकरों द्वारा अनुशासन कायम रख कर अच्छा काम कराने की कुशलता प्राप्त होती है।
अज्ञात अल्पज्ञातिः । शत्रुक्षयः । धनधान्य समृद्धः । कुजयुते देशान्तरसंचारी। अल्पराजयोगः । भंगयोगात्क्वचित सौख्यं । क्वचिद्योगभंगः। रन्ध्रेशे मन्दे अरिष्टं । वातरोगी। शुलव्रणदेही । इस के सम्बधित कष्ट कम होते है। शत्रुओं का क्षय होता है। धनधान्य की समृध्दि रहती है। मंगल शनि के
साथ हो तो यह व्यक्ति विदेशों में घूमता है। इसे अल्प मात्रा में राजयोग होता है। राजयोग का भंग होने से सुख कम मिलता है। कभी प्रयत्न विफल होते है। यह शनि अष्टमेश हो तो अरिष्टयोग होता है। इसे वातरोग, शूल और व्रण से कष्ट होता है।
छठे भाव में शनि शत्रुक्षेत्री या नीचस्थ शनि जातक को कुल नाशक बनाता है। यदिशनि छठे भाव में उच्च का है तो जातक शत्रुहन्ता व धनार्जन करने वालाहोता है। वह वांछित परिणाम प्राप्त करता है।
-मानसागरी
जातक अपने शत्रुओं का नाश करता है और वह धनी, उद्धत(अक्खड़) व अति भोजिता होगा।
-फलदीपिका
यदि शनि षष्टस्थ है तो जातक व्यभिचारी, सुंदर, उत्साही, अधिकखाने वाला, कुटिल तथा शत्रुजित् होगा।
-सारावली
व्यक्ति शत्रुहन्ता, कम शिक्षित, आर्थिक लाभ प्राप्त करने वाला औरकृषि के कारण उन्नतिशील रहेगा। यदि शनि मंगल से संबद्ध है तो वहाँएक तरह का राजयोग होता है जिससे जातक दूर-दूर की अनेक यात्राएँ करता है। यदि शनि अष्टमेश होकर छठे भाव में है तो जातक कीआयुक्षीण करता है, (स्यूमैटिक) गठिया कष्टों से पीड़ित और दर्द की लहरों से ग्रस्त तथा शरीर पर चोट के निशान देता है।
-भृगु
वह रोगी, बहरा, अल्पसंतति, झगडालू, यौन रोगी, ऋणी, चतुरचुस्त, हठी आदि होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
अनेक विद्वानों के मतानुसार छठे भाव में शनि की स्थिति पत्नी केस्वास्थ्य को हानि करती है। वह अतृप्त व मृतात्माओं से पीड़ित होगा। वहप्रसिद्ध लेखक और मूत्र व योन कष्टों से ग्रस्त होगा और ऋण में दबाहोगा।
शनि एक क्रूर ग्रह होकर षष्ठस्थ होने पर अच्छे फल देता है। क्रूरग्रह तीसरे, छठे व ग्यारहवें भाव में अच्छे होते हैं।
हमारे विचार -- इस स्थान में शनि के शुभ फल मेष, सिंह, धनु, मिथुन, कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियों में प्राप्त होते है। अन्य राशियों में अशुभ फल मिलते है ।
हमारा अनुभव
षष्ठस्थान में शनि पूर्व आयु में बहुत कष्ट देता है। प्रगति में रूकावटें आना, किसी की मदद न मिलना, लोगों के अपशब्द सहते हुए मेहनत करना इस प्रकार कष्टपूर्वक प्रगति करनी पड़ती है। मामा, मौसियां के लिये यह अशुभ योग है। उन का घरबार ठीक नही रहता। उन्हें सन्तति नहीं होती या होकर नष्ट होती है। इन व्यक्तियों का विवाह एक ही होता है और पत्नी अच्छी मिलती है। ये भैस अच्छी तरह पाल सकते है किन्तु गाय, घोडे नही पाल सकते। वृद्धावस्था में इन्हें आर्थिक कष्ट होता है। समय से पहले शारीरिक व्यंग के कारण पेन्शन लेनी पडती है, या कभी पेन्शन मिलती ही नहीं। इन्हें अपने स्थान के समान ही विदेश में भी कष्ट ही होता है। स्थानांतर से प्रगति नहीं होती। इन की ग्रहणशक्ति अच्छी रहती है। मन की एकाग्रता जल्दी हो सकती है। व्यवहार में तीक्ष्ण होते है। व्यवसाय में कीर्ति मिलती है। लोगों पर प्रभाव पडता है। किन्तु कभी कभी प्रयत्न करने पर भी असफल होने से इन की नीयत के बारे में गलतफहमी होती है। उदाहरण स्व. अच्युत बलवन्त कोल्हटकर (सम्पादक - सन्देश), इन के षष्ठ में मीन राशि में शनि था। इस स्थान में शनि से शत्रु बहुत होते है किन्तु वे कायम नहीं रहते। ये परिस्थिती से सतत संघर्ष कर प्रगति करते है। कीर्ति और सम्पत्ति का अधिकार साथसाथ नहीं मिलते। सम्पत्ति हो तो कीर्ति नहीं मिलती, सम्पत्ती न हो कर कीर्ति होने के उदाहरण क्रांतिकारियों की कुन्डलियों में मिलें। प्रायः इन के किसी एक पांव में कुछ दोष रहता है।
रोग विषयक फल
मेष, सिंह तथा धनु में सन्धिवात, घुटनों में पीडा ये रोग ३० वें या ६० वें वर्ष में होते है। वृषभ, कन्या, मकर में हृदय विकार होते है। मिथुन, तुला, कुम्भ में - वात और श्वास के विकार होते है। कर्क, वृश्चिक, मीन में - बद्धकोष्ठ, मधुमेह, बहुमुत्र आदि रोग होते है। इस विषय का विशेष विवरण पाश्चात्य मत में दिया गया है। इन व्यक्तियों का स्वास्थ्य पूर्व आयु मे अच्छा नहीं हो तो विवाह के बाद स्वास्थ्य में काफी सुधार होता है। षष्ठ में दुषित शनि से दारिद्रय, असफलता, अस्थिरता, शत्रु बहुत होना, अपमान, बुद्धि होने पर भी कदर न होना, कारावास में दीर्घकाल रहना आदि अशुभ फल मिलते है।
कुछ प्रसिध्द उदाहरण -- प्रसिध्द क्रान्तिकारी स्वातंत्र्यवीर सावरकर तथा सेनापति बापट, रावबहादुर एन. के. केलकर (भूतपूर्व मन्त्री मध्यप्रांत) (वृश्चिक), नामदार दामले, अकोला (वृश्चिक), स्व. नामदार दाजी आबाजी खरे (मिथुन), योगी अरविन्द घोष (धनु), स्व. खानविलकर (दीवान, बड़ोदा रियासत) (मकर), स्व. चंदूलाल (दीवान, बड़ोदा) (मेष), स्व. डॉक्टर भाटवडेकर (मेष), कवीवर्य रवीन्द्रनाथ ठाकुर (सिंह), श्री. माधवराव जोशी (प्रसिद्ध मराठी नाटककार) (वृषभ)। इन उदाहरणों से प्रतीत होगा कि षष्ठ में शनि कीर्ति, धन तथा अधिकार के फल भी देता है।
षष्ठ स्थान में शनि होने पर जातक हृष्ट-पुष्ट, अति कामातुर, बलशाली,पेटू, संपन्न, शत्रुहंता होता है। शत्रु काफी होते हैं किंतु जातक उन्हें पराजितकरता है। शनि यदि पाप पीड़ित या नीच का हो तो वह शत्रुओं से परेशानरहता है। स्त्री जातक की जन्मकुंडली में षष्ठ स्थान में शनि होना उसके लिएसौत का योग बनाता है। स्वराशि का शनि षष्ठ स्थान में शुभ फलदायक होता है। जातक प्रतिष्ठित, काव्य प्रेमी एवं निरोगी रहता है। शासन में भी सम्मानितहोता है।
जातक को ननिहाल का सुख कम प्राप्त होता है। गुहारोग, प्रमेह, लकवा,पोलियो आदि रोग उत्पन्न होते हैं। शनि अष्टमेश होकर षष्ठ स्थान में बैठाहो तो ‘अनिष्ट कारक' योग बनता है। वातशूल एवं व्रण (फुंसी-फोड़े) उत्पन्नहोते हैं। किंतु मंगल के साथ शनि षष्ठ स्थान में हो तो विदेश प्रवास होता है।यवन ज्योतिषविदों ने भी षष्ठस्थ शनि के इससे मिलते-जुलते फल ही कहेहैं। पाश्चात्य ज्योतिषविदों ने षष्ठस्थ बलवान शनि के शुभ एवं दुर्बल शनिके अशुभ फल बताए हैं। जातक को यकृत, पित्ताशय, दमा, आमाशय,मूत्रकृच्छ, डिप्थीरिया, हृदयविकार आदि रोग होने की संभावना रहती है।है। यदि जातक नौकरी करे तो अच्छी नौकरी न मिले, मिले तो लाभ न हो अथवा
षष्ठ भाव-लग्नकुंडली के छठे भाव में शनि हो तो जातक शत्रुओं पर भारीपड़ने वाला होता है। वह मौज-मस्ती वाला या लापरवाह किस्म का होता है।अनैतिक आचरण करने वाला या योगी होना-दोनों ही सम्भव होता है (शनि केबलावल एवं शुभाशुभ का विचार कर निर्णय कर लेना चाहिए) किन्तु कण्ठरोग याश्वास रोग (दमा आदि) संभव होते हैं। शनि अशुभ प्रभाव में हो तो लम्बी चलनेवाली बीमारियां देता है। चरराशि में व गुरु से दृष्ट होने पर रोग आता-जाता रहताहै। द्विस्वभाव राशि में कठिनाई से ठीक होता है। किन्तु स्थिर राशि में शनि अशुभहो तथा गुरु आदि की शुभ दृष्टि न हो तो रोग ठीक नहीं होता, सदा लगा रहता है।अशुध शनि यदि छठे घर में वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ राशि का हो तो दिल, गलाव सांस के रोग देता है। मेष, कर्क, तुला या मकर राशि में पित्त-विकार, जिगर केरोग तथा सन्धिवात के रोग देता है। मिथुन, कन्या, धनु तथा मीन राशियों में दमा,कफ रोग, पैरों के विकार या अपंगता आदि देता है। शनि की मंगल से छठे भावमें युति हो और लग्नेश आठवें भाव में सूर्य व राहू से दृष्ट हो तो जातक की क्षयरोगके कारण मृत्यु हो जाती है (आठवां भाव मृत्यु का कारण बताता है)।
शनि चंद्र के साथ छठे या आठवें भाव में पाप मध्य या पाप दृष्ट हो तथाअष्टमेश भी स्वग्रही होकर पापग्रहों के मध्य या उनकी दृष्टियों में हो तो जातक कीमृत्यु समूह में होती है।
लाल किताब के अनुसार छठा शनि का्यों में बाधा डालता तथा चिन्ताओं वझंझटों से ग्रस्त रखता है। बिना किसी की सहायता के जातक कठिन संघर्ष करतासमय से पूर्व अवकाश लेना पड़ता है। मीन राशि में शनि हो तो जातक के'शत्रु बहुत होते हैं, परन्तु बिना प्रयास के नष्ट भी ही जाते हैं। जातक के सामने टिकेनहीं। ऐसे जातक को सम्पत्ति, यश व अधिकर एकसाथ नहहीं मिलते-किसी एक की ही प्राति हो पाती है। शनि छठे और शुक्र बारहवें ही तो जातक की गृद्दस्थ मुख मिलता है तथा पत्नी भी सुखी होती है। ऐसे जातक का पुत्र अच्छा न भी हो तो भी जातक के काम आता है।
छठे भाव में शनि हो तो शनि से सम्बन्धित वस्तुर्ए लोका/मशीनरी, तेल, चमड़ा, शराब, सीमेंट, कबाड़ आदि घर में कम से कम लाना चाहिए (विशेषकर चमड़ा और मशीनरी)-अन्यथा शनि का प्रभाव अशुभ होने लगता है। ऐसा लाल किताब के जानकारों का मत है। सांप को दूध पिलाना जातक की संतान के लिए शुभ माना गया है (लाल किताब के टोटके के अनुसार)।
विशेष-प्रैक्टिकल अनुभव में छठे शनि वाले जातक प्रायः भैंस पालकर उसका दूध बेचते भी देखे गए हैं (पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि भैंस/भैंसा भी शनि के कारकों में से एक होता है)। कुल मिलाकर छठा शनि टीक नहीं होता। अशुभ होने पर तो और भी बुरा हो जाता है अच्छा देता है, परन्तु अर्थाभाव भी देता है। खर्चे मुश्किल से पूरे होते हैं। स्वराशि,वृष या कन्या का शनि द्विभार्या योग बनाता है। जातक का तलाक होकर पुर्नर्ववाहहोता है। सामान्य नियमानुसार गुरु की दृष्टि ससम भाव पर हो तो तलाक की नौबतनहीं आती।
षष्ठ भावः शनि छठे भाव में हो तो आयु का प्रथम खण्ड बहुत कष्टमयव्यतीत होता है। कायों में अवरोध, लोगों से झगड़े, जीविका के लिए संघर्ष,किसी का सहायक न होना आदि अनुभव होते हैं। मामा-मौसी आदि का दाम्पत्यजीवन सुखमय नहीं रहता, संतान या तो होती नहीं अथवा सेवा नहीं करती याहोकर मर जाती है। आयु के अंतिम दिनों में भी आर्थिक कष्ट सहन करने पड़तेहैं। ऐसे जातक दुधारू पशु, विशेषकर भैंस पालकर दूध का व्यवसाय करें तोलाभ रहता है। द्विस्वभाव राशि का शनि रोग स्थान में हो तो दमा, उदर, विकार,फेफड़ों में विकृति, सन्धिवात, पैरों में पीड़ा होती है। स्थिर राशि में हो तो हृदयविकार, कण्ठ विकार, मूत्रकृच्छ, खांसी, श्वास नलिका में शोथ आदि रोग होतेहैं। चर राशि, पित्ताशय, यकृत, उदर, वक्ष स्थल के रोग तथा संधिवात से पीड़ाहोती है। प्रायः छठे भाव में शनि के कारण दरिद्रता, दुख, शत्रुवृद्धि, स्थिरताका अंभाव, अपकीर्ति, ज्ञानी होकर भी लोगों की दृष्टि में अज्ञानी, कारावास,असफलता आदि फल अनुभव में आते हैं। शुभ संबंध में शनि हो तो कीर्तिवान,धनवान, शत्रुहन्ता आदि होने के शुभ फल भी मिलते हैं।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक मामा, पिता एवंभाई-बहनों से कम मात्रा में सुख पाता है या उनसे मतभेद रहते हैं। जातकपैतृक संपत्ति का दुरुपयोग करता है। कुछ आँचायों के मतानुसार उसके पिताऔर मामा का चरित्र अच्छा नहीं होता। जातक की आर्थिक स्थिति अच्छीहोती है लेकिन नेत्र रोग से पीड़ित रहता है। पुरुष जातक के अपनी मामी सेएवं स्त्री जातक के अपने मामा से अनुचित शारीरिक संबंध रहते हैं।
2. वृषभवृषभ राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक नेत्र एवं गुदारोग से पीड़ित रहता है। भाई-बहन एवं मामा के सुख में न्यूनता रहती है।मामी के साथ उसके अनुचित संबंध रहते हैं। कोर्ट-कचहरी एवं दवा-दारूमें पैसा खर्च होता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक रोगी परंतुदीर्घायु एवं कंजूस रहता है, दो विवाह होते हैं। मामा एवं संतान से उसे सुखकम प्राप्त होता है। वाद-विवाद, कोर्ट-कचहरी एवं चिकित्सा में पैसा खर्चहोता है।
4. कर्क-कर्क राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक के शत्रु बहुतरहते हैं। उसके दो विवाह होते हैं या परस्त्री संबंध रहते हैं। माता एवं संतानको आशानुकूल सुख प्राप्त नहीं होता। गुदा रोग एवं मस्तिष्क के विकारों सेजातक पीड़ित रहता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक के शत्रु बहुतहोते हैं, चोरों का डर बना रहता है। प्रायः जन्म स्थान से उसे दूर रहना होताहै। विदेश में या प्रवास में चोरी की संभावना रहती है। उसकी आर्थिक स्थितिसंतोषजनक रहती है, स्वास्थ्य कमजोर रहता है। कोई-न-कोई शारीरिक कष्ट
रहता है। यवनाचायों के मतानुसार जातक को मातृ एवं संतान सुख नहीं मिलता।जातक नेत्र रोग से पीड़ित रहता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक का बचपनपरेशानियों में गुजरता है। ऊंचाई से नीचे गिरने और शत्रु एवं चोरों का डरबना रहता है। जातक को जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है, प्रवास में या विदेशमें मृत्यु होती है। वह कामातुर होता है। महर्षि गर्ग के अनुसार जातक कीमां का चरित्र संदेहास्पद होता है और स्वयं जातक का स्वास्थ्य ठीक नहींरहता। नौकरी-पेशे में में मतभेद एवं विरोध रहता है।
7. तुला-तुला राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक कामातुर रहताहै। उसके अनेक स्त्र्यों से प्रेमसंबंध रहते हैं। माता का चरित्र शंकास्पद रहताहै। शत्रुओं की बहुतायत के कारण जीवन संकटग्रस्त रहता है। बचपन मुसीबतोंसे घिरा रहता है। जातक नास्तिक होता है। उच्चाधिकारियों के साथ उसकीशत्रुता रहती है, दांत खराब रहते हैं। मामा एवं ज्येष्ठ भ्राता के सुख की कमीहोती है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक नास्तिक,कामातुर, व्यसनी एवं निद्रालु रहता है। मामा एवं ज्येष्ठ भ्राता के सुख में कमी रहतीहै। बचपन में पानी, विष एवं सर्प से डर बना रहता है। जात्येतर प्रेमविवाह करता है।9. धनु-धनु राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक अल्पायु, बचपनमें पानी, विष एवं सर्पभय से ग्रस्त रहता है। स्वयं जातक या उसकी पत्नीगर्ममिजाज होती है। वैवाहिक जीवन में न्यूनता रहती है। अतिस्त्रीसंग के कारणवह तपेदिक का रोगी बनता है।
10. मकर-मकर राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक अल्पायु रहताहै। उसे अतिस्त्री प्रसंग या स्त्री संसर्ग के कारण तपेदिक जैसा घातक रोग होताहै। पति-पत्नी में सामंजस्य नहीं रहता। स्वजनों से विरोध एवं अन्यों से दोस्तीरहती है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक की भाइयोंसे नहीं बनती। संतान अल्पायु रहती है या मतभेद के कारण संतान सुख प्राप्तनहीं होता। प्रायः संतान न रहने की संभावना ही रहती है।
12. मीन मीन राशि का शनि षष्ठ स्थान में हो तो जातक को पुत्रसुखप्राप्त नहीं होता। वह गर्ममिजाज एवं कामातुर रहता है। उसके सौतेली मां होसकती है। पिता से अलगाव रहता है, शायद इसीलिए उसे पैतृक संपत्ति कासुख नहीं मिलता।
1. गणपति को लडडु चढ़ावें।
2.नारियल पानी में बहावें।
3. चमड़े कापट्टा न पहने।
===========================7) सप्तम् भाव - सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव) सप्तम स्थान में शनि के फल
आचार्य -- स्त्रीभिर्गतः परिभवो मदगे पतंगे । इसका स्त्री द्वारा अपमान होता है। गुणाकर यही कहता है ।
कल्याण वर्मा -- सततमनारोग्यतनुं मृतदारं धनविवर्जितं जनयेत् ।
द्यूनेऽर्कजः कुवेषं पापं बहुनीचकर्माणम् ॥। यह हमेशा अस्वस्थ रहता है। पापी, नीच काम करने वाला, निर्धन, गन्दा वेष धारण करने वाला होता है इस की पत्नि मृत होती है
पराशर-- सप्तमे स्त्रीविरोधनम्। हीना च पुष्पिणी व्याधिदौर्बलिनस्तथा । स्त्री द्वारा इस व्यक्ति का विरोध होता है। हीन रोगी, रजस्वला स्त्री से संग होता है।
वसिष्ठ -- रविजः किल सप्तमस्थः जायां कुकर्मनिरतां तनुसन्ततिं च। इस की पत्नि दुराचारी होती है तथा सन्तति अल्प होती है।
वैद्यनाथ -- भाराध्वश्रमतप्तधीरधनिको मन्दे मदस्थानगे । यह प्रवास से कष्ट भोगता है तथा निर्धन है। लम्बा पीनपयोधरा। इस की स्त्री का वक्षस्थल उन्नत होता है।
गर्ग -- विश्रामभूतां विनिहन्ति जायां सूर्यात्मजः सप्तमगश्च रोगान। धत्ते पुनर्दंभधरांगहीनं मित्रस्थवंशेन हृतासुहृच्च ॥ इस व्यक्ति की सुख देने वाली पत्नि की मृत्यु होती है। यह रोगी, ढोंगी, अंगहीन और मित्रों से भी मायावी व्यवहार करने वाला होता है। क्लीबा शनौ - इस की पत्नि को कामेच्छा बहुत कम होती है। यही श्लोक आर्यग्रंथकार देता है।
बृहद्यवनजातक -- आमयेन बलहीनतां गतो हीनवृत्तिनिचित्तसंस्थितः । कामिनीभवनधान्यदुःखितः कामिनीभवनवेगे शनौ नरः ।। यह रोगों के कारण दुर्बल होता है। हीन लोगों के संसर्ग में रहता है। इसे स्त्री, घर या धान्य का सुख नहीं मिलता। ढुंढीराज यहीं कहता है।
नारायण भट्ट -- सुदारा न मित्रं चिरं चारुवित्तं । शनौ धुनगे दम्पती रोगयुक्तौ । अनुत्साहसन्तप्तकृद्धीनचेताः ॥ कृतो वीर्यवान् विव्हलोलोलुपः स्यात् ।। इसे अच्छी पत्नी, मित्र या धन का सुख दीर्घ काल नहीं मिलता। ये पतिपत्नि रोगी रहते है । उदास रहने से दुखी होता है। हीन विचार रहता है।
वीर्यवान नहीं होता। विव्हल और लोभी होता है। मंत्रेश्वर और जागेश्वर का यही मत है।
काशीनाथ -- कलत्रस्थे मित्रपुत्रे सकलत्रौ रुजान्वितः । बहुशत्रुविवर्णश्च कृशश्च मलिनो भवेत् । यह पत्नि सहित रोगी रहता है। शत्रु बहुत होते है। यह दुबला विवर्ण तथा गन्दा होता है।
जयदेव सगदंः प्रियालयधनैर्विसुखः परभाग्यवान् भवति सप्तमगे । यह रोगी होता है । इसे स्त्री, धन और घर का सुख नहीं मिलता। दुसरों पर अवलम्बित रहता है।
लखनौ के नवाब - बदरोजनः कृशांगः कम्फहमश्च मानवो हिर्जः । जानो वा स्याज्जोहलो हफ्तुमखाने यदा भवति ॥ यह दुराचारी, दुबला, कम बोलनेवाला, बुद्धिहीन और सदा पराधीन रहने वाला होता है।
घोलप
--
यह पापी, क्षीण प्रकृति का, बहुत मुर्ख, कुटिल मित्रों से युक्त, बुरी दृष्टि का, रोगी स्त्री के कारण दुखित तथा अन्न, वस्त्र के अभाव से पीड़ित होता है । राजकीय कारणों से इसका बहुत व्यय होता है इसका शरीर सदोष होता है। दो विवाह होते है। वेश्यागमन करता है। विदेश मे घुमता है । हमेशा दुसरो के यहां भोजन करना पड़ता है । इस के नाभि व कान में रोग होता है । यह बहुभार्यायोग भी हो सकता है। सप्तम में शुक्र भी हो तो पत्नि व्याभिचारी होती है
गोपाल रत्नाकर
पाश्चात्य मत -- इस व्यक्ति की पत्नि (या पति) उदास, दुखी, निराश, कम बोलनेवाली होती है। यह स्त्री वियोग (या वैधव्य) का निश्चित योग होता है। शनि द्विस्वभाव राशि में हो तो बहुविवाह होने का योग होता है। शनि राशिबली और शुभ सम्बन्ध में हो तो विवाह से धन और इस्टेट का लाभ होता है। स्त्रियों की कुण्डली में यह शनि किसी विधुर, आयु में काफी बड़े किन्तु सम्पन्न वर से विवाह का योग करता है। साधारणतः सप्तम में शनि
शुभ नहीं होता। विवाह सुख ठीक नहीं मिलता। व्याभिचार की प्रवृत्ति होती है। बदमाश झुठ बोलने वाले विश्वासघातकी लोगों से एकदम शत्रुता होती है। साझीदारी में नुकसान होता है। कानून कचहरी के मामलों में असफल होते है। दुसरों के साथ किये व्यवहारों से बेकार के झगड़े हो कर तकलीफ होती है। राशिबली और शुभ सम्बन्ध में यह शनि अशुभ फल नहीं देता प्रत्युत शनि के विकसित गुणों से युक्त पत्नि मिलती है। विवाह से भाग्योदय होता है। विशेषतः तुला राशि में यह शनि पति पत्नि में अच्छा प्रेम रखता है। चन्द्र साथ में हो तो संसार सुख बिलकुल नहीं मिलता।
भृगुसुत्र -- शरीरदोषकरः कु शकलत्रः वेश्यासम्भोगवान् अति दुःखी । उच्च स्वक्षेत्रगते अनेकस्त्रीसम्भोगी। कुजयुते शिश्नचुम्बनपरः शुक्रयुते भगचुम्बनपरः परस्त्रीसम्भोगी। इसका शरीर दोषयुक्त रहता है। पत्नि कृश होती है । यह वेश्यागमन करता है। बहुत दुखी होता है। शनि उच्च या स्वक्षेत्र में हो तो यह कई स्त्रियों का उपभोग करता है। यहां शनि मंगल से युक्त हो तो वह स्त्री अतिकामुक होती है। शुक्र की युति हो तो वह पुरुष अतिकामुक होते है । परस्त्री से संपर्क रखते हैं।
सप्तम भाव में शनि जातक धोखेबाज, अनेक रोगों से ग्रस्त, अति प्रसन्न, पत्नी-हन्ता,खोखले शरीर व मित्र परिवार की कन्या से प्रेम संबंध रखने वाला होगा।
-मानसागरी
व्यक्ति संदिग्ध चरित्र की महिलाओं से संबद्ध, गरीब, घुमन्तु स्वभावतथा खिन्नमना होगा।
-फलदीपिका
जातक शिथिल स्वास्थ्य वाला, पत्नी वियोगी, नष्ट संपत्ति वाला, भद्दादिखने वाला, पापी व नीच कर्मी होगा।
-सारावली
जातक की पत्नी कृषकाय, स्वयं वेश्यावृत्ति में लिप्त और दुखी होगा।यदि शनि स्वक्षेत्री या उच्च का या केतु से युत है तो जातक का प्रेमसंबंध अनेक औरतों से होगा। मंगल व शनि की युति होने से जातक यौनसुख में पशुवत् व्यवहार करता। है। महिला जातक के प्रसंग में वहपुरुषोडम करा चुंबन और पुरूष होने पर शनि व शुक्र की युति होनें कीस्थिति में स्त्री गुप्तांगो के चुंबन का आदी होगा।
-भृगु
जातक एकाधिक पत्नी वाला, उद्यमी, रोगी, उदर-पीड़ा से ग्रस्त,बहरेपन का शिकार, राजनीतिज्ञ, स्थिर विवाहित जीवन, महत्वाकांक्षी,राजनीति में-सफल, यात्रा का शौकीन, कपटी, विदेशी सम्मान प्राप्त औरप्रतिस्थापना द्वारा कार्य करने वाला होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
उपरोक्त विद्वानों के अनुसार निष्कर्ष रूप में शनि सप्तम भाव मेंजातक को रति क्रीडा की अधिकता की इच्छा से उत्पन्न दुश्चरित्रताप्रदान करता है। सप्तमस्थ शनि से शिक्षा में बाधा, विवाहित जीवन मेंतनाव और जातक को भाग्यहीनता प्राप्त होती है।
शनि से अन्य ग्रहों के परस्पर संबंधो के कारण प्रभावों में न्यूनाधिकताहो सकती है। लग्न, लग्नेश, चन्द्रमा सूर्य व अन्य ग्रहों व भावों की स्थितिसे भी उपरोक्त फलों में परिवर्तन होता है। परन्तु अंतिम फल के विषयमें निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
हमारे विचार -- इस स्थान में आचार्य ने प्रायः अशुभ फल ही बतलाए हैं। वे फल मुख्यतः वृषभ, कन्या, मकर, तुला तथा कुम्भ इन राशियों में मिलते हैं। शुभ फलों का विचार नहीं किया गया है।
हमारा अनुभव -- सप्तम स्थान में शनि निसर्गतः बली होता है अतः इस के शुभ फल भी होने चाहिए । किन्तु केन्द्र में पाप ग्रह अशुभ फल ही देते है। इस पूर्वाग्रह से आचार्यों ने शुभ फलों का वर्णन नहीं किया है। मेष, सिंह, मिथुन, कर्क, वृश्चिक, धनु तथा मीन इन राशियों में शनि सप्तम स्थान में हो तो विवाह एक ही होता है और पति पत्नि मे अच्छा प्रेम रहता है। दिन भर बातुनी झगडे करेंगे लेकिन मन में प्रेम बना रहता है। इस व्यक्ति कि पत्नि पति को देवता समझकर हर समय आपत्ति में भी धैर्य और शांति से काम
चलाती है। संकट में पति को उत्साह देती है। लोगों मे पति का मान रखती है। एकांत में उसके दोष स्पष्ट बतलाकर उन्हें दूर करने का प्रयास करती है। यह प्रखर नीति की इच्छुक व निर्भय होती है। कामेच्छा उसे बहुत कम रहती है। पति के उद्योग मे मदत देती है और उस के स्वास्थ्य की बहुत चिन्ता रखती है यद्यपि पति का आलसी रहना उसे बिलकुल नहीं सुहाता। यह संसार में दक्ष किन्तु अनासक्त होती हैं। घर में सब पर प्रेम और रोब भी रहता। अतिथी सत्कार अच्छा करती है। एलन लिओ ने इस शनि के पत्नि के बारे में फल यों बतलाये है -- 'यह योग विवाह देरी से होने का या उस में बाधा आने का है। किन्तु विवाह होने पर पत्नि गम्भीर और विश्वासू स्वभाव की मिलती है। वह न्यायी, उद्योगी, दूरदर्शी, सावधानी से काम करनेवाली तथा मितव्ययी होती है। यह बहुत उन्नति का योग नहीं है किन्तु विवाह सम्बन्ध विश्वासपूर्ण रहता है। यह पति के प्रति प्रेम शब्दों से नहीं कृति से व्यक्त करती है और पति से भी इस प्रकार का व्यवहार चाहती है।' हमारे अनुभव में सप्तमस्थ शनि से पत्नि कुछ प्रौढ प्रकृति की और धैर्ययुक्त परिपक्व विचारों की होती है। सिंह तथा धनु में -- रोबदार, गोल चेहरा होता है । कुछ पुरुष जैसा किंन्तु मोहक आकार होता है । कद कुछ नाटा रहता है। वर्ण सावला, वाणी मधुर, चेहरा हंसमुख और हाव-भाव युक्त होता है। मेष में ऊंचा कद, छरहरा बदन, चेहरा लम्बा सा, आंखे छोटी, नाक नुकीली और केश विपुल होते हैं। वृषभ, कन्या तथा मकर में चेहरा चौकोर, कुछ बेढंगा स्वभाव, वर्ण गोरा किंन्तु फीका, केश कम और बोलना भी कम होता है। मिथुन, तुला, कुम्भ में चेहरा गोल, तेजस्वी, स्थल, केश रेशम जैसे चमकिले किन्तु विरल, वर्ण कुछ गोरा, बोलना बहुत मंजा हुआ तथा स्वभाव कुछ झगड़ालू होता है। कर्क, वृश्चिक, मीन में - चेहरा कुछ लम्बा, रोबदार, केश चमकिले, रुखे और लम्बे तथा मुद्रा गम्भीर होती है । इस शनि से पत्नि अच्छे स्वरुप और स्वभाव की मिलने पर आर्थिक स्थिति डांवाडोल रहती है। व्यापार में कमीबेशी चलती रहती है। आर्थिक कष्ट भी रहता है। किसी तरह संसार चलता है। व्यवसाय या नौकरी में परिवर्तन होते है। सन्तती कम होती है। इस व्यक्ती को २८ वें वर्ष से जीविका के साधन मिलते है। ३६ वें वर्ष से भाग्योदय शुरु होकर ४२ वें वर्ष में अच्छी प्रगती होती है। वृषभ, कन्या, मकर, कुम्भ में - दो विवाह होते है। दूसरे विवाह के बाद भाग्योदय होता है। इनकी पत्नियां साधारण ही रहती है - स्वार्थी, संसार में आसक्त, झगड़ालू तथा संकुचित स्वभाव की होती हैं। इसलिए इन्हें स्त्रीसुख अच्छा नही मिलता। तुला में स्त्री अच्छी किन्तु आर्थिक स्थिती मामूली रहती है। सप्तमस्थ शनी से साधारणतः खाने की इच्छा और कामेच्छा अधिक रहती है। मेष, मिथुन, सिंह, धनु, मकर तथा कुम्भ में शिक्षा पूरी होती है। कानून के क्षेत्र में (वकील, बैरिस्टर, जज मजिस्ट्रेट आदि के रुप में) सफलता मिलती है। अन्य क्षेत्रों में यश नहीं मिलता। वृषभ, कन्या, तुला, कर्क, वृश्चिक तथा मीन में काँट्रॅक्टर, प्लम्बर, खानों का काम, कोयला, लोहा, लकडी आदि के व्यापारी, मुद्रक, विदेशी माल के एजेन्ट आदि के रुप में यश मिलता है। मिथुन, कन्या, धनु तथा मीन में ज्योतिषी, शिक्षक, प्राध्यापक, गणितज्ञ, सम्पादक, मुद्रक आदि (ज्ञान सम्बन्धी) के रुप में यश मिलता है। यह योग क्वचित गोद लिये जाने का है। माता और कभी कभी पिता की मृत्यु २० वें वर्ष तक होती है। प्रायः बचपन में ही माता या पिता का वियोग होता है। कभी सौतेली मां से सम्बन्ध आता है। पत्नि की मृत्यु ५२ से ५५ वें वर्ष तक होती है। मिथुन, तुला तथा कुम्भ में सन्तति में काफी अन्तर रहता है। नौकरी और व्यवसाय दोनों से आजीविका चलती है। तुला में -द्विभार्यायोग हुआ तो लाभ होता है अन्यथा स्थिति साधारण रहती है। सप्तमस्थ शनि का साधारण फल यह है कि पत्नि में कामेच्छा अधिक नहीं होती। वृषभ तथा कन्या में अविवाहित रहने की ओर प्रवृत्ति होती है। साधारणतः सप्तमस्थ शनि हो तो वह व्यक्ति पत्नि के पहले मृत होता है । लग्न में शनि से पत्नि की मृत्यु पति से पहले होती है या पत्नि हमेशा बीमार रहती है। दोनों का आचरण अच्छा रहता है। मेष, सिंह, धनु, मिथुन तथा तुला में यह शनि हो तो उस व्यक्ति का स्वभाव उदार, आनन्दी स्नेहिल, खर्चीला, मिलनसार, क्वचिंत क्रोधी, लोगों को मदद करने वाला तथा परस्त्री से विन्मुख होता है । कुछ दुष्ट, हठी, गर्वीला और खुद को बहुत अच्छा और दुसरों को मूर्ख मानने वाला यह व्यक्ति होता है। पसीने से कपडे हमेशा मैले रहते हैं और जल्दी फटते हैं। इसे खाने पीने के लिए और अन्य वस्तुओं में भी ऊंची चीजों की इच्छा रहती है। कन्या, तुला, धनु में सन्तति आयु के उत्तरार्ध में होती है। सप्तमस्थ शनि के कुछ प्रसिद्ध उदाहरण - स्व. नरसिंह चिन्तामणि केलकर (धनु), विवाह (एक ही हुआ) । स्व. शिवराम महादेव परांजपे (कन्या) । सरदार बाबासाहेब मुजुमदार, पुणे (मिथुन) (ये गोद लिये गये थे, विवाह एक ही हुआ)। श्रीमन्त प्रतापसेठ अंमलनेर (मीन) (गोद लिये जाने से वैभव प्राप्त हुआ, विवाह एक ही हुआ) । ज्योतिषी वसन्त लाडोबा म्हापणकर । (मीन) | श्री. एम. जी. ओक, मुम्बई (मकर) (वुडस्टाक टाईपराइटर स्कूल में शिक्षक, दो विवाह हुए, जन्म वैशाख कृ. १ शक १८२१, इष्टघटी १४- ५०) । डॉ. प्रो. रिचारिया, नागपुर (मीन) (जन्म ता. १९-३-१९०८, अच्छे वैज्ञानिक थे, कपडा बनाने की नई पद्धति की खोज की है, कृषि शास्त्र में तज्ञ थे, विवाह एक हुआ)। प्रो. नारके (वृषभ) (ये भूगर्भ विज्ञान के विद्वान थें)। स्व. रावजी रामचन्द्र काले, सातारा (वृश्चिक) (वकील थे, विवाह एक हुआ, सन्तति नहीं थी ) । सर फिरोजशाह मेहता (मकर) (मुम्बई के प्रख्यात राजनीतिज्ञ, क्रानिकल पत्र के सम्पादक, दूसरे विवाह के बाद भाग्योदय हुआ)। श्री. ताम्बे (मकर) (ये कुछ समय के लिये मध्यप्रान्त के गवर्नर हुए थे, दूसरे विवाह के बाद भाग्योदय हुआ। ज्योतिषी होराभूषण गणेश प्रभाकर दीक्षित, कुण्डली वर्णन के लेखक तथा ज्योतिषी यशवन्तराव प्रधान, जातकमार्गोपदेशिका के सम्पादक, दोनों की कुण्डलियां प्रायः समान है। सप्तम में मिथुन में शनि है l ज्योतिष शिक्षक संपादक के रूप में अच्छा काम किया l
सप्तमस्थ शनि वृद्धिकारक होता है। इसलिए उसे 'वृद्धिकर' नाम से संबोधित किया जाता है। यह सच होते हुए भी सप्तमस्थ शनि इस बात केलिए अपवाद है। प्रायः सभी ज्योतिषाचायों ने सप्तम स्थान स्थित शनि कोवैवाहिक जीवन की दृष्टि से अशुभ माना है। सप्तम स्थान में शनि हो तोपत्नी के साथ मतभिन्नता रहती है। स्त्री जातक की कुंडली में सप्तम स्थानमें शनि हो तो पति के साथ मतभेद रहते हैं। जातक पत्नी द्वारा अपमानित होताहै। पत्नी सुख लंबे समय तक प्राप्त नहीं होता, पत्नी सदाचारी नहीं रहती।किसी-न-किसी कारण से दांपत्य जीवन का ह्ास होता है। जातकपारिजातकार आचार्य वैद्यनाथ के अनुसार ऐसे जातक की पत्नी के वक्षउन्नत होते हैं। महर्षि गर्ग के अनुसार पत्नी में कामेच्छा का अभाव रहता है।महर्षि भृगु के मतानुसार मकर या कुंभ राशि का शनि सप्तम स्थान में होतो जातक के अनेक स्त्रियों से संबंध रहते हैं। सप्तमस्थ शनि मंगल के साथहो तो जातक कामातुर रहता है। अन्य राशियों का शनि सप्तम स्थान में होतो जातक का परस्त्रीगमन एवं वेश्यागमन की ओर झुकाव रहता है।सप्तम स्थान में शनि हो तो विवाह में अड़चनें उत्पन्न होती हैं। विवाह विलंबसे होता है। जातक स्वयं नास्तिक, निर्दयी, हिंसक एवं गंदा रहता है। आर्थिकस्थिति ठीक-ठाक रहती है। प्रवास काफी होते हैं, भागदौड़ रहती है एवं अथकप्रयासों से धनसंग्रह होता है। उसके शत्रु अधिक रहते हैं, मित्रों से अपेक्षितसहयोग प्राप्त नहीं होता।
यवन ज्योतिषविद भी उपरोक्त फलों से सहमत हैं। जातक को कमबोलनेवाली, उदास वृत्ति की पत्नी प्राप्त होती है। पत्नी सुख में न्यूनता रहतीहै। मिथुन, धनु, मीन इन द्विस्वभाव राशियों में शनि सप्तम स्थान में हो तोजातक के एक से अधिक विवाह होते हैं। मकर, कुंभ, तुला में से किसी राशिका शनि सप्तम स्थान में और शुभ युक्त हो तो विवाह में धन प्राप्त होताहै। पत्नी अच्छी मिलती है, विवाह के बाद भाग्योदय होता है। पति-पत्नी मेंपरस्पर स्नेह रहता है। तुला का शनि इस विषय में अधिक शुभ फल प्रदानकरता है। शनि के साथ चंद्र सप्तम स्थान में हो तो गृहस्थी का सुख नहींमिलता। साझे के व्यवसाय एवं कोर्ट-कचहरी के मामलों में सफलता प्राप्त नहींहोती।
स्त्री जातक की कुंडली में सप्तम स्थान में शनि हो तो काफी उम्न होनेके बाद विवाह होता है या किसी विधुर के साथ उसका विवाह होता है।
।
ससम शनि-लग्नकुंडली के ससम भाव में शनि विद्यमान हो तो जातक क्रोधी, निर्धन (औसत), आवारागर्द, नीचकर्मा, आलसी, कामुक तथा काम टालने
की प्रवृत्ति वाला होता है। ऐसे जातक का विवाह विलम्ब से होता है (अत्रिवाहित
रहना भी सम्भव है) वैवाहिक जीवन सफल नहीं रहता, अलगाव की पूर्ण सम्भावना
होती है। अपने से अधिक आयु वाले परलिंगी से अवैध सम्बन्ध भी सम्भव होते हैं।
सातवें भाव का शनि दिक्बली होता है। अतः जन्म के समय गरीब हो तो भीजातक आयु बढ़ने के साथ-साथ धनवान होता जा सकता है (यदि शनि सतमेश
भी हो तो अपने अशुभ फलों को सातवें घर के लिए कम कर लेता है)। ऐसे जातक
के पास अच्छी कमाई का जरिया बनता है, परन्तु जायदाद के सुख से जातक वंचित
रहता है। प्रायः उसके पास अपने नाम से जायदाद/मकान नहीं होते। 'लालकिताब' के अनुसार ऐसा जातक अगर पराई औरतों के चककर में पड़े तो उसकी
संतान के लिए अशुभ रहता है। अतः उसे सावधान रहना चाहिए क्योंकि सातवां
शनि ऐसे कामों के लिए प्रेरित करता रहता है।
‘लाल किताब' के अनुसार सप्तम भाव में शनि हो तो विवाह देर से होता है
या अपने से बड़ी उम्र की पत्नी मिलती है। अथवा विजातीय (अपने से नीची जाति
की अधिकतर) होती है। स्त्री जातकों में सातवां शनि बूढ़े पति या विधुर से विवाह
कराता है। पति यद्यपि प्रेम करता है परन्तु वैधव्य भोगना पड़ता है। जलराशि याअग्निराशि में शनि हो तो जीवनसाथी सुहृद होता है। पति-पत्नी में वैमनस्य व
वाक्युद्ध तो होता है किन्तु मेल हो जाता है। जलराशि का शनि हो तो गृहस्थ सुख
सप्तम भावः सप्तम भाव का शनि द्विस्वभाव राशि में हो तो कई विवाहहोने की सम्भावना रहती है। पृथ्वी राशि का शनि हो तो पत्नी का रूप, रंग,नयन-नक्श साधारण होते हैं। अग्नि राशि का हो तो स्त्री सुंदर, मोहक औररोबदार होती है। वायु राशि में हो तो पत्नी गोल चेहरे वाली, तेजस्वी, गौरवर्णीलेकिन स्वभाव की उग्र होती है। जल राशि में शनि हो तो पत्नी सभी प्रकार सेअच्छी मिलती है। लेकिन विवाहोपरान्त अर्थाभाव बना रहता है। येन-केन-प्रकारेणकार्य चलता रहता है लेकिन व्यवसाय हो तो उसमें हानि, नौकरी हो तोजल्दी-जल्दी स्थानान्तरण होते रहते हैं। पृथ्वी राशि का शनि द्विभार्या योगबनाता है तथा दूसरे विवाह के पश्चात कार्य-व्यवसाय में स्थिरता आती है।यह अलग बात है कि पत्नी का स्वभाव मधुर नहीं होता। अग्नि राशि या वायुराशि का शनि सप्तमस्थ हो तो शिक्षा उत्तम और व्यक्ति वकील, जज जैसेमहत्त्वपूर्ण पद पर आसीन होता है। पृथ्वी या जल राशि में शनि हो तो शिक्षाकम होती है लेकिन जातक ठेकेदारी, कोयला, लोहा आदि के व्यवसाय सेअच्छा लाभ प्राप्त कर लेता है। स्त्री की कुण्डली में शनि द्विस्वभाव राशि में होतो उसे आयु में काफी बड़ा अथवा विधुर पति मिलता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक विद्वान, स्वपरिश्रमसे प्रगति करनेवाला, कम बोलनेवाला एवं कठोर होता है। श्वसुर के साथ मधुर संबंध नहीं रहते। पत्नी सुख में न्यूनता रहती है, संतानोत्पत्ति में बाधा रहतीहै। पत्नी सदाचारिणी रहती है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक विद्वान,उद्यमी, कम बोलनेवाला परंतु कटुभाषी एवं कठोर होता है। श्वसुर से अच्छेसंबंध नहीं रहते, बचपन कष्टमय रहता है। चोरी करने की एवं दुराचारी वृत्तिरहती है। मृत्यु राजकीय कार्य में या सजा के कारण होती है। जातक कामातुररहता है। पत्नी के अलावा अन्यत्र शारीरिक संबंध रहते हैं। पत्नी सुंदर होतेहुए भी वैवाहिक जीवन दुखभरा रहता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक को सुंदरपत्नी मिलती है, फिर भी वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहता। स्वयं जातक,उसकी पत्नी एवं मां व्यभिचारिणी होती है।
महर्षि गर्ग के मतानुसार जातक का अपनी साली के साथ एवं स्त्री जातकका अपने देवर के साथ अनुचित संबंध रहता है। पत्नी वंध्या होने की संभावनाभी रहती है। संतान सुख में बाधा और चोरी करने जैसी दुष्प्वृत्तियां जातक मेंपाई जाती हैं।
4. कर्क-कर्क राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक को पत्नीसुख प्राप्त नहीं होता। जातक अक्सर विवाह ही नहीं करता, विरक्त रहता है।यदि विवाह हो जाए तो पत्नी सुंदर, कलाप्रवीण किंतु शिथिल चरित्र की वअल्पायु मिलती है। पत्नी बांझ रहने से संतान सुख नहीं मिलता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक शास्त्रविद्यामें प्रवीण एवं निशानेबाज रहता है। पत्नी सुंदर एवं गुणवान होती है लेकिनउसका सुख लंबे समय तक नहीं मिलता। जातक के अविवाहित रहने की भीसंभावना रहती है। स्वास्थ्य कमजोर तथा कफ एवं श्वास रोग से पीड़ित रहताहै।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक की पत्नीखूबसूरत होती है। जातक कठोर, शस्त्रविद्या पारंगत होता है। पत्नी का सुखपूर्णतया प्राप्त नहीं होता।
7. तुला-तुला राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक कठोर स्वभावी,प्रभावी, समाज में प्रतिष्ठित, यशस्वी एवं कामातुर होता है। पत्नी सुंदर एवंसुखदायिनी होती है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक संपन्न होता है। पत्नी सुंदर, चतुर एवं आज्ञाकारिणी होती है।
9. धनु-धनु राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक कपटी, घमंडी, क्रूर, नास्तिक एवं अतिकामातुर रहता है। दुराचार या स्त्री संसर्ग के कारण उसकी मृत्यु होती है। पत्नी सुंदर एवं आज्ञाकारिणी रहती है। फिर भी जातकके साथ उसकी नहीं बनती।
10. मकर-मकर राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक सफल,दीर्घायु एवं तेजस्वी रहता है। उसके पेट में कोई बात नहीं पचती। विवाह एकसे अधिक होते हैं। जातक अपने चरित्र की ओर ध्यान न दे तो दुराचार केकारण मृत्यु होती है। त्वचा रोग, बबासीर, भगंदर, कैन्सर एवं संसर्गजन्य रोगोंसे जातक पीड़ित रहता है।
11. कुंभ-कुभ रशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक संपन्न होताहै। उसे अति कामातुर पत्नी प्राप्त होती है परंतु पत्नी में जननशक्ति का अभावरहता है या गर्भपात होते हैं। जातक नशीली चीजों का सेवन करता है। उसेवाद-विवाद या लड़ाई-झगड़ा करने की आदत रहती है। पेट में कोई बात नहींपचती। यवनाचार्य एवं महर्षि लोमश के अनुसार जातक दीर्घायु होता है।
12. मीनमीन राशि का शनि सप्तम स्थान में हो तो जातक परिश्रमी,गुणवान, संपन्न एवं सुखी परंतु झगड़ालू व नशेबाज रहता है। पत्नी सुंदर,सदाचारिणी, मधुरभाषिणी एवं अति कामातुर मिलती है। पत्नी सुख लंबे समयतक नहीं मिलता। महर्षि लोमश एवं मंत्रेश्वर के मतानुसार पत्नी में कोईशारीरिक दोष होने से संतान सुख प्राप्त नहीं होता।
1. स्त्री से लोहे की वस्तु न खरीदने देवें।
2. सरसों का दीया करें।
3. भैंस न पाले।
4. पांच नारियल पानी में बहावें।
===========================8) अष्टम् भाव - अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
अष्टम स्थान में शनि के फल
आचार्य -- स्वल्पात्मजो निधनगे विकलेक्षणश्च। इसे पुत्र कम और आंखे क्षीण होती हैं।
कल्याण वर्मा -- कुष्ठभगन्दर रोगैरभितप्तं हस्वजीवितं निधने । सर्वारम्भविहीनं जनयति रविजः सदा पुरुषम् ।। यह कोढ़, भगन्दर आदि रोगों से पीड़ित, अल्पायु और निरुत्साही होता है।
पराशर -- अष्टमे व्याधिहानिं च । रोग होते हैं तथा हानि होती है।
वसिष्ठ -- इन के विचार पहले मंगल विचार में स्पष्ट किये गए हैं।
गर्ग -- विदेशतो नीचसमीपतो वा सौरिर्मृति रन्ध्रगतो विधत्ते । हृच्छोककासामयवद्विषूचीनानाविधं रोगगणं विधाय ॥ विदेश में या समीप के किसी हीन स्थान में मृत्यु होती है। हृदय को हुआ शोक, खांसी, कॉलरा आदि नाना रोगों के कारण मृत्यु होती है।
काश्यप -- बुभुक्षया लंघनेन तथा प्रायोपवेशनात । बन्धुवर्गादरिकरात् क्षयतः पृथुदद्रुतः ।। चटकैर्व्रणकोपेन हयपादाभिघाततः। हस्तितः खरतो मृत्युर्मन्दे स्यान्मृत्युभावगे । शनि अष्टम स्थान में हो तो नीचे लिखे अनुसार मृत्यु होती है। - - मेष में भूख से, वृषभ में लंघन से, मिथुन में उपवास से, कर्क में रिश्तदारों से, सिंह में शत्रुओं के हाथ से, कन्या में क्षय से, तुला में बड़ी खुजली से, वृश्चिक में चटकों से, धनु में व्रणों से, मकर में घोडे की लात से, कुम्भ में हाथी से और मीन में गधे से ।
ज्योतिष श्यामसंग्रह -- इस में काश्यप के श्लोकों में ही कुछ परिवर्तन इस प्रकार किया गया है - बुभुक्षया लंघनेन तथाच बहुभोजनात्। संग्रहण्याः पण्डुरोगात् प्रमेहात् सन्निपाततः । कटकै व्रणकोपेन हस्तिपादाभिघाततः । हयतः खरतो मृत्युर्मन्दे स्यात् मृत्युभावगे । इसमें बहुत खाना, संग्रहणी, पण्डुरोग, प्रमेह, सन्निपात, कांटा चुभना, ये कारण अधिक गिनाए गए हैं।
बैद्यनाथ -- शूरो रोष्यग्रगण्यो विगतबलधनी भानुजे रन्ध्रयाते । मन्दे लग्नगतेऽधवाष्टमगते तत्पाकभुक्ती मृतिः ।। यह शूर, बहुत क्रोधी, दुर्बल और निर्धन होता है। लग्न में या अष्टम में शनि हो तो उस की दशा काल में मृत्यु होती है।
नारायण भट्ट -- वियोगो जनानां त्वनौपाधिकानां विनाशो धनानां स को यस्य न स्यात् । शनौ रन्ध्रगें व्याधितः क्षुद्रदर्शी तदग्रे जनः कैतवं किं करोतु ॥ लोगों का वियोग और धन की हानि होती है। रोगी रहता है। क्षुद्र दृष्टि होती है। इसे कोई धोखा नहीं दे सकता।
बृहद्यवनजातक -- कृशतनुर्ननु दद्भुविचर्चिका प्रभवतो भयतोषविवर्जितः। अलसतासहितो हि नरो भवन्निधनवेश्मनि भानुसुते गते । यह कृश, खुजली फोडों से दुःखित, असन्तुष्ट, निर्भय, आलसी होता है।
आर्य ग्रन्थ शनैश्चरे चाष्टमगे मनुष्यो देशान्तरे तिष्ठति दुःखभागी। चौर्यापराधेन च नीचहस्ते पंचत्वमाप्नोत्यथ नेत्ररोगी । यह विदेश में रहता है और दुखी होता है। चोरी के अपराध में दण्ड भोगता है। नीच व्यक्ति के हाथों मृत्यु होती है। इसे नेत्र रोग होता है।
काशीनाथ क्रोधातुरोऽष्टमे मन्दे दरिद्रो बहुरोगवान् । मिथ्याविवाद-कर्ता स्याद् वातरोगी भवेन्नरः ॥ यह बहुत क्रोधी, दरिद्री, निरर्थक विवाद करने वाला तथा वात रोग से पीडित होता है।
जयदेव--कृशतनुः सगदोऽलस भाग्वि दृश्विगत तोष सुखोऽष्टमगे शनौ। यह दुर्बल, रोगी, आलसी, असन्तुष्ट, दुखी होता है। इस को आंखों का कष्ट रहता है।
जागेश्वर -- परं कष्टभाक् क्रूरवक्ता प्रकोपी भवेत्क्षुद्रको धान्यकं नैवं सत्वं । परं हासवार्तादिकं किं तदग्रे यदा मन्दगो मृत्युगो वै नराणाम् ।। यह क्रोधी, निष्ठुर बोलने वाला, कष्टयुक्त, क्षुद्र स्वभाव का और कभी हंसी मजाक में शामिल न होने वाला होता है।
मन्त्रेश्वर -- शनैश्चरे मृतिंस्थिते मलीमसोऽर्शसोऽवसुः । करालधीर्बुभुक्षितः सुहृज्जनावमानितः ।। यह गंदा रहने वाला, निर्धन, भूखा, दुष्ट बुद्धि का, मित्रों द्वारा अपमानित तथा उस से पीडित रहनेवाला होता है। लखनौ के नवाब बीमारश्च हरीशो दगलबाजश्च दोजखी मनुजः । जोहलो हस्तमखाने भवति बखीलः कृपालसो भीरुः ॥ यह रोगी, आलसी, विश्वासघातक, पापी, डरपोक, कंजूस होता है।
घोलप यह दुष्ट, दुखी, दुष्टों की संगति से निन्दित, सज्जनों से दूर रहने वाला, अल्पवीर्य, जड़ होता है। इस की दृष्टि अच्छी नहीं होती। शरीर में रक्त कम होता है।
गोपाल रत्नाकर -- यह विवाद करने वाला, दरिद्री, नौकरी से जीविका चलाने वाला, शूद्र स्त्री से संपर्क रखने वाला होता है। इसकी नाभि बडी होती है। नेत्ररोग, कोढ़, गांठे इन से कष्ट होता है। पुत्र कम होते है।
हरिवंश -- स्यादायुस्थे दद्रयुक्तो दरिद्री धातुहीनो दुर्बलांगो रुजानां । सुतौ धूर्तों भीरुरालस्यधीरो भानोः पुत्रे निन्द्यमार्गप्रगामी ॥ यह दरिद्री, दुर्बल, डरपोक, आलसी तथा निन्दगीय मार्ग का अवलम्बन करने वाला होता है। खुजली व धातु की कमी से इसे कष्ट होता है। इस के पुत्र धूर्त होते हैं।
पाश्चात्य मत -- यह मकर, कुम्भ या तुला में शुभसम्बन्धित हो तो विवाह से आर्थिक लाभ होता है। वारिस के रुप में जमीन आदि इस्टेट प्राप्त होती है। उसकी देखभाल भी अच्छी करते हैं। अष्टम में बलवान शनि दीर्घायु देता है। नैसर्गिक वृद्धत्व से ही मृत्यु होती है । अष्टम में पीड़ित शनि विवाह से लाभ नहीं कराता। दहेज आदि कुछ नहीं मिलता। विवाह के बाद आर्थिक संकट आते हैं। दीर्घकाल रोग से कष्ट हो कर मृत्यु होती है। पूर्वार्जित धन नहीं मिलता। कर्क या मेष में अशुभ शनि से यह फल विशेष रुप में मिलता है। पीडित शनि से अकस्मात मृत्यु का योग होता है। जीवन में हमेशा निराशा होती है। गूढ शास्त्रों का अभ्यास करते हैं।
भृगुसूत्र -- त्रिपादायु : दरिद्री शूद्रस्त्रीरतः सेवकः । उच्चे स्वक्षेत्रे दीर्घायुः। अरिनीचगे भावाधिपे अल्पायुः कष्टान्नभोगी ॥ यह ७५ वर्ष की आयु पाता है। दरिद्री, नौकरी करने वाला, शुद्र स्त्री से सम्पर्क रखनेवाला होता है उच्च में या स्वक्षेत्र में शनि हो तो दीर्घायु होता है। यह शत्रु ग्रह की राशि में या नीच में हो तो अल्पायु होता है। कष्ट पूर्वक उपजीविका चलती है।
अष्टम भाव में शनिजातक नेत्ररोगी होगा। वह कठिनाईयों का सामना करने वाला,जन्मभूमि से दूर रहने वाला होगा। उसकी हत्या नीच जाति, निकृष्टव्यक्ति के कारण या चोरी की सजा भुगतने के कारण होगी।
-मानसागरी
व्यक्ति गंदा (मैला-कुचैला), बवासीर रोग से ग्रस्त, गरीब, स्वभावतःक्रूर, भूखा और मित्र-विहीन होगा।
-फलदीपिका
वह दरिद्र नीच जाति की महिलाओं से मेलजोल रखने वाला, दूसरोंकी सेवा द्वारा आजीविका कमाने वाला तथा 75 वर्ष की आयु प्राप्तकरेगा।
यदि शनि स्वक्षेत्री या उच्चस्थ है तो जातक पूर्णायु होगा। यदिअष्टमेश नीचस्थ या शत्रुक्षेत्री है तो वह अल्पजीवी, भोजन के अभाव सेत्रस्त व दरिद्र होगा।
-भृगु
अष्टम भाव में शनि को बुरा बताया गया है। उससे कुष्ठगंग, भगदरऔर अन्य गुदारोग, अल्पायु आदि होता है। जातक अपने कामों मेंअसफल होगा।
-सारावली
जातक निराश, शराबी और बड़े पेट व थुलथुल शरीर वाला होगा।शनि के अशुभयुत होने पर वह अल्प संतति, अन्य जाति की महिलाओंसे मैत्री रखने वाला, उदर पीडा से ग्रस्त, दृष्टि दोष वाला, निराशावादी,चतुर, अच्छा जानकार, अपवित्र, बेईमान, कृतध्न व क्रूर होगा। वहदीर्घजीवी हो सकता है परन्तु विष से भय और दमें व अपच रोग सेपीडित होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
शनि के पापाक्रान्त न होने पर और अष्टमेश की शुभ स्थिति होने परजातक दीर्घायु होता है। परन्तु कल्याण वर्मा अल्पायु बताते हैं-‘कारकोभावनाशाय' को ध्यान में रखकर, यह संगत जान पड़ता है परन्तु शनि केलिए यह लागू नहीं होता। अन्य विद्वानों के अनुसार अष्टमस्थ शनि पूर्णायुप्रदान करता है।
हमारे विचार -- प्राचीन लेखकों ने इस स्थान में शनि के फल सब अशुभ ही बतलाए हैं। वे मुख्यतः वृषभ, कन्या, कुम्भ, धनु, मीन तथा मिथुन इन राशियों के हैं। वृषभ में हो तो तुला लग्न और धनु में हो तो वृषभ लग्न होता है । इन लग्नों के लिये शनि शुभयोगकारक होने पर भी अष्टम में सुखदायक नहीं हो सकेगा। कन्या में हो तो यह व्ययेश होता है अतः दुःख और दारिद्र का ही फल मिलेगा। कुम्भ और मीन राशि में हो तो सप्तम और षष्ठ का स्वामी होता है। वृश्चिक में हो तो चतुर्थ और तृतीय का स्वामी होता है अतः दुःखद फल मिलता है।
हमारा अनुभव -- अष्टम स्थान विनाश सूचक है और शनि ग्रह यह भी आपत्तियों द्वारा विरक्ति का जन्मदाता ही है। अतः इन दोनों का संयोग दुःखदायी होता ही है। मेष, सिंह, तुला, वृश्चिक तथा मकर में शनि से अधिकार, सम्पति या सन्तति में से किसी एक के बारे में कष्ट रहता है। सन्तति और सम्पत्ति दोनों की प्राप्ति नहीं होती। सिर्फ कर्क राशि में दोनों
बातों से सुख मिलता है। आकस्मिक धनलाभ होता है। धनु राशि में विवाह के बाद भाग्य क्षीण होता जाता है क्यों कि यह भाग्येश अष्टम में होता है (भाग्येशो मारकस्थेषु जातभाग्यनिरर्थकं) । मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, धनु और मकर में मुख्यतः स्वतन्त्र व्यवसाय से जीविका चलती है। अन्य राशियों में नौकरी का योग होता है। अष्टमस्थं शनि पूर्व आयु में दुःखदायी हो तो वृद्धावस्था में सुख देता है और पूर्व आयु में सुख मिले तो वृद्धावस्था दुःखपूर्ण होती है। इस के विपरीत चतुर्थ के शनि से प्रारम्भ में कष्ट, फिर कुछ सुख और वृद्धावस्था में पुनः कष्टपूर्ण में स्थिति रहती है । अष्टमस्थ शनि से पत्नि अच्छी मिलती है। आपत्ति में धैर्य रखती है तथा घर की गुप्त बातें बाहर नहीं बतलाती है।
अब मृत्युयोग के बारे में विचार करेंगे। (१) शनि और राहु दोनों का भ्रमण २।४।६।८।१२ इन स्थानों से हो रहा हो (२) जन्मस्थ रवि चन्द्र दूषित हो (३) गोचर भ्रमण में गुरु का रवि पर से भ्रमण हो रहा हो अथवा केन्द्र में से गुरु का भ्रमण हो (४) चन्द्र से गुरु का युतियोग हो (५) धनेश तथा सप्तमेश पर से शनि का भ्रमण हो रहा हो (धनेश तथा सप्तमेश एक ही स्थान में हो तो उस स्थान में से शनि का भ्रमण मृत्युयोग कारक है, अलग अलग तो एक में शनि और दूसरे में गुरु का भ्रमण यही योग करता है (६) २४|६|७|८ इस स्थानों के स्वामी के ग्रह की दशा चल रही हो तो मृत्युयोग होता है। जन्म समय शनि केन्द्र में हो तो गोंचर शनि के उपर्युक्त स्थानों में भ्रमण से मृत्युयोग नहीं होता। इस समय शनि का भ्रमण १।३।५।७।९।१०।११ इन स्थानों से होता है । अष्टमस्थ शनि मृत्यु के समय सावधान स्थिति रखता है। इन । व्यक्तियों की वासनाएं क्षीण होने से मृत्यु के समय का आभास इन्हें कुछ समय पहले मिल जाता है । मेष, सिंह, कर्क, वृश्चिक, मकर तथा तुला दीर्घ आयु मिलती है। पश्चिमी साहित्य में राफेल द्वारा लिखित मेडिकल एस्ट्रॉलाजी मृत्युयोग के बारे में उपयुक्त ग्रन्थ है। यह शनि ५४ वें वर्ष के बाद में अशुभ स्थिति बतलाता है। विवाह के बाद स्थिती बिगड़ती है। कर्क तथा तुला में इस के अपवाद पाए जाते है l पत्नी का स्वाभाव अच्छा होता है l साधारणतः चतुर्थ व अष्टम में पाप ग्रह हो तो मृत्यु के समय सावधान स्थिति रहती है तथा मृत्यु के समय का आभास पहले होता है। इन स्थानों मे शुभ ग्रह हो तो मृत्यु के समय बेहोशी रहती है। भाग्योदय ३६ वें वर्ष के बाद होता है। अष्टमस्थ शनि बहुत दूषित हो तो कारावास का योग होता है। घरबार नष्ट होना, रोगी रहना, पति पत्नि में अनबन होना ये फल मिलते हैं। ६ वें वर्ष बडा नुकसान होता है। माता-पिता की मृत्यु अथवा पिता पर आर्थिक संकट इस रूप में नुकसान होता है। इसी तरह ३२ वा वर्ष भी आपत्ति कारक होता है।
अष्टम स्थान में शनि हो तो जातक भगंदर, बवासीर, गुप्त रोग, नेत्रविकार,कुष्ठरोग, खांसी, हैजा, हृदयरोग, खाज-खुजली, वातरोग, प्रमेह में से किसीरोग से पीड़ित रहता है। फलस्वरूप स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। महर्षि भृगु केअनुसार तुला, मकर या कुंभ राशि में से किसी एक राशि का शनि अष्टमस्थान में हो तो जातक दीर्घायु होता है। शनि अगर नीच का या शत्रु क्षेत्र काअष्टम स्थान में हो तो जातक की आयु कम रहती है।
कुछ विद्वानों के अनुसार मेष राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो शत्रुके कारण, वृषभ राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो भूख के कारण, मिथुनका शनि अष्टम स्थान में हो तो अधिक खाने से या भूख के कारण, कर्कराशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो संग्रहणी रोग से या रिश्तेदारों के हाथों,सिंह राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो शत्रुओं के हाथों या पीलिया रोगके कारण, कन्या राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो प्रमेह या तपेदिक केकारण, तुला राशि का शनि अष्टम में हो तो सन्निपात, लकवा याखाज-खुजली के कारण, वृश्चिक राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो कांटाचुभने या कीड़े के काटने से, धनु एवं मकर राशि का शनि अष्टम स्थान में
होने पर फोड़ों के कारण, मीन का शनि अष्टम में हो तो गधे के कारण मृत्युहोती है। अनेक जन्मकुंडलियों का अध्ययन करने पर यह फलित हमारी राय में सटीक नहीं बैठता।
जातक के संतान कम रहती है। पुत्र संतान होने में बाधा रहती है। स्त्री जातककी कुंडली में अष्टमस्थ शनि के कारण गर्भ में दोष रहता है।
जातक गर्ममिजाज, झगड़ालू किंतु चतुर रहता है। आर्थिक नुकसान के मौकोजीवन में कई बार आते हैं। आर्थिक स्थिति मध्यम रहती है। भाई-बहनों सेएवं रिश्तेदारों से मधुर संबंध नहीं रहते। उसे जन्म स्थान से दूर रहना पड़ताहै। शनि पापगृही हो तो चोरी करने जैसे दुर्गुण जातक में समाविष्ट होते हैं।फलस्वरूप इसके कारण दंड या सजा हो सकती है।
यवन ज्योतिषविदों के अनुसार भी उपरोक्त फल ही प्राप्त होते हैं।
पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार अष्टमस्थ शनि जातक को दीर्घायु बनाता है।विवाह के कारण या वसीयत के माध्यम से धन प्राप्त होता है।
अष्टम भाव-शनि जन्मकुंडली में आठवें भाव में हो तो जातक दीर्घायु,अस्थिर बुद्धि/मूडी, बातूनी, कायर, धोखेबाज/झूउ बोलने वाला, गुमांग रोगी यागुद्दा रोगी, विद्वान होता है। ऐसे जातक को कुष्ठ रोग सम्भव होता है (यदि बुध,मंगल व चंद्र सबल हों तो नहीं)। शनि बलवान हो तो जातक लम्बी आयु भोग करस्वाभाविक मौत मरता है। किन्तु बारहवां भाव खाली हो तो जीवन में आदि से अंततक जातक को सुख प्राप्त नहीं होता।
लाल किताब के अनुसार आठवें शनि का प्रभाव अनिश्चित प्रकार का होताहै। कब जीवन में शुभ असर देने लगे, कब अशुभ-पता नहीं चलता। शनि जबशुभ होता है तो जातक औरों के कल्याण में अपना कल्याण समझता है। यदिजातक शराब से दूर रहे तो आठवां शनि भी अशुभ प्रभाव नहीं दे पाता। शनिस्वग्रही या उच्च राशि का हो तो जातक को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो जाता हैऔर अन्तिम समय में वह स्वस्थचित्त रहता है। उसे दहेज भी अच्छा मिलता है।शनि यदि पाप प्रभाव में हो तो सरकार की ओर से दण्ड (विशेष्रकर जेल) का भयरहता है। ऐसे जातक के माता-पिता बचपन में ही मर जाते हैं या पिता को भारीहानि उठानी पड़ती है।
कर्क राशि का शनि सम्पत्ति व अधिकार दोनों ही प्रास्त कराता है। धनुराशिका शनि विवाह के बाद अशुभ फल देने वाला होता है। तब जातक धनोपार्जनसुचारू रूप से नहीं कर पाता और खर्चे बढ़ जाते हैं। वृष, कन्या, तुला, कुभ, मीनराशियों में शनि नौकरी के लिए शुभ होता है। शेष राशियों में व्यवसाय के लिए शुभहोता है पर सम्पत्ति व सन्तान दोनों साथ-साथ नहीं मिलते। शनि क्षीण हो तथाउच्च के मंगल से दृष्ट हो तो कैंसरं, भगंदर, पथरी जैसे रोग तथा ऑपरेशन के कारणमौत होती है।
अष्टम भावः अष्टम भाव आयु भाव कहलाता है। इस भाव से जातककी आयु, मृत्यु का कारण और जीवन में किन संकटों से जूझना होगा, आदि का विचार किया जाता है। शनि स्वयं दुख स्वरूप है, फलतः अष्टमस्थ शनि
के रहते सुख की आशा व्यर्थ है। आठवें भाव में स्थित शनि जातक को पूर्ववयमें कष्ट और उत्तरवय में सुख देता है। विवाहोपरान्त स्थिति में परिवर्तन आताहै। शनि कर्क या तुला में हो तो शुभ फल देता है। पूर्ण दाम्पत्य सुख मिलता है।मेष, सिंह, मकर, वृश्चिक का शनि अष्टम भावस्थ हो तो राज्याधिकार,धन-सम्पदा और संतान में से किसी एक की चिंता देता है। सभी सुखएकसाथ नहीं मिल पाते। कर्क का शनि सभी सुख समान रूप से देता है, धनुका शनि भाग्य की हानि करता है। अग्नि राशि व कर्क, मिथुन का शनि हो तोव्यवसाय से जीविका चलती है। अन्य राशि में हो तो नौकरी से जीविका चलतीहै। शनि पाप प्रभाव में हो तो कारावास का दण्ड मिलता है। संग्रहणी, पाण्डुरोग, प्रमेह, व्रण अथवा चोट लगने से भारी कष्ट मिलता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक हिंसाचारी,क्रोधी, कठोर एवं चालाक रहता है। वह सहोदरों एवं संतान सुख से वंचितरहता है। प्रायः वे अपंग होते हैं। मित्रों और शत्रुओं की बहुतायत होती है।पत्नी के प्रेम एवं सुख में न्यूनता रहती है। उदररोग, नेत्ररोग, संग्रहणी रोग सेजातक पीड़ित रहता है। विष एवं शासन से भय रहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, क्रूर,दुराचारी एवं चालाक होता है। पत्नी, पिता, पुत्र के सुख में न्यूनता रहती है।सहोदरों का वांछित सुख भी नहीं मिलता।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक को बचपनमें काफी कष्ट सहने पड़ते हैं। जातक क्रोधी, रोगी एवं परस्त्रीगामी रहता है।माता-पिता एवं सहोदरों के सुख में न्यूनता रहती है।
4. कर्क कर्क राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक चोर,परस्त्रीगामी, हिंसक और पत्नी एवं सहोदरों के सुख से वंचित रहता है। अपराधोंकी सजा मृत्युदंड के रूप में मिलती है। जमीन में गड़ा धन प्राप्त होता है।हाथ में विकार रहता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक शिल्पकलाप्रवीण, जुआखोर, व्यभिचारी, क्रोधी एवं ठग होता है। वह पत्नी एवं ज्येष्ठ भ्राता के सुख से वंचित रहता है। वसीयत या आकस्मिक रूप से धन प्राप्त करता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु रहताहै। वह शिल्पकला में प्रवीण, जुआखोर, व्यभिचारी, क्रोधी एवं ठग होता है।
7. तुला-तुला राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु रहताहै। पत्नी लावण्यमयी रहती है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक उग्रचेहरे का, रोगी, अल्पायु, झूठा, कपटी, चोरी करने में होशियार होता है। पत्लीसुंदर होती है।
9. धनु-धनु राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक ठग, कपटी,रोगी, लोगों को दुःखदायी, चोरी करने में चतुर एवं नास्तिक होता है। जीवनमें बड़ा संघर्ष करना पड़ता है।
10. मकर-मकर राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,यशस्वी, तेजस्वी, दुर्गुणी एवं नास्तिक होता है। उसके पेट में कोई बात नहींपचती। जातक पुरुषत्वहीन होने से पत्नी के अन्यत्र शरीर संबंध रहते हैं। जातकपरनिंदक, चोर, जुआरी, नास्तिक, झूठा, बेईमान, बोलने में चतुर एवं धूर्त रहताहै।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जाતक परनिंदक,जुआरी, धूर्त, बोलने में चतुर रहता है। पति-पत्नी दोनों गर्ममिजाज होते हैं,एक-दूसरे से बनती नहीं। पत्नी परपुरुषगामी होती है। कुछ आचायों के अनुसारजातक अविवाहित रहता है एवं वेश्यागामी बनता है।
12. मीन मीन राशि का शनि अष्टम स्थान में हो तो जातक हिंसाचारीएवं दुराचारी रहता है। उसके शत्रु बहुत होते हैं। संग्रहणी, सर्प, विष भय रहताहै। विवाह होता ही नहीं या विलंब से होता है। दांपत्य जीवन सुखी नहीं रहता।
1. मांस मदिर का सेवन नहीं करें।
2. काली गाय की सेवा करें।
3. उड़दपानी में बहावें।
===========================9) नवम् भाव - नवम स्थान (भाग्य भाव)
नवम स्थाम में शनि के फल
आचार्य और गुणाकर - धर्मे सुतार्थसुखभाक् । यह धनी, सुखी तथा पुत्रसहित होता है।
कल्याण वर्मा -- धर्मरहितोऽल्पधनिकः सहजसुतविवर्जितो
नवमसंस्थे । रविजे सौख्यविहीनः परोपतापी च जायते मनुजः ।। यह धर्म, धन, बन्धु, पुत्र, सुख इन सब से रहित तथा दूसरों को ताप देने वाला होता है
वैद्यनाथ -- मन्दे भाग्यगृहस्थिते रणतलख्यातो विदारो धनी ॥ यह शूर, धनवान किन्तु स्त्री हीन होता है।
गर्ग -- दम्भप्रधानः सुकृतः पितृदैवतवंचकः । क्षीणभाग्यः सुधर्माच स्यान्नरो नवमे शनौ ॥ स्वोच्चे स्वभे शनौ भाग्ये वैकुण्ठादागतो नरः । राज्यं कृत्वा स्वधर्मेण पुनर्वैकुण्ठमेष्यति ॥ नवमभावगतः स्वगृहे शनिर्भवति चेत् स महेश्वरयज्ञकृत् । अतिशयं कुरुते जयसंयुतं नृपतिवाहनचिन्हसमन्वितम् ॥
यह दाम्भिक, अच्छे काम करने वाला, पिता तथा देवता पर आस्था न रखने वाला, क्षीण भाग्य का, धार्मिक होता है। नवमस्थ शनि उच्च या स्वगृह में हो तो पूर्वजन्म तथा पुनर्जन्म अच्छे होते हैं । एवं इस जन्म में धर्मपूर्वक राज्य करता है। यह महेश्वरयज्ञ करने वाला, विजयी राजचिन्हों तथा राजा के वाहनों से युक्त होता है।
वसिष्ठ -- कुर्वन्ति धर्म रहितं विमतिं कुशीलम् । यह धर्म, बुद्धि तथा शील से रहित होता है।
पराशर - नवमे मित्रबन्धनम् भाग्यहानिश्च । भाग्य की हानि होती है तथा मित्रों को कारावास होता है।
नारायण भट्ट -- मतिस्तस्य तिक्ता न तिक्तं तु शीलं रतिर्योगशास्त्रे गुणो राजसः स्यात् । सुहृद्वर्गतो दुःखितो दीनबुद्ध्या शनिर्धर्मगः कर्मकृत संन्यसेद् वा । इस की बुद्धि तीखी किन्तु आचरण अच्छा रहता है। योगशास्त्र में रुचि रहती है। राजस स्वभाव का होता है। इसे मित्रों से सुख मिलता है। बुद्धि हीन होती है। यह कर्मनिष्ठ या संन्यासी होता है।
आर्यग्रन्थकार -- धर्मस्थस्पंगुर्वहुदम्भकारी धर्मार्थहीनः पितृवंचकश्च । मदानुरक्तो विधनी च रोगी पापिष्ठभार्यापरहीनवीर्यः ॥ यह बहुत दाम्भिक, धर्महीन, धनहीन, मदान्ध, रोगी पिता की वंचना करने वाला तथा हीन पत्नी के वश हो कर वीर्य हीन होने वाला होता है।
बृहद्यवनजातक धर्मकर्मरहितो विकलांगो दुर्मतिर्हि मनुजो विमना सः। संभवस्य समये हि नरस्य भाग्यसद्यनि शनौ स्थिरचित्तः ॥ यह धर्म कर्म से रहित किसी अवयव से हीन, दुर्बुद्धि, विमनस्क किन्तु स्थिर चित्त होता है।
ढुंढिराज -- उपर्युक्त वर्णन मे सिर्फ अतिमनोज्ञ - सुन्दर होना इतना विशेषण अधिक जोडा गया है।
काशीनाथ-- धर्मे मन्दे धर्म हीनो अविवेकी रिपोर्वशः । नृशंसो जायते लोके परदारतः सदा । यह धर्म हीन, अविवेकी, शत्रु के वश मे होने वाला, निष्ठुर तथा परस्त्री में अनुरक्त होता है।
जयदेव -- सुसतवित्तसुखो विमलांगभाग् विमतिभाग् विमना नवमेऽ कैजे ॥ यह धन, पुत्र तथा सुख से सम्पन्न, निर्मल शरीर का, विमनस्क तथा दुर्बुद्धि का होता है।
जागेश्वर -- भवेत क्रूरबुद्धिस्तथा धर्मो नाशो न तीर्थ न सौजन्यमेतस्य देहे। तथा पुत्रभृत्यादिचिन्तातुरः स्याद् यदा पुण्यगो मन्दगामी नरस्य ॥ यह क्रूर स्वभाव का, धर्महीन, पुत्र तथा नौकरों के लिये चिन्तित, सौजन्य-रहित होता है। यह कभी तीर्थयात्रा नहीं करता ।
मन्त्रेश्वर -- भाग्यार्थात्मजतातधर्मरहितो मन्दे शुभे दुर्जनः । यह दुष्ट, भाग्यहीन, धनहीन, धर्महीन, पुत्रहीन तथा पिता से विमुक्त होता है। हरिवंश -- मन्दोप्रज्ञो मन्दमानापमानो मन्दप्राप्तिर्मन्दविन्मन्द सौख्यः। मन्दस्त्यागी मन्दसत्यप्रसूतौ भाग्ये मन्दे मन्दभाग्यो मनुष्यः ॥ यह मन्दबुद्धि का होता है। मान, अपमान की भावना तीव्र नहीं होती। धन कम ही मिलता है। दान भी थोडा ही करता है। सत्यप्रीति ज्ञान तथा भाग्य भी अल्प होता है।
घोलप -- यह राजद्रोही, कामेच्छा रहित, दुष्टों की संगति में रहने वाला, दुराचारी, धर्महीन, कृश होता है। सज्जन इस पर रुष्ट होते हैं। इसे सिंहादि क्रूर प्राणियों से हानि होती है।
गोपाल रत्नाकर -- यह कंजूस होता है। पुराने कपडे पहनता है तालाब, मन्दिर आदि बनवाता है। इसके पिता के कुटुम्ब के व्यक्ति इस के विरोधक होते हैं। उन में स्त्री सम्बन्धितों का वियोग होता है।
लखनौ के नवाब -- बख्तबुलन्दः श्रीमान् शीरीं सखुनश्च मानवो यदि वै । जोहलो बख्तमकाने वेतालश्च हि कृपालुरपि भवति ।। यह हमेशा भाग्यवान, धनवान, मधुरभाषी, सुखी तथा दयालु होता है।
पाश्चात्य मत--इस स्थान में तुला, मकर, कुम्भ या मिथुन में शुभ-सम्बन्धित शनि हो तो वह व्यक्ति विद्याव्यासंगी, विचारी, शान्त, धीरोदात्त, स्थिरवृत्ति तथा मित्तभाषी होता है। यह कानून, दर्शनशास्त्र, वेदान्त आदि जटिल विषयों में रुचि रखता है तथा प्रवीणता प्राप्त करता है। न्यायदान, धार्मिक संस्थाएं, विद्यालय आदि में अपनी पवित्रता तथा श्रेष्ठ बुद्धि से ये अच्छा स्थान प्राप्त करते हैं। दैवी धर्मसंस्थापकों की कुण्डली में अकसर यह योग देखा गया है। इसी स्थान में पीड़ित शनि हो तो द्वेषी, कंजूस, स्वार्थी, क्षुद्र बुद्धि, छद्मी, धर्म के विषय में दुराग्रही तथा मर्मघातक बोलने वाला होता हैं । इसे विवाह से सम्बधित रिश्तेदारों से हानि होती है। विदेश में घूमने से, कानूनी व्यवहारों में लम्बे प्रवास से नुकसान होता है। ग्रन्थ प्रकाशन में असफलता मिलती है। इस स्थान में शुभ शनि ही विदेश भ्रमण के लिये अच्छा है। अशुभ शनि से विदेश में बहुत कष्ट होता है। इस का स्वभाव अभ्यास प्रिय, गम्भीर, दूसरों का, तिरस्कार करने वाला होता है। अशुभ सम्बन्ध से चित्त भ्रम, भटकना पागलपन आदि फल मिलते हैं। इस शनि से ज्योतिष आदि गूढ शास्त्रों में रुचि रहती है।
भृगुसूत्र -- अधिपतिः । जीर्णोद्धारकर्ता । एकोनचत्वारिंशद्वर्षे तटाक गोपुरनिर्माणकर्ता । उच्चस्वक्षेत्रे पितृदीर्घायुः । पापयुते दुर्बले । पित्ररिष्टवान्। यह अधिकारी होता है। पुरानी इमारतों का जीर्णोद्धार करता है । ३९ वें वर्ष में तालाब, मन्दिर बनवाता है । उच्च में या स्वगृह में यह शनि हो तो पिता दीर्घायु होता है। पाप ग्रह से युक्त या दुर्बल हो तो पिता पर आपत्ति आती है।
नवम भाव में शनी जातक धोखेबाज, अधार्मिक, दरिद्र तथा पिता को धोखा देने वालाहोगा। वह व्यसनी, रोगी, व्यभिचारिणी महिलाओं के प्रति आकृष्ट वकमजोर शरीरिक गठन वाला होगा।
-मानसागरी
व्यक्ति भाग्यहीन, दरिद्र, उसके पिता व संतान अधार्मिक और वहस्वयं दुष्ट व्यकति होगा।
-फलदीपिका
जातक दरिद्र व नास्तिक होगा। वह सहोदरों, संतान और प्रसन्नता केअभाव से ग्रस्त होगा। दूसरों को कष्ट देने वाला होगा।
-सारावली
नवमस्थ शनि जातक को पाप की ओर प्रवृत्त करता है। वह 39 वर्षकी आयु में धार्मिक स्थानों व घाटों का जीणोद्धार कराता है। यदि शनिस्वक्षेत्री या उच्च राशि में है ता जातक के पिता चिरंजीवी अन्यथाअल्पायु होंगे।
-भृगु
वह कानूनी रूप से विजयी, धर्मार्थ संस्थाओं का संस्थापक, कंजूसहोगा। 35 वर्ष की अवस्था में विवाह करने वाला, वैज्ञानिक, नास्तिक,तार्किक, उल्लासित, तथा तिरस्कृत होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणी
नवमभाव धर्म स्थान है। वहाँ शनि की स्थिति इस क्षेत्र में जातक केजीवन में आंदोलित करने वाली होती है। नवम भाव में बलवान शनि, गुरुसे दृष्ट होने पर जातक को दृढ़तापूर्वक धार्मिक सिद्धान्त मानने वाला व तपस्वी बनाता है।
हमारे विचार -- प्राचीन लेखकों में कल्याणवर्मा, गर्ग, वसिष्ठ, पराशर, नारायण भट्ट, आर्य ग्रन्थकार, ढुंढिराज, यवन जातककार, जयदेव, काशीनाथ, जागेश्वर, मन्त्रेश्वर, घोलप, गोपाल रत्नाकर तथा हरिवंशकार ने इस स्थान में शनि के फल अशुभ बतलाए है। इस का अनुभव वृषभ, कन्या, तुला, मकर तथा कुम्भ में आता है। आचार्य, गुणाकर व लखनौ के नबाब इन्हों ने जो शुभ फल दिये हैं, उनका अनुभव मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु तथा मीन में आता है।
हमारा अनुभव--नवम में मेष, सिंह, धनु, मिथुन, कर्क, वृश्चिक, मीन में शनि ३६ वें वर्ष से भाग्योदय कराता है। जीविका का आरम्भ, मामूली लोगों में २० वर्ष से तथा उच्च वर्गों में २७ वें वर्ष से होता है। पूर्वीजित सम्पति प्राप्त होती है तथा उसमें कुछ वृद्धि भी होती है। शेष राशियों में पूर्वार्जित सम्पत्ति नहीं होती। रही भी तो ३४ वें वर्ष तक अपने ही हाथों नष्ट होती है। सम्पत्ति में वृद्धि नहीं होती। दारिद्र्ययोग होता है। अस्थिरता रहती है। अपमान के अवसर आते हैं। पिता की जल्दी मृत्यु होती है या जीवित रहे तो सम्बन्ध ठीक नहीं रहते। भाइयों से अनबन होती है। भाई- बहनों की स्थिति अच्छी नहीं रहती। बंटवारा कर अलग रहना इन के लिये अच्छा होता है । इन्हें विवाह के बारे में कुछ अनियमित परिस्थिति प्राप्त होती है। रजिस्टर पद्धति से विवाह करेंगे या स्थैर्य प्राप्त होने तक विवाह न करना पसन्द करेंगे। विदेश भ्रमण हुआ तो किसी विदेशी युवती से विवाह करेंगे। आस्तिक विचार होते हैं किन्तु आचरण नास्तिकों जैसा होता है । मेषादि राशियों में शिक्षा पूरी होती है। विज्ञान की उपाधियां - बी.एससी., एम्. एससी, डी. एस सी. आदि या कानून की उपाधि प्राप्त होती है। शिक्षक, संशोधक, वकील, अटर्नी आदि के रुप में सफल होते हैं।
स्वतन्त्र व्यवसाय या व्यापार का योग क्वचित देखा गया है। ये कर्मठ होते हैं। सौतेली मां होने का योग होता है। इस स्थान में पुरुष राशि में शिक्षा पूरी होती है। स्त्री राशि में क्वचित ही होती है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन में यह शनि छोटे भाइयों के लिये शुभ है । अन्य राशियों में छोटे भाई नहीं रहते।
नवम स्थान में शनि पापी, दुर्बल, शुभ, बलवान हो तो अलग-अलग फलप्राप्त होते हैं।
नवम स्थान में शनि शुभयुक्त, बलवान, उच्च या स्वगृह का हो तो जातकसंपन्न, सुखी, धार्मिक, संतान सुख से युक्त, पराक्रमी, राजपंडित,लोक-कल्याणकारी एवं धार्मिक-सांस्कृतिक कार्य करनेवाला होता है। जातकसंन्यासी भी बन सकता है। शनि बलवान हो तो जातक सामान्य संन्यासी नहोकर मठाधीश बनता है। जीवन के 39वें वर्ष में मंदिर, कुआं आदि का निर्माणया जीर्णोद्धार का कार्य जातक करता है। पिता का सुख उत्तम एवं दीर्घकालीनरहता है।
नवम स्थान में शनि नीच, अस्त, पापपीड़ित या दुर्बल हो तो जातक को पिता का सुख कम मिलता है। ऐसा जातक आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं वरन् अपना पेट भरने के उद्देश्य से संन्यास लेता है, जातक ठग, आडंबरी, आचरणहीन, परस्त्रीगामी, स्त्रीपुत्रादि के सुख से वंचित रहता है। शरीर में,विशेष रूप से पैरों में विकार रहता है।
यवन ज्योतिर्विद उपरोक्त मतों से सहमत हैं। पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मत भी उपरोक्त मतों से मेल खाते हैं। उनके अनुसार नवमस्थ शुभ शनि हो तो न्यायशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि में जातक प्रवीण रहता है। जीवन सफल होताहै। परेदश निवास होता है। अशुभ शनि नवम स्थान में हो तो विवाह के बाद संबंधित रिश्तेदारों से कानूनी तौर पर एवं प्रवास के कारण नुकसान होता है।
नवम भाव-लग्नकुंडली में शनि नौवें भाव में हो तो जातक धार्मिक, तन्त्रमंत्र आदि विषयों में रुचि लेने वाला, भाग्यवान, विद्याव्यसनी, विचारक, न्यायप्रिय,शांत चित्त, घूमने का शौकीन, अधिक बोलने वाला और प्रायः रोगी होता है। भाई-बहनों के लिए नौवां शनि मारक/घातक होता है। जातक के पिता के लिए भी शुभनहीं होता।
लाल किताब में नौवें शनि को ‘भाग्य विधाता' कहा गया है। ऐसे जातक केमरने से पूर्व तीन मकान (कम से कम) अवश्य हो जाते हैं (तीसरे मकान के बनने
का समय उसके लिए अशुभ रहता है). ऐसा जातक मकान बनाने/बनवाने मेंनिपुण, दूसरों की पीड़ा समझने वाला तथा सुखी होता है। यदि जातक परोपकारीरहे तो शनि नौवें भाव में आजीवन शुभ फल एवं सुख प्रदान करता है। जातक की
रुचि गुत्त विधयाओं, वेद पाठन/वेदांत में होती है। जातक विद्वान, शांत, विचारक व
न्यायविद् होता है। धार्मिक संस्था का प्रवर्तक या विधालय का कुलपति होता है।
पूर्वजों की सम्पत्ति उत्तराधिकार में मिलती है, जिसे जातक और बढ़ाता है। इस
भाव का शनि अग्नि व जल राशियों में प्रायः शुभ रहता है।
जलराशियों में शनि जातक के भाइयों के लिए भी शुभ होता है (अन्यराशियों में अशुभ)। वायु तथा पृथ्वी राशियों में शनि प्रायः अशुभ रहता है। तबपूर्वारजिंत सम्पत्ति मिलकर भी नष्ट हो जाती है, जीवन के उत्तरार्थ में आर्थिक अभावव मन में अस्थिरता रहती है। मान हानि होती है। पिता दीर्घजीवी नहीं होते। यदिजीवित रहें तो पिता-पुत्र में अनबन रहे (दोनों साथ रहे तो प्रगति न कर सके)।भाई-बहनों से भी अनबन हो। बंटवारे पर झगड़ा कोर्ट-कचहरी की नौबत रहे।प्रवास अधिक करना पड़े।
शनि अशुभ प्रभाव में हो तो विदेशवास में जातक को कष्ट होता है (सौतेली
मां) विमाता, चित्तभ्रम, पागलपन, आवारागर्दी आदि दुष्फल होते हैं।
नवम भावः शनि नवम भाव में पृथ्वी अथवा वायु राशि में हो तो प्राय:अशुभ फल ही अनुभव में आते हैं। अन्य राशियों में शुभ फलों का मिलनादेखा जाता है। उच्च या स्वराशि का शनि शुभ ग्रहयुक्त या दृष्ट होकरनवमस्थ हो तो जातक मितभाषी, विद्याप्रेमी, विचारवान, धैर्यशाली और स्थिरवृत्ति वाला होता है। कानून, वेदान्त, दर्शनशास्त्र आदि गूढ़ विषयों का पठन-अध्ययनकर प्रवीणता प्राप्त करता है। न्यायाधीश, धर्म संस्था का अधिपति अथवाकुलपति आदि बनकर समाज में मान-सम्मान पाता है। अशुभ प्रभाव में हो तोजातक दूसरों से द्वेष रखने वाला, कंजूस, स्वार्थी, धर्म के विषय में दुराग्रही,विदेश में घूमने वाला तथा लम्बे प्रवास से हानि उठाने वाला होता है। चित्तभ्रम,पागलपन, व्यर्थ भटकना जैसे अशुभ फल मिलते हैं। अग्नि राशि और जलराशि का शनि हो तो दरिद्र होने का योग बनता है। कार्य-व्यवसाय में स्थिरतानहीं रहती, भाई-बहिनों में परस्पर प्रेम नहीं रहता। विभाजन के पश्चात स्थितिमें कुछ सुधार होता है। ऐसे जातक या तो विवाह करना पसन्द नहीं करतेअथवा किसी से भी कोर्ट मैरिज कर लेते हैं। शिक्षा के लिए भी यह शनिअच्छा नहीं है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक कामातुर रहताहै। उसके अनेक स्त्रियों से शारीरिक-संबंध होते हैं, ऐसा महर्षि लोमश कामानना है, तो यवनाचार्य मानते हैं कि जातक नपुसक होता है। स्त्री सुख मेंन्यूनता रहती है। पत्नी गर्ममिजाज होती है। जातक के पैर पर निशान होता है।लकड़ी, पत्थर एवं तत्संबंधी वस्तुओं के व्यापार में जातक धन कमाता है।
2. वृषभवृषभ राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक को दुर्घटनाका भय रहता है। जातक सरकारी कर्मचारी, विद्वान, प्रतिष्ठित, लेखक,सुधारक, संगीत-नाट्य आदि ललितकलाओं का जानकार होता है। जातक कीआर्थिक स्थिति मध्यम रहती है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक अनेक शास्त्रों का ज्ञाता, संगीत-नाट्य आदि ललितकलाओं का रसिक, सरकारी कर्मचारी, विचित्र कार्यकलापों के कारण विख्यात तर्क-कुतर्क कुशल, पुरुषार्थी,धार्मिक, लोकप्रिय एवं सुंदर आंखोंवाला होता है।
4. कर्क-कर्क राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक, उद्यमी,स्वपराक्रम से प्रगति करनेवाला, विद्वान, दयालु, धार्मिक, आस्तिक, समाज मेंप्रतिष्ठित, संपन्न एवं लोकप्रिय होता है। जातक का जन्म स्थान से अन्यत्रभाग्योदय होता है। भाग्योदय में स्त्रियों का बड़ा हाथ रहता है। सहोदरों केसुख में न्यूनता रहती है।
5. सिंह-सिंह राशि शनि नवम स्थान में हो तो जातक का बचपन कष्टकारक रहता है। सहोदरों से मधुर संबंध नहीं रहते। जातक का पिता चोर होता है। उसे स्त्रियों का उत्तम सहयोग प्राप्त होता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,लोकप्रिय, व्यवहारकुशल, आस्तिक, यशस्वी, सरकारी कर्मचारी होता है।देश-विदेश में इसे बार-बार घूमना होता है।
7. तुला-तुला राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक भाग्यवान,आस्तिक, समाज में प्रतिष्ठित, यशस्वी एवं सरकारी कर्मचारी होता है।देश-विदेश में घूमने के मौके हाथ लगते हैं।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातकभाग्यवान, विद्वान, आस्तिक एवं अधिकारसंपन्न होता है।
9. धनु-धनु राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक विशेष रूप सेधार्मिक एवं आस्तिक होता है। अपने सत्कायों के कारण उसे ख्याति एवं यश प्राप्त होता है। जातक संपन्न, सहोदरों से सुखी, सदाचारी एवं विद्वान होता है।जातक की मां आदर्श महिला होती है।
10. मकर-मकर रशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक की मांसदाचारिणी एवं परोपकारी महिला होती है। मातृप्रदत्त गुणों के कारण जातकदानकर्ता, उदार, परोपकारी, सदाचारी, आस्तिक एवं धार्मिक होता है। मित्र एवंसहोदरों का अच्छा सहयोग प्राप्त रहता है। आर्थिक दृष्टि से जातक का जीवनसुखी रहता है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक झगड़ालू,लोभी, कठोर, सहोदरों के सुख से युक्त एवं संपन्न रहता है। चेहरे पर कोईविकृति पाई जाती है।
12. मीन-मीन राशि का शनि नवम स्थान में हो तो जातक कठोर, हिंसकएवं लोभी रहता है। पत्नी भी कठोर एवं क्रोधी रहती है। दांपत्य जीवनसुखदायक रहता है। यवनाचार्य के मतानुसार जातक पुरुषत्वहीन होता है।
1. चने की दाल पानी में बहावें।
2. अपने गुरू के चरण छुऐं।
3. कबाड़खाना न रखें।
4. हजारा का पौधा नहीं लगावें।
===========================
10) दशम् भाव - दशम स्थान (कर्म भाव)
दशम स्थान मे शनि के फल
आचार्य व गुणाकर सुखशौर्यभाक् खे। यह सुखी और शूर होता है।
कल्याण वर्मा -- धनवान् प्राज्ञः शुरो मन्त्री वा दण्डनायको वापि । दशमस्थे रवितनये वृन्दपुरग्रामनेता च ॥ यह धनी, बुद्धिमान, शूर तथा मन्त्री या सेनापति होता है। यह नगर, गांव और जनसमूह का नेता होता है।
पराशर -- दशमें धनलाभं सुखं जयं । माने च मीने यदि वार्कपुत्रः संन्यासयोग प्रवदन्ति तस्य ॥ यह धनी, सुखी तथा विजयी होता है। यह शनि मीन में हो तो संन्यास का योग होता है।
गर्ग -- भवेत् वृन्दपुरग्रामपतिर्वा दण्डनायकः । प्राज्ञः शूरो धनी मन्त्री नरः कर्मस्थिते शनौ || सेवार्जितधनः क्रूरः कृपण: शत्रुघातकः । जंघारोगीनीचशत्रुराशिस्थे कर्मगे शनौ । शनि के साधारण फल कल्याण वर्मा जैसे बतलाए है। यह नीच या शत्रु राशि में हो तो नौकरी से धनार्जन करने वाला, क्रूर, कंजूस तथा शत्रुओं का घात करनेवाला होता है। इसकी जंघा में रोग होता हैं।
वसिष्ठ--बहुकुकर्मरतं कुपुत्रं दौर्मनस्यं । यह बहुत दुराचारी,दुर्बुद्धि तथा दुष्ट पुत्रों से युक्त होता है।
वैद्यनाथ -- मन्दे यदा दशमगे यदि दण्डकर्ता मानी धनी निजकुल- प्रभवश्च शूरः ।। विवासः। यह धनी, मानी, शूर, अपने कुल में श्रेष्ठ, शासक होता है। इसे संन्यास का भी योग होता है।
बृहद्यवनजातक -- राज्ञः प्रधानमतिनीतियुतं विनीतं सद्ग्रामवृन्दपुर-भेदनकाधिकारम् । कुर्यांन्नर सुचतुरं द्रविणेन पूर्णं मेषूरणे हि तरणेस्तनुजः करोति ॥ यह राजमन्त्री, बहुत नीतिमान, नम्र, गांव और लोगों का प्रमुख अधिकारी, चतुर, धनी होता है।
आर्य ग्रन्थ --शनैश्चरे कर्मगृहे स्थितेऽपि महाधनी भृत्यजनानुरक्तः । प्राप्तप्रवासे नृपसद्मवासी न शत्रुवर्गाभ्दयमेति मानी ॥ यह बहुत धनवान, नौकरों में आस्था रखने वाला, प्रवास में राजप्रसादों में रहने वाला, निर्भय तथा मानी होता है।
काशीनाथ -- कर्मभावे सूर्यपुत्रे कुकर्मा धनवर्जितः । दयासत्यगुणै- हीर्निश्चंचलोऽपि भवेत् सदा । यह दुराचारी, निर्धन, निर्दय, चंचल तथा सत्य से विमुख होता है ।
जयदेव -- प्राज्ञः प्रधानमतिमान् सभयो विनीतो ग्रामाधिकारसहित साधनोऽम्बरस्थे । यह बुद्धिमान, प्रधान, नम्र, गांव का अधिकारी, धनवान और भय युक्त होता है।
जागेश्वर-- शनी कर्मणे पितृघाती नरः स्यात् परं मातृकष्टं कथं देहसौख्यं तथा वाहनं मित्रसौख्यं कुतःस्याद् ध्रुवं दुष्टकर्मा भवेन्नीचवृत्तिः ।। यह पिता के लिये घातक होता है तथा माता को भी कष्ट होता है। शरीर सुख, वाहन अथवा मित्रों का सुख नहीं मिलता। यह दुराचारी और नीच वृत्ति से युक्त होता है।
नारायण भट्ट -- अजातस्य माता पिता बाहुरेव वृथा सर्वतो दुष्टकर्माधिपत्यात् । शनैरधते कर्मगः शर्म मन्दो जयो विग्रहे जीविकांना तु यस्य ॥ शनौ व्योमगे विन्दते किं च माता। सुखं शैशवं दृष्यते किन्तु पित्रा । निधिः स्थापितो वा पिता वा कृषिश्च प्रणश्येत ध्रुवं दृश्यतो दैवतो ना। इस के बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु होती है। इसे बहुत धीरे धीरे सुख मिलता है। युद्ध में विजयी होता है। अधिकारी होने पर यह व्यर्थ ही दुष्ट काम करता है। इस की पैतृक सम्पति, जमीन आदि दृष्य या दैवी कारण से नष्ट होती है।
मन्त्रेश्वर -- मन्त्री वा नृपतिर्धनी कृषिपरः शूरः प्रसिद्धोऽम्बरे। यह राजा अथवा मन्त्री, धनवान, शूर तथा खेती में रुचि लेने वाला होता है।
लखनौ के नवाब -- शाहमकाने जोव्हलश्चेषु दशाफ्ते च मानवो शाहः । अथवा भवेन्मशीरः खुशखुल्क सुकृती गनी नेही। शनि दशम में हो और शनि की दशा प्राप्त हो उस समय राजपद अथवा मन्त्रिपद मिलता है। यह संसार में सुखी, सदाचारी, लोगों से स्नेह रखने वाला होता है।
हरिवंश -- बुद्धियुक्तं पूर्णवित्तं मनुष्यं ग्रामधीशं राजमान्यं करोति । स्वोच्चस्थो वा स्वारुयस्थो विशेषात् शैषस्थश्चेद्वैरिभीत्यं शनिश्च ॥ यह शनि उच्च या स्वगृह में हो तो वह बुद्धिमान, धनी, गांव का अधिकारी और
राजमान्य होता है। अन्य राशियों में शत्रुओं से भय रहता है।
घोलप--यह सब कलाओं का ज्ञाता, राजा जैसा सुखी, लोगों से स्नेह पूर्वक रहने वाला होता हैl
गोपाल रत्नाकर -- यह मातृभूमि छोड़कर विदेश में निर्वाह करता
है। कंजूस, पित्त प्रकृति का होता है। इस से माता के लिए, मारक योग है। गांव का प्रमुख होता है। खेती से धनार्जन करता है। गंगास्नान करता है।
भृगुसुत्र - पंचविंशतिवर्षे गंगास्नायी। अतिलुब्धः पित्तशरीरी । पापयुते कर्मविघ्नकरः । शुभयुते कर्मसिद्धिः । केन्द्रे मन्दे षटूत्रिंशद्वर्षादुपरि भाग्यवृद्धिः । जनसेवकः मित्रवृद्धिः । समाजकार्ये रज्जकार्ये च कुशलः । सन्मानलाभश्च ।। यह २५ वें वर्ष गंगास्नान करता है। लोभी और पित्त प्रकृति का होता है। पाप ग्रह साथ हो तो कामों में विघ्न आते हैं। शुभ ग्रह साथ हो तो काम सफल होते हैं। शनि केन्द्र में हो तो ३६ वें वर्ष के बाद भाग्योदय होता । यह लोकसेवा करने वाला, समाज कार्य तथा राजनीति में कुशल, सम्मान पाने वाला और बहुत मित्रों से युक्त होता है
पाश्चात्य मत -- यह शनि राशिबली - तुला, मकर, कुम्भ या मिथुन में हो, या अन्य ग्रहों से शुभ सम्बन्धित हो तो सत्ता, अधिकार तथा भाग्य के लिये उत्कर्षकारक होता है। दीर्घ उद्योग, परिश्रम, महत्वाकांक्षा, प्रामाणिकता, दूरदृष्टि, व्यवस्थितता आदि गुणों से ये लोग सहज ही महान पद प्राप्त करते है। दूसरों की मदद के बिना अपने ही गुणों तथा परिश्रम से इन की उन्नति होती है। अधिकारपद, बड़े उद्योंगों के संचालक, बैंकों के डायरेक्टर आदि उत्तरदायित्वपूर्ण पदों के लिये योग्य व्यक्ति होते हैं। दशम में बलवान शनि कानून के क्षेत्र में अधिकार देता है --सबजज्ज, जज, हाईकोर्ट के जस्टिस आदि होते हैं। पीड़ित शनि से प्राप्त अधिकार का दुरुपयोग करते है। दुराचार, झूठे षड़यन्त्र, अप्रामाणिक व्यवहार से सत्ता प्राप्त होती है अतः उन का अधः पतन भी जल्दी ही होता है। हर्षल, नेपच्यून, सूर्य, मंगल या गुरु से अशुभ सम्बन्धित होने पर यह शनि बहुत अशुभ होता है। बचपन में माता-पिता की मृत्यु होना, बाल्यावस्था में ही स्थावर सम्पति नष्ट होना, नौकरी में असफल होना, वरिष्ठ अधिकारी से झगडा होना, उच्च पद छोड कर हलके पद पर नियुक्त होना, सामाजिक कार्य मे नुकसान होना आदि फल पीड़ित शनि से प्राप्त होते हैं। जीविका के लिये कठोर परिश्रम और कष्ट- दायक काम करने पड़ते है। बेइज्जती के अवसर बार बार आते हैं। स्वतन्त्र व्यवसाय मे दिक्कतें आती हैं। दशमस्थ शनि से रवि अथवा चन्द्र अशुभ सम्बन्ध में हो तो अशुभ फल बहुत तीव्र होते हैं । यह योग हमेशा असफलता, विघ्न, दारिद्र्य, अपमान और अपकीर्ति का कारण होता है। दशम में मेष, कर्क, वृश्चिक तथा मीन में शनि के फल बहुत अनिष्ट होते हैं।
हमारे विचार -- इस स्थान में आचार्य, गुणाकार, कल्याणवर्मा, गर्ग, पराशर, वैद्यनाथ, यवनजातक, आर्यग्रन्थ, हरिवंश, जयदेव, मन्त्रेश्वर, लखनौ के नवाब, घोलप तथा रत्नाकर ने सब शुभ फल बतलाए हैं। इन का अनुभव मेष, सिंह, धनु, मिथुन, कर्क, वृश्चिक तथा मीन में मिलता है। वसिष्ठ, काशीनाथ, जागेश्वर, नारायण भट्ट ने अशुभ फल बतलाए हैं। उन का अनुभव वृषभ, कन्या, तुला, मकर तथा कुम्भ में मिलता है।
दशम भाव में शनि जातक धनी, नर्तकियों से प्रेम करने वाला, विदेशी राजा का आतिथिशत्रुओं से भयभीत न होने वाला और आदरणीय होगा।-मानसागरीहोगा।व्यक्ति राजा या उसके समान, विख्यात् कृषि में संलग्न और बहादुर
-फलदीपिकाजातक
स्वस्थ, विद्वान्, योद्धा, मंत्री या न्यायाधीश या शहर गाँव कानेता होगा।
-सारावली
दशमस्थ शनि जातक को कंजूस प्रकृति तथा पित्त प्रधान बनाता है।वह 25 वें वर्ष की आयु में गंगा स्नान का पुण्य पाने वाला होगा। यदिशनि पापयुत है तो जातक के व्यवसाय में बाधाएँ होंगी। शनि के शुभयुतहोने पर वह अपने व्यवसाय और शुरू किए गए कार्यों में सफल होगा।
-भृगु
जातक धर्मस्थलों और पवित्र नदियों की यात्रा करने वाला, अच्छाकाम करने वाला, पित्त प्रकृति वाला, अच्छा किसान, आकस्मिक ऊँच-नीचका सामना करने वाला विदेश में निवास करने वाला, अनिश्चयी भविष्य,जीवन के उत्तरारद्ध में निराशावादी होगा।
-डॉ रामन
टिप्पणीयदि जन्म कुण्डली में शनि दशम भाव में है तो जातक पैतृक सम्पत्तिऔर माता-पिता से सुखी नहीं रहेगा। वह धीरे-धीरे आर्थिक उन्नतिकरेगा, न्यायकर्ता का पद संभालेगा, अपव्ययी संतान, उसकी विदेश मेंसंपत्ति होगी। महिला जातकों के मामले में दशमस्थ शनि जातिका कोपाप-प्रवृत्त व बदसूरत करता है।
दशमस्थ शनि स्वक्षेत्री या उच्च राशि में होने पर ‘सस' योग बनाताहै। जिसके फलस्वरूप-जातक को प्रसन्नता, शक्ति संपन्नता या उपरोक्तसकारात्मक फल प्राप्त होंगे। यदि शनि बलहीन, नीच या पापट्ृष्ट है तोजातक पाप कमों में लिप्त, बचपन से ही अनाथ और दरिद्र होगा।
दशम भाव में शनि की स्थिति के साथ-साथ स्वामित्व भी पर्याप्तप्रभावशाली होता है। अतः ध्यान रखने योग्य है। अन्य ग्रह दशमस्थ शनिके प्रभावों को घटा या बढ़ा सकते हैं।
जैसे मेष लग्न में शनि दशमेश तथा एकादशेश के रूप में स्वक्षेत्री. होता है तथा बाधक स्वभाव का भी होता है। हालांकि दशमेश की दशमभाव में स्थिति एक प्रबल राजयोग कारक होगी, परन्तु फलों में बाधकत्व के कारण रूकावट या विलंब होगा, नकारात्मक नहीं।
*वृष लग्न के लिए शनि नवमेश और दशमेश होकर अपनी मूलत्रिकोणराशि में दशमभाव में जाता है। जो कि एक प्रबल राजयोग है। जिससेनाम, यश, संपत्ति और सम्मान आदि प्राप्त होगें। यहाँ भी राशि बाधक है।तो क्या राजयोग निष्फल होगा? नही। शनि के पाप प्रभाव और पापसंबंधों (दृष्टि, युति, स्थिति) से मुक्त होने पर सभी शुभफल मिलेगें।बाधक रूप के फल कम मात्रा में होगें।
तुला लग्न के लिए शनि चतुर्थेश और पंचमेश होकर दशम भाव में कर्क राशि में आता है जो कि एक प्रबल धनयोग है।
मकर लग्न के लिए शनि लग्नेश और द्वितीयेश होकर दशम भाव में तुला राशि में उच्चस्थ होकर लग्नेश व धनेश की बलवान् स्थिति के कारण प्रबल राजयोगकारक होता है।
विद्वत्समाज द्वारा निर्धारित सूत्रों को अक्षरशः लागू न करके ग्रह के स्वामित्व और अन्य ग्रहों से उसके संबंधों को भी फलादेश से पहले सम्यक् रूप से देखना अपेक्षित है।
व्यवसाय की दृष्टि से दशमस्थ शनि जातक को संपन्न, धनी, विद्वान,उत्साही, मंत्री, दंडाधिकारी, नेता, किसी समाज, संगठन, गाँव, शहर कामुख्य व परिवार में महत्वपूर्ण स्थिति प्रदान करता है। दशम भाव में शनिश्रेष्ठ है। यदि वह स्वक्षेत्री, मूलत्रिकोण राशि या उच्च राशि में हो तो(i) 'शश' महाभाग्ययोग बनाता है तो वह उन्नति कारक होता है।पापाक्रान्त शनि से मान हानि, पराजय, असफलता, आदि मिलती है।
हमारा अनुभव
दशमस्थ शनि बचपन में ११ वें वर्ष तक ही माता-पिता का वियोग कराता है। उन की मृत्यु होती है अथवा गोद लिये जाने से दूसरे घर जाना पडता है। अथवा विदेश में निर्वासित होना पड़ता है। यदि दोनों एकत्र रहे तो पिता को सतत कष्ट का अनुभव होता है। व्यवसाय बदलना, हानि होना, बेकार रहना, अस्थिरता होना, कर्ज न चुकाने से कारावास आदि बातें होती है । नौकरी हो तो पदावनति होना, सस्पेण्ड होना, मतिभ्रम होना, निर्वासित होना, फौजदारी कानून से दण्डित होना, असाध्य रोग होना आदि से कष्ट होता है । यह बालक बड़ा होने पर माता-पिता से इसके सम्बन्ध अच्छे नहीं रहते। उपजीविंका नहीं चलती। भाग्योदय बिलकुल नहीं होता। मामूली इच्छाएं भी पूरी नहीं होतीं। बड़े हो कर बेकार रहने से घर मे हमेशा अपमान होता है । पैतृक इस्टेट नही मिलती और मिली भी तो वह पुरी तरह नष्ट होने पर ही कहीं सफलता मिल सकती है। इस योग में पिता- पुत्र दोनों एक साथ प्रगति नहीं कर सकते। गोपाल रत्नाकर का विदेश गमन से प्रगति होने का फल हमारे अनुभव से भी ठीक प्रतीत होता है। इन लोगों का अपनी जन्मभूमी में भाग्योदय नहीं होता। मेष, सिंह, धनु, मिथुन में प्राध्यापक, संशोधक, अधिकारी, गूढ़शास्त्रों के अभ्यासी होते हैं। क्वचित व्यापारी भी देखे हैं। वृषभ, कन्या, मकर, कर्क, वृश्चिक, मीन, तुला, कुम्भ में संन्यासी, धर्म-प्रवर्तक, लेखक, गूढ़शास्त्रों के अभ्यासी, ज्योतिषी आदि होते हैं। नगर-निगम, जिला परिषद आदि की सदस्यता या अध्यक्षता भी इस योग पर मिल सकती है। मेष, सिंह, धनु, मिथुन, कर्क, वृश्चिक, मीन में शिक्षा पूरी होती है । एम. ए., एल. एल. बी., एम.डी., एम.एससी. आदि उपाधियां प्राप्त होती है। न्यायविभाग में जज, आदि अधिकारी, पुलिस, सेना या आबकारी इन्सपेक्टर, रेंजर, डी. एफ. ओ., टेक्निकल अधिकारी आदि की कुंडलियों में यह योग होता है। वृषभ, कन्या, तुला, कुम्भ मे लेखक होने का योग होता है। ये दुसरों को बहुत उपदेश देते है किन्तु स्वयं दरिद्री ही रहते है। कॉन्ट्रॅक्टर, विदेशी माल के एजंट आदि हो सकते है। ये अपने व्यवसाय के मर्म को अच्छी तरह समझते है और उसमे इन से कोई स्पर्धा नही कर पाता। इन्हें स्त्रीसुख कम मिलता है। दो विवाह हो सकते है। इन्हें पुत्र नही होते या पुत्रों से सुख नहीं मिलता। गोद लिये जाने पर इन्हे पुत्रसुख मिल सकता है। साधारणत: शनि के फलस्वरूप विषयेच्छा कम होनी चाहिये किन्तु अनुभव में ये विषयासक्त हो पाये जाते है। शुक्र और चंद्रमा का अशुभ सम्बन्ध हो तो इनका किसी ज्येष्ठ स्त्री से अवैध सम्बन्ध पाया जाता है। वृद्धावस्था मे भी स्त्री सुख की इच्छा बनी रहती है। इन के वस्त्र पसीने से हमेशा मैले रहते है और जल्दी फटते है। ये अपने घर से अधिक दुसरों के व्यवहार की फिक्र करते है। दूसरों के विवाह जमाना, समझोता कराना, संस्थाए स्थापित करना आदि में मग्न हो कर ये अपने घर का ख्याल रखना भूल से जाते है। दशमस्थ शनि से कामशास्त्र के उपदेशक और वेदांत के प्रवर्तक दोनो प्रवृत्तियों के लोग पाये जाते है। इन्हे कीर्ति,
सन्मान, धन मिलता है। विदेश यात्रा होती है । ये स्वयं को किसी श्रेष्ठ कार्य के लिये उत्पन्न मानते है और उस कार्य को सफल देख कर मृत्यु के समय सन्तोष का अनुभव करते है। माता पिता की दृष्टी से यह योग अशुभ होता है। माता की मृत्यु होती है या उसे कोई असाध्य रोग या व्यंग होता है और पिता के जीवित रहते भाग्योदय नही हो पाता ।
कुछ प्रसिध्द उदाहरण - नासिक मठ के शंकराचार्य डॉ. कुर्तकोटी (मीन), स्वामी विवेकानंद (कन्या), स्व. श्री. पांगारकर (मराठी सन्त साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान) (धनु), प्रख्यात मराठी उपन्यासकार स्व. हरि नारायण आपटे (कन्या), भूतपूर्व मध्यप्रदेश राज्य के मन्त्री बाबासाहेब खापर्डे (मेष), स्व. तात्यासाहेब सांगलीकर (वृश्चिक) (इनके सात विवाह हुए किन्तु पुत्र नही हुआ), श्री. गंगाधर केशव देशपांडे, पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट (वृश्चिक) (तीन पत्नियों की मृत्यु हुई), सांगली रियासत के प्रधान (सिंह) (गोद लिये जाने से अधिकार पद मिला), स्व. जमनालाल बजाज (सिंह) (गोद लिये जाने से वैभव मिला), स्व. सयाजीराव गायकवाड, महाराज बडोदा (कन्या) (गोद लिये जाने से अधिकार पद, द्विभार्यायोग), श्री.उदगांवकर, अमरावती (तुला) (टेक्नीकल स्कुल के प्रमुख), श्री. एन. एम. पटवर्धन (मीन) (डिस्ट्रिक्ट जज हुए), फ्रान्स के बादशाह नेपोलिअन बोनापार्ट (मिथुन) (युद्ध में कुशलता तथा बहुभार्या योग), जर्मनी के युद्धकालीन प्रमुख एडाल्फ हिटलर (कर्क), पंडित पद्मनाभ पांडुरंग पालये (मीन) (ज्योतिषी), कुंण्डलीसंग्रह (पं. रघुनाथ शास्त्री द्वारा प्रकाशित) की कुण्डली नं. ११२ (दशम
में तुला में शनि) इस के जन्म के बाद ३ वर्षों में ही माता-पिता की मृत्यु हुई, जन्म के समय स्थिती अच्छी थी, द्विभार्या योग
हुआ।
दशमस्थ अशुभ शनि अति विपत्ति का कारण होता है बहुत दारिद्रय, खाने की मुश्किल होना पैतृक सम्पत्ति ना होना या हो कर भी प्राप्त न होना, कष्टमय जीवन, बेइज्जत होना, मन के प्रतिकुल हलकी नौकरी, नौकरी मे बहुत बार परिवर्तन, मृत्यु के समय तक कष्ट, यह इन लोगों के जीवन का हाल रहता है। दशमस्थ शनि, मेष, सिंह, धनु, मिथुन, कर्क, वृश्चिक और मीन में हो कर रवि चन्द्र से केन्द्र योग करता हो तो सांसारिक कष्ट बहुत रहते हैं किन्तु कीर्ति अच्छी मिलती है। इस का अच्छा उदाहरण स्व. हरि नारायण आपटे की कुण्डली है। इन्हे जीवन पर्यंत सन्तती तथा सम्पत्ति सुख अच्छी तरह प्राप्त नही हुआ किन्तु उनके मराठी उपन्यास चिरस्मरणीय हुए है । इन की कुण्डली में रवि-चन्द्र का शनि से षडाष्टक योग हुआ है।
प्रायः दशम स्थान में शनि के शुभ फल प्राप्त होते हैं। ऐसा जातक धैर्यवान,बलवान, बुद्धिमान, संपन्न, सुखी, समाज में अग्रणी, समाज प्रतिष्ठित, शत्रुहंता,स्वपरिश्रम से जीवन में आगे बढ़नेवाला एवं अधिकारसंपन्न रहता है। जातकके पिता निर्धन हो सकते हैं या जातक की उनसे मतभिन्नता रहती है। इसकारण जातक को माता-पिता का सुख कम प्राप्त होता है। शनि नीच, दुर्बल,पापयुक्त होने पर यह फलित विशेष रूप से अनुभव में आता है। ऐसी हालतमें जातक दुर्बुद्धि, दुराचारी, माता-पिता के स्नेह से वंचित, शत्रुओं से घिरा हुआ,लोभी किंतु परोपकारी रहता है। हर कार्य विलंब से संपन्न होता है।दशमस्थ शनि उच्च, स्वक्षेत्र में हो तो वह उत्तम फलदायी रहता है। जातकको खेती से लाभ होता है, मित्र परिवार बड़ा रहता है। वह समाजसेवी,परोपकारी एवं समाज में प्रतिष्ठित होता है। जीवन के 25वें साल में पुण्य काकाम होता है। 36वें वर्ष में जातक का भाग्योदय होता है। दशमस्थ शनि जातक को आध्यात्मिक बनाता है। मीन राशि का शनि दशमस्थान में हो तो जातक संन्यासी बनता है।
यवन एवं पाश्चात्य ज्योतिषविदों ने भी शनि के दशमस्थ होने के ऐसे ही
फल बताए हैं। दुर्बल एवं पापयुक्त शनि दशम स्थान में हो तो माता-पिताके सुख में न्यूनता, आर्थिक हानि, आर्थिक विषय में वाद-विवाद, अधिकारियोंसे मतभेद, पदावनति आदि बुरे फल प्राप्त होते हैं।
दशम भाव-शनि जब कुंडली के दसवें भाव में हो तो जातक न्यायप्रिय,परिश्रमी, संघर्षशील, धनी, सरकार से सम्मानित, नेता या धर्मनेता, उदर रोगी तथाकर्मठ होता है, किन्तु देखा जाता है कि तरंग आने पर वह गधे की तरह काम मेंजुटता है। तरंग न आने पर मगरमच्छ की तरह पड़ा भी रहता है।) ऐसे जातक कीमाता प्रायः कष्ट या दुख में रहती है तथा दाम्पत्य सफल नहीं रहता अथवा पत्नीसे कलह या अनबन रहती है।
माता-पिता से दूर रहने वाला/अलग हो जाने वाला होता है। (ऐसा जातक यद्यपि
लाल किताब के अनुसार यदि दसवें शनि के साथ गुरु दूसरे भाव में भी हो
तो जातक राजा की भांति जीवन जीने वाला तथा-धनाद्य होता है। शनि शुभ हो तोजातक जितना मान औरों को देता है, उतना ही उसे मिलता है। परन्तु यदि वहशराब पीए तो दसवां शनि अशुभ हो जाता है।
दसवें शनि के कारण प्रायः जातक को प्रारम्भ में आजीविका के लिए कठोर
श्रम करना पड़ता है परन्तु बाद में लक्ष्य प्रास हो जाता है। ऐसे जातक को माता-पिता से अलग/दूर होना पड़ता है। साथ रहने पर वैमनस्य तो रहता ही है, पिता-पुत्र दोनों की प्रगति बाधित होती है (जातक को पैतृक सम्पत्ति प्रास नहीं होती,पिता को व्यावसायिक सफलता नहीं मिलती)। कारोबार बन्द हो जाता है या कर्जालेकर चुकाना भारी हो जाता है। अग्निराशि में शनि गूढ़ शास्त्रों को पढ़ने की रुचिदेता है। ऐसा जातक प्रायः अध्यापनवृत्ति से जीविका चलाता है।अन्य राशियों का दसवां शनि जातक को पुजारी, धर्म प्रचारक, धार्मिक नेता,प्रवचनकर्ता, संन्यासी या ज्योतिषो बनाता है। ऐसा जातक औरों को उपदेश देता है।किन्तु स्वयं उनका पालन नहीं करता। अशुभ प्रभाव का शनि पूर्व जन्मों के करमोंके कारण कष्टकारी होता है। चन्द्र व शुक्र का अशुभ प्रभाव शनि पर हो तो जातकवृद्धावस्था में भी काम विकार से पीड़ित होता है।
दशम भावः दशम भावस्थ शनि स्वराशिस्थ या उच्च राशि का होकरवक्री हो तो माता-पिता से वियोग कराता है। इसमें दत्तक पुत्र होना, माता-पिताका न रहना अथवा दोनों के साथ वैमनस्य रहना आदि कारण हो सकते हैं।पिता-पुत्र एकसाथ नहीं रह पाते, रहें तो दोनों की प्रगति नहीं होती तथा पिताको अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं। व्यवसाय में हानि होना अथवा व्यवसायबदलना, व्यवसाय का नष्ट होना, ऋणग्रस्त रहना अथवा कारावास होना जैसेफल मिलते हैं। नौकरी में बर्खास्तगी, जल्दी-जल्दी स्थानांतरण होना, फौजदारी
में जेल काटना आदि फल हो सकते हैं। दशमस्थ शनि स्वदेश में उन्नति नहींहोने देता, पैतृक संपत्ति नहीं मिलती। किसी प्रकार मिल जाए तो नष्ट होने परही स्वार्जित संपत्ति होती है, पूर्वार्जित संपत्ति रहने तक जातक सफलता प्राप्तनहीं कर पाता। अग्नि और जल राशि का शनि हो तो उच्च शिक्षा प्राप्त करन्याय कायों से जुड़ जाता है अथवा प्राध्यापक होता है। पृथ्वी और वायु राशिमें हो तो धर्मगुरु, साधु या ज्योतिषी बन जाता है, लेखन से भी लाभ मिलताहै। इस भाव के शनि के दो फल प्रायः अनुभव में आते हैं कि जातक या तो कामासक्त या कामशास्त्रो पदेशक अथवा वेदान्ती होता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक शासन कीआलोचना करनेवाला, श्वसुर का अनुसरण करनेवाला, माता-पिता एवंभाई-बहनों का कम सुख पानेवाला होता है। पत्नी सदाचारिणी रहती है।
2. वृषभवृषभ राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक धैर्यवान,परिवार का प्रिय, राजनीतिक समीक्षक होता है। माता-पिता के साथ मतभेदरहते हैं। जन्म स्थान से उसे दूर रहना होता है। पत्नी सदाचारिणी, श्वसुर दुष्टकिंतु प्रभावशाली एवं प्रसिद्ध रहता है। जातक श्वसुर का अनुगामी बनता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक सुखी,अधिकारसंपन्न, यशस्वी, धैर्यवान, कार्यकुशल, परिवार में प्रिय रहता है।माता-पिता से मतभेद रहते हैं। जन्म स्थान से उसे दूर रहना होता है।
4. कर्ककर्क राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक, लेखक,सुधारक, समाज में विख्यात, सरकारी कर्मचारी, सुखी, संपन्न, आस्तिक, माताके सुख से परिपूर्ण, पिता के सुख से न्यून रहनेवाला होता है। पिता का अन्यस्त्री से संबंध रहता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखी,कार्य को जल्दी करनेवाला एवं समाजसेवी होता है। पत्नी का स्वभाव गर्म होताहै। मातृसुख उत्तम रहता है। पिता का अन्य स्त्री से संबंध होने के कारण पिताका सुख प्राप्त नहीं होता।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न,सरकारी कर्मचारी, यशस्वी, सुखी, माता-पिता का आज्ञाकारी होता है। पत्नीविद्वान, क्रोधी एवं क्रूर रहती है। संतान सुख में बाधा रहती है।
7. तुला-तुला राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सरकारीकर्मचारी, यशस्वी एवं सुखी होता है। संतान सुख में बाधा संभव रहती है।पत्नी सुशिक्षित रहती है।
8. वृश्चिक-वृश्चिक राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक सुखी,संपन्न, विद्वान, सरकारी कर्मचारी, समृद्ध एवं कटुभाषी रहता है। माता-पिता एवंसहोदरों का उसे उत्तम सुख प्राप्त रहता है। पुत्रसुख में बाधा. रहती है।
9. धनु-धनु राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक संपन्न, सुखीएवं यशस्वी होता है। जातक स्वयं एवं उसकी मां दोनों ही कटुभाषी होते हैं।माता-पिता के साथ अलगाव रहता है।
10. मकर-मकर राशि का शनि दशम स्थान में हो जातक अधिकारसंपन्न,दीर्घायु, बुद्धिमान एवं यशस्वी रहता है। ननिहाल का सुख अच्छा रहता है।11. कुंभ-कुंभ रशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक आस्तिक,धार्मिक, पराक्रमी, यशस्वी एवं आर्थिक दृष्टि से संपन्न रहता है। ननिहाल कासुख उत्तम रहता है।
12. मीनमीन राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक परोपकारी,आस्तिक एवं अधिकारसंपन्न होता है। समाजसेवा एवं लोकोपयोगी कायों मेंजातक यश प्राप्त करता है। बचपन दुखपूर्ण एवं सहोदरों का सुख उसे कमरहता है। महर्षि गर्ग के मतानुसार जातक वर्णसंकर होता है।
1. अंधों को दान न देवे।
2. गणेशजी का पूजन करें।
3. शनि सबन्धीवस्तुऐं दान करें।
===========================
11)एकादश भाव - एकादश स्थान (लाभ भाव)लाभस्थान में शनि के फल
आचार्य व गुणाकर -- प्रभूतधनवान् । यह बहुत धनवान होता बव्हायुः स्थिरविभवः शूरः शिल्पाश्रयो है। यही गुणाकर कहता है।
कल्याणवर्मा-विगतरोग:। आयस्थे भानुसुते धनजनसम्पद्युतो भवति ।। यह दीर्घायु, धनवान, शूर, शिल्प के आश्रय से जीविका चलाने वाला, नीरोग तथा परिवार से युक्त होता है।
वसिष्ठ -- रविजः सुकीर्तिम् । कीर्तिमान होता है।
गर्ग -- स्थिरसम्पत्तिभूलाभी शूरः शिल्पान्वितः सुखी। निर्लोभश्च शनौ कैश्चित् मृत प्रथमजीविकः । इस की सम्पत्ति, जमीन आदि स्थिर होती है। यह शूर तथा शिल्प से युक्त, सुखी एवं निर्लोभी होता है। इस की पहली सन्तति मृत होती है।
पराशर --एकादशे धनानां च सिद्धि मित्रसमागमम् ।। धन प्राप्त होता है तथा मित्रों की संगति मिलती है।
वैद्यनाथ -- भोगी भूपतिलब्धवित्तविपुलः प्राप्ति गते भानुजे । दासीदासकृषिक्रि यार्जितधनं धान्यं समृद्धं शनिः ॥ यह राजा कृपा से
की विपुल धन प्राप्त कर अच्छा उपभोग करता है। इसे दासदासीयों से तथा खेती से धन धान्य मिलते हैं ।
आर्यग्रन्थ--सूर्योत्मजे चायगते मनुष्यो धनी विमृश्यो बहुभाग्यभोगी । मितानुरागी मुदितः सुशीलः स बालभावे भवतीतिरोगी । यह धनवान, विचारशील, भाग्यवान, आनन्दी, शीलवान होता है। बचपन मे रोगी रहता है। बृहद्यवनजातक--कृष्णाश्वानामान्द्रनीलोर्णेकानां नांनाचंचद्वस्तु- दन्तावलीनाम् । कुर्यान्मनवान्तं प्राप्ति बलीयान् प्राप्तिस्थाने वर्तमानोऽर्क्रसूनुः ।। इसे काले घोड़े, इन्द्रनील रत्न, हस्तिदन्त आदि विविध वस्तु की प्राप्ति होती है।
नारायण भट्ट--स्थिरं वित्तमायुः स्थिरं मानसं च स्थिरार्नव रोगादयो न स्थिराणि। अपत्यानि शूरः शतादेक एव प्रपंचाधिको लाभगे भानुपुत्रे ॥ यह हमेशा धनवान, दीर्घायु, शूर तथा स्थिर चित्त का होता है। इसे दीर्घकाल तक रोग नही होते। इसकी सन्तती स्थिर नही रहती। प्रपंच बड़ा होता है।
जागेश्वर -- धनं सुस्थिरं दन्तिनस्तस्य गेहे भयं चाग्निना जायते देह दुःखं । न रोगा गरिष्ठास्तदङ्गे कदाचित् यदा लाभगो मन्दगामी जनानाम् ॥ यह सदा धनवान होता है। घर में हाथी पलते है। इसे आग से भय तथा शरीर
मे दुःख होता है। बड़े रोग नही होते ।
काशीनाथ -- छायात्मजे तु लाभस्थे सर्व विद्याविशारदः । खरोष्ट महिषैः पूर्णो राजमान्योऽशुचिर्भवेत् ॥ यह सब विद्याओं में प्रवीण, राजमान्य, किन्तु अपवित्र होता है। इस के घर मे ऊँट, भैंसे, गधे आदि प्राणी बहुत होते है।
जयदेव -- कृष्योर्णिकाश्वगजनीलबलाढ्यता स्यात् सद्वस्तुता भवति लाभगतेऽर्कसूनै । खेती, ऊन, घोडे, हाथी, नीली वस्तुएं आदि अच्छी चीजों से यह समृद्ध होता है।
हरिवंश -- पृथ्वीपालं मानलाभं धनं च । विद्यालाभं पण्डितेभ्यः प्रसूतौ । नानालाभ सर्वतो मानवस्य । लाभस्थाने भानुपुत्रो विदस्यात् ॥ इसे राजा से सन्मान, पण्डितों से विद्या, धन आदि कई लाभ होते है।
लखनौ के नबाब-- साहेबदर्दो नेकः शीरीं सखुनस्तवबंगरोना स्यात् याफ़्तमकाने जोहलः ईशः साबिरो रिपुहन्ता ॥ यह दयालु, शुध्द आचरण करने वाला, मधुर भाषी, धनवान, बहुत लोगों का दयालु मालिक, संतुष्ट और शत्रु को जीतने वाला होता है।
घोलप--यह उत्तम गुणों से युक्त, तेजस्वी, शत्रु का घात करने वाला, अच्छे घर में रहने वाला होता है। इस का मन सत्संगति से शुध्द होता है। नीतिमान और कष्ट मुक्त होता है।
गोपाल रत्नाकर--यह बहुत श्रीमान, राज पूज्य होता है। इसे भूमि का लाभ होता है। शिक्षा में रूकावट आती है। इस को और इस के पिता को बडे भाई नही होते। वाहन सुख मिलता है।
पाश्चात्य मत -- यह शनि तुला, मकर और कुम्भ में शुभ सम्बन्धित हो तो आयु के उत्तरार्ध में साम्पत्तिक सुख बहुत अच्छा मिलता है । धन प्राप्ति का प्रमाण अच्छा होता है और संचय भी होता है। मित्र कम होते है। यह शनि सन्तति के लिये अनुकूल नही है। स्त्री वन्ध्या होती हैl
अथवा देर से सन्तति होती है या हो कर नष्ट होती है। सन्तति से कष्ट होता है। इस स्थान में पीड़ित शनि के कारण मित्रों से नुकसान होता है। किसी की जमानत लेने या पैसे उधार देने से नुकसान होता है। इस शनि से रवि-चन्द्र का अशुभ योग हो तो वह दारिद्रयोग होता है। यह पीड़ित शनि चर राशि में हो तो मित्रों के कारण सर्वनाश होता है। स्थिर राशी में हो तो पूर्ण आयु में कष्ट होते है। द्विस्वभाव राशी में हो तो सभी आशाएं भग्न हो कर सर्वत्र असफ बहुत लता ही प्राप्त होती है। इस के दिये हुये कर्ज कभी वसूल नही होते।
भृगु सूत्र - बहुधनी। विघ्नकरः । भूमिलाभः । राजपूजितः । उच्चे स्वक्षेत्रे विद्वान् महाभाग्ययोगः वाहनयोगः ।। यह धनवान होता है | किसी भी काम में विघ्न लाता है। इसे राजदरबार से सन्मान और भूमि का लाभ होता है। यह शनि, तुला, मकर या कुम्भ में हो तो वह विद्वान बहुत भाग्यवान और वाहन सम्पन्न होता है।
एकादश भाव में शनि ग्यारहवें भाव में शनि की स्थिति बहुत अच्छी कही गई है। जातकसम्पन्न, विद्वान्, चितंक, कामुक, मनोरंजन का शौकीन, ठंडे पानी के प्रतिरूचि रखने व सदा प्रसन्नचित्त रहने वाला परन्तु बचपन में रोगी होगा।
-मानसागरी
जातक के पास अच्छा स्वास्थ्य, चिरस्थयी संपत्ति व आय होगी।-फलदीपिकायदि ग्यारहवें भाव में शनि है तो जातक चिरंजीवी, उत्साही, कलानिष्णात, धनी, स्वस्थ, निरोगी और भाग्यवशात् समृद्ध होगा।
-सारावली
जातक भूखण्डों का स्वामी, राज्य कृपापात्र और सम्पन्न होगा। यदिशनि स्वक्षेत्री या उच्च राशि में है तो जातक विद्वान्, प्रगतिशील,उच्चस्तरीय समृद्धि और सभी प्रकार के वाहन सुखों से युक्त होगा।
-भृगु
जातक विद्वान्, भयभीत, सम्मानित, धनी, पर्याप्त भू-संपदा कास्वामी, शिक्षा में बाधाओं का सामना करने वाला, वाहनों का स्वामी,राजनीतिक रूप से सफल व प्रतिष्ठित तथा प्रभावशाली होगा।
-डॉ रामन
हमारे विचार --इस स्थान में प्राचीन लेखकों ने बहुत शुभ फल बतलाए हैं। वे मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु तथा मीन में प्राप्त होते है। अन्य राशियों में अशुभ फल मिलते है ।
टिप्पणीविद्वानों ने इस स्थिति में संतान के विषय में कुछ नहीं कहा है।एकादश भाव से शनि की सीधी सप्तम दृष्टि पंचम भाव की और तीसरीव दसवीं क्रमशः लग्न व अष्टम भाव पर जाएँगी। लग्न पर तृतीय दृष्टिसे वह निरोगी, आयुर्भाव पर दशम दृष्टि होने से शायद चिरंजीवी होनाबताया गया। परन्तु सामान्यतः सप्तम दृष्टि पर पर्याप्त ध्यान नहीं दियागया। शनि यहाँ विवाह व संतान प्राप्ति में विलम्ब करता है।
पंचम भाव पर नकारात्मक प्रभाव होने के कारण जातक निसंतानहोता है। डॉ रामन के अनुसार एकादश भाव शनि शिक्षा में बाधाएँ उत्पन्नकरता है। बड़े भाई बहनों से अप्रसन्नता होती है।
दशम भाव में शनि का विस्तृत उसकी एकादश भाव में स्थिति कोसमझने में सहायक होता है।
हमारा अनुभव -- इस स्थान में मिथुन, सिंह, धनु में शनि पुत्र सन्तति नही देता। मुश्किल से एक पुत्र होता है । अन्य राशियों मे सन्तति होती है। पुत्र होने पर उन से सम्बन्ध अच्छे नही रहते । वे अलग रहते है। इस का स्वभाव कंजूस, लोभी होता है, कभी दान नही देता। इसे कोई ठग नही सकता। चुनाव में जीतते है। प्रधान पद मिलता है। इसे पूर्व तथा उत्तर आयु में कष्ट होता है, सिर्फ जीवन का मध्यकाल कुछ सुख से बीतता है। पूर्व आयु में परिस्थितिवश सभी कष्ट रहते है। उत्तर आयु में स्त्री पुत्रों से कष्ट होता है। धन अच्छा मिलता है और संचय की प्रवृत्ति होती है। इन्हे अपने कष्ट से ही प्रगति करनी पडती है। अब सन्तति स्थानों में (१/३/५/७/९/११)शनि
का साधारण फल बतलाते है। इस व्यक्ती का स्वभाव हठी, दुराग्रही, प्रतिशोधपूर्ण, किन्तु ऊपर दिखाने के लिये मधुर बोलनेवाला होता है। इस की दुष्ता कुछ छुपी-सी रहती है। व्यसनों से स्वभावतः दूर रहते है। बुध्दि गहरी, संशयी, अविश्वासु, अपनी ही फिक्र करने वाला, दूसरों की परवाह न करने वाला, अपना ही सच मानने वाला, व्यवहार में स्पष्ट ऐसा यह व्यक्ति होता है। इसे सच्चे मित्र प्राप्त नही होते। ये जिला परिषद, नगर निगम आदि में भाग लेते है। किसी की जमानत लेने से इन्हें हानि होती है। ये बहुत लोभी होते है।
एकादश स्थान में सभी ग्रह शुभ फलदायी होते हैं। शनि भी एकादश स्थानमें सुफल देता है। ऐसा जातक भरपूर संपत्ति से युक्त, समाज में यशस्वी,निरोगी, दीर्घायु, पराक्रमी, शिल्पकला में प्रवीण, मित्र एवं लोकाश्रय से युक्तहोता है। स्थिर संपत्ति एवं नौकर-चाकर बड़ी संख्या में रहते हैं। खेती से भीउसे लाभ होता है।
महर्षि गर्ग के अनुसार प्रथम संतान अल्पायु होती है या मृत जन्म लेतीहै। जातक स्वयं बचपन में रोगी रहता है। कार्य संपन्न तो होता है किंतुविष्न-बाधाओं के बाद ही जातक शासन में प्रतिष्ठित एवं सम्मानित रहता है।मकर-कुंभ या तुला राशि का शनि दशम स्थान में हो तो जातक महाभाग्यवानहोता है।
यवन ज्योतिषविदों ने भी उपरोक्त फलों का समर्थन किया है। पाश्चात्यज्योतिषविदों के मतानुसार एकादशस्थ शनि संतान सुख में बाधक रहता है।संतान विलंब से होना, संतान होकर उसका अल्पायु होना, पत्नी बांझ होनाऐसे कुफल मिलते हैं। शनि बलवान हो तो उत्तम सुफल प्राप्त होते हैं। विशेषरूप से जीवन का उत्तरार्ध धन-संपत्ति से परिपूर्ण व्यतीत होता है। शनि दुर्बल,नीच या पापपीड़ित हो तो मित्रों के कारण परेशानियां उठानी पड़ती हैं। सूर्य-चंद्रके साथ शनि का एकादशस्थ होना फलदायक नहीं होता।
एकादश भाव-यदि लग्नकुंडली के ग्यारहवें भाव में शनि बैठा हो तोजातक दीर्घायु, क्रोधी, सुखी, योगी, कर्मठ, व्यापार में सफल, विद्वान, शक्तिसम्पन्नकिन्तु सन्तानहीन होता है। ऐसा मेरे सुयोग्य आचार्य श्री मदनमोहन कौशिक कामत है। मेरे गुरु श्री सुरेश दत्त शर्मा के अनुसार ग्यारहवां शनि जातक को बड़ाइंडस्ट्रियलिस्ट बनाता है। पाराशंरी ज्योतिष की दृष्टि से भी शनि जिस भाव में बैटताहै, उसको वृद्धि करता है। ग्यारहवां भाव आय और लाभ का है। अतः ऐसे जातकको धनाद्य तथा मोटी आमदनी वाला होना ही चाहिए। 'लाल किताब' के अनुसारभी ग्यारहवां शनि जातक को ‘स्वयं अपना विधाता' बनाता है। यहां शुभ शनि होतो जातक मिट्टी को भी हाथ लगाता है तो सोना हो जाती है। किन्तु अशुभ शनि होतो ऐन विपरीत फल होता है। यानी सोना भी छू दे तो मिट्टी हो जाए।
ग्यारहवां शनि हो तो शुभ प्रभाव बढ़ाने के लिए घर में जलकुम्भ स्थापितकरना चाहिए। ग्यारहवां शनि क्योंकि सातवीं दृष्टि से पांचवें घर को देखता है,अतः जातक की सन्तान व शिक्षा के लिए अच्छा नहीं होता। प्रायः पत्नी केबांझपन/गर्भपात के कारण सन्तान का अभाव रहता है और जातक की शिक्षा मेंव्यवधान सम्भव होता है।
ग्यारहवां शनि यदि पीड़ित हो तो लाल किताब के अनुसार संतान कष्टदायक,मित्र से धोखा (क्योंकि दसवीं दृष्टि आठवें घर पर और तीसरी दृष्टि लग्न परडालेगा) जातक को होता है। ऐसा जातक किसी को कर्ज दे तो पैसा वापस नहींमिलता। सूर्य व चन्द्र से अशुभ योग हो तो जातक दरिद्र होता है। किन्तु शनिस्वराशि या उच्च का हो तथा शुभ सम्बन्ध बनाए तो जातक को उत्तरार्ध में अच्छीसम्पत्ति व धन लाभ दिलाता है। मिथुन राशि में शनि ग्यारहवां हो तो जातक को पुत्रकी प्राप्ति नहीं हो पाती। अन्य राशियों में सन्तान तो होती है, किन्तु वैमनस्य होने सेपिता-पुत्र साथ नहीं रह पाते। चर राशि में शनि हो तो मित्रों से हानि व धोखामिलता है। द्विस्वभाव राशि में शनि जातक की सब आशाओं को निराशा में बदलदेता है। स्थिर राशि में संघर्षपूर्ण जीवन देता है। वैसे ग्यारहवां शनि हो तो जातककी अपनी बनाई जायदाद कम ही होती है। प्रायः पिता की जायदाद ही मिलती है।
एकादश भावः लाभ स्थान का शनि यदि तुला, मकर अथवा कुम्भ राशिका हो तो आयु के उत्तरार्ध में संपत्ति एवं धन का प्रचुर मात्रा में लाभ होता हैतथा धन का संग्रह भी होता है। संतान पक्ष के लिए ऐसी ग्रह स्थिति शुभ फलनहीं देती। या तो पत्नी में बन्ध्यत्व दोष होता है या संतान देर से उत्पन्न होतीहै। अपवाद रूप में होकर काल का ग्रास बन जाती है। किसी को दिया कर्ज नचुकने अथवा किसी की जमानत राशि जमा कराने से धन का व्यय होता है।मिथुन, सिंह या धनु राशि का शनि पुत्र संतान का अभाव रखता है। अन्यराशियों में संतान मिलती तो है, पर पिता-पुत्र में वैमनस्य बना रहता है। शनिजब सूर्य और चंद्र से अशुभ योग बनाता है तो दरिद्र योग ही बनाता है। चरराशि का पाप पीड़ित ग्रह आय भाव में हो तो मित्रों के कारण धन की हानिहोती है। स्थिर राशि का शनि हो तो यौवन काल कष्टमय व्यतीत होता है।द्विस्वभाव राशि का शनि जीवनपर्यन्त असफलता का कारण बनता है। किसीको दिया कर्ज वापस नहीं लौटता।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक आर्थिक स्थिरता प्राप्त नहीं करता। संतान अच्छी नहीं रहती। वह समाज में यशस्वी,सरकारी कर्मचारी एवं संपन्न रहता है। अपमृत्यु का भय रहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक दुबलेपनका शिकार एवं अल्पायु रहता है। पत्नी सुंदर एवं सुशील रहती है किंतु प्रसवके समय उसे मरणप्राय यातनाएं होती हैं एवं मृत्यु का भी डर रहता है। जातककी सास दुराचारिणी होती है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक धैर्यवानएवं शत्रुहंता रहता है। चोर एवं राजभय से धन का क्षय होता है। पत्नी सुंदर,खूबसूरत एवं आज्ञाकारिणी होती है। किंतु उसे प्रसवकाल में मृतप्राय यातनाएंसहनी पड़ती हैं। महर्षि लोमश के मतानुसार संतान सुख में बाधा रहती है।
4. कर्क-कर्क राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक सरकारीकर्मचारी, अधिकारसंपन्न, धनवान, लोकप्रिय, यशस्वी, संगीतादि ललितकलाओं में प्रवीण होता है। उसके शत्रु अधिक रहते हैं। जीवन संकटग्रस्त रहता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान, चतुर,दीर्घायु, मातृपितृभक्त, अधिकारसंपन्न, कलाकार, संगीतादि कलाओं का रसिक,स्वपरिश्रम से प्रगति करनेवाला, जन्म स्थान से अन्यत्र रहनेवाला एवं लोकप्रिय होता है।
6. कन्या कन्या राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान,चतुर, दीर्घायु, पराक्रमी, मातृपितृभक्त, धैर्यवान, क्रोधी, सरकारी कर्मचारी,सहोदरों से सुखी एवं संपन्न जीवन जीनेवाला होता है। उसे जन्म स्थान से अन्यत्र रहना पड़़ता है।
7. तुला-तुला राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक विद्वान,निरोगी, सरकारी कर्मचारी, मित्रों एवं सहोदरों से सुखी, संपन्न, आस्तिक,व्यवहारकुशल, लोकव्यवहारी एवं सुखी होता है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातकबचपन में रोगी लेकिन शेष जीवन में निरोगी, आस्तिक, विद्वान, व्यापारकुशल एवं लोकव्यवहारी होता है।
9. धनु-धनु राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक दयालु, उद्यमी,विद्वान, धैर्यवान, सरकारी कर्मचारी, धनधान्य से संपन्न, समाजसेवी एवं दीर्घायु होता है। संतान सुख में बाधा रहती है।
10. मकर-मकर राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,सत्यवादी, सुखी, संपन्न, व्यवहारकुशल, मधुरभाषी, विद्वान, लेखक या कविहोता है। महर्षि लोमश के मतानुसार जातक को पुत्रसुख में बाधा रहती है।
11. कुंभ-कुभ राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक दीर्घायु,लोकव्यवहार एवं बोलने में चतुर, विद्वान, साहित्यप्रेमी, सुंदर, बलवान,धनसंपत्ति से युक्त, वाद-विवाद एवं वकालता में यशस्वी होता है।
12. मीनमीन राशि का शनि एकादश स्थान में हो तो जातक धनवान,आस्तिक, दानकर्ता, समाजसेवी, दीर्घायु एवं यशस्वी रहता हैl
1. पीपल को सींचे।
2. अर्ध देवे।
3. लोहे का कड़ा अवश्य पहने यालोहे की अंगुठी पहनें।
==========================
12) बारहवां भाव - द्वादश स्थान (व्यय भाव)व्ययस्थान में शनि के फल
आचार्य व गुणाकार -- पतितस्तु रि:फे। यह पतित होता है।
कल्याण वर्मा विकलः पतितो रोगी विषमाक्षो निर्घृणो विगतलज्जः। व्ययभवनगते सौरे बहुव्ययः स्यात् सुपरिभूतः ॥ यह दुखी, पतित, रोगी, निर्दय, निर्लज्ज, बहुत खर्च करने वाला, अपमानित होता है। इसकी दोनो आँखे समान नही होती।
पराशर -- द्वादशे धनहानिं च व्ययं वा कुक्षिरूक् क्रमात् । धनहानि, खर्च बढ़ना तथा पसलियों में व्यथा ये इस शनि के फल है।
वशिष्ठ -- रविजः सुतीव्र: । यह बहुत तीक्ष्ण होता है। वैद्यनाथ मन्दे रि:फगृहं गते विकलधी: मूर्खोऽधनी वंचकः । यह मन्दबुध्दि, मूर्ख, निर्धन तथा वंचक होता है।
गर्ग -- नीचकर्माश्रितः पापो हीनांगो भोगलालसः । व्ययस्थानगते मन्दे क्रूरेषु कुरूते रूचिम् ।। यह नीच काम करता है। पापी, भोगलोलुप तथा क्रूर कामों में रूचि लेने वाला होता है। इस के किसी अवयव में व्यंग होता है।
बृहद्यवनजातक -- दयार्विहीनो विधनो व्ययार्तः सदालसो नीचजनानुयातः नरोऽगभंगोज्झितसर्वसौख्यों व्ययस्थिते भानुसुते प्रसुतौ ।। यह निर्दय, निर्धन, बहुत खर्च से पीडित, आलसी, नीच लोगों के साथ रहने वाला, किसी अवयव के टूटने से सदा दुखी रहता है |
आर्यग्रंथकार -- व्यये शनौ पंचगणाधिनाथो गदान्वितो हीनवपुः सुदुःखी। जंपाव्रणी क्रूरमतिः कृशांगो वधे रतः पक्षिगणस्य नित्यम् । यह बहुत लोगों का प्रमुख, रोगी, दुबला, दुखी, क्रूर, पक्षियों को मारने की रूचि रखने वाला होता है। इस का शरीर क्षीण होता है, जंघा में व्रण होता है।
काशीनाथ -- असद्व्ययी व्यये मन्दे कृतघ्नो वित्तवर्जितः बन्धुवैरी: कुवेषः स्याच्चंचलश्च सदा नरः ।। यह बुरे काम में धन खर्च करता है। निर्धन, कृतघ्न, चंचल, बुरा वेष धारण करने वाला तथा रिश्तेदारों को वैरी मानने वाला होता है ।
जागेश्वर -- व्यये संप्रयुक्तोऽलसो नीचसेवी कृतस्तस्य सौख्यं जनो याति नाशं । यदा सौरिनामा गतश्चान्त्यभावम् ।। यह खर्चीला, आलसी नीच लोगों का सेवक, दुखी होता है। इस के स्वजनों का नाश होता है। जयदेव --विदयो विधनः स्वकर्महीनो विसुखो हीनतनुर्व्ययेऽर्कपुत्रे ।। यह निर्दय, निर्धन, दुखी, अपने काम को छोडने वाला और इस में शरीर दोष होता है।
मन्त्रेश्वर -- निर्लज्जार्थसुतो व्ययेंऽगविकलो मूर्खो रिपूत्सारितः । यह निर्लज्ज, निर्धन, पुत्र रहित, मूर्ख, शत्रूद्वारा पराजित तथा किसी अवयव में व्यंग युक्त होता है।
हरिवंश --स्वस्य देशे सदालस्ययुक्तो नरो बुध्दिहीनस्तथोद्विग्नचित्तो । बुध्दिभ्रंशं मानभंगं कुसंगं माद्यं शाल्पं देहजाड्यं
नरस्य । बन्धोर्वेरं वित्तहानिः प्रसूतै कुर्युराज्यब्दकुधरे व्ययस्थः ॥ यह अपनी जन्मभूमि में हमेशा आलसी, उद्विग्न रहता है। बुद्धिहीन अथवा बुद्धिभ्रष्ट, अपमानित, बुरी संगति में रहने वाला, मन्द, जड शरीर का, रिश्तेदारों से वैर करने वाला होता है। इस के धन की हानी होती है।
नारायण भट्ट -- व्ययस्थे यदा सूर्यसूनौ नरः स्यादशूरोऽथवा निस्त्रपो मन्दनेत्रः। प्रसन्नो बहिर्नो गृहे लग्नपश्चेद् व्ययस्थो रिपुध्वंसकृद् यज्ञभोक्ता | यह शूर नहीं होता। निर्लज्ज होता है। इस की आँखे मन्द दृष्टि की होती है। यह घर में प्रसन्न नहीं रहता, बाहर प्रसन्न रहता है। यह शनि यदि लग्नेश में हो तो शत्रु का घात कर यज्ञ करने वाला व्यक्ति होता है ।
लखनौ के नवाब --तंगहालो बदफेल: पापासक्जश्च मुक्तिसो मनुजः। जोहलः खजेमकाने भवति हरीशः कृपालुः स्यात् ॥ यह कठिन स्थिती में रहता है। दुराचारी, पापी, बलवान, दयालु होता है।
घोलप यह क्रुर, दुखी, दुर्बुद्धि, आप्त लोगों से रहित, खर्चीला, बुरी संगति में रहने वाला होता है।
गोपाल रत्नाकर --यह विद्वान, अंग हीन होता है। साथ में पाप ग्रह हो तो नेत्र हीन होता है। शुक्र से युति हो तो सुखी, सब कामों में रूचि रखने वाला होता है। यह कुछ तिरछा देखता है। पाप कर्म करता है।
पाश्चात्य मत-- इस की प्रवृत्ति एकान्तप्रिय, संन्यासी जैसी होती है। गुप्त शत्रुओं के कारण प्रगति में बारबार रूकावटें आती है। किसी पशु के कारण दुर्घटना होती है। यह अपने हाथ से ही अपना नुकसान करता है। अज्ञातवास, कारावास, विषप्रयोग, झुठे इलजामों से कैद आदि से कष्ट होता है। यह शनि पाप ग्रह से पीड़ित और राशि से बल हीन हो तो ये अशुभ फल तीव्र होते है । यही शुभ सम्बन्धित हो तो एकांत प्रियता और जिन व्यवसायों में लोगों से विशेष सम्बन्ध नही आता उन से लाभ हाता है। भिक्षागृह,
अस्पताल, कारागृह, दानसंस्था आदि से सम्बन्ध रहता है। ये लोग गुप्त रीति से धनसंचय करते है। गुप्त नौकरी, हलके काम आदि से लाभ होता है। यह शनि बुध से अशुभ सम्बन्ध में हो तो पागलपन की सम्भावना होती है। मंगल से अशुभ सम्बन्ध हो तो दुर्घटना, खुन या आत्महत्या द्वारा मृत्यु होती है। हर्षल से अशुभ सम्बन्ध हो तो अधिकारी और बड़े लोगों से शत्रुता होने से अपमान और दुष्कीर्ति होती है। रवि-चन्द्र से अशुभ सम्बन्ध हो तो प्रिय व्यक्ति की मृत्यु से खेद होता है। इस शनि से साधारणत: उदास और शोकपूर्ण प्रवृत्ति होती है।
भृगुसूत्र -- पतितः । विकलांग: । पापयुते नेत्रच्छेदः । शुभयुते सुखी सुनेत्रः । पुण्यलोकप्राप्तिः । पापयुते नरकप्राप्तिः अपात्रव्ययकारी निर्धनः शुभयुते राजयोगकरः || यह पतित, विकलांग होता है। पाप ग्रह के साथ हो तो आंखे अन्धी होती है, अयोग्य काम में धन खर्च करता है। निर्धन होता है। मृत्यु के बाद नरक में जाता है। शुभ ग्रह के साथ हो तो सुखी होता है। आँखे अच्छी होती है। राजयोग होता है। मृत्यु के बाद अच्छी गति मिलती है।
द्वादशस्थ शनि जातक को समाज व पंचायतादि का अध्यक्ष बनाता है।उसका शरीर रोगी व शिथिल और प्रतिकूलताओं से असंतुलित मस्तिष्कवाला, जंघा पर घाव, नीच मानसिकता और चिडीमार होगा।
-मानसागरीजातक निसंतान, दरिद्र, विकृत हाथ पैरों वाला, मूर्ख, शत्रुओं सेपराजित और उद्दण्ड होगा।
-फलदीपिका
व्यक्त दृष्टि दोष से ग्रस्त, क्रूर, निर्लज्ज, बातूनी, हताश, नैतिक रूपसे गिरा हुआ, खर्चीला और अपमानित होगा।
-सारावली
जातक पाप प्रवृत्त व शरीर के किसी अंग में रोग होगा। यदि शनिपापाक्रन्त है तो जातक को दृष्टि दोष होगा। जबकि शुभयुत होने पर वहप्रसन्न अच्छी दृष्टि वाला और मृत्यु के बाद स्वर्गगामी होगा। यदिपापाक्रान्त शनि द्वादश भाव में है तो जातक नर्कगामी और अपव्ययी होगा।
-भृगु
जातक की आँखों में भैंगापन, व्यापार में हानि, गुहय विदाओं काज्ञाता, दरिद्र, विकृत रचना वाला, बहुत से शत्रुओं वाला, अपव्ययी, दक्ष
और जीवन के उत्तराद्ध में योग के प्रति आकृष्ट होगा।
-डॉ बी.बी.रमन
टिप्पणी
व्ययभाव से शनि की तीसरी दृष्टि धन भाव अर्थात द्वितीय भाव(धन, परिवार, नेत्र, वाणि) पर जाएगी। जिससे जातक के हाथ, पैर, दृष्टितथा वाणी में विकार और परिवार में परेशानियाँ होंगी। शनि की सप्तमदृष्टि छठे भाव पर होगी। जो रोग वृद्धि करके रोगी शरीर तथा शत्रुओं सेपरास्त करेगा। शनि की दशम-दृष्टि नवम भाव पर जातक को भाग्यहीनऔर निसंतान बनाती है।
द्वादशस्थ शनि की स्थिति के कारण (कुटुम्ब भाव,षष्ठ भाव तथा नवम भाव पर दृष्टियाँ) वैरागीयों या महात्माओं कीकुण्डलियों की ओर आकृष्ट किया। शैय्या-सुख के भाव से शनि धन वपरिवार के भाव को और धर्म के भाव को देखते हुए जातक को लौकिकमनोरंजनो, पारिवारिक विमुखता देते हुए, आत्मोन्नति की ओर अग्रसरकरता है। अत: महर्षि भृगु के अनुसार भी जातक मरणोपरांत स्वर्गगामीहोता है।
हमारे विचार -- प्राचीन लेखकों ने इस स्थान में शनि के फल प्राय: अशुभ ही बतलाये है। ये दूषित शनि के फल है। इसे हर्षित ग्रह कहा गया है, किन्तु फल अशुभ बतलाए है।
हमारा अनुभव -- व्ययस्थान में मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु, मीन में शनि शुभ फल देता है। ये किसी विषय में प्रवीण होते है। बुध्दि तीव्र होती है। वकील बैरिस्टर, राजनीतिज्ञ, विद्वान होते है। अवकाश मिलने पर संस्था स्थापन करना, उनका काम देखना आदि से कीर्ति प्राप्त होती है। राजनीतिक झगडों में इन्हे दीर्घ कारावास होता है। घर से बाहर रहना पडता है। इन की पत्नी भी इन के ही समान प्रौढ, गम्भीर रहती है, अत: इन में पति पत्नी प्रेम कैसा है यह कहना कठिन होता है। ये व्यवहारी, दुबले पतले होते है, एक आँख से काने हो सकते है। एक दो सन्तान होती है। ये प्रसिध्द होते है, किन्तु इन के पुत्र पौत्रों की अवनती ही होती है। ये अपनी संस्कृति को कभी छोड़ना नही चाहते, उसी को सब से अच्छा समझते है। वृषभ, कन्या, तुला, मकर, कुम्भ में वकील, बैरिस्टर, डाक्टर आदि होने का योग होता है। अपने व्यवसायमें इन्हे किर्ती मिलती है। बी.एस.सी., एम.एस.सी., डी.एस.सी, डी.लिट्, आय.ए.एस. आदि उपाधियां प्राप्त होती है। इन्हें पहले कन्या सन्तति होती है। पुत्र हो तो जीवित नहीं रहता। सन्तति काफी होती है। इन्हें माता-पिता का सुख अच्छा मिलता है। ये लोग सार्वजनिक काम में भाग नहीं लेते । अपने को बहुत श्रेष्ठ मानते है। मिथुन, वृश्चिक, कुम्भ में इस शनि से क्रांन्तिकारी प्रवृत्ति होती है। इन की मृत्यु से भी इन्हे चिरकालीन कीर्ति मिलती है। स्त्रियों की कुण्डली मे भी यह शनि कीर्ति देता है।
कुछ प्रसिध्द उदाहरण स्व. दादासाहब खापर्डे, अमरावती (प्रसिध्द काँग्रेस नेता) (वृषभ),सरदार माधवराव किबे, इन्दौर (कुम्भ), सदाशिव शास्त्री भिडे, पुणे (कुम्भ), स्व. शिवराम पवार (तुला), स्व. पेंढारकर, (कन्या), नेताजी सुभाषचन्द्र बोस (वृश्चिक); स्व. प्रो. विश्वनाथ बलवन्त नाईक (मीन), दीवानबहादुर सिद्दप्पा, तोहप्पा कम्बली (मिथुन), स्व. विष्णुशास्त्री चिपलूनकर (मकर), स्व. बलवंत पांडुरंग किर्लोस्कर (मकर), प्रसिध्द मराठी अभिनेता स्व. भाऊराव कोल्हटकर (कन्या), सर मोरोपंत जोशी (सिंह), स्व. महारानी जमनाबाई गायकवाड, बडोदा (वृषभ), महारानी लक्ष्मीबाई, झांसी (तुला),श्रीमती एनी बेझंट (कुम्भ), श्रीमती कमलाबाई किबे (मिथुन) ।
द्वादश स्थान में शनि हो तो जातक विवेकशून्य, अशांत, भ्रष्ट, निर्लज्ज,कृतष्न, निर्दयी एवं धोखेबाज और दुबला-पतला रहता है। स्वास्थ्य अच्छा नहींरहता। वह त्वचा रोग एवं नेत्रोगों से पीड़ित रहता है। आंखें छोटी-बड़ी रहतीहैं, नेत्रज्योति मंद होती है। द्वादशस्थ शनि के साथ अन्य पापग्रह हो तो जातकअंधा या गूंगा होता है।
जातक की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रहती। वह कर्ज में डूबा रहता है।आकस्मिक खर्च, नुकसान, चोरी के कारण धनक्षय होता है। संगत अच्छी नहींरहती। सामाजिक जीवन में सफलता प्राप्त होती है। लोकनेता भी बनता है।स्वजनों से स्नेहपूर्ण व्यवहार नहीं रहता। जन्म स्थान से अन्यत्र रहने पर प्रगति
होती है। आचार्य मंत्रेश्वर के मतानुसार पुत्रसुख में बाधा रहती है। हमारी राय में इसके लिए जन्मकुंडली में अन्य ग्रहयोग भी देखने चाहिए। प्रायः सभी भारतीय ज्योतिषाचायों ने व्ययस्थ शनि के अशुभ फल ही बताए हैं। महर्षि भृगु की राय अलग है। उनके अनुसार पापयुक्त, पापक्षेत्र में अथवा दुर्बल शनि द्वादश स्थान में हो तो अशुभ फलदायी होता है। व्ययस्थ शनि मित्रक्षेत्र में, शुभग्रहयुक्त हो तो जातक संपन्न, राजयोगी एवं पुण्यात्मा रहता है। सत्कार्य में धन खर्च करता है।यवन ज्योतिषाचार्य भारतीय ज्योतिषियों के इस मत से सहमत हैं कि अशुभशनि अशुभ फल देगा, शुभ शनि शुभ फल देगा।
द्वादश भाव-शनि यदि लग्न कुंडली में द्वादश भाव में हो तो जातक लंठबुद्धि, आलसी, रोगी, कटुभाषी, फिजूलखर्ची, बुरे आचरण वाला तथा माता के पक्ष (ननिहाल) के लिए खराब होता है। ऐसे जातक को पागलपन तथा जेलयात्रा काभी भय रहता है। नेत्र रोग संभव होता है। अगर जातक के सिर के बाल उड़ने लगेंतो वह और भी सुखी तथा धनवान होता है। किन्तु झूठ बोले या स्त्रियों से नाजायज सम्बन्ध बनाए तो यहां का शनि अशुभ प्रभाव देने लगता है। ऐसा कुछ लालकिताब के जानकारों का मत है।
लाल किताब के अनुसार ऐसा जातक प्रायः एकांतप्रिय या संन्यासी प्रवृत्तिका होता है। बहुत बार उसे अपने कार्यों से ही हानि उठानी पड़ती है।अज्ञातवास/कारावास/विष से देह हानि तथा असत्य अभियोग का दण्ड मिलने कीसम्भावना पूर्ण रूप से रहती है। शनि पापाक्रांत या होनबल हो तो उपरोक्त सम्भावनाएं और भी तीव्र हो जाती हैं। किन्तु बलवान व शुभ शनि हो तो जातककारागृह का अधिकारी, धर्मार्थ संस्था का कार्यकर्ता, चिकित्सालय/भिक्षागृह काप्रबन्धक बनकर लाभ प्राप्त करता है। गुप्त रीति से धनसंचय करती है। बुध के साथशनि का अशुभ योग हो तो चित्त भ्रम/पागलपन सम्भव होता है। मंगल से अशुभयोग करे तो अपघात या आत्मघात सम्भावित होता है। बारहवां शनि जातक कोप्रायः अडियल रवैये का भी बनाता है।
द्वादश भावः व्यय स्थान में शनि हो तो जातक की प्रवृत्ति एकान्त में रहनेकी होती है, छिपे शत्रुओं के कारण जातक की प्रगति में बार-बार अवरोधआते हैं, किसी चौपाए के कारण चोट लगती है। ऐसा जातक अपने कृत्यों सेही अपने कार्य को बिगाड़ लेता है। अज्ञातवास, कारावास, किसी के द्वारा विषदिया जाना, झूठे अभियोग लगने से प्रतिष्ठा की हानि जैसे दुष्फल व्ययस्थानगत शनि से मिलते हैं। शनि यदि शुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट होकरव्यय स्थान में हो तो जातक को कारागृह, चिकित्सालय, भिक्षागृह आदि केप्रबन्धन से या ऐसे व्यवसायों से जिनका संबंध आम आदमी से नहीं होता,लाभ मिलता है। ऐसे जातक गुप्त कारयों से धन संचय करते हैं। मंगल सेअशुभ संबंध हो तो अपघात, हत्या या आत्महत्या की सम्भावना, बुध सेअशुभ योग हो तो पागलपन और सूर्य-चंद्र से अशुभ योग हो तो किसी प्रियव्यक्ति की मृत्यु से आघात पहुंचता है।
राशिगत फल
1. मेषमेष राशि का शनि द्वादश स्थान में हो तो जातक विद्वान होकरभी दुर्बुद्धि, अभिमानी एवं धूर्त रहता है। उसे जन्म स्थान से अन्यत्र रहना पड़ताहै, सरकारी नौकरी करता है। वह माता एवं ज्येष्ठ भ्राता के सुख से वंचितरहता है।
2. वृषभ-वृषभ राशि का शनि द्वादश स्थान में हो तो जातक धूर्त, दुर्बुद्धिएवं अभिमानी रहता है। स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। जातक को बचपन में पानी,विष एवं सर्पभय रहता है। वह ठगबाजी, चोरी, तस्करी से हिंसा की ओर प्रवृत्त, आत्मघाती होता है, प्रायः विषपान से मृत्यु होती है। जन्म स्थान से उसे दूररहना होता है, शरीर में कोई दोष रहता है।
3. मिथुन-मिथुन राशि का शनि व्यय स्थान में हो तो जातक में चोरी,ठगबाजी, हिंसाचार जैसे दुर्गुण निहित होते हैं। बचपन में जहरीले जंतु के काटनेसे या पानी में डूबने से मृत्यु होती है। अभक्ष्य भक्षण से भी मृत्यु हो सकतीहै। मरणोपरांत शरीर की दुर्गति होती है। कपड़े के व्यवसाय में जातक कोलाभ होता है। पत्नी लोभी, दुष्टा, खर्चीली रहती है। चोरों से जातक को भयबना रहता है।
4. कर्क कर्क राशि का शनि व्यय स्थान में हो तो जातक हिंसाचारी रहताहै। पत्नी दुष्टा एवं खर्चीली रहती है। वैवाहिक जीवन सुख से वंचित रहता है।जातक का श्वसुर चोर, रिश्वतखोर या तस्करी करनेवाला होता है। कपड़े केव्यवसाय में उसे फायदा होता है और प्रवास एवं पशुओं के कारण धनक्षय होता है।
5. सिंह-सिंह राशि का शनि व्यय स्थान में हो तो जातक रोगी, हिंसाप्रिय,परस्त्रीगामी, सज्जनों का दुश्मन रहता है। विदेश प्रवास एवं पशुओं के कारणउसे आर्थिक नुकसान होता है, पुत्र सुख से वंचित रहना पड़ता है। जन्म स्थानसे अन्यत्र रहना पड़ता है।
6. कन्या-कन्या राशि का शनि व्यय स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, मित्रएवं पुत्रसुख से वंचित रहता है। उसे जन्म स्थान से अन्यत्र रहना होता है।
7. तुला-तुला राशि का शनि द्वादश स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, चोर,परस्त्रीलोलुप होता है। राजभय रहता है। उसे भाई-बहन एवं माता-पिता के सुखसे वंचित रहना पड़ता है। महर्षि लोमश के अनुसार कारागार में मृत्यु होती है।
8. वृश्चिक वृश्चिक राशि का शनि द्वादश स्थान में हो तो जातकविदेशप्रवासी, अभिमानी, धैर्यवान, पराक्रमी, राजनीतिकुशल, दुर्बुद्ध, परस्त्रीगामी,निर्दयी, चोर, कुसंगतियुक्त, झगड़ालू रहता है। आर्थिक स्थिति सामान्य रहतीहै। ज्येष्ठ पुत्र के सुख से वंचित रहना पड़ता है। मां, सहोदर एवं मित्रों सेबनती नहीं है। राजद्वार से भय रहता है।
9. धनु-धनु राशि का शनि व्यय स्थान में हो तो जातक बहुरूपी, जुआखोर,चोर, परस्त्रीगामी, विदेश प्रवासी रहता है। आर्थिक स्थिति साधारण रहती है,ज्येष्ठ पुत्र के सुख से वंचित रहना पड़ता है। वसीयतनामे या दत्तक विधानसे दूसरों की संपत्ति प्राप्त होती है।
10. मकर-मकर राशि का शनि द्वादश स्थान में हो तो जातक कुशलवक्ता, मधुरभाषी, परस्त्रीगामी, जुआरी, निर्दयी, अभिमानी, क्रोधी एवं चोररहता है। जातक पेटू एवं ग्रामीण वातावरण में रहनेवाला होता है। संतान सुखमें न्यूनता रहती है। वसीयत से संपत्ति प्राप्त होती है।
11. कुंभ-कुंभ राशि का शनि व्यय स्थान में हो तो जातक अनेक स्त्रयोंसे संबंध रखनेवाला, दुष्टबुद्धि, उत्पाती किंतु पुरुषार्थी होता है। मातृसुख एवंसंतान सुख में न्यूनता रहती है।
12. मीन मीन राशि का शनि द्वादश स्थान में हो तो जातक विदेशप्रवासी,नौकरीपेशा, पुरुषार्थी, कामातुर, अनेक स्त्रियों से संबंध रखनेवाला, उपद्रवीहोता है। मातृसुख में न्यूनता रहती है।
1.पांच बादाम लोहे के बर्तन में जो ढक्कन दान हो उसमें रखकर कपडाबांध कर रखें। खोले नहीं।
2. घी मंदिर में दान करें।
3. लोहे का घड़ाशक्कर भर कर दान करें।
===========================
शनि का राशिगत फल
जन्मराशि से पहलाः जन्मराशि में शनि भ्रमण करते समय रोग, सुख-शांति,अशांत पारिवारिक वातावरण, अग्नि या जहरीली वस्तु से शारीरिक कष्ट,आप्तजनों से मुठभेड़, स्वकीयों से दूर रहना, आवास की जगह में परिवर्तन,राज्य शासन से बंधन योग, आर्थिक स्थिति की दुरावस्था, शारीरिक निस्तेजताआदि फल प्राप्त होते हैं।
जन्सराशि से दूसराः दूसरे स्थान में शनि भ्रमण होने पर आर्थिक समस्याएंबढ़ती हैं। पत्नी को मृत्युसम पीड़ा होती है। परदेस यात्रा की संभावना रहती है।
जन्मराशि से तीसराः तीसरे स्थान में शनि भ्रमण होने पर सब तरह केलाभ, सुख, आर्थिक लाभ, अर्थसंचय, व्यावसायिक प्रगति, नौकर-चाकर,वाहन, पालतू पशु से लाभ, हर काम में चपलता, शत्रु विजय, जमीन-जायदादके व्यवहार में लाभ होता है।
जन्मराशि से चौथा: चौथे स्थान में जब शनि भ्रमण होता है तब खरचों मेंबढ़ोत्तरी, कार्य में असफलता, जमीन-जायदाद संबंधी समस्याएं, नौकरी मेंतबादला, प्रवास में क्लेश, सरकारी लोगों को अनेक प्रकार के कष्ट सहन करनेपड़ते हैं। अपमानजनक प्रसंग उपस्थित होते हैं।
जन्मराशि से पांचवां: पांचवें स्थान में शनि भ्रमण के समय खर्च मेंबढ़ोत्तरी, विद्याभ्यास में मन न लगना, संतान के बारे में समस्याएं खड़ी होना,बुद्धि श्रम, आर्थिक खींच-तान होना, व्यापार में मंदी, पत्नी को वातरोग सेक्लेश आदि कष्टकारक बातें होती हैं।
जन्मराशि से छठा: छठे स्थान में जब शनि भ्रमण होता है। तब सुख,आर्थिक लाभ, पारिवारिक सुख, शत्रु पराजय, प्लॉट खरीदने के लिए अनुकूलता,शारीरिक कष्टों से निवृत्ति, स्त्री भोगविलास प्राप्त, प्रेम प्रकरणों में सफलताआदि सुखदायक घटनाएं घटती हैं।
जन्मराशि से सातवां: सातवें स्थान में शनि भ्रमण के समय रोगभय, गुप्त रोगका प्रादुर्भाव, पत्नी को कष्ट, प्रवास में क्लेश, आर्थिक विकट समस्याएं, व्यवसायका दीवाला, पति-पत्ली में मनमुटाव आदि घटनाएं होती हैं।
जन्मराशि से आठवां: आठवें स्थान में शनि भ्रमण के समय परिश्रमअधिक लाभ कम, पत्नी एवं संतान का असहयोग, मृत्युपीड़़ा, बुरी संगत, जुएसे नुकसान, सुख साधन पास में होते हुए भी उनका उपभोग प्राप्त नहीं होता।
जन्मराशि से नौवां: नौवें स्थान में जब शनि का भ्रमण होता है तब जातकपर विष्न-बाधाओं का हमला होता है। विष्न-विलंब, हृदयरोग से क्लेश,तांत्रिक क्रिया से परेशानी होती है।
जन्मराशि से दसवां: दसवें स्थान में जब शनि प्रमण होता है तब रोगप्रादुर्भाव, आर्थिक साधनों में वृद्धि, नए कार्य का आरंभ, व्यवसाय में परिवर्तन,छाती के रोगों से कष्ट, पत्नी से मनमुटाव होकर अलग रहना, अपयश एवअपमान के प्रसंग आदि शुभाशुभ बातें होती हैं।
जन्पराशि से ग्यारहवां: ग्यारहवें स्थान में शनि भ्रमण का समय बहुत हीलाभकारी होता है। कीर्ति-वैभव, आर्थिक स्थिति में सुधार, पारिवारिक सुख,व्यवसाय में प्रगति, स्त्री के माध्यम से लाभ, लोहा, मशीनरी, सीमेंट, कोयला,जमीन की खरीद-फरोख्त में मुनाफा होता है।
जन्पराशि से बारहवां: जब बारहवें स्थान में शनि भ्रमण होता है तबधननाश, व्यर्थ कष्ट, रोगपीडा, आर्थिक संकट, भाग्यपतन, संतान को कष्ट,संबंधित प्रतिष्ठित व्यक्तियों से मतभेद, दूर की यात्राओं से कष्ट होता है।
===========================
शनि मार्केश - शनि मारकेश ( 2, 7, का पति ) में हो नीच का हो ( 3, 6, 11 को
छोड़कर) अष्टम् स्थान या छंठवें (6) स्थान में स्थान में हो तो शारीरिक नुकसान दुर्घटना या रोग उत्पन्न करता है।
उपाय- इसके लिए शिव पर दही का अभिषेक करावें। महामृत्युजंय का
सम्मपुट करवाकर रूद्री पाठ करावें।
सरसों के तेल का अभिषेक भी शास्त्रों में लिखा है।
सवा लाख महामृत्युञ्जय जप दशांश होम (हवन) व तर्पण तथा
ब्राह्मण भोजन करावें यह सबसे अचूक उपाय है।
(नोट: 25 हजार से कम महामृत्युजंय जप न करावें )
काले चने उबाल कर तेल लगाकर शनि भगवान पर चढ़ावें ।
काले घोड़े की नाल, जहाज की कील, हाथी का अंकुश इन तीनों में से
किसी की अंगुठी बनाकर मध्यमा में पहनें।
कम्बल या छतरी दान करें।
शनि मंदिर चिपया (चिमटा) या लोहे की बाल्टी दान करें।
साडेसाती व ढय्या (साढ़े साती के उपाय) (शनि) राशियाँ अनुसार:
1. मेष - 12 बादाम काले कपड़े में बांधकर अग्नि कोण में लोहे के पात्र
में रखें।
2. वृषभ - 12 बादाम और दो सूखे नारियल गंगा में बहा दें। शिवलिंग
दूध के जल से अभिषेक करें। मिट्टी का बन्दर दक्षिण में रखें।
3. मिथुन महामृत्युजंय का हवन करें। स्टार नीलम की अंगुठी धारण
करे।
4. कर्क - बिना चप्पल पहने मंदिर में नारियल का तेल रखें। 60 ग्राम
सूरमा शनिवार को जंगल में दबा दें।
5. सिंह - मिट्टी के बरतन में सरसों का तेल डालकर तालाब में दबा दें।
मिठाई व नमकीन बच्चों में बाढ़ काले गैस की चाल की अंगूठी धारण
करें।
6. कन्या- 10 नेत्रहीनों (अंधों) को भोजन खिलाएँ। साँप का पूजा
दूध से करें। कार्य सिद्धि के लिए 43 दिन तक रोजाना नंगे पांव जाकर
हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ करें।
7. तुला- कोनें को रोटी खिलावें। 43 दिन तक वटवृक्ष में मीठा दूध
डाले और उस मिट्टी से माधे में तिलक करें।
8. वृश्चिक रोटी पर सरसों का तेल लगाकर कुत्ते को देवें। भैरो स्त्रोत
का पाठ करें।
9. धन- छोटी कन्या को भोजन करावें। कुों में चार खोटे सिक्के
डालें।
10. मकर - शिव सहस्त्र नाम पाठ करें। बन्दर को गुड व फल खिलावें।
11. कुम्भ - ॐ नमः शिवाय का जप कर जल चढ़ावें नंगे पैर भैरो
मंदिर में शराब चढ़ावें। अपने माथे पर तेल न लगाकर दही का तिलक
करें।
12. मीन - सुन्दर काण्ड का पाठ करें।
शनि दशा दोष व पनोति (साडेसाती या दय्या) निवारण-
शनि की दशा या शनि की पनोती है जातक कष्ट पा रहा हो तो
शनि का अनुष्ठान ब्राह्मणों द्वारा करावे।
शनि के निवारण में पाँच 1% x 1% के पाटिये (पाटा) लकड़ी के
लेवे। एक पूर्व में, एक पश्चिम में, एक उत्तर में, एक दक्षिण में तथा एक
मध्य में स्थापित करे। एक अन्य पाट पर सर्वोतोभद्र मण्डल बनाकर
रूद्र कलश स्थापित करें।
मध्य :- सबसे पहले मध्य के गेहूँ का आसन (अर्थात् लाल या
सुनहरा कपड़ा) उस पर गेहूँ का आसन बनाकर सोने का दीपक या सोने
की कलई करवाकर रखे। उसके सामने ब्राह्मण अपना आसन लगाकर
पुरुष सूक्त के 11 बार पाठ करें।
पूर्व
पूर्व में पाट पर सफेद कपड़े पर चावल का आसन
(अष्टदल) बनाकर चाँदी का दीपक व गोघृत डाले। जो ब्राह्मण पूर्व में
बैठे वह रूद्री का पाठ करें।
उत्तर : उत्तर की तरफ तिल के तेल का दीपक काँसी के दिये में
जलावे। पाट पर पीले कपड़े पर चने की दाल का आसन बनावे। जो
ब्राह्मण बैठे वह लक्ष्मी सूक्त व ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं की माला जपे।
दक्षिण :- दक्षिण की तरफ पाट पर लाल कपड़े पर मसूर की दाल
का आसन बनाकर तिल का तेल का दीपक करें। दीपक ताँबे का बना
हो। जो ब्राह्मण इस दीये के सामने बैठा हो वह 21 माला महामृत्युज्जय
का जप करें।
पश्चिम :- पश्चिम अर्थात् मध्य दीये के पीछे यह दीपक लोहे का
बना हो आसन काला, उड़द पर दीपक रखें। इसमें सरसों का तेल डाले
जो ब्राह्मण इस दीपक के सामने बैठा हो वह शन्नो माला (शनि मंत्र )
11 जपे फिर यजमान को शनि की कथा सुनावें ।
सभी ब्राह्मण अपना-अपना कर्म करते रहे। यजमान अपने कर्म के
बाद से यज्ञ शुरू करवा सकते है। उसके बाद यज्ञ करें। इसमें काले तिल
शनि कथा के बाद हवन करें। इसके अन्दर शनि भगवान की
1008 आहुतियों से हवन करें अर्थात् शनि सहस्त्रनामावली से हवन
ये कार्य शनिश्चरी अमावस्या या किसी भी शनिवार को करें।
पाँच ब्राह्मण अपना कर्म पहले दिन शुरू करें तो यज्ञ शनिश्चरी
अमावस्या को करें या सभी कर्म उसी दिन करें लेकिन कार्य सूर्य उदय
होते ही शुरू कर लेवें। जिससे कर्म में कमी न आ सके। यजमान को
गणपतिपूजन, पुण्याहवाचन, नवग्रह पूजन-कलश स्थापन करें। फिर
शिव पर दूध का अभिषेक तिल डालकर करें।
कर्म पूरा कर तर्पण करें, ब्राह्मण भोजन करें। ब्राह्मण भोजन में
उड़द के आटे की मिठाई या दाल अवश्य बनावें ।
इसके करने पर शनि का कुप्रभाव समाप्त हो जाता है। धन में वृद्धि
होती हैं, रोग समाप्त होता है अर्थात् इलाज लागू होता है। रोग, दोष व
दरिद्रता नाशक उपाय है।
विशेष- मध्य में लाल गुलाब चढ़ावें ।
पूर्व में पीले कनेर या मोगरा ।
उत्तर में पीले फूल चढ़ावें ।
पश्चिम में कोईली के फूल या आसमानी फूल।
दक्षिण में लाल पुष्प ।
शनि यंत्र का पूजन कर उसे पानी में बहा देवे तो कष्ट समाप्त होगा।
"
शनि सम्बन्धी कष्टो के उपाय-
शनि सम्बन्धी कष्टो के उपाय-shani se sambandhit samasyaon ke upaay-
शनि के रत्न और उपरत्न उपाय
नीलम, नीलिमा, नीलमणि, जामुनिया, नीला कटेला, आदि शनि के रत्न और उपरत्न हैं। अच्छा रत्न शनिवार को पुष्य नक्षत्र में धारण करना चाहिये.इन रत्नों मे किसी भी रत्न को धारण करते ही चालीस प्रतिशत तक फ़ायदा मिल जाता है।
शनि की जडी बूटियो द्वारा उपाय
बिच्छू बूटी की जड या शमी जिसे छोंकरा भी कहते है की जड शनिवार को पुष्य नक्षत्र में काले धागे में पुरुष और स्त्री दोनो ही दाहिने हाथ की भुजा में बान्धने से शनि के कुप्रभावों में कमी आना शुरु हो जाता है।
शनि सम्बन्धी वस्तुओं की दानोपचार उपाय
जो जातक शनि से सम्बन्धित दान करना चाहता हो वह उपरोक्त लिखे नक्षत्रों को भली भांति देख कर, और समझ कर अथवा किसी समझदार ज्योतिषी से पूंछ कर ही दान को करे।
नक्षत्र👇
पुष्य, अनुराधा, और उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों के समय में शनि पीडा के निमित्त स्वयं के वजन के बराबर के चने, काले कपडे, जामुन के फ़ल, काले उडद, काली गाय, गोमेद, काले जूते, तिल, भैंस, लोहा, तेल, नीलम, कुलथी, काले फ़ूल, कस्तूरी सोना आदि दान की वस्तुओं शनि के निमित्त दान की जाती हैं।
दान विधि
शनि वाले नक्शत्र के दिन किसी योग्य ब्राहमण को अपने घर पर बुलाये.चरण पखारकर आसन दे, और सुरुचि पूर्ण भोजन करावे, और भोजन के बाद जैसी भी श्रद्धा हो दक्षिणा दे.फ़िर ब्राहमण के दाहिने हाथ में मौली (कलावा) बांधे, तिलक लगावे.जिसे दान देना है, वह अपने हाथ में दान देने वाली वस्तुयें लेवे, जैसे अनाज का दान करना है, तो कुछ दाने उस अनाज के हाथ में लेकर कुछ चावल, फ़ूल, मुद्रा लेकर ब्राहमण से संकल्प पढावे, और कहे कि शनि ग्रह की पीडा के निवार्णार्थ ग्रह कृपा पूर्ण रूपेण प्राप्तयर्थम अहम तुला दानम ब्राहमण का नाम ले और गोत्र का नाम बुलवाये, अनाज या दान सामग्री के ऊपर अपना हाथ तीन बार घुमाकर अथवा अपने ऊपर तीन बार घुमाकर ब्राहमण का हाथ दान सामग्री के ऊपर रखवाकर ब्राहमण के हाथ में समस्त सामग्री छोड देनी चाहिये.इसके बाद ब्राहमण को दक्षिणा सादर विदा करे.जब ग्रह चारों तरफ़ से जातक को घेर ले, कोई उपाय न सूझे, कोई मदद करने के लिये सामने न आये, मंत्र जाप करने की इच्छायें भी समाप्त हो गयीं हों, तो उस समय दान करने से राहत मिलनी आरम्भ हो जाती है। सबसे बडा लाभ यह होता है, कि जातक के अन्दर भगवान भक्ति की भावना का उदय होना चालू हो जाता है और वह मंत्र आदि का जाप चालू कर देता है। जो भी ग्रह प्रतिकूल होते हैं वे अनुकूल होने लगते हैं। जातक की स्थिति में सुधार चालू हो जाता है। और फ़िर से नया जीवन जीने की चाहत पनपने लगती है। और जो शक्तियां चली गयीं होती हैं वे वापस आकर सहायता करने लगती है।
शनि मंत्र- स्रोत्र द्वारा उपाय
विनियोग👉 शन्नो देवीति मंत्रस्य सिन्धुद्वीप ऋषि: गायत्री छंद:, आपो देवता, शनि प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:.नीचे लिखे गये कोष्ठकों के अन्गों को उंगलियों से छुयें. अथ देहान्गन्यास:-शन्नो शिरसि (सिर), देवी: ललाटे (माथा).अभिषटय मुखे (मुख), आपो कण्ठे (कण्ठ), भवन्तु ह्रदये (ह्रदय), पीतये नाभौ (नाभि), शं कट्याम (कमर), यो: ऊर्वो: (छाती), अभि जान्वो: (घुटने), स्त्रवन्तु गुल्फ़यो: (गुल्फ़), न: पादयो: (पैर).अथ करन्यास:-शन्नो देवी: अंगुष्ठाभ्याम नम:.अभिष्टये तर्ज्जनीभ्याम नम:.आपो भवन्तु मध्यमाभ्याम नम:.पीतये अनामिकाभ्याम नम:.शंय्योरभि कनिष्ठिकाभ्याम नम:.स्त्रवन्तु न: करतलकरपृष्ठाभ्याम नम:.अथ ह्रदयादिन्यास:-शन्नो देवी ह्रदयाय नम:.अभिष्टये शिरसे स्वाहा.आपो भवन्तु शिखायै वषट.पीतये कवचाय हुँ.(दोनो कन्धे).शंय्योरभि नेत्रत्राय वौषट.स्त्रवन्तु न: अस्त्राय फ़ट.ध्यानम:-नीलाम्बर: शूलधर: किरीटी गृद्ध्स्थितस्त्रासकरो धनुश्मान.चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रशान्त: सदाअस्तु मह्यं वरदोअल्पगामी..शनि गायत्री:-औम कृष्णांगाय विद्य्महे रविपुत्राय धीमहि तन्न: सौरि: प्रचोदयात.वेद मंत्र:- औम प्राँ प्रीँ प्रौँ स: भूर्भुव: स्व: औम शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तु न:.औम स्व: भुव: भू: प्रौं प्रीं प्रां औम शनिश्चराय नम:.
शनि बीज जप मंत्र 👉 ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम:। नित्य २३००० जाप प्रतिदिन।
शनि स्तोत्रम
शनि अष्टोत्तरशतनामावलि
ॐ शनैश्चराय नमः ॥ ॐ शान्ताय नमः ॥ ॐ सर्वाभीष्टप्रदायिने नमः ॥ ॐ शरण्याय नमः ॥ ॐ वरेण्याय नमः ॥ ॐ सर्वेशाय नमः ॥ ॐ सौम्याय नमः ॥ ॐ सुरवन्द्याय नमः ॥ ॐ सुरलोकविहारिणे नमः ॥ ॐ सुखासनोपविष्टाय नमः ॥ ॐ सुन्दराय नमः ॥ ॐ घनाय नमः ॥ ॐ घनरूपाय नमः ॥ ॐ घनाभरणधारिणे नमः ॥ ॐ घनसारविलेपाय न मः ॥ ॐ खद्योताय नमः ॥ ॐ मन्दाय नमः ॥ ॐ मन्दचेष्टाय नमः ॥ ॐ महनीयगुणात्मने नमः ॥ ॐ मर्त्यपावनपदाय नमः ॥ ॐ महेशाय नमः ॥ ॐ छायापुत्राय नमः ॥ ॐ शर्वाय नमः ॥ ॐ शततूणीरधारिणे नमः ॥ ॐ चरस्थिरस्वभा वाय नमः ॥ ॐ अचञ्चलाय नमः ॥ ॐ नीलवर्णाय नमः ॥ ॐ नित्याय नमः ॥ ॐ नीलाञ्जननिभाय नमः ॥ ॐ नीलाम्बरविभूशणाय नमः ॥ ॐ निश्चलाय नमः ॥ ॐ वेद्याय नमः ॥ ॐ विधिरूपाय नमः ॥ ॐ विरोधाधारभूमये नमः ॥ ॐ भेदास्पदस्वभावाय नमः ॥ ॐ वज्रदेहाय नमः ॥ ॐ वैराग्यदाय नमः ॥ ॐ वीराय नमः ॥ ॐ वीतरोगभयाय नमः ॥ ॐ विपत्परम्परेशाय नमः ॥ ॐ विश्ववन्द्याय नमः ॥ ॐ गृध्नवाहाय नमः ॥ ॐ गूढाय नमः ॥ ॐ कूर्माङ्गाय नमः ॥ ॐ कुरूपिणे नमः ॥ ॐ कुत्सिताय नमः ॥ ॐ गुणाढ्याय नमः ॥ ॐ गोचराय नमः ॥ ॐ अविद्यामूलनाशाय नमः ॥ ॐ विद्याविद्यास्वरूपिणे नमः ॥ ॐ आयुष्यकारणाय नमः ॥ ॐ आपदुद्धर्त्रे नमः ॥ ॐ विष्णुभक्ताय नमः ॥ ॐ वशिने नमः ॥ ॐ विविधागमवेदिने नमः ॥ ॐ विधिस्तुत्याय नमः ॥ ॐ वन्द्याय नमः ॥ ॐ विरूपाक्षाय नमः ॥ ॐ वरिष्ठाय नमः ॥ ॐ गरिष्ठाय नमः ॥ ॐ वज्राङ्कुशधराय नमः ॥ ॐ वरदाभयहस्ताय नमः ॥ ॐ वामनाय नमः ॥ ॐ ज्येष्ठापत्नीसमेताय नमः ॥ ॐ श्रेष्ठाय नमः ॥ ॐ मितभाषिणे नमः ॥ ॐ कष्टौघनाशकर्त्रे नमः ॥ ॐ पुष्टिदाय नमः ॥ ॐ स्तुत्याय नमः ॥ ॐ स्तोत्रगम्याय नमः ॥ ॐ भक्तिवश्याय नमः ॥ ॐ भानवे नमः ॥ ॐ भानुपुत्राय नमः ॥ ॐ भव्याय नमः ॥ ॐ पावनाय नमः ॥ ॐ धनुर्मण्डलसंस्थाय नमः ॥ ॐ धनदाय नमः ॥ ॐ धनुष्मते नमः ॥ ॐ तनुप्रकाशदेहाय नमः ॥ ॐ तामसाय नमः ॥ ॐ अशेषजनवन्द्याय नमः ॥ ॐ विशेशफलदायिने नमः ॥ ॐ वशीकृतजनेशाय नमः ॥ ॐ पशूनां पतये नमः ॥ ॐ खेचराय नमः ॥ ॐ खगेशाय नमः ॥ ॐ घननीलाम्बराय नमः ॥ ॐ काठिन्यमानसाय नमः ॥ ॐ आर्यगणस्तुत्याय नमः ॥ ॐ नीलच्छत्राय नमः ॥ ॐ नित्याय नमः ॥ ॐ निर्गुणाय नमः ॥ ॐ गुणात्मने नमः ॥ ॐ निरामयाय नमः ॥ ॐ निन्द्याय नमः ॥ ॐ वन्दनीयाय नमः ॥ ॐ धीराय नमः ॥ ॐ दिव्यदेहाय नमः ॥ ॐ दीनार्तिहरणाय नमः ॥ ॐ दैन्यनाशकराय नमः ॥ ॐ आर्यजनगण्याय नमः ॥ ॐ क्रूराय नमः ॥ ॐ क्रूरचेष्टाय नमः ॥ ॐ कामक्रोधकराय नमः ॥ ॐ कलत्रपुत्रशत्रुत्वकारणाय नमः ॥ ॐ परिपोषितभक्ताय नमः ॥ ॐ परभीतिहराय न मः ॥ ॐ भक्तसंघमनोऽभीष्टफलदाय नमः ॥
इसका नित्य १०८ पाठ करने से शनि सम्बन्धी सभी पीडायें समाप्त हो जाती हैं। तथा पाठ कर्ता धन धान्य समृद्धि वैभव से पूर्ण हो जाता है। और उसके सभी बिगडे कार्य बनने लगते है। यह सौ प्रतिशत अनुभूत है।