सम्पूर्ण गणेश उपासना स्तोत्र मन्त्र सहित

सम्पूर्ण गणेश रहस्य  उपासना स्तोत्र मन्त्र सहित 

भगवान गणेश रहस्य विज्ञान एवं साधना 
    गणेश साधना
    मंत्र - ॐ लं नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्ष तत्त्वमसि।तत्वेमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवल घर्तासि।
    त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्ब्व खल्पिद ब्रह्मसि।त्वं साक्षादात्मसि नित्यं। ऋतं वच्म॥
    सत्यवच्म अवत्मं माम्। अव वक्तारम्॥
    अव श्रोतारम॥ अव दातारम॥ अवधातारमाअवानुचानमवशिष्यम।
    यज्ञ सामग्री - पीले वस्त्र, पीले पुष्प, आसन, सफेद चंदन, बेसन केलड्डू, पंचशिखा दीप, घृत, यज्ञ सामग्री आदि।
    सिद्धि विधि - गणेश पूजा प्रत्येक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना, साधना केआरम्भ में करने का नियम है। इस समय ईशान कोण में अग्नि साधना की तरहआसन लगाकर अग्नि प्रज्वलित करके तथा त्राटक में गणेशजी का ध्यान करतेहुए उपरोक्त मंत्र को पढ़ते हुए एक सौ आठ बार यज्ञ करें। यह पूजा-अर्चनाएक सौ आठ दिन तक निरंतर करते रहने पर सिद्धि प्राप्त हो जाती है औरगणेशजी के दर्शन प्राप्त होते हैं।
    सिद्धि फल - प्रज्ञा/वृद्धि ही जग में संपूर्ण कार्यों को करने वाली है,यही कार्यसिद्धि के मध्य आने वाली रुकावटों का उपाय सुझाती है। इसलिएयह मंत्र सिद्ध हो जाने पर मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

हरि ॐ श्री ऋद्धि सिद्धि गणेशाय नमः 
भगवान गणेश के रहस्य: वैज्ञानिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक, और क्वांटम/कॉस्मिक दृष्टिकोण :
भगवान  गणेश जिन्हें गणपति, विनायक, विघ्नहर्ता, और एकदंत के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य देवता हैं। वे बुद्धि, समृद्धि, विघ्न नाशक, और सृजन के प्रतीक हैं। तांत्रिक और वैदिक परंपराओं में, गणेश मूलाधार चक्र के अधिष्ठाता और आध्यात्मिक यात्रा के प्रवेश द्वार माने जाते हैं। उनका स्वरूप और साधना न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वैज्ञानिक, क्वांटम, और कॉस्मिक सिद्धांतों से भी गहराई से जुड़े हैं।  उनके रहस्य को विस्तार से समझें।
1. गणेश का स्वरूप और प्रतीकात्मकतागणेश का स्वरूप अनूठा और प्रतीकात्मकता से युक्त है। उनके प्रत्येक तत्व (हाथी का सिर, बड़ा पेट, टूटा दाँत, मूषक, मोदक) गहरे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक अर्थ समेटे हुए हैं।
(i) हाथी का सिर  प्रतीकात्मक अर्थ: गणेश का गजमुख बुद्धि, शक्ति, और स्मृति का प्रतीक है। हाथी की सूंड संवेदनशीलता और ग्रहणशीलता को दर्शाती है, जबकि बड़े कान गहन श्रवण और ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता को।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: हाथी का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है, जो सामाजिक बुद्धिमत्ता (social intelligence) और दीर्घकालिक स्मृति (long-term memory) से जुड़ा है। न्यूरोसाइंस में, यह प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस से तुलनीय है, जो निर्णय लेने और स्मृति को नियंत्रित करते हैं। सूंड की संवेदनशीलता न्यूरोलॉजिकल सिनैप्स की तरह है, जो सूक्ष्म संकेतों को ग्रहण करती है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: गजमुख क्वांटम सुपरपोजीशन (superposition) का प्रतीक है, जहाँ बुद्धि और चेतना कई संभावनाओं को एक साथ समेटे रहती है। सूंड क्वांटम टनलिंग की तरह है, जो बाधाओं को पार करके सूक्ष्म ऊर्जा को ग्रहण करती है। बड़े कान क्वांटम उलझाव (entanglement) को दर्शाते हैं, जो साधक को ब्रह्मांडीय जानकारी से जोड़ते हैं।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: गजमुख ब्रह्मांड की विशालता और जटिलता को दर्शाता है, जैसे गैलेक्सी समूह या ब्लैक होल। सूंड कॉस्मिक सर्पिल (spiral galaxies) की तरह है, जो ऊर्जा और पदार्थ को संगठित करती है। बड़े कान कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड (CMB) की तरह हैं, जो ब्रह्मांड की प्रारंभिक जानकारी को ग्रहण करते हैं।  
आध्यात्मिक महत्व: गजमुख मूलाधार चक्र का प्रतीक है, जो स्थिरता और आध्यात्मिक यात्रा का आधार है। यह साधक को बुद्धि और संवेदनशीलता के साथ विघ्नों को पार करने की शक्ति देता है।

(ii) टूटा दाँत और लेखनी  प्रतीकात्मक अर्थ: गणेश का एकदंत (टूटा दाँत) बलिदान और एकाग्रता का प्रतीक है। वे लेखनी और पुस्तक धारण करते हैं, जो ज्ञान और रचनात्मकता को दर्शाते हैं।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: टूटा दाँत मनोविज्ञान में "resilience" (लचीलापन) और "focused attention" से तुलनीय है। लेखनी न्यूरोसाइंस में न्यूरोप्लास्टिसिटी से जुड़ी है, जो मस्तिष्क की नई जानकारी सीखने और रचनात्मकता को बढ़ाती है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: टूटा दाँत क्वांटम डिकोहेरेंस (decoherence) का प्रतीक है, जहाँ साधक अहंकार और अनावश्यक विचारों को त्यागकर एकाग्रता प्राप्त करता है। लेखनी क्वांटम अवलोकन प्रभाव (observer effect) की तरह है, जहाँ साधक की चेतना वास्तविकता को आकार देती है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: टूटा दाँत ब्रह्मांडीय बलिदान (जैसे सुपरनोवा विस्फोट) को दर्शाता है, जो नए तारों और तत्वों को जन्म देता है। लेखनी और पुस्तक ब्रह्मांडीय सूचना (cosmic information) की तरह हैं, जो ब्रह्मांड की संरचना और इतिहास को रिकॉर्ड करती हैं।  
आध्यात्मिक महत्व: यह साधक को एकाग्रता, बलिदान, और ज्ञान के महत्व को सिखाता है।

(iii) बड़ा पेट  प्रतीकात्मक अर्थ: गणेश का लंबोदर स्वरूप सभी अनुभवों को समाहित करने और जीवन की प्रचुरता को दर्शाता है।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: बड़ा पेट पाचन तंत्र और माइक्रोबायोम से जुड़ा है, जो शरीर की ऊर्जा और स्वास्थ्य को बनाए रखता है। यह मनोविज्ञान में "abundance mindset" से तुलनीय है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: बड़ा पेट क्वांटम वैक्यूम ऊर्जा (zero-point energy) की तरह है, जो शून्यता में भी असीम संभावनाएँ समेटे रहता है। यह क्वांटम फील्ड थ्योरी में एकीकृत क्षेत्र (unified field) से तुलनीय है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांड की प्रचुरता (जैसे गैलेक्सी, तारे, और ग्रह) को दर्शाता है। यह कॉस्मिक इन्फ्लेशन से जुड़ा है, जिसने ब्रह्मांड को पदार्थ और ऊर्जा से समृद्ध किया।  
आध्यात्मिक महत्व: यह साधक को सभी अनुभवों को स्वीकार करने और जीवन की प्रचुरता को गले लगाने की प्रेरणा देता है।
(iv) मूषक (चूहा) वाहन  प्रतीकात्मक अर्थ: मूषक इच्छाओं और अहंकार का प्रतीक है, जिसे गणेश नियंत्रित करते हैं। यह सूक्ष्मता और गति को भी दर्शाता है।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: चूहे की गति और सूक्ष्मता न्यूरोलॉजिकल सिनैप्स की तरह है, जो तेजी से जानकारी संचारित करते हैं। यह मनोविज्ञान में "impulse control" से तुलनीय है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: मूषक क्वांटम कणों (जैसे इलेक्ट्रॉन) की तरह है, जो सूक्ष्म और तेजी से गतिशील हैं। गणेश का नियंत्रण क्वांटम अवलोकन प्रभाव की तरह है, जो चेतना के माध्यम से कणों की स्थिति को नियंत्रित करता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: मूषक ब्रह्मांडीय कणों (cosmic rays) की तरह है, जो ब्रह्मांड में तेजी से यात्रा करते हैं। गणेश का नियंत्रण गुरुत्वाकर्षण की तरह है, जो इन कणों को संतुलित करता है।  
आध्यात्मिक महत्व: यह साधक को इच्छाओं और अहंकार पर नियंत्रण की शिक्षा देता है।

(v) मोदक और लड्डू  प्रतीकात्मक अर्थ: मोदक आनंद और आत्मिक संतुष्टि का प्रतीक है।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: मोदक न्यूरोसाइंस में डोपामिन और सेरोटोनिन स्राव से जुड़ा है, जो आनंद और संतुष्टि प्रदान करता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: मोदक क्वांटम ऊर्जा पैकेट्स (quanta) की तरह है, जो साधक को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। यह क्वांटम कोहेरेंस से जुड़ा है, जो चेतना को सुसंगत बनाता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: मोदक ब्रह्मांडीय ऊर्जा (cosmic energy) की तरह है, जो स्टेलर न्यूक्लियोसिंथेसिस से उत्पन्न होती है। यह ब्रह्मांड की प्रचुरता को दर्शाता है।  
आध्यात्मिक महत्व: यह साधक को आंतरिक आनंद और संतुष्टि की खोज की प्रेरणा देता है।
2. पौराणिक कथाएँ और उनका अर्थ
गणेश की पौराणिक कथाएँ उनके महत्व को गहराई से समझाती हैं। ये कथाएँ क्वांटम और कॉस्मिक सिद्धांतों से भी जुड़ी हैं।(i) गणेश की उत्पत्ति  कथा: माता पार्वती ने अपनी देह के उबटन से गणेश को बनाया और उन्हें द्वारपाल बनाया। शिव द्वारा उनका सिर काटने और फिर गजमुख प्रदान करने की कथा बुद्धि और परिवर्तन को दर्शाती है।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह कथा अहंकार के विनाश और बुद्धि के उदय को दर्शाती है।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोसाइंस में न्यूरोप्लास्टिसिटी और मनोविज्ञान में "ego dissolution" से तुलनीय है, जो नई चेतना और बुद्धि को जन्म देता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: सिर का कटना क्वांटम डिकोहेरेंस की तरह है, जो पुरानी अवस्था को नष्ट करता है। गजमुख का प्राप्त होना क्वांटम सुपरपोजीशन और उलझाव की तरह है, जो नई संभावनाओं को जन्म देता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह बिग बैंग और सुपरनोवा विस्फोट की तरह है, जो पुरानी संरचनाओं को नष्ट कर नई संरचनाओं (गैलेक्सी, तारे) को जन्म देता है। गजमुख ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक है।
(ii) गणेश और चंद्रमा की कथा  कथा: चंद्रमा ने गणेश का मजाक उड़ाया, जिसके कारण गणेश ने चतुर्थी की रात को चंद्र दर्शन पर श्राप दिया।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह कथा अहंकार के दंड और विनम्रता के महत्व को दर्शाती है।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह मनोविज्ञान में "humility" और न्यूरोसाइंस में तनाव प्रबंधन से जुड़ा है, जो मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: चंद्रमा का अहंकार क्वांटम डिकोहेरेंस की तरह है, जो ऊर्जा के प्रवाह को बाधित करता है। गणेश का श्राप क्वांटम अवलोकन प्रभाव की तरह है, जो चेतना के माध्यम से व्यवस्था लाता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: चंद्रमा कॉस्मिक चक्रों (जैसे चंद्र चक्र) का प्रतीक है। गणेश का श्राप ब्रह्मांडीय संतुलन को बनाए रखने की प्रक्रिया की तरह है।

(iii) गणेश और कुबेर की कथा  कथा: कुबेर ने अपने धन का प्रदर्शन किया, लेकिन गणेश ने उनकी भोज्य सामग्री खाकर उनकी अहंकार को तोड़ा।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह कथा कृतज्ञता और संतुलन को दर्शाती है।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह मनोविज्ञान में "gratitude" और "abundance mindset" से तुलनीय है, जो मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: गणेश का भोजन क्वांटम वैक्यूम ऊर्जा की तरह है, जो असीम संभावनाओं को समाहित करता है। यह क्वांटम कोहेरेंस से जुड़ा है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय प्रचुरता (जैसे गैलेक्सी और तारे) और संतुलन को दर्शाता है, जो कॉस्मिक इन्फ्लेशन से तुलनीय है।
3. वैज्ञानिक और दार्शनिक रहस्यगणेश के रहस्य वैज्ञानिक और दार्शनिक स्तर पर गहन हैं। ये क्वांटम और कॉस्मिक सिद्धांतों से जुड़े हैं।  (i) मूलाधार चक्र और कुंडलिनी शक्ति  आध्यात्मिक अर्थ: गणेश मूलाधार चक्र के अधिष्ठाता हैं, जो आध्यात्मिक यात्रा का आधार है।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: मूलाधार चक्र रीढ़ की हड्डी के आधार और तंत्रिका तंत्र से जुड़ा है। यह न्यूरोलॉजिकल स्थिरता और हार्मोनल संतुलन को दर्शाता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: मूलाधार चक्र क्वांटम आधार अवस्था (ground state) की तरह है, जो ऊर्जा का प्रारंभिक बिंदु है। कुंडलिनी का जागरण क्वांटम टनलिंग और उलझाव की तरह है, जो साधक को उच्च चेतना से जोड़ता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: मूलाधार चक्र ब्रह्मांड के प्रारंभिक बिंदु (बिग बैंग) की तरह है। कुंडलिनी का जागरण कॉस्मिक इन्फ्लेशन और ब्रह्मांडीय चेतना से तुलनीय है।

(ii) विघ्नहर्ता और बुद्धि  आध्यात्मिक अर्थ: गणेश विघ्नों को हटाने और बुद्धि प्रदान करने वाले हैं।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोसाइंस में प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और समस्या-समाधान (problem-solving) से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: विघ्नों को हटाना क्वांटम टनलिंग की तरह है, जो ऊर्जा बाधाओं को पार करता है। बुद्धि क्वांटम सुपरपोजीशन की तरह है, जो कई संभावनाओं को एक साथ समेटती है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय संतुलन और गुरुत्वाकर्षण से तुलनीय है, जो गैलेक्सी और तारों को व्यवस्थित करता है।

(iii) प्रचुरता और संतुलन  आध्यात्मिक अर्थ: गणेश प्रचुरता और संतुलन के प्रतीक हैं।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह मनोविज्ञान में "abundance mindset" और न्यूरोसाइंस में हार्मोनल संतुलन से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: प्रचुरता क्वांटम वैक्यूम ऊर्जा की तरह है, जो असीम संभावनाएँ समेटे रहता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह कॉस्मिक इन्फ्लेशन और गैलेक्सी निर्माण से तुलनीय है, जो ब्रह्मांड को समृद्ध करता है।
4. तांत्रिक साधना और पूजा का महत्वगणेश की साधना तांत्रिक और वैदिक दोनों मार्गों में महत्वपूर्ण है। यह बुद्धि, समृद्धि, और विघ्न नाशन का मार्ग है।  (i) तांत्रिक महत्व  साधना की प्रक्रिया: गणेश की साधना गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, और अन्य शुभ अवसरों पर की जाती है। मंत्र जैसे "ॐ गं गणपतये नमः" का जप, हवन, और मोदक अर्पण शामिल हैं।  
सिद्धियाँ: यह बुद्धि, समृद्धि, और विघ्न नाशन प्रदान करती है।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: मंत्र जप मस्तिष्क में अल्फा और थीटा वेव्स उत्पन्न करता है, जो एकाग्रता और तनाव प्रबंधन को बढ़ाता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: मंत्र जप क्वांटम तरंगों की तरह है, जो साधक की चेतना को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ संनादति बनाता है। हवन क्वांटम ऊर्जा स्तरों की तरह है, जो ऊर्जा को परिवर्तित करता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: मंत्र जप कॉस्मिक तरंगों (cosmic vibrations) और हवन स्टेलर न्यूक्लियोसिंथेसिस की तरह है।

(ii) वैज्ञानिक दृष्टिकोण  प्रभाव: साधना न्यूरोप्लास्टिसिटी, मानसिक शांति, और सामाजिक बंधन को बढ़ाती है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: ध्यान क्वांटम अवलोकन प्रभाव की तरह है, जो चेतना को वास्तविकता के साथ जोड़ता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय चेतना और संतुलन से तुलनीय है।
5. प्रमुख मंदिर और उनकी महिमा(i) सिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई  विवरण: यह गणेश का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है, जो सिद्धि और समृद्धि के लिए जाना जाता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: मंदिर का वातावरण क्वांटम कोहेरेंस की तरह है, जो भक्तों की चेतना को संनादति बनाता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा केंद्र की तरह है, जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से प्रभावित है।

(ii) दगडूशेठ हलवाई गणपति, पुणे  विवरण: यह समृद्धि और भक्ति का केंद्र है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: सामूहिक पूजा क्वांटम उलझाव की तरह है, जो सामूहिक चेतना को बढ़ाता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह गैलेक्सी समूहों की तरह है, जो सामूहिक ऊर्जा को संगठित करता है।

6. आधुनिक संदर्भ में महत्वमनोवैज्ञानिक संतुलन: गणेश की पूजा तनाव प्रबंधन और एकाग्रता को बढ़ाती है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम कोहेरेंस और न्यूरोप्लास्टिसिटी से जुड़ा है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय चेतना और संतुलन से तुलनीय है।  
सामाजिक और आर्थिक समृद्धि: यह सामुदायिक बंधन और प्रचुरता को बढ़ाता है।

7. क्वांटम और कॉस्मिक विज्ञान से संबंधगणेश का स्वरूप और साधना क्वांटम और कॉस्मिक सिद्धांतों से गहरे स्तर पर जुड़े हैं:  क्वांटम सुपरपोजीशन: गजमुख और बड़ा पेट कई संभावनाओं को समेटने का प्रतीक है।  
क्वांटम उलझाव: साधना साधक को ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ती है।  
कॉस्मिक इन्फ्लेशन: गणेश की प्रचुरता ब्रह्मांड के विस्तार से तुलनीय है।  
होलोग्राफिक यूनिवर्स: गणेश की बुद्धि और चेतना ब्रह्मांड की एकता को दर्शाती है।
गणेश जी की प्रतिमा दुनिया के एक छोर जापान से लेकर दूसरे छोर अमेरिका तक सब जगह पाई है है।
भगवान गणेश के 32 स्वरूप (32 Forms of Lord Ganesha) हिंदू धर्म में विशेष रूप से तांत्रिक और वैदिक परंपराओं में महत्वपूर्ण हैं। ये स्वरूप गणेश के विभिन्न गुणों, शक्तियों, और आध्यात्मिक महत्व को दर्शाते हैं। प्रत्येक स्वरूप का वर्णन उनके प्रतीकात्मक अर्थ, मंत्र, पूजा विधि, और दार्शनिक महत्व के साथ किया जाता है। 
भगवान गणेश के 32 स्वरूप: विस्तृत वर्णनगणेश के 32 स्वरूप विभिन्न आध्यात्मिक और भौतिक उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए पूजे जाते हैं। प्रत्येक स्वरूप का नाम, रूप, और मंत्र विशिष्ट ऊर्जा और चेतना से जुड़ा है। नीचे प्रत्येक स्वरूप का वर्णन है:
1. बाल गणपति (Bala Ganapati)वर्णन: बाल गणपति गणेश का बाल स्वरूप है, जो सूर्य की तरह स्वर्णिम आभा वाला, चार भुजाओं वाला, और मोदक, गन्ना, केला, और आम धारण करने वाला है। यह स्वरूप मासूमियत, आनंद, और नई शुरुआत का प्रतीक है।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वरूप जीवन की प्रारंभिक ऊर्जा, शुद्धता, और सृजनात्मकता को दर्शाता है।  
मंत्र: ॐ श्री बाल गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: स्वास्थ्य, समृद्धि, और परिवार में सुख-शांति के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: बाल स्वरूप न्यूरोसाइंस में मस्तिष्क की प्रारंभिक विकास अवस्था (neuroplasticity in early childhood) से जुड़ा है, जो सीखने और अनुकूलन की क्षमता को दर्शाता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: बाल गणपति क्वांटम आधार अवस्था (ground state) की तरह है, जो ऊर्जा का प्रारंभिक और शुद्ध रूप है। यह क्वांटम सुपरपोजीशन को दर्शाता है, जहाँ सभी संभावनाएँ मौजूद होती हैं।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह बिग बैंग के प्रारंभिक चरण की तरह है, जब ब्रह्मांड में ऊर्जा और पदार्थ का सृजन हुआ। स्वर्णिम आभा कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड (CMB) की तरह है।
2. तरुण गणपति (Taruna Ganapati)वर्णन: तरुण गणपति युवा स्वरूप में हैं, जो लाल रंग के, आठ भुजाओं वाले, और पाश, अंकुश, मोदक, दंत, धान, गन्ना, टूटी टहनी, और कमल धारण करते हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वरूप युवा ऊर्जा, उत्साह, और आध्यात्मिक विकास को दर्शाता है।  
मंत्र: ॐ श्री तरुण गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: ऊर्जा, साहस, और नई परियोजनाओं में सफलता के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह किशोरावस्था के न्यूरोलॉजिकल विकास से जुड़ा है, जब मस्तिष्क में सिनैप्टिक कनेक्शन तेजी से बनते हैं।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: तरुण गणपति क्वांटम टनलिंग की तरह है, जो बाधाओं को पार करने की ऊर्जा को दर्शाता है। आठ भुजाएँ क्वांटम उलझाव की तरह हैं, जो कई कार्यों को एक साथ जोड़ती हैं।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय विस्तार (cosmic inflation) के चरण की तरह है, जब ब्रह्मांड तेजी से विकसित हुआ। लाल रंग तारों के निर्माण (stellar formation) से जुड़ा है।

3. भक्ति गणपति (Bhakti Ganapati)वर्णन: भक्ति गणपति श्वेत रंग के, चार भुजाओं वाले, और नारियल, आम, केला, और मोदक धारण करने वाले हैं। वे चंद्रमा की तरह शीतल और भक्ति भाव के प्रतीक हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वरूप भक्ति, शांति, और आत्मिक संतुष्टि को दर्शाता है।  
मंत्र: ॐ श्री भक्ति गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: आध्यात्मिक शांति और भक्ति मार्ग में प्रगति के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: भक्ति भाव न्यूरोसाइंस में सेरोटोनिन और डोपामिन स्राव से जुड़ा है, जो मानसिक शांति प्रदान करता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम कोहेरेंस (quantum coherence) की तरह है, जो चेतना को सुसंगत और शांत बनाता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: श्वेत रंग और चंद्रमा की शीतलता कॉस्मिक शांति और चंद्र चक्रों से जुड़े हैं।

4. वीर गणपति (Vira Ganapati)वर्णन: वीर गणपति लाल रंग के, सोलह भुजाओं वाले, और विभिन्न आयुध (त्रिशूल, चक्र, गदा, खड्ग, आदि) धारण करने वाले योद्धा स्वरूप हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वरूप साहस, शक्ति, और विघ्नों पर विजय को दर्शाता है।  
मंत्र: ॐ श्री वीर गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: शत्रु पर विजय और साहस के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह एड्रेनलिन और टेस्टोस्टेरोन स्राव से जुड़ा है, जो शारीरिक और मानसिक शक्ति को बढ़ाता है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: सोलह भुजाएँ क्वांटम मल्टीटास्किंग की तरह हैं, जो कई ऊर्जा स्तरों को एक साथ नियंत्रित करती हैं। यह क्वांटम टनलिंग से जुड़ा है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय शक्ति (जैसे ब्लैक होल की गुरुत्वाकर्षण शक्ति) और संतुलन को दर्शाता है।
5. शक्ति गणपति (Shakti Ganapati)वर्णन: शक्ति गणपति नारंगी रंग के, चार भुजाओं वाले, और अपनी शक्ति (देवी) को आलिंगन करते हुए, पाश और अंकुश धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वरूप शक्ति और संतुलन का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री शक्ति गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: दांपत्य सुख और शक्ति संतुलन के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोलॉजिकल संतुलन और हार्मोनल सामंजस्य से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम उलझाव की तरह है, जो चेतना (पुरुष) और ऊर्जा (प्रकृति) को जोड़ता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह पदार्थ और डार्क एनर्जी के संतुलन की तरह है, जो ब्रह्मांड को स्थिर रखता है।

6. द्विज गणपति (Dvija Ganapati)वर्णन: द्विज गणपति चंद्रमा की तरह श्वेत, चार भुजाओं वाले, और पुस्तक, माला, दंड, और कमंडल धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वरूप ज्ञान, पवित्रता, और ब्राह्मण गुणों को दर्शाता है।  
मंत्र: ॐ श्री द्विज गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: शिक्षा और आध्यात्मिक ज्ञान के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोप्लास्टिसिटी और दीर्घकालिक स्मृति से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: पुस्तक और माला क्वांटम सूचना संरक्षण की तरह हैं।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह कॉस्मिक सूचना (cosmic information) और ब्रह्मांडीय समयरेखा से जुड़ा है।

7. सिद्धि गणपति (Siddhi Ganapati)वर्णन: सिद्धि गणपति स्वर्ण रंग के, चार भुजाओं वाले, और तिलक, फूलों का हार, गन्ना, और मोदक धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वरूप सिद्धियों (आध्यात्मिक शक्तियों) और समृद्धि का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री सिद्धि गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: सिद्धियों और सफलता के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोसाइंस में डोपामिन स्राव से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम संभावनाओं (quantum possibilities) की तरह है, जो साधक को नई ऊर्जा प्रदान करता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह स्टेलर न्यूक्लियोसिंथेसिस की तरह है, जो ब्रह्मांडीय समृद्धि को दर्शाता है।

8. उच्छिष्ट गणपति (Ucchishta Ganapati)वर्णन: उच्छिष्ट गणपति नीले रंग के, छह भुजाओं वाले, और शक्ति के साथ, बीजापुर, धनुष, बाण, आदि धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह तांत्रिक स्वरूप अशुद्धता में भी पवित्रता और तांत्रिक साधना को दर्शाता है।  
मंत्र: ॐ श्री उच्छिष्ट गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: तांत्रिक सिद्धियों और बाधा नाश के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोलॉजिकल लचीलापन (resilience) से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम डिकोहेरेंस के विपरीत है, जो अराजकता में भी सुसंगति लाता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह डार्क मैटर और डार्क एनर्जी की तरह है, जो ब्रह्मांड की छिपी शक्ति को दर्शाता है।
9. विघ्न गणपति (Vighna Ganapati)वर्णन: विघ्न गणपति स्वर्ण रंग के, आठ भुजाओं वाले, और शंख, चक्र, पाश, आदि धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वरूप विघ्नों का नाश करने वाला है।  
मंत्र: ॐ श्री विघ्न गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: बाधाओं को दूर करने के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोलॉजिकल समस्या-समाधान से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम टनलिंग की तरह है, जो बाधाओं को पार करता है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय संतुलन की तरह है, जो गैलेक्सी को व्यवस्थित करता है।

10. खेचर गणपति (Kshipra Ganapati)वर्णन: खेचर गणपति लाल रंग के, चार भुजाओं वाले, और टूटी दंत, पाश, अंकुश, और बीजापुर धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह त्वरित इच्छापूर्ति और गति का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री खेचर गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: त्वरित सफलता और कार्य सिद्धि के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोलॉजिकल गति और निर्णय लेने से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम कणों की गति की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह कॉस्मिक रेज़ (cosmic rays) की तरह है, जो तेजी से ब्रह्मांड में यात्रा करते हैं।

11. हेरंब गणपति (Heramba Ganapati)वर्णन: हेरंब गणपति पांच सिर और दस भुजाओं वाले, सिंह वाहन पर सवार, और विभिन्न आयुध धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वरूप रक्षा और शक्ति का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री हेरंब गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: रक्षा और शत्रु पर विजय के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोलॉजिकल सतर्कता से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: पांच सिर क्वांटम मल्टीडायमेंशनल स्टेट्स की तरह हैं।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय संरचनाओं की जटिलता की तरह है।

12. लक्ष्मी गणपति (Lakshmi Ganapati)वर्णन: लक्ष्मी गणपति श्वेत रंग के, आठ भुजाओं वाले, और लक्ष्मी के साथ, कमल, धनुष, बाण, आदि धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह समृद्धि और धन का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री लक्ष्मी गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: धन और समृद्धि के लिए।  
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह न्यूरोसाइंस में प्रचुरता मानसिकता से जुड़ा है।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम वैक्यूम ऊर्जा की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह कॉस्मिक इन्फ्लेशन की तरह है।

13. महा गणपति (Maha Ganapati)वर्णन: महा गणपति लाल रंग के, दस भुजाओं वाले, और शक्ति के साथ, विभिन्न आयुध धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह सर्वोच्च शक्ति और सिद्धियों का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री महा गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: सर्वांगीण सफलता के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम फील्ड थ्योरी की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय एकता की तरह है।
14. विजय गणपति (Vijaya Ganapati)वर्णन: विजय गणपति लाल रंग के, चार भुजाओं वाले, और मूषक पर सवार हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह विजय और सफलता का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री विजय गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: कार्यों में विजय के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम टनलिंग की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय संतुलन की तरह है।

15. नृत्य गणपति (Nritya Ganapati)वर्णन: नृत्य गणपति स्वर्ण रंग के, चार भुजाओं वाले, और नृत्य मुद्रा में हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह कला और रचनात्मकता का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री नृत्य गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: कला और सृजनात्मकता के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम तरंगों की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह कॉस्मिक सर्पिल की तरह है।

16. ऊर्ध्व गणपति (Urdhva Ganapati)वर्णन: ऊर्ध्व गणपति स्वर्ण रंग के, छह भुजाओं वाले, और शक्ति के साथ हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री ऊर्ध्व गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: आध्यात्मिक प्रगति के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम टनलिंग की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय चेतना की तरह है।

17. एकाक्षर गणपति (Ekakshara Ganapati)वर्णन: एकाक्षर गणपति लाल रंग के, चार भुजाओं वाले, और मूषक पर सवार हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह एकाग्रता और ध्यान का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री एकाक्षर गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: एकाग्रता के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम अवलोकन प्रभाव की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय एकता की तरह है।

18. वरद गणपति (Varada Ganapati)वर्णन: वरद गणपति समुद्री नीले रंग के, चार भुजाओं वाले, और वरद मुद्रा में हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह वरदान और कृपा का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री वरद गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: इच्छापूर्ति के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम संभावनाओं की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह कॉस्मिक प्रचुरता की तरह है।

19. त्र्यम्बक गणपति (Tryambaka Ganapati)वर्णन: त्र्यम्बक गणपति स्वर्ण रंग के, चार भुजाओं वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह त्रिनेत्र और शिव से संबंधित है।  
मंत्र: ॐ श्री त्र्यम्बक गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: आध्यात्मिक शक्ति के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम उलझाव की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय चेतना की तरह है।
20. क्षिप्र प्रसाद गणपति (Kshipra Prasada Ganapati)वर्णन: क्षिप्र प्रसाद गणपति लाल रंग के, चार भुजाओं वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह त्वरित कृपा का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री क्षिप्र प्रसाद गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: त्वरित इच्छापूर्ति के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम गति की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह कॉस्मिक रेज़ की तरह है।

21. हरिद्रा गणपति (Haridra Ganapati)वर्णन: हरिद्रा गणपति पीले रंग के, चार भुजाओं वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री हरिद्रा गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: स्वास्थ्य और धन के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम वैक्यूम ऊर्जा की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह स्टेलर न्यूक्लियोसिंथेसिस की तरह है।

22. एकदंत गणपति (Ekadanta Ganapati)वर्णन: एकदंत गणपति नीले रंग के, चार भुजाओं वाले, और टूटा दंत धारण करने वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह एकाग्रता और बलिदान का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री एकदंत गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: एकाग्रता और आध्यात्मिक प्रगति के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम डिकोहेरेंस की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह सुपरनोवा की तरह है।

23. सृष्टि गणपति (Srishti Ganapati)वर्णन: सृष्टि गणपति लाल रंग के, चार भुजाओं वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह सृजन और प्रचुरता का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री सृष्टि गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: सृजनात्मक कार्यों के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम वैक्यूम उतार-चढ़ाव की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह बिग बैंग की तरह है।

24. उद्दंड गणपति (Uddanda Ganapati)वर्णन: उद्दंड गणपति लाल रंग के, दस भुजाओं वाले, और शक्ति के साथ हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह अनुशासन और शक्ति का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री उद्दंड गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: अनुशासन और शक्ति के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम मल्टीटास्किंग की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह गुरुत्वाकर्षण की तरह है।

25. रिणमोचन गणपति (Rinamochana Ganapati)वर्णन: रिणमोचन गणपति श्वेत रंग के, चार भुजाओं वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह ऋण और बंधनों से मुक्ति का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री रिणमोचन गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: ऋण मुक्ति के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम टनलिंग की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय संतुलन की तरह है।
26. ढुंढि गणपति (Dhundhi Ganapati)वर्णन: ढुंढि गणपति लाल रंग के, चार भुजाओं वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह खोज और अन्वेषण का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री ढुंढि गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: ज्ञान और खोज के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम अनिश्चितता की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह कॉस्मिक अन्वेषण की तरह है।

27. द्विमुख गणपति (Dwimukha Ganapati)वर्णन: द्विमुख गणपति हरे रंग के, चार भुजाओं वाले, और दो मुखों वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह दोहरे दृष्टिकोण और संतुलन का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री द्विमुख गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: संतुलन और समझ के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम ड्युएलिटी की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह पदार्थ-प्रतिपदार्थ की तरह है।

28. त्रिमुख गणपति (Trimukha Ganapati)वर्णन: त्रिमुख गणपति नीले रंग के, छह भुजाओं वाले, और तीन मुखों वाले हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह त्रिगुण (सत, रज, तम) का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री त्रिमुख गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: त्रिगुण संतुलन के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम मल्टीडायमेंशनल स्टेट्स की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय त्रय (सृजन, पालन, संहार) की तरह है।

29. सिन्ह गणपति (Sinha Ganapati)वर्णन: सिन्ह गणपति श्वेत रंग के, आठ भुजाओं वाले, और सिंह पर सवार हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह शक्ति और रक्षा का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री सिन्ह गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: रक्षा और साहस के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम शक्ति की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह गुरुत्वाकर्षण की तरह है।
30. योग गणपति (Yoga Ganapati)वर्णन: योग गणपति लाल रंग के, चार भुजाओं वाले, और योग मुद्रा में हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह ध्यान और आत्मसंयम का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री योग गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: योग और ध्यान के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम कोहेरेंस की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय चेतना की तरह है।

31. दुर्ज गणपति (Durga Ganapati)वर्णन: दुर्ज गणपति स्वर्ण रंग के, आठ भुजाओं वाले, और दुर्गा के समान हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह शक्ति और विजय का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री दुर्ज गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: शक्ति और विजय के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम शक्ति की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्लैक होल की तरह है।

32. संकटहर गणपति (Sankatahara Ganapati)वर्णन: संकटहर गणपति लाल रंग के, चार भुजाओं वाले, और शक्ति के साथ हैं।  
प्रतीकात्मक अर्थ: यह संकट नाश और कृपा का प्रतीक है।  
मंत्र: ॐ श्री संकटहर गणपतये नमः  
पूजा का उद्देश्य: संकट नाश के लिए।  
क्वांटम विज्ञान से संबंध: यह क्वांटम टनलिंग की तरह है।  
कॉस्मिक विज्ञान से संबंध: यह ब्रह्मांडीय संतुलन की तरह है।

क्वांटम और कॉस्मिक विज्ञान से समग्र संबंधक्वांटम सुपरपोजीशन: गणेश के 32 स्वरूप क्वांटम सुपरपोजीशन की तरह हैं, जहाँ वे एक साथ विभिन्न अवस्थाओं में मौजूद हैं, प्रत्येक स्वरूप एक विशिष्ट ऊर्जा और चेतना को दर्शाता है।  
क्वांटम उलझाव: प्रत्येक स्वरूप की पूजा साधक की चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ती है, जैसे क्वांटम उलझाव में कण एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।  
क्वांटम वैक्यूम ऊर्जा: स्वरूपों के रंग और प्रतीक क्वांटम वैक्यूम ऊर्जा की तरह हैं, जो शून्यता में भी असीम संभावनाएँ समेटे रहते हैं।  
कॉस्मिक इन्फ्लेशन: गणेश के स्वरूप ब्रह्मांडीय विस्तार की तरह हैं, जो विभिन्न गुणों और शक्तियों को जन्म देते हैं।  
होलोग्राफिक यूनिवर्स: प्रत्येक स्वरूप होलोग्राफिक यूनिवर्स की तरह है, जो पूरे ब्रह्मांड की जानकारी को एक बिंदु में समेटता है।
पाश्चात्य मुवक्किल (archangle) से संबंध 
प्रश्न यह था :–पाश्चात्य तंत्र में मुवक्किल किसे कहते है और मुवक्किल को सनातन तंत्र शास्त्र में क्या कहते है। पाश्चात्य में मुवक्किल के राजा का नाम क्या है और सनातन में उसी राजा को क्या कहते है?
उत्तर, रहस्य,ज्ञान विज्ञान इस प्रकार है । इस पोस्ट से उन हजारों यूट्यूब वाले तांत्रिको का खण्डन होगा जिन्होंने मुवक्किल साधना वाली वीडियो तो डाली है पर उन्हें मुवक्किल क्या है सनातन तंत्र से इसका क्या संबंध है पता ही नही। यूट्यूब में मुवक्किल साधना डालने वालो में से एक को भी रहस्य का पता नही है। आज सिद्ध करेगे। आप सब भ्रम में न रहे और वास्तविक विज्ञान को समझे यही इस तुच्छ सेवक का उद्देश्य है।
मुवक्किल उर्दू शब्द है जिसका अर्थ "सहायक गण" है।
प्रत्येक अक्षर , शब्द, वाक्य , व्यक्ति, आदि के सहायक गण (मुवक्किल होते है) जो उस शब्द , अक्षर, वाक्य से निकली ध्वनि को सहायक ऊर्जा प्रदान करते है। और व्यक्ति के कर्म को सहायक ऊर्जा प्रदान करते है जिससे शब्द, वाक्य अथवा कर्म का ध्येय पूर्ण हो सके। प्रत्येक शब्द के कुल 9 मुवक्किल (गण) होते है। वह इस प्रकार है 
सहायक गण (मुवक्किल) के 3। विरोधी गण के 3 मुवक्किल
सहायक गण (मुवक्किल):–शब्दो से निकली ऊर्जा के अनुरूप 
ऋणात्मक सहायक गण (सिफली सहायक मुवक्किल), धनात्मक सहायक गण (नूरी सहायक मुवक्किल),
तथस्ट सहायक गण (अल्वी सहायक मुवक्किल).
विरोधी गण (मुवक्किल):–
ऋणात्मक विरोधी गण (सिफली विरोधी मुवक्किल)
धनात्मक विरोधी गण (नूरी विरोधी मुवक्किल)
तटस्थ विरोधी गण (अल्वी विरोधी मुवक्किल)
यह कुल 6 हुए
इनमे से सहायक 3 मुवक्किल के संचालक इनके अधिपति होते है सहायक गणाधिपत (सहायक शाह मुवक्किल)
दूसरे 3 विरोधी मुवक्किल के अधिपति होते है विरोधी गणाधिपति (विरोधी शाह मुवक्किल)
समस्त गणों की ऊर्जा का मूल स्तोत्र बादशाह मुवक्किल से है। जिसे पाश्चात्य जगत में मितातारून मुवक्किल और सनातन में महा गणाधिपति कहते है। यह पद है और ऊर्जा के स्तोत्र का एक प्रकार जो श्रृष्टि की रचना से आज तक चलते आ रहा है यही  महाभारत लिखने के लिए एक दांत गणेश के रूप में अवतार लेते है तो यही विविध काल में विविध रूपों में अवतरित होते है। अपितु ऊर्जा के इस महा स्तोत्र का कोई स्वरूप नही पर पुराणों से प्राप्त ज्ञात स्वरूप जिससे हम महा गणाधिपति की आराधना करते है वह स्वरूप हमे भारत से लेकर जापान तक और पाश्चात्य में भी इतिहासिक स्थलों में देखने मिल जाता है। गण देवताओं के भी होते है जेसे शिव गण आदि। 
मनुष्य के लिए गण (मुवक्किल) केसे कार्य करते है?
इसे समझने हम उद्धरण लेते है। 
एक खुश व्यक्ति ने किसी दूसरे उदास व्यक्ति को कोई शब्द कहा । वह शब्द अच्छा था जिससे दूसरा व्यक्ति सुनकर प्रसन्न हुआ।
जब पहले व्यक्ति ने वह शब्द कहा तो उस शब्द का मुवक्किल (गण) था सहायक धनात्मक गण (नूरी सहायक मुवक्किल) । वह मुवक्किल सीधे उस उदास व्यक्ति के मन के धनात्मक सहायक गण (नूरी सहायक मुवक्किल) से टकराकर उसे ऊर्जा प्रदान किया जिससे धनात्मक ऊर्जा बड़ी जिससे उस उदास व्यक्ति के मन की ऋणात्मक गण ऊर्जा (सिफली मुवक्किल ऊर्जा) कम हुई इससे वह उदास व्यक्ति प्रसन्न हुआ। यह हुई धनात्मक सहायक ऊर्जा इसी का अपोजिट आप ऋणात्मक सहायक ऊर्जा के रूप में देखे। अब तटस्थ सहायक गण (अल्वी सहायक मुवक्किल) केसे कार्य करते है । जेसे आपका एक दोस्त आपसे कहता है की वह कोई कार्य करने जा राजा है अंजाम  नही जानता की कार्य सिद्ध होगा या नहीं और आपसे कहता है की भाई जो भी अंजाम होगा तू संभाल लेना। आप कहते है की तू काम कर जो होगा देखा जायेगा अच्छा होगा तो संभाल लूंगा बुरा होगा तो संभाल लूंगा। तो आपके शब्द उस व्यक्ति के लिए तटस्थ सहायक गण ऊर्जा (अल्वी सहायक मुवक्किल) की तरह कार्य करेगे वह निश्चिंत होकर कार्य करेगा उसे पता है कार्य नहीं हुआ तो भी संभालने वाला कोई है कार्य हुआ तो भी संभालने वाला कोई है। 
यह हुआ सहायक मुवक्किल का कार्य।
अब विरोधी मुवक्किल केसे कार्य करते है।
उदाहरण आपका मित्र कहता है की मैं यह कार्य करने जा रहा हु। पर आपको पता है की वह कार्य गलत है आप उचित मार्ग से उसे वह कार्य करने से रोकते है या प्यार भरे और समझाने वाले शब्दो से उसे समझाते है तो वह उस कार्य से रुख जाता है। आपके शब्दो ने अथवा कर्म ने धनात्मक विरोधी गण (नूरी विरोधी मुवक्किल) के रूप में उस व्यक्ति के गलत कार्यों का विरोध किया। आपके शब्द आपके कर्म धनात्मक थे (सकारात्मक positive) इस लिए इस कार्य को अंजाम दिया धनात्मक विरोधी ऊर्जा गण ने (नूरी विरोधी मुवक्किल)। इसी का उल्टा अगर आप सोचे तो वह ऋणात्मक विरोधी गण (सिफली विरोधी गण) होगा यानी जन आप नकारात्मक रूप से डाट फटकार कर जबरदस्ती करके उसे गलत शब्द कहकर रोकेंगे तो वह नकारात्मक या ऋणात्मक विरोधी गण होगे (सिफली विरोधी मुवक्किल) को आपके इस कार्य को सिद्ध करेगे। तठस्थ विरोधी गण (अल्वी विरोधी मुवक्किल) ऐसे कम करेगे जेसे जब आप का दोस्त कहेगा में यह कार्य करने जा रहा हु। आप बोलेंगे तू ऐसी तैसी करा भाड़ में जा मेको मत बता तेरे साथ कुछ गलत हुआ तो मेरे पास मत आना सही भी हुआ तो मेलो मार बताना। इस वाक्य की ऊर्जा से आपके दोस्त का मनोबल टूट जायेगा ओर उसके कार्य का स्वतः विरोध हो जायेगा वह रुख जायेगा। आप तठस्थ थे वह आपके शब्द भी तठस्थ थे पर उसके कार्य का विरोध कर रहे थे तो आपके शब्द से तठस्थ विरोधी गण (अल्वी विरोधी मुवक्किल) के रूप में कार्य किया। इस तरह इन 6 मुवक्किल का आपके शब्द और आपके कर्मों द्वारा कार्य संचालन होता है । यह सब मुवक्किल आपके कर्मों, आचरण, वाणी, मन, बुद्धि, आदि पर निर्भर करते है जैसा आप आचरण करेगे वैसे ही यह मुवक्किल गण सहायक होते है। आप जितने सकारात्मक रहेंगे, जितने सात्विक रहेंगे जितने मधुर रहेंगे जितने बुद्धिवान रहेंगे जितने आत्मिक आध्यात्मिक ऊर्जावान रहेंगे उतने ही शक्तिवान आपके कर्म और वाणी के मुवक्किल शक्तिवान रहेंगे। जेसे अपने वाणी मात्र से नेतागण लोगो को और कार्यों को प्रभावित कर देते है। अब गणाधिपति ओर महा गणाधिपति कार्य करते है। जब आप आपने जीवन में आध्यात्मिक , आत्मिक और सांसारिक, बौद्धिक, भौतिक दृष्टिकोण से उन्नति अर्जित करते है वैसे वैसे ही आपके सहायक और विरोधी गणाधिपति (मुवक्किल) ऊर्जावान होते जाते है। और जब आप साधना मार्ग से सिद्धि अर्जित कर लेते है तो महागनाधिपति (मितातारून ) आपके सहायक हो जाते है आपको वाक और कर्म सिद्धि प्राप्त होती है आपके शब्द वरदान और श्राप रूपी हो जाते है (वरदान और श्राप देने योग्य)। आपके कर्म कभी विफल नही होते, वाक, वाणी, स्वर, ऋद्धि सिद्धि, निधि की प्राप्ति होती है  और यह सिद्धि सबसे कठिन है। 
नीचे दिया गया यंत्र जो पाश्चात्य जगत में मितातारून तलिस्मान नाम से जाना जाता है (मायन, यहूदी, ईसाई, मुस्लिम आदि में) और सनातन तंत्र में महागनाधिपति यंत्र नाम से जाना जाता है । वाक सिद्धि, वाणी सिद्धि, स्वर सिद्धि, कर्म सिद्धि,  संपूर्ण सिद्धि , व निधि हेतु समस्त विघ्न हरण हेतु और महागनाधिपति (बादशाह मुवक्किल मितातारून) की पूर्ण कृपा प्राप्ति हेतु , समस्त शत्रु निवारण , समस्त अभिचार कर्म नाश, समस्त दोष निवारण हेतु निर्माण किया जाता है, यह यंत्र पाश्चात्य जगत के बड़े नेताओं (इसराइली पीएम आदि) द्वारा धारण किया गया देखा जा सकता है इसका महत्व illuminati में भी सर्वाधिक माना गया है (उसमे कुछ अंतर है)। योग्य साधक के लिए हमारे द्वारा निर्मित किया जाएगा। जब हम कुछ बोलते है कुछ कार्य करते है तब महा गणाधिपति की ऊर्जा हमारे कर्म अथवा वचन अनुसार एक दायरा बनाती है जिस दायरे का स्वरूप इस यंत्र की तरह होता है उस ऊर्जा रूपी दायरे में सभी गण समाहित होते है जिन्हे हमारे कर्म अथवा वचन अनुसार ऊर्जा मलती है। अगर हम इस महागनाधिपति ऊर्जा स्वरूप दायरे को यंत्र रूप में धारण कर ले तो समस्त गण समस्त मुवक्किल हमारे अनुकूल हो जाते है। 
उपरोक्त जानकारी के बाद आप उन हजारों यूट्यूब के और फेसबुक के तांत्रिको से शब्द मुवक्किल का अर्थ और परिभाषा के बारे में प्रश्न कर सकते है जो आलतू फालतू साधनाएं मुवक्किल के नाम से डाले जा रहे है।और वास्तविकता से कोसो दूर है। 
यंत्र के लॉकेट का स्वरूप पूर्व पोस्ट में डाला गया है। चतुर्थी में पंच धातु में निर्मित कर समस्त वर्णमाला के अक्षर (सभी अक्षर सभी मात्राओ के साथ) यंत्र में चिन्हित कर महा गणाधिपति साधना अनुष्ठान (पूर्व में बताया गया है) से तंत्र चैतन्य प्राण प्रतिष्ठित कर और अगर पाश्चात्य संप्रदाय से है तो बरहती का अमल करके तंत्र चैतन्य कर धारण करे। रोजाना एक माला गणाधिपति मंत्र का जप करे (पाश्चात्य अनुयाई है तो 3 बार बरहती का पाठ करे)। महा गणाधिपति के दर्शन भी प्राप्त होगे। 
1. शास्त्रों में गणेश का वर्णन(i) वेदों मेंऋग्वेद और यजुर्वेद: गणेश का प्रत्यक्ष उल्लेख वेदों में नहीं मिलता, लेकिन "गणपति" और "गणानां त्वा गणपतिं हवामहे" (ऋग्वेद 2.23.1) में गणपति को गणों (देवताओं के समूह) के स्वामी के रूप में वर्णित किया गया है। विद्वान इसे गणेश से जोड़ते हैं।
अथर्ववेद: गणपति को विघ्नों को दूर करने वाले और बुद्धि के दाता के रूप में संदर्भित किया गया है, जो गणेश के प्रारंभिक स्वरूप का संकेत देता है।

(ii) पुराणों मेंशिव पुराण, गणेश पुराण, मुद्गल पुराण: गणेश को शिव और पार्वती के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी उत्पत्ति की कथाएँ (जैसे पार्वती द्वारा स्नान के समय निर्मित) और उनके गजमुख स्वरूप का वर्णन है। गणेश पुराण और मुद्गल पुराण में उनके आठ अवतारों (वक्रतुंड, एकदंत, आदि) का उल्लेख है।
स्कंद पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण: गणेश को प्रथम पूजनीय, विघ्नहर्ता, और बुद्धि-समृद्धि के दाता के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी पूजा सभी शुभ कार्यों की शुरुआत में अनिवार्य है।
नामों का उल्लेख: गणपति, विघ्नहर्ता, एकदंत, गजानन, लंबोदर, विनायक, सिद्धिविनायक, हेरंब, और गजवक्त्र प्रमुख नाम हैं।

(iii) महाभारत मेंव्यास का सहायक: महाभारत के आदि पर्व में गणेश को वेदव्यास के लेखक के रूप में वर्णित किया गया है। व्यास ने गणेश से अनुरोध किया कि वे महाभारत को लिखें, और गणेश ने शर्त रखी कि वे बिना रुके लिखेंगे, जिसके लिए व्यास को निरंतर बोलना था।
प्रतीकात्मकता: यह गणेश के बुद्धि, लेखन, और ज्ञान के देवता स्वरूप को दर्शाता है।

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ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु : अद्य ब्रह्मनो $ ह्नि द्वितीय परार्द्धे श्रीश्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे $ अष्टाविंशतीतमे कलयुगे कलिप्रथम् चरणे जम्बूद्विपे  भारतवर्षे भरतखण्डे आर्याव्रतैक देशान्तरगते महाराष्ट्र क्षेत्रे विरार नगरे विरार पश्चिम बोलिंज नाका  श्री बोलेश्वरी माता मंदिर ग्राम देवता निकटे जीवनदानी माता मंदिर निकटे  माधव  अटालिका ए विंग मध्ये तृतीय सतह गृह स्थित गृह संख्या 303 आनंद सम्वत्सरे दक्षिणायण सूर्ये वर्षा ऋतौ महामांगल्यप्रद मासोत्तमे मासे पुण्य पवित्रे मासे भाद्रपद  मासे शुक्ल पक्षे चतुर्थी तिथौ चित्रा नक्षत्रे ब्रह्म योगे वनिज करणे शुक्र वासरे कन्या राशि स्थिते चंद्रे सिंह राशि स्थिते सूर्ये कुम्भ राशि स्थिते देव गुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथायथा राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं  ग्रहगुणगण विशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्य तिथौ अमुक गोत्र अमुक नाम अहं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त पुण्य फल प्राप्त्यर्थं मम सकुटुम्बस्य ऐश्वर्याभिवृद्ध्यर्थं अप्राप्तलक्ष्मी प्राप्त्यर्थं प्राप्त लक्ष्म्याश्चिर  कालसंरक्षणार्थं सकलमनईप्सित कामनासंसिध्यर्थं लोके वा राजसभायां तद्वारे  वा  राजद्वारे सभायां व्यापारे देशे विदेशे यन्त्रालय मंत्रालय न्यायालय जले वायु मार्गे सर्वत्र यशोविजय लाभादि प्राप्त्यर्थं पुत्रपौत्राद्यंभि वृद्धर्थं  च इह जन्मनिजन्मान्तरे वा सकलदुरितोपशमनार्थं तथा मम सभार्यस्य  सपुत्रस्य सबान्धवस्य अखिल कुटुम्ब सहितस्य वृद्धयर्थं आदित्यादि नवग्रहानुकूलता सिद्धयर्थं तथा इन्द्रादिदशदिक्पाल प्रसन्नता सिद्धयर्थं आधि दैविकाधि भौतिक आध्यात्मि  त्रिविध तापोप शमणार्थं कायिक वाचिक मानसिक पाप शमणार्थं धर्मार्थकाममोक्ष चतुर्विध पुरूषार्थ सिद्धयर्थं  मम चलित कार्यं उत्तरोत्तर वृद्धयर्थं नवीन कार्य प्राप्त्यर्थं नवीन उत्साह प्राप्त्यर्थं  सुख समृद्धि शान्ति प्राप्त्यर्थं  अमुक कार्य सिद्धयर्थं श्री गणेश प्रीतिकाम:    अमुक गोत्रस्य  अमुक नाम  ब्राह्मण द्वारा  भगवान श्री गणपति पूजनं  अहं  करिष्ये ।
*पार्थिव श्रीगणेश पूजन का महत्त्व और विधि*
अलग अलग कामनाओ की पूर्ति के लिए अलग अलग द्रव्यों से बने हुए गणपति की स्थापना की जाती हैं। यहाँ गणेश जी के 12 प्रकार के पार्थिव स्वरूपो की पूजा का फल दिया जा रहा है।
(1) श्री गणेश👉 मिट्टी के पार्थिव श्री गणेश बनाकर पूजन करने से सर्व कार्य सिद्धि होती हे!                         
(2) हेरम्ब👉 गुड़ के गणेश जी बनाकर पूजन करने से लक्ष्मी प्राप्ति होती हे। 
(3) वाक्पति👉 भोजपत्र पर केसर से पर श्री गणेश प्रतिमा चित्र बनाकर।  पूजन करने से विद्या प्राप्ति होती हे।
 (4) उच्चिष्ठ गणेश👉 लाख के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से स्त्री।  सुख और स्त्री को पतिसुख प्राप्त होता हे घर में ग्रह क्लेश निवारण होता हे। 
(5) कलहप्रिय👉 नमक की डली या। नमक  के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से शत्रुओ में क्षोभ उतपन्न होता हे वह आपस ने ही झगड़ने लगते हे। 
(6) गोबरगणेश👉 गोबर के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से पशुधन में व्रद्धि होती हे और पशुओ की बीमारिया नष्ट होती है (गोबर केवल गौ माता का ही हो)।
(7) श्वेतार्क श्री गणेश👉 सफेद आक मन्दार की जड़ के श्री गणेश जी बनाकर पूजन करने से भूमि लाभ भवन लाभ होता हे। 
(😎 शत्रुंजय👉 कडूए नीम की की लकड़ी से गणेश जी बनाकर पूजन करने से शत्रुनाश होता हे और युद्ध में विजय होती हे।
(9) हरिद्रा गणेश👉 हल्दी की जड़ से या आटे में हल्दी मिलाकर श्री गणेश प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विवाह में आने वाली हर बाधा नष्ठ होती हे और स्तम्भन होता हे।
(10) सन्तान गणेश👉 मक्खन के श्री गणेश जी बनाकर पूजन से सन्तान प्राप्ति के योग निर्मित होते हैं।
(11) धान्यगणेश👉 सप्तधान्य को पीसकर उनके श्रीगणेश जी बनाकर आराधना करने से धान्य व्रद्धि होती हे अन्नपूर्णा माँ प्रसन्न होती हैं।    
(12) महागणेश👉 लाल चन्दन की लकड़ी से दशभुजा वाले श्री गणेश जी प्रतिमा निर्माण कर के पूजन से राज राजेश्वरी श्री आद्याकालीका की शरणागति प्राप्त होती हैं।
पार्थिव गणेश प्रतिष्ठा पूजा 
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द्विराचम्य प्राणायामं कृत्वा। इष्टकुलस्वाम्यादि देवतानां फल-तांबूलानि प्रदानं कृत्वा। ज्येष्ठां नमस्कृत्य।
ॐ श्रीमन्महागणपतये नम:॥
इष्ट,कुल,ग्राम,वास्तु,गुरू देवताभ्यो नम:॥
सुमुखश्चैकदंतश्च……॥
पूजा संकल्प 
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श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य….शालिवाहनशके मन्मथ नामसंवत्सरे, दक्षिणायने, वर्षा ऋतौ, भाद्रपद मासे, शुक्लपक्षे, चतुर्थ्यां तिथौ (रात्री १०:१९पर्यंत), बृहस्पति वासरे, स्वाती (उत्तररात्री १:३१पर्यंत) दिवस नक्षत्रे, तुला (अहोरात्र) स्थिते वर्तमाने चंद्रे, सिंह स्थिते श्रीसूर्ये (दु.१२:१८नंतर कन्या), सिंह स्थिते श्रीदेवगुरौ, वृश्चिक स्थिते श्रीशनैश्चरौ, शेषेशु ग्रहेषु यथायथं….. शुभपुण्यतिथौ….॥
मम आत्मन: श्रुतिस्मृति-पुराणोक्त फलप्राप्त्यर्थं श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं….अमुक …गोत्रोत्पन्नाय अमुक…शर्माणं अहं अस्माकं सकलकुटुंबानां सपरिवाराणां द्विपद-चतुष्पद-सहितानां क्षेम स्थैर्य आयु: आरोग्य ऐश्वर्य अभिवृद्धी अर्थं,समस्त मंगल अवाप्ति अर्थं,समस्त अभ्युदय अर्थं,अभीष्ट कामना सिद्धी अर्थंच प्रतिवार्षिक विहितं {पार्थिवसिद्धिविनायक} देवता प्रीत्यर्थं यथाज्ञानेन यथामिलित उपचार द्रव्यै: पुरुषसूक्त/पुरणोक्तमंत्रै: प्राणप्रतिष्ठापन पूर्वक ध्यानआवाहनादि षोडश उपचार पूजन अहं करिष्ये॥ आदौ निर्विघ्नता सिद्ध्यर्थं महागणपति स्मरणं, शरीर शुद्ध्यर्थं षडंगन्यासं कलश, शंख, घंटा, दीप पूजनं च करिष्ये॥
॥प्राणप्रतिष्ठा॥
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अस्य श्री प्राणप्रतिष्ठामंत्रस्य ब्रह्म-विष्णू-महेश्वरा ऋषय:। ऋग्यजु:सामाथर्वाणि च्छंदासि। पराप्राणशक्तिर्देवता आं बी
जम्। -हीं शक्ति:। क्रों कीलकम्। अस्यां मृन्मयमूर्तौ प्राणप्रतिष्ठापने विनियोग:॥
॥ॐ आं -हीं क्रों॥ अं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं अ:॥ क्रों -हीं आं हंस: सोहं॥
अस्यां मूर्तौ १ प्राण २ जीव ३ सर्वेंद्रियाणि वाङ् मन:त्वक् चक्षु श्रोत्र जिव्हा घ्राण पाणि पाद पायूपस्थानि इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठंतु स्वाहा॥
ॐ असुनीते…ॐ चत्वारिवाक्…॥
गर्भाधानादि १५ संस्कार सिद्ध्यर्थं १५ प्रणवावृती: करिष्ये॥
रक्तांभोधिस्थ… तच्चक्षुर्देवहितं…॥ अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठंतु अस्यै प्राणा:क्षरंतु च।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥
देवस्य आज्येन नेत्रोन्मीलनं कृत्वा।
प्राणशक्त्यै नम:। पंचोपचारै: संपूज्य॥
१ ध्यानं,आवाहनं👉 
एकदंतं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं चतुर्भुजं।
पाशांकुशधरं देवं ध्यायेत्सिद्धिविनायकं॥
ॐ सहस्रशीर्षा…
आवाहयामि विघ्नेश सुरराजार्चितेश्वर।
अनाथनाथ सर्वज्ञ पूजार्थं गणनायक॥
२ आसन👉 
ॐ पुरुषएवेदं…
नानारक्तसमायुक्तं कार्तस्वरविभूषितम्।
आसनं देवदेवेश प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥
३ पाद्यं👉 
ॐ एतावानस्य…
पाद्यं गृहाण देवेश सर्वक्षेमसमर्थ भो।
भक्त्या समर्पितं तुभ्यं लोकनाथ नमोस्तु ते॥
४ अर्घ्य👉 
ॐ त्रिपादूर्ध्व…
नमस्ते देव देवेश नमस्ते धरणीधर।
नमस्ते जगदाधार अर्घ्यं न: प्रतिगृह्यताम॥
५ आचमन👉 
ॐ तस्माद्विराळ…
कर्पूरवासितं वारि मंदाकिन्या:समाहृतम्।
आचम्यतां जगन्नाथ मया दत्तं हि भक्तित:॥
६ स्नान👉 
ॐ यत्पुरुषेण…
गंगादिसर्वतीर्थेभ्यो मया प्रार्थनया हृतम्।
तोयमेतत्सुखस्पर्शं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥
॥पंचामृतस्नान,पंचोपचारपूजा,अभिषेक॥
मांगलिक स्नान👉
ॐ कनिक्रदत्…
तैलेलक्ष्मीर्जलेगंगा यतस्तिष्ठति वै प्रभो।
तन्मांगलिकस्नानार्थं जलतैले समर्पये॥
ॐ तदस्तुमित्रा… सुप्रतिष्ठितमस्तु॥
७ वस्त्र👉 
ॐ तंयज्ञंबर्हिषि…
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे।
मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम्।
८ यज्ञोपवीत👉 
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत:…
देवदेव नमस्तेतु त्राहिमां भवसागरात्।
ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण परमेश्वर॥
९ गंध👉 
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतऋच:…
श्रीखंडं चंदनं दिव्यं गंधाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चंदनं प्रतिगृह्यताम्॥
अक्षतास्तंडुला:शुभ्रा:कुंकूमेन विराजिता:।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर॥
हरिद्रा स्वर्णवर्णाभा सर्वसौभाग्यदायिनी।
सर्वालंकारमुख्या हि देवि त्वं प्रतिगृह्यताम्॥
हरिद्राचूर्णसंयुक्तं कुंकुमं कामदायकम्।
वस्त्रालंकारणं सर्वं देवि त्वं प्रतिगृह्यताम्॥
उदितारुणसंकाश जपाकुसुमसंनिभम्।
सीमंतभूषणार्थाय सिंगूरं प्रतिगृह्यताम्॥
परिमलद्रव्य👉
ॐ अहिरिवभोगै:…
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते विश्वरूपिणे।
नानापरिमलद्रव्यं गृहाण परमेश्वर॥
१० फुले,हार,कंठी👉 
ॐ तस्मादश्वा…
माल्यादीनि सुगंधीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।
मया हृतानि पूजार्थं पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम्॥
करवीरैर्जातिकुसुमैश्चंपकैर्बकुलै:शुभै:।
शतपत्रैश्चकल्हारैरर्चयेत् परमेश्वर॥
॥अथ अंग पूजा॥ 👉 
गणेश्वराय नम:-पादौ पूजयामि॥
विघ्नराजाय नम:-जानुनी पू०॥
आखुवाहनाय नम:-ऊरू पू०॥
हेरंबाय नम:-कटिं पू०॥
लंबोदराय नम:-उदरं पू०॥
गौरीसुताय नम:-स्ननौ पू०॥
गणनायकाय नम:- हृदयं पू॥
स्थूलकर्णाय नम:-कंठं पू०॥
स्कंदाग्रजाय नम:-स्कंधौ पू०॥
पाशहस्ताय नम:-हस्तौ पू०॥
गजवक्त्राय नम:-वक्त्रं पू०॥
विघ्नहत्रे नम:-ललाटं पू०॥
सर्वेश्वराय नम:- शिर:पू०॥
गणाधिपाय नम:-सर्वांगं पूजयामि॥
अथ पत्र पूजा:👉 
सुमुखायनम:-मालतीपत्रं समर्पयामि॥(मधुमालती)
गणाधिपायनम:-भृंगराजपत्रं॥(माका)
उमापुत्रायनम:-बिल्वपत्रं॥(बेल)
गजाननायनम:-श्वेतदूर्वापत्रं॥(पांढ-यादूर्वा)
लंबोदरायनम:-बदरीपत्रं॥(बोर)
हरसूनवेनम:-धत्तूरपत्रं॥(धोत्रा)
गजकर्णकायनम:-तुलसीपत्रं॥(तुळस)
वक्रतुंडायनम:-शमीपत्रं॥(शमी)
गुहाग्रजायनम:-अपामार्गपत्रं॥(आघाडा)
एकदंतायनम:-बृहतीपत्रं॥(डोरली)
विकटायनम:-करवीरपत्रं॥(कण्हेरी)
कपिलायनम:-अर्कपत्रं॥(मांदार)
गजदंतायनम:-अर्जुनपत्रं॥(अर्जुनसादडा)
विघ्नराजायनम:-विष्णुक्रांतापत्रं॥(विष्णुक्रांत)
बटवेनम:-दाडिमपत्रं॥(डाळिंब)
सुराग्रजायनम:-देवदारुपत्रं॥(देवदार)
भालचंद्रायनम:-मरुपत्रं॥(पांढरा मरवा)
हेरंबायनम:-अश्वत्थपत्रं॥(पिंपळ)
चतुर्भुजायनम:-जातीपत्रं॥(जाई)
विनायकायनम:-केतकीपत्रं॥(केवडा)
सर्वेश्वरायनम:-अगस्तिपत्रं॥(अगस्ति)
११ धूप,अगरबत्ती👉 
ॐ यत्पुरुषंव्यदधु:…
वनस्पतिरसोद्भूतो गंधाढ्यो गंधउत्तम:।
आघ्रेय:सर्वदेवानां धूपोयं प्रतिगृह्यताम्॥
१२ दीप,निरांजन👉 
ॐ ब्राह्मणोस्य…
आज्यंच वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेश सर्वक्षेमसमर्थ भो:॥
१३ नैवेद्य,प्रसाद👉 
ॐ चंद्रमामनसो…
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरू।ईप्सितं मे वरं देहि परत्रं च परां गतिम्॥
शर्कराखंडखद्यानी दधिक्षीरघृतानिच।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतं।
कर्पूरैलासमायुक्तं तांबूलं प्रतिगृह्यताम्॥
हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसो:।
अनंतपुण्यफलद मत:शातिं प्रयच्छ मे॥
इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरतस्तव।
तेन मे सुफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥
फलेन फलितं सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम्।
तस्मात्फलप्रदानेन सफलाश्च मनोरथा:॥
दूर्वायुग्म पूजा👉 
गणाध्यक्ष महादेव शिवपुत्राभयप्रद।
दूर्वापूजां गृहाणेश गणाधिप नमोऽस्तुते॥
ॐ गणाधिपायनम:-दूर्वायुग्मं समर्पयामि॥
पतिर्गणानां सर्वेषामम्बिकागर्भसम्भव।
दूर्वायुग्मं गृहाणेश उमापुत्र नमोऽस्तुते॥
ॐ उमापुत्रायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
भक्तानां स्मरणादेव सर्वाद्यक्षयकृद्विभु:।
दूर्वायुग्मं गृहाणेश अघनाश नमोऽस्तुते॥
ॐ अघनाशनायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
नृपाणां युद्धसमये भजतामभयप्रद।
दूर्वापूजां गृहाणेश विनायक नमोऽस्तते॥
ॐ विनायकायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
जनितो देवतार्थाय तारासुतवधो विभु:।
दूर्वापूजां गृहाणेश ईशपुत्र नमोऽस्तुते॥
ॐ ईशपुत्रायनम:-दूर्वायुग्मं०॥
स्कन्दावरज भूतेश लम्बोदर गजानन।
दूर्वायुग्मं गुहाणेश सर्वसिद्धिप्रदायक॥
ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
राक्षसानां विनाशाय दूतायुधधरोभव।
दूर्वापूजां गृहाणेश एकदन्त नमोनम:॥
ॐ एकदंतायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
उमामहेश्वरं दृष्ट्वा कृतोऽसौ गजवक्त्रक:।
दूर्वायुग्मं गृहाणेश इभवक्त्र नमो नम:॥
ॐ इभवक्त्रायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
मूषकोत्तममारुह्य जिता देवा सुराहवे।
दूर्वापूजां गृहाणेश नमो मूषकवाहन॥
ॐ आखुवाहनायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
अग्निर्भू:बाहुलेयश्च गुरुमुख्यो भवप्रभो।
दूर्वापूजां गृहाणेश कुमारगुरवे नम:॥
ॐ कुमारगुरवेनम:-दूर्वायुग्मं ०॥
गणाधिप नमस्तेस्तु उमापुत्राघनाशन।
विनायकेशपुत्रेति सर्वसिद्धिप्रदायक॥
एकदंतेभवक्त्रेति तथा मूषकवाहन।
कुमारगुरवे तुभ्यं पूजनीय:प्रयत्नत:॥
एकैकेन तु नाम्ना तु दत्वैकं सर्वनामभि:।
तत:स्वर्णमयं पुष्पं विघ्नेशाय समर्पयेत्॥
दूर्वामेकां समर्पयामि॥
ॐ श्रियेजात:
चंद्रादित्यौच धरणी विद्युदग्निस्तथैवच।त्वमेव सर्व ज्योतींषि आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम्॥
१४ प्रदक्षिणा👉 
ॐ नाभ्याआसी…
यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च।
तानि तानि विनश्यंति प्रदक्षिण पदे पदे॥
१५ नमस्कार👉 
ॐ सप्तास्यासन्…
नमस्ते विघ्नसंहर्त्रे नमस्ते ईप्सितप्रद।
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते गणनायक॥
१६ प्रार्थना👉 
ॐ यज्ञेनयज्ञम…
विनायकगणेशान सर्वदेवनमस्कृत।
पार्वतीप्रिय विघ्नेश मम विघ्नान्निवारय॥
आवाहनं न जानामि……
यस्यस्मृत्या……
अनेन मया यथाज्ञानेन कृतषोडशोपचार पूजनेन तेन श्रीसिद्धिविनायक:प्रीयताम्॥
*॥जय गणेश॥*

परं धाम परं ब्रह्म परेशं परमीश्वरम । विघ्न निघ्न्करम शान्तं पुष्टं कान्त्मनंत्क्म॥ 
सुरसुरेंद्रे : सिद्धेंद्रे : स्तुतं स्तौमि परात्परं । सुरपद्म दिनेशं च गणेशं मंग्लायतम ॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं विघ्न शोकं हरं परम । यः पठेत प्रात रुत्थाय सर्व विघ्नात प्रमुच्यते ॥
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम्ं। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥

वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ:। निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥

गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः।
द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः॥
विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌॥
विश्वं तस्य भवेद्वश्यं न च विघ्नं भवेत्‌ क्वचित्‌।

केयूरिणं हारकिरीटजुष्टं चतुर्भुजं पाशवराभयानिं। सृणिं वहन्तं गणपं त्रिनेत्रं सचामरस्त्रीयुगलेन युक्तम्॥

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥

नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं। गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च॥

एकदन्तं महाकायं तप्तकांचनसंनिभम्।
लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम्।।
मुंजकृष्णाजिनधरं नागयज्ञोपवीतिनम्।
बालेन्दुकलिकामौलिं वन्देऽहं गणनायकम्।। 

एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्ं। विध्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्॥

रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षकं। भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात्॥

I।श्री गणपति अथर्वशीर्ष।। 

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।
ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।
अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।।3।।
त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि।।4।।
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिवाक्पदानि।।5।।
त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।
गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सं हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।
एकदंताय विद्‍महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।
नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।
एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।।
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।।
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।।
अनेन गणपतिमभिषिंचति
स वाग्मी भवति
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति
स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति।।14।।
यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति
स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति ससर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।।16।। 
अथर्ववेदीय गणपतिउपनिषद समाप्त।।

ध्यानम् 
दन्ताभये चक्रवरौ दधानं कराग्रगं स्वर्ण घटं त्रिनेत्रम् । धृताब्जयालिंगितमब्धिपुत्र्या लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे 

ॐ नमो विघ्नराजाय सर्वसौख्यप्रदायिने । दुष्टारिष्ट विनाशाय पराय परमात्मने ॥ लम्बोदरं महावीर्यं नागयज्ञाय शोभितम् । अर्धचन्द्रधरं देवं विघ्न व्यूह विनाशनम् ॥ ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः हेरम्बाय नमो नमः । सर्वसिद्धिप्रदो सित्वं सिद्धिबुद्धिप्रदोभव ॥ चिन्तितार्थ प्रदस्त्व हि सततं मोदकप्रियः । सिन्दुरारुणत्रस्त्रेश्च पूजितो वरदायकः ॥ इदं गणपतिस्तोत्रं यः पठेद् भक्तिमान् नरः । तस्य देहं च गेहं च स्वयं लक्ष्मीर्न मुञ्चति ॥

श्री और संतान प्राप्ति का  गणाधिपस्तोत्र

सरागिलोकदुर्लभं विरागिलोकपूजितं सुरासुरैर्नमस्कृतं जरापमृत्युनाशकम् । गिरा गुरुं श्रिया हरिं जयन्ति यत्पदार्चकाः नमामि तं गणाधिपं कृपापयः पयोनिधिम् ॥ 1॥ गिरीन्द्रजामुखाम्बुज प्रमोददान भास्करं रीन्द्रवक्त्रमानताघसङ्घवारणोद्यतम् । सरीसृपेश बद्धकुक्षिमाश्रयामि सन्ततं शरीरकान्ति निर्जिताब्जबन्धुबालसन्ततिम् ॥ 2॥ शुकादिमौनिवन्दितं गकारवाच्यमक्षरं प्रकाममिष्टदायिनं सकामनम्रपङ्क्तये । चकासतं चतुर्भुजैः विकासिपद्मपूजितं प्रकाशितात्मतत्वकं नमाम्यहं गणाधिपम् ॥ 3॥ नराधिपत्वदायकं स्वरादिलोकनायकं ज्वरादिरोगवारकं निराकृतासुरव्रजम् । कराम्बुजोल्लसत्सृणिं विकारशून्यमानसैः हृदासदाविभावितं मुदा नमामि विघ्नपम् ॥ 4॥ श्रमापनोदनक्षमं समाहितान्तरात्मनां सुमादिभिः सदार्चितं क्षमानिधिं गणाधिपम् । रमाधवादिपूजितं यमान्तकात्मसम्भवं शमादिषड्गुणप्रदं नमामि तं विभूतये ॥ 5॥ गणाधिपस्य पञ्चकं नृणामभीष्टदायकं प्रणामपूर्वकं जनाः पठन्ति ये मुदायुताः । भवन्ति ते विदां पुरः प्रगीतवैभवाजवात् चिरायुषोऽधिकः श्रियस्सुसूनवो न संशयः ॥ 6

  llसंकटनाश गणेश स्तोत्र ll
प्रणम्य शिरसा देवं गौरी विनायकम् ।
भक्तावासं स्मेर नित्यमाय्ः कामार्थसिद्धये ॥1॥
प्रथमं वक्रतुडं च एकदंत द्वितीयकम् ।
तृतियं कृष्णपिंगात्क्षं गजववत्रं चतुर्थकम् ॥2॥
लंबोदरं पंचम च पष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेंद्रं धूम्रवर्ण तथाष्टमम् ॥3॥

नवमं भाल चंद्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजानन् ॥4॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंघ्यंयः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥5॥

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मो क्षार्थी लभते गतिम् ॥6॥

जपेद्णपतिस्तोत्रं षडिभर्मासैः फलं लभते ।
संवत्सरेण सिद्धिंच लभते नात्र संशयः ॥7॥

अष्टभ्यो ब्राह्मणे भ्यश्र्च लिखित्वा फलं लभते
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥8॥
॥ इति श्री नारद पुराणे संकष्टनाशनं नाम श्री गणपति स्तोत्रं संपूर्णम् ॥

मयूरेश स्तोत्रं
ब्रह्मा उवाच 
पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा ।
मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ १ ॥
परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् ।
गुणातीतं गुनमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ २ ॥
सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया । 
सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ३ ॥
नानादैत्यनिहन्तारं नानारुपाणि बिभ्रतम् ।
नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ४ ॥
इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् ।
सदसद्व्यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ५ ॥
सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरुपधरं विभुम् ।
सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ६ ॥
पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् ।
भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ७ ॥
मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपुरकम् ।
समष्टिव्यष्टिरुपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ८ ॥
सर्वाज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् ।
सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ९ ॥
अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्र्वरम् ।
अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ १० ॥
मयूरेश उवाच 
इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रनाशनम् ।
सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम् ॥ ११ ।
कारागृहगतानां च मोचनं दिनसप्तकात् ।
आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ॥ १२॥
॥ इति श्रीमयूरेशस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

ज्ञानार्थवाचको गश्च णश्च निर्वाणवाचक:।
तयोरीशं परं ब्रह्म गणेशं प्रणमाम्यहम्।।

एकशब्द: प्रधानार्थो दन्तश्च बलवाचक:।
बलं प्रधानं सर्वास्मादेकदन्तं प्रणमाम्यहम् ll

दीनार्थवाचको हेश्च रम्ब: पालकवाचक:।
दीनानां परिपालकं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्।।

विपत्तिवाचको विघ्नो नायक: खण्डनार्थक:।
विपत्खण्डनकारकं नमामि विघ्ननायकम्।।

विष्णुदत्तैश्च नैवेद्यर्यस्य लम्बोदरं पुरा।
पित्रा दत्तैश्च विविधैर्वन्दै लम्बोदरं च तम्।।

शूर्पाकारौ च यत्कर्णौं विघ्न निवारणकारणौ।
सम्पदौ ज्ञानरूपौ च शूर्पकर्णं नमाम्यहम्।।

विष्णुप्रसादपुष्पं च यन्मूर्ध्नि मुनिदत्तकम्।
तद् गजेन्द्रवक्त्रयुक्तं गजवक्त्रं नमाम्यहम्।।

गुहस्याग्रे च जातोऽयमाविर्भूतो हरालये।
वन्देगुहाग्रजं देवं सर्वदेवाग्रपूजितम्।।

एतन्नामाष्टकं दुर्गे नामभि: संयुतं परम्।
पुत्रस्य पश्य वेदे च तदा कोपं तथा कुरु।।

नामाष्टक स्तोत्र के पाठ का फल

एतन्नामाष्टकं स्तोत्रं नानार्थसंयुतं शुभम्।
त्रिसंध्यं य: पठेन्नित्यं स सुखी सर्वतो जयी।।
ततो विघ्ना: पलायन्ते वैनतेयाद् यथोरगा:।
गणेश्वरप्रसादेन महाज्ञानी भवेद् ध्रुवम्।।
पुत्रार्थी लभते पुत्रं भार्यार्थी विपुलां स्त्रियम्।
महाजड: कवीन्द्रश्च विद्यावांश्च भवेद् ध्रुवम्।।

श्री गणेश कवच (2)

एषोति चपलो दैत्यान् बाल्येपि नाशयत्यहो ।
अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ॥

दैत्या नानाविधा दुष्टास्साधु देवद्रुमः खलाः ।
अतोस्य कंठे किंचित्त्यं रक्षां संबद्धुमर्हसि ॥

ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहु माद्ये युगे
त्रेतायां तु मयूर वाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् । ई
द्वापरेतु गजाननं युगभुजं रक्तांगरागं विभुम् तुर्ये
तु द्विभुजं सितांगरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥

विनायक श्शिखांपातु परमात्मा परात्परः ।
अतिसुंदर कायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥

ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः ।
नयने बालचंद्रस्तु गजास्यस्त्योष्ठ पल्लवौ ॥

जिह्वां पातु गजक्रीडश्चुबुकं गिरिजासुतः ।
वाचं विनायकः पातु दंतान्‌ रक्षतु दुर्मुखः ॥

श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिंतितार्थदः ।
गणेशस्तु मुखं पातु कंठं पातु गणाधिपः ॥

स्कंधौ पातु गजस्कंधः स्तने विघ्नविनाशनः ।
हृदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान् ॥

धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरश्शुभः ।
लिंगं गुह्यं सदा पातु वक्रतुंडो महाबलः ॥

गजक्रीडो जानु जंघो ऊरू मंगलकीर्तिमान् ।
एकदंतो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदावतु ॥

क्षिप्र प्रसादनो बाहु पाणी आशाप्रपूरकः ।
अंगुलीश्च नखान् पातु पद्महस्तो रिनाशनः ॥

सर्वांगानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदावतु ।
अनुक्तमपि यत् स्थानं धूमकेतुः सदावतु ॥

आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोवतु ।
प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥

दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः ।
प्रतीच्यां विघ्नहर्ता व्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥

कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्याविशनंदनः ।
दिवाव्यादेकदंत स्तु रात्रौ संध्यासु यःविघ्नहृत् ॥

राक्षसासुर बेताल ग्रह भूत पिशाचतः ।
पाशांकुशधरः पातु रजस्सत्त्वतमस्स्मृतीः ॥

ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मी च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् । ई
वपुर्धनं च धान्यं च गृहं दारास्सुतान्सखीन् ॥

सर्वायुध धरः पौत्रान् मयूरेशो वतात् सदा ।
कपिलो जानुकं पातु गजाश्वान् विकटोवतु ॥

भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कंठे धारयेत् सुधीः ।
न भयं जायते तस्य यक्ष रक्षः पिशाचतः ॥

त्रिसंध्यं जपते यस्तु वज्रसार तनुर्भवेत् ।
यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥

युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् ।
मारणोच्चाटनाकर्ष स्तंभ मोहन कर्मणि ॥

सप्तवारं जपेदेतद्दनानामेकविंशतिः ।
तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥

एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः ।
कारागृहगतं सद्यो राज्ञावध्यं च मोचयोत् ॥

राजदर्शन वेलायां पठेदेतत् त्रिवारतः ।
स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥

इदं गणेशकवचं कश्यपेन सविरितम् ।
मुद्गलाय च त्रइनाथ मांडव्याय महर्षये ॥

मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्व सिद्धिदम् ।
न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ॥

अनेनास्य कृता रक्षा न बाधास्य भवेत् व्याचित् ।
राक्षसासुर बेताल दैत्य दानव संभवाः ॥

संसारमोहन गणेश कवचं 

ॐ अस्य श्री गणेश कवचमंत्रस्य संसारमोहनस्यास्य कवचस्य प्रजापति:ऋषि बृहतीश्छन्दश्च देवो लम्बोदर: स्वयम्॥ धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोग: प्रकीर्तित:।  सर्वेषां कवचानां च सारभूतमिदं मुने॥ 

ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा मे पातुमस्तकम्।  द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो ललाटं मे सदावतु॥ 

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं गमिति च संततं पातु लोचनम्।  तालुकं पातु विध्नेशःसंततं धरणीतले॥
 ॐ ह्रीं श्रीं क्लीमिति च संततं पातु नासिकाम्।  ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा पात्वधरं मम॥ दन्तानि तालुकां जिह्वां पातु मे षोडशाक्षर:॥ ॐ लं श्रीं लम्बोदरायेति स्वाहा गण्डं सदावतु।  ॐ क्लीं ह्रीं विघन्नाशाय स्वाहा कर्ण सदावतु॥ ॐ श्रीं गं गजाननायेति स्वाहा स्कन्धं सदावतु।  ॐ ह्रीं विनायकायेति स्वाहा पृष्ठं सदावतु॥ ॐ क्लीं ह्रीमिति कङ्कालं पातु वक्ष:स्थलं च गम्।  करौ पादौ सदा पातु सर्वाङ्गं विघन्निघन्कृत्॥ प्राच्यां लम्बोदर: पातु आगन्य्यां विघन्नायक:।  दक्षिणे पातु विध्नेशो नैर्ऋत्यां तु गजानन:॥ पश्चिमे पार्वतीपुत्रो वायव्यां शंकरात्मज:।  कृष्णस्यांशश्चोत्तरे च परिपूर्णतमस्य च॥ ऐशान्यामेकदन्तश्च हेरम्ब: पातु चो‌र्ध्वत:।  अधो गणाधिप: पातु सर्वपूज्यश्च सर्वत:॥ स्वप्ने जागरणे चैव पातु मां योगिनां गुरु:॥ इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्।  संसारमोहनं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥ श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके रासमण्डले।  वृन्दावने विनीताय मह्यं दिनकरात्मज:॥ मया दत्तं च तुभ्यं च यस्मै कस्मै न दास्यसि।  परं वरं सर्वपूज्यं सर्वसङ्कटतारणम्॥ गुरुमभ्य‌र्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु य:।  कण्ठे वा दक्षिणेबाहौ सोऽपि विष्णुर्नसंशय:॥ अश्वमेधसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च।  ग्रहेन्द्रकवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ इदं कवचमज्ञात्वा यो भजेच्छंकरात्मजम्।  शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्र: सिद्धिदायक:॥
॥ ऋणमुक्ति श्री गणेश स्तोत्रम् ॥

॥ विनियोग ॥
ॐ अस्य श्रीऋणविमोचन महागणपति-स्तोत्रमन्त्रस्य
शुक्राचार्य ऋषिः ऋणविमोचन महागणपतिर्देवता
अनुष्टुप् छन्दः ऋणविमोचन महागणपतिप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

॥ स्तोत्र पाठ ॥

ॐ स्मरामि देवदेवेशं
वक्रतुण्डं महाबलम्।
षडक्षरं कृपासिन्धुं
नमामि ऋणमुक्तये॥1॥

महागणपतिं वन्दे
महासेतुं महाबलम्।
एकमेवाद्वितीयं तु
नमामि ऋणमुक्तये॥2॥

एकाक्षरं त्वेकदन्तमेकं
ब्रह्म सनातनम्।
महाविघ्नहरं देवं
नमामि ऋणमुक्तये॥3॥

शुक्लाम्बरं शुक्लवर्णं
शुक्लगन्धानुलेपनम्।
सर्वशुक्लमयं देवं
नमामि ऋणमुक्तये॥4॥

रक्ताम्बरं रक्तवर्णं
रक्तगन्धानुलेपनम्।
रक्तपुष्पैः पूज्यमानं
नमामि ऋणमुक्तये॥5॥

कृष्णाम्बरं कृष्णवर्णं
कृष्णगन्धानुलेपनम्।
कृष्णयज्ञोपवीतं च
नमामि ऋणमुक्तये॥6॥

पीताम्बरं पीतवर्ण
पीतगन्धानुलेपनम्।
पीतपुष्पैः पूज्यमानं
नमामि ऋणमुक्तये॥7॥

सर्वात्मकं सर्ववर्णं
सर्वगन्धानुलेपनम्।
सर्वपुष्पैः पूज्यमानं
नमामि ऋणमुक्तये॥8॥

एतद् ऋणहरं स्तोत्रं
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
षण्मासाभ्यन्तरे तस्य
ऋणच्छेदो न संशयः॥9॥

सहस्रदशकं कृत्वा
ऋणमुक्तो धनी भवेत्॥

॥ इति रुद्रयामले ऋणमुक्ति श्री गणेशस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
गणेशाष्टक स्तोत्र
सर्व कार्य सिद्धि हेतु नित्य पढ़ें गणेशाष्टक स्तोत्र 
श्री गणेश देवताओं के प्रधान देवता हैं। भगवान शिव द्वारा उन्हें वरदान प्राप्त हुआ था कि सभी शुभ एवं मांगलिक कार्यों को आरम्भ करने से पूर्व यदि  श्री गणेश का पूजन किया जायेगा तो कार्य निर्विघ्न संपन्न हो जायेंगे इसीलिए गजानन को विघ्नहर्ता, संकटनाशन कहा जाता है। श्री गणेश रिद्धि और सिद्धि के स्वामी हैं इसीलिए जिस घर में गणपति की नित्य आराधना होती है वहां रिद्धि और सिद्धि का स्थाई का स्थाई निवास होता है। संक्षेप में श्री गणेश की पूजा आराधना करने से आर्थिक धनलाभ, विद्या एवं बुद्धि प्राप्ति तथा संकटों  का नाश होकर समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। यहाँ समस्त कार्यों की सिद्धि हेतु ' गणेशाष्टक स्तोत्र ' का उल्लेख किया जा रहा है। इसके नित्य पाठ करने से आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त होते हैं। 
                                                                   गणेशाष्टक स्तोत्र 
                                                                        सर्वे ऊचुः 
यतोअनन्तशक्तेरनन्ताश्च जीवा यतो निर्गुणादप्रमेया गुणास्ते। यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 

यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेतत्त्थाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता। तथेन्द्रादयो देवसंघा मनुष्याः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 

यतो वहिनभानुद्भवो भूर्जलं च यतः सागराश्चन्द्रमा व्योम वायुः। यतः स्थावरा जंगमा वृक्षसंघा सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 

यतो दानवाः किंनरा यक्षसंघा यतश्चारणा वारणः श्वापदाश्च। यतः पक्षिकीटा यतो  वीरूधश्च सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 

यतो बुद्धिर्ज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यताः सम्पदो भक्तसंतोषिकः स्युः। यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 

यतः पुत्रसम्पदः यतो वाञ्छितार्थो यतोभक्तविघ्नास्तथानेकरूपाः। यतः शोकमोहौ यतः काम एव सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 

यतोनन्तशक्तिः स शेषो बभूव धराधारणेअनेकरूपे च शक्तः। यतोअनेकधा स्वर्गलोका हि नाना सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 

यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यत्ता गृणन्ति। परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 
                                                       श्री गणेश उवाच        
पुनरूचे गणाधीशः स्तोत्रमेतत्पठेन्नरः। त्रिसन्ध्यं त्रिदिनं तस्य सर्व कार्यं भविष्यति ।। 
यो जपेदष्टदिवसं श्लोकाष्टकमिदं शुभम। अष्टवारं चतुर्थ्याम् तु सोअष्टसिद्धिरवाप्नुयात् ।।
यः पठेन्मासमात्रं तु दशवारं दिने दिने। स मोचयेद्वंधगतम् राजवध्यं न संशयः ।।
विद्याकामो लभेदिविद्या पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात्। वांछितांल्लभते सर्वानेकविंशतिवारतः ।।
यो जपेत् परया भक्त्या गजाननपरो नरः। एवमुक्त्वा ततो देवश्चन्तर्धानं गतः प्रभुः ।।
                               । । इति श्रीगणेश पुराणे श्री गणेशाष्टकं सम्पूर्णं । ।

गणेश प्रार्थना!!
==========.
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय, लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय!
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय, गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते!!
भक्तार्तिनाशनपराय गनेशाश्वराय, सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय!
विद्याधराय विकटाय च वामनाय , भक्त प्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते!!
नमस्ते ब्रह्मरूपाय विष्णुरूपाय ते नम:!
नमस्ते रुद्राय्रुपाय करिरुपाय ते नम:!!
विश्वरूपस्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मचारणे!
भक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक!!
लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रिय! 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा!!
त्वां विघ्नशत्रुदलनेति च सुन्दरेति , 
भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति!
विद्याप्रत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति,
तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव!!
गणेशपूजने कर्म यन्न्यूनमधिकं कृतम !
तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नोSस्तु सदा मम !!

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