माँ मातंगी साधना : देवी मातंगी
दस महाविद्याओं में नौवीं, देवी मातंगी, एक उग्र स्वरुप, उत्कृष्ट ज्ञान से सम्पन्न, कला और संगीत पर महारत प्राप्त करने वाली।
देवी मातंगी दस महाविद्याओं में नवे स्थान पर अवस्थित हैं तथा देवी निम्न जाती तथा जनजातिओ से सम्बंधित रखती हैं। देवी का एक अन्य विख्यात नाम उच्छिष्ट चांडालिनी भी हैं तथा देवी का सम्बन्ध नाना प्रकार के तंत्र क्रियाओं से हैं। इंद्रजाल विद्या या जादुई शक्ति कि देवी प्रदाता हैं, वाक् सिद्धि, संगीत तथा अन्य ललित कलाओं में निपुण, सिद्ध विद्याओ से सम्बंधित हैं तथा अपने भक्तों को प्रदान करती हैं। देवी, केवल मात्र वचन द्वारा त्रिभुवन में समस्त प्राणिओ तथा अपने घनघोर शत्रु को भी वश करने में समर्थ हैं, जिसे सम्मोहन क्रिया कहा जाता हैं। देवी सम्मोहन विद्या की अधिष्ठात्री हैं। देवी का सम्बन्ध प्रकृति, पशु, पक्षियों, जंगलों, वनों, शिकार इत्यादि से हैं तथा जंगल में वास करने वाले आदिवासिओ, जनजातिओ कि देवी पूजिता हैं। ऐसा माना जाता हैं कि देवी की ही कृपा से वैवाहिक जीवन सुखमय होता हैं। देवी मातंग मुनि के पुत्री के रूप से भी जानी जाती हैं। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध उच्छिष्ट भोजन पदार्थो से हैं, देवी तभी उच्छिष्ट चांडालिनी के नाम से विख्यात हैं तथा देवी की आराधना हेतु उपवास की भी आवश्यकता नहीं होती। देवी कि आराधना हेतु उच्छिष्ट सामाग्रीओ की आवश्यकता होती हैं चुकी देवी की उत्पत्ति शिव तथा पार्वती के उच्छिष्ट भोजन से हुई थी। देवी की आराधना सर्वप्रथम भगवान विष्णु द्वारा ही हुई, तभी भगवान विष्णु सुखी, सम्पन्न, श्री युक्त तथा उच्च पद पर विराजित हैं। देवी की अराधना बौद्ध धर्म में भी की जाती हैं, किन्तु बौद्ध धर्म के प्रारंभ में देवी का कोई अस्तित्व नहीं था। कालांतर में देवी बौद्ध धर्मं में मातागिरी नाम से जनि जाने लगी।
देवी के अन्य विख्यात नाम: उछिष्ट साम मोहिनी, लघु श्यामा, राज मातंगी, वैश्य मातंगी, चण्ड मातंगी, कर्ण मातंगी, सुमुखि मातंगी, षडाम्नायसाध्य। रति, प्रीति, मनोभाव, क्रिया, शुधा, अनंग कुसुम, अनंग मदन तथा मदन लसा देवी मातंगी की आठ शक्तियां हैं।
देवी चण्डालिनी हैं तथा भगवान शिव चांडाल, जो श्मशान घाटो में शव दाह से सम्बंधित कार्य करते हैं।
देवी का सम्बन्ध मृत शरीर या शव तथा श्मशान भूमि से भी हैं। देवी अपने दाहिने हाथ पर महा शंख (मनुष्य खोपड़ी) या खोपड़ी से निर्मित खप्पर, धारण करती हैं। पारलौकिक या इंद्रजाल, मायाजाल से सम्बंधित रखने वाले सभी देवी देवता श्मशान, शव, चिता, चिता भस्म, हड्डीओं से जुड़े होते हैं, कहा जाता हैं पारलौकिक शक्तियां यही वास करती हैं। तंत्रो या तंत्र विद्या के अनुसार देवी तांत्रिक सरस्वती नाम से जनि जाती हैं तथा श्री विद्या त्रिपुर सुंदरी के रथ की सारथि तथा मुख्य सलाहकार हैं। देवी हिन्दू समाज के अत्यंत निम्न जाती, चांडाल सम्बद्ध हैं, देवी चांडालिनी हैं तथा भगवान शिव चांडाल। (चांडाल श्मशान घाटो में शव दाह से सम्बंधित कार्य करते हैं) तंत्र शास्त्र में देवी की उपासना विशेषकर वाक् सिद्धि (जो बोला जाये वही हो) हेतु, पुरुषार्थ सिद्धि तथा भोगविलास में पारंगत होने हेतु कि जाती हैं। देवी मातंगी चौसठ प्रकार के ललित कलाओं से सम्बंधित विद्याओं से निपुण हैं तथा तोता पक्षी इनके बहुत निकट हैं।
देवी मातंगी का भौतिक स्वरूप विवरण।
देवी मातंगी का वर्ण गहरे नीले रंग (नील कमल के समान) या श्याम वर्ण का है, अपने मस्तक पर देवी अर्ध चन्द्र धारण करती हैं, देवी तीन नशीले नेत्रों से युक्त हैं, देवी अमूल्य रत्नो से युक्त रत्नमय सिंहासन पर बैठी हैं, मुक्तभूषण से सुसज्जित हैं। अन्य स्वरूपों में देवी कमल के आसन तथा शव पर भी विराजमान हैं। देवी मातंगी गुंजा के बीजो की माला धारण करती हैं, लाल रंग के आभूषण देवी को प्रिय हैं तथा सामान्यतः लाल रंग के ही आभूषण धारण करती हैं। देवी सोलह वर्ष की एक युवती जैसा स्वरूप धारण करती हैं जिनकी शारीरिक गठन पूर्ण तथा मनमोहक हैं। देवी ने अपने दायें हाथों में वीणा तथा मानव खोपड़ी धारण कर राखी हैं तथा बायें हाथों से खड़ग धारण करती हैं तथा अभय मुद्रा प्रदर्शित करती हैं।
देवी मातंगी के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा।
शक्ति संगम तंत्र के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु और उनकी पत्नी लक्ष्मी जी, भगवान शिव तथा सती से मिलने हेतु कैलाश पर्वत गये, पर जहाँ शिव तथा सती जी का निवास स्थान है। भगवान विष्णु, अपने साथ खाने की कुछ सामग्री अपने साथ ले गए तथा शिव जी को भेट की। शिव तथा सती जी ने, उपहार स्वरूप प्राप्त हुए वस्तुओं को खाया, भोजन करते हुए खाने का कुछ भाग नीचे धरती पर गिरा। परिणामस्वरूप, उन गिरे हुए भोजन के भागों से एक श्याम वर्ण वाली दासी ने जन्म लिया, जो मातंगी नाम से विख्यात हुई। देवी का प्रादुर्भाव उच्छिष्ट भोजन से हुआ, परिणामस्वरूप देवी का सम्बन्ध उच्छिष्ट भोजन सामग्रीओ से हैं तथा इन्हीं उच्छिष्ट वस्तुओं से देवी की अराधना होती हैं। देवी उच्छिष्ट मातंगी नाम से जानी जाती हैं।
प्राणतोषिनी तंत्र के अनुसार, एक बार पार्वती देवी ने, अपने पति भगवान शिव से अपने पिता हिमालय राज के यहाँ जा अपने माता तथा पिता से मिलने की अनुमति मांगी। परन्तु भगवान शिव नहीं चाहते थे की वो उन्हें अकेले छोड़ कर जाये। परन्तु, शिव जी के सन्मुख बार बार प्रार्थना करने पर, उन्होंने देवी को अपने पिता हिमालय राज के यहाँ जाने की अनुमति दे दी। साथ ही शिव जी ने एक शर्त भी राखी, की वो शीघ्र ही माता-पिता से मिलकर वापस कैलाश आ जाएगी। तदनंतर पार्वती की माता ने एक बगुला भेजा, अपनी पुत्री पार्वती को कैलाश से लेन हेतु। कुछ दिन पश्चात् भगवान शिव बिना पार्वती के विरक्त हो गए तथा उन्हें वापस लाने का उपाय सोचने लगे। शिव जी ने अपना भेष एक आभूषण के व्यापारी के रूप में बदल तथा हिमालय राज के घर गए। शिव जी इस भेष में देवी पार्वती की परीक्षा लेना चाहते थे, वे पार्वती के सन्मुख गए और अपनी इच्छा अनुसार आभूषणो का चुनाव करने के लिया कहा। पार्वती जी ने जब कुछ आभूषणो का चुनाव कर लिया, शिव जी ने आभूषणो के मूल्य के बदले उन से सम्भोग की इच्छा प्रकट की। देवी पार्वती अत्यंत क्रोधित हुई तथा अपनी अलौकिक शक्तिओ से उन्होंने पहचान लिया। तदनंतर देवी सम्भोग हेतु तैयार हो गई तथा व्यापारी से कुछ दिनों बाद आने का निवेदन किया। कुछ दिनों पश्चात् देवी पार्वती भी भेष बदल कर, शिव जी के सन्मुख कैलाश पर्वत पर गई। भगवान शिव अपने नित्य संध्योपासना के तैयारी कर रहे थे। देवी पार्वती लाल वस्त्र धारण कर, बड़ी बड़ी आँखें कर, श्याम वर्ण तथा दुबले शरीर से युक्त अपने पति शिव जी के सन्मुख प्रकट हुई। भगवान शिव ने देवी से उनका परिचय पूछा, देवी ने उत्तर दिया कि वह एक चांडाल की कन्या हैं तथा तपस्या करने आई हैं। भगवान शिव ने देवी को पहचान लिया तथा कहाँ वो तपस्वी को तपस्या का फल प्रदान करने वाले हैं। यह कहते हुए उन्होंने देवी का हाथ पकड़ लिया और प्रेम में मग्न हो गए। तत्पश्चात्, देवी ने भगवान शिव से वार देने का निवेदन किया तथा शिव जी ने उन्हें इसी रूप चांडालिनी से अवस्थित होने का अशिर्वाद प्रदान किया तथा कई अलौकिक शक्तियां प्रदान की।
देवी चांडालिनी हैं तथा भगवान शिव चांडाल, जो श्मशान घाटो में शव दाह से सम्बंधित कार्य करते हैं।
नारदपंचरात्र के अनुसार, कैलाशपति भगवान शिव को चांडाल तथा देवी शिवा को ही उछिष्ट चांडालिनी कहा गया हैं। एक बार मातंग मुनि ने, सभी जीवो को वश में करने हेतु, नाना प्रकार के वृक्षों से परिपूर्ण वन में देवी श्री विद्या त्रिपुरा की आराधना की। मातंग मुनि के कठिन साधना से संतुष्ट हो देवी त्रिपुर सुंदरी ने अपने नेत्रों से एक श्याम वर्ण की सुन्दर कन्या का रूप धारण किया। इन्हें राज मातंगी कहा गया तथा ये भी देवी मातंगी का ही एक स्वरूप हैं। तभी देवी मतंग कन्या के नाम से भी जानी जाती हैं। देवी के सन्मुख बैठा तोता ह्रीं वर्ण का उचारण करता है, जो बीजाक्षर का प्रतिक हैं। कमल सृष्टि का, शंख पात्र ब्रह्मरंध, मधु अमृत, शुक या तोता शिक्षा का प्रतिक हैं।
🕉️9वी महाविद्या माँ मातंगी की साधना . मां के भक्त जन साल के किसी भी नवरात्री /गुप्त नवरात्री /अक्षय तृतीया या किसी भी शुभ मुहूर्त या शुक्ल पक्ष में शुरु कर सकते हैं.
मैरिड लाइफ की हर समस्या होगी उड़नछू
माता को प्रकृति की देवी माना जाता है। इनकी आराधना से आपके व्यक्तित्व में आकर्षण बनता है। साथी के साथ चल रही परेशानियों से मुक्ति के लिए आज के दिन माता को वरमाला, कुमकुम, एवं सुगंधी चढ़ाएं। पुष्प से श्रृंगार करने पर देवी अत्यंत प्रसन्न तो होती ही हैं, इच्छित वर भी देती हैं।
यदि आपके जीवन में आर्थिक समस्या के कारण रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं तो आपको माता को अनार अर्पित करते हुए कमल गट्टे की माला पर इन मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए-माँ मातंगी की साधना से व्यक्ति का हर काम आसानी से बनने लगता है। अपनी वाणी से आकर्षित करना, काम बनवाना, यह सब माँ मातंगी की कृपा से ही हो सकता है।
अक्षय तृतीया को मातंगी प्राकट्य दिवस भी होता है, मां को प्रसन्न कर सकते हैं और जो भी माँ मातंगी की साधना करना चाहते है, जो अपने जीवन में गृहस्थ समस्याओं से कलह कलेश आर्थिक तंगी ओर रोग ,तंत्र जादू टोना से पीड़ित है वो मां मातंगी जी की साधना एक बार जरूर करके देखे उन्हें जरूर लाभ होगा ये मेरा विश्वास है। मां अपने शरण में आए हुए हर भक्त की मनोकानाएं पूर्ण करती है।एक बार भगवान विष्णु और उनकी पत्नी लक्ष्मी जी, भगवान शिव तथा पार्वती से मिलने हेतु उनके निवास स्थान कैलाश शिखर पर गये। भगवान विष्णु अपने साथ कुछ खाने की सामग्री ले गए तथा उन्होंने वह खाद्य प्रदार्थ शिव जी को भेट स्वरूप प्रदान की। भगवान शिव तथा पार्वती ने उपहार स्वरूप प्राप्त हुए वस्तुओं को खाया, भोजन करते हुए खाने का कुछ अंश नीचे धरती पर गिर उन गिरे हुए भोजन के भागों से एक श्याम वर्ण वाली दासी ने जन्म लिया जो मातंगी नाम से विख्यात हुई। देवी का प्रादुर्भाव उच्छिष्ट भोजन से हुआ, परिणामस्वरूप देवी का सम्बन्ध उच्छिष्ट भोजन सामग्रियों से हैं तथा उच्छिष्ट वस्तुओं से देवी की आराधना होती हैं। देवी उच्छिष्ट मातंगी नाम से जानी जाती हैं। तंत्र शास्त्र में देवी की उपासना विशेषकर वाक् सिद्धि (जो बोला जाये वही सिद्ध होना) हेतु, पुरुषार्थ सिद्धि तथा भोग-विलास में पारंगत होने हेतु की जाती हैं। देवी मातंगी चैंसठ प्रकार के ललित कलाओं से सम्बंधित विद्याओं में निपुण हैं तथा तोता पक्षी इनके बहुत निकट हैं। मातंगी दस महाविद्याओं में से नौवीं विद्या हैं। माँ मातंगी जयंती पर माता की पूजा अर्चना की जाती है। इस पावन अवसर पर जो भी कोई माता की पूजा करता है वह सर्व-सिद्धियों का लाभ प्राप्त करता है। मातंगी की पूजा व्यक्ति को सुखी जीवन प्रदान करती है। राक्षसों का नाश व उनका वध करने हेतु माता मातंगी ने विशिष्ट तेजस्वी स्वरुप धारण किया। ऐसा माना जाता हैं कि देवी की ही कृपा से वैवाहिक जीवन सुखमय होता हैं, देवी ग्रहस्त के समस्त कष्टों का निवारण करती हैं। देवी की उत्पत्ति शिव तथा पार्वती के प्रेम से हुई हैं। मतंग शिव का नाम है। इनकी शक्ति मातंगी है। यह श्याम वर्ण और चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करती हैं। चार भुजाएं और चार वेद है। भगवती मातंगी त्रिनेत्रा, रत्नमय सिंहासन पर आसीन, नीलकमल के समान कान्तिवाली तथा राक्षस-समूह रूप अरण्य को भस्म करने में दावानल के समान हैं। माँ मातंगी का सम्बन्ध मृत शरीर या शव तथा श्मशान भूमि से हैं। माँ मातंगी अपने दाहिने हाथ पर महा-शंख (मनुष्य खोपड़ी) या खोपड़ी से निर्मित खप्पर, धारण करती हैं। तंत्र विद्या के अनुसार देवी तांत्रिक सरस्वती नाम से जानी जाती हैं एवं श्री विद्या महा त्रिपुरसुंदरी के रथ की सारथी है। नारद पांचरात्र के बारहवें अध्याय में शिव को चाण्डाल तथा शिवा को उच्छिष्ट चाण्डाली कहा गया है। इनका ही नाम मातंगी है। पुराकाल में मतंग नामक मुनि ने नाना वृक्षों से परिपूर्ण कदम्ब वन में सभी जीवों को वश में करने के लिए भगवती त्रिपुरा की प्रसन्नता हेतु कठोर तपस्या की थी उस समय त्रिपुरा के नेत्र से उत्पन्न तेज ने एक श्यामल नारी-विग्रह का रूप धारण कर लिया। इन्हें राजमातंगिनी कहा गया है। यह दक्षिण तथा पश्चिमाम्नाय की देवी हैं। राजमातंगी, सुमुखी, वश्यमातंगी तथा कर्णमातंगी इनके नामान्तर हैं। मातंगी के भैरव का नाम मतंग हैं।
माँ मातंगी गृहस्थी से जुडी हर दिक्कत का उपाय बताती है। मातंगी पूजा से आप भौतिक जीवन को भोगते हुए आध्यात्म की उँचाइयों को छू सकते है। मातंगी पूजा से जातक को पूर्ण गृहस्थ-सुख, शत्रुओ का नाश, भोग-विलास, आपार सम्पदा, वाक सिद्धि, कुंडली जागरण, आपार सिद्धियां, काल ज्ञान, इष्ट दर्शन आदि माँ के आशीर्वाद से प्राप्त होते है। पलास और मल्लिका पुष्पों से युक्त बेलपत्रों की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आकर्षण और स्तम्भन शक्ति का विकास होता है। हिन्दू धर्म के अनुसार मातंगी ही एक ऐसी देवी है जिन्हें जूठन का भोग लगाया जाता है। वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण के लिए देवी मातंगी की आराधना की जाती है। माँ मातंगी के प्रभाव से साधक सबका ध्यान अपनी और खींचने में सफल होता है, उसमे तेज आता हैं अलौकिक शक्ति का वास होता हैं।
ये साधना रात को पूरे 10 बजे शुरू करे।इस साधना में आपको जो जरूरी सामग्री चाहिए वो कुछ इस प्रकार है।
मां मातंगी जी की प्रतिमा अगर आपको वो नहीं मिलती तो आप सुपारी को ही मां का रूप समझ कर उन्हें किसी भी तांबे या कांसे की थाली में अष्ट दल बना कर उस पर स्थापित करे ओर मां से प्रार्थना करे के मां मैं आपको नमस्कार करता हूं आप इस सुपारी को अपना रूप स्वीकार करे।
आपको पहले चोकी को गंगा जल से साफ करना है फिर उस में लाल रंग के कपड़े को बिछाना है उसके उपर प्लेट लेकर अष्ट दल बना कर सुपारी स्थापित करनी है जो मां की प्रतिमा स्थापित करना चाहते है वो प्रतिमा स्थापित करे।
गूगल की धूप ,देसी घी की जोत या दिया,ओर एक तिल के तेल का दिया, 5 मेबा का भोग ओर फल अपनी श्रद्धा अनुसार मां को भोग लगाने के लिए।कुछ दक्षिणा लौंग इलायची का भोग भी लगाएं मां को। जाप के लिए लाल मूंगे की माला जो वो नहीं क ले सकते वो रुद्राक्ष की माला ले ओर गोमुखी ले। माला को साधना से पहले संस्कार जरूर कर ले।
कुमकुम या रोली, अक्षत ,प्तासे ,पान के नो पत्ते रोज एक पत्ता पान का मां को भोग लगाए जो समर्थ है मां को पान अर्पित करे उसमे लौंग इलायची ओर प्ताहसे रख के मां की प्रतिमा के पास भोग लगाए मां को।
साधना को शुरू करने से पहले आप संकल्प जरूर ले संकल्प आप जब ले तब हाथ में गंगा जल फूल मिठाई कुछ पैसे ले ओर अपना नाम गोत्र का नाम स्थान का नाम ओर मनोकामना जो आप पूरी करने के लिए साधना कर रहे है वो मां से बताए के मां में आपकी साधना इस मनोकामना पूर्ति के लिए कर रही हूं /रहा हूँ, आप मेरी साधना स्वीकार करे मुझसे कोई भूल हो जाए तो आप मुझे अपनी शरण में आया बच्चा समझ कर क्षमा करे आप बहुत दयालु है सबका उधार करती है मां मेरा भी करे। उसके बाद वो जल पैसे मिठाई तिलक स्थान में छोड़ दे।
यह मैने आप सभी को साधारण विधि बताइ है जो हर कोई कर सकता है। इस साधना में आपको हो सके तो हर रोज लाल वस्त्र धारण करें नहीं तो लाल आसान का जरूर इस्तेमाल करे ।
जो कोई मनुष्य किसी भी प्रकार की समस्या से जूझ रहे हैं बो ये साधना करके मा मातंगी जी से आशीर्वाद पा सकते हैं। यह साधना जल्दी फल देने वाली है। वर्तमान युग में, मानव जीवन के प्रारंभिक पड़ाव से अंतिम पड़ाव तक भौतिक आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहता है । व्यक्ति जब तक भौतिक जीवन का पूर्णता से निर्वाह नहीं कर लेता है, तब तक उसके मन में आसक्ति का भाव रहता ही है और जब इन इच्छाओ की पूर्ति होगी,तभी वह आध्यात्मिकता के क्षेत्र में उन्नति कर सकता है । मातंगी महाविद्या साधना एक ऐसी साधना है जिससे आप भौतिक जीवन को भोगते हुए आध्यात्म की उँचाइयो को छु सकते है । मातंगी महाविद्या साधना से साधक को पूर्ण गृहस्थ सुख ,शत्रुओ का नाश, भोग विलास,आपार सम्पदा,वाक सिद्धि, कुंडली जागरण ,आपार सिद्धियां, काल ज्ञान ,इष्ट दर्शन आदि प्राप्त होते ही है ।
इसीलिए ऋषियों ने कहा है -
" मातंगी मेवत्वं पूर्ण मातंगी पुर्णतः उच्यते "
इससे यह स्पष्ट होता है की मातंगी साधना पूर्णता की साधना है । जिसने माँ मातंगी को सिद्ध कर लिया फिर उसके जीवन में कुछ अन्य सिद्ध करना शेष नहीं रह जाता । माँ मातंगी आदि सरस्वती है,जिसपे माँ मातंगी की कृपा होती है उसे स्वतः ही सम्पूर्ण वेदों, पुरानो, उपनिषदों आदि का ज्ञान हो जाता है ,उसकी वाणी में दिव्यता आ जाती है ,फिर साधक को मंत्र एवं साधना याद करने की जरुरत नहीं रहती ,उसके मुख से स्वतः ही धाराप्रवाह मंत्र उच्चारण होने लगता है ।दस महाविद्याओं में मातंगी महाविद्या नवम् स्थान पर स्थित है।
"पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार मतंग मुनि ने सभी जीवों को वश में करने के उद्देश्य से नाना प्रकार के वृक्षों से परिपूर्ण कदम्ब वन में देवी श्रीविद्या त्रिपुरा की आराधना की। मतंग मुनि के कठिन साधना से सन्तुष्ट होकर देवी त्रिपुरसुन्दरी ने अपने नेत्रों से एक श्याम वर्ण की सुन्दर कन्या का रूप धारण किया, जिन्हें राजमातंगिनी कहा गया एवं जो देवी मातंगी का ही एक स्वरूप हैं। यह दक्षिणाम्नाय तथा पश्चिमाम्नाय की देवी हैं। राजमातंगी, सुमुखी, वश्यमातंगी तथा कर्णमातंगी इनके नामान्तर हैं। मातंगी के भैरव का नाम मतंग हैं। ब्रह्मयामल इन्हें मतंग मुनि की कन्या बताता है।"
भगवती मातंगी की साधना करने वाला उत्तम पुरुष शास्त्र, वेद-वेदांग का ज्ञाता, दैवज्ञ, संगीत एवं सर्व विद्याओं से सम्पन्न हो जाता है। इनके मन्त्रों से वशीकरण एवं सम्मोहन कार्यों में शीघ्र सफलता मिलती है। देवताओं से पूजित यह विद्या किसी भी कन्या के विवाह में उत्पन्न दोषों को समाप्त करती है। इस विद्या के प्रभाव से अन्न-धन की वृद्धि, वाक् सिद्धि एवं परम सौभाग्य की प्राप्ति होती है। भगवती मातंगी के कई स्वरूपों की उपासना प्रचलित है।
जब वो बोलता है तो हजारो लाखो की भीड़ मंत्र मुग्ध सी उसके मुख से उच्चारित वाणी को सुनती रहती है । साधक की ख्याति संपूर्ण ब्रह्माण्ड में फैल जाती है ।कोई भी उससे शास्त्रार्थ में विजयी नहीं हो सकता,वह जहाँ भी जाता है विजय प्राप्त करता ही है । मातंगी साधना से वाक सिद्धि की प्राप्ति होते है, प्रकृति साधक से सामने हाँथ जोड़े खडी रहती है, साधक जो बोलता है वो सत्य होता ही है । माँ मातंगी साधक को वो विवेक प्रदान करती है की फिर साधक पर कुबुद्धि हावी नहीं होती,उसे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है और ब्रह्माण्ड के समस्त रहस्य साधक के सामने प्रत्यक्ष होते ही है ।
माँ मातंगी को उच्छिष्ट चाण्डालिनी भी कहते है,इस रूप में माँ साधक के समस्त शत्रुओ एवं विघ्नों का नाश करती है,फिर साधक के जीवन में ग्रह या अन्य बाधा का कोई असर नहीं होता । जिसे संसार में सब ठुकरा देते है,जिसे संसार में कही पर भी आसरा नहीं मिलता उसे माँ उच्छिष्ट चाण्डालिनी अपनाती है,और साधक को वो शक्ति प्रदान करती है जिससे ब्रह्माण्ड की समस्त सम्पदा साधक के सामने तुच्छ सी नजर आती है ।
महर्षि विश्वमित्र ने यहाँ तक कहा है की " मातंगी साधना में बाकि नव महाविद्याओ का समावेश स्वतः ही हो गया है " । अतः आप भी माँ मातंगी की साधना को करें जिससे आप जीवन में पूर्ण बन सके ।
माँ मातंगी जी का साधना जो साधक कर लेता है वह तो गर्व से कह सकता है,मेरा यह अध्यात्मिक जिवन व्यर्थ नही गया । अगर मैंने स्वयं कभी मातंगी साधना नही की होती तो मुझे सबसे ज्यादा दुख आनेवाले कई वर्षो तक तकलीफ देता परंतु अध्यात्मिक जिवन के प्रथम पडाव मे ही मैने मातंगी साधना को इसी विधि-विधान से सम्पन्न कर लिया जो आज आप सभी के लिये दे रहा हूं।
साधना विधि:-
इस साधना को आपको उत्तर दिशा या पश्चिम दिशा मे मुख करके करना है। यंत्र भोजपत्र पर कुम्कुम या अष्टगंध के स्याही से बनाये। वस्त्र आसन लाल रंग का हो,साधना रात्रि मे 10 बजे के बाद करे। नित्य 11 या 21 माला जाप 9 दिनो तक करना चाहिए। देवि मातंगी वशीकरण की महाविद्या मानी जाती है,इसी मंत्र साधना से वशीकरण क्रिया भी सम्भव है। 10 वे दिन कम से कम घी की 108 आहूति हवन मे अर्पित करे ओर अगर हवन नहीं कर सकते तो दशांश जाप करे ये सब आप संकल्प में निर्धारित कर ले दशांश जाप करना है या हवन क्यों लोग पैसों की कमी से नहीं कर पाते तो वो जाप ही करे। इस तरह से साधना पुर्ण होती है।11 वे दिन भोजपत्र पर बनाये हुए यंत्र को चांदि के तावीज मे डालकर पहेन ले,यह एक दिव्य कवच माना जाता है।अक्षय तृतीया के दिन ''मातंगी जयंती'' होती है और वैशाख पूर्णिमा ''मातंगी सिद्धि दिवस'' होता है। जो साधक चाहे तो इस साधना को लगातार 21 दिन भी कर सकता है ओर 22 वे दिन दासंश हवन करे जो हवन नहीं कर सकते वो लोग दशांश जाप करे। ये आप पर निर्भर है आप कितने दिन करना चाहते है ओर कितने जाप का संकल्प लेते है।
सबसे पहले साधक संक्षिप्त गणेश और गुरुपूजन सम्पन्न करें और गुरुमन्त्र का 1 माला जाप करें। फिर पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी से मातंगी हृदय साधना सम्पन्न करने के लिए मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लें और उनसे साधना की पूर्णता एवं सफलता के लिए निवेदन करें।जिन लोगों ने गुरु दीक्षा नहीं ले रखी वो इस मंत्र का जाप करे। नहीं तो किसी भी शिवालय जाकर भगवान शिव जी के सामने संकल्प लेकर उन्हें अपना गुरु बनाए ओर उनका कोई भी मंत्र गुरु मंत्र समझ कर जाप करे। मैं यह मंत्र दे रहा हूं आप ये भी जाप कर सकते है।
गणेश मन्त्र अथर्वशीर्ष
ॐ श्री गणेशाय नमः
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरः, गुरुर साक्षात परमब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुवे नमः।
ॐ नमः शिवाय
इसके बाद भगवान को गुरु मानकर उनसे साधना की आज्ञा ले।
इसके बाद सामान्य गणपति पूजन करके एक माला "ओम् वक्रतुण्डाय हुम्" मन्त्र का जाप करें और गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।
तत्पश्चात साधक क्षेत्र के अधिपति भगवान भैरवनाथजी का स्मरण करके एक माला
"ॐ हूं भ्रं हूं मतंग भैरवाय नमः"
मन्त्र का जाप करें और भैरवनाथजी से साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए निवेदन करें।
इसके बाद साधक को चाहिए कि वह साधना के पहले दिन संकल्प अवश्य लें। साधक दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि “मैं अमुक नाम का साधक गोत्र अमुक आज से श्री मातंगी हृदय साधना का अनुष्ठान आरम्भ कर रहा हूँ। मैं नित्य 9 दिनों तक ११ (अपनी सुविधा के अनुसार) माला मन्त्र जाप करूँगा। माँ मेरी साधना को स्वीकार कर मुझे मन्त्र की सिद्धि प्रदान करे तथा इसकी ऊर्जा को मेरे भीतर स्थापित कर दे। संकल्प में जाप की कितनी संख्या करेंगे और किस उद्देश्य से कर रहे हैं, मां से बोल दे।
संकल्प लेने के बाद माँ भगवती मातंगी का पूजन कुमकुम, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि से सामान्य पूजन करें।फिर निम्न विनियोग मन्त्र का उच्चारण करके एक आचमनी जल भूमि पर छोड़ दें -----
विनियोग:
अस्य मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषि विराट् छन्दः मातंगी देवता ह्रीं बीजं हूं शक्तिः क्लीं कीलकं सर्वाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यास :-----
ॐ दक्षिणामूर्ति ऋषये नमः शिरसि। (सिर को स्पर्श करें)
विराट् छन्दसे नमः मुखे। (मुख को स्पर्श करें)
मातंगी देवतायै नमः हृदि। (हृदय को स्पर्श करें)
ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये। (गुह्य स्थान को स्पर्श करें)
हूं शक्तये नमः पादयोः। (पैरों को स्पर्श करें)
क्लीं कीलकाय नमः नाभौ। (नाभि को स्पर्श करें)
विनियोगाय नमः सर्वांगे। (सभी अंगों को स्पर्श करें)
करन्यास :-----
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः। (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अँगूठे को स्पर्श करें)
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। (परस्पर दोनों हाथों को स्पर्श करें)
हृदयादिन्यास :-----
ॐ ह्रां हृदयाय नमः। (हृदय को स्पर्श करें)
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा। (सिर को स्पर्श करें)
ॐ ह्रूं शिखायै वषट्। (शिखा को स्पर्श करें)
ॐ ह्रैं कवचाय हूं। (भुजाओं को स्पर्श करें)
ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। (नेत्रों को स्पर्श करें)
ॐ ह्रः अस्त्राय फट्। (सिर से घूमाकर तीन बार ताली बजाएं)
ध्यानः
ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गीं।
न्यस्तैकाङ्घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां
मातङ्गीं शङ्खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्॥
मैं मातंगी देवी का ध्यान करता हूँ । वे रत्नमयी सिंहासनपर बैठकर पढ़ते हुए तोते का मधुर शब्द सुन रही हैं । उनके शरीर का वर्ण श्याम है । वे अपना एक पैर कमलपर रखे हुए हैं और मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करती हैं तथा कह्लार - पुष्पों की माला धारण किये वीणा बजाती हैं । उनके अंग में कसी हुई चोली शोभा पा रही है । वे लाला रंग की साड़ी पहने हाथ में शंखमय पात्र लिये हुए हैं । उनके वदन पर मधु का हलका - हलका प्रभाव जान पड़ता है और ललाट में बिंदी शोभा दे रही है।
"यह श्रीं दुर्गासप्तशती के सप्तम अध्याय में, ध्यान में वर्णित माँ मातंगी का ध्यान मंत्र है"
ओर
ॐ श्यामांगी शशिशेखरां त्रिनयनां वेदैः करैर्विभ्रतीं,
पाशं खेटमथांकुशं दृढमसिं नाशाय भक्तद्विषाम् ।
रत्नालंकरणप्रभोज्जवलतनुं भास्वत्किरीटां शुभां
मातंगी मनसा स्मरामि सदयां सर्वाथसिद्धिप्रदाम् ।।
मंत्रः
।। ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा ।।
(om hreem kleem hoom matangyaei phat swaahaa)
रोज की माला जाप हो जाने के बाद आप अपना जाप देवी मां मातंगी जी को समर्पित करे मंत्र दे रहा हूं वो बोलकर जाप समर्पित करे ।
माता के करुणामयी रूप का ध्यान करते हुए 108 बिल्व पत्र, 108 ही कमल के पुष्प इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए अर्पित करें। दांपत्य जीवन में चल रही हर समस्या से छुटकारा मिलेगा।
ॐ ही ऐं भगवती मतेंगश्वरी श्रीं स्वाहा।
भगवती मातंगी देवी महामंत्र—
ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा
सभी सुखों की प्राप्ति के लिय मंत्र:
क्रीं ह्रीं मातंगी ह्रीं क्रीं स्वाहा:
आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए मंत्र:
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं महा मातंगी प्रचिती दायिनी,लक्ष्मी दायिनी नमो नमः।
।। ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा ।।
ज्योतिष अनुसार दुर्गा सप्त सती का मातंगी माता के द्वादश अक्षर का संपुट लगा वैदिक ब्राह्मणां द्वारा पाठ करवाए तो विवाह में आने वाली हर बाधा समाप्त हो जाती हैं। भगवती मातङ्गी के 36 अक्षर के मंत्र का जाप करवाए 36 लाख से अधिक जप करवाने से दांपत्य जीवन में सुख मिलने लगेगा। मोगरे के पुष्पों से माता जी का पुशार्चन और आवरण पूजन करना चाहिए।
जाप समर्पण मंत्र -
गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री-त्वं
गृहाणास्मितकृतम् जपं।
सिद्धिर्भवतु मे देवी
त्वत्प्रसादान्मयि स्थिरा ||
guhyaati guhya goptri tvam gruhaanaasmat kritam japam
siddhirbhavatu may devi tvatprasaadanmayi sthira
ये मंत्र साधना अत्यंत तीव्र मंत्र है । मातंगी महाविद्या साधना प्रयोग सर्वश्रेष्ठ साधना है जो साधक के जिवन को भाग्यवान बना देती है। मंत्र जाप के बाद अवश्य ही कवच का एक पाठ करे।
मातंगी कवच
।। श्रीदेव्युवाच ।।
साधु-साधु महादेव, कथयस्व सुरेश्वर
मातंगी-कवचं दिव्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम् ।।
श्री-देवी ने कहा – हे महादेव ! हे सुरेश्वर ! मनुष्यों को सर्व-सिद्धि-प्रद दिव्य मातंगी-कवच अति उत्तम है, उस कवच को मुझसे कहिए ।
।। श्री ईश्वर उवाच ।।
श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि, मातंगी-कवचं शुभं ।
गोपनीयं महा-देवि, मौनी जापं समाचरेत् ।।
ईश्वर ने कहा – हे देवि उत्तम मातंगी-कवच कहता हूँ, सुनो । हे महा-देवि इस कवच को गुप्त रखना, मौनी होकर जप करना ।
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीमातंगी-कवचस्य श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषिः । विराट् छन्दः । श्रीमातंगी देवता । चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगः ।
ऋष्यादि-न्यासः-
श्री दक्षिणा-मूर्तिः ऋषये नमः शिरसि ।
विराट् छन्दसे नमः मुखे ।
श्रीमातंगी देवतायै नमः हृदि ।
चतुर्वर्ग-सिद्धये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
।। मूल कवच-स्तोत्र ।।
ॐ शिरो मातंगिनी पातु, भुवनेशी तु चक्षुषी ।
तोडला कर्ण-युगलं, त्रिपुरा वदनं मम ।।
पातु कण्ठे महा-माया, हृदि माहेश्वरी तथा ।
त्रि-पुष्पा पार्श्वयोः पातु, गुदे कामेश्वरी मम ।।
ऊरु-द्वये तथा चण्डी, जंघयोश्च हर-प्रिया ।
महा-माया माद-युग्मे, सर्वांगेषु कुलेश्वरी ।।
अंग प्रत्यंगकं चैव, सदा रक्षतु वैष्णवी ।
ब्रह्म-रन्घ्रे सदा रक्षेन्, मातंगी नाम-संस्थिता ।।
रक्षेन्नित्यं ललाटे सा, महा-पिशाचिनीति च ।
नेत्रयोः सुमुखी रक्षेत्, देवी रक्षतु नासिकाम् ।।
महा-पिशाचिनी पायान्मुखे रक्षतु सर्वदा ।
लज्जा रक्षतु मां दन्तान्, चोष्ठौ सम्मार्जनी-करा ।।
चिबुके कण्ठ-देशे च, ठ-कार-त्रितयं पुनः ।
स-विसर्ग महा-देवि हृदयं पातु सर्वदा ।।
नाभि रक्षतु मां लोला, कालिकाऽवत् लोचने ।
उदरे पातु चामुण्डा, लिंगे कात्यायनी तथा ।।
उग्र-तारा गुदे पातु, पादौ रक्षतु चाम्बिका ।
भुजौ रक्षतु शर्वाणी, हृदयं चण्ड-भूषणा ।।
जिह्वायां मातृका रक्षेत्, पूर्वे रक्षतु पुष्टिका ।
विजया दक्षिणे पातु, मेधा रक्षतु वारुणे ।।
नैर्ऋत्यां सु-दया रक्षेत्, वायव्यां पातु लक्ष्मणा ।
ऐशान्यां रक्षेन्मां देवी, मातंगी शुभकारिणी ।।
रक्षेत् सुरेशी चाग्नेये, बगला पातु चोत्तरे ।
ऊर्घ्वं पातु महा-देवि देवानां हित-कारिणी ।।
पाताले पातु मां नित्यं, वशिनी विश्व-रुपिणी ।
प्रणवं च ततो माया, काम-वीजं च कूर्चकं ।।
मातंगिनी ङे-युताऽस्त्रं, वह्नि-जायाऽवधिर्पुनः ।
सार्द्धेकादश-वर्णा सा, सर्वत्र पातु मां सदा ।।
इसके बाद फल श्रुति करे।
फल-श्रुति ।।
इति ते कथितं देवि गुह्यात् गुह्य-तरं परमं ।
त्रैलोक्य-मंगलं नाम, कवचं देव-दुर्लभम् ।।
यः इदं प्रपठेत् नित्यं, जायते सम्पदालयं ।
परमैश्वर्यमतुलं, प्राप्नुयान्नात्र संशयः ।।
गुरुमभ्यर्च्य विधि-वत्, कवचं प्रपठेद् यदि ।
ऐश्वर्यं सु-कवित्वं च, वाक्-सिद्धिं लभते ध्रुवम् ।।
नित्यं तस्य तु मातंगी, महिला मंगलं चरेत् ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च, ये देवा सुर-सत्तमाः ।।
ब्रह्म-राक्षस-वेतालाः, ग्रहाद्या भूत-जातयः ।
तं दृष्ट्वा साधकं देवि लज्जा-युक्ता भवन्ति ते ।।
कवचं धारयेद् यस्तु, सर्वां सिद्धि लभेद् ध्रुवं ।
राजानोऽपि च दासत्वं, षट्-कर्माणि च साधयेत् ।।
सिद्धो भवति सर्वत्र, किमन्यैर्बहु-भाषितैः ।
इदं कवचमज्ञात्वा, मातंगीं यो भजेन्नरः ।।
अल्पायुर्निधनो मूर्खो, भवत्येव न संशयः ।
गुरौ भक्तिः सदा कार्या, कवचे च दृढा मतिः ।।
तस्मै मातंगिनी देवी, सर्व-सिद्धिं प्रयच्छति ।।
आशा है कि ये साधना आपके समस्त कार्य सिद्ध करेगी कृपया इस साधना को पूर्ण विश्वास से करे । मां आप सबका कल्याण करे। मां आप सभी की मनोकामना पूर्ण करे।
धन्यवाद ।
जय माता मातंगी जी की।