उत्तम संतान प्राप्ति के लिएसंतति योग दोष उपाय निवारण विश्लेषण
उत्तम संतान प्राप्ति के लिए
संसार में कोई भी ऐसा दंपति नहीं होगा, जो संतान सुख नहीं चाहता हो। चाहे वह गरीब हो या अमीर। सभी के लिए संतान सुख होना सुखदायी ही रहता है। संतान चाहे खूबसूरत हो या बदसूरत, लेकिन माता-पिता को बस संतान चाहिए। फिर चाहे वह संतान माता-पिता के लिए सहारा बने या न बने। अकबर बादशाह ने भी काफी मन्नतें मानकर सलीम को माँगा था।
किसी-किसी की संतान होती है और फिर गुजर जाती है। ऐसा क्यों होता है? ये सब ग्रहों की वजह से होता है। यहाँ पर हम इन्हीं सब बातों की जानकारी देंगे, जिससे आप भी जान सकें कि संतान होगी या नहीं।
पंचम स्थान संतान का होता है। वही विद्या का भी माना जाता है। पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है। पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है, यानी पुत्र में बाधा आती है।
सिंह लग्न में पंचम गुरु वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है, परन्तु गुरु की पंचम दृष्टि हो या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो संतान सुख उत्तम मिलता है।
पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है। यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है। मंगल की यदि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम दृष्टि पूर्ण पंचम भाव पर पड़ रही हो तो पुत्र अवश्य होता है।
पुत्र संततिकारक चँद्र, बुध, शुक्र यदि पंचम भाव पर दृष्टि डालें तो पुत्री संतति होती है। यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो और उस पर चँद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो तो वह संतान होशियार होती है। पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो एवं सभी ग्रहों में बलवान हो तो निश्चित तौर पर लड़की ही होती है। पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होता है। कुंभ का शनि भी लड़की देता है। पुत्र की चाह में पुत्रियाँ होती हैं। कुछ संतान नष्ट भी होती है।
संतति सुख के लिए पंचम स्थान, पंचमेश, पंचम स्थान पर शुभाशुभ प्रभाव व बृहस्पति का विचार मुख्यत: किया जाता है। ज्योतिष के अनुसार मेष, मिथुन, सिंह, कन्या ये राशियाँ अल्प प्रसव राशियाँ हैं। वृषभ, कर्क, वृश्चिक, धनु, मीन ये बहुप्रसव राशियाँ हैं।
संतान प्राप्ति में ग्रहों का प्रभाव
संतान प्राप्ति दाम्पत्य जीवन में पहला सुख होता है। नारी संतान प्राप्त करके धन्य हो जाती है। हर आँगन में बच्चों की किलकारी घर के सौंदर्य एवं खुशहाली में चार चाँद लगा देती है, परंतु कुछ दम्पति इस सुख से वंचित रहने से परेशान हो जाते हैं, कुछ हल निकाल लेते हैं। कुछ दम्पति अपने जीवन का अनमोल रत्न (संतान) प्राप्त न कर पाने से जीवन बर्बाद कर लेते हैं एवं प्राप्ति के बाद भी संतान सुखी नहीं रहती। देखें, बच्चे का सुख ग्रहों की शांति से कैसे प्राप्त होता है, क्योंकि ग्रह भी विशेष प्रभाव डालते हैं।
कुंडली में पंचम भाव संतान का होता है। देखें ग्रह वहाँ विराजमान होकर क्या असर देते हैं। यदि अशुभ असर देते हैं तो उनका उपाय निम्न प्रयोग से कीजिए।
सूर्य : पाँचवें घर में उच्च का सूर्य हो या शुभ हो तो संतान की वृद्धि करता है, परंतु अशुभ सूर्य संतान में बाधक होता है। इसके लिए हनुमानजी को चोला चढ़ाएँ, चने का भोग लगाएँ अथवा बंदरों की सेवा फल से करें।
चंद्र : संतान भाव में चंद्रमा अशुभ फल दे रहा हो तो अपने शयन कक्ष में पलंग के नीचे ताँबे की प्लेट रखें।
मंगल : यदि संतान भाव में मंगल अशुभ फल दे रहा हो या गर्भस्थ में बीच में तकलीफ आ रही हो तो मंगलवार के दिन हनुमानजी के पैर में नमक छुआकर नारी कमर में बाँध ले। अनुकूलता आएगी।
बुध : बुध पाँचवें घर में अशुभ फल दे रहा हो तो चतुर्थी के दिन चाँदी खरीदें एवं धारण करें। स्नान में कुट का प्रयोग करें।
गुरु : गुरु पाँचवें घर में संतान के लिए बाधक हो तो गुरुवार को केसर का तिलक चंदन के साथ करें एवं पीली हल्दी, पीला चंदन गुरु मंदिर में दान करें।
शुक्र : शुक्र यदि संतान भाव में स्थित होकर बाधा दे रहा हो तो सफेद कपड़ा, चंदन, इत्र, दही एवं सुगंधित सफेद फूल का दान करें।
शनि : शनि पाँचवें घर में संतान के लिए बाधक हो तो काले तिल जमीन में दबा दें एवं लोहे की कील, चाकू शनि मंदिर में दान करें।
राहु : राहु यदि पाँचवें घर में बाधक हो तो अपने पास चाँदी का चौकोर पतरा रखें एवं लोहे की अँगूठी मध्यमा में पहनें।
केतु : केतु पाँचवें घर में स्थित होकर संतान बाधक हो तो किसी कोढ़ी या गरीब व्यक्ति को कंबल दान करें एवं मंगल के दिन दोपहर में सीसे की अँगूठी गोमूत्र में धोकर धारण करें।
* पंचम स्थान में पाप ग्रह हो तो संतति सुख में बाधा आती है।
* पंचमेश यदि 6, 8,12 में हो या 6, 8,12 के स्वामी पंचम में हो तो संतान सुख बाधित होता है।
* पंचमेश अशुभ नक्षत्र में हो तो संतान प्राप्ति में विलंब होता है।
* पंचम का राहु पहली संतान के लिए अशुभ होता है।
* लग्न पर पाप प्रभाव हो तो संतति विलंब से होती है।
* लग्न, षष्ठ, सप्तम या अष्टम का मंगल संतान प्राप्ति में विलंब कराता है। (स्त्री-पुरुष दोनों की कुंडली में)
* स्त्री की कुंडली में लग्न पंचम, सप्तम, भाग्य या लाभ में शनि हो तो संतान देर से होती है।
* सूर्य-शनि युति संतान प्राप्ति में विलंब और संतान से मतभेद दिखाती है।
* प्रथम या सप्तम का मंगल (स्त्री के लिए) कष्ट से संतान प्राप्ति का सूचक है।
* पंचम स्थान पर पापग्रहों की दृष्टि संतान प्राप्ति में विलंब कराती है।
* पत्रिका (कुंडली) में गुरु राहु युति हो व पंचम स्थान पाप प्रभाव में हो तो दत्तक संतान का योग बनता है।
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संतान प्रतिबंधक योग
* तृतीय भाव का अधिपति और चंद्रमा केंद्र या त्रिकोण भावों में स्थित हो तो जरक को संतान सुख में बाधा होती है !
* लग्न में मांगल, आठवें शनि और पंचम भाव में शनि हो तो भी जातक को संतान सुख में बाधा होती है !
* बुध और लग्न भाव का अधिपति ये दोनों लग्न के अलावा केंद्र स्थानों में हो तो भी संतान सुख में बाधा होती है !
* लग्न, अस्थम एवम बारहवें भाव में पापग्रह हो तो संतान सुख में बाधा उत्पन्न होती है !
* सप्तम भाव में शुक्र, दशवें भाव में चन्द्रमा, एवं सप्तम भाव में शनि या मंगल हो तो संतान सुख में बाधा होती है !
* तीसरे भाव का अधिपति 1/2/3/5 वें भाव में स्थित हो तथा शुभ से युत या द्रस्त हो तो ऐसे जातक को संतान
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* बहुसन्तान योग
पंचमेश शनि शुक्र के साथ पाप स्थानगत हो |
आठवें भाग में पंचमेश हो |
पंचमेश तथा तृतीयेश साथ-साथ हो |
पंचमेश के स्थान में तृतीयेश हो |
सप्तमेश-तृतीयेश का अन्योंयास्रित योग हो |
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*गोद जाने का योग
कर्क या सिंह राशि मे पापग्रह हो |
४ या १०वें स्थान पर पापग्रह हो |
चन्द्रमा से चतुर्थ राशि मे पापग्रह हो |
सूर्य से ९वें स्थान पर पापग्रह हो |
चन्द्रमा या सूर्य शत्रुक्षेत्र मे हो
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*अधिक कन्या योग
पंचमेश आठवें स्थान पर हो |
11वें भाव में बुध, शुक्र या चन्द्रमा हो |
पांचवें भाव में शुक्र हो |
5वें भाव में मेष, वृष या कर्क राशि हो और उसमे केतु हो |
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पंचमेश और तृतीयेश दोनों निच के हो |
जब पंचम भाव में बृहस्पति अथवा शुक्र स्थित हो या जब बुध पाँचवें भाव से युक्त हो अथवा जब पंचम भाव में शुभ राशि हो और वहाँ शुभ ग्रह स्थित हो तो पुत्र सुख योग बनता है । ऐसे जातक संतानों से सुख प्राप्त करते हैं ।
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संतान प्राप्ति के अचूक उपाय
ध्यान रहे कि जिनकी जिंदगी में ऐसा दुःख नहीं होता वो इस बात के मर्म को नहीं समझ सकते हैं किंतु जो वाकई इससे पीड़ित हैं, उन्हें इसका चमत्कार बहुत शीघ्र देखने को मिलता है। परंतु इससे पूर्व संतान हीनता से पीड़ित हर जातक को ये तथ्य भली-भांति समझ लेनी होगी कि किसी भी मंत्र-तंत्र-यंत्र सहित रत्न तक आस्था-श्रद्धा-विश्वास व अटूट निष्ठा की मांग करते हैं। यानि इन प्रयोगों को अपनाने के लिए आपको इतना संकल्पकृत होना ही होगा कि मध्य राह में चाहे जितनी बाधाएं आएं किंतु आप अपने कदम डिगने नहीं देंगे।
इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमने गत आलेख में ये स्पष्ट किया था कि डेस्टिनी चेंज हो सकती है बशर्ते आप ग्रहों की चालाकियां समझ लें तथा अपने विवेक को इस्तेमाल करते हुए सही ढंग से उपाय करें।
तो आइए अब हम संतानहीन योगों के बावज़ूद संतान प्राप्ति के उपायों की बात आरंभ करते हैं:
यदि पति व पत्नी, दोनों की कुण्डलियों में पूर्ण संतानहीनता की स्थिति हो तो उन्हें संतान बाधा मुक्ति के लिए निम्न उपाय अविलंब आरंभ करना चाहिए। इसका परिणाम हमेशा सुखद रहा है............
मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः
जप विधि: तुलसी की माला से प्रतिदिन 5 माला प्रातः काल जप करना श्रेयस्कर रहेगा।
भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर के सामने बैठकर कातर भाव से जप करने के पश्चात लड्डू का भोग (प्रसाद) अवश्य चढ़ाएं।
पुत्रेष्टि यज्ञ: यह एक विशद यज्ञ विधान है, जिसे आचार्यों की सहायता के बिना करना संभव नहीं। इस महान यज्ञ का अनुष्ठान संतानहीनता की स्थिति से मुक्त कर देता है। वस्तुतः यह याज्ञिक विधान वैदिक रीति से संपन्न किया जाता है जिसमें भारी व्यय होता है। इसलिए आम आदमी को ये सलाह दी जाती है कि वह इस यज्ञ के स्थान पर गोपाल संतान मंत्र व यंत्र की सहायता ले ताकि बिना किसी व्यय के उसका कार्य पूर्ण हो जाए।
बाधक ग्रहों की क्रूर व पापी ग्रहों की किरण रश्मियों को पंचम भाव, पंचमेश तथा संतान कारक गुरु से हटाने के लिए रत्नों का विकल्प बेहद प्रभावी रहता है। इस बात को समझने के लिए विशेषज्ञ आचार्य की अनिवार्यता होती है ताकि वह निर्धारित कर सके कि किन ग्रहों के कारण संतान प्राप्ति में बाधा आ रही है तथा किन ग्रहों की किरण रश्मियों को प्रतिकर्षित करने के लिए कैसे रत्नों का प्रयोग किया जाए।
संतानहीनता के लिए नवमांश की स्थिति की समीक्षा किया जाना बेहद आवश्यक है। यदि नवमांश चक्र में भी पूर्णरूपेण संतानहीनता की स्थिति बन रही है तो ऐसे में उपरोक्त वर्णित प्रथम उपाय के साथ तृतीय उपाय एक साथ करना लाभकारी होता है।
ध्यान रहे कि इन सभी प्रयोगों का फल पूर्ण निष्ठा से करने पर ही प्राप्त होता है। जिनके मन में इन उपायों को करते रहने के दौरान संशय व्याप्त रहता है, उन्हें इसका फल अपेक्षानुसार नहीं प्राप्त हो पाता है।
पुत्र प्राप्ति हेतु गर्भाधान
दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।
* 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।
* प्राचीन संस्कृत पुस्तक 'सर्वोदय' में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।
* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।
* कुछ विशिष्ट पंडितों तथा ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य के उत्तरायण रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्र तथा दक्षिणायन रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्री जन्म लेती है। उनका यह भी कहना है कि मंगलवार, गुरुवार तथा रविवार पुरुष दिन हैं। अतः उस दिन के गर्भाधान से पुत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार कन्या दिन हैं, जो पुत्री पैदा करने में सहायक होते हैं। बुध और शनिवार नपुंसक दिन हैं। अतः समझदार व्यक्ति को इन दिनों का ध्यान करके ही गर्भाधान करना चाहिए।
* जापान के सुविख्यात चिकित्सक डॉ. कताज का विश्वास है कि जो औरत गर्भ ठहरने के पहले तथा बाद कैल्शियमयुक्त भोज्य पदार्थ तथा औषधि का इस्तेमाल करती है, उसे अक्सर लड़का तथा जो मेग्निशियमयुक्त भोज्य पदार्थ जैसे मांस, मछली, अंडा आदि का इस्तेमाल करती है, उसे लड़की पैदा होती है।
विश्वविख्यात वैज्ञानिक प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. लेण्डरम बी. शैटल्स ने हजारों अमेरिकन दंपतियों पर प्रयोग कर प्रमाणित कर दिया है कि स्त्री में अंडा निकलने के समय से जितना करीब स्त्री को गर्भधारण कराया जाए, उतनी अधिक पुत्र होने की संभावना बनती है। उनका कहना है कि गर्भधारण के समय यदि स्त्री का योनि मार्ग क्षारीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्र तथा अम्लीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्री होने की संभावना बनती है।
गर्भ धारण करने के लिए टोटका
अगर आपको किसी कारणवश गर्भ धारण नहीं हो रहा हो तो मंगलवार के दिन कुम्हार के घर आएं और उसमें प्रार्थना कर मिट्टी के बर्तन वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भरकर दाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया केवल मंगलवार को ही करनी है अगर संभव हो तो उस दिन पति-पत्नी अवश्य ही रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही उस डोरे को हनुमानजी के चरणों में रख दें।
संतान व सुख प्राप्ति हेतु
संतान व सुख प्राप्ति हेतु जेमस्टोन
संतान सुख की प्राप्ति के लिये पुरुष दायें हाथ INDEX FINGER में 6 रत्ती का पुखराज बृहस्पतिवार को पहने।
संतान का वरदान :-
किसी दंपत्ति को संतान प्राप्त करने में कठिनाई आ रही हो या संतान से दुखी हो अथवा संतान रोगग्रस्त हो तो प्रात: पति-पत्नी एक साथ सफेद वस्त्र धारण कर 'यौं' बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। संतान संबंधी किसी भी समस्या से शीघ्र मुक्ति मिलती है।
पुत्र प्राप्ति के लिए मन्त्र चौपाई
प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बाल चरित कर गान।।
सन्तान सुख मन्त्र
हे जगन्नाथ ! हे जगदीश !!
हे जगत् पति !! हे जगदाधार !
संतानप्रदायक गणेश मंत्र
श्री गणेश मंत्र का श्रद्धा के साथ 108 बार पाठ करना संतानप्रदायक माना गया है।
नमोस्तु गणनाथाय सिद्धिबुद्धि युताय च
सर्व प्रदाय देहाय पुत्र वृद्धि प्रदाय च
गुरुदराय गरबे गोपुत्रे गुह्यासिताय ते
गोप्याय गोपिता शेष भुवनाय चिदात्मने
विश्व मूलाय भव्याय विश्व सृष्टि कराय ते
नमो नमस्ते सत्याय सत्यपूर्णाय शुंडिने
एकदंताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नमः
प्रपन्न जन पालाय प्रणतार्ति विनाशिने
शरणंभव देवेश संततिं सुदृढ़ां कुरु
भविष्यंति च ये पुत्रा मत्कुले गणनायकः
ते सर्वे तव पूजार्थं निरताः स्युर्वरोमतः
पुत्र प्रदं इदंस्तोत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम।
संतान गोपाल यंत्र
मानव जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए एक अच्छे संतान की आवश्यकता होती हैं। परन्तु-कुछ लोग संतान विहीन होते हैं और संतान की प्राप्ति के लिए अनेक प्रयास करते हैं। ऐसी स्थिति में संतान प्राप्ति हेतु यह यंत्र अत्यन्त चमत्कारिक है। इस यंत्र की प्रतिष्ठा पूजा करने से मनोवांछित संतान की प्राप्ति होती है। और वह दीर्घायु और गुणवान होता है।
संतान गोपाल यंत्र की साधना अत्यन्त प्रसिद्ध है जिन्हें संतान नहीं उत्पन्न होती है वे बालकृष्ण की मूर्ति के साथ संतान गोपाल यंत्र स्थापित करते हैं तथा उनके सामने संतानगोपाल स्तोत्र का पाठ करते हैं।
रोष्टि यज्ञ’ करते हैं पुत्रेष्टि यज्ञ एवं संतान गोपाल यंत्र के द्वारा अवश्य ही संतान की प्राप्ति होती है।
संतान गोपाल मंत्र एवं यंत्र का उपयोग
यदि पति व पत्नी, दोनों की कुण्डलियों में पूर्ण संतानहीनता की स्थिति हो तो उन्हें संतान बाधा मुक्ति के लिए निम्न उपाय अविलंब आरंभ करना चाहिए। इसका परिणाम हमेशा सुखद रहा है............
मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः
जप विधि: तुलसी की माला से प्रतिदिन 5 माला प्रातः काल जप करना श्रेयस्कर रहेगा।
भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर के सामने बैठकर कातर भाव से जप करने के पश्चात लड्डू का भोग (प्रसाद) अवश्य चढ़ाएं।
पुत्रेष्टि यज्ञ: यह एक विशद यज्ञ विधान है, जिसे आचार्यों की सहायता के बिना करना संभव नहीं। इस महान यज्ञ का अनुष्ठान संतानहीनता की स्थिति से मुक्त कर देता है। वस्तुतः यह याज्ञिक विधान वैदिक रीति से संपन्न किया जाता है जिसमें भारी व्यय होता है। इसलिए आम आदमी को ये सलाह दी जाती है कि वह इस यज्ञ के स्थान पर गोपाल संतान मंत्र व यंत्र की सहायता ले ताकि बिना किसी व्यय के उसका कार्य पूर्ण हो जाए।
संतान गोपाल यंत्र को गुरुपुष्य नक्षत्र में पूजन एवं प्रतिष्ठा करने के पश्चात् संतान गोपाल स्त्रोत्र का पाठी करने से शीघ्र ही गृह में कुलीन एवं अच्छे गुणों से युक्त संतान की उत्पत्ति होती है तथा माता पिता की सेवा में ऐसी संतानें हमेशा तत्पर रहती हैं।
संतान गोपाल यंत्र को गोशाला में प्रतिष्ठित करके गोपालकृष्ण का मंत्र का जप श्रद्धापूर्वक करने से वध्या को भी शीघ्र ही पुत्ररत्न उत्पन्न होता है तथा सभी गुणों से सम्पन्न होता है।
ऐसे मिलेगी स्वस्थ और सुन्दर संतान
यदि आपकी शादी को लम्बा समय बीत गया है? लेकिन अब तक आप माता- पिता बनने का सुख नहीं उठा पाएं है। अब तो रिश्तेदार भी आपको ताने मारने लगे हैं तो इस परेशानी से निजात पाने के सबसे आसान उपाय तंत्र में हैं।यदि आप चाहते हैं कि आपके घर में शीघ्र ही एक स्वस्थ और सुन्दर बच्चे की किलकारियां गुंजे तो नीचे लिखे इन टोटकों को जरुर अपनाए।
- शुक्रवार के दिन बने तो शुक्रवार के दिन चने के आटे की दो रोटियां बनाकर उस पर सूखी सब्जी रखकर किसी गरीब को खिलाएं।
- इस क्रिया को सात बार करें तो स्वस्थ संतान की प्राप्ति होगी।
- सोमवार के दिन गर्भवती स्त्री देशी कपूर का एक टूकड़ा लें। उसमें से आधा काटकर जला दें। आधा शिवजी के मंदिर में डाल दें तो भी स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है।
- गौ शाला में दान करने से संतान की स्वस्थ और सुन्दर संतान प्राप्त होगी।
- शुक्रवार को आटे में पनीर डालक र गाय को खिलाने से स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है।
- दक्षिणावर्ती शंख में दूध भरकर नियमित रूप से उस दूध से नर्मदेश्वर का अभिषेक करें और बाद में अभिषेक के दूध को पूरी आस्था के साथ ग्रहण करें। शीघ्र ही सुन्दर और स्वस्थ संतान की प्राप्ति होगी।
पुरुष और स्त्री के दाहिने हाथ मे साफ़ मिट्टी रख कर उसके अन्दर थोडा दही और पिसी शुद्ध हल्दी रखनी चाहिये,यह काम रात को सोने से पहले करना चाहिये,सुबह अगर दोनो के हाथ में हल्दी का रंग लाल हो गया है तो संतान आने का समय है,स्त्री के हाथ में लाल है और पुरुष के हाथ में पीली है तो स्त्री के अन्दर कामवासना अधिक है,पुरुष के हाथ में लाल हो गयी है और स्त्री के हाथ में नही तो स्त्री रति सम्बन्धी कारणों से ठंडी है,और संतान पैदा करने में असमर्थ है,कुछ समय के लिये रति क्रिया को बंद कर देना चाहिये।
चार वीरवार को 900 ग्राम जौं चलते जल में बहाए |
वीरवार का व्रत भी रखना शुभ होगा |
राधा कृष्णजी के मंदिर में शुक्ल पक्ष के वीरवार या जन्माष्टमी को चान्दी की बांसुरी चढाये |
लाल या भूरी गायें को आट्टे का पेढा व पानी दे |
अन्य उपाय
1. यदि किसी दम्पति को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही है तो वह स्त्री शुक्ल पक्ष में अभिमंत्रित संतान गोपाल यंत्र को अपने घर में स्थापित करके लगातार 16 गुरुवार को ब्रत रखकर केले और पीपल के वृक्ष की सेवा करें उनमे दूध चीनी मिश्रित जल चड़ाकर धुप अगरबत्ती जलाये फिर मासिक धर्म से ठीक तेहरवीं रात्रि में अपने पति से रमण करें संतान सुख अति शीघ्र प्राप्त होगा ।
2. पति पत्नी गुरुवार का ब्रत रखें या इस दिन पीले वस्त्र पहने , पीली वस्तुओं का दान करें यथासंभव पीला भोजन ही करें .....अति शीघ्र योग्य संतान की प्राप्ति होगी ।
3. संतान सुख के लिए स्त्री गेंहू के आटे की 2 मोटी लोई बनाकर उसमें भीगी चने की दाल और थोड़ी सी हल्दी मिलाकर नियमपूर्वक गाय को खिलाएं ...शीघ्र ही उसकी गोद भर जाएगी ।
4. शुक्ल पक्ष में बरगद के पत्ते को धोकर साफ करके उस पर कुंकुम से स्वस्तिक बनाकर उस पर थोड़े से चावल और एक सुपारी रखकर सूर्यास्त से पहले किसी मंदिर में अर्पित कर दें और प्रभु से संतान का वरदान देने के लिए प्रार्थना करें ...निश्चय ही संतान की प्राप्ति होगी ।
5. किसी भी गुरुवार को पीले धागे में पीली कौड़ी को कमर में बांधने से संतान प्राप्ति का प्रबल योग बनता है।
6. संतान प्राप्ति के लिए स्त्री पारद शिवलिंग का नियम से दूध से अभिषेक करें ...उत्तम संतान की प्राप्ति होगी ।
7. हर गुरुवार को भिखारियों को गुड का दान देने से भी संतान सुख प्राप्त होता है l
8. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में आम की जड़ को लाकर उसे दूध में घिसकर पिलाने से स्त्री को अवश्य ही संतान की प्राप्ति होती है यह अत्यंत ही सिद्ध / परीक्षित प्रयोग है ।
9. रविवार को छोड़कर अन्य सभी दिन निसंतान स्त्री यदि पीपल पर दीपक जलाये और उसकी परिक्रमा करते हुए संतान की प्रार्थना करें उसकी इच्छा अति शीघ्र पूरी होगी ।
10. श्वेत लक्ष्मणा बूटी की 21 गोली बनाकर उसे नियमपूर्वक गाय के दूध के साथ लेने से संतान सुख की अवश्य ही प्राप्ति होती है ।
सन्तति योग दोष उपाय वैदिक तांत्रिक विवेचना भाग 2
Special For न ewly married couples
जन्म कुंडली से संतान सुख, किसी को संतान होती ही नहीं है , कोई पुत्र चाहता है तो कोई कन्या …
शास्त्रों में 3 प्रकार के ऋण बताये गए है
देव ऋण
ऋषि ऋण और
पितृ ऋण
देव ऋण देव पूजन उपासना दान पुण्य सत कर्म से
ऋषि ऋण ज्ञान प्राप्ति से
पितृ ऋण संतति उत्पन्न करने से
समाप्त होता है
स्त्री और पुरुष संतान प्राप्ति की कामना के लिए विवाह करते हैं | वंश परंपरा की वृद्धि के लिए एवम परमात्मा को श्रृष्टि रचना में सहयोग देने के लिए यह आवश्यक भी है | पुरुष पिता बन कर तथा स्त्री माता बन कर ही पूर्णता का अनुभव करते हैं | धर्म शास्त्र भी यही कहते हैं कि संतान हीन व्यक्ति के यज्ञ,दान ,तप व अन्य सभी पुण्यकर्म निष्फल हो जाते हैं | महाभारत के शान्ति पर्व में कहा गया है कि पुत्र ही पिता को पुत् नामक नर्क में गिरने से बचाता है | मुनिराज अगस्त्य ने संतानहीनता के कारण अपने पितरों को अधोमुख स्थिति में देखा और विवाह करने के लिए प्रवृत्त हुए |प्रश्न मार्ग के अनुसार संतान प्राप्ति कि कामना से ही विवाह किया जाता है जिस से वंश वृद्धि होती है और पितर प्रसन्न होते हैं|
प्राचीन फलित ग्रंथों में संतान सुख के विषय पर बड़ी गहनता से विचार किया गया है | भाग्य में संतान सुख है या नहीं ,पुत्र होगा या पुत्री अथवा दोनों का सुख प्राप्त होगा ,संतान कैसी निकलेगी ,संतान सुख कब मिलेगा और संतान सुख प्राप्ति में क्या बाधाएं हैं और उनका क्या उपचार है , इन सभी प्रश्नों का उत्तर पति और पत्नी की जन्म कुंडली के विस्तृत व गहन विश्लेषण से प्राप्त हो सकता है |प्रस्तुत लेख में सन्तान प्राप्ति में होने वाली रूकावट के कारण व निवारण पर प्रकाश डाला गया है
सन्तान प्रप्ति हमारे पूर्व जन्मोंपार्जित कर्मो पर है आधारित
विवाह के उपरान्त प्रत्येक माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे को जल्द से जल्द सन्तान हो जाये और वे दादा-दादी, नाना-नानी बन जाये। मगर ऐसा सभी दम्पत्तियों के साथ नहीं हो पाता है। शादी के बाद 2-3 वर्ष तक सन्तान न होने पर यह एक चिन्ता का विषय बन जाता है। भारतीय सनातन परंपरा में सन्तान होना सौभाग्यशाली होने का सूचक माना जाता है। दाम्पत्य जीवन भी तभी खुशहाल रह पाता है जब दम्पत्ति के सन्तान हो अन्यथा समाज भी हेय दृष्टि से देखता है। पुत्र सन्तान का तो हमारे समाज में विशेष महत्व माना गया है क्योंकि वह वंश वृद्धि करता है। सन्तान प्राप्ति हमारे पूर्व जन्मोपार्जित कर्मों पर आधारित है। अत: हमें नि:सन्तान दम्पत्ति की कुण्डली का अध्ययन करते वक्त किसी एक की कुण्डली का अध्ययन करने की बजाये पति-पित्न दोंनो की कुण्डली का गहन अध्ययन करने के बाद ही निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिये।
अगर पंचमेश खराब है या पितृदोष, नागदोष व नाड़ीदोष है तब उनका उपाय मन्त्र, यज्ञ, अनुष्ठान तथा दान-पुण्य से करना चाहिये। । सन्तान प्राप्ति योग के लिये जन्मकुण्डली का प्रथम स्थान व पंचमेश महत्वपूर्ण होता है। अगर पंचमेश बलवान हो व उसकी लग्न पर दृष्टि हो या लग्नेश के साथ युति हो तो निश्चित तौर पर दाम्पत्ति को सन्तान सुख प्राप्त होगा। यदि सन्तान के कारक गुरू ग्रह पंचम स्थान में उपनी स्वराशि धनु, मीन या उच्च राशि कर्क या नीच राशि मकर में हो तब कन्याओं का जन्म ज्यादा देखा गया है। पुत्र सन्तान हो भी जाती है तो बीमार रहती है अथवा पुत्र शोक होता है।
यदि पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक या मीन राशि पर गुरू की दृष्टि या मंगल का प्रभाव होने पर पुत्र प्राप्ति होती है। यदि पंचम स्थान के दोनों ओर शुभ ग्रह हो व पंचम भाव तथा पंचमेश पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो पुत्र के होने की संभावना ज्यादा होती है। पंचमेश के बलवान होने पर पुत्र लाभ होता है। परन्तु पंचमेश अष्टम या षष्ठ भाव में नहीं होना चाहियें। बलवान पंचम, सप्तम या लग्न में स्थित होने पर उत्तम सन्तान सुख प्राप्त होता है। बलवान गुरू व सूर्य भी पुत्र सन्तान योग का निर्माण करते हैं। पंचमेश के बलवान हाने पर, शुभ ग्रहों के द्वारा दृष्ट होने पर, शुभ ग्रहों से युत हाने पर पुत्र सन्तान योग बनता है। पंचम स्थान पर चन्द्र ग्रह हो व शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तब भी पुत्र सन्तान योग होता है। पुरूष जातक की कुण्डली में सूर्य व शुक्र बलवान हाने पर वह सन्तान उत्पन्न करने के अधिक योग्य होता है। मंगल व चन्द्रमा के बलवान हाने पर स्त्री जातक सन्तान उत्पन्न करने के योग्य होती है।
सर्वप्रथम पति और पत्नी की जन्म कुंडलियों से संतानोत्पत्ति की क्षमता पर विचार किया जाना चाहिए |जातकादेशमार्ग तथा फलदीपिका के अनुसार पुरुष की कुंडली में सूर्य स्पष्ट ,शुक्र स्पष्ट और गुरु स्पष्ट का योग करें |राशि का योग 12 से अधिक आये तो उसे 12 से भाग दें |शेष राशि ( बीज )तथा उसका नवांश दोनों विषम हों तो संतानोत्पत्ति की पूर्ण क्षमता,एक सम एक विषम हो तो कम क्षमता तथा दोनों सम हों तो अक्षमता होती है | इसी प्रकार स्त्री की कुंडली से चन्द्र स्पष्ट ,मंगल स्पष्ट और गुरु स्पष्ट से विचार करें |शेष राशि( क्षेत्र ) तथा उसका नवांश दोनों सम हों तो संतानोत्पत्ति की पूर्ण क्षमता,एक सम एक विषम हो तो कम क्षमता तथा दोनों विषम हों तो अक्षमता होती है | बीज तथा क्षेत्र का विचार करने से अक्षमता सिद्ध होती हो तथा उन पर पाप युति या दृष्टि भी हो तो उपाय करने पर भी लाभ की संभावना क्षीण होती है ,शुभ युति दृष्टि होने पर शान्ति उपायों से और औषधि उपचार से लाभ होता है | शुक्र से पुरुष की तथा मंगल से स्त्री की संतान उत्पन्न करने की क्षमता का विचार करें | पुरुष व स्त्री जिसकी अक्षमता सिद्ध होती हो उसे किसी कुशल वैद्य से परामर्श करना चाहिए |
सूर्यादि ग्रह नीच ,शत्रु आदि राशि नवांश में,पाप युक्त दृष्ट ,अस्त ,त्रिक भावों का स्वामी हो कर पंचम भाव में हों तो संतान बाधा होती है | योग कारक ग्रह की पूजा ,दान ,हवन आदि से शान्ति करा लेने पर बाधा का निवारण होता है और सन्तिति सुख प्राप्त होता है | फल दीपिका के अनुसार :-
एवं हि जन्म समये बहुपूर्वजन्मकर्माजितं दुरितमस्य वदन्ति तज्ज्ञाः |
ततद ग्रहोक्त जप दान शुभ क्रिया भिस्तददोषशान्तिमिह शंसतु पुत्र सिद्धयै ||
अर्थात जन्म कुंडली से यह ज्ञात होता है कि पूर्व जन्मों के किन पापों के कारण संतान हीनता है | बाधाकारक ग्रहों या उनके देवताओं का जाप ,दान ,हवन आदि शुभ क्रियाओं के करने से पुत्र प्राप्ति होती है |
जन्म कुंडली के किस भाव से विचार करें
जन्म लग्न और चन्द्र लग्न में जो बली हो ,उस से पांचवें भाव से संतान सुख का विचार किया जाता है | भाव ,भाव स्थित राशि व उसका स्वामी ,भाव कारक बृहस्पति और उस से पांचवां भाव तथा सप्तमांश कुंडली, इन सभी का विचार संतान सुख के विषय में किया जाना आवश्यक है |पति एवम पत्नी दोनों की कुंडलियों का अध्ययन करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए |पंचम भाव से प्रथम संतान का ,उस से तीसरे भाव से दूसरी संतान का और उस से तीसरे भाव से तीसरी संतान का विचार करना चाहिए | उस से आगे की संतान का विचार भी इसी क्रम से किया जा सकता है |
संतान सुख प्राप्ति के योग
पंचम भाव में बलवान शुभ ग्रह गुरु ,शुक्र ,बुध ,शुक्ल पक्ष का चन्द्र स्व मित्र उच्च राशि – नवांश में स्थित हों या इनकी पूर्ण दृष्टि भाव या भाव स्वामी पर हो , भाव स्थित राशि का स्वामी स्व ,मित्र ,उच्च राशि – नवांश का लग्न से केन्द्र ,त्रिकोण या अन्य शुभ स्थान पर शुभ युक्त शुभ दृष्ट हो , संतान कारक गुरु भी स्व ,मित्र ,उच्च राशि – नवांश का लग्न से शुभ स्थान पर शुभ युक्त शुभ दृष्ट हो , गुरु से पंचम भाव भी शुभ युक्त –दृष्ट हो तो निश्चित रूप से संतान सुख की प्राप्ति होती है | शनि मंगल आदि पाप ग्रह भी यदि पंचम भाव में स्व ,मित्र ,उच्च राशि – नवांश के हों तो संतान प्राप्ति करातें हैं | पंचम भाव ,पंचमेश तथा कारक गुरु तीनों जन्मकुंडली में बलवान हों तो संतान सुख उत्तम ,दो बलवान हों तो मध्यम ,एक ही बली हो तो सामान्य सुख होता है |सप्तमांश लग्न का स्वामी जन्म कुंडली में बलवान हो ,शुभ स्थान पर हो तथा सप्तमांश लग्न भी शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट हो तो निश्चित रूप से संतान सुख की अनुभूति होती है | प्रसिद्ध फलित ग्रंथों में वर्णित कुछ प्रमुख योग निम्नलिखित प्रकार से हैं जिनके जन्मकुंडली में होने से संतान सुख की प्राप्ति अवश्य होती है :-
१ जन्मकुंडली में लग्नेश और पंचमेश का या पंचमेश और नवमेश का युति,दृष्टि या राशि सम्बन्ध शुभ भावों में हो |
२ लग्नेश पंचम भाव में मित्र ,उच्च राशि नवांश का हो |
३ पंचमेश पंचम भाव में ही स्थित हो |
४ पंचम भाव पर बलवान शुभ ग्रहों की पूर्ण दृष्टि हो |
५ जन्म कुंडली में गुरु स्व ,मित्र ,उच्च राशि नवांश का लग्न से शुभ भाव में स्थित हो |
६ एकादश भाव में शुभ ग्रह बलवान हो कर स्थित हों |
संतान सुख हीनता के योग
लग्न एवम चंद्रमा से पंचम भाव में निर्बल पाप ग्रह अस्त ,शत्रु –नीच राशि नवांश में स्थित हों ,पंचम भाव पाप कर्तरी योग से पीड़ित हो , पंचमेश और गुरु अस्त ,शत्रु –नीच राशि नवांश में लग्न से 6,8 12 वें भाव में स्थित हों , गुरु से पंचम में पाप ग्रह हो , षष्टेश अष्टमेश या द्वादशेश का सम्बन्ध पंचम भाव या उसके स्वामी से होता हो , सप्तमांश लग्न का स्वामी जन्म कुंडली में 6,8 12 वें भाव में अस्त ,शत्रु –नीच राशि नवांश में स्थित हों तो संतान प्राप्ति में बाधा होती है | जितने अधिक कुयोग होंगे उतनी ही अधिक कठिनाई संतान प्राप्ति में होगी |
पंचम भाव में अल्पसुत राशि ( वृष ,सिंह कन्या ,वृश्चिक ) हो तथा उपरोक्त योगों में से कोई योग भी घटित होता हो तो कठिनता से संतान होती है |
गुरु के अष्टक वर्ग में गुरु से पंचम स्थान शुभ बिंदु से रहित हो तो संतानहीनता होती है |
सप्तमेश निर्बल हो कर पंचम भाव में हो तो संतान प्राप्ति में बाधा होती है |
गुरु ,लग्नेश ,पंचमेश ,सप्तमेश चारों ही बलहीन हों तो अन्पतत्यता होती है |
गुरु ,लग्न व चन्द्र से पांचवें स्थान पर पाप ग्रह हों तो अन्पतत्यता होती है |
पुत्रेश पाप ग्रहों के मध्य हो तथा पुत्र स्थान पर पाप ग्रह हो ,शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो अन्पतत्यता होती है |
पुत्र या पुत्री योग
सूर्य ,मंगल, गुरु पुरुष ग्रह हैं | शुक्र ,चन्द्र स्त्री ग्रह हैं | बुध और शनि नपुंसक ग्रह हैं | संतान योग कारक पुरुष ग्रह होने पर पुत्र तथा स्त्री ग्रह होने पर पुत्री का सुख मिलता है | शनि और बुध योग कारक हो कर विषम राशि में हों तो पुत्र व सम राशि में हो तो पुत्री प्रदान करते हैं | सप्तमान्शेष पुरुष ग्रह हो तो पुत्र तथा स्त्री ग्रह हो तो कन्या सन्तिति का सुख मिलता है | गुरु के अष्टक वर्ग में गुरु से पांचवें स्थान पर पुरुष ग्रह बिंदु दायक हों तो पुत्र स्त्री ग्रह बिंदु दायक हो तो पुत्री का सुख प्राप्त होता है |पुरुष और स्त्री ग्रह दोनों ही योग कारक हों तो पुत्र व पुत्री दोनों का ही सुख प्राप्त होता है | पंचम भाव तथा पंचमेश पुरुष ग्रह के वर्गों में हो तो पुत्र व स्त्री ग्रह के वर्गों में हो तो कन्या सन्तिति की प्रधानता रहती है |
पंचमेश के भुक्त नवांशों में जितने पुरुष ग्रह के नवांश हों उतने पुत्र और जितने स्त्री ग्रह के नवांश हों उतनी पुत्रियों का योग होता है | जितने नवांशों के स्वामी कुंडली में अस्त ,नीच –शत्रु राशि में पाप युक्त या दृष्ट होंगे उतने पुत्र या पुत्रियों की हानि होगी |
किस व्यक्ति के कैसी सन्तान होगी,इसका पता भी लगाया जा सकता है,जन्म कुन्डली में चलित नवमांश कारकांश के द्वारा जन्म योग है,या नहीं इसका पता लगाना तो असंभव तो नही परन्तु कठिन अवश्य है। संतान सुख का विचार करने के लिए त्रिकोण 1,5,9वें स्थान द्वितीय स्थान एकादश स्थान (2,11) से सन्तान सम्बन्धी विचार करना चाहिए।
देह भवन यानी शरीर स्थान यह सन्तान के वास्ते महत्वपूर्ण साधन है,जिससे प्रथम देह स्थान का बल होना देखना चाहिये। उसके बाद द्वितीय स्थान जहां कुटुम्ब वृद्धि या वंश वृद्धि का विचार करना चाहिये,उसके बाद पंचम स्थान से संतान सुख का विचार किया जाता है,पांचवें स्थान स पांचवे यानी नवम स्थान को भाग्य स्थान भी इसके लिये महत्वपूर्ण माना जाता है,फिऱ ग्यारहवां भाव जहां से किसी भी वस्तु की प्राप्ति होती है को देखना चाहिये। इसके साथ ही पुत्र कारक गुरु का भी विचार करना चाहिए। सप्तांश,नवमांश कारकांश यह कुन्डली में जन्म के इन पांचों स्थानों के स्वामी की क्या परिस्थिति है,उसका ध्यान होने के बाद सन्तान सम्बन्धी जातक को योग्य मार्गदर्शन देना चाहिये।
पुत्र या पुत्री प्राप्ति हेतु गर्भाधान का तरीका
हमारे ऋषि महर्षियों ने हजारो साल पहले ही संतान प्राप्ति के कुछ नियम और सयम बताये है ,संसार की उत्पत्ति पालन और विनाश का क्रम पृथ्वी पर हमेशा से चलता रहा है,और आगे चलता रहेगा। धर्म का मतलब मर्यादा में चलने से होता है,माता को माता समझना पिता को पिता का आदर देना अन्य परिवार और समाज को यथा स्थिति आदर सत्कार और सबके प्रति आस्था रखना ही धर्म कहा गया है,अर्थ से अपने और परिवार के जीवन यापन और समाज में अपनी प्रतिष्ठा को कायम रखने का कारण माना जाता है,काम का मतलब अपने द्वारा आगे की संतति को पैदा करने के लिये स्त्री को पति और पुरुष को पत्नी की कामना करनी पडती है,पत्नी का कार्य धरती की तरह से है और पुरुष का कार्य हवा की तरह या आसमान की तरह से है,गर्भाधान भी स्त्री को ही करना पडता है,वह बात अलग है कि पादपों में अमर बेल या दूसरे हवा में पलने वाले पादपों की तरह से कोई पुरुष भी गर्भाधान करले। धरती पर समय पर बीज का रोपड किया जाता है,तो बीज की उत्पत्ति और उगने वाले पेड का विकास सुचारु रूप से होता रहता है,और समय आने पर उच्चतम फ़लों की प्राप्ति होती है,अगर वर्षा ऋतु वाले बीज को ग्रीष्म ऋतु में रोपड कर दिया जावे तो वह अपनी प्रकृति के अनुसार उसी प्रकार के मौसम और रख रखाव की आवश्यकता को चाहेगा,और नही मिल पाया तो वह सूख कर खत्म हो जायेगा,इसी प्रकार से प्रकृति के अनुसार पुरुष और स्त्री को गर्भाधान का कारण समझ लेना चाहिये। जिनका पालन करने से आप तो संतानवान होंगे ही आप की संतान भी आगे कभी दुखों का सामना नहीं करेगा…
हमारे पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।
यदि आप पुत्र या पुत्री कोई भी प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।
* चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।
* पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।
* छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।
* सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।
* आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।
* नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।
* दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।
* ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।
* बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।
* तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।
* चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।
* पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।
* सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।
व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘संस्कार विधि’ में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि पूर्णरूप से की है।
* दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।
* 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।
* प्राचीन संस्कृत पुस्तक ‘सर्वोदय’ में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।
* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।
* कुछ विशिष्ट पंडितों तथा ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य के उत्तरायण रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्र तथा दक्षिणायन रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्री जन्म लेती है। उनका यह भी कहना है कि मंगलवार, गुरुवार तथा रविवार पुरुष दिन हैं। अतः उस दिन के गर्भाधान से पुत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार कन्या दिन हैं, जो पुत्री पैदा करने में सहायक होते हैं। बुध और शनिवार नपुंसक दिन हैं। अतः समझदार व्यक्ति को इन दिनों का ध्यान करके ही गर्भाधान करना चाहिए।
कुछ राते ये भी है जिसमे हमें सम्भोग करने से बचना चाहिए .. जैसे अष्टमी, एकादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमवाश्या .चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
ग्रह और संतान
सूर्य मंगल गुरु पुत्र के ग्रह होते है,चन्द्र स्त्री ग्रह है,बुध शुक्र शनि कुन्डली में बलवान होने पर पुत्र या पुत्री का अपने बल के अनुसार फ़ल देते है,सूर्य की सिंह राशि अल्प प्रसव राशि है,और सूर्य जब ग्यारहाव रहकर पांचवें स्थान के सामने होता है,तो एक पुत्र से अधिक का योग नही बनता है,कभी कभी वंश वृद्धि में बाधा भी बनती है। परन्तु सूर्य से अधिक से अधिक एक ही पुत्र का सुख होता है,जब चन्द्र राशि कर्क उसके स्वामी के "चन्द्र कन्या प्रजावान" योग के लिये प्रसिद्ध माना जाता है,यानी चन्द्र राशि कर्क कन्या राशि की अधिकता के लिये माना जाता है। पांचवें स्थान में कर्क राशि को अगर ग्यारहवें भाव से शनि देखता हो तो जातक के सात पुत्रिया भी हो सकती है,और एक पुत्र का योग होता है,और वह पुत्र भी अल्पायु वाला कहा जाता है,लेकिन अगर कर्क राशि में जन्म नही है,तो पर्णाम उल्टा भी देखा जाता है,धनु लगन की कुन्डली में पांचवे स्थान से पुत्र सुख अधिक होता है,शनि पुत्र सुख नही देता है।
कम सन्तान योग
पुत्र के सुख का अभाव तब होता है जब पंचम स्थान दूषित होता है,पंचम स्थान को अगर शनि राहु मंगल अगर कोई भी ग्रह दृष्टि दे रहा है,या पंचम के मालिक बारहवें भाव में है,या पंचम और धन स्थान में अशुभ ग्रहों का जोर या युति है तो सन्तान में पुत्र सुख नही मिल पाता है या बिलम्ब होता है , लेकिन कन्या संतान अवश्य मिलती है।
मनचाही सन्तान प्राप्ति के लिए वैदिक जीव विज्ञानं का सटीक तरीका
स्त्री के ऋतु चक्र के सोलह रात तक ऋतुकाल रहता है, उस समय में ही गर्भ धारण हो सकता है, उसके अन्दर पहली चार रातें निषिद्ध मानी जाती है, कारण दूषित रक्त होने के कारण कितने ही रोग संतान और माता पिता में अपने आप पनप जाते है, इसलिये शास्त्रों और विद्वानो ने इन चार रातों को त्यागने के लिये ही जोर दिया गया है। चौथी रात को ऋतुदान से कम आयु वाला पुत्र पैदा होता है, पंचम रात्रि से कम आयु वाली ह्रदय रोगी पुत्री होती है, छठी रात को वंश वृद्धि करने वाला पुत्र पैदा होता है, सातवीं रात को संतान न पैदा करने वाली पुत्री, आठवीं रात वाला पुत्र, नवीं रात को कुल में नाम करने वाली पुत्री, दसवीं रात को कुलदीपक पुत्र, ग्यारहवीं रात को अनुपम सौन्दर्य युक्त पुत्री,बारहवीं रात को अभूतपूर्व गुणों से युक्त पुत्र,तेरहवीं रात को चिन्ता देने वाली पुत्री,चौदहवीं रात को सदगुणी पुत्र,पन्द्रहवीं रात को लक्ष्मी समान पुत्री,और सोलहवीं रात को सर्वज्ञ पुत्र पैदा होता है। इसके बाद की रातों को संयोग करने से पुत्र संतान की गुंजायश नही होती है। इसके बाद स्त्री का रज अधिक गर्म हो जाता है,और पुरुष के वीर्य को जला डालता है, परिणामस्वरूप या तो गर्भपात हो जाता है, अथवा संतान पैदा होते ही खत्म हो जाती है। मेडिकल सांइस में भी गर्भाधारण के लिये ऋतु चक्र से सोलह दिन बताये गये है । यदि भूतकाल में देखे तो हमारे राजाओं , महाराजाओं के एक या दो ही संताने हुआ करती थी जो की जीवन के हर क्षेत्र में पूर्ण निपुण हुआ करती थी , क्योंकि हमारे विद्वानों ने गर्भाधारण के लिए औरत की जन्म कुंडली के अनुसार गर्भाधारण के लिए एक उचित समय का निर्धारण कर योग्य सन्तान प्राप्ति के बारे में आंकलन किया जाता है । आज के युग में भी यदि इस पर विचार करके गर्भ धारण किया जाये तो योग्य सन्तान प्राप्त की जा सकती है जिससे देश व राष्ट्र की उन्नति हो।
गर्भाधान मुहूर्त
जिस स्त्री को जिस दिन मासिक धर्म हो,उससे चार रात्रि पश्चात सम रात्रि में जबकि शुभ ग्रह केन्द्र (1, 4, 7, 10) तथा त्रिकोण (1, 5, 9) में हों,तथा पाप ग्रह (3, 6, 11) में हों ऐसी लग्न में पुरुष को पुत्र प्राप्ति के लिये अपनी स्त्री के साथ संगम करना चाहिये। मृगशिरा अनुराधा श्रवण रोहिणी हस्त तीनों उत्तरा स्वाति धनिष्ठा और शतभिषा इन नक्षत्रों में षष्ठी को छोड कर अन्य तिथियों में तथा दिनों में गर्भाधान करना चाहिये,भूल कर भी शनिवार मंगलवार गुरुवार को पुत्र प्राप्ति के लिये संगम नही करना चाहिये।
सन्तान न होने के योग
पंचम स्थान या पंचमेश के साथ राहू होने पर सर्पशाप होता है। ऐसे में जातक को पुत्र नहीं होता है अथवा पुत्र नाश होता है। शुभ ग्रहों की दृष्टि हाने पर पुत्र प्राप्ति हो सकती है। यदि लग्न व त्रिकोण स्थान में शनि हो और शुभ ग्रहो द्वारा दृष्ट न हो तो पितृशाप से पुत्र प्राप्ति में कठिनाई होती है। पंचमेश मंगल से दृष्ट हो या पंचम भाव में कर्क राशि का मंगल हो तब पुत्र प्राप्ति में कठिनाई होती है तथा शत्रु के प्रभाव से पुत्र नाश भी होता है। पंचमेश व पंचम स्थान पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि हो तब देवशाप द्वारा पुत्र नाश होता है। चतुर्थ स्थान में पाप ग्रह हो पंचमेश के साथ शनि हो एवं व्यय स्थान में पाप ग्रह हो तो मातृदोष कें कारण सन्तान प्राप्ति में कठिनाई होती है।
भाग्य भाव में पाप ग्रह हो व पंचमेश के साथ शनि हो तब पितृदोष से सन्तान होने में कठनाई होती है। गुरू पंचमेश व लग्नेश निर्बल हो तथा सूर्य, चन्द्रमा व नावमांश निर्बल हो तब देवशाप के प्रभाव से सन्तान हानि होती है। गुरू, शुक्र पाप युक्त हों तो ब्राह्मणशाप व सूर्य, चन्द्र के खराब या नीच के होने पर पितृशाप के कारण सन्तान प्राप्ति में कठिनाई होती है। यदि लग्नेश, पंचमेश व गुरू निर्बल हों या 6वें,8वें,12वें स्थान में हो तों भी सन्तान प्राप्ति में कठिनाई होती है। पाप ग्रह चतुर्थ स्थान में हो तो भी सन्तान प्राप्ति की राह में कठिनाई होती है।
नवम भाव में पाप ग्रह हो तथा सूर्य से युक्त हो तब पिता (जिसकी कुण्डली में यह योग हो उसके पिता) के जीवन काल में पोता देखना नसीब नहीं होता है। सन्तान बाधा के उपाय- सूर्य व चन्द्रमा साथ-साथ होने पर सन्तान प्रप्ति के लिये पितृ व पितर का पूजन करना करना चाहियें। चन्द्रमा के लिये गया (बिहार) क्षेत्र में श्राद्ध करना चाहियें व मन्दिरों में पूजा व जागरण का आयोजन करने से भी लाभ होता है। मंगल के कारण सन्तान प्राप्ति में कठिनाई हो रही हो तो ब्राह्मणों को भोजन करायें तथा मां दुर्गा की आरधना करें।
यदि बुध के कारण सन्तान प्राप्ति में बाधा आ रही हो तो भगवान विष्णु का पूजन करें तथा ब्राह्मणों को भोजन करयें। गुरू के कारण यदि सन्तान प्राप्ति में कठिनाई हो रही हो तो ब्राह्मणें की सेवा करें। गुरूवार को मिठाइयों से युक्त ब्राह्मणों को भोजन करायें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। पुत्रदायक औषधियां भी अच्छा कार्य करती हैं। शिवलिंगी के बीज तथा पुत्र जीवी के प्रयोग से भी लाभ मिलता है। गुरू के कारण सन्तान प्राप्ति में कठिनाई हो तब शुक्रवार को सफेद वस्तुओं, सुगन्धित तेल आदि दान करे तथा यक्ष की पूजा करें।
ब्राह्मणों को भोजन करने कर उनका आशिर्वाद प्राप्त करें। शनि के कारण यदि सन्तान प्राप्ति में कठिनाई उत्पन्न हो रही हो तो सर्प की पूजा करें व सर्पों की दो मूर्तियों की पूजा करके दान में देनी चाहियें। सन्तान गोपाल यन्त्र के सामने पुत्र जीवी की माला के द्वारा सन्तान गोपाल मत्रं का जप करें। यदि कोई दाम्पती प्रात: स्नानादि से निवत्तृ होकर भगवान श्री राम और माता कौशल्या की शोड्शोपचार पूजा करके नियमित रूप से एक माला इस चौपाई का पाठ करे तो पुत्र प्राप्ति अवश्य होगी:-प्रेम मगन कौशल्या, लिस दिन जात न जात। सुत सनेह बस माता, बाल चरित कर गाय। सन्तान प्राप्ति हेतु यदि दाम्पति नौं वर्ष से कम आयु वाली कन्याओं के पैर छूकर 90 दिन तक यदि आशीर्वाद प्राप्त करे तो सन्तान अवश्य प्राप्त होगी।
पुत्र कामना पूरी करे पार्थिव लिंग पूजा
सावन में भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए शिव स्तुति और स्त्रोत का पाठ करने का विशेष महत्व है। इन स्त्रोतों में शिव महिम्र स्त्रोत सबसे प्रभावी माना जाता है। इस स्त्रोत का पूरा पाठ तो शुभ फल देने वाला है ही, बल्कि यह ऐसा देव स्त्रोत है, जिसका कामना विशेष की पूर्ति के लिए प्रयोग भी निश्चित फल देने वाला होता है।
शिव महिम्र स्त्रोत के इन प्रयोगों में एक है – पुत्र प्राप्ति प्रयोग। पुत्र की प्राप्ति दांपत्य जीवन का सबसे बड़ा सुख माना जाता है। इसलिए हर दंपत्ति ईश्वर से पुत्र प्राप्ति की कामना करता है। अनेक नि:संतान दंपत्ति भी पुत्र प्राप्ति के लिए धार्मिक उपाय अपनाते हैं। शास्त्रों में शिव महिम्र स्त्रोत के पाठ से पुत्र प्राप्ति का उपाय बताया है। जानते है प्रयोग विधि -
– पुत्र प्राप्ति का यह उपाय विशेष तौर पर सावन माह से शुरु करें।
– स्त्री और पुरुष दोनों सुबह जल्दी उठे। स्त्री इस दिन उपवास रखे।
– पति-पत्नी दोनों साथ मिलकर गेंहू के आटे से ११ पार्थिव लिंग बनाए। पार्थिव लिंग विशेष मिट्टी के बनाए जाते हैं।
– पार्थिव लिंग को बनाने के बाद इनका शिव महिम्र स्त्रोत के श्लोकों से पूजा और अभिषेक के ११ पाठ स्वयं करें। अगर ऐसा संभव न हो तो पूजा और अभिषेक के लिए सबसे श्रेष्ठ उपाय है कि यह कर्म किसी विद्वान ब्राह्मण से कराएं। पार्थिव लिंग निर्माण और पूजा भी ब्राह्मण के बताए अनुसार कर सकते हैं।
– पार्थिव लिंग के अभिषेक का पवित्र जल पति-पत्नी दोनों पीएं और शिव से पुत्र पाने के लिए प्रार्थना करें।
– यह प्रयोग २१ या ४१ दिन तक पूरी श्रद्धा और भक्ति से करने पर शिव कृपा से पुत्र जन्म की कामना शीघ्र ही पूरी होती है।
जन्म कुंडली में अन्पत्तयता दोष स्थित हो या संतान भाव निर्बल एवम पीड़ित होने से संतान सुख की प्राप्ति में विलम्ब या बाधा हो तो निम्नलिखित पुराणों तथा प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में वर्णित शास्त्रोक्त उपायों में से किसी एक या दो उपायों को श्रद्धा पूर्वक करें | आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी |
1. संकल्प पूर्वक शुक्ल पक्ष से गुरूवार के १६ नमक रहित मीठे व्रत रखें | केले की पूजा करें तथा ब्राह्मण बटुक को भोजन करा कर यथा योग्य दक्षिणा दें | १६ व्रतों के बाद उद्यापन कराएं ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं गुरुवे नमः का जाप करें |
2. पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की तर्जनी में गुरु रत्न पुखराज स्वर्ण में विधिवत धारण करें |
3. यजुर्वेद के मन्त्र दधि क्राणों ( २३/३२) से हवन कराएं |
4. अथर्व वेद के मन्त्र अयं ते योनि ( ३/२०/१) से जाप व हवन कराएं |
5 संतान गोपाल स्तोत्र
ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि में तनयं कृष्ण त्वामहम शरणम गतः |
उपरोक्त मन्त्र की १००० संख्या का जाप प्रतिदिन १०० दिन तक करें | तत्पश्चात १०००० मन्त्रों से हवन,१००० से तर्पण ,१०० से मार्जन तथा १० ब्राह्मणों को भोजन कराएं |
संतान गणपति स्तोत्र
श्री गणपति की दूर्वा से पूजा करें तथा उपरोक्त स्तोत्र का प्रति दिन ११ या २१ की संख्या में पाठ करें |
पुत्र प्रद प्रदोष व्रत
शुक्ल पक्ष की जिस त्रयोदशी को शनिवार हो उस दिन से साल भर यह प्रदोष व्रत करें|प्रातःस्नान करके पुत्र प्राप्ति हेतु व्रत का संकल्प करें | सूर्यास्त के समय शिवलिंग की भवाय भवनाशाय मन्त्र से पूजा करें जौ का सत्तू ,घी ,शक्कर का भोग लगाएं | आठ दिशाओं में दीपक रख कर आठ -आठ बार प्रणाम करें | नंदी को जल व दूर्वा अर्पित करें तथा उसके सींग व पूंछ का स्पर्श करें | अंत में शिव पार्वती की आरती पूजन करें |
सूर्य संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण पितृ पीड़ा है | पितृ शान्ति के लिए गयाजी में पिंड दान कराएं | हरिवंश पुराण का श्रवण करें |सूर्य रत्न माणिक्य धारण करें | रविवार को सूर्योदय के बाद गेंहु,गुड ,केसर ,लाल चन्दन ,लाल वस्त्र ,ताम्बा, सोना तथा लाल रंग के फल दान करने चाहियें | सूर्य के बीज मन्त्र ॐ ह्रां ह्रीं ह्रों सः सूर्याय नमः के 7000 की संख्या में जाप करने से भी सूर्य कृत अरिष्टों की निवृति हो जाती है | गायत्री जाप से , रविवार के मीठे व्रत रखने से तथा ताम्बे के पात्र में जल में लाल चन्दन ,लाल पुष्प ड़ाल कर नित्य सूर्य को अर्घ्य देने पर भी शुभ फल प्राप्त होता है | विधि पूर्वक बेल पत्र की जड़ को रविवार में लाल डोरे में धारण करने से भी सूर्य प्रसन्न हो कर शुभ फल दायक हो जाते हैं |
चन्द्र संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण माता का शाप या माँ दुर्गा की अप्रसन्नता है जिसकी शांति के लिए रामेश्वर तीर्थ का स्नान ,गायत्री का जाप करें | श्वेत तथा गोल मोती चांदी की अंगूठी में रोहिणी ,हस्त ,श्रवण नक्षत्रों में जड़वा कर सोमवार या पूर्णिमा तिथि में पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की अनामिका या कनिष्टिका अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप ,पुष्प ,अक्षत आदि से पूजन कर लें |
सोमवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः मन्त्र का ११००० संख्या में जाप करें |सोमवार को चावल ,चीनी ,आटा, श्वेत वस्त्र ,दूध दही ,नमक ,चांदी इत्यादि का दान करें |
मंगल संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण भ्राता का शाप ,शत्रु का अभिचार या श्री गणपति या श्री हनुमान की अवज्ञा होता है जिसकी शान्ति के लिए प्रदोष व्रत तथा रामायण का पाठ करें |लाल रंग का मूंगा सोने या ताम्बे की अंगूठी में मृगशिरा ,चित्रा या अनुराधा नक्षत्रों में जड़वा कर मंगलवार को सूर्योदय के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की अनामिका अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ क्रां क्रीं क्रों सः भौमाय नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , लाल पुष्प, गुड ,अक्षत आदि से पूजन कर लें
मंगलवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ क्रां क्रीं क्रों सः भौमाय नमः मन्त्र का १०००० संख्या में जाप करें | मंगलवार को गुड शक्कर ,लाल रंग का वस्त्र और फल ,ताम्बे का पात्र ,सिन्दूर ,लाल चन्दन केसर ,मसूर की दाल इत्यादि का दान करें
बुध संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण मामा का शाप ,तुलसी या भगवान विष्णु की अवज्ञा है जिसकी शांति के लिए विष्णु पुराण का श्रवण ,विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें |हरे रंग का पन्ना सोने या चांदी की अंगूठी में आश्लेषा,ज्येष्ठा ,रेवती नक्षत्रों में जड़वा कर बुधवार को सूर्योदय के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की कनिष्टिका अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ ब्रां ब्रीं ब्रों सः बुधाय नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , लाल पुष्प, गुड ,अक्षत आदि से पूजन कर लें | बुधवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ ब्रां ब्रीं ब्रों सः बुधाय नमः मन्त्र का ९००० संख्या में जाप करें | बुधवार को कर्पूर,घी, खांड, ,हरे रंग का वस्त्र और फल ,कांसे का पात्र ,साबुत मूंग इत्यादि का दान करें | तुलसी को जल व दीप दान करना भी शुभ रहता है |
बृहस्पति संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण गुरु ,ब्राह्मण का शाप या फलदार वृक्ष को काटना है जिसकी शान्ति के लिए पीत रंग का पुखराज सोने या चांदी की अंगूठी मेंपुनर्वसु ,विशाखा ,पूर्व भाद्रपद नक्षत्रों में जड़वा कर गुरुवार को सूर्योदय के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की तर्जनी अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरुवे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , पीले पुष्प, हल्दी ,अक्षत आदि से पूजन कर लें |पुखराज की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न सुनैला या पीला जरकन भी धारण कर सकते हैं | केले की जड़ गुरु पुष्य योग में धारण करें |गुरूवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरुवे नमः मन्त्र का १९००० की संख्या में जाप करें | गुरूवार को घी, हल्दी, चने की दाल ,बेसन पपीता ,पीत रंग का वस्त्र ,स्वर्ण, इत्यादि का दान करें |फलदार पेड़ सार्वजनिक स्थल पर लगाने से या ब्राह्मण विद्यार्थी को भोजन करा कर दक्षिणा देने और गुरु की पूजा सत्कार से भी बृहस्पति प्रसन्न हो कर शुभ फल देते हैं |
शुक्र संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण गौ -ब्राह्मण ,किसी साध्वी स्त्री को कष्ट देना या पुष्प युक्त पौधों को काटना है जिसकी शान्ति के लिए गौ दान ,ब्राह्मण दंपत्ति को वस्त्र फल आदि का दान ,श्वेत रंग का हीरा प्लैटिनम या चांदी की अंगूठी में पूर्व फाल्गुनी ,पूर्वाषाढ़ व भरणी नक्षत्रों में जड़वा कर शुक्रवार को सूर्योदय के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , श्वेत पुष्प, अक्षत आदि से पूजन कर लें
हीरे की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न श्वेत जरकन भी धारण कर सकते हैं |शुक्रवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः मन्त्र का १६ ००० की संख्या में जाप करें | शुक्रवार को आटा ,चावल दूध ,दही, मिश्री ,श्वेत चन्दन ,इत्र, श्वेत रंग का वस्त्र ,चांदी इत्यादि का दान करें |
शनि संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण पीपल का वृक्ष काटना या प्रेत बाधा है जिसकी शान्ति के लिए पीपल के पेड़ लगवाएं,रुद्राभिषेक करें ,शनि की लोहे की मूर्ती तेल में डाल कर दान करें| नीलम लोहे या सोने की अंगूठी में पुष्य ,अनुराधा ,उत्तरा भाद्रपद नक्षत्रों में जड़वा कर शनिवार को सूर्यास्त के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ प्रां प्रीं प्रों सः शनये नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , नीले पुष्प, काले तिल व अक्षत आदि से पूजन कर लें|
नीलम की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न संग्लीली , लाजवर्त भी धारण कर सकते हैं | काले घोड़े कि नाल या नाव के नीचे के कील का छल्ला धारण करना भी शुभ रहता है |शनिवार के नमक रहित व्रत रखें | ॐ प्रां प्रीं प्रों सः शनये नमः मन्त्र का २३००० की संख्या में जाप करें | शनिवार को काले उडद ,तिल ,तेल ,लोहा,काले जूते ,काला कम्बल , काले रंग का वस्त्र इत्यादि का दान करें |श्री हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करना भी शनि दोष शान्ति का उत्तम उपाय है |
दशरथ कृत शनि स्तोत्र
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकंठनिभाय च |नमः कालाग्नि रूपाय कृतान्ताय च वै नमः ||
नमो निर्मोसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च | नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ||
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णे च वै पुनः | नमो दीर्घाय शुष्काय कालद्रंष्ट नमोस्तुते||
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरिक्ष्याय वै नमः| नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करालिने ||
नमस्ते सर्व भक्षाय बलि मुख नमोस्तुते|सूर्य पुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ||
अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोस्तुते| नमो मंद गते तुभ्यम निंस्त्रिशाय नमोस्तुते ||
तपसा दग्धदेहाय नित्यम योगरताय च| नमो नित्यम क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः||
ज्ञानचक्षुर्नमस्ते ऽस्तु कश्यपात्मजसूनवे |तुष्टो ददासि वै राज्यम रुष्टो हरसि तत्क्षणात ||
देवासुर मनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगा | त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः||
प्रसादं कुरु में देव वराहोरऽहमुपागतः ||
पद्म पुराण में वर्णित शनि के दशरथ को दिए गए वचन के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक शनि की लोह प्रतिमा बनवा कर शमी पत्रों से उपरोक्त स्तोत्र द्वारा पूजन करके तिल ,काले उडद व लोहे का दान प्रतिमा सहित करता है तथा नित्य विशेषतः शनिवार को भक्ति पूर्वक इस स्तोत्र का जाप करता है उसे दशा या गोचर में कभी शनि कृत पीड़ा नहीं होगी और शनि द्वारा सदैव उसकी रक्षा की जायेगी |
राहु संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण सर्प शाप है जिसकी शान्ति के लिए नाग पंचमी में नाग पूजा करें ,गोमेद पञ्च धातु की अंगूठी में आर्द्रा,स्वाती या शतभिषा नक्षत्र में जड़वा कर शनिवार को सूर्यास्त के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , नीले पुष्प, काले तिल व अक्षत आदि से पूजन कर लें|रांगे का छल्ला धारण करना भी शुभ रहता है | ॐ भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः मन्त्र का १८००० की संख्या में जाप करें | शनिवार को काले उडद ,तिल ,तेल ,लोहा,सतनाजा ,नारियल , रांगे की मछली ,नीले रंग का वस्त्र इत्यादि का दान करें | मछलियों को चारा देना भी राहु शान्ति का श्रेष्ठ उपाय है |
केतु संतान प्राप्ति में बाधक है तो कारण ब्राह्मण को कष्ट देना है जिसकी शान्ति के लिए ब्राह्मण का सत्कार करें , सतनाजा व नारियल का दान करें और ॐ स्रां स्रीं स्रों सः केतवे नमः का १७००० की संख्या में जाप करें |
किसी भी देश का भविष्य बालकों पर निर्भर करता है जो दम्पति सुविचारी, सदाचारी एवं पवित्रात्मा हैं तथा शास्त्रोक्त नियमों के पालन में तत्पर हैं ऐसे दम्पति के घर में दिव्य आत्माएँ जन्म लेती हैं ऐसी संतानों में बचपन से ही सुसंस्कार, सदगुणों के प्रति आकर्षण एवं दिव्यता देखी जाती है वर्त्तमान में देश के सामने बालकों में संस्कारों की कमी यह एक प्रमुख समस्या है, जिससे उबरने ले हेतु संतानप्राप्ति के इच्छुक दम्पति को ब्रह्मज्ञानी संतों-महापुरुषों के दर्शन-सत्संग का लाभ लेकर स्वयं सुविचारी, सदाचारी बनना चाहिए, साथ ही उत्तम संतानप्राप्ति के नियमों को भी जान लेना चाहिए
वास्तव में पत्थर, पानी, खनिज देश की सच्ची सम्पत्ति नहीं हैं अपितु ॠषि-परम्परा के पवित्र संस्कारों से सम्पन्न तेजस्वी बालक ही देश की सच्ची सम्पत्ति हैं लेकिन मनुष्य धन-सम्पत्ति बढ़ाने में जितना ध्यान देता है उतना संतान पैदा करने में नहीं देता यदि शास्त्रोक्त रीति से शुभ मुहूर्त में गर्भाधान कर संतानप्राप्ति की जाय तो वह परिवार व देश का नाम रोशन करनेवाली सिद्ध
करने. वालाी. होगी
उत्त्म संतानप्राप्ति के लिए सर्वप्रथम पति-पत्नी का तन-मन स्वस्थ होना चाहिए वर्ष में केवल एक ही बार संतानोत्पत्ति हेतु समागम करना हितकारी है
गर्भाधान के लिए समय:
ॠतुकाल की उत्तरोत्तर रात्रियों में गर्भाधान श्रेष्ठ है लेकिन 11वीं व 13वीं रात्रि वर्जित है
यदि पुत्र की इच्छा हो तो पत्नी को ॠतुकाल की 8, 10, 12, 14 व 16वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद कर समागम करना चाहिए
यदि पुत्री की इच्छा हो तो ॠतुकाल की 5, 7, 9 या 15वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद करना चाहिए
कृष्णपक्ष के दिनों में गर्भ रहे तो पुत्र व शुक्लपक्ष में गर्भ रहे तो पुत्री पैदा होती है
रजोदर्शन दिन को हो तो वह प्रथम दिन गिनना चाहिए सूर्यास्त के बाद हो तो सूर्यास्त से सूर्योदय तक के समय के तीन समान भाग कर प्रथम दो भागों में हुआ हो तो उसी दिन को प्रथम दिन गिनना चाहिए रात्रि के तीसरे भाग में रजोदर्शन हुआ हो तो दूसरे दिन को प्रथम दिन गिनना चाहिए
निषिद्ध रात्रियाँ: पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, ऊत्तरायण, जन्माष्टमी, रामनवमी, होली, शिवरात्रि, नवरात्रि आदि पर्वों की रात्रि, श्राद्ध के दिन, चतुर्मास, प्रदोषकाल, क्षयतिथि (दो तिथियों का समन्वय काल) एवं मासिक धर्म के चार दिन समागम नहीं चाहिए शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए
माता पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, नक्षत्रों की संधि (दो नक्षत्रों के बीच का समय) तथा अश्विनी, रेवती, भरणी, मघा, मूल इन नक्षत्रों में समागम वर्जित है
दिन में समागम करने से आयु व बल का बहुत ह्रास होता है गर्भाधान हेतु सप्ताह के 7 दिनों की रात्रियों के शुभ समय इस प्रकार हैं :
रवि >> 8 से 9 >> 1.30 से 5
सोम >> 10.30 se 12 >> 1.30 से 4
मंगल >> 7.30 से 9 >> 10.30 से 1.30
बुध >> 7.30 से 10 >> 3 से 4.30
गुरु >> 12 से 1.30 >> 3 से 4
शुक्र >> 9 से 10.30 >> 12 से 3.30
शनि >> 9 से 12
रात्रि के शुभ समय में से भी प्रथम 14 व अंतिम 15 मिनट का त्याग करके बीच का समय गर्भाधान के लिए निश्चित करें
गर्भधारण के पूर्व कर्तव्य
रात्रि तथा समय कम-से-कम तीन दिन पूर्व निश्चित कर लेना चाहिए निश्चित रात्रि में शाम होने से पूर्व पति-पत्नी को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर सदगुरु व इष्टदेवता की पूजा करनी चाहिए संभव हो तो हवन करना चाहिए
गर्भाधान एक प्रकार का यज्ञ है इसलिए इस सतत यज्ञ की भावना रखनी चाहिए, विलास की दृष्टि नहीं रखनी चाहिए
पति-पत्नी दोंनो को अपनी चित्तवृत्तियाँ परमात्मा में स्थिर करनी चाहिए व उत्तम आत्माओं को प्रार्थना करते हुए उनका आह्वान करना चाहिए :’हे ब्रह्माण्ड में विचरण कर रहीं सूक्ष्म रूपधारी पवित्र आत्माओं ! हम दोंनो आपको प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारे यहाँ जन्म धारण करके हमें कृतार्थ करें हम दोंनो अपने शरीर, मन, प्राण व बुद्धि को आपके योग्य बानायेंगे ’
पुरुष दायें पैर से स्त्री से पहले शय्या पर आरोहण करे और स्त्री बायें पैर से पति के दक्षिण पार्श्व में श्य्या पर चढ़े तत्पश्चात शय्या पर निम्नलिखित मंत्र पढ़ना चाहिए :
अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठासि धाता त्वां दधातु विधाता त्वां दधातु ब्रह्मवर्चसा भवेति
ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोम सूर्यस्तथाऽश्विनौ भगोऽथ मित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम्
‘हे गर्भ ! तुम सूर्य के समान हो तुम मेरी आयु हो, तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिष्ठा हो धाता (सबके पोषक ईश्वर) तुम्हारी रक्षा करें, विधाता (विश्व के निर्माता ब्रह्मा) तुम्हारी रक्षा करें तुम ब्रह्मतेज से युक्त होओ
ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, अश्विनीकुमार और मित्रावरुण जो दिव्य शक्तिरूप हैं, वे मुझे वीर पुत्र प्रदान करें
चरक संहिता, शारीरस्थान : 8.8
दोंनो गर्भ विषय में मन लगाकर रहें ऐसा करने से तीनों दोष अपने-अपने स्थानों में रहने से स्त्री बीज ग्रहण करती है विधिपूर्वक गर्भधारण करने से इच्छानुकूल फल प्राप्त होता है
अपने यहाँ स्वस्थ, तंदरुस्त और पुण्यात्मा बालक का जन्म हो इस हेतु सभी दम्पत्तियों को जप, अनुष्ठान, रामायण एवं श्री गुरुगीता का पाठ करके गर्भाधान करना चाहिए।
पति पत्नी का व्यवहार सिर्फ़ संतान उत्पत्ति के लिए उपयोग करते तो अपने कुल खानदान को तारते है । पर पति पत्नी का व्यवहार अमावस्या, पूनम, एकदशी, अष्टमी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, दिवाली, होली, एसे पवित्र दिनों में और अपना जन्म दिवस, श्राद्ध पक्ष के दिन करते तो अकाल मृत्यु को बुलाते हो या जीव लेवा बीमारी बुलाते हो , और अगर संतान रह गयी तो विकलांग संतान ही होगी ।
गर्भवती महिलाओ के लिए:
गर्भवती महिलाओ को तकलीफ है, डॉक्टर बोले गर्भ कमजोर है, तो वो abortion के चक्कर मे नही पड़ना..सुवर्ण भस्म की १/२ गोली रोज खाए...सुवर्ण-प्राश की गोली खाना..ऑपरेशन नही कराये...
प्रसूति मे प्रॉब्लम आया , कैसा भी भयंकर प्रॉब्लम बताये डॉक्टर तो भी डरना नही...ऑपरेशन नही कराये..१०/१२ मिलीग्राम देसी गाय का गोबर का रस ले, उस मे देखते हुए "नारायण नारायण" २१ बार जप कर के गर्भिणी को पिलाये..1 घंटे मे प्रसूति हो जायेगी..
नही हुआ तो वापस पिला दे १ /२ घंटे मे जरुर हो जायेगी...
शक्तिशाली व गोरे पुत्र प्राप्ति के लिए:
गर्भिणी स्त्री ढाक (पलाश) का एक कोमल पत्ता घोंटकर गौदुग्ध के साथ रोज़ सेवन करे | इससे बालक शक्तिशाली और गोरा होता है | माता-पीता भले काले हों, फिर भी बालक गोरा होगा | इसके साथ सुवर्णप्राश की २-२ गोलियां लेने से संतान तेजस्वी होगी |
दूध-माखन व त्रिफला प्रयोग:
त्वचा में खुजली की बीमारी होती है तो त्रिफला ५-७ ग्राम रात को थोड़ा पानी से फांक लें l कई लोगों को गाल पे दाग-दाग हैं, तो १ ग्लास दूध और १०-२० ग्राम माखन (खारा नहीं होना चाहिए) l माखन को पानी में २-४ बार अच्छी तरह से धो के दूध में मिला दें l १-२ बार हिला दें और पियें तो चेहरे पर जो दाग-दागे होते हैं, बादल जैसे (झाइयाँ), वो सब ठीक हो जायेगा l गर्भिणी स्त्री ऐसा दूध पियें तो बालक एकदम लाल-लाल टमाटर जैसा पैदा होता हैl
शिशु व बालक सम्बन्धी बातें:
बालक जन्मते ही दाई या नर्स बच्चे को नहलाकर पिता की गोद में बचे को दे और पिता बच्चे के कान में निम्नलिखित मंत्र बोले -
७ बार ॐ का उच्चारण करके "अस्मा भव" तू चटान की नाई अडिग रहना l
७ बार ॐ का उच्चारण करके "परशु भव" तू कुल्हाड़े की नाई विघ्न बाधा को काटने वाला बनना l
७ बार ॐ का उच्चारण करके "हिरन्यस्तुम भव" तू चैतन्य अमर आत्मा है, तुझे कोई दोष ना लगे l
फिर माँ दूध पिलाने से पहले शहद और घी विमिश्रण करके सोने की सलाई से बच्चे की जीभ पर "ॐ" लिखे, फिर उसे दूध पिलाये l
जन्म से २ साल तक शैशव अवस्था होती है - शैशव काल में बच्चा जब हाथ-पैर हिलाने लगे तो उसे गोद में ज्यादा नहीं लेना चाहिए, इससे बच्चों के विकास में बड़ी हानि होती है l हाथ पैर चलने दें, बच्चा मजबूत बने l उसकी प्रतिभा विकसित करने के लिए उसे हँसते-खेलते रखना चाहिए l उसकी अनुकूल वस्तुएं दिलानी चाहिए, नहीं दे सकते तो बोलना चाहिए, चिंता नहीं, आ जायेगी, उसको निषेधात्मक नहीं बोलना चाहिए l उसे पेट की बीमारियाँ ना हों, ये ध्यान रखना चाहिए, अगर पेट की तकलीफ है तो पपीते के बीज २-३ कूट के पिलायें अथवा तुलसी के बीज कूट दें फिर १/४ चुटकी चूर्ण, रात को भिगो कर सुबह पिलायें l
२-५ साल तक उसके मन में जिज्ञासा (जानने की वृति) फूटती है l जो वह पूछे उसे उत्साह से उत्तर दें और उसके सामने प्रश्न लायें जिससे उसकी प्रतिभा विकसित हो l उसे रात को कहानियों के माध्यम से जानने की वृति और विचार की शक्ति पैदा करें
सुखपूर्वक प्रसव:
सुखपूर्वक प्रसवकारक मंत्र
पहला उपाय
"एं ह्रीं भगवति भगमालिनि चल चल भ्रामय भ्रामय पुष्पं विकासय विकासय स्वाहा "
इस मंत्र द्वारा अभिमंत्रित दूध गर्भिणी स्त्री को पिलायें तो सुखपूर्वक प्रसव होगा
दूसरा उपाय
गर्भिणी स्त्री स्वयं प्रसव के समय 'जम्भला-जम्भला' जप करे
तीसरा उपाय
देशी गाय के गोबर का १२ से १५ मि.ली. रस 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का २१ बार जप करके पीने से भी प्रसव-बाधाएँ दूर होंगी और बिना ऑपरेशन के प्रसव होगा
प्रसुति के समय अमंगल की आशंका हो तो निम्न मंत्र का जप करें :
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोSस्तुते
(दुर्गासप्तशती)
जब कोई माता गर्भवती हो तो
ये सब को पता है की कयादुमाँ ने नारद मुनि के आश्रम में जा कर खूब जप, तप किया, सत्संग सुना तो राक्षस कुल में भी प्रह्लाद जैसी संतान हुई । इसलिए घर में कोई बहु, बेटी, बहन गर्भवती हो तो उसे कहना कि श्रीमद भागवत पढ़े और ऐसे पढ़े कि जैसे हम किसी को पढ़कर सुना रहे हो, जोर से पढ़े। उन दिनों में कोशिश करना कि अधिक से अधिक भगवन नाम जपे।
। इसलिए घर में कोई बहु, बेटी, बहन गर्भवती हो तो उसे कहना कि श्रीमद भागवत पढ़े और ऐसे पढ़े कि जैसे हम किसी को पढ़कर सुना रहे हो, जोर से पढ़े। उन दिनों में कोशिश करना कि अधिक से अधिक भगवन नाम जपे। अधिक से अधिक शांत और ध्यान में बैठने की कोशिश करना । ऐसी संतान आप के घर जन्म लेगी जो सात-सात पीढ़ी को तारने वाली होगी। क्योकि आप गर्भ से उसे संस्कार दे रहे हो ।
संतान आगमन पर:
जो भी संयम में रहते, तो उनका वीर्य मजबूत होता है, तो बालक भी मजबूत पैदा होते हैं
बच्चा पैदा हो उसको गुनगुने पानी से नहलाकर पिता की गोद में रखना चाहिये
पिता उस बच्चे को देखे और बोले उसके कान में:
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ (7 बार) अश्मा भव
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ (7 बार) परशु भव
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ (7 बार ) हिरन्यस्तुम भव
तू चट्टान की नाईं दृढ़ होना तू विघ्न बाधाओं और पापों को काटने वाला कुल्हाड़ा बनना तू सुवर्ण की नाईं- लोहे को दाग लग जाता है, तांबे को भी जंग लग जाता है, लेकिन सोना ज्यों का त्यों रहत है ऐसे ही तू संसार में निर्लेप रहना ऐसा करके बाप माँ की गोद में बच्चे को ड़ाल दे
फिर माँ क्या करे ?उसे स्तन-पान न करवाये कुछ भी उसके मुँह में न ड़ाले; पहले माँ को क्या करना चाहिए माँ हो, मौसी हो, जो भी हो, एक बूँद शहद की, दस बूँद घी की, दोनों को मिला दे, और सोने की सलाई से (अगर सोने की सलाई खरीदने की ताकत नहीं है तो चाँदी की सलाई पर सोने का पानी 15-20 रुपये में चढ़ जाता है ) शहद और घी के विमिश्रण से (सममिश्रण होगा तो ज़हर बनता है- या तो शहद का वजन ज्यादा हो, या तो घी का ज्यादा हो; बराबरी में जहर होता है ) बालक की जीभ पर ॐ लिख देवें बाद में उसको जो भी देना हो, पानी/दूध दे सकते हैं बच्चा ऐसा बनेगा कि 7 पीढ़ी के खानदान में ऐसा नहीं हुआ होगा जैसा ये बालक/बालिका बनेंगें
तन-मन से निरोग-स्वस्थ व तेजस्वी संतान-प्राप्ति के नियम:
गृहस्थ जीवन की सफलता उत्तम संतान की प्राप्ति में मानी जाती है किन्तु मनुष्य यह नहीं जानता कि कुछ नियमों का पालन उसे दिव्य, तेजस्वी एवं ओजस्वी संतान प्रदान करने में सहायक होता है। अगर निम्नांकित नियमों को जानकर उसका पालन किया जाये तो उत्तम, स्वस्थ संतान की प्राप्ति हो सकती है।
ऋतुकाल की चौथी, छठी, आठवीं और बारहवीं रात्रि में स्त्रीसंग करके पुरुष दीर्घायुवाला पुत्र उत्पन्न करता है। पुत्र की इच्छा रखनेवाली स्त्री को इस रात्रि में लक्ष्मणा (हनुमान बेल की जड़ को दूध में घिसकर उसकी दो तीन बूँदे दायें नथुने में डालनी चाहिए।
ऋतुकाल की पाँचवी, नवमी और ग्यारहवीं रात्रि में स्त्रीसंग करके गुणवान कन्या उत्पन्न करता है किन्तु सातवीं रात्रि में स्त्रीसंग करने से दुर्भांगी कन्या उत्पन्न होती है।
ऋतुकाल की तीन रात्रियों में, प्रदोष काल में, अमावस्या, पूर्णिमा, ग्यारस अथवा ग्रहण के दिनों में एवं श्राद्ध तथा पर्व दिनों में संयम न रखने वाले गृहस्थों के यहाँ कम आयुवाले, रोगी, दुःख देने वाले एवं विकृत अंगवाले बच्चों का जन्म होता है। अतः इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।
तेजस्वी पुत्र की इच्छा रखनेवाले स्त्री-पुरुष दोनों को उपरोक्त बातों का ध्यान रखकर शैया पर निम्नलिखित वेदमंत्र पढ़ना चाहिए।
अहिरसि, आयुरसि, सर्वतः प्रतिष्ठासि धाता।
त्वा दधातु विधाता त्वा दधातु ब्रह्मवर्चसा भवेदिति।।
ब्रह्मा बृहस्पति र्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाऽश्विनौ।
भगोऽथ मित्रावरुणी वीरं दधतु मे सुतम्।।
गर्भवती स्त्री द्वारा रखने योग्य सावधानीः
उकड़ू बैठना, ऊँचे नीचे स्थान एवं कठिन आसन में बैठना, वायु, मल-मूत्र का वेग रोकना, शरीर जिसके लिए अभ्यस्त न हो ऐसा कठिन व्यायाम करना, तीखे, गरम, खट्टे, दही एवं मावे की मिठाइयों जैसे पदार्थों का अति सेवन करना, गहरी खाई अथवा ऊँचे जलप्रपात हों ऐसे स्थलों पर जाना, शरीर अत्यंत हिले-डुले ऐसे वाहनों में मुसाफिरी करना, हमेशा चित्त सोना-ये सब कार्य और व्यवहार गर्भ को नष्ट करने वाले हैं अतः गर्भिणी को इनसे बचना चाहिए।
जिनका गर्भ गिर जाता हो वे माताएँ गर्भरक्षक मंत्र (जो कि आवश्यक माताओं को ध्यान योग शिविर में दिया जाता है।) पढ़ते हुए एक काले धागे पर 21 गाँठे लगायें व 21 बार गर्भरक्षक मंत्र पढ़कर पेट पर बाँधें। इससे गर्भ की रक्षा होती है।
जो गर्भिणी स्त्री खुले प्रदेश में, एकांत में अथवा हाथ-पैर को खूब फैलाकर सोने के स्वभाव वाली हो अथवा रात्रि के समय में बाहर घूमने के स्वभाववाली हो तो वह स्त्री उन्मत्त-पागल संतान को जन्म देती है।
लड़ाई-झगड़े, हाथापाई एवं कलह करने के स्वभाववाली स्त्री अपस्मार या मिर्गी के रोगवाली संतान को जन्म देती है।
यदि गर्भावस्था में मैथुन का सेवन किया जाये तो खराब देहवाली, लज्जारहित, स्त्रीलंपट संतान उत्पन्न होती है।
गर्भावस्था में शोक, क्रोध एवं दुष्ट कर्मों का त्याग करना चाहिए।
गर्भवती स्त्री के लिए पथ्य आहार-विहारः
गर्भधारण होने के पश्चात् ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना चाहिए। सत्साहित्य का श्रवण एवं अध्ययन, सत्पुरुषों, आश्रमों एवं देवमंदिरों के दर्शन करना चाहिए एवं मन प्रफुल्लित रहे – ऐसी सत्प्रवृत्तियों में रत रहना चाहिए।
गर्भधारण के पश्चात् प्रथम मास में बिना औषधि का ठंडा दूध सुबह-शाम पियें। आहार प्रकृति के अनुकूल एवं हितकर करें। दूध भात उत्तम आहार है।
दूसरे मास में मधुर औषधि जैसे कि जीवंति, मुलहठी, मेदा, महामेदा, सालम, मुसलीकंद आदि से संस्कारित सिद्ध दूध योग्य मात्रा में पियें तथा आहार हितकर एवं सुपाच्य ले।
तीसरे मास में दूध में शहद एवं घी (विमिश्रण) डालकर पिलायें तथा हितकर एवं सुपाच्य आहार दें।
चौथे मास में दूध में एक तोला मलाई डालकर पिलायें एवं हितकर तथा सुपाच्य आहार दें।
पाँचवें मास में दूध एवं घी मिलाकर पिलायें।
छठे एवं सातवें मास में दूसरे महीने की तरह औषधियों से सिद्ध किया गया दूध दें एवं घी खिलायें।
आठवें एवं नवें मास में चावल को दूध में पकाकर, घी डालकर सुबह-शाम दो वक्त खिलायें।
इसके अलावा वातनाशक द्रव्यों से सिद्ध तेल के द्वारा कटि से जंघाओं तक मालिश करनी चाहिए। पुराने मल की शुद्धि के लिए निरुद बस्ति एवं अनुवासन बस्ति का प्रयोग करना चाहिए। नवें महीने में उसी तेल का रूई का फाहा योनि में रखना चाहिए।
शरीर में रक्त बनाने के लिए प्राणियों के खून से बनी ऐलोपैथिक केप्सूल अथवा सिरप लेने के स्थान पर सुवर्णमालती, रजतमालती एवं च्यवनप्राश का रोज सेवन करना चाहिए एवं दशमूल का काढ़ा बनाकर पीना चाहिए।
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नवजात शिशु का स्वागत:
शिशु के जन्मते समय प्रसूति करनेवाली दाई बालक की नाल जल्दी से काट देती है। यह नाल माता और बच्चे के शरीर को जोड़ती है और इसी नाल द्वारा बच्चा माता के शरीर में से सभी पोषण प्राप्त करता है। यह नाल सहसा ही काट डालने से बालक के प्राण भय से आक्रांत हो जाते हैं। उसके चित्त पर भय के संस्कार गहरे होकर बिम्बित हो जाते हैं। फिर वह सम्सत जीवन भयतुर रहकर व्यतीत करता है।
पुराने विचारों की दाइयाँ तो ठीक परन्तु आज के आधुनिक वैज्ञानिक साधन-सम्पन्न, मनोविज्ञान से सुशिक्षित डॉक्टर भी यही नादानी करते जा रहे हैं। बालक के जन्मते ही तुरन्त उसकी नाल काट देते हैं। बालक के जन्मते ही तुरंत नाल काट देना अच्छा नहीं है।
बालक का जन्म होते ही, मूर्च्छावस्था दूर करने के बाद जब बालक ठीक से श्वास-प्रश्वास लेने लगे तब थोड़ी देर बाद स्वतः ही नाल में रक्त का परिभ्रमण रुक जाता है। नाल अपने-आप सूखने लगती है। तब बालक की नाभि से आठ अंगुल ऊपर रेशम के धागे से बंधन बाँध दें। जिस प्रकार बाल और बढ़े हुए नाखून काटने से कष्ट नहीं होता उसी प्रकार ऐसी सूखी हुई नाल काटने से बालक के प्राणों में क्षोभ नहीं होता और वह सुख की साँस लेता हुआ अपना जीवन आरंभ कर सकता है।
अब बंधन के ऊपर से नाल काटकर शरीर से जुड़े हुए नाल के हिस्से को गले में धागे अथवा अन्य किसी सहारे से गले में पहना दें ताकि नाल ऊपर की दिशा में रहे एवं लटके नहीं।
बालक के जन्मोपरांत प्रथम बार दूध पिलाने से पूर्व मधु और घी विषम प्रमाण में लेकर (अर्थात् घी अधिक हो, मधु कम अथवा मधु अधिक हो, घी कम) मिश्रण तैयार करें। पहले से बनवाई हुई सोने की सलाई को उस मिश्रण में डुबोकर उससे नवजात शिशु की जीभ पर ॐ लिखें।
उसके कान में ॐ शब्द का उच्चारण बड़ी ही मधुरता से करें और वैदिक मंत्र से अभिमन्त्रित करके यह मिश्रण पिला देवें। प्रथम तीन दिन तक, जब तक माता के सीने से दूध न आये, यही पिलायें।
इससे बालक प्रज्ञावान, मेधावी, तेजस्वी और ओजस्वी होता है।
स्तनपान कैसे आरंभ करें?
माँ को पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठाकर उसका दायाँ स्तन पानी से धोकर उसमें से पहले थोड़ा दूध निकलावाकर उसे निम्न मंत्र से अभिमंत्रित करके बालक को प्रथम दायाँ स्तन देना चाहिए। फिर बालक का सिर पूर्व की ओर रखकर मंत्र से अभिमंत्रित जलपूर्ण कलश की स्थापना करनी चाहिए।
मंत्रः
चत्वारः सागरास्तुभ्यं स्तनयोः क्षीरवाहिणः।
भवन्तु सुभगे नित्यं बालस्य बल वृद्धये।।
पयोऽमृतररसं पीत्वा कुमारस्ते शुभानने।
दीर्घमायुरवाप्नोतु देवाः प्राश्यामृत यथा।।
अर्थात् 'हे उत्तम भाग्यशालिनी स्त्री! इस बालक के विकास के लिए चारों समुद्र हमेशा तेरे स्तनों में दूध बहानेवाले हों। हे सुंदर मुखवाली स्त्री! जिस प्रकार देवताओं ने अमृत का रस पीकर लंबी आयु को पाया है वैसे ही यह बालक अमृत जैसे रस वाला तेरा दूध पीकर लंबी आयु प्राप्त करे
श्रेष्ठ पुत्र या पुत्री प्राप्ति के लिए ज्योतिष अनुसार गर्भाधान का तरीका
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जानिए अपनी जन्म कुंडली से गर्भाधान काल के योग—–
जन्म कुंडली में त्रिकोण भावों को सबसे शक्तिशाली माना जाता है। लग्न व्यक्तित्व व व्यक्ति के स्वास्थ्य का भाव है। पंचम भाव बुद्धि, संतान तथा निर्णय क्षमता से संबंध रखता है। नवम भाव भाग्य का है। यह धर्म व चिंतन का भाव भी है। इन्हीं तीनों भावों को ‘त्रिकोण’ कहा जाता है। तंत्र-साहित्य में ‘त्रिकोण’ निर्माण तथा सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है।
पंचम भाव संतान का है तथा इसका कारक बृहस्पति है।
जातक के जीवन में संतान तथा भाग्य से इस भाव का गहरा संबंध है। बृहस्पति इसका कारक इसलिए है क्योंकि उसकी यहाँ उपस्थिति अपनी स्थिति व दृष्टि से त्रिकोण पर पूर्ण प्रभाव रखती है।
फलित-ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है ‘भावात् भावम्’। अर्थात भाव से भाव तक।
जिस भाव पर विचार करना है, उसे लग्नवत मानकर विभिन्न भावों पर विचार। पंचम भाव से पंचम अर्थात नवम भाव भी संतान विचार में महत्वपूर्ण है।
यों तो संतान योग जातक की जन्मकुंडली में जैसा भी विद्यमान हो उस अनुसार प्राप्त हो ही जाता है फ़िर भी कुछ प्रयासों से मनचाही संतान प्राप्त की जा सकती है. यानि प्रयत्न पूर्वक कर्म करने से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है. विवाहोपरांत दंपति को संतान प्राप्ति की प्रबल उत्कंठा होती है. आज जब लडकियां भी पढ लिखकर काफ़ी उन्नति कर रही हैं तो भी अधिकांश दंपतियों की दबे छुपे मन में पुत्र संतान ही प्राप्त करने की इछ्छा रखते हैं.
भारतीय धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि बिना पुत्र सन्तान के मुक्ति असम्भव है। जीवन का महत्त्वपूर्ण सुख सन्तान सुख है। पितृ ऋण चुकाने हेतु भी सन्तान उत्पत्ति आवश्यक है।
किसी जातक को सन्तान सुख प्राप्त होगा या नहीं, इसके लिए ज्योतिष एक आधार प्रस्तुत करता है।
स्त्रियों के मासिक धर्म प्रारम्भ से 16 रात्रि तक ऋतुकाल कहा गया है। इसकी प्रारंभिक चार रात्रि गर्भाधान के लिए त्याज्य मानी गई हैं। इसके बाद की 12रात्रियां गर्भधारण करने के लिए उपयुक्त मानी गई हैं।
यदि स्त्री एवं पुरुष का संगम सम रात्रियों 6, 8, 10, 12, 14, 16 में हो तो ये पुत्र सुख देने वाली हैं तो विषम रात्रियां 5, 7, 9, 11, 13, 15 में स्त्री एवं पुरुष का संगम हो तो कन्या सन्तान की उत्पत्ति होती है।
गर्भाधान के लिए क्या आवश्यक?
गर्भाधान के लिए पंचम भाव एवं पंचमेश की शक्ति की परख या परीक्षण आवश्यक है। इसी शक्ति के आधार पर प्रजनन क्षमता का पता लगाया जाता है।
पुरुष की कुण्डली के पंचम भाव से बीज एवं स्त्री की कुण्डली के पंचम भाव से क्षेत्र की क्षमता बताई जाती है।
जब बीज और क्षेत्र दोनों का कमजोर सम्बन्ध बने तो सन्तान सुख की प्राप्ति कमजोर ही रहती है।
इस स्थिति में अनुकूल ग्रह स्थितियां ही गर्भाधान कराती हैं।
मंगल एवं चन्द्र के कारण स्त्रियों को रजोधर्म रहता है। यदि स्त्री की जन्म राशि से चन्द्रमा अनुपचय स्थानों से गोचर करे एवं उस चन्द्र पर मंगल की दृष्टि हो तो स्त्री गर्भ धारण करने में सक्षम होती है। इसी प्रकार पुरुष की जन्म राशि से चन्द्र उपचय स्थानों से गोचर करे एवं उस पर बृहस्पति एवं शुक्र की दृष्टि हो तो गर्भधारण हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि पुरुष एवं स्त्री की जन्म कुण्डली से उपरोक्त ग्रह स्थितियां गोचरवश बन रही हों। पंचमेश एवं पंचम भाव शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो संभावना अधिक हो जाती है।
ग्रहों में चन्द्र को जल एवं मंगल को रक्त व अग्नि का कारक माना जाता है। चन्द्र रक्त में श्वेत रुधिर कणिकाओं एवं मंगल लाल रुधिर कणिकाओं का नेतृत्व करता है। जब चन्द्र एवं मंगल की परस्पर दृष्टि बने या सम्बन्ध बने तब रजोधर्म होता है। रजोधर्म काल में यदि उपरोक्त स्थितियां बन रही हों तो लेकिन पुरुष से संगम न हो, स्त्री अधिक आयु या कम आयु की हो, किसी रोग से ग्रस्त हो या बांझ हो तो उसे गर्भधारण नहीं होता है।
यह जान लें कि सन्तान के लिए स्त्रियों में XX गुणसूत्र व पुरुषों में XY गुणसूत्र रहते हैं। सम राशियां स्त्री कारक एवं विषम राशियां पुरुष कारक होती हैं।
अतः स्त्रियों में रजोधर्म कारक चन्द्र मंगल एवं पुत्रकारक गुरु का सम राशि में बली होकर स्थित होना XX गुणसूत्र को बलवान बनाता है। पुरुषों की कुण्डली में इसी प्रकार से चन्द्र, शुक्र एवं प्रजनन कारक सूर्य का विषम राशि में बलवान होकर स्थित होना XY गुणसूत्र को बली बनाता है। यदि बीज एवं क्षेत्राकारक बली हो एवं किसी प्रकार का दोष न हो व गर्भाधान के लिए उपयुक्त ग्रह स्थितियां गोचरवश बन रही हों तो गर्भाधान हो जाता है।
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———-गर्भाधान के समय व्यय भाव का स्वामी शुभ ग्रहों की संगति तथा प्रभाव में हो तथा चंद्रमा केन्द्र या त्रिकोण भाव में हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है। लग्न पर सूर्य का प्रभाव हो तो बच्चे व माता दोनों सुरक्षित रहते हैं। गर्भाधान के समय रवि लग्न, तृतीय, पंचम या नवम भाव में हो तथा इनके स्वामी से एक भी संबंध हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है तथा भाग्यशाली व दीर्घायु मानव जन्म होता है।
—— पंचम लग्न या एकादश भाव पर प्रसव के समय मंगल व शनि का प्रभाव हो, या इन भावों के स्वामी इन ग्रहों के प्रभाव में हों तब शल्य क्रिया से संतान का जन्म होता है।
——–भारतीय ज्योतिष ने संतान संख्या, संतान का लिंग, संतानोत्पत्ति के समय स्त्री के आसपास का वातावरण, पिता की स्थिति, गर्भाधान के समय माता-पिता की मनःस्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इसके लिए जन्म कुंडली के साथ सप्तमांश व नवांश कुंडली के विभिन्न योगों का फलित ग्रंथों में विस्तार से वर्णन है।
——- ‘गर्भपात’ संतान चाहने वाले दंपतियों के लिए एक दुःखद स्थिति है। इसके अतिरिक्त समय से पूर्व अविकसित प्रसव भी कष्टदायक है। फलित ज्योतिष ने इस विषय पर भी प्रकाश डाला है।
——- लग्न या सप्तमांश कुंडली के पंचम भाव पर राहु एवं मंगल का संयुक्त प्रभाव बार-बार गर्भपात करवाता है।
—–गर्भपात के समय पंचम भाव पाप-कर्तरी योग में हो या पंचम भाव या उसका स्वामी राहु-मंगल के संयुक्त प्रभाव में हो तब भी गर्भपात की स्थिति बन सकती है। गर्भाधान के समय लग्नव चंद्र लग्न के स्वामी ग्रहों का गोचरीय षडाष्टक योग हो तथा चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो तो भी गर्भपात होता है। 6 एवं 8 वें भाव के स्थायी ग्रह की अंतरदशा या प्रत्यंतर दशा में गर्भाधान न ही करें तो सुखद होगा।
——–गर्भाधान के समय केंद्र एवम त्रिकोण मे शुभ ग्रह हों, तीसरे छठे ग्यारहवें घरों में पाप ग्रह हों, लग्न पर मंगल गुरू इत्यादि शुभ कारक ग्रहों की दॄष्टि हो, विषम चंद्रमा नवमांश कुंडली में हो और मासिक धर्म से सम रात्रि हो, उस समय सात्विक विचार पूर्वक योग्य पुत्र की कामना से यदि रति की जाये तो निश्चित ही योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है. इस समय में पुरूष का दायां एवम स्त्री का बांया स्वर ही चलना चाहिये, यह अत्यंत अनुभूत और अचूक उपाय है जो खाली नही जाता. इसमे ध्यान देने वाली बात यह है कि पुरुष का जब दाहिना स्वर चलता है तब उसका दाहिना अंडकोशः अधिक मात्रा में शुक्राणुओं का विसर्जन करता है जिससे कि अधिक मात्रा में पुल्लिग शुक्राणु निकलते हैं. अत: पुत्र ही उत्पन्न होता है.
——-यदि पति पत्नि संतान प्राप्ति के इच्छुक ना हों और सहवास करना ही चाहें तो मासिक धर्म के अठारहवें दिन से पुन: मासिक धर्म आने तक के समय में सहवास कर सकते हैं, इस काल में गर्भादान की संभावना नही के बराबर होती है.
——-तीन चार मास का गर्भ हो जाने के पश्चात दंपति को सहवास नही करना चाहिये. अगर इसके बाद भी संभोग रत होते हैं तो भावी संतान अपंग और रोगी पैदा होने का खतरा बना रहता है. इस काल के बाद माता को पवित्र और सुख शांति के साथ देव आराधन और वीरोचित साहित्य के पठन पाठन में मन लगाना चाहिये. इसका गर्भस्थ शिशि पर अत्यंत प्रभावकारी असर पदता है,
——-यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करें, राहु बाधक हो तो क्न्यादान से, केतु बाधक हो तो गोदान से, शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं.
———-आधानकाल में जिस द्वादशांश में चन्द्रमा हो उससे उतनी ही संख्या की अगली राशि में चन्द्रमा के जाने पर बालक का जन्म होता है। आधान काल में शुक्र, रवि, चन्द्रमा और मंगल अपने-अपने नवमांश में हों गुरू, लग्न अथवा केन्द्र या त्रिकोण में हों तो वीर्यवान पुरुष को निश्चय ही सन्तान प्राप्त होती है।
———यदि मंगल और शनि सूर्य से सप्तम भाव में हांे तो वे पुरुष के लिये तथा चन्द्रमा से सप्तम में हों तो स्त्री के लिये रोगप्रद होते हैं। सूर्य से 12, 2 में शनि और मंगल हों तो पुरुष के लिये और चन्द्रमा से 12-2 में ये दोनों हों तो स्त्री के लिये घातक योग होता है अथवा इन शनि, मंगल में से एक युत और अन्य से दृष्ट रवि हो तो वह पुरुष के लिये और चन्द्रमा यदि एक से युत तथा अन्य से दृष्ट हो तो स्त्री के लिये घातक होता है।
———दिन में गर्भाधान हो तो शुक्र, मातृग्रह और सूर्य पितृग्रह होते हैं। रात्रि में गर्भाधान हो तो चन्द्रमा मातृग्रह और शनि पितृग्रह होते हैं। पितृग्रह यदि विषम राशियों में हो तो पिता के लिये और मातृग्रह सम राशि में हो तो माता के लिये शुभ कारक होता है।
———यदि पापग्रह बारहवें भाव में स्थित होकर पापग्रहों से देखा जाता हो और शुभ ग्रहों से न देखा जाता हो, अथवा लग्न में शनि हो तथा उस पर क्षीण चन्द्रमा और मंगल की दृष्टि हो, तो उस समय गर्भाधान होने से स्त्री का मरण होता है। लग्न और चन्द्रमा दोनों या उनमें से एक भी दो पापग्रहों के बीच में हो तो गर्भाधान होने पर स्त्री गर्भ के सहित मृत्यु को प्राप्त होती है।
——–लग्न अथवा चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान में पापग्रह हो, मंगल अष्टम भाव में हो अथवा लग्न से 4-12वें स्थान में मंगल और शनि हों तथा चन्द्रमा क्षीण हो तो गर्भवती स्त्री का मरण होता है। गर्भाधान काल में मास का स्वामी अस्त हो, तो गर्भ का स्त्राव होता है, इसलिये इस प्रकार के लग्न को गर्भाधान हेतु त्याग देना चाहिये।
————यदि धनु राशि का अंतिम नवांश लग्न हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों और बलवान बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिये। है। उक्त सभी ग्रह यदि सम राशि और सम नवमांश में हों अथवा मंगल चन्द्रमा और शुक्र ये समराशि में हों तो विद्वजनों को कन्या का जन्म समझना चाहिये। ये सब द्विस्वभाव राशि में हों और बुध से देखे जाते हों तो अपने-अपने पक्ष के यमल (जुड़वी सन्तान) केे जन्म कारक होते हैं अर्थात् पुरुष ग्रह दो पुत्रों के और स्त्री ग्रह दो कन्याओं के जन्मदायक होते हैं।
———यदि दोनों प्रकार के ग्रह हों तो एक पुत्र और एक कन्या का जन्म समझना चाहिये। लग्न में विषम (3-5 आदि) स्थानों में स्थित शनि भी पुत्र जन्म का कारक होता है। क्रमशः विषम एवं समराशि में स्थित रवि और चन्द्रमा अथवा बुध और शनि एक दूसरे को देखते हों, अथवा सम राशिस्थ सूर्य को विषम राशिस्थ लग्न एवं चन्द्रमा पर मंगल की दृष्टि हो, अथवा चन्द्रमा समराशि और लग्न विषम राशि में स्थित हो तथा उन पर मंगल की दृष्टि हो अथवा लग्न चन्द्रमा और शुक्र ये तीनों पुरुष राशियों के नवमांश में हों तो इन सब योगों में नपुंसक का जन्म होता है। शुक्र और चन्द्रमा सम राशि में हो तथा बुध मंगल लग्न और बृहस्पति विषम राशि में स्थित होकर पुरुष ग्रह से देखे जाते हों अथवा लग्न एवं चन्द्रमा समराशि में हो या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं।
———–यदि बुध अपने (मिथुन या कन्या के) नवमांश में स्थित होकर द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह और लग्न को देखता हो तो गर्भ में तीन सन्तान की स्थिति समझनी चाहिये। उनमें से दो तो बुध नवमांश के सदृश होंगे और एक लग्नांश के सदृश्य। यदि बुध और लग्न दोनांे तुल्य नवमांश में हों तो तीनों सन्तानों को एक-सा ही समझना चाहिये। यदि धनु राशि का अंतिम नवांश लग्न हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों और बलवान बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिये। या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं।
———यदि बुध अपने (मिथुन या कन्या के) नवमांश में स्थित होकर द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह और लग्न को देखता हो तो गर्भ में तीन सन्तान की स्थिति समझनी चाहिये। उनमें से दो तो बुध नवमांश के सदृश होंगे और एक लग्नांश के सदृश्य। यदि बुध और लग्न दोनांे तुल्य नवमांश में हों तो तीनों सन्तानों को एक-सा ही समझना चाहिये। यदि धनु राशि का अंतिम नवांश लग्न हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों और बलवान बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिये।
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गर्भ मासों के अधिपति:——-
शुक्र, मंगल, बृहस्पति, सूर्य, चन्द्रमा, शनि, बुध, आधान-लग्नेश, सूर्य, और चन्द्रमा ये गर्भाधान काल से लेकर प्रसव पर्यन्त दस मासों के क्रमशः स्वामी हैं। आधान समय में जो ग्रह बलवान या निर्बल होता है, उसके मास में उसी प्रकार शुभ या अशुभ फल होता है। बुध त्रिकोण (5-6) में हो और अन्य ग्रह निर्बल हो तो गर्भस्थ शिशु के दो मुख, चार पैर, और चार हाथ होते हैं। चन्द्रमा वृष में और अन्य सब पाप ग्रह राशि संधि में हों तो बालक गंूगा होता है। यदि उक्त ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और हाथ से रहित रहता है तो वह बालक अधिक दिनों में बोलता है।
———–मंगल और शनि यदि बुध की राशि नवमांश में हों तो शिशु गर्भ में ही दांतांे से युक्त होता है। चन्द्रमा कर्क राशि में होकर लग्न में हो तथा उस पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो गर्भस्थ शिशु कुबड़ा होता है। मीन राशि लग्न में हो और उस पर शनि, चन्द्रमा, तथा मंगल की दृष्टि हो तो गर्भ का बालक पंगु होता है।
——–पापग्रह और चन्द्रमा राशि संधि में हों और उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो गर्भस्थ शिशु जड़-बुद्धि (मूर्ख) होता है। मकर का अन्तिम अंश लग्न मे हो और उस पर शनि चन्द्रमा तथा सूर्य की दृष्टि हो तो गर्भ का बच्चा वामन (बौना) होता है। पंचम तथा नवम लग्न के द्रेष्काण में पापग्रह हो तो जातक क्रमशः पैर, मस्तक और हाथ से रहित रहता है।
——–गर्भाधान के समय यदि सिंह लग्न में सूर्य और चन्द्रमा हों तथ उन पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो शिशु नेत्रहीन अथवा नेत्रविकार से युक्त होता है। यदि शुभ और पापग्रह दोनों की दृष्टि हो तो आंख में फूला होती है। यदि लग्न से बाहरवें भाव में चन्द्रमा हो तो बालक के वाम नेत्र, सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र में कष्ट होता है। अशुभ योगों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो उन योगों के फल परिवर्तित होकर सम हो जाते हैं।
जन्म कुंडली में त्रिकोण भावों को सबसे शक्तिशाली माना जाता है। लग्न व्यक्तित्व व व्यक्ति के स्वास्थ्य का भाव है। पंचम भाव बुद्धि, संतान तथा निर्णय क्षमता से संबंध रखता है। नवम भाव भाग्य का है। यह धर्म व चिंतन का भाव भी है। इन्हीं तीनों भावों को 'त्रिकोण' कहा जाता है। तंत्र-साहित्य में 'त्रिकोण' निर्माण तथा सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है।
पंचम भाव संतान का है तथा इसका कारक बृहस्पति है। जातक के जीवन में संतान तथा भाग्य से इस भाव का गहरा संबंध है। बृहस्पति इसका कारक इसलिए है क्योंकि उसकी यहाँ उपस्थिति अपनी स्थिति व दृष्टि से त्रिकोण पर पूर्ण प्रभाव रखती है।
फलित-ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है 'भावात् भावम्'। अर्थात भाव से भाव तक। जिस भाव पर विचार करना है, उसे लग्नवत मानकर विभिन्न भावों पर विचार। पंचम भाव से पंचम अर्थात नवम भाव भी संतान विचार में महत्वपूर्ण है। नवम से नवम अर्थात पंचम भाव का भी भाग्य से गहरा संबंध है। पंचम को लग्नवत माना जाए तो लग्न भाग्यस्थान तथा भाग्यभाव से लग्न संतान का भाव है। स्वास्थ, संतान तथा भाग्य एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं।
संतान भाग्य से ही प्राप्त होती है। स्वस्थ संतान के लिए माता-पिता का स्वास्थ्य भी महत्वपूर्ण है। चंद्र, मंगल, रवि एवं बृहस्पति 'गर्भाधान' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, बशर्ते कुंडली में संतान प्राप्ति के योग हों। चंद्रमा तिथि, रवि माह तथा बृहस्पति गर्भाधान का वर्ष बताता है। शनि एवं बृहस्पति की दशा गर्भ को पुष्ट करती है।
स्त्री के मासिक धर्म का संबंध चंद्रमा के भ्रमण तथा मंगल के प्रभाव से है। जन्म कालीन चंद्रमा से 3, 6, 10 या 11वें भाव में चंद्रमा हो तथा मंगल से संबंध हो तब का मासिक धर्म 'गर्भ धारण' का कारण बन सकता है। स्त्री व पुरुष की चंद्र राशि से प्रथम, पंचम, सप्तम या एकादश भाव में गोचरस्थ शनि व बृहस्पति गर्भ की स्थिति निर्मित करते हैं। लग्न से पंचम या नवम भाव से शनि तथा पंचम भाव से बृहस्पति का गोचर गर्भधारण करवा सकता है। मंगल-शुक्र की परस्पर युति या पूर्ण दृष्टि संबंध तथा उसका लग्न, पंचम या एकादश भाव से संबंध गर्भधारण की स्थिति निर्मित करता है।
फलित ज्योतिष में गर्भाधान के अनेक योगों का उल्लेख आया है। इसी तरह गर्भ के सुरक्षित या पुष्ट होने के योग भी प्राप्त होते हैं। गर्भाधान के समय व्यय भाव का स्वामी शुभ ग्रहों की संगति तथा प्रभाव में हो तथा चंद्रमा केन्द्र या त्रिकोण भाव में हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है। लग्न पर सूर्य का प्रभाव हो तो बच्चे व माता दोनों सुरक्षित रहते हैं। गर्भाधान के समय रवि लग्न, तृतीय, पंचम या नवम भाव में हो तथा इनके स्वामी से एक भी संबंध हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है तथा भाग्यशाली व दीर्घायु मानव जन्म होता है।
पंचम लग्न या एकादश भाव पर प्रसव के समय मंगल व शनि का प्रभाव हो, या इन भावों के स्वामी इन ग्रहों के प्रभाव में हों तब शल्य क्रिया से संतान का जन्म होता है। भारतीय ज्योतिष ने संतान संख्या, संतान का लिंग, संतानोत्पत्ति के समय स्त्री के आसपास का वातावरण, पिता की स्थिति, गर्भाधान के समय माता-पिता की मनःस्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इसके लिए जन्म कुंडली के साथ सप्तमांश व नवांश कुंडली के विभिन्न योगों का फलित ग्रंथों में विस्तार से वर्णन है। 'गर्भपात' संतान चाहने वाले दंपतियों के लिए एक दुःखद स्थिति है। इसके अतिरिक्त समय से पूर्व अविकसित प्रसव भी कष्टदायक है। फलित ज्योतिष ने इस विषय पर भी प्रकाश डाला है।
लग्न या सप्तमांश कुंडली के पंचम भाव पर राहु एवं मंगल का संयुक्त प्रभाव बार-बार गर्भपात करवाता है। गर्भपात के समय पंचम भाव पाप-कर्तरी योग में हो या पंचम भाव या उसका स्वामी राहु-मंगल के संयुक्त प्रभाव में हो तब भी गर्भपात की स्थिति बन सकती है। गर्भाधान के समय लग्नव चंद्र लग्न के स्वामी ग्रहों का गोचरीय षडाष्टक योग हो तथा चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो तो भी गर्भपात होता है। 6 एवं 8 वें भाव के स्थायी ग्रह की अंतरदशा या प्रत्यंतर दशा में गर्भाधान न ही करें तो सुखद होगा।
प्रथम भाव का कमजोर होना तथा पंचम भाव पर राहु तथा व्यय पर शनि का प्रभाव 'गर्भ' को कमजोर करता है। पंचम व सप्तम भाव में पापग्रह तथा अष्टम भाव पर मंगल का प्रभाव गर्भपात करवा सकता है।
ज्योतिष की अपनी सीमाएँ हैं। वह केवल मार्गदर्शन कर सकता है। ग्रहजनित पीड़ा के उपाय बता सकता है लेकिन भाग्य तो भाग्य है। मार्गदर्शन व भावी संभावना का आभास देकर ज्योतिष गर्भपात को रोकने में मदद कर सकता है। यही कारण है कि भारत में संतानोत्पत्ति एक प्रमुख संस्कार है तथा इसके लिए विधिवत मुहूर्त की व्यवस्था भी है।
गर्भपात अगर ग्रहों के गोचर व दशाओं के कारण संभावित है तो उसे रोका जा सकता है। सर्वप्रथम डॉॅक्टर की सलाह मानें। पंचम भाव के स्वामी तथा बृहस्पति का रत्न धारण करें। संतानोत्पत्ति कार्य को धर्म व उद्देश्य मानें तथा संयोग के समय मन में किसी तरह के कुविचार वअशांति न लाएँ। बहुधा लड़ाई-झगड़ों का अंत शैया पर होता है तथा इससे जो संतान भविष्य में आएगी, उस पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। बार-बार गर्भपात की स्थिति में चांदी के सर्प का पूजन करें। संतान गोपाल महामंत्र का निरंतर जप करें। श्रीकृष्ण का पूजन मन को शांति देता है। आगे भगवदिच्छा गरीयसी।
ज्योतिष में गर्भाधान काल
(उत्तम संतान प्राप्त योग)- पूर्णलेख पढे।नए वैवाहिक जोड़ो के लिए उत्तम।
पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज से मन सहित जीव (जीवात्मा) का संयोग जिस समय होता है उसे गर्भाधान काल कहते हैं।
वीर्य, रज, जीव और मन का संयोग ही गर्भ है:-
गर्भ उत्पत्ति की संभावना का योग
जब स्त्री की जन्म राशि से अनुपचय (1, 2, 4, 5, 7, 8, 9, 12) स्थान में गोचरीय चंद्रमा मंगल द्वारा दृष्ट हो, उस समय स्त्री की रज प्रवृत्ति हो तो ऐसा रजो दर्शन गर्भाधान का कारण बन सकता है अर्थात गर्भाधान संभव होता है।
किसी अच्छे ज्योतिषी से गर्भाधान का मुहूर्त निकलवाना चाहिए। यही हमारी संस्कृति का प्राचीन नियम है।शुभ मुहूर्त में गर्भाधान संस्कार करने से सुंदर, स्वस्थ, तेजस्वी, गुणवान, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली और दीर्घायु संतान का जन्म होता है। इसलिए इस प्रथम संस्कार का महत्व सर्वाधिक है।
उत्तम संतान प्राप्ति योग
शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि से कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि तक चंद्रमा को शास्त्रकारों ने पूर्णबली माना है। शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की कलाऐं जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे स्त्री-पुरुषों के मन में प्रसन्नता और काम-वासना बढ़ती है।
जिस समय आपकी राशि से गोचर का चंद्रमा चैथा, आठवां बारहवां न हो तब गोचरीय चंद्रमा रश्मियुक्त शुक्र अथवा गुरु या (सूर्य से (दृष्ट) )से दृष्टि या युति संबंध होता है, यह मुहूर्त अनुभव सिद्ध है।
यह आधार अगर राशि से न मिले तो गर्भाधान की लग्न व विषम श्रेष्ठ रात्रि संतान प्राप्ति
यज्ञ के साथ सम्मलित ही श्रेष्ठ संतान रत्न की प्राप्ति कराती है
ज्योतिष में जीव (गुरु) को गर्भोत्पत्ति का प्रमुख कारक माना है।
पुरुष की जन्म राशि से उपचय (3, 6,10,11) स्थानों में चंद्र गोचर हो और उसे संतान कारक गुरु देखे तो पुरुष को गर्भाधान में प्रवृत्त होना चाहिए।
पुरुष की जन्म राशि से 2, 5, 9वें स्थान में जब गुरु गोचर करता है तब वह गर्भाधान करने में सफल होता है। क्योंकि 2 स्थान का गुरु 6,10चन्द्र को और तथा पंचम स्थान स्थित गुरु 11वें चंद्रमा को और नवम भाव का गुरु तृतीय भाव स्थित चंद्रमा को देखेगा। द्वितीय पंचम नवम गुरु से गर्भाधान की संभावना का स्थूल आकलन किया जाता है।
पुरुष की जन्म राशि से 3, 5, 9, 11वें स्थान में सूर्य का गोचर हो तो गर्भाधान की संभावना रहती है।
गर्भाधान के समय लग्न, सूर्य, चंद्र व गुरु बलवान होकर विषम राशि व विषम नवांश में हो तो पुत्र जन्म होता है। यदि ये सब या इनमें से अधिकांश ग्रह सम राशि व सम नवांश में हो तो पुत्री का जन्म होता है।
गर्भाधान संस्कार हेतु अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाती, अनुराधा, तीन उत्तरा, धनिष्ठा, रेवती नक्षत्र प्रशस्त है।
वैधृति, व्यतिपात, मृत्यु योग, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा व सूर्य संक्रांति काल गर्भाधान हेतु वर्जित है।
गर्भाधान संस्कार हेतु स्त्री (पत्नी) की जन्म राशि से चंद्र बल शुद्धि आवश्यक है। जन्म राशि से 4, 8, 12 वां गोचरीय चंद्रमा त्याज्य है। नीच या शत्रु राशि (पूर्ण फल के लिए) का चंद्रमा भी त्याज्य है। जन्म लग्न से अष्टम राशि का लग्न त्याज्य है।
प्रत्येक पशु पक्षी भी किसी विशेष ऋतु काल में ही समागम करते हैं। किंतु स्वयं को सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहने वाला मनुष्य आज भूल गया है कि उसे गर्भाधान कब करना चाहिए और कब नहीं।
श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न संतान प्राप्ति का भारतीय मनीषियों के पास एक पूरा जन्म विज्ञान था। उनके पास ऐसे अनेक प्रयोग थे फलतः उन्हें मनोवांछित संतान की प्राप्ति हो जाती थी।
1. जिस दिन स्त्री को रजस्राव (रजोदर्शन) शुरू होता है वह उसके मासिक धर्म का प्रथम दिन/रात कही जाती है। स्त्री के मासिक धर्म के प्रथम दिन से लेकर सोलहवें दिन तक का स्वाभाविक ऋतुकाल माना गया है। ऋतुकाल में ही गर्भाधान करें।
कड़वी, खट्टी, तीखी, उष्ण वस्तुओं का सेवन न करके पांच दिन तक मधुर सेवन करें।
2. ऋतुकाल की प्रथम चार रात्रियां रोगकारक होने के कारण निषिद्ध हैं। इसी तरह ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी निंदित है। अतः इन छः रात्रियों को छोड़कर शेष दस रात्रियों में ही गर्भाधान करें। इन दस रात्रियों में भी यदि कोई पर्व-व्रतादि हो तो भी समागम न करें।
3. उपरोक्त विधि से चयन की गई रात्रियों के अलावा शेष समय पति-पत्नी संयम से रहें। क्योंकि ब्रह्मचारी का वीर्य ही श्रेष्ठ होता है, कामी पुरूषों का नहीं और श्रेष्ठ बीजों से ही श्रेष्ठ फलों की उत्पत्ति होती है।
4. गर्भाधान हेतु ऋषियों ने रात्रि ही महत्वपूर्ण मानी है। अतः रात्रि के द्वितीय प्रहर (10 से 1 बजे) में ही समागम करें। दिन में यौन संपर्क स्थापित से प्राण क्षीण होते हैं’। इसी उपनिषद में प्रदोष काल अर्थात् गोधूली बेला भी यौन संपर्क हेतु निषिद्ध कही गई है
5. शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ तथा निरोगी, बुद्धिमान और श्रेष्ठ संतान चाहने वाली दंपत्ति को चाहिए कि वह गर्भकाल/गर्भावस्था में यौन संपर्क कदापि न करें। अन्यथा होने वाली संतान जीवन भर काम वासना से त्रस्त रहेगी तथा उसे किसी भी प्रकार का शारीरिक मानसिक रोग/विकृति हो सकती है।
6. संस्कारवान और सच्चरित्र संतान की कामना वाली गर्भवती स्त्री को चाहिए वह गर्भावस्था के दौरान काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, द्वेष आदि विकारों का परित्याग कर दे। शुभ आचरण करें और प्रसन्नचित रहें।
किस रात्रि के गर्भ से कैसी संतान होगी
चोथी रात्रि में गर्भधारण करने से जो पुत्र पैदा होता है, वह अल्पायु, गुणों से रहित, दुःखी और दरिद्री होता है।
पांचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़कियां ही पैदा करेगी।
छठवीं रात्रि के गर्भ से उत्पन्न पुत्र मध्यम आयु का होगा।
सातवीं रात्रि के गर्भ से उत्पन्न कन्या अल्पायु और बांझ होगी।
आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र सौभाग्यशाली और ऐश्वर्यवान होगा।
नौवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती और ऐश्वर्यशालिनी कन्या उत्पन्न होती है।
दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर (प्रवीण) पुत्र का जन्म होता है।
ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से अधर्माचरण करने वाली चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।
बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरूषोत्तम/सर्वोत्तम पुत्र का जन्म होता है।
तेरहवीं रात्रि के गर्भ से मूर्ख, पापाचरण करने वाली, दुःख चिंता और भय देने वाली सर्वदुष्टा पुत्री का जन्म होता है। ऐसी पुत्री वर्णशंकर कोख वाली होती है जो विजातीय विवाह करती है जिससे परंपरागत जाति, कुल, धर्म नष्ट हो जाते हैं।
चोदहवीं रात्रि के गर्भ से जो पुत्र पैदा होता है तो वह पिता के समान धर्मात्मा, कृतज्ञ, स्वयं पर नियंत्रण रखने वाला, तपस्वी और अपनी विद्या बुद्धि से संसार पर शासन करने वाला होता है।
पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से राजकुमारी के समान सुंदर, परम सौभाग्यवती और सुखों को भोगने वाली तथा पतिव्रता कन्या उत्पन्न होती है।
सोलहवीं रात्रि के गर्भ से विद्वान, सत्यभाषी, जितेंद्रिय एवं सबका पालन करने वाला सर्वगुण संपन्न पुत्र जन्म लेता है।
ज्योतिषीय ग्रंथों एवं आयुर्वेद के मतानुसार पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।
यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।
👉 चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।
👉 पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।
👉 छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।
👉 सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।
👉 आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।
👉 नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।
👉 दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।
👉 ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।
👉 बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।
👉 तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।
👉 चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।
👉 पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।
👉 सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।
व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘संस्कार विधि’ में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि पूर्णरूप से की है।
दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।
2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।
प्राचीन संस्कृत पुस्तक ‘सर्वोदय’ में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।
*चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।
गर्भ स्तंबन एवं गर्भ रक्षा प्रकरण
संतान गणपति स्तोत्र
नमोस्तु गणनाथाय सिद्धी बुद्धि युताय च।
सर्वप्रदाय देवाय पुत्र वृद्धि प्रदाय च।।
गुरू दराय गुरवे गोप्त्रे गुह्यासिताय ते।
गेाप्याय गोपिताशेष भुवनाय चिदात्मनें।।
विश्व मूलाय भव्याय विश्वसृष्टि करायते।
नमो नमस्ते सत्याय सत्य पूर्णाय शुण्डिनें ।।एकदन्ताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नम : ।प्रपन्न जन पालाय प्रणतार्ति विनाशिने ।।
शरणं भव देवेश सन्तति सुदृढ़ां कुरु।
भविष्यन्ति च ये पुत्रा मत्कुले गण नायक।।ते सर्वे तव पूजार्थ विरता : स्यु : वरो मत : ।पुत्रप्रदमिदं स्तोत्रं सर्व सिद्धि प्रदायकम्।।
बटुक भैरव मन्त्र
ॐ बंभ्रंबटुक भैरवाय ॐ बालशिवाय विद्महे काली पुत्राय धीमहि तन्नो बटुक प्रचोदयात्
श्री माधवी काननस्ये गर्भरक्षांबिके पाही भक्ताम् स्थुवन्तम्। (हर श्लोक के बाद)
वापी तटे वाम भागे, वाम देवस्य देवी स्थिता त्वां,मानया वारेन्या वादानया, पाही, गर्भस्या जन्थुन तथा भक्ता लोकान ॥ १ ॥
श्री गर्भ रक्षा पुरे या दिव्या,
सौंन्दर्या युक्ता ,सुमंगलया गात्री,धात्री, जनीत्री जनानाम, दिव्या,
रुपाम ध्यारर्दाम मनोगनाम भजे तं ॥ २ ॥
आषाढ मासे सुपुन्ये, शुक्र,
वारे सुगंन्धेना गंन्धेना लिप्ता,
दिव्याम्बरा कल्प वेशा वाजा,
पेयाधी याग्यस्या भक्तस्या सुद्रष्टा ॥ ३ ॥
कल्याण धात्रीं नमस्ये, वेदी,
कंगन च स्त्रीया गर्भ रक्षा करीं त्वां,
बालै सदा सेवीथाअन्ग्रि, गर्भ
रक्षार्थ, माराधुपे थैयुपेथाम ॥४ ॥
ब्रम्होत्सव विप्र विद्ययाम वाद्य
घोषेण तुष्टाम रथेना सन्निविष्टाम्
सर्व अर्थ धात्रीं भजेअहम, देव
व्रुन्दैरा पीडायाम जगन मातरम त्वां ॥ ५ ॥
येतथ कृतम स्तोत्र रत्नम, दीक्षीथ
अनन्त रामेन देव्या तुष्टाच्यै
नित्यम् पाठयस्तु भक्तया,पुत्र-पौत्रादि भाग्यं
भवे तस्या नित्यं ॥ ६ ॥
इति श्री ब्रह्म श्री अनंत रामा दीक्षिता विरचितम् गर्भ रक्षाअम्बिका स्तोत्रं संपूर्णम्॥
संतान गोपाल संपूर्ण मंत्र
विनियोग-
अस्य गोपाल मंत्रस्य, नारद ऋषि:, अनुष्टुप छंद:, कृष्णो देवता, मम पुत्र कामनार्थ जपे विनियोग: ।
ध्यान-
विजयेन युतो रथस्थित: प्रसभानीय समुद्र मध्यत: ।
प्रददत्त नयान् द्विजन्मने स्मरणीयो वसुदेव नंदन: ।।
संतान गोपाल मंत्र-
ॐ क्लीं कृष्णाय देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते । देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ।।
यह मंत्र एक लाख बार जपने से सिद्ध होता है। मंत्र को जीवापोता, स्फटिक या रूद्राक्ष की माला से जपना चाहिए। एक लाख मंत्र पूर्ण हो जाने के बाद इसका दशांश अर्थात् 10 हजार मंत्रों से हवन करना चाहिए। हवन के पश्चात ब्राह्मणों को श्रद्धानुसार क्षमतानुसार भोजन करवाकर दान-दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त करें।
गर्भ ठहरने का मंत्र | गर्भ ठहरने का शाबर मंत्र
मंत्र- ॐ नमो आदेश गुरु का ।
जय जय जय जय जयकार।
गोरख बैठा घोरुवार।
जब लग गोरख जाप जपै।
जब लग राज विभीषण करै।
गौरा कात्या कातना।
ईश्वर बांध्या गंडा।
राखु राखु श्री हनुमंत बजरंग।
जो छिटका परता।
अंडा ढूध पूत।
ईश्वर कि माया।
पड़ता गर्भ श्री गोरखनाथ जी रखाया।
मेरी भक्ति।गुरु कि शक्ति।फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।
गर्भ ठहरने के मंत्र की विधि (इस शाबर मंत्र को कैसे करे)
इस मंत्र के जाप की शुरुआत आपको रविवार के दिन से करनी हैं. जिस रविवार से आप शुरुआत करते है. उस दिन से लेकर 41 दिन तक रोजाना इस शाबर मंत्र का जाप 108 बार करना हैं.
हनुमान गर्भ रक्षा शाबर मंत्र
मत्रः- ॐ नमो आदेश गुरू का हनुमन्त वीर गम्भीर धूजे धरती बँधावे धीर । बाँध बाँध हनुमन्ता वीर मास एक बाँधू ।
।मास दोइ बाँधू, मास तीन बाँधू । मास चार बाँधू, मास पाँच,बाँधू, मास छः बाँधू । मास सात बाँधू, मास आठ बाँधू, मास
नौ बाँधू । “अमुकी” गर्भ गिरे नहीं । ठाँह को ठाँह रहे , ठाँह का ठाँह न रहे । मेरा बाँधा बंध छटे तो ईश्वर महादेव
गोरखनाथ । जती हनुमन्त वीर लाजें मेरी भक्ति गुरू की शक्ति । फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा ।।
अमुख के स्थान पर स्त्री का नाम
विधि- काले धागे में 9 गाँठ मंत्र पढकर लगावें और 9-9 बार धूप दीप दिखाकर गर्भवति की कमर में बाँधे स्वयं सिद्ध व
हमारा अनुभूत है।विशेष -3 मंगलवार हनुमान जी को चोला अवश्य चढवायें ।।
गर्भवती महिला को अपने गर्भ की रक्षा स्वयं करना चाहिए, न कि खतरा महसूस होने पर । यदि आपका गर्भ सुरक्षित है, तब भी आप यहाँ दिए गए प्रयोग कर लाभ उठा सकती हैं।
* प्रथम मास में गर्भिणी स्त्री को मिश्री मिला दूध दोनों समय अवश्य पीना चाहिए।
* दूसरे मास में शतावरी का चूर्ण 10 ग्राम मात्रा में फाँककर ऊपर से कुनकुना गर्म मीठा दूध पीना चाहिए।
* तीसरे मास में दूध ठंडा कर 1 चम्मच घी तथा तीन चम्मच शहद डालकर पीना चाहिए। यह उपाय आठवें माह तक करें। घी व शहद समान मात्रा में लिया जाए तो जहर का काम करते हैं।
* पूरे चौथे मास में दूध में मक्खन मिलाकर सेवन करें।
* पाँचवें मास में फिर दूध में घी लिया करें।
* छठे तथा सातवें मास में फिर शतावरी चूर्ण डालकर दूध का सेवन करें।
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संतान सुख प्राप्त करने में सहायक होते हैं ये दस ज्योतिषीय उपाय
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकतर विवाहित जोड़े हमेशा संतान की इच्छा रखते हैं। घर के बड़े-बुजुर्गों के मन में भी ये कामना रहती है कि उनका वंश आगे बढ़े और वे अपने पुत्र य पुत्री की संतान को एक बार देख लें। लेकिन कई ऐसे विवाहित जोड़े होते हैं जो लाख कोशिशों के बावजूद भी संतान सुख से वंचित रह जाते हैं। वैदिक ज्योतिष में भगवान बृहस्पति को किसी भी जातक की कुंडली में संतान का कारक माना गया है। वहीं शुक्र भी यदि किसी महिला की कुंडली में कमजोर स्थिति में हो तो उस महिला को गर्भपात का दंश झेलना पड़ता है।
जीवन की दुविधा दूर करने के लिए विद्वान ज्योतिषियों से करें फोन पर बात और चैट
ऐसे में आज हम आपको इस लेख में संतान सुख प्राप्त करने के कुछ ज्योतिषीय उपाय बताने वाले हैं।
पहला उपाय
बृहस्पतिवार के दिन व्रत रखें। फलाहार पर रहें। भगवान विष्णु की पूजा करें और नमक व अन्न ग्रहण न करें। सेंधा नमक का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे भगवान बृहस्पति प्रसन्न होंगे और कुंडली में उनकी स्थिति मजबूत होगी।
दूसरा उपाय
महीने के शुक्ल पक्ष में बरगद के पत्ते को धोकर उस पर कुमकुम से स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं। इसके बाद इस पर चावल और सुपारी रखकर किसी मंदिर में सूर्यास्त से पहले भगवान को अर्पित करें। भगवान को प्रणाम कर अपनी समस्या बताएं। आपकी समस्या जरूर दूर होगी।
तीसरा उपाय
कभी कभी ऐसा होता है कि पूर्वजों के श्राद्ध के दौरान कुछ अनुष्ठान सही ढंग से नहीं हो पाते हैं। इससे पितृ दोष पैदा होता है जिसकी वजह से भी संतान प्राप्ति में समस्या आती है। ऐसे में जातकों पूर्वजों का विधिपूर्वक श्राद्ध कर पितृ दोष का उपाय करना चाहिए। इससे आपकी समस्या खत्म होगी।
चौथा उपाय
ऐसी महिलाएं जो संतान सुख से वंचित हैं, उन्हें गर्भ गौरी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। इस रुद्राक्ष के दो भाग होते हैं जिसमें से पहला भाग दूसरे भाग से बड़ा होता है। इस रुद्राक्ष का पहला भाग माता पार्वती का प्रतीक है जबकि दूसरा उनके पुत्र भगवान गणेश का। इस रुद्राक्ष को धारण करने से आपको जल्द संतान की प्राप्ति होगी। इस रुद्राक्ष को पूजा घर में स्थापित कर 108 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करने से भी संतान संबंधी समस्या का निवारण होता है।
पांचवा उपाय
बृहस्पतिवार के दिन पीले रंग के धागे में केले का जड़ पिरोकर गले में धारण करने से भी संतान संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिलता है। अगर केले का जड़ न मिले तो आप पपीते का जड़ भी धारण कर सकते हैं।
छठा उपाय
सनातन धर्म में एकादशी का बड़ा महत्व है। साल में कुल 24 एकादशी पड़ती है जिसमें से पुत्रदा एकादशी करने से जातकों की संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है। इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। ध्यान रखें कि इस व्रत के नियम दशमी की संध्या से शुरू होकर द्वादशी के पारण मुहूर्त तक पालन करने होते हैं।
सातवां उपाय
बृहस्पतिवार के दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करें। इसके साथ ही इस दिन गरीब व जरूरतमंद लोगों को पीले रंग की वस्तुओं का दान करें। सुबह उठकर घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लें। इससे कुंडली में बृहस्पति की स्थिति बेहतर होगी।
आठवां उपाय
भगवान कृष्ण के बाल रूप को बाल गोपाल के नाम से जाना जाता है। ऐसे जातक जो संतान सुख प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें बाल गोपाल की पूजा जरूर करनी चाहिए। घर के मंदिर में बाल गोपाल की प्रतिमा स्थापित कर रोज उनकी पूजा करें।
नौवां उपाय
ऐसी महिलाएं जिन्हें गर्भपात की समस्या होती है उन्हें कुंडली में शुक्र को मजबूत करने के उपाय करने चाहिए। शुक्र को प्रसन्न करने के लिए शुक्रवार को व्रत रखें। साथ ही शुक्रवार के दिन सफ़ेद या गुलाबी वस्त्र धारण करने से भी शुक्र देवता प्रसन्न होते हैं। कन्या पूजन करें। साथ ही उन्हें भोजन कराने के बाद कुछ दान देकर विदा करें। शुक्र की स्थिति कुंडली में बेहतर होगी।
दसवां उपाय
मां दुर्गा के नौ रूपों में से एक रूप स्कंदमाता का है। माँ स्कंदमाता शेर पर सवार रहती हैं और उनकी गोद में भगवान कार्तिकेय विराजमान हैं। माता स्कंदमाता की पूजा से मातृत्व सुख प्राप्त होता है। माँ स्कंदमाता का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस मंत्र का जाप करें-
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रित करद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।