ज्योतिष: #विज्ञान की #माँ

#Astrology The Mother of all #Sciences boon to mankind

#ज्योतिष: #विज्ञान की #माँ 

#astroscience 

आसमान के विभिन्न भागों में विभिन्न ग्रहों की स्थिति के कारण पृथ्वी पर या पृथ्वी के जड़ चेतन पर पडऩेवाले प्रभाव का अध्य्यन फलित ज्योतिष कहलाता है। यह विज्ञान है या अंधविश्वास, इस प्रश्न का उत्तर दे पाना समाज के किसी भी वर्ग के लिए आसान नहीं है। परंपरावादी और अंधविश्वासी विचारधारा के लोग,जो कई स्थानों पर ज्योतिष पर विश्वास करने के कारण धोखा खा चुकें हैं, भी इस शास्त्र पर संदेह नहीं करते। वे ज्योातिष को मानते हुए सारा दोषारोपण ज्योतिषी पर कर देते  है। दूसरी ओर वैज्ञानिकता से संयुक्त विचारधारा से ओत-प्रोत ज्योतिष को जीवनभर न मानने वाले व्यक्ति भी किसी मुसीबत में फंसते ही समाज से छुपकर ज्योतिषियों की शरण में जाते देखे जाते हैं।

कारन  की हमारे सनातन संस्कृति का आधार वेद है, जो पूर्ण विज्ञान है और ज्योतिष वेदों का छठा अंग माना जाता है...। ज्योतिष दो शब्दों ज्योति + अष्क से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है ज्योति पिंड और जो ज्ञान इन ज्योति पिंडों के जड़ चेतन के प्रभाव का अध्ययन करता है उसे ज्योतिष विज्ञान कहते है। 

सबसे पहले इसी विज्ञान ने ब्रह्मांड के बारे में नक्षत्रों, ग्रहों, राशियों के बारे में विस्तार से बताया। उसका गणितीय संयोजन प्रस्तुत किया, जो आज के खगोल विज्ञान का आधार बना। पृथ्वी पर होने वाली ऋतुओं, तिथि, समय, अंक, समुद्र में ज्वार-भाटे, सूर्य-चन्द्र ग्रहण या धरती पर पर होने वाले सृजन, विकार या विनाश का सटीक विश्लेषण प्रस्तुत किया। 
 
ज्योतिष पर मुंह बनाने वाले मूढ़मति लोगों को सूर्य सिद्धांत का पढ़ लेना चाहिए, जिसमें न केवल पृथ्वी बल्कि सौरमंडल के ग्रहों का नियमन करने वाली गतियों, उनके प्रभाव आदि का विस्तार वैज्ञानिक आधार पेश किया गया है। लोग जिस न्यूटन का नाम लेते नहीं थकते उसे भास्कराचार्य ने पहले ही सिद्ध कर दिया था। 

एक बार आप आर्यभट्ट,  वराहमिहिर देश में बनाई वेधशालाओं के दर्शन ही कर लें, तो ज्योतिष गणना की सटीकता और भारतीय विज्ञान के मुरीद हो जाओगे। आर्यभट्ट और वराहमिहिर ने ज्योतिष का संवर्धन किया और अपने आधार से ठोस आधार प्रदान किए। 'भास्कराचार्य' ने न्यूटन से बहुत पहले ही गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रतिपादन कर दिया था, जिसे उन्होंने अपने ग्रंथ 'सिद्धांतशिरोमणि' में प्रस्तुत किया है। 

'आकृष्ट शक्ति च महीतया, स्वस्थ गुरं स्वभिमुखं स्वंशवत्या', 
 
अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है, जिससे वह अपने आस-पास की वस्तुओं को आकर्षित करती है।
 
आज से करीब दो हजार साल पहले वराहमिहिर ने 27 नक्षत्रों और 7 ग्रहों तथा ध्रुव-तारे का को वेधने के लिए एक बडे़ जलाशय में स्तंभ का निर्माण करवाया था, इसकी चर्चा 'भागवतपुराण' में है, स्तंभ में सात ग्रहों के लिए सात मंजिलें और 27 नक्षत्रों के लिए 27 रोशनदान काले पत्थरों से निर्मित करवाए थे, इसके चारों तरफ 27 वेधशालाएं मंदिरों के रूप में बनी थीं। 
 
प्राचीन भारतीय शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने वेधशालाओं को तुड़वाकर वहां मस्जिद बनवा दी थी और अंग्रेजी शासन ने इस स्तंभ के ऊपरी भाग को तुड़वा दिया था, आज भी वह 76 फुट शेष है। यह वहीं दिल्ली की प्रसिद्ध 'कुतुबमीनार' है, जिसे सभी जानते है। 
 
ज्योतिष की सार्थकता और सटीकता पर आंखे बंद करके विरोध करना अज्ञानी या अर्द्धज्ञानी का काम है। इसके पहले आपको वेदों, पुराणों, ज्योतिषशास्त्र का समझें। ऐसे लोग प्रज्ञा अपराध के साथ गुरु अपराध के भागी भी है, जो खुद समय लेकर परेशानी आने पर ज्योतिष गुरु के यहां नतमस्तक होते है और सार्वजानिक जीवन में विरोध करके खुद शालीन और ज्ञानी बताते है। ये अपने गुरु ज्ञान का अपमान है। 
 
खास बात जो लोग ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते उनको अधिकार भी नहीं की पंचांग की गणना के आधार पर निर्धारित किए जाने वाले होली, दीपावली, बच्चों के नाम, शादियों के मुहूर्त आदि को मानें। 
 
अंत में एक ज्योतिष विद्वान द्वारा कुछ साल पहले से किसी के बारे में मंत्री बनने की भविष्यवाणी की जाना और इस बात का सत्य होना ज्योतिष की प्रमाणिकता को दर्शाता है, फिर भी शास्त्र कहते है...
 
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥
 
जिस मनुष्य में स्वयं का विवेक, चेतना एवं बोध नहीं है, उसके लिए शास्त्र क्या कर सकता है। आंखों से हीन अर्थात् अंधे मनुष्य के लिए दर्पण क्या कर सकता है। 

ज्योतिष विद्या को एक आध्यात्मिक विज्ञान कहा जा सकता है। वास्तव में यह एक आत्मा के अवतरण और उस अवतरण का दर्पण है। जिसमें हम ग्रहों, नक्षत्रों और योगों के अनुसार अपने जीवन के विकास और विस्तार को देख सकते है। इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल जन्मकुंडली से ही सत्य और मुक्ति का मार्ग प्राप्त किया जा सकता है। सरल शब्दों में कहें तो ज्योतिष विद्या हमें हमारी आत्मा के प्रकट होने की चाबी देती है, इस चाबी का प्रयोग कर हम अपने आंतरिक ऊर्जा शक्ति को प्रदर्शित कर सकते है। नक्षत्रों और ग्रह केवल आकाशीय पिंड ही नहीं है अपितु ये हमारे मन, हमारे जीवन, हमारी आत्मा के मार्गदर्शक है जो अपनी स्थिति के अनुसार जीवन को रोशन करते है।

इसे हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि हमारी आंतरिक शक्तियां ग्रहों और नक्षत्रों के द्वारा संचालित होती है और ग्रह एवं नक्षत्र भी हमारी आंतरिक शक्तियों से प्रभावित होते है। इसे से जीवन को दिशा, विकास और आकार मिलता है। ग्रहों का प्रकाश हमारे भीतरी चेतना शक्ति को प्रभावित कर हमें आंतरिक रुप से प्रभावित करता है। सृष्टि की यही किरणें ब्रह्मांड और हमारे मन की ऊर्जा को बाहर की ओर लाने का कार्य करती हैं। ग्रह/नक्षत्र हमारे जीवन में हमारी गतिविधियों और जीवन की घटनाओं का क्षेत्र निर्धारित करते हैं। ये उन ऊर्जाओं को दर्शाते हैं जिन्हें हम, आत्म रूप में, इस जीवन में प्राप्त करते हैं। जैसे- कि हम इनका प्रतिबिंब हों, जबकि हम इनका प्रतिबिंब हैं। हम सभी के भीतर एक सौरमंडल कार्य करता है, भ्रमण करता है, जिसकी उर्जा शक्ति से हमारा जीवन गति पाता है।

हमारी अपनी आत्मा ही एक नक्षत्र, ग्रह का प्रतिरुप है जो एक लौकिक प्रकाश का बिंदु है। यही वजह है, कि इस धरती पर जन्म लेने का कारण लेकर ही आत्मा इस धरा में आती है। यह हमारे वर्तमान जीवन और जीवन में छुपे विचारों की प्रेरक शक्ति है। इसमें संपूर्ण ब्रह्मांड को बनाने की शक्ति है। हमारी आत्मा का प्रकाश सूर्य आदि नक्षत्रों में स्थित एक दिव्य प्रकाश से सीधे ब्रह्मांडीय प्रकाश से जुड़ता है और ग्रहों के माध्यम से होता हुआ हम तक पहुंचता है। जीवन की सभी घटनाओं की जांच करने के लिए ज्योतिष का उपयोग किया जा सकता है। इसके द्वारा हम अपने स्वास्थ्य, धन, कैरियर और रिश्तों के बारे में जान सकते हैं। कुंडली हमारी मानसिक और आध्यात्मिक अभिव्यक्तियां करती है। यह जीवन की संपूर्ण संरचना को दर्शाती है कि जिसके माध्यम से हमें जीवन में कार्य करना चाहिए।

ज्योतिष विद्या को आज तक का सबसे व्यापक विज्ञान कहा जा सकता है। ज्योतिष योग इस आत्मा के विज्ञान का उच्चतम स्तर है। ज्योतिष विद्या का मुख्य उद्देश्य हमारे जीवन का मार्गदर्शन करना है। ग्रह उन ऊर्जाओं को दिखाते हैं जिन्हें हमें अपने दिमाग को शांत करने की जरुरत होती है। उदाहरण के लिए, मंगल ग्रह में एक विशिष्ट ऊर्जा, क्रोध, सत्य की शक्ति है जो यह बताती है कि क्या सही है और इससे विचलित नहीं होने देती है। यह शक्ति क्रोध के रुप में प्रकट होती है। जब हम कुछ अहम् विचारों या भावनाओं के साथ सत्य की पहचान करते हैं। इसके अतिरिक्त सीमित स्थिति में संघर्ष करने वाली उच्च शक्तियां हैं। ये हमारे मन के आभूषण है, जिनका दमन करने की जगह इनका पुन: एकीकरण करने की आवश्यकता है।

आध्यात्मिक विज्ञान का अनिवार्य सिद्धांत आत्म-ज्ञान है। जैसा कि महान संतों ने बार-बार कहा है, "आत्म-ज्ञान सभी ज्ञानों का आधार है।" फिर भी आत्म-ज्ञान मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से कहीं अधिक है। यह हमारे बाहरी व्यक्तित्व या वातानुकूलित आत्म का ज्ञान नहीं है, बल्कि हमारी आंतरिक चेतना हैं वह भी बिना शर्त के। स्मृति का विश्लेषण हमें अपने अस्तित्व के सतही पहलू तक सीमित करता है। जबकि आत्म-ज्ञान पिछले जन्मों के ज्ञान से भी कुछ अधिक है। यह एक व्यापक स्मृति है, जो समय सीमा के आवरण में फंस कर रह गई है। आत्म-ज्ञान वह ज्ञान है जो हमारे वास्तव में होने, सच्चे होने और जो जागरूकता का प्रकाश है। यह वह स्व है, जिसमें से हमारे सभी मुखौटे अलग होते हैं। हम कौन थे? या हम जो हैं वह क्यों बनें, यह अलग-अलग पहचानों को नकारने और जीवन को जानने का ज्ञान है। यह अपने मन को नियंत्रित कर ही पाया जा सकता है। इसके लिए हमें अपने जीवन के भीतर देखने की आवश्यकता है। ऐसा होने पर हमारी उपस्थिति दिव्य हो जाएगी।

ज्योतिष सही तरीके से नियोजित हैं, इसीलिए यह हमें अपने भीतर की दुनिया दिखाता है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड को घेरने वाली किरणों के माध्यम से मानव मस्तिष्क में अपनी शारीरिक सीमा से हमारी चेतना को स्थानांतरित करने का एक उपकरण है। यह ध्यान का एक उपकरण है जिसमें ग्रह उन गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें हमें अपने भीतर महसूस करना चाहते है। सभी संसार, ग्रह, तारे, आकाशगंगाएँ और जो कुछ भी उनसे परे है वह सभी इस सृष्टि की सात किरणों की अभिव्यक्ति है। सृष्टि की यही किरणें हमारी अपनी आत्मा की रोशनी हैं। प्रकृति और कुछ नहीं बल्कि विभिन्न स्तरों इस सात किरणों की रोशनी के विभिन्न संयोजन हैं। हमारे सौर मंडल को इन रचनात्मक ऊर्जाओं को प्रकट करने के लिए ही मुख्य रुप से डिज़ाइन किया गया है। सूर्य और चंद्रमा के रूप में यह किरणें हमें दोहरी शक्ति देती हैं और मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि जैसे पांच प्रमुख ग्रहों के रूप में इस रोशनी का पांच गुना विविधीकरण होता है।

प्रत्येक ग्रह एक शिक्षण संस्थान है। यह ब्रह्मांड क्र्र आत्म-अभिव्यक्ति में होने के अभिन्न पहलूओं का प्रतिनिधित्व करता है। प्रत्येक ग्रह हमें ब्रह्मांडीय होने के दृष्टिकोण की एक पंक्ति दिखाता है। ग्रहों द्वारा प्रतिनिधित्व की गई ऊर्जाओं को अपने भीतर समाहित करके, हम ब्रह्मांडीय प्राणियों के रूप में अपनी वास्तविक पूर्णता को पुनः प्राप्त करते हैं। इसीलिए प्रत्येक ग्रह इस मुक्ति के द्वार का प्रतिनिधित्व करता है। यदि हम अपने भीतर किसी ग्रह की ऊर्जा को नहीं समझ पाते हैं, तो वह हमें दुःख और संघर्ष में बांध देगा। यदि हम किसी भी ग्रह की ऊर्जा को बहुत अधिक या बहुत कम मात्रा में ग्रहण करते है तो यह हमारे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दोनों में असंतुलन और विकार पैदा करेगा। यदि हम किसी ग्रह की ऊर्जा का विभाजन सतही रूप में करते हैं, तो यह हमें विघटन की ओर लेकर जाएगा। अगर हम उस ऊर्जा को अपने गहन स्व के हिस्से के रूप में ग्रहण करते हैं, तो यह हमें ओर बेहतर व उच्चतर प्रदर्शन की ओर ले जाएगा।

प्रत्येक ग्रह जबरदस्त शक्ति का कार्य करता हैं। यही वहज है हम सभी इस रहस्यमयी ब्रह्मांड का हिस्सा हैं और हमारे भीतर इसकी जबरदस्त ऊर्जा है। जीवन की अविश्वसनीय शक्तियों से निपटने के लिए हमारी आत्मा रुपी एक महान शक्ति मौजूद है। जिसके माध्यम से हमें अपने माध्यम को तोड़ना चाहिए और इन अविश्वसनीय शक्तियों से दूर जाना चाहिए। आत्म विश्लेषण करने और आत्मसमर्पण करने पर ग्रहों और नक्षत्रों को नियंत्रित करने की शक्ति हममें आ सकती है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक ग्रह एक विशेष प्रकार के योग का प्रतिनिधित्व भी करता है, जो चेतना के प्रकट होने का एक निश्चित तरीका है। ग्रह हमारी आध्यात्मिक यात्रा में वापसी का मार्गदर्शन करने के साथ साथ ऊर्जा का उपहार भी देते है। सभी ग्रहों की प्रकृति, स्वभाव, कारकतत्व, विशेषताएं एवं दृष्टिकोण अलग-अलग है, लेकिन उनका लक्ष्य एक है। वह हैं हमारे जीवन को दिशा देने का।

आत्मा और ब्रह्मांड का विकास इस प्रकार होता है कि प्रत्येक आत्मा ब्रह्मांडीय विकास में एक मार्गदर्शक शक्ति का कार्य करती है और मुक्ति के मार्ग पर इस दुनिया को एक निश्चित पहलू देकर विकास की ओर आगे बढ़ाती है। विभिन्न देश, नस्ल और धर्म भी अलग-अलग ग्रहों की किरणों के द्वारा निर्धारित होते हैं। वास्तव में हम सभी देवताओं के इस मजेदार खेल का हिस्सा हैं, जो कि ग्रहों के द्वारा खेला जा रहा है। यहां हम इस नाटक में स्वयं को सिर्फ कठपुतली मानने की गलती नहीं कर सकते। क्योंकि यदि हम ऐसा करते हैं तो हम अपने भीतर की आत्मशक्ति, क्षमताओं को अनदेखा करते हैं। अंदरूनी तौर पर हम इस नाटक के स्वामी हैं, इसकी मार्गदर्शक बुद्धि है। ब्रह्मांडीय ग्रहों व नक्षत्रों में निहित बुद्धिमत्ता हमारे भीतर अपने स्वाभाविक सहज ज्ञान और सहज अंतर्दृष्टि के रूप में सहज अभिव्यक्त होती है मौजूद हैं।

ज्योतिष भी अन्य विज्ञानों की तरह एक विज्ञान है और उसका मूल उद्‍गम सृष्टि के गर्भ में छिपे तथ्यों को जानने की उत्सुकता में निहित है। आकाश-मंडल, निर्बाध गति से चलने वाले रात-दिन, और जन्म-मरण के चक्र और सूर्य, चन्द्र तथा तारागणों के प्रति मानव का कौतूहल अनादिकाल से रहता आया है।

इसी के परिणाम स्वरूप ज्योतिष की विद्या का प्रादुर्भाव हुआ और उसके शास्त्र को विभिन्न ग्रहों और काल का बोध कराने वाले शास्त्र के रूप में स्थापित किया गया। ज्योतिषशास्त्र को वेदों में भी समुचित प्रतिष्ठा प्रदान की गई थी। और यह तथ्य कतिपय व्यक्तियों की इस धारणा को सर्वथा निर्मूल सिद्ध करता है कि यह विज्ञान भारत में विदेशों से आयातित हुआ था।

ज्योतिष का विज्ञान वस्तुतः अपने आप में इतना सशक्त और भरपूर है कि उसके प्रबल विरोधी भी उसके वैज्ञानिक पहलुओं की अवहेलना नहीं कर सकते। ज्योतिष विज्ञान के अन्तर्गत आने वाले ग्रह स्वयं किसी को सुख अथवा दुःख प्रदान नहीं करते। हाँ, उनका प्रभाव सृष्टि के अणु-परमाणुओं पर निरंतर पड़ता रहता है और उससे यहाँ का प्राणी जगत भी प्रभावित होता है। उदाहरण स्वरूप कमल का पुष्प सूर्य की प्रथम किरण पाते ही खिल उठता है और फिर सूर्यास्त होने के साथ ही उसकी पंखुड़ियाँ बंद हो जाती हैं। इसे सूर्य की अपनी विशेषता नहीं कहा जाएगा, बल्कि उन दोनों के मिलन के फलस्वरूप ही इस प्रकार की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है।

कोई भी विज्ञान अपने आप में संपूर्ण नहीं होता। उसकी कुछ विशेषताएँ होती हैं और कुछ खामियाँ। इसी तरह ज्योतिष विज्ञान को भी सर्वथा पूर्ण और निष्कलंक कहना कठिन है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस विज्ञान के गणित को अनादिकाल से हमारे पूर्वजों ने गोपनीय बनाए रखने की चेष्टा की और तत्संबंध में जो ज्ञान जिसके पास था वह उसके जीवन के साथ ही समाप्त होता चला गया।

आज भी इस विज्ञान को फलने-फूलने के लिए न उस तरह का परिवेश मिल रहा है जो उसके विकास और विस्तार के लिए अपेक्षित है, और न वह वातावरण जिसके सहारे वह अपने को पुष्पित-पल्लवित करने में समर्थ हो सके। अपनी तमाम कमियों के बावजूद मनुष्य के जीवन में ज्योतिष-विज्ञान का सर्वोपरि स्थान है। यह बात भी असंदिग्ध है कि समग्र विश्व इस विज्ञान की सहायता से अपनी विभिन्न समस्याओं के निराकरण में असामान्य रूप से सफल हो सकता है।

ज्योतिष-विज्ञान वह विज्ञान है जो मनुष्य को उसके कार्यक्षेत्र से परिचित कराता है और जिस तरह रोग-निवारण में औषधि का प्रयोग सहायक सिद्ध होता है। उसी प्रकार इस विज्ञान में जीवन की बाधाओं के प्रति मानव को सचेत करते हुए उसके समुचित निवारण को निर्दिष्ट करने की अद्‍भुत क्षमता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए तो ज्योतिष विज्ञान एक अमूल्य वरदान है। उसके आधार पर वर्षा, भूकम्प, बाढ़ और तूफान जैसे प्राकृतिक क्रियाकलापों से अवगत होकर संभावित प्रकोपों के प्रति पहले से सावधान हुआ जा सकता है।

ज्योतिष के माध्यम से प्राप्त जानकारी विश्वसनीय सिद्ध होती रही है। शिक्षा के क्षेत्र में भी ज्योतिष विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। यह विज्ञान अपना अध्ययन क्षेत्र चुनने में विद्यार्थियों का पथ प्रदर्शन करने में भी पूरी तरह समर्थ है। उद्योग के क्षेत्र में भी इस विज्ञान के माध्यम से बहुत सहायता प्राप्त की जा सकती है।

इसी प्रकार चिकित्सा और मनोविज्ञान की विधाओं में भी ज्योतिष-शास्त्र बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक जहाँ मात्र बाह्य निरीक्षणों के आधार पर रोग का निर्धारण करते हैं वहीं ज्योतिष विज्ञान जन्मकालीन ग्रह और नक्षत्रों की स्थितियों के आधार पर आंतरिक वास्तविकता का ज्ञान कराने में समर्थ है। राजनीति के क्षेत्र में भी ज्योतिष विज्ञान का विशेष महत्व है।

इस तरह कहा जा सकता है कि आज के युग में भी ज्योतिष विज्ञान मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वरदान सिद्ध होने की असाधारण क्षमता रखता है। ज्योतिष विज्ञान वस्तु का स्वरूप तो सहज ही बता सकता है, लेकिन उसमें किसी तरह का परिवर्तन लाना उसके लिए संभव नहीं है। हाँ, वह किसी आदमी को उसके व्यक्तित्व की कमियों और खूबियों का अहसास कराते हुए तदनुसार अपना विकास करने के लिए उसे अवश्य प्रेरित कर सकता है।

मनुष्य के अतिरिक्त राष्ट्र की अनेक समस्याएँ भी ज्योतिष की सहायता से बखूबी हल की जा सकती हैं। उसके गणितपक्ष के आधार पर ग्रहों की गति और स्थिति का ज्ञान अर्जित कर कालगणना, नक्षत्रों के परिवर्तन, ग्रहों के संयोग और सूर्य अथवा चंद्र ग्रहण जैसे विभिन्न क्रियाकलापों का आकलन आसानी से किया जा सकता है।

ज्योतिष मात्र विज्ञान ही नहीं, एक कला भी है, लेकिन उसकी सफलता पूरी तरह ज्योतिषी की कार्यक्षमता और दूरदर्शिता पर निर्भर है। इस तरह ज्योतिष शास्त्र एक प्रयोगात्मक विज्ञान है और वह कुछ निश्चित नियमों और सिद्धांतों पर आधारित है।

दु:ख की बात यह है कि इस विज्ञान को वैज्ञानिक गंभीरता के साथ लेने का कोई सार्थक प्रयत्न अब तक नहीं किया गया है। आज मौसम विज्ञान के शोध और परिमार्जन हेतु लाखों रुपयों का व्यय किया जा रहा है लेकिन ज्योतिष विज्ञान पहले की तरह उपेक्षित है। यद्यपि ज्योतिष विज्ञान के आधार पर जो भविष्यवाणियाँ की जाती रही हैं, उनमें हमेशा अधिक सार रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी ज्योतिष विज्ञान पूरी तरह उपेक्षित रहा है। उसके विस्तृत और व्यापक अध्ययन के लिए किसी भी विश्वविद्यालय में कोई विशेष सुविधा सुलभ नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार के अतिरिक्त देश के शिक्षाविद् भी इस संबंध में ध्यान आकृष्ट करें जिससे इस विद्या के माध्यम से उपलब्ध होने वाले लाभ उपेक्षित न रह सकें।

ज्योतिष-व्यवसाय से संबद्ध लोगों से यह अपेक्षित है कि मात्र अपनी रोजी-रोटी तक वे उस विद्या को सीमित न रखते हुए वास्तविक और वैज्ञानिक रूप से उसे पुष्पित और पल्लवित करने की चेष्टा करें जिससे जनसामान्य के सम्मुख अपने निखरे रूप में उपस्थित होना उसके लिए संभव हो सके।

इसमें संदेह नहीं है कि ज्योतिष-विज्ञान मानवीय क्रियाकलापों को नवीनता प्रदान करने का एक अद्‍भुत सूत्र बन सकता है। बशर्ते उसे पूर्ण रूप से विकसित होने योग्य वातावरण मिल सके और उसके माध्यम से पुरातन के आधार पर नवीनीकरण की सृष्टि करने का प्रयत्न किया जाए।

इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी समस्याओं की तार्किक दृष्टि से व्याख्या करें, बगैर किसी पूर्वाग्रह उनका मंथन करें और फिर उनका हल निकालने के लिए प्रयत्नशील हों।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो इस विज्ञान की उन्नति को अवरुद्ध होने से कोई नहीं बचा सकता। क्योंकि किसी भी विज्ञान का विकास विभिन्न प्रयोगों, उनके गंभीर अध्ययन, सूक्ष्म निरीक्षण, गणित के ठोस आधार और उसके द्वारा प्रतिपादित फलों पर निर्भर करता है।

अनेक लोगों की धारणा है कि ज्योतिषियों द्वारा बताए गए अधिकांश फलादेश फलीभूत नहीं होते, उनकी इस बात पर आपत्ति नहीं की जा सकती। लेकिन अनेक बार तो चिकित्सा शास्त्री भी किसी रोग का समुचित निदान करने में पूरी तरह विफल हो जाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि चिकित्सा शास्त्र को हम विज्ञान की परिधि से निकालकर उसका उपहास करना शुरू कर दें? ज्योतिष शास्त्र के साथ आज ऐसा ही हो रहा है। हाँ, यह अवश्य है कि ज्योतिष विज्ञान की सफलता ज्योतिषी की योग्यता, उसकी दूरदर्शिता और कार्यक्षमता पर ही निर्भर है, लेकिन यह बात तो प्रायः हर विज्ञान के साथ लागू होती है।

ज्योतिषशास्त्र मानव के साथ-साथ देश और राष्ट्र के लिए भी एक अमूल्य वैज्ञानिक निधि है और उसकी सहायता से न केवल भविष्य की रूपरेखा से अवगत हुआ जा सकता है बल्कि संभावित विघ्न-बाधाओं से बचने की चेष्टा भी की जा सकती है। वर्तमान कालखंड के उस संघर्षपूर्ण वातावरण में जिसमें आदमी सत्य, अहिंसा और शांति के पावन लक्ष्यों से पूरी तरह भटक चुका है, ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन बहुत आवश्यक है।

ज्योतिष का अध्ययन क्षेत्र में भी इतना विस्तृत, साथ ही आकर्षक और रोचक है कि उसका अध्ययनकर्ता अगर उसमें पूरी तरह रम हो जाए तो किसी अन्य विधा की ओर दृष्टि उठाने का भी उसे समय नहीं मिल पाएगा। ज्योतिष का विज्ञान हमारी समस्त हलचल, समस्त गतिविधियों की आधारशिला है, और उसकी संभावनाओं की कोई सीमा नहीं ल

ज्योतिष की इस विवादास्पद स्थिति के लिए मैं सरकार,शैक्षणिक संस्थानों एवं पत्रकारिता विभाग को दोषी मानती हूं। इन्होंने आजतक ज्योतिष को न तो अंधविश्वास ही सिद्ध किया और न ही विज्ञान? सरकार यदि ज्योतिष को अंधविश्वास समझती तो जन्मकुंडली बनवाने या जन्मपत्री मिलवाने के काम में लगे ज्योतिषियों पर कानूनी अड़चनें आ सकती थी। यज्ञ हवन करवाने या तंत्र-मंत्र का प्रयोग करनेवाले ज्योतिषियों के कार्य में बाधाएं आ सकती थी। सभी पत्रिकाओं में राशि-फल के प्रकाशन पर रोक लगाया जा सकता था। आखिर हर प्रकार की कुरीतियों और अंधविश्वासों जैसे जुआ, मद्यपान, बाल-विवाह, सती-प्रथा आदि को समाप्त करनें में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है,परंतु ज्योतिष पर विश्वास करनेवालों के लिए ऐसी कोई कड़ाई नहीं हुई। मैं पूछता हूं, आखिर क्यों??

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