पितृ दोष सम्पूर्ण विवेचन उपासना निदान नारायणबलि-नागबलि)त्रिपिंडी कर्म का सम्पूर्ण विवरण
पितृ दोष सम्पूर्ण विवेचन उपासना निदान नारायणबलि-नागबलि)त्रिपिंडी कर्म का सम्पूर्ण विवरण
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पित्तर कौन होते है
पित्तरों का महत्व
संसार के समस्त धर्मों
में कहा गया है कि मरने के बाद भी जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता है वरन
वह किसी ना किसी रूप में बना ही रहता हे। जैसे मनुष्य कपड़ों को समय समय पर बदलते
रहते है उसी तरह जीव को भी शरीर बदलने पड़ते है जिस प्रकार तमाम जीवन भर एक ही
कपड़ा नहीं पहना जा सकता है उसी प्रकार आत्मा अनन्त समय तक एक ही शरीर में नही ठहर
सकती है।
ना जायते म्रियते वा
कदाचिन्नाय भूत्वा भविता वा न भूपः
ऊजो नित्यः शाश्वतोऽयं
पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।
गीता.2ए अध्याय.20
अर्थात आत्मा ना तो कभी
जन्म लेती है और ना ही मरती है मरना जीना तो शरीर का धर्म है शरीर का नाश हो जाने
पर भी आत्मा का नाश नहीं होता है। विज्ञान के अनुसार कोई भी पदार्थ कभी भी नष्ट
नहीं होता है वरन् उसके रूप में परिवर्तन हो जाता है।
व्यक्ति के सत्संस्कार
होने के बाद यही अक्षय आत्मा पित्तर रूप में क्रियाशील रहती है तथा अपनी
आत्मोन्नति के लिये प्रयासरत रहने के साथ पृथ्वी पर अपने स्वजनों एवं सुपात्रों की
मदद के लिये सदैव तैयार रहती है।
हिन्दु धर्म ग्रंथो में
पितरों को संदेशवाहक भी कहा गया है|
शास्त्रों में लिखा
है..............
ॐ अर्यमा न तृप्यताम इदं
तिलोदकं तस्मै स्वधा नम:।ॐ मृर्त्योमा अमृतं गमय||
अर्थात, अर्यमा पितरों के देव हैं, जो सबसे श्रेष्ठ है उन अर्यमा देव को प्रणाम
करता हूँ ।
हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम है . आप हमें
मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें। इसका अर्थ है कि हम पूरे वर्ष भर अपने देवों को
समर्पित अनेकों पर्वों का आयोजन करते हैं, लेकिन हममे से बहुत लोग यह महसूस करते है की हमारी प्रार्थना देवों तक नही
पहुँच प़ा रही है। हमारे पूर्वज देवों और हमारे मध्य एक सेतु का कार्य करते हैं,और जब हमारे पितृ हमारी श्रद्धा, हमारे भाव, हमारे कर्मों से तृप्त हो जाते है हमसे संतुष्ट हो जाते है
तो उनके माध्यम से उनके आशीर्वाद से देवों तक हमारी प्रार्थना बहुत ही आसानी से
पहुँच जाती है और हमें मनवांछित फलों की शीघ्रता से प्राप्ति होती है ।
पित्तरों का सूक्ष्म जगत
से सम्बन्ध होने के कारण यह अपने परिजनों स्वजनों को सतर्क करती रहती है तथा तमाम
कठनाइयों को दूर कराकर उन्हें सफलता भी दिलाती है। समान्यतः यह सर्वसाधारण को अपनी
उपस्थिति का आभास भी नहीं देते है परन्तु उपर्युक्त मनोवृर्ति एवं व्यक्तित्व को
देखकर यह उपस्थित होकर भी सहयोग एवं परामर्श देते है। पित्तरों का उद्देश्य ही
अपने वंशजों को पितृवत स्नेह दुलार सहयोग एवं खुशियां प्रदान करना है संसार में
तमाम उदाहरण उपलब्ध है जब इन्होंने दैवीय वरदान के रूप में मदद की है।
पित्तरों के प्रति
श्रद्धा भाव
पित्तर अपने कुल से मात्र
अपने प्रति श्रृद्धा अपना स्मरण अपना आदर तथा अपने प्रति उचित संस्कार की ही
अपेक्षा रखते है और यह भी सत्य है कि उनका श्राद्ध करने उनके नाम से दान धर्म करने
संस्कार करने स्मारक आदि बनाने का पुण्य फल एवं यश करने वाले को ही प्राप्त होता
है तथा उसका मात्र कुछ अंश ही हमारे पित्तरों के पास पहुँचता है जो करता है वही
भरता है परन्तु हमारे पित्तर जब यह देखते है कि मेरे कुल के लोग हमारे प्रति
कृतज्ञता एवं उपकार का भाव प्रदर्शित कर रहे है तो उन्हें असीम सन्तोष एवं सुख का
अनुभव होता है तथा वह अवसर आने पर उस उपकार का बदला अवश्य ही चुकाते है अपने
प्रियजनों की सहायता के लिये वह हर सम्भव प्रयत्न करते है।
पित्तरों के प्रति
श्रद्धा भाव रखने उन्हे सदभावना भरी श्रद्धान्जलि देने तथा उनके प्रति अनुकूल भाव
रखकर उनकी सहायता लेने से पीछे नहीं रहना चाहिये।
शान्ति की कामना करनी
चाहिये
परिजनों का मतृक के लिये
लगातार रोने पीटने तथा शोक प्रदर्शन करने से उन्हें दुख होता है उनकी शान्ति में
बाधा पड़ती है इसलिये उनकी यादों स्मृतियों क्रिया कलापों को सदा के लिये संजोकर
रखकर हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिये उनकी शान्ति की कामना करनी चाहिये परन्तु मतृक
के साथ संसारिक मोह बन्धन शीघ्र ही तोड़ लेना चाहिये यह मानना चाहिये कि उनका रूप
अवश्य बदल गया है लेकिन उनका आशीर्वाद सदैव आपके साथ है।
परालौकिक शक्ति
परावैज्ञानिकों को अपने
अनुसंधानों के दौरान अनेकों साक्ष्य मिलें है जिससे यह पता चलता है कि तमाम
पित्तरों ने समय समय पर अपने आत्मीयों की कठिनाइयों में सहायता की है तथा उनका
उचित मार्गदर्शन भी किया है कहीं यह नजर आये है कहीं उनकी आवाज सुनाई पड़ी है और
कहीं यह स्पष्ट आभास हुआ है कि कोई परालौकिक शक्ति हमारी मददगार बनी है प्रश्न
हमारा उनके प्रति श्रद्धा विश्वास एवं कठिनाइयों में उनका स्मरण करने का है।
आरम्भिक जन्म
हिन्दू धर्मशास्त्रों के
अनुसार चाहे शरीरधारियों की 84 लाख योनियां ही
क्यों ना हो परन्तु उनका आरम्भिक जन्म एक रसायनिक तत्व से ही हुआ है। सृष्टि के
आरम्भ में एक ही जीव रसायन था और वही अभी तक समस्त प्राणियों की संरचना का एकमात्र
कारण है। परिस्थितियों के लम्बे समय के क्रमिक विकास के कारण एक से अनेक बने
प्राणधारी विभिन्न स्तर विभिन्न आकृतियों एवं प्रकृतियों के बनते चले गये है और आज
इतनी अधिक संख्या में जीव योनियां बन गयी है।
पित्तर पूजन एवं श्राद्ध
धर्म की परम्परा
हमें अपने पित्तरों के
प्रति वैसी ही श्रद्धा भावना रखनी चाहिये जैसा हम प्रभु के प्रति रखते है। संसार
में सभी धर्मों एवं सभ्यताओं में पित्तरों के प्रति कर्त्तव्य पूरा करने को कहा
गया है। अनेक धर्मों में अलग अलग रीतियों से पित्तर पूजन एवं श्राद्ध धर्म की
परम्परा प्रचलित है। पित्तरों को स्थूल सहायता की नही वरन् सूक्ष्म भावनात्मक
सहयोग एवं श्रद्धा मात्र की ही आवश्यकता होती है क्योंकि वह सूक्ष्म शरीर में ही
रहते है तथा प्रसन्न होने पर यही पित्तर बदले में प्रेरणा शक्ति सहयोग मार्गदर्शन
एवं सफलता प्रदान करते है
पितृदोष किसे कहते है ?
हमारे पूर्वज, पितर जो कि अनेक प्रकार की कष्टकारक योनियों
में अतृप्ति, अशांति, असंतुष्टि का अनुभव करते हैं एवं उनकी सद्गति
या मोक्ष किसी कारणवश नहीं हो पाता तो हमसे वे आशा करते हैं कि हम उनकी सद्गति या
मोक्ष का कोई साधन या उपाय करें जिससे उनका अगला जन्म हो सके एवं उनकी सद्गति या
मोक्ष हो सके। उनकी भटकती हुई आत्मा को संतानों से अनेक आशाएं होती हैं एवं यदि
उनकी उन आशाओं को पूर्ण किया जाए तो वे आशिर्वाद देते हैं। यदि पितर असंतुष्ट रहे तो
संतान की कुण्डली दूषित हो जाती है एवं वे अनेक प्रकार के कष्ट, परेशानीयां उत्पन्न करते है, फलस्वरूप कष्टों तथा र्दुभाग्यों का सामना करना
पडता है।
पितृदोष से होने वाली
हानिया
यदि किसी जातक की कुंडली
मे पित्रृदोष होता है तो उसे अनेक प्रकार की परेशानियां, हानियां उठानी पडती है। जो लोग अपने पितरों के लिए तर्पण
एवं श्राद्ध नहीं करते, उन्हे राक्षस,
भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी-शाकिनी,
ब्रहमराक्षस आदि विभिन्न प्रकार से पीडित करते
रहते है।
घर में कलह, अशांति रहती है।
रोग-पीडाएं पीछा नहीं
छोडती है।
घर में आपसी मतभेद बने
रहते है।
कार्यों में अनेक प्रकार
की बाधाएं उत्पन्न हो जाती है।
अकाल मृत्यु का भय बना
रहता है।
संकट, अनहोनीयां, अमंगल की आशंका बनी रहती है।
संतान की प्राप्ति में
विलंब होता है।
घर में धन का अभाव भी
रहता है।
अनेक प्रकार के महादुखों
का सामना करना पडता है।
पितृदोष के लक्षण
घर में आय की अपेक्षा
खर्च बहुत अधिक होता है।
घर में लोगों के विचार
नहीं मिल पाते जिसके कारण घर में झगडे होते रहते है।
अच्छी आय होने पर भी घर
में बरकत नहीं होती जिसके कारण धन एकत्रित नहीं हो पाता।
संतान के विवाह में काफी
परेशानीयां और विलंब होता है।
शुभ तथा मांगलीक कार्यों
में काफी दिक्कते उठानी पडती है।
अथक परिश्रम के बाद भी
थोडा-बहुत फल मिलता है।
बने-बनाए काम को बिगडते
देर नहीं लगती।
पित्रुओं की शांति,
तर्पण आदि न करने से पाप
पित्रुओं की शांति एवं
तर्पण आदि न करने वाले मानव के शरीर का रक्तपान पित्रृगण करते हैं अर्थात् तर्पण न
करने के कारण पाप से शरीर का रक्त शोषण होता है।
पितृदोष की शांति हेतु
त्रिपिण्डी श्राद्ध, नारायण बलि कर्म,
महामृत्युंजय मंत्र
त्रिपिण्डी श्राद्ध यदि
किसी मृतात्मा को लगातार तीन वर्षों तक श्राद्ध नहीं किया जाए तो वह जीवात्मा
प्रेत योनि में चली जाती है। ऐसी प्रेतात्माओं की शांति के लिए त्रिपिण्डी श्राद्ध
कराया जाता है।
नारायण बलि कर्म यदि किसी
जातक की कुण्डली में पित्रृदोष है एवं परिवार मे किसी की असामयिक या अकाल मृत्यु
हुई हो तो वह जीवात्मा प्रेत योनी में चला जाता है एवं परिवार में अशांति का
वातावरण उत्पन्न करता है। ऐसी स्थिति में नारायण बलि कर्म कराना आवश्यक हो जाता
है।
महामृत्युंजय मंत्र
महामृत्युंजय मंत्र जाप एक अचूक उपाय है। मृतात्मा की शांति के लिए भी
महामृत्युंजय मंत्र जाप करवाया जा सकता है। इसके प्रभाव से पूर्व जन्मों के सभी
पाप नष्ट भी हो जाते है।
पितृदोष की शांति हेतु
सरल उपाय
घर में कभी-कभी गीता पाठ
करवाते रहना चाहिए।
प्रत्येक अमावस्या को
ब्राहमण भोजन अवश्य करवायें।
ब्राहमण भोजन में
पूर्वजों की मनपसंद खाने की वस्तुएं अवश्य बनायी जाए।
ब्राहमण भोजन में खीर अवश्य
बनाए।
योग्य एवं पवित्र ब्राहमण
को श्राद्ध में चांदी के पात्र में भोजन करवायें।
स्वर्ण दक्षिणा सहित दान
करने से अति उत्तम फल की प्राप्ति होती है।
पित्रृदोष की शांति करने
पर सभी परेशानीयां अपने-आप समाप्त होने लगती है। मानव सफल, सुखी एवं ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।
पितरो का ऋणबंधन
प्रत्येक मनुष्य जातक पर
उसके जन्म के साथ ही तीन प्रकार के ऋण अर्थात देव ऋण, ऋषि ऋण और मातृपितृ ऋण अनिवार्य रूप से चुकाने बाध्यकारी हो
जाते है। जन्म के बाद इन बाध्यकारी होने जाने वाले ऋणों से यदि प्रयास पूर्वक
मुक्ति प्राप्त न की जाए तो जीवन की प्राप्तियों का अर्थ अधूरा रह जाता है।
ज्योतिष के अनुसार इन दोषों से पीड़ित कुंडली शापित कुंडली कही जाती है। ऐसे
व्यक्ति अपने मातृपक्ष अर्थात माता के अतिरिक्त माना मामा-मामी मौसा-मौसी
नाना-नानी तथा पितृ पक्ष अर्थात दादा-दादी चाचा-चाची ताऊ ताई आदि को कष्ट व दुख
देता है और उनकी अवहेलना व तिरस्कार करता है।
जन्मकुण्डली में यदि
चंद्र पर राहु केतु या शनि का प्रभाव होता है तो जातक मातृ ऋण से पीड़ित होता है।
चन्द्रमा मन का प्रतिनिधि ग्रह है अतः ऐसे जातक को निरन्तर मानसिक अशांति से भी
पीड़ित होना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति को मातृ ऋण से मुक्ति के प्श्चात ही जीवन में
शांति मिलनी संभव होती है।
पितृ ऋण के कारण व्यक्ति
को मान प्रतिष्ठा के अभाव से पीड़ित होने के साथ-साथ संतान की ओर से कष्ट
संतानाभाव संतान का स्वास्यि खराब होने या संतान का सदैव बुरी संगति जैसी
स्थितियों में रहना पड़ता है। यदि संतान अपंग मानसिक रूप से विक्षिप्त या पीड़ित
है तो व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन उसी पर केन्द्रित हो जाता है। जन्म पत्री में यदि
सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में
पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है।
माता-पिता के अतिरिक्त
हमें जीवन में अनेक व्यक्तियों का सहयोग व सहायता प्राप्त होती है गाय बकरी आदि
पशुओं से दूध मिलता है। फल फूल व अन्य साधनों से हमारा जीवन सुखमय होता है इन्हें
बनाने व इनका जीवन चलाने में यदि हमने अपनी ओर से किसी प्रकार का सहयोग नहीं दिया
तो इनका भी ऋण हमारे ऊपर हो जाता है। जन कल्याण के कार्यो में रूचि लेकर हम इस ऋण
से उस ऋण हो सकते हैं। देव ऋण अर्थात देवताओं के ऋण से भी हम पीड़ित होते हैं।
हमारे लिए सर्वप्रथम देवता हैं हमारे माता-पिता, परन्तु हमारे इष्टदेव का स्थान भी हमारे जीवन में
महत्वपूर्ण है। व्यक्ति भव्य व शानदार बंगला बना लेता है अपने व्यावसायिक स्थान का
भी विज्ञतार कर लेता है, किन्तु उस जगत के
स्वामी के स्थान के लिए सबसे अन्त में सोचता है या सोचता ही नहीं है जिसकी
अनुकम्पा से समस्त ऐश्वर्य वैभव व सकल पदार्थ प्राप्त होता है। उसके लिए घर में
कोई स्थान नहीं होगा तो व्यक्ति को देव ऋण से पीड़ित होना पड़ेगा। नई पीढ़ी की
विचारधारा में परिवर्तन हो जाने के कारण न तो कुल देवता पर आस्था रही है और न ही
लोग भगवान को मानते हैं। फलस्वरूप ईश्वर भी अपनी अदृश्य शक्ति से उन्हें नाना
प्रकार के कष्ट प्रदान करते हैं।
ऋषि ऋण के विषय में भी
लिखना आवश्यक है। जिस ऋषि के गोत्र में हम जन्में हैं, उसी का तर्पण करने से हम वंचित हो जाते हैं। हम लोग अपने
गोत्र को भूल चुके हैं। अतः हमारे पूर्वजों की इतनी उपेक्षा से उनका श्राप हमें
पीढ़ी दर पीढ़ी परेशान करेगा। इसमें कतई संदेह नहीं करना चाहिए। जो लोग इन ऋणों से
मुक्त होने के लिए उपाय करते हैं, वे प्रायः अपने
जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो जाते हैं। परिवार में ऋण नहीं है, रोग नहीं है, गृह क्लेश नहीं है, पत्नी-पति के विचारों में सामंजस्य व एकरूपता है संताने माता-पिता का सम्मान
करती हैं। परिवार के सभी लोग परस्पर मिल जुल कर प्रेम से रहते हैं। अपने सुख-दुख
बांटते हैं। अपने अनुभव एक-दूसरे को बताते हैं। ऐसा परिवार ही सुखी परिवार होता
है। दूसरी ओर, कोई-कोई परिवार
तो इतना शापित होता है कि उसके मनहूस परिवार की संज्ञा दी जाती है। सारे के सारे
सदस्य तीर्थ यात्रा पर जाते हैं अथवा कहीं सैर सपाटे पर भ्रमण के लिए निकल जाते
हैं और गाड़ी की दुर्घटना में सभी एक साथ मृत्यु को प्राप्त करते हैं। पीछे बच
जाता है परिवार का कोई एक सदस्य समस्त जीवन उनका शोक मनाने के लिए। इस प्रकार पूरा
का पूरा वंश ही शापित होता है। इस प्रकार के लोग कारण तलाशते हैं। जब सुखी थे तब न
जाने किस-किस का हिस्सा हड़प लिया था। किस की संपत्ति पर अधिकार जमा लिया था। किसी
निर्धन कमजोर पड़ोसी को दुख दिया था अथवा अपने वृद्धि माता-पिता की अवहेलना और
दुर्दशा भी की और उसकी आत्मा से आह निकलती रही कि जा तेरा वंश ही समाप्त हो जाए।
कोई पानी देने वाला भी न रहे तेरे वंश में। अतएव अपने सुखी जीवन में भी मनुष्य को
डर कर चलना चाहिए। मनुष्य को पितृ ऋण उतारने का सतत प्रयास करना चाहिए। जिस परिवार
में कोई दुखी होकर आत्महत्या करता है या उसे आत्महत्या के लिए विवश किया जाता है
तो इस परिवार का बाद में क्या हाल होगा? इस पर विचार करें। आत्महत्या करना सरल नहीं है, अपने जीवन को कोई यूं ही तो नहीं मिटा देता, उसकी आत्मा तो वहीं भटकेगी। वह आप को कैसे चैन
से सोने देगी, थोड़ा विचार
करें। किसी कन्या का अथवा स्त्री का बलात्कार किया जाए तो वह आप को श्राप क्यों न
देगी, इस पर विचार करें। वह यदि
आत्महत्या करती है, तो कसूर किसका
है। उसकी आत्मा पूरे वंश को श्राप देगी। सीधी आत्मा के श्राप से बचना सहज नहीं है।
आपके वंश को इसे भुगतना ही पड़ेगा, यही प्रेत बाधा
दोष व यही पितृ दोष है। इसे समझें।
पितृ दोष क लिए जिम्मेदार
ज्योतिषीय योग:
1. लग्नेश की अष्टम
स्थान में स्थिति अथवा अष्टमेष की लग्न में स्थिति।
2. पंचमेश की अष्टम
में स्थिति या अष्टमेश की पंचम में स्थिति।
3. नवमेश की अष्टम में
स्थिति या अष्टमेश की नवम में स्थिति।
4. तृतीयेश, यतुर्थेश या दशमेश की उपरोक्त स्थितियां।
तृतीयेश व अष्टमेश का संबंध होने पर छोटे भाई बहनों, चतुर्थ के संबंध से माता, एकादश के संबंध से बड़े भाई, दशमेश के संबंध से पिता के कारण पितृ दोष की उत्पत्ति होती
है।
5. सूर्य मंगल व शनि
पांचवे भाव में स्थित हो या गुरु-राहु बारहवें भाव में स्थित हो।
6. राहु केतु की
पंचम, नवम अथवा दशम भाव में
स्थिति या इनसे संबंधित होना।
7. राहु या केतु की
सूर्य से युति या दृष्टि संबंध (पिता के परिवार की ओर से दोष)।
8. राहु या केतु का
चन्द्रमा के साथ युति या दृष्टि द्वारा संबंध (माता की ओर से दोष)। चंद्र राहु
पुत्र की आयु के लिए हानिकारक।
9. राहु या केतु की
बृहस्पति के साथ युति अथवा दृष्टि संबंध (दादा अथवा गुरु की ओर से दोष)।
10. मंगल के साथ राहु
या केतु की युति या दृष्टि संबंध (भाई की ओर से दोष)।
11. वृश्चिक लग्न या
वृश्चिक राशि में जन्म भी एक कारण होता है, क्योंकि वह राशि चक्र के अष्टम स्थान से संबंधित है।
12. शनि-राहु चतुर्थी
या पंचम भाव में हो तो मातृ दोष होता है। मंगल राहु चतुर्थ स्थान में हो तो मामा
का दोष होता है।
13. यदि राहु शुक्र
की युति हो तो जातक ब्राहमण का अपमान करने से पीड़ित होता है। मोटे तौर पर राहु
सूर्य पिता का दोष, राहु चंद्र माता
दोष, राहु बृहस्पति दादा का
दोष, राहु-शनि सर्प और संतान
का दोष होता है।
14. इन दोषों के निराकारण के लिए सर्वप्रथम जन्मकुंडली का उचित तरीके से विश्लेषण करें और यह ज्ञात करने की चेष्टा करें कि यह दोष किस किस ग्रह से बन रहा है। उसी दोष के अनुरूप उपाय करने से आपके कष्ट समाप्त हो जायेंगे।
पितृ पक्ष का हिन्दू
धर्म/संस्कृति में बड़ा महत्व
पितृ पक्ष का हिन्दू धर्म
तथा हिन्दू संस्कृति में बड़ा महत्व है। श्रद्धापूर्वक पित्तरों के लिये किया गया
कर्म श्राद्ध कहलाता है, जो पित्तरों के
नाम पर श्राद्ध तथा पिण्डदान नहीं करता है वह हिन्दू नहीं माना जा सकता है।
हिन्दूशास्त्रों के अनुसार मृत्यु होने पर जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाती है तथा
ऊँची उठकर पितृलोक में पहुँचती है इन मृतात्मओं को शक्ति प्रदान करने के लिये
पिण्डदान और श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का
प्रतीक हैं। मरने के बाद स्थूल शरीर समाप्त होकर केवल सूक्ष्म शरीर ही रह जाता
है। सूक्ष्म शरीर को भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि
की आवश्यकता नहीं रहती। सूक्ष्म शरीर में चेतना और भावना की प्रधानता रहती है। ऐसे
में पितरों को हमसे केवल आदर,श्रद्धा की ही
आकांक्षा होती है। वे इसी से तृप्त हो जाते है। इसीलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए
श्राद्ध एवं तर्पण किए जाते हैं। इन क्रियाओं का विधि-विधान बहुत ही सरल और कण
खर्चे का है, सभी व्यक्ति इसे बहुत ही
आसानी से संपन्न कर सकते है। पित्तरों के के नाम पर दान-पुण्य करके ब्राहम्णों को
भोजन भी कराया जाता है। इसके पुण्यफल से ही पित्तर संतुष्ट रहते है।
पित्तरों के लिये श्राद्ध
प्रत्येक वर्ष 2 बार किया जाता
है। प्रथम मृत्यु की तिथि पर द्वितीय पित्तर पक्ष में। वर्ष में जिस माह की जिस
तारीख में पित्तर की मृत्यु हुयी है उस तिथि को किया जाने वाला श्राद्ध “एकोदिष श्राद्ध” कहलाता है।
इसमें उस पित्तर की
संतुष्टि के लिये उस दिन एक पिण्ड का दान किया जाता है तथा एक ब्राहमण को भोजन
कराया जाता है।
द्वितीय अश्विन माह के
कृष्ण पक्ष की जिस तिथि को पित्तर की मृत्यु हुयी थी उस दिन किया जाने वाला
श्राद्ध “पाण श्राद्ध” कहलाता है। कहते है अश्विन मास में हमारे
पित्तर अपने पृथ्वी लोकवासी सगे-सम्बन्धियों के घर बिना बुलाये आते है और ‘काव्य’ ग्रहण करके तृप्त होते है तथा अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते है।
शास्त्रों के अनुसार जिन
व्यक्तियों की अकाल-मृत्यु (दुर्घटना, हत्या, सर्पदंश, आत्महत्या आदि) हुई हो, उनका श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को ही किया जाता है।
सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध केवल नवमी को ही किया जाना उचित है। नवमी तिथि माता
के श्राद्ध के लिए सबसे उत्तम है। संन्यासी पितृगणों का श्राद्ध केवल द्वादशी को
किया जाता है। पूर्णिमा को मृत्यु प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध केवल भाद्रपद शुक्ल
पक्ष की पूर्णिमा अथवा आश्विन में कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही किया जाना चाहिए ।
नाना-नानी का श्राद्ध केवल आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही करना उचित माना
गया है ।
वैसे तो पितृपक्ष में
किये जाने वाले श्राद्ध में नौ ब्राहमणें को भोजन कराना चाहिये लेकिन वर्तमान समय
में यदि एक ब्राहमण को भी श्रृद्धापूर्वक आदर सहित भोजन कराया जाय तो वह भी
पर्याप्त है। उस दिन उस ब्राहमण को ही पितृदेवता समझकर उनका स्वागत सत्कार करना
चाहिये तथा उन्हे पूर्ण रूप से संतुष्ट करके ही स्वयं भोजन करना चाहिये। इस दिन
ब्राहमणों को अतिरिक्त एक-एक ग्रास गाय, कौआ, कुत्ता तथा चीटियों के
लिये भी निकालना चाहिये।
श्राद्ध का अर्थ ही
श्रद्धा भाव से किया गया कर्म है यदि श्राद्धकर्ता निर्धन हो, ब्राहमण को भोजन ना भी करा पाये तो पित्तरों के
नाम से गाय को हरा चारा ही डाल दे तथा श्रद्धा से पित्तरों से विनम्र निवेदन कर ले
कि मेरे पास आपके लिये आदर श्रद्धा एवं भक्ति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, आप मुझे क्षमा करके मुझ पर एवं मेरे परिवार पर
कृपा करें तब भी पित्तर प्रसन्न हो जाते है।
पितृ अत्यंत दयालु तथा
कृपालु होते हैं, वह अपने
पुत्र-पौत्रों से पिण्डदान तथा तर्पण की आकांक्षा रखते हैं। श्राद्ध तर्पण आदि
द्वारा पितृ को बहुत प्रसन्नता एवं संतुष्टि मिलती है। शास्त्रों के अनुसार
अमावस्या बरसी और पूरे श्राद्ध पक्ष में पितृगण वायुरूप में अपने वंशजों के घर के
दरवाजे पर खड़े रहते हैं और अपने स्वजनों से तर्पण, श्राद्ध की उम्मीद करते हैं। वे सूर्यास्त तक भूख-प्यास से
व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर
दुःखित मन से अपने-अपने लोकों को लौट जाते हैं। अतःइन दिनों इनका श्राद्ध, तर्पण, ब्राह्मण भोजन अवश्य करना चाहिए।
जैसे पशुओं के भोजन को
तृण और मनुष्यों का भोजन को अन्न कहते , वैसे ही देवता और पितरों का भोजन अन्न का 'सार तत्व' है। सार तत्व का
अर्थ है गंध, रस और उष्मा। देवता और
पितर दोनों ही गंध तथा रस तत्व से तृप्त होते हैं। लेकिन दोनों के लिए अलग अलग तरह
के गंध और रस होते है।अत: जो भी वस्तुएं हम श्रद्धा से अपने पूर्वजों को अर्पित
करते है वह उन तक सार तत्व के रूप में पहुँच जाती है।
कुर्वीत समये श्राद्धं
कुले कश्चिन्न सीदति।
आयुः पुत्रान् यशः
स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं
प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।
देवकार्यादपि सदा
पितृकार्यं विशिष्यते।।
देवताभ्यः पितृणां हि
पूर्वमाप्यायनं शुभम्।
हमारे पितृ मृत्यु के बाद
जिस लोक में रहते है वह पितृ लोक कहलाता हैं। यह चांद के पास है इस लिए इसे सोम
लोक भी कहा जाता है । पित्रों के एक दिन 30 मानव दिनों के समान होते हैं। एक महीने में एक बार मात्र अमावास्य पर जो उनके
लिए दोपहर का खाने का समय है पितृ तर्पण करने से, उनके निमित ब्राह्मण भोजन कराने से, दान देने से उनको महान संतोष की प्राप्ति होती है वह पूर्ण
रूप से तृप्त हो जाते है।
"समयानुसार
श्राद्ध, तर्पण करने से कुल में कोई
दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से
भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक
कल्याणकारी है।"
पितृपक्ष में तीन
पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए
तर्पण किया जाता हैं। तर्पण करते समय एक पीतल के बर्तन में जल में गंगाजल ,
कच्चा दूध, तिल, जौ, तुलसी के पत्ते, दूब, शहद और सफेद फूल
आदि डाल कर फिर एक लोटे से पहले देवताओं, ऋषियों, और सबसे बाद में पितरों
का तर्पण करना चाहिए।
तर्पण, श्राद्ध में तिल और कुशा सहित जल हाथ में लेकर
देवताओं का तर्पण करते समय पूर्व दिशा की तरफ मुँह करके देवताओं का नाम लेकर एक एक
बार तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली से जल गिराते हुए जलांजलि दें ।
ऋषियों का तर्पण करते समय
उत्तर दिशा की तरफ मुँह करके दो बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली के दोनों तरफ से
जल गिराते हुए जलांजलि दें ।
अंत में पितरों का तर्पण
करते समय दक्षिण दिशा की तरफ मुँह करके तीन बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि, तपरान्तयामि कहकर पितृ तीर्थ यानी अंगूठे की ओर जलांजलि
देते हुए जल को धरती में किसी बर्तन में छोड़ने से पितरों को तृप्ति मिलती है।
ध्यान रहे तर्पण का जल तर्पण के बाद किसी वृक्ष की जड़ में चड़ा देना चाहिए वह जल
इधर उधर बहाना नहीं चाहिए ।
हमारे धार्मिक ग्रंथों के
अनुसार तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक शहद , डेढ़ प्रहर तक दूध और साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप में हमारे पितरों को प्राप्त
होता है। अत: हमें सुबह सवेरे ही तर्पण करना चाहिए ।
इन पितृ-कर्मों को करने
के दौरान अपने पूर्वजों के उपकारों का अवश्य ही स्मरण करें। उनके प्रति पूर्ण
श्रद्धा कृतज्ञता तथा सम्मान की भावना रखें। उनके प्राप्ति हमारी इस प्रकार की
भावनाएं जितनी ही प्रबल होंगी, पितरों को उतनी
ही अधिक तृप्ति प्राप्त होगी ।
दोष जो पित्तरों से
सम्बन्धित होता है
वह दोष जो पित्तरों से
सम्बन्धित होता है पितृदोष कहलाता है। यहाँ पितृ का अर्थ पिता नहीं वरन् पूर्वज
होता है। ये वह पूर्वज होते है जो मुक्ति प्राप्त ना होने के कारण पितृलोक में
रहते है तथा अपने प्रियजनों से उन्हे विशेष स्नेह रहता है। श्राद्ध या अन्य
धार्मिक कर्मकाण्ड ना किये जाने के कारण या अन्य किसी कारणवश रूष्ट हो जाये तो उसे
पितृ दोष कहते है।
विश्व के लगभग सभी धर्मों
में यह माना गया है कि मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति की देह का तो नाश हो जाता है
लेकिन उनकी आत्मा कभी भी नहीं मरती है। पवित्र गीता के अनुसार जिस प्रकार स्नान के
पश्चात् हम नवीन वस्त्र धारण करते है उसी प्रकार यह आत्मा भी मृत्यु के बाद एक देह
को छोड़कर नवीन देह धारण करती है।
हमारे पित्तरों को भी
सामान्य मनुष्यों की तरह सुख दुख मोह ममता भूख प्यास आदि का अनुभव होता है। यदि
पितृ योनि में गये व्यक्ति के लिये उसके परिवार के लोग श्राद्ध कर्म तथा श्रद्धा
का भाव नहीं रखते है तो वह पित्तर अपने प्रियजनों से नाराज हो जाते है।
पित्तरों के पास आलौकिक
शक्तियां होती है
समान्यतः इन पित्तरों के
पास आलौकिक शक्तियां होती है तथा यह अपने परिजनों एवं वंशजों की सफलता सुख समृद्धि
के लिये चिन्तित रहते है जब इनके प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक कर्म नहीं किये जाते
है तो यह निर्बलता का अनुभव करते है तथा चाहकर भी अपने परिवार की सहायता नहीं कर
पाते है तथा यदि यह नाराज हो गये तो इनके परिजनों को तमाम कठनाइयों का सामना करना
पड़ता है।
पितृ दोष होने पर व्यक्ति
पितृ दोष होने पर व्यक्ति
को जीवन में तमाम तरह की परेशानियां उठानी पड़ती है जैसे घर में सदस्यों का बिमार
रहना मानसिक परेशानी सन्तान का ना होना कन्या का अधिक होना या पुत्र का ना होना
पारिवारिक सदस्यों में वैचारिक मतभेद होना जीविकोपार्जन में अस्थिरता या पर्याप्त
आमदनी होने पर भी धन का ना रूकना प्रत्येक कार्य में अचानक रूकावटें आना सर पर
कर्ज का भार होना सफलता के करीब पहुँचकर भी असफल हो जाना प्रयास करने पर भी
मनवांछित फल का ना मिलना आकस्मिक दुर्घटना की आशंका तथा वृद्धावस्था में बहुत दुख
प्राप्त होना आदि। बहुत से लोगों की कुण्डली में कालसर्प योग भी देखा जाता है
वस्तुतः कालसर्प योग भी पितृ दोष के कारण ही होता जिसकी वजह से मनुष्य के जीवन में
तमाम मुसीबतों एवं अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।
तर्पण का महत्व
हिन्दु धर्म शास्त्रों
में- वसु, आदित्य और रुद्र इन तीन
देवताओं को क्रमशः पितृ, पितामह और
प्रपितामह का पोषण प्रतिनिधि माना है। हमारे विवाह में भी गात्रोच्चारण में पितृ,
पितामह, प्रपितामह इन तीनों का ही उल्लेख होता है।
येन पितुः पितरो ये
पितामहास्तेभ्यः पितृभ्योनमसा विधेम।
अर्थात् पितृ, पितामह, प्रपितामाहों को हम श्राद्ध से तृप्त करते हैं।
त्रयाणामुदकं कार्य
त्रिषु पिंडः प्रवर्तते।
चतुर्थः सम्प्रदातैषां
पंचमो नापि विद्यते॥
अर्थात् पिता, पितामह और प्रपितामह इन तीनों का श्राद्ध,
तर्पण, पिंडदान होता है। चौथा श्राद्धकर्ता स्वयं यजमान होता है, और यहाँ पर पाँचवें की कोई सम्भावना ही नहीं
है।
तिल और पानी की जलांजली
के माध्यम से हम अपने पित्रों को संतुष्ट करते हुए उनको और ऊंचे स्तर पर पहुंचा
सकते हैं।
तर्पण में हम उन्हें
मंत्रों के साथ पानी और तिल की पेशकश करते हैं तर्पण जो उन्हें बहुत पसंद है और वह
शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते है ।
महाभारत,आदि पर्व, 74.39 मे लिखा है
पुन्नाम्नॊ
नरकादयस्मात्पितरम् त्रायते सुत:
तस्मात्पुत्र इति
प्रॊक्त: स्वयमॆव स्वयम्भुवा
बेटा पिता को पुत नाम का
नरक से बचाता है,इसलिए उसे
स्वयंभु भगवान ने पुत्र नाम रखा था।
हमारे पूर्वजों की मौत के
बाद हमें उनकी आगे की यात्रा के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है, वे कहाँ, किस रूप में है, उन्होंने जन्म लिया है या नहीं, जन्म लिए है तो कहाँ किसी को कुछ भी पता नहीं होता है, लेकिन यह हमारा कर्तव्य है की हम उन्हें जीवित भी खुश रखें
और उनकी मृत्यु के बाद भी। पितृ तर्पण एक अद्भुत मौका है जिसमें देवताओं, वसु, रुद्र और आदित्य,चाहे हमारे पितृ
किधर भी किसी भी रूप में हो, उनको सूक्ष्म
माध्यम से हमारे जल और तिल को पित्रों के पास उत्तम रूप मे पहुंचा देते हैं।
चूँकि पितरों को भी पोषण
की जरूरत है। इसलिए जब हम उनको तर्पण देते हैं,वे संतुष्ट हो जाते हैं और हमें सुख,दौलत और सत संतति की आशीर्वाद देते हैं। और जब वे अच्छाई
करते हैं,तब उसके हिसाब से उनको भी
ऊंचाई मिल जाती है।
तर्पण करने से पहले कुछ
भी नहीं खाना चाहिए. उस दिन के रात में, किसी भी उपवास खाना खाना चाहिए|वैसे ही तिथि के
पहले दिन की रात मे भी उपवास का खाना लेना है।
प्रतिदिन तर्पण के दिन की
सुबह में गीले किए हुये और सूखे धोती / कपड़ा पहनना चाहिए. यदि संभव हो तो पिछली
रात मे धोती को धो के एक स्थान पर लटकाए जिधर कोई नहीं छुए।
तर्पण करने से व्यक्ति के
जन्म के आरंभ से तर्पण के दिन तक जाने अनजाने किए गए पाप उसी समय नष्ट हो जाते
हैं।
"समयानुसार
श्राद्ध, तर्पण करने से कुल में
कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से
भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक
कल्याणकारी है।"
पितृपक्ष में तीन
पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए
तर्पण किया जाता हैं। तर्पण करते समय एक पीतल के बर्तन में जल में गंगाजल ,
कच्चा दूध, तिल, जौ, तुलसी के पत्ते, दूब, शहद और सफेद फूल
आदि डाल कर फिर एक लोटे से पहले देवताओं, ऋषियों, और सबसे बाद में पितरों
का तर्पण करना चाहिए।
कुश तथा काला तिल भगवान
विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुए हैं तथा चांदी भगवान शिव के नेत्रों से प्रकट हुई
हैं। गाय का दूध और गंगाजल का प्रयोग श्राद्ध के कर्मफल को कई गुना तक बढ़ा देता
है। तुलसी बहुत ही पवित्र मानी जाती है अत: इसके प्रयोग से पितृ अत्यंत प्रसन्न
होते हैं।
तर्पण में कुशा (पवित्री)
का प्रयोग अनिवार्य है। दो कुशा से बनाई हुई पवित्री (अंगूठी) दाहिने हाथ की
अनामिका अंगुली तथा तीन कुशाओं से मिलाकर बनाई गई पवित्री बाईं अनामिका में धारण
करें, यह आप खुद भी बना सकते या
बाज़ार में किसी भी पूजा की दुकान में मिल जाता है।
पितरों के तर्पण में
सोना-चांदी, कांसा या तांबे के पात्र
का ही उपयोग करना चाहिए। लेकिन लौह के पात्र अशुद्ध माने गए हैं। अत: यथासंभव लोहे
के बर्तनो का प्रयोग नहीं ही करना चाहिए ।
तर्पण, श्राद्ध में तिल और कुशा सहित जल हाथ में लेकर
देवताओं का तर्पण करते समय पूर्व दिशा की तरफ मुँह करके देवताओं का नाम लेकर एक एक
बार तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली से जल गिराते हुए जलांजलि दें ।
ऋषियों का तर्पण करते समय
उत्तर दिशा की तरफ मुँह करके दो बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली के दोनों तरफ से
जल गिराते हुए जलांजलि दें ।
इसके पश्चात दक्षिण दिशा
की तरफ मुँह करके सबसे पहले भगवान यमराज फिर चित्रगुप्त का नाम लेते हुए और उसके
बाद अपने सभी पितरों का नाम लेते हुए सबके नाम के बाद तीन बार तपरान्तयामि,
तपरान्तयामि, तपरान्तयामि कहकर पितृ तीर्थ यानी अँगूठे के बगल की उँगली
और अंगूठे के बीच से जलांजलि देते हुए जल को धरती में किसी बर्तन में छोड़ने से
पितरों को तृप्ति मिलती है।
तर्पण करते समय पहले अपने
ददिहाल के सभी पितरों उसके बाद अपने ननिहाल के सभी पितरों का नाम लेते हुए उनका
तर्पण करें, फिर अपने वंश के भूले हुए,
पितृ जिन तक आपका तर्पण पहुँचना चाहिए उन सभी
पितरों को एक साथ जलांजलि देते हुए उनका तर्पण करें ।
अंत में पूर्व की ओर मुंह
करके शुद्ध जल से सूर्य को अर्घ्य प्रदान करें।
ध्यान रहे तर्पण का जल
तर्पण के बाद किसी वृक्ष की जड़ में चड़ा देना चाहिए वह जल इधर उधर बहाना नहीं
चाहिए ।
हमारे धार्मिक ग्रंथों के
अनुसार तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक शहद , डेढ़ प्रहर तक दूध और साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप में हमारे पितरों को प्राप्त
होता है। अत: हमें सुबह सवेरे ही तर्पण करना चाहिए ।
हमारे पूर्वज अपने वंशजों
से अपने प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता एवं
स्मरण की अपेक्षा रखते है । और यह सभी व्यक्तियों का अनिवार्य कर्तव्य है कि वह
अपने पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्यों का निश्चित ही पालन करें । जिस भी व्यक्ति
के माता पिता जीवित है यह उसका दायित्व है कि वह अपने माता पिता को उनके पूर्वजों
के प्रति किये जाने वाले कर्मों के बारे में बताये । याद रखिये यदि कोई व्यक्ति
जान बूझ कर अपने पूर्वजों का श्राद्ध, पितृ पक्ष में प्रतिदिन तर्पण नहीं करता है तो वह घोर नरक का भागी होता है,
और जिस भी व्यक्ति को इन कर्म कांडों के बारे
में ज्ञान है लेकिन वह अन्य लोगो को इसके बारे में नहीं बताते है वह भी पाप के
भागी होते है । अत: यह हम सभी की जिम्मेदारी है की हम समाज के सभी लोगो को पितरों
के प्रति कर्तव्यों के बारे में अवश्य ही बताएं ।
देव दोष क्या?
देव दोष ऐसे दोषों को
कहते हैं जो पिछले पूर्वजों, बुजुर्गो से चलें
आ रहे हैं, जिसका देवताओं से संबंध
होता है। गुरु और पुरोहित तथा ब्राहमण विद्वान पुरुषों को इनके पिछले पूर्वज मानते
चले आते थे। इन्होंने उनको मानना छोड़ दिया अथवा वह पीपल जिस पर यह रहते थे,
को काट दिया तो उससे देव दोष पैदा होता है।
इसका असर औलाद तथा कारोबार पर विपरीत होता है। इसका संबंध बृहस्पति तथा सूर्य से
होता है। बृहस्पति नीच सूर्य भी नीच या दो बुरे ग्रहों के घरे में हो तो यह दोष
उत्पन्न होता है।
अपने समय के अनुरूप इस
जातक के भाई ने कोई रूहानी गुरु धारण कर लिया और उस गुरु के कहने पर देवी देवता
पुरोहित की पूजा छोड़ दी, जिससे कारोबार
में अत्यधिक हानि होती गई। रुकती नहीं। पहले इनके पूर्वज बुजुर्गादि, देवी देवता व शहीदों मृतकों को मानते थे।
परन्तु इन्होंने उनको मानना पूजा आदि छोड़ दी इस कारण ऐसा हुआ। दोबारा पूजा शुरू
करने पर सब ठीक है।
पितृदोष के कारण
भूत-प्रेत आदि का भय
जिसके यहां खून के रिश्ते
में कोई पानी में डूब गया हो या अग्नि द्वारा जल गया हो या शस्त्र द्वारा मौत हो
गई हो या कोई औरत तड़प-तड़प कर मर गई हो या मारी गई हो, उनको प्रेत-दोष भुगतना पड़ता है और कई बार तो बाहरी भूत
प्रेतों का भी असर हो जाता है। जैसे किसी समाधि या कब्र का अनादर अपमान किया जाए
या किसी पीपल-बरगद जैसे विशेष वृक्ष के नीचे पेशाब आदि करने से यह दोष शुरू हो
जाता है। कई बार किसी शत्रु द्वारा किए कराए का असर भी होता है।
भूत-प्रेत के कारक
भूत-प्रेत कारक ग्रह राहु
से अधिक संबंध रखता है। चौथे स्थान में राहु, दसवें स्थान में शनि-मंगल हो तो उसके निवास स्थान में प्रेत
का वास रहता है। इसके कारण धन हानि, संतान हानि, स्त्री को कष्ट
इत्यादि होता है। अगर दूसरे, चौथे, पंचम, छठे, सातवें, द्वादश रवि के साथ राहु या गुरु के साथ राहु या
तीनों एक जगह हों तो धन के लिए किसी की हत्या करना, विधवा स्त्री का धन, जायदाद आदि हड़प लेने से घर में पागलपन, दरिद्रता, लोगों के लापता हो जाने जैसी घटनाएं होती हैं। ऐसी हालत में
वहां पिशाच, प्रेत का निवास होता है।
पांच पीढ़ी तक यह दुख देता है।
राहु अगर चंद्र या शुक्र
के साथ हो तो किसी स्त्री का श्राप सात पीढ़ी तक चलता है। महारोग क्षयरोग गण्डमाला
रोग, सांप का काटना इत्यादि
घटनाएं होती हैं। राहु के साथ शनि आत्महत्या का कारक है। तंग होकर कोई खून के
रिश्ते में आत्महत्या कर ले, तो सात पीढ़ी तक
चलता है। औलाद व औरत न बचे, धन हानि होती है।
ये हैं प्रेत दोष।
इस प्रकार प्रथम भाव से
खानदानी दोष देह पीड़ा द्वितीय भाव आकाश देवी, तृतीय भाव अग्नि दोष, चतुर्थ भाव प्रेत दोष, पंचम भाव देवी देवताओं का दोष, छठा भाव ग्रह दोष, सातवों भाव लक्ष्मी देवी दोष, आठवां भाव नाग
देवता दोष, नवम भाव धर्म स्थान दोष,
दशम भाव पितर दोष, लाभ भाव ग्रह दशा, व्यय भाव पिछले जन्म का ब्रहम दोष होता है। कोई ग्रह किसी घर में पीड़ित हो,
सूर्य दो ग्रहों द्वारा पीड़ित हो तो जिस घर
में होगा वही दोष होगा।
भूत-प्रेत योनि श्राप या
जीव हत्याजनित दोष
विद्वानों ने अपने
ग्रंथों में विभिन्न दोषों का उदाहरण दिया है और पितर दोष का संबंध बृहस्पति
(गुरु) से बताया है।
अगर गुरु ग्रह पर दो बुरे
ग्रहों का असर हो तथा गुरु 4-8-12वें भाव में हो
या नीच राशि में हो तथा अंशों द्वारा निर्धन हो तो यह दोष पूर्ण रूप से घटता है और
यह पितर दोष पिछले पूर्वज (बाप दादा परदादा) से चला आता है, जो सात पीढ़ियों तक चलता रहता है। उदाहरण हेतु इस
जन्मकुंडली को देखें जिसमें पूर्ण पितर दोष है। इनका परदादा अपने पिता का एक ही
लड़का था, दादा भी अपने पिता का एक
ही लड़का था। इसका बाप भी अपने पिता का भी एक ही लड़का और यह अपने बाप का एक ही
लड़का है और हर बाप को अपने बेटे से सुख नहीं मिला। जब औलाद की सफलता व सुपरिणाम
का समय आया तो बाप चल बसा। पितर दोष के और भी दुष्परिणाम देखे गए हैं- जैसे कई
असाध्य व मंभीर प्रकार की बीमारियां जैसे दमा, शुगर इत्यादि जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती हैं। पितर दोष का
प्रभाव घर की स्त्रियों पर भी अधिक रहता है।
भूत-प्रेत योनि श्राप या
जीव हत्याजनित दोष
विद्वानों ने अपने
ग्रंथों में विभिन्न दोषों का उदाहरण दिया है और पितर दोष का संबंध बृहस्पति
(गुरु) से बताया है।
अगर गुरु ग्रह पर दो बुरे
ग्रहों का असर हो तथा गुरु 4-8-12वें भाव में हो
या नीच राशि में हो तथा अंशों द्वारा निर्धन हो तो यह दोष पूर्ण रूप से घटता है और
यह पितर दोष पिछले पूर्वज (बाप दादा परदादा) से चला आता है, जो सात पीढ़ियों तक चलता रहता है। उदाहरण हेतु इस
जन्मकुंडली को देखें जिसमें पूर्ण पितर दोष है। इनका परदादा अपने पिता का एक ही
लड़का था, दादा भी अपने पिता का एक
ही लड़का था। इसका बाप भी अपने पिता का भी एक ही लड़का और यह अपने बाप का एक ही
लड़का है और हर बाप को अपने बेटे से सुख नहीं मिला। जब औलाद की सफलता व सुपरिणाम
का समय आया तो बाप चल बसा। पितर दोष के और भी दुष्परिणाम देखे गए हैं- जैसे कई
असाध्य व मंभीर प्रकार की बीमारियां जैसे दमा, शुगर इत्यादि जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती हैं। पितर दोष का
प्रभाव घर की स्त्रियों पर भी अधिक रहता है।
असली नकली प्रेतावेश की
पहचान
प्रेत बाधित व्यक्ति में
उपर्युक्त लक्षण हैं, तो समझना चाहिए
कि सचमुच प्रेत कष्ट से वह पीड़ित है, अन्यथा नहीं।
व्यक्ति वास्तव में
प्रेतग्रस्त है और उसके माध्यम से बोलने वाला वास्तव में प्रेत है या पालतू प्रेत
है, इसे समझने के लिए एक हरा
और ताजा नींबू लेकर उसे प्रेतग्रस्त व्यक्ति को दिखाकर चाकू से काटें और देखें अगर
पालतू प्रेत होगा तो तत्काल भाग जाएगा, नहीं तो नहीं।
पितर दोषों के उपाय:-
पितर दोष के लिए बृहस्पति की पूजा, पीपल ब्रहमा की
पूजा तीन महीने करें। रोज प्रातः इतवार को छोड़कर दूध जल चीनी मिलाकर पीपल की जड़
में पनी डालें तथा कच्चा सूत लपेटें और जयोति जलाएं। हल्दी जैसे पीले रंग का प्रसाद
बांटे, अपने बुजुर्गों की सेवा
करें। लीला पुखराज नौ या बारह रत्ती का धारण करें और घर में नारायण बलि का हवन पाठ
कराएं।
वास्तव में पितर अपने
वंशज की श्रद्धा के भूखे होते हैं, उनके द्वारा दी
गई वस्तुओं के भूखे नहीं होते। श्राद्ध कर्म का मूल तत्व है, श्रद्धा। श्रद्धा और तप्रण सर्वथा निरर्थक है।
कंजूसी करना अनुचित है। श्राद्धकर्ता पितरों के आशीर्वाद से धन धान्य, सुख समृद्धि, संतान और स्वर्ग प्राप्त करता है। शास्त्रों में पितृगण को
देवताओं से भी अधिक दयालु और कृपालु बताया गया है। पितृपक्ष में श्राद्ध और तप्रण पाकर
वे वर्ष भर तृप्त रहते हैं। जिस घर में पूर्वजों का श्राद्ध होता है वह घर पितरों
द्वारा सदैव सुरक्षित रहता है। पितृपक्ष में श्राद्ध न किए जाने से पितर अतृप्त
होकर कुपित हो जाते हैं जिससे व्यक्ति को अनेकों प्रकार के कष्ट और दुख उठाने पडते
हैं। मृतक के लिए किए गए श्राद्ध का सूक्ष्मांश उस तक अवश्य पहुंचता है। चाहे वह
किसी लोक या योनी में हों। श्राद्ध और तप्रण वंशज द्वारा बुजुर्गो पुरखों पूर्वजों
को दी गई एक श्रद्धांजलि मात्र है। हमें किसी भी स्थिति में अपने इस आध्यात्मिक
कर्तव्य से विमुख होकर उदासीनता नहीं बरतनी चाहिए। पितृपक्ष पुरखों पूर्वजों की
स्मृति का विशेष पक्ष है। पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का जो हमारा
दायित्व और धर्म है उसके लिए इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता।
जन्म का ब्रहम दोष
प्रथम भाव से खानदानी दोष
देह पीड़ा द्वितीय भाव आकाश देवी, तृतीय भाव अग्नि
दोष, चतुर्थ भाव प्रेत दोष,
पंचम भाव देवी देवताओं का दोष, छठा भाव ग्रह दोष, सातवों भाव लक्ष्मी देवी दोष, आठवां भाव नाग देवता दोष, नवम भाव धर्म स्थान दोष, दशम भाव पितर दोष, लाभ भाव ग्रह दशा, व्यय भाव पिछले
जन्म का ब्रहम दोष होता है। कोई ग्रह किसी घर में पीड़ित हो, सूर्य दो ग्रहों द्वारा पीड़ित हो तो जिस घर
में होगा वही दोष होगा।
पितृ ऋण या पितृ दोष
पितृ ऋण या पितृ दोष ,
जन्म -कुंडली में एक ऐसा दोष है जोकि इन्सान की प्रगति में बाधक होता है।
किसी भी कुंडली को देखने से यह बताया
है कि जातक को किस प्रकार का ऋण दोष है।
सबसे पहले तो यह जानते हैं कि पितृ दोष क्या है।
इसके बहुत सारे ज्योतिषीय कारण है।
इसे राहू , सूर्य
वृहस्पति की विभिन्न भावों में स्थिति से जाना जा सकता है। यह भी कई प्रकार के होते हैं जैसे पितृ ऋण ,
स्त्री ऋण , भगिनी ऋण , भ्राता ऋण ,
गुरु ऋण , मातृ ऋण आदि।
पूर्व जन्म में यदि किसी ने किसी को
संताप दिया हो जैसे दैहिक , भौतिक या मानसिक भी , तो वह अगले जन्म में उस जातक की कुंडली में दोष बन कर जीवन
में बाधा का कारण बन जाता है।
लक्षण :--
१) . परिवार में अशांति , विशेषतया भोजन के
समय कोई बहस या तकरार।
२ ). कन्या संतान का जन्म और पुत्र का अभाव।
३ ). धन की बरकत न
होना।
४ ). घर में बीमारी बनी रहना।
५ ). निसन्तान रहना।
६ ). बच्चों के विवाह में अड़चन।
७ ). कोई भी शुभ काम के बाद कोई अशुभ होना। जैसे झगड़ा ,
चोट लगना , आग लगना , मौत या मौत की
खबर आदि कोई भी अशुभ समाचार मिलना।
पितृदोष की शांति के सरल
और सस्ते उपाय
आमतौर पर पितृदोष के लिए
खर्चीले उपाय बताए जाते हैं लेकिन यदि किसी जातक की कुंडली में पितृ दोष बन रहा है
और वह महंगे उपाय करने में असमर्थ है तो भी परेशान होने की कोई बात नहीं। पितृदोष
का प्रभाव कम करने के लिए ऐसे कई आसान, सस्ते व सरल उपाय भी हैं जिनसे इसका प्रभाव कम हो सकता है।
1. कुंडली में पितृ
दोष बन रहा हो तब जातक को घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने स्वर्गीय परिजनों का
फोटो लगाकर उस पर हार चढ़ाकर रोजाना उनकी पूजा स्तुति करना चाहिए। उनसे आशीर्वाद
प्राप्त करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है।
2. अपने स्वर्गीय
परिजनों की निर्वाण तिथि पर जरूरतमंदों अथवा गुणी ब्राह्मणों को भोजन कराए। भोजन
में मृतात्मा की कम से कम एक पसंद की वस्तु अवश्य बनाएं।
3. इसी दिन अगर हो
सके तो अपनी सामर्थ्यानुसार गरीबों को वस्त्र और अन्न आदि दान करने से भी यह दोष
मिटता है
4. पीपल के वृक्ष पर
दोपहर में जल, पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल, काले तिल चढ़ाएं और स्वर्गीय परिजनों का स्मरण
कर उनसे आशीर्वाद मांगें।
5. शाम के समय में
दीप जलाएं और नाग स्तोत्र, महामृत्युंजय
मंत्र या रुद्र सूक्त या पितृ स्तोत्र व नवग्रह स्तोत्र का पाठ करें। इससे भी पितृ
दोष की शांति होती है।
6. सोमवार प्रात:काल
में स्नान कर नंगे पैर शिव मंदिर में जाकर आक के 21 पुष्प, कच्ची लस्सी,
बिल्वपत्र के साथ शिवजी की पूजा करें। 21 सोमवार करने से पितृदोष का प्रभाव कम होता है।
7. कुंडली में
पितृदोष होने से किसी गरीब कन्या का विवाह या उसकी बीमारी में सहायता करने पर भी
लाभ मिलता है।
8. पितरों के नाम पर
गरीब विद्यार्थियों की मदद करने तथा दिवंगत परिजनों के नाम से अस्पताल, मंदिर, विद्यालय, धर्मशाला आदि का
निर्माण करवाने से भी अत्यंत लाभ मिलता है।
पितृ दोष के बुरे असरों
को कम किया जा सके
पितृ दोष के बारे में
इतनी चर्चा करने के बाद आइए अब विचार करें कि जन्म कुंडली में उपस्थित किन लक्षणों
से कुंडली में पितृ दोष के होने का पता चलता है। नव-ग्रहों में सूर्य सपष्ट रूप से
पूर्वजों के प्रतीक माने जाते हैं, इस लिए किसी
कुंडली में सूर्य को बुरे ग्रहों के साथ स्थित होने से या बुरे ग्रहों की दृष्टि
से अगर दोष लगता है तो यह दोष पितृ दोष कहलाता है। इसके अलावा कुंडली का नवम भाव
पूर्वजों से संबंधित होता है, इस लिए यदि
कुंडली के नवम भाव या इस भाव के स्वामी को कुंडली के बुरे ग्रहों से दोष लगता है
तो यह दोष भी पितृ दोष कहलाता है। पितृ दोष प्रत्येक कुंडली में अलग-अलग तरह के
नुकसान कर सकता है जिनका पता कुंडली का विस्तारपूर्वक अध्ययन करने के पश्चात ही चल
सकता है। पितृ दोष के निवारण के लिए सबसे पहले कुंडली में उस ग्रह या उन ग्रहों की
पहचान की जाती है जो कुंडली में पितृ दोष बना रहे हैं और उसके पश्चात उन ग्रहों के
लिए उपाय किए जाते हैं जिससे पितृ दोष के बुरे असरों को कम किया जा सके।
इन बाधाओं के निवारण के
लिए कुछ उपाय हैं
इन बाधाओं के निवारण के लिए कुछ उपाय हैं जो
निम्नलिखित हैं :-
1. यदि किसी व्यक्ति
की कुंडली में सूर्य-राहु, सूर्य-शनि आदि
योग के कारण पितृ दोष बन रहा है तब उसके लिए नारायण बलि, नाग बलि, गया में श्राद्ध,
आश्विन कृष्ण पक्ष में पितरों का श्राद्ध,
पितृ तर्पण, ब्राह्मण भोजन तथा दानादि करने से शांति प्राप्त होती है.
2. मातृ दोष |
यदि कुंडली में चंद्रमा
पंचम भाव का स्वामी होकर शनि, राहु, मंगल आदि क्रूर ग्रहों से युक्त या आक्रान्त हो
और गुरु अकेला पंचम या नवम भाव में है तब मातृ दोष के कारण संतान सुख में कमी का
अनुभव हो सकता है. मातृ दोष के शांति उपाय | यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मातृ दोष बन रहा है तब इसकी
शांति के लिए गोदान करना चाहिए या चांदी के बर्तन में गाय का दूध भरकर दान देना
शुभ होगा. इन शांति उपायों के अतिरिक्त एक लाख गायत्री मंत्र का जाप करवाकर हवन
कराना चाहिए तथा दशमांश तर्पण करना चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए,
वस्त्रादि का दान अपनी सामर्थ्य अनुसार् करना
चाहिए. इससे मातृ दोष की शांति होती है. मातृ दोष की शांति के लिए पीपल के वृक्ष
की 28 हजार परिक्रमा करने से
भी लाभ मिलता है.
3. भ्रातृ दोष |
तृतीय भावेश मंगल यदि किसी व्यक्ति की कुंडली
में राहु के साथ पंचम भाव में हो तथा पंचमेश व लग्नेश दोनों ही अष्टम भाव में है
तब भ्रातृ शाप के कारण संतान प्राप्ति बाधा तथा कष्ट का सामना करना पड़ता है.
भ्रातृ दोष के शांति उपाय | भ्रातृ दोष की
शांति के लिए श्रीसत्यनारायण का व्रत रखना चाहिए और सत्यनारायण भगवान की कथा कहनी
या सुननी चाहिए तथा विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके सभी को प्रसाद बांटना चाहिए.
4. सर्प दोष |
यदि पंचम भाव में राहु है
और उस पर मंगल की दृष्टि हो या मंगल की राशि में राहु हो तब सर्प दोष की बाधा के
कारण संतान प्राप्ति में व्यवधान आता है या संतान हानि होती है. सर्प दोष के शांति
उपाय | सर्प दोष की शांति के लिए
नारायण नागबली विधिपूर्वक करवानी चाहिए. इसके बाद ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्यानुसार
भोजन कराना चाहिए, उन्हें वस्त्र,
गाय दान, भूमि दान, तिल, चांदी या सोने का दान भी करना चाहिए. लेकिन एक
बात ध्यान रखें कि जो भी करें वह अपनी यथाशक्ति अनुसार करें.
5. ब्राह्मण श्राप
या दोष |
किसी व्यक्ति की कुंडली
में यदि धनु या मीन में राहु स्थित है और पंचम भाव में गुरु, मंगल व शनि हैं और नवम भाव का स्वामी अष्टम भाव
में है तब यह ब्राह्मण श्राप की कुंडली मानी जाती है और इस ब्राह्मण दोष के कारण
ही संतान प्राप्ति में बाधा, सुख में कमी या
संतान हानि होती है. ब्राह्मण श्राप के शांति उपाय | ब्राह्मण श्राप की शांति के लिए किसी मंदिर में या किसी
सुपात्र ब्राह्मण को लक्ष्मी नारायण की मूर्तियों का दान करना चाहिए. व्यक्ति अपनी
शक्ति अनुसार किसी कन्या का कन्यादान भी कर सकता है. बछड़े सहित गाय भी दान की जा
सकती है. शैय्या दान की जा सकती है. सभी दान व्यक्ति को दक्षिणा सहित करने चाहिए.
इससे शुभ फलों में वृद्धि होती है और ब्राह्मण श्राप या दोष से मुक्ति मिलती है.
6. मातुल श्राप |
यदि किसी व्यक्ति की
कुंडली में पांचवें भाव में मंगल, बुध, गुरु तथा राहु हो तब मामा के श्राप से संतान
प्राप्ति में बाधा आती है. मातुल श्राप के शांति उपाय | मातुल श्राप से बचने के लिए किसी मंदिर में श्री विष्णु जी
की प्रतिमा की स्थापना करानी चाहिए. लोगों की भलाई के लिए पुल, तालाब, नल या प्याउ आदि लगवाने से लाभ मिलता है और मातुल श्राप का प्रभाव कुछ कम होता
है.
7. प्रेत श्राप |
किसी व्यक्ति की कुंडली
में यदि पंचम भाव में शनि तथा सूर्य हों और सप्तम भाव में कमजोर चंद्रमा स्थित हो
तथा लग्न में राहु, बारहवें भाव में
गुरु हो तब प्रेत श्राप के कारण वंश बढ़ने में समस्या आती है. यदि कोई व्यक्ति
अपने दिवंगत पितरों और अपने माता-पिता का श्राद्ध कर्म ठीक से नहीं करता हो या
अपने जीवित बुजुर्गों का सम्मान नहीं कर रह हो तब इसी प्रेत बाधा के कारण वंश
वृद्धि में बाधाएँ आ सकती हैं. प्रेत श्राप के शांति उपाय |
पितृ दोष के विशेष योग और
उपाय
जन्म के समय व्यक्ति अपनी
कुण्डली में बहुत से योगों को लेकर पैदा होता है.
यह योग बहुत अच्छे हो सकते हैं, बहुत खराब हो सकते हैं, मिश्रित फल प्रदान करने वाले हो सकते हैं या व्यक्ति के पास
सभी कुछ होते हुए भी वह परेशान रहता है.
सब कुछ होते भी व्यक्ति दुखी होता है! इसका क्या
कारण हो सकता है?
कई बार व्यक्ति को अपनी परेशानियों का कारण नहीं
समझ आता तब वह ज्योतिषीय सलाह लेता है.
तब उसे पता चलता है कि
उसकी कुण्डली में पितृ-दोष बन रहा है और इसी कारण वह परेशान है.
बृहतपराशर होरा शास्त्र
के अनुसार जन्म कुंडली में 14 प्रकार के शापित
योग हो सकते हैं.
जिनमें पितृ दोष, मातृ दोष, भ्रातृ दोष,
मातुल दोष, प्रेत दोष आदि को प्रमुख माना गया है.
इन शाप या दोषों के कारण व्यक्ति को स्वास्थ्य
हानि, आर्थिक संकट, व्यवसाय में रुकावट, संतान संबंधी समस्या आदि का सामना करना पड़ सकता है.
पितृ दोष के बहुत से कारण
हो सकते हैं. उनमें से जन्म कुण्डली के आधार पर कुछ कारणों का उल्लेख किया जा रहा
है जो निम्नलिखित हैं :-
जन्म कुण्डली के पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें या दसवें
भाव में यदि सूर्य-राहु या सूर्य-शनि एक साथ स्थित हों तब यह पितृ दोष माना जाता
है.
इन भावों में से जिस भी भाव में यह योग बनेगा
उसी भाव से संबंधित फलों में व्यक्ति को कष्ट या संबंधित सुख में कमी हो सकती
है.
सूर्य यदि नीच का होकर राहु या शनि के साथ है
तब पितृ दोष के अशुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है.
किसी जातक की कुंडली में लग्नेश यदि छठे,
आठवें या बारहवें भाव में स्थित है और राहु
लग्न में है तब यह भी पितृ दोष का योग होता है.
जो ग्रह पितृ दोष बना रहे हैं यदि उन पर छठे,
आठवें या बारहवें भाव के स्वामी की दृष्टि या
युति हो जाती है तब इस प्रभाव से व्यक्ति को वाहन दुर्घटना, चोट, ज्वर, नेत्र रोग, ऊपरी बाधा, तरक्की में रुकावट,
बनते कामों में विघ्न, अपयश की प्राप्ति, धन हानि आदि अनिष्ट फलों के मिलने की संभावना बनती है.
उपाय
यदि आपकी कुण्डली में उपरोक्त पितृ दोष में से
कोई एक बन रहा है तब आपको जिस रविवार को संक्रांति पड़ रही है या अमावस्या पड़ रही
है उस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए तथा लाल वस्तुओं का दान करना चाहिए.
उन्हें यथा संभव दक्षिणा
भी देनी चाहिए. पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष के प्रभाव में कमी आती है.
जन्म कुंडली में चंद्र-राहु, चंद्र-केतु, चंद्र-बुध, चंद्र-शनि,
आदि की युति से मातृ दोष होता है. यह दोष भी
पितृ दोष की ही भाँति है. इन योगों में
चंद्र-राहु, और सूर्य-राहु की युति को
ग्रहण योग कहते हैं. यदि बुध की युति राहु के साथ है तब यह जड़त्व योग बनता है. इन
योगों के प्रभावस्वरुप भाव स्वामी की स्थिति के अनुसार ही अशुभ फल मिलते हैं. वैसे
चंद्र की युति राहु के साथ कभी भी शुभ नही मानी जाती है. इस युति के प्रभाव से
माता या पत्नी को कष्ट होता है, मानसिक तनाव रहता
है, आर्थिक परेशानियाँ,
गुप्त रोग, भाई-बांधवों से वैर-विरोध, परिजनों का व्यवहार परायों जैसा होने के फल मिल सकते
हैं.
जन्म कुण्डली में दशम भाव का स्वामी छठे,
आठवें अथवा बारहवें भाव में हो और इसका राहु के
साथ दृष्टि संबंध या युति हो रही हो तब भी पितृ दोष का योग बनता है.
यदि जन्म कुंडली में आठवें या बारहवें भाव में
गुरु व राहु का योग बन रहा हो तथा पंचम भाव में सूर्य-शनि या मंगल आदि क्रूर ग्रहों
की स्थिति हो तब पितृ दोष के कारण संतान कष्ट या संतान से सुख में कमी रहती
है.
बारहवें भाव का स्वामी लग्न में स्थित हो,
अष्टम भाव का स्वामी पंचम भाव में हो और दशम
भाव का स्वामी अष्टम भाव में हो तब यह भी पितृ दोष की कुंडली बनती है और इस दोष के
कारण धन हानि या संतान के कारण कष्ट होता है.
इन योगों के अतिरिक्त कुंडली में कई योग ऎसे
भी बन जाते हैं जो कई प्रकार से कष्ट पहुंचाने का काम करते हैं. जैसे पंचमेश राहु
के साथ यदि त्रिक भावों (6, 8, 12) में स्थित है और
पंचम भाव शनि या कोई अन्य क्रूर ग्रह भी है तब संतान सुख में कमी हो सकती है. शनि
तथा राहु के साथ अन्य शुभ ग्रहों के मिलने से कई तरह के अशुभ योग बनते हैं जो पितृ
दोष की ही तरह बुरे फल प्रदान करते हैं.
पितृ दोष की शांति के विशेष उपाय | यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष बन रहा है और वह महंगे उपाय करने में
असमर्थ है तब वह सरल उपायों के द्वारा भी पितृ दोष के प्रभाव को कम कर सकता है.
यह उपाय निम्नलिखित हैं :-
यदि किसी की कुंडली में
पितृ दोष बन रहा हो तब उस व्यक्ति को अपने घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने
दिवंगत पूर्वजों का फोटो लगाकर उस पर हार चढ़ाकर उन्हें सम्मानित करना चाहिए.
पूर्वजों की मृत्यु की तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, अपनी सामर्थ्यानुसार वस्त्र और दान-दक्षिणा आदि
देनी चाहिए. नियम से पितृ तर्पण और श्राद्ध करते रहना चाहिए.
जिन व्यक्तियों के माता-पिता जीवित हैं उनका
आदर-सत्कार करना चाहिए. भाई-बहनों का भी सत्कार आपको करते रहना चाहिए. धन, वस्त्र, भोजनादि से सेवा करते हुए समय-समय पर उनका आशीर्वाद ग्रहण
करना चाहिए.
प्रत्येक अमावस्या के दिन अपने पितरों का ध्यान
करते हुए पीपल के पेड़ पर कच्ची लस्सी, थोड़ा गंगाजल, काले तिल,
चीनी, चावल, जल तथा पुष्प अर्पित करें
और “ऊँ पितृभ्य: नम:” मंत्र का जाप करें. उसके बाद पितृ सूक्त का पाठ
करना शुभ फल प्रदान करता है.
प्रत्येक संक्रांति, अमावस्या और रविवार के दिन सूर्यदेव को ताम्र बर्तन में लाल
चंदन, गंगाजल और शुद्ध जल
मिलाकर बीज मंत्र पढ़ते हुए तीन बार अर्ध्य दें.
प्रत्येक अमावस्या के दिन दक्षिणाभिमुख होकर
दिवंगत पितरों के लिए पितृ तर्पण करना चाहिए. पितृ स्तोत्र या पितृ सूक्त का पाठ
करना चाहिए. त्रयोदशी को नीलकंठ स्तोत्र का पाठ करना, पंचमी तिथि को सर्पसूक्त पाठ, पूर्णमासी के दिन श्रीनारायण कवच का पाठ करने के बाद
ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार मिठाई तथा दक्षिणा सहित भोजन कराना चाहिए.
इससे भी पितृ दोष में कमी आती है और शुभ फलों की प्राप्ति होती है.
पितरों की शांति के लिए जो नियमित श्राद्ध किया
जाता है उसके अतिरिक्त श्राद्ध के दिनों में गाय को चारा खिलाना चाहिए. कौओं,
कुत्तों तथा भूखों को खाना खिलाना चाहिए. इससे
शुभ फल मिलते हैं. श्राद्ध के दिनों
में माँस आदि का मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए. शराब तथा अंडे का भी त्याग करना
चाहिए. सभी तामसिक वस्तुओं को सेवन छोड़ देना चाहिए और पराये अन्न से परहेज करना
चाहिए.
पीपल के वृक्ष पर मध्यान्ह में जल, पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल, काले तिल चढ़ाएँ. संध्या समय में दीप जलाएँ और नाग स्तोत्र,
महामृत्युंजय मंत्र या रुद्र सूक्त या पितृ
स्तोत्र व नवग्रह स्तोत्र का पाठ करें. ब्राह्मण को भोजन कराएँ. इससे भी पितृ दोष
की शांति होती है.
सोमवार के दिन 21 पुष्प आक के लें, कच्ची लस्सी, बिल्व पत्र के साथ शिवजी की पूजा करें. ऎसा करने से पितृ दोष का प्रभाव कम
होता है.
प्रतिदिन इष्ट देवता व कुल देवता की पूजा करने
से भी पितृ दोष का शमन होता है.
कुंडली में पितृ दोष होने से किसी गरीब कन्या
का विवाह या उसकी बीमारी में सहायता करने पर भी लाभ मिलता है.
ब्राह्मणों को गोदान, कुंए खुदवाना, पीपल तथा बरगद के पेड़ लगवाना, विष्णु भगवान के
मंत्र जाप, श्रीमदभागवत गीता का पाठ
करना, पितरों के नाम पर अस्पताल,
मंदिर, विद्यालय, धर्मशाला,
आदि बनवाने से भी लाभ मिलता है.
पितृदोष के कारण संतान कष्ट होने के उपाय |
पितृ दोष के कारण कई
व्यक्तियों को संतान प्राप्ति में बाधा तथा रुकावटों का सामना करना पड़ता है.
सूर्य के कारण है पितृ
दोष तो करें ये 7 चमत्कारी उपाय
ज्योतिष शास्त्र के
अनुसार किसी भी व्यक्ति की कुंडली देखकर यह बताया जा सकता है कि उसे पितृ दोष है
या नही और यदि है किन ग्रहों के कारण। उन ग्रहों के उपाय कर इस दोष के प्रभाव को
कुछ कम किया जा सकता है। ज्योतिषिय मत के अनुसार पितृ दोष होने का एक कारण सूर्य
की अशुभ ग्रहों के साथ बन रही युति भी है। यदि आपकी कुंडली में भी इसी वजह से पितृ
दोष बन रहा है तो नीचे लिखे उपाय करें-
- रविवार के दिन घर
में विधि-विधान पूर्वक सूर्य यंत्र स्थापित करें। रोज इस यंत्र का पूजन विधि-विधान
पूर्वक करें।
- सूर्य को रोज
तांबे के लोटे में जल उसमें लाल फूल, कुंकुम व चावल मिला कर अध्र्य दें।
- इस मंत्र का जप रोज करें। मंत्र जप करते समय आपका मुख पूर्व
दिशा में होना चाहिए
- ऊँ आदित्याय
विद्महे, प्रभाकराय, धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्।।
पांच मुखी रूद्राक्ष धारण करें व रोज 12 ज्योतिर्लिंगों के नामों का स्मरण करें।
- बुजुर्गों का
अपमान न करें तथा उनकी मदद का प्रयास करें।
रविवार के दिन गाय को
गेहूं व गुड़ खिलाएं। स्वयं घर से निकलते समय गुड़ खाएं।
- लग्न के अनुसार
सोने ये तांबे में 5 रत्ती के ऊपर का
माणिक्य रविवार के दिन विधि-विधान से धारण करें।
गर्भ मास के अधिपति ग्रह
व उनके
प्रेत शांति के लिए भगवान
शिवजी का पूजन करवाने के बाद विधि-विधान से रुद्राभिषेक कराना चाहिए. ब्राह्मणों
को अन्न, वस्त्र, फल, गोदान आदि उचित दक्षिणा सहित अपनी यथाशक्ति अनुसार देनी चाहिए. इससे प्रेत
बाधा से राहत मिलती है. गयाजी, हरिद्वार,
प्रयाग आदि तीर्थ स्थानों पर स्नान तथा दानादि
करने से लाभ और शुभ फलों की प्राप्ति होती है.
गर्भ मास के अधिपति ग्रह
व उनका दान गर्भाधान से नवें महीने तक प्रत्येक मास के अधिपति ग्रह के पदार्थों का
उनके वार में दान करने से गर्भ क्षय का भय नहीं रहता
गर्भ मास के अधिपति ग्रह
व उनके दान निम्नलिखित हैं
प्रथम मास — – शुक्र (चावल ,चीनी ,गेहूं का आटा ,दूध ,दही ,चांदी ,श्वेत वस्त्र व दक्षिणा शुक्रवार को )
द्वितीय मास — –मंगल ( गुड ,ताम्बा ,सिन्दूर ,लाल वस्त्र , लाल फल व दक्षिणा मंगलवार को )
तृतीय मास — – गुरु ( पीला वस्त्र ,हल्दी ,स्वर्ण , पपीता ,चने कि दाल , बेसन व दक्षिणा
गुरूवार को )
चतुर्थ मास — – सूर्य ( गुड , गेहूं ,ताम्बा ,सिन्दूर ,लाल वस्त्र , लाल फल व दक्षिणा रविवार को )
पंचम मास —- चन्द्र (चावल ,चीनी ,गेहूं का आटा ,दूध ,दही ,चांदी ,श्वेत वस्त्र व दक्षिणा सोमवार को )
षष्ट मास — –- शनि ( काले तिल ,काले उडद ,तेल ,लोहा ,काला वस्त्र व दक्षिणा शनिवार को )
सप्तम मास —– बुध ( हरा वस्त्र ,मूंग ,कांसे का पात्र ,हरी सब्जियां व दक्षिणा बुधवार को )
अष्टम मास —- गर्भाधान कालिक लग्नेश ग्रह से सम्बंधित दान
उसके वार में |यदि पता न हो तो
अन्न ,वस्त्र व फल का दान अष्टम
मास लगते ही नकार दें |
नवं मास —- चन्द्र (चावल ,चीनी ,गेहूं का आटा ,दूध ,दही ,चांदी ,श्वेत वस्त्र व दक्षिणा सोमवार को )
पितृदोष विवेचन
विश्लेषण और निवारण हेतु पितृशांति के लिए
मंत्र :-
पितृदोष क्या है और कैसे
होता है:-
ज्योतिषीय योग के कारण
बनता है पितर दोष, मुक्त न होने पर
हर कार्य में आती है बाधा, नजरअंदाज करना भी
पड़ता है भारी अक्सर लोगों को यह शिकायत होती है कि उनके बने बनाए कार्य बिगड़ जाते हैं। कुछ लोग अपनी
किस्मत को ही दोष देने से नहीं चूकते हैं। वहीं ज्योतिषाचार्यों से परामर्श के बाद
जब उन्हें ज्ञात होता है कि उन्हें पितर दोष लगा हुआ है तो वे अक्सर घबरा जाते
हैं। जिसका फायदा कुछ लोग उठाकर उन्हें ठग लेते हैं। जबकि हकीकत में पितर दोष का
मुख्य कारण ज्योतिषीय योग है, और उसका निवारण
भी आसान है। लोगों को कुंडली में व्याप्त दोषों की जानकारी होना चाहिए। इसके लिए
वे उचित कुंडली ज्ञाता या ज्योतिषाचार्य से संपर्क करें। ताकि भय के बिना वे इस
दोष से मुक्ति पा सकें।
जब किसी भी व्यक्ति की कुंडली के नवम पर जब
सूर्य और राहू की युति हो रही हो तो यह समझा जाता है कि उसके पितृ दोष योग बन रहा
है | भारतीय संस्कृति में
पुराणों और शास्त्रों के अनुसार सूर्य तथा राहू जिस भी भाव में बैठते है, उस भाव के सभी फल
नष्ट हो जाते है | यह योग व्यक्ति
की कुण्डली में एक ऎसा दोष है जो सभी प्रकार के दु:खों को एक साथ देने की क्षमता
रखता है, इस दोष को पितृ दोष के
नाम से जाना जाता है | धर्म ग्रंथों के
अनुसार, जो लोग श्राद्ध पक्ष के
दौरान से कुछ समस्या इस प्रकार है- अपने
पितरों का तर्पण, पिण्डदान व
श्राद्ध नहीं करते, उन्हें कई
समस्याओं का सामना करना पड़ता है।उनमें से निम्न पितर दोष के लक्षण है
1.विवाह ना होना या
विवाह होने मैं बहुत समस्या होना
2.वैवाहिक जीवन में
कलह होना
3.परीक्षा में
बार-बार फ़ैल होना
4.नौकरी का ना
मिलना या बार २ नौकरी छूटना
5.गर्भपात या गर्भधारण
मैं बहुत ज्यादा समस्या
6.बच्चे की अकाल
मृत्यु हो जाना
7.मंदबुद्धि बच्चे
का जन्म होना
8.अपने आप पर
विश्वास ना होना या कोई निर्णय न ले पाना
9.बात बात पर क्रोध
आना
10.बहुत मेह्नत के
बावजूद व्यापर ना चलना
11. जिन लोगों की
कुंडली में पितृ दोष होता है उनके यहां संतान होने में समस्याएं आती हैं। कई बार
तो संतान पैदा ही नहीं होती और यदि संतान हो जाए तो उनमें से कुछ अधिक समय तक
जीवित नहीं करती है।
12. पितृ दोष होने के
कारण ऐसे लोगों को हमेशा धन की कमी रहती है। किसी न किसी रूप में धन की हानि होती
रहती है।
13. जिन लोगों को
पितृ दोष होता है, उनकी शादी होने
में कई प्रकार की समस्याएं आती हैं।
14. घर-परिवार में
किसी न किसी कारण झगड़ा होता रहता है। परिवार के सदस्यों में मनमुटाव बना रहता है
व मानसिक अशांति के कारण जीना दूभर हो जाता है।
15. यदि कोई व्यक्ति
लंबे समय तक किसी मुकद्में में उलझा रहे या बिना किसी कारण उसे कोर्ट-कचहरी के
चक्कर काटना पड़े तो ये भी पितृ दोष का कारण हो सकता है।
16. पितृ दोष होने पर
परिवार का एक न एक सदस्य निरंतर रूप से बीमार रहता है। यह बीमारी भी जल्दी ठीक
नहीं होती।
17. पितृ दोष होने के
कारण कन्या के विवाह में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है या तो कन्या का
विवाह जल्दी नहीं होता या फिर मनचाहा वर नहीं मिल पाता।
18. सबसे सटीक जब
भोजन परोसे तो झगड़ा हो बिना बात के
उपरोक्त में से एक न एक
बाधा पितृ दोष के कारण बनी रहती है।
क्या सभी को पितृ दोष से
ग्रसित होतेहै? या कुछ लोग?
इसका पता कैसे लगाया जा
सकत है,
जातक की जन्म कुण्डली
देखकर भी पता लगाया जा सकता है,इसके अलावा
प्रश्न कुंडली,मृत्यु कुंडली,और पदमचक्र के माध्यम से भी पितृ दोष का पता
लगाया जा सकता है,परन्तु प्राय ये
विधिया प्रचललन में नहीं है,मुख्य रूप से
जन्म कुण्डली से ही पितृ दोष का निर्णय किया जाता है,सूर्य आत्मा एव पिता का कारक गृह है,पिता का विचार सूर्य से होता है,इसी प्रकार चन्द्रमा मन एव माता का कारक ग्रह है, सूर्य जब राहु की युति में हो तो ग्रहण योग
बनता है,सूर्य का ग्रहण अतः पिता
आत्मा का ग्रहण हुआ,सूर्य राहु की
युति पितृ दोष का निर्माण करती है,सूर्य व
चन्द्र अलग अलग या दोनों ही राहु की युति में हो तो पितृ दोष होता
है,शनि सूर्य पुत्र है। यह
सूर्य का नैसर्गिक शत्रु भी है,अतः शनि की सूर्य
पर दर्ष्टि भी पितृ दोष उत्पन करती है,इसी पितृ दोष से जातक आदि व्याधि उपाधि तीनो प्रकार की पीड़ाओं से कष्ट उठाता
है,उसके प्रत्येक कार्ये में
अड़चन आती है.कोई भी कार्य सामान्य रूप से निर्विघ्न सम्पन्न नहीं होते है,दूसरे की दृष्टि में जातक सुखी दिखाई पड़ता है,परन्तु जातक अतिरिक्त रूप से दुखी होता है,जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट उठाता है,कष्ट किस प्रकार के होते है इसका विचार व
निर्णय सूर्य राहु की युति अथवा सूर्य शनि की दृष्टि सम्बन्ध या युति जिस भाव में
हो उसी पर निर्भर करता है,कुंडली में
चतुर्थ भाव नवम भाव,तथा दशम भाव में
सूर्य राहु अथवा चन्द्र राहु की युति से जो पितृ दोष उतपन्न होता उसे श्रापित पितृ
दोष कहते है,इसी प्रकार पंचम भाव में
राहु गुरु की युति से बना गुरु चांडाल योग भी प्रबल पितृ दोष कारक होता होता है,संतान भाव में इस दोष के कारण प्रसव कष्टकारक
होता है, आठवे या बारहवे भाव में
स्थित गुरु प्रेतात्मा से पितृ दोष करता है,यदि इन भावो में राहु बुध की युति में हो तथा सप्तम,अष्टम भाव में राहु और शुक्र की युति में हो तब भी पूर्वजो
के दोष से पितृ दोष होता है,यदि राहु शुक्र
की युति द्वादश भाव में हो तो पितृ दोष स्त्री जातक से होता है इसका कारण भी
स्पष्ट होता है की बारहवा भाव भोग एव शैया सुख का स्थान है,अतः स्त्री जातक से दोष होना स्वभाविक है।
पितृ दोष में जिम्मेदार
ज्योतिषीय योग:-
01 ---यदि कुण्डली में
में अष्टमेश राहु के नक्षत्र में तथा राहु अष्टमेश के नक्षत्र में स्थित हो
तथा लग्नेश निर्बल एव पीड़ित हो तो जातक पितृ दोष एव भूत प्रेत आदि
से शीघ्र प्रभावित होते है,
02--यदि जातक का जन्म
सूर्य चन्द्र ग्रहण में हो तथा घटित होने वाले ग्रहण का का सम्बन्ध जातक के लग्न,षष्ट एव अष्टम भाव बन रहा हो तो ऐसे जातक पितृ
दोष,भूत प्रेत,एव अतृप्त आत्माओं के प्रभाव से पीड़ित रहते है,
03-- यदि लग्नेश जन्म
कुण्डली में अथवा नवमांश कुण्डली में अपनी नीच राशि में स्थित हो तथा राहु ,शनि,मंगल के प्रभाव से युक्त हो तो जातक पितृ दोष,अतृप्त आत्माओं का शिकार होता है,
04 -- यदि जन्म कुण्डली
में अष्टमेश पंचम भाव तथा पंचमेश अष्टम
भाव में स्थित हो तथा चतुर्थेश षष्ठ भाव में स्थित हो और लग्न और लग्नेश पापकर्तरी
योग में स्थित हो तो जातक मातृ शाप एव अतृप्त आत्माओं से प्रभावित होता है,
05-- यदि चन्द्रमा
जन्म कुण्डली अथवा नवमांश कुण्डली में अपनी नीच राशि में स्थित हो तथा चन्द्रमा एव
लग्नेश का सम्बन्ध क्रूर एव पाप ग्रहो से बन रहा हो तो जातक पितृ दोष,प्रेतज्वर,एव अतृप्त आत्माओं से प्रभावित होता है,
06-- यदि कुंडली में
शनि एव चन्द्रमा की युति हो अथवा चन्द्रमा शनि के नक्षत्र में,अथवा शनि चन्द्रमा के नक्षत्र में स्थित हो तो
जातक ऊपरी हवा,पितृदोष,एव अतृप्त आत्माओं से शीघ्र प्रभावित होता है,
07-- यदि लग्नेश जन्म
कुंडली में अपनी शत्रु राशि में निर्बल आव दूषित होकर स्थित हो तथा क्रूर एव पाप
ग्रहो से युक्त हो तथा शुभ ग्रहो की दृस्टि लग्न भाव एव लग्नेश पर नहीं पड़ रही हो,तो जातक ऊपरी हवा,एव पितृ दोष से पीड़ित होता है,
08-- यदि जातक का जन्म
कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की सप्तमी के मध्य हुआ हो और चन्द्रमा अस्त,निर्बल,एव दूषित हो,अथवा चन्द्रमा
पक्षबल में निर्बल हो,तथा राहु शनि से
युक्त नक्षत्रिये परिवर्तन बना रहा हो तो जातक अद्रशय रूप से मानशिक उन्माद का शिकार
होता है
09--यदि जन्म कुंडली
में चन्द्रमा राहु का नक्षत्रीय योग परिवर्तन योग बना रहा हो,तथा चन्द्रमा पर अन्य क्रूर अव पाप ग्रहो का
प्रभाव एव लग्न एव लग्नेश भाव पर हो तो
जातक अतृपत आत्माओं का का प्रभाव होता है,
10-- यदि कुंडली में
चन्द्रमा राहु के नक्षत्र में स्थित हो तथा अन्य क्रूर एव पाप ग्रहो का प्रभाव
चन्द्रमा,लग्नेश,एव लग्न भाव पर हो तो जातक अतृप्त आत्माओं से
प्रभावित होता है है,
11--यदि कुंडली में
गुरु का सम्बन्ध राहु से हो तथा लग्नेश एव लग्न भाव पापकर्तरी योग में हो तो जातक
को अतृप्त आत्माए अधिक परेशान करती है,.
12--यदि बुध एव राहु में नक्षत्रीय परिवर्तन हो तथा
लग्नेश निर्बल होकर अष्टम भाव में स्थित हो साथ ही लग्न एव लग्नेश पर क्रूर एव पाप
ग्रहो का प्रभाव हो तो जातक अतृप्त आत्माओं से परेसान रहता है और मनोरोगी बन जाता
है,
13-- यदि कुंडली में
अष्टमेश लग्न में स्थित हो तथा लग्न भाव तथा लग्नेश पर अन्य क्रूर तथा पाप ग्रहो
का प्रभाव हो तो जातक अतृपत आत्माओं का शिकार होता है,
14-- यदि जन्म कुण्डली
में राहु जिस राशि में स्थित हो उसका स्वामी निर्बल एव पीड़ित होकर अष्टम भाव में
स्थित हो तथा लग्न एव लग्नेश पापकर्तरी योग में स्थित हो तो जातक ऊपरी हवा,प्रेतज्वर,और अतृप्त आत्माओं से परेशान रहता है , इसके अतिरित और भी बहुत से योग कुंडली में होते
है जो जातक को पितृ दोष से ग्रसित होता है,पितृ दोष भी भांति भांति के होते है,इनमे पितृशाप,मातृशाप,प्रेतशाप आदि दोषो के कारण जातक को अनेक
कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है,और शारीरिक,मानशिक,पारिवारिक,अक्षमात
दुर्घटनाओं से परेशान रहता है,जातक जीवन नर्क
बन जाता है,
15-- व्यक्ति की
कुन्डली का नवम् भाव अथवा घर धर्म का सूचक है तथा यह पिता का घर भी होता है |
इसलिए अगर किसी की कुंडली में नवम् घर में
ग्रहों कि स्थिति ठीक नहीं है अर्थात खराब ग्रहों से ग्रसित है तो इसका तात्पर्य
है कि जातक के पूर्वजों की इच्छायें अधूरी रह गयीं थी अत: इस प्रकार का जातक हमेशा
तनाव में रहता है एवं उसे मानसिक, शारीरिक तथा
भौतिक समस्याओं और संकटों का सामना कारण पडता है |
अत: सपष्ट है कि जातक का
नवां भाव या नवें भाव का मालिक राहु या केतु से ग्रसित है तो यह सौ प्रतिशत
पितृदोष के कारणों में माना जाता है |
16-- लग्नेश की अष्टम
स्थान में स्थिति अथवा अष्टमेष की लग्न में स्थिति।
2. पंचमेश की अष्टम
में स्थिति या अष्टमेश की पंचम में स्थिति।
17-- नवमेश की अष्टम
में स्थिति या अष्टमेश की नवम में स्थिति।
18-- तृतीयेश, यतुर्थेश या दशमेश की उपरोक्त स्थितियां।
तृतीयेश व अष्टमेश का संबंध होने पर छोटे भाई बहनों, चतुर्थ के संबंध से माता, एकादश के संबंध से बड़े भाई, दशमेश के संबंध से पिता के कारण पितृ दोष की उत्पत्ति होती
है।
19-- सूर्य मंगल व शनि
पांचवे भाव में स्थित हो या गुरु-राहु बारहवें भाव में स्थित हो।
20-- राहु केतु की
पंचम, नवम अथवा दशम भाव में
स्थिति या इनसे संबंधित होना।
21-- राहु या केतु की
सूर्य से युति या दृष्टि संबंध (पिता के परिवार की ओर से दोष)।
22-- राहु या केतु का
चन्द्रमा के साथ युति या दृष्टि द्वारा संबंध (माता की ओर से दोष)। चंद्र राहु
पुत्र की आयु के लिए हानिकारक।
23-- राहु या केतु की
बृहस्पति के साथ युति अथवा दृष्टि संबंध (दादा अथवा गुरु की ओर से दोष)।
24-- मंगल के साथ राहु
या केतु की युति या दृष्टि संबंध (भाई की ओर से दोष)।
25-- वृश्चिक लग्न या
वृश्चिक राशि में जन्म भी एक कारण होता है, क्योंकि वह राशि चक्र के अष्टम स्थान से संबंधित है।
26-- शनि-राहु चतुर्थी
या पंचम भाव में हो तो मातृ दोष होता है। मंगल राहु चतुर्थ स्थान में हो तो मामा
का दोष होता है।
27-- यदि राहु शुक्र
की युति हो तो जातक ब्राहमण का अपमान करने से पीड़ित होता है। मोटे तौर पर राहु
सूर्य पिता का दोष, राहु चंद्र माता
दोष, राहु बृहस्पति दादा का
दोष, राहु-शनि सर्प और संतान
का दोष होता है।
28-- जब पीड़ित सूर्य,
मंगल, दुर्बल चंद्र, बुध दूषित बलहीन ,
नीचअस्त बलहीन बृहस्पति, शुक्र, शनि, की स्थिति लग्न से 2,5,6,8,9,10,12 भाव में राहु केतु से पीड़ित एवं त्रस्त हो तो
निश्चित ही पितृ दोष सिद्द होता है
पितृदोष निवारण पितृशांति
के उपाय
मुख्यतया: पितृदोष इस
आधुनिक युग में पितरों के प्रति अनदेखी और खून के रिश्ते के होकर भी उन्हें भुलाने
जैसे आज के इस स्वार्थवादी सभ्यता कि देन है | आजकल के इस आधुनिकरण के युग में न जाने कितने ही लोग रोज
अकाल मृत्यु के शिकार हो जाते है अत: इस प्रकार कल के गाल में समाये हुए परिजनों
की इच्छाएं अधूरी रह जाती है और वे मृत्युलोक के बंधन से मुक्त नहीं होकर यही
भटकते रहते है और यह आशा करते है कि उनके परिजन उनके लिए श्राद्धकर्म तथा तर्पणादि
कर उनको इस बंधन से मुक्त कराएँगे | पर जब उनके परिजनों द्वारा उनका तर्पण व श्राद्ध नहीं किया जाता है और यहाँ तक
उन्हें याद करने तक का समय भी उनके पास नहीं होता है तब भटकते हुए परिजनों अर्थात
पितरों के साथ खून का रिश्ता होने फलस्वरूप भी उनका तिरस्कार करने का फल उन्हें इस
पितृदोष के रूप में प्राप्त होता है |
इन दोषों के निराकारण के
लिए सर्वप्रथम जन्मकुंडली का उचित तरीके से विश्लेषण करें और यह ज्ञात करने की
चेष्टा करें कि यह दोष किस किस ग्रह से बन रहा है। उसी दोष के अनुरूप उपाय करने से
आपके कष्ट समाप्त हो जायेंगे।
1. अमावस्या के दिन
अपने पूर्वजों के नाम पर मन्दिर में दूध, चीनी, श्वेत वस्त्र व दक्षिणा
आदि दें।
2. पीपल की नित्य
(रविवार निषेध ) कच्चादूध जल सींच कर 108 परिक्रमा निरंतर 108 दिन तक लगाएं।
3. परिवार के किसी
सदस्य की अकाल मृत्यु होने पर उसके निमित्त पिंडदान अवश्य कराएं।गया, हरिद्वार , ब्रम्ह्कपाली में जाकर करना सर्वश्रेस्ठ
4. ग्रहण के समय दान
अवश्य करें।
5. जन कल्याण के
कार्य करें, वृक्षारोपण करें। जल की
व्यवस्था में सहयोग दें।
6. पितृदोष निवारण
के लिए विशेष रूप से निर्मित यंत्र लगाकर एक विशेष यंत्र का 45 दिन विधिवत पाठ करके गृह शुद्धि करें।
7.पितृदोष और
पितृशांति के लिये श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ 11 अध्याय का विशेष पाठ
करना सबसे उत्तम रहता है तथा पितृदोष और पितृशांति के लिए श्री कृष्ण
चरित्र कथा श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ विद्वान ब्राह्मणों से करवाना चाहिए |
और साथ ही पितृ पूजा भी
करवानी चाहिए |
8.पितृदोष और
पितृशांति के लिये सबसे पहले श्री कृष्ण की पूजा करनी चाहिए और भगवद्गीता के 11,
12 वें और 13वें अध्याय का पाठ, संकल्प के साथ करना चाहिए और इस पाठ को पितरों को समर्पित करना चाहिए |
9. इसी तरह
ग्रहशांति या सभी ग्रहों की शांति की लिए
निचे लिखे इस मंत्र की 1008 आहुतियाँ देनी
चाहिए :-
In Hindi:-
"ओम् नमो भगवते
वासुदेवाय"
In English:-
"Ohm Namo Bhagawate Vasudeway"
तथा
पितृदोष निवारण पितृशांति
के उपाय के लिए इस मंत्र को भी पितरों के चित्र के सम्मुख बैठकर श्रृद्धा और भक्ति
के साथ हवन करे और इस मंत्र का जाप करे |
In Hindi:-
ऊँ श्री सर्व
पितृ दोष निवारणाय कलेशम्
हं हं सुख शांतिम् देहि फट
स्वाहा: |
In English:-
Ohm Shree Sarva
Pitra Dosh Nivarnaay Kaleshm Han Han Sukh Shantim Dehi Fat
Svahaa: |
इन दोनों मन्त्रों की
यज्ञ या हवन में आहुतियाँ देनी चाहिए व प्रतिदिन संध्याकाल में इस मंत्र का जाप
करने से आपको जन्म कुंडली में स्थित अनिष्टकारक ग्रह भी आपका कुछ भी अनिष्ट नहीं
करेंगे |
10.अपने पितरों को
प्रसन्न करने के लिए और पितृ दोष से मुक्ति और उसके कुप्रभावों से बचने के लिए
पढ़ें पितृ स्तोत्र सूक्त एवं कवच...
अर्चितानाममूर्तानां
पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां
ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।
इन्द्रादीनां च नेतारो
दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां
तान् नमस्यामि कामदान् ।।
मन्वादीनां मुनीन्द्राणां
सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान्
पितृनप्सूदधावपि ।।
नक्षत्राणां ग्रहाणां च
वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा
नमस्यामि कृताञ्जलि:।।
देवर्षीणां जनितृंश्च
सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन्
नमस्येsहं कृताञ्जलि:।।
प्रजापते: कश्यपाय सोमाय
वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा
नमस्यामि कृताञ्जलि:।।
नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा
लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि
ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।
सोमाधारान् पितृगणान्
योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं
जगतामहम् ।।
अग्रिरूपांस्तथैवान्यान्
नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्नीषोममयं विश्वं यत
एतदशेषत:।।
ये तु तेजसि ये चैते
सोमसूर्याग्निमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा
ब्रह्मस्वरूपिण:।।
तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।
नमो नमो नमस्ते मे
प्रसीदन्तु स्वधाभुज:।।.
।।पितृ-सूक्तम्॥
उदिताम् अवर उत्परास
उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुम् यऽ ईयुर-वृका
ॠतज्ञास्ते नो ऽवन्तु पितरो हवेषु॥1॥
अंगिरसो नः पितरो नवग्वा
अथर्वनो भृगवः सोम्यासः।
तेषां वयम् सुमतो
यज्ञियानाम् अपि भद्रे सौमनसे स्याम्॥2॥
ये नः पूर्वे पितरः
सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।
तेभिर यमः सरराणो हवीष्य
उशन्न उशद्भिः प्रतिकामम् अत्तु॥3॥
त्वं सोम प्र चिकितो
मनीषा त्वं रजिष्ठम् अनु नेषि पंथाम्।
तव प्रणीती पितरो न
देवेषु रत्नम् अभजन्त धीराः॥4॥
त्वया हि नः पितरः सोम
पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः।
वन्वन् अवातः परिधीन्
ऽरपोर्णु वीरेभिः अश्वैः मघवा भवा नः॥5॥
त्वं सोम पितृभिः
संविदानो ऽनु द्यावा-पृथिवीऽ आ ततन्थ।
तस्मै तऽ इन्दो हविषा
विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥6॥
बर्हिषदः पितरः
ऊत्य-र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्।
तऽ आगत अवसा शन्तमे नाथा
नः शंयोर ऽरपो दधात॥7॥
आहं पितृन्त् सुविदत्रान्
ऽअवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
बर्हिषदो ये स्वधया
सुतस्य भजन्त पित्वः तऽ इहागमिष्ठाः॥8॥
उपहूताः पितरः सोम्यासो
बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।
तऽ आ गमन्तु तऽ इह
श्रुवन्तु अधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥9॥
आ यन्तु नः पितरः
सोम्यासो ऽग्निष्वात्ताः पथिभि-र्देवयानैः।
अस्मिन् यज्ञे स्वधया
मदन्तो ऽधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥10॥
अग्निष्वात्ताः पितर एह
गच्छत सदःसदः सदत सु-प्रणीतयः।
अत्ता हवींषि प्रयतानि
बर्हिष्य-था रयिम् सर्व-वीरं दधातन॥11॥
येऽ अग्निष्वात्ता येऽ
अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।
तेभ्यः स्वराड-सुनीतिम्
एताम् यथा-वशं तन्वं कल्पयाति॥12॥
अग्निष्वात्तान् ॠतुमतो
हवामहे नाराशं-से सोमपीथं यऽ आशुः।
ते नो विप्रासः सुहवा
भवन्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥13॥
आच्या जानु दक्षिणतो
निषद्य इमम् यज्ञम् अभि गृणीत विश्वे।
मा हिंसिष्ट पितरः केन
चिन्नो यद्व आगः पुरूषता कराम॥14॥
आसीनासोऽ अरूणीनाम्
उपस्थे रयिम् धत्त दाशुषे मर्त्याय।
पुत्रेभ्यः पितरः तस्य
वस्वः प्रयच्छत तऽ इह ऊर्जम् दधात॥15॥
॥ओमशांति: शांति:शांति:॥
पितृ कवच का पवित्र पाठ
कृणुष्व पाजः प्रसितिम् न
पृथ्वीम् याही राजेव अमवान् इभेन।
तृष्वीम् अनु प्रसितिम्
द्रूणानो अस्ता असि विध्य रक्षसः तपिष्ठैः॥
तव भ्रमासऽ आशुया
पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः।
तपूंष्यग्ने जुह्वा
पतंगान् सन्दितो विसृज विष्व-गुल्काः॥
प्रति स्पशो विसृज
तूर्णितमो भवा पायु-र्विशोऽ अस्या अदब्धः।
यो ना दूरेऽ अघशंसो योऽ
अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्॥
उदग्ने तिष्ठ
प्रत्या-तनुष्व न्यमित्रान् ऽओषतात् तिग्महेते।
यो नोऽ अरातिम् समिधान
चक्रे नीचा तं धक्ष्यत सं न शुष्कम्॥
ऊर्ध्वो भव प्रति
विध्याधि अस्मत् आविः कृणुष्व दैव्यान्यग्ने।
अव स्थिरा तनुहि
यातु-जूनाम् जामिम् अजामिम् प्रमृणीहि शत्रून्।
अग्नेष्ट्वा तेजसा
सादयामि॥
पितृ दोष को शान्त करने
के लिए और पितरों का आर्शिवाद प्राप्त करने के लिए पितृ गायत्री मंत्र सबसे
श्रेष्ठ है। पितृ पक्ष में इस मंत्र का जाप करने से रुष्ट पितृ तृप्त होकर अपनी
कृपा मंत्र जाप करने वाले के ऊपर जरुर करते है।
पितृ गायत्री मंत्र
ओऊम् देवताभ्यः
पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वाहायै स्वधायै
नित्यमेव नमो नमः ।।
इस मंत्र का जाप पितृ
पक्ष और अमावस्या के दिन करने से तत्काल पितृ शान्ति होती है। इस मंत्र का जाप
करते समय भगवान विष्णु के चरणों का ध्यान करना चाहिए।
11. हिंदू धर्म में
श्राद्ध की व्यवस्था इसलिए की गई है कि मनुष्य साल में एक बार अपने पितरों को याद
कर उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सके। श्राद्ध का अर्थ अपने पितरों से प्रति
व्यक्त की गई श्रद्धा से है। जिस व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष होता है, उसके लिए भी श्राद्ध पक्ष का समय विशेष होता है
क्योंकि इन 16 दिनों में किए गए कर्मों
के आधार पर ही पितृ दोष से मुक्ति मिलना संभव है।
12. किसी भी
अमावस्य को
पितृ दोष निवारण के लिए
अचूक पितृ त्रिपिंडी का अनुष्ठान अपने नगर से बाहर कोई शिव मंदिर नदी नहर पे किसी
विद्वान पुरोहित से करावे उस दिन के एक रात पहले चटाई पर सो कर ब्रम्हचर्य पालन
करे और उस दिन ध्यान रखे की घर की कोई
स्त्री रजस्वला ना हो पूरा घर गौमूत्र से
धोकर पवित्र करे पश्चात संध्या के समय ब्राह्मण भोज करा कर स्वर्ण कमल दान दे
13. अगर श्राद्ध करने
वाले की साधारण आय हो तह पितरों के श्राद्ध में केवल एक ब्राह्मण को भोजन कराए या
भोजन सामग्री जिसमें आटा, फल, गुड़, शक्कर, सब्जी और दक्षिणा दान
करें। इससे पितृ दोष का प्रभाव कम होता है।
14. अगर कोई व्यक्ति
गरीब हो और चाहने पर भी धन की कमी से पितरों का श्राद्ध करने में समर्थ न हो पाए
तो वह किसी पवित्र नदी के जल में काले तिल डालकर तर्पण करे। इससे भी पितृ दोष में
कमी आती है।
15. विद्वान ब्राह्मण
को एक मुट्ठी काले तिल दान करने मात्र से भी पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।
16. अगर कोई व्यक्ति
ऊपर बताए गए उपायों को करने में भी किसी कारणवश कठिनाई महसूस करे तो वह पितरों को
याद कर गाय को चारा खिला दे। इससे भी पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।
17. इतना भी संभव न
हो तो सूर्यदेव को हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि मैं श्राद्ध के लिए जरूरी धन और
साधन न होने से पितरों का श्राद्ध करने में असमर्थ हूं। इसलिए आप मेरे पितरों तक
मेरा भावनाओं और प्रेम से भरा प्रणाम पहुंचाएं और उन्हें तृप्त करें।
18. गौ को गुल,
शवान(कुत्ता) मीठी रोटी या बिस्कुट, चिटी को कीड़ी नगर सामग्री , कौवे को बेसन की सेवपपड़ी , मछली आटे की गोली खिलाकर सेवा करे
20. गरीबो में आटा
हलवा बाटे, सरसो के तेल से निर्मित
खाद्य, आमलेट, ब्रेड , छाता, कम्बल, कपडे, छप्पल जूते, लोहे के बर्तन
दान दे
21. घर में सफाई और
पानी की मटकियों के साथ एक छोटी मटकी पितरो के निमित स्थापित करे
22. पंचदेव को नित्य
ध्याये और हर महीने की संकस्टी चतुर्थी का
व्रत को गणेश पूजनकरे, हर महीने पुष्य नक्षत्र या प्रदोष को व्रत करे और शिव अभिषेक करे और मासिक
दुर्गाअष्ट्मी को व्रत सहित देवी सप्तशती के पाठ से हवन करे , सप्तमी को व्रत सहित गायत्री जप , सूर्य कवच मंत्र आदित्यह्रदय स्तोत्र का पाठ करे, और एकादशी अमावस्या को उपवास रखे,
और पूर्णिमा को
सत्यनारायण व्रत रखे और कथा कर गुरु गीता का पाठ करे यदि कोई ऐसा करता है तो कभी कुंडली खोल के
देखने की कोई ज़रूरत नहीं
23. रामायण का पाठ
श्रावण और राम चरितमानस की चौपाई का पाठ करना उत्तम विशेष कर केवल इस चौपाई का
नित्य 324 बार पाठ पितृ दोष से
मुक्ति दिला देगा
ॐ श्री राम llदेव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गन्धर्व बंदौ
किन्नर रजनीचर कृपा करउ अब सर्व ll
24. लाल किताब के
उपाय में सभी रक्त सम्बन्धियों से निश्चित राशि लेकर कोढ़ीखाने में खाना कम्बल ,
हस्पताल में दवाई वितरण , विद्यालय में पाठन सामग्री , अनाथालय, छोटी बच्चियों , स्कूल बाग़ बगीचे के कल्याण हेतु दान पुण्य करे याद रखे दान
से शांति और पुण्य से वृद्धि होती है
*******************************
++++++++++++++++++++++++
क्या होता है जब पित्र
दोष हो आपके घर में
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
पितृ हमारे वह पूर्वज हैं
जो पूर्व के समयों में हमारे कुल -खानदान -वंश -गोत्र में जन्म ले चुके होते हैं l
कुछ पूर्वजों की जल्दी मुक्ति हो जाती है
किन्तु कुछ लोगों की मुक्ति में हजारों वर्ष भी लग जाते हैं l मुक्ति की प्रक्रिया उनके कर्म ,मृत्यु के समय शारीरिक स्थिति आदि पर निर्भर
करती है l जब तक उनकी मुक्ति नहीं होती वह पितृ लोक में रहते हैं और
उन सम्बन्ध हमारे साथ बना रहता है इनमे कुछ सामान्य मृत्यु को प्राप्त आत्माएं
होती हैं तो कुछ असमय मृत्यु को प्राप्त आत्माएं खानदान की असमय मृत्यु प्राप्त आत्माएं
हजारों वर्ष तक प्रेत लोक में रहती हैं और यह भी पितृ में ही गिनी जाती हैं l
यह अतृप्त होती हैं और अधिक प्रतिक्रिया भी
करती हैं l व्यक्ति विभिन्न जन्मों
में जिस प्रकार के कर्म करता है ,जैसा जिसके साथ
व्यवहार करता है ,जैसा श्राप ,
आशीर्वाद ग्रहण करता है ,वैसी उर्जा उसके सूक्ष्मशरीर के साथ जुडती जाती है और यह
संचित कर्म बनती है ,जिसे भुगतना ही
होता है l परिवार -कुल -खानदान के
प्रति किये गए कर्म अगले जन्मों में पित्र दोष के रूप में सामने आते हैं तथा
व्यक्ति ऐसे योगों में ,ग्रह स्थितियों
में जन्म लेता है की कुंडली पित्र दोष व्यक्त करती है l जरुरी नहीं की यह पित्र दोष आज के ही जन्म अनुसार खानदान से
सम्बन्धित हो ,यह पूर्व के
विभिन्न कुलों से सम्मबंधित भी हो सकता है किन्तु यह आज की कुंडली में पित्र दोष
दिखाता है l
आज के खानदान में जन्म के
बाद भी पित्र दोष का प्रभाव भुगतना पड़ जाता है जब उस खानदान में अकाल मृत्यु
प्राप्त आत्माएं हों या हो जाएँ |इनका प्रभाव
व्यक्ति पर पड़ता है और कुंडली में यह दृष्टिगत नहीं होता |जिस खानदान में व्यक्ति जन्म लेता है वहां के पित्र तो
प्रभावित करते ही हैं पूर्व जन्मों के खानदान के पित्र भी उनके साथ जुड़ किये गए
कर्मों के अनुसार परिणाम ,प्रभाव देते हैं |कभी कभी ऐसा भी होता है की आज के खानदान में
गया श्राद्ध ,नाशिक या हरिद्वार
श्राद्ध आदि की प्रक्रियाएं कर देने पर भी पित्र दोष के प्रभाव समाप्त नहीं होते |कारण यह होता है की आज के खानदान के पित्र तो
जो भी उस समय तक होते हैं श्राद्ध होने पर खानदान से श्राद्ध तीर्थ पर चले जाते
हैं किन्तु जो पूर्व जन्मों के पित्र हैं वह प्रत्यक्ष प्रभाव देते रहते हैं |आज के पित्र भी तीर्थ स्थल पर जाकर भी पित्र
लोक में रहते हुए व्यक्ति और खानदान से जुड़े रहते हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से
कर्मानुसार व्यक्तियों को प्रभावित करते रहते हैं |इनके आशीर्वाद ,श्राप से व्यक्तियों की स्थितियां प्रभावित होती हैं |
पितृ दोष उत्पन्न करने
वाले दो प्रकार के पित्र होते हैं |अतृप्त पित्र
अर्थात अपनी शारीरिक आयु पूर्ण न कर पाने वाले पित्र और निर्लिप्त पित्र अर्थात
पूर्णायु प्राप्त कर सामान्य मृत्यु को प्राप्त पित्र आत्माएं |
पूर्णायु पूर्ण न करने
वाले अर्थात अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया
गलत आचरण, परिजनों की अतृप्त
इच्छाएं ,इन अतृप्त पितरों की
संतुष्टि -शान्ति -मुक्ति के लिए कोई प्रयास न करना ,जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होना ,विवाहादिमें परिजनों द्वारा गलत निर्णय ,पितरों को मुख्य अवसरों पर याद भी न करना ,श्राद्ध आदि कर्म न करना आदि के साथ परिवार के
किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं , परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी
शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं|इस प्रकार के पित्र केवल श्राप ही नहीं देते ,सीधे परिवार और व्यक्ति को प्रभावित भी करते हैं और इनकी
प्रतिक्रिया तीव्र होती है |यह खुद असंतुष्ट
होने के कारण परिवारियों को संतुष्ट सुखी नहीं रहने देते और इनके साथ जुडी अन्य
बाहरी आत्माए जब परिवार का शोषण करती हैं तो यह कोई प्रतिक्रिया नहीं देते |
पूर्णायु प्राप्त कर शरीर
त्याग करने वाले अर्थात उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते
, परन्तु उनका किसी भी रूप
में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति- रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर
,अथवा पारिवारिक या कुल की
मर्यादा के विरुद्ध आचरण होने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं | इनकी प्रतिक्रिया अंतरजातीय विवाहों ,कुल के संस्कार विरुद्ध आचरण ,कुलदेवता /देवी के अपमान ,किसी अन्य शक्ति को कुलदेवता /देवी के स्थान पर
पूजे जाने पर यह प्रतिक्रया देते हैं और पित्र दोष उत्पन्न करते हैं |परिवार -खानदान अथवा व्यक्ति द्वारा किसी प्रेत
शक्ति ,शहीद -मजार ,पिशाच ,ब्रह्म ,सती जैसी आत्मिक शक्तियों
को पूजने पर भी यह प्रतिक्रिया करते हैं और श्राप देते हैं |इनके द्वारा उत्पन्न पित्र दोष अधिक स्थायी और कई पीढ़ियों
को प्रभावित करने वाला होता है |
पित्र दोष के प्रभाव से
उत्पन्न समस्याएं
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
💐💐 मानसिक अवसाद होता है ,चिंताएं घेरे रहती हैं |
💐💐 व्यापार में नुक्सान होता है ,सबकुछ ठीक लगने पर भी उपयुक्त आय नहीं होती |अनायास हानि हो जाती है |धोखा मिलता है |कर्मचारी /सहयोगी स्वार्थी हो जाते हैं |
💐💐 परिश्रम के अनुसार फल नहीं मिलता ,उन्नति के मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं |सभी प्रकार की योग्यता ,क्षमता होने पर भी उपयुक्त उन्नति नहीं होती |
💐💐 वैवाहिक जीवन में समस्याएं,अथवा विवाह न होना ,विवाह बाद भी अलगाव हो जाना ,जीवनसाथी के साथ कलहपूर्ण जीवन होना ,बिन बात के झगड़े उत्पन्न होना होता है |
💐💐 कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो
जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है |परिस्थितियां अनुकूल होने पर भी काम नहीं बनता |
💐💐 पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते, कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं की अर्चना की जाए
, उसका शुभ फल नहीं मिल
पाता|
💐💐 आय -व्यय में सदैव असंतुलन बना रहता है |
💐💐 प्रत्यक्ष खाने वाले ४ होने पर भी खर्च १०
लोगों के बराबर होता है |
💐💐 यह तो दीखता है की इतना आय हुआ ,पर कहाँ गया यह समझ में नहीं आता |
💐💐 बचत कम हो जाती है या समाप्त हो जाती है या
होती ही नहीं |समझ में नहीं आता
की आने वाला रुपया जा कहाँ रहा है जबकि परिवार लायक पर्याप्त आय होती है |
💐💐 मांगलिक कार्यों में बाधा आती है |बच्चों के विवाह नहीं हो पाते |उनकी उच्च शिक्षा में बाधा आती है |उनका दाम्पत्य जीवन सुखी नहीं होता |
💐💐 अनायास के खर्चे आते हैं |दुर्घटनाएं और बीमारियाँ होती हैं जिनपर बेवजह
खर्च होता है |
💐💐 छोटी बीमारी भी बढती जाती है ,जल्दी ठीक नहीं होती या बार बार होती है |
💐💐 बिना किसी उपयुक्त कारण के गंभीर बीमारी हो
जाती है या ऐसी बीमारी हो जाती है जो चिकित्सकीय रूप से बीमारी ही नहीं होती या
चिकित्सक पकड नहीं पाते की समस्या कहाँ और क्या है |
💐💐मानसिक स्थिति हमेशा संतुलित नहीं होती |दिनचर्या अनियमित हो सकती है |
💐💐व्यापार /व्यवसाय में लगाया हुआ रुपया डूब जाता है |व्यवसाय बंद हो जाता है या हानि के कारण अथवा
विवाद के कारण बंद करना पड़ जाता है |
💐💐 प्रापर्टी ,जमीन -जायदाद विवाद में फंस जाती है |अनावश्यक मुकदमे ,विवाद का सामना करना पड़ता है |
💐💐 घर में घुसते ही सर भारी हो जाता है |अनायास की चिंता या मनहूसियत घेर लेती है ,कुछ अच्छा नहीं लगता |अकेले रहने का मन होता है |
💐💐परिवार में शोर -शराबा ,उल्लास का माहौल भी खुश नहीं कर पाता |मन हमेशा भटकता रहता है |
💐💐 घर में रहते हुए चिडचिडापन रहता है ,बात बात में गुस्सा आता है ,उलझन रहती है ,याददास्त कमजोर होती जाती है |बाहर स्थिति ठीक लगती है |
💐💐अपने ही घर में कभी अभी अजनवीपन लगता है |खाली घर में अकेले महसूस होता है की कोई और भी
है घर में |
💐💐पूजा -पाठ में मन नहीं लगता ,अरुचि हो जाती है |पूजा -पाठ का कोई परिणाम भी नहीं मिलता और स्थितियां जटिल ही होती जाती हैं |
💐💐अनायास और अनावश्यक कर्ज की स्थिति उत्पन्न होती है जबकि
क्षमताएं ,योग्यताएं और आय के स्रोत
पर्याप्त दीखते हैं ,पर वह काम नहीं
करते |लिया कर्ज जल्दी उतरता
नहीं क्योंकि अपेक्षित आय समय पर नहीं हो पाती |
💐💐दिया हुआ पैसा समय पर या तो मिलता नहीं या डूब जाता है |लोग धोखा देते हैं |
💐💐 उर्ध्वगति वाले पितरों के प्रभाव के कारण
उत्पन्न पित्र दोष के लिए उपाय कारगर नहीं होते फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना
किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों
ना किये जाएँ, उनका कोई भी
कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता |
💐💐 भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो
जाती है |
💐💐मुक्ति मार्ग में बाधाएं उत्पन्न होती हैं ,मुक्ति के लिए अनुकूल ग्रह स्थिति भी मुक्ति
नहीं दिला पाती और पित्र व्यक्ति को मुक्त नहीं होने देते |
💐💐कुलदेवता /देवी रुष्ट हो जाते हैं ,किया गया पूजा -पाठ ईष्ट तक नहीं पहुँचने देते जिससे किये
गए सभी पूजा ,जप व्यर्थ जाने लगते हैं |
💐💐संतानें विकारयुक्त और भाग्य में पित्र दोष लिए उत्पन्न
होती हैं |इस कारण खानदान पतन की ओर
अग्रसर हो जाता है |कुछ पीढ़ियों बाद
खानदान का नाम लेने वाला तक नहीं बचता l
💐💐 ऐसी संताने उत्पन्न होती हैं जो खानदान को
कलंकित करती हैं ,दुर्व्यसनी ,दुर्जन होती हैं जिन्हें समाज तिरस्कृत कर देता
है और जो दंड पाती हैं |अंततः विनष्ट हो
जाता है परिवार अथवा बिखर जाता है l
उपरोक्त स्थितियों में
उच्च ज्ञानी पारम्परिक ज्योतिषी और अच्छा जानकार तंत्र ज्ञानी मदद कर सकता है ,क्यंकि सबसे पहले तो यह समझना जरुरी होता है की
पित्र दोष है किस प्रकार का, उसके बाद यह
देखना जरुरी होता है की क्या वास्तव में वैसा ही हो रहा है जैसा उस पित्र दोष में
सामान्य रूप से होना चाहिए l इसके बाद यह
जानना जरूरी है की ऐसा क्या किया जा सकता है की पित्र दोष का प्रभाव समाप्त किया
जा सके l उपाय बिना सूक्ष्म और गहन विश्लेष्ण के कारगर नहीं होते ,अतः सामान्य उपाय लिखने का कोई मतलब नहीं l
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
घर के प्रेत या पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय (पुनः प्रेषित)
बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ -दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ?आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति।
पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया
है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।
आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में
जाती है ,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं
अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को
धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके
आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है।
वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती
है,लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है ,जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी
इच्छा वश ,मोह वश अपने कुल में जन्म लेती
हैं।
पितृ दोष क्या होता है?
मारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे
प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी
अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास
ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे "पितृ- दोष" कहा जाता है।
पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है .ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती
है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं ,आपके आचरण से,किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से ,श्राद्ध आदि कर्म ना करने से ,अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।
इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुक्सान ,परिश्रम के अनुसार फल न मिलना , विवाह या वैवाहिक जीवन में समस्याएं,कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर
क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है पितृ दोष
होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं
मिल पाते,कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं की अर्चना की जाए ,उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।
पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है
1.अधोगति वाले पितरों के कारण
2.उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण
अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण,की अतृप्त इच्छाएं ,जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर,विवाहादिमें परिजनों द्वारा गलत निर्णय .परिवार के किसी
प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं ,परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से
नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।
उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के
पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।
इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति
बिलकुल बाधित हो जाती है ,फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों
ना किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों ना
किये जाएँ,उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष
सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि
किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?
जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न ,पंचम ,अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष
का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया
जाता है।
इनमें से भी गुरु ,शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक
पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।
अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु ,शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है ,इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि
पंचमुखी ,सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष
भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो
जाता है।
पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के
अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।
विभिन्न ऋण और पितृ दोष
हमारे ऊपर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं जिनका कर्म न
करने(ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है ,ये ऋण हैं : मातृ ऋण ,पितृ ऋण ,मनुष्य ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण।
मातृ ऋण
माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमें मा,मामी ,नाना ,नानी ,मौसा ,मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं ,क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः
यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है ,अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है,तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं ,इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर
पीढ़ी चलता ही रहता है।
पितृ ऋण
पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा ,ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन
को प्रभावित करता है पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है,हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है ,और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है।
पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ?पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है ,इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना
ही पड़ता है ,इसमें घर में आर्थिक अभाव,दरिद्रता ,संतानहीनता ,संतान को विभिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने
से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि।
देव ऋण
माता-पिता प्रथम देवता हैं,जिसके कारण भगवान गणेश महान बने |इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी ,दुर्गा माँ ,भगवान विष्णु आदि आते हैं ,जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है ,हमारे पूर्वज भी भी अपने अपने कुल देवताओं को मानते थे , लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है इसी कारण भगवान
/कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर उन्हें अपनी उपस्थिति
का आभास कराते हैं।
ऋषि ऋण
जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए ,वंश वृद्धि की ,उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है ,उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं,इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।
मनुष्य ऋण
माता -पिता के अतिरिक्त जिन अन्य मनुष्यों ने हमें प्यार
दिया ,दुलार दिया ,हमारा ख्याल रखा ,समय समय पर मदद की गाय आदि पशुओं का दूध पिया जिन अनेक मनुष्यों ,पशुओं ,पक्षियों ने हमारी प्रत्यक्ष या
अप्रत्यक्ष रूप से मदद की ,उनका ऋण भी हमारे ऊपर हो गया।
लेकिन लोग आजकल गरीब ,बेबस ,लाचार लोगों की धन संपत्ति हरण करके अपने को ज्यादा
गौरवान्वित महसूस करते हैं। इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा
परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है,वंश हीनता ,संतानों का गलत संगति में पड़ जाना,परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना ,परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना
इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं।
ऐसे परिवार को पितृ दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है रामायण में श्रवण
कुमार के माता -पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा,ये जग -ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ दोषों
का निवारण करना बहुत आवश्यक है।
पितृों के रूष्ट होने के लक्षण
पितरों के रुष्ट होने के कुछ असामान्य लक्षण जो मैंने अपने निजी अनुभव के आधार एकत्रित किए है वे क्रमशः इस प्रकार
हो सकते है।
खाने में से बाल निकलना
अक्सर खाना खाते समय यदि आपके भोजन में से बाल निकलता है तो इसे नजरअंदाज न
करें
बहुत बार परिवार के किसी एक ही सदस्य के साथ होता है कि उसके खाने में से बाल
निकलता है, यह बाल कहां से आया इसका कुछ
पता नहीं चलता। यहां तक कि वह व्यक्ति यदि रेस्टोरेंट आदि में भी जाए तो वहां पर
भी उसके ही खाने में से बाल निकलता है और परिवार के लोग उसे ही दोषी मानते हुए
उसका मजाक तक उडाते है।
बदबू या दुर्गंध
कुछ लोगों की समस्या रहती है कि उनके घर से दुर्गंध आती है, यह भी नहीं पता चलता कि दुर्गंध कहां से आ रही है। कई बार
इस दुर्गंध के इतने अभ्यस्त हो जाते है कि उन्हें यह दुर्गंध महसूस भी नहीं होती
लेकिन बाहर के लोग उन्हें बताते हैं कि ऐसा हो रहा है अब जबकि परेशानी का स्रोत
पता ना चले तो उसका इलाज कैसे संभव है
पूर्वजों का स्वप्न में बार बार आना
मेरे एक मित्र ने बताया कि उनका अपने पिता के साथ झगड़ा हो गया है और वह झगड़ा
काफी सालों तक चला पिता ने मरते समय अपने पुत्र से मिलने की इच्छा जाहिर की परंतु
पुत्र मिलने नहीं आया, पिता का स्वर्गवास हो गया हुआ।
कुछ समय पश्चात मेरे मित्र मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता को
बिना कपड़ों के देखा है ऐसा स्वप्न पहले भी कई बार आ चुका है।
शुभ कार्य में अड़चन
कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कोई त्यौहार मना रहे हैं या कोई उत्सव आपके घर पर
हो रहा है ठीक उसी समय पर कुछ ना कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि जिससे रंग में भंग डल
जाता है। ऐसी घटना घटित होती है कि खुशी का माहौल बदल जाता है। मेरे कहने का तात्पर्य है कि शुभ अवसर पर कुछ अशुभ घटित होना पितरों की
असंतुष्टि का संकेत है।
घर के किसी एक सदस्य का कुंवारा रह जाना
बहुत बार आपने अपने आसपास या फिर रिश्तेदारी में देखा होगा या अनुभव किया होगा कि बहुत अच्छा युवक है, कहीं कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी शादी नहीं हो रही है। एक लंबी उम्र निकल
जाने के पश्चात भी शादी नहीं हो पाना कोई अच्छा संकेत नहीं है। यदि घर में पहले ही किसी कुंवारे व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी
है तो उपरोक्त स्थिति बनने के आसार बढ़ जाते हैं। इस समस्या के कारण का भी पता नहीं चलता।
मकान या प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त में दिक्कत आना
आपने देखा होगा कि कि एक बहुत अच्छी प्रॉपर्टी, मकान, दुकान या जमीन का एक हिस्सा
किन्ही कारणों से बिक नहीं पा रहा यदि कोई खरीदार मिलता भी है तो बात नहीं बनती।
यदि कोई खरीदार मिल भी जाता है और सब कुछ हो जाता है तो अंतिम समय पर सौदा कैंसिल
हो जाता है। इस तरह की स्थिति यदि लंबे समय से चली आ रही है तो यह मान लेना चाहिए
कि इसके पीछे अवश्य ही कोई ऐसी कोई अतृप्त आत्मा है जिसका उस भूमि या जमीन के
टुकड़े से कोई संबंध रहा हो।
संतान ना होना
मेडिकल रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य होने के बावजूद संतान सुख से वंचित है
हालांकि आपके पूर्वजों का इस से संबंध होना लाजमी नहीं है परंतु ऐसा होना बहुत हद
तक संभव है जो भूमि किसी निसंतान व्यक्ति से खरीदी गई हो वह भूमि अपने नए मालिक को
संतानहीन बना देती है
उपरोक्त सभी प्रकार की घटनाएं या समस्याएं आप में से बहुत से लोगों ने अनुभव
की होंगी इसके निवारण के लिए लोग समय और पैसा नष्ट कर देते हैं परंतु समस्या का
समाधान नहीं हो पाता। क्या पता हमारे इस लेख से ऐसे ही किसी पीड़ित व्यक्ति को कुछ
प्रेरणा मिले इसलिए निवारण भी स्पष्ट कर रहा हूं।
पितृ-दोष कि शांति के उपाय
1
सामान्य उपायों में षोडश पिंड
दान ,सर्प पूजा ,ब्राह्मण को गौ -दान ,कन्या -दान,कुआं ,बावड़ी ,तालाब आदि बनवाना ,मंदिर प्रांगण में पीपल ,बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना ,प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना
चाहिए।
2
वेदों और पुराणों में पितरों की
संतुष्टि के लिए मंत्र ,स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन
है जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो ,शांत हो जाती है अगर नित्य पठन संभव ना हो , तो कम से कम प्रत्येक माह की
अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए।
वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब
से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है।
3
भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या
प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र की
एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर
शुभत्व की प्राप्ति होती है |मंत्र जाप प्रातः या सायंकाल
कभी भी कर सकते हैं :
मंत्र : "ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।
4
अमावस्या को पितरों के निमित्त
पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा ,घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है।
5
अपने माता -पिता ,बुजुर्गों का सम्मान,सभी स्त्री कुल का आदर /सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने
से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं।
6
पितृ दोष जनित संतान कष्ट को
दूर करने के लिए "हरिवंश पुराण " का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से
पाठ करें।
7
प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या
सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है।
8
सूर्य पिता है अतः ताम्बे के
लोटे में जल भर कर ,उसमें लाल फूल ,लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर ११ बार "ॐ घृणि सूर्याय नमः
" मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है।
9
अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने
पूर्वजों के नाम दुग्ध ,चीनी ,सफ़ेद कपडा ,दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए।
10
पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा
अवश्य करें अगर १०८ परिक्रमा लगाई जाएँ ,तो पितृ दोष अवश्य दूर होगा।
विशिष्ट उपाय :
1
किसी मंदिर के परिसर में पीपल
अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज़ उसमें जल डालें ,उसकी देख -भाल करें ,जैसे-जैसे वृक्ष फलता -फूलता
जाएगा,पितृ -दोष दूर होता जाएगा,क्योकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी -देवता ,इतर -योनियाँ ,पितर आदि निवास करते हैं।
2
यदि आपने किसी का हक छीना है,या किसी मजबूर व्यक्ति की धन संपत्ति का हरण किया है,तो उसका हक या संपत्ति उसको अवश्य लौटा दें।
3
पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को
किसी भी एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या तक अर्थात एक माह तक किसी पीपल के
वृक्ष के नीचे सूर्योदय काल में एक शुद्ध घी का दीपक लगाना चाहिए,ये क्रम टूटना नहीं चाहिए।
एक माह बीतने पर जो अमावस्या आये उस दिन एक प्रयोग और करें
इसके लिए किसी देसी गाय या दूध देने वाली गाय का थोडा सा गौ -मूत्र प्राप्त
करें उसे थोड़े जल में मिलाकर इस जल को पीपल
वृक्ष की जड़ों में डाल दें इसके बाद पीपल वृक्ष के नीचे ५ अगरबत्ती ,एक नारियल और शुद्ध घी का दीपक लगाकर अपने पूर्वजों से
श्रद्धा पूर्वक अपने कल्याण की कामना करें,और घर आकर उसी दिन दोपहर में कुछ गरीबों को भोजन करा दें ऐसा करने पर पितृ दोष
शांत हो जायेगा।
4
घर में कुआं हो या पीने का पानी
रखने की जगह हो ,उस जगह की शुद्धता का विशेष
ध्यान रखें,क्योंके ये पितृ स्थान माना
जाता है इसके अलावा पशुओं के लिए पीने
का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवाने अथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने से भी पितृ
दोष शांत होता है।
5
अगर पितृ दोष के कारण अत्यधिक
परेशानी हो,संतान हानि हो या संतान को कष्ट
हो तो किसी शुभ समय अपने पितरों को प्रणाम कर उनसे प्रण होने की प्रार्थना करें और
अपने द्वारा जाने-अनजाने में किये गए अपराध / उपेक्षा के लिए क्षमा याचना करें ,फिर घर अथवा शिवालय में पितृ गायत्री मंत्र का सवा लाख विधि
से जाप कराएं जाप के उपरांत दशांश हवन के बाद संकल्प ले की इसका पूर्ण फल पितरों
को प्राप्त हो ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंके उनकी मुक्ति का मार्ग आपने प्रशस्त किया होता है।
6
पितृ दोष की शांति हेतु ये उपाय
बहुत ही अनुभूत और अचूक फल देने वाला देखा गया है,वोह ये कि- किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त रूप से अथवा प्रत्यक्ष रूप
से आर्थिक सहयोग करना |(लेकिन ये सहयोग पूरे दिल से
होना चाहिए ,केवल दिखावे या अपनी बढ़ाई
कराने के लिए नहीं )|इस से पितर अत्यंत प्रसन्न होते
हैं ,क्योंकि इसके परिणाम स्वरुप
मिलने वाले पुण्य फल से पितरों को बल और तेज़ मिलता है ,जिस से वह ऊर्ध्व लोकों की ओरगति करते हुए पुण्य लोकों को
प्राप्त होते हैं.|
7
अगर किसी विशेष कामना को लेकर
किसी परिजन की आत्मा पितृ दोष उत्पन्न करती है तो तो ऐसी स्थिति में मोह को त्याग
कर उसकी सदगति के लिए "गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र " का पाठ करना चाहिए।
8
पितृ दोष दूर करने का अत्यंत
सरल उपाय : इसके लिए सम्बंधित व्यक्ति को अपने घर के वायव्य कोण (N -W )में नित्य सरसों का तेल में बराबर मात्रा में अगर का तेल
मिलाकर दीपक पूरे पितृ पक्ष में नित्य लगाना चाहिए+दिया पीतल का हो तो ज्यादा
अच्छा है ,दीपक कम से कम 10 मिनट नित्य जलना आवश्यक है।
इन उपायों के अतिरिक्त वर्ष की प्रत्येक अमावस्या को दोपहर के समय गूगल की
धूनी पूरे घर में सब जगह घुमाएं ,शाम को आंध्र होने के बाद
पितरों के निमित्त शुद्ध भोजन बनाकर एक दोने में साड़ी सामग्री रख कर किसी बबूल के
वृक्ष अथवा पीपल या बड़ किजद में रख कर आ जाएँ,पीछे मुड़कर न देखें। नित्य प्रति घर में देसी कपूर जाया करें। ये कुछ ऐसे उपाय
हैं,जो सरल भी हैं और प्रभावी भी,और हर कोई सरलता से इन्हें कर पितृ दोषों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन किसी भी
प्रयोग की सफलता आपकी पितरों के प्रति श्रद्धा के ऊपर निर्भर करती है।
पितृदोष निवारण के लिए करें विशेष उपाय (नारायणबलि-नागबलि)
अक्सर हम देखते हैं कि कई लोगों के जीवन में परेशानियां समाप्त होने का नाम ही
नहीं लेती। वे चाहे जितना भी समय और धन खर्च कर लें लेकिन काम सफल नहीं होता। ऐसे
लोगों की कुंडली में निश्चित रूप से पितृदोष होता है।
यह दोषी पीढ़ी दर पीढ़ी कष्ट पहुंचाता रहता है, जब तक कि इसका विधि-विधानपूर्वक निवारण न किया जाए। आने वाली पीढ़ीयों को भी
कष्ट देता है। इस दोष के निवारण के लिए कुछ विशेष दिन और समय तय हैं जिनमें इसका
पूर्ण निवारण होता है। श्राद्ध पक्ष यही अवसर है जब पितृदोष से मुक्ति पाई जा सकती
है। इस दोष के निवारण के लिए शास्त्रों में नारायणबलि का विधान बताया गया है। इसी
तरह नागबलि भी होती है।
क्या है नारायणबलि और नागबलि
नारायणबलि और नागबलि दोनों विधि मनुष्य की अपूर्ण इच्छाओं और अपूर्ण कामनाओं
की पूर्ति के लिए की जाती है। इसलिए दोनों को काम्य कहा जाता है। नारायणबलि और
नागबलि दो अलग-अलग विधियां हैं। नारायणबलि का मुख्य उद्देश्य पितृदोष निवारण करना
है और नागबलि का उद्देश्य सर्प या नाग की हत्या के दोष का निवारण करना है। इनमें
से कोई भी एक विधि करने से उद्देश्य पूरा नहीं होता इसलिए दोनों को एक साथ ही
संपन्न करना पड़ता है।
इन कारणों से की जाती है नारायणबलि पूजा
जिस परिवार के किसी सदस्य या पूर्वज का ठीक प्रकार से अंतिम संस्कार, पिंडदान और तर्पण नहीं हुआ हो उनकी आगामी पीढि़यों में
पितृदोष उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्तियों का संपूर्ण जीवन कष्टमय रहता है, जब तक कि पितरों के निमित्त नारायणबलि विधान न किया
जाए।प्रेतयोनी से होने वाली पीड़ा दूर करने के लिए नारायणबलि की जाती है।परिवार के
किसी सदस्य की आकस्मिक मृत्यु हुई हो। आत्महत्या, पानी में डूबने से, आग में जलने से, दुर्घटना में मृत्यु होने से ऐसा दोष उत्पन्न होता है।
क्यों की जाती है यह पूजा...?
शास्त्रों में पितृदोष निवारण के लिए नारायणबलि-नागबलि कर्म करने का विधान है।
यह कर्म किस प्रकार और कौन कर सकता है इसकी पूर्ण जानकारी होना भी जरूरी है। यह
कर्म प्रत्येक वह व्यक्ति कर सकता है जो अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करना
चाहता है। जिन जातकों के माता-पिता जीवित हैं वे भी यह विधान कर सकते हैं।संतान
प्राप्ति, वंश वृद्धि, कर्ज मुक्ति, कार्यों में आ रही बाधाओं के निवारण के लिए यह कर्म पत्नी सहित करना चाहिए।
यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी यह कर्म किया जा
सकता है।यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पांचवें महीने तक यह कर्म किया जा
सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये कर्म एक साल तक नहीं किए जा सकते
हैं। माता-पिता की मृत्यु होने पर भी एक साल तक यह कर्म करना निषिद्ध माना गया है।
कब नहीं की जा सकती है नारायणबलि-नागबलि
नारायणबलि गुरु, शुक्र के अस्त होने पर नहीं किए
जाने चाहिए। लेकिन प्रमुख ग्रंथ निर्णण सिंधु के मतानुसार इस कर्म के लिए केवल
नक्षत्रों के गुण व दोष देखना ही उचित है। नारायणबलि कर्म के लिए धनिष्ठा पंचक और
त्रिपाद नक्षत्र को निषिद्ध माना गया है।धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरण, शततारका, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती, इन साढ़े चार नक्षत्रों को धनिष्ठा पंचक कहा जाता है। कृतिका, पुनर्वसु, विशाखा, उत्तराषाढ़ा और उत्तराभाद्रपद ये छह नक्षत्र त्रिपाद
नक्षत्र माने गए हैं। इनके अलावा सभी समय यह कर्म किया जा सकता है।
पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय
नारायणबलि- नागबलि के लिए पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय बताया गया है। इसमें
किसी योग्य पुरोहित से समय निकलवाकर यह कर्म करवाना चाहिए। यह कर्म गंगा तट अथवा
अन्य किसी नदी सरोवर के किनारे और महाराष्ट्र् में नासिक के समीप स्थित प्रमुख
ज्योतिर्लिंग त्रयंबकेश्वर में भी संपन्न कराया जाता है। संपूर्ण पूजा तीन दिनों
की होती है।
बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ -दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ?आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति।
पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।
आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है ,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है।
वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है,लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है ,जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश ,मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।
पितृ दोष क्या होता है?
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हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे "पितृ- दोष" कहा जाता है।
पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है .ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं ,आपके आचरण से,किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से ,श्राद्ध आदि कर्म ना करने से ,अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।
इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुक्सान ,परिश्रम के अनुसार फल न मिलना , विवाह या वैवाहिक जीवन में समस्याएं,कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते,कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं की अर्चना की जाए ,उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।
पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है
1.अधोगति वाले पितरों के कारण
2.उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण
अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण,की अतृप्त इच्छाएं ,जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर,विवाहादिमें परिजनों द्वारा गलत निर्णय .परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं ,परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।
उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।
इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है ,फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ,उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?
जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न ,पंचम ,अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।
इनमें से भी गुरु ,शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।
अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु ,शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है ,इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी ,सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है।
पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।
विभिन्न ऋण और पितृ दोष
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हमारे ऊपर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने(ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है ,ये ऋण हैं : मातृ ऋण ,पितृ ऋण ,मनुष्य ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण।
मातृ ऋण👉 माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमेंमा,मामी ,नाना ,नानी ,मौसा ,मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं ,क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है ,अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है,तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं ,इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।
पितृ ऋण👉 पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा ,ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है,हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है ,और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है।
पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ?पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है ,इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है ,इसमें घर में आर्थिक अभाव,दरिद्रता ,संतानहीनता ,संतान को विभिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि।
देव ऋण👉 माता-पिता प्रथम देवता हैं,जिसके कारण भगवान गणेश महान बने |इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी ,दुर्गा माँ ,भगवान विष्णु आदि आते हैं ,जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है ,हमारे पूर्वज भी भी अपने अपने कुल देवताओं को मानते थे , लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर उन्हें अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं।
ऋषि ऋण👉 जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए ,वंश वृद्धि की ,उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है ,उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं,इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।
मनुष्य ऋण👉 माता -पिता के अतिरिक्त जिन अन्य मनुष्यों ने हमें प्यार दिया ,दुलार दिया ,हमारा ख्याल रखा ,समय समय पर मदद की गाय आदि पशुओं का दूध पिया जिन अनेक मनुष्यों ,पशुओं ,पक्षियों ने हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद की ,उनका ऋण भी हमारे ऊपर हो गया।
लेकिन लोग आजकल गरीब ,बेबस ,लाचार लोगों की धन संपत्ति हरण करके अपने को ज्यादा गौरवान्वित महसूस करते हैं। इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है,वंश हीनता ,संतानों का गलत संगति में पड़ जाना,परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना ,परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं।
ऐसे परिवार को पितृ दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है रामायण में श्रवण कुमार के माता -पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा,ये जग -ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है।
पितृों के रूष्ट होने के लक्षण
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पितरों के रुष्ट होने के कुछ असामान्य लक्षण जो मैंने अपने निजी अनुभव के आधार एकत्रित किए है वे क्रमशः इस प्रकार हो सकते है।
खाने में से बाल निकलना
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अक्सर खाना खाते समय यदि आपके भोजन में से बाल निकलता है तो इसे नजरअंदाज न करें बहुत बार परिवार के किसी एक ही सदस्य के साथ होता है कि उसके खाने में से बाल निकलता है, यह बाल कहां से आया इसका कुछ पता नहीं चलता। यहां तक कि वह व्यक्ति यदि रेस्टोरेंट आदि में भी जाए तो वहां पर भी उसके ही खाने में से बाल निकलता है और परिवार के लोग उसे ही दोषी मानते हुए उसका मजाक तक उडाते है।
बदबू या दुर्गंध
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कुछ लोगों की समस्या रहती है कि उनके घर से दुर्गंध आती है, यह भी नहीं पता चलता कि दुर्गंध कहां से आ रही है। कई बार इस दुर्गंध के इतने अभ्यस्त हो जाते है कि उन्हें यह दुर्गंध महसूस भी नहीं होती लेकिन बाहर के लोग उन्हें बताते हैं कि ऐसा हो रहा है अब जबकि परेशानी का स्रोत पता ना चले तो उसका इलाज कैसे संभव है
पूर्वजों का स्वप्न में बार बार आना
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मेरे एक मित्र ने बताया कि उनका अपने पिता के साथ झगड़ा हो गया है और वह झगड़ा काफी सालों तक चला पिता ने मरते समय अपने पुत्र से मिलने की इच्छा जाहिर की परंतु पुत्र मिलने नहीं आया, पिता का स्वर्गवास हो गया हुआ। कुछ समय पश्चात मेरे मित्र मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता को बिना कपड़ों के देखा है ऐसा स्वप्न पहले भी कई बार आ चुका है।
शुभ कार्य में अड़चन
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कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कोई त्यौहार मना रहे हैं या कोई उत्सव आपके घर पर हो रहा है ठीक उसी समय पर कुछ ना कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि जिससे रंग में भंग डल जाता है। ऐसी घटना घटित होती है कि खुशी का माहौल बदल जाता है। मेरे कहने का तात्पर्य है कि शुभ अवसर पर कुछ अशुभ घटित होना पितरों की असंतुष्टि का संकेत है।
घर के किसी एक सदस्य का कुंवारा रह जाना
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बहुत बार आपने अपने आसपास या फिर रिश्तेदारी में देखा होगा या अनुभव किया होगा कि बहुत अच्छा युवक है, कहीं कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी शादी नहीं हो रही है। एक लंबी उम्र निकल जाने के पश्चात भी शादी नहीं हो पाना कोई अच्छा संकेत नहीं है। यदि घर में पहले ही किसी कुंवारे व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है तो उपरोक्त स्थिति बनने के आसार बढ़ जाते हैं। इस समस्या के कारण का भी पता नहीं चलता।
मकान या प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त में दिक्कत आना
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आपने देखा होगा कि कि एक बहुत अच्छी प्रॉपर्टी, मकान, दुकान या जमीन का एक हिस्सा किन्ही कारणों से बिक नहीं पा रहा यदि कोई खरीदार मिलता भी है तो बात नहीं बनती। यदि कोई खरीदार मिल भी जाता है और सब कुछ हो जाता है तो अंतिम समय पर सौदा कैंसिल हो जाता है। इस तरह की स्थिति यदि लंबे समय से चली आ रही है तो यह मान लेना चाहिए कि इसके पीछे अवश्य ही कोई ऐसी कोई अतृप्त आत्मा है जिसका उस भूमि या जमीन के टुकड़े से कोई संबंध रहा हो।
संतान ना होना
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मेडिकल रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य होने के बावजूद संतान सुख से वंचित है हालांकि आपके पूर्वजों का इस से संबंध होना लाजमी नहीं है परंतु ऐसा होना बहुत हद तक संभव है जो भूमि किसी निसंतान व्यक्ति से खरीदी गई हो वह भूमि अपने नए मालिक को संतानहीन बना देती है
उपरोक्त सभी प्रकार की घटनाएं या समस्याएं आप में से बहुत से लोगों ने अनुभव की होंगी इसके निवारण के लिए लोग समय और पैसा नष्ट कर देते हैं परंतु समस्या का समाधान नहीं हो पाता। क्या पता हमारे इस लेख से ऐसे ही किसी पीड़ित व्यक्ति को कुछ प्रेरणा मिले इसलिए निवारण भी स्पष्ट कर रहा हूं।
पितृ-दोष कि शांति के उपाय
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1👉 सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान ,सर्प पूजा ,ब्राह्मण को गौ -दान ,कन्या -दान,कुआं ,बावड़ी ,तालाब आदि बनवाना ,मंदिर प्रांगण में पीपल ,बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना ,प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए।
2👉 वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र ,स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो ,शांत हो जाती है अगर नित्य पठन संभव ना हो , तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए।
वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है।
3👉 भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र की एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है |मंत्र जाप प्रातः या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं :
मंत्र : "ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।
4👉 अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा ,घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है।
5👉 अपने माता -पिता ,बुजुर्गों का सम्मान,सभी स्त्री कुल का आदर /सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं।
6👉 पितृ दोष जनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए "हरिवंश पुराण " का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें।
7👉 प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है।
8👉 सूर्य पिता है अतः ताम्बे के लोटे में जल भर कर ,उसमें लाल फूल ,लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर ११ बार "ॐ घृणि सूर्याय नमः " मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है।
9👉 अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध ,चीनी ,सफ़ेद कपडा ,दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए।
10👉 पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा अवश्य करें अगर १०८ परिक्रमा लगाई जाएँ ,तो पितृ दोष अवश्य दूर होगा।
विशिष्ट उपाय :
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1👉 किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज़ उसमें जल डालें ,उसकी देख -भाल करें ,जैसे-जैसे वृक्ष फलता -फूलता जाएगा,पितृ -दोष दूर होता जाएगा,क्योकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी -देवता ,इतर -योनियाँ ,पितर आदि निवास करते हैं।
2👉 यदि आपने किसी का हक छीना है,या किसी मजबूर व्यक्ति की धन संपत्ति का हरण किया है,तो उसका हक या संपत्ति उसको अवश्य लौटा दें।
3👉 पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को किसी भी एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या तक अर्थात एक माह तक किसी पीपल के वृक्ष के नीचे सूर्योदय काल में एक शुद्ध घी का दीपक लगाना चाहिए,ये क्रम टूटना नहीं चाहिए।
एक माह बीतने पर जो अमावस्या आये उस दिन एक प्रयोग और करें
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इसके लिए किसी देसी गाय या दूध देने वाली गाय का थोडा सा गौ -मूत्र प्राप्त करें उसे थोड़े जल में मिलाकर इस जल को पीपल वृक्ष की जड़ों में डाल दें इसके बाद पीपल वृक्ष के नीचे ५ अगरबत्ती ,एक नारियल और शुद्ध घी का दीपक लगाकर अपने पूर्वजों से श्रद्धा पूर्वक अपने कल्याण की कामना करें,और घर आकर उसी दिन दोपहर में कुछ गरीबों को भोजन करा दें ऐसा करने पर पितृ दोष शांत हो जायेगा।
4👉 घर में कुआं हो या पीने का पानी रखने की जगह हो ,उस जगह की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें,क्योंके ये पितृ स्थान माना जाता है इसके अलावा पशुओं के लिए पीने का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवाने अथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने से भी पितृ दोष शांत होता है।
5 👉 अगर पितृ दोष के कारण अत्यधिक परेशानी हो,संतान हानि हो या संतान को कष्ट हो तो किसी शुभ समय अपने पितरों को प्रणाम कर उनसे प्रण होने की प्रार्थना करें और अपने द्वारा जाने-अनजाने में किये गए अपराध / उपेक्षा के लिए क्षमा याचना करें ,फिर घर अथवा शिवालय में पितृ गायत्री मंत्र का सवा लाख विधि से जाप कराएं जाप के उपरांत दशांश हवन के बाद संकल्प ले की इसका पूर्ण फल पितरों को प्राप्त हो ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंके उनकी मुक्ति का मार्ग आपने प्रशस्त किया होता है।
6👉 पितृ दोष की शांति हेतु ये उपाय बहुत ही अनुभूत और अचूक फल देने वाला देखा गया है,वोह ये कि- किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त रूप से अथवा प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग करना |(लेकिन ये सहयोग पूरे दिल से होना चाहिए ,केवल दिखावे या अपनी बढ़ाई कराने के लिए नहीं )|इस से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंकि इसके परिणाम स्वरुप मिलने वाले पुण्य फल से पितरों को बल और तेज़ मिलता है ,जिस से वह ऊर्ध्व लोकों की ओरगति करते हुए पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं.|
7👉 अगर किसी विशेष कामना को लेकर किसी परिजन की आत्मा पितृ दोष उत्पन्न करती है तो तो ऐसी स्थिति में मोह को त्याग कर उसकी सदगति के लिए "गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र " का पाठ करना चाहिए।
8👉 पितृ दोष दूर करने का अत्यंत सरल उपाय : इसके लिए सम्बंधित व्यक्ति को अपने घर के वायव्य कोण (N -W )में नित्य सरसों का तेल में बराबर मात्रा में अगर का तेल मिलाकर दीपक पूरे पितृ पक्ष में नित्य लगाना चाहिए+दिया पीतल का हो तो ज्यादा अच्छा है ,दीपक कम से कम 10 मिनट नित्य जलना आवश्यक है।
इन उपायों के अतिरिक्त वर्ष की प्रत्येक अमावस्या को दोपहर के समय गूगल की धूनी पूरे घर में सब जगह घुमाएं ,शाम को आंध्र होने के बाद पितरों के निमित्त शुद्ध भोजन बनाकर एक दोने में साड़ी सामग्री रख कर किसी बबूल के वृक्ष अथवा पीपल या बड़ किजद में रख कर आ जाएँ,पीछे मुड़कर न देखें। नित्य प्रति घर में देसी कपूर जाया करें। ये कुछ ऐसे उपाय हैं,जो सरल भी हैं और प्रभावी भी,और हर कोई सरलता से इन्हें कर पितृ दोषों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन किसी भी प्रयोग की सफलता आपकी पितरों के प्रति श्रद्धा के ऊपर निर्भर करती है।
पितृदोष निवारण के लिए करें विशेष उपाय (नारायणबलि-नागबलि)
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अक्सर हम देखते हैं कि कई लोगों के जीवन में परेशानियां समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। वे चाहे जितना भी समय और धन खर्च कर लें लेकिन काम सफल नहीं होता। ऐसे लोगों की कुंडली में निश्चित रूप से पितृदोष होता है।
यह दोषी पीढ़ी दर पीढ़ी कष्ट पहुंचाता रहता है, जब तक कि इसका विधि-विधानपूर्वक निवारण न किया जाए। आने वाली पीढ़ीयों को भी कष्ट देता है। इस दोष के निवारण के लिए कुछ विशेष दिन और समय तय हैं जिनमें इसका पूर्ण निवारण होता है। श्राद्ध पक्ष यही अवसर है जब पितृदोष से मुक्ति पाई जा सकती है। इस दोष के निवारण के लिए शास्त्रों में नारायणबलि का विधान बताया गया है। इसी तरह नागबलि भी होती है।
क्या है नारायणबलि और नागबलि
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नारायणबलि और नागबलि दोनों विधि मनुष्य की अपूर्ण इच्छाओं और अपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है। इसलिए दोनों को काम्य कहा जाता है। नारायणबलि और नागबलि दो अलग-अलग विधियां हैं। नारायणबलि का मुख्य उद्देश्य पितृदोष निवारण करना है और नागबलि का उद्देश्य सर्प या नाग की हत्या के दोष का निवारण करना है। इनमें से कोई भी एक विधि करने से उद्देश्य पूरा नहीं होता इसलिए दोनों को एक साथ ही संपन्न करना पड़ता है।
इन कारणों से की जाती है नारायणबलि पूजा
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जिस परिवार के किसी सदस्य या पूर्वज का ठीक प्रकार से अंतिम संस्कार, पिंडदान और तर्पण नहीं हुआ हो उनकी आगामी पीढि़यों में पितृदोष उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्तियों का संपूर्ण जीवन कष्टमय रहता है, जब तक कि पितरों के निमित्त नारायणबलि विधान न किया जाए।प्रेतयोनी से होने वाली पीड़ा दूर करने के लिए नारायणबलि की जाती है।परिवार के किसी सदस्य की आकस्मिक मृत्यु हुई हो। आत्महत्या, पानी में डूबने से, आग में जलने से, दुर्घटना में मृत्यु होने से ऐसा दोष उत्पन्न होता है।
क्यों की जाती है यह पूजा...?
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शास्त्रों में पितृदोष निवारण के लिए नारायणबलि-नागबलि कर्म करने का विधान है। यह कर्म किस प्रकार और कौन कर सकता है इसकी पूर्ण जानकारी होना भी जरूरी है। यह कर्म प्रत्येक वह व्यक्ति कर सकता है जो अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है। जिन जातकों के माता-पिता जीवित हैं वे भी यह विधान कर सकते हैं।संतान प्राप्ति, वंश वृद्धि, कर्ज मुक्ति, कार्यों में आ रही बाधाओं के निवारण के लिए यह कर्म पत्नी सहित करना चाहिए। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी यह कर्म किया जा सकता है।यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पांचवें महीने तक यह कर्म किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये कर्म एक साल तक नहीं किए जा सकते हैं। माता-पिता की मृत्यु होने पर भी एक साल तक यह कर्म करना निषिद्ध माना गया है।
कब नहीं की जा सकती है नारायणबलि-नागबलि
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नारायणबलि गुरु, शुक्र के अस्त होने पर नहीं किए जाने चाहिए। लेकिन प्रमुख ग्रंथ निर्णण सिंधु के मतानुसार इस कर्म के लिए केवल नक्षत्रों के गुण व दोष देखना ही उचित है। नारायणबलि कर्म के लिए धनिष्ठा पंचक और त्रिपाद नक्षत्र को निषिद्ध माना गया है।धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरण, शततारका, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती, इन साढ़े चार नक्षत्रों को धनिष्ठा पंचक कहा जाता है। कृतिका, पुनर्वसु, विशाखा, उत्तराषाढ़ा और उत्तराभाद्रपद ये छह नक्षत्र त्रिपाद नक्षत्र माने गए हैं। इनके अलावा सभी समय यह कर्म किया जा सकता है।
पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय
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नारायणबलि- नागबलि के लिए पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय बताया गया है। इसमें किसी योग्य पुरोहित से समय निकलवाकर यह कर्म करवाना चाहिए। यह कर्म गंगा तट अथवा अन्य किसी नदी सरोवर के किनारे और महाराष्ट्र् में नासिक के समीप स्थित प्रमुख ज्योतिर्लिंग त्रयंबकेश्वर में भी संपन्न कराया जाता है। संपूर्ण पूजा तीन दिनों की होती है।
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त्रिपिंडी कर्म का सम्पूर्ण विवरण
त्रिपिंडी काम्य श्राध्द है। लगातार तीन वर्ष तक जिनका श्राध्द न किया गया हो, उनको प्रेतत्व प्राप्त होता है।तीर्थस्थल पर पितरों को संबोधित कर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे त्रिपिंडी श्राद्ध कहते हैं ।
यह पुजा सभी अतृप्त आत्माओंके मोक्ष प्राप्ती के लिए कि जाती है।त्रिपिंडी श्राध्द में अपने गोत्र,पितरोंके नाम का नही किया जाता।कारण कौनसी पितरों की बाधा है।इस के बारे मे शाश्वत ज्ञान नहि होता।सभी अतृप्त आत्माओंकी मोक्ष प्राप्ती के लिए त्रिपिंडी श्राध्द करने का शास्त्र धर्मग्रंथ में बताया गया है।
हमारे लिए अज्ञात, सद्गति को प्राप्त न
हुए अथवा दुुर्गति को प्राप्त तथा कुल के लोगों को कष्ट देनेवाले पितरों को, उनका प्रेतत्व दूर होकर सद्गति मिलने के लिए अर्थात भूमि, अंतरिक्ष एवं आकाश, तीनों स्थानों में स्थित आत्माओं को मुक्ति देने हेतु त्रिपिंडी करने की पद्धति है ।
श्राद्ध साधारणतः एक पितर अथवा पिता-पितामह (दादा)-प्रपितामह (परदादा) के लिए किया जाता है । अर्थात, यह तीन पीढियों तक ही सीमित होता है ।परंतु त्रिपिंडी श्राद्ध से उसके पूर्व की पीढियों के पितरों को भी तृप्ति मिलती है । प्रत्येक परिवार में यह विधि प्रति बारह वर्ष करें; परंतु जिस परिवार में पितृदोष अथवा पितरों द्वारा होनेवाले कष्ट हों, वे यह विधि दोष निवारण हेतु करें ।
अमावस्या पितरों की तिथि है। इस दिन त्रिपिंडी श्राध्द करें। तमोगुणी, रजोगुणी एवं सत्तोगुणी – ये तीन प्रेत योनियां हैं। पृथ्वीपर वास करने वाले पिशाच तमोगुमी होते है। अंतरिक्ष में वास करने वाले पिशाच रजोगुणी एवं वायुमंडल पर वास करने वाले पिशाच सत्तोगुणी होते है। इन तीनों प्रकार की प्रेतयोनियो की पिशाच पीडा के निवारण हेतु त्रिपिंडी श्राध्द किया जाता है।
कई साल तक पितरों का विधी पूर्वक श्राध्द न होने से पितरों को प्रेतत्व प्राप्त होता है।श्राध्द कमलाकर ग्रंथ में साल मे ७२ दफा पितरों का श्राध्द करना चाहिए यह कह गया है।
अमावस्या व्दादशैव क्षयाहव्दितये तथा।षोडशापरपक्षस्य अष्टकान्वष्टाकाश्च षट॥
संक्रान्त्यो व्दादश तथा अयने व्दे च कीर्तिते।चतुर्दश च मन्वादेर्युगादेश्च चतुष्टयम॥
त्रिपिंडी श्राद्ध के सही समय
श्रावण, कार्तिक, मार्गशिर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन और वैशाख मुख्य मास है ५, ८, ११, १३, १४, ३० में शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की तिथीयाँ और रविवार दिन बताया गया है। किंन्तु तीव्रवार पिडा यदि हो रही है तो तत्काल त्रिपिडी श्राध्द करना उचित है। इसके लिए गोदायात्रा विवेका-दर्शा में प्रमाण दिया है। अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा ये तिथियां एवं संपूर्ण पितृपक्ष उचित होता है । गुरु शुक्रास्त, गणेशोत्सव एवं शारदीय नवरात्र की कालावधि में यह विधि न करें । उसी प्रकार, परिवार में मंगलकार्य के उपरांत अथवा अशुभ घटना के उपरांत एक वर्ष तक त्रिपिंडी श्राद्ध न करें । अत्यंत अपरिहार्य हो, उदा. एक मंगलकार्य के उपरांत पुनः कुछ माह के अंतराल पर दूसरा मंगलकार्य नियोजित हो, तो दोनों के मध्यकाल में त्रिपिंडी श्राद्ध करें ।
श्राध्द न करने से पितर लोग अपने वंशजों का खून पिते है यह आदित्यपुराण मे कहा है।
न सन्ति पितरश्र्चेति कृत्वा मनसि यो नरः।
श्राध्दं न कुरुते तत्र तस्य रक्तं पिबन्ति ते॥(आदित्यपुराण)
श्राध्द न करने से होनेवाले दोष त्रिपिंडी श्राध्द से समाप्त होते है।जैसे भूतबाधा,प्रेतबाधा,गंधर्व राक्षस शाकिनी आदि दोष दूर करने के लिए त्रिपिंडी श्राध्द करने की प्रथा है|घर में कलह, अशांती,बिमारी,अपयश,अकाली मृत्य,वासना पूर्ति न होना,शादी वक्त पर न होना,संतान न होना, काम धंधा बंद, नौकरी रोज़गार की बाधा, इस सब को प्रेत दोष कहा जाता है।धर्म ग्रंथ में धर्म शास्त्र के नुसार सभी दोष के निवारण के लिए त्रिपिंडी श्राध्द करना को सुचित किया गया है।
ज्योतिष द्वारा श्राद्धकर्ता की कुंडली में पितृदोष की पुष्टि करवाकर यदि पितृदोष हो, तो माता-पिता के जीवित होते हुए भी पुत्र का विधि करना उचित
श्राद्धकर्ता के पिता जीवित न हों, तो उसे विधि करते समय केश मुंडवाने चाहिए । जिसके पिता जीवित हैं, उस श्राद्धकर्ता को केश मुंडवाने की आवश्यकता नहीं है ।
घर का कोई सदस्य विधि कर रहा हो, तब अन्य सदस्यों द्वारा पूजा इत्यादि होना उचित है ।
त्रिपिंडी श्राद्ध में श्राद्धकर्ता के लिए ही अशौच होता है, अन्य परिजनों के लिए नहीं । इसलिए घर का कोई सदस्य विधि कर रहा हो, तो अन्यों के लिए पूजा इत्यादि बंद करना आवश्यक नहीं है ।
त्रिपिंडी श्राध्द में पद्धति
त्रिपिंडी श्राध्द का आरम्भ करने से पूर्व किसी पवित्र नदी या तीर्थ स्थात में शरीर शुध्दि के लिये प्रायश्चित के तौर पर क्षौर कर्म कराने का विधान है।
दश विधि स्नान भी करके आप कार्य आगे बढ़ा सकते है
त्रिपिंडी श्राध्द में ब्रह्मा, विष्णु् और महेश इनकी प्रतिमाएं तैयार करवाकर उनकी प्राण-प्रतिष्ठापुर्वक पूजन किया जाता है। ब्रम्हदेव,विष्णु,रुद्र ये तिन देवताओंकी प्राणप्रतिष्ठापूर्वक पुजा की जाती है।त्रिपिंडी श्राध्द में सात्विक प्रेत दोष निवारण के लिए ब्रम्ह पुजन करते है और यव का पिंड दिया जाता है।राजस प्रेत दोष निवारण के लिए विष्णु पुजन करते है और चावल का पिंड दिया जाता है।तामसप्रेत दोष निवारण के लिए तिल्लिका पिंड दिया जाता है और रुद्र पुजन करते है।
‘प्रथम तीर्थ में स्नान कर श्राद्ध का संकल्प करें । तदुपरांत महाविष्णु की एवं श्राद्ध के लिए बुलाए गए ब्राह्मणों की पूजा श्राद्धविधि के अनुसार करें । तत्पश्चात यव (जौ), व्रीहि (कीटक न लगे चावल) एवं तिल के आटे का एक-एक पिंड बनाएं । दर्भ फैलाकर उस पर तिलोदक छिडक कर पिंडदान करें ।
अ. यवपिंड (धर्मपिंड)
पितृवंश के एवं मातृवंश के जिन मृत व्याक्तियों की उत्तरक्रिया न हुई हो, संतान न होने के कारण जिनका पिंडदान न किया गया हो अथवा जो जन्म से ही अंधे-लूले थे (नेत्रहीन-अपंग होने के कारण जिनका विवाह न हुआ हो इसलिए संततीरहित), ऐसे पितरों का प्रेतत्व नष्ट हो एवं उन्हें सद्गति प्राप्त हो, इसलिए यवपिंंड प्रदान किया जाता है। इसे धर्मपिंड की संज्ञा दी गई है ।
आ. मधुरत्रययुक्त व्रीहीपिंड
पिंड पर चीनी, मधु एवं घी मिलाकर चढाते हैं; इसे मधुरत्रय कहते हैं । इससे अंतरिक्ष में स्थित पितरों को सद्गति मिलती है ।
इ. तिलपिंड
पृथ्वी पर क्षुद्र योनि में रहकर अन्यों को कष्ट देनेवाले पितरों को तिलपिंड से सद्गति प्राप्त होती है ।
इन तीनों पिंडों पर तिलोदक अर्पित करें । तदुपरांत पिंडों की पूजा कर अघ्र्य दें । श्रीविष्णु के लिए तर्पण करें ।
ब्राह्मण से इन तीनों देवताओं के लिये मंत्रों का जाप करवाया जाता है। हमें सतानेवाला, परेशान करने वाला पिशाचयोनि प्राप्त जो जीवात्मा है, उसका नाम एवं गोत्र हमे ज्ञात नहीं होने से उसके लिये अनाधिष्ट गोत्र शब्द का प्रयोग किया जाता है।
अंतत: इससे प्रेतयोनि प्राप्त उस जीवात्मा को सम्बोधित करते हुए यह श्राध्द किया जाता है। जौ तिल, चावल के आटे के तीन पिंड तैयार किये इन तीनों पिंडो का पूजन करके अर्ध्यं देकर देवाताओं को अर्पण किये जाते है। हमारे कुलवंश को पिडा देने वाली प्रेतयोनि को प्राप्त जीवात्मा ओं को इस श्राध्द कर्म से तृप्ती हो और उनको सदगति प्राप्त हो, ऐसी प्रार्थना के साथ यह कर्म किया जाता है। फिर
ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उन्हें दक्षिणा के रूप में वस्त्र, पात्र, पंखा, पादत्राण सोना, चांदी,तांबा, गाय, काले तिल, उडद, छत्र-खडाऊ, कमंडल, 7 बर्तन, अंगौछा, गमछा, धोती कुरता, साडी, में चीजें प्रत्यक्ष रुप में या उनकी कीमत के रुप में नकद रकम दान देकर अर्ध्य दान करने के पश्चात ब्राह्मण एवं सौभाग्यीशाली स्त्री को भोजन करवाने के पश्चाडत यह श्राध्दं कर्म पूर्ण होता है।
यहाँ जो ब्राह्मण भोज होता है वह शुद्ध गायी के देसी घी में बनता है और बनाने वाला भी ब्राह्मण होता है, भोजन बनाने में गंगाजल का प्रयोग होता है, भोजन में हींग और तेल प्याज, लहसुन, वर्जित है और ये भोजन वही पर बनता है जहा ये कर्म सिद्ध होता है, भोजन में खीर, खाजा, रतालू, आलू, मिर्ची, पूरी, बनती है, और सभी लोग जो इस प्रक्रिया में सम्मिलित है वो भाग लेते है, प्रक्रिया के पश्चात, यजमान भी वही भोजन प्रशादी ग्रहण करता है जो ब्राह्मण और पितरो को परोसी गयी हो, जो इस पूजन में बैठता है उसको सुबह निराहार रहना होता है
* देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब ।
बंदउं किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब ॥
अर्थ : देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर और निशाचर सबको मैं प्रणाम करता हूं । अब सब मुझपर कृपा कीजिए
सवा लाख जप करे
।।पितृ-सूक्तम्॥
उदिताम् अवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुम् यऽ ईयुर-वृका ॠतज्ञास्ते नो ऽवन्तु पितरो हवेषु॥1॥
अंगिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वनो भृगवः सोम्यासः।
तेषां वयम् सुमतो यज्ञियानाम् अपि भद्रे सौमनसे स्याम्॥2॥
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।
तेभिर यमः सरराणो हवीष्य उशन्न उशद्भिः प्रतिकामम् अत्तु॥3॥
त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठम् अनु नेषि पंथाम्।
तव प्रणीती पितरो न देवेषु रत्नम् अभजन्त धीराः॥4॥
त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः।
वन्वन् अवातः परिधीन् ऽरपोर्णु वीरेभिः अश्वैः मघवा भवा नः॥5॥
त्वं सोम पितृभिः संविदानो ऽनु द्यावा-पृथिवीऽ आ ततन्थ।
तस्मै तऽ इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥6॥
बर्हिषदः पितरः ऊत्य-र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्।
तऽ आगत अवसा शन्तमे नाथा नः शंयोर ऽरपो दधात॥7॥
आहं पितृन्त् सुविदत्रान् ऽअवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वः तऽ इहागमिष्ठाः॥8॥
उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।
तऽ आ गमन्तु तऽ इह श्रुवन्तु अधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥9॥
आ यन्तु नः पितरः सोम्यासो ऽग्निष्वात्ताः पथिभि-र्देवयानैः।
अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तो ऽधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥10॥
अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सु-प्रणीतयः।
अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्य-था रयिम् सर्व-वीरं दधातन॥11॥
येऽ अग्निष्वात्ता येऽ अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।
तेभ्यः स्वराड-सुनीतिम् एताम् यथा-वशं तन्वं कल्पयाति॥12॥
अग्निष्वात्तान् ॠतुमतो हवामहे नाराशं-से सोमपीथं यऽ आशुः।
ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥13॥
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्य इमम् यज्ञम् अभि गृणीत विश्वे।
मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरूषता कराम॥14॥
आसीनासोऽ अरूणीनाम् उपस्थे रयिम् धत्त दाशुषे मर्त्याय।
पुत्रेभ्यः पितरः तस्य वस्वः प्रयच्छत तऽ इह ऊर्जम् दधात॥15॥
॥ओमशांति: शांति:शांति:॥
* अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए पढ़ें पितृ कवच...
पितृ कवच का पवित्र पाठ
कृणुष्व पाजः प्रसितिम् न पृथ्वीम् याही राजेव अमवान् इभेन।
तृष्वीम् अनु प्रसितिम् द्रूणानो अस्ता असि विध्य रक्षसः तपिष्ठैः॥
तव भ्रमासऽ आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः।
तपूंष्यग्ने जुह्वा पतंगान् सन्दितो विसृज विष्व-गुल्काः॥
प्रति स्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायु-र्विशोऽ अस्या अदब्धः।
यो ना दूरेऽ अघशंसो योऽ अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्॥
उदग्ने तिष्ठ प्रत्या-तनुष्व न्यमित्रान् ऽओषतात् तिग्महेते।
यो नोऽ अरातिम् समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यत सं न शुष्कम्॥
ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याधि अस्मत् आविः कृणुष्व दैव्यान्यग्ने।
अव स्थिरा तनुहि यातु-जूनाम् जामिम् अजामिम् प्रमृणीहि शत्रून्।
अग्नेष्ट्वा तेजसा सादयामि॥
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