गृह शांति प्रगति समृद्धि यज्ञ या हवन

गृह शांति प्रगति समृद्धि यज्ञ या हवन.....🔥
यज्ञ एक शास्त्रोक्त कर्म ही नहीं बल्कि एक वैदिक विज्ञान है. सनातन परंपरा में यज्ञ या हवन का बड़ा महत्व बताया गया है। हवन की अग्नि शुद्धिकरण का सबसे बड़ा माध्यम है। कुंड में अग्नि के माध्यम से देवी-देवताओं को हविष्य पहुंचाने की प्रक्रिया को हवन कहते हैं। हविष्य वह पदार्थ है जिनसे हवन की पवित्र अग्नि में आहुति दी जाती है।

पुरातन काल से ही किसी कामना की पूर्ति के लिए यज्ञ करने की परंपरा रही है। ऋषि-मुनि दिव्य दृष्टि प्राप्त करने, देवताओं को प्रसन्न करने, वर्षा कराने, राक्षसों का नाश करने जैसे अनेक कार्यों के लिए यज्ञ करते आए हैं। राजा-महाराजा अपने राज्य की खुशहाली, विस्तार और शत्रुओं से रक्षा के लिए यज्ञ करते थे।

हवन में डाली जाने वाली वस्तुएं न सिर्फ पर्यावरण को शुद्द रखती हैं, बल्कि रोगाणुओं को भी नष्ट कर देती है। इससे कई बीमारियां ठीक हो जाती हैं। हवन में डाले जाने वाले कपूर और सुगंधित दृव्य वातावरण में एक विशेष प्रकार का आरोमा फैला देते हैं जिसका मन-मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

यज्ञोनुष्ठान द्वारा देवी देवताओं की उपासना:

एक सक्षम आचार्य के दिशा निर्देशों के अनुसार सकाम या निष्काम भाव से किये जाने वाले यज्ञ के संकल्पित क्रमबद्ध कर्म में सबसे पहले शारीरिक व मानसिक शुद्धिकरण, वैदिक सूक्तों व स्तुतियों से विभिन्न देवी देवताओं का आव्हान किया जाकर उन्हें उचित स्थान प्रदान करते हैं. और फिर उनके प्रसन्नार्थ उन्हें संबंधित वैदिक मंत्रों के द्वारा नाना प्रकार की हवि सामग्रियों से अग्नि के माध्यम से स्वाहा घोष से आहुति देने के रूप में भोग लगाया जाता है. 

सम्पूर्ण यज्ञ कर्म करने के बाद आव्हान किये हुए देवी देवताओं को उनको ससम्मान अपने अपने स्थान के लिए वैदिक मंत्रों के साथ विसर्जन किया जाता है. ये सब क्रमबद्ध कर्म है. इसके पीछे एक वैज्ञानिक आधार है.

यज्ञ विज्ञान.:
यज्ञ पूर्णतः वैज्ञानिक व रासायनिक प्रक्रिया है.

"यज्ञो वै श्रेष्ठतम कर्म" अर्थात यज्ञ से श्रेष्ठ कोई कार्य नही है. यज्ञ को अग्निहोत्र भी कहते हैं. अग्निहोत्र का अर्थ है जल, पृथ्वी, वायु आदि की शुद्धि के लिए डाली गयी आहुतियां.

यज्ञ केवल कर्मकाण्ड ही नही बल्कि चिकित्सा पद्धति भी है. यज्ञ करते समय जो हम विभिन्न मंत्रोच्चार करते हैं उसका हमारे मन, मस्तिष्क व आत्मा पर विशेष प्रभाव डालती है. साथ साथ वातावरण को भी शुद्ध करती है.

यज्ञ को हवि भी कहते हैं जिसका अर्थ है विष को हरने वाला.

विज्ञान के सिद्धान्त के अनुसार कोई भी पदार्थ नष्ट नही होता, हां उसका रूप बदला जा सकता है. (By law of conservation of mass. As we know that mass cannot be created nor destroyed in a chemical reaction)

नाना प्रकार की हवन सामग्री, गाय का देशी घी आदि जो हम अग्नि पर डालते है हवन के लिए वे वास्तव में औषधियां हैं, जलने से नष्ट नही होतीं बल्कि दूसरे रूप में  परिवर्तित होती हैं और सूक्ष्म रूप में हमे प्राप्त होती हैं.

जब एलोपैथ नही था तो प्राचीन काल में आयुर्वेद था. आयुर्वेद में इन्ही जड़ी बूटियों, वनस्पतियों से ही चिकित्सा की जाती थी.

हवन सामग्री में जो औषधियां हैं उनमें..
1.कीटाणुनाशक
2.सुगंधि वर्धक
3.स्वास्थ्यवर्धक (medicinal action property)
4.पौष्टिक
5. ऑक्सीजन वर्धक गुण होते हैं.

जब ये औषधियां हवन कुण्ड में जलायी जाती हैं तो ये वातावरण के द्वारा परमाणु रूप मे सांस के माध्यम से एक नही बल्कि अनेको जीव जंतुओं तक पहुचती हैं. जिससे परोपकार भी होता है.

यज्ञ में होने वाली रासायनिक क्रियाएँ निम्न हैं...
1.ज्वलन ( combustion)
2. ऊर्ध्वपातन ( sublimation)
3. धूनी (Fumigation)  
धूनी एक प्रक्रिया है जो कि विशेष रूप से एक क्षेत्र विशेष को कीटाणुरहित करती है, इसमें हवन यज्ञ सामग्री का धुआं, विशेष गैस या रसायन विशेष की वाष्प आदि को उस क्षेत्र में पूर्णरूप से भर दिया जाता है. ताकि उस क्षेत्र में गैस के प्रभाव से कीटाणु नष्ट होकर कीटाणुरहित हो जाय. (Fumigation  is a method of pest control that completely fills an area with smoke, vapor, or gas to especially for the purpose of disinfecting or of destroying pests. 

4.औटना( Volatilization)
घुलनशील सामग्री को वाष्पीकृत करना (Volatilization is the process whereby a dissolved sample is vaporised.)

ये सभी रासायनिक क्रियाएँ हमारे लिए लाभकारी ही हैं.

इनमे ज्वलन (combustion) अभिक्रिया  के दौरान  गाय का घी ( जिसमे लगभग  8% संतृप्त saturated fatty acids  तथा triglycerides, diglycerides, monoglyceride) ज्वलन को तेज करता है जिससे complete cumbustion हो सके.

fatty acid  के combustion के दौरान CO2 और H2O  निकलती है. complete combustion से CO2 भी बहुत कम हो जाता है.

Glycerol  के  combustion में  pyruvic acid और Glyoxal (C2H2O2)बनता है. pyruvic acid हमारे metabolism को बढ़ाता है. और glyoxal बैक्टेरिया को ख़त्म करता है.

इनके अलावा combustion के दौरान  जो हाइड्रोकार्बन बनते हैं वे पुनः  स्लो combustion  रिएक्शन होता है और methyle, ethyle alcohol, फार्मिक एसिड और फार्मेल्डिहाइड आदि  बनता है. जो कि वायु को सुगन्धित करता है और कीटाणुनाशक ही है. यही तक कि H1V1 वायरस के साथ साथ कई जटिल बीमारियों को भी समाप्त करने की क्षमता भी यज्ञ में है.

अब आप सोच रहे होंगे की जब ज्वलन होता है तो ऑक्सीजन खर्च होती है. एक तरह से हम पर्यावरण को नुक्सान पहुचाते हैं. तो आप गलत हैं, यज्ञ ही वह प्रक्रिया है, जिसमें ऑक्सीजन खर्च तो होता है पर ऑक्सीजन बनती भी है, क्योंकि इसमें CO2 के साथ -साथ वाष्प (H2O) भी बनती है. देखिये..

CO2  +    H2O +12000 cal= HCHO (farmaldehyde) +O2(ऑक्सीजन)

इस प्रकार यज्ञ करने से ऑक्सीजन खर्च नही बल्कि प्रोड्यूस होती है बनती है. साथ ही साथ अन्य रासायनिक क्रियाओं से बने gaseous प्रोडक्ट्स से पर्यावरण शुद्ध होता है. एवं हमें स्वास्थ्य लाभ भी होता है. साथ ही अग्निहोत्र का अवशेष राख हमारी मिट्टी की उर्वरकता बढाती है.

अतः यज्ञ से कोई नुकसान नही बल्कि लाभ ही लाभ है.

नित्य होम-विधि:

प्रातःकाल स्नान, सन्ध्या और तर्प्ण आदि के अनन्तर नित्य होम होता है । नित्य होम प्रात: और सायंकाल करना चाहिये ।

पवित्र आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर आचमन और प्राणायाम कर के अपनी दायें हाथ की अनामिका अङगुली में कुश की पवित्री धारण करें और जल लेकर निम्नलिखित संकल्प करें---

देशकालौ संकीत्य अमुकगोत्र: अमुकशर्माऽहं अमुकवर्माऽहम्, अमुकगुप्तोऽहम् श्रीपरमेश्वरप्रीतये सायंप्रातर्होमं करिष्ये ।

पश्चात् वेदी अथवा ताम्र-कुण्ड में पञ्चभूसंस्कार करना चाहिये । तीन कुशों से भूमि अथवा ताम्र-कुण्ड को भाड दें माड दें और उन कुशों को ईशानकोण में फेक दें । पश्चात् गोमय और जल से लेपन करें । अनन्तर स्त्रवा अथवा तीन कुशों द्वारा उत्तरोत्तर क्रम से तीन-तीन पूर्वाग्र रेखाएँ करें । उल्लेखन क्रम से अनामिका और अङ्गुष्ठ से तीन बार मृत्तिका उठाकर ईशानकोण में फेंक दें, फिर वहाँ जल छिडकें । इस प्रकार संस्कार करके निम्नाङ्कित मन्त्र से वहाँ अग्नि ले आवें ।

अग्न्याहरणमन्त्र
अन्वग्निरित्यस्य पुरोधा ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दोऽग्निर्देवता अग्न्यानयने विनियोग: ।
ॐ अन्न्वग्निरुषसामग्ग्रमक्ख्यदन्न्वहानि प्प्रथमो जातवेदा: ।
अनुसूर्य्यस्य पुरुत्रा चरश्मीननु द्यावापृथिवी ऽआततन्थ ॥

‘जिन अग्निदेव ने उष:काल के प्रारम्भ में क्रमश: प्रकाश फैलाया, फिर समस्त उत्पन्न वस्तुओं का ज्ञान रखनेवाले जिन प्रमुख देव ने दिनों को अभिव्यक्त किया तथा सूर्य की किरणों को अनेक रंग-रूपों में प्रकाशित किया और जो प्रकाश एवं पृथिवी को सब ओर से व्याप्त किये हुए हैं, उन अग्निदेव का हम साश्नात्कार कर रहे हैं ।’
इसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढकर पूर्वोक्त वेदी अथवा ताम्रकुण्ड में अग्नि की स्थापना करें

अग्निस्थापनमन्त्र
पृष्टो दिवीत्यस्य कुत्सऋषिस्त्रिष्टुप्‌छन्दो वैश्वानरो देवता अग्निम्थापने विनियोग: ।
ॐ पृष्ट्टो दिवि पृष्ट्टोऽग्नि: पृथिव्व्यां पृष्ट्टो व्विश्वा ऽओषधीरा विवेश ।
वैश्वानर: सहसा पृष्टोऽग्नि: स नो दिवा स रिषस्पातु नक्तम् ॥

‘द्युलोक में कौन आदिंत्यरूप से तप रहा है ? इस प्रकार जिनके विषय में मुमुक्षुओं ने प्रश्न किया है प्रथिवी अर्थात अन्तरिक्षलोक में कौन ‘विद्युत्’ रूप से प्रकाशमान हो रहा है?--- इस प्रकार जिनके सम्बन्ध में जलार्थी लोगों द्वारा प्रश्न किया गया है, जो सम्पूर्ण ओषधियों व्रीहि-यव आदि अन्नों में व्याप्त होकर मनुष्यों की जिज्ञासा के विषय हो रहे हैं अर्थात् ताप, फलपरिपाक और प्रकाश के द्वारा कौन समस्त प्राणियों का उपकार और उनके जीवन की रक्षा कर रहा है ? इस प्रकार जिन्हें जानने के लिये लोग प्रश्न करते हैं तथा यज्ञ में अश्वर्युद्वारा बलपूर्वक मन्थन करने पर यह किसके लिये मन्थन किया जा रहा है?--- ऐसा लोगों ने जिनके विषय में प्रश किया है, वे वैश्वानर अग्निदेव दिन में और रात्रि में भी हमें नाश से वचावें ।’
तदनन्तर निम्नाङ्कित मन्त्रों से अग्नि का उपस्थान करें ।

उपस्थानमन्त्र
समिधाग्निमिति तं त्वेति च देवा ऋषयो गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता अग्न्युपस्थाने विनियोग: ।      
ॐ समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् ।
आस्मिन् हव्या जुहोतन ॥

‘हे ऋत्विग्गण ! आपलोग घृताक्त समिधा से अग्निदेव की परिचर्या करें तथा आतिथ्यकर्म से पूजनेयोग्य उन अग्निदेव को घी से प्रज्वलित करें । फिर इस प्रज्वलित अग्नि में सब ओर नाना प्रकार के हषिष्य का हवन करें ।’

ॐ तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन व्वर्द्धयामसि ।
बृहच्छोचा यविष्टय ॥

‘हे अङ्गिर:--- हे गतिशील अग्निदेव ! प्रसिद्ध गुणों से युक्त आपको हम समिधा और घी से प्रज्बलित-कर रहे हैं । हे निर्जर देव ! आप अत्यन्त देदीप्यमान होइये ।’
इसके पञ्चात् नीचे लिखे व्याहृतियोंसहित तीन मन्त्रों से अग्नि को प्रज्षलित करे ।

अग्नि-प्रज्वालामन्त्र
त्रिव्याह्रतीनां प्रजापतिऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्या देवता:, ता, सवितुरिति कण्व ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्द: सविता देवता, तत्सवितुरिति विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्द: सविता देवता, विश्वानि देवेति नारायण ऋषिर्गायत्री छन्द: सविता देवता सन्धुक्षणे विनियोग: ।

ॐ भूर्भुव: स्व: । ॐ ता, सवितुर्व्वरेण्यस्य चित्रामाऽहं व्वृणे सुमतिं व्विश्वजन्याम् । यामस्य कण्ण्वो ऽअदुहत् प्रपीना, सहस्त्रधारां पयसा महीं गाम् ॥

‘मैं वरण करनेयोग्य सविता की विचित्र नाना प्रकारे के मनोवाञ्छित फल देने में समर्थ तथा सब लोगों का हित साधन करनेवाली उस कल्याणमयी बुद्धि को अंगीकार करता हूँ, जिस गौरूपा बुद्धि का कण्व ऋषि ने दोहन किया था तथा जो अत्यन्त पुष्ट सहस्त्रों क्षीरधाराओं से युक्त और दूध से परिपूर्ण है ।’

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो न: प्रचोदयात् ॥

‘हम स्थावर-जङ्गमरूप सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न करनेवाले उन निरतिशय प्रकाशमय परमेश्वर के भजने योग्य तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करते हैं ।’

ॐ विश्वानि देव सवितद्‌र्दुरितानि परासुव ।
यद् भद्रं तन्न ऽआसुव ॥

‘हे सूर्यदेव ! सम्पूर्ण पाप दूर कर दो और जो कल्याणमय वस्तु है हमेंत्र प्राप्त कराओं ।’
इस प्रकार इन मन्त्रों से अग्नि को प्रज्वलित करके बाएँ हाथ में तीन कुश रक्खें और खडा होकर प्रादेशमात्र लम्बी तीन घृताक्त समिधाएँ अग्नि में छोडें ।

समिन्धन-मन्त्र
अग्निसमिन्धन का मन्त्र इस प्रकार है---
पुनस्त्वेति प्रजापतिऋषिस्त्रिष्टुपछन्दोऽग्निर्देवता अग्निसमिन्धने विनियोग: ।
पुनस्त्वाऽऽदित्या रुद्रा व्वसव: समिन्धताम्पुनर्ब्ब्रह्माणो व्वसुनीथ यज्ञै: । घृतेन त्वन्तन्न्वं व्वर्धयस्व सत्त्या: सन्तु यजमानस्य कामा: ॥

‘हे अग्निदेव ! आदित्य, रुद्र और वसुगण तुम्हें पुन: उद्दीप्त करें ।
हे वसुनीथ (घननायक) ! ऋत्विक् और यजमानरूप ब्राह्मण लोग यज्ञों के द्वारा तुम्हें फिर से प्रज्वलित करें तथा तुम भी हमारे अर्पण किये हुए घी से अपने शरीर को बढाओ प्रज्वलित करो और तुम्हारे प्रज्वलित होने पर यजमान की कामनाएँ पूर्ण हों ।’
फिर बैठकर जल से अग्नि का पर्युश्नण करे और घृत, दधि, खीर अथवा घृताक्त यव, चावल या तिल आदि से अथवा मधुर फल से निम्नलिखित मन्त्रों द्वारा चार आहुतियाँ दें ।

सायंद्दोम
ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये न मम ।
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम ।

प्रातर्होम
ॐ सूर्याय स्वाहा, इदं सूर्याय न मम ।
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम ।

इसके पश्चात् अग्नि की प्रदक्षिणा करके प्रणाम करें और---
त्र्यायुषमिति नारायण ऋषिरुष्णिक् छन्द आशीर्देवता भस्मधारणे विनियोग: ।
ॐ त्र्यायुषं जमदग्ने: कश्यपस्य त्र्यायुषम् ।
यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो ऽअस्तु त्र्यायुषम् ॥

‘जमदग्नि ऋषि और कश्यप मुनि का जो तीनों बाल्य, यौवन, जरा अवस्थाओं की आयु का समूह है तथा इन्द्र आदि देवताओं की जो तीनों बाल्य, कुमार और यौवन अवस्थाओं की आयु का समाहार है, वह हमें प्राप्त हो ।’
इस मन्त्र से होम के भस्म को क्रमश: ललाट, ग्रीवा, दक्षिण बाहुमूल और हृदय में लगावें । इसके बाद निम्नाङ्कित श्लोक पढकर न्यूनतापूर्ति के लिये भगवान् से प्रार्थना करें ।

ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् ।
स्मरणादेव तद्विष्णो: सम्पूर्ण स्यादिति श्रुति: ॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥

‘यज्ञ में कर्म करनेवालों का जो कर्म प्रमादवश विधि से च्युत हो जाय, वह भगवान् विष्णु के स्मरणमात्र से ही पूर्ण हो सकता है, ऐसा श्रुति का वचन है ।’

‘जिनके स्मरण और नामोचारण से तप, यज्ञ आदि क्रियाओं में न्यूनता की तत्काल पूर्ति हो जाती है, उन भगवान् अच्युत को मैं प्रणाम करता हूँ ।’

ॐ विष्णवे नम: । ॐ विष्णवे नम: । ॐ विष्णवे नम: ।
अन्त में निम्नाङ्कित वाक्य कह कर यह हवन-कर्म भगवान् को अर्पण करें ।

कृतेनानेत नित्यहोमकर्मणा श्रीपरमेश्वर: प्रीयताम्, न मम ।

वग्रहों के बीज एवं तांत्रिक मंत्र कौन हैं : -

1. सूर्य- ॐ घृणि: सूर्याय नम: (बीज मंत्र), ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम: (तांत्रिक मंत्र)
2. चंद्र- ॐ सों सोमाय नम: (बीज मंत्र), ॐ श्रां श्रीं श्रौं चंद्रमसे नम: (तांत्रिक मंत्र)
3. मंगल- ॐ अं अंगारकाय नम: (बीज मंत्र), ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम: (तांत्रिक मंत्र)
4. बुध- ॐ बुं बुधाय नम: (बीज मंत्र), ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम: (तांत्रिक मंत्र)
5. गुरु- ॐ बृं बृहस्पतये नम: (बीज मंत्र), ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम: (तांत्रिक मंत्र)
6. शुक्र- ॐ शुं शुक्राय नम: (बीज मंत्र), ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम: (तांत्रिक मंत्र)
7. शनि- ॐ शं शनैश्चराय नम: (बीज मंत्र), ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम: (तांत्रिक मंत्र)
8. राहु- ॐ रां राहवे नम: (बीज मंत्र), ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: (तांत्रिक मंत्र)
9. केतु- ॐ कें केतवे नम: (बीज मंत्र), ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम: (तांत्रिक मंत्र) 

दशांश हवन ,तर्पण और मार्जन सम्पूर्ण जानकारी

    हवन करना शास्त्रों में बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। भारतीय परम्पराओ में हवन अथवा यज्ञ को बहुत महत्व बताया गया है। दशांश हवन प्रत्येक मंत्रो को सिद्ध करने के बाद किया जाता है। जिसके अंतर्गत मन्त्र जप का दसवा हिस्सा आहुतियों के माद्यम से सिद्ध किया जाता है। मान लीजिये हमने 125000 जप किये है तो हमें कुल के दसवां भाग 12500 जप का हवन करना होता है। इसको समझने के लिए हम तालिका का प्रयोग करेंगे :-

क्र. जप संख्या कर्म विधान
1 125000 कुल मंत्र जप
2 125000/10= 12500 हवन अहुतिया
3 12500/10 =  1250 तर्पण
4. 1250/10  =  125 मार्जन
5 125/10   =   12 ब्रम्ह या कन्या भोज
      उपरोक्त दी गई तालिका के माद्यम से हम समझ सकते है कि सपूर्ण दशांश हवन कैसे किया जाये। यदि किसी कारणवश तर्पण ,मार्जन या कन्या भोज में असमर्थ है तो आप उससे दुगना जप करके भी सिद्ध मान सकते है। लेकिन कुछ मतानुसार हवन कर्म करने से देवताओ को शक्ति मिलती है अर्थात मंत्र हवन से अधिक लाभ मिलता है।

     हवन से पहेले हमें सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी। सर्वप्रथम सामग्री पर विचार कर लेते है :
कुण्ड : कुण्ड अगर हम जमीन पर बना रहे है तो अति उत्तम माना जाता है। अगर किसी कारण से जमीन पर नहीं बनाया जा सके तो आप किसी भी पात्र का चयन कर सकते है। 12500 आहुतियों के लिए लगभग 2X2 कि लम्बाई चोड़ाई होना चाहिए तथा गहराइ 1.6 इंच लगभग होना चाहिए।\
. आसन: कुश का आसन हो तो बहुत ही अच्छा है अन्यथा आप कोई भी ऊनि आसन का प्रयोग कर सकते है।
जलपात्र : आपको ताम्बे का लोटा तथा एक बड़ा पात्र  जिसमे 1-2 लीटर पानी आ जाये तर्पण ,मार्जन के लिए आवश्यकता पड़ेगी।
हवन लकड़ी/समिधा : अधिकांशतः आम की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है क्योंकि यह आसानी से उपलब्द हो जाता है। शास्त्रों में अन्य लकड़ियों को भी विवरण मिलता है। गृह शांति के लिए गृह अनुसार भी लकड़ी प्रयोग में लाई जाती है। सूर्य: मदार, चन्द्र: पलाश, मंगल : खैर, बुध: चिड़चिड, बृहस्पति: पीपल, शुक्र: गूलर, शनि: शमी, राहु: दूर्वा केतु: कुशा की लकड़ी उपयोगी है।
नारियल गोला/बाटकी: पूर्ण आहुति के लिए नारियल की बाटकी की आवश्यकता पड़ेगी।
हविष्य या आहुति सामग्री: सर्वप्रथम हमें घी लेकर आ जाये। अलग अलग प्रकार के हवन में अलग अलग सामग्री उपयोग में लाई जाती है। सामान्यतः पांच तरह की सामग्री मिलाकर पंचांग धुप बना सकते है : 100 ग्राम तिल ,80 ग्राम मिश्री ,50 ग्राम जों , 25 ग्राम चावल, 25 नारियल बुरा। आप मार्केट से भी सामग्री ला सकते है। लक्ष्मी जी के दशांश हवन के लिए आप सिर्फ कमलगट्टे और घी से भी आहुतियाँ दे सकते है।
 सामान्य पंचोपचार पूजन सामग्री। नवग्रह लकड़ी, कपूर,शक्कर,फल ,मेवा आदि।

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