सनातन सदाशिव रुद्रास्टाध्यायी रुद्राभिषेक महत्व प्रयोग

सनातन सदाशिव रुद्रास्टाध्यायी रुद्राभिषेक महत्व प्रयोग


शिव या महादेवआरण्य संस्कृति जो आगे चल कर सनातन संस्कृति के नाम से जाने जाती है में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि नामों से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है।[1] हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं, तथा पुत्री अशोक सुंदरी हैं। शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है। यह शैव मत के आधार है। इस मत में शिव के साथ शक्ति सर्व रूप में पूजित है।

रुद्राष्टाध्यायी पाठ

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भगवान शिव को संहार का देवता कहा जाता है। भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। राम, रावण, शनि, कश्यप ऋषि आदि इनके भक्त हुए है। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव कहा जाता है। शिव के कुछ प्रचलित नाम, महाकाल, आदिदेव, किरात, चन्द्रशेखर, जटाधारी, नागनाथ, मृत्युंजय, त्रयम्बक, महेश, विश्वेश, महारुद्र, विषधर, नीलकण्ठ, महाशिव, उमापति, काल भैरव, भूतनाथ आदि।


अस्ट मूर्तिशिव

क्षितिमूर्ति -सर्व
2. जलमूर्ति -भव
3. अग्निमूर्ति -रूद्र
4. वायुमूर्ति -उग्र
5. आकाशमूर्ति -भीम
6. यजमानमूर्ति -पशुपति
7. चन्द्रमूर्ति -महादेव
8. सूर्यमूर्ति -ईशान

शिव स्वरूप सूर्य

जिस प्रकार इस ब्रह्मण्ड का ना कोई अंत है, न कोई छोर और न ही कोई सुरुआत, उसी प्रकार शिव अनादि है सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव के अंदर समाया हुआ है जब कुछ नहीं था तब भी शिव थे जब कुछ न होगा तब भी शिव ही होंगे। शिव को महाकाल कहा जाता है, अर्थात समय। शिव अपने इस स्वरूप द्वारा पूर्ण सृष्टि का भरण-पोषण करते हैं। इसी स्वरूप द्वारा परमात्मा ने अपने ओज व उष्णता की शक्ति से सभी ग्रहों को एकत्रित कर रखा है। परमात्मा का यह स्वरूप अत्यंत ही कल्याणकारी माना जाता है क्योंकि पूर्ण सृष्टि का आधार इसी स्वरूप पर टिका हुआ है।

शिव स्वरूप शंकर जी

पृथ्वी पर बीते हुए इतिहास में सतयुग से कलयुग तक, एक ही मानव शरीर एैसा है जिसके ललाट पर ज्योति है। इसी स्वरूप द्वारा जीवन व्यतीत कर परमात्मा ने मानव को वेदों का ज्ञान प्रदान किया है जो मानव के लिए अत्यंत ही कल्याणकारी साबित हुआ है। वेदो शिवम शिवो वेदम।। परमात्मा शिव के इसी स्वरूप द्वारा मानव शरीर को रुद्र से शिव बनने का ज्ञान प्राप्त होता है।
रुद्राष्टाध्यायी यजुर्वेद का अंग है और वेदों को ही सर्वोत्तम ग्रंथ बताया गया है। वेद शिव के ही अंश है वेद: शिव: शिवो वेद:। अर्थात् वेद ही शिव है तथा शिव ही वेद हैं, वेद का प्रादुर्भाव शिव से ही हुअा है। भगवान शिव तथा विष्णु भी एकांश हैं तभी दोनो को हरिहर कहा जाता है, हरि अर्थात् नारायण (विष्णु) और हर अर्थात् महादेव (शिव) वेद और नारायण भी एक हैं वेदो नारायण: साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुतम्। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में वेदों का इतना महत्व है तथा इनके ही श्लोकों, सूक्तों से पूजा, यज्ञ, अभिषेक आदि किया जाता है। शिव से ही सब है तथा सब में शिव का वास है, शिव, महादेव, हरि, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, नीलकंठ आदि सब ब्रह्म के पर्यायवाची हैं। रुद्र अर्थात् 'रुत्' और रुत् अर्थात् जो दु:खों को नष्ट करे, वही रुद्र है, रुतं--दु:खं, द्रावयति--नाशयति इति रुद्र:। रुद्रहृदयोपनिषद् में लिखा है--

सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:।

रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दन:।।

यो रुद्र: स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशन:।

ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत्।।

यह श्लोक बताता है कि रूद्र ही ब्रह्मा, विष्णु है सभी देवता रुद्रांश है और सबकुछ रुद्र से ही जन्मा है। इससे यह सिद्ध है कि रुद्र ही ब्रह्म है, वह स्वयम्भू है।

इसी रुद्र (शिव) के उपासना के निमित्त रुद्राष्टाध्यायी ग्रंथ वेद का ही सारभूत संग्रह है। जिस प्रकार दूध से मक्खन निकालते हैं उसी प्रकार जनकल्याणार्थ शुक्लयजुर्वेद से रुद्राष्टाध्यायी का भी संग्रह हुआ है। इस ग्रंथ में गृहस्थधर्म, राजधर्म, ज्ञान-वैराज्ञ, शांति, ईश्वरस्तुति आदि अनेक सर्वोत्तम विषयों का वर्णन है।

मनुष्य का मन विषयलोलुप होकर अधोगति को प्राप्त न हो और व्यक्ति अपनी चित्तवृत्तियों को स्वच्छ रख सके इसके निमित्त रुद्र का अनुष्ठान करना मुख्य और उत्कृष्ट साधन है। यह रुद्रानुष्ठान प्रवृत्ति मार्ग से निवृत्ति मार्ग को प्राप्त करने में समर्थ है। इसमें ब्रह्म (शिव) के निर्गुण और सगुण दोनो रूपों का वर्णन हुआ है। जहाँ लोक में इसके जप, पाठ तथा अभिषेक आदि साधनों से भगवद्भक्ति, शांति, पुत्र पौत्रादि वृद्धि, धन धान्य की सम्पन्नता और स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है; वहीं परलोक में सद्गति एवं मोक्ष भी प्राप्त होता है। वेद के ब्राह्मण ग्रंथों में, उपनिषद, स्मृति तथा कई पुराणों में रुद्राष्टाध्यायी तथा रुद्राभिषेक की महिमा का वर्णन है।

वायुपुराण में लिखा है--

यश्च सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम्।

सर्वान्नात्मगुणोपेतां सुवृक्षजलशोभिताम्।।

दद्यात् कांचनसंयुक्तां भूमिं चौषधिसंयुताम्।

तस्मादप्यधिकं तस्य सकृद्रुद्रजपाद्भवेत्।।

यश्च रुद्रांजपेन्नित्यं ध्यायमानो महेश्वरम्।

स तेनैव च देहेन रुद्र: संजायते ध्रुवम्।।

अर्थ: जो व्यक्ति समुद्रपर्यन्त, वन, पर्वत, जल एवं वृक्षों से युक्त तथा श्रेष्ठ गुणों से युक्त ऐसी पृथ्वी का दान करता है, जो धनधान्य, सुवर्ण और औषधियों से युक्त है, उससे भी अधिक पुण्य एक बार के रुद्री[4] जप एवं रुद्राभिषेक का है। इसलिये जो भगवान शिव का ध्यान करके रुद्री का पाठ करता है, वह उसी देह से निश्चित ही रुद्ररूप हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है।

इस प्रकार साधन पूजन की दृष्टि से रु रूद्राष्टाध्यायी का विशेष महत्व है।

प्राय: कुछ लोगों मे यह धारणा होती है कि मूलरूप से वेद के सुक्त आदि पुण्यदायक होते हैं अत: इन मन्त्रों का केवल पाठ और सुनना मात्र ही आवश्यक है। वेद तथा वेद के अर्थ तथा उसके गंभीर तत्वों से विद्वान प्राय: अनभिज्ञ हैं। वास्तव में यह सोंच गलत है, विद्वान वेद और वान से मिलकर बना है, तो वेद के विद्या को जो जाने वही विद्वान है, इसके संदर्भ में उनको जानकारी होना आवश्यक है। प्राचीन ग्रंथों में भी वैदिक तत्वो की महिमा का वर्णन है।

निरुक्तकार कहते हैं कि जो वेद पढ़कर उसका अर्थ नहीं जानता वह भार वाही पशु के तुल्य है अथवा निर्जन वन के सुमधुर उस रसाल वृक्ष के समान है जो न स्वयं उस अमृत रस का आस्वादन करता है और न किसी अन्य को ही देता है। अत: वेदमंत्रों का ज्ञान अतिकल्याणकारी होता है--

स्थाणुरयं भारहार: किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम्। योऽर्थज्ञ इत् सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपप्मा।।

अत: रुद्राष्टाध्यायी के अभाव में शिवपूजन की कल्पना तक असंभव है।
रुद्राष्टाध्यायी अत्यंत ही मूल्यवान है, न ही इससे बिना रुद्राभिषेक ही संभव है और न ही इसके बिना शिव पूजन ही किया जा सकता है। यह शुक्लयजुर्वेद का मुख्य भाग है। इसमें मुख्यत: आठ अध्याय हैं पर अंतिम में शान्त्यध्याय: नामक नवम तथा स्वस्तिप्रार्थनामन्त्राध्याय: नामक दशम अध्याय भी हैं। इसके प्रथम अध्याय में कुल 10 श्लोक है तथा सर्वप्रथम गणेशावाहन मंत्र है, प्रथम अध्याय में शिवसंकल्पसुक्त है। द्वितीय अध्याय में कुल 22 वैदिक श्लोक हैं जिनमें पुरुसुक्त (मुख्यत: 16 श्लोक) है। इसी प्रकार आदित्य सुक्त तथा वज्र सुक्त भी सम्मिलित हैं। पंचम अध्याय में परम् लाभदायक रुद्रसुक्त है, इसमें कुल 66 श्लोक हैं। छठें अध्याय के पंचम श्लोक के रूप में महान महामृत्युंजय श्लोक है। सप्तम अध्याय में 7 श्लोकों की अरण्यक श्रुति है प्रायश्चित्त हवन आदि में इसका उपयोग होता है। अष्टम अध्याय को नमक-चमक भी कहते हैं जिसमें 24 श्लोक हैं।

श्लोकों की संख्या की सूची निम्नांकित है---

प्रथम अध्याय                 = 10 श्लोक
द्वितीय अध्याय               = 22 श्लोक
तृतीय अध्याय                = 17 श्लोक
चतुर्थ अध्याय                 = 17 श्लोक
पंचम अध्याय                  = 66 श्लोक
षष्ठम अध्याय                  = 8 श्लोक
सप्तम अध्याय                 = 7 श्लोक
अष्टम अध्याय                 = 29 श्लोक
शान्त्यध्याय:                  = 24 श्लोक
स्वस्तिप्रार्थनामंत्राध्याय:  = 13 श्लोक
सौजन्य: प्रकाशित रुद्राष्टाध्यायी पुस्तिका से।

प्रथम अध्याय के 5वे श्लोक से इसकी शुरुआत है--

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१॥

अर्थ: जो मन जागते हुए मनुष्य से बहुत दूर तक चला जाता है, वही द्युतिमान् मन सुषुप्ति अवस्था में सोते हुए मनुष्य के समीप आकर लीन हो जाता है तथा जो दूरतक जाने वाला और जो प्रकाशमान श्रोत आदि इन्द्रियों को ज्योति देने वाला है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२॥

अर्थ: कर्म अनुष्ठान में तत्पर बुद्धि संपन्न मेधावी पुरुष यज्ञ में जिस मन से शुभ कर्मों को करते हैं, प्राजाजन के शरीर में और यज्ञीय पदार्थों के ज्ञान में जो मन अद्भुत पूज्य भाव से स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥३॥

अर्थ: जो मन प्रकर्ष ज्ञान स्वरूप, चित्त स्वरूप और धैर्य रूप हैं; जो अविनाशी मन प्राणियों के भीतर ज्योति रूप से विद्यमान है और जिसकी सहायता के बिना कोई कर्म नहीं किया जा सकता, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥४॥

अर्थ जिस शाश्वत मन के द्वारा भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्यकाल की सारी वस्तुएँ सब ओर से ज्ञात होती हैं और जिस मन के द्वारा सात होतावाला यज्ञ विस्तारित किया जाता है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

यस्मिन्नृचः साम यजूं गुँ षि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥५॥

अर्थ: जिस मन में ऋग्वेद की ऋचाएँ और जिसमें सामवेद तथा यजुर्वेद के मंत्र उसी प्रकार प्रतिष्ठित है, जैसे रथ चक्र की नाभि में तीलियाँ जुड़े रहते हैं, जिस मन में प्रजाओं का सारा ज्ञान (पट में तंतु की भाँति) ओतप्रोत रहता है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान् नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥६॥

अर्थ: जो मन मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार उसी प्रकार घुमाता है, जैसे कोई अच्छा सारथि लगाम के सहारे वेगवान् घोड़ों को अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित करता है; बाल्य, यौवन, वार्धक्य आदि से रहित तथा अति वेगवान् जो मन हृदय में स्थित है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

रुद्राभिषेक
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रुद्राभिषेक में शिवलिंग की विधिवत् पूजा की जाती है, इसमें आप दुग्ध, घृत, जल, गन्ने का रस, शक्कर मिश्रित जल अपने इच्छा के अनुसार उपयोग कर सकते हैं। नियम निम्नांकित है --

पूजन - सभी देवी देवताओं का विधिवत् पूजन करें।

अभिषेक - श्रिंगी द्वारा अभिषेक करें, रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करें।

रुद्री पाठ की विधियाँ--

शुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी का पाठ (1 या 11 बार)

रुद्राष्टाध्यायी का पंचम और अष्टम अध्याय का पाठ।

कृष्णयजुर्वेदीय पाठ का "नमक" पाठ 11 बार उसके बाद "चमक" पाठ के एक श्लोक का पाठ। (एकादश रूद्र पाठ)

शिव सहस्रनाम का पाठ।

रूद्र सुक्त का पंचम अध्याय का पाठ।[7]

उत्तर पूजन पुन: पूजन करें।

बिल्वार्पण आचार्य शिवमहिम्न स्तोत्र आदि शिव श्रोत्रो का पाठ करते हुए बिल्व अर्पित करें।

आरती मंगल आरती करें।

पार्थिव पूजन
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सर्वप्रथम पवित्रीकरण करें।

शिवलिंग निर्माण - सर्वप्रथम काली मिट्टी से शिवलिंग निर्माण करें यहाँ आप 121 रुद्री बनावें, आचार्य से पूछें कि क्या क्या बनाना होगा।

प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा करें।

गणेश पूजन गणेश तथा आवाहित देवताओं का पूजन करें।

शिव पूजन शिवलिंग का पूजन करें।

अभिषेक रुद्राभिषेक करें आचार्य रुद्री का पाठ करें।

उत्तर पूजन  शिव पूजन करें।

बिल्वार्पण  आचार्य स्तोत्र पाठ करें यजमान बिल्व अर्पित करें।

हवन हवन करें।

आरती

दक्षिणा आचार्य को दक्षिणा भूयषी दें।

विसर्जन

प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे।

माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। ॥ शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ॥

भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धा चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। नारद संहिता में आया है कि जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है। इस बार 6 मार्च को शिवरात्रि प्रदोष व अर्धरात्रि दोनों में विद्यमान रहेगी।

ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं। यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं। मारक या अनिष्ट की आशंका में महामृत्युंजय शिव की आराधना ग्रहयोगों के आधार पर बताई जाती है। बारह राशियां, बारह ज्योतिर्लिगों की आराधना या दर्शन मात्र से सकारात्मक फलदायिनी हो जाती है।

यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है। ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है। यही काल कामदेव के विकास का है और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है। भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं, अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है।
महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। भगवान शिव का यह प्रमुख पर्व फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माता पार्वती की पति रूप के महादेव शिव को पाने के लिये की गई तपस्या का फल महाशिवरात्रि है। इसी दिन माता पार्वती और शिव विवाह के पवित्र सूत्र में बंधे। शादी में जिन 7 वचनों का वादा वर वधु आपस में करते है उसका कारण शिव पार्वती विवाह है। महादेव शिव का जन्म उलेखन कुछ ही ग्रंथो में मिलता है। परंतु शिव अजन्मा है उनका जन्म या अवतार नही हुआ । महाशिवरात्रि को भारत वर्ष में काफी धूम धाम से मनाया जाता हैN

भगवान शिव का नित्य अभिषेक करने से इच्छित वस्तु सुगमता से ही मिल जाती है। इस माह में किए गए अभिषेक से जातकों की कुंडली में कष्ट देने वाले ग्रह भी शुभ फल प्रदान करते हैं। भगवान शिव के अभिषेक की महिमा अपार है। ज्योतिषाचार्य पं. राजकुमार शास्त्री के अनुसार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक राशि के जातकों के लिए विधि बताई गई है।

कैसे करें अभिषेक- भगवान सदाशिव को प्रसन्न करने के लिए ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शिव के पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय, लघु रूद्री से अभिषेक करें। शिवजी को बिल्वपत्र, धतूरे का फूल, कनेर का फूल, बेलफल, भांग चढ़ाकर पूजन करें।

भगवान शंकर के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वे माया-मोह और संसार से विरक्त रहते हैं लेकिन संपूर्ण ब्रह्मांड उनके आगे नतमस्तक भी है। ज्योतिष के अनुसार, मनुष्य के जीवन में सुख-दुख ग्रहों के कारण आते हैं। किसी ग्रह का अच्छा प्रभाव उसे सफलता, सुख और समृद्धि देता है तो दुष्प्रभाव उसके लिए कई समस्याएं लेकर आता है।

पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, मंगल और संपूर्ण ग्रह-नक्षत्र शिव के इशारे पर गतिमान हैं। अगर भगवान शिव के पूजन में कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो वे ग्रहों के दुष्प्रभाव को भी मंगलकारी बना देते हैंं। शिव की कृपा से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।

महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा में इन बातों का ध्यान रखकर आप संंबंधित ग्रहों की शांति कर सकते हैं। इससे ये आपके जीवन में शुभ प्रभाव भी देने लगेंगे।

सूर्य
इस ग्रह की शांति के लिए भगवान शिव का जलाभिषेक करें। अगर गंगाजल उपलब्ध हो तो अतिउत्तम। अगर न मिले तो पवित्र जल से भी अभिषेक कर सकते हैं।

चंद्र
भगवान शिव के मस्तक पर विराजित चंद्रमा मन का कारक है। अगर मन चंचल है और अध्ययन, दैनिक कार्य आदि में एकाग्रता का अभाव महसूस करते हैं तो शिवरात्रि के दिन कच्चे दूध में काले तिल डालकर शिव का अभिषेक कीजिए। मन एकाग्र रहेगा।

मंगल
अगर क्रोध अधिक आता है, दुर्घटनाएं आदि होती हैं तो यह मंगल का दुष्प्रभाव हो सकता है। इसके लिए गिलोय की बूटी के रस से भोलेनाथ का अभिषेक कीजिए। जीवन में समस्त कार्य मंगलमय होंगे।

बुध
अगर बुध का दोष हो, परिश्रम का सही परिणाम नहीं मिलता हो, अध्ययन का परिणाम अच्छा नहीं आ रहा हो तो भगवान शिव को दही व मिश्री चढ़ाएं। यह उपाय डरावने सपने आने की स्थिति में भी किया जा सकता है।

बृहस्पति
वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण हो, विवाह में विलंब हो रहा हो तो महाशिवरात्रि का दिन इस समस्या को दूर कर सकता है। इस दिन कच्चे दूध में हल्दी मिलाकर शिव का अभिषेक कीजिए। वे आपके जीवन की समस्या जरूर दूर करेंगे।

शुक्र
अगर संतान का स्वास्थ्य ठीक न रहता हो, संतान में बहुत विलंब हो, अग्नि से भय हो, कृषि से संबंधित उत्पादों पर आधारित कारोबार में लाभ चाहते हैं तो शिवरात्रि पर पंचामृत से भोले का अभिषेक कीजिए।

शनि
काम के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं लेकिन हर बार असफलता ही हाथ लगती है, सत्कार्य में भी अपयश मिलता है, जो अपराध आपने नहीं किया लेकिन उसका दोषी आपको माना जा रहा है तो यह शनि का दुष्प्रभाव हो सकता है। इसके लिए गन्ने के रस से शिव का अभिषेक कीजिए। भगवान शिव जरूर आपकी विपदा को दूर करेंगे।

मेष- शहद, गु़ड़, गन्ने का रस। लाल पुष्प चढ़ाएं।

वृषभ- कच्चे दूध, दही, श्वेत पुष्प।

मिथुन- हरे फलों का रस, मूंग, बिल्वपत्र।

कर्क- कच्चा दूध, मक्खन, मूंग, बिल्वपत्र।

सिंह- शहद, गु़ड़, शुद्ध घी, लाल पुष्प।

कन्या- हरे फलों का रस, बिल्वपत्र, मूंग, हरे व नीले पुष्प।

तुला- दूध, दही, घी, मक्खन, मिश्री।

वृश्चिक- शहद, शुद्ध घी, गु़ड़, बिल्वपत्र, लाल पुष्प।

धनु- शुद्ध घी, शहद, मिश्री, बादाम, पीले पुष्प, पीले फल।

मकर- सरसों का तेल, तिल का तेल, कच्चा दूध, जामुन, नीले पुष्प।

कुंभ- कच्चा दूध, सरसों का तेल, तिल का तेल, नीले पुष्प।

मीन- गन्ने का रस, शहद, बादाम, बिल्वपत्र, पीले पुष्प, पीले फल।

ये हैं शिवपुराण के छोटे-छोटे उपाय, कर सकते हैं आपकी हर इच्छा पूरी :

भगवान शिव बहुत भोले हैं, यदि कोई भक्त सच्ची श्रद्धा से उन्हें सिर्फ एक लोटा पानी भी अर्पित करे तो भी वे प्रसन्न हो जाते हैं। इसीलिए उन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है। भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए कुछ छोटे और अचूक उपायों के बारे शिवपुराण में भी लिखा है। ये उपाय इतने सरल हैं कि इन्हें बड़ी ही आसानी से किया जा सकता है। हर समस्या के समाधान के लिए शिवपुराण में एक अलग उपाय बताया गया है।  ये उपाय इस प्रकार हैं-

शिवपुराण के अनुसार, भगवान शिव को प्रसन्न करने के उपाय इस प्रकार हैं-

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।

यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में बांट देना चाहिए।

शिवपुराण के अनुसार, जानिए भगवान शिव को कौन-सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से क्या फल मिलता है-

1. बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।

3. शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।

4. शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

5. शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है।

6. यदि शारीरिक रूप से कमजोर कोई व्यक्ति भगवान शिव का अभिषेक गाय के शुद्ध घी से करे तो उसकी कमजोरी दूर हो सकती है।

शिवपुराण के अनुसार, जानिए भगवान शिव को कौन-सा फूल चढ़ाने से क्या फल मिलता है-

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है।

6. जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से भगवान शिव का पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजन में शुभ माना गया है।

11. दूर्वा से भगवान शिव का पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

इन उपायों से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव

1. सावन में रोज 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ऊं नम: शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं।

2. अगर आपके घर में किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो सावन में रोज सुबह घर में गोमूत्र का छिड़काव करें तथा गुग्गुल का धूप दें।

3. यदि आपके विवाह में अड़चन आ रही है तो सावन में रोज शिवलिंग पर केसर मिला हुआ दूध चढ़ाएं। इससे जल्दी ही आपके विवाह के योग बन सकते हैं।

4. सावन में रोज नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएं। इससे जीवन में सुख-समृद्धि आएगी और मन प्रसन्न रहेगा।

5. सावन में गरीबों को भोजन कराएं, इससे आपके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी तथा पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी।

6. सावन में रोज सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निपट कर समीप स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं और भगवान शिव का जल से अभिषेक करें और उन्हें काले तिल अर्पण करें। इसके बाद मंदिर में कुछ देर बैठकर मन ही मन में ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इससे मन को शांति मिलेगी।

7. सावन में किसी नदी या तालाब जाकर आटे की गोलियां मछलियों को खिलाएं। जब तक यह काम करें मन ही मन में भगवान शिव का ध्यान करते रहें। यह धन प्राप्ति का बहुत ही सरल उपाय है।

आमदनी बढ़ाने के लिए

सावन के महीने में किसी भी दिन घर में पारद शिवलिंग की स्थापना करें और उसकी यथा विधि पूजन करें। इसके बाद नीचे लिखे मंत्र का 108 बार जप करें-

ऐं ह्रीं श्रीं ऊं नम: शिवाय: श्रीं ह्रीं ऐं

प्रत्येक मंत्र के साथ बिल्वपत्र पारद शिवलिंग पर चढ़ाएं। बिल्वपत्र के तीनों दलों पर लाल चंदन से क्रमश: ऐं, ह्री, श्रीं लिखें। अंतिम 108 वां बिल्वपत्र को शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद निकाल लें तथा उसे अपने पूजन स्थान पर रखकर प्रतिदिन उसकी पूजा करें। माना जाता है ऐसा करने से व्यक्ति की आमदानी में इजाफा होता है।

संतान प्राप्ति के लिए उपाय

सावन में किसी भी दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव का पूजन करें। इसके पश्चात गेहूं के आटे से 11 शिवलिंग बनाएं। अब प्रत्येक शिवलिंग का शिव महिम्न स्त्रोत से जलाभिषेक करें। इस प्रकार 11 बार जलाभिषेक करें। उस जल का कुछ भाग प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। यह प्रयोग लगातार 21 दिन तक करें। गर्भ की रक्षा के लिए और संतान प्राप्ति के लिए गर्भ गौरी रुद्राक्ष भी धारण करें। इसे किसी शुभ दिन शुभ मुहूर्त देखकर धारण करें।

बीमारी ठीक करने के लिए उपाय

सावन में किसी सोमवार को पानी में दूध व काले तिल डालकर शिवलिंग का अभिषेक करें। अभिषेक के लिए तांबे के बर्तन को छोड़कर किसी अन्य धातु के बर्तन का उपयोग करें। अभिषेक करते समय ऊं जूं स: मंत्र का जाप करते रहें। इसके बाद भगवान शिव से रोग निवारण के लिए प्रार्थना करें और प्रत्येक सोमवार को रात में सवा नौ बजे के बाद गाय के सवा पाव कच्चे दूध से शिवलिंग का अभिषेक करने का संकल्प लें। इस उपाय से बीमारी ठीक होने में लाभ मिलता है।

*शिवार्चन और शिव वास*

*शिव वास देखने का सूत्र*
शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक तिथियों की कुल संख्या 30 होती है । इस तरह से कोई भी मुहूर्त देखने के लिए 1 से 30 तक की संख्या को ही लेना चाहिए ।।

तिथी च द्विगुणी कृत्वा तामे पञ्च समाजयेत ।।
सप्तभि (मुनिभिः) हरेद्भागं शेषे शिव वाससं ।।
एक शेषे तू कैलाशे, द्वितीये गौरी संनिधौ ।।
तृतीये वृष भारुढौ सभायां च चतुर्थके ।।
पंचमे तू क्रीडायां भोजने च षष्टकं ।।
सप्तमे श्मशाने च शिववास: प्रकीर्तितः ।।

अर्थ:- तिथि को दुगुना करें,
उसमे पांच को जोड़ देना चाहिए,
कुल योग में, 7 का भाग देने पर, 1.2.3. शेष बचे तो इच्छा पूर्ति होता है, शिववास अच्छा बनता है । बाकि बचे तो हानिकारक होता है, शुभ नहीं है ।।

इसे इस प्रकार समझना चाहिए ...
१.कैलाश अर्थात = सुख,
२. गौरिसंग = सुख एवं संपत्ति,
३.वृषभारूढ = अभिष्ट्सिद्धि
, ४.सभा = सन्ताप,
५.भोजन = पीड़ा,
६.क्रीड़ा = कष्ट,
७.श्मशाने = मरण ।।

*शिव-वास*
【१】यह ध्यान रहे कि शिव-वास का विचार सकाम अनुष्ठान में ही जरूरी है...
【२】 निष्काम भाव से की जाने वाली अर्चना कभी भी हो सकती है..
. 【३】ज्योतिíलंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, सावन के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है...
【४】वस्तुत:शिवलिंग का अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और तब उसकी सारी समस्याएं स्वत:समाप्त हो जाती हैं..
.【५】 दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से सारे पाप-ताप-शाप धुल जाते हैं.
【६】कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं।
【७】अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होती है जिससे अभिषेककर्ता पर विपत्ति आ सकती है।
【८】कृष्णपक्ष की द्वितीया, नवमी तथा शुक्लपक्ष की तृतीया व दशमी में महादेव देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं। इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप या दुख मिलता है।
【९】कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी व एकादशी में सदाशिव क्रीडारत रहते हैं।
【१०】 इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट प्रदान करते है।
【११】कृष्णपक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी व चतुर्दशी में रुद्रदेव भोजन करते हैं।
【१२】 इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा देते हैं।
【१३】किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है
और मनोवांछित फल प्राप्त होता है.
【१४】प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया (2) व नवमी (9) के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है…
【१५】कृष्णपक्ष की चतुर्थी (4), एकादशी (11) तथा शुक्लपक्ष की पंचमी (5) व द्वादशी (12) तिथियों में भगवान शंकर कैलास पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है. कृष्णपक्ष की पंचमी (5), द्वादशी (12) तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी (6) व त्रयोदशी (13) तिथियों में भ१६१६ोलेनाथ नंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते हैं… अत:इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है…

【१६】कृष्णपक्ष की सप्तमी (7), चतुर्दशी (14) तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), पूíणमा (15) में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूíत के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होगी. इससे यजमान पर महाविपत्ति आ सकती है
【१७】 कृष्णपक्ष की द्वितीया (2), नवमी (9) तथा शुक्लपक्ष की तृतीया (3) व दशमी (10) में महादेवजी देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं. इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप (दुख) मिलेगा. कृष्णपक्ष की तृतीया (3), दशमी (10) तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी (4) व एकादशी (11) में नटराज क्रीडारत रहते हैं.इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चन संतान को कष्ट दे सकता है. कृष्णपक्ष की षष्ठी (6), त्रयोदशी (13) तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी (7) व चतुर्दशी (14) में रुद्रदेव भोजन करते हैं.।।                                           
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भगवान शिव सनातन संस्कृति में ऐसे भगवान माने गए हैं जो औपचारिकताओं में ज्यादा विश्वास नहीं करते। देव हो या असुर, वे सबके परेश्वर हैं और उनकी तपस्या, पूजन आदि कोई भी कर सकता है।

रावण ने भगवान शिव की तपस्या से ऐसी शक्ति अर्जित की थी कि संपूर्ण पृथ्वी उसके प्रताप से कांपने लगी थी, तो भगवान श्रीराम ने शिव की कृपा से वानरों को भी कुशल योद्धा बनाकर लंका पर विजय प्राप्त की।

इस प्रकार शिव की पूजा में प्रमुख है - भावना। भगवान शिव भावना के अनुरूप फल देते हैं और उनकी पूजन विधि भी बहुत आसान है, क्योंकि वे त्रुटियों को क्षमा भी कर देेते हैं। जानिए, भगवान शिव की पूजा से जुड़े ऐसे ही कुछ सरल उपाय, जो आपके जीवन की विघ्न-बाधाओं को दूर कर देंगे।

1- अगर आप जीवन में अनेक बाधाओं से परेशान हैं, बार-बार काम बिगड़ रहा है तो आज भगवान शिव का अभिषेक सरसों के तेल से कीजिए। इससे आपके बिगड़े हुए काम बनने लगेंगे।

2- जिन दंपत्ति के संतान नहीं है या जिनकी संतान अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहती या जन्म के तुरंत बाद मृत्यु हो जाती है तो वे शिवरात्रि पर भोलेनाथ को गाय का घी चढ़ाएं और शुद्ध मन से प्रार्थना करें। शिव आपके मन की मुराद जरूर पूरी करेंगे।

3- अगर आप आर्थिक समस्याओं से पीडि़त हैं, धन का व्यय अधिक हो रहा है या बीमारियों के उपचार में बहुत धन लग रहा है तो शिवरात्रि पर भगवान शिव को गन्ने का रस चढ़ाएं और पूजन कीजिए। पूजन के बाद प्रसाद के रूप में फल वितरित करें।

4- जो लोग व्यापार करते हैं या राजनीति, समाज सेवा, लेखन, भाषण जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं (जो सीधे जनता से संबंधित हैं), वे शिवलिंग पर जलधारा चढ़ाएं। जलधारा भगवान शिव को विशेष प्रिय है। यह व्यक्ति के जीवन में यश लाती है।

5- चिकित्सा, औषधि आदि क्षेत्रों से संबंधित लोग भगवान शिव को गाय का कच्चा दूध चढ़ाएं। भगवान शिव जीवन और मोक्ष, दोनों के दाता हैं। चिकित्सक पर अगर शिव की कृपा हो तो उसके मरीज शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हैं। संभव हो तो इस दिन 11 या 16 लोगों को दूध का दान करें।

6- सैनिक, पुलिस, रक्षा और न्याय क्षेत्र से जुड़े लोग भगवान शिव को धतूरा और आक चढ़ाएं। शिव का एक हाथ सज्जनों को वरदान देता है तो दूसरा त्रिशूल के माध्यम से दुष्टों को दंड भी देता है। शिव न्याय और शक्ति के भी प्रतीक हैं। आक-धतूरा उन्हें विशेष प्रिय हैं।

7- अगर किसी के वैवाहिक जीवन में बाधा आ रही है या शादी का रिश्ता टूट जाता है तो वह भगवान शिव को शहद चढ़ाए। इससे व्यक्ति के जीवन की समस्याओं का निस्तारण होकर शहद की तरह मधुरता आती है।

8- अगर आप शिव की पूजन विधि से ज्यादा परिचित नहीं हैं तो भी शिव आप पर कृपा करेंगे। आप शिव को पवित्र जल और दही अर्पित कर भी शिव की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। पूजन के बाद प्रभु से क्षमायाचना करें।


👉 शिव पर नाना प्रकार के द्रव्यों से अभिषेक करने पर लाभ

अभिषेक द्रव्य-

जो भी व्यक्ति कामना से अभिषेक करना चाहता है तो इन द्रव्यों

से अभिषेक करने से लाभ होगा। मनोकामना सिद्ध होगी।

1) वर्षा की कामना करने पर जलाभिषेक करें।

2) रोग शान्ति के लिए दही का अभिषेक करें।

3 ) धन व व्यापार वृद्धि के लिए गन्ने के रस से ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नमः कासम्पुट लगाकर अभिषेक करें।

4) विवाह के लिए शहद से अभिषेक करें।

5) पुत्र की कामना के लिए घी से अभिषेक करें।

6) महाकाल संहिता के अनुसार ज्वर शान्ति के लिए जल से अभिषेक करें।

7) पद प्राप्ति व पदच्युत होने पर नारियल के पानी से या आम के फलोंके  रस से अभिषेक करें।

8 ) रोग नाश तथा शत्रु नाश हेतु सरसों के तेल से करें।

9) स्त्री कलह के लिए दूध या अंगुर के रस से करें। मंत्र त्र्यंबकं यजामहे

सुंगधि पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बंधानादितो मुक्षीयमामुतः। का संपुट

लगावे ।

10 ) धन प्राप्ति के लिए बिल्व रस से अभिषेक करें ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं

महालक्ष्म्यै नमः का सम्पुट रुद्री पाठ में लगावें।

11) कार्यसिद्धि के लिए जातक ॐ नमः शिवाय से नित्य 108 गुलाब

के पुष्प चढ़ावे ये 41 दिन करने पर कार्य सिद्ध होगा।

12 ) शत्रु नाश हेतु धतुरे के रस का अभिषेक करें। ॐ छाँ नमः का

सम्पुट लगावें।

13 ) इत्र से अभिषेक करने पर भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी।

14 ) पंचामृत के अभिषेक से सभी प्रकार की इच्छापूर्ण होती है।

15) आम की गुटली को पीसकर अभिषेक करने पर नाक गले के रोग

मं आराम होगा। ॐ हौं जूं सः का सम्पुट लगावें ।

16 ) आक के सफेद फूलों का रस से अभिषेक करने से रोग से आराम

मिलेगा या 108 पुष्प लेकर नित्य महामृत्युजञ्य के जप से चढ़ावे तो

रोग निवारण होगा।

17 ) पपीते के रस से महामृत्युञ्जय का सम्पुट लगाकर अभिषेक करें

तो किडनी के रोग में आराम मिलेगा।

18) आंवला के रस से महामृत्युञ्जय का सम्पुट लगाकर अभिषेक करें

तो हृदय रोग में आराम मिलता है।

19 ) महामृत्युजञ्य का जप करते रहे व शिव पर काली मिर्च चढ़ाते रहे

करीब 1 हजार मंत्र बोले तो शत्रु नाश होता है।

नोट : रूद्री में अध्याय के शुरू व अंत में संपुट तथा पांचवे अध्याय में

हर यंत्र संपुट देकर पाठ करें। आप चाहेत तो रूद्र के हर मंत्र के

आगे-पीछे संपुट लगाकर अभिषेक कर सकते है।

ग्रहों के अनुसार निम्न द्रव्यों से शिव पर अभिषेक-

नोट: जो ग्रह नीच हो, शत्रु क्षेत्रीय हो, पाप ग्रह युक्त हो, अंशों में

कमजोर, सप्तवर्गि बलम् में कमजोर, वर्त्री हो तो निम्न द्रव्यों से शिव

पर अभिषेक करने से निश्चित लाभ होगा।

सूर्य - अनार के रस से

चन्द्रमा -  दूध या पंचामृत से

मंगल - शहद से

बुद्ध -  गन्ने के रस से

गुरु -  घी से

शुक्र -  दही  से

शनि - जल में काले तिल मिलाकर

राहु - सफेद आक के फूलों के रस से या भांग से

केतु - जल में कुशा डालकर या पंचामृत में कुशा डालकर उससे अभिषेक करें।

राशियों के अनुसार शिव पूजन (अभिषेक) -

मेष-अनार के रस से

वृषभ दूध से

मिथुन शहद से

कर्क पंचामृत से

सिंह घी से

कन्या गन्ने के रस से

तुला दही या इत्र से

वृश्चिक धतूरे से या इत्र से

धनु गंगाजल या नारियल के जल से

मकर जल में तिल डालकर

कुम्भ भांग से

मीन अंगुर के रस या बिल्ब के रस से


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