मीन लग्न का सारगर्भित फल स्वाभाव

मीन लग्न का सारगर्भित फल स्वाभाव और गुण(लग्नेश गुरु-केतु-वरुण)

इस लग्न के स्वामि देवता श्री गणेश है और तत्व जल है 
मीन लग्न के नक्षत्र एवं विशेषताएं
पूर्वाभाद्रपद (चतुर्थ चरण), उत्तराभाद्रपद (चारों चरण), तथा रेवती (चारों चरण) के संयोग से मीन लग्न बनता है.
लग्न स्वामी : गुरु
लग्न तत्व: जल
लग्न चिन्ह :दो मछलियाँ
लग्न स्वरुप: द्विस्वभाव
लग्न स्वभाव: सौम्य
लग्न उदय: उत्तर
लग्न प्रकृति: त्रिधातु प्रकृति
जीवन रत्न: पुखराज
अराध्य: भगवान् विष्णु
लग्न गुण : सतोगुण
अनुकूल रंग: पीला
लग्न जाति: ब्राह्मण
शुभ दिन: गुरूवार, रविवार
शुभ अंक: 3
जातक विशेषता: भावुक
मित्र लग्न :कर्क, वृश्चिक
शत्रु लग्न : मेष, सिंह
लग्न लिंग: स्त्री


जन्मकुण्डली के प्रथम भाव में जब मीन राशि हो तो जातक का लग्न मीन होता है। मीन राशि का स्वामी गुरु ही मीन लग्न का लग्नेश होता है। यह अन्तिम (बारहवीं) राशि है। ठीक वैसे ही जैसे मेष आरम्भिक (प्रथम) लग्न है। मीन लग्न के जातकों के विवेचन करने के लिए हमें लग्न के स्वामी गुरु के गुण (विशेषताएं) तथा मीन राशि के प्रतीक चिह्न ’मछली’ की विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए। इस आधार पर यह स्थूल निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि मीन लग्न के जातक नदी/समुद्र के तटों को पसंद करने वाले, जल से लगाव रखने वाले, रिजर्व (संकुचित) रहने वाले, अशांत/बेचैन तबियत के (अस्थिर स्वभाव वाले), औसत कद-काठी के, फेयर डीलिंग करने वाले (न्यायपूर्ण/स्पष्ट व्यवहार वाले), महत्वाकांक्षी, धर्मभीरू, आस्तिक, उच्च कोटि के धार्मिक तथा इतिहास के शौकीन होते हैं किन्तु इनमें आत्मविश्वास का प्रायः अभाव रहता है।मीन लग्न के स्वामी बृहस्पति है। बृहस्पति देवताओं के गुरू माने जाते हैं। ऐसे व्यक्ति, गौरवर्ग, कायन देह, मछली के समान आकर्षक व सुन्दर आँखों वाले होते हैं .इनके बाल घुंगराले एवं नाक ऊंची होती है। इनके दांत छोटे एवं पैने होते हैं. मीन लग्न में जन्मे व्यक्ति धार्मिक बुद्धि से ओतप्रोत, मेहमान प्रिय, सामाजिक अच्छाईयों व नियमों का पालन करने वाले होते है। ऐसे जातक आस्तिक एवं ईश्वर के प्रति श्रद्धावान होते हैं तथा सामाजिक रूढ़ियों का कट्टरता से पालन करते हैं। आप कूटनीति, रणनीति व षडयंत्रकारी मामलों में एक कभी रूचि नहीं लेते। इनका प्राकृति स्वभाव उत्तम दायलु व दानशीलता है। सामान्यता मीनलग्न में उत्पन्न जातक स्वास्थ्य एवं दर्शनीय होते है। तथा सौम्यता की छाप हमेशा विद्यमान रहती हे।

         

          मीन लग्न के जातक कभी-कभी औसत से कम कद वाले भी देखे गए हैं। किन्तु कद कम हो या औसत इनकी शरीर रचना इस प्रकार की होती है कि शरीर का ऊपर का हिस्सा भारी व निचला हिस्सा कमजोर रहता है। ये तगड़े व मजबूत किस्म के भी हो सकते हैं और ढीले-ढाले मोटू किस्म के भी हो सकते हैं परन्तु जैसाकि बताया-मछली की पूंछ की भांति इनके शरीर का निचला हिस्सा ऊपर के हिस्से की अपेक्षा कमजोर नजर आता है। इनके नेत्र गोल हो सकते हैं। प्रायः बड़े, गोलाईयुक्त तथा बाहर को उभरे हुए होते हैं। ये स्थिर विचारों के नहीं होते, परिवर्तनशील स्वभाव के होते हैं। ये नम्र स्वभाव के, ईमानदार व दयालु होते हैं और प्रायः डरपोक किस्म के होते हैं।

          प्रतिशोधात्मक भावना मीन लग्न के जातकों में न के बराबर होती है। गुरु लग्नेश होने से ये लोग क्षमाशील व सज्जन, धर्मात्मा होते हैं। शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान तथा कला में इनकी रुचि होती है। लग्न पर शुभ प्रभाव हो तो ये उच्च कोटि के सन्त अथवा दार्शनिक भी हो सकते हैं। क्योंकि तब अध्यात्म में इनकी रुचि तथा क्षमता और भी गहन हो जाती है। लग्न पर अशुभ प्रभाव हो तो तपेदिक, श्वास व पैरों की तकलीफ, गुदा व गुप्तांग के रोग इन्हें सम्भावित रहते हैं। वैसे मीन लग्न वालों को यकृत, पीलिया, नितम्बों आदि से सम्बन्धित रोग एवं मेदवृद्धि की पूर्ण सम्भावना होती ही है। कन्या, कर्क व वृश्चिक लग्न के जातकों से इनकी मित्रता शुभ फलदायी होती है। ये लोग सिनेमा, टी.वी., अभिनय, संगीत, डॉक्टरी, आयातनिर्यात, समुद्र/जल सम्बन्धी कार्यों (तरल पदार्थों का विक्रय, बन्दरगाह/जल सेना आदि) में विशेष सफल होते हैं।

          मीन लग्न में गुरु यदि लग्न में ही हो तो जातक अति विद्वान, प्रतापी, प्रसिद्ध तथा ब्राह्मणत्व के गुणों से सम्पन्न होता है। चतुर्थ भाव में गुरु हो तो माता का धन, वाहन का सुख तथा भूमि में गड़े धन का लाभ दिलाता है। पांचवें घर में विद्या लाभ कराता है, पुत्र भी विद्वान होते हैं किन्तु अल्प होते हैं। आठवें घर में गुरु हो तो तीर्थ स्थान या धर्म सम्बन्धी कार्य में जातक की मृत्यु होती है । ग्यारहवें घर का गुरु धन, विद्या और यश तीनों में वृद्धि करता है। बारहवें घर में गुरु हो तो जातक दानपुण्य करने वाला तथा धर्म सम्बन्धी कार्यों में धन का अधिक व्यय करने वाला होता है। यदि सातवें घर में गुरु हो तो ऐसे जातक की पत्नी भी बहुत विदूषी अथवा साध्वी (नियम/संयम तथा पूजा/उपवास आदि के साथ रहने वाली) होती है।

          मीन लग्न के जातक पात्र/सुपात्र का ध्यान रखे बिना भी उपकार/दान/आर्थिक सहायता करते हुए देखे जाते हैं। वे बहुत अधिक संवदेनशील होते हैं। मीन लग्न के जातक कल्पनाशील होते हैं। प्रायः ये यथार्थ से दूर आदर्शवादिता में जीते हैं और दिमाग की बजाय दिल से फैसले करते हैं। किन्तु अपना भ्रम टूटने, स्वप्न बिखरने या मानसिक चोट पहुंचने के सदमे से बहुत अधिक दुखी होते हैं। कष्ट को सहने का माद्दा इनमें कम ही रहता है। बहुत से मीन लग्न के जातक इस प्रकार की स्थितियों में नशे का सहारा लेते हुए भी देखे जा सकते हैं। मीन लग्न के जातक औरों को धोखा नहीं देते। इनमें अध्यात्म में प्रगति करने की सम्भावना अति तीव्र होती है। संतोषी प्रवृत्ति के होते हैं तो भी इनका वैवाहिक जीवन सुखपूर्ण नहीं होता।

          मेरे अपने अनुभव के अनुसार मीन लग्न के जातकों को कन्याएं अधिक पैदा होती हैं। ये लोग अपने मित्र, सम्बन्धी/प्रिय रिश्तेदारों की आवश्यकता से अधिक प्रशंसा करके उन्हें महिमामंडित करने की प्रवृत्ति वाले होते हैं। दुनिया को भले ही ये धोखा न देते हों, किन्तु स्वयं को धोखे में जरूर रखते हैं। क्योंकि वास्तविकता से नजर चुराकर कल्पना में ही रहना पसंद करते हैं। प्रायः ये दृढ़ इरादों वाले भी नहीं होते। लेकिन विपन्नता की स्थिति में घबराते भी नहीं। इनकी प्रबल आस्था इनको ऐसे अवसरों पर बल प्रदान करती है। जो जातक स्वयं को भाग्य के भरोसे छोड़ देते हैं वे अक्सर सफल होते देखे गए हैं। जबकि किसी कारण से महत्त्वाकांक्षी या लालची होकर जो प्रयास करने वाले जातक (मीन लग्न के) मैंने देखे हैं वो असफल होते देखे हैं। मीन लग्न के जातकों की सहनशीलता विशेष होती है। मैंने कभी किसी मीन लग्न के जातक को झुंझलाते हुए नहीं देखा है। जमीन-जायदाद के मामले मीन लग्न के जातकों के लिए दिक्कतें पैदा करने वाले ही होते हैं। या तो वे इन कार्यों में सफल नहीं होते। या ऐसे परिणाम निकलते हैं जिससे उन्हें यह सोचना पड़ता है कि यह काम न करते तो ही अच्छा होता।

          विशेष (रोग)-मीन लग्न हो, अष्टमस्थ शनि निर्बल चंद्र के साथ हो तो जातक की अकाल मृत्यु होती है या प्रेत बाधा की पीड़ा झेलनी पड़ती है (अकेला चन्द्र भी अष्टमस्थ हो तो जातक बाल्यावस्था में तो रुग्ण रहता ही है)।

ऽ    मीन लग्न हो, गुरु व लग्न दोनों पापग्रहों के बीच हों, सूर्य निर्बल हो और सातवें भाव में भी पापग्रह हों तो जातक आत्महत्या के लिए विवश हो जाता है।

ऽ    मीन लग्न हो, दूसरे, ग्यारहवें या बारहवें भाव में शनि, गुरु, राहू व मंगल की युति हो जाए तो जातक के जीवन में आजीवन कोई न कोई रोग लगा रहता है।

ऽ    मीन लग्न, सातवें घर में चन्द्र, मंगल तथा राहू की युति हो तथा शुभ ग्रहों की वहां दृष्टि न हो तो जातक एक वर्ष में मृत्यु को प्राप्त होता है या मृत्युतुल्य कष्ट भोगता है। (ऐसी स्थिति में जातक को अनिष्ट निवारक सिद्ध यंत्र से लाभ होता है।)

ऽ    मीन लग्न हो, शनि सप्तमस्थ, गुरु, शुक्र व राहू बारहवें घर में हों तथा कुण्डली में कोई शुभ योग न हो तो भी जातक की एक वर्ष की आयु में मृत्यु होती है।

ऽ    मीन लग्न हो, क्षीण चन्द्र लग्नस्थ हो तथा पापदृष्ट हो तो भी जातक रुग्ण रहता है। मीन लग्न में यदि दुःस्थानों में बुध, गुरु, शुक्र की युति एकसाथ हो तो जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना के कारण होती है

ऽ    मीन लग्न हो, षष्ठेश (सूर्य) लग्नस्थ तथा पापदृष्ट हो तो नेत्रों से जलस्राव के कारण जातक अंधा हो सकता है (दूसरा तथा बारहवां घर भी विचारें)।

ऽ    मीन लग्न हो, वृश्चिक का सूर्य दो पापग्रहों के बीच हो तो तीव्र हार्ट अटैक। अथवा चैथा राहू, अन्य पापग्रहों से दृष्ट तथा गुरु निर्बल हो तो भी हार्ट अटैक होता है। अथवा चैथे में पापग्रह तथा चतुर्थेश (बुध) पापग्रहों के बीच हो तो हृदय रोग अथवा चतुर्थेश बुध कर्क राशि में निर्बल/अस्त या अष्टमस्थ हो तो भी जातक को हृदय रोग होता है।
मीन लग्न के स्वामी बृहस्पति है। बृहस्पति देवताओं के गुरू माने जाते हैं। ऐसे व्यक्ति, गौरवर्ग, कायन देह, मछली के समान आकर्षक व सुन्दर आँखों वाले होते हैं .इनके बाल घुंगराले एवं नाक ऊंची होती है। इनके दांत छोटे एवं पैने होते हैं. मीन लग्न में जन्मे व्यक्ति धार्मिक बुद्धि से ओतप्रोत, मेहमान प्रिय, सामाजिक अच्छाईयों व नियमों का पालन करने वाले होते है। ऐसे जातक आस्तिक एवं ईश्वर के प्रति श्रद्धावान होते हैं तथा सामाजिक रूढ़ियों का कट्टरता से पालन करते हैं। आप कूटनीति, रणनीति व षडयंत्रकारी मामलों में एक कभी रूचि नहीं लेते। इनका प्राकृति स्वभाव उत्तम दायलु व दानशीलता है। सामान्यता मीनलग्न में उत्पन्न जातक स्वास्थ्य एवं दर्शनीय होते है। तथा सौम्यता की छाप हमेशा विद्यमान रहती हे।

ये विद्वान एवं बुद्धिमान होते हैं तथा नवीन विचारों का सृजन करने में समर्थ रहते हैं। इनके विचारों से सामाजिक लोग प्रभावित तथा आकर्षित रहते हैं। बातचीत करने की कला कोई इनसे सीखे। इन्हें धर्मपालक एवं अतिथिसेवी भी कहा जाता है।भौतिक सुख संसाधनों का उपभोग करने की इनकी प्रबंल इच्छा रहती है तथा इससे इन्हें प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त धनैश्वर्य से ये युक्त रहते हैं एवं विभिन्न स्रोतों से धनार्जन करके आर्थिक रूप से सुदृढ रहते हैं। साथ ही चिन्तन एवं मननशीलता का भाव भी इसमें रहता है।

प्रायः लेखन कार्य में इनकी रूचि रहा करती है। संगीत, नाटक एवं साहित्य की और इनका विशेष झुकाव होता है। फिजूलखर्ची इन्हें पसंद नही होती। आत्मविश्वास के धनी ऐसे जातक अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेते हैं। न्याय का पक्ष लेते हैं तथा कानून का सम्मान करते हैं। ऐसे जातक स्वभाव के इतने सौम्य होते हैं कि भले ही कोई इनके साथ दुष्टता का व्यवहार करें, किन्तु ये बदले में भलाई ही करेंगे, बुराई नहीं।

प्राकृतिक दृश्यों का अवलोकन करके इनको शांति एवं संतुष्टि की प्राप्ति होती है। प्रेम के क्षेत्र में ये सरल और भावुक रहते है। परन्तु व्यवहार कुशल होते है। अतः सांसारिक कार्यों में उचित सफलता अर्जित करके अपने उन्नति मार्ग प्रशस्त करने में सफल रहते हैं। इसके अतिरिक्त नवीन वस्तुओं के उत्पादन आदि में इनकी रूचि रहती है तथा इस क्षेत्र में इनका प्रमुख योगदान रहता है।

आकर्षक व्यक्तित्व के कारण अन्य लोग भी आपसे प्रभावित रहते हैं. लेखन के प्रति आपकी रूचि होगी तथा इस क्षेत्र में आप आदर एवं प्रतिष्ठा भी अर्जित कर सकते है। अभिमान के भाव की आप अल्पता होगा तथा सबके साथ विनम्रता का व्यवहार करेंगे। आप में दयालुता का भाव भी विद्यमान होगा तथा अवसरानुकूल अन्य जनों की सेवा तथा सहायता करने के लिए तत्पर होंगे। इसके अतिरिक्त साहित्य एवं कला के प्रति भी आपकी रूचि रहेगी।

वैदिक ज्योतिष में मीन लग्न (Meen Lagna) को एक महत्वपूर्ण लग्न के तौर पर जाना जाता है। इस लग्न में पैदा हुए जातक स्वभाव से सरल व अविरल धारा की तरह होते हैं, साफ मन व मृदुल वाणी के हैं। आप अगर एक मीन जातक हैं तो आपका स्वभाव शांत व मृदुल होगा। आपके अंदर कई अन्य विशेषताएं भी हैं। 

ज्योतिष में लग्न क्या अर्थ है
जन्मकुण्डली के प्रथम भाव में जब मीन राशि हो तो जातक का लग्न मीन
होता है।प्रथम भाव पूर्व दिशा का सूचक है और वहा आपके जन्म के समय जो राशि उदित हुई वो राशि लग्न और राशीश लग्नेश कहलायेगा  मीन राशि का स्वामी गुरु ही मीन लग्न का लग्नेश होता है,मीन लग्न ( Meen Lagna ) मुक्ति या मोक्ष का प्रतीक होता है। इस लग्न में जन्मे व्यक्ति का स्वामी ग्रह बृहस्पति होता है। जो इनकी कुंडली में इनके लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है ।  किन्तु मेरा मान्ना है की गुरु के साथ जल के देवता  वरुण, रोमन सागर के देवता (neptune), सिंधी समाज के देवता  झूलेलाल, अरोड़ा खत्रियो के दरियावजी, और केतु को भी मीन लग्न में लग्नेश होने का दायित्व मिलता है इस वजह से यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.गुरु केतु वरुण इस राशि के स्वामी होते है, यह अन्तिम(बारहवीं) राशि है। ठीक वैसे ही जैसे मेष आरम्भिक (प्रथम) लग्न है। मीनलग्न के जातकों के विवेचन करने के लिए हमें लग्न के स्वामी गुरु-वरुण के गुण (विशेषताएं) तथा मीन राशि के प्रतीक चिह्न 'मछली' स्पेशली डॉलफिन की विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए। इस आधार पर यह स्थूल निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि मीन लग्न के जातक हल्की सी हलचल में अपनी दिशा बदल देती है. 

इनकी गतिशीलता इतनी अधिक होती है क्योंकि मछली एक स्थान पर टिकती नहीं है. इसी लिए उसका कोई घर भी नहीं होता है. बहुत अधिक मेहनत के लिए परमात्मा ने इनको नहीं बनाया है. मीन कुंडली में बारहवें स्थान में पड़ने वाली राशि है. द्विस्भाव की स्त्री राशि है. इसके कारण ऐसे जातकों का स्वभाव कभी जटिल तो कभी सरल होता है. इसे सौम्य राशि भी कहते हैं. यह राशि पूर्वाभाद्रपद के एक चरण, उत्तराभाद्रपद के चार चरण और रेवती नक्षत्र के चार चरण से मिलकर बनी है.

यह व्यक्ति को अत्यंत संवेदनशील और भावुक बनाता है. यह व्यक्ति के अंदर कल्पना और रहस्य के गुण पैदा पैदा करता है. इससे व्यक्ति के अंदर शुद्ध आध्यात्मिकता आती है. यह व्यक्ति को कला, संगीत और फिल्म के क्षेत्र में खूब सफलता देता है. यह व्यक्ति को बहुत ज्यादा प्रसिद्धि और यश देता है.

नेप्च्यून की प्रधानता वाले लोग यानि जो मीन लग्न में जन्म लेने वाले जातक चंचल और होशियार होता है. ऐसे व्यक्ति खतरे को दूर से ही भांप लेते हैं. इनमें कई और भी खूबियां पाई जाती हैं.दूसरों का अनुकरण करने वाले होते हैं और दूसरों के विचार अपने ही विचार हैं ऐसा मानते हैं। बेशुमार नामो-शोहरत देती है नेप्च्यून की कृपादृष्टि जन्म कुंडली में, यदि नेप्च्यून लाभ ग्रहों के साथ 1, 5 वें और 9वें घरों में बैठा है, तो जातक शानदार सफलता, ऊंचाई और लोकप्रियता को प्राप्त करता है। यदि नेप्च्यून उन राशियों के साथ बैठा है जिनके स्वामी बहुत शक्तिशाली पोजीशन में हैं, तो जातक हमेशा लाइटलाइट में रहेगा। अंदर के इंसाँ का प्रतिनिधि मीन लग्न का स्वामी नेपच्यून हमारी कल्पना, मानसिक संवेदनशीलता और रहस्यवादी सोच से संबंध को प्रकट करता है - सब कुछ अनदेखी और अज्ञात। जन्म कुंडली में नेपच्यून का स्थान हमारे जीवन के उन हिस्सों से संबंधित है जहां हम विश्वासों से सीमित होने या परंपरा से बंधे होने से इनकार करते हैं।। इस ग्रह की ऊर्जा को धोखे, भ्रम और निराशाजनक लत के रूप में देखा जा सकता है। देसी अंदाज में कहें तो जातक की कुण्‍डली में नेप्‍च्‍यून ग्रह जिस स्‍थान पर होगा, उस स्‍थान से संबंधित चमत्‍कार पैदा करेगा।नेप्च्यून जलीय दरिया समुन्दर नदी झील प्रकृति का ग्रह है, इसलिए जल तत्व वाली मीन राशि को इसकी राशि कहा गया है। इसी गुण के कारण कई ज्योतिषियों का मानना है कि रात्रि के समय का जन्म हो और मीन लग्न उदित हो अथवा दिन का जन्म हो, या रात का गुरु के साथ नेप्च्यून को लग्नेश मानना चाहिए। यह एक राशि में लगभग 14 वर्ष तक रहता है. यह जल तत्त्व को नियंत्रित करता है. इसलिए बहुत सारे लोग इसको वरुण देव भी कहते हैं. अंक ज्योतिष में इसका अंक 7 है.नेप्च्यून 

वरुण हमारे आंतरिक मन, विचार, रचनात्मकता, अनुसंधान कार्य, वित्तीय बाजार, शेयर बाजार, विदेशों से जुड़े बिजनेस, पनडुब्बी, तेल और रासायनिक रिफाइनरी, एंटी बायोटीक दवा, नौसेना, कीटनाशक, समुद्री उत्पाद, खनिज की खान और कुछ हानिकारक प्रभाव वाले जहरीले रसायनों से संबंधित व्यापार का कारक है, जल स्रोत के पास जन्म या जल वाली जगह नदी,नाला, तालाब, झील वाली जगह पर सफल होते है सौंदर्य प्रेम भावना कला रस की अधिकता,  यह द्वादश भाव और राशि में अत्यंत बलवान होता है. 

यदि नेप्च्यून पाप ग्रह की पाप दृष्टि योग वाला हो तो व्यक्ति को किसी भी काम में हाथ डालने से उससे संताप व अपमान प्राप्त होता है।यह अन्धकार और अवसाद की ओर ले जाता है. यह कल्पना की और मानसिक समस्याएं भी देता है. यह नशे, सम्मोहन और रहस्य के अंधेरे में ले जाता है. यह विचित्र तरह का चरित्र दोष भी देता है.  यह नींद और आराम में समस्याएं भी पैदा करता है

दिमागी रूप से व्यस्त रहते हैंमीन जातकों में उच्च कोटि के भोग और ऐश्वर्य के जीवन जीने की प्रबल इच्छा रहती है. मीन लग्न वाला जातक बहुआयामी व्यक्तित्व का धनी होता है. मीन का जातक शारीरिक रूप से भले ही खाली हो, आराम कर रहा हो, लेकिन दिमागी रूप से बहुत व्यस्त रहता है. मीन लग्न वाला हमेशा दिमागी रूप से फुर्तीला होता है. इसलिए देखा गया है कि ऐसे जातकों का सामान्य ज्ञान बहुत अच्छा होता है. यह भौतिक सुखों की ओर अधिक प्रयासरत रहते हैं. इन्हें बहुत धन प्राप्त करने की इच्छा होती है. इस लग्न वाले को यदि अवसर मिल जाए तो यह हर हथकंडे से उसका लाभ उठाता है.

मित्र कभी धोखा नहीं देते यह बहुत कड़ी मेहनत नहीं कर पाते हैं, हां दिमागी रूप से चाहे जितनी मेहनत करवा लीजिए. साहस और भीरुता का मिश्रित व्यवहार परिलक्षित होता है. मीन वालों को मित्रों का सुख बहुत प्राप्त होता है, इन्हें मित्र कभी धोखा नहीं देते, भले ही यह मित्र को धोखा दे दें. मीन लग्न की स्त्री जातक बहुत गुणी और सुंदर होती हैं और इन्हें पुत्र-पौत्र का सुख प्राप्त होता है.

गुरु का सम्मान करना जरूरी मीन लग्न का स्वामी गुरु मूल त्रिकोण के पंचम भाव में जाकर उच्च का होता है. मीन लग्न के जातकों के लिए आत्मा और कर्म दोनों के स्वामी गुरु होते हैं. इसलिए मीन लग्न वालों को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि अनजाने में भी उनसे अपने शिक्षक का निरादर न हो जाए. मीन लग्न वालों को वृद्धों की सेवा करने की इच्छा हमेशा रखनी चाहिए. यह सब करने से मीन लग्न वाले को शांति और आत्मबल में वृद्धि होगी. मीन लग्न के  जातकों को कभी धन की ओर ज्यादा ध्यान देना नहीं चाहिए.

संगीत में रुचि रखते हैं और संगीत कला आदि के गायक वादक या परफ़ॉर्मर होते है मीन लग्न वालों के लिए शुक्र बहुत अच्छे फल नहीं देता है. अगर कुंडली में शुक्र अच्छा या उच्च का हो जाए तो ऐसा जातक शास्त्री संगीत में बहुत रुचि लेता है. इस लग्न वालों को आयु के साथ-साथ शक्कर की मात्रा घटाते चलना चाहिए क्योंकि इस लग्न वालों को मधुमेह रोग होने के आसार सर्वाधिक होते हैं. मीन लग्न वालों की कन्याएं बहुत सुशील और गुणवान होती हैं. मीन वाला जातक घर से निकलता है कहीं के लिए और पहुंच कहीं जाता है. यह अपनी दिशा बदलने मे तनिक भी देरी नहीं करता है. मीन जातकों के भाग्य का स्वामी मंगल होता है. इसलिए भाग्य और कोष में वृद्धि के लिए हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए. प्राय: देखा गया है मीन लग्न वाले व्यक्ति की सत्ता के विपक्षियों के साथ ज्यादा बनती है.

सरकार के आलोचक होते हैं
यह सरकार का आलोचक होता है. शनि इन लोगों के लिए आय और व्यय का स्वामी है. यदि कुंडली में शनि की स्थिति आय की ओर से अच्छी बने तो यह अधिक आय कराते हैं और यदि व्यय की ओर से स्थिति ज्यादा मजबूत बनती हैं तो यह खर्च के साथ-साथ दुर्घटनाएं भी कराती हैं. इसलिए मीन वालों को कुंडली दिखाकर ही नीलम रत्न धारण करना चाहिए अन्यथा नुकसान भी हो सकता है. इन लोगों के लिए कन्या, कर्क, वृश्चिक, धनु अच्छे मित्र होते हैं

मंगल ग्रह भी अपनी उपस्थिति एक लाभकारी ग्रह के रूप में करता है। मंगल कुंडली में दुसरे और नौवें घर का स्वामी होता है, और जातक के लिए योगकारक युति बनाता है । 

मीन लग्न राशि के जातक शर्मीले, संवेदनशील और दयालु होते हैं। आप सपने देखने वाले लगते हैं और आपमें आत्मविश्वास कम होता है। आप अपनी पसंद की चीजें करते हैं और शायद ही कभी आप दी गई सलाह पर ध्यान दें। आपके अंतर्ज्ञान काफी मजबूत हैं और आप गुप्त प्राणी हैं। मीन लग्न राशि के लोग भोले और अनुकूल होते हैं, और अक्सर कलात्मक प्रतिभाओं से नवाजे जाते हैं। लक्ष्य निर्धारित करते समय आप अक्सर अवास्तविक होते हैं, और निर्णय लेने में कौशल की कमी होती है। इस विशेषता को इस तथ्य से भी ट्रिगर किया जा सकता है कि आप इस प्रक्रिया में किसी को भी चोट पहुंचाना पसंद नहीं करते हैं। लेकिन, आपके पास लोगों के साथ संवाद करने का एक सुंदर तरीका है और समझाने के लिए अच्छा व्यवहार है।
मीन लग्न की जातिकायें (महिलाएं)
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(दि, दु, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
यदि किसी जातक के पास अपने जन्म की तारीख, वार, समय आदि का विवरण नहीं है। तो वह अपने नाम के प्रथम अक्षर अनुसार अपनी राशि व उसके फल का अनुशीलन कर सकता है।

मीनर्क्षे मीन लग्ने वा मीनदृक स्थूल नासिका।
धन-धर्म सुखैर्युक्ता: सुशीला च सुभर्त्रिता।।

मीन लग्न की जातिका तीखे नयन नक्श वाली, लघु और सुंदर नेत्र, मछलियों की तरह अत्यंत चंचला, धन-धान्य एवं सवारि आदि सुखों से युक्त, धर्मपरायणा, सुशील तथा पति संतति आदि सुखों से युक्त होती है।

ऐसी जातिका मध्यम कद, गोल चौड़ा चेहरा, सुंदर एवं संतुलित शरीर, मुलायम व नरम बाल, पुष्ट कंधे तथा आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी होती है। बाल्यकाल में दुर्बल किंतु आयु वृद्धि के साथ-साथ पुष्ट शरीर होगा, नेत्र कुछ उभरे हुए एवं चमकीले होते हैं। इस लग्न राशि का स्वामी गुरु होने से मीन लग्न राशि की लड़की अत्यंत बुद्धिमान, तीव्र स्मरण शक्ति, हंसमुख, भावुक व संवेदनशील, परिश्रमी, स्वाभिमानी, मिलनसार परंतु धार्मिक आस्था रखने वाली, सौम्य प्रकृति, दयालु एवं परोपकारी स्वभाव वाली, सेवा एवं आतिथ्य सत्कार करने में तत्पर होती है। द्विस्वभाव लग्न राशि होने से मीन जातिका शीघ्रता से अपने मन की बात प्रकट नहीं कर पाती कई बार दूसरों के लिए उसे समझना कठिन हो जाता है। कई बार महत्वपूर्ण निर्णय करने में भी गहन चिंतन एवं विचार करने के कारण अत्यंत विलंब भी हो जाता है। परंतु जब किसी विषय पर सोच विचार के बाद निर्णय ले लेती है तो उस पर पूरी तन्मयता से अडिग रहती है। जलीय तत्व राशि होने से जातिका हर प्रकार की परिस्थितियों में स्वयं को ढाल लेने में सक्षम होगी। सरलहृदया, सेवाभावी, अध्ययनशील, दूसरों के मनोभावों को समझने में कुशल, धैर्यवान एवं क्षमाशील स्वभाव की होती है। गुरु आकाशीय तत्व प्रधान होने से जातिका दूसरों के साथ सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करने वाली, गायन, संगीत, साहित्य, लेखन, पठन, योग, दर्शन, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों में विशेष रुचि रखने वाली, गुणवान, अपने गुणों द्वारा परिवार एवं समाज में सम्मान पाने वाली तथा अपनी प्रतिष्ठा के प्रति विशेष सावधान रहती है। परिस्थितियों एवं अवसर अनुसार आचरण करने में निपुण होती है। गुरु प्रधानता के कारण व्यवहार कुशल परंतु दूसरों पर अधिकार जताने की प्रवृत्ति होती है। साथ ही अपने मित्रों के प्रति उदार एवं भावनात्मक दृष्टिकोण रखती है। इनमें पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करने की अद्भुत विशेषता होती है।

शिक्षा👉 मीन जातिका की कुंडली में चंद्र, मंगल, गुरु, शुभस्थ हो तो जातिका व्यवसायिक विद्या जैसे कंप्यूटर, कॉमर्स, साहित्य, कानून, अकाउंट्स आदि क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त कर लेती है। वैसे भी मीन लग्न जातिका अध्ययनशील प्रकृति की होने के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल रहती है।

कैरियर एवं व्यवसाय👉 मीन लग्न की जातिका को स्वाध्याय एवं पठन-पाठन के कार्यों के अतिरिक्त गायन, अभिनय, संगीत, साज-सज्जा, फैशन, श्रृंगार, सौंदर्य आदि विषयों में भी विशेष रूचि रहती है। वह शिक्षण, अध्यापन, कॉमर्स, कंप्यूटर, कढ़ाई-बुनाई, पत्रकारिता, समाचार पठन, फैशन डिजाइनिंग, इंटीरियर डेकोरेशन, हस्त कला एवं शिल्पकारी, धर्म प्रचारक, लेखन, कला, चिकित्सा, वकालत आदि जहां बौद्धिक योग्यता की विशेष आवश्यकता हो ऐसे कार्यों में विशेष सफल होने की संभावनाएं होती हैं। अधिक जानकारी के लिये मीन लग्न के जातक संबंधित हमारी पिछली पोस्ट पढ़ सकते है।

स्वास्थ्य एवं रोग👉 यदि मीन लग्न की जातिका की कुंडली में गुरु, मंगल, चंद्र आदि ग्रह शुभ भावस्थ है तो जातिका का स्वास्थ्य लगभग अच्छा रहता है। तथा वह कम ही बीमार होती है। परंतु यदि कुंडली में गुरु, सूर्य, चंद्र, शनि, मंगल आदि ग्रह नीच आदि अशुभ अवस्था में हो तो जातिका को रक्त विकार, सिर पीड़ा, नेत्र, दांत, टांसिल, गले में दर्द या जोड़ों में दर्द, कफ विकार, खुजली,, एक्जिमा आदि चर्म रोग, हिस्टीरिया, कान के रोग का भय होता है। रोगों संबंधित अधिक जानकारी हेतु हमारी गत पोस्टों में लिखित पुरुष मीन जातक का भी अवलोकन कर सकते हैं।

प्रेम विवाह और वैवाहिक जीवन👉 प्रेम के संबंधों में मीन लग्न की जातिका अत्यंत भावुक और संवेदनशील होती है। बन-संवर कर रहना उसे अति प्रिय होता है। पुरुषों को अपनी और आकर्षित करने की इनमे में विशेष योग्यता होती है। करुणा एवं सहानुभूति की भावनाएं विशेष होती है। वह अपने मित्रों का दुख दर्द बांटने के लिए अपने निजी स्वार्थ को भी न्योछावर कर देती है। अपनी सहज मुस्कान एवं उन्मुक्त व्यवहार के कारण वह युवक युवतियों के लिए शीघ्र आकर्षण का केंद्र बन जाती है। द्विस्वभाव राशि होने के कारण वह अपने प्रेमी या जीवनसाथी के चयन में जल्दबाजी नहीं करती बल्कि विशेष सोच विचार के बाद ही भावनात्मक संबंध जोड़ती है। जब मीन जातिका किसी प्रेमी या साथी से संबंध जोड़ लेती है तब पूरी निष्ठा ईमानदारी एवं समर्पण की भावना से जोड़ती है। अत्यधिक भावुक होने के कारण कभी-कभी प्यार में धोखा भी खा सकती है।

 लग्नेश गुरु एवं सप्तमाधिपति बुध के कारण जीवन साथी के चुनाव में बाहरी व्यक्तित्व के साथ-साथ बौद्धिक एवं शैक्षणिक योग्यता को भी विशेष महत्व देती है। यदि जातिका की कुंडली में बुध, गुरु आदि ग्रहों की स्थिति अच्छी हो तथा भावी पति की जन्म कुंडली के साथ जातिका की कुंडली का परस्पर राशि, नक्षत्र एवं गुण मिलान भी ठीक प्रकार से किया गया हो तो जातक का वैवाहिक एवं दांपत्य जीवन मधुर एवं सुखमय रहता है। विवाह के बाद उसे मनचाहा पति, सुंदर आवास, वाहन एवं अन्य दांपत्य सुख प्राप्त होते हैं। 

अनुकूल राशि मैत्री👉 मीन लग्न राशि की कन्या को मेष, मिथुन, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, मकर लग्न राशि के जातकों के साथ विवाह या व्यापारिक संबंध स्थापित करने शुभ एवं लाभप्रद होते हैं। जबकि शेष अन्य लग्न राशि वालों के साथ संबंध साधारण या असामान्य रहते।

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मीन लग्न राशि वाले लोग औसत लंबे होते हैं और छोटा कद तो इनका होता ही है। आपकी आँखें अक्सर बड़ी, कोमल और स्वप्निल होती हैं। इस लग्न के लिए एक सामान्य शारीरिक लक्षण मछली की तरह उनकी त्वरित और सुंदर चाल है जो आपके लग्न राशि चिन्ह का प्रतिनिधित्व करता है। लवली मुस्कुराहट, आकर्षक तरीके और शांत भाव इस संकेत के लक्षण हैं।

मीन लग्न राशि के लोग समझौतावादी और स्वभाव से सरल होते हैं। आपको लोगों की भावनात्मक समर्थन की आवश्यकता है। भले ही आप सपने देखने वाले के रूप में आते हैं। लेकिन वास्विकता से भी आपका गहरा नता है। उम्र के साथ, आपका दिमाग मजबूत हो जाता है और आप बौद्धिक खोज की तरफ अधिक झुकाव रखते हैं।

प्रेम में मीन लग्न जातक बहुत रोमांटिक और निस्वार्थ हैं। आप बहुत भावुक हैं और आकस्मिक मामलों में विश्वास नहीं करते हैं। आप किसी भी साथी के लिए अनुकूल हैं जो आपको एक व्यक्ति के रूप में पूरा करता है। आप एक वफादार और व्यावहारिक साथी की इच्छा रखते हैं जो तार्किक और संगठित हो। इसके अलावा, एक मीन लग्न राशि के चिन्ह के रूप में, आप अक्सर उनके परी-कथा रोमांस में रहते हैं (भले ही वास्तविकता अलग हो) और अक्सर अपने साथी से जुड़े रहते हैं, जिससे आपको कुछ दर्दनाक अनुभवों और निराशाओं का सामना करना पड़ सकता है।

मीन लग्‍न में मन का स्‍वामी चंद्रमा पंचम भाव का स्‍वामी होकर माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.चंद्रमा इस लग्न के लिए एक शुभ ग्रह है, जो पुर्व पुण्य के  5 वें घर का स्वामी है और जातक को पिछले जन्मों में किए गए अच्छे कर्म  इस जन्म में देता है 

मीन पैर (अधिक प्रतीकात्मक तरीके से) पर शासन करता है। इसलिए, संभावित जोखिमों में पैर शामिल हैं। आप गठिया या संचार समस्याओं से पीड़ित हो सकते हैं। शीत और ब्रोंकाइटिस भी एक मीन लग्न की सामान्य शिकायतें हैं, क्योंकि आप उच्च और निम्न तापमान के प्रति संवेदनशील हैं। आपके पास आमतौर पर कमजोर स्वास्थ्य होता है। कुल मिलाकर आपको अपने सेहत के प्रति सजग रहना चाहिए।

सूर्य षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी , वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल द्वितीय और नवम भाव का स्‍वामी होता है द्वितीय भाव का अधिपति होने के कारण जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है जबकि नवमेश होने के कारण यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र ग्रह तीसरे और 8 वें घर  का स्वामी होता है, और जीवन में कुछ परीक्षा के पल ला सकता है। मीन लग्न ( Meen Lagna ) में शुक्र की स्थिति जातक के लिए नाजुक और प्रतिकूल स्थान के रूप में रोमांस और विवाह संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है।शुक्र तृतीय और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधि बनता है जबकि अष्टमेश होने के कारण यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध चतुर्थ भाव का स्‍वामी होकर जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.यदि कुंडली में बुध शुभ संयोगों में शामिल है, तो जातक के जीवन में चतुर्थांश के स्वामित्व का दोष प्रकट नहीं होगा। 

बृहस्‍पति दशम भाव का स्‍वामी होकर जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बॄहस्पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि एकादश और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. एकादश भाव का स्वामी होने के कारण यह जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है जबकि द्वादशेश होने के नाते यह निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण.इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु को मीन लग्न में सप्तमेश होने का दायित्व मिलता है जिसकी वजह से यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होत है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

कुंडली में नेपच्यून अशुभ हो तो जल की बर्बादी बिलकुल न करें. एक ओपल अवश्य धारण करें. नित्य प्रातः वरुण मन्त्र का जाप करें. मंत्र होगा  "ॐ वं वरुणाय नमः". जहां तक हो सके हल्के नीले रंग का प्रयोग करें

नदी/समुद्र के तटों को पसंद करने वाले, जल से लगाव रखने वाले, रिजर्व (संकुचित) रहने वाले, अशांत/बेचैन तबियत के (अस्थिर स्वभाव वाले), औसत कद-काठी के, फेयर डीलिंग करने वाले (न्यायपूर्ण/स्पष्ट व्यवहार वाले), महत्वाकांक्षी, धर्मभीरू, आस्तिक, उच्च कोटि के धार्मिक विद्वान तथा पुरानी परम्पराओ रूढ़िवाद और  इतिहास के शौकीन होते हैं किन्तु इनमें आत्मविश्वास का प्राय: अभाव रहता है।

मीन लग्न के जातक कभी-कभी औसत से कम कद वाले भी देखे गए हैं।
किन्तु कद कम हो या औसत इनकी शरीर रचना इस प्रकार की होती है कि शरीर का ऊपर का हिस्सा भारी व निचला हिस्सा कमजोर रहता है। ये तगड़े व मजबूत किस्म के भी हो सकते हैं और ढीले-ढाले मोटू किस्म के भी हो सकते हैं परन्तु जैसाकि बताया-मछली की पूंछ की भांति इनके शरीर का निचला हिस्सा ऊपर के हिस्से की अपेक्षा कमजोर नजर आता है। इनके नेत्र गोल हो सकते हैं। प्राय: बड़े,गोलाईयुक्त तथा बाहर को उभरे हुए होते हैं। ये स्थिर विचारों के नहीं होते, परिवर्तनशील स्वभाव के होते हैं। ये नम्र स्वभाव के, ईमानदार व दयालु होते हैं
और प्रायः डरपोक किस्म के होते हैं। इनकी चमड़ी चमकदार स्वस्थ और सुनहरी सुन्दर और सफ़िट साफ़ ललाई लिए आकर्षक गोरी और भूरी सुनहरी आंखे  होती है हाथ पांव छोटे छोटे नाज़ुक और कलाकारी से भरे 
प्रतिशोधात्मक भावना मीन लग्न के जातकों में न के बराबर होती है। गुरु
लग्नेश होने से ये लोग क्षमाशील व सज्जन, धर्मात्मा होते हैं। शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान तथा कला में इनकी रुचि होती है। लग्न पर शुभ प्रभाव हो तो ये उच्च कोटि के दरवेज़ सन्त दार्शनिक अथवा दार्शनिक भी हो सकते हैं। क्योंकि तब अध्यात्म में इनकी रुचि तथा
क्षमता और भी गहन हो जाती है। लग्न पर अशुभ प्रभाव हो तो तपेदिक, श्वास व
पैरों की तकलीफ, गुदा व गुप्तांग के रोग इन्हें सम्भावित रहते हैं। वैसे मीन लग्न
वालों को यकृत, पोलिया, नितम्बों आदि से सम्बन्धित रोग एवं मेदवृद्धि की पूर्ण
सम्भावना होती ही है। कन्या, कर्क व वृश्चिक लग्न के जातकों से इनकी मित्रता
शुभ फलदायी होती है। ये लोग सिनेमा, टी.वी., अभिनय, संगीत, वादक, निर्देशक डॉक्टरी, आयात-निर्यात, समुद्र/जल सम्बन्धी कार्यों (तरल पदार्थों का विक्रय, बन्दरगाह/जल सेना आदि) में विशेष सफल होते हैं। मीन लग्न में गुरु यदि लग्न में ही हो तो जातक अति विद्वान, प्रतापी, प्रसिद्ध तथा ब्राह्मणत्व के गुणों से सम्पन्न होता है। चतुर्थ भाव में गुरु हो तो माता का धन, वाहन का सुख तथा भूमि में गड़े धन का लाभ दिलाता है। पांचवें घर में विद्या लाभ कराता है, पुत्र भी विद्वान होते हैं किन्तु अल्प होते हैं। आठवें घर में गुरु हो तो तीर्थ स्थान या धर्म सम्बन्धी कार्य में जातक की मृत्यु होती है । ग्यारहवें घर का गुरु धन, विद्या और यश तीनों में वृद्धि करता है। बारहवें घर में गुरु हो तो जातक दानपुण्य करने वाला तथा धर्म सम्बन्धी कार्यों में धन का अधिक व्यय करने वाला होता है। यदि सातवें घर में गुरु हो तो ऐसे जातक की पत्नी भी बहुत विदूषी अथवा साध्वी(नियम/संयम तथा पूजा/उपवास आदि के साथ रहने वाली) होती है।
मीन लग्न के जातक पात्र/सुपात्र का ध्यान रखे बिना भी उपकार/दान/आर्थिक
सहायता करते हुए देखे जाते हैं। वे बहुत अधिक संवदेनशील होते हैं। मीन लग्न
के जातक कल्पनाशील होते हैं। प्राय: ये यथार्थ से दूर आदर्शवादिता में जीते हैं
और दिमाग की बजाय दिल से फैसले करते हैं। किन्तु अपना भ्रम टूटने, स्वप्न
बिखरने या मानसिक चोट पहुंचने के सदमे से बहुत अधिक दुखी होते हैं । कष्ट को सहने का माद्दा इनमें कम ही रहता है। बहुत से मीन लग्न के जातक इस प्रकार की स्थितियों में नशे का सहारा लेते हुए भी देखे जा सकते हैं। मीन लग्न के जातकऔरों को धोखा नहीं देते। इनमें अध्यात्म में प्रगति करने की सम्भावना अति तीव्र होती है। संतोषी प्रवृत्ति के होते हैं तो भी इनका वैवाहिक जीवन सुखपूर्ण नहीं होता। मेरे अपने अनुभव के अनुसार मीन लग्न के जातकों को कन्याएं अधिक पैदा होती हैं। ये लोग अपने मित्र, सम्बन्धी/प्रिय रिश्तेदारों की आवश्यकता से अधिक प्रशंसा करके उन्हें महिमामंडित करने की प्रवृत्ति वाले होते हैं। दुनिया को भले ही ये धोखा न देते हों, किन्तु स्वयं को धोखे में जरूर रखते हैं। क्योंकि वास्तविकता से नजर चुराकर कल्पना में ही रहना पसंद करते हैं। प्राय: ये दृढ़ इरादों वाले भी नहीं होते। लेकिन विपन्नता की स्थिति में घबराते भी नहीं। इनकी प्रबल आस्था इनको ऐसे अवसरों पर बल प्रदान करती है। जो जातक स्वयं को भाग्य के भरोसे छोड़ देते हैं वे अक्सर सफल होते देखे गए हैं। जबकि किसी कारण से महत्त्वाकांक्षी या लालची होकर जो प्रयास करने वाले जातक (मीन लग्न के) मैंने देखे हैं वो असफल होते देखे हैं। मीन लग्न के जातकों की सहनशीलता विशेष होती है। मैंने कभी किसी मीन लग्न के जातक को झुंझलाते हुए नहीं देखा है। जमीन-जायदाद के मामले मीन लग्न के जातकों के लिए दिकतें पैदा करने वाले ही होते हैं। या तो वे इन कार्यों में सफल नहीं होते। या ऐसे परिणाम निकलते हैं जिससे उन्हें यह सोचना पड़ता है कि यह काम न करते तो ही अच्छा होता।
विशेष (रोग)-मीन लग्न हो, अटमस्थ शनि निर्बल चंद्र के साथ हो तो जातक की अकाल मृत्यु होती है या प्रेत बाधा की पीड़ा झेलनी पड़ती है (अकेला
चन्द्र भी अष्टमस्थ हो तो जातक बाल्यावस्था में तो रुग्ण रहता ही है)। स्वयं को अकेला श्रेष्ट और ईमानदार और दूसरो की गलतिया और बुराई भी करते है जो इनके लिए हानिकारक  होती है मेहनती चतुर और विषय विशेषज्ञ, किन्तु छुपे हुवे  ईर्ष्यालु प्रतिस्पर्धात्मक होते है, अपने वर्चस्व और वजूद को उत्कृस्ट मानकर जीते है और हमेशा सुझाव देने और समझाने समीक्षा और एक्सपर्ट कमेंट देते है 

मीन लग्न हो, गुरु व लग्न दोनों पापग्रहों के बीच हों, सूर्य निर्बल हो और सातवें भाव में भी पापग्रह हो तो जातक आत्महत्या के लिए विवश हो जाता है। मीन लग्न हो, दूसरे, ग्यारहवें या बारहवें भाव में शनि, गुरु, राहू व मंगल
की युति हो जाए तो जातक के जीवन में आजीवन कोई न कोई रोग लगा रहता है।
मीन लग्न, सातवें घर में चन्द्र, मंगल तथा राहू की युति हो तथा शुभ ग्रहों की वहां दृष्टि म हो तो जातक एक वर्ष में मृत्यु को प्राप्त होता है या मृत्युतुल्य कष्ट भोगता है। (ऐसी स्थिति में जातक को अनिष्ट निवारक सिद्ध यंत्र से लाभ होता है।)
- मीन लग्न हो, शनि सप्तमस्थ, गुरु, शुक्र व राहू बारहवें घर में हों
तथा कुण्डली में कोई शुभ योग न हो तो भी जातक की एक वर्ष की आयु में मृत्यु
होती है।
- मीन लग्न हो, क्षीण चन्द्र लग्नस्थ हो तथा पापदृष्ट हो तो भी जातक रुग्ण
रहता है। मीन लग्न में यदि दुःस्थानों में बुध, गुरु, शुक्र की युति एकसाथ हो तो
जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना के कारण होती है।
मीन लग्न हो, षष्ठेश (सूर्य) लग्नस्थ तथा पापदृष्ट हो तो नेत्रों से जलस्राव
के कारण जातक अंधा हो सकता है (दूसरा तथा बारहवां घर भी विचारें)।
मीन लग्न हो, वृश्चिक का सूर्य दो पापग्रहों के बीच हो तो तीव्र हार्ट
अटैक। अथवा चौथा राहू, अन्य पापग्रहों से दृष्ट तथा गुरु निर्बल हो तो भी हार्ट
अटैक होता है। अथवा चौथे में पापग्रह तथा चतुर्थेश (बुध) पापग्रहों के बीच हो
तो हृदय रोग अथवा चतुर्थेश बुध कर्क राशि में निर्बल/अस्त या अष्टमस्थ हो तो भी जातक को हृदय रोग होता है।

मीन लग्न की जातिकायें (महिलाएं)
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(दि, दु, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
यदि किसी जातक के पास अपने जन्म की तारीख, वार, समय आदि का विवरण नहीं है। तो वह अपने नाम के प्रथम अक्षर अनुसार अपनी राशि व उसके फल का अनुशीलन कर सकता है।

मीनर्क्षे मीन लग्ने वा मीनदृक स्थूल नासिका।
धन-धर्म सुखैर्युक्ता: सुशीला च सुभर्त्रिता।।

मीन लग्न की जातिका तीखे नयन नक्श वाली, लघु और सुंदर नेत्र, मछलियों की तरह अत्यंत चंचला, धन-धान्य एवं सवारि आदि सुखों से युक्त, धर्मपरायणा, सुशील तथा पति संतति आदि सुखों से युक्त होती है।

ऐसी जातिका मध्यम कद, गोल चौड़ा चेहरा, सुंदर एवं संतुलित शरीर, मुलायम व नरम बाल, पुष्ट कंधे तथा आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी होती है। बाल्यकाल में दुर्बल किंतु आयु वृद्धि के साथ-साथ पुष्ट शरीर होगा, नेत्र कुछ उभरे हुए एवं चमकीले होते हैं। इस लग्न राशि का स्वामी गुरु होने से मीन लग्न राशि की लड़की अत्यंत बुद्धिमान, तीव्र स्मरण शक्ति, हंसमुख, भावुक व संवेदनशील, परिश्रमी, स्वाभिमानी, मिलनसार परंतु धार्मिक आस्था रखने वाली, सौम्य प्रकृति, दयालु एवं परोपकारी स्वभाव वाली, सेवा एवं आतिथ्य सत्कार करने में तत्पर होती है। द्विस्वभाव लग्न राशि होने से मीन जातिका शीघ्रता से अपने मन की बात प्रकट नहीं कर पाती कई बार दूसरों के लिए उसे समझना कठिन हो जाता है। कई बार महत्वपूर्ण निर्णय करने में भी गहन चिंतन एवं विचार करने के कारण अत्यंत विलंब भी हो जाता है। परंतु जब किसी विषय पर सोच विचार के बाद निर्णय ले लेती है तो उस पर पूरी तन्मयता से अडिग रहती है। जलीय तत्व राशि होने से जातिका हर प्रकार की परिस्थितियों में स्वयं को ढाल लेने में सक्षम होगी। सरलहृदया, सेवाभावी, अध्ययनशील, दूसरों के मनोभावों को समझने में कुशल, धैर्यवान एवं क्षमाशील स्वभाव की होती है। गुरु आकाशीय तत्व प्रधान होने से जातिका दूसरों के साथ सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करने वाली, गायन, संगीत, साहित्य, लेखन, पठन, योग, दर्शन, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों में विशेष रुचि रखने वाली, गुणवान, अपने गुणों द्वारा परिवार एवं समाज में सम्मान पाने वाली तथा अपनी प्रतिष्ठा के प्रति विशेष सावधान रहती है। परिस्थितियों एवं अवसर अनुसार आचरण करने में निपुण होती है। गुरु प्रधानता के कारण व्यवहार कुशल परंतु दूसरों पर अधिकार जताने की प्रवृत्ति होती है। साथ ही अपने मित्रों के प्रति उदार एवं भावनात्मक दृष्टिकोण रखती है। इनमें पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करने की अद्भुत विशेषता होती है।

शिक्षा👉 मीन जातिका की कुंडली में चंद्र, मंगल, गुरु, शुभस्थ हो तो जातिका व्यवसायिक विद्या जैसे कंप्यूटर, कॉमर्स, साहित्य, कानून, अकाउंट्स आदि क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त कर लेती है। वैसे भी मीन लग्न जातिका अध्ययनशील प्रकृति की होने के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल रहती है।

कैरियर एवं व्यवसाय👉 मीन लग्न की जातिका को स्वाध्याय एवं पठन-पाठन के कार्यों के अतिरिक्त गायन, अभिनय, संगीत, साज-सज्जा, फैशन, श्रृंगार, सौंदर्य आदि विषयों में भी विशेष रूचि रहती है। वह शिक्षण, अध्यापन, कॉमर्स, कंप्यूटर, कढ़ाई-बुनाई, पत्रकारिता, समाचार पठन, फैशन डिजाइनिंग, इंटीरियर डेकोरेशन, हस्त कला एवं शिल्पकारी, धर्म प्रचारक, लेखन, कला, चिकित्सा, वकालत आदि जहां बौद्धिक योग्यता की विशेष आवश्यकता हो ऐसे कार्यों में विशेष सफल होने की संभावनाएं होती हैं। अधिक जानकारी के लिये मीन लग्न के जातक संबंधित हमारी पिछली पोस्ट पढ़ सकते है।

स्वास्थ्य एवं रोग👉 यदि मीन लग्न की जातिका की कुंडली में गुरु, मंगल, चंद्र आदि ग्रह शुभ भावस्थ है तो जातिका का स्वास्थ्य लगभग अच्छा रहता है। तथा वह कम ही बीमार होती है। परंतु यदि कुंडली में गुरु, सूर्य, चंद्र, शनि, मंगल आदि ग्रह नीच आदि अशुभ अवस्था में हो तो जातिका को रक्त विकार, सिर पीड़ा, नेत्र, दांत, टांसिल, गले में दर्द या जोड़ों में दर्द, कफ विकार, खुजली,, एक्जिमा आदि चर्म रोग, हिस्टीरिया, कान के रोग का भय होता है। रोगों संबंधित अधिक जानकारी हेतु हमारी गत पोस्टों में लिखित पुरुष मीन जातक का भी अवलोकन कर सकते हैं।

प्रेम विवाह और वैवाहिक जीवन👉 प्रेम के संबंधों में मीन लग्न की जातिका अत्यंत भावुक और संवेदनशील होती है। बन-संवर कर रहना उसे अति प्रिय होता है। पुरुषों को अपनी और आकर्षित करने की इनमे में विशेष योग्यता होती है। करुणा एवं सहानुभूति की भावनाएं विशेष होती है। वह अपने मित्रों का दुख दर्द बांटने के लिए अपने निजी स्वार्थ को भी न्योछावर कर देती है। अपनी सहज मुस्कान एवं उन्मुक्त व्यवहार के कारण वह युवक युवतियों के लिए शीघ्र आकर्षण का केंद्र बन जाती है। द्विस्वभाव राशि होने के कारण वह अपने प्रेमी या जीवनसाथी के चयन में जल्दबाजी नहीं करती बल्कि विशेष सोच विचार के बाद ही भावनात्मक संबंध जोड़ती है। जब मीन जातिका किसी प्रेमी या साथी से संबंध जोड़ लेती है तब पूरी निष्ठा ईमानदारी एवं समर्पण की भावना से जोड़ती है। अत्यधिक भावुक होने के कारण कभी-कभी प्यार में धोखा भी खा सकती है।

 लग्नेश गुरु एवं सप्तमाधिपति बुध के कारण जीवन साथी के चुनाव में बाहरी व्यक्तित्व के साथ-साथ बौद्धिक एवं शैक्षणिक योग्यता को भी विशेष महत्व देती है। यदि जातिका की कुंडली में बुध, गुरु आदि ग्रहों की स्थिति अच्छी हो तथा भावी पति की जन्म कुंडली के साथ जातिका की कुंडली का परस्पर राशि, नक्षत्र एवं गुण मिलान भी ठीक प्रकार से किया गया हो तो जातक का वैवाहिक एवं दांपत्य जीवन मधुर एवं सुखमय रहता है। विवाह के बाद उसे मनचाहा पति, सुंदर आवास, वाहन एवं अन्य दांपत्य सुख प्राप्त होते हैं। 

अनुकूल राशि मैत्री👉 मीन लग्न राशि की कन्या को मेष, मिथुन, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, मकर लग्न राशि के जातकों के साथ विवाह या व्यापारिक संबंध स्थापित करने शुभ एवं लाभप्रद होते हैं। जबकि शेष अन्य लग्न राशि वालों के साथ संबंध साधारण या असामान्य रहते।

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मीन राशि एवं लग्न सम्पूर्ण परिचय
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(दि, दु, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
यदि किसी जातक के पास अपने जन्म की तारीख, वार, समय आदि का विवरण नहीं है। तो वह अपने नाम के प्रथम अक्षर अनुसार अपनी राशि व उसके फल का अनुशीलन कर सकता है।

मीन लग्ने धनी मानी विनितश्च भोगी बहुगुण: कुशलो सहृष्टमानस:।
पितृ मातृ सुराचार्य गुरु भक्ति युतो उदार शास्त्र कलादरत्वो नरः।।
अत्यम्बुपान: समचारुदेह: स्वदारगस्तयो वित्तभोक्ता।
विद्वानकृतज्ञो भिभवत्यमित्रान शुभेक्षणो भाग्य यूतोन्त्यराशौ।।

अर्थात मीन राशि या मीन लग्न में उत्पन्न जातक/जातिका मान, प्रतिष्ठा एवं धन संपदा आदि सुखों युक्त, विनम्र स्वभाव, विलासी प्रकृति, किंतु हंसमुख, गुणवान, धर्मशास्त्र एवं संगीत, कला, अभिनय आदि में कुशल। माता-पिता, देवताओं एवं गुरुओं के प्रति श्रद्धा भाव रखने वाले। सुंदर एवं संतुलित शरीर, आकर्षक नेत्र, विद्वान, कृतज्ञ, अपनी स्त्री एवं परिवार में संतुष्ट भाग्यशाली होते हैं। जलीय वस्तुओं के शौकीन तथा जल में उत्पन्न वस्तुओं से विशेष लाभ पाने वाले होते हैं।

मीन राशि राशि चक्र की बारहवीं और अंतिम राशि है। इसका विस्तार क्षेत्र मेष संपात बिंदु से 330 अंश से 360 अंश तक माना जाता है। इस राशि का स्वामी ग्रह गुरु है। मीन राशि का प्रतीकात्मक चिन्ह जल में संचरणशील दो मछलियां हैं। जिनके मुख एक दूसरे की विपरीत दिशा में पूछ के पास लगे गोल आकृति दिखाए गए हैं। इस राशि के अंतर्गत पूर्वाभाद्रपद का अंतिम चतुर्थ चरण, उत्तराभाद्रपद के चारों चरण तथा रेवती नक्षत्र के चारों चरण होते हैं। पूर्वाभाद्रपद का स्वामी गुरु, उत्तराभाद्रपद का शनि तथा रेवती का स्वामी बुध ग्रह को माना गया है। इस राशि के प्रारंभ में लिखे नक्षत्र अक्षरों एवं नक्षत्र चरण के अनुसार ही जन्म समय अनुसार बच्चे का नाम रखने की भारतीय परंपरा रही है। काल पुरुष में मीन राशि का संबंध जातक के दोनों पांव तलवे एवं पैरों की उंगलियों से है। किसी जातक के जन्म समय में जो राशि शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होगी जातक का वह अंग पुष्ट होगा तथा जो राशि पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट होगी उसमें पीड़ा या कष्ट जाने।

मीन राशि के अन्य पर्यायवाची नाम👉 अन्त्य, मत्स्य, तीमि, अंडज, पृथुरोम, अंतिम, अत्भय, मीनाली, सफरी, अवसान, जलचर, पुष्करागार, तिमिध्वय इत्यादि। अंग्रेजी में पाइसिस (pisces) तथा उर्दू फारसी में इसे हूत कहते हैं।

मीन राशि करुणा, संवेदनशीलता एवं आध्यात्मिकता की राशि है। मीन राशि में प्रजनन शक्ति प्रबल होती है। यह द्विस्वभाव, जल तत्व, स्त्रीलिंग एवं सम राशि, मध्यम शरीर, सौम्यप्रकृति, पिंगल वर्ण, ब्राह्मण जाति, दिवा बली, सत्व गुणी, सम संज्ञक, बहु प्रसवा, स्निग्ध शरीर, उभ्योदयी, उत्तर दिशा की स्वामिनी, कफ़ एवं शीत प्रकृति होती है। इस राशि का प्रिय वार गुरुवार तथा प्रिय रत्न पुखराज है। शुक्र मीन राशि के 27 अंश पर उच्च स्थिति में होता है। जबकि बुध राशि के 15 अंश पर नीच स्थिति में होता है। बुध के लिए यह अस्त राशि भी है। ग्रह मैत्री चक्र अनुसार मीन राशि सूर्य व मंगल के लिए मित्र राशि, शनि के लिए सम तथा बुध व शुक्र के लिए शत्रु राशि होती है। मीन राशि का प्रथम नवांश कर्क से आरंभ होता है। जबकि प्रथम द्रेष्काण मीन का ही होता है।

निरयण सूर्य इस राशि पर लगभग 14 मार्च से 12 अप्रैल तक संचारित है। जबकि सायन सूर्य लगभग 19 फरवरी से 19 मार्च के मध्य मीन राशि पर रहता है। वर्तमान काल में बसंत ऋतु का प्रारंभ भी सायन मीन के सूर्य से ही माना जाता है।

शनि इस राशि में जातक का सुधार करता है। मंगल क्षणिक उत्तेजना, संघर्ष, चोट व दुर्घटना आदि का भय, सूर्य क्रोध, तेजी, ज्वर, आंत में सूजन, पैरों में पसीना, शनि राहु आदि वात रोग तथा गुरु पेट संबंधी रोग व पैरों में सूजन, चंद्र व शुक्र इस राशि में सिनेमा, संगीत, आमोद, प्रमोद कविता आदि का शौक तथा मदिरा आदि पेय वस्तुओं के सेवन की प्रवृत्ति देता है।

में राशि से संबंधित वस्तुए👉 मठाधीश, शिक्षा संस्थान, न्यायालय, प्राध्यापक, वैद्य, डॉक्टर, बैंकिंग, वस्त्र (विशेषकर ऊनी), उच्च पदाधिकारी, धर्म एवं दर्शन शास्त्र, लेखन आदि साहित्य, क्रीडा क्षेत्र, लकड़ी, सोना, पीतल, तांबा आदि धातुएं केले, पपीता, चने, हल्दी, बेसन आदि पीले वर्ण की वस्तुएं। मोम, गाय, घोड़ा, पुखराज, विदेश गमन, समुद्री यात्राएं, मदिरा, मछली आती जल से उत्पन्न वस्तुएं।

मीन लग्न गुण स्वभाव-विशेषताएं एवं विवाह सुख
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शारीरिक गठन एवं व्यक्तित्व
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मीन लग्न के जातक का सुंदर भरा हुआ संतुलित शरीर रचना, मध्यम या ऊंचा कद, बड़ा मस्तिष्क एवं चौड़ा गोल चेहरा, श्वेत पीत वर्ण एवं सुगठित कंधे, आकर्षक चमकीली व कुछ बड़ी बड़ी आंखें, नेत्र कुछ उभरे से दिखाई दे, नरम मुलायम बाल, तीखे नयन नक्श, चुंबकीय एवं आकर्षक तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होता है।

चारित्रिक विशेषतायें
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राशि स्वामी गुरु शुभ हो तो मीन जातक तीव्र बुद्धिमान, ईमानदार, मानवीय गुणों से युक्त, परिश्रमी, सौम्य एवं विनम्र मधुर स्वभाव, महत्वकांक्षी, संवेदनशील, भावुक, सहृदय, संगीत, साहित्य एवं सौंदर्य के प्रति स्वाभाविक रूचि हो। तथा मीन राशि होने से जातक जल की तरह प्रत्येक प्रकार की परिस्थितियों में स्वयं को ढाल लेने की क्षमता रखता है। स्मरण शक्ति तीव्र होती है। जातक विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं को विचलित नहीं होने देता, उच्च कल्पनाशील होने पर भी जातक की प्रबंधन शक्ति अच्छी होती है। वह अपने कार्य क्षेत्र में सक्रिय एवं विकासशील बना रहता है। राशिपति गुरु के कारण जातक हंसमुख, मिलनसार, परोपकारी, सरल एवं दयालु स्वभाव, धर्म परायण, सत्य निष्ठ, सेवाभावी, प्रेरणादायक, साधारण लोगों की भलाई एवं सहायता करने में उत्सुक, हस्तशिल्प, साहित्य, लेखन, गायन ,धार्मिक, ज्योतिष एवं योग दर्शन आदि गूढ़ विषयों में विशेष रुचि रखने वाला। धैर्यवान, क्षमाशील, स्वाभिमानी, कई बार गंभीर रहस्यमई एवं गोपनीय आचरण करने वाला होता है।

मीन द्वि-स्वभाव राशि होने से जातक शीघ्रता से अपने मन की बात प्रकट नहीं कर पाता। कई बार दूसरों के लिए उन्हें समझना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में जातक निष्कपट एवं सरल हृदय होते हुए भी संदेह के दायरे में आ जाते हैं। यदि जन्म कुंडली में चंद्र, गुरु शुभ भावों में स्थित हो अथवा उन दोनों का योग अथवा संबंध हो तो जातक महत्वकांक्षी, धार्मिक एवं पौराणिक आस्थाओं से युक्त दूसरों पर अधिकार जताने की प्रवृत्ति। तर्क-वितर्क करने में कुशल, व्यवहार कुशल होते हैं। अधिकांशतः मिलनसार प्रकृति के होते हैं। जातक नए-नए सृजनात्मक एवं मौलिक विचार सोचते रहते हैं। मीन जातक अपने परिवार एवं मित्रों के साथ विशेष प्यार और आसक्ति रखते हैं। अपने मित्रों का चुनाव भी बहुत ध्यान पूर्वक करते हैं। उनके मैत्री संबंध सामान्य जन से लेकर कुछ प्रतिष्ठित लोगों तक होते हैं।

द्वि-स्वभाव राशि होने से मीन जातक किसी कार्य विशेष में जल्दी से कोई निर्णय नहीं लेते परंतु जब गंभीर सोच विचार के बाद कोई फैसला करते हैं तो उस कार्य को पूरे उत्साह एवं तन्मयता से अंजाम देते हैं। यदि कुंडली में मंगल शुक्र का योग किसी अशुभ भाव में हो तो जातक विषय आसक्त, कामुक, मदिरा आदि मादक वस्तुओं का सेवन करने वाला, व्यंग पूर्ण एवं कठोर वाणी का प्रयोग करने वाला एवं अशांत चित्त वाला होता है।

शिक्षा एवं कैरियर
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मीन जातक गुरु एवं चंद्र के प्रभाव के कारण प्रायः अध्ययनशील प्रकृति के होते हैं। शिक्षा चाहे साधारण ही हो अथवा किसी भी व्यवसाय से संबंधित हो उन्हें धर्म, योग, ज्योतिष आदि विषयों में अवश्य रुचि रहती है। मीन जातक की कुंडली में यदि चंद्र, गुरु, शुक्र आदि ग्रह स्वोच्च अथवा स्वक्षेत्री स्थिति में हो तो जातक उच्च शिक्षित एवं उच्च प्रतिष्ठित होता है। मीन लग्न के जातक प्रायः अपनी बौद्धिक योग्यता, प्रभावशाली आकर्षक व्यक्तित्व, एवं परिश्रम व पराक्रम द्वारा समुचित धन लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेते हैं। प्रारंभिक जीवन में संघर्ष अधिक होगा परंतु 35 वर्ष की आयु के बाद जातक भूमि, मकान, वाहन, स्त्री व संतान आदि के विशेष सुख प्राप्त करने में सफल होता है। मीन जातक प्रत्येक विषय को गहराई से जानने की जिज्ञासा रखते हैं और इसी प्रयास में वह कुछ नया पा लेते हैं।

प्रेम और वैवाहिक जीवन 
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प्रेम और सौंदर्य के संबंध में मीन जातक विपरीत योनि के प्रति अत्यंत मैत्रीपूर्ण, उदार एवं संवेदनशील होते हैं। भावनात्मक दृष्टिकोण होता है। करुणावश वह अपने मित्रों का दुख दर्द बांटने के लिए तथा उन्हें लाभ पहुंचाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। अपनी सहज मुस्कान एवं उन्मुक्त व्यवहार के कारण वह युवक युवतियों के लिए शीघ्र ही आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। द्वि स्वभाव राशि होने के कारण मीन जातक प्रेम पात्र या प्रेमिका के चयन के संबंध में जल्दबाजी नहीं करते अपितु विशेष सोच विचार के बाद ही भावनात्मक संबंध स्थापित करते हैं। जब संबंध स्थापित हो जाता है तो वह अपने प्रेम पात्र या प्रेमिका के प्रति पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा से व्यवहार करते हैं। सप्तमेश बुध के कारण मीन जातक जीवन साथी के चुनाव में बाहरी सौंदर्य के साथ साथ शैक्षणिक एवं बौद्धिक योग्यता को भी अधिमान देते हैं। यदि कुंडली में बुध, शुक्र ग्रहों की स्थिति अच्छी हो तथा दोनों की जन्मपत्री में पारस्परिक राशि नक्षत्र एवं गुण मिलान भी भली-भांति ठीक प्रकार से किया गया हो तो जातक का वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है। विवाह के बाद उन्हें भूमि, मकान, वाहन, सुंदर पत्नी, संतान आदि के सुख मिलते हैं।

अनुकूल राशि मैत्री
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मीन लग्न राशि वाले जातकों को मेष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, मकर लग्न व राशि वाली जातिकाओ के साथ विवाह या व्यवहारिक संबंध शुभ एवं लाभप्रद होते हैं। जबकि अन्य लग्न राशि वालों के साथ मधुर संबंध नहीं रह पाते।

स्वास्थ्य और रोग
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यदि कुंडली में गुरु, मंगल, सूर्य आदि ग्रह शुभ हो तो मीन जातक का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। परंतु यदि कुंडली में गुरु, सूर्य, शुक्र, भौम आदि ग्रह नीच या अशुभ हो अथवा शनि, सूर्य आदि क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक मदिरा, तंबाकू आदि नशो का शिकार हो जाता है। उसे पेट के विकार, पेट गैस, हाथ-पावों में पसीना, रक्त विकार, सिर पीड़ा, अल्सर, खुजली आदि चर्म रोग, का शिकार, हिस्टीरिया, जोड़ों में दर्द, कान आदि में रोग होने का भय रहता है। यदि सूर्य अशुभ हो तो शरीर में गर्मी, ज्वर एवं पांव में सूजन हो, चंद्र अशुभ हो तो मानसिक विकार, माता को कष्ट अथवा सुख में कमी रहती है। मंगल या केतु अशुभ हो तो रक्त विकार, फोड़े फुंसी, दुर्घटना आदि से चोट का भय या रक्त विकार। बुध अशुभ हो तो आंतों की कमजोरी, चर्मरोग, कान के विकार, फोड़े फुंसी, दुर्घटना आदि से चोट भय या रक्त विकार। बुध अशुभ हो तो आंतों की कमजोरी, चर्मरोग, कर्णशूल, टीबी, श्वास आदि रोग। अशुभ गुरु के कारण सोजस, पांव में सूजन, लीवर में दोष, आँतड़ियों में दोष, शुक्र के कारण, शक्कर रोग (शुगर)। राहु, शनि के दोष के कारण हिस्टीरिया, जोड़ों के दर्द, पथरी और शीत रोग होने का भय रहता है।

सावधानी👉 मीन जातकों को अधिक तामसी एवं गरिष्ठ भोजन से बचना चाहिए, भोजन में अनियमितता और अधिक मानसिक श्रम से बचें। उत्साह शीलता, उतावलापन, क्रोध की अधिकता एवं निराशा की भावना से भी बचना चाहिए। तथा ईश्वर भक्ति, प्रार्थना एवं ध्यान की प्रक्रिया भी नियमित रूप से करनी चाहिए।

मीन लग्न की जातिकायें (महिलाएं)
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(दि, दु, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
यदि किसी जातक के पास अपने जन्म की तारीख, वार, समय आदि का विवरण नहीं है। तो वह अपने नाम के प्रथम अक्षर अनुसार अपनी राशि व उसके फल का अनुशीलन कर सकता है।

मीनर्क्षे मीन लग्ने वा मीनदृक स्थूल नासिका।
धन-धर्म सुखैर्युक्ता: सुशीला च सुभर्त्रिता।।

मीन लग्न की जातिका तीखे नयन नक्श वाली, लघु और सुंदर नेत्र, मछलियों की तरह अत्यंत चंचला, धन-धान्य एवं सवारि आदि सुखों से युक्त, धर्मपरायणा, सुशील तथा पति संतति आदि सुखों से युक्त होती है।

ऐसी जातिका मध्यम कद, गोल चौड़ा चेहरा, सुंदर एवं संतुलित शरीर, मुलायम व नरम बाल, पुष्ट कंधे तथा आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी होती है। बाल्यकाल में दुर्बल किंतु आयु वृद्धि के साथ-साथ पुष्ट शरीर होगा, नेत्र कुछ उभरे हुए एवं चमकीले होते हैं। इस लग्न राशि का स्वामी गुरु होने से मीन लग्न राशि की लड़की अत्यंत बुद्धिमान, तीव्र स्मरण शक्ति, हंसमुख, भावुक व संवेदनशील, परिश्रमी, स्वाभिमानी, मिलनसार परंतु धार्मिक आस्था रखने वाली, सौम्य प्रकृति, दयालु एवं परोपकारी स्वभाव वाली, सेवा एवं आतिथ्य सत्कार करने में तत्पर होती है। द्विस्वभाव लग्न राशि होने से मीन जातिका शीघ्रता से अपने मन की बात प्रकट नहीं कर पाती कई बार दूसरों के लिए उसे समझना कठिन हो जाता है। कई बार महत्वपूर्ण निर्णय करने में भी गहन चिंतन एवं विचार करने के कारण अत्यंत विलंब भी हो जाता है। परंतु जब किसी विषय पर सोच विचार के बाद निर्णय ले लेती है तो उस पर पूरी तन्मयता से अडिग रहती है। जलीय तत्व राशि होने से जातिका हर प्रकार की परिस्थितियों में स्वयं को ढाल लेने में सक्षम होगी। सरलहृदया, सेवाभावी, अध्ययनशील, दूसरों के मनोभावों को समझने में कुशल, धैर्यवान एवं क्षमाशील स्वभाव की होती है। गुरु आकाशीय तत्व प्रधान होने से जातिका दूसरों के साथ सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करने वाली, गायन, संगीत, साहित्य, लेखन, पठन, योग, दर्शन, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों में विशेष रुचि रखने वाली, गुणवान, अपने गुणों द्वारा परिवार एवं समाज में सम्मान पाने वाली तथा अपनी प्रतिष्ठा के प्रति विशेष सावधान रहती है। परिस्थितियों एवं अवसर अनुसार आचरण करने में निपुण होती है। गुरु प्रधानता के कारण व्यवहार कुशल परंतु दूसरों पर अधिकार जताने की प्रवृत्ति होती है। साथ ही अपने मित्रों के प्रति उदार एवं भावनात्मक दृष्टिकोण रखती है। इनमें पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करने की अद्भुत विशेषता होती है।

शिक्षा👉 मीन जातिका की कुंडली में चंद्र, मंगल, गुरु, शुभस्थ हो तो जातिका व्यवसायिक विद्या जैसे कंप्यूटर, कॉमर्स, साहित्य, कानून, अकाउंट्स आदि क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त कर लेती है। वैसे भी मीन लग्न जातिका अध्ययनशील प्रकृति की होने के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल रहती है।

कैरियर एवं व्यवसाय👉 मीन लग्न की जातिका को स्वाध्याय एवं पठन-पाठन के कार्यों के अतिरिक्त गायन, अभिनय, संगीत, साज-सज्जा, फैशन, श्रृंगार, सौंदर्य आदि विषयों में भी विशेष रूचि रहती है। वह शिक्षण, अध्यापन, कॉमर्स, कंप्यूटर, कढ़ाई-बुनाई, पत्रकारिता, समाचार पठन, फैशन डिजाइनिंग, इंटीरियर डेकोरेशन, हस्त कला एवं शिल्पकारी, धर्म प्रचारक, लेखन, कला, चिकित्सा, वकालत आदि जहां बौद्धिक योग्यता की विशेष आवश्यकता हो ऐसे कार्यों में विशेष सफल होने की संभावनाएं होती हैं। अधिक जानकारी के लिये मीन लग्न के जातक संबंधित हमारी पिछली पोस्ट पढ़ सकते है।

स्वास्थ्य एवं रोग👉 यदि मीन लग्न की जातिका की कुंडली में गुरु, मंगल, चंद्र आदि ग्रह शुभ भावस्थ है तो जातिका का स्वास्थ्य लगभग अच्छा रहता है। तथा वह कम ही बीमार होती है। परंतु यदि कुंडली में गुरु, सूर्य, चंद्र, शनि, मंगल आदि ग्रह नीच आदि अशुभ अवस्था में हो तो जातिका को रक्त विकार, सिर पीड़ा, नेत्र, दांत, टांसिल, गले में दर्द या जोड़ों में दर्द, कफ विकार, खुजली,, एक्जिमा आदि चर्म रोग, हिस्टीरिया, कान के रोग का भय होता है। रोगों संबंधित अधिक जानकारी हेतु हमारी गत पोस्टों में लिखित पुरुष मीन जातक का भी अवलोकन कर सकते हैं।

प्रेम विवाह और वैवाहिक जीवन👉 प्रेम के संबंधों में मीन लग्न की जातिका अत्यंत भावुक और संवेदनशील होती है। बन-संवर कर रहना उसे अति प्रिय होता है। पुरुषों को अपनी और आकर्षित करने की इनमे में विशेष योग्यता होती है। करुणा एवं सहानुभूति की भावनाएं विशेष होती है। वह अपने मित्रों का दुख दर्द बांटने के लिए अपने निजी स्वार्थ को भी न्योछावर कर देती है। अपनी सहज मुस्कान एवं उन्मुक्त व्यवहार के कारण वह युवक युवतियों के लिए शीघ्र आकर्षण का केंद्र बन जाती है। द्विस्वभाव राशि होने के कारण वह अपने प्रेमी या जीवनसाथी के चयन में जल्दबाजी नहीं करती बल्कि विशेष सोच विचार के बाद ही भावनात्मक संबंध जोड़ती है। जब मीन जातिका किसी प्रेमी या साथी से संबंध जोड़ लेती है तब पूरी निष्ठा ईमानदारी एवं समर्पण की भावना से जोड़ती है। अत्यधिक भावुक होने के कारण कभी-कभी प्यार में धोखा भी खा सकती है।

 लग्नेश गुरु एवं सप्तमाधिपति बुध के कारण जीवन साथी के चुनाव में बाहरी व्यक्तित्व के साथ-साथ बौद्धिक एवं शैक्षणिक योग्यता को भी विशेष महत्व देती है। यदि जातिका की कुंडली में बुध, गुरु आदि ग्रहों की स्थिति अच्छी हो तथा भावी पति की जन्म कुंडली के साथ जातिका की कुंडली का परस्पर राशि, नक्षत्र एवं गुण मिलान भी ठीक प्रकार से किया गया हो तो जातक का वैवाहिक एवं दांपत्य जीवन मधुर एवं सुखमय रहता है। विवाह के बाद उसे मनचाहा पति, सुंदर आवास, वाहन एवं अन्य दांपत्य सुख प्राप्त होते हैं। 

अनुकूल राशि मैत्री👉 मीन लग्न राशि की कन्या को मेष, मिथुन, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, मकर लग्न राशि के जातकों के साथ विवाह या व्यापारिक संबंध स्थापित करने शुभ एवं लाभप्रद होते हैं। जबकि शेष अन्य लग्न राशि वालों के साथ संबंध साधारण या असामान्य रहते।

मीन लग्न के अंतर्गत दशान्तर्दशाओ का फल
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प्रत्येक लग्न में किसी ग्रह विशेष की दशा अंतर्दशा के फल में भिन्नता आ जाती है। मीन लग्न के जातक/जातिका की जन्मकुंडली में यदि गुरु, मंगल, चंद्र ग्रह शुभ हो तथा इनमें से किसी एक ग्रह की दशा या अंतर्दशा चल रही हो तो जातक/जातिका को अपनी दशा के सोची योजनाओं में कामयाबी, धन लाभ व उन्नति, विद्या में सफलता, व्यवसाय में लाभ व पदोन्नति, विवाह, संतान, भूमि, वाहन, आदि सुखों की प्राप्ति होती है अथवा ग्रह परिवार में किसी मांगलिक कार्य का आयोजन होता है। यदि उपरोक्त ग्रह नीच अशुभ आदि राशि में हो अथवा अरिष्ट भावों में पड़े हो तो यह ग्रह वांछित फल प्रदान नहीं कर पाते 

 यदि जन्म कुंडली में बुध, शनि या केतु आदि क्रूर ग्रह किसी अशुभ भाव में हो तो वह ग्रह विघ्नों के बाद सफलताएं, बनते कामों में विघ्न अड़चनें, पारिवारिक कलह क्लेश, आय के स्त्रोतों में रुकावटें, भाई बंधुओं के साथ मतांतर तथा आय कम व खर्च अधिक बढ़ जाते हैं। शुक्र शनि ग्रहों की दशा अंतर्दशा में धन हानि, मानसिक तनाव, घरेलू ,व्यवसायिक परेशानियां बढ़ जाती हैं। राहु केतु अपने भाव एवं राशि अनुसार फल प्रदान करते हैं।

शुभ एवं योगकारक ग्रह
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सूर्य👉 षष्ठेश ग्रह होने से मीन लग्न में शुभ अशुभ दोनों अर्थात मिश्रित प्रभाव करेगा। इन लग्न के 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 9 , 10 एवं 11 भावों में प्रायः शुभाशुभ (मिश्रित) फल तथा अन्य भावो में अशुभ फल करता है।

चंद्र👉  पंचमेश होने से मीन लग्न में प्रायः शुभफल प्रकट करता है। उच्च या बली होने की स्थिति में जातक मेधावी, उच्च शिक्षित, विद्वान, धनी, माता, स्त्री व पारिवारिक सुखों से युक्त होगा। कुंडली में 1, 2, 3, 5, 7, 9, 10 एवं 11 वे भाव में शुभ व अन्य भागों में सामान्य फल देता है।

मंगल👉 धनेश व भाग्येश मंगल मीन लग्न में प्रायः शुभ फल प्रदान करता है। द्वितीय मारकेश भी होने से मंगल जातक को संघर्ष, तनाव एवं उत्तेजना भी देता है। मीन लग्न के 1, 3, 4, 10, 11 वे भाव में शुभ एवं 2, 5, 8 व 9 भावों में मिश्रित फल तथा 5, 6, 7 व बारहवें भाव में प्रायः अशुभ फल देता है।

बुध👉 सुखेश व सप्तमेश होने से प्रायः शुभ फल प्रदान करता है। परंतु इसे यहां केंद्र स्वामित्व का दोष भी रहता है। नीच राशि में स्थित होने से उच्च विद्या में अड़चनें तथा स्वास्थ्य में कमी करता है। इसके अतिरिक्त 6 आठवें, बारहवें भाव में अशुभ फल ही होता है। जबकि अन्य भावो में प्रायः शुभ फल ही रहता है। शुभ होने पर स्त्री, विद्या व सुख साधनों में वृद्धि करता है। संगीत, गायन, आर्ट आदि ललित कलाओं को भी देता है।

गुरु👉 मीन लग्न में लग्नेश व कर्मेश होने से गुरु अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे यहां लग्नेश होने से केंद्र आधिपत्य दोष नहीं लगता है। 3,6,8 ग्यारहवे एवं बारहवे भावो में अशुभ तथा शेष अन्य भागों में शुभ फलदाई होता है। शुभ होने की स्थिति में यह जातक को उच्च विद्या, पति एवं संतति सुख, धन संपदा, धार्मिक प्रवृत्ति, बौद्धिक योग्यता व उच्च प्रतिष्ठा देता है।

शुक्र👉 मीन लग्न में शुक्र त्रिषडायपति अर्थात तीसरे व आठवें भाव का स्वामी होने से शुभ फलदायक नहीं माना जाता। परंतु लग्न, तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम भाव में उच्च एवं स्वराशिगत होने से स्त्री, धन संपदा, वाहन आदि सुखों की उपलब्धि करवाता है। जबकि 2, 6 व सातवें भाव में अशुभ फल तथा आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह भाव मिश्रित फल प्रदान करता है।

शनि👉 मीन लग्न मे लाभेश एवं व्ययेश होने से प्रायः मिश्रित फल देता है। तृतीय, सप्तम, अष्टम, दशम, एकादश एवं व्यय भावो में प्रायः अशुभ फल प्रदान करता है। अन्य 1, 3, 4, 6 एवं नौवें भाव में मिश्रित फल प्रदान करता है।

राहु👉 मीन लग्न में राहु 3, 4, 6, 7, 11 एवं 12 भाव में शुभाशुभ अर्थात मिश्रित फल देता है। जबकि 1, 2, 5, 9 एवं दसवे स्थानों पर अशुभ फल प्रदान करता है।

केतु👉 1, 2, 5, 6, 9, 10 एवं 12 वे भाव में मिश्रित फल, जबकि 3, 4, 7, 8 एवं 11 विभागों में प्रायः अशुभ कारक माना गया है।

कुछ उपयोगी उपाय
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शुभवार👉 मीन लग्न के जातक/ जातिकाओ के लिए रविवार, सोमवार, मंगलवार, गुरुवार शुभ एवं भाग्य कारक दिन होते हैं। जबकि बुधवार, शुक्रवार तथा शनिवार मिश्रित प्रभाव रखते हैं।

शुभरंग👉 लाल, पीला, गुलाबी, नारंगी सतरंगी क्रीम सफेद इत्यादि रंग शुभ होते हैं। हल्का हरा, निला मिश्रित या सामान्य फलदायक है। जबकि काला, भूरा, गहरा नीला अशुभ फलदाई होंगे।

शुभ रत्न👉 पुखराज नग सवा 5 या सवा सात रति का सोने की अंगूठी में गढ़वा कर वीरवार को गंगाजल में धोकर शुभ मुहूर्त में धारण करना चाहिए। धारण करते समय गुरु का बीज मंत्र कम से कम पांच माला पढ़ना आवश्यक है।

गुरु का बीजमंत्र👉 "ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:" उस दिन विधि अनुसार वीरवार का व्रत भी रखना चाहिए, गाय को चने की भीगोई हुई दाल सहित चारा डालना तथा पीला वस्त्र, केले, आम आदि फल, अनाज, पीले चावल, गुड़ आदि का दान करना शुभ एवं कल्याणकारी होगा। धार्मिक ग्रंथों का दान करना भी आपके लिए शुभ व कल्याणकारी रहेगा।

शुभ अंक👉 1,3,4 और 9 के अंक शुभ है जबकि 8 का अंक अशुभ होगा।

भाग्योन्नतिकारण वर्ष👉 आयु का 28, 33,  37, 39, 42, 45, 48, 54, व 58 वा वर्ष शुभ और भाग्य उन्नति कारक रहता है।

सावधानी👉 आपको संदेहशील प्रकृति से बचना चाहिए। दूसरों के प्रति आलोचनात्मक प्रवृत्ति बहुत अधिक स्वच्छंदता एवं भावुकता तथा अधिक स्वार्थपरता का भी यथा शक्ति त्याग करना चाहिए। तामसिक भोजन का त्याग तथा सात्विक एवं संतुलित भोजन आपकी मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के लिए शुभ व कल्याणकारी होगा। चापलूसी करने वाले तथाकथित मित्रों से भी बचना चाहिए। इसके अतिरिक्त स्वभाव में जल्दबाजी व उतावलापन भी आपके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। प्रभु की भक्ति ज्ञान एवं स्वाध्याय श्रेष्ठ पुस्तकों का पठन आपके जीवन के लिए अत्यंत कल्याणकारी होगा।

नोट👉 जन्म कुंडली में किसी ग्रह के फल का निर्णय करते समय उस ग्रह के साथ अन्य ग्रह के योग एवं दृष्टि आदि को भी ध्यान में अवश्य रखना चाहिए।
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मीन लग्न के उपाय दान ईष्ट मन्त्र 

सूर्य : अंक 1षष्ठेश सूर्य अपनी दशा में स्वास्थ्य हानि करता है। यदि सूर्य अष्टम भावगत हो, तो सूर्य की दशा राजयोगकारक भी हो सकती है। किन्तु सूर्य अशुभ फल कारक होकर परेशानी देगा बीमारी बाधा शत्रु ऋण रोग दुःख इसलिए इसका दान ही शुभ करक रहेगा l

चंद्रमा : अंक 2 पंचमेश चंद्रमा की दशा नई योजनाओं का सृजन करती है। अनुकूल समय की अनुभूति से मनुष्य प्रफुल्लित रहता है। संतान का सुख प्राप्त होता है।सर्वदा शुभ लाभ अमृत करक होकर सदैव शुभ फल भाग्य संतान इष्ट फल कारी मारण करे चावल खावे दूध पिए मोती मूनस्टोन पहने चाँदी की गिलास में पानी पिए, रोहिणी,चतुर्थी, पूर्णिमा का व्रत रखे खिरनी की जड़, और 2 मुखीरुद्राक्ष पहने दूज के चाँद देखे शिवाभिषेक करे l

मंगल : अंक 9 द्वितीयेश और नवमेश मंगल शुभ और समृद्धिदायक है। इसकी दशा में भाग्योदय होता है। मंगल अपने बल के सदृश्य शुभ फल देगा, यद्यपि द्वितीयेश होने से मारकेश है।सर्वदा शुभ मंगल लाभ भाग्यकारी अंडाकार लाल मूंगा धारण करे, अनंत मूल की जड़ी, 3 मुखी रुद्राक्ष पहने, ताम्बे का कड़ा ताम्बे में जल पिए, लाल गणेश जी,  हनुमानजी को पूजे, हनुमानजी, नरसिंह जी, रक्तांग भैरवजी पूजे, नीम का पेड़ लगावे, ताम्बे में मंगल यन्त्र धारण करे 

बृहस्पति : अंक 3 लग्नेश और दशमेश बृहस्पति मंगलकारी है। लग्नेश होने से दो केंद्रों के स्वामी होने के दोष से मुक्त है। बृहस्पति की दशा में स्वास्थ्य लाभ के साथ मान-सम्मान और सरकारी धन और कारोबार में लाभ होता है। बृहस्पति में मंगल का अन्तर सफलता प्रदान करता है। व्यक्ति की योजनाओं के क्रियान्वयन का यह सबसे अच्छा समय होगा। बृहस्पति और मंगल यदि सशक्त हों, तो यह जीवन का स्वर्णकाल हो सकता है।गुरु शुभ अमृत लाभ धन वैभव अत्यधिक शुभ फल दायक, बृहस्पति लग्नेश होने से सबसे श्रेष्ठ, पुखराज , सुनहला, सिट्रीन रत्न धारण करे 5 मुखी रुद्राक्ष और भारंगी की जड़ी पहने, पीतल में खाना खावे, पीपल का पेड़ लगाए सीचे और शनिवार को  के तेल का दिया करे, बृहस्पति यंत्र इंडेक्स फिंगर में सोने में पहने, पुष्करतीर्थ में स्नान और पूजन करावे,  दक्षिणमुखीशिव, दत्तात्रेय भन् की पूजा करे उनको गुरु  बनावे

शनि: अंक 8 लाभेश और व्ययेश शनि सर्वदा अपकारक और विपत्तिदाता है। यदि गोचर में भी शनि प्रतिकूल संकेत दे रहा हो, तो स्थिति भयावह रूप ले सकती है और यह अब तक का सबसे बुरा समय हो सकता है। ये धन दे सकता है किन्तु वो आपके लिए अशुभ अप्ययकारी होगा, विदेश से लाभ ज़रूर दे, अशुभ होने के कारण इसका त्याग अतः इसका दान ही श्रेष्ट रहेगा l

बुध : अंक 5 चतुर्थेश और सप्तमेश बुध दो केंद्रों का स्वामी होकर शुभ है।  बुध ही शुभ फल दे सकता है। ये बुध व्यापर पत्नी माता व्यापर, भूमि भवन वाहन का सुख कर्म के लिए सर्वदा शुभ कारी रहेगाlपन्ना पहने हरी चड्डी पहने हरी सब्ज़िया खूब खावे सर्वदा शुभ करक सर्वदा दुर्गा षोडशी भुवनेश्वरी पूजे आरोग्य शुभ धन सिद्धि कारी पन्ना पहने, पेरिडॉट पहने, विदारा जड़ी पहने, 4 मुखी रुद्राक्ष पहने l

शुक्र : अंक 6 शनि और सूर्य  के बाद शुक्र मीन लग्न के लिए सर्वाधिक अनिष्टकारी ग्रह है। तृतीय और अष्टम दोनों ही भाव विपरीत फलों को देने वाले हैं। शुक्र यदि चंद्रमा से भी अपकारक हो या राहु अधिष्ठ राशि का स्वामी हो, तो इसकी दशा में मृत्यु तुल्य कष्ट संभव है। स्वास्थ्य हानि के साथ आर्थिक कष्ट भी पर्याप्त मात्रा में भोगने पड़ सकते हैं। शुक्र सर्वदा अशुभ अतः इसका दान ही श्रेष्ठ l


राहु इस लग्न में 3,6,11 भाव में ही शुभ अन्यथा अशुभ गोमेद न पहने 

केतु इस लग्न के लिए शुभकारी अतः 

टाइगरऑय स्टोन पहने कान छिदावेl

 

अधिकतर राहु-केतु सर्वदा अशुभ इनके दान करे जूता छाता चप्पल कम्बल मोज़े टोपी, 8स्टील और 8लोहे के बर्तन, जौ बाजरी प्याज लहसुन सफ़ेद काले तिल, कोयला सिगड़ी, मोप्पर, वाइपर, पोछा, साबुन लिक्विड वाशिंग  पाउडर केमिकल, मेडिसिन  या इंडक्शन 

शनि :  काली उडद

शुक्र :  ज्वार

सुर्य : गेहू 

केतु :  बाजरा/चौला

राहू: जौ/मोठ

मिक्सचर donate करे गौशाला में 

@  9,18,27,54,81,108,kg

गुड़ की पेटी और मुफ़ली तेल का एक कैन गौशाला में देवे हर अमावस्या को करें

OR

50gm डिब्बी में रात को सिरहाने रखकर या सुबह 27 बार एंटीक्लॉक वाइज उवार कर पक्षियों में डाले


12. मीन लग्न के इष्ट  - मंत्र

मीन राशि : इन्हें श्वेत रक्त या हरिद्रा गणेश माता हनुमान कमला या माता सिद्धिदात्री भैरव कृष्ण काली  दत्तात्रेय की उपासना करनी चाहिए।

ॐ ग्लौंगं गणपतायै नमः 

ॐ हं हनुमंताय रुद्रात्मकाय नमः  नमः

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हं सौः जगत्प्रसूत्यै नमः 

ॐ भ्रं भैरवाय नमः

मीन राशि लग्न के जातक इस मंत्र का जप 108 बार रोज करें ।

ॐ ग्लौंगंबृंटंलंदंह्रौंहंफ़्रौंक्रींभ्रं

ऐंह्रींश्रींक्लींहंसौःजगत प्रसूत्यै नमः |

गणेश हरिहरब्रम्ह, दत्तात्रये, विष्णु नारायण, देवी पार्वती, शारदा , छिन्मस्ता, बगलामुखी, दुर्गा , वरुण देव शुभ 

ॐ क्लीं उद्धृताय उद्धारिणे नम:

इसके अलावा ये नीचे  दिए  गृह आपके अनुकूल रहेंगे तो इनका जाप करते रहे दान न करे इनकी दशा में जप करावे 

गुरु मंत्र- 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:'। 

गुरु का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ ब्रं बृहस्पतये नम:'।

ॐ ऎं क्लीं श्रीं |ॐ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:

चंद्र तांत्रिक मंत्र- 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:'।चंद्र एकाक्षरी मंत्र- ॐ सों सोमाय नम:।

 भौम मंत्र- 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:'।

भौम एकाक्षरी मंत्र- ॐ ॐ अंगारकाय नम:।

बुध मंत्र- 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:'।

बुध का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ बुं बुद्धाय नमः

शनि प्रजापति 

शनि का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:'

मीन लग्न के लिए गुरु चंद्र मंगल, बुद्ध, रूद्र, वरुण, केतु शुभ है, इनके लिए मोती, मूंगा,सफेदपुखराज, पन्ना, फ़िरोज़ा,लाजवर्त, टाइगर धारण करें।  2,3,4,5,6,7मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। 

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दान : के ग्रह 

सूर्य की दान देने वाली वस्तुओं में

 1 अंक सांड,रोटी,अनार, कमल, गुलाबी रंग, चौरस आकर के आसान  सोने की 1ग्राम  गिंनी, कमल का फूल, आम, चुकुंदर, गाजर, रानी रंग के वस्त्र, अनार, आम, नारंगी, बन्दर के खिलोने, कुमकुम, बिस्कुट, गुलाल, आटा, तांबा, गुड़, गेहूं, मसूर दाल दान की जा सकती है। पीला बल्ब  रौशनी की वस्तुवे टोर्च, टेबल लैंप  यह दान प्रत्येक रविवार या सूर्य संक्रांति के दिन किया जा सकता है। सूर्य ग्रहण के दिन भी सूर्य की वस्तुओं का दान करना लाभकारी रहता है।


शुक्र ग्रह अंक 6, 6 मुखी रुद्राक्ष, सरपौंखा की जड़, हीरा प्लैटिनम चांदी  स्टील वाइट metal,का 6ग्राम सिक्का, श्रीयंत्र, छोला,सफ़ेद काबुली चने, मैदा,  कमलगट्टा , सफ़ेदक्रीम, पनीर , मक्खन, दही,  चावल, ज्वार, सफ़ेद उड़द दाल, मिश्री, दूध, दही लस्सी, श्रीखंड, इत्र, सफेद चंदन, चांदी, प्लैटिनम, हीरा, अमेरिकन डायमंड, सफ़ेद पुखराज, ओपल, मोज़ोनैट, बंगाली छैने की सफ़ेद मिठाई, मलाई, कपूर, इत्र, कमल ककड़ी, धूपबत्ती, खुशबु की वस्तुवे,टेलकम पाउडर, श्रृंगार सामग्री, मोगरा चमेली सफ़ेद खुशबूदार पुष्प, इत्र परफ्यूम डीओ, फ्रग्रेंस, कद्दू,आलू,शक्करकंद, आगरे का पेठा, मखाने, सफ़ेद क्रिस्टल, led लाइट, गन्ना, सफ़ेद मावा मिश्री, काजू कतली, दूधबर्फी, बताशा, आभूषण, सिल्क रेशम, मखमल, सफ़ेद मूंगा, sunscreen लोशन, क्रीम, टूथपेस्ट, स्त्री सौंदर्य सामग्री, सैनेटरीपेड, स्त्री प्रसाधन, ब्रा-पेंटी,   मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, आराम की सामग्री, मनोरंजन सामग्री, सिंघाड़ा, साबूदाना , आलू के बने व्यंजन, निरोध, वियाग्रा, 

शनि के दान अंक 8

अंक 8, लोहा, 8 लोहे के बर्तन, 8 के काले नीले वस्त्र  अंक में काजल, सुरमा, कालीउड़द, लोहे के औज़ार, हथियार गाडी, धातु से बने पात्र, अस्त्र शास्त्र, मशीन, 7 धान, जूते, काले फल, काले अंगूर, काले नीले फूल, कला दन्त मंजन, काला नमक, राई,  काले मोज़े, काला कपड़ा, साबुत उड़द, लोहा, अलसी, तेल, काला पुष्प, कस्तूरी, काले तिल, चमड़ा, काले कंबल का दान किया जाता है, नील, चारकोलसोप, आवला, पीपल, कला कुत्ता, उड़द से बने इमरती, डोसा, इडली, सांभर वादा, काली दाल, चाय की पत्ती, काली पैंट, कला रुमाल, गोल बगीचे के आठ चक्कर, टायर, पायल, धातु, बांसुरी, लौंग, काली हल्दी, 

राहु-केतु के दान अंक 4-7

नीलेफूल, मैग्गी, चौमीन, सोया सॉस ,फ़ास्ट फ़ूड, अंडा नॉनवेज, चाय, बीड़ी, सिगरेट, भांग, शराब, आईटी, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, ईरफ़ोन, mic, स्पीकर, मुखौटा,  नशे, डबल रोटी ब्रेड, बासी भोजन, स्टील, अस्ट धातु या पांच धातु या मिश्रण धातु के आइटम, लेड शीशा, पीतल, कांसा, स्टील के बर्तन  जौ-बाजरा,प्याज-लहसुन,काले-सफ़ेद तिल, मशरूम, ऊनि- टोपी, जूता, छाता, चप्पल कम्बल, एलोपैथिक होम्योपैथिक दवाइयाँ, चाकू छुरी, तलवार कटार, ढाल, कपडे, शराब, मादक पदार्थ, खट्टे आइटम, डेटोल, स्पिरिट, पोछा, वाशिंग मशीन, साबुन डिटर्जेंट, केमिकल, तेज़ाब, एसिड, पोइसन, केमिकल स्प्रे, radio, मोबाइल, ट्रांजिस्टर, इंडक्शन चूल्हा, शमशान की लकड़ी, पलंग, पूरानी लकड़ी के आइटम हेंडीक्राफ्ट   काले-दुरंगे कुत्ते, राहु के लिए काला-नीला कपड़ा, कंबल, सरसों का दाना, राई, ऊनी कपड़ा, काले तिल व तेल का ‍दान किया जाता है।

केतु के लिए सात अनाज, काजल, झंडा, ऊनी कपड़ा, तिल आदि का दान किया जाता है।

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आराधना

गणेश मंदिर :  बुद्धवार

लड्डू, पान, दूर्वा चढ़ावे और गणेश अष्टक का पाठ करे मॉस की दोनों  चतुर्थी का व्रत करे मंत्र स्तोत्र कवच का पाठ करे गणेश यंत्र केतु यन्त्र NE

में लगावे 


देवी दुर्गा मंदिर 

/लक्ष्मी/सरस्वती/काली दुर्गा की उपासना, सोम, बुध, शुक्रवार की शाम को करे वैभव लक्ष्मी, कीलक,अर्गला, कवच 

सिद्धकुंजिका का पाठ करे, बीसा, नवदुर्गा, दशविद्या, श्री  यन्त्र स्थापित करे पूजा में, तीज, शुक्लस्ट्मी, शुक्ल नवमी को व्रत रखे   


काली मंदिर : शनिवार  चढ़ावे : माँ काली को प्रथम भेट में पांव की पायल भेट करे और सरसो के तेल का दिया मोगरा माला मोगरा धुप , मोगरा इत्र कटार,त्रिशूल, कटार, मालपुआ, इमरती, मूंग दाल कचौड़ी, दही बडा,मोगरे इत्र,धुप, बेसन की चकी,मीश्री गूंजा ,सेव, अनार, पान, सरसो के तेल का दिया लगावे  108 बार मंत्र बोले ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कालिकायै नमः कवच स्तोत्र का पाठ काली यंत्र शनि यंत्र पश्चिम में लगाए   


भैरव मंदिर : शनिवार, रविवार, कृष्ण पक्षअस्टमी कालाष्टमी का व्रत, कट्टार, त्रिशूल, शनि या रवि वार को मालपुआ  इमरती कचौी बड़े, दाल के बड़े, पापड,  उड़द की दाल,चूरमा, शसिगरेट पान चढ़ावे और मंत्र है ॐ भ्रं भैरवाय नमः, भैरव यंत्र sw में लगावे राहु यन्त्र लगावे 

विष्णु मंदिर: मत्यस्यावतार की पूजा करे  या लक्ष्मी नारायण का पूर्णिमा व्रत रखे  बेसन चक्की और दूध की बर्फी केले भोग नैवेद्य ॐ श्रीं दं नमः अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी, द्वादशी का व्रत

रखे 


हनुमान मंदिर : मंगल शनि 

गदा की भेट, चमेली आवला का दिया 5 इमरती 5 गुलाब पुष्प,सिन्दूर चमेली तेल गुड़ चना पान चढ़ावे 

llॐ हं फ़्रौं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट ll दक्षिण में मंगल यन्त्र पांच मुखी हनुमान यन्त्र स्थापित करे 

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शिव मंदिर : कच्चादूध जल और शक्कर का घोल शिवलिंग पर चढ़ावे 

सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, पुष्य नक्षत्र,  व्रत , रुद्रास्टाध्यायी, अभिषेक लोटा जल, कच्चा दूध, शक्कर, बिल्वपत्र(बुधवार),  पान, गन्ने का रास दीप, पान 

मंत्र ॐ ह्रीं नमः शिवायै च 

ह्रौं नमः शिवाय  

पूर्व उत्तर में केतु गुरु यन्त्र उत्तर में 

बारह ज्योतिर्लिंग और उनका राशियों से संबंध

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कमला लक्ष्मी मंदिर 

मिश्री दही दूध बताशा गन्ना श्रीफल केला पान सुपारी मखाना साबूदाना चावल की खीर मोगरे का इत्र माला धुप ,मिश्री मावा अनार सेब 

श्रीयंत्र स्थापित करे कनकधारायंत्र कुबेर यंत्र स्थापित करे श्रीसूक्त, कनकधारा, लक्ष्मीसूक्त, पद्मावती, श्रीविद्या,लक्ष्मीअष्टक,त्रयोदशी,  अमावस्या पूर्णिमा, अष्टमी तृतीया त्रयोदशी लक्ष्मी कमला त्रिपुर सुंदरी कवच मन्त्र पत्नी से करावे 

षोडशी श्री विद्या मंत्र 

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'

या

ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:

ॐ ह्रींश्रींक्लीं महालक्ष्म्यै नमः 

ॐश्रीं श्रियै नमः 

ॐकमलवासिन्यै स्वाहा

ॐ कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं महालक्ष्म्यै नमः 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हं सौः जगतप्रसूत्यै नमः 


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 पितृदोष : दत्तात्रेय भगवान की पूजा करे , त्रिपिंडी, नारायणबलि, करावे 

अमावस्या बुद्धवार को व्रत उपवास रखे विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करे 

रामायण, भागवत का पाठ करावे 

गौशाला ब्राह्मण को दान करे 

पीपल सींचे : दत्तात्रेय यन्त्र राहु यन्त्र SW लगावे  में मंगलवार और रविवार को न सींचे सुबह 10:00  से 12:00. के बीच पीतल, चाँदी, स्टील के जग या बड़े लोटे में कच्चादूध, गंगाजल, चावल, सीके  हुवु चनो का सत्तु, किशमिशदाख, शक्कर/बताशा मिलाकर घोल बना कर पीपल की जड़ो में अर्पित करे  

llॐ पित्राय स्वधाll तरपत्यांx3

    2. त्रिपिंडी 

    3. दत्तात्रेय भगवन की मूर्ति या तस्वीर पूजा रखे पूर्णिमा और अमावस्या को विशेष पूजा करे स्तोत्र मंत्र कवच 

ॐ द्रां दत्तात्रेय नमः

पितृदोष निवारक यन्त्र स्थापित करे 

प्रेत दोष निवारक यन्त्र स्थापित करे 

दत्तात्रेय यन्त्र स्थापित करे

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