कर्क लग्न का सम्पूर्ण स्वभाव व्यवहार विवेचन
कर्क लग्न का सम्पूर्ण स्वभाव व्यवहार जीवनशैली विवरण विवेचन और व्याख्या और उपाय एवम साधना:
इस लग्न के देवता श्री गणेश है और तत्व जल है
कर्क लग्न (लग्नेश चन्द्र)कर्क लग्न का स्वरूप
पाटलो वनचारी व ब्राह्मणो निशि वीर्यवान्।10ll
बहुपादचर: स्थीत्यतनुः सत्वगुणी जली।
पृष्ठोदयी कर्कराशिमृगाकाधिपतिः स्मृतः ॥11॥
-बृहत्पाराशरहोराशास्त्र, अ. 4/श्लो. 10
पाटलवर्ण, वनचारी, विप्रवर्ण, रात्रिबली, बहुत पैर वाला, स्थूल देह, सत्वगुणी, जल तत्व, पृष्ठोदय है इसका स्वामी चन्द्रमा है।।10-1111
आवकद्रुतगः समुन्नतकटिः स्त्रीनिर्जितः सत्सुहद्,
दैवज्ञः प्रचुरालयः क्षयधनैः संयुज्जते चन्द्रवत् ।
हस्वः पीनगलः समेति च वशं साम्ना सुहृद्वत्सल
स्तोयोद्यानरतः स्ववेश्मसहिते जातः शशांके नरः ॥4॥
-बृहज्जातकम् अ. 16/ श्लो. 4
यदि चन्द्रमा कर्क लग्न में स्थित हो तो जातक कुछ टेढ़ा होकर जल्दी चलने वाला, कम के किनारों पर ऊंचे मांस वाला, स्त्रीजनों से विजित अर्थात् स्त्रियों से शीघ्र प्रभावित होने वाला अच्छे मित्रों वाला, भाग्य को जानने वाला अर्थात् ज्योतिषी अथवा ज्योतिष में रुचि रखने वाल प्रचुर अर्थात् खूब भवनों वाला, अथवा कई कमरों या मंजिलों के मकान में रहने वाला, केवल शांति व प्रेम से वश में होने वाला चन्द्रमा के समान ही घटते-बढ़ते हुए हानि लाभ वाला, छोटे
कद वाला, मोटी गर्दन वाला, अपने मित्रों से विशेष स्नेह रखने वाला, जल व उद्यानों से विशेष प्रीति रखने वाला अर्थात् जलीय प्रदेशों व हरे भरे स्थानों में रुचि रखने वाला होता है।
लग्ने कुलीरे यदि संप्रसूतो नयप्रियो ऽसृष्टरुगिष्टयोगः।
सौभाग्ययुक्तो रतिलालसश्च मन्त्रोपसेवी गुरुवत्सलः स्यात् ॥4॥
-वृद्धयवनजातक अ.24/श्लो.5/ पृ.28
यदि कर्क लग्न में जन्म हो तो मनुष्य नीतिपरायण, न्यायप्रिय, रोगों की कल्पना में जो वाला, असम्भावित रोगों से ग्रस्त होने का भ्रम पालने वाला, अभीष्ट फल पाने वाला, सौभाग्य से युक्त, रति-क्रिया की इच्छा रखने वाला, मनन परायण, सदैव सोच विचार का कार्य करते
वाला, गुरुओं का प्रिय पात्र होता है।
मिष्टानाम्बर भूषणो ललितवाक्कापट्ययीर्थर्यवान्।
जातः स्थूलकलेवरोऽन्यभवनप्रीतः कुलीरोदये ॥5॥
मिठाई (रसपूर्ण सुस्वादु खाद्य पदार्थ), वस्त्र, आभूषणों का भोक्ता, सुन्दर और कोमल-जातक पारिजात श्लो.5/9.678
वाणी, कपट बुद्धि, धार्मिक, पुष्ट (मोटा) शरीर, दूसरों के मकानों में प्रीति रखने वाला। फलदीपिका के अनुसार जिसके कई मकान हों।
कर्कटकादिमभागे देवब्राह्मणरतश्चलो गौरः।
कृत्यकरश्च परेषां सुधीः सुमूर्तिः शुभाङ्गनः सुभगः ॥ ॥
-सारावली श्लो. 10/पृ. 466
यदि जन्म लग्न में कर्क राशि व कर्क राशि का पहला द्रेष्काण हो तो जातक देवता व ब्राह्मणों में लीन अर्थात् भक्त, चंचल, गौरवर्ण, दूसरों के कार्य करने वाला व परोपकारी, सुन्दर बुद्धिमान व पण्डित, सुन्दर शरीरधारी, अच्छी स्त्री वाला और सौभाग्यवान होता है।
कर्क लग्ने समुत्पन्नो, भोगी धर्मजनप्रियः ।
मिष्ठान्नपानसंयुक्तः सुभगः सुजनप्रियः ॥
-मानसागरी अ. 1/श्लो. 4
कर्क लग्न वाला जातक भोगी, मानव धर्म उपासक, मिष्ठान प्रेमी, धन-सम्पदा ऐश्वर्य से सम्पन्न, उदार मनोवृत्ति, जलप्रिय, विनम्र परन्तु चपल बुद्धि, तत्वग्राही मनोवृत्तिशील होगा।
कर्क लग्न का स्वामी "चन्द्रमा" एक शीतल सौम्य एवं शुभ ग्रह है। चन्द्रमा का सबसे ज्यादा असर मनः स्थिति पर देखा गया है। अत: इस राशि वाले पुरुष - स्त्री प्रायः अत्यधिक भावुक व भावनाप्रद विचारों से ओत-प्रोत पाए जाते हैं, लम्बा कद, दूसरों के प्रति दया व प्रेम की भावना विशेष एवं जीवन में निरन्तर आगे बढ़ने की तीव्र लालसा इनकी निजी विशेषता है। सामान्यतया कर्क लग्न में उत्पन्न जातक शान्त प्रवृत्ति से युक्त होते हैं तथा अपने कार्यकलापों को वे दृढ़तापूर्वक सम्पन्न करते हैं। इनमें भावुकता है तथा प्रेम एवं स्नेह के क्षेत्र में ये निश्छलता का संसाधनों को ये स्वपरिश्रम तथा पराक्रम से अर्जित करने में समर्थ रहते हैं तथा सुखपूर्वक इनका उपभोग करते हैं साथ ही इनमें समाज या देश सेवा की भावना भी विद्यमान रहती है। अन्य जनों की आंतरिक भावनाओं को समझने में ये दक्ष होते हैं तथा राजनीतिक या सरकारी क्षेत्र में किसी सम्मानित पद को प्राप्त करके मान प्रतिष्ठा एवं प्रसिद्ध अर्जित करते हैं।
अत: इसके प्रभाव से आप एक बुद्धिमान पुरुष होंगे तथा अपने सांसारिक शुभ एवं महत्वपूर्ण कार्यों को बुद्धिमता एवं परिश्रम से सम्पन्न करेंगे तथा इनमें आपको प्राय: सफलता रहता हैं।
जीवन में भौतिक सुखप्राप्त होगी जिससे आपके उन्नते मार्ग प्रशस्त रहेंगे। साथ ही समाज में यथोचित आदर एवं सम्मान प्राप्त करेंगे। आर्थिक रूप से आप सृदृढ़ रहेंगे तथा प्रचुर मात्रा में धनार्जन होता रहेगा। जीवन में आपको उतार चढ़ाव का सामना करना पड़ेगा। परन्तु समस्त समस्याओं सामना तथा समाधान आप दृढ़तापूर्वक करेंगे तथा विषम परिस्थितियों में भी साहस नहीं छोड़ेंगे।
इसके अतिरिक्त समाज में आपका प्रभाव रहेगा तथा अनुकूल प्रतिष्ठा अर्जित करने में समर्थ होंगे आपका व्यक्तित्व आकर्षक रहेगा फलतः अन्य जन आपसे प्रभावित होंगे। श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट कार्यों को करने में आपकी रुचि रहेगी तथा यत्नपूर्वक इनको करने में तत्पर होंगे। आप में कर्त्तव्य परायणता का भाव भी विद्यमान रहेगा तथा समाज एवं देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों का ईमानदारी से पालन करेंगे। इससे सर्वत्र आपके उन्नति मार्ग प्रशस्त रहेंगे तथा लोभ भी आपको यथोचित आदर प्रदान करेंगे। सरकारी क्षेत्र या राजनीति में आपको सफलता मिलेगीतथा किसी उच्च पद को प्राप्त करने में समर्थ होंगे। धर्म के प्रति आपकी श्रद्धा रहेगी परन्तु धार्मिक कार्यकलाप या अनुष्ठान अल्प मात्रा में ही सम्पन्न करेंगे। प्रकृति के प्रति आकर्षण रहेगा तथा समय-समय पर आप इन स्थानों पर भ्रमण कार्यक्रम बनाते रहेंगे। संगीत एवं कला के प्रति भी आपका आकर्षण रहेगा तथा इस क्षेत्र में आपका योगदान भी रहेगा। मित्रों के मध्य आप सम्मानीय रहेंगे तथा उनसे आपको इच्छित सुख एवं सहयोग की प्राप्ति होगी साथ ही वे गुणवान तथा शिक्षित भी होंगे। इस प्रकार आप कर्त्तव्यपरायण, दृढ़-प्रतिज्ञ, मित्र-प्रेमी तथा पराक्रमी पुरुष होंगे एवं जीवन में परिश्रमपूर्वक धन ऐश्वर्य एवं वैभव अर्जित करके प्रसन्नतापूर्वक अपना समय व्यतीत करेंगे। कर्क लग्न वाले प्रायः गोरे वर्ण व धवल कांति वाले होते हैं।
जन्म कुण्डली का पहला खाना सम्पूर्ण कुण्डली का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग होता है। ज्योतिष भाषा में इस खाने को प्रथम भाव अथवा लग्न भाव भी कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य किसी भी जातक की जन्म कुण्डली में लग्न एवं लग्नाधिपति अर्थात लग्नेश की स्थिति को देख कर ही सम्बंधित जातक के रंग, रूप, शारीरिक गठन, आचरण, स्वभाव एवं स्वास्थ्य आदि के सम्बन्ध में विवेचना कर देते हैं। कुछ अनुभवी एवं ज्ञानी ज्योतिषाचार्य तो किसी भी जातक की आभा, मुखमण्डल, आदतें एवं व्यवहार को देखकर ही सम्बंधित जातक के जन्म लग्न का एकदम सटीक पता लगा लेते हैं।
कर्क राशि एवं लग्न (सम्पूर्ण परिचय)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
कर्क राशि एवं लग्न, जातक की प्रमुख विशेषताएं
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
कर्क लग्ने समुत्पन्नो धर्मो भोगी जहप्रियः।
मिष्ठान्न भुक्त साधुरतो विनितो सौभाग्यधन संयुतः।।
परदेशगः सुधीरः साहसकर्मा जलाधिगतवित्त:।
स्त्रीभुषणाम्बर सुखै भोगैश्च समन्वितो भवति।।
भचक्र में कर्क राशि चतुर्थ क्रम में पड़ती है। इसका विस्तार ९० अंश से १२० अंश के अंदर माना जाता है। इस राशि के अंतर्गत पुनर्वसु (चतुर्थ चरण) पुष्य के चारोचरण एवं आश्लेषा के चारो चरण सम्मिलित है। पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी गुरु, पुष्य का शनि, तथा आश्लेषा का स्वामी बुध माना जाता है। कर्क राशि का स्वामी चंद्र है। आकाश मंडल में इसका स्वरूप केकड़े का जैसा है।
इस राशि के अन्य पर्याय नाम कर्कट, कीट, कूर्म, कुलीर, शंशाकभ, सलिलचर, षोडश पाद एवं चान्द्र है। यह राशि कोमलता, सहानुभूति ईमानदारी, पवित्रता, मिलनसार, संवेदनशील, एवं भावुकता की प्रतीक मानी गई है।
यह राशि चर (परिवर्तन शील) जलतत्त्व से युक्त, ब्राह्मण वर्ण, स्त्रीजाति, सौम्य लेकिन कफ प्रकृति, रजोगुणी, रात्रिबली, सम संज्ञक, रक्त-श्वेत वर्ण एवं उत्तर दिशा की स्वामिनी मानी जाती है।
इस राशि का स्वामी चंद्र है यह शुभ सौम्य राशि की प्रथम नवांश राशि कर्क की होती है। इस राशि पर गुरु ५ अंश पर परमोच्च रहता है। जबकि मंगल इस राशि के २८ अंश पर परमनीच का होता है। निरयण सूर्य इस राशि पर लगभग १६ जुलाई से १५ अगस्त के बीच संचार करता है।
कर्क राशि के गुण-विशेषताएं👉 संवेदनशील, ईमानदार, गुणग्राह्य, परिवर्तनशील, भावुक, मिलनसार, जल्दबाज, दुखी प्राणी के प्रति दया, सहानुभूति, उदारता, कल्पनाशील प्रकृति, हँसमुख, चंचल परन्तु परिस्थिति अनुसार स्वयं को ढाल लेने की प्रकृति, संगीत व सौंदर्य के प्रति रुचि, सहृदयता, कार्य तत्परता, आदि गुण विशेष रूप में पाए जाते है। इस राशि का संबंध पेट, हृदय एवं गुर्दे से है। यदि किसी जातक की नाम राशि, जन्म राशि एवं लग्न राशि समान हो तो ये गुण जातक में अधिक मिलेंगे।
शारीरिक संरचना👉 कर्क राशि/लग्न के जातक का रंग गोरा, गोल सुंदर व आकर्षक चेहरा, भरे हुए गाल, मध्यम कद, छोटी किंतु कुछ उठी हुई नाक, आंखे काली या थोड़ा भूरापन लिये हुए, चौड़ी छाती, हाथपैर अपेक्षाकृत छोटे, बाल्यकाल में दुबला पतला शरीर किंतु आयु वृद्धि के साथ पुष्ट शरीर हो जाता है।
व्यक्तिगत विशेषताएं👉 चर व जलीय राशि होने के कारण कर्क के जातक संवेदनशील, भावुक हृदय, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली, कल्पनाशील, किसी भी बात या विषय को शीघ्र समझने वाले, दुसरो की भावना व विचारों का सम्मान करने वाले, नवीनता व परिवर्तन प्रिय, देश-विदेश में यात्राएं करने के शौकीन, न्याय प्रिय व दयालु स्वभाव, शीघ्र क्रोधित व शीघ्र शांत हो जाने वाले, व्यवहार कुशल, अतिथि सत्कार में तत्पर, हँसमुख, अपने मित्र व पारिवारिक कार्यो में हर प्रकार से सहायक, कुटुम्ब में श्रेष्ठ व सम्मानित होते है। ये जातक जब तक विशेष रूप से सताए ना जाये तब तक किसी का अहित नही करते और एक बार उत्तेजित हो जाये तो छोड़ते नही। इनकी जलीय व प्राकृतिक वस्तु के प्रति विशेष रुचि होती है।
कर्क लग्न की कुंडली मे यदि गुरु व मंगल शुभ हो तो ऐसा जातक धार्मिक प्रवृत्ति वाला, परोपकारी, उदार हृदय, उच्चाकांक्षी, स्वाभिमानी तथा अपनी प्रतिष्ठा के प्रति अत्यंत संवेदनशील होगा। उच्च व्यावसायिक शिक्षा जैसे उच्च-प्रशासनीय कंपटीशन, डॉक्टरी, वकालत, इंजीनियरिंग, प्राध्यापन, आदि क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने की क्षमता होती है।
इनकी कुंडली मे यदि चंद्र-शुक्र शुभस्थ हो अथवा इन ग्रहों की शुभ दृष्टि हो, तो सौन्दर्यानुभूति विशेष अधिक होगी। चित्रपट, दूरदर्शन, सिनेमा आदि में तथा गायन , संगीत, एवं साहित्य में भी अधिक झुकाव रहे। पठन पाठन एवं लेखनादि कार्यो में भी रुचि लेते है। ये लोग नए नए विषयो को जानने के लिये भी उत्सुक रहते है। कर्क के जातक यद्यपि दूसरे व्यक्ति के अन्तरभावो को शीघ्र समझने में सक्षम होता है। परन्तु आवेश में शीघ्र विश्वास कर लेने के कारण अनेको बार धोखा भी खाता है। चंद्रमा की कलाओं की भांति कर्क जातक के स्वभाव एवं जीवन मे समरसता नही आ पाती बल्कि परिवर्तन होता रहता है। इनके जीवन का उत्तरार्ध भाग अपेक्षाकृत अधिक भाग्यशाली होता है।
यदि कुंडली मे चंद्र - मंगल अशुभ हों या किसी पाप ग्रह से युत या दृष्ट हों तो जातक वासनाप्रिय, कामुक, आरामतलब, अस्थिर एवं उद्विग्न मन वाला, हठधर्मी, दुसरो के बहकावे में शीघ्र आने वाला, जल्दबाजी में आवेश पूर्वक बिना सोचे काम करने वाला, अधीर एवं कुछ मूडी प्रकृति रखे अर्थात किसी के द्वारा की गई थोड़ी सी अवहेलना से शीघ्र उत्तेजित हो जाये तथा कठिन परिस्थितियों में कोई एक बात को लेकर बहुत सोच विचार में लगा रहे। चंद्र शुक्र अशुभ होने की स्थिति में जातक अत्यधिक तनाव एवं चिंता से परेशान होकर शराब, तम्बाकू, मास, आदि तामसिक भोजन की और आकृष्ट हो जाता हैं। इन जातकों को अपनी इसी कमजोरी से विशेष सावधान होना चाहिये।
कर्क राशि/लग्न की कन्या सभी जातको का प्रेम-वैवाहिक जीवन एवँ अनुकूल साथी चुनाव
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
कर्क लग्न में जन्म लेने वाली कन्या का गोल सुंदर चौड़ा चेहरा, गोरा रंग, उभरे हुए सुंदर गाल, श्वेत वर्ण, आंखे काली कुछ नीलिमा अथवा भूरापन लिये हुए, हाथ पैर अपेक्षाकृत कुछ छोटे, मध्यम कद, दुबलपतला कोमल शरीर, परन्तु आयु वृद्धि के साथ-साथ शरीर पुष्ट व कुछ स्थूल होने की भी संभावना रहती है।
कर्क लग्न जातिका के लग्न का स्वामी चंद्र तथा मंगल शुभ हो, तो जातिका बुद्धिमान, हँसमुख, भावुक, संवेदनशील, परिश्रमी, परोपकारी, नेक व दयालु हृदय की होती है। व्यवहार कुशल, धार्मिक विचारों से युक्त, अथिति सत्कार में तत्पर रहेगी। चर व जलीय राशि होने के कारण ये कन्या चंचल, परिवर्तनशील एवं कल्पनाशील स्वभाव की होती है। इनके जीवन मे अनेक प्रकार के उच्च नीच परिवर्तन होते रहते है। चंद्र यदि अशुभ हो तो शीघ्र क्रोधित शीघ्र शांत होने की प्रकृति रहेगी। चंद्रमाकी घटती बढ़ती कलाओं के अनुसार ही इनके स्वभाव में भी परिवर्तन होता रहेगा फिर भी ऐसी जातिका परिस्थिति अनुसार स्वयं को ढालने में सक्षम रहती है।
चंद्र मंगल व गुरु शुभ होने की स्थिति में उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त होने की संभावना रहती है। अध्यापन, गृहविज्ञान, प्रशासकीय प्रतियोगिता, मेडिकल, फैशन डिजाइनिंग, होटल मैनेजमेंट, नर्सिंग, श्रृंगार संबंधित व्यवसाय, सौन्दर्यानुभूति विशेष रूप से रहती है। प्राकृतिक सौनदयर, नृत्य, संगीत, गायन एवं कला में भी रुचि लेती है। इन्हें देश विदेश की यात्रा करने का शौक होता है। शुक्र के प्रभाव से जातिका गुणवान एवं अपने परिवार व समाज से सम्मान पाने वाली होती है।
बौद्धिक कार्यो में विशेष रुचि रहने तथा प्रकृति के नए नए विषयो को जानने की इच्छुक रहती है। ये परोपकारी व उदार हृदय रहने के बाद भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नही आने देती। ये दुसरो को भाव को शीघ्र जान लेती है फिर भी भावुक स्वभाव होने के कारण शीघ्र धोखा भी का जाती है।
मंगल, चंद्र यदि अशुभ हो तो रक्त विकार, गले, स्वास के रोग, स्नायु दुर्बलता प्रमेह, रक्त प्रदर गर्भाशय संबंधित रोग, मानसिक दबाव, हिस्टीरिया आदि रोगों की संभावना रहती है।
इनके वैवाहिक जीवन की सफलता कुंडली मे गुरु व शनि की शुभ व अशुभ स्थिति पर निर्भर करेगी। गुरु व शनि १,३,५,७,९,११ भाव में हो तो मनोवांछित जीवन साथी मिलने की संभावना रहती है। इस ग्रह योग में उच्च पदासीन अथवा सम्पन्न एवं उच्चशिक्षित जीवन साथी के योग बनेंगे, विवाह के उपरांत पति-पत्नी दोनों के लिये भाग्योन्नति होगीं। सामान्यतः कर्क लग्न की महिलाए अपने पति, बच्चो व परिवार के प्रति निष्ठावान एवं समर्पित भाव रखती है अपनी महात्त्वकांक्षाओ का भी इनके लिये त्याग कर देती हैं।
स्वास्थ्य और रोग👉 कर्क लग्न के जातक बाल्यकाल में प्रायः दुर्बल होते हैं। परन्तु आयु वृद्धि के साथ-साथ शरीर एवं स्वास्थ्य का विकास होता जाता हैं। कला पुरुष के वक्ष स्थल और पेट पर कर्क राशि वास माना जाता हैं। यदि यह राशि अशुभ ग्रह से युत या दृष्ट होतो कर्क जातक को अत्यधिक मानसिक तनाव, गुप्त चिंताएं, स्वास, खांसी, गले, कफ जन्य रोग, फेंफड़ो के रोग, स्नायु दुर्बलता, मिर्गी, पित्ताशय में पथरी आदि पेट के रोग, रक्त विकार, अनिद्रा, प्रेमह, मधुमेह, मंदाग्नि, चित्त-विभ्रम, उद्वेग तथा मानसिक एव हृदय रोगों की संभावना अधिक रहती है। कर्क जातको को उत्तेजक व तामसिक पदार्थो का सेवन से परहेज करना चाहिए। इन्हें धैर्य, सहनशीलता एवं आध्यात्मिकता को ग्रहण करना चाहिए तथा अधीरता एव अत्यधिक भावुकता को त्यागना चाहिये।
कर्क राशि/लग्न जातको की आर्थिक स्थिति शिक्षा एवं रोजगार
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
कर्क जातक की कुंडली मे चंद्र, सूर्य, मंगलादि ग्रह, शुभ भावस्थ या शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हों तो अगर लिखित व्यवसायों में से किसी एक मे विशेष लाभ व उन्नति पा सकता है। इनमे बिजली संबंधित कार्य, भूमि जायदाद क्रय-विक्रय, वस्त्र उद्योग, स्टेशनरी, स्त्री सौंदर्य संबधी, सेल्समेन-प्रतिनिधि, केमिस्ट्, कम्प्यूटर इंजीनियर, डॉक्टर, वैद्य, सर्जन, वस्त्र उद्योग क्रय-विक्रय, रेस्टॉरेंट, पेय पदार्थ(कोल्ड्रिंक, शराब)आदि, ज्यूलर्स, सिनेमा, कलाकार, कृषि उद्योग, अध्यापन, धर्म गुरु, उपदेशक, सुनार, सेना, फोटोग्राफी, गायन, संगीत, बेकर्ज, नर्सिंगहोम, होटल, फास्टफूड, फैशन डिजाइनिंग, हेल्थ क्लब, स्पोर्ट्स, यातायात, नेवी व समुद्री जहाज संबंधी, आयात-निर्यात, डिपार्टमेंटल स्टोर, लेखन, वकालात, आदि मानसिक कार्य, धार्मिक, एवं प्राचीन, सांस्कृतिक पुस्तको के प्रकाशन व स्त्री के सहयोग से चलने वाले कार्य विशेष शुभ एव लाभदायक रहते है।
आर्थिक स्थिति
〰️〰️〰️〰️〰️
कर्क जातक की आर्थिक स्थिति चंद्र, सूर्य, शुक्र एवं मंगल आदि ग्रहों पर विशेष तौर पर निर्भर करती है।यदि उपरोक्त ग्रह जन्म कुंडली, नवमांश, चलित कुंडली मे शुभ भावस्थ एवं शुभ दृष्टि हो तो ऐसे जातक की आर्थिक स्थिति अत्यंत अच्छी होगी तथा धन संपदा वाहन सुख की प्राप्ति होगी। आय के साथ साथ खर्च भी उच्च स्तरीय होंगे, पत्नी का सहयोग आर्थिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण होगा। चंद्र यदि शनि राहु के प्रभाव में हो तो जातक को शेयर सट्टे आदि के द्वारा भी धन की संभावनाए रहती है।
सावधानी👉 शेयर सट्टा लाटरी द्वारा जातक को कई बार (ग्रह स्थिति के अनुसार) हानि भी उठानी पड़ती है।
कर्क लग्न में भावानुसार ग्रहों का फल व शुभाशुभ ग्रह योग
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
सूर्य👉 २-३-५-७-९-१० एवं ११ वे भाव मे प्रायः शुभ तथा अन्य भाव मे अशुभ फल प्रदायक होता है।
चंद्र👉 २-४-५-९-१० एवं १२ वे भावो में शुभ तथा शेष भावो में अशुभ या मिश्रित फल देता है।
मंगल👉 २-४-५-९-१० एवं १२ वे भावो में प्रायः शुभ तथा शेष भावो में अशुभ या मिश्रित फल देता है।
बुध👉 १-३-५-९-११ एवं १२ वे भाव मे शुभ एव अन्य भावो में मिश्रित फल देगा।
गुरु👉 १-२-५-७-९-१०-११ भाव में शुभ तथा अन्य भावो में अशुभ फल देगा।
शुक्र👉 १-३-४-५-९-१०-११ वे भावो में शुभ तथा अन्य भावो में मिश्रित फल देता है।
शनि👉 लग्न में स्वास्थ्य, द्वितीय में धन, तृतीय में स्वास्थ्य व संतान, चतुर्थ में कार्य व्यवसाय व स्वास्थ्य के लिये हानिकारक लेकिन सवारी आदि के लिये शुभ, पंचम में संतान और छठे में शत्रु की हानि, सप्तम में शरीर कष्ट, अष्टम में धन की तंगी किंतु आयु वृद्धि, नवम में भाई के सुख में कमी, दशम में व्यावसायिक परेशानी, ११ वे में स्वास्थ्य हानि एवं संतान चिंता तथा १२ वे भाव मे धन का अपव्यय कराता है।
राहु👉 ३-६-११-१२ वे भाव में शुभ एव अन्य भावो में अशुभ माना जाता है।
केतु👉 २-५-६-९ एवं १२ भाव मे शुभ कभी मिश्रित तथा अन्य में अशुभ फल देगा।
शुभाशुभ ग्रह योग
〰️〰️〰️〰️〰️〰️
चंद्र-मंगल👉 केंद्र-त्रिकोण का संबंध होने से यह योग अत्यंत शुभ है। यह योग २-४-५-७-९-१० एव ११ वे भावो में शुभ फल देता है इस योग के प्रभाव से जातक को उच्च शिक्षा, उच्चपद, भूमि-जायदाद, संतान आदि सुखों की प्राप्ति होती है।
मंगल-शुक्र👉 केंद्र-त्रिकोण का संबंध होने से इस योग के प्रभावस्वरूप मकान, वाहन, उच्चशिक्षा, स्त्री-संतानादि सुखों की प्राप्ति, एवं जातक उच्च प्रतिष्ठित होता है। यह योग १-२-४-५-७-९-१०-११ वे भावो में विशेष फल देगा।
मंगल-गुरु👉 १-२-४-५-९ एवं १० वे भाव मे शुभ तथा अन्य भावो में मिश्रित प्रभाव करेगा। दवाइयां इंजीनियरिंग, प्राध्यापन, सेना आदि क्षेत्रों में विशेष सफलता दिलवाता है।
मंगल-शनि👉 कर्क जातक की कुंडली मे मंगल-शनि प्रायः दो परस्पर विरुद्ध ग्रहों का योग मिश्रित फलदायक रहेगा। यह १-३-५-७-९-१०-११ वे भाव मे थोड़ा अच्छा फल देगा। इंजीनियरिंग, मेडिकल, कारखाने आदि के कार्यो में सफलता मिलेगी। लेकिन अत्यंत संघर्ष व तनाव भी रहे।
चंद्र-गुरु👉 यह योग सुख समृद्धि भाग्यलाभ व उन्नति देने वाला होगा। लेकिन सफलता विघ्न बाधाओं के बाद मिलेगी।
बुध-शुक्र👉 सदोष होने पर भी यह योग बलवान है। २-४-९-१०-११ वे भावो में विशेष फलित होता है। यह योग जातक को धन, संपदा, वाहन, स्त्री आदि सुखों से युक्त तथा विवाह के बाद स्त्री से लाभान्वित करवाता है। इस योग के प्रभाव से रहन सहन पर उच्च स्तरीय खर्च होते है।
बुध-शनि👉 यह योग दोष युक्त होने पर भी बलवान है। इस योग के फलस्वरूप बृहद स्तर पर अत्यधिक व्यय करने पर ही आय के साधन बनते है।
सूर्य-मंगल👉 यह योग १-४-६-७-८-११-११२ वे भावो में अशुभ तथा २-३-५-९-१० भावो में शुभ होता है इसके प्रभावस्वरूप जातक धन-संपदा, वाहनादि सुखों से युक्त तथा पिता और सरकारी क्षेत्र से लाभ उठाने वाला होता है।
सूर्य-शनि👉 २-५-९-१० भावो में धन-स्त्री आदि की दृष्टि से शुभ परन्तु धन लाभ जैसे शुभ फल अत्यंत संघर्ष के बाद मिलते है।
कर्क कुंडली मे गुरु-शुक्र, गुरु-शनि तथा बुध-गुरु के योग शुभाशुभ अर्थात मिश्रित फल प्रदान करते है कर्क लग्न में लग्न में।चंद्र और दशम में सूर्य मेष राशि का हो तो राजयोग कारक होता है।
कर्क राशि/लग्न के जातकों के लिए दशा-अंतर्दशा का फल एवं शुभाशुभ विचार
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
कर्क लग्न में चंद्र, मंगल, गुरु व शुक्र ग्रहों की दशा अन्तर्दशाये प्रायः शुभ फल दायक होती है। शुभस्थ चंद्र मंगल की दशा अन्तर्दशा में शारीरिक सुख, धन लाभ, उच्च विद्या की प्राप्ति, भाई-बहन व पिता का सुख सहयोग मिलता है। मंगल-शुक्र में सुख साधनों की वृद्धि, ऐश्वर्य एवं सौंदर्य, संगीत-सिनेमा आदि में रुचि, मदिरा तम्बाकू आदी के सेवन में रुचि बढ़ेगी, चंद्र-गुरु की दशा अन्तर्दशा में धार्मिक कार्यो में रुचि, श्रेष्ठ एवं गुरुजनों आदि की संगत में सत्संग लाभ मिलता है। धार्मिक एवं सहभ कार्यो पर व्यय होते है।
मंगल-गुरु-शुक्रादी शुभ ग्रहों की दशाओं में मनोवांछित पद (नौकरी) की प्राप्ति, विवाह एवं संतान सुख, विदेश यात्रा आदि की संभावनाए बढ़ेंगी, यदि मंगल, गुरु शुक्र आदि अशुभ भावस्थ हो तो उपरोक्त सुख साधन और धन लाभ में कमी, विघ्न बढ़ाओ के पश्चात सोची हुई योजनाओ में असफलता मिलने के आसार बढ़ते है।
बुध, शनि, राहु, केतु, की दशा अन्तर्दशा में प्रायः अशुभ फल ही प्राप्त होते है। ध्यान रहे उपरोक्त ग्रहों के फलादेश में भाव-राशि की स्थिति तथा ग्रहों की शुभ-अशुभ दृष्टि के अनुसार फलादेश की मात्रा न्यूनाधिक भी हो सकती है।
गोचर विचार👉 ग्रहों के फलादेश करते समय गोचर ग्रहों के फल का भी विचार कर लेना चाहिए।
शुभाशुभ विचार
〰️〰️〰️〰️〰️
शुभ रंग👉 लाल, सफेद, क्रीम, गुलाबी, हल्का पीला, संतरी रंग ज्यादा अनुकूल एवं लाभदायक रहेंगे।
अशुभ रंग👉 काला, नीला, हरा।
शुभ रत्न👉 चांदी की अंगूठी में सफेद मोती अथवा चंद्रकांत मणि, विधिपूर्वक धारण करना शुभ रहेगा।
भाग्यशाली दिन👉 रविवार, सोमवार, मंगलवार व शुक्रवार शुभ व अनुकूल रहेंगे, गुरुवार मध्यम फलदायी रहेगा जबकि बुधवार यात्रा व पूंजी निवेश के लिये सामान्य शुभ रहेगा तथा सह्निवार अशुभ फल देगा।
शुभांक👉 ४-८-१ क्रमशः भगायशाली अंक रहेंगे जबकि ३ व ५ अंक इनके लिये अशुभ व २-७ मध्यम शुभ माने जाते है।
भाग्योदय कारक वर्ष👉 २४-२८-२९-३१-३७ एव ४३ वा वर्ष भाग्योन्नति कारक होगा।
〰️〰️🔹〰️〰️🔹〰️〰️🔹〰️〰️🔹〰️〰️🔹〰️〰️
कर्क लग्न की स्त्री
कर्क लग्न में जन्म लेने वाली जातिका अधिक कंठ और बात वाली गुप्त रोगिणी होती है। इसे अपने परिवार वालों से आदर व स्नेह कम मिलता है। अतः यह हमेशा आदर व प्रशंसा पाने की भूखी रहती है। इसे सुयोग्य पति नहीं मिलता अथवा पति अनमेल होता है। संतान बहुत होती है। शत्रुओं पर यह सरलता से विजय प्राप्त कर सकती है। इसका परिणाम ठीक ठीक रहता है। परन्तु इसका स्वभाव अस्थिर होता है। वह सदैव दूसरों के धन को खर्च कराने की इच्छा रखती है। प्राय: कमर दर्द बना रहता है। किसी-किसी के हृदय और नाक पर तिल होते हैं। यदि हो तो 3 पुत्र 2 कन्याएं को विशेष सुख देगी। इसको तीसरे वर्ष अग्नि से, 11वें वर्ष जल से, 18वें वर्ष बीमारी से भय रहेगा, आयु 70 वर्ष तक होती है। मृत्यु कफ या जलोदर रोग व फांसी से भी हो सकती है। कर्क लग्न वाली महिला जल विहार, जल-क्रीड़ा की शौकीन होगी। शीघ्रगामी होगी। चाल तेज होगी। संतान थोड़ी होगी। प्रकृति कुटिल होगी। कूटराजनीतिज्ञ वाली होगी। स्थूल गला, कमर मोटी, कद मध्यम होगा। धनाढ्य और मकान बहुत से होंगे। बुद्धिशाली और सेक्स की रसीली होगी यदि शुक्र नीच क होतो पदोसि मित्र य किसी मिलने वाले पंडित से या अप्ने से छोटे पुरुश से सम्बंध बनाती है । शुक्र अच्छा हो तो पति को खूब चाहेगी। कद मध्यम होगा। स्थूल शरीर की संभावना, प्रायः गौर वर्ण, विशाल आंखें, गौर वर्ण मुस्कराहट युक्त हो। वक्षस्थल प्रशस्त और हो। हाथ पैर और शरीर के अधोभाग अपेक्षाकृत स्थूल व मजबूत होंगे। नाक थोड़ी-सी दबी हुई होगी। नित्य नए कामों में व्यस्त रहने वाली ईमानदारी और न्यायशीलता में प्रसिद्ध। कुटिल पर भावुक, पैनी बुद्धिवाली परन्तु कठोर परिश्रमी होती है। पुष्ट दाम्पत्य जीवन में कलह रहेगा। परिवार में भी प्रायः मनमुटाव बना रहेगा। अति संवेदनशील स्वभाव की हो। सबका भला चाहने वाली हो। शत्रु कम रहें। सत्यप्रिय ज्यादा से छल-कपट की सीमा रहेगी। वर्ष -5-16-18-20-24 में विवाह के पूर्व कष्ट उत्तर वय में 45-50-54-56 में कष्ट अंतिम वय में 65-70-75 में कष्ट होगा। निश्चय में परिवर्तन हेतु प्रतिपल तैयार रहने वाली हो पर स्वभाव खरा व जिद्दी हो। अपनी योजनाओं की शीघ्र पूर्ति करेंगी। चाहे उसमें छल-बल-कपट सभी तरह के व्यवहार क्यों न करने पड़ें।
सहनशीलता में कमी रहेगी। भीतर से कुछ बाहर से कुछ दिखाएगी। पूर्ण स्वार्थी प्रवृत्ति 'होगी पर आत्मप्रशंसा सुनना खूब पसंद करेंगी। प्रशंसकों का काम भी कर देगी। व्यवहार में कुशलता रहेगी। ईश्वर के प्रति आस्था होगी। जनता में भी प्रशंसा पाएगी पर एक क्षण में प्रसन्न दूसरे ही क्षण रूठ जाने की कला बनी रहेगी। जीवन में उतार-चढ़ाव बहुत आएंगे। कृष्ण पक्ष की अपेक्षा शुक्ल पक्ष में जन्म लेने वाली महिला अधिक भाग्यशाली होगी। आय के अनेक स्त्रोत रहेंगे। धन के मामले में सदा सजग रहेगी। व्यक्ति कपट से भी धन कमाने में होशियार होगी और जब तक पूरा धन न मिले साथ ही प्रशंसा भी न मिले तब तक संतोष नहीं होगा। अपनी संतान पर अपार स्नेह रहेगा। स्मरण शक्ति अति तीव्र होगी। भूमि व वाहन के सुख उत्तम रहेंगे।
कर्क लग्न का सम्पूर्ण स्वभाव व्यवहार जीवनशैली
किसी जातक की जन्म कुण्डली का फलादेश बहुत कुछ उस जातक की कुण्डली के लग्न भाव की राशि, लग्नेश एवं उसकी स्थिति, लग्न भाव में स्थित ग्रह, लग्न भाव पर दृष्टि डालने वाले ग्रह, ग्रहों की युति तथा लग्न भाव की दृष्टि आदि से प्रभावित होता हैं। लोक प्रकृति, भौगोलिक एवं सामाजिक स्थितियाँ भी सम्बंधित जातक के कुण्डली फलादेश को प्रभावित करती हैं।प्रथम भाव में जब कर्क राशि हो तो जातक कर्क लग्न का होता है। कर्क का राशीश चन्द्र है इसका स्वामी चन्द्रमा है। इस लग्न को ज्योतिष शास्त्र में 'रानी लग्न' कहकर पुकारा गया है। श्रेष्ठ लग्नों में सिंह, कर्क तथा वृषभ की ही गिनती क्रमशः विशेषरूप से होती है। कर्क लग्न वाले जातकों का विवेचन करते समय हमें इस लग्न/राशि के प्रतीक चिह्न कर्क (केकड़े) तथा इसकेस्वामी चन्द्र के गुण-विशेषताओं को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। कर्क लग्न एक महत्वपूर्ण लग्न है। क्योंकि क्षत्रिय (मेष), वैश्य (वृष), शूद्र (मिथुन) के बाद यह प्रथम ब्राह्मण लग्न है और आध्यात्मिकता में प्रवेश का प्रथम सोपान कर्क लग्न से ही खुलता है। कर्क लग्न जल तत्त्व प्रधान है। अत: चंचलता के साथ शीतलता व उपकार भावना का कर्क लग्न के जातकों में विशेष रूप से समावेश रहता है। निःसंदेह ये झील, तालाब, झरने आदि के निकट रहने को पसंद करने वाले भी होते हैं।
कर्क लग्न के जातकों का स्वभाव समझने के लिए चन्द्रमा के चारित्रिक गुणों को बारीकी से समझना चाहिए और केकड़े के स्वभाव को भी। चन्द्रमा समुद्र मंथन से उत्पन्न रत्नों में से एक है और कालकूट विष तथा लक्ष्मी का सहोदर है। शिव की जटाओं में सुशोभित होता है (शीश पर)। समुद्र में ज्वारभाटे का कारक है। अत्यधिक चंचल, रसिक, कामुक, सौम्य व शीतल है। ये सभी गुण कर्क लग्न में पाए जाते हैं। कर्क लग्न के जातक सौम्य, शान्त, चंचल, रसिक, कला/सौंदर्य प्रेमी तथा कामुक होते हैं। जितना ये विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षित होने का स्वभाव रखते हैं, उतना ही उन्हें आकर्षित कर लेने का गुण भी रखते हैं। प्रौढ़/वृद्ध होने पर भी इनके चेहरे पर एक भोलापन व सौम्यता बरकरार रहती है। पक्कापन नहीं आता। ये जातक शिव की भांति ही भोले, उदार और जनहितकारी होते हैं। धन का अभाव कर्क लग्न वालों में देखने में नहीं आता। यद्यपि ये शत्रुता को भुला देने वाले होते हैं किन्तु किसी प्रबल कारण से यदि किसी से प्रतिशोध लेने पर आ जाएं तो बड़े नीतिपूर्ण एवं युक्तिपूर्ण ढंग से प्रतिशोध लेते हैं। केकड़ा जैसे किसी को नाहक परेशान नहीं करता किन्तु पकड़ ले तो उससे छूटना मुश्किल हो जाता है। उसी प्रकार कर्क लग्न वाले अपने काम से काम रखने वाले होते हैं। पर ठान लें तो अपने मनोबल से कुछ भी कर सकते हैं।
कर्क लग्न के जातक अत्यधिक संवेदनशील, अतिचंचल, संगीत व कला प्रेमी, सौंदर्य प्रेमी, मनोरंजन प्रेमी, प्रकृति (जलीय स्थान विशेष) प्रेमी, वाचाल, भावुक, ईमानदार, न्यायप्रिय, घुमक्कड़, शृंगारप्रिय (रात में ज्यादा), कवि, कलाकार, फैशनेबल, लापरवाह और कुछ ईर्ष्यालु होते हैं। इनकी ईर्ष्या डाह वाली न होकर स्पर्धात्मक होती है। ये लोग तीव्र एवं कुशाग्र बुद्धि, स्पष्ट चरित्र के होते हैं। किन्तु प्रायः कुछ सनकी, प्रतिष्ठावान होते हैं। परिवार के प्रति बहुत मोह रखने वाले और धुन के पक्के होते हैं। प्रेम-प्रसंगों में प्रायः असफल रहने वाले ये जातक अक्सर पूर्वाभास/इन्ट्यूशन की क्षमता से युक्त होते हैं।
चन्द्र व केकड़े की चारित्रिक विशेषताओं के आधार पर सहज ही कहा जा सकता है कि कर्क लग्न वाले जातक सौम्य, शांत, क्षमाशील, अस्थिर मनःस्थितीवाले, रसिकमिजाज, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित होने वाले किन्तु उन्हें अपनी ओर सहज ही आकर्षित कर लेने वाले, वशीकरण/सम्मोहक व्यक्तित्व वाले, ईर्ष्यालु और हठी होते हैं। केकड़े की पकड़ की भांति इनकी GRASPING POWER बोहोत अच्छी होती है। ये जिस काम के पीछे पड़ जाएं/ठान लें, उसे करके ही मानते हैं। नि:संदेह ये झील, तालाब, झरने आदि के निकट रहने को पसंद करने वाले भी होते हैं।जिस काम को हाथ मे लेते है उसमे डूब कर पूरी श्रद्धा निष्ठा और बारीकी पूरकरते है ।
कर्क लग्न के जातक अत्यधिक संवेदनशील, अतिचंचल, ज्योतिष, तंत्र मंत्र,संगीत व कला आध्यात्म तकनीकी क्षेत्र के ज्ञानी और वक्ता, कलाकार, अभिनेता और तिलिस्मी विध्याओ का ज्ञाता मार्तंड और नीपूर्ण प्राकृतिक प्रतिभाओ का स्वामी होता है ,रूप एवं प्रकृति संस्कृति प्रेमी, सौंदर्य प्रेमी, मनोरंजन प्रेमी, प्रकृति (जलीय स्थान विशेष) प्रेमी, विनोदी वाचाल,भावूक, ईमानदार, न्यायप्रिय, घुमक्कड़, श्रिइंगारप्रिय (रात में ज्यादा), कवि, कलाकार, फैशनेबल, लापरवाह और कुछ ईष्यालु होते हैं। इनकी ईष्या डाह वाली न होकर स्पर्धात्मक होती है। ये लोग तीन एवं कुशाग्र बुद्धि, स्पष्ट चरित्र के होते हैं। किन्तु प्रायः कुछ सनकी प्रतिष्ठावान होते हैं। परिवार के प्रति बहुत मोह रखने वाले और धुन के पक्के होते हैं। प्रेम प्रसंगों में प्रायः असफल रहने वाले ये जातक अक्सर पूर्वाभास/इन्ट्यूशन की क्षमता से युक्त होते हैं। इनका कद मंझला, छाती चौड़ी, चेहरा भरा हुआ, भुजाएं लम्बी, धड़ अपेक्षाकृत लम्बा, शरीर का रंग साफ व गोरा होता है किन्तु स्त्रियों की भांति कोमल व लचीला होता है। इनकी चाल में एक विशेष प्रकार की मस्ती या शालीनता रहती है। व्यक्तित्व आकर्षक व लुभावना होता है।
चंद्र कलाओ की भांति आपका मूड बना रहेगा, इसका अर्थ यह हुआ कि आप किसी भी बात पर बहुत जल्दी नाराज हो सकते हैं तो शीघ्र ही किसी अन्य बात पर खुश भी हो सकते हैं. कर्क लग्न जल तत्व होता है इसलिए आप अत्यधिक भावुक व्यक्ति होगें. आप दूसरों के दुख से भी जल्दी ही पिघलने वाले व्यक्ति होगें. जरा - जरा सी बात से आपका मन बेचैन व व्याकुल हो सकता है. अत्यधिक भावुक होने से आपकी भावनाएँ आपके सभी निर्णयों में शामिल हो सकती है. इसलिए कोई भी निर्णय लेने से पहले आपको एक बार विचार अवश्य कर लेना चाहिए.
आप लचीले स्वभाव के व्यक्ति होते हैं इसलिए हर तरह की परिस्थिति में स्वयं को ढ़ालने में सक्षम भी होते हैं. आप केकड़े के समान होगें अर्थात जिस प्रकार केकड़ा अपने पंजें में एक बार किसी चीज को जकड़ लेता है तब उसे आसानी से छोड़ता नही हैं. उसी प्रकार आप जिस बात को पकड़ लेगें फिर उसे नहीं छोड़ेगें. एक बार जो मित्र बन गया उसकी मित्रता के लिए जी जान भी दे देगें लेकिन जिससे शत्रुता हो गई फिर उस से अच्छी तरह से शत्रुता ही निभाएंगे.
यदि किसी व्यक्ति से आप भावनात्मक रुप से जुड़ जाते हैं तब बरसों तक आप उसे निभाते भी हैं. आप बड़ी - बड़ी योजनाओ के सपने अधिक देखते हैं लेकिन साथ ही आप परिश्रमी व उद्यमी भी होते हैं. आपको कला से संबंधित क्षेत्रों में रुचि होती है. इसके अलावा आपको प्राकृतिक सौन्दर्य से भी लगाव होता है. आपको जलीय स्थान अच्छे लगते हैं और आप भ्रमणप्रिय व्यक्ति होते हैं.
कर्क लग्न में जन्म लेने वाले जातक प्रायः राजनेता, मंत्री, राज्याधिकारी, डाक्टर, व्यवसायी, नाविक, प्राध्यापक अथवा इतिहासकार आदि क्षेत्रों को अपनी जीविकोपार्जन का माध्यम बनाते हैं। इनकी वृश्चिक, मकर एवं मीन लग्न वाले जातकों से अच्छा मित्र भाव बना रहता है। इनका कोई भी कार्य धन के आभाव में नहीं रुकता। सामाजिक कार्यों में भी धन व्यय करने हेतु सदैव अग्रणी एवं तत्पर रहते हैं। ऐसे जातक आत्म विश्वास से परिपूर्ण एवं न्याय प्रिय होते हैं। इनकी मानसिक शक्ति बड़ी तीव्र एवं मजबूत होती है।
कर्क लग्न में जन्मे जातक प्रायः गौर वर्ण के ही होते हैं, किन्तु ग्रह स्थिति के कारण अपवाद स्वरुप श्याम वर्ण के भी हो सकते हैं। इनका कद मंझोला एवं सुगठित शरीर होता है एवं आगे के दांत कुछ बड़े आकार के होते हैं। इनका मुख देखने में सुन्दर होता है। ये जातक विलासी, गतिशील, परिवर्तनशील एवं चंचल प्रवृत्ति वाले होते हैं एवं इनका हृदय उदार, स्वच्छ एवं विशाल होता है। ऐसे जातक अत्यन्त कल्पनाशील एवं भावुक प्रवृत्ति के होते है एवं भावना के वेग में ये इतना बह जाते हैं कि अपना भला बुरा तक इन्हे नहीं सूझता। यात्रा करना एवं प्रकृति प्रेम इनके स्वभाव में होता है एवं ऐसे जातक नवीन तथा जलज वस्तुओं के प्रति विशेष रुचि रखने वाले होते हैं।
कर्क लग्न में जन्मे जातक अपना कार्य बड़ी मेहनत, चातुर्य, बुद्धिमत्ता, नीतिज्ञता एवं समय अनुसार करना पसंद करते हैं। ऐसे जातक को स्त्री वर्ग से विशेष हर्ष एवं लाभ प्राप्त होता है। इनका दाम्पत्य जीवन प्रायः सुखद नहीं होता किन्तु फिर भी ये अपनी पत्नी एवं संतानो पर जान छिड़कते हैं। कुण्डली में विवाह प्रतिबन्धक योग होने पर भी इन्हें काम सुख प्राप्ति के अवसर मिलते ही रहते हैं। कर्क लग्न में जन्मे जातको को उदर, हृदय, कफ, मूत्राशय सम्बन्धी रोगों व विकारों की सम्भावना बनी रहती है।
कर्क लग्न में जन्मे जातक की जन्म कुंडली में यदि लग्न भाव में मंगल-राहु ग्रह युति बनती है तो ऐसे जातक ओछेपन की प्रवृत्ति कायम कर लेते हैं। लग्न भाव में मंगल-राहु ग्रह युति इन्हें दरिद्री एवं उदर रोगी भी बना देती है। इनके लग्न में शनि सप्तमेश की स्थिति में होता है, जिस कारण शनि ग्रह प्रारम्भ में शुभ फल एवं बाद में अशुभ फल प्रदान करता है। बृहस्पति ग्रह से इन्हे शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के प्रभाव प्राप्त होते हैं। शुक्र एवं बुध ग्रह से इनको अशुभ फल प्राप्त होता हैं। कर्क लग्न में जन्मे जातक के लिए मंगल ग्रह सर्वश्रेष्ठ फल प्रदान करने वाला ग्रह समझा गया है।इस लग्न के लोग काफी अच्छे माने गये है क्योकि कर्क लग्न देव लग्न होता है ब्राह्मण वर्ण लग्न होता है सोशल होते है राजनीती में निपुण होते है ।
कर्क लगन वालो का जो दुश्मन काफी बुद्धिमान, वेदों का ज्ञाता ,पड़ा लिखा समझदार और परफेक्ट होता है क्योकि देव गुरु बृहस्पति की धनु रही 6 भाव पर हैभगवान् श्री राम का भी कर्क लगन था और उनका दुश्मन रावण कितना समझदार हर विद्या में निपुर्ण था पंडित था आपका दुश्मन आपको विचारो की लड़ाई से हराने की कोशिश करेगा यहाँ पर आपका दुश्मन काफी ताकतवार है और यह लड़ाई जीतना आपके लिए बहुत मुश्किल है कोई बड़ा बुड्ढा या वो इंसान जिस को आपने सबसे ज्यादा प्यार किया है वही एक दिन आपसे दुश्मनी की भावना के साथ आगे आयेगा आपकी सारी कमजोरी उस को पता होगी और वो आप से बिलकुल आमने सामने की लड़ाई करेगा ।
लेकिन दुश्मन आपका तभी आप पर हावी होगा जब आप भी कही कोई गलती करेंगे या उसको ललकारे गे तो वो आपसे बे वजह नहीं उलझेगा इसलिए किसी से बेवजह पंगा लेना आपके लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
जिन लोगो का जन्म कर्क लग्न में होता है उनमे भावुकता, अपार जिज्ञासा, विलासिता, व्यापार दक्षता इनमें कूट-कूट कर भरी होती है. इस लग्न का जातक भोजन का बहुत शौकीन होता है. ऐसे व्यक्तियों को कहां कौन सी खाने की चीज मशहूर है, इन्हें इसकी जानकारी होती है. इन्हें आभूषणों के संग्रह का भी शौक होता है. कर्क वाला व्यक्ति ऐसी चीजों का संग्रह करता रहता है जो भविष्य में मूल्यवान हो सके. कर्क जातक रत्नों को एकत्र करता है भले यह रत्न वस्तु हो या फिर कोई मनुष्य.
कर्क लग्न में जन्म लेने वाले व्यक्ति एक साथ कई कार्य करने के गुण रखते हैं. इनमे मल्टीटास्किंग टैलेंट होता है. इनमें प्रबंधन की क्षमता भी जन्मजात होती है. व्यक्ति को जो लग्न मिलती है उसके पीछे जन्मों के कर्म होते हैं और जिस लग्न में भगवान राम ने अवतार लिया हो वह कोई मामूली लग्न नहीं हो सकती है. काल पुरुष की कुंडली में चतुर्थ भाव की राशि होने के कारण सुख, समृद्धि, निवास स्थान और जनसंपर्क बहुत उच्च कोटि का होता है. कुंडली में चंद्रमा अच्छी और बलवान स्थिति में हो तो ऐसा जातक बहुत ऊंचे पद पर आसीन होता है. यह एक ही समय पर कई बिंदुओं पर अपनी पकड़ बनाने में दक्ष होता है. यह व्यक्ति अगर किसी को एक बार मन से पकड़ ले या कोई लक्ष्य निर्धारित कर ले तो उसे दुनिया की कोई ताकत छुड़ा नहीं सकती है. इनमें एक बात विशेष होती है, यह एक चीज छोड़ने से पहले दूसरी चीज पर अपना लक्ष्य साध लेते हैं.
यह अपने सेवकों और चहेतों की उन्नति में हमेशा तत्पर रहते हैं. यह जातक कुशल राजनीतिज्ञ होता है. यह अपनी विपरीत परिस्थिति और समय की नजाकत को देखते हुए नरम हो जाते हैं. कर्क लग्न वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व बहुत खुला नहीं होता है. इसके दिमाग में क्या चल रहा है इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है. इन लोगों का उद्देश्य सब को नहीं पता चल पाता है. कर्क लग्न वाले जातक के ध्येय की भनक उनके खास लोगों तक को नहीं हो पाती है. यह अपने शत्रुओं को कभी नहीं भूलता, शत्रुओं को अपने लक्ष्य पर ही रखता है. इन लग्न के जातकों में एक सबसे खास बात होती है कि इन में जानवरों के हावभाव को समझने तक की क्षमता हो सकती है. इन्हें पशु पक्षियों से विशेष प्रेम होता है. इन लग्न के व्यक्ति से हनुमान जी बहुत प्रसन्न रहते हैं और जीवन में यही बहुत इन लग्न वालों को देते हैं. मंगल इन लोगों के लिए परमकारक होता है.
इस लग्न के जातकों को घूमने में बहुत मजा आता है. बैठे-बैठे अचानक बाहर जाने का कार्यक्रम बना लेना इनके बायं हाथ का काम है. इन्हें अपने ड्राइंग रूम को सुसज्जित रखने की प्रबल इच्छा रहती है. इन जातकों का जनसंपर्क भी बहुत ज्यादा होता है. भगवान राम की कुंडली भी कर्क लग्न की थी. कर्क लग्न वाले के मन में इच्छा होती है कि उसके कई मकान हों. लग्न में मंगल बैठा हो या फिर लग्न को देख रहा हो तो व्यक्ति की काया बड़ी होती है. यह अति बुद्धिमान, जलविहार का शौकीन होता है. कर्क लग्न का पुरुष जातक अपनी पत्नी से प्रेम करने वाला उसकी बात का पालन करने वाला होता है. देखा गया है कि इस लग्न में जन्मे जातक की चाल सामान्य नहीं होती है. ग्रहों की गति के अनुसार कभी-कभी यह बहुत जल्दी-जल्दी हिरन की तरह और कभी-कभी हाथी की तरह मस्त चाल में चलने लगते हैं. कर्क लग्न वाले के दिमाग में हमेशा कुछ ना कुछ चलता ही रहता है.
कर्क लग्न वालो की शादीशुदा ज़िन्दगी में काफी तनाव होता है क्योकि 7 वे भाव का स्वामी शनि और लग्न का स्वामी चंद्रमा दोनों मे विचारों का मदभेद रहता है और अगर शनि पॉप प्रभाव में हुआ तो शादी बहुत लेट कराता है या फिर उनके पति के कई जगह किसी और से रिलेशन देखे गये है कारण है क्योकि 5 भाव प्रेमी प्रेमिका का भाव है उसकी उच्च राशि 7 भाव में है 5 भाव का स्वामी 7 भाव को देखकर ललचाता है इसलिए अच्छे से कुंडली मिलाकर शादी करना।
जब कुंडली में 6 भाव का स्वामी नीच होगा या फिर अस्त होगा तो आपके दुश्मन कमजोर होंगे फिर उनसे आपको ज्यादा खतरा नहीं है ।या फिर लगन और लग्नेश बहुत बलवान हो तो आप अपने दुश्मन से जीत जाओगे नहीं तो फिर राह आसान नहीं।
कर्क लग्न वाले जातक के ध्येय की भनक उनके खास लोगों तक को नहीं हो पाती है. यह अपने शत्रुओं को कभी नहीं भूलता, शत्रुओं को अपने लक्ष्य पर ही रखता है. इन लग्न के जातकों में एक सबसे खास बात होती है कि इन में जानवरों के हावभाव को समझने तक की क्षमता हो सकती है. इन्हें पशु पक्षियों से विशेष प्रेम होता है. इन लग्न के व्यक्ति से हनुमान जी बहुत प्रसन्न रहते हैं और जीवन में यही बहुत इन लग्न वालों को देते हैं. मंगल इन लोगों के लिए परमकारक होता है.
कर्क लग्न वाले जातक के ध्येय की भनक उनके खास लोगों तक को नहीं हो पाती है. यह अपने शत्रुओं को कभी नहीं भूलता, शत्रुओं को अपने लक्ष्य पर ही रखता है. इन लग्न के जातकों में एक सबसे खास बात होती है कि इन में जानवरों के हावभाव को समझने तक की क्षमता हो सकती है. इन्हें पशु पक्षियों से विशेष प्रेम होता है. इन लग्न के व्यक्ति से हनुमान जी बहुत प्रसन्न रहते हैं और जीवन में यही बहुत इन लग्न वालों को देते हैं. मंगल इन लोगों के लिए परमकारक होता है.
कर्क लग्न वाले जातक के ध्येय की भनक उनके खास लोगों तक को नहीं हो पाती है. यह अपने शत्रुओं को कभी नहीं भूलता, शत्रुओं को अपने लक्ष्य पर ही रखता है. इन लग्न के जातकों में एक सबसे खास बात होती है कि इन में जानवरों के हावभाव को समझने तक की क्षमता हो सकती है. इन्हें पशु पक्षियों से विशेष प्रेम होता है. इन लग्न के व्यक्ति से हनुमान जी बहुत प्रसन्न रहते हैं और जीवन में यही बहुत इन लग्न वालों को देते हैं. मंगल इन लोगों के लिए परमकारक होता है.
ये कल्पनाजीवी, अस्थिरचित्त तथा भावनाओं से संचालित होते हैं। शीघ्र ही उत्तेजित व शांत हो जाते हैं व्यावहारिकता के मामले में कुशल नहीं कहे जा सकते। प्रायः जल से उत्पन्न वस्तुओं के कारोबार या चन्द्र सम्बन्धी कार्यों के माध्यम से आजीविका कमाने वाले, नीतिकुशल होते हैं। राजनीति, डॉक्टरी, अध्यापन, नौका चालन कला, संगीत या शृंगार सम्बन्धी व्यवसायों में ये अधिक पाए जाते हैं। इन्हें वृश्चिक, मकर तथा मीन लग्न के जातकों की मित्रता शुभ रहती है। उदर, हृदय, मूत्र संबंधी रोग एवं शीत रोग या कफ रोगों की सम्भावनाएं इनको अधिक होती हैं।
कर्क लग्न के जातकों को निर्णय लेने में देर लग सकती है। किन्तु इनके निर्णय सटीक होते हैं। ये लोग छोटी-छोटी बातों को भी दिल में रख लेने वाले होते हैं और अक्सर उन बातों को मौन रूप से छिपाए रहते हैं। जब क्रोध आता/विस्फोट होता है तब महीनों या दिनों पुरानी उन शिकायतों को कहते हैं और जब तक कह नहीं लेते तब तक मन ही मन उन बातों को लेकर स्वयं घुटते रहते हैं। यह कर्क लग्न वालों की एक विशेषता है। वैसे इनका परामर्श बड़ा सृजनात्मक होता है। किन्तु इन पर 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' को कहावत फिट बैठती है। कर्क लग्न के जातक सौम्य व शांत स्वभाव के होने से बहुत कम क्रोधित। होते हैं। होते भी हैं तो अपने क्रोध को अपने में ही सीमित रखते हैं, दूसरे पर प्रकट नहीं करते। करते हैं तो बहुत दिनों बाद किसी अन्य अवसर पर शिकायत के रूप में प्रकट करते हैं।
ये लोग लडाई-झगडे से दूर रहने वाले तथा धीमे स्वर में बात करने वाले होते हैं। अक्सर ये लोग ऊंची आवाज में बोलने वालों को पसंद नहीं करते। किन्तु जब भिड़ा जाए तो जाए तो ये जोरदार प्रभावी आवाज और शब्दो के साथ कल्पनाशीलता के साथ जीवन के बारीक पहलुओ को रख कर बुद्धिमता और दिव्यवानी से आप को बहस मे हारा देंगे, और आप उनकी तार्किक वाणी और ओजस्विता से हारने के बाद भी अभिभूत ङ्गे और ओ अच्छे गुरुओ और मार्गदर्शकों की श्रेणी मे मानेंगे। ये लोग दूसरों के प्रति प्रेम व सहयोगपूर्ण व्यवहार रखते हैं। दूसरों कीतकलीफ देखकर शीघ्र पिघल जाने वाले तथा अपनी सीमा से बाहर जाकर भीउनका सहयोग करने का प्रयास करने वाले होते हैं। ये एक बालक की भौति भोले और निष्कपट होते हैं। दूसरों की बुराइयों पर विशेष ध्यान नहीं देते। उसे नजरअंदाजकर देते हैं। कर्क लग्न वालों का भाग्य प्राय: उत्तम होता है। पर पाचनशक्ति प्रायः कमजोर होती है। उदर रोग डकार और हृदय रोग सम्भावित होते हैं। विशेषकर शनि की साढ़ेसाती में। अथवा शनि जब कर्क राशि से गुजरता है तो इनको अधिक तकलीफ देता है। प्रायः ।यह कष्ट शारीरिक होता है किन्तु कई बार किसी निकट सम्बन्धी की मृत्यु आदि । कारणों से इनकी भावनात्मक अवस्था या मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है। कर्क लान वाले जातक जिद पर आ जाएं तो प्राय: असम्भव को भी वे सम्भव बना डालते हैं। जीवन के प्रति इनका दृष्टिकोण भी कभी नकारात्मक नहीं होता। शीट आद्रा व ठंडे स्थानों पर रहना इन्हें पसंद होता है। ऐसे स्थानों पर रहना इनके भाग्य के विकास तथा मन की शांति के लिए जरूरी भी होता है। ऐसा भी प्राय: देखा गया है कि इनको जन्म स्थान से दूर जाने पर सफलता की प्राप्ति होती है। कर्क लग्न के जातक अपने बाल्यकाल की पुरानी व छोटी बातों को भी स्मरण रखते हैं। यह उनकी विशेषता होती है। क्योंकि मेरा स्वयं का लग्न कर्क है। अत: मैंने इस लग्न के जातकों के अध्ययन में विशेष रुचि रखी है। मेरे अनुभव से कर्क लान के जातकों में कुछ विशेषताएं और भी देखने में आई हैं, जो इस प्रकार हैं-
कर्क लग्न वालों का मस्तिष्क विचारों से नहीं भावनाओं से प्रेरित होता है। एक बार जिससे धोखा खा चुके हैं उसे भी तकलीफ में देखें तो उसकी सहायता को तैयार हो जाते हैं। पशुओं के प्रति इन्हें विशेष करुणा रहती है। चन्द्रमा जिस प्रकार घटता-बढ़ता रहता है, उसी प्रकार इनकी मनोवृत्ति भी बहुत तेजी से बदलती।रहती है। ये मूड में आ जाएं तो अपनी सामर्थ्य से भी अधिक परिश्रम लगातार करते चले जाते हैं और थकते नहीं, किन्तु मूड न बने तो इनके छोटे-छोटे काम भी दिनों तक यं ही पड़े रहते हैं। इसी प्रकार न डरें तो ये लोग शेर से भी न डरें और डर जाएं तो चहे से भी डर जाएं-ऐसे होते हैं। विशेषरूप से तब जब इनकी गलती हो, ये विरोध नहीं करते और तुरंत क्षमा मांग लेते हैं। किन्तु इनकी गलती न हो तो ये पूरा विरोध करते हैं। ये लोग अपने मनोबल व बुद्धिबल से जीवन की विकट स्थितियों पर भी काबू पा लेते हैं और अमावस को पूर्णिमा में बदल देते हैं। कई लग्न वालों से कुछ घंटे बात की जाए तो ये आपको अपने बचपन की कल बा।अवश्य किसी संदर्भ में बताएंगे। चन्द्रमा क्योंकि बचपन का कारक होता है। अतः इन जातकों पर उम्र भर बच्चों की तरह मासूमियत का प्रभाव रहता है।
बीती हुई बातों को भी विस्तार से इस प्रकार कहना मानो वह अभी-अभी हो।रही हो, कर्क लग्न वालों की ऐसी विशेषता होती है। कर्क लग्न वाले आस्तिक व । धर्मभीरू होते हैं। इन्हें किसी भी काम को करने की कोई जल्दी नहीं होती। ये। जल्दबाज बिलकुल नहीं होते और प्रायः समय के पाबंद होते हैं। शब्दों व सिद्धांतों का मान रखने वाले होते हैं। यानी कमिटमेंट पूरी करने वाले तथा सिद्धांतों के लिए अड़ जाने वाले होते हैं। यही वजह इन्हें कभी-कभी सनक की स्थिति तक भी ले जाती है। कर्क लग्न के जातकों में स्वप्न द्वारा या कभी-कभी यूं ही बैठते-चलते । भविष्य सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त कर लेने की क्षमता भी बहुत बार देखी गई है। इनके। जीवन में भावना का महत्त्व धन, यश या किसी भी वस्तु से बहुत अधिक होता है। न्यायप्रियता की हद यह होती है कि न्याय के लिए अपने प्रिय/सम्बन्धी/मित्र को छोड़कर अपरिचित का पक्ष लेने में भी नहीं हिचकते। कर्क लग्न के जातकों का स्वभाव समझने के लिए चन्द्रमा के चारित्रिक गुणों को बारीकी से समझना चाहिए और केकड़े के स्वभाव को भी। चन्द्रमा समुद्र मंथन से उत्पन्न रत्नों में से एक है और कालकूट विष तथा लक्ष्मी का सहोदर है। शिव की जटाओं में सुशोभित होता है (शीश पर)। समुद्र में ज्वारभाटे का कारक है। अत्यधिक चंचल, रसिक, कामुक, सौम्य व शीतल है। ये सभी गुण कर्क लग्न में पाए जाते हैं।
ये लोग हरफनमौला होते है । जिस काम को दखते है सुनते या अनुभव करते है उसमे कर थोड़े ही समय मे नीपूर्ण होजाते है, किसी संस्था के रिक्रूटमेंट मैनेजर, फ़ैक्टरि के operations मैनेजर, या कंसल्टेंट होते है.
उच्च कोटी के मनोवैज्ञानिक, ब्रांहांड के रहस्यो को बारीकी से जाननेवाले, प्रकृतिक वैज्ञानिक और इंजीनियर होते है और ये किसी डिग्री के मोहताज नहीं होते बल्कि बुद्धि ज्ञान शास्त्र कल्पना एकाग्रता तकनीक गति सटीकता निपूर्नता अभ्यास अनुभव प्रज्ञान और देवीय कृपा से पूर्ण ज्ञानी होते है
ये अच्छे ज्योतिष, कर्मकांडी तांत्रिक वैज्ञानिक वक्ता mentor, healer, वैद्य गायक संगीतज्ञ वकील, स्कूल कॉलेज या स्पिरितुयलसाइन्स के खोजी या करता बनते है । ये शस्त्र शास्त्र मे नीपूर्ण तांत्रिक रहस्यो और पूरातत्वी भी होते है । इनका दिल विशाल किन्तु गहरा होता है और मन हृदय बुद्धि विवेक एक साथ चलते है जो इन्हे पेर्फ़ेक्ट बनाते है और कई प्रतिस्पर्धात्मक शत्रु और ईर्ष्याद्वेषी प्रतिद्वंदी बनाते है । ये रूढ़िवादी नहीं होते और किताबो के शौकीन होते है और उनको सबसे अच्छा गिफ्ट ये ही है । ये किताब की आत्मा को पढ़ लेते है i ये परंपरावादियों और लकीर के फकीरो को चुनौती देते है। रूढ़ियो और पाखंडी ढकोसलो से दूर रहते है और प्रेकटिकल और वैज्ञानिक अप्रोच बात को जीवन से जोड़कर प्रस्तुतकरते है से जनता को बोहोत भाता है और ये एक लाइफ कोच या लाइफ मेनजमेंट गुरु के रूप मे स्थापित हो जाते है और अच्छे कौन्स्लेर्स बन जाते है विशेषकर महिलाओ मे अधिक लोकप्रिय होते है क्यूकी ये उनके मन को बारीकी से समझते है इनमे स्त्रियो की व्याव्हारिक कोमलता मनोवैज्ञानिक निपूर्न्ता और कला के साथ साथ पुरुष का पुरुषार्थ, गांभीर्य और मार्मिक मौलिकता का मिश्रण होता है ।
कर्क लग्न के जातक सौम्य, शान्त, चंचल, रसिक, कला/सौंदर्य प्रेमी तथा कामुक होते हैं। जितना ये विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षित होने का स्वभाव रखते हैं, उतना ही उन्हें आकर्षित कर लेने का गुण भी रखते हैं। प्रौढ़/वृद्ध होने पर भी इनके चेहरे पर एक भोलापन व सौम्यता बरकरार रहती है। पक्कापन नहीं आता। ये जातक शिव की भांति ही भोले, उदार और जनहितकारी होते हैं। धन का अभाव कर्क लग्न वालों में देखने में नहीं आता। यद्यपि ये शत्रुता को भुला देने वाले होते हैं किन्तु किसी प्रबल कारण से यदि किसी से प्रतिशोध लेने पर आ जाएं तो बड़े नीतिपूर्ण एवं युक्तिपूर्ण ढंग से प्रतिशोध लेते हैं। केकड़ा जैसे किसी को नाहक परेशान नहीं करता किन्तु पकड़ ले तो उससे छूटना मुश्किल हो जाता है। उसी प्रकार कर्क लग्न वाले अपने काम से काम रखने वाले होते हैं। पर ठान लें तो अपने मनोबल से कुछ भी कर सकते हैं।अब अपने अनुभव को छोड़ ज्योतिष के शास्त्रीय तथ्यों पर पुनः लौटते हैं।चन्द्रमा स्वप्रकाशित नहीं है। परन्तु मन का कारक है। सूर्य (जिसके प्रकाश से चन्द्र प्रकाशित होता है) ब्रह्मांड का नेत्र है। नेत्र से जो दीख नहीं पाता वह मन की आंख देख पाती है। अत: चन्द्रमा की शक्ति मन या ब्रह्मांड की गहनता में छिपे भेद भी उजागर कर सकने में समर्थ है। सम्भवतः इसी कारण कर्क लग्न के जातकों में अन्तर्ज्ञान की प्रवृत्ति पाई जाती है। यदि चन्द्रमा क्षीण न हो तो कर्क लग्न के जातकों का मनोबल भी अत्यंत विकसित होता है। सम्भवतः इसीलिए लाल किताब में कर्क लग्न को आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करने का प्रथम द्वार माना गया है।
यदि कर्क लग्न में गुरु लग्नस्थ हो तो (उच्च का होने के कारण) जातक धर्मात्मा, धार्मिक, विद्वान तथा परिष्कृत होता है। ऐसा जातक धर्म प्रचारक या उच्च धर्म पथ प्रदर्शक बन सकता है। यदि लग्न में चन्द्रमा हो तो जातक गोरा, बहुत सुन्दर, आकर्षक, घुमक्कड़ परन्तु लापरवाह/कामों को टालने वाला, श्रृंगारप्रिय और स्त्रेण स्वभाव का होता है। वह रजोगुण प्रधान होता है। यदि चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में हो तो उच्च का होने से इन फलों में वृद्धि करता है तथा जातक का यश व धन और भी अधिक बढ़ते हैं। जातक स्वावलम्बी होता है। किन्तु कर्क लग्न में चंद्रमा सातवें भाव में हो तो जातक पत्नीभक्त होता है और उसे पत्नी भी काली-कलूटी मिलती है।रोग ज्योतिष के अनुसार कर्क लग्न में चंद्र नीच का हो (पंचमस्थ) तो जलोदर रोग होता है। कर्क लग्न वाले जातकों को चंद्र निर्बल व पापाक्रांत हो तो फेफड़ों, रक्त तथा छाती के रोग देता है। कफ़ व शीत के रोग भी देता है। राहू या शनि का चन्द्र पर प्रभाव हो तो क्षय/टी.बी., कैंसर व चित्तभ्रम आदि रोग होते हैं। विशेष (रोग)-कर्क लग्न में यदि लग्नेश चन्द्र आठवें भाव में हो अथवा छठे भाव में हो तो जातक रोगी रहता है।
यदि आठवें भाव में चन्द्रमा शनि से युतिकर रहा हो तो जातक प्रेतबाधा या शत्रुओं से पीड़ित होकर अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। कर्क लग्न में शनि के साथ राहू या केतु यदि दसवें भाव में हो औरचन्द्रमा निर्बल या पापाक्रांत हो तो जातक की माता की मृत्यु या जातक को मातृसुखका अभाव हो जाता है। चतुर्थ भाव, चतुर्थश, लग्न व लग्नेश पापाक्रांत हो तोमातृसुख में बाधा होती है तथा जातक को छाती के रोग निश्चित रूप से होते हैं। यदि चन्द्रमा के साथ राहू चतुर्थ भाव म हा आर कर्क लग्न भी पाप प्रभाव में हो तो जातक को चित्तभ्रम, वहम, भयभात रहना या ऊपरी हवा आदि की पूर्ण सम्भावनाएं होती हैं। कर्क लग्न व लग्नेश (चन्द्र) दोनों पापग्रहों के मध्य हों, सप्तम भाव भी पापग्रह से युक्त हो तथा सूर्य निर्बल हो तो जातक जीवन से निराश होकर आत्महत्या कर लेता है। ऐसा लाल किताब का मत है। कर्क लग्न हो, चन्द्रमा पापग्रहों के साथ ही, शनि सप्तमस्थलीनदेवशाप से या शत्रु से पीड़ित रहता है। अथवा दूसरे भाव में सूर्य तथा चौथ भाव में पापग्रह हों तो जातक को अति कष्टप्रद जीवन जीना पड़ता है।
कर्क लग्न हो, चौथे भाव में सूर्य, आठवें में गुरु, बारहवें भाव में तथा चन्द्र पर शुभ दृष्टि न हो तो जातक जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता कर्क लग्न हो, दूसरे या बारहवें भाव में पापग्रह हो, चन्द्र निर्बल होनालग्न, द्वितीय व द्वादश भाव पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो 32 वर्ष की आदत सम्भव होती है।। कर्क लग्न में सूर्य सप्तमस्थ हो तो जातक को नेत्र रोग होता है। दया लालकिताब का मत है।अतिविशेष (स्त्री जातक)-कर्क लग्न में बुध यदि तीसरे भाव में होती स्त्री जातकों को व्यभिचारिणी बनाता है। यदि शुक्र भी साथ ही तो निश्चित रूपसे-ऐसा मेरे सुयोग्य आचार्य श्री कौशिकजी का मत है (वैसे लगभग एक दर्जनस्त्री जातकों की कुंडलियों में मैंने पाया है कि कर्क लग्न में शनि सातवें भाव में हीतो स्त्री जातकों के स्तन बड़े परन्तु लटके हुए होते हैं और उनके पति व्यभिचारीतथा अल्प कामशक्ति वाले होते हैं। परन्तु अभी और अध्ययन करने पर हीनिश्चित सिद्धांत बनाया जा सकता है)।कर्क लग्न हो, चन्द्र शुक्र व शनि की युति दःस्थानों में हो तो जातक की मृत्यु वाहनदुर्घटना में होती है। कर्क लग्न, चतुर्थस्थ पापग्रह, चतुर्थेश पापग्रहों के बीच हो तो जातक कोहृदय रोग होता है। अथवा शुक्र शनि के साथ अष्टम भाव में हो तो भी हृदय रोग होता है। अथवा चौथे भाव में शनि, षष्ठेश सूर्य के साथ पापग्रहों के बीच हो तो भी जातक को हृदय रोग होता है। या फिर शनि चौथे भाव में तथा सर्य आठवें भाव न हो तब भी जातक को हृदय रोग होता है।कर्क लग्न हो, चौथे भाव में राह पापग्रहों से दृष्ट हो और चन्द्रमाहो तो जातक को हार्टअटैक होता है। यदि सर्य वृश्चिक राशि में (पांचवे भाव दो पापग्रहों के साथ हो तो जातक हार्ट अटैक से मरता है।
इस राशि मे गुरु उच्च और मंगल नीच का होता है। जातक हस्वकाय, कुटिल स्वभाव, स्थूल शरीर, स्त्रियो के वशीभूत, धनिक, जलाशय प्रेमी, मित्र द्रोही, शत्रुओ से पीड़ित, कन्या संतति वाला, व्यापारी, स्वस्थान त्यागकर अन्य स्थानवासी, 16-17 की उम्र में भाग्योदय प्राप्त करने वाला, व्यसनी होता है। 5, 25, 40, 48, 62 वे वर्ष मे शारीरिक कष्ट होते है। 18, 22, 28, 32, 42, 48 वे वर्ष मे सफलता, उन्नति, लाभ होता है।
प्रायः इस लग्न वालो को दाम्पत्य जीवन का पूर्ण सुख नही मिलता है। एकादश भाव-लग्नकुंडली में ग्यारहवेमें सूर्य हो तो जातक शक्तिवान, यह चर लग्न की राशि है यानि ये चलने के शौकीन घुमकड होते है और अथिर स्वभाव के होते है केकड़ा इंका प्रतीक चिन्ह है यानि ये जल से जुड़े हुवे लोग होते है जल तत्व प्रधान होता है मानव मन के मनोविज्ञान को ये सबसे ज़्यादा समझते है इंका स्वामी चन्द्र है इंका स्वभाव सौम्य होता है किन्तु जब क्रोध आए तो ये तर्क कुतर्क या बहसबाजी पे उतार आते है ओर फिर उन्न बातों को भी बोलते है जो इनहोने नोट की थी या आपकी पुरानी गल्तियो के डाव पेच मे दाल कर आपको दलीलों से हरादेंगे किन्तु ये शत्रु नहीं रखते उनको माफ करदेते है येही इनको सभी से अलग बनाता है अगर ये पुरुष है तो ये पुरुष होने के साथ साथ स्त्री के मन की मनोदशा को भी समझते है ओर मिश्रित ओर सम भाव से आकलन करते है स्त्रियो के प्रति विशेष आकर्षण होता है ओर स्त्री का भी इनके जीवन मे अप्रतिम योग्दान होता है इसी कारण ये पुरुषोत्तम कहलते है इस लग्न को आध्यात्म मार्ग मे श्रेष्ट लग्न कहा गया है
ये जन्म जात तांत्रिक ओझा या भविष्यवक्ता, योगी धर्म प्रचारक उधघोषक,आध्यात्म तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष योग पदार्थो का ज्ञान पारलोकिक शक्ति भूत प्रेत या पारलोकीक विषयो के मर्मज्ञ होते है यज्ञ शक्ति उपसना ओर तकनीकी, इंजीन्यरिंग कानून ज्योतिष के जान कार के र्रोप मे प्रख्यात होते है जातक कुछ टेढ़ा होकर जल्दी चलने वाला कमर के किनारो पर उचे मास वाला, भाग्य को जाननेवाल अर्थार्थ ज्योतिषी अथवा ज्योतिष मे रुचि रखने वाला कई मकानो का मालिक औसत छोटे कद वाला बड़ा चेहरा मोटी गर्दन वाला अच्छी बोली आवाज़ वाला, कुशल गायक संगीतज्ञ, प्रकृतिक विध्याओ से लेस ओर आकर्षण से भरपूर होगा जनता उसकी बातों को बोहोत रुचि आकर्षण से सुने याद रखे अप्रतिम गायक ज्योतिष वकील उद्घोषक वक्ता तांत्रिक राजनीतिज्ञ मंत्री या जननायक होता है इनकी कल्पना शक्ति बोहोत तेज़ होगी ओर ये इस्स शक्ति का भरपूर प्रयोग भी करेंगे जिससे ये घटना के होने का पूरा डेमो अपनी मशतिष्क मे बनालेंगे ओर होगा वैसा ही इसलिए इनकी बातों को कभी न नकारे क्योकि इनके मुख से स्वयं विधाता बोलता है। ये जो बोलते है वो सिद्ध होजता है ।
इनको रोग पालने की ओर असंभावित रोग होने का भय लगा रेहता है, इनके अंदर एक छोटा बच्चा हमेशा जीवित रहेगा ओर उसी के कारण ये सदैव जीवंत ओर ऊर्जावान बने रहेंगे न्यायप्रिय भी होते है, खाने के शौकीन होते है किन्तु विविधता बारीकी ओर रासो की पूर्ण जानकारी रखते है ये कूकिंग एक्सपेर्ट भी होंगे और अच्छा खाना बनाने के माहिर किन्तु अल्पभोजी यानि स्वाद के शौकीन नाकी बोहोत खाने के शौकीन भावुक होते ओर प्रेम ओर निश्चल ममता रखते है प्रेम का प्रदर्शन न कर के उसको निभाने ओर उसको जीकर दिखते है देहिक प्रेम से परे ये आत्मिक ओर मानसिक प्रेम ओर भावनात्मक प्रेम मे आनंद महसूस करते, ये दुखी होकर भी स्थिति को संभालने की शक्ति रखते है ओर अपनी हताशा ओर निराशा किसी को नहीं बताते है किन्तु आपात स्थिति मे ये संकट मोचक की तरह उभरकर आते है ओर वो सभी कर्म पूर्ण निष्ठा गुनवत्ता और बारीकी से कर सकते है ओर विपरीतस्थिति के अनुरूप हो जाते है बिना जताए ओर बोले कर्मयोगी होते हैl
जीवन मे भौतिक सुख संसाधनो को ये स्वपरिश्रम तथा पराक्रम से अर्जित करने मे समर्थ रहते है तथा सुख पूर्वक इनका उपभोग करते है, नयी तकनीक के पहले खरीदार होते है साथ ही इनमे समाज या देश की सेवा की भावना भी विध्यमान होती है ये देश प्रेमी होते है और रसत्र के लिए त्याग बलिदान करसकते है ये अन्यजनों की आंतरिक भावनाओ को समझने मे दक्ष ओर सिद्ध हस्त होते है तथा राजनीतिक या सरकारी क्षेत्र मे किसी सम्मानित पद को प्रपट करने, मान प्रतिस्ठा एवं प्रसीशी अर्जित करते है
ये एक बुद्धिमान पुरुष होंगे तथा अपने सांसारिक शुभ एवं महत्वपूर्ण कार्यो को बुद्धिमता एवं परिश्रम से सम्पन्न करेंगेआर्थिक रूप से सुदृढ़ रहेंगे ओर अच्छा ओर प्रचूर मात्र मे धनार्जन होता रहेगा
जीवन मे आपको उतार चढ़ाव का सामना करने पड़ेगा परंतु समस्त समस्याओ का सामना तथा समाधान आप सुदृढ़ता पूर्वक करेंगे तथा विषम परिस्थितियो मे भी साहस नह छोड़ेंगे इसके अतिरिक्त समाज मे आपका प्रभाव रहेगा ओर काफी अछि प्र्तिस्ठा प्रपट कर लेंगे
आपकी बोली सभी प्रश्नो का उत्तर देने वाली शांति देने वाली ओर सुलझरे कराने वाली होगी लोग आपके विवेचन व्याख्यान की प्रतीक्षा करेंगे श्रेस्ठ एवं उत्कृस्ठ कार्यो को करने मे आपकी रुचि रहेगी ओर प्रकृति से जुड़े रहस्यो को जाना समझना ओर प्रतिपादन करने के ओर सदैव अग्रसर रहेंगे जीवन मे आगे बढ्ने की स्टैंडर्ड बढ़ाने की इनकी भावना रेही है ये प्रतिस्पर्धात्मक पूर्ण व्यवहार करते है ओर अच्छे से और अच्छा करने की कोशिश ओर सिद्धि रखते है।
कर्क लग्न की हस्तियाँ
श्रीराम, अर्जन, भीस्म, महर्षि अरविंद घोष, गौतम बुद्ध, आध्याशंकरचार्य, मदन मोहन मालवीय, रामानुजाचार्य, वीवीएस लक्ष्मण, सम्राट विक्रमादित्य, महाराज युधिस्थिर, श्री राम, वीरवर अर्जुन, राजा हरीशचन्द्र, सद्दाम हुसैन, जवागल श्रीनाथ, जवाहरलाल नेहरू, मोतीलाल नेहरू, चंगेज़ खान, एम करुणानिधि, सरदार वल्लभ भाई पटेल, किशोर कुमार, एच डी देवगौड़ा, मेंनका गांधी, इंद्रा गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, महाराजा रणजीत सिह, प्राइस चार्ल्स, जाइप्रकाश नारायण, डॉक्टर अब्दुल कलाम, वी पी सिह,आइ के गुजराल, जॉर्ज बुश, वसुंधरा राजे, नेल्सन मंडेला, मिखाइल गोर्बछोव, लोकमानी तिलक, मायावती, मोहन छंगाणी, अयुब खान, नजमा हेप्तुला, अनिल कुंबले, बिल क्लिंटन, राजकपूर, हेममालिनी, वीरेंद्र सहवाग, कुमार मंगलम बिरला, गोविंदा, अजय देव्गन
इनका कद मंझला, छाती चौड़ी, चेहरा भरा हुआ, भुजाएं लम्बी, धड़ अपेक्षाकृत लम्बा, शरीर का रंग साफ व गोरा होता है किन्तु स्त्रियों की भांति कोमल व लचीला होता है। इनकी चाल में एक विशेष प्रकार की मस्ती या शालीनता रहती है। व्यक्तित्व आकर्षक व लुभावना होता है।ये कल्पनाजीवी, अस्थिरचित्त तथा भावनाओं से संचालित होते हैं। शीघ्र ही उत्तेजित व शांत हो जाते हैं। व्यावहारिकता के मामले में कुशल नहीं कहे जा सकते। प्रायः जल से उत्पन्न वस्तुओं के कारोबार या चन्द्र सम्बन्धी कार्यों के माध्यम से आजीविका कमाने वाले, नीतिकुशल होते हैं। राजनीति, डॉक्टरी, अध्यापन, नौका चालन कला, संगीत या शृंगार सम्बन्धी व्यवसायों में ये अधिक पाए जाते हैं। इन्हें वृश्चिक, मकर तथा मीन लग्न के जातकों की मित्रता शुभ रहती है। उदर, हृदय, मूत्र संबंधी रोग एवं शीत रोग या कफ रोगों की सम्भावनाएं इनको अधिक होती हैं।
कर्क लग्न के जातकों को निर्णय लेने में देर लग सकती है। किन्तु इनके निर्णय सटीक होते हैं। ये लोग छोटी-छोटी बातों को भी दिल में रख लेने वाले होते हैं और अक्सर उन बातों को मौन रूप से छिपाए रहते हैं। जब क्रोध आता/विस्फोट होता है तब महीनों या दिनों पुरानी उन शिकायतों को कहते हैं और जब तक कह नहीं लेते तब तक मन ही मन उन बातों को लेकर स्वयं घुटते रहते हैं। यह कर्क लग्न वालों की एक विशेषता है। वैसे इनका परामर्श बड़ा सृजनात्मक होता है। किन्तु इन पर ’बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ को कहावत फिट बैठती है।
कर्क लग्न के जातक सौम्य व शांत स्वभाव के होने से बहुत कम क्रोधित होते हैं। होते भी हैं तो अपने क्रोध को अपने में ही सीमित रखते हैं, दूसरे पर प्रकट नहीं करते। करते हैं तो बहुत दिनों बाद किसी अन्य अवसर पर शिकायत के रूप में प्रकट करते हैं। ये लोग लड़ाई-झगड़े से दूर रहने वाले तथा धीमे स्वर में बात करने वाले होते हैं। अक्सर ये लोग ऊंची आवाज में बोलने वालों को पसंद नहीं करते। ये लोग दूसरों के प्रति प्रेम व सहयोगपूर्ण व्यवहार रखते हैं। दूसरों की तकलीफ देखकर शीघ्र पिघल जाने वाले तथा अपनी सीमा से बाहर जाकर भी उनका सहयोग करने का प्रयास करने वाले होते हैं। ये एक बालक की भांति भोले और निष्कपट होते हैं। दूसरों की बुराइयों पर विशेष ध्यान नहीं देते। उसे नजरअंदाज कर देते हैं।
कर्क लग्न वालों का भाग्य प्रायः उत्तम होता है। पर पाचनशक्ति प्रायः कमजोर होती है। उदर रोग सम्भावित होते हैं। विशेषकर शनि की साढ़ेसाती में अथवा शनि जब कर्क राशि से गुजरता है तो इनको अधिक तकलीफ देता है। प्रायः यह कष्ट शारीरिक होता है किन्तु कई बार किसी निकट सम्बन्धी की मृत्यु आदि कारणों से इनकी भावनात्मक अवस्था या मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है। कर्क लग्न वाले जातक जिद पर आ जाएं तो प्रायः असम्भव को भी वे सम्भव बना डालते हैं। जीवन के प्रति इनका दृष्टिकोण भी कभी नकारात्मक नहीं होता। शांत व ठंडे स्थानों पर रहना इन्हें पसंद होता है। ऐसे स्थानों पर रहना इनके भाग्य के विकास तथा मन की शांति के लिए जरूरी भी होता है। ऐसा भी प्रायः देखा गया है कि इनको जन्म स्थान से दूर जाने पर सफलता की प्राप्ति होती है। कर्क लग्न के जातक अपने बाल्यकाल की पुरानी व छोटी बातों को भी स्मरण रखते हैं। यह उनकी विशेषता होती है। क्योंकि मेरा स्वयं का लग्न कर्क है। अतः मैंने इस लग्न के जातकों के अध्ययन में विशेष रुचि रखी है। मेरे अनुभव से कर्क लग्न के जातकों में कुछ विशेषताएं और भी देखने में आई हैं, जो इस प्रकार हैं-
कर्क लग्न वालों का मस्तिष्क विचारों से नहीं भावनाओं से प्रेरित होता है। एक बार जिससे धोखा खा चुके हैं उसे भी तकलीफ में देखें तो उसकी सहायता को तैयार हो जाते हैं। पशुओं के प्रति इन्हें विशेष करुणा रहती है। चन्द्रमा जिस प्रकार घटता-बढ़ता रहता है, उसी प्रकार इनकी मनोवृत्ति भी बहुत तेजी से बदलती रहती है। ये मूड में आ जाएं तो अपनी सामर्थ्य से भी अधिक परिश्रम लगातार करते चले जाते हैं और थकते नहीं, किन्तु मूड न बने तो इनके छोटे-छोटे काम भी दिनों तक यूं ही पड़े रहते हैं। इसी प्रकार न डरें तो ये लोग शेर से भी न डरें और डर जाएं तो चूहे से भी डर जाएं-ऐसे होते हैं। विशेषरूप से तब जब इनकी गलती हो, ये विरोध नहीं करते और तुरंत क्षमा मांग लेते हैं। किन्तु इनकी गलती न हो तो ये पूरा विरोध करते हैं। ये लोग अपने मनोबल व बुद्धिबल से जीवन की विकट स्थितियों पर भी काबू पा लेते हैं और अमावस को पूर्णिमा में बदल देते हैं। कर्क लग्न वालों से कुछ घंटे बात की जाए तो ये आपको अपने बचपन की कुछ बातें अवश्य किसी संदर्भ में बताएंगे। चन्द्रमा क्योंकि बचपन का कारक होता है। अतः इन जातकों पर उम्र भर बच्चों की तरह मासूमियत का प्रभाव रहता है।
बीती हुई बातों को भी विस्तार से इस प्रकार कहना मानो वह अभी-अभी हो रही हो, कर्क लग्न वालों की ऐसी विशेषता होती है। कर्क लग्न वाले आस्तिक व धर्मभीरू होते हैं। इन्हें किसी भी काम को करने की कोई जल्दी नहीं होती। ये जल्दबाज बिलकुल नहीं होते और प्रायः समय के पाबंद होते हैं। शब्दों व सिद्धांतों का मान रखने वाले होते हैं। यानी कमिटमेंट पूरी करने वाले तथा सिद्धांतों के लिए अड़ जाने वाले होते हैं। यही वजह इन्हें कभी-कभी सनक की स्थिति तक भी ले जाती है। कर्क लग्न के जातकों में स्वप्न द्वारा या कभी-कभी यूं ही बैठते-चलते भविष्य सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त कर लेने की क्षमता भी बहुत बार देखी गई है। इनके जीवन में भावना का महत्त्व धन, यश या किसी भी वस्तु से बहुत अधिक होता है। न्यायप्रियता की हद यह होती है कि न्याय के लिए अपने प्रिय/सम्बन्धी/मित्र को छोड़कर अपरिचित का पक्ष लेने में भी नहीं हिचकते।
अब अपने अनुभव को छोड़ ज्योतिष के शास्त्रीय तथ्यों पर पुनः लौटते हैं। चन्द्रमा स्वप्रकाशित नहीं है। परन्तु मन का कारक है। सूर्य (जिसके प्रकाश से चन्द्र प्रकाशित होता है) ब्रह्मांड का नेत्र है। नेत्र से जो दीख नहीं पाता वह मन की आंख देख पाती है। अतः चन्द्रमा की शक्ति मन या ब्रह्मांड की गहनता में छिपे भेद भी उजागर कर सकने में समर्थ है। सम्भवतः इसी कारण कर्क लग्न के जातकों में अन्तर्ज्ञान की प्रवृत्ति पाई जाती है। यदि चन्द्रमा क्षीण न हो तो कर्क लग्न के जातकों का मनोबल भी अत्यंत विकसित होता है। सम्भवतः इसीलिए लाल किताब में कर्क लग्न को आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करने का प्रथम द्वार माना गया है।
यदि कर्क लग्न में गुरु लग्नस्थ हो तो (उच्च का होने के कारण) जातक धर्मात्मा, धार्मिक, विद्वान तथा परिष्कृत होता है। ऐसा जातक धर्म प्रचारक या उच्च धर्म पथ प्रदर्शक बन सकता है। यदि लग्न में चन्द्रमा हो तो जातक गोरा, बहुत सुन्दर, आकर्षक, घुमक्कड़ परन्तु लापरवाह/कामों को टालने वाला, शृंगारप्रिय और स्त्रैण स्वभाव का होता है। वह रजोगुण प्रधान होता है। यदि चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में हो तो उच्च का होने से इन फलों में वृद्धि करता है तथा जातक का यश व धन और भी अधिक बढ़ते हैं। जातक स्वावलम्बी होता है। किन्तु कर्क लग्न में चंद्रमा सातवें भाव में हो तो जातक पत्नीभक्त होता है और उसे पत्नी भी काली-कलूटी मिलती है।
रोग ज्योतिष के अनुसार कर्क लग्न में चंद्र नीच का हो (पंचमस्थ) तो जलोदर रोग होता है। कर्क लग्न वाले जातकों को चंद्र निर्बल व पापाक्रांत हो तो फेफड़ों, रक्त तथा छाती के रोग देता है। कफ व शीत के रोग भी देता है। राहू या शनि का चन्द्र पर प्रभाव हो तो क्षय/टी.बी., कैंसर व चित्तभ्रम आदि रोग होते हैं।
विशेष (रोग)-कर्क लग्न में यदि लग्नेश चन्द्र आठवें भाव में हो अथवा छठे भाव में हो तो जातक रोगी रहता है। यदि आठवें भाव में चन्द्रमा शनि से युति कर रहा हो तो जातक प्रेतबाधा या शत्रुओं से पीड़ित होकर अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है।
कर्क लग्न में शनि के साथ राहू या केतु यदि दसवें भाव में हो और चन्द्रमा निर्बल या पापाक्रांत हो तो जातक की माता की मृत्यु या जातक को मातृसुख का अभाव हो जाता है। चतुर्थ भाव, चतुर्थेश, लग्न व लग्नेश पापाक्रांत हो तो मातृसुख में बाधा होती है तथा जातक को छाती के रोग निश्चित रूप से होते हैं।
यदि चन्द्रमा के साथ राहू चतुर्थ भाव में हो और कर्क लग्न भी पाप प्रभाव में हो तो जातक को चित्तभ्रम, वहम, भयभीत रहना या ऊपरी हवा आदि की पूर्ण सम्भावनाएं होती हैं।
कर्क लग्न व लग्नेश (चन्द्र) दोनों पापग्रहों के मध्य हों, सप्तम भाव भी पापग्रह से युक्त हो तथा सूर्य निर्बल हो तो जातक जीवन से निराश होकर आत्महत्या कर लेता है। ऐसा लाल किताब का मत है।
कर्क लग्न हो, चन्द्रमा पापग्रहों के साथ हो, शनि सप्तमस्थ हो तो जातक देवशाप से या शत्रु से पीड़ित रहता है। अथवा दूसरे भाव में सूर्य तथा चौथे व दसवें भाव में पापग्रह हों तो जातक को अति कष्टप्रद जीवन जीना पड़ता है।
कर्क लग्न हो, चौथे भाव में सूर्य, आठवें में गुरु, बारहवें भाव में चन्द्र हो तथा चन्द्र पर शुभ दृष्टि न हो तो जातक जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
कर्क लग्न हो, दूसरे या बारहवें भाव में पापग्रह हों, चन्द्र निर्बल हो तथा लग्न, द्वितीय व द्वादश भाव पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो 32 वर्ष की आयु में मृत्यु सम्भव होती है। कर्क लग्न में सूर्य सप्तमस्थ हो तो जातक को नेत्र रोग होता है। ऐसा लाल किताब का मत है।
अतिविशेष (स्त्री जातक)-कर्क लग्न में बुध यदि तीसरे भाव में हो तो स्त्री जातकों को व्यभिचारिणी बनाता है। यदि शुक्र भी साथ हो तो निश्चित रूप से-ऐसा हो लगभग एक दर्जन स्त्री जातकों की कुंडलियों में मैंने पाया है कि कर्क लग्न में शनि सातवें भाव में हो तो स्त्री जातकों के स्तन बड़े परन्तु लटके हुए होते हैं और उनके पति व्यभिचारी तथा अल्प कामशक्ति वाले होते हैं। परन्तु अभी और अध्ययन करने पर ही निश्चित सिद्धांत बनाया जा सकता है)।
कर्क लग्न हो, चन्द्र शुक्र व शनि की युति दुःस्थानों में हो तो जातक की मृत्यु वाहनदुर्घटना में होती है।
कर्क लग्न, चतुर्थस्थ पापग्रह, चतुर्थेश पापग्रहों के बीच हो तो जातक को हृदय रोग होता है। अथवा शुक्र शनि के साथ अष्टम भाव में हो तो भी हृदय रोग होता है। अथवा चौथे भाव में शनि, षष्ठेश सूर्य के साथ पापग्रहों के बीच हो तो भी जातक को हृदय रोग होता है। या फिर शनि चौथे भाव में तथा सूर्य आठवें भाव में हो तब भी जातक को हृदय रोग होता है।
कर्क लग्न हो, चौथे भाव में राहू पापग्रहों से दृष्ट हो और चन्द्रमा निर्बल हो तो जातक को हार्टअटैक होता है। यदि सूर्य वृश्चिक राशि में (पांचवें भाव में) दो पापग्रहों के साथ हो तो जातक हार्ट अटैक से मरता है।
स्त्री जातक विशेष-कर्क लग्न में जन्म लेने वाली स्त्रियां प्रायरू सुन्दर ही होती हैं। किन्तु चन्द्रमा लग्न में हो तो पति को अतिप्रिय होती हैं। लेकिन यदि शनि लग्न में हो तो स्त्री एक नम्बर की जिद्दी होती है (वृष लग्न में जन्म लेने वाली स्त्रियां भी प्रायः सुन्दर होती हैं)।
कर्क लग्न में जन्म लेने वाले जातक प्रायः राजनेता, मंत्री, राज्याधिकारी, डाक्टर, व्यवसायी, नाविक, प्राध्यापक अथवा इतिहासकार आदि क्षेत्रों को अपनी जीविकोपार्जन का माध्यम बनाते हैं। इनकी वृश्चिक, मकर एवं मीन लग्न वाले जातकों से अच्छा मित्र भाव बना रहता है। इनका कोई भी कार्य धन के आभाव में नहीं रुकता। सामाजिक कार्यों में भी धन व्यय करने हेतु सदैव अग्रणी एवं तत्पर रहते हैं। ऐसे जातक आत्म विश्वास से परिपूर्ण एवं न्याय प्रिय होते हैं। इनकी मानसिक शक्ति बड़ी तीव्र एवं मजबूत होती है।
कर्क लग्न में जन्मे जातक प्रायः गौर वर्ण के ही होते हैं, किन्तु ग्रह स्थिति के कारण अपवाद स्वरुप श्याम वर्ण के भी हो सकते हैं। इनका कद मंझोला एवं सुगठित शरीर होता है एवं आगे के दांत कुछ बड़े आकार के होते हैं। इनका मुख देखने में सुन्दर होता है। ये जातक विलासी, गतिशील, परिवर्तनशील एवं चंचल प्रवृत्ति वाले होते हैं एवं इनका हृदय उदार, स्वच्छ एवं विशाल होता है। ऐसे जातक अत्यन्त कल्पनाशील एवं भावुक प्रवृत्ति के होते है एवं भावना के वेग में ये इतना बह जाते हैं कि अपना भला बुरा तक इन्हे नहीं सूझता। यात्रा करना एवं प्रकृति प्रेम इनके स्वभाव में होता है एवं ऐसे जातक नवीन तथा जलज वस्तुओं के प्रति विशेष रुचि रखने वाले होते हैं।
कर्क लग्न में जन्मे जातक अपना कार्य बड़ी मेहनत, चातुर्य, बुद्धिमत्ता, नीतिज्ञता एवं समय अनुसार करना पसंद करते हैं। ऐसे जातक को स्त्री वर्ग से विशेष हर्ष एवं लाभ प्राप्त होता है। इनका दाम्पत्य जीवन प्रायः सुखद नहीं होता किन्तु फिर भी ये अपनी पत्नी एवं संतानो पर जान छिड़कते हैं। कुण्डली में विवाह प्रतिबन्धक योग होने पर भी इन्हें काम सुख प्राप्ति के अवसर मिलते ही रहते हैं। कर्क लग्न में जन्मे जातको को उदर, हृदय, कफ, मूत्राशय सम्बन्धी रोगों व विकारों की सम्भावना बनी रहती है।
कर्क लग्न में जन्मे जातक की जन्म कुंडली में यदि लग्न भाव में मंगल-राहु ग्रह युति बनती है तो ऐसे जातक ओछेपन की प्रवृत्ति कायम कर लेते हैं। लग्न भाव में मंगल-राहु ग्रह युति इन्हें दरिद्री एवं उदर रोगी भी बना देती है। इनके लग्न में शनि सप्तमेश की स्थिति में होता है, जिस कारण शनि ग्रह प्रारम्भ में शुभ फल एवं बाद में अशुभ फल प्रदान करता है। बृहस्पति ग्रह से इन्हे शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के प्रभाव प्राप्त होते हैं। शुक्र एवं बुध ग्रह से इनको अशुभ फल प्राप्त होता हैं। कर्क लग्न में जन्मे जातक के लिए मंगल ग्रह सर्वश्रेष्ठ फल प्रदान करने वाला ग्रह समझा गया है।
कर्क लग्न व्यक्तित्व विशेषता
एक कर्क लग्न के लिए स्वामी ग्रह चंद्रमा है और आपके जन्म कुंडली में पहले भाव का शासक ग्रह भी है। जैसा कि आप जानते हैं कि चंद्रमा अंतर्ज्ञान और संवेदनशीलता का प्रतिनिधित्व करता है, और कर्क के बढ़ते संकेत के रूप में आप बहुत संवेदनशील और सहज होने की संभावना रखते हैं। बहुत कुछ कर्क के प्रतीक की तरह है - केकड़ा, आप एक कठिन बाहरी आवरण को ऊपर रखते हुए अपने संवेदनशील पक्ष को छिपाने की कोशिश करते हैं। मिलनसार होने के अलावा, आपके पास खुद को बचाने की प्रवृत्ति है और आप अनदेखी खतरों से प्यार करते हैं। आप संचारक हैं जो गहरा प्रभाव डालते हैं। आप दूसरों के दिल तक पहुंचना बखुबी जानते हैं।
कर्क लग्न शारीरिक विशेषता
कर्क लग्न व्यक्ति का चेहरा पूर्ण गोल, गोल आंखें, कद काठी और विरल बाल होते हैं। इन लोगों में वजन के कम करने की प्रवृत्ति होती है, खासकर कूल्हे के क्षेत्र में। आपके पास छोटे और मजबूत पैर हैं। आपका शरीर सुडौल व सुंदर है। आकर्षण की कोई कमी नहीं है। आपके पास एक अच्छा शरीर है।
कर्क लग्न की मानसिक विशेषता
कर्क लग्न में जन्मे जातको के लिए, भावनाएं बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये जातक बहुत ही रक्षात्मक और सुरक्षात्मक होते हैं और आमतौर पर अस्वीकृति के पहले पीछे हट जाते हैं। इन्हें अक्सर भावनात्मक समर्थन की आवश्यकता होती है और जब आवश्यकता होती है तो वे उसी भावनात्मक समर्थन और जरूरतमंद लोगों को महत्व देते हैं। ज्योतिष के अनुसार आपका दबंग स्वभाव है। आप अपने प्रियजनों और उनके अतीत के बारे में बहुत कुछ जानकारी रखते हैं। आमतौर पर कर्क लग्न का व्यक्ति शर्मीला और शांत होता है।
कर्क लग्न प्रेम और संबंध विशेषता
कर्क लग्न जातक जीवन में विश्वसनीय और स्थिर साथी की तलाश करते हैं। वे अच्छी तरह से परिभाषित सीमाओं और अपेक्षाओं के साथ एक प्रतिबद्ध संबंध चाहते हैं। कर्क लग्न के जातक किसी ऐसे व्यक्ति की सराहना करते हैं जो प्यार में रोमांटिक और गंभीर दोनों हो। उनकी भावनात्मक लगाव और मजबूत पारिवारिक मूल्य सुनिश्चित करते हैं कि उनका प्रेम जीवन एक खुशहाल और सफल हो।
कर्क लग्न का स्वास्थ्य विशेषता
कर्क लग्न में अत्यधिक भावनाएं जीवन में अवांछित अवसाद और तनाव में योगदान करती हैं, जिसका पाचन तंत्र पर विविध प्रभाव हो सकता है। ये जातक पेट और पाचन तंत्र से संबंधित विकारों से पीड़ित हो सकते हैं। कमजोर या पीड़ित चंद्रमा भी फेफड़ों, श्वसन प्रणाली और सर्दी और खांसी से संबंधित बीमारियों का कारण हो सकता है। अनावश्यक भावनाओं और तनावों से बचें और सकारात्मक और खुशहाल माहौल में रहने की कोशिश करें।
कर्क लग्न में ग्रहों के प्रभाव :-
1.चन्द्रमा :- कर्क लग्न में चंद्र देवता पहले घर के स्वामी हैं | पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, नवम, दसम और ग्यारहवें भाव में अपनी क्षमता के मुताबिक शुभ फल देंगे | तीसरा, पांचवा (नीच), छठा, आठवें और बारहवें भाव में यदि चंद्र देवता उदय अवस्था में पड़े हैं तो अशुभ फल देंगे | उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता दूर की जाती है | अस्त अवस्था में चन्द्रमा किसी भाव में पड़े हो तो इनके रत्न मोती को धारण करना चाहिए |
2.सूर्य :- सूर्य देवता इस लग्न कुण्डली में दूसरे भाव के स्वामी हैं | द्वितीय भाव मारक भाव कहलाता है, इसलिए सूर्य देव कर्क लग्न में मारक ग्रह होते हैं | इस लग्न कुण्डली में जब भी सूर्य की महादशा चलती है तो चाहे वो धन का थोड़ा आगमन करवाती है लेकिन कुल मिलाकर वह अशुभता का ही फल देती है | इस लग्न कुण्डली में इसका रत्न कभी भी धारण नहीं किया जा सकता है | इसका दान-पाठ करके इसकी अशुभता को कम किया जा सकता है |
3.बुध :- बुध देवता इस लग्न कुण्डली में तीसरे और द्वादश भाव के स्वामी हैं | दोनों ख़राब भावों के स्वामी और लग्नेश चन्द्रमा के अति शत्रु हैं इस वजह से यह इस लग्न कुण्डली में एक मारक ग्रह बन जाते हैं | इस लग्न कुण्डली में बुध की महादशा व अन्तर्दशा हर भाव में अशुभ फल देगी | इस ग्रह की अशुभता इनके दान-पाठ करके कम की जा सकती है | अगर बुध देवता छठें, आठवें या बारहवें भाव में विराजमान हो और चन्द्रमा कही बली हो तो बुध देवता विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल दायक भी हो सकतें है | इस लग्न कुण्डली में बुध का रत्न पन्ना किसी भी जातक को कभी भी धारण नहीं करने चाहिए |
4.शुक्र :- इस लग्न कुण्डली में शुक्र देवता चौथे और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं | शुक्र इस लग्न कुण्डली में सम ग्रह माने जातें है क्योँकि यह दो अच्छे घरों के मालिक हैं | अगर शुक्र देवता लग्न, दूसरा, चौथा, पांचवा, सातवा, नवम ( उच्च ), दसम और ग्यारहवें भाव में विराजमान हो तो अपनी क्षमतानुसार अच्छा फल देते हैं | तीसरा (नीच ), छठा, आठवां, बारहवें भाव में यह अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं | अगर अच्छे भाव में शुक्र देवता पड़े हो तो अपनी दशा-अन्तर्दशा में उसका नग पहनकर उसकी शुभता को बढ़ाया जाता है | अगर शुक्र देव अशुभ भावों में पड़े हो तो इस ग्रह की अशुभता इनके दान पाठ करके कम की जा सकती है |
5.मंगल :- इस लग्न कुण्डली में मंगल देवता पांचवें और दसवें भाव के स्वामी हैं और लग्नेश चन्द्रमा के अति मित्र हैं इसलिए इस लग्न कुण्डली के अति योग कारक हैं | अगर मंगल देवता दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें (उच्च ), नवम, दसम, ग्यारहवें भाव में विराजमान हो तो अपनी क्षमतानुसार सदा शुभफल देते हैं | लग्न (नीच), तीसरा, छठा, आठवाँ, बारहवें भाव में अगर मंगल देव विराजमान हों तो अपनी क्षमता के अनुसार सदा अशुभ फल देते हैं | इस ग्रह की अशुभता इनके दान पाठ करके कम की जा सकती है | अगर अच्छे भाव में मंगल देवता विराजमान हो तो इसका नग मूंगा पहनकर इसकी शुभता को बढ़ाया जा सकता है |
6.शनि :- इस लग्न कुण्डली में शनि देवता सातवें और आठवें भाव के मालिक हैं | लग्नेश चन्द्रमा के शत्रु एवं अष्टमेश होने के कारण वह कुण्डली के अतिमारक ग्रह माने जाते हैं | कुण्डली में किसी भी भाव में पड़े शनि देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं | परन्तु यदि शनि देवता छठे, आठवें और बारहवें भाव में पड़े हो तो विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता भी रखते हैं | पर इसके लिए लग्नेश चन्द्रमा का बलि होना और शुभ होना अनिवार्य है | इस लग्न कुण्डली में शनि का रत्न नीलम कदापि और किसी भी जातक को नहीं पहनना चाहिए, अपितु उनका दान व पाठ कर के शनि की अशुभता दूर की जाती है |
7.बृहस्पति :- इस लग्न कुण्डली में बृहस्पति देवता छठे और नवम भाव के स्वामी हैं एवं लग्नेश चन्द्रमा के अति मित्र भी हैं | इन्ही कारणों से बृहस्पति देवता इस कुण्डली में अति योगकारक ग्रह होते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, नौवें, दसवें और एकादश भाव में बृहसपति देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं | कुण्डली के किसी भी भाव में यदि गुरु देवता सूर्य के साथ बैठकर अस्त हो जाते हैं तो उनका रत्न पुखराज पहन कर उनका बल बढ़ाया जाता है |
8.राहु :- राहु देवता की कोई अपनी राशि नहीं होती है l राहु देवता अपने मित्र की राशि में शुभ भाव में बैठकर ही शुभ फल देते हैं lइस लग्न कुण्डली में राहु देवता चौथे, सातवें और एकादश भाव में शुभ फल देते हैं lपहले, दूसरे, तीसरे, पांचवें, छठें, आठवें, नवम, दसम, और 12वें भाव में राहु देवता अशुभ हो जातें है lराहु का रत्न गोमेद कभी भी किसी जातक को नहीं पहनना चाहिए l अपितु उनके दान -पाठ करके उनकी अशुभता को कम करनी चाहिए l
9.केतु:- देवता के फल:केतु देवता की अपनी कोई राशि नहीं होती है l केतु देवता अपने मित्र की राशि में और शुभ भाव में ही बैठकर शुभ फलदायक होते हैं l
केतु देवता इस लग्न कुण्डली में चौथे, पांचवें (उच्च ) और सातवें भाव में शुभ फल देतें है lपहले दूसरे, तीसरे , छठें, आठवें, नवम, दशम, एकादश ( नीच ) और द्वादश भाव में केतु देवता मारक ग्रह बन जातें है lकेतु देवता का रत्न लहसुनिया कभी भी नहीं पहना जाता है अपितु उनके दान पाठ करके अशुभता को दूर की जाती है l टाइगर स्टोन पहन सकते है
4. कर्क लग्न के इष्ट- मंत्र- देवता
कर्क राशि : कर्क राशि लग्न जातकों के श्वेत हरिद्रा रक्त गणपति हनुमानजी भैरव जी कृष्ण माता कमला अथवा माता सिद्धिदात्री की उपासना करनी चाहिए।
ॐ ग्लौंगं गणपतायै नमः
ॐ हं हनुमंताय रुद्रात्मकाय नमः नमः
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हं सौः जगत्प्रसूत्यै नमः
ॐ क्रीं कलिकायै नम:
ॐ भ्रं भैरवाय नमः
ॐ द्रां दतात्रेय नम:
ॐ हरिहरब्रम्हायैसदाशिवायैहिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:
बीज मंत्र कुंडली एवम जीवन बीज मंत्र जप
"ॐ ग्लौं गं हौं हं फ्रौं दूं क्रीं भ्रं द्रां ऎं ह्रीं श्रीं क्लीं हंसौः जगत्प्रसूत्यै नमः"

कर्क लग्न
मूल देवता गणेश जी
बीजसमूह मन्त्र
ॐग्लौंगंहौंद्रांदुंक्ष्रौंहंफ्रौंक्रींभ्रंनमः
ऎंह्रींश्रींक्लीं हंसौः जगत्प्रसूत्यै नमः"
सूर्य : 1 अंक द्वितीयेश सूर्य यद्यपि मारकेश है, लेकिन इसकी दशा में मृत्यु की संभावना नहीं होती है। सूर्य की दशा अनिष्ट फल करती है।धन वाणी कुटुंब जनता नेत्र को शक्ति दे l
माणक/ गोल मूंगा धारण करे एक
सूर्य भगवन को अर्ग देवे माणक 1 मुखी रुद्राक्ष सांड को आटा लाया खिलावे शिव मंदिर में चाँदी का नंदी भेट करे l बेल की जड़ी पहने आदित्य ऋदय स्तोत्र, सूर्य कवच का पाठ करे सप्तमी, रविवार का व्रत रखे रखे ॐ घृणिः सूर्याय नमः
चंद्रमा : 2 अंक लग्नेश होकर शुभ और मंगलकारी फल देता है।सर्वदा शुभ लाभ अमृत करक होकर सदैव शुभ फल भाग्य संतान इष्ट फल कारी चावल खावे दूध पिए मोती मूनस्टोन पहने चाँदी की स में पानी पिए, रोहिणी,चतुर्थी, पूर्णिमा का व्रत रखे खिकी जड़, और 2 मुखीरुद्राक्ष पहने दूज के चाँद देखे शिवाभिषेक करे l चतुर्थी का व्रत रखे गणेश उपासना करे
मंगल : अंक 9 पांचमेश और दशमेश होने से मंगल की महादशा मनोवांछित फलों को देती है।सर्वदा शुभ मंगल लाभ भाग्यकारी अंडाकार लाल मूंगा धारण करे, अनंत मूल की जड़ी, 3 मुखी रुद्राक्ष पहने, ताम्बे का कड़ा ताम्बे में जल पिए, लाल गणेश जी, हनुमानजी को पूजे, हनुमानजी, नरसिंह जी, रक्तांग भैरवजी पूजे, नीम का पेड़ लगावे, ताम्बे में मंगल यन्त्र धारण करे l रक्त गणपति की उपासना करे
बृहस्पति : अंक 3 बृहस्पति भाग्येश और शत्रु का स्वामी होकर शुभ फल करता है।अत्यधिक शुभ फल दायक, बृहस्पति नवमेश होने से सबसे श्रेष्ठ, पुखराज , सुनहला, सिट्रीन रत्न धारण करे 5 मुखी रुद्राक्ष और भारंगी की जड़ी पहने, पीतल में खाना खावे, पीपल का पेड़ लगाए सीचे और शनिवार को के तेल का दिया करे, बृहस्पति यंत्र इंडेक्स फिंगर में सोने में पहने, पुष्करतीर्थ में स्नान और पूजन करावे, दक्षिणमुखीशिव, दत्तात्रेय भन् की पूजा करे उनको गुरु बनावे
हल्दी के गणेश की पूजा करे l चने की दाल बेसन पीले लड्डू का भोजन करे बृहस्पति वॉर को l केसर हल्दी दाल कर दूध पिए
शनि : अंक 8 आंशिक शुभ, सप्तम और अष्टम जैसे दो मारक स्थान का स्वामी होकर शनि अपनी दशा में रोग, ऋण, भय, दांपत्य में क्लेश और मातृपक्ष की हानि करता है। ये शनि व्यापर धन वैभव यश कीर्ति के लिए शुभ होगा और व्यापार के लिए प्रेरित और सफल करता है स्वरोज़गार कोर्ट, कचहरी, वकालत, लोहा, मशीन इंजीनियरिंग, समुद्र के पास निवास विदेश, ट्रेवल एजेंट मोटर ड्राइवर मैकेनिक , धातु ,भवन निर्माण इत्यादि में सफल, पत्नी कर्कशा मिलती है, 3,5,8,9,11,12में चंद्र हो तो फ़िरोज़ा धारण करे, 1,2,4,6,7,10, तो नीलम l बिच्छू की जड़ी 7 मुखी रुद्राक्ष पहने लाजवर्त भी पहन सकते है भैरव, कृष्ण, काली, शिव, की पूजा करे l पत्नी को प्रेम दे ससुराल से चाँदी की ईट, कलश, लावे l शनिवार को काले चने राजमा, उड़द के बड़े डोसा इडली मेदूवदा खावे
बुध : अंक 5 सर्वदा अशुभ पराक्रमेश और व्ययेश होकर बुध अशुभ होता है। बुध की शुभ ग्रहों से युति और दृष्टि ही कुछ राहत दे सकती है।किसीभी दृस्टि से शुभ नहीं इसका दान ही श्रेष्ट है l हरी घास मुंग दाल दान करे l बुद्ध वॉर को सांभर वड़ा खावे
शुक्र : अंक 6 सुखेश और लाभेश होकर शुक्र साधारणतया मिश्रित फलों को देता है। हालांकि जब केंद्रों के स्वामी शुभ ग्रह हों, तो वे अशुभ होते हैं। शुक्र सुख और लाभ के करक है किन्तु शुभ नहीं होंगे हीरा या हीरा,सफ़ेद पुखराज धारण करे l माता लक्ष्मी कमला की उपासना करे 9 मि का व्रत और सिद्धि दात्री की उपासना करे l शुक्रवार को आलू छोला दही का सेवन करे
राहु: अंक 4
3-6-10-11 भाव में अति शुभ अन्यथा मारकेश से कर्क लग्न वालो को गोमेद नहीं पहना चाहिए भैरव जी की उपासना करे शनिवार को
केतु:अंक 7
शुभ फल देगा इसलिए कुत्ते की सेवा करे दूध ब्रेड खिलावे और कान बिन्धावे, गणेश उपासना जीवन को अमृत बनादेगी गणेश चतुर्थी व्रत
टाइगर ऑय स्टोन धारण करना शुभ है
अधिकतर राहु-केतु सर्वदा अशुभ इनके दान करे जूता छाता चप्पल कम्बल मोज़े टोपी, 8स्टील और 8लोहे के बर्तन, जौ बाजरी प्याज लहसुन सफ़ेद काले तिल, कोयला सिगड़ी, मोप्पर, वाइपर, पोछा, साबुन लिक्विड वाशिंग पाउडर केमिकल, मेडिसिन या इंडक्शन
बुद्ध : मूंगदाल/हरीघास
शनि : काली उडद/काले चने
शुक्र : ज्वार
सुर्य : गेहू गुड़
गुरु : चनादाल / मक्का
केतु : बाजरा/चौला
राहू: जौ/मोठ
मिक्सचर donate करे गौशाला में
@ 9,18,27,54,81,108,kg
गुड़ की पेटी और मुफ़ली तेल का एक कैन गौशाला में देवे हर अमावस्या को करें
OR
50gm डिब्बी में रात को सिरहाने रखकर या सुबह 27 बार एंटीक्लॉक वाइज उवार कर पक्षियों में डाले
======================
4. कर्क लग्न के इष्ट- मंत्र-
कर्क राशि : कर्क राशि लग्न जातकों के श्वेत हरिद्रा रक्त गणपति हनुमानजी भैरव जी कृष्ण माता कमला अथवा माता सिद्धिदात्री की उपासना करनी चाहिए।
गणेश मन्त्र
ॐ ग्लौंगं गणपतायै नमः
शिव मन्त्र
ॐहौंजूंस:
हनुमान मन्त्र
ॐ हं हनुमंताय रुद्रात्मकाय नमः नमः
सिद्धिदात्रीकमला मन्त्र
ॐ ऐंह्रींश्रींक्लींहंसौः जगत्प्रसूत्यै नमः
भैरव मन्त्र
ॐ भ्रं भैरवाय नमः
वैष्णव मन्त्र
ॐ क्लीं कृष्णाय नमः
"ॐग्लौंगंहौंदंद्रांहंफ्रौंक्रींभ्रं ऎंह्रींश्रींक्लीं हंसौः जगत्प्रसूत्यै नमः"
ॐहरिहरब्रम्हायैसदाशिवायै
हिरण्यगरभायै अव्यक्त रूपिणे नम:
इसके अलावा ये गृह आपके अनुकूल रहेंगे तो इनका जाप करते रहे दान न करे इनकी दशा में जप करावे
साथ में यह गृह बीज मंत्र
चंद्र तांत्रिक मंत्र- 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:'।चंद्र एकाक्षरी मंत्र- ॐ सों सोमाय नम:।
भौम मंत्र- 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:'।
भौम एकाक्षरी मंत्र- ॐ ॐ अंगारकाय नम:।
गुरु मंत्र- 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:'।
गुरु का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ ब्रं बृहस्पतये नम:'।
शुक्र मंत्र- 'ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:'।
शुक्र का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शुं शुक्राय नम:'।
शनि मंत्र- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:'।
शनि का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:'
कर्क लग्न के लिए चन्द्र, सूर्य, मंगल, गुरु, शनि, वरुण, रूद्र, योग कारक हैं इसलिए माणक, मोती, मूंगा, पुखराज, नीलम, लाजवर्त, ओपल फ़िरोज़ा, टाइगर धारण करना शुभ रहेगा l 1,2,3,5,6,7,8,9 रुद्राक्ष भी धारण करना चाहिए।
Astromechanics-7073520724
https://www.facebook.com/profile.php?id=100089296834132&mibextid=ZbWKwL
===========================
आराधना
गणेश मंदिर : ईष्ट देव तत्त्व देव है सातो दिन गणेश जी को पूजे मूल देवता है इनकीआराधना श्रेष्ठ
लड्डू, पान, दूर्वा पुष्प चढ़ावे और गणेश अष्टक कवच स्तोत्र या फिर सहस्त्रनाम का पाठ करे मास की दोनों चतुर्थी का व्रत करे मंत्र स्तोत्र कवच का पाठ करे गणेश यंत्र केतु यन्त्र NE
में लगावे
देवी दुर्गा मंदिर
/लक्ष्मी/सरस्वती/काली दुर्गा की उपासना, सोम, बुध, शुक्रवार की शाम को करे वैभव लक्ष्मी, कीलक,अर्गला, कवच
सिद्धकुंजिका का पाठ करे, बीसा, नवदुर्गा, दशविद्या, श्री यन्त्र स्थापित करे पूजा में, तीज, शुक्लस्ट्मी, शुक्ल नवमी को व्रत रखे कुलदेवी पूजे
======================
काली मंदिर : शनिवार चढ़ावे : माँ काली को प्रथम भेट में पांव की पायल भेट करे और सरसो के तेल का दिया मोगरा माला मोगरा धुप , मोगरा इत्र कटार,त्रिशूल, कटार, मालपुआ, इमरती, मूंग दाल कचौड़ी, दही बडा,मोगरे इत्र,धुप, बेसन की चकी,मीश्री गूंजा ,सेव, अनार, पान, सरसो के तेल का दिया लगावे 108 बार मंत्र बोले ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कालिकायै नमः कवच स्तोत्र का पाठ काली यंत्र शनि यंत्र पश्चिम में लगाए
======================
भैरव मंदिर : शनिवार, रविवार, कृष्ण पक्षअस्टमी कालाष्टमी का व्रत, कट्टार, त्रिशूल, शनि या रवि वार को मालपुआ इमरती कचौी बड़े, दाल के बड़े, पापड, उड़द की दाल,चूरमा, शसिगरेट पान चढ़ावे और मंत्र है ॐ भ्रं भैरवाय नमः, भैरव यंत्र sw में लगावे राहु यन्त्र लगावे
======================
विष्णु मंदिर: राम, कृष्ण, नरसिह मत्यस्यावतार की पूजा करे या लक्ष्मी नारायण का पूर्णिमा व्रत रखे बेसन चक्की और दूध की बर्फी केले भोग नैवेद्य ॐ श्रीं दं नमः अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी, द्वादशी का व्रत
रखे
======================
हनुमान मंदिर : मंगल शनि
गदा की भेट, चमेली आवला का दिया 5 इमरती 5 गुलाब पुष्प,सिन्दूर चमेली तेल गुड़ चना पान चढ़ावे
llॐ हं फ़्रौं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट ll दक्षिण में मंगल यन्त्र पांच मुखी हनुमान यन्त्र स्थापित करे
======================
शिव मंदिर : कच्चादूध जल और शक्कर का घोल शिवलिंग पर चढ़ावे
सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, पुष्य नक्षत्र, व्रत , रुद्रास्टाध्यायी, अभिषेक लोटा जल, कच्चा दूध, शक्कर, बिल्वपत्र(बुधवार), पान, गन्ने का रास दीप, पान
मंत्र ॐ ह्रीं नमः शिवायै च
ह्रौं नमः शिवाय
पूर्व उत्तर में केतु गुरु यन्त्र उत्तर में
बारह ज्योतिर्लिंग और उनका राशियों से संबंध
======================
कमला लक्ष्मी मंदिर
मिश्री दही दूध बताशा गन्ना श्रीफल केला पान सुपारी मखाना साबूदाना चावल की खीर मोगरे का इत्र माला धुप ,मिश्री मावा अनार सेब
श्रीयंत्र स्थापित करे कनकधारायंत्र कुबेर यंत्र स्थापित करे श्रीसूक्त, कनकधारा, लक्ष्मीसूक्त, पद्मावती, श्रीविद्या,लक्ष्मीअष्टक,त्रयोदशी, अमावस्या पूर्णिमा, अष्टमी तृतीया त्रयोदशी लक्ष्मी कमला त्रिपुर सुंदरी कवच मन्त्र पत्नी से करावे
षोडशी श्री विद्या मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'
या
ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:
ॐ ह्रींश्रींक्लीं महालक्ष्म्यै नमः
ॐश्रीं श्रियै नमः
ॐकमलवासिन्यै स्वाहा
ॐ कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हं सौः जगतप्रसूत्यै नमः
======================
पितृदोष : दत्तात्रेय भगवान की पूजा करे , त्रिपिंडी, नारायणबलि, करावे
अमावस्या बुद्धवार को व्रत उपवास रखे विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करे
रामायण, भागवत का पाठ करावे
गौशाला ब्राह्मण को दान करे
पीपल सींचे : दत्तात्रेय यन्त्र राहु यन्त्र SW लगावे में मंगलवार और रविवार को न सींचे सुबह 10:00 से 12:00. के बीच पीतल, चाँदी, स्टील के जग या बड़े लोटे में कच्चादूध, गंगाजल, चावल, सीके हुवु चनो का सत्तु, किशमिशदाख, शक्कर/बताशा मिलाकर घोल बना कर पीपल की जड़ो में अर्पित करे
llॐ पित्राय स्वधाll तरपत्यांx3
2. त्रिपिंडी
3. दत्तात्रेय भगवन की मूर्ति या तस्वीर पूजा रखे पूर्णिमा और अमावस्या को विशेष पूजा करे स्तोत्र मंत्र कवच
ॐ द्रां दत्तात्रेय नमः
पितृदोष निवारक यन्त्र स्थापित करे
प्रेत दोष निवारक यन्त्र स्थापित करे
दत्तात्रेय यन्त्र स्थापित करे
======================
सूर्य की दान देने वाली वस्तुओं में
1 अंक सांड,रोटी,अनार, कमल, गुलाबी रंग, चौरस आकर के आसान सोने की 1ग्राम गिंनी, कमल का फूल, आम, चुकुंदर, गाजर, रानी रंग के वस्त्र, अनार, आम, नारंगी, बन्दर के खिलोने, कुमकुम, बिस्कुट, गुलाल, आटा, तांबा, गुड़, गेहूं, मसूर दाल दान की जा सकती है। पीला बल्ब रौशनी की वस्तुवे टोर्च, टेबल लैंप यह दान प्रत्येक रविवार या सूर्य संक्रांति के दिन किया जा सकता है। सूर्य ग्रहण के दिन भी सूर्य की वस्तुओं का दान करना लाभकारी रहता है।
अंक 5
बुध के लिए,हरा रंग हरा पन्ना, हरी घास, किन्नर को दान, हरी साडीया, मटकी, कुल्लड़, कटोरी, भरनी, हांंड़ी, हरे कपडे ,इलैची,पान, हरी पत्तेदार सब्ज़िया,धनिया,पालक, मेथी, खड्डे वाली वस्तुवे, मुंग दाल ढोकली, पास्ता, पाइप, गले कक चैन, नाक की नथ, अंगूठी, हरा बल्ब, निरोध, हाथ पांव के दस्ताने, बच्चियों के कपडे, चमड़े के सामान, वाद्ययन्त्र, माइक, स्पीकर, रेडियो, ढोलक, तबला, हारमोनियम, मजीरा, सितार, गिटार, बांसुरी, ताम्बे के खड्डेवाले सिक्के, सांभर वडा, 5₹सिक्का, फिटकरी मूँग, घी, हरा कपड़ा, चाँदी, फूल, काँसे के बर्तन, हाथी दाँत और कपूर का दान किया जाता है। ध्वनि यन्त्र माइक, स्पीकर, हैडफ़ोन, बुध के लिए मूँग, घी, हरा कपड़ा, चाँदी, फूल, काँसे का बर्तन, हाथी दाँत और कपूर का दान किया जाता है।बुध के लिए मूँग, घी, हरा कपड़ा, चाँदी, फूल, काँसे का बर्तन, हाथी दाँत और कपूर का दान किया जाता है
गुरु के दान की सामग्री अंक 3
3gm सोने की गिन्नी, पित्तल के,5 मुखी रुद्राक्ष, भारंगी की जड़, 11 बर्तन 3अलग ,8अलग धार्मिक, पुखराज, पुस्तकें, केसर, हल्दी, पीताम्बर, चने की दाल, पीले मूंग, पीले पुष्प, पीला वस्त्र, शक्कर, घोड़ा (लकड़ी या खिलौना घोड़ा), चने की दाल, हल्दी, ताजे फल, पके केले नमक, स्वर्णपत्र, कांस्य, पीतल, कपास, पीला गुड़, पीली गेंद, बेसन की सेवे, बेसन के नमकीन, बेसन के बने व्यंजन, मक्की, अध्यन सामग्री, अध्यन के लिए स्टेशनरी का सामान, किताब, कॉपी कलम, कागज़, ग्रन्थ, भगवा वस्त्र,
शनि के दान अंक 8
अंक 8, लोहा, 8 लोहे के बर्तन, 8 के काले नीले वस्त्र अंक में काजल, सुरमा, कालीउड़द, लोहे के औज़ार, हथियार गाडी, धातु से बने पात्र, अस्त्र शास्त्र, मशीन, 7 धान, जूते, काले फल, काले अंगूर, काले नीले फूल, कला दन्त मंजन, काला नमक, राई, काले मोज़े, काला कपड़ा, साबुत उड़द, लोहा, अलसी, तेल, काला पुष्प, कस्तूरी, काले तिल, चमड़ा, काले कंबल का दान किया जाता है, नील, चारकोलसोप, आवला, पीपल, कला कुत्ता, उड़द से बने इमरती, डोसा, इडली, सांभर वादा, काली दाल, चाय की पत्ती, काली पैंट, कला रुमाल, गोल बगीचे के आठ चक्कर, टायर, पायल, धातु, बांसुरी, लौंग, काली हल्दी,
राहु-केतु के दान अंक 4-7
नीलेफूल, मैग्गी, चौमीन, सोया सॉस ,फ़ास्ट फ़ूड, अंडा नॉनवेज, चाय, बीड़ी, सिगरेट, भांग, शराब, आईटी, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, ईरफ़ोन, mic, स्पीकर, मुखौटा, नशे, डबल रोटी ब्रेड, बासी भोजन, स्टील, अस्ट धातु या पांच धातु या मिश्रण धातु के आइटम, लेड शीशा, पीतल, कांसा, स्टील के बर्तन जौ-बाजरा,प्याज-लहसुन,काले-सफ़ेद तिल, मशरूम, ऊनि- टोपी, जूता, छाता, चप्पल कम्बल, एलोपैथिक होम्योपैथिक दवाइयाँ, चाकू छुरी, तलवार कटार, ढाल, कपडे, शराब, मादक पदार्थ, खट्टे आइटम, डेटोल, स्पिरिट, पोछा, वाशिंग मशीन, साबुन डिटर्जेंट, केमिकल, तेज़ाब, एसिड, पोइसन, केमिकल स्प्रे, radio, मोबाइल, ट्रांजिस्टर, इंडक्शन चूल्हा, शमशान की लकड़ी, पलंग, पूरानी लकड़ी के आइटम हेंडीक्राफ्ट काले-दुरंगे कुत्ते, राहु के लिए काला-नीला कपड़ा, कंबल, सरसों का दाना, राई, ऊनी कपड़ा, काले तिल व तेल का दान किया जाता है।
केतु के लिए सात अनाज, काजल, झंडा, ऊनी कपड़ा, तिल आदि का दान किया जाता है।
शुक्र ग्रह अंक 6, 6 मुखी रुद्राक्ष, सरपौंखा की जड़, हीरा प्लैटिनम चांदी स्टील वाइट metal,का 6ग्राम सिक्का, श्रीयंत्र, छोला,सफ़ेद काबुली चने, मैदा, कमलगट्टा , सफ़ेदक्रीम, पनीर , मक्खन, दही, चावल, ज्वार, सफ़ेद उड़द दाल, मिश्री, दूध, दही लस्सी, श्रीखंड, इत्र, सफेद चंदन, चांदी, प्लैटिनम, हीरा, अमेरिकन डायमंड, सफ़ेद पुखराज, ओपल, मोज़ोनैट, बंगाली छैने की सफ़ेद मिठाई, मलाई, कपूर, इत्र, कमल ककड़ी, धूपबत्ती, खुशबु की वस्तुवे,टेलकम पाउडर, श्रृंगार सामग्री, मोगरा चमेली सफ़ेद खुशबूदार पुष्प, इत्र परफ्यूम डीओ, फ्रग्रेंस, कद्दू,आलू,शक्करकंद, आगरे का पेठा, मखाने, सफ़ेद क्रिस्टल, led लाइट, गन्ना, सफ़ेद मावा मिश्री, काजू कतली, दूधबर्फी, बताशा, आभूषण, सिल्क रेशम, मखमल, सफ़ेद मूंगा, sunscreen लोशन, क्रीम, टूथपेस्ट, स्त्री सौंदर्य सामग्री, सैनेटरीपेड, स्त्री प्रसाधन, ब्रा-पेंटी, मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, आराम की सामग्री, मनोरंजन सामग्री, सिंघाड़ा, साबूदाना , आलू के बने व्यंजन, निरोध, वियाग्रा,