सम्पूर्ण श्रीमहालक्ष्मी-कमला उपासना

सम्पूर्ण श्रीमहालक्ष्मी-कमला उपासना 
अतः श्रीसूक्त 
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं, सुवर्णरजतस्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आ वह।।१।।

हे जातवेदा (सर्वज्ञ) अग्निदेव! सुवर्ण के समान पीले रंगवाली, किंचित हरितवर्ण वाली, सोने और चांदी के हार पहनने वाली, चांदी के समान धवल पुष्पों की माला धारण करने वाली, चन्द्र के समान प्रसन्नकान्ति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी को मेरे लिए आवाहन करो (बुलाइए)।

तां म आ वह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।२।।

हे अग्निदेव! आप उन जगत प्रसिद्ध लक्ष्मीजी को, जिनका कभी विनाश नहीं होता तथा जिनके आगमन से मैं सोना, गौ, घोड़े तथा पुत्रादि को प्राप्त करुंगा, मेरे लिए आवाहन करो।

अश्वपूर्वां रथमध्यां, हस्तिनादप्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुप ह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।३।।

जिन देवी के आगे घोड़े तथा उनके पीछे रथ रहते हैं अथवा जिनके सम्मुख घोड़े रथ में जुते हुए हैं, ऐसे रथ में बैठी हुई, हाथियों के निनाद से प्रमुदित होने वाली, देदीप्यमान एवं समस्तजनों को आश्रय देने वाली लक्ष्मीजी को मैं अपने सम्मुख बुलाता हूँ। दीप्यमान व सबकी आश्रयदाता वह लक्ष्मी मेरे घर में सर्वदा निवास करें।

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम्।।४।।

जो साक्षात् ब्रह्मरूपा, मन्द-मन्द मुसकराने वाली, जो चारों ओर सुवर्ण से ओत-प्रोत हैं, दया से आर्द्र हृदय वाली या समुद्र से प्रादुर्भूत (प्रकट) होने के कारण आर्द्र शरीर होती हुई भी तेजोमयी हैं, स्वयं पूर्णकामा होने के कारण भक्तों के नाना प्रकार के मनोरथों को पूर्ण करने वाली, भक्तानुग्रहकारिणी, कमल के आसन पर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहां आवाहन करता हूँ।

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।।५।।

मैं चन्द्र के समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर, द्युतिशालिनी, यश से दीप्तिमती, स्वर्गलोक में देवगणों के द्वारा पूजिता, उदारशीला, पद्महस्ता, सभी की रक्षा करने वाली एवं आश्रयदात्री लक्ष्मीदेवी की शरण ग्रहण करता हूँ। मेरा दारिद्रय दूर हो जाय। मैं आपको शरण्य के रूप में वरण करता हूँ अर्थात् आपका आश्रय लेता हूँ।

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६।।

हे सूर्य के समान कान्ति वाली! तुम्हारे ही तप से वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिना फूल के फल देने वाला बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ। उस बिल्व वृक्ष के फल हमारे बाहरी और भीतरी (मन व संसार के) दारिद्रय को दूर करें।

उपैतु मां दैवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।७।।

हे लक्ष्मी! देवसखा (महादेव के सखा) कुबेर और उनके मित्र मणिभद्र अर्थात् चिन्तामणि तथा दक्ष प्रजापति की कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों। अर्थात् मुझे धन और यश की प्राप्ति हो। मैं इस राष्ट्र में–देश में उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें।

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वां निर्णुद मे गृहात्।।८।।

लक्ष्मी की ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी) का, जो क्षुधा और पिपासा से मलिन–क्षीणकाय रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ। देवि! मेरे घर से सब प्रकार के दारिद्रय और अमंगल को दूर करो।

गन्धद्वारां दुराधर्षां, नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां, तामिहोप ह्वये श्रियम्।।९।।

सुगन्धित पुष्प के समर्पण करने से प्राप्त करने योग्य, किसी से भी दबने योग्य नहीं, धन-धान्य से सर्वदा पूर्ण, गौ-अश्वादि पशुओं की समृद्धि देने वाली, समस्त प्राणियों की स्वामिनी तथा संसार प्रसिद्ध लक्ष्मीदेवी का मैं यहां–अपने घर में आवाहन करता हूँ।

मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।१०।।

हे लक्ष्मी देवी! आपके प्रभाव से मन की कामनाएं और संकल्प की सिद्धि एवं वाणी की सत्यता मुझे प्राप्त हों; मैं गौ आदि पशुओं के दूध, दही, यव आदि एवं विभिन्न अन्नों के रूप (भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, लेह्य, चतुर्विध भोज्य पदार्थों)  को प्राप्त करुँ। सम्पत्ति और यश मुझमें आश्रय लें अर्थात् मैं लक्ष्मीवान एवं कीर्तिमान बनूँ।

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्।।११।।

लक्ष्मी के पुत्र कर्दम की हम संतान हैं। कर्दम ऋषि! आप हमारे यहां उत्पन्न हों (अर्थात् कर्दम ऋषि की कृपा होने पर लक्ष्मी को मेरे यहां रहना ही होगा) मेरे घर में लक्ष्मी निवास करें। पद्मों की माला धारण करने वाली सम्पूर्ण संसार की माता लक्ष्मीदेवी को हमारे कुल में स्थापित कराओ।

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले।।१२।।

समुद्र-मन्थन द्वारा चौदह रत्नों के साथ लक्ष्मी का भी आविर्भाव हुआ है। इसी अभिप्राय में कहा गया है कि वरुण देवता स्निग्ध पदार्थों की सृष्टि करें। पदार्थों में सुन्दरता ही लक्ष्मी है। लक्ष्मी के आनन्द, कर्दम, चिक्लीत और श्रीत–ये चार पुत्र हैं। इनमें चिक्लीत से प्रार्थना की गयी है। हे लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत! आप भी मेरे घर में वास करें और दिव्यगुणयुक्ता तथा सर्वाश्रयभूता अपनी माता लक्ष्मी को भी मेरे कुल में निवास करायें।

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आ वह।।१३।।

हे अग्निदेव! हाथियों के शुण्डाग्र से अभिषिक्त अतएव आर्द्र शरीर वाली, पुष्टि को देने वाली अर्थात् पुष्टिरूपा, पीतवर्णा, पद्मों (कमल) की माला धारण करने वाली, चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्ति से युक्त, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी का मेरे घर में आवाहन करें।

आर्द्रां य करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१४।।

हे अग्निदेव! जो दुष्टों का निग्रह करने वाली होने पर भी कोमल स्वभाव की हैं, जो मंगलदायिनी, अवलम्बन प्रदान करने वाली यष्टिरूपा हैं (जिस प्रकार लकड़ी के बिना असमर्थ पुरुष चल नहीं सकता, उसी प्रकार लक्ष्मी के बिना संसार का कोई भी कार्य ठीक प्रकार नहीं हो पाता), सुन्दर वर्णवाली, सुवर्णमालाधारिणी, सूर्यस्वरूपा तथा हिरण्यमयी हैं (जिस प्रकार सूर्य प्रकाश और वृष्टि द्वारा जगत का पालन-पोषण करता है, उसी प्रकार लक्ष्मी ज्ञान और धन के द्वारा संसार का पालन-पोषण करती है), उन प्रकाशस्वरूपा लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें।

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्।।१५।।

हे अग्निदेव! कभी नष्ट न होने वाली उन स्थिर लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें जो मुझे छोड़कर अन्यत्र नहीं जाने वाली हों, जिनके आगमन से बहुत-सा धन, उत्तम ऐश्वर्य, गौएं, दासियां, अश्व और पुत्रादि को हम प्राप्त करें।

य: शुचि: प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पंचदशर्चं च श्रीकाम: सततं जपेत्।।१६।।

जिसे लक्ष्मी की कामना हो, वह प्रतिदिन पवित्र और संयमशील होकर अग्नि में घी की आहुतियां दे तथा इन पंद्रह ऋचाओं वाले–’श्री-सूक्त’ का निरन्तर पाठ करे।

श्री-सूक्त में पन्द्रह ऋचाएं हैं। माहात्म्य सहित सोलह ऋचाएं मानी गयी हैं क्योंकि किसी भी स्तोत्र का बिना माहात्म्य के पाठ करने से फल प्राप्ति नहीं होती। अत: सोलह ऋचाओं का पाठ करना चाहिए। ऋग्वेद में वर्णित श्री-सूक्त के द्वारा जो भी श्रद्धापूर्वक लक्ष्मी का पूजन करता है, वह सात जन्मों तक निर्धन नहीं होता।
श्री लक्ष्मी सूक्तम्‌ स्तोत्र 

पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि। 
विश्वप्रिये विश्वमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥ 
- हे लक्ष्मी देवी! आप कमलमुखी, कमल पुष्प पर विराजमान, कमल-दल के समान नेत्रों वाली, कमल पुष्पों को पसंद करने वाली हैं। सृष्टि के सभी जीव आपकी कृपा की कामना करते हैं। आप सबको मनोनुकूल फल देने वाली हैं। हे देवी! आपके चरण-कमल सदैव मेरे हृदय में स्थित हों। 

पद्मानने पद्मऊरू पद्माक्षी पद्मसम्भवे। 
तन्मे भजसिं पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्‌ ॥ 
- हे लक्ष्मी देवी! आपका श्रीमुख, ऊरु भाग, नेत्र आदि कमल के समान हैं। आपकी उत्पत्ति कमल से हुई है। हे कमलनयनी! मैं आपका स्मरण करता हूं, आप मुझ पर कृपा करें। 

अश्वदायी गोदायी धनदायी महाधने। 
धनं मे जुष तां देवि सर्वांकामांश्च देहि मे ॥ 
- हे देवी! अश्व, गौ, धन आदि देने में आप समर्थ हैं। आप मुझे धन प्रदान करें। हे माता! मेरी सभी कामनाओं को आप पूर्ण करें । 
 
पुत्र-पौत्र, धन-धान्य दिलाएंगी मां लक्ष्मी

पुत्र पौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम्‌। 
प्रजानां भवसी माता आयुष्मंतं करोतु मे ॥ 
- हे देवी! आप सृष्टि के समस्त जीवों की माता हैं। आप मुझे पुत्र-पौत्र, धन-धान्य, हाथी-घोड़े, गौ, बैल, रथ आदि प्रदान करें। आप मुझे दीर्घ-आयुष्य बन ाए ं। 

धनमाग्नि धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसु। 
धन मिंद्रो बृहस्पतिर्वरुणां धनमस्तु मे ॥ 
- हे लक्ष्मी! आप मुझे अग्नि, धन, वायु, सूर्य, जल, बृहस्पति, वरुण आदि की कृपा द्वारा धन की प्राप्ति कराएं। 

वैनतेय सोमं पिव सोमं पिवतु वृत्रहा। 
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥ 
- हे वैनतेय पुत्र गरुड़! वृत्रासुर के वधकर्ता, इंद्र, आदि समस्त देव जो अमृत पीने वाले हैं, मुझे अमृतयुक्त धन प्रदान करें। 
अशुभ कर्मों को दूर करेंगी मां लक्ष्मी

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः। 
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्‌ ॥ 
- इस सूक्त का पाठ करने वाले की क्रोध, मत्सर, लोभ व अन्य अशुभ कर्मों में वृत्ति नहीं रहती, वे सत्कर्म की ओर प्रेरित होते हैं। 

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गंधमाल्यशोभे। 
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरी प्रसीद मह्यम्‌ ॥ 
- हे त्रिभुवनेश्वरी! हे कमलनिवासिनी! आप हाथ में कमल धारण किए रहती हैं। श्वेत, स्वच्छ वस्त्र, चंदन व माला से युक्त हे विष्णुप्रिया देवी! आप सबके मन की जानने वाली हैं। आप मुझ दीन पर कृपा करें। 

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्‌। 
लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम ॥ 
- भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी, माधवप्रिया, भगवान अच्युत की प्रेयसी, क्षमा की मूर्ति, लक्ष्मी देवी मैं आपको बारंबार नमन करता हूं। 
कैसे करें महादेवी लक्ष्मी का स्मरण

महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि। 
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्‌ ॥ 
- हम महादेवी लक्ष्मी का स्मरण करते हैं। विष्णुपत्नी लक्ष्मी हम पर कृपा करें, वे देवी हमें सत्कार्यों की ओर प्रवृत्त करें। 

चंद्रप्रभां लक्ष्मीमेशानीं सूर्याभांलक्ष्मीमेश्वरीम्‌। 
चंद्र सूर्याग्निसंकाशां श्रिय देवीमुपास्महे ॥ 
- जो चंद्रमा की आभा के समान शीतल और सूर्य के समान परम तेजोमय हैं उन परमेश्वरी लक्ष्मीजी की हम आराधना करते हैं। 

श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाभिधाच्छ्रोभमानं महीयते। 
धान्य धनं पशु बहु पुत्रलाभम्‌ सत्संवत्सरं दीर्घमायुः ॥ 
- इस लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने से व्यक्ति श्री, तेज, आयु, स्वास्थ्य से युक्त होकर शोभायमान रहता है। वह धन-धान्य व पशु धन सम्पन्न, पुत्रवान होकर दीर्घायु होता है। 
॥ इतिश्री लक्ष्मी सूक्तम्‌ संपूर्णम्‌ ॥

नमस्ते  अस्तु  महामाये  श्री पीठे  सुरपूजिते I 
शंख चक्र गदा हस्ते  महालक्ष्मि  नमोस्तु  ते II
नमस्ते  गरुडारूढे कोलासुर भयङ्करि I
सर्व पापहरे देवि  महालक्ष्मि नमोस्तु  ते II
सर्वज्ञे सर्व वरदे सर्व दुष्ट भयङ्करि I
सर्व दुःखहरे देवि  महालक्ष्मि नमोस्तु  ते II
सिद्धि बुद्धि प्रदे  देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि I
मन्त्रपूते सदा देवि  महालक्ष्मि  नमोस्तु  ते I I
आद्यन्त रहिते  देवि  आद्य शक्ति महेश्वरि I
योगजे योग सम्भूते महालक्ष्मि  नमोस्तु  ते  II
स्थूल सूक्ष्म महारौद्रे  महाशक्ति महोदरे I
महा पाप हरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते II
पद्मासन स्थिते  देवि  परब्रह्म स्वरूपिणि I
परमेशि जगन्मातः महालक्ष्मि  नमोस्तु  ते II
श्वेताम्बरधरे  देवि  नानालङ्कारभूषिते I
जगत्स्थिते  जगन्मातः  महालक्ष्मि  नमोस्तु  ते II
महालक्ष्म्यष्टकम्  स्तोत्रं  यः पठेद्  भक्तिमान्  नरः I
सर्वसिद्धिम्  अवाप्नोति  राज्यं  प्राप्नोति  सर्वदा II
एकका ले  पठेन्नित्यं  महापापविनाशनं I
द्विकालं  यः पठेन्नित्यं  धनधान्य समन्वितः II
त्रिकालं  यः  पठेन्नित्यं  महाशत्रुविनाशनं I
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं  प्रसन्ना  वरदा  शुभा II
*अष्ट लक्ष्मी रूप एवं स्तोत्र मंत्र ।

माँ लक्ष्मी के 8 रूप माने जाते है।हर रूप विभिन्न कामनाओ को पूर्ण करने वाला है। दिवाली और हर शुक्रवार को माँ लक्ष्मी के इन सभी रूपों की वंदना करने से असीम सम्पदा और धन की प्राप्ति होती है।

१) आदि लक्ष्मी या महालक्ष्मी :

माँ लक्ष्मी का सबसे पहला अवतार जो ऋषि भृगु की बेटी के रूप में है।

मंत्र 

सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवी चन्द्र सहोदरीहेममये |
मुनिगणमंडित मोक्षप्रदायिनी मंजुलभाषिणीवेदनुते ||
पंकजवासिनी देवसुपुजित सद्रुणवर्षिणी शांतियुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी आदिलक्ष्मी सदापलीमाम ||

२) धन लक्ष्मी :

धन और वैभव से परिपूर्ण करने वाली लक्ष्मी का एक रूप भगवान विष्णु भी एक बारे देवता कुबेर से धन उधार लिया जो समय पर वो चूका नहीं सके , तब धन लक्ष्मी ने ही विष्णु जी को कर्ज मुक्त करवाया था।

मंत्र

धिमिधिमी धिंधिमी धिंधिमी धिंधिमी दुन्दुभी नाद सुपूर्णमये |
घूमघूम घुंघुम घुंघुम घुंघुम शंखनिनाद सुवाद्यनुते ||
वेदपूराणेतिहास सुपूजित वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी धनलक्ष्मी रूपेण पालय माम || 

३) धान्य लक्ष्मी :

धान्य का मतलब है अनाज : मतलब वह अनाज की दात्री है।

मंत्र

अहिकली कल्मषनाशिनि कामिनी वैदिकरुपिणी वेदमये |
क्षीरमुद्भव मंगलरूपिणी मन्त्रनिवासिनी मन्त्रनुते | |
मंगलदायिनि  अम्बुजवासिनि देवगणाश्रित पाद्युते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी धान्यलक्ष्मी सदा पली माम|| 

४) गज लक्ष्मी :

उन्हें गज लक्ष्मी भी कहा जाता है, पशु धन की देवी जैसे पशु और हाथियों, वह राजसी की शक्ति देती है ,यह कहा जाता है गज - लक्ष्मी माँ ने भगवान इंद्र को सागर की गहराई से अपने खोए धन को हासिल करने में मदद की थी। देवी लक्ष्मी का यह रूप प्रदान करने के लिए है और धन और समृद्धि की रक्षा करने के लिए है।

मंत्र साधना 
जयजय दुर्गतिनाशिनी कामिनी सर्वफलप्रद शास्त्रमये |
रथगज तुरगपदादी  समावृत परिजनमंडित लोकनुते ||
हरिहर ब्रम्हा सुपूजित सेवित तापनिवारिणी पादयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी गजलक्ष्मी  रूपेण पलेमाम ||

५) सनातना लक्ष्मी :

सनातना लक्ष्मी का यह रूप बच्चो और अपने भक्तो को लम्बी उम्र देने के लिए है। वह संतानों की देवी है। देवी लक्ष्मी को इस रूप में दो घड़े , एक तलवार , और एक ढाल पकड़े , छह हथियारबंद के रूप में दर्शाया गया है ; अन्य दो हाथ अभय मुद्रा में लगे हुए है एक बहुत ज़रूरी बात उनके गोद में एक बच्चा है।

मंत्र

अहिखग वाहिनी मोहिनी  चक्रनि रागविवर्धिनी  लोकहितैषिणी
स्वरसप्त भूषित गाननुते सकल सूरासुर देवमुनीश्वर  ||
मानववन्दित पादयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी संतानलक्ष्मी त्वं पालयमाम || 

६) वीरा धैर्य लक्ष्मी :

जीवन में कठिनाइयों पर काबू पाने के लिए, लड़ाई में वीरता पाने ले लिए शक्ति प्रदान करती है।

मंत्र

जयवरवर्णिनी  वैष्णवी भार्गवी मन्त्रस्वरूपिणी  मन्त्रम्ये |
सुरगणपूजित शीघ्रफलप्रद ज्ञानविकासिनी शास्त्रनुते ||
भवभयहारिणी पापविमोचनि साधुजनाश्रित पादयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी धैर्यलक्ष्मी सदापलेमाम ||

७) विजया लक्ष्मी या जया लक्ष्मी :

विजया का मतलब है जीत। विजय लक्ष्मी जीत का प्रतीक है और उन्हें जाया लक्ष्मी भी कहा जाता है। वह एक लाल साड़ी पहने एक कमल पर बैठे, आठ हथियार पकडे हुए रूप में दिखाई गयी है ।

मंत्र

जय कमलासनी सद्रतिदायिनी ज्ञानविकासिनी गानमये |
अनुदिनमर्चित कुमकुमधूसर-भूषित वासित वाद्यनुते ||
कनकधस्तुति  वैभव वन्दित शंकर देशिक मान्य पदे |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी विजयलक्ष्मी सदा पालय माम ||

८) विद्या लक्ष्मी

विद्या का मतलब शिक्षा के साथ साथ ज्ञान भी है ,माँ यह रूप हमें ज्ञान , कला , और विज्ञानं की शिक्षा प्रदान करती है जैंसा माँ सरस्वती देती है। विद्या लक्ष्मी को कमल पे बैठे हुए देखा गया है , उनके चार हाथ है , उन्हें सफेद साडी में और दोनों हाथो में कमल पकड़े हुए देखा गया है , और दूसरे दो हाथ अभया और वरदा मुद्रा में है।

मंत्र

प्रणत सुरेश्वरी भारती भार्गवी शोकविनासिनी रत्नमये |
मणिमयभूषित कर्णविभूषण शांतिसमवृत  हास्यमुखे ||
नवनिधिदायिनी  कलिमहरिणी कामित फलप्रद  हस्त युते  |
जय जय हे मधुसुदन कामिनीविद्यालक्ष्मी  सदा पालय माम  ||
*
llलक्ष्मी कवचं ll
नारायण उवाच
सर्व सम्पत्प्रदस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः।
ऋषिश्छन्दश्च बृहती देवी पद्मालया स्वयम्।।१
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः।
पुण्यबीजं च महतां कवचं परमाद्भुतम्।।२

ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा मे पातु मस्तकम्।
श्रीं मे पातु कपालं च लोचने श्रीं श्रियै नमः।।३
ॐ श्रीं श्रियै स्वाहेति च कर्णयुग्मं सदावतु।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मे पातु नासिकाम्।।४
ॐ श्रीं पद्मालयायै च स्वाहा दन्तं सदावतु।
ॐ श्रीं कृष्णप्रियायै च दन्तरन्ध्रं सदावतु।।५
ॐ श्रीं नारायणेशायै मम कण्ठं सदावतु।
ॐ श्रीं केशवकान्तायै मम स्कन्धं सदावतु।।६
ॐ श्रीं पद्मनिवासिन्यै स्वाहा नाभिं सदावतु।
ॐ ह्रीं श्रीं संसारमात्रे मम वक्षः सदावतु।।७
ॐ श्रीं श्रीं कृष्णकान्तायै स्वाहा पृष्ठं सदावतु।
ॐ ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहा मम हस्तौ सदावतु।।८
ॐ श्रीं निवासकान्तायै मम पादौ सदावतु।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहा सर्वांगं मे सदावतु।।९
प्राच्यां पातु महालक्ष्मीराग्नेय्यां कमलालया।
पद्मा मां दक्षिणे पातु नैर्ऋत्यां श्रीहरिप्रिया।।१०
पद्मालया पश्चिमे मां वायव्यां पातु श्रीः स्वयम्।
उत्तरे कमला पातु ऐशान्यां सिन्धुकन्यका।।११
नारायणेशी पातूर्ध्वमधो विष्णुप्रियावतु।
संततं सर्वतः पातु विष्णुप्राणाधिका मम।।१२
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्।
सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम्।।१३
सुवर्णपर्वतं दत्त्वा मेरुतुल्यं द्विजातये।
यत् फलं लभते धर्मी कवचेन ततोऽधिकम्।।१४
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत् तु यः।
कण्ठे वा दक्षिणे वाहौ स श्रीमान् प्रतिजन्मनि।।१५
अस्ति लक्ष्मीर्गृहे तस्य निश्चला शतपूरुषम्।
देवेन्द्रैश्चासुरेन्द्रैश्च सोऽत्रध्यो निश्चितं भवेत्।।१६
स सर्वपुण्यवान् धीमान् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः।
स स्नातः सर्वतीर्थेषु यस्येदं कवचं गले।।१७
यस्मै कस्मै न दातव्यं लोभमोहभयैरपि।
गुरुभक्ताय शिष्याय शरणाय प्रकाशयेत्।।१८
इदं कवचमज्ञात्वा जपेल्लक्ष्मीं जगत्प्सूम्।
कोटिसंख्यं प्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सोद्धिदायकः।।१९
========================
।।श्री ब्रह्मवैवर्ते महालक्ष्मी कवचं।।

👣👣👣श्री देवी  माँ लक्ष्मी कवच👣👣👣
               श्रीमधुसूदन उवाच

गृहाण कवचं शक्र सर्वदुःखविनाशनम्।
परमैश्वर्यजनकं सर्वशत्रुविमर्दनम्।।

ब्रह्मणे च पुरा दत्तं संसारे च जलप्लुते।
यद् धृत्वा जगतां श्रेष्ठः सर्वैश्वर्ययुतो विधिः।।

बभूवुर्मनवः सर्वे सर्वैश्वर्ययुतो यतः।
सर्वैश्वर्यप्रदस्यास्य कवचस्य ऋषिर्विधि।।

पङ्क्तिश्छन्दश्च सा देवी स्वयं पद्मालया सुर।
सिद्धैश्वर्यजपेष्वेव विनियोगः प्रकीर्तित।।

यद् धृत्वा कवचं लोकः सर्वत्र विजयी भवेत्।।

।।मूल कवच पाठ।।

मस्तकं पातु मे पद्मा कण्ठं पातु हरिप्रिया।
नासिकां पातु मे लक्ष्मीः कमला पातु लोचनम्।।

केशान् केशवकान्ता च कपालं कमलालया।
जगत्प्रसूर्गण्डयुग्मं स्कन्धं सम्पत्प्रदा सदा।।

ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु।
ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा वक्षः सदावतु।।

पातु श्रीर्मम कंकालं बाहुयुग्मं च ते नमः।।

ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः पादौ पातु मे संततं चिरम्।
ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा पातु नितम्बकम्।।

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा सर्वांगं पातु मे सदा।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मां पातु सर्वतः।।

।।फलश्रुति।।

इति ते कथितं वत्स सर्वसम्पत्करं परम्।
सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम्।।

गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं शरयेत्तु यः।
कण्ठे वा दक्षिणे बांहौ स सर्वविजयी भवेत्।।

महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन।
तस्य छायेव सततं सा च जन्मनि जन्मनि।।

इदं कवचमज्ञात्वा भजेल्लक्ष्मीं सुमन्दधीः।
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः।।

।।इति श्रीब्रह्मवैवर्ते इन्द्रं प्रति हरिणोपदिष्टं लक्ष्मीकवचं।।
(गणपतिखण्ड २२।५-१७)
भावार्थः-

श्रीमधुसूदन बोले- इन्द्र, (लक्ष्मी-प्राप्ति के लिये) तुम लक्ष्मीकवच ग्रहण करो। यह समस्त दुःखों का विनाशक, परम ऐश्वर्य का उत्पादक और सम्पूर्ण शत्रुओं का मर्दन करने वाला है। पूर्वकाल में जब सारा संसार जलमग्न हो गया था, उस समय मैनें इसे ब्रह्मा को दिया था। जिसे धारण करके ब्रह्मा त्रिलोकी में श्रेष्ठ और सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के भागी हुए थे।

देवराज, इस सर्वैश्वर्यप्रद कवच के ब्रह्मा ऋषि हैं, पङ्क्ति छन्द है, स्वयं पद्मालया लक्ष्मी देवी है और सिद्धैश्वर्य के जपों में इसका विनियोग कहा गया है। इस कवच के धारण करने से लोग सर्वत्र विजयी होते हैं।

पद्मा मेरे मस्तक की रक्षा करें। हरिप्रिया कण्ठ की रक्षा करें। लक्ष्मी नासिका की रक्षा करें। कमला नेत्र की रक्षा करें। केशवकान्ता केशों की, कमलालया कपाल की, जगज्जननी दोनों कपोलों की और सम्पत्प्रदा सदा स्कन्ध की रक्षा करें। “ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा” मेरे पृष्ठं भाग का सदा पालन करें। “ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा” वक्षःस्थल को सदा सुरक्षित रखे। श्री देवी को नमस्कार है वे मेरे कंकालं तथा दोनों भुजाओं को बचावे। “ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः” चिरकाल तक मेरे पैरों का पालन करें। “ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा” नितम्ब भाग की रक्षा करें। “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा” मेरे सर्वांग की सदा रक्षा करे। “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा” सब ओर से सदा मेरा पालन करे।

वत्स, इस प्रकार मैंने तुमसे इस सर्वैश्वर्यप्रद नामक परमोत्कृष्ट कवच का वर्णन कर दिया। यह परम अद्भुत कवच सम्पूर्ण सम्पत्तियों को देने वाला है। जो मनुष्य विधिपूर्वक गुरु की अर्चना करके इस कवच को गले में अथवा दाहिनी भुजा पर धारण करता है, वह सबको जीतने वाला हो जाता है। महालक्ष्मी कभी उसके घर का त्याग नहीं करती; बल्कि प्रत्येक जन्म में छाया की भाँति सदा उसके साथ लगी रहती है। जो मन्दबुद्धि इस कवच को बिना जाने ही लक्ष्मी की भक्ति करता है, उसे एक करोड़ जप करने पर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।

 मैनें इसे ब्रह्मा को दिया था। जिसे धारण करके ब्रह्मा त्रिलोकी में श्रेष्ठ और सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के भागी हुए थे।

देवराज, इस सर्वैश्वर्यप्रद कवच के ब्रह्मा ऋषि हैं, पङ्क्ति छन्द है, स्वयं पद्मालया लक्ष्मी देवी है और सिद्धैश्वर्य के जपों में इसका विनियोग कहा गया है। इस कवच के धारण करने से लोग सर्वत्र विजयी होते हैं।

पद्मा मेरे मस्तक की रक्षा करें। हरिप्रिया कण्ठ की रक्षा करें। लक्ष्मी नासिका की रक्षा करें। कमला नेत्र की रक्षा करें। केशवकान्ता केशों की, कमलालया कपाल की, जगज्जननी दोनों कपोलों की और सम्पत्प्रदा सदा स्कन्ध की रक्षा करें। “ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा” मेरे पृष्ठं भाग का सदा पालन करें। “ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा” वक्षःस्थल को सदा सुरक्षित रखे। श्री देवी को नमस्कार है वे मेरे कंकालं तथा दोनों भुजाओं को बचावे। “ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः” चिरकाल तक मेरे पैरों का पालन करें। “ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा” नितम्ब भाग की रक्षा करें। “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा” मेरे सर्वांग की सदा रक्षा करे। “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा” सब ओर से सदा मेरा पालन करे।

वत्स, इस प्रकार मैंने तुमसे इस सर्वैश्वर्यप्रद नामक परमोत्कृष्ट कवच का वर्णन कर दिया। यह परम अद्भुत कवच सम्पूर्ण सम्पत्तियों को देने वाला है। जो मनुष्य विधिपूर्वक गुरु की अर्चना करके इस कवच को गले में अथवा दाहिनी भुजा पर धारण करता है, वह सबको जीतने वाला हो जाता है। महालक्ष्मी कभी उसके घर का त्याग नहीं करती; बल्कि प्रत्येक जन्म में छाया की भाँति सदा उसके साथ लगी रहती है। जो मन्दबुद्धि इस कवच को बिना जाने ही लक्ष्मी की भक्ति करता है, उसे एक करोड़ जप करने पर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।

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कमला माता मंत्र
ॐ ऐंह्रींश्रींक्लीं हं सौं जगत्प्रसूत्यै नमः î

॥ श्रीकमलाकवचम् ॥

श्रीगणेशाय नमः ।
ॐ अस्याश्चतुरक्षराविष्णुवनितायाः
कवचस्य श्रीभगवान् शिव ऋषीः ।
अनुष्टुप्छन्दः । वाग्भवा देवता ।
वाग्भवं बीजम् । लज्जा शक्तिः ।
रमा कीलकम् । कामबीजात्मकं कवचम् ।
मम सुकवित्वपाण्डित्यसमृद्धिसिद्धये पाठे विनियोगः ।

ऐङ्कारो मस्तके पातु वाग्भवां सर्वसिद्धिदा ।
ह्रीं पातु चक्षुषोर्मध्ये चक्षुर्युग्मे च शाङ्करी ॥ १॥

जिह्वायां मुखवृत्ते च कर्णयोर्दन्तयोर्नसि ।
ओष्ठाधारे दन्तपङ्क्तौ तालुमूले हनौ पुनः ॥ २॥

पातु मां विष्णुवनिता लक्ष्मीः श्रीवर्णरूपिणी ॥

कर्णयुग्मे भुजद्वन्द्वे स्तनद्वन्द्वे च पार्वती ॥ ३॥

हृदये मणिबन्धे च ग्रीवायां पार्श्वर्योद्वयोः ।
पृष्ठदेशे तथा गुह्ये वामे च दक्षिणे तथा ॥ ४॥

उपस्थे च नितम्बे च नाभौ जंघाद्वये पुनः ।
जानुचक्रे पदद्वन्द्वे घुटिकेऽङ्गुलिमूलके ॥ ५॥

स्वधा तु प्राणशक्त्यां वा सीमन्यां मस्तके तथा ।
सर्वाङ्गे पातु कामेशी महादेवी समुन्नतिः ॥ ६॥

पुष्टिः पातु महामाया उत्कृष्टिः सर्वदाऽवतु ।
ऋद्धिः पातु सदा देवी सर्वत्र शम्भुवल्लभा ॥ ७॥

वाग्भवा सर्वदा पातु पातु मां हरगेहिनी ।
रमा पातु महादेवी पातु माया स्वराट् स्वयम् ॥ ८॥

सर्वाङ्गे पातु मां लक्ष्मीर्विष्णुमाया सुरेश्वरी ।
विजया पातु भवने जया पातु सदा मम ॥ ९॥

शिवदूती सदा पातु सुन्दरी पातु सर्वदा ।
भैरवी पातु सर्वत्र भेरुण्डा सर्वदाऽवतु ॥ १०॥

त्वरिता पातु मां नित्यमुग्रतारा सदाऽवतु ।
पातु मां कालिका नित्यं कालरात्रिः सदाऽवतु ॥ ११॥

नवदुर्गाः सदा पातु कामाख्या सर्वदाऽवतु ।
योगिन्यः सर्वदा पातु मुद्राः पातु सदा सम ॥ १२॥

मात्राः पातु सदा देव्यश्चक्रस्था योगिनी गणाः ।
सर्वत्र सर्वकार्येषु सर्वकर्मसु सर्वदा ॥ १३॥

पातु मां देवदेवी च लक्ष्मीः सर्वसमृद्धिदा ॥

॥ इति विश्वसारतन्त्रे श्रीकमलाकवचं सम्पूर्णम् ॥

कमला माता को लक्ष्मी का ही रुप माना जाता है। मां कमला साधक को धन व ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। यह दस महाविद्या में शामिल हैं। ये दस महाविद्याओं में दसवें स्थान पर हैं। वैसे तो इन दसों महाविद्याओं में शामिल सभी देवियां अपने-आप में पूर्ण हैं लेकिन साधक की सुविधा, साधना क्रम और आध्यात्मिक लक्ष्य के अनुसार इन्हें क्रम दिया गया है। सिद्धविद्यात्रयी में कमला माता को तीसरा स्थान प्राप्त है। इनकी उपासना दक्षिण और वाम दोनों मार्ग से की जाती है।
कमला माता मंत्र
1. एकाक्षरी कमला मंत्र
श्रीं॥
मां कमला का एकाक्षरी मंत्र श्रीं बहुत ही प्रभावशाली है इस मंत्र के ऋषि भृगु हैं और निवृद छंद। मां लक्ष्मी से धन्य व ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है। श्रीं= श्+र+ई+नाद+बिंदू से बना है इसमें श् मां लक्ष्मी, र धन व संपत्ती के लिए ई महामाया तो नाद जगत जननी के लिए प्रयुक्त हुआ है। वहीं हर मंत्र में बिंदु का प्रयोग दुखहर्ता अर्थात दु:खों का हरण करने वाले के रुप में किया जाता है।
 2. द्वीक्षरी साम्राज्य लक्ष्मी मंत्र
स्ह्क्ल्रीं हं॥
इस बीज मंत्र के ऋषि हरि हैं एवं छंद गायत्री है, इस मंत्र में साम्राज्यदा मोहिनी लक्ष्मी देवता का आह्वान किया जाता है।
3. त्रयाक्षरी साम्राज्य लक्ष्मी मंत्र
श्रीं क्लीं श्रीं॥
श्रीं का अर्थ उपरोक्त मंत्र में सपष्ट किया गया है क्लीं कामबीज अथवा कृष्णबीज के रुप में प्रयोग होता है जिसमें क= योगस्त या श्रीकृष्ण, ल= दिव्यतेज, ई= योगीश्वरी या योगेश्वर एवं बिंदु= दुखहरण यहां पर इसका प्रयोग कामबीज रुप में हुआ है जिसका तात्पर्य है राजराजेश्वरी योगमाया मेरे दुख दूर करें। अर्थात पूरे मंत्र के जरिये साधक मां लक्ष्मी एवं मां राजराजेश्वरी योगमाया का आह्वान करता है और सुख, समृद्धि के साथ दुखों के हरण की कामना करता है।
 
4. चतुराक्षरी कमला मंत्र
ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं॥
इस चतुराक्षरी बीज मंत्र में ऐं माता सरस्वती, श्रीं मां लक्ष्मी, ह्रीं शिवयुक्त विश्वमाता आद्य शक्ति, क्लीं योगमाया के लिए प्रयुक्त हुआ। ये सभी कमला माता के ही भिन्न रुप हैं। इस मंत्र के जरिये साधक देवी के इन सभी रुपों से अपने संकटों का हरण करने एवं उसकी मनोकामना पूर्ण करने की कामना करता है।
5. पंचाक्षरी कमला मंत्र
श्रीं क्लीं श्रीं नमः॥
इस मंत्र का अर्थ त्रयाक्षरी मंत्र के समान हैं। किसी भी मंत्र या बीज मंत्र का जाप देवी-देवता को खुश कर उनकी कृपा प्राप्त कर अपने मनोरथ सिद्ध करने के लिये ही किया जाता है ऐसे में कई मंत्रों के अंत में स्वाहा, फट् आदि लगा होता है ये एक विशेष प्रयोजन में प्रयोग किये जाते हैं। बीज मंत्रों के अंत में नम: का प्रयोग स्तम्भन, विद्वेषण और मोहन के लिए किया जाता है।  
6. नवाक्षरी सिद्धी लक्ष्मी मंत्र
ॐ ह्रीं हूं हां ग्रें क्षौं क्रों नमः॥
ॐ परमपिता परमात्मा अर्थात ईश्वर, ह्रीं शिवयुक्त विश्वमाता आद्य शक्ति, हूं कूर्च बीज है इसमें ह भगवान शिव के लिए ऊ भैरव एवं अनुस्वार दुखहर्ता के लिए है, इसका तात्पर्य है असुर संहारक भगवान शिव मेरे दुखों का नाश करें, इसी प्रकार अन्य बीज मंत्र भी अलग-अलग देवी-देवताओं का प्रतिनिध्व करते हैं। इसलिए अपने मंत्र की शक्ति को बढ़ाने के लिए प्रत्येक देवी-देवता के मंत्र में अन्य देवी-देवताओं के मंत्र को शामिल कर लिया जाता है ताकि साधक को साधना का अभिष्ट फल निर्विघ्न रुप से प्राप्त हो। कुल मिलाकर इस मंत्र के माध्यम से भी यही आह्वान किया गया है कि साधक के जीवन के कष्टों को दूर करते हुए सभी देव उसके जीवन को समृद्ध करें एवं शत्रुओं का शमन करें।
7. दशाक्षरी कमला मंत्र
ॐ नमः कमलवासिन्यै स्वाहा॥
माता कमला का यह दशाक्षरी मंत्र काफी लोकप्रिय है। इसमें भी साधक मां कमला से पापों का नाश करने, जीवन में समृद्धि लाने के लिए, आंतरिक शक्ति को मजबूत करने की प्रार्थना करता है।
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माँ लक्ष्मी के धन प्राप्ति के मंत्र और प्रयोग

महामंत्र जिसमे माँ लक्ष्मी और विष्णु भगवान की उपासना करने के छंद रूप महामंत्र जिनसे सुख समृद्धि प्राप्त की जा सकती है | इन मंत्रो से धन धान और सुख शांति में बढ़ोतरी की जा सकती है | माँ लक्ष्मी धन बरसाने वाली और निर्धनता दूर करने वाली देवी है | इनके चमत्कारी मंत्रो के जाप से इनकी कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति जीवन में धन की कमी से दूर रहता है |

माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने और धन प्राप्ति का मंत्र

माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उनके प्रिय वार शुक्रवार के दिन का वैभव लक्ष्मी व्रत नियम से करना चाहिए | माँ लक्ष्मी के दिव्य और चमत्कारी मंत्रो का जाप करे |

विष्णु लक्ष्मी मंत्र

ॐ ह्रीं ह्रीं श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नम:।

श्री लक्ष्मी मंत्र : 2

ॐ आं ह्रीं क्रौं श्री श्रिये नम: ममा लक्ष्मी 
नाश्य-नाश्य मामृणोत्तीर्ण कुरु-कुरु
सम्पदं वर्धय-वर्धय स्वाहा:।

महामंत्र : 3

पद्मानने पद्म पद्माक्ष्मी पद्म संभवे 
तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्।।

महामंत्र : 4

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नम:

महामंत्र : 5

ॐ ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये,
धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा:।

महामंत्र : 6

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्ह नम: महालक्ष्म्यै 
धरणेंद्र पद्मावती सहिते हूं श्री नम:।

महामंत्र : 7

ऊं ह्रीं त्रिं हुं फट

महामंत्र : 8

ऊं श्रीं, ऊं ह्रीं श्रीं, ऊं ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम

महामंत्र : 9

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिभुवन महालक्ष्म्यै अस्मांक दारिद्र्य नाशय प्रचुर धन देहि देहि क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ ।

महामंत्र : 10

ॐ श्रीं श्रियै नमः।

उपरोक्त सभी महामंत्र देवी लक्ष्मी और विष्णु भगवान को प्रसन्न करने और अपार धन सम्पदा को प्राप्त करने के लिए है |

सनातन धर्म में देवी लक्ष्मी को धन की देवी माना गया है। उनकी कृपा से ही व्यक्ति रूपए-संपत्ती से संबंधित सुख-सुविधाएं पा सकता है। यदि महालक्ष्मी मेहरबान हो जाएं तो घर में भर देती हैं धन ही धन। राशि अनुसार जपिए लक्ष्मी मंत्र, इन मंत्रों का कोई विशेष विधान नहीं है। प्रातकाल: उठ कर शुद्ध होने के पश्चात धूप-दीप करने के पश्चात ऊन या कुशासन पर बैठें एवं अपनी शक्ति अनुरूप एक, तीन या पांच माला का जाप करें। निश्चित ही इसका प्रभाव होगा, जिससे धन, यश और समृद्धि की वृद्धि होगी।

मेष
मंत्र- श्रीं

वृषभ
मंत्र- ॐ सर्वबाधा विर्निमुक्तो धनधान्यसुतान्वित:, मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय: 

मिथुन
मंत्र- ॐ श्रीं श्रीये नम:

कर्क
मंत्र- ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ

सिंह
मंत्र- ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नम: 

कन्‍या
मंत्र- ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी नम:

तुला
मंत्र- ॐ श्रीं श्रीय नम:
 
वृश्चिक
मंत्र-  ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नम:

धनु
मंत्र-  ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नम:

मकर
मंत्र-  ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्री ॐ

कुंभ
मंत्र- ऐं ह्रीं श्रीं अष्टलक्ष्मीयै ह्रीं सिद्धये मम गृहे आगच्छागच्छ नमः स्वाहा

मीन
मंत्र- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नम:
   

हिन्दू धर्म के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने से धन की वर्षा होती है, दरिद्रता दूर होती है. जानिए राशि अनुसार क्या है लक्ष्मी मंत्र, जिससे देवी होती हैं प्रसन्‍न्‍ा...
मेष
मां लक्ष्मी के ‘श्रीं’ मंत्र का जाप करना चाहिए. इस शब्द के जाप से देवी प्रसन्न होती हैं. संभव हो तो 10008 बार जाप करें.
 ृषभ
ॐ सर्वबाधा विर्निमुक्तो धनधान्यसुतान्वित:, मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:, इस मंत्र की रोज एक माला जाप करें.

मिथुन
ॐ श्रीं श्रीये नम:, इस मंत्र का रोज जाप करें.

कर्क
ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ, इस मंत्र का रोज जाप करें.
सिंह
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नम: का जाप करें.
देश के इस हिस्से में दीपावली पर नहीं होती लक्ष्मी पूजा, जानें किसे पूजते हैं लोग
कन्‍या
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी नम:, मंत्र का एक माला जाप करें.
तुला
ॐ श्रीं श्रीय नम:, का जाप करें.
वृश्चिक
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नम:, इस मंत्र के जाप से महालक्ष्‍मी प्रसन्‍न होती हैं.
धनु
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नम:, मंत्र का जाप करें.
मकर
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्री ॐ, मंत्र का जाप करें.
कुंभ
ऐं ह्रीं श्रीं अष्टलक्ष्मीयै ह्रीं सिद्धये मम गृहे आगच्छागच्छ नमः स्वाहा, मंत्र का जाप करने से देवी प्रसन्न होंगी.
मीन
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नम:, नित्य दो माला जाप करें.

ॐ श्री शुक्ले महाशुक्ले, महाशुक्ले कमलदल निवासे श्री महालक्ष्मी नमो नमः। लक्ष्मी माई सबकी सवाई, आओ चेतो करो भलाई, ना करो तो सात समुद्रों की दुहाई, ऋद्धि नाथ देवों
नौ नाथ चैरासी सिद्धों की दुहाई। ’
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