स्त्री-पुरुश मांगलिक दोष एवं घट-कुम्भ विवाह विवरण सम्पूर्ण जानकारी

स्त्री पुरुश मांगलिक दोष एवं घट-कुम्भ विवाह विवरण सम्पूर्ण जानकारी 


जब एक बच्चे का जन्म होता है, तब उसके ग्रह स्थिति के स्थान  तय  होते हैं। व्यक्ति की कुंडली में कई तरह दोष (समस्याएँ) होती हैं। ये दोष साढ़े साती, मंगल दोष, काल सर्प दोष, आदि के रूप में हो सकते हैं| प्रत्येक समस्या के दोष को दूर करने या इसके प्रभावों को कम करने का एक उपाय होता है। किसी व्यक्ति के दोषों को उसकी कुंडली से दूर करने के लिए भारत में कई आध्यात्मिक समाधान हैं। हिंदू परंपरा और संस्कृति में, आध्यात्मिकता एक आशीर्वाद है, और यह हर समस्या के लिए एक धार्मिक समाधान देता है।

विवाह में देरी के लिए किसी व्यक्ति द्वारा सामना किए जाने वाले दोषों में से एक मंगल दोष है। मांगलिक दोष उन दोषों में से एक है जो लोगों के जीवन को प्रभावित करता है और कई मुद्दों को जन्म देता है, जैसे कि मांगलिक विवाह में देरी या अमांगलिक वर/ वधु से शादी होना। कुम्भ विवाह में किए गए अनुष्ठानों के बीच एक व्यापक अवधारणा है और इसका वैधव्य योग से प्रभावित स्त्री जीवन पर प्रभाव कम करने में लाभकारी  होता  है।

मंगल दोष एक ऐसा दोष है जो संबंधित व्यक्ति के जीवन और उसके आसपास के लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। मंगल दोष के दुष्प्रभाव से बचने के लिए कई आध्यात्मिक उपाय होते  हैं

मंगल दोष क्या है?

मांगलिक दोष
भगवान मंगल ग्रह किसी व्यक्ति की कुंडली में एक, दो, चार, सातवां, आठवा और बारह घर लग्न कुंडली में मांगलिक दोष / कुजा दोष का कारण बनता है। मंगल ग्रह का स्थान चन्द्र और शुक्र से मांगलिक दोष को 1, 2, 4 वें, 7 वें, 8 वें और 12 वें घरों में चंद्र और शुक्र से चलाता है। विवाह का घर, जिसे  जीवनसाथी का घर भी कहा जाता है, सातवें घर में स्थित है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, सप्तम भाव पर मंगल का प्रभाव विवाहित और दांपत्य जीवन के लिए बुरा होता  है।

    मंगली दोष क्या है?-मंगल यदि जन्मकुंडली में 1,4,7,8,12 भाव में होतो जातक 'मंगली' कहलाता है। (दक्षिण भारतीय पद्धति में दूसरे भाव का मंगलभी मंगली दोष में गिना जाता है।) यह एक सामान्य नियम है। इन भावों में "मंगलीदोष' मंगल क्यों उत्पन्न करता है? इसका उत्तर है-मंगल का दृष्टि प्रभाव। जैसाकि हम जानते हैं कि मंगल अपने से चौथे, सातवें और आठवें भाव को पूर्ण दृष्टिसे देखता है। और मंगल की दृष्टि में संहारक/विनाशात्मक प्रभाव होता है। इसआधार पर-

    प्रथम भाव का मंगल चौथे भाव (परिवार व सुख), सातवें भाव (जीवन-साथी व प्रणय) तथा आठवें भाव (आयु एवं मृत्यु का कारण) को देखता है।परिणामतः जातक के ये तीनों भाव संहारक प्रभाव में आते हैं। इसी प्रकार चौथेभाव का मंगल सातवें भाव (जीवनसाथी), दसबें भाव (पिता एवं कर्मक्षेत्र) तथाग्यारहवें भाव (आय/लाभ स्थान) को संहारक प्रभाव में लाता है। सातरवें भाव कामंगल दसवें भाव, लग्न (जातक स्वयं)तथा दूसरे भाव (धन/कुटुम्ब का भाव) कोमारक प्रभाव में लाता है। आठवें भाव का मंगल ग्यारहवें भाव, दूसरे भाव तथातीसरे भाव (छोटे भाई एवं संघर्ष क्षमता) को मारक प्रभाव में लाता है तथा बारहवेंभाव का मंगल तृतीय भाव, छठे भाव (रोग, ऋण, शत्रु, शोक) तथा सत्तम भाव कोप्रभाव में (मारक) लेता है। दूसरे भाव का मंगल पांचवें भाव (संतान व शिक्षा),आठवें भाव तथा नौवें भाव (भाग्य एवं जनक) को मारक प्रभाव में लेता है।(दक्षिण भारतीय इसलिए दूसरे भाव के मंगल को भी मंगली मानते हैं।)

    आठवां भाव स्त्री के वैधव्य को भी दिखाता है तथा जातक की आयु को भी,     अतः महत्त्वपूर्ण है। जातक की ससुराल भी यही भाव दिखाता है। सातवा भावतथा लग्न पति व पत्नी दोनों को दिखाता है। चौथा भाव जातक की माता, परिवारव सुख के अलावा जातक के ससुर का भी है। इसी प्रकार दसवा भाष जातक केपिता व कर्मक्षेत्र के अलावा जातक की सास का भी है। बारहवा भाव हस्पताल,खर्चे व शयनसुख का है। तीसरा भाव जातक के भाइयों, साहस व संघर्षक्षमता केअलावा जीवनसाथी की भाभियों का भी है। इस प्रकार ये भाव मंगल के मारकप्रभाव में होने से पति, पत्नी, जेठ, देवर, भाई, सास, ससुर, माता, पिता आदि कीमृत्यु या उनको कष्ट, परिवार, गृहस्थ व प्रणय सुख में अवरोध आदि का भी भयउत्पन्न कर देता है। अतः ऐसे जातक को मंगली कहा जाता है। उपाय रूप मेंमंगली का विवाह मंगली के साथ ही करने की प्रथा है, ताकि मंगली दोष आपसमें कट जाए और मंगल का मारक प्रभाव निष्क्रिय हो जाए।

    किन्तु आतंकित होने/करने की बजाय, मंगली दोष को गम्भीरता से समझनाचाहिए।80% मामलों में ‘मंगली दोष' दिखता है, किन्तु होता नहीं है।

    मंगल का अर्थ है कल्याण/शुभत्व, न कि विनाश/अशुभत्व। अतः मंगल ग्रहको मूलतः अशुभ या विनाशक नहीं माना जा सकता। मंगल में सृजनात्मक शक्ति(POSITIVE POWER) तथा विनाशात्मक शक्ति (NEGATIVE POWER) दोनोंपाई जाती हैं। अनेक कुंडलियों में मंगल संहारक होता है किन्तु बहुत-सी कुंडलियोंमें सृजक अथवा पोषक/विकासक भी होता है। अतः मात्र उसके किसी भावविशेष में बैठे होने से ही जातक को मंगली दोष से ग्रस्त मान लेना उचित नहीं है।लाल किताब में इसीलिए मंगल को ‘नेक' तथा ‘बद' दो नामों से पुकारा गया हैऔर दोनों के फल अलग-अलग कहे गए हैं।

    यद्यपि ज्योतिष के प्राचीन ग्रन्थों (होराशास्त्र, बृहद् पाराशर, जातक पारिजातआदि) में मंगल दोष क्रम में नहीं है। फलदीपिका, ज्योतिष सिद्धांत, सारावली,ज्योतिषसार, बृहद् मुक्तावली, मुहूर्त मार्तण्ड, मुहूर्त चिन्तामणि आदि प्राचीन ग्रन्थोंमें ही मंगली दोष का सिरे से उल्लेख नहीं है। जन्मकुंडली के सातवें भाव में मंगलहोने मात्र से ही जातक मंगली हो जाता है तो भगवान राम को भी मंगली होनाचाहिए था (उनकी कुंडली में सातवें भाव में मंगल था)। किन्तु न तो उनकाविवाह विलम्ब से हुआ (जैसा कि मंगली होने पर सम्भावित था) और न हीधर्मग्रन्थों/रामायण, पुराण आदि में उनके मंगली होने का कोई प्रमाण मिलता है।इससे स्पष्ट है कि मंगली दोष को ज्योतिष में बाद में शामिल किया गया होगा।

    बहुत सारे मामलों में जातक पूरी तरह से मंगली नहीं होता (नवमांश,चन्द्रकुंडली व जन्मकुंडली इन तीनों में ही जातक मंगली हो या कम से कम दो मेंहो तभी उसे मंगली कहा जा सकता है। मात्र एक कुंडली के आधार पर नहीं)।     बहुत से मामलों में जातक की ही कुंडली में मंगली दोष का निराकरण/परिहार होरहा होता है। बहुत से मामलों में जीवनसाथी की कुंडली के ग्रह जातक के मंगलीदोष को निष्क्ियु कर रहे/काट रहे होते हैं। बहुत सारे मामलों में अतिविलम्ब सेविवाह होने से ही मंगली दोष समास हो जाता है। शेष मामलों में ही मंगली दोषलागू होता है। परन्तु उनमें भी अनेक का बाद में या पहले उपाय/उपचार करकेपरिहार करना सम्भव होता है। अतः मात्र मंगली दोष के नाम से आतंकित न होजाएं। आगे हम मंगली दोष के निवारण तथा उपचार के विषय में बता रहे हैं।

    पाठक इनको ध्यानपूर्वक पढ़े व समझें। ताकि अभकचरे 'ज्ञानियों' द्वारा गुमराह न हों अथवा स्वयं कुंडली का फलादेश करने में भ्रमित न हो जाएं। मंगली दोष का निर्धारण-मंगली दोष निर्धारण के लिए यह देखनाआवश्यक है कि कुंडली में मंगल किस भाव का स्वामी है? मंगल शुभ/लाभकारी/नेक है अथवा अशुभ/मारक/बद है ? मात्र इसलिए कि मंगल 1,4,7,8 या 12 भाव में बैठा है-जातक को मंगली नहीं कह सकते। (सूर्य व शनि की युति हो तो मंगल 'बद' होता है। पर सूर्य और बुध की युति हो तो मंगल 'नेक ' होता है।) नेक मंगल-यदि शनि और राहू या शनि और केतु एक ही भाव में बैठें बुध और केतु एक ही भाव में बैठें और चंद्रमा 3, 4 या 7 भाव में बैठा हो, शुक्र बैठा हो या चंद्र, मंगल अथवा शुक्र, मंगल युति करते हुए बैठे हों अथवा चन्द्र 1,4,7 या10 भाव अर्थात् केन्द्र ें हो, छठे भाव में सूर्य हो या सूर्य, शनि, गुरु में से कोई 3,4,8,9 भाव में हो या सूर्य, चंद्र या गुरु मंगल के सहायक बन रहे हों (दृष्टि आदि से) तो मंगल के फल शुभ होते हैं।

    बद मंगल-यदि मंगल के मित्रों में से (चन्द्र, सूर्य, गुरु) कोई उसकी सहायता न कर रहा हो तब मंगल अशुभ होता है। अथवा सूर्य, केतु नवम भाव या पंचम भाव में हो। या सूर्य 6 अथवा 12 भाव में राहू से युति करे या शुक्र के साथससम भाव में हो, अथवा सूर्य शनि के साथ 10 भाव में या बुध के साथ 12 भावमें हो अथवा सूर्य 1,8 भाव में मंगल से युति करे और चन्द्र, गुरु 3,4 या 8 भाव मेंन हों अथवा मंगल 3,4,8 भाव में से किसी में हों और शेष दो भावों में बुध व केतु हों तो मंगल को सहायता न मिलने से मंगल 'बद' या अशुभ फल देने वाला हो

    जाता है ‘बद' मंगल राहू की भांति भूत-प्रेत आदि बाधाएं भी देता है।उपरोक्त विवेचन के आधार पर पहले यह तय करना चाहिए कि कुंडली में मंगल शुभ है या अशुभ। फिर यह देखना चाहिए कि मंगल स्वामी कहाँ का है?मंगल दोषकारी है/नहीं-यदि मंगल त्रिकोणेश हो (1,5,9 में से किसीभाव का स्वामी हो) तब मंगल शुभ ही रहता है। यदि मंगल अनिष्ट स्थानों में बलबान होकर स्थित हो अथवा अनिष्ट स्थानों का स्वामी हो, तभी दोषकारी होता     है। दूसरी बात--यदि मंगल सूर्य के साथ/पास होने से अस्त हो अथवा शुभ ग्रह सेदृष्ट हो तो भी दोषकारी नहीं होता।

    अन्य-इनके अलावा मंगल की उच्च व नीच दृष्टि, उसंका वक्री/मार्गीहोना, स्वगृही/मित्रगृही/शत्रुग्रही होना, या मूल त्रिकोण में होना, मंगल की दृष्टियांतथा मंगल पर दृष्टियां, मंगल का योगकारक होना या न होना (कर्क व सिंह लग्नमें मंगल योगकारक होता है) आदि भी विचारें और साथ ही 8,12,5,10,1,7,9भावों और उनके भावेशों की स्थिति भी विचारें तथा कुंडली में गुरु व शुक्र कीस्थिति भी विचारें। तभी निर्णय लें।

    मंगली दोष के प्रभाव—मंगली दोष का जो सबसे बड़ा आ्तक जनमानसके मस्तिष्क में बैठाया गया है, वह यह है कि पति या पत्नी की मृत्यु। किन्तु इसविडम्बना के लिए अकेले मंगल को ही उत्तरदायी कैसे ठहराया जा सकता है?अन्य पृथक्कीकरण के स्वभाव वाले ग्रह-शनि, केतु, राहू तथा सूर्य की स्थिति भीविचारनी चाहिए। SEX के कारक व सौम्य ग्रह शुक्र एवं अतिसौम्य ग्रह गुरु (जोमहिलाओं में पति का कारक है और पुरुषों में शुक्र स्त्री का/पत्नी का कारक भीहै) की स्थिति भी विचारनी चाहिए। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि कुंडली मेंवैधव्य योग, विधुर योग या पुनर्विवाह आदि का योग बनता है या नहीं तथा जातककी कुण्डली में ‘अल्पायु योग' भी बनता है या नहीं। यदि अल्पायु योग तथावैधव्य योग आदि नहीं बनते हैं तो मंगल या कोई भी कैसे विवाह होते हीपति/पत्नी की मृत्यु करा सकता है? यही कारण है कि हमारे प्राचीन ज्योतिषाचारयों-पाराशर, जैमिनी, वराहमिहिर, वैद्यनाथ आदि (जो ज्योतिषशास्त्र के प्रवर्तक तथाएक‘अ्थॉरिटी' रहे थे) ने मंगली दोष के मामले को महत्त्व नहीं दिया है।

    किन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं है कि मंगली दोष का दुष्प्रभाव जातक कोझेलना नहीं पड़ता है। प्रायः विवाह में विलम्ब, विवाह में बाधाएं, गृहस्थ सुख काअभाव, वैवाहिक जीवन में अशांति/कलह/असफलता आदि के प्रभाव ‘मंगलीदोष' से ग्रस्त जातकों को कमोबेश झेलने ही पड़ते हैं (यहां तक कि मंगली दोषकट भी रहा हो तो भी कुछ न कुछ झंझट तो झेलने ही पड़ जाते हैं)। लेकिन ऐसानहीं है कि मंगली दोष के सभी मामलों में पति/पत्नी अथवा दोनों की मृत्युअनिवार्य ही हो। जैसा कि बाद के कुछ ज्योतिषाचायों ने जनमानस को भ्रमित वआतंकित कर दिया है। जिसका कोई ठोस आधार नहीं है। लग्न, चन्द्र व शुक्र सेमंगली दोष को कन्फर्म करना चाहिए।

    


जब किसी व्यक्ति के विवाह की बात आती है, तो मंगल ग्रह को सबसे अधिक पुरुष ग्रह या पापी ग्रह के रूप में माना जाता है, और कुछ घरों में इसका स्थान मांगलिक दोष का कारण बनता है। जब एक मांगलिक लड़का या लड़की एक गैर-मांगलिक जीवनसाथी से शादी करते हैं, तो कई जोड़ों की मृत्यु या गंभीर दुर्घटनाओं का अनुभव होता है, जिसके परिणामस्वरूप गैर-मांगलिक जीवनसाथी की मृत्यु या स्थायी विकलांगता हो जाती है। ऊपर वर्णित घरों में सूर्य, शनि, राहु और केतु स्थान भी अंशी मांगलिक दोष का निर्माण करते हैं।

कुंडली मिलान, जिसे कुंडली मॅचिंग भी कहा जाता है, एक ऐसी विधि है जो जोड़ों को एक-दूसरे के व्यक्तित्व को बेहतर ढंग से समझने और शादी करने से पहले उनकी संगतता को मजबूत करने में मदद करती है। शादी के बाद, सितारों की एक व्यक्तिगत कुंडली अध्ययन का उपयोग करके युगल की संगतता का मूल्यांकन किया जाता है।

यह दोष कुंडली के 12 स्थानों में से किसी एक में मंगल की स्थिति से निर्धारित होता है। यह दोष तब होता है जब जन्म के समय मंगल किसी की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12 में से किसी एक स्थान पर दिखाई देता है। कई लोग कुंडली में सिर्फ मंगल को देखकर डर जाते हैं और इसे गलत समझ लेते हैं। सिर्फ इसलिए कि कुंडली में मंगल दोष है, यह अशुभ नहीं है। मंगल ग्रह की कुंडली में चार स्थान हैं - आंशिक मंगल, हल्का मंगल, घुमावदार मंगल और तीव्र मंगल। इन बातों को ध्यान में रखते हुए मंगल की स्थिति का निर्धारण करना बेहतर है,

सिर्फ इसलिए कि पत्रिका में मंगल है, डरो मत। मंगल दोष के प्रभाव की सीमा का निर्धारण पत्रिका से ही किया जा सकता है। मंगल को आमतौर पर उग्र ग्रह माना जाता है। मंगलदोष के बारे में विस्तृत जानकारी मुहूर्त चिंतामणि, ज्योतिर महार्णव, मुहूर्त गणपति जैसे ग्रंथों में मिलती है। यदि किसी व्यक्ति में मंगल दोष है, तो उसे ठीक करने के लिए शांति पूजा यानि "भातपूजा" की जाती है।

मंगल दोष के लक्षण:
मंगल दोष व्यावहारिकता या वाणी की कठोर प्रकृति है। इसलिए मांगलिक व्यक्ति को हमेशा संयम से बोलना चाहिए या किसी प्रिय व्यक्ति के विमुख होने की संभावना है।

प्रभुत्व रखना मंगल दोष है, यह विवाह के मामले में एक कठिन स्थिति पैदा करता है, इसलिए यदि ऐसा व्यक्ति सौम्य, सौम्य स्वभाव रखता है, तो कई कठिनाइयों को दूर किया जाएगा।

मांगलिक व्यक्ति अनायास ही आगे आ जाता है| इसलिए वह जीवनसाथी से सहयोग की अपेक्षा कर सकता है और यदि जीवनसाथी का साथ न मिले तो वैवाहिक जीवन असंतुलित हो जाता है और परिणाम अवसाद होता है। जिससे झगड़े भी हो सकते हैं। इससे बचने के लिए यदि आपको अपने साथी का साथ मिलता है तो आप समय के साथ एक मजबूत संबंध स्थापित कर सकते हैं और सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

मांगलिक दोष के प्रकार:
TYPES OF MANGLIK DOSHA
मांगलिक दोष दो प्रकार के होते हैं, जैसे "अंशी मांगलिक" और "महा मांगलिक"।

अंशी-मांगलिक:
इस तरह के दोष को छोटा मांगलिक दोष के रूप में जाना जाता है, जो आमतौर पर अठारह साल के अंत में आता है। इस अंशी मांगलिक दोष का कुप्रभाव विवाह के बाद स्वास्थ्य समस्याओं, विवादों, प्रसव समस्याओं और किसी के परिवार में संघर्ष के कारण होता है।

महा-मांगलिक:
यह एक और प्रकार का दोष है, यह दोष जिसकी भी  कुंडली में  होता है, इसका  दोष किसी  ओर के  जीवन पर अधिक बुरा और हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है, जैसे  की गंभीर दुर्घटनाएं।

कुंडली में स्थिति से मंगल के और दोष बनते हैं। यदि मंगल जन्म कुण्डली के पाँच स्थानों में से किसी एक स्थान पर रुके तो निम्न दोष प्रकट होते हैं।

प्रथम स्थान पर मंगल दोष: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्म कुण्डली में प्रथम स्थान को 'तनु' या 'विवाह स्थान' कहा जाता है। यदि मंगल इस स्थिति में हो तो वह पत्रिका में चौथे, सातवें और आठवें स्थान पर होगा। चतुर्थ स्थान 'सुख का स्थान' होने के कारण मंगल परिवार में कलह का कारण बन सकता है। चूंकि सातवां स्थान 'विवाह स्थान' है, मंगल विवाहित जोड़ों के बीच मतभेद पैदा कर सकता है। मंगल के उग्र स्वभाव के कारण वैवाहिक साथी के साथ छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद भयानक रूप धारण कर सकता है। इसी प्रकार अष्टम स्थान मृत्यु स्थान होने के कारण मंगल की दृष्टि से जीवनसाथी या स्वयं के साथ दुर्घटना होने की संभावना है।

चतुर्थ स्थान पर मंगल दोष:
जब मंगल चतुर्थ भाव में होता है तो वह सातवें, दसवें और ग्यारहवें स्थान पर अपनी दृष्टि रखता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चौथे स्थान को विवाह का स्थान कहा जाता है। यदि विवाह पारिवारिक दबाव में होता है तो जातक अपने जीवनसाथी के साथ खुश रहता है। फिर भी यदि विवाह स्थान में मंगल की दृष्टि हो तो भी जीवनसाथी से लगातार कलह और वाद-विवाद होता रहता है। नतीजतन, ये विवाद सीधे कोर्ट-कचेरी या तलाक में बदल सकते हैं। इसी प्रकार कुंडली में दशम स्थान को 'कर्म स्थान' माना गया है। यदि कार्य स्थान मंगल की दृष्टि हो तो ऐसे जातक का विवाह के बाद पूरा जीवन बदल जाता है, उसे कार्य या व्यवसाय के स्थान पर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसी प्रकार जन्म कुण्डली में ग्यारहवें स्थान को 'लाभ स्थान' कहा जाता है। मंगल की दृष्टि होने पर पिता से पैतृक धन का लाभ नहीं होता है।

सप्तम स्थान पर मंगल दोष :
जब कुंडली में मंगल सप्तम स्ताहन में होता है तो उसकी दृष्टि पहले, दूसरे और दसवें स्थान पर होती है। प्रथम स्थान ‘तनु स्थान’ होने के कारण परिवार में अशांति हो सकती है। पति-पत्नी एक-दूसरे पर शक कर सकते हैं। मंगल के गरम स्वभाव के कारण परिवार के सुख से वंचित रह सकते हैं। दूसरे स्थान को कहते हैं 'धन स्थान'| यदि मंगल दूसरे स्थान पर देखा जाए तो यह आर्थिक संकट, धन संचय में कठिनाई और आर्थिक संकट का कारण बन सकता है। इसी प्रकार दशम स्थान को 'कर्म स्थान' कहा जाता है। चूंकि कर्म का स्थान पिता से होता है, इसलिए व्यक्ति के लिए पिता से आर्थिक सहायता प्राप्त करना कठिन हो सकता है। इससे प्रमोशन में देरी भी हो सकती है। इसके अलावा भाग्योदय देर से होता है। शिक्षा में पूर्णता नहीं होती है।

अष्टम स्थान पर मंगल दोष:
जब मंगल आठवें स्थान पर आता है, तो वह दूसरे, तीसरे और ग्यारहवें स्थान पर अपनी दृष्टि रखता है। दूसरे स्थान को 'धन स्थान' कहते हैं। यदि इस स्थान पर मंगल दिखाई दे तो यात्रा के दौरान चोरी या सेंधमारी जैसी घटनाएं हो सकती हैं। इसी प्रकार तीसरे स्थान को पराक्रम का स्थान कहा जाता है। यहां मंगल की दृष्टि हो तो मेहनत करनी पड़ती है, मेहनत का फल देर से मिलता है। ग्यारहवें स्थान को 'लाभ स्थान' कहा जाता है। इस समय मंगल की दृष्टि आई कि जातक को मित्रों, भाई-बहनों का सहयोग या ससुराल का सहयोग नहीं मिलता।नौकरी को बढ़ावा नहीं दिया जाता है, प्राप्त राशि खो सकती है, शेयर या बीमा निकाल लिया जा सकता है।

द्वादश स्थान पर मंगल दोष:
यदि मंगल बारहवें स्थान में स्थित हो तो वह तीसरे, छठे और सातवें स्थान पर होगा। तीसरे स्थान को पराक्रम का स्थान कहा जाता है। जब आप यहां मंगल को देखते हैं, तो जीवन में उत्साह दूर हो जाता है और आत्मविश्वास कम हो जाता है, नौकरी या व्यवसाय में पद या प्रतिष्ठा में कमी आ सकती है। ऐसा व्यक्ति अपने भाई-बहनों के साथ ठीक नहीं रहता है, जिससे वाद-विवाद हो सकता है। इसी प्रकार छठे स्थान को रिपु स्थान कहते हैं। यदि इस स्थान पर मंगल की दृष्टि हो तो ऐसे जातक को गुप्त शत्रुओं से कष्ट हो सकता है। जीवन तनावपूर्ण हो सकता है। कोर्ट-कचेरी की घटनाएं हो सकती हैं। छठे स्थान को रोग स्थान भी कहा जाता है। जब कोई व्यक्ति इस स्थान पर मंगल को देखता है, तो उसके जीवन को खतरा होता है। अचानक से दुर्घटना या पुरानी बीमारी हो सकती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सप्तम स्थान को विवाह स्थान कहा जाता है। यदि मंगल की दृष्टि सप्तम भाव में हो तो जीवनसाथी से कलह, वाद-विवाद, कलह की संभावना रहती है। परिणाम वैवाहिक असंतोष है। जीवनसाथी के सहयोग में कमी के कारण पारिवारिक सुख में कमी आ सकती है।
मंगली दोष, आगे फलित की चर्चा करने से पूर्व मंगली दोष, शनि की साढ़ेसाती व ढैया के विषय में पाठकों को जानकारी दे दें। ये ज्योतिष की दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण हैं ही। किन्तु जनसमुदाय इनके नामों से जो प्रायः आतंकित रहता है, इस कारण भी इस विषय में अज्ञान व भ्रम का खण्डन होना तथा उचित जानकारी का पता होना आवश्यक हो जाता है। अतः इनको एक ही अध्याय के अंतर्गत चर्चा में लेंगे। तो सर्वप्रथम लेते हैं ’मंगली दोष’ को। मंगली दोष क्या है? -मंगल यदि जन्मकुंडली में 1,4,7,8,12 भाव में हो तो जातक ’मंगली’ कहलाता है। (दक्षिण भारतीय पद्धति में दूसरे भाव का मंगल भी मंगली दोष में गिना जाता है।) यह एक सामान्य नियम है। इन भावों में ’मंगली दोष’ मंगल क्यों उत्पन्न करता है ? इसका उत्तर है-मंगल का दृष्टि प्रभाव। जैसा कि हम जानते हैं कि मंगल अपने से चैथे, सातवें और आठवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। और मंगल की दृष्टि में संहारक/विनाशात्मक प्रभाव होता है। इस आधार पर - प्रथम भाव का मंगल चैथे भाव (परिवार व सुख), सातवें भाव (जीवनसाथी व प्रणय) तथा आठवें भाव (आयु एवं मृत्यु का कारण) को देखता है। परिणामतः जातक के ये तीनों भाव संहारक प्रभाव में आते हैं। इसी प्रकार चैथे भाव का मंगल सातवें भाव (जीवनसाथी), दसवें भाव (पिता एवं कर्मक्षेत्र) तथा ग्यारहवें भाव (आय/लाभ स्थान) को संहारक प्रभाव में लाता है। सातवें भाव का मंगल दसवें भाव, लग्न (जातक स्वयं) तथा दूसरे भाव (धन/कुटुम्ब का भाव) को मारक प्रभाव में लाता है। आठवें भाव का मंगल ग्यारहवें भाव, दूसरे भाव तथा तीसरे भाव (छोटे भाई एवं संघर्ष क्षमता) को मारक प्रभाव में लाता है तथा बारहवें भाव का मंगल तृतीय भाव, छठे भाव (रोग, ऋण, शत्रु, शोक) तथा सप्तम भाव को प्रभाव में (मारक) लेता है। दूसरे भाव का मंगल पांचवें भाव (संतान व शिक्षा), आठवें भाव तथा नौवें भाव (भाग्य एवं जनक) को मारक प्रभाव में लेता है। (दक्षिण भारतीय इसलिए दूसरे भाव के मंगल को भी मंगली मानते हैं।) आठवां भाव स्त्री के वैधव्य को भी दिखाता है तथा जातक की आयु को भी, अतः महत्त्वपूर्ण है। जातक की ससुराल भी यही भाव दिखाता है। सातवां भाव तथा लग्न पति व पत्नी दोनों को दिखाता है। चैथा भाव जातक की माता, परिवार व सुख के अलावा जातक के ससुर का भी है। इसी प्रकार दसवां भाव जातक के पिता व कर्मक्षेत्र के अलावा जातक की सास का भी है। बारहवां भाव हस्पताल, खर्चे व शयनसुख का है। तीसरा भाव जातक के भाइयों, साहस व संघर्षक्षमता के अलावा जीवनसाथी की भाभियों का भी है। इस प्रकार ये भाव मंगल के मारक प्रभाव में होने से पति, पत्नी, जेठ, देवर, भाई, सास, ससुर, माता, पिता आदि की मृत्यु या उनको कष्ट, परिवार, गृहस्थ व प्रणय सुख में अवरोध आदि का भी भय उत्पन्न कर देता है। अतः ऐसे जातक को मंगली कहा जाता है। उपाय रूप में मंगली का विवाह मंगली के साथ ही करने की प्रथा है, ताकि मंगली दोष आपस में कट जाए और मंगल का मारक प्रभाव निष्क्रिय हो जाए। किन्तु आतंकित होने/करने की बजाय, मंगली दोष को गम्भीरता से समझना चाहिए। 80ः मामलों में ’मंगली दोष’ दिखता है, किन्तु होता नहीं है। मंगल का अर्थ है कल्याण/शुभत्व, न कि विनाश/अशुभत्व। अतः मंगल ग्रह को मूलतः अशुभ या विनाशक नहीं माना जा सकता। मंगल में सृजनात्मक शक्ति (च्व्ैप्ज्प्टम् च्व्ॅम्त्) तथा विनाशात्मक शक्ति (छम्ळ।ज्प्टम् च्व्ॅम्त्) दोनों पाई जाती हैं। अनेक कुंडलियों में मंगल संहारक होता है किन्तु बहुत-सी कुंडलियों में सृजक अथवा पोषक/विकासक भी होता है। अतः मात्र उसके किसी भाव विशेष में बैठे होने से ही जातक को मंगली दोष से ग्रस्त मान लेना उचित नहीं है। लाल किताब में इसीलिए मंगल को श्नेकश् तथा श्बदश् दो नामों से पुकारा गया है और दोनों के फल अलग-अलग कहे गए हैं। यद्यपि ज्योतिष के प्राचीन ग्रन्थों (होराशास्त्र, बृहद् पाराशर, जातक पारिजात आदि) में मंगल दोष क्रम में नहीं है। फलदीपिका, ज्योतिष सिद्धांत, सारावली, ज्योतिषसार, बृहद् मुक्तावली, मुहूर्त मार्तण्ड, मुहूर्त चिन्तामणि आदि प्राचीन ग्रन्थों में ही मंगली दोष का सिरे से उल्लेख नहीं है। जन्मकुंडली के सातवें भाव में मंगल होने मात्र से ही जातक मंगली हो जाता है तो भगवान राम को भी मंगली होना चाहिए था (उनकी कुंडली में सातवें भाव में मंगल था)। किन्तु न तो उनका विवाह विलम्ब से हुआ (जैसा कि मंगली होने पर सम्भावित था) और न ही धर्मग्रन्थों/रामायण, पुराण आदि में उनके मंगली होने का कोई प्रमाण मिलता है। इससे स्पष्ट है कि मंगली दोष को ज्योतिष में बाद में शामिल किया गया होगा। बहुत सारे मामलों में जातक पूरी तरह से मंगली नहीं होता (नवमांश, चन्द्रकुंडली व जन्मकुंडली इन तीनों में ही जातक मंगली हो या कम से कम दो में हो तभी उसे मंगली कहा जा सकता है। मात्र एक कुंडली के आधार पर नहीं)। बहुत से मामलों में जातक को ही कुंडली में मंगली दोष का निराकरण/ परिहार हो रहा होता है। बहुत से मामलों में जीवनसाथी की कुंडली के ग्रह जातक के मंगली दोष को निष्क्रिय कर रहे/काट रहे होते हैं। बहुत सारे मामलों में अतिविलम्ब से विवाह होने से ही मंगली दोष समाप्त हो जाता है। शेष मामलों में ही मंगली दोष लागू होता है। परन्तु उनमें भी अनेक का बाद में या पहले उपाय/उपचार करके परिहार करना सम्भव होता है। अतरू मात्र मंगली दोष के नाम से आतंकित न हो जाएं। आगे हम मंगली दोष के निवारण तथा उपचार के विषय में बता रहे हैं। पाठक इनको ध्यानपूर्वक पढ़ें व समझें। ताकि अधकचरे ’ज्ञानियों’ द्वारा गुमराह न हों अथवा स्वयं कुंडली का फलादेश करने में भ्रमित न हो जाएं। मंगली दोष का निर्धारण-मंगली दोष निर्धारण के लिए यह देखना आवश्यक है कि कुंडली में मंगल किस भाव का स्वामी है? मंगल शुभ/लाभकारी/नेक है अथवा अशुभ/मारक/बद है? मात्र इसलिए कि मंगल 1,4,7,8 या 12 भाव में बैठा है-जातक को मंगली नहीं कह सकते। (सूर्य व शनि की युति हो तो मंगलश्बदश् होता है। पर सूर्य और बुध की युति हो तो मंगल ’नेक’ होता है।) नेक मंगल-यदि शनि और राहू या शनि और केतु एक ही भाव में बैठे बुध और केतु एक ही भाव में बैठे और चंद्रमा 3, 4 या 7 भाव में बैठा हो, शुक्र बैठा हो या चंद्र, मंगल अथवा शुक्र, मंगल युति करते हुए बैठे हों अथवा चन्द्र 1,4,7 या 10 भाव अर्थात् केन्द्र में हो, छठे भाव में सूर्य हो या सूर्य, शनि, गुरु में से कोई 3,4,8,9 भाव में हो या सूर्य, चंद्र या गुरु मंगल के सहायक बन रहे हों (दृष्टि आदि से) तो मंगल के फल शुभ होते हैं। बद मंगल-यदि मंगल के मित्रों में से (चन्द्र, सूर्य, गुरु) कोई उसकी सहायता न कर रहा हो तब मंगल अशुभ होता है। अथवा सूर्य, केतु नवम भाव या पंचम भाव में हो। या सूर्य 6 अथवा 12 भाव में राहू से युति करे या शुक्र के साथ सप्तम भाव में हो, अथवा सूर्य शनि के साथ 10 भाव में या बुध के साथ 12 भाव में हो अथवा सूर्य 1,8 भाव में मंगल से युति करे और चन्द्र, गुरु 3,4 या 8 भाव में न हों अथवा मंगल 3,4,8 भाव में से किसी में हों और शेष दो भावों में बुध व केतु हों तो मंगल को सहायता न मिलने से मंगल ’बद’ या अशुभ फल देने वाला हो जाता है ’बद’ मंगल राहू की भांति भूत-प्रेत आदि बाधाएं भी देता है। उपरोक्त विवेचन के आधार पर पहले यह तय करना चाहिए कि कुंडली में मंगल शुभ है या अशुभ। फिर यह देखना चाहिए कि मंगल स्वामी कहां का है? मंगल दोषकारी है/नहीं-यदि मंगल त्रिकोणेश हो (1,5.9 में से किसी भाव का स्वामी हो) तब शुभ ही रहता है। यदि मंगल अनिष्ट स्थानों में मं बलवान होकर स्थित हो अथवा अनिष्ट स्थानों का स्वामी हो, तभी दोषकारी होता है। दूसरी बात-यदि मंगल सूर्य के साथ/पास होने से अस्त हो अथवा शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो भी दोषकारी नहीं होता। अन्य-इनके अलावा मंगल की उच्च व नीच दृष्टि, उसका वक्री/मार्गी होना, स्वगृही/मित्रगृही/शत्रुग्रही होना, या मूल त्रिकोण में होना, मंगल की दृष्टियां तथा मंगल पर दृष्टियां, मंगल का योगकारक होना या न होना (कर्क व सिंह लग्न में मंगल योगकारक होता है) आदि भी विचारें और साथ ही 8,12,5,10,1,7,9 भावों और उनके भावेशों की स्थिति भी विचारें तथा कुंडली में गुरु व शुक्र की स्थिति भी विचारें। तभी निर्णय लें। मंगली दोष के प्रभाव-मंगली दोष का जो सबसे बड़ा आतंक जनमानस के मस्तिष्क में बैठाया गया है, वह यह है कि पति या पत्नी की मृत्यु। किन्तु इस विडम्बना के लिए अकेले मंगल को ही उत्तरदायी कैसे ठहराया जा सकता है ? अन्य पृथक्कीकरण के स्वभाव वाले ग्रह-शनि, केतु, राहू तथा सूर्य की स्थिति भी विचारनी चाहिए। ैम्ग् के कारक व सौम्य ग्रह शुक्र एवं अतिसौम्य ग्रह गुरु (जो महिलाओं में पति का कारक है और पुरुषों में शुक्र स्त्री का/पत्नी का कारक भी है) की स्थिति भी विचारनी चाहिए। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि कुंडली में वैधव्य योग, विधुर योग या पुनर्विवाह आदि का योग बनता है या नहीं तथा जातक की कुण्डली में ’अल्पायु योग’ भी बनता है या नहीं। यदि अल्पायु योग तथा वैधव्य योग आदि नहीं बनते हैं तो मंगल या कोई भी कैसे विवाह होते ही पति/पत्नी की मृत्यु करा सकता है ? यही कारण है कि हमारे प्राचीन ज्योतिषाचार्योंपाराशर, जैमिनी, वराहमिहिर, वैद्यनाथ आदि (जो ज्योतिषशास्त्र के प्रवर्तक तथा एक ’अथॉरिटी’ रहे थे) ने मंगली दोष के मामले को महत्त्व नहीं दिया है। किन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं है कि मंगली दोष का दुष्प्रभाव जातक को झेलना नहीं पड़ता है। प्रायः विवाह में विलम्ब, विवाह में बाधाएं, गृहस्थ सुख का अभाव, वैवाहिक जीवन में अशांति/कलह/असफलता आदि के प्रभाव ’मंगली दोष’ से ग्रस्त जातकों को कमोबेश झेलने ही पड़ते हैं (यहां तक कि मंगली दोष कट भी रहा हो तो भी कुछ न कुछ झंझट तो झेलने ही पड़ जाते हैं)। लेकिन ऐसा नहीं है कि मंगली दोष के सभी मामलों में पति/पत्नी अथवा दोनों की मृत्यु अनिवार्य ही हो। जैसा कि बाद के कुछ ज्योतिषाचार्यों ने जनमानस को भ्रमित व आतंकित कर दिया है। जिसका कोई ठोस आधार नहीं है। लग्न, चन्द्र व शुक्र से मंगली दोष को कन्फर्म करना चाहिए। मंगली दोष का निराकरण ऽ मंगल (1,4,7,8,12 भावों में मंगल बैठे तो मंगली दोष कहा जाता है।) जिस भाव में बैठा है-यदि उस भाव का स्वामी अपनी उच्च राशि में बैठा हो तो वह मंगल के प्रभाव को कम कर देता है। अतः मंगली दोष स्वतः कट जाता है। ऽ पहले या चैथे भाव का मंगल यदि स्वराशि का हो (मेष/वृश्चिक में हो) यानी पहले या चैथे भाव में मेष या वृश्चिक राशि ही पड़ रही हो तो मंगली दोष कट जाता है। ऽ दक्षिण भारतीय दूसरे भाव में मंगल होने को भी मंगली दोष मानते हैं। किन्तु दूसरे भाव में यदि मिथुन या कन्या राशि हो तो दूसरे भाव का मंगली दोष कट जाता है। ऽ सातवें घर का मंगल यदि अपनी उच्च या नीच राशि में हो (अर्थात् सातवें भाव में मकर/कर्क राशि हो) तो मंगली दोष स्वतः कट जाता है। ऽ आठवें भाव का मंगल यदि गुरु की राशियों में हो (आठवें भाव में राह धनु/मीन राशि हो) तो मंगल आठवें होकर भी मंगली दोष उत्पन्न नहीं करता। ऽ बारहवें भाव का मंगल यदि शुक्र की राशियों में हो (अर्थात् बारहवें भाव में वृष/तुला राशि हो) तो भी मंगली दोष स्वतः कट जाता है। ऽ सातवें भाव में मीन राशि का, आठवें भाव में कुम्भ राशि का, प्रथम भाव में मेष का, चैथे भाव में वृश्चिक का तथा बारहवें भाव में धनु का मंगल हो तो भी मंगली दोष का निराकरण हो जाता है। ऽ मंगल सिंह या कुम्भ राशि का हो तो किसी भी भाव में बैठकर मंगली दोष नहीं देता (कुछ विद्वान मेष, वृश्चिक व कर्क राशि में मंगल को भी ऐसा गुण कहते हैं)। ऽ राहू शुभ ग्रहों के साथ, शुभ राशियों में, केन्द्र/त्रिकोण में बैठकर मंगल को देखता हो तो भी मंगली दोष कट जाता है। ऽ सप्तमेश सबल अवस्था में हो अथवा गुरु सातवें भाव में बैठा हो तो भी नि मंगली दोष कट जाता है। ऽ मंगल यदि शनि या गुरु से दृष्ट हो अथवा मंगल यदि शनि या गुरु के साथ बैठा हो अथवा मंगल चन्द्र व गुरु के साथ बैठा हो तो इन तीनों स्थितियों में भी है मंगली दोष स्वतः ही कट जाता है/निष्प्रभावी रहता है। ऽ सप्तमेश केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो अथवा गुरु केन्द्र या त्रिकोण को (1,4,5,7,10,9) में बैठा हो अथवा 1,2,4,12 भाव में शुक्र बैठा हो तो भी मंगली दोष स्वतः कट जाता है। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि शुक्र या गुरु अस्त न हो सेट तथा पापमध्य/पापकर्तरी योग में न हों। अन्यथा वे मंगली दोष का निराकरण कर कर पाने में समर्थ नहीं होते। दोष के निराकरण के लिए उनका बली होना अनिवार्य है। ऽ द्वितीय भाव तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रहों की उपस्थिति हो और वे बली हों तो भी मंगली दोष कटता है। अथवा लग्न में स्वग्रही/मित्रक्षेत्री/उच्च के ग्रह बैठे हों तो भी मंगली दोष का प्रभाव नगण्यप्रायः रहता है। ऽ सप्तम भाव में शनि व शुक्र की युति हो अथवा केन्द्र या त्रिकोण में शुक्र स्वराशि या उच्च राशि में हो तो भी मंगली दोष का निराकरण होता है। (कुछ विद्वान 6,8 भावों में शुक्र के उच्च या स्वग्रही होने पर भी मंगली दोष का निवारण मानते हैं। परन्तु इससे पुरुष की पौरुष क्षमता प्रभावित होती है अतः इसे निरापद नहीं कह सकते।) ऽ चन्द्रमा यदि केन्द्र में अकेला हो किन्तु बली हो तो भी मंगली दोष में न्यूनता ले आता है। ऽ वर या वधू की कुंडली में जिस भाव में मंगल हो, उसी भाव में शनि या राहू बैठा हो तो भी मंगली दोष स्वतः कट जाता है। ऽ यदि मंगली दोष शुक्र, चन्द्र व लग्न तीनों से कन्फर्म नहीं होता तो उसे अर्ध मंगली कह दिया जाता है। ऐसे मामलों में यदि 28-29 साल तक जातक का विवाह न हो तो मंगली दोष स्वतः कट जाता हैं। निष्कर्ष-शेष मामलों में यदि मंगली दोष तीनों प्रकार से कन्फर्म हो रहा हो तभी जातक को मंगली कहा जा सकता है। ऐसा हो तो मंगली जातक का विवाह मंगली जातक से ही करना चाहिए। मंगली दोष यदि कट न गया हो (स्वतः) और कन्फर्म हो तो उसके निवारण/प्रभाव को कम करने के कुछ उपायों की व्यवस्था भी ज्योतिषशास्त्र करता है। विषय को सम्पूर्णता देने के लिए तथा पाठकों के ज्ञानवर्धन व लाभ के लिए कुछ प्रमुख उपायों को संक्षेप में यहां कहेंगे- निवारण के उपाय ऽ जातक के लग्न में अशुभ मंगल होने से मंगली दोष बनता हो तो जातक को हाथी के दांत से बनी वस्तुओं को घर में तथा अपने साथ रखना उपयोगी होता है (यदि दूसरे भाव में बुध भी हो तथा 7,9,11 भाव खाली हों तो पीतल के बर्तन/वस्तुएं आदि जातक घर में रखे तथा पीपल व ब्रह्मा की पूजा करे। ऐसे जातक को किसी से मुफ्त में कुछ नहीं लेना चाहिए)। ऽ चतुर्थ भाव के मंगल से जातक मंगली हो तो साधु, माता तथा बन्दरों की सेवा करनी चाहिए। प्रतिदिन प्रातः दांतों की सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। चीनी, शहद का दान करना चाहिए तथा विकलांग व काले व्यक्ति से मित्रता नहीं करनी चाहिए। ऐसे जातक को शिवाराधना या हनुमानजी की पूजा भी शुभ रहती है। दूध, चांदी, चावल, मोती व हाथीदांत घर में रखने चाहिए। ऽ सप्तम भाव से जातक मंगली हो तो जातक को भैंस, सांप, बिच्छू, कौआ, मछली तथा चमगादड़ों को भोजन कराना चाहिए। काले उड़द, शराब, सरसों का तेल, कोयला, नमक आदि का दान करना चाहिए। भैरव मन्दिर में शराब चढ़ाना भी उसके लिए लाभकारी होगा, बबूल व खजूर के वृक्षों का पानी देना, चाचा की सेवा करना भी उसके लिए शुभ है। लाल किताब के अनुसार उसे शहद से भरा मिट्टी का पात्र निर्जन स्थान में भूमि में दबाना चाहिए तथा बांस की बांसुरी में चीनी भरकर निर्जन या श्मशान में भूमि में दबा देना चाहिए। किन्तु इन कार्यों को किसी की जानकारी में आए बिना करना चाहिए। ऽ आठवें भाव से जातक मंगली हो तो उसको मीठी रोटी (नित्य नहीं तो कम से कम प्रति मंगलवार (कुत्ते को खिलानी चाहिए) यह मीठी रोटी गुड़ से बने, न कि चीनी से)। या रोटी पर सरसों का तेल चुपड़कर कुत्तों या गायों को खिलाए। विधवाओं का आशीर्वाद ले। भैरव की उपासना करे अथवा चतुर्थ भाव से मंगली होने वाले उपायों के अनुसार शराब, विकलांग, शहद आदि से सम्बन्धित निर्देशों का पालन करे। ऽ बारहवें भाव से जातक मंगली हो तो उसे चाहिए कि अपने भाइयों सहित शिवाराधना करे तथा भाइयों को लाल वस्त्र न पहनने दे। मीठी वाणी बोले, मांस का सेवन न करे, सदाचारी रहे तथा हनुमान चालीसा का पाठ या हनुमानजी की पूजा करे अथवा दुर्गा की पूजा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करे। मदिरा का सेवन न करे। मां, दादी व सास का आशीर्वाद लेता रहे। नोट-अन्य उपायों के लिए ’उपाय खण्ड’ में पाठक देख सकते हैं। मंगली सम दोष-यदि 1,4,7,8,12 भावों में मंगल न होकर पापी या क्षीण चन्द्रमा हो (अमावस या कृष्ण पक्ष का अथवा नीच राशि का या अस्त हो) अथवा 4,7,8, 12 भावों में सूर्य पाप प्रभाव, नीच राशि या शत्रु क्षेत्रीय हो। अथवा 1,4,7 व 12 भावों में शुक्र नीच का या अशुभ हो। अथवा 1,4,7,8, 12 भावों में शनि नीच राशि का या अशुभ हो। या फिर 1,4,7 भावों में राहू शत्रुक्षेत्री होकर और अशुभ हो गया हो तो भी मंगली दोष के समान ही फल होने से कुछ विद्वान इनको भी मंगली दोष के अंतर्गत मानते हैं। (बहुत से विद्वान 1,4,7,8,12 भावों पर मंगल की दृष्टि होने को भी मंगली दोष के अंतर्गत लेते हैं। जो ठीक नहीं है)। ऐसे मामलों से सम्बन्धित उपाय भी पाठक इसी पुस्तक के अन्त में उपाय खण्ड के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। विशेष-मंगली दोष पूर्ण रूप से कन्फर्म न होता हो किन्तु तीव्र सम्भावित हो तो उपाय के रूप में कन्या का प्रथम विवाह/सात फेरे किसी कुम्भ से अथवा वृक्ष के साथ करा दिए जाते हैं। तत्पश्चात् वर के साथ उसका विवाह/फेरे कराए जाते हैं। इस प्रकार के उपाय के पीछे तर्क यह है कि ’मंगली दोष’/मंगल का मारक प्रभाव उस घड़े या वृक्ष पर होता है, जिससे कन्या का प्रथम विवाह किया गया है। वर दूसरा पति होने के कारण उस प्रभाव से सुरक्षित रह पाता है। सुनने में आता है कि वह घड़ा जिससे कन्या के फेरे कराए जाते हैं, टूट जाता है तथा वह वृक्ष जिससे कन्या का विवाह कराया जाता है-सूख जाता है। चीरा मंगली-पहले, सातवें, आठवें भाव से मंगली दोष हो तो कुछ विद्वान उसकी महत्ता दर्शाने के लिए उसको ’चीरा मंगली’ (खतरनाक) कहते हैं। क्योंकि पहले में जातक के जीवनसाथी की तथा सात व आठ में स्वयं जातक की मृत्यु सम्भावित होती है (यदि अन्य योगों से उसका निराकरण न हो रहा हो तो)। मांगलिक कुंडली का निर्णय बारिकी से किया जाना चाहिए क्योंकि शास्त्रों में मांगलिक दोष निवारण के तरीके उपलब्ध हैं। शास्त्रवचनों के जिस श्लोक के आधार पर जहां कोई कुंडली मांगलिक बनती है, वहीं उस श्लोक के परिहार (काट) के कई प्रमाण हैं। ज्योतिष और व्याकरण का सिध्दांत है कि पूर्ववर्ती कारिका से परवर्ती कारिका (बाद वाली) बलवान होती है। दोष के सम्बन्ध में परवर्ती कारिका ही परिहार है, इसलिये मांगलिक दोष का परिहार मिलता हो तो जरूर विवाह का फैसला किया जाना चाहिए। परिहार नहीं मिलने पर भी यदि मांगलिक कन्या का विवाह गैर मांगलिक वर से करना हो तो शास्त्रों मे विवाह से पूर्व “घट विवाह” का प्रावधन है। मांगलिक प्रभाव वाली कुंडली से भयभीत होने कि जरूरत नहीं है। मुहूर्त दीपक', 'मुहूर्त पारिजात' तथा अन्य मानक ग्रंथों में मंगली योग या दोष के कुछ आत्म कुंडलीगत तथा कुछ पर कुंडलीगत परिहार बताए हैं। यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्ठम व द्वादश भावों में कहीं भी मंगल हो और अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि या युति निम्न प्रकार हो, तो कुजदोष स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है :- * यदि मंगल ग्रह वाले भाव का स्वामी बली हो, उसी भाव में बैठा हो या दृष्टि रखता हो, साथ ही सप्तमेश या शुक्र अशुभ भावों (6/8/12) में न हो। * यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो। * यदि गुरु या शुक्र बलवान, उच्च के होकर सप्तम में हो तथा मंगल निर्बल या नीच राशिगत हो। * मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ में, कर्क या मकर का मंगल सप्तम में, मीन का मंगल अष्टम में तथा मेष या कर्क का मंगल द्वादश भाव में हो। * यदि मंगल स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि में स्थित हो। * यदि वर-कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में मंगल दोष हो तथा परकुंडली में उन्हीं पाँच में से किसी भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो। कहा गया है - शनि भौमोअथवा कश्चित्‌ पापो वा तादृशो भवेत्‌। तेष्वेव भवनेष्वेव भौम-दोषः विनाशकृत्‌॥ इनके अतिरिक्त भी कई योग ऐसे होते हैं, जो कुजदोष का परिहार करते हैं। अतः मंगल के नाम पर मांगलिक अवसरों को नहीं खोना चाहिए। सौभाग्य की सूचिका भी है मंगली कन्या? कन्या की जन्मकुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादशभाव में मंगल होने के बाद भी प्रथम (लग्न, त्रिकोण), चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम तथा दशमभाव में बलवान गुरु की स्थिति कन्या को मंगली होते हुए भी सौभाग्यशालिनी व सुयोग्यभार्या तथा गुणवान व संतानवान बनाती है। ऐसा होने से नहीं लगता है वैवाहिक जीवन में मांगलिक दोष 1. मंगल दोष के परिहार स्वयं की कुंडली में (मंगल भी निम्न लिखित परिस्तिथियों में दोष कारक नहीं होगा)—जैसे शुभ ग्रहों का केंद्र में होना, शुक्र द्वितीय भाव में हो, गुरु मंगल साथ हों या मंगल पर गुरु की दृष्टि हो तो मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है। 2. वर-कन्या की कुंडली में आपस में मांगलिक दोष की काट- जैसे एक के मांगलिक स्थान में मंगल हो और दूसरे के इन्हीं स्थानों में सूर्य, शनि, राहू, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो दोष नष्ट हो जाता है। 3. मेष का मंगल लग्न में, धनु का द्वादश भाव में, वृश्चिक का चौथे भाव में, वृष का सप्तम में, कुंभ का आठवें भाव में हो तो भौम दोष नहीं रहता। 4. कुंडली में मंगल यदि स्व-राशि (मेष, वृश्चिक), मूलत्रिकोण, उच्चराशि (मकर), मित्र राशि (सिंह, धनु, मीन) में हो तो भौम दोष नहीं रहता है। 5. सिंह लग्न और कर्क लग्न में भी लग्नस्थ मंगल का दोष नहीं होता है। शनि, मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु, सूर्य, केतु अगर मांगलिक भावों (1,4,7,8,12) में कन्या जातक के हों और उन्हीं भावों में वर के भी हों तो भौम दोष नष्ट होता है। यानी यदि एक कुंडली में मांगलिक स्थान में मंगल हो तथा दूसरे की में इन्हीं स्थानों में शनि, सूर्य, मंगल, राहु, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो उस दोष को काटता है। 6. कन्या की कुंडली में गुरू यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो मांगलिक दोष नहीं लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है। 7. यदि एक कुंडली मांगलिक हो और दूसरे की कुंडली के 3, 6 या 11वें भाव में से किसी भाव में राहु, मंगल या शनि में से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है। 8. कुंडली के 1,4,7,8,12वें भाव में मंगल यदि चर राशि मेष, कर्क, तुला और मकर में हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता है। 9. वर की कुण्डली में मंगल जिस भाव में बैठकर मंगली दोष बनाता हो कन्या की कुण्डली में उसी भाव में सूर्य, शनि अथवा राहु हो तो मंगल दोष का शमन हो जाता है। 10. जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व, उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का, वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा। 11. यदि 1,4,7,8,12 भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता। मंगल के साथ चन्द्र गुरु शनि में से कोई भी एक ग्रह हो अथवा शनि की पूर्ण दृष्टि हो तो ऐसी कुंडली में मंगल दोष किंचित मात्र भी नहीं रहता है। मेष का मंगल लग्न में हो, वृश्चिक का चौथा, मीन का 7वां, कुंभ का 8वां, धनु का 12वां हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है। यदि केंद्र त्रिकोण में गुरु हो या केंद्र में चन्द्रमा हो या 6-11वें भाव में राहु हो, मंगल के साथ राहु अथवा मंगल को गुरु देखता हो अथवा मंगल से दूसरा शुक्र हो तो मंगल शुभ होकर समृद्धिकारक हो जाता है। गुरु बलवान हो, शुक्र लग्न अथवा 7वां हो, मंगल वक्री नीच या शत्रु के घर का हो या अस्त हो तो दोष नहीं होता है मंगल दोष के उपाय 1. सबसे सरल उपाय है हनुमान जी की नियमित उपासना। यह मंगल के हर तरह के दोष तो खत्म करने में सहायक है। 2. हर मंगलवार को शिवलिंग पर कुमकुम चढ़ाएं। इसके साथ ही शिवलिंग पर लाल मसूर की दाल और लाल गुलाब अर्पित करें। 3. लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है। 4. कुंडली में मंगल यदि स्व-राशि (मेष, वृश्चिक), मूलत्रिकोण, उच्चराशि (मकर), मित्र राशि (सिंह, धनु, मीन) में हो तो भौम दोष नहीं रहता है। 5. सिंह लग्न और कर्क लग्न में भी लग्नस्थ मंगल का दोष नहीं होता है। शनि, मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु, सूर्य, केतु अगर मांगलिक भावों (1,4,7,8,12) में कन्या जातक के हों और उन्हीं भावों में वर के भी हों तो भौम दोष नष्ट होता है। यानी यदि एक कुंडली में मांगलिक स्थान में मंगल हो तथा दूसरे की में इन्हीं स्थानों में शनि, सूर्य, मंगल, राहु, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो उस दोष को काटता है। 6. कन्या की कुंडली में गुरू यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो मांगलिक दोष नहीं लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है। 7. यदि एक कुंडली मांगलिक हो और दूसरे की कुंडली के 3, 6 या 11वें भाव में से किसी भाव में राहु, मंगल या शनि में से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है। 8. कुंडली के 1,4,7,8,12वें भाव में मंगल यदि चर राशि मेष, कर्क, तुला और मकर में हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता है। 9. वर की कुण्डली में मंगल जिस भाव में बैठकर मंगली दोष बनाता हो कन्या की कुण्डली में उसी भाव में सूर्य, शनि अथवा राहु हो तो मंगल दोष का शमन हो जाता है। 10. जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व, उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का, वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा। 11. यदि 1,4,7,8,12 भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता। एक व्यक्ति को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सभी मांगलिक दोष प्रमाणित गुरुजी की उपस्थिति और आशीर्वाद से त्र्यंबकेश्वर मंदिर (महाराष्ट्र)में कुंभ विवाह जैसे धार्मिक अनुष्ठान करके हटाए और शून्य हो सकते हैं। कुंभ विवाह का ऐसा पवित्र आयोजन केवल हमारे प्राचीन शास्त्रों के अनुसार इस स्थान पर किया जाना चाहिए।

मंगलदोष के नकारात्मक परिणाम:
चूंकि मंगल पहले स्थान पर है; यह वैवाहिक संघर्ष और दुर्व्यवहार को उत्प्रेरक कर सकता है।

जब मंगल दूसरे स्थान में होता है, तो यह वैवाहिक संघर्ष और पेशेवर बाधाओं को शुरू करते हुए संपूर्ण रूप से प्रभावित करता है।

जब मंगल चौथे घर में होता है, तो एक व्यक्ति का पेशेवर प्रदर्शन बाधित होता है, और उन्हें नौकरी बदलने की आवश्यकता हो सकती है।

सप्तम भाव में होने पर मांगलिक के अंदर की अतिरिक्त ऊर्जा मनुष्य को चिड़चिड़ा बना देती है। इसके अलावा, जब मंगल सातवें घर में होता है, तो व्यक्ति के अंदर की अतिरिक्त ऊर्जा व्यक्ति को चिड़चिड़ा बना देती है। व्यक्ति के व्यक्तित्व के कारण, परिवार के सदस्यों के साथ  मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना लगभग असंभव होता है।

जब मंगल आठवें स्थान पर अपना घर बनाता है, तो व्यक्ति पैतृक संपत्ति खो देता है क्योंकि वे अपने बुजुर्गों से अलग हो जाते हैं।

जब मंगल दसवें घर में प्रवेश करता है, तो व्यक्ति मानसिक कठिनाइयों और वित्तीय नुकसान का अनुभव करता है और दुश्मन बनाता है।

मांगलिक कन्या से शादी करने का क्या अप्रभाव हो सकता है?
मांगलिक कन्या से शादी करने से उनके दांपत्य जीवन मे अनहोनी, तनाव निर्माण होता है।

क्या विवाह के बाद कुंभ विवाह का अनुष्ठान करना उचित है?

नहीं उसके लिए पुनर विवाह होता है  यदि किसी लड़की की कुण्डली में वैधव्य योग हो तो विवाह से पूर्व कुम्भ विवाह संस्कार करना अनिवार्य होता है।

किसी भी व्यक्ति के मांगलिक होने के क्या लाभ हैं?
यह मन जाता है की मांगलिक व्यक्ति अपने लक्ष्यों पर केंद्रित होता है, और उसका ज्यादा उत्साही स्वभाव होता है।
ऊर्जा अति या बिलकुल कम होना स्त्रियों में प्रोजेस्ट्रोन और ऑक्सीटोसिन को घटा बढ़ाता है जो दांपत्य और सेक्स लाइफ पर संकट उत्पन्न करता है

मंगल दोष को दूर कैसे करें?
मंगल दोष किसी व्यक्ति की कुंडली मे होने से उन्हें विवाह संबंधी समस्याओ का सामना करना पड़ सकता है| इसके लिए कुम्भ विवाह की विधी करना अनिवार्य है।

पुरुष के लिए अर्क विवाह:
जब एक विधुर ने 3 शादियां की हों और तीनों पत्नियों की मृत्यु हो गई हो, और संबंधित व्यक्ति पुनर्विवाह करने को तैयार हो, तो ऐसे व्यक्ति का अर्कविवाह किया जाता है। अर्कविवाह रस्म अर्की यानी मंदार के पेड़ से आदमी की पहली शादी होती है। यह शादी सामान्य तरीके से की जाती है। संबंधित व्यक्ति का विवाह तब नियोजित दुल्हन के साथ तय किया जाता है। विवाह समारोह के बाद जातक अपने जीवनसाथी के साथ सुख से रह सकता है | इसके अलावा, यदि एक अविवाहित पुरुष की मृत्यु हो जाती है, तो उसका विवाह अंतिम संस्कार से पहले किया जाता है। एक ब्रह्मचारी का ब्रह्मचर्य इसलिए किया जाता है ताकि ब्रह्मचारी के परिवार को किसी भी तरह से दोष या नुकसान न पहुंचे। इसके बाद ही इसके अंत पारित होते हैं; ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और परिवार के अन्य सदस्य इससे पीड़ित न हों।

पुरुष-अर्क विवाह  विवरण 


जब एक बच्चे का जन्म होता है, तब उसके ग्रह स्थिति के स्थान  तय  होते हैं। व्यक्ति की कुंडली में कई तरह दोष (समस्याएँ) होती हैं। ये दोष साढ़े साती, मंगल दोष, काल सर्प दोष, आदि के रूप में हो सकते हैं| प्रत्येक समस्या के दोष को दूर करने या इसके प्रभावों को कम करने का एक उपाय होता है। किसी व्यक्ति के दोषों को उसकी कुंडली से दूर करने के लिए भारत में कई आध्यात्मिक समाधान हैं। हिंदू परंपरा और संस्कृति में, आध्यात्मिकता एक आशीर्वाद है, और यह हर समस्या के लिए एक धार्मिक समाधान देता है। 


विवाह में देरी के लिए किसी व्यक्ति द्वारा सामना किए जाने वाले दोषों में से एक मंगल दोष है। मांगलिक दोष उन दोषों में से एक है जो लोगों के जीवन को प्रभावित करता है और कई मुद्दों को जन्म देता है, जैसे कि मांगलिक विवाह में देरी या अमांगलिक वर/ वधु से शादी होना। कुम्भ विवाह में किए गए अनुष्ठानों के बीच एक व्यापक अवधारणा है और इसका वैधव्य योग से प्रभावित स्त्री जीवन पर प्रभाव कम करने में लाभकारी  होता  है।


मंगल दोष एक ऐसा दोष है जो संबंधित व्यक्ति के जीवन और उसके आसपास के लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। मंगल दोष के दुष्प्रभाव से बचने के लिए कई आध्यात्मिक उपाय होते  हैं


मंगल दोष क्या है?


मांगलिक दोष 

भगवान मंगल ग्रह किसी व्यक्ति की कुंडली में एक, दो, चार, सातवां, आठवा और बारह घर लग्न कुंडली में मांगलिक दोष / कुजा दोष का कारण बनता है। मंगल ग्रह का स्थान चन्द्र और शुक्र से मांगलिक दोष को 1, 2, 4 वें, 7 वें, 8 वें और 12 वें घरों में चंद्र और शुक्र से चलाता है। विवाह का घर, जिसे  जीवनसाथी का घर भी कहा जाता है, सातवें घर में स्थित है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, सप्तम भाव पर मंगल का प्रभाव विवाहित और दांपत्य जीवन के लिए बुरा होता  है। 


जब किसी व्यक्ति के विवाह की बात आती है, तो मंगल ग्रह को सबसे अधिक पुरुष ग्रह या पापी ग्रह के रूप में माना जाता है, और कुछ घरों में इसका स्थान मांगलिक दोष का कारण बनता है। जब एक मांगलिक लड़का या लड़की एक गैर-मांगलिक जीवनसाथी से शादी करते हैं, तो कई जोड़ों की मृत्यु या गंभीर दुर्घटनाओं का अनुभव होता है, जिसके परिणामस्वरूप गैर-मांगलिक जीवनसाथी की मृत्यु या स्थायी विकलांगता हो जाती है। ऊपर वर्णित घरों में सूर्य, शनि, राहु और केतु स्थान भी अंशी मांगलिक दोष का निर्माण करते हैं।


कुंडली मिलान, जिसे कुंडली मॅचिंग भी कहा जाता है, एक ऐसी विधि है जो जोड़ों को एक-दूसरे के व्यक्तित्व को बेहतर ढंग से समझने और शादी करने से पहले उनकी संगतता को मजबूत करने में मदद करती है। शादी के बाद, सितारों की एक व्यक्तिगत कुंडली अध्ययन का उपयोग करके युगल की संगतता का मूल्यांकन किया जाता है।


यह दोष कुंडली के 12 स्थानों में से किसी एक में मंगल की स्थिति से निर्धारित होता है। यह दोष तब होता है जब जन्म के समय मंगल किसी की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12 में से किसी एक स्थान पर दिखाई देता है। कई लोग कुंडली में सिर्फ मंगल को देखकर डर जाते हैं और इसे गलत समझ लेते हैं। सिर्फ इसलिए कि कुंडली में मंगल दोष है, यह अशुभ नहीं है। मंगल ग्रह की कुंडली में चार स्थान हैं - आंशिक मंगल, हल्का मंगल, घुमावदार मंगल और तीव्र मंगल। इन बातों को ध्यान में रखते हुए मंगल की स्थिति का निर्धारण करना बेहतर है, 


सिर्फ इसलिए कि पत्रिका में मंगल है, डरो मत। मंगल दोष के प्रभाव की सीमा का निर्धारण पत्रिका से ही किया जा सकता है। मंगल को आमतौर पर उग्र ग्रह माना जाता है। मंगलदोष के बारे में विस्तृत जानकारी मुहूर्त चिंतामणि, ज्योतिर महार्णव, मुहूर्त गणपति जैसे ग्रंथों में मिलती है। यदि किसी व्यक्ति में मंगल दोष है, तो उसे ठीक करने के लिए शांति पूजा यानि "भातपूजा" की जाती है। 


मंगल दोष के लक्षण:

मंगल दोष व्यावहारिकता या वाणी की कठोर प्रकृति है। इसलिए मांगलिक व्यक्ति को हमेशा संयम से बोलना चाहिए या किसी प्रिय व्यक्ति के विमुख होने की संभावना है।


प्रभुत्व रखना मंगल दोष है, यह विवाह के मामले में एक कठिन स्थिति पैदा करता है, इसलिए यदि ऐसा व्यक्ति सौम्य, सौम्य स्वभाव रखता है, तो कई कठिनाइयों को दूर किया जाएगा।


मांगलिक व्यक्ति अनायास ही आगे आ जाता है| इसलिए वह जीवनसाथी से सहयोग की अपेक्षा कर सकता है और यदि जीवनसाथी का साथ न मिले तो वैवाहिक जीवन असंतुलित हो जाता है और परिणाम अवसाद होता है। जिससे झगड़े भी हो सकते हैं। इससे बचने के लिए यदि आपको अपने साथी का साथ मिलता है तो आप समय के साथ एक मजबूत संबंध स्थापित कर सकते हैं और सफलता प्राप्त कर सकते हैं।


मांगलिक दोष के प्रकार:

TYPES OF MANGLIK DOSHA

मांगलिक दोष दो प्रकार के होते हैं, जैसे "अंशी मांगलिक" और "महा मांगलिक"।


अंशी-मांगलिक:

इस तरह के दोष को छोटा मांगलिक दोष के रूप में जाना जाता है, जो आमतौर पर अठारह साल के अंत में आता है। इस अंशी मांगलिक दोष का कुप्रभाव विवाह के बाद स्वास्थ्य समस्याओं, विवादों, प्रसव समस्याओं और किसी के परिवार में संघर्ष के कारण होता है।


महा-मांगलिक:

यह एक और प्रकार का दोष है, यह दोष जिसकी भी  कुंडली में  होता है, इसका  दोष किसी  ओर के  जीवन पर अधिक बुरा और हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है, जैसे  की गंभीर दुर्घटनाएं।


कुंडली में स्थिति से मंगल के और दोष बनते हैं। यदि मंगल जन्म कुण्डली के पाँच स्थानों में से किसी एक स्थान पर रुके तो निम्न दोष प्रकट होते हैं।


प्रथम स्थान पर मंगल दोष: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्म कुण्डली में प्रथम स्थान को 'तनु' या 'विवाह स्थान' कहा जाता है। यदि मंगल इस स्थिति में हो तो वह पत्रिका में चौथे, सातवें और आठवें स्थान पर होगा। चतुर्थ स्थान 'सुख का स्थान' होने के कारण मंगल परिवार में कलह का कारण बन सकता है। चूंकि सातवां स्थान 'विवाह स्थान' है, मंगल विवाहित जोड़ों के बीच मतभेद पैदा कर सकता है। मंगल के उग्र स्वभाव के कारण वैवाहिक साथी के साथ छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद भयानक रूप धारण कर सकता है। इसी प्रकार अष्टम स्थान मृत्यु स्थान होने के कारण मंगल की दृष्टि से जीवनसाथी या स्वयं के साथ दुर्घटना होने की संभावना है।


चतुर्थ स्थान पर मंगल दोष:

जब मंगल चतुर्थ भाव में होता है तो वह सातवें, दसवें और ग्यारहवें स्थान पर अपनी दृष्टि रखता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चौथे स्थान को विवाह का स्थान कहा जाता है। यदि विवाह पारिवारिक दबाव में होता है तो जातक अपने जीवनसाथी के साथ खुश रहता है। फिर भी यदि विवाह स्थान में मंगल की दृष्टि हो तो भी जीवनसाथी से लगातार कलह और वाद-विवाद होता रहता है। नतीजतन, ये विवाद सीधे कोर्ट-कचेरी या तलाक में बदल सकते हैं। इसी प्रकार कुंडली में दशम स्थान को 'कर्म स्थान' माना गया है। यदि कार्य स्थान मंगल की दृष्टि हो तो ऐसे जातक का विवाह के बाद पूरा जीवन बदल जाता है, उसे कार्य या व्यवसाय के स्थान पर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसी प्रकार जन्म कुण्डली में ग्यारहवें स्थान को 'लाभ स्थान' कहा जाता है। मंगल की दृष्टि होने पर पिता से पैतृक धन का लाभ नहीं होता है।


सप्तम स्थान पर मंगल दोष :

जब कुंडली में मंगल सप्तम स्ताहन में होता है तो उसकी दृष्टि पहले, दूसरे और दसवें स्थान पर होती है। प्रथम स्थान ‘तनु स्थान’ होने के कारण परिवार में अशांति हो सकती है। पति-पत्नी एक-दूसरे पर शक कर सकते हैं। मंगल के गरम स्वभाव के कारण परिवार के सुख से वंचित रह सकते हैं। दूसरे स्थान को कहते हैं 'धन स्थान'| यदि मंगल दूसरे स्थान पर देखा जाए तो यह आर्थिक संकट, धन संचय में कठिनाई और आर्थिक संकट का कारण बन सकता है। इसी प्रकार दशम स्थान को 'कर्म स्थान' कहा जाता है। चूंकि कर्म का स्थान पिता से होता है, इसलिए व्यक्ति के लिए पिता से आर्थिक सहायता प्राप्त करना कठिन हो सकता है। इससे प्रमोशन में देरी भी हो सकती है। इसके अलावा भाग्योदय देर से होता है। शिक्षा में पूर्णता नहीं होती है।


अष्टम स्थान पर मंगल दोष:

जब मंगल आठवें स्थान पर आता है, तो वह दूसरे, तीसरे और ग्यारहवें स्थान पर अपनी दृष्टि रखता है। दूसरे स्थान को 'धन स्थान' कहते हैं। यदि इस स्थान पर मंगल दिखाई दे तो यात्रा के दौरान चोरी या सेंधमारी जैसी घटनाएं हो सकती हैं। इसी प्रकार तीसरे स्थान को पराक्रम का स्थान कहा जाता है। यहां मंगल की दृष्टि हो तो मेहनत करनी पड़ती है, मेहनत का फल देर से मिलता है। ग्यारहवें स्थान को 'लाभ स्थान' कहा जाता है। इस समय मंगल की दृष्टि आई कि जातक को मित्रों, भाई-बहनों का सहयोग या ससुराल का सहयोग नहीं मिलता।नौकरी को बढ़ावा नहीं दिया जाता है, प्राप्त राशि खो सकती है, शेयर या बीमा निकाल लिया जा सकता है।


द्वादश स्थान पर मंगल दोष:

यदि मंगल बारहवें स्थान में स्थित हो तो वह तीसरे, छठे और सातवें स्थान पर होगा। तीसरे स्थान को पराक्रम का स्थान कहा जाता है। जब आप यहां मंगल को देखते हैं, तो जीवन में उत्साह दूर हो जाता है और आत्मविश्वास कम हो जाता है, नौकरी या व्यवसाय में पद या प्रतिष्ठा में कमी आ सकती है। ऐसा व्यक्ति अपने भाई-बहनों के साथ ठीक नहीं रहता है, जिससे वाद-विवाद हो सकता है। इसी प्रकार छठे स्थान को रिपु स्थान कहते हैं। यदि इस स्थान पर मंगल की दृष्टि हो तो ऐसे जातक को गुप्त शत्रुओं से कष्ट हो सकता है। जीवन तनावपूर्ण हो सकता है। कोर्ट-कचेरी की घटनाएं हो सकती हैं। छठे स्थान को रोग स्थान भी कहा जाता है। जब कोई व्यक्ति इस स्थान पर मंगल को देखता है, तो उसके जीवन को खतरा होता है। अचानक से दुर्घटना या पुरानी बीमारी हो सकती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सप्तम स्थान को विवाह स्थान कहा जाता है। यदि मंगल की दृष्टि सप्तम भाव में हो तो जीवनसाथी से कलह, वाद-विवाद, कलह की संभावना रहती है। परिणाम वैवाहिक असंतोष है। जीवनसाथी के सहयोग में कमी के कारण पारिवारिक सुख में कमी आ सकती है।

एक व्यक्ति को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सभी मांगलिक दोष प्रमाणित गुरुजी की उपस्थिति और आशीर्वाद से त्र्यंबकेश्वर मंदिर (महाराष्ट्र)में कुंभ विवाह जैसे धार्मिक अनुष्ठान करके हटाए और शून्य हो सकते हैं। कुंभ विवाह का ऐसा पवित्र आयोजन केवल हमारे प्राचीन शास्त्रों के अनुसार इस स्थान पर किया जाना चाहिए।


मंगलदोष के नकारात्मक परिणाम:

चूंकि मंगल पहले स्थान पर है; यह वैवाहिक संघर्ष और दुर्व्यवहार को उत्प्रेरक कर सकता है।

जब मंगल दूसरे स्थान में होता है, तो यह वैवाहिक संघर्ष और पेशेवर बाधाओं को शुरू करते हुए संपूर्ण रूप से प्रभावित करता है।

जब मंगल चौथे घर में होता है, तो एक व्यक्ति का पेशेवर प्रदर्शन बाधित होता है, और उन्हें नौकरी बदलने की आवश्यकता हो सकती है।

सप्तम भाव में होने पर मांगलिक के अंदर की अतिरिक्त ऊर्जा मनुष्य को चिड़चिड़ा बना देती है। इसके अलावा, जब मंगल सातवें घर में होता है, तो व्यक्ति के अंदर की अतिरिक्त ऊर्जा व्यक्ति को चिड़चिड़ा बना देती है। व्यक्ति के व्यक्तित्व के कारण, परिवार के सदस्यों के साथ  मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना लगभग असंभव होता है।

जब मंगल आठवें स्थान पर अपना घर बनाता है, तो व्यक्ति पैतृक संपत्ति खो देता है क्योंकि वे अपने बुजुर्गों से अलग हो जाते हैं।

जब मंगल दसवें घर में प्रवेश करता है, तो व्यक्ति मानसिक कठिनाइयों और वित्तीय नुकसान का अनुभव करता है और दुश्मन बनाता है।

मांगलिक कन्या से शादी करने का क्या अप्रभाव हो सकता है?

मांगलिक कन्या से शादी करने से उनके दांपत्य जीवन मे अनहोनी, तनाव निर्माण होता है।

क्या विवाह के बाद कुंभ विवाह का अनुष्ठान करना उचित है?

नहीं उसके लिए पुनर विवाह होता है  यदि किसी लड़की की कुण्डली में वैधव्य योग हो तो विवाह से पूर्व कुम्भ विवाह संस्कार करना अनिवार्य होता है।

किसी भी व्यक्ति के मांगलिक होने के क्या लाभ हैं?

यह मन जाता है की मांगलिक व्यक्ति अपने लक्ष्यों पर केंद्रित होता है, और उसका ज्यादा उत्साही स्वभाव होता है।

ऊर्जा अति या बिलकुल कम होना स्त्रियों में प्रोजेस्ट्रोन और ऑक्सीटोसिन को घटा बढ़ाता है जो दांपत्य और सेक्स लाइफ पर संकट उत्पन्न करता है 

मंगली दोष का निराकरण परिहार 

मांगलिक कुंडली का निर्णय बारिकी से किया जाना चाहिए क्योंकि शास्त्रों में मांगलिक दोष निवारण के तरीके उपलब्ध हैं। 

शास्त्रवचनों के जिस श्लोक के आधार पर जहां कोई कुंडली मांगलिक बनती है, वहीं उस श्लोक के परिहार (काट) के कई प्रमाण हैं। ज्योतिष और व्याकरण का सिध्दांत है कि पूर्ववर्ती कारिका से परवर्ती कारिका (बाद वाली) बलवान होती है। दोष के सम्बन्ध में परवर्ती कारिका ही परिहार है, इसलिये मांगलिक दोष का परिहार मिलता हो तो जरूर विवाह का फैसला किया जाना चाहिए। परिहार नहीं मिलने पर भी यदि मांगलिक कन्या का विवाह गैर मांगलिक वर से करना हो तो शास्त्रों मे विवाह से पूर्व “घट विवाह” का प्रावधन है। मांगलिक प्रभाव वाली कुंडली से भयभीत होने कि जरूरत नहीं है।


मुहूर्त दीपक', 'मुहूर्त पारिजात' तथा अन्य मानक ग्रंथों में मंगली योग या दोष के कुछ आत्म कुंडलीगत तथा कुछ पर कुंडलीगत परिहार बताए हैं। यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्ठम व द्वादश भावों में कहीं भी मंगल हो और अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि या युति निम्न प्रकार हो, तो कुजदोष स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है :-

    0 मंगल (1,4,7,8,12 भावों में मंगल बैठे तो मंगली दोष कहा जाता है।)

    जिस भाव में बैठा है-यदि उस भाव का स्वामी अपनी उच्च रशि में बैठा हो तोवह मंगल के प्रभाव को कम कर देता है। अतः मंगली दोष स्वतः कट जाता है।
    D पहले या चौथे भाव का मंगल यदि स्वराशि का हो (मेष/वृश्चिक में हो)यानी पहले या चौथे भाव में मेष या वृश्चिक राशि ही पड़ रही हो तो मंगली दोषकट जाता है।
    । दक्षिण भारतीय दूसरे भाव में मंगल होने को भी मंगली दोष मानते हैं।किन्तु दूसरे भाव में यदि मिथुन या कन्या राशि हो तो दूसरे भाव का मंगली दोषकट जाता है।
    | सातवें घर का मंगल यदि अपनी उच्च या नीच राशि में हो (अर्थात् सातवेंभाव में मकर/कर्क राशि हो) तो मंगली दोष स्वतः कट जाता है।
    D आठवें भाव का मंगल यदि गुरु की राशियों में हो (आठवें भाव मेंधनु/मीन राशि हो) तो मंगल आठवें होकर भी मंगली दोष उत्पन्न नहीं करता।
    D बारहवें भाव का मंगल यदि शुक्र की राशियों में हो (अर्थात् बारहवें भावमें वृष/तुला राशि-हो) तो भी मंगली दोष स्वतः कट जाता है।
    Dसातवें भाव में मीन राशि का, आठवें भाव में कुम्भ राशि का, प्रथम भावमें मेष का, चौथे भाव में वृश्चिक का तथा बारहवें भाव में धनु का मंगल हो तो भीमंगली दोष का निराकरण हो जाता है।
    Dमंगल सिंह या कुम्भ राशि का हो तो किसी भी भाव में बैठकर मंगलीदोष नहीं देता (कुछ विद्वान मेष, वृश्चिक व कर्क राशि में मंगल को भी ऐसा गुणकहते हैं)।
    0राहू शुभ ग्रहों के साथ, शुभ राशियों में, केन्द्र/त्रिकोण में बैठकर मंगलको देखता हो तो भी मंगली दोष कट जाता है।
    0 ससमेश सबल अवस्था में हो अथवां गुरु सातवें भाव में बैठा हो तो भीमंगली दोष कट जाता है।
    0 मंगल यदि शनि या गुरु से दृष्ट हो अथवा मंगल यदि शनि या गुरु के साथबैठा हो अथवा मंगल चन्द्र व गुरु के साथ बैठा हो तो इन तीनों स्थितियों में भीमंगली दोष स्वत: ही कट जाता है/निष्प्भावी रहता है।
    D सप्मेश केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो अथवा गुरु केन्द्र या त्रिकोण(1,4,5,7,10,9) में बैठा हो अथवा 1,2,4,12 भाव में शुक्र बैठा हो तो भी मंगलीदोष स्वतः कट जाता है। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि शुक्र या गुरु अस्त न होतथा पापमध्य/पापकर्तरी योग में न हों। अन्यथा वे मंगली दोष का निराकरण करपाने में समर्थ नहीं होते। दोष के निराकरण के लिए उनका बली होना अनिवार्य है।
    0 द्वितीय भाव तथा संसम भाव में शुभ ग्रहों की उपस्थिति हो और वे बली  हों तो भी मंगली दोष कटता है। अथवा लग्न में स्वग्रही/मित्रक्षेत्री/उच्च के ग्रह बैठेहों तो भी मंगली दोष का प्रभाव नगण्यप्रायः रहता है।
    D ससम भाव में शनि व शुक्र की युति हो अथवा केन्द्र या त्रिकोण में शुक्र
    स्वराशि या उच्च राशि में हो तो भी मंगली दोष का निराकरण होता है। (कुछ
    विद्वान 6,8 भाषों में शुक्र के उच्चर या स्वग्रही होने पर भी मंगली दोष का निवारण
    मानते हैं। परन्तु इससे पुरुष की पौरुष क्षमता प्रभावित होती है अतः इसे निरापदनहीं कह सकते।)
    D चन्द्रमा यदि केन्द्र में अकेला हो किन्तु बली हो तो भी मंगली दोष मेंन्यूनता ले आता है।
    D वर या वधू की कुंडली में जिस भाव में मंगल हो, उसी भाव में शनि याराहू बैठा हो तो भी मंगली दोष स्वतः कट जाता है।
    D यदि मंगली दोष शुक्र, चन्द्र व लग्न तीनों से कन्फर्म नहीं होता तो उसे
    अर्ध मंगली कह दिया जाता है। ऐसे मामलों में यदि 28-29 साल तक जातक काविवाह न हो तो मंगली दोष स्वतः कट जाता हैं।
    निष्कर्ष-शेष मामलों में यदि मंगली दोष तीनों प्रकार से कन्फर्म हो रहा होतभी जातक को मंगली कहा जा सकता है। ऐसा हो तो मंगली जातक का विवाहमंगली जातक से ही करना चाहिए।
    मंगली दोष यदि कट न गया हो (स्वतः) और कन्फर्म हो तो उसकेनिवारण/प्रभाव को कम करने के कुछ उपायों की व्यवस्था भी ज्योतिषशास्त्र करता
    है। 

* यदि मंगल ग्रह वाले भाव का स्वामी बली हो, उसी भाव में बैठा हो या दृष्टि रखता हो, साथ ही सप्तमेश या शुक्र अशुभ भावों (6/8/12) में न हो।

* यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो।

* यदि गुरु या शुक्र बलवान, उच्च के होकर सप्तम में हो तथा मंगल निर्बल या नीच राशिगत हो।

* मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ में, कर्क या मकर का मंगल सप्तम में, मीन का मंगल अष्टम में तथा मेष या कर्क का मंगल द्वादश भाव में हो।

* यदि मंगल स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि में स्थित हो।

* यदि वर-कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में मंगल दोष हो तथा परकुंडली में उन्हीं पाँच में से किसी भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो। कहा गया है -

शनि भौमोअथवा कश्चित्‌ पापो वा तादृशो भवेत्‌।

तेष्वेव भवनेष्वेव भौम-दोषः विनाशकृत्‌॥

इनके अतिरिक्त भी कई योग ऐसे होते हैं, जो कुजदोष का परिहार करते हैं। अतः मंगल के नाम पर मांगलिक अवसरों को नहीं खोना चाहिए।

सौभाग्य की सूचिका भी है मंगली कन्या?

कन्या की जन्मकुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादशभाव में मंगल होने के बाद भी प्रथम (लग्न, त्रिकोण), चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम तथा दशमभाव में बलवान गुरु की स्थिति कन्या को मंगली होते हुए भी सौभाग्यशालिनी व सुयोग्यभार्या तथा गुणवान व संतानवान बनाती है।


ऐसा होने से नहीं लगता है वैवाहिक जीवन में मांगलिक दोष

1. मंगल दोष के परिहार स्वयं की कुंडली में (मंगल भी निम्न लिखित परिस्तिथियों में दोष कारक नहीं होगा)—जैसे शुभ ग्रहों का केंद्र में होना, शुक्र द्वितीय भाव में हो, गुरु मंगल साथ हों या मंगल पर गुरु की दृष्टि हो तो मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है।


2. वर-कन्या की कुंडली में आपस में मांगलिक दोष की काट- जैसे एक के मांगलिक स्थान में मंगल हो और दूसरे के इन्हीं स्थानों में सूर्य, शनि, राहू, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो दोष नष्ट हो जाता है।


3. मेष का मंगल लग्न में, धनु का द्वादश भाव में, वृश्चिक का चौथे भाव में, वृष का सप्तम में, कुंभ का आठवें भाव में हो तो भौम दोष नहीं रहता।


4. कुंडली में मंगल यदि स्व-राशि (मेष, वृश्चिक), मूलत्रिकोण, उच्चराशि (मकर), मित्र राशि (सिंह, धनु, मीन) में हो तो भौम दोष नहीं रहता है।


5. सिंह लग्न और कर्क लग्न में भी लग्नस्थ मंगल का दोष नहीं होता है। शनि, मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु, सूर्य, केतु अगर मांगलिक भावों (1,4,7,8,12) में कन्या जातक के हों और उन्हीं भावों में वर के भी हों तो भौम दोष नष्ट होता है। यानी यदि एक कुंडली में मांगलिक स्थान में मंगल हो तथा दूसरे की में इन्हीं स्थानों में शनि, सूर्य, मंगल, राहु, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो उस दोष को काटता है।


6. कन्या की कुंडली में गुरू यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो मांगलिक दोष नहीं लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।


7. यदि एक कुंडली मांगलिक हो और दूसरे की कुंडली के 3, 6 या 11वें भाव में से किसी भाव में राहु, मंगल या शनि में से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है।

8. कुंडली के 1,4,7,8,12वें भाव में मंगल यदि चर राशि मेष, कर्क, तुला और मकर में हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता है।


9. वर की कुण्डली में मंगल जिस भाव में बैठकर मंगली दोष बनाता हो कन्या की कुण्डली में उसी भाव में सूर्य, शनि अथवा राहु हो तो मंगल दोष का शमन हो जाता है।


10. जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व, उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का, वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा।


11. यदि 1,4,7,8,12 भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता।


मंगल के साथ चन्द्र गुरु शनि में से कोई भी एक ग्रह हो अथवा शनि की पूर्ण दृष्टि हो तो ऐसी कुंडली में मंगल दोष किंचित मात्र भी नहीं रहता है।


 मेष का मंगल लग्न में हो, वृश्चिक का चौथा, मीन का 7वां, कुंभ का 8वां, धनु का 12वां हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।


यदि केंद्र त्रिकोण में गुरु हो या केंद्र में चन्द्रमा हो या 6-11वें भाव में राहु हो, मंगल के साथ राहु अथवा मंगल को गुरु देखता हो अथवा मंगल से दूसरा शुक्र हो तो मंगल शुभ होकर समृद्धिकारक हो जाता है।


गुरु बलवान हो, शुक्र लग्न अथवा 7वां हो, मंगल वक्री नीच या शत्रु के घर का हो या अस्त हो तो दोष नहीं होता है

 विषय को सम्पूर्णता देने के लिए तथा पाठकों के ज्ञानवर्धन व लाभ के लिएकुछ प्रमुख उपायों को संक्षेप में यहां कहेंगे-

मंगल दोष के उपाय

1. सबसे सरल उपाय है हनुमान जी की नियमित उपासना। यह मंगल के हर तरह के दोष तो खत्म करने में सहायक है।

2. हर मंगलवार को शिवलिंग पर कुमकुम चढ़ाएं। इसके साथ ही शिवलिंग पर लाल मसूर की दाल और लाल गुलाब अर्पित करें।

3. लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है।

4. कुंडली में मंगल यदि स्व-राशि (मेष, वृश्चिक), मूलत्रिकोण, उच्चराशि (मकर), मित्र राशि (सिंह, धनु, मीन) में हो तो भौम दोष नहीं रहता है।

5. सिंह लग्न और कर्क लग्न में भी लग्नस्थ मंगल का दोष नहीं होता है। शनि, मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु, सूर्य, केतु अगर मांगलिक भावों (1,4,7,8,12) में कन्या जातक के हों और उन्हीं भावों में वर के भी हों तो भौम दोष नष्ट होता है। यानी यदि एक कुंडली में मांगलिक स्थान में मंगल हो तथा दूसरे की में इन्हीं स्थानों में शनि, सूर्य, मंगल, राहु, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो उस दोष को काटता है।


6. कन्या की कुंडली में गुरू यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो मांगलिक दोष नहीं लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।


7. यदि एक कुंडली मांगलिक हो और दूसरे की कुंडली के 3, 6 या 11वें भाव में से किसी भाव में राहु, मंगल या शनि में से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है।


8. कुंडली के 1,4,7,8,12वें भाव में मंगल यदि चर राशि मेष, कर्क, तुला और मकर में हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता है।


9. वर की कुण्डली में मंगल जिस भाव में बैठकर मंगली दोष बनाता हो कन्या की कुण्डली में उसी भाव में सूर्य, शनि अथवा राहु हो तो मंगल दोष का शमन हो जाता है।


10. जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व, उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का, वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा।


11. यदि 1,4,7,8,12 भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता।

    निवारण के उपाय

    0 जातक के लग्न में अशुभ मंगल होने से मंगली दोष बनता हो तो जातकको हाथी के दांत से बनी वस्तुओं को घर में तथा अपने साथ रखना उपयोगी होता

    है (यदि दूसरे भाव में बुध भी हो तथा 7,9,11 भाव खाली हों तो पीतल के

    बर्तन/वस्तुएं आदि जातक घर में रखे तथा पीपल व ब्रह्मा की पूजा करे । ऐसे जातकको किसी से मुफ्त में कुछ नहीं लेना चाहिए)।

    D चतुर्थ भाव के मंगल से जातक मंगली हो तो साधु, माता तथा बन्दरों कीसेवा करनी चाहिए। प्रतिदिन प्रातः दांतों की सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए।चीनी, शहद का दान करना चाहिए तथा विकलांग व काले व्यक्ति से मित्रता नहींकरनी चाहिए। ऐसे जातक को शिवाराधना या हनुमानजी की पूजा भी शुभ रहतीहै। दूध, चांदी, चावल, मोती व हाथीदांत घर में रखने चाहिए।

    0 ससम भाव से जातक मंगली हो तो जातक को भैंस, सांप, बिच्छू, कौआ,मछली तथा चमगादड़ों को भोजन कराना चाहिए। काले उड़द, शराब, सरसों कातेल, कोयला, नमक आदि का दान करना चाहिए। भैरव मन्दिर में शराब चढ़ानाभी उसके लिए लाभकारी होगा, बबूल व खजूर के वृक्षों की पानी देना, चाचा कीसेवा करना भी उसके लिए शुभ है। लाल किताच के अनुसार उसे शहद से भरामिट्टी का पात्र निर्जन स्थान में भूमि में दबाना चाहिए तथा बांस की बांसुरी में चीनीभरकर निर्जन या श्मशान में भूमि में दबा देना चाहिए। किन्तु इन कार्यों को किसीकी जानकारी में आए बिना करना चाहिए।
    D आठवें भाव से जातक मंगली हो तो उसको मीठी रोटी (नित्य नहीं तोकम से कम प्रति मंगलवार (कुत्ते को खिलानी चाहिए) यह मीठी रोटी गुड़ सेबने, न कि चीनी से)। या रोटी पर सरसों का तेल चुपड़कर कुत्तों या गायों कोखिलाए। विधवाओं का आशीर्वाद ले। भैरव की उपासना करे अथवा चतुर्थ भावसे मंगली होने वाले उपायों के अनुसार शराब, विकलांग, शहद आदि से सम्बन्धितनिर्देशों का पालन करे।
    D बारइवें भाव से जातक मंगली हो तो उसे चाहिए कि अपने भाइयों सहितशिवाराधना करे तथा भाइयों को लाल वस्त्र न पहनने दे। मीठी वाणी बोले, मांसका सेवन न करे, सदाचारी रहे तथा हनुमान चालीसा का पाठ या हनुमानजी कीपूजा करे अथवा दुर्गा की पूजा या दुर्गा ससशती का पाठ करे। मदिरा का सेवन नकरे। मां, दादी व सास का आशीर्वाद लेता रहे।
    नोट-अन्य उपायों के लिए ‘उपाय खण्ड' में पाठक देख सकते हैं।
    मंगली सम दोष-यदि 1,4,7,8,12 भावों में मंगल न होकर पापी या क्षीणचन्द्रमा हो (अमावस यां कृष्ण पक्ष का अथवा नीच राशि को या अस्त हो) अथवा4,7,8, 12 भावों में सूर्य पाप प्रभाव, नीच राशि या शत्रु क्षेत्रीय हो। अथवा 1,4,7व 12 भावों में शुक्र नीच का या अशुभ हो। अथवा 1,4,7,8, 12 भावों में शनिनीच राशि का या अशुभ हो। या फिर 1,4,7 भाषों में राहू शत्रक्षेत्री होकर औरअशुभ हो गया हो तो भी मंगली दोष के समान ही फल होने से कुछ विद्वान इनकोभी मंगली दोष के अंतर्गत मानते हैं। (बहुत से विद्वान 1,4,7,8,12 भावों पर मंगलकी दृष्टि होने को भी मंगली दोष के अंतर्गत लेते हैं। जो ठोक नहीं है)। ऐसेमामलों से सम्बन्धित उपाय भी पाठक इसी पुस्तक के अन्त में उपाय खण्ड-केअंतर्गत पढ़ सकते हैं।
    विशेष-मंगली दोष पूर्ण रूप से कन्फर्म न होता हो किन्तु तीव्र सम्भावितहो तो उपाय के रूप में कन्या का प्रथम विवाह/सात फेरे किसी कुम्भ से अथवावृक्ष के साथ करा दिए जाते हैं। तत्पश्चात् वर के साथ उसका विवाह/फेरे कराए     जाते हैं। इस प्रकार के उपाय के पीछे तर्क यह है कि ‘मंगली दोष'/मंगल कामारक प्रभाव उस घड़े या वृक्ष पर होता है, जिससे कन्या का प्रथम विवाह कियागया है। वर दूसरा पति होने के कारण उस प्रभाव से सुरक्षित रह पाता है। सुनने मेंआता है कि वह घड़ा जिससे कन्या के फेरे कराए जाते हैं, टूट जाता है तथा वहवृक्ष जिससे कन्या का विवाह कराया जाता है-सूख जाता है।
    चीरा मंगली-पहले, सातवें, आठवें भाव से मंगली दोष हो तो कुछविद्वान उसकी महत्ता दर्शने के लिए उसको 'चीरा मंगली' (खतरनाक) कहते हैं।क्योंकि पहले में जातक के जीवनसाथी की तथा सात व आठ में स्वयं जातक कीमृत्यु सम्भावित होती है (यदि अन्य योगों से उसका निराकरण न हो रहा हो तो)।


मंगल दोष को दूर कैसे करें?

मंगल दोष किसी व्यक्ति की कुंडली मे होने से उन्हें विवाह संबंधी समस्याओ का सामना करना पड़ सकता है| इसके लिए कुम्भ विवाह की विधी करना अनिवार्य है। किन्तु कुम्भ विवाह स्त्री के लिए है 

पुरुष के लिए अर्क विवाह

जब एक विधुर ने 3 शादियां की हों और तीनों पत्नियों की मृत्यु हो गई हो, और संबंधित व्यक्ति पुनर्विवाह करने को तैयार हो, तो ऐसे व्यक्ति का अर्कविवाह किया जाता है। अर्कविवाह रस्म अर्की यानी मंदार के पेड़ से आदमी की पहली शादी होती है। यह शादी सामान्य तरीके से की जाती है। संबंधित व्यक्ति का विवाह तब नियोजित दुल्हन के साथ तय किया जाता है। विवाह समारोह के बाद जातक अपने जीवनसाथी के साथ सुख से रह सकता है | इसके अलावा, यदि एक अविवाहित पुरुष की मृत्यु हो जाती है, तो उसका विवाह अंतिम संस्कार से पहले किया जाता है। एक ब्रह्मचारी का ब्रह्मचर्य इसलिए किया जाता है ताकि ब्रह्मचारी के परिवार को किसी भी तरह से दोष या नुकसान न पहुंचे। इसके बाद ही इसके अंत पारित होते हैं; ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और परिवार के अन्य सदस्य इससे पीड़ित न हों।


अर्कविवाह कब करना चाहिए?

 में आधिकारिक ताम्रपत्रधारी , गुरुजी द्वारा दिए गए शुभ समय में, विवाह गुरुजी के घर पर किया जाता है।


कुंभ-अर्क विवाह करने का सबसे अच्छा मुहरत क्या है?

कुंभ-अर्कविवाह एक प्रतीकात्मक विवाह है, इसलिए मुहूरत नहीं होता है। सिर्फ गरम या तीक्ष्ण निषेध वार तिथि मुहूर्त में ही किया जाता है 


जो पुरुष घट विवाह करवा रहा है उन्हें निर्देश है की सस्ता सामान लाना होगा

क्योकि ये विवाह के बाद उतर जायेगा या दान होगा इसलिए आर्टिफीसियल  ज्वेलरी और सस्ते सामान ही लावे 


साफा, तिलक, हार, अंगूठी , नए चड्डी-बनियान, चोला-पैजामा, मोज़ा-जुती, कटार, मेहँदीकोण, इत्र, रुमाल 

कुम्भ विवाह क्या होता है..??

जब कन्या के जन्म प्रमाण पत्र में ग्राहम के अनुसार विधवा योग होता है तो उसके निवारण के लिए कुम्भ विवाह संस्कार किया जाता है। इस योग का जन्म संबंधित कन्या की जन्म कुंडली में होता है। यदि ऐसी कन्या कुम्भ राशि से विवाह किये बिना ही किसी वर से विवाह कर लेती है तो उसे विधवा हो जाती है। इस अनुष्ठान में, पहली दुल्हन का विवाह मिट्टी के बर्तन में स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति के साथ किया जाता है।

यह शादी सामान्य तरीके से की जाती है। इसमें दुल्हन का दहेज भी था। पूरे विवाह समारोह के बाद, विष्णु की मूर्ति को जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है। इस प्रकार कुंभ विवाह समारोह संपन्न होता है। इसके बाद संबंधित दुल्हन का विवाह इच्छुक दूल्हे के साथ किया जा सकता है।

कुम्भ विवाह की  विधि :

कुंभ विवाह पूजा में सबसे पहले महिला के माता-पिता, भाई या  मामा का उपस्थित आवश्यक है।
आधिकारिक गुरुजी पूजा के लिए सामग्री और सामग्री प्रदान करेंगे, दिए गए समय पर केवल आपकी उपस्थिति आवश्यक है।
कुंभ विवाह पूजा में काला वस्त्र पहनना मना हैं।

स्वस्तीवचन द्वारा पूजा के लिए संकल्प बनाया जाता है।

श्री गणेशजी की पूजा फूल, कुमकुम,षदा से की जाती है ।

कुम्भविवाह से पूर्व कुम्भ मिट्टी के मटकेपर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित कर पूजा की जाती है।

इसी प्रकार अग्नि देवता का आवाहन कर दीपक जलाते हैं।

कुम्भ के विवाह संपन्न होने के बाद भगवान विष्णु की मूर्ति को जलाशय में विसर्जित किया जाता है ।

पूजा पूरी होने के बाद गुरुजी से आशीर्वाद लेने के साथ पूजा समाप्त होती है।

मंगल दोष निवारण मंत्र:

  "ओम क्रां क्रीम् क्रौं सः भौमाय नमः"

विष्णु के साथ कुंभ विवाह
यह शादी सामान्य तरीके से की जाती है। इसमें दुल्हन का दहेज भी था। पूरे विवाह समारोह के बाद, विष्णु की मूर्ति को जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है।

इस प्रकार कुंभ विवाह समारोह संपन्न होता है। इसके बाद संबंधित दुल्हन का विवाह इच्छुक दूल्हे के साथ किया जा सकता है।

विष्णु विवाह करने के लाभ :
लंबे, स्वस्थ, सुखी और समृद्ध वैवाहिक जीवन के लिए।

कुंभ विवाह करने का सबसे अच्छा मुहरत क्या है?
कुंभ विवाह एक प्रतीकात्मक विवाह है, इसलिए मुहूरत नहीं होता है। सिर्फ गरम या तीक्ष्ण निषेध वॉर मुहूर्त में ही किया जाता है

जो स्त्री घट विवाह करवा रही है उसको विवाह के लिए सस्ता सामान लाना होगा
क्योकि ये विवाह के बाद उतर जायेगा या दान होगा इसलिए आर्टिफीसियल  ज्वेलरी और सस्ते सामान ही लावे


@ नए ब्रा-पेन्टी, ब्लाउज, पेटीकोट,16 सिंगार मांग टीका-सिरबोर,कानो की बाली-लूंगग झुमके, गजरा , नथनी, हार,बाजूबंद, मंगल सूत्र, चूड़ियाँ, हाथफूल, अंगूठी कमरबंध पायल, पाव फूल,  बिछिया Lipsticks, काजल, Nail Paint,Bindiलाल साड़ी, मोजा मोज़ा-जुती, मेहँदी  रुमाल

कुम्भ विवाह पूजा मूल्य:

कुंभ विवाह पूजा का मूल्य पूरी तरह पूजा, ब्राह्मण और पूजा को आवश्यक अन्य चीजों पर निर्भर है।
की जाने वाली प्रक्रिया एवं पदार्थो, सामग्री और पंडितो के दक्षिणा का विवरण

1. 5 ब्राह्मण दक्षिणा (2100₹)
इनमे से दो ब्राह्मण भोजन बनाते है, एक जप करते है, एक ग्रन्थ का पाठ करते है एक यजमान को निर्देश देते है

2. 1 आचार्य (2100₹)
आचार्य श्री ज्ञानी, ध्यानी, मानी, पुरे विधि और कार्यक्रम का निर्देशन और मंत्र का वाचन करते है

3. पूजन सामग्री (2100₹)

4. पद/भेट/दान सामग्री (2200₹)
टोपी, चन्दन, गमछा, पेन, डायरी, साबुन, तेल, कंगी, टोर्च, इत्र, धोती, कुरता, गंजी, बनियान, चड्डी,उत्तरिय, 7 बर्तन, पुस्तक, छाता, चप्पल, पेण्ट, शर्ट, जूते, चाँदी की गायी.

5. ब्राह्मणभोजन और दक्षिणा  (2500₹)

कुल खर्चा
  2100
+2100
+2100
+2200
+2500
_________
11,000
_________
यजमान द्वारा
नियत देय राशि 11,000₹



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