ज्योतिष कामवासना SEX LIFE व 12 राशि का काम स्वभाव SEX LIFE TIPS

ज्योतिष कामवासना SEX LIFE व 12 राशि 9 ग्रहो का काम स्वभाव


लोगों की संकीर्ण सोच के कारण सेक्स के बारे में कोई भी खुलकर बात नहीं करना चाहता है, लेकिन क्या कोई इसके बारे में जानना भी नहीं चाहता है? तथाकथित पेशेवरों और सेक्सोलॉजिस्ट लोगों के ज्ञान की कमी और समाज के लोगों की इस विषय पर शर्म के कारण सेक्स जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर बोलने और समझाने की बजाय आपने अकसर रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, पुरुषों के लिए यूरिनल्स पर इससे संबंधित चीज़ें लिखी हुई देखी होगी। ऐसी चीज़ें लोगों के ज्ञान की कमी और सेक्स और कामुकता के बारे में बोलने और जानने के लिए समाज के शर्म के कारण पनपती हैं। लेकिन खुद सोचिये कि, क्या यह अच्छा नहीं होगा जब दो लोग न केवल अन्य कारकों के आधार पर बल्कि उनकी यौन अनुकूलता और इच्छाओं के आधार पर भी एक-दूसरे के करीब आएं?

कम से कम पश्चिम में वे निश्चित स्तर तक ऐसा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन भारत में यह अभी भी छिपा हुआ है। शादी की अनुकूलता में सबसे महत्वपूर्ण कारक आमतौर पर किसी का ध्यान नहीं जाता है जो युगल के बीच यौन नाराजगी का कारण बनता है। आइए सेक्स, यौन रोगों, नपुंसकता, मन में यौन क्रीड़ा से संबंधित इच्छाओं आदि और उपायों के बारे में सेक्स के बारे में जानें।

वैदिक ज्योतिष में दो या दो से अधिक ग्रहों का कुंडली के किसी एक घर में एक साथ बैठना युति कहलाता है। जब तीन ग्रह साथ में हो तो यह त्रिग्रही योग, चार ग्रह साथ में हो तो चतुर्ग्रही योग और पांच ग्रह साथ में हो तो पंचग्रही योग होता है। आज हम बात करते हैं मंगल-शुक्र की युति की।

ज्योतिषीय परिभाषा के अनुसार जब किसी स्त्री या पुरुष की कुंडली में मंगल और शुक्र एक साथ एक ही घर में मौजूद हों तो ऐसे जातक में काम वासना की अधिकता होती है। इन दोनों ग्रहों की स्थिति यदि अत्यंत मजबूत हो तो यह काम वासना अत्यधिक तीव्रता वाली हो जाती है और जातक को खुद पर नियंत्रण रखना भी मुश्किल हो जाता है।
 
वैदिक ज्योतिष में मंगल को अग्नि और तेज का प्रतीक माना गया है। शरीर में रक्त पर मंगल का प्रभाव होता है। वहीं शुक्र सौंदर्य, प्रेम, वासना, काम, यौन इच्छा का प्रतिनिधि ग्रह होता है। जब इन दोनों ग्रहों का मिलन होता है तो इनके गुणधर्मों के अनुसार व्यक्ति में काम वासना बलवती हो जाती है। कुंडली के अलग-अलग भावों के अनुसार इनके फल में कम-ज्यादा हो सकता है, लेकिन मूलत: यह व्यक्ति को अत्यंत कामी बनाता है।
जब किसी जातक की जन्मकुंडली में मंगल और शुक्र एक साथ बैठे हों और दोनों ग्रह सामान्य अवस्था में हो तो जातक में यौन इच्छाएं तो अत्यंत प्रभावी होती हैं, लेकिन उसका उन इच्छाओं पर पूर्ण नियंत्रण होता है। यह परिस्थिति के अनुसार खुद को कंट्रोल कर सकता है।यदि दोनों ग्रहों में से मंगल ज्यादा प्रभावी हो और शुक्र कमजोर हो तो जातक दुष्कर्मी भी बन सकता है, क्योंकि मंगल उसे अतिचारी बना देता है और व्यक्ति कैसे भी करके अपनी यौन इच्छा पूरी कर लेना चाहता है। ऐसी स्थिति में केवल यौन भावनाएं प्रबल होती हैं, प्रेम नहीं होता।
यदि दोनों ग्रहों में से शुक्र ज्यादा प्रभावी हो और मंगल कमजोर हो तो जातक संतुलित, सधा हुआ और नियंत्रित यौन व्यवहार करता है। ऐसे व्यक्ति के लिए यौन भावनाएं दूसरे स्थान पर आती हैं, जबकि यह प्रेम को अधिक बल देता है। ऐसा व्यक्ति अपने पार्टनर की इच्छाओं को समझते हुए यौन संबंध बनाता है।
 
जिस जातक की कुंडली में मंगल-शुक्र दोनों संतुलित अवस्था में हो तो उसके अनेक विपरीत लिंगी मित्र होते हैं और वह सबके साथ समान व्यवहार करता है। पुरुष की कुंडली में यह युति है तो उसकी महिला मित्र अधिक होंगी और स्त्री की कुंडली में इस युति के होने से उसके पुरुष मित्र अधिक होते हैं।

यौन इच्छाएं और व्यवहार:

केपी के अनुसार, यदि 7 वाँ भाव सूर्य के तारे में या सूर्य के उप में है तो संभोग सुखमय होगा, यदि चंद्रमा है तो संभोग सुखी और सुखद होगा, यदि मंगल तब जबरदस्ती सेक्स करता है और सेक्स में अप्रसन्नता है, बुध व्यक्ति शारीरिक से अधिक मुखर सेक्स करना पसंद करेंगे। ये लोग फ़ोन सेक्स को बहुत पसंद करते हैं। यदि बृहस्पति है तो यौन कार्य अच्छा होगा। यदि शुक्र है तो पूरे कामसूत्र को दैनिक करा जाएगा। यदि शनि है तो सेक्स और अवधि में कोई आनंद नहीं होगा|

आमतौर पर, यदि 7 वें घर में मंगल है या मंगल ग्रह से संबंधित है, तो व्यक्ति सेक्स करते समय गुस्से में है होने जैसा प्रदर्शित करता है और उसको अपनी सेक्स इच्छा की पूर्ति  से ही मतलब होता है। अगर बृहस्पति है तो, प्यार करना अच्छा और शांतिपूर्ण है। अगर शनि है तो हो सकता है समलैंगिकता की प्रवृत्ति, बिस्तर पर पशुवत व्यवहार, गुदा मैथुन, सेक्स के बारे में विकृत दृष्टिकोण। अगर राहू है तो व्यक्ति सेक्स में असामान्य हो जाएगा और इसे इस तरह से करेगा जो किसी चीज को चुराने जैसा है। अगर केतु फिर व्यक्ति में हाइपर हो जाएगा। सेक्स और समय से पहले स्खलन से पीड़ित हो सकता है। यदि शुक्र तब यौन कृत्य आनंद है। यदि बुध तो व्यक्ति शीघ्र थकावट और शीघ्रपतन से पीड़ित होता है। अगर चंद्रमा है तो मूड स्विंग यौन सुख का फैसला करेगा। अगर सूर्य  है तो यौन क्रिया में आक्रामकता होगी। दैनिक गोचर यौन इच्छाओं को भी प्रभावित करता है और कई बार जन्म कुंडली में सेक्स के वादों को पार कर जाता है।

मनुष्य में काम वासना एक जन्मजात प्रवृति और वह इससे आजीवन प्रभावित -संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है किसी में ज्यादा हो सकता है । ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की व्यक्ति में काम भावना किस रूप में विद्यमान है और वह उसका प्रयोग किन क्षत्रों में कितने अंशों में कर रहा है ।

सेक्स के रोग:

1. 8 वें में मंगल और शुक्र अंडकोष के रोग देंगे।

2. यदि मंगल और शुक्र मंगल की राशि में हैं तो भी यही परिणाम है।

3. यदि मंगल और शुक्र 7 वें में हैं तो यौनकर्मी के कारण यौन रोग।

4. मंगल शुक्र राहु, 8 वें यौन रोग में मंगल शुक्र शनि।

5. 8 वें में राहु एक व्यक्ति को सेक्स पागल बनाता है और संबंधित रोग देता है।

6. 8 वें में बुध आंशिक रूप से पूर्ण नपुंसकता देता है।

यौन अंग:

पुरुष हो या महिला, ये निष्कर्ष दोनों पर लागू होते हैं:

1. यदि 8 वां घर बृहस्पति का है तो यौन अंगों का आकार और कार्य  सामान्य होगा।

2. यदि शनि है तो आकार बड़ा होगा किन्तु कार्य असंतोषजनक होगा।

3. यदि शुक्र हो तो सब अच्छा  है।

4. यदि मंगल है तो आकार छोटा लेकिन अधिक संतोषजनक होगा।

5. यदि बुध  है तो सेक्स के मामलों में हीन भावना।

6. अगर सूर्य  है तो चीजें ठीक होंगी।

7. यदि चंद्रमा है तो अंग सामान्य होंगे और कार्य मूड स्विंग पर निर्भर करेगा।

नपुंसकता:

चिकित्सा विज्ञान कहता है कि, वास्तविक नपुंसकता शायद ही होती है। यह वास्तविक से अधिक मनोवैज्ञानिक है। इसे ठीक किया जा सकता है, अधिकांश लोगों को नपुंसकता के नाम पर केवल चुटकी बजाते ही मूर्ख बना दिया जाता है जो वास्तव में अधिकांश मामलों में मौजूद नहीं होता है। अधिकांश मामलों में एक अच्छी मनोवैज्ञानिक परामर्श निश्चित रूप से राहत देगा। फिर भी, जो संयोजन नपुंसकता उत्पन्न कर सकते हैं वे हैं

1. द्वितीय में राहु या शनि, 8 वें में बुध और 12 वें में चंद्रमा एक नपुंसक बनाता है।

2. 8 वें में शनि बुध और चंद्रमा किशोरावस्था में राहु नपुंसकता उत्पन्न करता है।

3. 8 वें में बुध या 8 वें भाव से जुड़ा होने से नपुंसकता आती है।

4. यदि चंद्रमा पुरुषार्थ के बीच बँधा हो और 8 वें घर में केतु या मरकरी हो तो नपुंसकता आती है।

5. लग्न में शनि राहु और 7 वें में बुध केतु है।

6. 7 वें में राहु और 8 वें में शनि और कोई भी बृहस्पति से दृष्ट  नहीं है।

महिलाओं में सेक्स फोबिया:

1. जब शनि लग्न में स्थित हो तो मंगल केतु से युक्त होता है।

2. लगन में शनि राहु।

3. जब 8 वें स्थान पर शनि और राहु के बीच चंद्रमा होता  है।

4. शनि राहु चंद्रमा एक चार्ट में सम्‍मिलित है।

इन मामलों में कई बार महिला डर की वजह से सेक्स में सुस्त हो जाएगी और वह हताश हो जाएगी। अपने साथी को सेक्स की संतुष्टि नहीं दे पाएगी |


 लग्न / लग्नेश

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1👉  यदि लग्न और बारहवें भाव के स्वामी एक हो कर केंद्र /त्रिकोण में बैठ जाएँ या एक दूसरे से केंद्रवर्ती हो या आपस में स्थान परिवर्तन कर रहे हों तो पर्वत योग का निर्माण होता है । इस योग के चलते जहां व्यक्ति भाग्यशाली , विद्या -प्रिय ,कर्म शील , दानी , यशस्वी , घर जमीन का अधिपति होता है वहीं अत्यंत कामी और कभी कभी पर स्त्री गमन करने वाला भी होता है ।


3👉 यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो और सप्तमेश लग्न में हो , तो जातक स्त्री और पुरुष दोनों में रूचि रखता है , उसे समय पर जैसा साथी मिल जाए वह अपनी भूख मिटा लेता है । यदि केवल सप्तमेश लग्न में स्थित हो तो जातक में काम वासना अधिक होती है तथा उसमें रतिक्रिया करते समय पशु प्रवृति उत्पन्न हो जाती है और वह निषिद्ध स्थानों को अपनी जिह्वा से चाटने लगता है ।

5👉 लग्न में शुक्र की युति 2 /7 /6 के स्वामी के साथ हो तो जातक का चरित्र संदिग्ध ही रहता है ।

सप्तम भाव और तुला राशि

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1👉 सातवें भाव में मंगल , बुद्ध और शुक्र की युति हो इस युति पर कोई शुभ प्रभाव न हो और गुरु केंद्र में उपस्थित न हो तो जातक अपनी काम की पूर्ति अप्राकृतिक तरीकों से करता है ।

3👉 तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ।

5👉 दूषित शुक्र और बुद्ध की युति सप्तम भाव में हो तो जातक काम वासना की पूर्ति के लिए गुप्त तरीके खोजता है ।

2👉 सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है ।

4👉 शुक्र तीसरे भाव में स्थित हो और मंगल से दूषित हो , छठे भाव में मंगल की राशि हो और चन्द्रमा बारहवें स्थान पर हो तो व्यभिचारी प्रवृतियां अधिक होती है ।

     गुरु

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1👉 गुरु लग्न/चतुर्थ /सप्तम/दशम स्थान पर हो या पुरुष राशि में छठे भाव में हो या द्वादश भाव में हो , जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए सभी सीमाओं को तोड़ डालता है


    शनि

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1👉 यदि शनि स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि का होकर लग्न से केंद्रवर्ती हो तो शशः योग बनता है । ऐसा व्यक्ति राजा ,सचिव, जंगल पहाड़ पर घूमने वाला ,पराये धन का अपहरण करने वाला ,दूसरों की कमजोरियों को जानने वाला ,दूसरों की पत्नी से सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा करने वाला होता है ।कभी कभी अपने इस दुराचार के लिए उसकी प्रतिष्ठा कलंकित हो सकती है , वह दूसरों की नज़रों में गिर सकता है और समाज में अपमानित भी हो सकता है ।


3👉 दशम स्थान का शनि विरोधाभास उत्पन्न करता है , जातक कभी कभी ज्ञान वैराग्य की बात करता है तो कभी कभी कामशास्त्र का गंभीरता से विश्लेषण करता है , काम और सन्यास के बीच जातक झूलता रहता है ।


5👉 शनि की चन्द्रमा/शुक्र/मंगल के साथ युति जातक में काम वासना को काफी बड़ा देती है ।


2👉 नवम भाव में दूषित चन्द्रमा की उपस्थिति गुरु/ शिक्षक /मार्गदर्शक के साथ व्यभिचार करने के उकसाते हैं ।


4👉 नीच का चन्द्रमा सप्तम स्थान पर हो तो जातक आपने नौकर /नौकरानी से शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं ।


2👉 मंगल सप्तम भाव में हो और उसपर कोई शुभ प्रभाव न हो तो जातक नबालिकों के साथ सम्बन्ध बनाता है ।


4👉 जातक कामांध होकर पशु सामान व्यवहार करता है यदि मंगल और एक पाप ग्रह सप्तम में स्थित हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ भाव हो या मंगल चतुर्थ भाव में और राहु सप्तम भाव में हो या शुक्र मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम को देखता हो ।

मनुष्य में काम वासना एक जन्मजात प्राकृतिक प्रवृति और वह इससे आजीवन प्रभावित .संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है किसी में ज्यादा हो सकता है । ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की व्यक्ति में काम भावना किस रूप में विद्यमान है और वह उसका प्रयोग किन क्षत्रों में कितने अंशों में कर रहा है ।सेक्स व दाम्पत्य (वैवाहिक जीवन) आदि से सम्बन्धित कुछ प्रमुख सूत्रों को इस अध्याय में संक्षेप में चर्चा के अन्तर्गत लेंगे। समाज क्योंकि पुरुष प्रधान है और उपरोक्त मामलों में स्त्री की भूमिका विशेष होती है तथा स्त्री के स्वभाव की गुत्थियों तथा चरित्र को समझना सरल नहीं होता। इसके अलावा जनसामान्य (विशेषकर पुरुष तथा बहुत-सी स्त्रियां भी) अन्य स्त्रियों के विषय में जानने को उत्सुक रहते हैं। अतः इस अध्याय का विशेष जोर स्त्रियों पर ही होगा--(यह मेरे शोध का विषय भी है। अतः इस विषय में मैं कुछ विशेष कह पाने की स्थिति में भी हूं।) अध्ययन का आधार-इस संदर्भ में संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि सप्तम भाव (विवाह/गृहस्थी), द्वादश भाव (शयन सुख), तृतीय भाव (गुप्त कामेच्छा), लग्न (मस्तिष्क), चतुर्थ भाव (मन), इन सब भावों के स्वामी, कारक एवं शुक्र, गुरु, मंगल तथा चंद्र की स्थिति विशेष रूप से देखी जानी चाहिए। साथ ही शनि एवं बुध की भी-जो नपुंसकत्व/ठंडेपन के प्रतिनिधि हैं। बेशक इस मामले में जन्म नक्षत्र तथा जन्म राशि का विचार भी किया जाना चाहिए। तभी निश्चयात्मक रूप से कुछ कहा जा सकता है। (रोग आदि के सम्बन्ध में शुक्र, बुध, मंगल, शनि, गुरु आदि से छठे तथा आठवें भाव का सम्बन्ध भी देखा जाना चाहिए।) परन्तु यहां हम सीधे फलित सूत्र ही कहेंगे, ताकि पाठकों को सुविधा रहे।
आधारभूत/स्मरणीय तथ्य-शुक्र क्योंकि पत्नी के साथ-साथ काम (ैम्ग्) का कारक भी है। अतः पुरुष की कुंडली में विशेष विचारणीय होता है। मंगल उत्तेजना का कारक होने से ैम्ग् के मामले में शुक्र के समान ही महत्त्वपूर्ण होता है।
गुरु महिलाओं में पति का कारक होने से विशेषरूप से विचारणीय होता है (शुक्र व मंगल तो होते ही हैं)। पर स्त्रियों में चरित्र के विषय में जानने के लिए चन्द्रमा (मन) की स्थिति देखनी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है।महिला जातकों में पतिसुख को देखने के लिए सप्तमेश की स्थिति तथा राशि भी विशेष रूप से विचारी जाती है। क्योंकि सप्तमेश का चर राशियों में होना गृहस्थी के सुख के लिए शुभ नहीं माना जा सकता।महिलाएं या पुरुष (पुरुष विशेष रूप से) शुक्र, मंगल, गुरु आदि के साथ अथवा सातवें तथा बारहवें भाव के साथ शनि तथा बुध का सम्बन्ध भी विचारना अत्यंत आवश्यक होता है। क्योंकि ये दोनों ठंडेपन/नपुंसकत्व के प्रतिनिधि ग्रह हैं एवं कामसुख में बाधक हैं।
ऽ नक्षत्र, सप्तमेश तथा द्वादशेश सहित लग्नेश का तो विशेष विचार दोनों कुंडलियों में होना ही चाहिए। किन्तु सातवें से बारहवां होने के कारण छठा तथा बारहवें से बारहवां होने के वारण ग्यारहवां भाव भी कम महत्त्व का नहीं होता। सुख व मन का कारक चैथा भाव तथा गुप्त कामेच्छाओं का कारक तीसरा भाव भी सूक्ष्म अध्ययन के लिए अवश्य ही विचारा जाना चाहिए।
ऽ सूर्य, शनि, राहू, केतु-इन चारों ग्रहों से सप्तमेश, द्वादशेश या सप्तम व द्वादश भाव तथा (महिला कुंडलियों में चन्द्रमा भी) लग्न व लग्नेश म्थ्थ्म्ब्ज्म्क् (प्रभावित) न हों यह भी देखा जाना चाहिए। क्योंकि इनका प्रभाव गृहस्थ सुख में बाधक/अधोगति वाला होता है।
ऽ अतिसूक्ष्म अवलोकन कर चरित्र विचार करने के लिए ’त्रिशांश’ का विचार करना चाहिए। यह ।क्ट।छब्म् क्म्म्च् ैज्न्क्ल् का विषय है। अतः इस पुस्तक में शामिल नहीं है।
मनुष्य में काम वासना एक जन्मजात प्रवृति और वह इससे आजीवन प्रभावित .संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है किसी में ज्यादा हो सकता है । ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की व्यक्ति में काम भावना किस रूप में विद्यमान है और वह उसका प्रयोग किन क्षत्रों में कितने अंशों में कर रहा है ।
कामना से कामुकता ज्योतिष दृस्टि
ज्योतिष शास्त्र में शुक्र को सुंदरता आकर्षण ओर दैहिकसुख से जोड़कर देखा जाता रहा है। साथ ही समझे तो हमारे भीतर दबी हुई या बाहर अभिव्यक्त उजागर लालसा कामना समस्त इच्छाए लालुप्त का तार्किक अर्थ शुक्र प्रभावित जातक है।

लग्न-लग्नेश
1ण् यदि लग्न और बारहवें भाव के स्वामी एक हो कर केंद्र ध्त्रिकोण में बैठ जाएँ या एक दूसरे से केंद्रवर्ती हो या आपस में स्थान परिवर्तन कर रहे हों तो पर्वत योग का निर्माण होता है । इस योग के चलते जहां व्यक्ति भाग्यशाली ए विद्या प्रिय एकर्म शील ए दानी ए यशस्वी ए घर जमीन का अधिपति होता है वहीं अत्यंत कामी और कभी कभी पर स्त्री गमन करने वाला भी होता है ।
2ण् यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो एतो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन एविचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है ।
3ण् यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो और सप्तमेश लग्न में हो ए तो जातक स्त्री और पुरुष दोनों में रूचि रखता है ए उसे समय पर जैसा साथी मिल जाए वह अपनी भूख मिटा लेता है । यदि केवल सप्तमेश लग्न में स्थित हो तो जातक में काम वासना अधिक होती है तथा उसमें रतिक्रिया करते समय पशु प्रवृति उत्पन्न हो जाती है और वह निषिद्ध स्थानों को अपनी जिह्वा से चाटने लगता है ।
4ण् यदि लग्नेश ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो जातक अप्राकृतिक सेक्स और मैस्टरबेशन आदि प्रवृतियों से ग्रसित रहता है और ये क्रियाएँ उसे आनंद और तृप्ति प्रदान करती हैं ।
5ण् लग्न में शुक्र की युति 2 ध्7 ध्6 के स्वामी के साथ हो तो जातक का चरित्र संदिग्ध ही रहता है ।
6ण् मीन लग्न में सूर्य और शुक्र की युति लग्नध्चतुर्थ भाव में हो या सूर्य शुक्र की युति सप्तम भाव में हो और अष्टम में पुरुष राशि हो तो स्त्री ए स्त्री राशि होने पर पुरुष अपनी तरक्की या अपना कठिन कार्य हल करने के लिए अपने साथी के अतिरिक्त अन्य से सम्बन्ध स्थापित करते हैं ।
सप्तम भाव और तुला राशि रू
1 सातवें भाव में मंगल ए बुद्ध और शुक्र की युति हो इस युति पर कोई शुभ प्रभाव न हो और गुरु केंद्र में उपस्थित न हो तो जातक अपनी काम की पूर्ति अप्राकृतिक तरीकों से करता है ।
2 मंगल और शनि सप्तम स्थान पर स्थित हो तो जातक समलिंगी क्ष्होमसेक्सुअल द्व होता है ए अकुलीन वर्ग की महिलाओं के संपर्क में रहता है । अष्टम ध्नवम ध्द्वादश भाव का मंगल भी अधिक काम वासना उत्पन्न करता है ए ऐसा जातक गुरु पत्नी को भी नही छोड़ पाता है ।
3 तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहुध्मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ।
4 तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी पारिवारिक कलेश का कारण बनती है ।
5 दूषित शुक्र और बुद्ध की युति सप्तम भाव में हो तो जातक काम वासना की पूर्ति के लिए गुप्त तरीके खोजता है ।
शुक्र रू
1 यदि शुक्र स्वक्षेत्री एमूलत्रिकोण राशि या अपने उच्च राशि का हो कर लग्न से केंद्र में हो तो मालव्य योग बनता है । इस योग में व्यक्ति सुन्दरएगुणी ए संपत्ति युक्त एउत्साह शक्ति से पूर्ण ए सलाह देने या मंत्रणा करने में निपुण होने के साथ साथ परस्त्रीगामी भी होता है । ऐसा व्यक्ति समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा से रहता है तथा आपने ही स्तर की महिलाध्पुरुष से संपर्क रखते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देता है । समाज भी सब कुछ जानते हुए उसे आदर सम्मान देता रहता है ।
2 सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है ।
3 शुक्र के ऊपर मंगल ध्राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है ।
4 शुक्र तीसरे भाव में स्थित हो और मंगल से दूषित हो ए छठे भाव में मंगल की राशि हो और चन्द्रमा बारहवें स्थान पर हो तो व्यभिचारी प्रवृतियां अधिक होती है ।
5 शुक्र के ऊपर शनि की दृष्टिध्युति ध्प्रभाव जातक में अत्याधिक मैस्टरबेशन की प्रवृति उत्पन्न करते हैं ।
गुरु
1 गुरु लग्नध्चतुर्थ ध्सप्तमध्दशम स्थान पर हो या पुरुष राशि में छठे भाव में हो या द्वादश भाव में हो ए जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए सभी सीमाओं को तोड़ डालता है ।
2ण् छठे भाव में गुरु यदि पुरुष राशि में बैठा हो तो जातक काम प्रिय होता है ।
शनि
1यदि शनि स्वक्षेत्री एमूलत्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि का होकर लग्न से केंद्रवर्ती हो तो शशः योग बनता है । ऐसा व्यक्ति राजा एसचिवए जंगल पहाड़ पर घूमने वाला एपराये धन का अपहरण करने वाला एदूसरों की कमजोरियों को जानने वाला एदूसरों की पत्नी से सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा करने वाला होता है ।कभी कभी अपने इस दुराचार के लिए उसकी प्रतिष्ठा कलंकित हो सकती है ए वह दूसरों की नज़रों में गिर सकता है और समाज में अपमानित भी हो सकता है ।
2शनि लग्न में हो तो जातक में वासना अधिक होती हैएपंचम भाव में शनि अपनी से बड़ी उम्र की स्त्री से आकर्षण ए सप्तम में होने से व्यभिचारी प्रवृतिएचन्द्रमा के साथ होने पर वेश्यागामीए मंगल के साथ होने पर स्त्री में और शुक्र के साथ होने पर पुरुष में कामुकता अधिक होती है ।
3दशम स्थान का शनि विरोधाभास उत्पन्न करता है ए जातक कभी कभी ज्ञान वैराग्य की बात करता है तो कभी कभी कामशास्त्र का गंभीरता से विश्लेषण करता है ए काम और सन्यास के बीच जातक झूलता रहता है ।
4दूषित शनि यदि चतुर्थ भाव में उपस्थित हो तो जातक की वासना उसे इन्सेस्ट की और अग्रसर करती है ।
5शनि की चन्द्रमाध्शुक्रध्मंगल के साथ युति जातक में काम वासना को काफी बड़ा देती है ।
चन्द्रमा रू
1चन्द्रमा बारहवें भाव में मीन राशि में हो तो जातक अनेकों का उपभोग करता है ।
2नवम भाव में दूषित चन्द्रमा की उपस्थिति गुरुध् शिक्षक ध्मार्गदर्शक के साथ व्यभिचार करने के उकसाते हैं ।
3सप्तम भाव में क्षीण चन्द्रमा किसी पाप ग्रह के साथ बैठा हो तो जातक विवाहित स्त्री से आकर्षित होता है ।
4नीच का चन्द्रमा सप्तम स्थान पर हो तो जातक आपने नौकर ध्नौकरानी से शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं ।
मंगल रू
1मंगल की उपस्थिति 8 ध्9 ध्12 भाव में हो तो जातक कामुक होता है ।
2मंगल सप्तम भाव में हो और उसपर कोई शुभ प्रभाव न हो तो जातक नबालिकों के साथ सम्बन्ध बनाता है ।
3मंगल की राशि में शुक्र या शुक्र की राशि में मंगल की उपस्थित हो तो जातक में कामुकता अधिक होती है ।
4जातक कामांध होकर पशु सामान व्यवहार करता है यदि मंगल और एक पाप ग्रह सप्तम में स्थित हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ भाव हो या मंगल चतुर्थ भाव में और राहु सप्तम भाव में हो या शुक्र मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम को देखता हो ।
जिस युवती की कुंडली में बना यह योगए उसे बनना ही पड़ा वेश्या
हमारे समाज में सबसे घृणित कार्यों में से एक माना जाता है वेश्यावृत्ति। अक्सर इसके पीछे कई मजबूरियां होती हैं जब कोई लड़की हवस के सौदागारों को अपना जिस्म बेचने के लिए तैयार होती है। अगर प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन किया जाए तो मालूम होता है कि इसका इतिहास बहुत पुराना है। आचार्य चाणक्य ने भी अपने ग्रंथ में इसका उल्लेख किया है। दुनिया का शायद ही कोई देश हो जहां वेश्यावृत्ति न हो। कुछ देशों में इसे कानूनी मान्यता है और वहां वेश्याओं के संबंध में लोगों का नजरिया थोड़ा अलग है। वहीं ज्यादातर देशों में इसे बेहद घृणित माना जाता है और इस पर पाबंदी है।चूंकि वेश्यावृत्ति का इतिहास बहुत पुराना रहा हैए इसलिए ज्योतिष शास्त्र में भी इसका उल्लेख आता है। इसके मुताबिकए कुंडली में ग्रहों का खास योग किसी महिला को वेश्यावृत्ति की ओर धकेल सकता है। यही नहींए ऐसे ज्यादातर मामलों में महिला को उसके प्रेमी द्वारा बहला.फुसलाकर देह व्यापार के गंदे धंधे में धकेल दिया जाता है। इसलिए जिसकी कुंडली में ऐसा योग होए उसे प्रेम प्रसंग और धोखेबाज प्रेमी से बचना चाहिए।
इस संबंध में महिला की कुंडली के सातवेंए आठवें और दसवें भाव का अध्ययन जरूर करना चाहिए।
ज्योतिष की मान्यता है कि यदि इन भावों में बुध अथवा शुक्र विराजमान हों तो इस बात की काफी संभावना होती है कि वह महिला वेश्यावृत्ति में चली जाए। खासतौर पर यदि शुक्र और मंगल कुंडली के सातवें अथवा दसवें भाव में विराजमान हों। यह योग अगर अन्य क्रूर ग्रहों की युति एवं दृष्टि से बने तो महिला का जीवन तबाह हो जाता है। उसे अपने जीवन का काफी समय वेश्यावृत्ति में बिताना पड़ता है।
उच्च का चंद्रमा प्रेम प्रसंग में सफलता प्रदान करता है लेकिन यही जब नीच राशि में स्थित होता है तो जीवन में कष्ट लेकर आता है।
अगर महिला की कुंडली में नीच का चंद्रमा हो और अन्य ग्रह शुभ न हों तो वह भविष्य में देह व्यापार का मार्ग चुन लेती है। इस प्रकार शुक्रए मंगल और चंद्रमा का दोषपूर्ण संबंध महिला के जीवन की राह निर्धारित करता है।
शनि और राहु का संबंध ज्योतिष शास्त्र में अच्छा नहीं माना जाता। यह महिलाओं के लिए बहुत कष्टपूर्ण होता है। इन दोनों ग्रहों का संबंध वेश्यावृत्ति का योग बनाता है।
इसी प्रकार अष्टम में शुक्र या शनिए शुक्र व मंगल की युति किसी महिला के जीवन का कड़ा इम्तिहान लेती है और उसे देह व्यापार में धकेल देती है। शुक्र और राहु का योग भी वेश्यावृत्ति के लिए जिम्मेदार होता है।
लग्न / लग्नेश :
1. यदि लग्न और बारहवें भाव के स्वामी एक हो कर केंद्र /त्रिकोण में बैठ जाएँ या एक दूसरे से केंद्रवर्ती हो या आपस में स्थान परिवर्तन कर रहे हों तो पर्वत योग का निर्माण होता है । इस योग के चलते जहां व्यक्ति भाग्यशाली , विद्या -प्रिय ,कर्म शील , दानी , यशस्वी , घर जमीन का अधिपति होता है वहीं अत्यंत कामी और कभी कभी पर स्त्री गमन करने वाला भी होता है ।
2. यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो ,तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है ।
3. यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो और सप्तमेश लग्न में हो , तो जातक स्त्री और पुरुष दोनों में रूचि रखता है , उसे समय पर जैसा साथी मिल जाए वह अपनी भूख मिटा लेता है । यदि केवल सप्तमेश लग्न में स्थित हो तो जातक में काम वासना अधिक होती है तथा उसमें रतिक्रिया करते समय पशु प्रवृति उत्पन्न हो जाती है और वह निषिद्ध स्थानों को अपनी जिह्वा से चाटने लगता है ।
4. यदि लग्नेश ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो जातक अप्राकृतिक सेक्स और मैस्टरबेशन आदि प्रवृतियों से ग्रसित रहता है और ये क्रियाएँ उसे आनंद और तृप्ति प्रदान करती हैं ।
5. लग्न में शुक्र की युति 2 /7 /6 के स्वामी के साथ हो तो जातक का चरित्र संदिग्ध ही रहता है ।
6. मीन लग्न में सूर्य और शुक्र की युति लग्न/चतुर्थ भाव में हो या सूर्य शुक्र की युति सप्तम भाव में हो और अष्टम में पुरुष राशि हो तो स्त्री , स्त्री राशि होने पर पुरुष अपनी तरक्की या अपना कठिन कार्य हल करने के लिए अपने साथी के अतिरिक्त अन्य से सम्बन्ध स्थापित करते हैं ।

सप्तम भाव और तुला राशि :
1. सातवें भाव में मंगल , बुद्ध और शुक्र की युति हो इस युति पर कोई शुभ प्रभाव न हो और गुरु केंद्र में उपस्थित न हो तो जातक अपनी काम की पूर्ति अप्राकृतिक तरीकों से करता है ।
2. मंगल और शनि सप्तम स्थान पर स्थित हो तो जातक समलिंगी {होमसेक्सुअल } होता है , अकुलीन वर्ग की महिलाओं के संपर्क में रहता है । अष्टम /नवम /द्वादश भाव का मंगल भी अधिक काम वासना उत्पन्न करता है , ऐसा जातक गुरु पत्नी को भी नही छोड़ पाता है ।
3. तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ।
4. तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी पारिवारिक कलेश का कारण बनती है ।
5. दूषित शुक्र और बुद्ध की युति सप्तम भाव में हो तो जातक काम वासना की पूर्ति के लिए गुप्त तरीके खोजता है ।
शुक्र :
1. यदि शुक्र स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपने उच्च राशि का हो कर लग्न से केंद्र में हो तो मालव्य योग बनता है । इस योग में व्यक्ति सुन्दर,गुणी , संपत्ति युक्त ,उत्साह शक्ति से पूर्ण , सलाह देने या मंत्रणा करने में निपुण होने के साथ साथ परस्त्रीगामी भी होता है । ऐसा व्यक्ति समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा से रहता है तथा आपने ही स्तर की महिला/पुरुष से संपर्क रखते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देता है । समाज भी सब कुछ जानते हुए उसे आदर सम्मान देता रहता है ।
2. सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है ।
3. शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है ।
4. शुक्र तीसरे भाव में स्थित हो और मंगल से दूषित हो , छठे भाव में मंगल की राशि हो और चन्द्रमा बारहवें स्थान पर हो तो व्यभिचारी प्रवृतियां अधिक होती है ।
5. शुक्र के ऊपर शनि की दृष्टि/युति /प्रभाव जातक में अत्याधिक मैस्टरबेशन की प्रवृति उत्पन्न करते हैं ।
गुरु :
1. गुरु लग्न/चतुर्थ /सप्तम/दशम स्थान पर हो या पुरुष राशि में छठे भाव में हो या द्वादश भाव में हो , जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए सभी सीमाओं को तोड़ डालता है ।
2. छठे भाव में गुरु यदि पुरुष राशि में बैठा हो तो जातक काम प्रिय होता है ।
शनि
1. यदि शनि स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि का होकर लग्न से केंद्रवर्ती हो तो शशः योग बनता है । ऐसा व्यक्ति राजा ,सचिव, जंगल पहाड़ पर घूमने वाला ,पराये धन का अपहरण करने वाला ,दूसरों की कमजोरियों को जानने वाला ,दूसरों की पत्नी से सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा करने वाला होता है ।कभी कभी अपने इस दुराचार के लिए उसकी प्रतिष्ठा कलंकित हो सकती है , वह दूसरों की नज़रों में गिर सकता है और समाज में अपमानित भी हो सकता है ।
2. शनि लग्न में हो तो जातक में वासना अधिक होती है,पंचम भाव में शनि अपनी से बड़ी उम्र की स्त्री से आकर्षण , सप्तम में होने से व्यभिचारी प्रवृति,चन्द्रमा के साथ होने पर वेश्यागामी, मंगल के साथ होने पर स्त्री में और शुक्र के साथ होने पर पुरुष में कामुकता अधिक होती है ।
3. दशम स्थान का शनि विरोधाभास उत्पन्न करता है , जातक कभी कभी ज्ञान वैराग्य की बात करता है तो कभी कभी कामशास्त्र का गंभीरता से विश्लेषण करता है , काम और सन्यास के बीच जातक झूलता रहता है ।
4. दूषित शनि यदि चतुर्थ भाव में उपस्थित हो तो जातक की वासना उसे इन्सेस्ट की और अग्रसर करती है ।
5. शनि की चन्द्रमा/शुक्र/मंगल के साथ युति जातक में काम वासना को काफी बड़ा देती है ।
चन्द्रमा :
1. चन्द्रमा बारहवें भाव में मीन राशि में हो तो जातक अनेकों का उपभोग करता है ।
2. नवम भाव में दूषित चन्द्रमा की उपस्थिति गुरु/ शिक्षक /मार्गदर्शक के साथ व्यभिचार करने के उकसाते हैं ।
3. सप्तम भाव में क्षीण चन्द्रमा किसी पाप ग्रह के साथ बैठा हो तो जातक विवाहित स्त्री से आकर्षित होता है ।
4. नीच का चन्द्रमा सप्तम स्थान पर हो तो जातक आपने नौकर /नौकरानी से शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं ।
मंगल :
1. मंगल की उपस्थिति 8 /9 /12 भाव में हो तो जातक कामुक होता है ।
2. मंगल सप्तम भाव में हो और उसपर कोई शुभ प्रभाव न हो तो जातक नबालिकों के साथ सम्बन्ध बनाता है ।
3. मंगल की राशि में शुक्र या शुक्र की राशि में मंगल की उपस्थित हो तो जातक में कामुकता अधिक होती है ।
4. जातक कामांध होकर पशु सामान व्यवहार करता है यदि मंगल और एक पाप ग्रह सप्तम में स्थित हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ भाव हो या मंगल चतुर्थ भाव में और राहु सप्तम भाव में हो या शुक्र मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम को देखता हो ।
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सेक्स, दाम्पत्य व ज्योतिषीय सिद्धांत सेक्स व दाम्पत्य (वैवाहिक जीवन) आदि से सम्बन्धित कुछ प्रमुख सूत्रों को इस अध्याय में संक्षेप में चर्चा के अन्तर्गत लेंगे। समाज क्योंकि पुरुष प्रधान है और उपरोक्त मामलों में स्त्री की भूमिका विशेष होती है तथा स्त्री के स्वभाव की गुत्थियों तथा चरित्र को समझना सरल नहीं होता। इसके अलावा जनसामान्य (विशेषकर पुरुष तथा बहुत-सी स्त्रियां भी) अन्य स्त्रियों के विषय में जानने को उत्सुक रहते हैं। अध्ययन का आधार-इस संदर्भ में संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि सप्तम भाव (विवाह/गृहस्थी), द्वादश भाव (शयन सुख), तृतीय भाव (गुप्त कामेच्छा), लग्न (मस्तिष्क), चतुर्थ भाव (मन), इन सब भावों के स्वामी, कारक एवं शुक्र, गुरु, मंगल तथा चंद्र की स्थिति विशेष रूप से देखी जानी चाहिए। साथ ही शनि एवं बुध की भी-जो नपुंसकत्व/ठंडेपन के प्रतिनिधि हैं। बेशक इस मामले में जन्म नक्षत्र तथा जन्म राशि का विचार भी किया जाना चाहिए। तभी निश्चयात्मक रूप से कुछ कहा जा सकता है। (रोग आदि के सम्बन्ध में शुक्र, बुध, मंगल, शनि, गुरु आदि से छठे तथा आठवें भाव का सम्बन्ध भी देखा जाना चाहिए।) परन्तु यहां हम सीधे फलित सूत्र ही कहेंगे, ताकि पाठकों को सुविधा रहे। आधारभूत/स्मरणीय तथ्य-शुक्र क्योंकि पत्नी के साथ-साथ काम (ैम्ग्) का कारक भी है। अतः पुरुष की कुंडली में विशेष विचारणीय होता है। मंगल उत्तेजना का कारक होने से ैम्ग् के मामले में शुक्र के समान ही महत्त्वपूर्ण होता है। गुरु महिलाओं में पति का कारक होने से विशेषरूप से विचारणीय होता है (शुक्र व मंगल तो होते ही हैं)। पर स्त्रियों में चरित्र के विषय में जानने के लिए चन्द्रमा (मन) की स्थिति देखनी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है। ऽ महिला जातकों में पतिसुख को देखने के लिए सप्तमेश की स्थिति तथा राशि भी विशेष रूप से विचारी जाती है। क्योंकि सप्तमेश का चर राशियों में होना गृहस्थी के सुख के लिए शुभ नहीं माना जा सकता। ऽ महिलाएं या पुरुष (पुरुष विशेष रूप से) शुक्र, मंगल, गुरु आदि के साथ अथवा सातवें तथा बारहवें भाव के साथ शनि तथा बुध का सम्बन्ध भी विचारना अत्यंत आवश्यक होता है। क्योंकि ये दोनों ठंडेपन/नपुंसकत्व के प्रतिनिधि ग्रह हैं एवं कामसुख में बाधक हैं। ऽ नक्षत्र, सप्तमेश तथा द्वादशेश सहित लग्नेश का तो विशेष विचार दोनों कुंडलियों में होना ही चाहिए। किन्तु सातवें से बारहवां होने के कारण छठा तथा बारहवें से बारहवां होने के वारण ग्यारहवां भाव भी कम महत्त्व का नहीं होता। सुख व मन का कारक चैथा भाव तथा गुप्त कामेच्छाओं का कारक तीसरा भाव भी सूक्ष्म अध्ययन के लिए अवश्य ही विचारा जाना चाहिए। ऽ सूर्य, शनि, राहू, केतु-इन चारों ग्रहों से सप्तमेश, द्वादशेश या सप्तम व द्वादश भाव तथा (महिला कुंडलियों में चन्द्रमा भी) लग्न व लग्नेश म्थ्थ्म्ब्ज्म्क् (प्रभावित) न हों यह भी देखा जाना चाहिए। क्योंकि इनका प्रभाव गृहस्थ सुख में बाधक/अधोगति वाला होता है। ऽ अतिसूक्ष्म अवलोकन कर चरित्र विचार करने के लिए ’त्रिशांश’ का विचार करना चाहिए। यह ललित अध्यन का विषय है। मनुष्य में काम वासना एक जन्मजात प्रवृति और वह इससे आजीवन प्रभावित -संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है किसी में ज्यादा हो सकता है । ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की व्यक्ति में काम भावना किस रूप में विद्यमान है और वह उसका प्रयोग किन क्षत्रों में कितने अंशों में कर रहा है । कामना से कामुकता ज्योतिष दृस्टि ज्योतिष शास्त्र में शुक्र को सुंदरता आकर्षण ओर दैहिकसुख से जोड़कर देखा जाता रहा है। साथ ही समझे तो हमारे भीतर दबी हुई या बाहर अभिव्यक्त उजागर लालसा कामना समस्त इच्छा, लालुप्त का तार्किक अर्थ शुक्र प्रभावित जातक है। मनुष्य में काम वासना एक जन्मजात प्राकृतिक प्रवृति और वह इससे आजीवन प्रभावित -संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है किसी में ज्यादा हो सकता है । ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की व्यक्ति में काम भावना किस रूप में विद्यमान है और वह उसका प्रयोग किन क्षत्रों में कितने अंशों में कर रहा है । लग्न / लग्नेश : 1. यदि लग्न और बारहवें भाव के स्वामी एक हो कर केंद्र /त्रिकोण में बैठ जाएँ या एक दूसरे से केंद्रवर्ती हो या आपस में स्थान परिवर्तन कर रहे हों तो पर्वत योग का निर्माण होता है । इस योग के चलते जहां व्यक्ति भाग्यशाली , विद्या -प्रिय ,कर्म शील , दानी , यशस्वी , घर जमीन का अधिपति होता है वहीं अत्यंत कामी और कभी कभी पर स्त्री गमन करने वाला भी होता है । 2. यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो ,तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है । 3. यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो और सप्तमेश लग्न में हो , तो जातक स्त्री और पुरुष दोनों में रूचि रखता है , उसे समय पर जैसा साथी मिल जाए वह अपनी भूख मिटा लेता है । यदि केवल सप्तमेश लग्न में स्थित हो तो जातक में काम वासना अधिक होती है तथा उसमें रतिक्रिया करते समय पशु प्रवृति उत्पन्न हो जाती है और वह निषिद्ध स्थानों को अपनी जिह्वा से चाटने लगता है । 4. यदि लग्नेश ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो जातक अप्राकृतिक सेक्स और मैस्टरबेशन आदि प्रवृतियों से ग्रसित रहता है और ये क्रियाएँ उसे आनंद और तृप्ति प्रदान करती हैं । 5. लग्न में शुक्र की युति 2 /7 /6 के स्वामी के साथ हो तो जातक का चरित्र संदिग्ध ही रहता है । 6. मीन लग्न में सूर्य और शुक्र की युति लग्न/चतुर्थ भाव में हो या सूर्य शुक्र की युति सप्तम भाव में हो और अष्टम में पुरुष राशि हो तो स्त्री , स्त्री राशि होने पर पुरुष अपनी तरक्की या अपना कठिन कार्य हल करने के लिए अपने साथी के अतिरिक्त अन्य से सम्बन्ध स्थापित करते हैं । सप्तम भाव और तुला राशि : 1. सातवें भाव में मंगल , बुद्ध और शुक्र की युति हो इस युति पर कोई शुभ प्रभाव न हो और गुरु केंद्र में उपस्थित न हो तो जातक अपनी काम की पूर्ति अप्राकृतिक तरीकों से करता है । 2. मंगल और शनि सप्तम स्थान पर स्थित हो तो जातक समलिंगी {होमसेक्सुअल } होता है , अकुलीन वर्ग की महिलाओं के संपर्क में रहता है । अष्टम /नवम /द्वादश भाव का मंगल भी अधिक काम वासना उत्पन्न करता है , ऐसा जातक गुरु पत्नी को भी नही छोड़ पाता है । 3. तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है । 4. तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी पारिवारिक कलेश का कारण बनती है । 5. दूषित शुक्र और बुद्ध की युति सप्तम भाव में हो तो जातक काम वासना की पूर्ति के लिए गुप्त तरीके खोजता है । शुक्र : 1. यदि शुक्र स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपने उच्च राशि का हो कर लग्न से केंद्र में हो तो मालव्य योग बनता है । इस योग में व्यक्ति सुन्दर,गुणी , संपत्ति युक्त ,उत्साह शक्ति से पूर्ण , सलाह देने या मंत्रणा करने में निपुण होने के साथ साथ परस्त्रीगामी भी होता है । ऐसा व्यक्ति समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा से रहता है तथा आपने ही स्तर की महिला/पुरुष से संपर्क रखते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देता है । समाज भी सब कुछ जानते हुए उसे आदर सम्मान देता रहता है । 2. सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है । 3. शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है । 4. शुक्र तीसरे भाव में स्थित हो और मंगल से दूषित हो , छठे भाव में मंगल की राशि हो और चन्द्रमा बारहवें स्थान पर हो तो व्यभिचारी प्रवृतियां अधिक होती है । 5. शुक्र के ऊपर शनि की दृष्टि/युति /प्रभाव जातक में अत्याधिक मैस्टरबेशन की प्रवृति उत्पन्न करते हैं । गुरु : 1. गुरु लग्न/चतुर्थ /सप्तम/दशम स्थान पर हो या पुरुष राशि में छठे भाव में हो या द्वादश भाव में हो , जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए सभी सीमाओं को तोड़ डालता है । 2. छठे भाव में गुरु यदि पुरुष राशि में बैठा हो तो जातक काम प्रिय होता है । शनि 1. यदि शनि स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि का होकर लग्न से केंद्रवर्ती हो तो शशः योग बनता है । ऐसा व्यक्ति राजा ,सचिव, जंगल पहाड़ पर घूमने वाला ,पराये धन का अपहरण करने वाला ,दूसरों की कमजोरियों को जानने वाला ,दूसरों की पत्नी से सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा करने वाला होता है ।कभी कभी अपने इस दुराचार के लिए उसकी प्रतिष्ठा कलंकित हो सकती है , वह दूसरों की नज़रों में गिर सकता है और समाज में अपमानित भी हो सकता है । 2. शनि लग्न में हो तो जातक में वासना अधिक होती है,पंचम भाव में शनि अपनी से बड़ी उम्र की स्त्री से आकर्षण , सप्तम में होने से व्यभिचारी प्रवृति,चन्द्रमा के साथ होने पर वेश्यागामी, मंगल के साथ होने पर स्त्री में और शुक्र के साथ होने पर पुरुष में कामुकता अधिक होती है । 3. दशम स्थान का शनि विरोधाभास उत्पन्न करता है , जातक कभी कभी ज्ञान वैराग्य की बात करता है तो कभी कभी कामशास्त्र का गंभीरता से विश्लेषण करता है , काम और सन्यास के बीच जातक झूलता रहता है । 4. दूषित शनि यदि चतुर्थ भाव में उपस्थित हो तो जातक की वासना उसे इन्सेस्ट की और अग्रसर करती है । 5. शनि की चन्द्रमा/शुक्र/मंगल के साथ युति जातक में काम वासना को काफी बड़ा देती है । चन्द्रमा : 1. चन्द्रमा बारहवें भाव में मीन राशि में हो तो जातक अनेकों का उपभोग करता है । 2. नवम भाव में दूषित चन्द्रमा की उपस्थिति गुरु/ शिक्षक /मार्गदर्शक के साथ व्यभिचार करने के उकसाते हैं । 3. सप्तम भाव में क्षीण चन्द्रमा किसी पाप ग्रह के साथ बैठा हो तो जातक विवाहित स्त्री से आकर्षित होता है । 4. नीच का चन्द्रमा सप्तम स्थान पर हो तो जातक आपने नौकर /नौकरानी से शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं । मंगल : 1. मंगल की उपस्थिति 8 /9 /12 भाव में हो तो जातक कामुक होता है । 2. मंगल सप्तम भाव में हो और उसपर कोई शुभ प्रभाव न हो तो जातक नबालिकों के साथ सम्बन्ध बनाता है । 3. मंगल की राशि में शुक्र या शुक्र की राशि में मंगल की उपस्थित हो तो जातक में कामुकता अधिक होती है । 4. जातक कामांध होकर पशु सामान व्यवहार करता है यदि मंगल और एक पाप ग्रह सप्तम में स्थित हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ भाव हो या मंगल चतुर्थ भाव में और राहु सप्तम भाव में हो या शुक्र मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम को देखता हो । जिस युवती की कुंडली में बना यह योग, उसे बनना ही पड़ा वेश्या हमारे समाज में सबसे घृणित कार्यों में से एक माना जाता है वेश्यावृत्ति। अक्सर इसके पीछे कई मजबूरियां होती हैं जब कोई लड़की हवस के सौदागारों को अपना जिस्म बेचने के लिए तैयार होती है। अगर प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन किया जाए तो मालूम होता है कि इसका इतिहास बहुत पुराना है। आचार्य चाणक्य ने भी अपने ग्रंथ में इसका उल्लेख किया है। दुनिया का शायद ही कोई देश हो जहां वेश्यावृत्ति न हो। कुछ देशों में इसे कानूनी मान्यता है और वहां वेश्याओं के संबंध में लोगों का नजरिया थोड़ा अलग है। वहीं ज्यादातर देशों में इसे बेहद घृणित माना जाता है और इस पर पाबंदी है।चूंकि वेश्यावृत्ति का इतिहास बहुत पुराना रहा है, इसलिए ज्योतिष शास्त्र में भी इसका उल्लेख आता है। इसके मुताबिक, कुंडली में ग्रहों का खास योग किसी महिला को वेश्यावृत्ति की ओर धकेल सकता है। यही नहीं, ऐसे ज्यादातर मामलों में महिला को उसके प्रेमी द्वारा बहला-फुसलाकर देह व्यापार के गंदे धंधे में धकेल दिया जाता है। इसलिए जिसकी कुंडली में ऐसा योग हो, उसे प्रेम प्रसंग और धोखेबाज प्रेमी से बचना चाहिए। इस संबंध में महिला की कुंडली के सातवें, आठवें और दसवें भाव का अध्ययन जरूर करना चाहिए। ज्योतिष की मान्यता है कि यदि इन भावों में बुध अथवा शुक्र विराजमान हों तो इस बात की काफी संभावना होती है कि वह महिला वेश्यावृत्ति में चली जाए। खासतौर पर यदि शुक्र और मंगल कुंडली के सातवें अथवा दसवें भाव में विराजमान हों। यह योग अगर अन्य क्रूर ग्रहों की युति एवं दृष्टि से बने तो महिला का जीवन तबाह हो जाता है। उसे अपने जीवन का काफी समय वेश्यावृत्ति में बिताना पड़ता है। उच्च का चंद्रमा प्रेम प्रसंग में सफलता प्रदान करता है लेकिन यही जब नीच राशि में स्थित होता है तो जीवन में कष्ट लेकर आता है। अगर महिला की कुंडली में नीच का चंद्रमा हो और अन्य ग्रह शुभ न हों तो वह भविष्य में देह व्यापार का मार्ग चुन लेती है। इस प्रकार शुक्र, मंगल और चंद्रमा का दोषपूर्ण संबंध महिला के जीवन की राह निर्धारित करता है। शनि और राहु का संबंध ज्योतिष शास्त्र में अच्छा नहीं माना जाता। यह महिलाओं के लिए बहुत कष्टपूर्ण होता है। इन दोनों ग्रहों का संबंध वेश्यावृत्ति का योग बनाता है। इसी प्रकार अष्टम में शुक्र या शनि, शुक्र व मंगल की युति किसी महिला के जीवन का कड़ा इम्तिहान लेती है और उसे देह व्यापार में धकेल देती है। शुक्र और राहु का योग भी वेश्यावृत्ति के लिए जिम्मेदार होता है। राशि और सैक्स – मीन राशि सौर मण्डल में इस राशि का आकार विपरीत दिशा में दो मछलियों के समान है, इनमें एक नर दूसरी मादा लगती है। चारों ओर जल प्रतीत होता है। अंग्रेजी की संख्या 69 के समान आकृति बनती है। इस राशि का मास चैत्र (मार्च-अप्रेल), स्वभाव द्विस्वभाव, तत्त्व जल, उभयोदय उदय, लिंग स्त्री, दिशा उत्तर-पूर्व, रंग गहरा भूरा, निवास जल, शरीर अंग पैरों का तलुवा, स्वामी ग्रह बृहस्पति और केतु है। बृहस्पति सत्त्वगुणी, पुरूष है, केतु तमोगुणी, नपुंसक है। केतु का भूरा रंग, बृहस्पति का सुनहला (दोनों मिलकर राषि रंग सलेटी या भूरा), रत्न वैदूर्यमणि है। इन्द्रिय ज्ञान राहु के समान स्पर्श है। आकार रेखा के समान है। जाति ब्राह्मण, अंक 7 है।इस राशि में उत्पन्न जातकों की आंखें मछलियों के समान गोल, सुन्दर, काली और चमकीली होती हैं। स्त्रियां बहुत सुन्दर होती है। इस राशि की गौर वर्ण स्त्रियों के पसीने से मछली जैसी गंध आती है। सुन्दर रूप, कुछ लम्बा चेहरा, शरीर मछली के समान चिकना-चमकीला होता है। यह कितनी ही गहरी नींद में हो, जरा से स्पर्श से आंखें खुल जाती है। इनके स्तन छोटे और मछली की मुखाकृति के समान होते हैं। ऐसा लगता है, मानो दो रोहू मछलियों के सिर काटकर लगा दिये गये हों। इनकी इन्द्रिय रेखा के समान पतली और छोटी-सी होती है। नितम्ब चलते समय इस प्रकार हिलते हैं, मानो घड़े से पानी छलक रहा हो।पुरूष सामान्य कद-काठी पर सुन्दर आंखों और छोटे होंठो के स्वामी होते हैं। इन्द्रिय प्रायः बहुत लघु होती है। इसके तलुवों में कड़ापन ज्यादा होता है। स्त्री-पुरूष विचित्र प्रकार का मैथुन 69 की दशा में करते हैं। एक दूसरे के पैरों की ओर इनका सिर होता है। अपनी राशि के आकार के अनुसार इनको बड़ा सुख मिलता है। द्विस्वभाव, उभयोदय और ब्राह्मण राशि के कारण इसका मैथुन घृणित, चंचल तथा कामकला की दृष्टि से श्रेष्ठ (ब्राह्मण) होता हैं। कामुकता बराबर बनी रहती है। इस राशि का मैथुन सबसे निकृष्ट होता है। यह राशि स्त्री को तृप्त करने की क्षमता रखती है। प्रेमिका या प्रेमी से यह बहुत कम अलग होते हैं। इनका स्वभाव बड़ा चंचल होता है। इस राशि के अधिकांष पुरूष प्रायः नपुंसक, अर्धनपुंसक, शीघ्रपतन, स्वप्नदोष के शिकार होते हैं। यह पूर्ण पूरूष नहीं होते हैं। इस राशि की महिला का मैथुन भी बड़ा चंचल होता है। मछली की तरह उसका बदन सम्भोग के समय लहराता है और अपने पति से भी गिरा हुआ मैथुन पसन्द करती है। इस राशि की महिला को गुप्तागों के दर्शन, स्पर्श से विशेष सुख मिलता है। उनसे खिलवाड़ और प्यार, लगाव इसको विशेष रूचिकर लगता है। इस क्रिया में कम खिलवाड़ में ज्यादा सुख मिलता है। वह कामुक होती है, किन्तु मैथुन से ज्यादा रूचि अन्य कामुक व्यवहारों में करती है। इस राशि की महिलाओं में वासना होती है, किन्तु अपने पर बड़ा नियन्त्रण करती है।इस राशि के जातकों की कामुकता का उत्तेजना स्थल उनके तलवों में होता है। स्त्री या पुरूष के तलवे थोड़ा सा सहलाते ही इनकी उत्तेजना बढ़ जाती है या कामुकता की गति के कारण शीघ्र स्खलित हो जाते हैं। निवास जल होने के कारण इनका मैथुन ठण्डा होता है, उत्तेजक नहीं और शीतल स्थान में यह विशेष कामुकता का परिचय देते हैं। गहरा भूरा रंग इनको विशेष प्रिय है।इस राशि के जातकों का विवाह शीघ्र हो जाता है, किन्तु इनका दाम्पत्य जीवन चंचल-सा, अस्थिर, द्विस्वभाव के कारण बड़ा ही क्लेश भरा होता है। प्रायः गर्भाधान चैत्र मास (मार्च-अप्रेल) में होता है तथा इस माह में इनकी काम वासना ज्यादा होती है। उत्तर-पूर्व दिशा में रूख करके यह मैथुन करने में अपने को बराबर सुखद दशा में रखते हैं। इनका प्रेम मैथुन के समय अत्यन्त प्रगाढ़ हो जाता है, किनतु उतना प्रेम यह अपने सामान्य जीवन में एक-दूसरे के प्रति नहां रखते हैं। इनका दाम्पत्य जीवन द्विस्वभाव राशि होने के कारण प्रायः कलह, वाद-विवाद से भरा रहता हैं। दिन भर या रात भर की कलह का समझौता मैथुन के समय समाप्त हो जाता है और सारा प्यार उनका एक-दूसरे के लिये उमड़ पड़ता है।मैथुन से पूर्व, मध्य या अन्त में यह एक-दूसरे से लिपट कर पड़े रहना ज्यादा पसन्द करते हैं, इसमें इनको ज्यादा सुख मिलता है। इस राशि का जातक अपनी पत्नी के साथ लिपटकर सोना ज्यादा पसन्द करता है। इसका यह स्वभाव बन जाता है। अकेले होने पर यह तकिया, रजाई, गद्दा आदि को ही लपेटकर खींच लेंगें।सन्तान सुख कम ही होता है। इनकी सन्तान प्रायः रूग्ण रहती है। प्रेम के मामले में ये हमेशा डरपोक होते हैं। प्रेम हो जाता है, लेकिन अवैध सम्बन्ध करने से बहुत डरते है। इनका अवैध सम्बन्ध सदैव अस्थायी होता है, केवल शरीर तक कायम रहता है। इनके प्रेमपत्र दार्शनिक किस्म के, संक्षिप्त तथा अनिश्चयात्मक बातो या वायदों से भरे होते हैं। शेरो-शायरी, सिनेमा के गाने जरूर लिखते हैं।इनका पारिवारिक जीवन सामान्यतः सुखद होता है, पर सम्भोग जीवन को काफी समय तक जीते हैं और सबसे ज्यादा सुख यही पाते हैं। सभी प्रकार का प्राकृतिक-अप्राकृतिक-विकृत सम्भोग यही जाना-भोगा होता है तथा मैथुन के समय एक-दूसरे में मछली के समान डुबकी मार जाना इनका स्वभाव होता है। कुल मिलाकर सामान्य दाम्पत्य जीवन अपनी चरम मैथुन सीमा पर यह व्यतीत करते हैं। राशि और सैक्स - कुम्भ राशि जिस महिला के स्तन घड़े के समान विशाल स्तूपाकार, शक भरी बहुत पनियल आंखें हो तथा पुरूष का सिर घड़े के समान, दर्शन, ज्योतिष या गुप्त विद्याओं की बात कर रहा हो, नजरें बड़ी तीखी हो वह जातक कुम्भ राशि का होगा।सौरमण्डल में आकार घड़े (कुम्भ) के समान, माह फाल्गुन (फरवरी-मार्च), अंक 4 है। स्वभाव स्थिर, तत्त्व आकाश, शीर्षोदय उदय, लिंग पुरूष, दिषा उत्तर, जाति वैश्य, रंग रंग-बिरंगा, रहने का स्थान कुम्हार की जगह, शरीर का अंग घुटना, गुण तमोगुणी, प्रकृत्ति पित्त, रत्न कौस्तुभ और गोमेद, ग्रह शनि, अधिपति देवता यम / दुर्गा तथा आकार रेखा के समान है।इस राशि की महिलाओं के स्तन अत्यन्त विशाल होते हैं, उनकी इन्द्रिय घड़े के मुंह के समान गोल और काफी फेली हुई लगती है और पुत्रवती न होने के बावजूद एक बच्चे की मां के समान लगती है। इस राशि का पुरूष सामान्य कद काठी का और हल्का सा आकर्षक होता है। इसका पुरूषांग रेखा के समान एकदम सीधा होता है, अण्डकोष आवश्यकता से बड़े होते हैं। इस राशि के जातकों का स्खलन इतना अधिक होता है कि जंघाएं भीग जाती है। विशेष रूप से स्त्री मैथुन के समय इतनी गीली हो जाती है कि पुरूष को बार-बार पोंछना पड़ता है। फाल्गुन माह का स्वामी होने के कारण हर समय काम पीड़ित रहते हैं।इस राशि का कामोत्तेजना केन्द्र पिंडलियां / घुटने है। इनको उठाते सहलाते ही इनका ठंडापन समाप्त हो जाता है और शीघ्र स्खलित हो जाते हैं। इसे दिन में मैथुन करना सुखमय लगता है तथा पृष्ठ भाग कम प्रिय है, किन्तु कुम्हार के चाक की भांति यह चकरी लगा-लगाकर इस क्रिया को करता है। कामुकता होती है, किन्तु छलकते घड़े के समान धीमी गति से यह देर तक क्रीड़ारत रहता है। परायी स्त्रियों से इसके सम्बन्ध होते हैं, किन्तु वास्तविक प्रेम अपनी पत्नी को ही करता है। इसका तत्त्व आकाश होने से मैथुन के सम्बन्ध में नाना प्रकार की कल्पनाएं करता रहता है। उत्तर दिशा की ओर मुख करके मैथुन करने में ज्यादा सुख पाता है। इसका मैथुन ध्वनिमय होता है। जाति वैश्य होने के कारण साफ सफाई पसन्द हैं। इस राशि की महिला को बनाव-श्रृगांर बड़ा प्यारा होता है तथा रंग-बिरंगे कपड़े पसन्द करती है। मन्थर मैथुन इसे प्रिय है। चरम उत्तेजना और स्खलन के समय सीत्कारें अवश्य बिखेरती है। अपने पति को प्रगाढ़ प्रेम करती है और उसे पूरा सुख देती है। इस राशि की महिला बहुत कम परपुरूषगामी होती है। विवाह पूर्व अपनी चंचलता के कारण उनको अपयश मिल सकता है, किन्तु शरीर सम्बन्ध में यह सरलता से हाथ नहीं लगाने देती है। कुम्भ होने के कारण हर बात में वजन रखती है। सोच-समझकर कदम उठाती है। अपने घरेलु काम-काज में रूचि रखती है। इस राशि के पुरूष का स्खलन अधिक मात्रा में होता है। पूर्ण रूप से यह मैथुन करता है। गौर-वर्ण की स्त्रियों में सबसे ज्यादा रूचि रखता है। हल्का नीला रंग देखकर इसकी कामोत्तेजना बढ़ती है। शनिवार के दिन यह विशेष रूप से कामपीड़ित रहता है। इस राशि का विशिष्ट माह फरवरी-मार्च (फाल्गुन) है। मैथुन से पूर्व यह जातक अपनी पत्नी के शरीर के साथ सबसे ज्यादा प्यार करता है। इसके चुम्बन सबसे लम्बे और आलिंगन सबसे प्रगाढ़ होंते हैं। मैथुन से पूर्व यह पत्नी को प्यार करके बहुत ज्यादा उत्तेजित कर देता है। इसको मैथुन के दौरान, पूर्व व अन्त में अश्लील वार्ता से सुख मिलता है। यह अपनी पत्नी से खुलकर फूहड़ शब्दों में तमाम बातें करता है। एकान्त स्थानों में मौका देखकर यह अश्लीलतम वाक्य लिखने में माहिर होता है अथवा गुप्त रोगों के चित्र बना देने में इसको बड़ा आनन्द आता है। इसके प्रेमपत्र सबसे अश्लील होते हैं। अपनी पत्नी के साथ सार्वजनिक प्रेम प्रदर्शन करता है। हाथ पकड़कर चलना, कन्धे पर हाथ रखना, कमर में सबके सामने हाथ डालना, निगाहें बचाकर यात्रा के दौरान उसके स्तन मर्दन कर देना साधारण बात है। अत्यन्त भोग-विलासी, कामुक, बनाव-श्रृगार में समय लगाने वाले और हमेशा सजे-संवरे रहना विशेष गुण होता है। स्वभाव से बेहद शक्की और तांक-झांक करने वाले होते हैं। मैथुन का कोई भी कुकर्म इनसे नहीं बचता। इस राशि का सम्भोग अत्यन्त घृणित और पतित होता है। वह सब सीमाएं पार कर जाता है। स्त्रियों का कामावेग अत्यन्त प्रचण्ड़ होता है। सबसे अधिक यौन रोग इस राशि के जातकों को होते हैं। सबसे अधिक समय तक 60/65 साल तक इस राशि के व्यक्ति सम्भोग करते हैं।इनका दाम्पत्य जीवन मैथुन पर आधारित है। सारा गुस्सा मैथुन की प्राप्ति के साथ हवा हो जाता है, इससे बड़े खुश रहते हैं। समाज के भय से यह विवाहिता को साथ रखते हैं, वरना कुम्हार के चक्के की तरह नयी-नयी मिट्टी गढ़ना कोई इनसे सीखे। अश्लीलता में इनको सबसे ज्यादा सुख मिलता है। दाम्पत्य जीवन प्रायः इसी कारण कटु, अर्थाभाव वाला होता है। पुरूष प्रायः दार्शनिक या ज्योतिषी जैसे होते हैं। इनका प्रेम धुमकेतु के समान पल में तोला, पल में माशा होता है। बड़ा दुःखद दाम्पत्य जीवन होता है। बीमारी, मासिक धर्म, पूरे गर्भ में भी पत्नी की नाना प्रकार की दुर्गति कर डालते हैं।सन्तान अत्यन्त कम और दुर्बल होती है। सन्तान के प्रति ममता कम होती है। इनके प्रेमपत्र निहायत दार्शनिक होते हैं और द्विअर्थी। इनका स्वभाव रसिक होता है। समाज में इसके बावजूद इनकी कुशाग्र बुद्धि और बड़बोलेपन के कारण सम्मान बना रहता है। राशि और सैक्स - मकर राशि सौरमण्डल में अपने मगरमच्छ आकार के कारण इस राशि का नामकरण ‘मकर’ है। स्वामी ग्रह शनि, अंक 8 है। हस्तरेखा के अनुसार तर्जनी के तल में स्थित है। इसका माह माघ (जनवरी-फरवरी), चर राशि, तत्त्व पृथ्वी, पृष्ठोदय उदय, दिशा उत्तर, लिंग स्त्री, जाति शूद्र, तमोगुणी, रंग नीला काला, प्रकृति रात, ऋतु शिशिर, रत्न नीलम, आकार छड़ लगी खिड़की के समान, निवास जल, शरीर में अंग पैर तथा इसका केवल प्रथम भाग चतुष्पद है।इस राशि के जातक छरहरे, लम्बे, साधारण सुन्दर होते हैं। इस राशि के पुरूष की इन्द्रिय बेलनाकार होती है और स्त्री अंग खिड़कीनुमा, उसमें कई दरारें दीखती हैं। भगोष्ठ फेलने पर एक दरार दीखेगी, किन्तु सामान्य दशा में कई छिद्र दीखते हैं। स्तन बड़े और लटके होते हैं, किन्तु नितम्ब अत्यन्त उच्च और वृद्धावस्था तक कसावट भरे होते हैं। इस राशि की कामोत्तेजना का स्थल पैरों में है। विशेष रूप से पिंडलियों में, उनको कंधे पर उठाकर रखते ही कम्पन के साथ ही कामोत्तेजना बढ़ जाती है और यह स्खलित हो जाता है। जाति से शूद्र और केवल प्रथम भाग चतुष्पद है, अतः इसे कंधे पर पैर रखे जाने वाला आसन ही सबसे प्रिय है। तत्त्व इसका पृथ्वी तथा निवास जल या वन होने से मैथुन शांत, किन्तु भरपूर होता है। विपरीत पक्ष को यह पूरा निगल जाता है। उत्तर की ओर मुख करके क्रिया में विशेष सुख पाता है। इसका मैथुन सारे शरीर में हलचल मचा देने वाला तथा पानी में मगरमच्छ के भागने की ‘छप-छप’ की ध्वनि से युक्त होता है। यह पृष्ठ भाग से सम्भोग करना पसन्द करता है। उनकी आंखों में चमक भी होती है। इस राशि के जातकों का व्यवहार बड़ा रहस्यमय होता है। प्रेम के मामले में प्रायः उदासीन रहते हैं। इनका प्यार पाने के लिये निरन्तर प्रयास करना पड़ता है। चर स्वभाव के कारण चंचलता होती है, और रात्रि में मैथुन करना विशेष प्रिय है। बिना खिड़की वाले कमरे या स्थान में मैथुन करतें समय इनको पूर्ण तृप्ति नहीं मिलती है। इस राशि का जातक अत्यन्त कामुक होता है। अपनी पत्नी के अलावा यह परायी स्त्री से अवश्य सम्बन्ध रखता है। इस राशि की स्त्री में कामोत्तेजना होती है, कामुक होती हैं किन्तु परपुरूष से सम्पर्क में कठिनता से आती है। इस राशि की स्त्री को सन्तुष्ट करने में पति को पसीना आ जाता है। जाति शूद्र होने से इसका मैथुन बड़ा अश्लील होता है। साफ-सफाई तो इसको पसन्द है, किन्तु इसमें भी घिनौनापन ज्यादा होता है। इस राशि का जातक मैथुन से पूर्व अपनी पत्नी को बेहद तंग करता है। कभी हाथ तो कभी मुख का प्रयोग करने पर विवश कर देता है। श्रृगांरप्रियता के कारण पत्नी का पूरा श्रृगांर करवाने के बाद ही यह क्रिया करता है। पत्नी को यह नित नये रूप में देखना पसन्द करता है। इस राशि के जातक का मन बड़ा रसिक होता है। प्रेमपत्र लिखने में सबसे ज्यादा आलस्य दिखलाते हैं। बड़ी मुश्किल से लिखते हैं। लिखाई की भाषा बड़ी रहस्यपूर्ण होती है, शेरो-शायरी का भरपूर प्रयोग होता है। अश्लीलता के चलते अपनी पत्नी को अश्लीलतम पत्र भी लिख देते हैं। पैरों में ज्यादा बल होने के कारण यह पैदल चलने से नहीं थकते। निवास जल में होने के कारण इनका मैथुन ठंडा होता है। तत्त्व पृथ्वी होने से यह व्यवहारिक होते हैं। स्वभाव इनका रहस्यमय होता है। इनका दाम्पत्य जीवन देख कर पता नहीं लगाया जा सकता की ये सुखी हैं या दुःखी।सन्तान इनके कम होती है। प्रेम सम्बन्ध कम होते हैं। रूढ़ियां और सामाजिक परम्परा तोड़ नहीं सकते। धर्मभीरू और अंधविश्वासी होते हैं। इस कारण प्रेम करने से डरते भी हैं और दिल से कमजोर होते हैं।इनके दाम्पत्य जीवन में आर्थिक समस्याएं अपने-आप सुलझ जाया करती हैं। जनवरी-फरवरी (माघ) गर्भाधान का समय होता है तथा शिशिर में यह थोड़ा कामातुर हो जाया करते हैं। रात का समय बेहद प्रिय है। 40 साल की उमर के पश्चात् सम्भोग में रूचि कम हो जाया करती हैं।साधारण तौर पर इस राशि के जातक सेक्स के मामले में ठंड़े होते हैं, दाम्पत्य जीवन विशेष चहल-पहल वाला नहीं होता। चतुराई के साथ अपना काम बना लेते हैं। इस राशि की महिलाएं बहुत बातुनी होती हैं और जबान पर नियन्त्रण नहीं होता है। शान-घमंड नहीं होता है और अपनी गलती स्वयं स्वीकार कर लेती हैं। स्वभाव लगभग सौम्य होता है। इस राशि की महिला प्रायः एक-दो सन्तान के पश्चात् अपनी वास्तविक उम्र से अधिक की लगने लग जाती है। उसका शरीर जल्दी ढल जाता है। इस राशि की महिला को एकांत पसन्द है। दिन में आलस्य और रात्रि में अत्यन्त फुर्ती होती है। इस राशि के जातक सन्तान के प्रति लापरवाह होते हैं। इनका पत्नी प्रेम घटता-बढ़ता रहता है। मैथुन के समय बात करते रहने की आदत होती है। प्रायः गुप्त रोग हो जाते हैं, जिन्हें अपनी लापरवाही से बढ़ा लेते हैं। इस राशि का पुरूष निम्नस्तरीय महिलाओं में विशेष रूचि रखता है। नौकरानी, मेहरी, मजदूर, आदि स्त्रियों में रूचि रहती है। यह हमेशा अपना पौरूष बढ़ाना चाहता है और सब ठीक रहने पर भी नाना प्रकार से ऐसे चक्कर में पड़ा रहता है। कामवर्धक दवाएं इसे सबसे ज्यादा प्रिय होती है। इसके साथ-साथ रात में इसको नग्नावस्था में ही सोने की आदत होती है। इस राशि की पत्नी इसके प्रभाव में रहती है और इसके भयानक क्रोध से बेहद डरती है। कुल मिलाकर इसका सैक्स विकृत होता है। राशि और सैक्स - धनु राशि यह पौष माह (दिसम्बर-जनवरी) की राशि है। सौर मंडल में इसका आकार अगला भाग तीर ताने पुरूष और पिछला भाग घोड़ा है। इसका ग्रह देवता बृहस्पति है। स्वभाव द्विस्वभाव, तत्त्व अग्नि, पृष्ठोदय उदय, दिशा उत्तर-पश्चिम, रंग सुनहला, निवास युद्ध स्थल, प्रथम भाग द्विपद और उत्तर भाग चतुष्पद, जाति क्षत्रिय है। शरीर में स्थान जंघा है। प्रकृत्ति कफ, सत्त्वगुणी, रत्न पुष्पराग, स्वाद मधुर, इन्द्रिय ज्ञान कान, आकार वृत्त के समान होता है।यह राशि मैथुन के सम्बन्ध में एकदम ‘युद्धस्थल’ है। हर तरह से मारकाट करती और अपने धनु से बराबर बाण बरसाती है। इसके अन्धाधुंध तीरों की मार से विपरीत पक्ष घबरा जाता है। इस राशि के जातक की जंघांए शेर की रान के समान बलिष्ठ होती हैं और रात्रिकालीन क्रिया पसन्द है। प्रायः सबसे अधिक समय इस राशि के जातक को लगता है। इसका अंग जंघां होने के कारण यहीं स्पर्श से इसका काम जाग्रत हो जाता है। इस राशि को पीले रंग से भी गहरी उत्तेजना मिलती है। उत्तर-पश्चिम दिशा में अपना रूख कर यह जातक विशेष सुख पाता है। स्त्री अंग धनुष की प्रत्यंचा के समान बांयी ओर ज्यादा चौड़ा फैला रहता है तथा जंघाएं अत्यन्त सुडौल-मजबूत होती है। पैर हवा में लहराकर या उठाकर की जाने वाली रतिक्रिया इस राशि की स्त्री को विशेष प्रिय होती है। द्विपद, चतुष्पद होने के कारण नाना प्रकार के सभी आसन बदलकर सुख लेना प्रिय है। मैथुनरत इस राशि का जातक पल पल में आसन बदलता है। स्तन गोल वृत्त के समान, किन्तु ढीले रहते हैं। पुरूष की जांघें शेर के समान बलिष्ठ होती है और काफी देर तक मैथुन करता है।रूप-रंग में प्रायः कद नाटा और वर्ण सुनहला होता है। सुनहले घुंघराले बाल इनकी विषेषता है। मांग कर खाना बड़ा पसन्द करते हैं। कान बहुत तेज हैं। दीवारों के पार की भी बात का पता कर लेते हैं। सन्तान पर्याप्त संख्या में उत्पन्न करते हैं। विपरीत लिंगी के प्रति प्रबल आकर्षण करते हैं, पर प्रेम निर्वाह ईमानदारी से करते हैं। इनका प्रेम एक बार हो जाने पर टूट या छूट पाना कठिन होता है। मैथुन को यह रणक्षेत्र बना देते हैं और हर तरह से वार करते हैं। इस राशि के पुरूष से स्त्रियां त्राहिमाम् करती है। इस राशि की स्त्री को संतुष्ट करना भी लोहे के चने चबाना होता है। अपने प्रेमी / पति से यह तीर के समान टकराती है और अपने हाव-भाव से हर पल चुनौती देती है। शरीर से प्रायः स्थूल होती हैं। परपुरूषगामी प्रायः नहीं होती, किन्तु असन्तुष्ट होने पर पति से नफरत करने लग जाती है तथा उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। सत्त्वगुणी होने के कारण इनके प्रेम-पत्र सात्त्विक और सर्वथा मामूली होते हैं। उनको पढ़कर प्रेमपत्र की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। इस राशि की महिलाएं प्रायः दिसम्बर-जनवरी (पौष) में गर्भाधान करती हैं। सन्तान के प्रति इनमें गहरी ममता होती है और सबका ध्यान रखती हैं। समय के बड़े पाबन्द और हमेशा क्रियाशील होते हैं। इस राशि की महिला का गुप्त प्रेम प्रायः प्रकट नहीं होता हैं। मैथुन से पूर्व या मैथुन के समय अथवा पश्चात् इस राशि के जातक कोई क्रीड़ा नहीं करते हैं। हां, दन्त-नख का भी खूब प्रयोग करते हैं। वर्ण क्षत्रिय और स्वभाव क्रूर होने के कारण बहुत र्निभयता तथा र्निदयता के साथ व्यवहार करता है। जातक बड़ा कामुक और उत्तेजक मैथुन करता है। इसको गोपनीयता पसन्द नहीं हैं। स्वभाव इनका अग्नि तत्त्व होने के कारण उग्र रहता है, तथा मैथुन के मामले में हर समय ‘गरम’ रहता हैं। विवाह के बाद रात-दिन वह इसी में रूचि रखता है। कई-कई बार अपना धनु सम्भालता है। यह थकता नहीं है और होंठों से नाना प्रकार की ध्वनियां हुकांर के समान निकालता है, किन्तु इसके बावजूद दाम्पत्य जीवन निभ जाता है। अपनी राशि के गुण के कारण हर समय मैथुन के लिये तैयार हो जाते हैं। पुरूष को स्त्री के लिये, स्त्री को पुरूष के लिये तैयार होने में देर नहीं लगती और रूचि के साथ ‘रणभूमि’ में अपने-अपने हथियार ये वार करते हैं। शीघ्र विवाह करते हैं और तुरन्त बच्चा पैदा करते हैं।कर्मठता, क्रियाशीलता और समय की पाबन्दी के कारण इनका गृहस्थ जीवन आर्थिक संकटों में प्रायः नहीं पड़ता, साधारण सुखमय दाम्पत्य होता है। राशि और सैक्स - वृश्चिक राशि यह मेष राशि की सहोदर है। इसका आकार बिच्छू के समान है। स्थिर राशि, तत्त्व जल, शीर्षोदय उदय, दिशा पश्चिम, लिंग स्त्री, जाति ब्राह्मण, निवास छेद या बिल, योनि कीट, शरीर में स्थान गुप्तांग (योनि, इन्द्रिय, नितम्ब, गुदा), रंग काला तथा ग्रह स्वामी मंगल है।शरीर में स्थान गुप्तांग होने के कारण पुरूषों की इन्द्रिय दीर्घ और बिच्छू के समान डंक मारने वाली होती है। इस राशि का पुरूष हमेशा बिच्छू जैसी पीड़ा देने के समान अपना मैथुन शुरू कर देता है। स्त्री के साथ यह कब क्रीड़ा प्रारम्भ कर दे कहा नहीं जा सकता। प्रथम प्रवेश में स्त्री को लगता है, मानो बिच्छू डंक मार गया और वह तिलमिला जाया करती है। एक प्रकार से अपना हर सम्भोग यह बलात्कार से शुरू करता है। इस राशि की महिला भी ऐसा ही व्यवहार ज्यादातर पसन्द करती है। स्त्री अंग काफी दीर्घ होता है। अक्षत योनि होने के बावजूद सम्भोग की आदी-सी लगती है। इस राशि की स्त्रियों के स्तनों के चूचक (स्तनाग्र) गौर वर्ण के बावजूद अत्यन्त काले, कठोर होते हैं और नितम्ब भारी होते हैं।इसका निवास स्थान स्वयं गुप्तांग (योनि, इन्द्रिय, नितम्ब, गुदा) है, इस कारण इन्हीं क्षेत्रों में इनकी उत्तेजना का भी निवास है। इन्हीं अंगों को सहलाने या चुम्बन आदि से इनको उत्तेजना मिलती है। कीट राशि होने से बिल्कुल घुटन-भरे वातावरण में मैथुन प्रिय है तथा निम्न स्तरीय मैथुन अच्छा लगता है। योनि कीट होने के कारण इसे नंगी जमीन विशेष प्रिय होती है। स्वभाव नर है, अस्थिर रूप से मैथुन करते हैं। पश्चिम की ओर मुख करने में ज्यादा सुख मिलता है। जाति ब्राह्मण है, किन्तु गन्दगी प्रिय है। इस राशि के जातकों में कामुकता अधिक होती है। इस राशि के पुरूषों की कामना बहुत जहरीली होती है। प्रायः टाँगे उठाकर काफी देर तक क्रियारत रहते हैं। इस राशि के पुरूष का मैथुन कर्क, मकर, कुंभ या सिंह राशि की महिला ही झेल सकती है, किन्तु अन्य राशि की महिला को बराबर इस राशि के पुरूष के मैथुन से कष्ट होगा। इस राशि की स्त्री की वासना शान्त होने में काफी समय लगता है। इस राशि की महिला कन्या राशि के पुरूष के पल्ले पड़ गयी तो कन्या राशि का पुरूष पनाह मांगेगा। स्त्री को खड़े-खड़े होकर की जाने वाली कामलीला में ज्यादातर रूचि रहती है। इस राशि के जातक देर तक पीड़ादायक मैथुन करते हैं और देर तक लिपटे रहेंगे। मैथुन से पुर्व इस राशि के जातक को अपने पति-पत्नी के गुप्तांगों से खेलने का शौक होता है तथा दर्पण में या ऐसे आसनों में जिनमें अंगों की क्रिया दिखलाई पड़े, इनको बड़ा आनन्द आता है। एक-दूसरे के गुप्तांगों की क्रिया देखकर मैथुन करना इस राशि का स्वभाव होता है तथा ध्वनियां बराबर करते रहते हैं। इनको लोकलाज का भय नहीं होता। उल्टा चलने से बिच्छू स्वभाव के कारण इस राशि का जातक विपरीत रति में बड़ा सुख पाता है और सबसे प्रिय आसन मानता है। लाल कपड़ों से भी इनको बड़ी उत्तेजना मिलती है। इस राशि का पुरूष प्रायः मासिक धर्म या गर्भावस्था में भी अपनी पत्नी को नहीं छोड़ता है। इस राशि के जातक में समलैंगिक मैथुन की भी तीव्र भावना रहती है। कुल मिलाकर प्रचण्ड संभोग के साथ अपना दाम्पत्य जीवन पूरा करते हैं। तत्त्व जल तथा योनि कीट होने से स्खलन बहुत होता है। इस राशि की महिला का मासिक धर्म भी सबसे अधिक रक्त स्त्राव करता है। पुरूष में पूर्ण पौरूष तथा स्त्री में पूर्ण स्त्रीत्व होता है। मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसम्बर) में इस राशि के जातकों की कामुकता बढ़ जाती है। गर्भाधान होता है या प्रसव होता है। इस राशि का स्वभाव अत्यन्त उग्र होता है तथा व्यंग्य बाण चलाने (डंक मारने, ताना देने) में बड़ी कुशल होती है। इनके व्यंग्य बाणों से श्रोता तिलमिला जाता है। घोर अवसरवादी मौका पड़ने पर हाथ जोड़ने वाला, काम निकल जाने पर जूता मारने वाला, परले दर्जे का स्वार्थी होता है। वैसे इस राशि की स्त्री जितनी सुन्दर होगी, वह उतनी ही ‘बिच्छू’ (व्यंग्य कसने वाली) होगी। इसके व्यंग्य से मर्माहत होकर पति प्रायः मारपीट करते हैं, हत्या कर देते हैं या स्वयं आत्महत्या कर लेते हैं अथवा तलाक दे देते हैं। सबके साथ ऐसा ही बिच्छू जैसा व्यवहार होता है। कामलीला के समय भी ऐसा व्यंग्य कस देंगी कि मनुष्य छटपटा जाता है। पुरूष का स्वभाव भी इसी प्रकार का होता है। स्त्रियां पैर ज्यादा उठाकर चलती हैं तथा सोते समय पैर सिकोड़कर बिच्छू के समान आकार में सोती हैं।पुरूष अधिकतर परस्त्रीगामी होते है, कब किस परिवार की विवाहिता पर हाथ फेरकर डंक मार दें, पता नहीं चलता। जाति ब्राह्मण होने से अपने से कुलीन से सम्बन्ध बनाते हैं। संकरे स्थान, बिल या छेद के स्थान इसे बहुत ही पसन्द हैं। इस राषि की स्त्रियां भी विवाहित पुरूष में विशेष रूचि रखती हैं। पुरूष सुन्दर स्त्रियों को सब राज बता देते हैं। इनका दाम्पत्य जीवन अत्यन्त कलहपूर्ण होता है। विवाह शीघ्र करते हैं। अंधाधुंध सन्तान उत्पन्न करते हैं और उनकी ओर से लापरवाह होते हैं। प्रायः फुसफुसाकर बात करना इनकी आदत होती है। इनके प्रेम-पत्र व्यंग्यात्मक होते हैं। प्रेम इनका अस्थायी होता है, डंक मारा और चल दिये। स्त्रियां सावधानी से सम्बन्ध बनाती हैं। अपयश बहुत कम सामने आता है। अधिकांश शुभ ग्रह प्रभाव से सच्चरित्र होती है, पर व्यंग्य बाण इनके चरित्र को संदेहास्पद बना देता है। इनका रहन-सहन कीट योनि होने के कारण साफ-सफाई वाला नहीं होता, न ही बनाव-श्रृगांर में रूचि रखते हैं। लग्न / लग्नेश : 1. यदि लग्न और बारहवें भाव के स्वामी एक हो कर केंद्र /त्रिकोण में बैठ जाएँ या एक दूसरे से केंद्रवर्ती हो या आपस में स्थान परिवर्तन कर रहे हों तो पर्वत योग का निर्माण होता है । इस योग के चलते जहां व्यक्ति भाग्यशाली , विद्या -प्रिय ,कर्म शील , दानी , यशस्वी , घर जमीन का अधिपति होता है वहीं अत्यंत कामी और कभी कभी पर स्त्री गमन करने वाला भी होता है । 2. यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो ,तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है । 3. यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो और सप्तमेश लग्न में हो , तो जातक स्त्री और पुरुष दोनों में रूचि रखता है , उसे समय पर जैसा साथी मिल जाए वह अपनी भूख मिटा लेता है । यदि केवल सप्तमेश लग्न में स्थित हो तो जातक में काम वासना अधिक होती है तथा उसमें रतिक्रिया करते समय पशु प्रवृति उत्पन्न हो जाती है और वह निषिद्ध स्थानों को अपनी जिह्वा से चाटने लगता है । 4. यदि लग्नेश ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो जातक अप्राकृतिक सेक्स और मैस्टरबेशन आदि प्रवृतियों से ग्रसित रहता है और ये क्रियाएँ उसे आनंद और तृप्ति प्रदान करती हैं । 5. लग्न में शुक्र की युति 2 /7 /6 के स्वामी के साथ हो तो जातक का चरित्र संदिग्ध ही रहता है । 6. मीन लग्न में सूर्य और शुक्र की युति लग्न/चतुर्थ भाव में हो या सूर्य शुक्र की युति सप्तम भाव में हो और अष्टम में पुरुष राशि हो तो स्त्री , स्त्री राशि होने पर पुरुष अपनी तरक्की या अपना कठिन कार्य हल करने के लिए अपने साथी के अतिरिक्त अन्य से सम्बन्ध स्थापित करते हैं । सप्तम भाव और तुला राशि : 1. सातवें भाव में मंगल , बुद्ध और शुक्र की युति हो इस युति पर कोई शुभ प्रभाव न हो और गुरु केंद्र में उपस्थित न हो तो जातक अपनी काम की पूर्ति अप्राकृतिक तरीकों से करता है । 2. मंगल और शनि सप्तम स्थान पर स्थित हो तो जातक समलिंगी {होमसेक्सुअल } होता है , अकुलीन वर्ग की महिलाओं के संपर्क में रहता है । अष्टम /नवम /द्वादश भाव का मंगल भी अधिक काम वासना उत्पन्न करता है , ऐसा जातक गुरु पत्नी को भी नही छोड़ पाता है । 3. तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है । 4. तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी पारिवारिक कलेश का कारण बनती है । 5. दूषित शुक्र और बुद्ध की युति सप्तम भाव में हो तो जातक काम वासना की पूर्ति के लिए गुप्त तरीके खोजता है । शुक्र : 1. यदि शुक्र स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपने उच्च राशि का हो कर लग्न से केंद्र में हो तो मालव्य योग बनता है । इस योग में व्यक्ति सुन्दर,गुणी , संपत्ति युक्त ,उत्साह शक्ति से पूर्ण , सलाह देने या मंत्रणा करने में निपुण होने के साथ साथ परस्त्रीगामी भी होता है । ऐसा व्यक्ति समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा से रहता है तथा आपने ही स्तर की महिला/पुरुष से संपर्क रखते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देता है । समाज भी सब कुछ जानते हुए उसे आदर सम्मान देता रहता है । 2. सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है । 3. शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है । 4. शुक्र तीसरे भाव में स्थित हो और मंगल से दूषित हो , छठे भाव में मंगल की राशि हो और चन्द्रमा बारहवें स्थान पर हो तो व्यभिचारी प्रवृतियां अधिक होती है । 5. शुक्र के ऊपर शनि की दृष्टि/युति /प्रभाव जातक में अत्याधिक मैस्टरबेशन की प्रवृति उत्पन्न करते हैं । गुरु : 1. गुरु लग्न/चतुर्थ /सप्तम/दशम स्थान पर हो या पुरुष राशि में छठे भाव में हो या द्वादश भाव में हो , जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए सभी सीमाओं को तोड़ डालता है । 2. छठे भाव में गुरु यदि पुरुष राशि में बैठा हो तो जातक काम प्रिय होता है । शनि 1. यदि शनि स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि का होकर लग्न से केंद्रवर्ती हो तो शशः योग बनता है । ऐसा व्यक्ति राजा ,सचिव, जंगल पहाड़ पर घूमने वाला ,पराये धन का अपहरण करने वाला ,दूसरों की कमजोरियों को जानने वाला ,दूसरों की पत्नी से सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा करने वाला होता है ।कभी कभी अपने इस दुराचार के लिए उसकी प्रतिष्ठा कलंकित हो सकती है , वह दूसरों की नज़रों में गिर सकता है और समाज में अपमानित भी हो सकता है । 2. शनि लग्न में हो तो जातक में वासना अधिक होती है,पंचम भाव में शनि अपनी से बड़ी उम्र की स्त्री से आकर्षण , सप्तम में होने से व्यभिचारी प्रवृति,चन्द्रमा के साथ होने पर वेश्यागामी, मंगल के साथ होने पर स्त्री में और शुक्र के साथ होने पर पुरुष में कामुकता अधिक होती है । 3. दशम स्थान का शनि विरोधाभास उत्पन्न करता है , जातक कभी कभी ज्ञान वैराग्य की बात करता है तो कभी कभी कामशास्त्र का गंभीरता से विश्लेषण करता है , काम और सन्यास के बीच जातक झूलता रहता है । 4. दूषित शनि यदि चतुर्थ भाव में उपस्थित हो तो जातक की वासना उसे इन्सेस्ट की और अग्रसर करती है । 5. शनि की चन्द्रमा/शुक्र/मंगल के साथ युति जातक में काम वासना को काफी बड़ा देती है । चन्द्रमा : 1. चन्द्रमा बारहवें भाव में मीन राशि में हो तो जातक अनेकों का उपभोग करता है । 2. नवम भाव में दूषित चन्द्रमा की उपस्थिति गुरु/ शिक्षक /मार्गदर्शक के साथ व्यभिचार करने के उकसाते हैं । 3. सप्तम भाव में क्षीण चन्द्रमा किसी पाप ग्रह के साथ बैठा हो तो जातक विवाहित स्त्री से आकर्षित होता है । 4. नीच का चन्द्रमा सप्तम स्थान पर हो तो जातक आपने नौकर /नौकरानी से शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं । मंगल : 1. मंगल की उपस्थिति 8 /9 /12 भाव में हो तो जातक कामुक होता है । 2. मंगल सप्तम भाव में हो और उसपर कोई शुभ प्रभाव न हो तो जातक नबालिकों के साथ सम्बन्ध बनाता है । 3. मंगल की राशि में शुक्र या शुक्र की राशि में मंगल की उपस्थित हो तो जातक में कामुकता अधिक होती है । 4. जातक कामांध होकर पशु सामान व्यवहार करता है यदि मंगल और एक पाप ग्रह सप्तम में स्थित हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ भाव हो या मंगल चतुर्थ भाव में और राहु सप्तम भाव में हो या शुक्र मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम को देखता हो । राशि और सैक्स

 
मीन राशि

सौर मण्डल में इस राशि का आकार विपरीत दिशा में दो मछलियों के समान है इनमें एक नर दूसरी मादा लगती है। चारों ओर जल प्रतीत होता है। अंग्रेजी की संख्या 69 के समान आकृति बनती है। इस राशि का मास चैत्र ;मार्च.अप्रेलद्धए स्वभाव द्विस्वभावए तत्त्व जलए उभयोदय उदयए लिंग स्त्रीए दिशा उत्तर.पूर्वए रंग गहरा भूराए निवास जलए शरीर अंग पैरों का तलुवाए स्वामी ग्रह बृहस्पति और केतु है। बृहस्पति सत्त्वगुणीए पुरूष हैए केतु तमोगुणीए नपुंसक है। केतु का भूरा रंगए बृहस्पति का सुनहला ;दोनों मिलकर राषि रंग सलेटी या भूराद्धए रत्न वैदूर्यमणि है। इन्द्रिय ज्ञान राहु के समान स्पर्श है। आकार रेखा के समान है। जाति ब्राह्मणए अंक 7 है।इस राशि में उत्पन्न जातकों की आंखें मछलियों के समान गोलए सुन्दरए काली और चमकीली होती हैं। स्त्रियां बहुत सुन्दर होती है। मीन राशि वाली महिलाओं के पैर के निचले हिस्‍से में स्‍पर्श, चुंबन या मसाज से सेक्‍स के प्रति उत्‍तेजना बढ़ती है। धीरे-धीरे एड़ी से शुरुआत कर आप उन्‍हें संभोग के लिए आसानी से आकर्षित कर सकते हैं।इस राशि की गौर वर्ण स्त्रियों के पसीने से मछली जैसी गंध आती है। सुन्दर रूपए कुछ लम्बा चेहराए शरीर मछली के समान चिकना.चमकीला होता है। यह कितनी ही गहरी नींद में होए जरा से स्पर्श से आंखें खुल जाती है। इनके स्तन छोटे और मछली की मुखाकृति के समान होते हैं। ऐसा लगता हैए मानो दो रोहू मछलियों के सिर काटकर लगा दिये गये हों। इनकी इन्द्रिय रेखा के समान पतली और छोटी.सी होती है। नितम्ब चलते समय इस प्रकार हिलते हैंए मानो घड़े से पानी छलक रहा हो।पुरूष सामान्य कद.काठी पर सुन्दर आंखों और छोटे होंठो के स्वामी होते हैं। इन्द्रिय प्रायः बहुत लघु होती है। इसके तलुवों में कड़ापन ज्यादा होता है। स्त्री.पुरूष विचित्र प्रकार का मैथुन 69 की दशा में करते हैं। एक दूसरे के पैरों की ओर इनका सिर होता है। अपनी राशि के आकार के अनुसार इनको बड़ा सुख मिलता है। द्विस्वभावए उभयोदय और ब्राह्मण राशि के कारण इसका मैथुन घृणित एव  चंचल तथा कामकला की दृष्टि से श्रेष्ठ ;ब्राह्मणद्ध होता हैं। मीन : संभोग के लिये ये हमेशा तैयार रहते हैं। मीन राशि वाले अपने पार्टनर की भावनाओं को समझने में काफी आगे रहते हैं। लिहाजा अपने पार्टनर को संतुष्‍ट करना भी इन्हें अच्छी तरह आता है। इन्‍हें अलग-अलग तरह की क्रियाओं में संभोग करना पसंद होता है। मीन राशि वालों को सेक्स का सबसे सुखद ऐहसास इसी राशि वाले पार्टनर के साथ होता है। कामुकता बराबर बनी रहती है। इस राशि का मैथुन सबसे निकृष्ट होता है। यह राशि स्त्री को तृप्त करने की क्षमता रखती है। प्रेमिका या प्रेमी से यह बहुत कम अलग होते हैं। इनका स्वभाव बड़ा चंचल होता है। इस राशि के अधिकांष पुरूष प्रायः नपुंसकए अर्धनपुंसकए शीघ्रपतनए स्वप्नदोष के शिकार होते हैं। यह पूर्ण पूरूष नहीं होते हैं। इस राशि की महिला का मैथुन भी बड़ा चंचल होता है। मछली की तरह उसका बदन सम्भोग के समय लहराता है और अपने पति से भी गिरा हुआ मैथुन पसन्द करती है। इस राशि की महिला को गुप्तागों के दर्शनए स्पर्श से विशेष सुख मिलता है। उनसे खिलवाड़ और प्यारए लगाव इसको विशेष रूचिकर लगता है। इस क्रिया में कम खिलवाड़ में ज्यादा सुख मिलता है। वह कामुक होती हैए किन्तु मैथुन से ज्यादा रूचि अन्य कामुक व्यवहारों में करती है। इस राशि की महिलाओं में वासना होती हैए किन्तु अपने पर बड़ा नियन्त्रण करती है।इस राशि के जातकों की कामुकता का उत्तेजना स्थल उनके तलवों में होता है। स्त्री या पुरूष के तलवे थोड़ा सा सहलाते ही इनकी उत्तेजना बढ़ जाती है या कामुकता की गति के कारण शीघ्र स्खलित हो जाते हैं। निवास जल होने के कारण इनका मैथुन ठण्डा होता हैए उत्तेजक नहीं और शीतल स्थान में यह विशेष कामुकता का परिचय देते हैं। गहरा भूरा रंग इनको विशेष प्रिय है।इस राशि के जातकों का विवाह शीघ्र हो जाता हैए किन्तु इनका दाम्पत्य जीवन चंचल.साए अस्थिरए द्विस्वभाव के कारण बड़ा ही क्लेश भरा होता है। प्रायः गर्भाधान चैत्र मास ;मार्च.अप्रेलद्ध में होता है तथा इस माह में इनकी काम वासना ज्यादा होती है। उत्तर.पूर्व दिशा में रूख करके यह मैथुन करने में अपने को बराबर सुखद दशा में रखते हैं। इनका प्रेम मैथुन के समय अत्यन्त प्रगाढ़ हो जाता हैए किनतु उतना प्रेम यह अपने सामान्य जीवन में एक.दूसरे के प्रति नहां रखते हैं। इनका दाम्पत्य जीवन द्विस्वभाव राशि होने के कारण प्रायः कलहए वाद.विवाद से भरा रहता हैं। दिन भर या रात भर की कलह का समझौता मैथुन के समय समाप्त हो जाता है और सारा प्यार उनका एक.दूसरे के लिये उमड़ पड़ता है।मैथुन से पूर्वए मध्य या अन्त में यह एक.दूसरे से लिपट कर पड़े रहना ज्यादा पसन्द करते हैंए इसमें इनको ज्यादा सुख मिलता है। इस राशि का जातक अपनी पत्नी के साथ लिपटकर सोना ज्यादा पसन्द करता है। इसका यह स्वभाव बन जाता है। अकेले होने पर यह तकियाए रजाईए गद्दा आदि को ही लपेटकर खींच लेंगें।सन्तान सुख कम ही होता है। इनकी सन्तान प्रायः रूग्ण रहती है। प्रेम के मामले में ये हमेशा डरपोक होते हैं। प्रेम हो जाता हैए लेकिन अवैध सम्बन्ध करने से बहुत डरते है। इनका अवैध सम्बन्ध सदैव अस्थायी होता हैए केवल शरीर तक कायम रहता है। इनके प्रेमपत्र दार्शनिक किस्म केए संक्षिप्त तथा अनिश्चयात्मक बातो या वायदों से भरे होते हैं। शेरो.शायरीए सिनेमा के गाने जरूर लिखते हैं।इनका पारिवारिक जीवन सामान्यतः सुखद होता हैए पर सम्भोग जीवन को काफी समय तक जीते हैं और सबसे ज्यादा सुख यही पाते हैं। सभी प्रकार का प्राकृतिक.अप्राकृतिक.विकृत सम्भोग यही जाना.भोगा होता है तथा मैथुन के समय एक.दूसरे में मछली के समान डुबकी मार जाना इनका स्वभाव होता है। कुल मिलाकर सामान्य दाम्पत्य जीवन अपनी चरम मैथुन सीमा पर यह व्यतीत करते हैं।

राशि और सैक्स - कुम्भ राशि


कुंभ राशि वाली महिलाओं की कोहनी और कंधे पर छोटा सा स्‍पर्श उन्‍हें उत्‍तेजित कर देता है।जिस महिला के स्तन घड़े के समान विशाल स्तूपाकारए शक भरी बहुत पनियल आंखें हो तथा पुरूष का सिर घड़े के समानए दर्शनए ज्योतिष या गुप्त विद्याओं की बात कर रहा होए नजरें बड़ी तीखी हो वह जातक कुम्भ राशि का होगा।सौरमण्डल में आकार घड़े ;कुम्भद्ध के समानए माह फाल्गुन ;फरवरी.मार्चद्धए अंक 4 है। स्वभाव स्थिरए तत्त्व आकाशए शीर्षोदय उदयए लिंग पुरूषए दिषा उत्तरए जाति वैश्यए रंग रंग.बिरंगाए रहने का स्थान कुम्हार की जगहए शरीर का अंग घुटनाए गुण तमोगुणीए प्रकृत्ति पित्तए रत्न कौस्तुभ और गोमेदए ग्रह शनिए अधिपति देवता यम ध् दुर्गा तथा आकार रेखा के समान है।इस राशि की महिलाओं के स्तन अत्यन्त विशाल होते हैंए उनकी इन्द्रिय घड़े के मुंह के समान गोल और काफी फेली हुई लगती है और पुत्रवती न होने के बावजूद एक बच्चे की मां के समान लगती है। कुंभ राशि वाले सेक्स लाइफ में प्रयोग करना पसंद करते हैं। कई बार संभोग के दौरान ये इतने ज्‍यादा उत्‍तेजित हो जाते हैं, कि इन्‍हें किसी भी बात का खयाल नहीं रहता। संभोग के दौरान बाते करना पसंद नहीं करते। ये अपने पार्टनर की संतुष्टि से ज्‍यादा अपनी संतुष्टि पर ध्‍यान देते हैं। इस राशि का पुरूष सामान्य कद काठी का और हल्का सा आकर्षक होता है। इसका पुरूषांग रेखा के समान एकदम सीधा होता हैए अण्डकोष आवश्यकता से बड़े होते हैं। इस राशि के जातकों का स्खलन इतना अधिक होता है कि जंघाएं भीग जाती है। विशेष रूप से स्त्री मैथुन के समय इतनी गीली हो जाती है कि पुरूष को बार.बार पोंछना पड़ता है। फाल्गुन माह का स्वामी होने के कारण हर समय काम पीड़ित रहते हैं।इस राशि का कामोत्तेजना केन्द्र पिंडलियां ध् घुटने है। इनको उठाते सहलाते ही इनका ठंडापन समाप्त हो जाता है और शीघ्र स्खलित हो जाते हैं। इसे दिन में मैथुन करना सुखमय लगता है तथा पृष्ठ भाग कम प्रिय हैए किन्तु कुम्हार के चाक की भांति यह चकरी लगा.लगाकर इस क्रिया को करता है। कामुकता होती हैए किन्तु छलकते घड़े के समान धीमी गति से यह देर तक क्रीड़ारत रहता है। परायी स्त्रियों से इसके सम्बन्ध होते हैंए किन्तु वास्तविक प्रेम अपनी पत्नी को ही करता है। इसका तत्त्व आकाश होने से मैथुन के सम्बन्ध में नाना प्रकार की कल्पनाएं करता रहता है। उत्तर दिशा की ओर मुख करके मैथुन करने में ज्यादा सुख पाता है। इसका मैथुन ध्वनिमय होता है। जाति वैश्य होने के कारण साफ सफाई पसन्द हैं। इस राशि की महिला को बनाव.श्रृगांर बड़ा प्यारा होता है तथा रंग.बिरंगे कपड़े पसन्द करती है। मन्थर मैथुन इसे प्रिय है। चरम उत्तेजना और स्खलन के समय सीत्कारें अवश्य बिखेरती है। अपने पति को प्रगाढ़ प्रेम करती है और उसे पूरा सुख देती है। इस राशि की महिला बहुत कम परपुरूषगामी होती है। विवाह पूर्व अपनी चंचलता के कारण उनको अपयश मिल सकता हैए किन्तु शरीर सम्बन्ध में यह सरलता से हाथ नहीं लगाने देती है। कुम्भ होने के कारण हर बात में वजन रखती है। सोच.समझकर कदम उठाती है। अपने घरेलु काम.काज में रूचि रखती है। इस राशि के पुरूष का स्खलन अधिक मात्रा में होता है। पूर्ण रूप से यह मैथुन करता है। गौर.वर्ण की स्त्रियों में सबसे ज्यादा रूचि रखता है। हल्का नीला रंग देखकर इसकी कामोत्तेजना बढ़ती है। शनिवार के दिन यह विशेष रूप से कामपीड़ित रहता है। इस राशि का विशिष्ट माह फरवरी.मार्च ;फाल्गुनद्ध है। मैथुन से पूर्व यह जातक अपनी पत्नी के शरीर के साथ सबसे ज्यादा प्यार करता है। इसके चुम्बन सबसे लम्बे और आलिंगन सबसे प्रगाढ़ होंते हैं। मैथुन से पूर्व यह पत्नी को प्यार करके बहुत ज्यादा उत्तेजित कर देता है। इसको मैथुन के दौरानए पूर्व व अन्त में अश्लील वार्ता से सुख मिलता है। यह अपनी पत्नी से खुलकर फूहड़ शब्दों में तमाम बातें करता है। एकान्त स्थानों में मौका देखकर यह अश्लीलतम वाक्य लिखने में माहिर होता है अथवा गुप्त रोगों के चित्र बना देने में इसको बड़ा आनन्द आता है। इसके प्रेमपत्र सबसे अश्लील होते हैं। अपनी पत्नी के साथ सार्वजनिक प्रेम प्रदर्शन करता है। हाथ पकड़कर चलनाए कन्धे पर हाथ रखनाए कमर में सबके सामने हाथ डालनाए निगाहें बचाकर यात्रा के दौरान उसके स्तन मर्दन कर देना साधारण बात है। अत्यन्त भोग.विलासीए कामुकए बनाव.श्रृगार में समय लगाने वाले और हमेशा सजे.संवरे रहना विशेष गुण होता है। स्वभाव से बेहद शक्की और तांक.झांक करने वाले होते हैं। मैथुन का कोई भी कुकर्म इनसे नहीं बचता। इस राशि का सम्भोग अत्यन्त घृणित और पतित होता है। वह सब सीमाएं पार कर जाता है। स्त्रियों का कामावेग अत्यन्त प्रचण्ड़ होता है। सबसे अधिक यौन रोग इस राशि के जातकों को होते हैं। सबसे अधिक समय तक 60ध्65 साल तक इस राशि के व्यक्ति सम्भोग करते हैं।इनका दाम्पत्य जीवन मैथुन पर आधारित है। सारा गुस्सा मैथुन की प्राप्ति के साथ हवा हो जाता हैए इससे बड़े खुश रहते हैं। समाज के भय से यह विवाहिता को साथ रखते हैंए वरना कुम्हार के चक्के की तरह नयी.नयी मिट्टी गढ़ना कोई इनसे सीखे। अश्लीलता में इनको सबसे ज्यादा सुख मिलता है। दाम्पत्य जीवन प्रायः इसी कारण कटुए अर्थाभाव वाला होता है। पुरूष प्रायः दार्शनिक या ज्योतिषी जैसे होते हैं। इनका प्रेम धुमकेतु के समान पल में तोलाए पल में माशा होता है। बड़ा दुःखद दाम्पत्य जीवन होता है। बीमारी मासिक धर्म पूरे गर्भ में भी पत्नी की नाना प्रकार की दुर्गति कर डालते हैं।सन्तान अत्यन्त कम और दुर्बल होती है। सन्तान के प्रति ममता कम होती है। इनके प्रेमपत्र निहायत दार्शनिक होते हैं और द्विअर्थी। इनका स्वभाव रसिक होता है। समाज में इसके बावजूद इनकी कुशाग्र बुद्धि और बड़बोलेपन के कारण सम्मान बना रहता है।

राशि और सैक्स . मकर राशि


सौरमण्डल में अपने मगरमच्छ आकार के कारण इस राशि का नामकरण ष्मकरष् है। स्वामी ग्रह शनिए अंक 8 है। हस्तरेखा के अनुसार तर्जनी के तल में स्थित है। इसका माह माघ ;जनवरी.फरवरीद्धए चर राशिए तत्त्व पृथ्वीए पृष्ठोदय उदयए दिशा उत्तरए लिंग स्त्रीए जाति शूद्रए तमोगुणीए रंग नीला कालाए प्रकृति रातए ऋतु शिशिरए रत्न नीलमए आकार छड़ लगी खिड़की के समानए निवास जलए शरीर में अंग पैर तथा इसका केवल प्रथम भाग चतुष्पद है।इस राशि के जातक छरहरेए लम्बेए साधारण सुन्दर होते हैं। इस राशि के पुरूष की इन्द्रिय बेलनाकार होती है औ मकर राशि वाली महिलाओं के पैर सबसे ज्‍यादा संवेदनशील होते हैं। पैर के किसी भी भाग पर स्‍पर्श और चुंबन से वो जल्‍द उत्‍तेजित हो उठती हैं। स्त्री अंग खिड़कीनुमाए उसमें कई दरारें दीखती हैं। भगोष्ठ फेलने पर एक दरार दीखेगीए किन्तु सामान्य दशा में कई छिद्र दीखते हैं। स्तन बड़े और लटके होते हैंए किन्तु नितम्ब अत्यन्त उच्च और वृद्धावस्था तक कसावट भरे होते हैं। इस राशि की कामोत्तेजना का स्थल पैरों में है। विशेष रूप से पिंडलियों मेंए उनको कंधे पर उठाकर रखते ही कम्पन के साथ ही कामोत्तेजना बढ़ जाती है और यह स्खलित हो जाता है। मकर : मकर राशि वाले लोग सेक्‍स लाइफ में काफी सावधानीपूर्वक चलते हैं। ये सही व्‍यक्ति से ही यौन संबंध स्‍थापित करते हैं। दूसरों के लिए इनमें कोई रुचि नहीं होती। ईमानदार सेक्‍स लाइफ ही इनका मंत्र है। ओरल सेक्स इन्‍हें काफी पसंद होता है। पार्टनर की इच्‍छाओं का खयाल रखने के मामले में ये थोड़े से लापरवाह होते हैं। जाति से शूद्र और केवल प्रथम भाग चतुष्पद हैए अतः इसे कंधे पर पैर रखे जाने वाला आसन ही सबसे प्रिय है। तत्त्व इसका पृथ्वी तथा निवास जल या वन होने से मैथुन शांतए किन्तु भरपूर होता है। विपरीत पक्ष को यह पूरा निगल जाता है। उत्तर की ओर मुख करके क्रिया में विशेष सुख पाता है। इसका मैथुन सारे शरीर में हलचल मचा देने वाला तथा पानी में मगरमच्छ के भागने की ष्छप.छपष् की ध्वनि से युक्त होता है। यह पृष्ठ भाग से सम्भोग करना पसन्द करता है। उनकी आंखों में चमक भी होती है। इस राशि के जातकों का व्यवहार बड़ा रहस्यमय होता है। प्रेम के मामले में प्रायः उदासीन रहते हैं। इनका प्यार पाने के लिये निरन्तर प्रयास करना पड़ता है। चर स्वभाव के कारण चंचलता होती हैए और रात्रि में मैथुन करना विशेष प्रिय है। बिना खिड़की वाले कमरे या स्थान में मैथुन करतें समय इनको पूर्ण तृप्ति नहीं मिलती है। इस राशि का जातक अत्यन्त कामुक होता है। अपनी पत्नी के अलावा यह परायी स्त्री से अवश्य सम्बन्ध रखता है। इस राशि की स्त्री में कामोत्तेजना होती हैए कामुक होती हैं किन्तु परपुरूष से सम्पर्क में कठिनता से आती है। इस राशि की स्त्री को सन्तुष्ट करने में पति को पसीना आ जाता है। जाति शूद्र होने से इसका मैथुन बड़ा अश्लील होता है। साफ.सफाई तो इसको पसन्द हैए किन्तु इसमें भी घिनौनापन ज्यादा होता है। इस राशि का जातक मैथुन से पूर्व अपनी पत्नी को बेहद तंग करता है। कभी हाथ तो कभी मुख का प्रयोग करने पर विवश कर देता है। श्रृगांरप्रियता के कारण पत्नी का पूरा श्रृगांर करवाने के बाद ही यह क्रिया करता है। पत्नी को यह नित नये रूप में देखना पसन्द करता है। इस राशि के जातक का मन बड़ा रसिक होता है। प्रेमपत्र लिखने में सबसे ज्यादा आलस्य दिखलाते हैं। बड़ी मुश्किल से लिखते हैं। लिखाई की भाषा बड़ी रहस्यपूर्ण होती हैए शेरो.शायरी का भरपूर प्रयोग होता है। अश्लीलता के चलते अपनी पत्नी को अश्लीलतम पत्र भी लिख देते हैं। पैरों में ज्यादा बल होने के कारण यह पैदल चलने से नहीं थकते। निवास जल में होने के कारण इनका मैथुन ठंडा होता है। तत्त्व पृथ्वी होने से यह व्यवहारिक होते हैं। स्वभाव इनका रहस्यमय होता है। इनका दाम्पत्य जीवन देख कर पता नहीं लगाया जा सकता की ये सुखी हैं या दुःखी।सन्तान इनके कम होती है। प्रेम सम्बन्ध कम होते हैं। रूढ़ियां और सामाजिक परम्परा तोड़ नहीं सकते। धर्मभीरू और अंधविश्वासी होते हैं। इस कारण प्रेम करने से डरते भी हैं और दिल से कमजोर होते हैं।इनके दाम्पत्य जीवन में आर्थिक समस्याएं अपने.आप सुलझ जाया करती हैं। जनवरी.फरवरी ;माघद्ध गर्भाधान का समय होता है तथा शिशिर में यह थोड़ा कामातुर हो जाया करते हैं। रात का समय बेहद प्रिय है। 40 साल की उमर के पश्चात् सम्भोग में रूचि कम हो जाया करती हैं।साधारण तौर पर इस राशि के जातक सेक्स के मामले में ठंड़े होते हैंए दाम्पत्य जीवन विशेष चहल.पहल वाला नहीं होता। चतुराई के साथ अपना काम बना लेते हैं। इस राशि की महिलाएं बहुत बातुनी होती हैं और जबान पर नियन्त्रण नहीं होता है। शान.घमंड नहीं होता है और अपनी गलती स्वयं स्वीकार कर लेती हैं। स्वभाव लगभग सौम्य होता है। इस राशि की महिला प्रायः एक.दो सन्तान के पश्चात् अपनी वास्तविक उम्र से अधिक की लगने लग जाती है। उसका शरीर जल्दी ढल जाता है। इस राशि की महिला को एकांत पसन्द है। दिन में आलस्य और रात्रि में अत्यन्त फुर्ती होती है। इस राशि के जातक सन्तान के प्रति लापरवाह होते हैं। इनका पत्नी प्रेम घटता.बढ़ता रहता है। मैथुन के समय बात करते रहने की आदत होती है। प्रायः गुप्त रोग हो जाते हैंए जिन्हें अपनी लापरवाही से बढ़ा लेते हैं। इस राशि का पुरूष निम्नस्तरीय महिलाओं में विशेष रूचि रखता है। नौकरानीए मेहरीए मजदूरए आदि स्त्रियों में रूचि रहती है। यह हमेशा अपना पौरूष बढ़ाना चाहता है और सब ठीक रहने पर भी नाना प्रकार से ऐसे चक्कर में पड़ा रहता है। कामवर्धक दवाएं इसे सबसे ज्यादा प्रिय होती है। इसके साथ.साथ रात में इसको नग्नावस्था में ही सोने की आदत होती है। इस राशि की पत्नी इसके प्रभाव में रहती है और इसके भयानक क्रोध से बेहद डरती है। कुल मिलाकर इसका सैक्स विकृत होता है।

राशि और सैक्स . धनु राशि


यह पौष माह ;दिसम्बर.जनवरीद्ध की राशि है। सौर मंडल में इसका आकार अगला भाग तीर ताने पुरूष और पिछला भाग घोड़ा है। इसका ग्रह देवता बृहस्पति है। स्वभाव द्विस्वभावए तत्त्व अग्निए पृष्ठोदय उदयए दिशा उत्तर.पश्चिमए रंग सुनहलाए निवास युद्ध स्थलए प्रथम भाग द्विपद और उत्तर भाग चतुष्पदए जाति क्षत्रिय है। शरीर में स्थान जंघा है। प्रकृत्ति कफए सत्त्वगुणीए रत्न पुष्परागए स्वाद मधुरए इन्द्रिय ज्ञान कानए आकार वृत्त के समान होता है।यह राशि मैथुन के सम्बन्ध में एकदम ष्युद्धस्थलष् है। हर तरह से मारकाट करती और अपने धनु से बराबर बाण बरसाती है। इसके अन्धाधुंध तीरों की मार से विपरीत पक्ष घबरा जाता है। इस राशि के जातक की जंघांए शेर की रान के समान बलिष्ठ होती हैं और रात्रिकालीन क्रिया पसन्द है। प्रायः सबसे अधिक समय इस राशि के जातक को लगता है। इसका अंग जंघां होने के कारण यहीं स्पर्श से इसका काम जाग्रत हो जाता है। इस राशि को पीले रंग से भी गहरी उत्तेजना मिलती है। उत्तर.पश्चिम दिशा में अपना रूख कर यह जातक विशेष सुख पाता है। स्त्री अंग धनुष की प्रत्यंचा के समान बांयी ओर ज्यादा चौड़ा फैला रहता है तथा जंघाएं अत्यन्त सुडौल.मजबूत होती है। पैर हवा में लहराकर या उठाकर की जाने वाली रतिक्रिया इस राशि की स्त्री को विशेष प्रिय होती है। धनु राशि वाले काफी उत्‍साहवर्धक होते हैं। यौन जीवन को खुलकर जीने वाले होते हैं और बहुत जल्‍द सेक्‍स के लिए तैयार भी हो जाते हैं। इन्‍हें चुंबन या फोरप्‍ले ज्‍यादा पसंद नहीं होता। सीधे संभोग में इन्‍हें ज्‍यादा मजा आता है। इनके अंदर उत्तेजित करने वाली फीलिंग्‍स कूट-कूट कर भरी होती हैं। आसानी से चरम सीमा तक पहुंच जाते हैं। द्विपदए चतुष्पद होने के कारण नाना प्रकार के सभी आसन बदलकर सुख लेना प्रिय है। मैथुनरत इस राशि का जातक पल पल में आसन बदलता है। धनु राशि वाली महिलाएं लंबे समय तक फोरप्‍ले पसंद करती हैं। उनके लिए जांघ सबसे ज्‍यादा संवेदनशील अंग होता है। जांघ पर स्‍पर्श करने से वो काफी तेजी से उत्‍तेजित हो जाती हैं।स्तन गोल वृत्त के समानए किन्तु ढीले रहते हैं। पुरूष की जांघें शेर के समान बलिष्ठ होती है और काफी देर तक मैथुन करता है।रूप.रंग में प्रायः कद नाटा और वर्ण सुनहला होता है। सुनहले घुंघराले बाल इनकी विषेषता है। मांग कर खाना बड़ा पसन्द करते हैं। कान बहुत तेज हैं। दीवारों के पार की भी बात का पता कर लेते हैं। सन्तान पर्याप्त संख्या में उत्पन्न करते हैं। विपरीत लिंगी के प्रति प्रबल आकर्षण करते हैंए पर प्रेम निर्वाह ईमानदारी से करते हैं। इनका प्रेम एक बार हो जाने पर टूट या छूट पाना कठिन होता है। मैथुन को यह रणक्षेत्र बना देते हैं और हर तरह से वार करते हैं। इस राशि के पुरूष से स्त्रियां त्राहिमाम् करती है। इस राशि की स्त्री को संतुष्ट करना भी लोहे के चने चबाना होता है। अपने प्रेमी ध् पति से यह तीर के समान टकराती है और अपने हाव.भाव से हर पल चुनौती देती है। शरीर से प्रायः स्थूल होती हैं। परपुरूषगामी प्रायः नहीं होतीए किन्तु असन्तुष्ट होने पर पति से नफरत करने लग जाती है तथा उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। सत्त्वगुणी होने के कारण इनके प्रेम.पत्र सात्त्विक और सर्वथा मामूली होते हैं। उनको पढ़कर प्रेमपत्र की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। इस राशि की महिलाएं प्रायः दिसम्बर.जनवरी ;पौषद्ध में गर्भाधान करती हैं। सन्तान के प्रति इनमें गहरी ममता होती है और सबका ध्यान रखती हैं। समय के बड़े पाबन्द और हमेशा क्रियाशील होते हैं। इस राशि की महिला का गुप्त प्रेम प्रायः प्रकट नहीं होता हैं। मैथुन से पूर्व या मैथुन के समय अथवा पश्चात् इस राशि के जातक कोई क्रीड़ा नहीं करते हैं। हांए दन्त.नख का भी खूब प्रयोग करते हैं। वर्ण क्षत्रिय और स्वभाव क्रूर होने के कारण बहुत र्निभयता तथा र्निदयता के साथ व्यवहार करता है। जातक बड़ा कामुक और उत्तेजक मैथुन करता है। इसको गोपनीयता पसन्द नहीं हैं। स्वभाव इनका अग्नि तत्त्व होने के कारण उग्र रहता हैए तथा मैथुन के मामले में हर समय ष्गरमष् रहता हैं। विवाह के बाद रात.दिन वह इसी में रूचि रखता है। कई.कई बार अपना धनु सम्भालता है। यह थकता नहीं है और होंठों से नाना प्रकार की ध्वनियां हुकांर के समान निकालता हैए किन्तु इसके बावजूद दाम्पत्य जीवन निभ जाता है। अपनी राशि के गुण के कारण हर समय मैथुन के लिये तैयार हो जाते हैं। पुरूष को स्त्री के लियेए स्त्री को पुरूष के लिये तैयार होने में देर नहीं लगती और रूचि के साथ ष्रणभूमिष् में अपने.अपने हथियार ये वार करते हैं। शीघ्र विवाह करते हैं और तुरन्त बच्चा पैदा करते हैं।कर्मठताए क्रियाशीलता और समय की पाबन्दी के कारण इनका गृहस्थ जीवन आर्थिक संकटों में प्रायः नहीं पड़ताए साधारण सुखमय दाम्पत्य होता है।

राशि और सैक्स . वृश्चिक राशि


वृश्चिक राशि वालों के अंदर संभोग के प्रति भूख बहुत ज्‍यादा होती है, लेकिन वो भी उनके मूड पर निर्भर करता है। ये लोग बहुत ज्‍यादा भावुक होने के कारण आसानी से सेक्‍स करते। इनके पार्टनर अपनी सेक्‍स लाइफ को लेकर काफी परेशान रहते हैं। इनके सबसे अच्‍छे यौन संबंध वृश्चिक राशि वालों के साथ ही बनते हैं।यह मेष राशि की सहोदर है। इसका आकार बिच्छू के समान है। स्थिर राशिए तत्त्व जलए शीर्षोदय उदयए दिशा पश्चिमए लिंग स्त्रीए जाति ब्राह्मणए निवास छेद या बिलए योनि कीटए शरीर में स्थान गुप्तांग ;योनिए इन्द्रियए नितम्बए गुदाद्धए रंग काला तथा ग्रह स्वामी मंगल है।शरीर में स्थान गुप्तांग होने के कारण पुरूषों की इन्द्रिय दीर्घ और बिच्छू के समान डंक मारने वाली होती है। इस राशि का पुरूष हमेशा बिच्छू जैसी पीड़ा देने के समान अपना मैथुन शुरू कर देता है। स्त्री के साथ यह कब क्रीड़ा प्रारम्भ कर दे कहा नहीं जा सकता। प्रथम प्रवेश में स्त्री को लगता हैए मानो बिच्छू डंक मार गया और वह तिलमिला जाया करती है। एक प्रकार से अपना हर सम्भोग यह बलात्कार से शुरू करता है। वृश्चिक राशि वाली महिलाओं योनि सेक्‍स के लिए सबसे ज्‍यादा संवेदनशील होती है। धीरे-धीरे स्‍पर्श एवं मसाज से वो बहुत जल्‍द उत्‍तेजित हो उठती हैं। यही कारण है कि वृश्चिक राशि वाली महिलाओं को सेक्‍स की चरम सीमा तक पहुंचने में काफी समय लगता है।इस राशि की महिला भी ऐसा ही व्यवहार ज्यादातर पसन्द करती है। स्त्री अंग काफी दीर्घ होता है। अक्षत योनि होने के बावजूद सम्भोग की आदी.सी लगती है। इस राशि की स्त्रियों के स्तनों के चूचक ;स्तनाग्रद्ध गौर वर्ण के बावजूद अत्यन्त कालेए कठोर होते हैं और नितम्ब भारी होते हैं।इसका निवास स्थान स्वयं गुप्तांग ;योनिए इन्द्रियए नितम्बए गुदाद्ध हैए इस कारण इन्हीं क्षेत्रों में इनकी उत्तेजना का भी निवास है। इन्हीं अंगों को सहलाने या चुम्बन आदि से इनको उत्तेजना मिलती है। कीट राशि होने से बिल्कुल घुटन.भरे वातावरण में मैथुन प्रिय है तथा निम्न स्तरीय मैथुन अच्छा लगता है। योनि कीट होने के कारण इसे नंगी जमीन विशेष प्रिय होती है। स्वभाव नर हैए अस्थिर रूप से मैथुन करते हैं। पश्चिम की ओर मुख करने में ज्यादा सुख मिलता है। जाति ब्राह्मण हैए किन्तु गन्दगी प्रिय है। इस राशि के जातकों में कामुकता अधिक होती है। इस राशि के पुरूषों की कामना बहुत जहरीली होती है। प्रायः टाँगे उठाकर काफी देर तक क्रियारत रहते हैं। इस राशि के पुरूष का मैथुन कर्कए मकरए कुंभ या सिंह राशि की महिला ही झेल सकती हैए किन्तु अन्य राशि की महिला को बराबर इस राशि के पुरूष के मैथुन से कष्ट होगा। इस राशि की स्त्री की वासना शान्त होने में काफी समय लगता है। इस राशि की महिला कन्या राशि के पुरूष के पल्ले पड़ गयी तो कन्या राशि का पुरूष पनाह मांगेगा। स्त्री को खड़े.खड़े होकर की जाने वाली कामलीला में ज्यादातर रूचि रहती है। इस राशि के जातक देर तक पीड़ादायक मैथुन करते हैं और देर तक लिपटे रहेंगे। मैथुन से पुर्व इस राशि के जातक को अपने पति.पत्नी के गुप्तांगों से खेलने का शौक होता है तथा दर्पण में या ऐसे आसनों में जिनमें अंगों की क्रिया दिखलाई पड़ेए इनको बड़ा आनन्द आता है। एक.दूसरे के गुप्तांगों की क्रिया देखकर मैथुन करना इस राशि का स्वभाव होता है तथा ध्वनियां बराबर करते रहते हैं। इनको लोकलाज का भय नहीं होता। उल्टा चलने से बिच्छू स्वभाव के कारण इस राशि का जातक विपरीत रति में बड़ा सुख पाता है और सबसे प्रिय आसन मानता है। लाल कपड़ों से भी इनको बड़ी उत्तेजना मिलती है। इस राशि का पुरूष प्रायः मासिक धर्म या गर्भावस्था में भी अपनी पत्नी को नहीं छोड़ता है। इस राशि के जातक में समलैंगिक मैथुन की भी तीव्र भावना रहती है। कुल मिलाकर प्रचण्ड संभोग के साथ अपना दाम्पत्य जीवन पूरा करते हैं। तत्त्व जल तथा योनि कीट होने से स्खलन बहुत होता है। इस राशि की महिला का मासिक धर्म भी सबसे अधिक रक्त स्त्राव करता है। पुरूष में पूर्ण पौरूष तथा स्त्री में पूर्ण स्त्रीत्व होता है। मार्गशीर्ष ;नवम्बर.दिसम्बरद्ध में इस राशि के जातकों की कामुकता बढ़ जाती है। गर्भाधान होता है या प्रसव होता है। इस राशि का स्वभाव अत्यन्त उग्र होता है तथा व्यंग्य बाण चलाने ;डंक मारनेए ताना देनेद्ध में बड़ी कुशल होती है। इनके व्यंग्य बाणों से श्रोता तिलमिला जाता है। घोर अवसरवादी मौका पड़ने पर हाथ जोड़ने वालाए काम निकल जाने पर जूता मारने वालाए परले दर्जे का स्वार्थी होता है। वैसे इस राशि की स्त्री जितनी सुन्दर होगीए वह उतनी ही ष्बिच्छूष् ;व्यंग्य कसने वालीद्ध होगी। इसके व्यंग्य से मर्माहत होकर पति प्रायः मारपीट करते हैंए हत्या कर देते हैं या स्वयं आत्महत्या कर लेते हैं अथवा तलाक दे देते हैं। सबके साथ ऐसा ही बिच्छू जैसा व्यवहार होता है। कामलीला के समय भी ऐसा व्यंग्य कस देंगी कि मनुष्य छटपटा जाता है। पुरूष का स्वभाव भी इसी प्रकार का होता है। स्त्रियां पैर ज्यादा उठाकर चलती हैं तथा सोते समय पैर सिकोड़कर बिच्छू के समान आकार में सोती हैं।पुरूष अधिकतर परस्त्रीगामी होते हैए कब किस परिवार की विवाहिता पर हाथ फेरकर डंक मार देंए पता नहीं चलता। जाति ब्राह्मण होने से अपने से कुलीन से सम्बन्ध बनाते हैं। संकरे स्थानए बिल या छेद के स्थान इसे बहुत ही पसन्द हैं। इस राषि की स्त्रियां भी विवाहित पुरूष में विशेष रूचि रखती हैं। पुरूष सुन्दर स्त्रियों को सब राज बता देते हैं। इनका दाम्पत्य जीवन अत्यन्त कलहपूर्ण होता है। विवाह शीघ्र करते हैं। अंधाधुंध सन्तान उत्पन्न करते हैं और उनकी ओर से लापरवाह होते हैं। प्रायः फुसफुसाकर बात करना इनकी आदत होती है। इनके प्रेम.पत्र व्यंग्यात्मक होते हैं। प्रेम इनका अस्थायी होता हैए डंक मारा और चल दिये। स्त्रियां सावधानी से सम्बन्ध बनाती हैं। अपयश बहुत कम सामने आता है। अधिकांश शुभ ग्रह प्रभाव से सच्चरित्र होती हैए पर व्यंग्य बाण इनके चरित्र को संदेहास्पद बना देता है। इनका रहन.सहन कीट योनि होने के कारण साफ.सफाई वाला नहीं होताए न ही बनाव.श्रृगांर में रूचि रखते हैं।
 
राशि और सैक्स . तुला राशि

तुला राशि वाले अपने पार्टनर को हमेशा संतुष्‍ट करते हैं। ये अपने पार्टनर की इच्‍छा पर ही संभोग के लिए आगे बढ़ते हैं। ये आसानी से आकर्षित हो जाते हैं, लिहाजा यौन क्रिया की चरमसीमा तक पहुंचने में इन्‍हें दिक्‍कत नहीं होती। संभोग के दौरान बाते करना पसंद नहीं करते।यह राशि वृष की सहोदर राशि है। आकाश में इसका आकार तुला ;तराजूद्ध के समान है। कार्तिक ;अक्टूबर.नवम्बरद्ध इसका मास है। यह चर राशिए तत्त्व आकाशए शीर्षोदय उदय दिशा पश्चिम निवास हाट.बाजारए रंग रंग.बिरंगाए जाति वैश्यए पद द्विपद आकार अष्टकोणए शरीर में स्थान नाभिए ग्रह स्वामी शुक्र है।इस राशि के जातक साधारण रूपरंग के होते हैं। विचार अत्यन्त नपे.तुलेए कोई भी कामए कोई भी बातए बिना सोचे समझे नहीं बोलते। इस राशि की लड़कियां अत्यन्त चतुरए बुद्धिमान तथा तेजस्वी होती हैं। अपने पति या प्रेमी को जी.जान से प्रेम करती हैं उसके एक इशारे पर अपनी जान दे देती हैं। इस राशि के जातक का सैक्स भी एकदम नपातुला होता है। ज्यादा सम्भोग करना कराना पसन्द नहीं करते। दाल में नमक के बराबर। प्रेम या विवाह काफी तौलकर करते हैं और बड़ी शान्ति के साथ दाम्पत्य जीवन व्यतीत होता है। निवास बाजार हाट होने के कारण घूमना और रंग.बिरंगा रंग होने के कारण खूब बन.ठनकर निकलनाए श्रृगांर करना बड़ा प्रिय होता है। तुला: तुला राशि वाली महिलाओं की पीठ का निचला हिस्‍सा काफी संवेदनशील होता है। तुला राशि वाली महिलाओं को सेक्‍स के लिए उत्‍तेजित करने के लिए हिप्‍स के ठीक ऊपर के भाग में स्‍पर्श करने से उत्‍तेजना पैदा होती है।इस राशि की स्त्री के दोनों स्तन एकदम समान आकार और तराजू के पल्लों के समान होते हैं ;अन्य स्त्रियों के स्तन निश्चित रूप से एक छोटाए दूसरा बड़ा होता है स्त्री अंग सांप सा लहरायाए पर तराजू की डंडी के समान संकरा ;पतलाद्ध होता है। पुरूष अंग समान रूप से गोलाकार और सामान्य लम्बाई का होता है। बड़ी संयमित और संतुलित सेक्स जीवन जीने वाली यह राशि है। इसकी कामोत्तेजना का केन्द्र नाभि है। नाभि में अंगुली डालने या गुदगदी करने पर स्त्री काम पीड़ित तथा स्खलित हो जाती है। तत्त्व आकाश होने के कारण घुटन.भरे वातावरण में किये गये सम्भोग से इसको न आनन्द मिलता हैए न ये पसन्द करते हैं। राशि रूप चर हैंए अतः मैथुन अस्थिर रूप से करता है। मैथुन कम पर देर तक करते हैं। शीर्षोदय राशि के कारण अश्लील ढंग नहीं अपनाते दिन में विशेष सुख मिलता है और सामने से ही क्रियारत होते हैं। द्विपदी राशि के कारण नाना प्रकार के आसन में रूचि नहीं होती हैं मानवोचित संभोग लीला करते हैं। पश्चिम की ओर मुख करने से ज्यादा सुख मिलता है। परिवार.नियोजन का यह स्वयं ही बड़ी कड़ाई से पालन करते हैं। इस राशि के जातक दोनों का सेक्स अत्यन्त नपा.तुला होता है। पूर्ण रूप से एक.दूसरे का संतुष्ट करते हैं। जाति वैश्य होने से इनके संभोग में शालीनता होती है। इसका आकार तुला होने के कारण प्यार में सौदा करना इसका एक स्वभाव है। प्रायः यह मैथुन पूर्व चुम्बन.आलिंगन की बाजी लगाया करती है। पति या पत्नी के साथ द्यूत.क्रिड़ाए बाजी लगाना इसको बड़ा पसन्द आता है। इसमें स्वार्थी भाव ज्यादा होते हैं। मैथुन करते समय केवल आवश्यक या अनिवार्य ध्वनियां ही होती है तथा उचित समय पर मैथुन करते हैं। पूर्व में कुछ मनोरंजन और समाप्ति पर प्रायः एक.दूसरे को ठगते हैं। इस राशि की महिला अपने पति से संभोग समाप्ति के उपरान्त कुछ न कुछ फरियाद अवश्य करेगी। इस राशि के जातक साफ.सुथरा और स्तरीय मैथुन करना पसन्द करते हैं। अपना मैथुन किसी पर प्रकट नहीं करते बहुत गोपनीय ढ़ग से इस कार्य को करते हैं। स्वभाव इनका संतुलित होता है। प्रेम.पत्र भी एक एक पंक्ति को दस बार सोचकर लिखेंगें। इनकी लिखावट में काट.पीटए संशोधन अवश्य होगा।इनका प्रेम जल्दी प्रकट नहीं होता है। हर काम यह योजना बनाकर करते हैं और पहले साधन तथा वातावरण बना लेते हैं। स्त्री कभी पुरूष के पीछे या पुरूष के पीछे नहीं भागता है। इस राशि के नवयुवक छेड़खानी नहीं करते हैं। प्रायः गम्भीर रहते हैं। इसी राशि की लड़कियों का परीक्षाफल प्रायः सबसे सन्तोषजनक रहता है। तत्त्व आकाश होने के कारण अपने बनाये आकाश में मग्न रहते हैं। जाति राशि वैश्य होने के कारण प्रेम ध् विवाह में अपना नफा.नुकसान देखकर निर्णय हैं और किये गये निर्णय पर अटल रहते हैं। इस राशि की ही महिलाओं का प्रतिशत अविवाहित महिलाओं में ज्यादा होता है। अक्टूबर.नवम्बर में यह गर्भाधान करती है। नाभि राशि अंग होने से मूत्र रोगए गर्भाशय की बीमारी तथा उदर रोग होते हैं पर गुप्त रोग इस राशि के जातकों के पास भी नहीं फटकते हैं। पुरूषों को अवश्य वृद्धावस्था में अण्डकोष की बीमारी हो जाती है। वृद्धावस्था में इनका सैक्स शांत हो जाया करता है। अपने जीवन का अन्तिम काल 60 से ऊपर होने पर यह शांति के साथ धार्मिक कार्यों में लगाते हैं। यह राशि सौम्य एकदम नपी.तुली है। ऐसा ही इनका सेक्स दाम्पत्य जीवन और सन्तान संसार नपा.तुला होता है।
 
राशि और सैक्स . कन्या राशि

कन्या : इनके अंदर सेक्स की भूख काफी होती है, लिहाजा फोरसेक्‍स या ओरल सेक्स में ज्‍यादा समय नष्‍ट नहीं करते। ये भी काफी मूडी होते हैं। अगर मूड नहीं है, तो चाहे उनके पार्टनर कुछ भी कर लें, ये संभोग नहीं करते। ये सिर्फ विश्‍वस्‍त पार्टनर से ही सेक्स करते हैं।मिथुन राशि की भांति कन्या राशि का भी ग्रह स्वामी बुध है। इसकी आकृति हाथ में दीप लिये कन्या के समान है। स्वभाव द्विस्वभाव हैए तत्त्व पृथ्वीए शीर्षोदय राशिए दिशा दक्षिण.पश्चिमए पद द्विपदए शीर्षोदय उदयए जाति शूद्र और लिंग स्त्री है। रंग सलेटीए निवास हरियाली या गीली भूमि है। शरीर में स्थान कमरए पद इसका द्विपद है। इस राशि में उत्पन्न जातक शरीर से दुबले.पतले तथा घनी भौहों वाले होते हैं। यह देखने में अपनी उमर से काफी कम लगते हैं। शरीर में काफी स्फूर्ति होती है। पुरूषों में स्त्रियोचित गुण मिलते हैए तथा स्त्रियां बड़ी ही कोमल होती है। उनकी कमर में बड़ी ताकत होती है। इस राशि की महिला प्रायः अत्यन्त कुशल नर्तकी होती है। स्तन दीपक के समान होते हैं। नितम्ब मध्यम तथा स्त्री अंग दीपक की लौ के समान छोटाए संकर थोडा सा लम्बा होता है। योनि के भगोष्ठों की बनावट दीपक की लौ की लहर के समान होती है। इस राशि की स्त्री के तलुवे लाल और पैर बहुत सुन्दर होते हैं। उनका आकार प्रायः ष्कमलष् के समान होता है।कन्‍या राशि वालों के पेट पर एक चुंबन उनके अंदर सेक्‍स की तीव्र इच्‍छा पैदा करता है। उनका पेट सेक्‍स के प्रति सबसे संवेदनशील भाग होता है। पेट पर स्‍पर्श और मसाज से आप उन्‍हें उत्‍तेजित कर सकते हैं। पुरूष अंग आगे से अधिक मोटा तथा पीछे की ओर क्रमशः पतला होता है। निवास जल या भीगी भूमि होने के कारण तत्काल उत्तेजना प्राप्त कर शीघ्र स्खलित हो जाया करते हैं। यह विवाह बहुत सोच समझ कर देर से करते हैं। अधिकाशं इस कारण अविवाहित रह जाते हैं। तत्त्व पृथ्वी होने के कारण मन से कठोर होते हैंए पर द्विस्वभाव होने से निर्णय बदलते रहते हैं। शीर्षोदय उदय के कारण पृष्ठभाग से मैथुन नहीं करते और न समलिंगी होते हैं। इस राशि का शरीर का अंग कमर हैए अतः इस राशि के जातकों की कामोत्तेजना का क्षेत्र कमर है। स्त्री के कूल्हों या कमर ;बांया भागद्ध पकड़ने सहलाने से शीघ्र उत्तेजित होती हैं। कमर पकड़करए उकडूँ बैठकर मैथुन करना इस राशि के पुरूषों का स्वभाव होता है। नंगी जमीन पर सामान्य मानवोचित्त संभोगप्रिय होता है। लिंग स्त्री होने से इनमें विशेष कामवासना नहीं होती है। इस राशि के पुरूषों में स्त्रीत्व की अधिकता होती है।ए जनानापनए अतएव अधिकतर नपुंसकए संभोग असमर्थए शीघ्रपतन के शिकार रहते हैं। इस राशि का पुरूष पौरूष की कमी के कारण प्रायः अपनी स्त्री को संतुष्ट नहीं कर पाते। इस राशि के लोग ही ज्यादातर हिंजड़े होते हैं। इस राशि के जातक का स्वभाव बड़ा ही कोमल होता हैए बहुत नाजुक मिजाज। बड़ी नाजुक.मिजाजी के साथ यह सम्भोग करते हैं। कोई उठा.पटकए बलात्कारए आवाजें नहींए कोई शोर.शराबा नहीं। अपने आप में मगन रहते हैं। कामुक नहीं होतेए पर प्रेम में सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। आत्महत्या तक कर जाते हैं। अन्त तक साथ देते हैं। स्वभाव हंसमुख होता है। व्यभिचारी नहीं होतेए एक के प्रति वफादार होते हैं। दाम्पत्य जीवन में कलह या मारपीट नहीं करतेए बड़ा आर्दश गृहस्थ जीवन होता है।इस राशि की स्त्रियां आश्विन ;सितम्बर.अक्टुबरद्ध माह में गर्भाधान करती है। कमर में स्थान होने के कारण प्रसव के समय कमर में घोर पीड़ा होती है। इस राशि की महिला की कमर सहलाने या कमर पकड़कर मैथुन करने से उसे विशेष सुख मिलता है। सन्तान सामान्य रूप से होती है। इस राशि की महिला का मासिक बहुत कम असामान्य होता है। इनका प्रेम.प्रसंग सीधा सपाट होता है। भावुकता इनके प्रेम पत्रों में नहीं होतीए कामकाज की बातें ज्यादा लिखेंगें। सबसे अधिक मनपसंद और अर्न्तजातीय विवाह कन्या राशि के जातक करते हैं। जाति से शूद्र होने के कारण अपने से निम्न कुल या स्तर के लोगों से इनका प्रेम हो जाता है। प्रेम को यह विवाह में जरूर बदलते हैं। चतुर होने के कारण अपना काम सरलता से बना लेते हैं। इस राशि की अधिकतर महिलाएं ठंड़ी होती हैं। मैथुन में उनको किसी प्रकार की रूचि नहीं होती है। वृश्चिकए कर्क या सिंह से पाला पड़ जाने पर सूखकर कांटा हो जाती हैं। अपने ठंडेपन के कारण अरूचि दिखलाती हैं। बनाव.श्रृगांर में रूचि रखती हैं पर मैथुन में अश्लीलता नहीं होती। दक्षिण.पश्चिम दिशा में सिर कर ज्यादा सुख मिलता है। रिमझिम बरसते पानी में इनको उत्तेजना मिलती है अथवा हरियाली बिखरी पाकर मैथुनातुर होती है। इनकी कमर की लचक बहुत आकर्षक होती है। चुपचाप सम्भोग करना और द्विस्वभाव के कारण कभी इधरए कभी उधर खिसकनाए उलटनाए पलटना इनकी आदत होती है। रात्रि.दीप की लौ के समान हौल.हौले लहराती है। बस एक.दो फूँक में बुझ ;ठंडीद्ध जाती है। इनका क्रिया.कलाप क्षणिक होता है। मैथुन के पूर्वए अन्त में या मैथुन के दौरान यह उत्तेजना तो बहुत दिखलाती हैए किन्तु करते कुछ नहीं बनता।राशियों में सबसे सुकुमार और सीधी राशि कन्या है। भोली.भाली कन्या के समान ही इसका वैवाहिकए दाम्पत्य और सन्तान जीवन होता है। इसी राषि में सैक्स का सबसे कम महत्त्व है तथा सबसे कम समय लगता है।
 
राशि और सैक्स . सिंह राशि

सिंह राशि वाले तब तक संभोग के लिए आगे नहीं बढ़ते जब तक पार्टनर की ओर से सिगनल नहीं मिलता। संभोग के दौरान ये काफी ऊर्जावान होते हैं। कई बार संभोग के दौरान ये इतने ज्‍यादा उत्तेजित हो जाते हैं, कि इन्‍हें किसी भी बात का खयाल नहीं रहता। ये अपने पार्टनर को खुद पर हावी नहीं होने देते हैं। सिंह राशि वाली महिलाओं की पीठ सेक्‍स के प्रति सबसे संवेदनशील जगह होती है। आप अगर उनकी पीठ पर सुनहरा स्‍पर्श करते हैं, तो वो आसानी से सेक्‍स के प्रति उत्‍तेजित हो जाती हैं। उनकी पीठ और फिर उनके हिप्‍स पर स्‍पर्श उन्‍हें सेक्‍स की चरम सीमा तक पहुंचाता है।इस राशि की आकृति शेर के समान है। राशि स्थिरए तत्त्व अग्निए ग्रहाधिपति सूर्यए उदय शीर्षोदयए लिंग पुरूषए जाति क्षत्रियए दिशा दक्षिणए रहने का स्थान पर्वत की गुफाए चतुष्पदीए शरीर का अंग पेटए सत्त्वगुणीए स्वभाव क्रूरए रंग लाल मिश्रित वर्णए प्रकृत्ति पित्तए धातु ताम्रए रत्न माणिक्यए ऋतु ग्रीष्मए सौर मंडल में पद राजा काए आकार चतुष्कोणए इन्द्रिय ज्ञान नेत्रए ग्रह के अधिपति देवता षिव हैं।इस राशि के जातक अत्यन्त तेजस्वी और सुडौल होते हैं। बलिष्ठता तथा सीना तानकर चलना इसका गुण है। इस राशि की स्त्रियां परम सुन्दरी होती हैं। कम से कम उनकी कमर शेर की कमर के समान पतली और अत्यन्त मोहक बल खाने वाली होती है। आंखें माणिक्य या हीरे के समान जगमगाती है। विश्व की सुन्दरतम महिलाओं की राशि लगभग यही है। इनके स्तन चैकोन और अत्यन्त नुकीलेए उठेए लपटें फेंकते.से लगते हैं। इनका अंग चौकोन समान रूप से लम्बा.चौड़ा होता है तथा स्वभाव एकदम निर्भीक होता है। कड़ी नजर से घूर ले तो आदमी एकदम भीगी बिल्ली बन जाता है। प्रायः एकदम गम्भीर होती हैंए बोलना बहुत कम पसन्द होता हैए चाल मस्तानी और बेखबर होती है। हथेलियां मजबूत तथा अंगुलियां लम्बी.नुकीली होती है। चेहरे प्रायः चौकोर होते हैं। इनका क्रोध कहर बरपा देता है। मारपीट में नाखून.दांतों का उपयोग पहले करेंगी। इनकी वासना सुप्त रहती है और जागी तो बस कच्चा चबाकर खा जाने की मुद्रा में आ जाती है। गर्भवती या प्रसूता होने का समय भाद्रपद ;अगस्त.सितम्बरद्ध प्रायः ग्रीष्म में होती है। इस राशि की महिला का सैक्स अत्यन्त प्रबल होता है। पति को भी अपने ष्अन्दरष् रखने की जबर्दस्त इच्छा होती है और जब भी मौका मिलता हैए धर दबोचती है। अपने क्रूर स्वभावए लिंग नर होने के कारण इस राशि की महिला अत्यन्त उग्र होती है। तृप्ति न होने पर यह गुस्से से भर जाती है और हाथ.पैर पटकती हैंए अशक्त पति की यह पिटाई भी कर देती है। इस राशि की महिला प्यार बहुत गहरा करती है। प्रर्दशन नहीं करती है। स्वभाव से जिद्दी और हठी होती है। अपनी बात से पीछे नहीं हटती है। इस कारण कलह शांत नहीं हो पाता। इस राशि की महिला को यदि वश में कर लिया तो जीवन.भर वफादार रहती है और पति के लिये जान भी दे देती है। सती हो जाती है।इस राशि के जातकों की कामोत्तेजना का केन्द्र पेट है। प्रायः गुदगुदी से इनको कामोत्तेजना होने लगती है। इनकी कमर दोनों ओर से पकड़कर मैथुन करने से इनको सुख मिलता है। जाति से क्षत्रिय और स्थिर गुण के कारण एक आसन में ही घोर युद्ध करना इनका स्वभाव है। चतुष्पदी राशि होने से पशुवत् आसन में मैथुन प्रिय होता है। विभिन्न प्रकार के आसन बदलते हुए क्रिया करने से नफरत करते है। उकडूं बैठना बहुत प्रिय है। इस राशि का पुरूष बैठकर ही क्रियारत होना पसन्द करता हैं। क्रिया के दौरान यदा.कदा सिंह के समान गुर्राने के स्वर अवश्य निकालते हैं। चरम सीमा पर अचानक ध्वनियां करते हैं। इस राशि का मैथुन सबसे अधिक ध्वनिमय होता है। निवास पर्वत की गुफा होने के कारण एकदम गुफा जैसा स्थान अंधकारए खिड़की.दरवाजे सब बन्द होए तब इसको सुख मिलता है। दक्षिण की ओर मुख करके इनको विशेष सुख मिलता है। सांसे कम से कम लेते हैं। हिलना.डुलना पसन्द नहीं हैंए बस एक सुर में प्रबल रूप से क्रियारत रहते हैं। यह शीघ्र उत्तेजित होता है और स्त्री को देखकर यकायक टूट पड़ता है। इसकी पत्नी तक नहीं भांप पाती कि यह कब यकायक टूट पड़ेगा और झपाटे से तोड़कर रख देगा। हौले.हौले या धैर्य का यह व्यवहार नहीं करताए इसका झपट्टा शेर के समान होता है। यह अपना मैथुन हमेशा बलात्कार से शुरू करता है। अपने नक्षत्रों के कारण प्रबल भोगी और क्रूर होता है। वैसे यह जितेन्द्रिय होता हैए मैथुन कम करता हैए किन्तु जब करता है तो छक्के छुड़ा देता है। प्रायः इस राशि के जातक नोंच.खसोट करते हैं। इस राशि के जातक ही मैथुन में सबसे अधिक नख.दंत क्षत होते हैं। पहलेए दौरान या अंत में यह विशेष लाड़.प्यार नहीं करते। शिकार कियाए झपट्टे से चबाया और फेंक दिया। यह तुरन्त अलग हो जाया करते हैं। क्षत्रिय स्वभाव के कारण ष्खून.खराबाष् अवश्य करेंगे। स्वच्छता प्रिय है। प्रकृतिसम्मत क्रियाओं के अतिरिक्त अन्य प्रकार की क्रियाओं में इनकी रूचि नहीं होती है। पेटू होने के कारण बिना खाये.पीये यह मैथुन नहीं करते हैं। मैथुन के उपरान्त कुछ न कुछ खाना इसका स्वभाव है। इस राशि का पुरूष उन्नतए बलवान तथा चौड़े ललाट वाला होता है। स्वभाव अत्यन्त क्रोधी और हिंसक होता है। शीर्षोदय राषि के कारण समलैंगिक या अप्राकृतिक मैथुन से सर्वथा दूर रहता है। कामुक नहीं होता है। काम जागने पर यह अपनी पत्नी की हड्डियां चबाकर फेंक देता है। प्रेम अत्यन्त प्रगाढ़ होता है। दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करता हैए परिवार के सभी सदस्यों पर अपना रूआब रखता है। इन्द्रिय लम्बी और आगे से नुकीली होती है। काम.क्रिया में अधिक समय लगता है। शीर्षोदय राशि के कारण मुंह पर सब बोल देता है। पीठ.पीछे कुछ नहीं कहता। निडर होकर बात कह देता है। सन्तान का बड़ा ख्याल रखता हैए अपने बच्चों के पीछे वह मरने.मारने को तैयार हो जाता है। अत्यन्त साहसी और कठोर परिश्रमी होता है। पेटू होने से खाता खूब है। आंखों के कोने प्रायः लाल रहते हैं। स्वाद कटू होने से जातकों को कटू पदार्थ अच्छे लगते हैं। बोलना भी बहुत कडुवा है। सबसे ऊपरए सब पर अपना रंग जमाकर रखना चाहता है। अंक 1 होने से हमेशा जुआए सट्टाए लाटरी जीतता है। इसको घाटा नहीं होता है। प्रेम.पत्र स्पष्ट और शुष्क होते हैं। सन्तान अधिक से अधिक उत्पन्न करता है। इस राशि की महिलाएं दबंग होती हैए गुण्ड़ों.बदमाशों को पीट देती हैं। सिंह राशि का सैक्सए दाम्पत्य जीवन और सन्तान सब कुछ शानदार होता है। जीवन के मध्याह्न काल में इनका विवाह अवश्य हो जाता है। अवैध सम्बन्ध के मामले में यह कम रूचि रखता है। एक ही शिकार से अपना पेट भर लेता है। वृद्धावस्था में भी यह नहीं मानता। अपने मरने तक इसमें सैक्स भरा रहता है। इस राशि की महिला का मासिक धर्म 55.56 की उमर तक बना रहता हैस
 
 
राशि और सैक्स .कर्क राशि

कर्क : कर्क राशि वाले लोग बहुत ज्‍यादा भावुक एवं मानसिक तौर पर संवेदनशील होने की वजह से यौन क्रियाओं का सुख उठाने में पीछे रह जाते हैं। ये काफी मूडी होते हैं। ये अपने पार्टनर की संतुष्टि से ज्‍यादा अपनी संतुष्टि पर ध्‍यान देते हैं। यही कारण है कि इनकी सेक्‍स लाइफ नीरस होती है। हां अगर ये मूड में आ जायें तो यौन सुख देने में सबसे आगे रहते हैं।कर्क का अर्थ हैए ष्केकड़ा इस राशि वाले केकड़े के समान हृष्ट.पुष्ट होता है और स्वभाव भी ष्मोटी खालष् वालाए बकते.चीखते रहियेए उनपर कोई असर नहीं होगा। परले सिरे के बेशर्मए लड़की छेड़ेंगेए गालियां देंगीए चप्पल लेकर दौड़ेंगीए किन्तु इस राशि का आवारा युवक हंसता रहंगा और जूते खाकर भी नहीं मानेगा। सहनशीलता गजब की होती है। इस राशि वाली महिलाएं आसानी से सेक्‍स के प्रति उत्‍तेजित नहीं होतीं। सेक्‍स के प्रति सबसे संवेदनशील भाग उनके वक्ष होते हैं। उनके वक्षों को स्‍पर्श कर आप उन्‍हें संभोग के लिए आसानी से प्रेरित कर सकते हैं। के साथ मैथुन करिये या कठोरतम बलात्कारए ष्उफष् तक नहीं करेगीए सब बरदाश्त कर जायेंगी। बुरा लगेगाए पीड़ा सहन कर लेंगीए बोलेंगी नहीं। झगड़ा होए पति बेतरह पीटेए सब बरदाश्त कर लेंगीए खून का घूंट पीकर रह जायेंगी। अपनी मर्जी के बिना यह टस से मस नहीं होती। ज्योतिष में यह राशि चर ;चलायमानद्ध हैए तत्त्व जलए पृष्ठोदय उदयए लिंग स्त्रीए रंग गुलाबीए दिशा दक्षिणए अंक 2। ग्रह स्वामी चन्द्रमा जाति ब्राह्मण ऋतु वर्षा रत्न मोती स्वाद लवण धातु अस्थि और वीर्य आकार गोल शरीर में स्थान हृदय है तथा कीट में गणना होती है। ग्रहाधिपति देवता पार्वती है।लिंग स्त्री होने के बावजूद इस राशि के पुरूषों में पौरूष और स्त्रियों में सहनशक्ति गजब की होती है। इस राशि के पुरूष का शरीर नाजुक होता हैए किन्तु पंजा मजबूत। स्त्रियों की चाल में मस्ती होती है। इस राशि के स्त्री.पुरूषों को गृहस्थ जीवन बड़ा अच्छा लगता है। अपने गृहस्थ जीवन के अनुभव लोगों को सुनाया करते हैं। प्रायः इनका गृहस्थ जीवन सुखमय होता है। घूमने.फिरने का बड़ा शौक होता है।यह चलायमान ;चरद्ध राशि होने के कारण चंचलए केंकड़ा होने के कारण कठोरतम मैथुन प्रिय होता है और रात्रि बली ;पृष्ठोदयद्ध होने के कारण मैथुन हमेशा अन्धकार में करना पसन्द करते हैं। पद इसका कीट हैए अतएव रेंगकर ;लम्बा होकरद्ध मैथुन करना पसन्द करते हैं। कीट में गणना के कारण सभी प्रकार के चलायमान मैथुन सभी आसनों में करना स्वभाव होता है। मैथुन करते समय कीट ;पतंगोंद्ध के समान भुनभुनाते या सांस छोड़ते हैं। अत्यन्त क्रूर.कठोरतम मैथुन होता है। इस राशि के पुरूष के मैथुन से स्त्री पनाह मांगती है और स्त्री से पुरूष को पसीना आ जाता है। इसे सन्तुष्ट करना लोहे के चने चबाने जैसा है। जाति ब्राह्मण होने के बावजूद अपने स्वभाव कीट होने के कारण साफ.सफाई के साथ संभोग नहीं होता है। गन्दे ढ़ग से प्रायः मैथुन करता है। मैथुन के समय गति केकड़े के समानए किन्तु अत्यन्त कठोर होती है। अपनी चंचलता तथा कठोरता के कारण विपरीत लिंगी का कचुमर निकाल देते हैं। अंधकार इनको प्रिय होता है और मैथुन करते समय ध्वनि नहीं करते हैं। इनकी धड़कने चरम सीमा पर होती है और हांफते बहुत हैं। इनका मैथुन पूर्ण तृप्तिदायक होता है। अपने नक्षत्रों के कारण इस कार्य में क्रूरए भोगी और हर प्रकार से रूचि रखते हैं। इस राशि के जातक इस क्रिया के दौरान अपनी गरदन सिकोड़ते या चलायमान अवश्य करते हैंए यह इनका एक विशेष गुण होता है। अपने तत्त्व के जल के कारण विशेष गरम नहीं होती है ओर पसीना कम निकलता है। मैथुन करते समय यह जरा सी बात पर चिढ़ जाते हैं। क्रिया रोक देते हैं। किसी प्रकार का व्यवधान इनको पसन्द नहीं हैं। मैथुन से पूर्वए मैथुन के समय या बाद में कुछ न कुछ खाने.पीने की इनकी आदत होती है। मुंह चलता रहता है। इनमें स्तम्भन शक्ति ज्यादा होती है। प्रायः शरीर सिकोड़कर केकड़े के समान आकृति बनाकर यह सम्भोग करते हैं। बीच बीच में रूक जाया करते हैं। इस क्रिया में सबसे अधिक समय इस राशि के जातकों को ही लगता हैं। इस राशि के जातक प्रायः भावुक बेहद होते हैं। मैथुन करते समय अन्य भावुकता भरी क्रियाएं और खूब प्यार करते हैं। प्यार से अपने प्रिय को तर.बतर कर देते हैं। स्खलन इनका कम मात्रा में होता हैंए यह बिना रूके होता है और मैथुन के उपरान्त भी यह शीघ्र अलग नहीं होते। स्खलित होकर उसी अवस्था में देर तक पड़े रहते हैं। सामान्य तौर पर इनका दाम्पत्य जीवन का यह पक्ष मधुर होता हैए पर क्रोधी स्वभाव के कारण मन उखड़ गया तो फिर कई दिनों तक मैथुन नहीं करते हैं। दाम्पत्य जीवन सामान्यतः सुखमय होता हैए किन्तु अपनी इस ष्कामलीलाष् के कारण कभी.कभी तनाव या तलाक जैसी स्थिति भी इसी राशि में सबसे ज्यादा होती है।दक्षिण दिशा में मुख करके मैथुन कर इस राशि के जातक और भी सुख उठा सकते हैं। इसकी काम वासना का समय सबसे अधिक श्रावण मास ;जुलाई.अगस्तद्ध है। इसी माह में प्रायः गर्भाधान.प्रसव करती है। अपने ग्रह देवता चन्द्रमा के प्रभाव के कारण शुक्ल पक्ष में काम वासना अधिक हो जाती है। स्त्रियां विशेष रूप से पूर्णिमा की रात बहुत बेचैन रहती है। इसकी कामात्तेजना और स्खलन के बिन्दु स्तन हैं। उनका मर्दन.चुम्बनए पान इसको उत्तेजना देता है और स्खलित करा देते हैं। निवास तालाबए झील होने के कारण इस राशि के जातक नदी या जलाशय के पास बसे आवासए नगर आदि में अत्यन्त सुख का अनुभव करते हैं। ऐसे स्थानों पर इस राशि की महिलाओं में भी का वासना अधिक होती है। गुलाबी रंग से उत्तेजना मिलती है। इस राशि की स्त्रियां वर्षा ऋतु में प्रायः गर्भाधान करती है। इनको मीठी वस्तुएं कम पसन्द आती है। प्रायः जातक के चेहरे गोल हुआ करते हैं। स्त्रियों के स्त्री अंग तथा स्तन भी गोलाकार होंते हैं। लम्बाई कम से कम होती है। पुरूषेन्द्रिय में कठोरता ज्यादा होती है। इस राशि की महिलाओं के चेहरे पर लावण्य अवश्य होता है। कुशल गृहिणी होती है। इस राशि के जातक बहुत गहरा प्यार करते हैंए यह प्यार अन्त तक निभाते हैं। आपस में तनाव बढ़ता है तो कई दिनों तक बात नहीं करते हैं। सन्तान अधिक उत्पन्न करते हैं और सन्तान के प्रति यह बहुत ध्यान रखते हैं।प्रेम के मामले में यह पक्के होते हैं और निभाते हैंए किन्तु इनके प्रेम प्रायः असफल होते हैं। बाहर से शांत दिखते हैंए अन्दर से बहुत भावुक होते हैं। संवेदनशीलता ज्यादा होती है। इनके प्रेम पत्र कभी बहुत प्रिय कभी बहुत कठोर होते हैं। अप्राकृतिक मैथुन इस राशि को अप्रिय लगता है।

 राशि और सैक्स . मिथुन राशि


इस राशि का ग्रह बुध माना गया है। अधिपति देवता विष्णु है। लिंग पुरूष है। राषि उभयोदय हैए तत्व आकाशए स्वभाव द्विस्वभावए रंग हराए निवास गांव या शयन कक्ष आकार त्रिभुजए दिशा दक्षिण पूर्व है। ऋतु शरद रत्न पन्ना प्रकृत्ति पित्त स्वाद अम्ल और मिश्रित रक्त और वीर्य धातु मूत्र मिश्र संज्जक है। वेद अथर्ववेद जाति वैश्य है। खगोल विज्ञान के अनुसार बुध को सूर्य का निकटतम ग्रह माना गया है। तापमान 770 डिग्री फारेनहाइट है। इसकी परिक्रमा गति सबसे तेज है। इस ग्रह पर पृथ्वी से 8 गुना अधिक धूप पड़ती है। इस राशि का जो खंड सौरमण्डल में हैए उसमें ऐसा प्रतीत होता हैए मानो एक आकृति वीणावादन कर रही है और दूसरी उसे ध्यान से सुन रही है। उक्त गुणों से ही इस राशि के जातकों का विवाह और दाम्पत्य जीवन और सैक्स का पता लग जाता है। मेष और वृष राशि की भांति इनका विवाह शीघ्र हो जाता हैए किन्तु इस राशि के पुरूषों में स्त्रीत्व अधिक और स्त्रियों में पुरूषत्व अधिक होता है। मिथुन : जेमिनी हमेशा सेक्‍सुअली एक्टिव होते हैं। संभोग के दौरान पार्टनर से बातें करना इन्‍हें पसंद होता है। ये हमेशा संभोग के लिए तैयार रहते हैं। चरमसीमा तक पहुंचने में भी ये काफी माहिर होते हैं। इन्‍हें उत्तेजित करना भी काफी आसान होता है। एक से अधिक लोगों के साथ यौन संबंध बनना काफी आम होता है। ये अपने पार्टनर को संतुष्‍ट करना अच्‍छी तरह जानते हैं। मिथुन: मिथुन राशि वाली महिलाओं के हाथ, खास तौर से हथेली काफी संवेदनशील होती हैं। उनकी उंगलियों, हथेली, हाथ पर चुंबन लेने से वो सेक्‍स के प्रति आसानी से उत्‍तेजित हो उजाती हैं। उनकी उंगलियों को मुंह में चूसना, उंगलियों से फोर प्‍ले करना और उनके कंधों पर चुंबन लेना उन्‍हें तेजी से उत्‍तेजित करता है। अधिकांश के दाढ़ी.मूंछ होते ही नहीं या वहां पर केवल रोम होते हैं। इस राशि के पुरूष ही प्रायः हिंजड़ा बनता है। पुरूषेन्द्रिय प्रायः अशक्तए लघुए पतली तथा सामान्य लम्बी होती है। स्त्री अंग त्रिकोण के समान होता हैए नीचे से संकरा और ऊपर की ओर शनैः.शनैः बढ़ता जाता है। स्तन भी प्रायः त्रिभुजाकार होते हैं। इनका शरीर सामान्यतः सन्तुलित होता है। स्त्री की आंखों में लालिमा अधिक होती है। इस राशि की स्त्रियों में ही पुरूष की अपेक्षा आठ गुना अधिक कामाग्नि होती है। इनका विवाहित जीवन प्रचण्ड कामतुष्टि के साथ साथ हमेशा वाद.विवादमय रहता है। इस राशि का उत्तेजना केन्द्र गले और बांहों में कहीं भी हो सकता है। बांहें सहलानेए दबानेए या पकड़ने से इनको सुख मिलता है और उत्तेजित होते हैं। द्विस्वभाव के कारण एक बात पर टिक नहीं पाते हैं। इस राशि के जातक का मैथुन अत्यन्त चंचल है। मैथुन के दौरान पल.पल स्थिति बदलते रहते हैं। उभयोदय राशि के कारण एक दिशा से नहींए उपदिशाए उलट पलट मैथुन इनका स्वभाव होता है। दिवा.रात्री बली होने के कारण दिन.रात कभी भी इनको मैथुन से सुख ही मिलता है। शयनकक्ष में बिस्तर जरूरी है। यह कुछ.न.कुछ बिछा जरूर लेते हैं। नंगी पृथ्वी पर मैथुन करना पसन्द नहीं है। इनकी कामवासना मेष.वृषभ से ज्यादा होती है। दक्षिण.पूर्व दिशा में मुख करके सम्भोग करने से अपने सुख को बढ़ा सकते हैं। इस राशि का जातक मौन मिथुन नहीं करता। ;आकृति गुणद्ध इसके मैथुन में नाना प्रकार की ध्वनियोंए सीत्कारेंए थपथपाहट होती है ताकि राशि गुण ;शयनकक्षए गांवद्ध होने से ;गांव वाले दूसरे लोग भी सुन लेंद्ध प्रभाव पड़ता है। व्यर्थ ध्वनियां बेहद करते हैंए जो सरलता से सुनायी पड़ जाती है। प्रारम्भिक क्रिया के दौरानए अन्त में इनका प्रेमालापए प्रेम क्रियाएं चलती रहती है। निवास शयनकक्षए गाँव होने से यह शयनकक्ष में या कहीं भी मैथुन कर सकता है। इनको इस बात की चिन्ता नहीं होती है कि कोई देख रहा है। इसके लिये लोकलाज नहीं के बराबर होती है। यह अपनी प्रेमिका ध् प्रेमीए पत्नी ध् पति से बहुत प्यार करते हैं और बड़ी भावुकता के साथ प्यार करते हैं। जल्दी छोड़ते नहीं हैं। मैथुन प्रेमालाप के समय के मध्य आंसूए मुस्कान का मेल बराबर होता है। अभी आंसू बहायाए अगले पल मुस्करायाय इनको सन्तोष नहीं होता। यह विवाह के प्रारम्भिक दिनों में रात.दिन मिलाकर चार.पाँच.सात बार भोग कर डालते हैं। सबके देखते देखते दरवाजा बंद कर क्रिया शुरू कर देंगे। इनको यह अहसास नहीं होता कि परिवार के अन्य सदस्य क्या सोच रहे होंगे। निर्लज्जता इनके मैथुन का गुण है।तत्त्व आकाश हैए कल्पनायें ज्यादा करते हैं। जाति वैश्य होने से सैक्स में भी सौदेबाजी करते हैंए पहले यह करोए तब इच्छा पूर्ति होगी. इनकी साधारण आदत होती है। जब भी कोई नयी वस्तु पत्नी ध् प्रेमिका को देंगेए उतने ही मूल्य काए ज्यादा कीमती होने पर कठोर और देर तकए कम कीमती होने पर कुछ देरए साधारण मैथुन अवश्य करेंगे। उसी दिन अपना मूल्य वसूल लेंगेए छोड़ने वाले नहीं हैं। वेश्यागामी होने पर पूरी कीमत उसके शरीर से वसूल लेंगे।इनकी गति तेज होती हैं। मैथुन भी तेजी से करना कराना पसन्द करते हैं। इस राशि की स्त्रियां जून.जुलाई माह में विशेष रूप से गर्भवती होती है। रंग हरा होने के कारण यह सावन के अंधे की तरह हर जगह हरियाली ही देखते हैं। इस कारण प्रायः इनका प्रेम असफल रहता है। कल्पना खूब कर लेते हैंए हाथ नहीं लगा पाते। निवास शयन कक्ष है। अतएव रसिक बातें खूब करते है और मैथुन चर्चा में बड़ा आनन्द पाते हैं।इस राशि का दाम्पत्य जीवन कहा सुनी से भरा होने के बाद भी निभ जाता है। क्षण में माशा क्षण में तोला। इस राषि की स्त्रियां अत्यन्त भावुक होती है। इस राशि के जातकों के गुप्त सम्बन्ध प्रायः प्रकट हो जाते हैं। इनके प्रेम पत्र अत्यन्त लम्बे और खूब भावुकता पूर्ण होते हैं। प्रेमपत्रों में मैथुन.चर्चा अवश्य लिखते हैं। ष्तुम्हें बहुत.बहुत प्यारष् के स्थान पर ष्चुम्बनष् लिखना और संभोग की बातें करना जरूर रहता है।सन्तान के प्रति इनका व्यवहार बड़ा भावुकता पूर्ण होता है। उनको अनुशासन में नहीं रख पाते और प्रायः लाड़.प्यार में बिगाड़ दिया करते हैं। इनको सन्तान कम होती है। गुप्त रोग कम होते हैं। यह गर्भ के दिन पूरे होने पर भी संभोग करने से नहीं मानते हैं। प्रेम में अपनी भावुकता के कारण घर से भागनाए आत्महत्या करनाए परिवार की नेक सलाह को ठुकराना इनकी विषेषता है। इस राशि के जातकों का चरित्र प्रायः संदिग्ध दृष्टि से समाज में देखा जाता है।काफी उमर तक यह भोगी होते हैं। इस राशि की स्त्रियों का मासिक धर्म 48ध्52 के आसपास तक सक्रिय होता है। पुरूष 60ध्65 तक क्रियाशील रहता है। प्रायः इस राशि की महिला अपने पति को अपना उत्तेजना केन्द्र बतला देती है। आमतौर पर इसका दाम्पत्य जीवन सुखद होता हैए पर कामुकता के कारण दूसरा पक्ष यदा.कदा बहुत घबरा जाता है और कलह की गुंजाइश हो जाती है। इस राशि के जातक की सन्तान भी ज्यादा होती है।

राशि और सैक्स . वृष राशि


इस राशि की आकृति बैल के समान है। इस राशि के जातक में ज्येष्ठ ;मई.जूनद्ध में अधिक वासना रहती है। वृषभ: वृषभ राशि वाली महिलाओं की गर्दन सेक्‍स के प्रति काफी संवेदनशील होती है। यदि आप उन्‍हें सेक्‍स के प्रति उत्‍तेजित करना चाहते हैं तो उनकी गर्दन पर चुंबन से शुरुआत करें। यदि आप उन्‍हें एक सुंदर हार तोहफे में देते हैं, तो वो आपकी तरफ खिंची चली आयेंगी।स्त्रियों में गर्भाधान या प्रसव का यही समय है। इस राशि के जातकों के चेहरे प्रायः कांतिवान होते हैं। रूपरंग विशेष न होने के बावजूद चेहरा मोहक होता है। इस राशि के पुरूषांग बैल के समान होता है। स्त्री अंग आम के पत्ते के समान होता है। वृषभ : संभोग के दौरान वृषभ राशि वाले सेक्स की चरम सीमा तक काफी देर से पहुंचते हैं। यदि आप अचानक इन्‍हें सेक्स के लिए उत्तेजित करना चाहें तो भी ये उत्तेजित नहीं होते। इन्‍हें संभोग से पहले फोरप्‍ले व ओरल सेक्‍स पसंद होता है। चुंबन में ये काफी एक्‍सपर्ट होते हैं। इन्‍हें सेक्स के लिए मनाना काफी कठिन होता है।इस राशि के स्त्री.पुरूष विशेष सुन्दर नहीं होते हैंए किन्तु इनके जीवन साथी प्रायः सुन्दर मिलते हैं। सन्तानवान् होते हैं। जीवन साथी के प्रति वफादार होते हैं। कामुकता ज्यादा होती हैए किन्तु प्रेम स्थायी होता है।यह एक स्थिर राशि हैए इस कारण इस राशि के जातक स्थिर भाव से मैथुन करते हैंए बार.बार आसन नहीं बदलते। रात्रिबली राशि होने से रात्री में ही सम्भोग करना इसे अच्छा लगता है। निवास स्थान खेत या मैदान होने के कारण इनको खुले में ज्यादा सुख मिलता हैए कमरे की खिड़की आदि अवश्य खुली रखेंगे। तत्त्व पृथ्वी होने से बिस्तर पर कमए जमीनए फर्श पर अथवा नंगी भूमि पर इनको विशेष सुख मिलता है।इस राशि के जातक का उत्तेजना केन्द्र चेहरे या गले में कहीं भी हो सकता है। प्रायः कंधे पर दाँतों का प्रयोग विशेष प्रिय है। इस राशि का पुरूष प्रायः इस क्रिया में अपनी पत्नी के कंधों को मजबूती से पकड़ता है। चुम्बन प्रयोग से जिस स्थान के स्पर्श से जातक आकुल.व्याकुल हो जाये वही उत्तेजना स्थल हो सकता है। प्रायः इस राशि की स्त्रियों के कुचाग्र चूसने पर यह शीघ्र उत्तेजित और स्खलित हो जाती है।राशि ब्राह्मण होने के कारण उसकी क्रिया शांतए हौले.हौले चलती है। मारकाट या युद्ध वाली स्थिति नहीं रहा करती है। मेष राशि के ही समान इस राशि को अपनी दिशा पूर्व की ओर मुख करके इस कार्य को करना चाहिये। इस राशि के जातकों को चतुष्पद जीवन अत्यन्त प्रिय होता है। इनका यह कर्म बड़ा प्यार और धीमी गति से ;बैल गतिद्ध चलता है। पहलेए क्रिया के दौरान और अन्त में आलिंगन.चुम्बन बराबर करते हैं। इस राशि के जातक के नथुने क्रियारत दशा में तेजी के साथ फूलते.पिचकते हैं। साथ ही यह लम्बी.लम्बी सांसें छोड़ते हैं। बैल का यह गुण अवश्य होता है। वह शांति और धैर्य के साथ मैथुन करते हैं। स्तम्भन शक्ति क्षीण होती है। स्तम्भन शक्ति की क्षीणता के कारण पुरूष बार बार मैथुन करने का आदी होता है। इस राशि के जातकों की स्खलन की मात्रा भी रूक.रूककर अधिक होती है।नक्षत्र गुण ;कृतिकाए रोहिणी व मृगशिराद्ध चंचलताए किन्तु सुन्दरता के साथए धैर्य के साथ क्रिया करते हैं। कृतिका के ;3 चरणद्ध के कारण इनकी क्रिया में थोड़ी अशुचिता ;मेष से कुछ अधिकद्ध होती है। इसके बावजूद यह पवित्रता का ध्यान रखते हैं। इस राशि के पुरूष को अपने पौरूष बड़ा घमण्ड होता है तथा अपने मित्रों के सम्मुख अपना पौरूष खुब बढ़ा.चढ़ाकर बतलाता है। इस राशि की स्त्री भी अपने पति के गुण बढ़ा.चढ़ाकर सहेलियों को बतलाती है।इस राशि के जातक गुप्तेन्द्रिय और मुख का प्रायः सम्बन्ध बना लेते हैंए यह इनकी आकृति का स्वभाव है। यह सहजता के साथ इस क्रिया को करते हैं। सामान्यतः यह परस्पर पूर्ण तृप्त होकर ही विलग होते हैं। भिन्न राशि से मिलन के बावजूद इस राशि का दूसरी राशि का चतुराई के साथ मेल बैठ जाता है।दाम्पत्य जीवन के सुख में बाधा नहीं पड़ने देते हैं। अधिकतर परस्त्रीगामी होते हैं। विवाहित स्त्रियों की ओर इनका विशेष झुकाव होता है। यह कलह और शौर.शराबे से दूर रहते हैं। विलासिता की वस्तुओं के प्रति इनके मन में बड़ा लगाव होता है। बनाव श्रृगांर इनको विशेष प्रिय होता है। मनोरंजन में इनका बड़ा मन लगता है। तांक.झांक करने और निरर्थक सुन्दर स्त्रियों का पीछा करने की इनको आदत होती है। अवैध सम्बन्ध अत्यन्त सावधानी के साथ करते हैं। अपयश से बचते हैं।इस राशि के स्त्री.पुरूषों को नाच गाने में विशेष रूचि रखते हैं। इस गुण का उपयोग यह सम्भोग से पूर्व अथवा दौरान अवश्य करते हैं। ऐसे अवसर पर इनको संगीतमय वातावरण विशेष प्रिय होता है। इस राशि का मैथुन जीवन प्रायः सुखद रहता है। पत्नी इस राशि के पुरूष से संतुष्ट रहती है और स्त्री वृष होए पुरूष अन्य राशि का हो तो अपना तालमेल बैठा लेती हैं। अनुकूल बना लेना इस राशि का स्वभाव है। लिंग से यह स्त्री राशि हैए किन्तु अपने में पूरा पौरूष रखती है।इस राषि की महिलाओं के स्तन बैल के सीगों के समान नुकीले और ऊर्ध्वगामी होते हैं। कमर विशेषतः मोटी होती है। पनीली आंखें इनकी विषेषता है। बनाव श्रृगांर में सबसे अधिक समय लगता है। अशुभ प्रभाव में हो तो विवाहित पुरूष या अपने से कम आयु के युवक के साथ सम्बन्ध इनको रूचिकर लगता है अन्यथा पति के प्रति वफादार होती हैं। इनका काम उग्र होता है। घर गृहस्थी के कामों में कुशल तथा अधिकतर नौकरीपैशा होती हैं। पुरूषों की तरह उपार्जन करना इनका विशेष गुण होता है। अधिकतर स्वभाव उग्र होता है और हाथ उठाने में पहल करती हैं। विशेष चिन्ह् या प्रभाव न हो तो यावज्जीवन पति को सुख देती हैं। अधिकतर पुत्र पैदा करती है। कन्याओं की संख्या कम होती है।अपने परिश्रम और रूचि से इस राशि की महिलाएं घर को स्वर्ग बना देती है। इस राशि की महिलाओं के चरण शुभ माने गये हैं। यह विवाह के बाद ससुराल का कायाकल्प कर देती है। इस राशि के पुरूषों में गजब का धैर्य और सहनशीलता होती है। प्रसव के समय स्त्री और संकट के समय पुरूष अत्यन्त साहस से काम लेते हैं।पुरूषों को गुर्दों का रोग होता है। गुप्त रोग विशेष रूप से होता है। धातु दौर्बल्यए मूत्ररोग प्रमुख होते हैं। महिलाओं को मुहांसों की बीमारी ज्यादातर होती है। माहवारी अक्सर अनियमित होती है। उदर पीड़ाए शूलए गले और नैत्रए नाक के रोग प्रायः होते हैं। इससे इनका सैक्स दुर्बल होता है। इस राशि की महिलायें मैथुन में प्रायः कम रूचि रखती हैं। सहजता से तैयार हो जाती हैंए किन्तु उसमें रस नहीं लेती। सहजता के साथ अपनी दिनचर्या मान लेती हैं। रसिकता भरी बातों में इनको कोई रूचि नहीं होती। इनके प्रेम पत्र कामकाजी ज्यादा होते हैं। प्यार के उद्गार कम लिखा करती हैं। अपने श्रृगांर के प्रति सतर्क रहती हैं। किसी के यहां शोक प्रकट करने जाने के समय भी बन संवर कर जाना नहीं भूलेंगी।अपने सन्तान के प्रति बहुत ममता होती है। प्रौढावस्था में उत्पन्न पुत्र से इस राशि के जातकों को विशेष लगाव होता है। यह इनकी भाग्यशाली सन्तान होती है। अपने उग्र स्वभावए हठवादिता और कामुकता के बावजूद दोनों का दाम्पत्य जीवन निभ जाता है। इस राशि की महिलाएं बहुत कम तलाक या दूसरी शादी जैसी स्थिति से गुजरती हैं। यह पति का साथ निभा ले जाती है।
 
राशि और सैक्स . मेष राशि

मेष: मेष राशि वाली महिलाओं का माथा और मुख काफी संवेदनशील होता है। इन जगहों पर चुंबन लेने से वो सेक्स के प्रति काफी जल्‍दी उत्‍तेजित हो जाती हैं। उनके बालों पर धीरे-धेरी स्‍पर्श, उनके होठों व गाल पर चुंबन और कान पर स्‍पर्श उन्‍हें सेक्स के प्रति उत्‍तेजित करता है।इस राशि के पुरूष की इन्द्रिय भेड़ के समान होती है। स्त्री अंग आंवले के आकार का होता है। इस राशि की महिलाओं का चेहरा अधिक लम्बोतरा होता है। इसके स्तन भेड़ के खुर के समान फैले चकले होते हैं। उनमें उठान नहीं होता है। कमर अधिकतर स्थुल होती है। पुरूष ज्यादातर लम्बे.चौड़ेए स्वस्थ होते हैं। इनका विवाह प्रायः शीघ्र हो जाता है। यह रूक रूक कर समागम करते हैंए प्रायः पुरूष होते हैं। मेष राशि वाले काफी हॉट एवं कामुक होते हैं। इन्हें ज्यादा लंबे समय तक सेक्स नहीं पसंद होता। कम समय में ज्यादा लुत्फ़ उठाने वाले इन लोगों में संभोग के दौरान एक अलग सी आग होती है। संभोग के लिए काफी जल्दी उत्तेजित भी हो जाते हैं। यदि इनका पार्टनर मेष राशि वाला हो तो प्यार का अहसास कई गुना बढ़ जाता है। स्वभाव में उग्रता के कारण दाम्पत्य जीवन में कलहए मारपीट प्रायः कर डालते हैं। इसके बावजूद भी इनका दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है। परिवार का ध्यान रखते हैं। पत्नी का साथ निभाते हैंए पर सौन्दर्य प्रेमी और स्त्रियों को आकर्षित करने की क्षमता के कारण प्रायः अवैध सम्बन्ध बनाये रखते हैं। इस राशि की स्त्रियों को यदि नियन्त्रण में नहीं रखा जाये तो प्रायः पथ.भ्रष्ट हो जाती हैं। सौन्दर्य प्रियता और कला के प्रति इनके रूझान होने के कारण इनको सरलता से बहकाया जा सकता है। अधिक देर तक मैथुन इनको अच्छा लगता है। इस राशि के स्त्री पुरूष प्रेम प्रसंग प्रायः गोपनीय रखते हैं। पृष्ठोदय राशि के कारण पीठ पीछे इनके दाम्पत्य जीवन और प्रेम प्रसंगों की लोग चर्चा करते हैंए किन्तु सामने कोई नहीं कहता। फिर यह भी गुप्त रूप से कार्य करते हैं। सतर्कता प्यारी होती है। इस राशि के जातक प्रेमपत्र बड़ी संयत और सतर्क भाषा में लिखे होते हैं। अवसर आने पर प्रेमपत्र प्रमाणित नहीं भी हो सकते हैं। प्रायः अपने इच्छित स्त्री.पुरूष से इनका प्रेम सम्बन्ध बन जाया करता है। प्रेम के मामले में ईर्ष्यालु भी होते हैं। प्रेम सम्बन्धी प्रकरणों में यह हिंसक भी हो सकते हैं। पृष्ठोदय राशि एवं गुणचार होने के कारण इनको पृष्ठ भाग से किया गया मैथुन प्रिय होता है। रात्रिबली राशि होने के कारण रात में ही मैथुन सुख अच्छा लगता है। दिन के समय किया गया मैथुन इसको अप्रिय हाता है। उसमें यह रस नहीं लेते। चर राशि होने से यह चलायमान अर्थात् चंचल होते हैं। इस राशि की स्त्री को शरीर आघातों द्वारा या कंधे पकड़करए निरन्तर स्तन मंथन करके हिलाते रहना चाहिये। इस राशि के पुरूष को भी इसी प्रकार की लीला में सुख मिलता है। इसी गुण के ;चरद्ध कारण इनका प्रेम किसी एक पर स्थिर नहीं रहता। इस राशि का निवास वन है अतः इसे सर्वथा एकान्त चाहिये। घर में कोई जागता रहेए भले ही न देख सके पर उसे इसका आभास होगा तो मन खट्टा हो जायेगा।जाति क्षत्रिय होने के कारण ष्लड़ाकुष् मैथुन प्रिय होता है। अपने सम्पूर्ण हथियारों के साथ एक.दूसरे पर हमला करना इनका विशेष गुण है। चतुष्पद राशि होने के कारण पशु आसन या पृष्ठ भाग से किया गया मैथुन अच्छा लगता है तथा तृप्ति अनुभव करते हैं। तत्व अग्नि होने के कारण काम दम्य रहते हैं तथा पसीना बहुत आता है। मंगल में जल है अतः यह ष्गीलेष् बहुत होते हैं अर्थात् क्षण में कामोत्तेजित हो जाते हैं और इनका स्खलन अधिक मात्रा में होता है। कृतिका नक्षत्र का केवल प्रथम चरण ;अद्ध होने के कारण इनका मैथुन कर्म बहुत कम विकृत होता हैं। प्रायः शुचिता का ध्यान रखते हैं। अश्विनी और भरणी के पूरे चारों चरण होने के कारण कुशलतापुर्वक और दृढ़ता के साथ मैथुन कर्म करते हैं। ग्रह अधिपति गणपति ;गणेशद्ध के कारण बड़ी ही चतुराई से कामसुख भोगते हैं। धातु मज्जा होने के कारण इस राशि के पुरूष स्त्री को गर्भवती शीघ्र बनाते हैं। उसमें शुक्राणु अधिक होते हैं। इस राशि का ललाट पर अधिकार होने से उत्तेजना केन्द्र ललाट हैए वैसे इस स्त्री को ललाट के अलावा अन्य स्थान ;पलकए कपोलए होंठए नाकए कानए बालए भौहें आदिद्ध पर भी हो सकते हैंए किन्तु चेहरे से नीचे नहीं। इस राशि की स्त्रियां यदि दशा अनुकूल हो तो प्रायः ग्रीष्म.ऋतु ;वैषाखय अप्रेल.मईद्ध में गर्भवती होती हैं। इसकी ऋतु ग्रीष्म हैए अतः इस मौसम में इनमें वासना की मात्रा अधिक होती है। प्रायः गर्भाधान व प्रसव का इस राशि की स्त्री का यही समय है।इस राशि की स्त्री के केशए रोम अगर शरीर पर हुए तो बहुत मुलायम होते हैं। आकृति भेड़ होने के कारण स्त्री की त्वचा सुचिक्कण होती है और क्रिया के समय भेड़ के समान सीधेपन का व्यवहार करती है। इस राशि की महिला को सम्भोग के समय धूम्रपान करना अच्छा नहीं लगता और न ही धूम्रपान करना पसन्द करती है। इस राशि के जातक का इन्द्रियज्ञान नैत्र हैए अतएव आँखों ही आँखों में यह बहुत कुछ कह डालते हैं। जिह्वा के बदले आँखों से अधिक काम लेते हैं। राशि की उच्चता के कारण अपने से अधिक श्रेष्ठ स्त्री.पुरूष की ओर विशेष झुकाव रखते हैं। आकार ढोल होने के कारण इस राशि की महिलाओं के नितम्ब बड़े होते हैं तथा पुरूषों की प्रायः तोंद निकल आती है। उमर के साथ कामुकता बढ़ती जाती है।इस राशि के जातक दोनों अश्लील वार्ता कम करते हैं और गम्भीरता ओढ़े रखते हैं। मैथुन से पूर्वए मैथुन के दौरान या उपरान्त किसी प्रकार के विकृत शब्द नहीं निकालतेए इनकी क्रिया सित्कारहीन होती हैए ध्वनी नहीं करते हैं। बन्द कमरे के बाहर कान लगाकर सुनना चाहें तो उसको आभास भी नहीं हो सकता है कि अन्दर क्या हो रहा है। इस क्रिया के पूर्व आलिंगन.चुम्बन भी प्रायः काम.चलाऊ ही करते हैं। समाप्ति पर चुपचाप हट जाते हैंए फिर कुछ ऐसा व्यवहार हो जाता है कि इस बात का अनुमान करना कठिन है कि अभी कुछ हुआ है। यह एकदम सामान्य हो जाते हैं।इस राशि की महिलाओं का मासिक धर्म 50 की उमर के बाद तक भी जारी रह सकता है। उन्हें प्रदर रोग आदि कम ही होते हैं। गुप्त रोग या यौन रोग प्रायः इनको नहीं होता।सन्तानों से बड़ा प्यार करते हैए अनुशासन इनको प्रिय होता है। फूहड़ हंसी.मजाक इनको अच्छे नहीं लगतेए किन्तु पेशाबघरोंए सार्वजनिक स्थानोंए रेल के डिब्बोंए सैलानी स्थानों आदि पर यह गंदे शब्द और चित्र बड़ी तेजी से लिख बना देते हैंए यह इनका विशेष स्वभाव होता है। इस राशि की महिलाओं को अधिक शब्द सुनकर कान बन्द कर लेने की आदत होती हैए किन्तु होठों पर मुस्कान होती है।

मनुष्य में काम वासना एक जन्मजात प्रवृति और वह इससे आजीवन प्रभावित -संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है किसी में ज्यादा हो सकता है । ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की व्यक्ति में काम भावना किस रूप में विद्यमान है और वह उसका प्रयोग किन क्षत्रों में कितने अंशों में कर रहा है ।

ज्योतिषीय परिभाषा के अनुसार जब किसी स्त्री या पुरुष की कुंडली में मंगल और शुक्र एक साथ एक ही घर में मौजूद हों तो ऐसे जातक में काम वासना की अधिकता होती है। इन दोनों ग्रहों की स्थिति यदि अत्यंत मजबूत हो तो यह काम वासना अत्यधिक तीव्रता वाली हो जाती है और जातक को खुद पर नियंत्रण रखना भी मुश्किल हो जाता है। आइए जानते मंगल-शुक्र की युति के बारे में और अधिक…

मंगल को अग्नि और तेज का प्रतीक माना गया है वैदिक ज्योतिष में मंगल को अग्नि और तेज का प्रतीक माना गया है। शरीर में रक्त पर मंगल का प्रभाव होता है। वहीं शुक्र सौंदर्य, प्रेम, वासना, काम, यौन इच्छा का प्रतिनिधि ग्रह होता है। जब इन दोनों ग्रहों का मिलन होता है तो इनके गुणधर्मों के अनुसार व्यक्ति में काम वासना बलवती हो जाती है। कुंडली के अलग-अलग भावों के अनुसार इनके फल में कम-ज्यादा हो सकता है, लेकिन मूलत: यह व्यक्ति को अत्यंत कामी बनाता है।ये होते हैं प्रभाव जब किसी जातक की जन्मकुंडली में मंगल और शुक्र एक साथ बैठे हों और दोनों ग्रह सामान्य अवस्था में हो तो जातक में यौन इच्छाएं तो अत्यंत प्रभावी होती हैं, लेकिन उसका उन इच्छाओं पर पूर्ण नियंत्रण होता है। यह परिस्थिति के अनुसार खुद को कंट्रोल कर सकता है। यदि मंगल और शुक्र एक साथ बैठे हों और दोनों अत्यंत प्रबल अवस्था में हो, बलवान हो तो व्यक्ति की काम वासना की भावना बहुत बलवती होती है। कई बार जातक अपनी वासना को नियंत्रित नहीं कर पाता मंगल ज्यादा प्रभावी हो और शुक्र कमजोर हो तो …यदि दोनों ग्रहों में से मंगल ज्यादा प्रभावी हो और शुक्र कमजोर हो तो जातक दुष्कर्मी भी बन सकता है, क्योंकि मंगल उसे अतिचारी बना देता है और व्यक्ति कैसे भी करके अपनी यौन इच्छा पूरी कर लेना चाहता है। ऐसी स्थिति में केवल यौन भावनाएं प्रबल होती हैं, प्रेम नहीं होता। यदि दोनों ग्रहों में से शुक्र ज्यादा प्रभावी हो और मंगल कमजोर हो तो जातक संतुलित, सधा हुआ और नियंत्रित यौन व्यवहार करता है। ऐसे व्यक्ति के लिए यौन भावनाएं दूसरे स्थान पर आती हैं, जबकि यह प्रेम को अधिक बल देता है। ऐसा व्यक्ति अपने पार्टनर की इच्छाओं को समझते हुए यौन संबंध बनाता है। मंगल-शुक्र दोनों संतुलित अवस्था में हो तो…जिस जातक की कुंडली में मंगल-शुक्र दोनों संतुलित अवस्था में हो तो उसके अनेक विपरीत लिंगी मित्र होते हैं और वह सबके साथ समान व्यवहार करता है। पुरुष की कुंडली में यह युति है तो उसकी महिला मित्र अधिक होंगी और स्त्री की कुंडली में इस युति के होने से उसके पुरुष मित्र अधिक होते हैं।

सेक्‍स संबंध बनाते वक्‍त महिलाएं किसी पुरुष से क्‍या चाहती हैं:

 यह हमेशा से ही शोध का विषय रहा है. इस पर पहले भी काफी कुछ लिखा जा चुका है. इसी मुद्दे पर ताजातरीन रिसर्च के नतीजे सामने आए हैं. सेक्‍स से जुड़े विषय के एक्‍सपर्ट्स के अलावा 700 से ज्‍यादा महिलाओं ने खुलकर अपने विचार व्‍यक्‍त किए हैं. महिलाएं बिस्‍तर पर क्‍या चाहती हैं मर्द से, जानिए वो 12 राज...

1. सिर्फ कामक्रीड़ा पर ही हो पूरा ध्‍यान

बिस्‍तर पर महिला पार्टनर की यौन-इच्‍छा को तृप्‍त करने के लिए सबसे जरूरी चीज है- ‘जज्‍बा’. सर्वे में शामिल करीब 42 फीसदी महिलाओं ने यह बात स्‍वीकार की है. महिलाएं कई तरीके से पुरुषों के प्‍यार को महसूस करती हैं, जिनमें सबसे ज्‍यादा इनका ध्‍यान खींचता है आपके मुंह से की गईं ‘शरारतें’. आंखों में आंखें डालकर प्‍यार जताना, होठों को संवेदनशील अंगों पर फिराना, किसी और तरीके से देह को छूना महिलाओं को भाता है. जीभ के अगले भाग से नाजुक अंगों का स्‍पर्श भी महिलाओं का मन मचलने के लिए काफी होता है.

2. फोरप्‍ले की अहमियत सबसे ज्‍यादा

कामक्रीड़ा का असली मजा सिर्फ चरम तक पहुंचने पर ही नहीं है, बल्कि इसके हर पल का भरपूर आनंद लेना चाहिए. फोरप्‍ले भी इसका अहम पार्ट है, जिसका अपना मजा है. सर्वे में शामिल महिलाओं ने माना कि फोरप्‍ले के दौरान होने वाली उत्तेजना एकदम अलग तरह की होती है. महिलाओं ने कहा कि पुरुषों को सेक्‍स के मामले में थोड़ा ‘क्रिएटिव’ होना चाहिए. कुछ नया और एकदम अलग अंदाज में किया जाना महिलाओं को खूब भाता है.

3. ‘आनंद’ व ‘संतुष्टि’ में फर्क है

किंसले इंस्टिट्यूट के शोध में यह पाया गया कि पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं ने भी यह माना कि उन्‍हें कंडोम के बिना यौन संबंध ज्‍यादा अच्‍छा लगता है. पर महिलाओं ने यह भी माना कि दरअसल संभोग के दौरान कंडोम का इस्‍तेमाल किए जाने पर उन्‍हें ज्‍यादा सुकून मिलता है. यह सुकून 'प्रोटेक्‍शन' को लेकर होता है. सर्वे में शामिल महिलाओं ने कहा कि कंडोम यौन रोगों से बचाव का यह कारगर तरीका है. इसके इस्‍तेमाल से महिलाएं खुलकर सेक्‍स का भरपूर मजा ले पाती हैं.

4. धीरे-धीरे, आराम से...

सभी महिलाएं यही चाहती हैं कि उसके बेहद कोमल अंगों को शुरुआती दौर में ज्‍यादा तकलीफ न दी जाए. महिलाएं पुरुषों से चाहती हैं कि वे उसके सेंसिटिव अंगों के साथ संवेदनशीलता से ही पेश आएं. मतलब यह कि संभोग के दौरान वे चाहे तो जीभ व उंगलियों का इस्‍तेमाल करके जरूरी उत्तेजना पैदा करें, पर कष्‍ट देने से बाज आएं.

5. वातावरण का भी पड़ता है असर

शोध के दौरान 50 फीसदी महिलाओं ने स्‍वीकार किया कि संभोग के दौरान अनुकूल मौसम व वातावरण न होने की वजह से वे चरम तक न पहुंच सकीं. महिलाओं ने माना कि दरअसल पुरुषों के ठंडे पांव की वजह से उन्‍हें ज्‍यादा तकलीफ होती है. डॉ. होल्‍सटेज ने कहा कि सेक्‍स के दौरान वातावरण भी काफी मायने रखता है. अगर कमरे का तापमान अनुकूल रहता है, तो यह सेक्‍स का मजा बढ़ा देता है.

6. सेक्‍स के दौरान पोजिशन का भी रखें खयाल

सेक्‍स संबंध बनाने के दौरान पोजिशन का भी खयाल रखना बेहद जरूरी होता है. स्‍त्री के निचले भाग को अगर दो-तीन तकियों के सहारे थोड़ा-सा और ऊपर उठाकर संभोग किया जाए, तो इससे संसर्ग ठीक से हो पाता है. वह स्थिति भी बेहतर होती है, जब स्‍त्री लेटे हुए पुरुष के ऊपर आकर संभोग करती है. इससे स्त्रियां ‘उन’ अंगों में ज्‍यादा उत्तेजना महसूस करती हैं.

एक और पोजिशन महिलाओं व पुरुषों को अच्‍छा लगता है, वह है ‘डॉगी स्‍टाइल’. मतलब, जिसमें स्‍त्री घुटनों और हाथों के बल खुद को संतुलित किए रहती है और पुरुष उसके ठीक पीछे जाकर संभोग करता है.

7. तरीके तो और भी हैं...

ऑस्‍ट्रेलियन सेक्‍स रिसर्चर जूलियट रिचटर्स कहती हैं कि सर्वे में शामिल पांच में से केवल एक महिला ने माना कि वे केवल एकदम नॉर्मल तरीके से किए गए संभोग से ही चरम तक पहुंच जाती हैं. ज्‍यादातर युवा महिलाओं का मानना था कि वे अपने पार्टनर से चाहती है कि वे सेक्‍स के दौरान अपने हाथ और मुंह का भी ज्‍यादा इस्‍तेमाल करें. उन्‍हें अपनी किताब के लिए 19 हजार लोगों पर किए गए सर्वे के दौरान इस तथ्‍य का पता चला.

90 फीसदी से ज्‍यादा महिलाओं ने माना कि वे केवल सेक्‍स के दौरान अपने पार्टनर द्वारा मुख का भी इस्‍तेमाल किए जाने के बाद चरम तक पहुंचती हैं.

रिसर्च में पाया गया कि जब कामक्रीड़ा आरामदायक तरीके से, धीरे-धीरे, पर लगातार किया जाता है, तो जोड़े चरम तक जल्‍दी पहुंच जाते हैं.

8. जल्‍दबाजी की, तो गए ‘काम’ से

सर्वे में शामिल महिलाओं में से केवल पचास फीसदी ने कहा कि वे 10 मिनट या इससे कम वक्‍त में ही चरम तक पहुंच जाती हैं. सेक्‍स मेडिसिन के एक जर्नल में प्रकाशित स्‍टडी के मुताबिक, सेक्‍स में जल्‍दबाजी दिखलाने पर पुरुष तो संतुष्‍ट हो जाते हैं, पर महिलाएं चरम तक नहीं पहुंच पाती हैं. ऐसे में पुरुषों की जिम्‍मेदारी होती है कि वे बिना हड़बड़ी दिखलाए अपनी पार्टनर को लंबे गेम में साथ लेकर चलें.


9. संवेदनशील अन्‍य अंगों को पहचानें

सेक्‍स पर शोध करने वालों ने पाया है कि केवल G-स्‍पॉट ही आनंद देने के लिए पर्याप्‍त नहीं है, बल्कि महिलाओं के शरीर में और भी ऐसे भाग हैं, जहां संवेदना ज्‍यादा होती है. इसमें A- स्‍पॉट भी शामिल है, जहां सहलाने से महिलाओं का शरीर यौन क्रिया के लिए शारीरिक रूप से तैयार हो पाता है. इस काम में उंगलियों की कारस्‍तानी काम आती है.


10. तैयारी को ठीक से परखें 

कोई स्‍त्री संभोग के लिए तैयार है या नहीं, यह परखने में भी कई बार भूल हो जाती है. कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में लेक्‍चरर बरबरा कीसलिंग का मानना है कि सिर्फ बाहरी लक्षण से ही इसकी पहचान संभव नहीं है. इनकी नजर में ‘बटरफ्लाई पोजिशन’ सबसे ज्‍यादा बेहतर है.


11. ‘कीमत’ तो अदा करनी ही पड़ती है... 

अगर महिला अपने थकाऊ काम या नींद की कमी की वजह से परेशान है, तो इसक स्थिति में वह मुश्किल से उत्तेजित होती है. ऐसे में पुरुषों की जिम्‍मेदारी बढ़ जाती है. पुरुषों को चाहिए कि वे व्‍यंजन पकाने या कपड़े धोने आदि काम में इनकी मदद करें. सर्वे में शामिल महिलाओं ने माना कि ऐसी स्थिति में जब पुरुष उनके काम में मदद करते हैं कि उन्‍हें बेहतर एहसास होता है.


12. जरूरी नहीं कि हर बार चरम तक पहुंचा ही जाए

महिला हर बार चरम तक पहुंच ही जाए, यह कोई जरूरी नहीं है. कई बार तनाव व थकान की वजह से ऐसा नहीं हो पाता. ऐसे में जबरन आधे घंटे तक ‘खेल’ जारी रखने की बजाए इसे खत्‍म करना बेहतर रहता है. चरम तक न ले जाने के लिए हर बार पुरुष ही जिम्‍मेदार नहीं होता. फिर भी अगर महिला चाहे, तो आप अपने हाथों और उंगलियों से उसे संतुष्‍ट कर सकते हैं. कुल मिलाकर इस क्रीड़ा का आनंद ही मायने रखता है

कैसे बिस्तर में एक आदमी को संतुष्ट करने के लिए 25 तरीके 25 युक्तियों का प्रयास करें

बेशक, एक आदमी को बिस्तर में संतुष्ट रखना खुद को आंखों में पानी भरने के लिए झुकना और कुछ प्रभावशाली बेडरूम कलाबाजी के साथ दिखाना नहीं है। वास्तव में इससे बहुत अधिक है.इसलिए, यदि आप अपने आदमी को प्रभावित करना चाहते हैं और उसे वास्तव में अच्छा समय दिखाना चाहते हैं, तो निम्न का प्रयास क्यों न करें?

# 1 पर रोशनी के साथ करो. वह आपके शरीर को देखना चाहता है और आप दोनों को एक साथ नीचे और गंदे होते देखकर उत्तेजित हो जाता है। कंबल के नीचे न छुपें और न ही रोशनी को कम करें। इसके बजाय बहादुर बनें और उन्हें जारी रखें। वह आपके आत्मविश्वास को भी एक वास्तविक मोड़ मिलेगा!

# 2 एक पट्टी छेड़ो. यह कठिन लग सकता है, लेकिन अगर आप की हिम्मत है तो उसके लिए एक धीमी और कामुक पट्टी छेड़ना उसे पाने के लिए निश्चित है। आपको ओवरबोर्ड जाने की ज़रूरत नहीं है, बस कुछ अच्छे अधोवस्त्र पहनना और इसे धीमा लेना याद रखें.

# 3 सेक्स टॉय का इस्तेमाल करें. वहाँ सेक्स खिलौने की एक बहुतायत वहाँ आप के रूप में एक जोड़े के साथ मज़ा करने के लिए कर रहे हैं। वाइब्रेटर से लेकर हथकड़ी तक खिलौने और आंखों पर पट्टी बांधने तक, आप जो भी हैं, उसे पूरा किया जाना निश्चित है। एक साथ दुकानों की यात्रा करें और आनंद लेने के लिए सेक्सी उपहारों के एक बैग के साथ वापस आएं!

# 4 कुछ भूमिका निभाने की कोशिश करें. कभी-कभी वास्तविकता से थोड़ी देर के लिए बचना और अपने रिश्ते में कुछ मसाला वापस इंजेक्ट करना अच्छा हो सकता है। भूमिका निभाना आप दोनों के लिए कामुक और सेक्सी हो सकता है, तो इसे क्यों न दें? यहां तक ​​कि अगर आप पहली बार में थोड़ा अजीब लग रहा है, तो आप जल्द ही इसे लटका लेंगे!

# 5 फोन सेक्स करें. सेक्स के लिए सिर्फ शारीरिक होना जरूरी नहीं है। अगली बार जब वह रात के लिए दूर हो तो उसे सेक्सी फोन कॉल से आश्चर्यचकित न करें और देखें कि यह कहाँ जाता है?

# 6 सेक्सी टेक्स्ट भेजें. सेक्सी पाठ या बल्कि 'सेक्सटिंग' सभी क्रोध हैं। इससे पहले कि आप एक साथ एक ही कमरे में हों, फोरप्ले शुरू करने का यह एक शानदार तरीका है। वास्तव में उसके रक्त पंप करने के लिए तीस से सेक्सी से नीच गंदी तक जा रहा है, और वह अपने कपड़े फाड़ के रूप में जल्द ही वह घर जाना चाहता है यकीन है.

# 7 गर्म अधोवस्त्र में निवेश करें. सेक्सी होना भाग को देखने और महसूस करने के बारे में है। उसी पुरानी दादी की पैंटी को दिन में पहनना और दिन-ब-दिन उसकी हवस को कम करना है! कुछ गंभीरता से सेक्सी अंडरवियर प्राप्त करें, और आप अधिक आत्मविश्वास महसूस करेंगे। साथ ही, वह इसकी सराहना करना भी सुनिश्चित करता है!

# 8 स्थान बदलें. सेक्स को संतुष्ट करने का रहस्य भिन्नता है। सुनिश्चित करें कि आप एक ही पुरानी दिनचर्या में नहीं आते हैं और स्थिति को बदलते हुए इसे मिलाते हैं.

# 9 कामसूत्र की एक प्रति प्राप्त करें. नए पदों की बात करते हुए, इस क्लासिक सेक्स बुक में निवेश क्यों न करें और देखें कि आप उनमें से कितने में महारत हासिल कर सकते हैं?!

# 10 महान आउटडोर में सिर. यह इतना आसान हो सकता है कि आप इसे अपने बेडरूम में हमेशा कर सकते हैं। याद रखें, वहाँ एक पूरी दुनिया है, लोग! बाहर सिर और देखो क्या नया, आविष्कारशील, और स्थानों आप इसे करने के लिए मिल रहा है!

# 11 आश्वस्त रहें. दिन के अंत में, जब यह सीखने की बात आती है कि बिस्तर में एक आदमी को कैसे संतुष्ट किया जाए, तो यदि आप उनके बारे में आश्वस्त महसूस नहीं करते हैं तो कोई भी शानदार सेक्स चालें नहीं चलती हैं। पता है कि आप गर्म हैं, कि वह सोचता है कि आप पूरी तरह से सेक्सी हैं, और आपका आत्मविश्वास स्पष्ट होगा-और उसके लिए एक बहुत बड़ा मोड़ होगा.

# 12 जानिए आपको क्या पसंद है. अपने आदमी को संतुष्ट करना चाहते हैं? उसे भी मस्ती में आने दो। सेक्स दो तरह की सड़क है और जब तक वह नहीं जानता कि उसने अच्छा काम किया है तब तक वह संतुष्ट नहीं होगा। तो, उसे बताएं कि आपको कोई अनिश्चित शब्दों में क्या पसंद है.

# 13 संवाद करें. सेक्स सभी अच्छे संचार के बारे में है। इसके बारे में खुली और ईमानदार बातचीत करने से डरो मत, इस तरह से आप एक दूसरे को संतुष्ट करने की अधिक संभावना रखते हैं.

# 14 हँसो. यह याद रखना वास्तव में महत्वपूर्ण है कि सेक्स, सब से ऊपर, मजेदार होना चाहिए। कभी-कभी चीजें अजीब हो जाती हैं या गलत हो जाती हैं और यह वास्तव में ठीक है। यदि आप हँसते हैं और इसके साथ मज़े करते हैं, तो आपको हर स्तर पर अनुभव को गहराई से संतुष्ट करने की संभावना है.

# 15 सहज रहें. रूटीन एक जुनून हत्यारा है, इसलिए चीजों को ताजा और रोमांचक रखना सुनिश्चित करता है कि सेक्स बासी नहीं होता है.

# 16 अपने आप को स्पर्श करें. दोस्तों इसे तब पसंद करते हैं जब एक महिला को बिस्तर में खुद को छूने का आत्मविश्वास होता है। यदि आप उसे चालू करना चाहते हैं, तो ऐसा करने से न डरें.

# 17 ज़ोर से करो. सेक्स से ज्यादा ऑफ-पुट कुछ भी नहीं है इसलिए चुपचाप आप पिन ड्रॉप सुन सकते हैं। थोड़ा मुखर होने से मत डरो। कभी-कभी यह बहुत अच्छा होता है कि आप वास्तव में चीर दें और अपने भीतर के जंगली पक्ष से भी संपर्क करें!

# 18 धीमा. सेक्स हमेशा टूटने वाले फर्नीचर के बारे में नहीं होता है! कभी-कभी धीमे धीमे, विशेष रूप से अंत में, अपने आदमी को अधिक शक्तिशाली और गहन संभोग बचाता है। कुछ ऐसा है जिसके लिए वह सुपर आभारी है!

# 19 हावी हो. यह एक आदमी के लिए एक समय में एक बार नियंत्रण में ले जाने के लिए अच्छा हो सकता है। सुनिश्चित करें कि आप अपने आंतरिक डॉमेट्रिक्स के संपर्क में हैं और बस इसके लिए जाएं!

# 20 छेड़ो. यदि कोई सबसे बड़ा रहस्य यह सीखता है कि बिस्तर में आदमी को कैसे संतुष्ट किया जाए, तो यह एक वास्तविक छेड़ छाड़ है। छेड़ना यौन तनाव का निर्माण करता है जिससे यह अंत में अधिक स्वादिष्ट हो जाता है!

# 21 हावी हो. अपने आदमी को नियंत्रण में लेने देना भी उसके लिए एक बहुत बड़ा मोड़ हो सकता है, इसलिए उसे एक बार थोड़ी देर में ऊपरी हाथ करने देना न भूलें.

# 22 अपनी कल्पनाओं को साझा करें. जो कुछ भी उसकी सबसे गहरी और बेतहाशा कल्पना है, उसे उसे आपको बताने के लिए प्राप्त करें, और फिर उस पर अमल करें!

# 23 प्रयोग. याद रखें बस चीजों को ताजा रखें और नई चीजों के लिए खुले रहें। सब कुछ एक जोड़े के रूप में आपके लिए काम करने वाला नहीं है, लेकिन प्रयोग करना आधा मजेदार है!

# 24 पोर्न देखना. पोर्न आप दोनों को एक मूड में लाने का एक आसान और विश्वसनीय तरीका है और आपके सेक्स जीवन को एक और बढ़ावा देता है!

# 25 प्यार करो. दोस्तों अंतरंग और प्यार करने वाले सेक्स को उतना ही प्यार करते हैं जितना कि लड़कियां करती हैं। दो लोगों के बीच सेक्स जो धीमा, प्यार और रोमांटिक है, वह सभी का सबसे संतोषजनक और यादगार सेक्स हो सकता है!

इसलिए यह अब आपके पास है। यदि आप जानना चाहते हैं कि बिस्तर में एक आदमी को कैसे संतुष्ट करना है तो ऊपर की कोशिश करें। सभी युक्तियां आपके लिए काम नहीं करेंगी, लेकिन बस खोज करने, आत्मविश्वास महसूस करने और मज़े करने से, आपके पास कुछ गंभीर खेल होंगे। वह आपको इसके लिए और अधिक प्यार करेगा!

यौन जीवन में सुधार के उपाय:

1. हीरा पहनने से अनुभव में सुधार होगा क्योंकि शुक्र आनंदपूर्ण यौन सुख के लिए मुख्य ग्रह है।

2. असम में कामरूप जिले के मदन कामदेव मंदिर में पूजा करना यौन जीवन बढ़ाने का एक और उपाय है।

3. कामदेव मंत्र का पाठ करने से निश्चित ही यौन सुख में वृद्धि होगी।

4. योग में अश्विनी मुद्रा यौन जीवन में सुधार के लिए एक बहुत ही कारगर उपाय माना जाता है।

5. अधिक से अधिक उड़द के बने आटे को गेहूं या व्यंजनों के साथ खाने से निश्चित रूप से किसी व्यक्ति को अधिक यौन व्यवहार्यता मिलती है।

6. तरबूज के सफेद भाग का सेवन एक प्राकृतिक कामोद्दीपक है।

7. उचित यौगिक श्वास और व्यायाम नियमित रूप से किया जाना चाहिए और 20 से 30 मिनट के लिए रोजाना ध्यान करना चाहिए।

8. एक अच्छे सेक्सोलॉजिस्ट और एक मनोचिकित्सक से परामर्श करना एक बहुत अच्छा कदम होगा यदि आप वास्तव में अपने स्वयं के द्वारा बनाई गई मानसिक बाधा से बाहर निकलना चाहते हैं।

मुझे आशा है कि यदि आप यहाँ तक पहुँच गए हैं, तो बहुत सारे भ्रम दूर हो गए होंगे और आपके पास सेक्स और यौन जीवन के बारे में सोचने का एक नया तरीका होगा।



Thanks & Regards
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