जन्म कुंडली देखने की प्रक्रिया और 12 भावो का सम्पूर्ण विवेचन
जन्म कुंडली देखने की प्रक्रिया और 12 भावो का सम्पूर्ण विवेचन
जन्म कुंडली को पढ़ने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखा जाता है. आइए सबसे पहले उन बातो को आपके सामने रखने का प्रयास करें. जन्मकुंडली बच्चे के जन्म के समय विशेष पर आकाश का एक नक्शा है.
जन्म कुंडली में एक समय विशेष
पर ग्रहो की स्थिति तथा चाल का पता चलता है. जन्म कुंडली में बारह खाने बने होते
हैं जिन्हें भाव कहा जाता है. जन्म कुण्डली अलग - अलग स्थानो पर अलग-अलग तरह से
बनती है. जैसे भारतीय पद्धति तथा पाश्चात्य पद्धति. भारतीय पद्धति में भी उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय तथा पूर्वी भारत में बनी
कुंडली भिन्न होती है.
जन्म कुंडली बनाने के लिए बारह
राशियों का उपयोग होता है, जो मेष से मीन
राशि तक होती हैं. बारह अलग भावों में बारह अलग-अलग राशियाँ आती है. एक भाव में एक
राशि ही आती है. जन्म के समय भचक्र पर जो राशि उदय होती है वह कुंडली के पहले भाव
में आती है.
अन्य राशियाँ फिर क्रम से
विपरीत दिशा(एंटी क्लॉक वाइज) में चलती है. माना पहले भाव में मिथुन राशि आती है
तो दूसरे भाव में कर्क राशि आएगी और इसी तरह से बाकी राशियाँ भी चलेगी. अंतिम और
बारहवें भाव में वृष राशि आती है.
भाव का परिचय
जन्म कुंडली में भाव क्या होते
हैं आइए उन्हेँ जानने का प्रयास करें. जन्म कुंडली में बारह भाव होते हैं और हर
भाव में एक राशि होती है. कुँडली के सभी भाव जीवन के किसी ना किसी क्षेत्र से
संबंधित होते हैं. इन भावों के शास्त्रो में जो नाम दिए गए हैं वैसे ही इनका काम
भी होता है. पहला भाव तन, दूसरा धन,
तीसरा सहोदर, चतुर्थ मातृ, पंचम पुत्र, छठा अरि, सप्तम
रिपु, आठवाँ आयु, नवम धर्म, दशम कर्म, एकादश आय तो द्वादश व्यय भाव कहलाता है़.
सभी बारह भावों को भिन्न काम
मिले होते हैं. कुछ भाव अच्छे तो कुछ भाव बुरे भी होते हैं. जिस भाव में जो राशि
होती है उसका स्वामी उस भाव का भावेश कहलाता है. हर भाव में भिन्न राशि आती है
लेकिन हर भाव का कारक निश्चित होता है.
बुरे भाव के स्वामी अच्छे भावों
से संबंध बनाए तो अशुभ होते हैं और यह शुभ भावों को खराब भी कर देते हैं. अच्छे
भाव के स्वामी अच्छे भाव से संबंध बनाए तो शुभ माने जाते हैं और व्यक्ति को जीवन
में बहुत कुछ देने की क्षमता रखते हैं. किसी भाव के स्वामी का अपने भाव से पीछे
जाना अच्छा नहीं होता है, इससे भाव के
गुणो का ह्रास होता है. भाव स्वामी का अपने भाव से आगे जाना अच्छा होता है. इससे
भाव के गुणो में वृद्धि होती है.
ग्रहो की स्थिति
जन्म कुंडली मैं सबसे आवश्यक
ग्रहों की स्थिति है, आइए उसे जाने़.
ग्रह स्थिति का अध्ययन करना जन्म कुंडली का बहुत महत्वपूर्ण पहलू है. इनके अध्ययन
के बिना कुंडली का कोई आधार ही नहीं है.
पहले यह देखें कि किस भाव में
कौन सा ग्रह गया है, उसे नोट कर
लें. फिर देखें कि ग्रह जिस राशि में स्थित है उसके साथ ग्रह का कैसा व्यवहार है.
जन्म कुंडली में ग्रह मित्र राशि में है या शत्रु राशि में स्थित है, यह एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है इसे नोट करें. ग्रह उच्च, नीच, मूल त्रिकोण या स्वराशि में है, यह देखें और नोट करें.
जन्म कुंडली के अन्य कौन से
ग्रहों से संबंध बन रहे है इसे भी देखें. जिनसे ग्रह का संबंध बन रहा है वह शुभ
हैं या अशुभ हैं, यह जांचे. जन्म
कुंडली में ग्रह किसी तरह के योग में शामिल है या नहीं, जैसे
राजयोग, धनयोग, अरिष्ट योग आदि अन्य
बहुत से योग हैं.
कुंडली का फलकथन
फलकथन की चर्चा करते हैं, भाव तथा ग्रह के अध्ययन के बाद जन्म्
कुंडली के फलित करने का प्रयास करें. पहले भाव से लेकर बारहवें भाव तक के फलों को
देखें कि कौन सा भाव क्या देने में सक्षम है.
कौन सा भाव क्या देता है और वह
कब अपना फल देगा यह जानने का प्रयास गौर से करें. भाव, भावेश तथा कारक तीनो की कुंडली में स्थिति
का अवलोकन करना आवश्यक होता है. जन्म कुंडली में तीनो बली हैं तो जीवन में चीजें
बहुत अच्छी होगी.
तीन में से दो बली हैं तब कुछ
कम मिलने की संभावना बनती है लेकिन फिर भी अच्छी होगी. यदि तीनो ही कमजोर हैं तब
शुभ फल नहीं मिलते हैं और परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.
दशा का अध्ययन
अभी तक बताई सभी बातों के बाद
दशा की भूमिका आती है, बिना अनुकूल
दशा कै कुछ् नहीं मिलता है. आइए इसे समझने का प्रयास करें. सबसे पहले यह देखें कि
जन्म कुंडली में किस ग्रह की दशा चल रही है और वह ग्रह किसी तरह का कोई योग तो
नहीं बना रहा है.
जिस ग्रह की दशा चल रही है वह
किस भाव का स्वामी है और कहाँ स्थित है, यह
जांचे. कुंडली में महादशा नाथ और अन्तर्दशानाथ आपस में मित्रता का भाव रखते है या
शत्रुता का भाव रखते हैं यह देखें.
कुंडली के अध्ययन के समय
महादशानाथ से अन्तर्दशानाथ किस भाव में स्थित है अर्थात जिस भाव में महादशानाथ
स्थित है उससे कितने भाव अन्तर्दशानाथ स्थित है, यह
देखें. महादशानाथ बली है या निर्बल है इसे देखें. महादशानाथ का जन्म और नवांश
कुंडली दोनो में अध्ययन करें कि दोनो में ही बली है या एक मे बली तो दूसरे में
निर्बल तो नहीं है यह देखें.
गोचर का अध्ययन
सभी बातो के बाद आइए अब ग्रहो
के गोचर की बात करें. दशा के अध्ययन के साथ गोचर महत्वपूर्ण होता है. कुंडली की
अनुकूल दशा के साथ ग्रहों का अनुकूल गोचर भी आवश्यक है तभी शुभ फल मिलते हैं.
किसी भी महत्वपूर्ण घटना के लिए
शनि तथा गुरु का दोहरा गोचर जरुरी है. जन्म कुंडली में यदि दशा नहीं होगी और गोचर
होगा तो अनुकूल फलों की प्राप्ति नहीं होती है क्योकि अकेला गोचर किसी तरह का फल
देने में सक्षम नहीं होता है.
कैसे बनाएं कुंडली
कुंडली बनाने का कार्य मुख्य
रूप से पंडित या ब्राह्ममण करते हैं लेकिन आज इंटरनेट ने अपना विस्तार इस तरह किया
है कि ज्योतिष की इस अहम शाखा में भी उसकी पहुंच हो गई है। आज कई वेबसाइट्स और
सॉफ़्टवेयर भी कुंडली बनाती हैं। इनमें से कई तो आपको पूर्ण हिन्दी या अंग्रेजी में
भी कुंडली उपलब्ध कराते हैं।
काल पुरुख जिसकी कल्पना हम
ज्योतिष शास्त्र में करते हैं और जिसके रचयता ब्रह्माजी हैं और जो सम्पूरण जातकों
का प्रतिनिधितव भी करता है वह असल में किस प्रकार से कार्य करता है ! यहाँ पर
विचारणीय बात ये भी है की जिस लाल किताब का आज इतना प्रचार किया जा रहा है वो भी
इसी काल पुरुख लगन से प्रेरित है और उसका महत्व उपचार पर ज्यादा है , इसी प्रकार से अंक विद्या , केपी सिस्टम जो की बहुत ही सटीकता से फोरकास्टिंग करता है और न जाने कितने
सिस्टम हैं ज्योतिष विद्या में वे सब के सब अपने आप में महत्व पूरण माने जाते हैं
पर उन सब का आधार यही काल पुरुख कुंडली माना जाता है , इसके
बाहर तो ज्योतिष शास्त्र की कल्पना करना भी बेकार है !
प्रथम भाव
उसमें काल पुरुख की मेष राशि
यानी एरीज जोडिएक पड़ता है और जिसका के स्वामित्व हम मंगल गृह को मानते हैं , वह मंगल फिर अष्टम भाव का भी स्वामी मन
जाता है क्यों की उसकी दूसरी राशि वृश्चिक वहां पड़ती है और दोनों राशियों का अपना
अलग प्रभाव मन जाएगा , तो हम बात कर रहे थे पहले भाव की की
वहां मेष राशी जिसका स्वामी मंगल को माना जाता है व रुधिर जिसे हम खून भी कहते है
का शरीर में प्रतिनिधितव करता करता है और मंगल को हम उत्साह व उर्जा का कारक भी
मानते हैं दुसरे वहां पर सूर्य उच्च का मन जाता है वह भी उर्जा का प्रकार मन जाता
है तो दोनों मंगल और सूर्य उर्जा के कारक होने के साथ साथ अग्नि के कारक भी है
इसलिए ये जीवन के संचालक गृह प्रथम भाव के कारक बनाये गए जो की पूरण तया तर्कसंगत
मन जाएगा , अब मेडिकल साइंस के मुताविक भी इनका यही मतलव
निकलता है क्यों को विज्ञान भी यही मानता आया है की ये सारा ब्रह्माण्ड एक उर्जा
के आधीन है और प्रमाणित व प्रतक्ष रूप से सूर्य तो इसका प्रमाण है ही , अब विचारनिए बात यह है की जीवन जीने के लिए वो भी सही जीवन जीने के लिए
हमें इस उर्जा का सही समन्वय करना पड़ता है नहीं तो हम कहीं न कहीं पिछड़ना शुरू हो
जाते हैं सो हमें उर्जा का नेगेटिव या पॉजिटिव प्रयोग करना आना चाहिए , अपनी अपनी पर्सनल होरोस्कोप में देखने पर इन दोनों उर्जा युक्त ग्रहों का
किस प्रकार से बैठे हैं , किन किन नक्षत्रों में , उप नक्षत्रों में और आगे उप उप नक्षत्रों में, नव्मंषा
कुंडली में, षोडस वर्गों में, अष्टक
वर्गों में , पराशर शास्त्र अनुसार की प्लेनेट और न जाने और
कितनी विधियों अनुसार देखने के वाद ही ये पता चलता है के वे गृह कितने बलवान हैं ,
मात्र एक आधी विधि अपूरण मानी जाती गयी है , और
विचारनिए बात ये भी है के आज के वक्त में इस पवित्र शास्त्र का मज़ाक बना कर रख
दिया गया है मात्र सिर्फ भौतिकता के चलते ऐसा हो रहा है , क्यों
के हर आदमी दो चार किताबें पढ़ कर अपने आप को ज्ञानी मानने लगता है और आज जब सब कुछ
कोमर्शिअल यानी व्यावसायिक सोच सब पर हावी हो चुकी है तो हर चीज की सैंक्टिटी यानी
पवित्रता ख़तम हो रही है , जब स्वार्थ हावी हो जाए तो अक्ल पर
पर्दा पड़ना शुरू हो जाता है, तो हम यहाँ देखते हैं के इन
दोनों ऊर्जायों का हम कैसे सही इस्तेमाल करते हैं और जैसे के अगर कहीं न कहीं कोई
ग्रहों में कमी पूर्व जनित कर्मो के कारण आ गयी हो तो हम उसमे काफी हद तक सुधार भी
ला सकते हैं , हालांकि वह सुधार अपनी अपनी बिल्पावेर यानि
इच्छा शक्ति , करम और प्रभु पर पूरण भरोसा इसी के चलते पूरण
हो पाती हैकुंडली का पहला भाव
वैदिक ज्योतिष में कुंडली के
पहले भाव को लग्न कहा जाता है तथा वैदिक ज्योतिष के अनुसार इसे कुंडली के बारह
घरों मेंसबसे महत्त्वपूर्ण घर माना जाता है। किसी भी व्यक्ति विशेष के जन्म के समय
उसके जन्म स्थान पर आकाश में उदित राशि को उस व्यक्ति का लग्न माना जाता है तथा इस
राशि अर्थात लग्न को उस व्यक्ति की कुंडली बनाते समय पहले घर में स्थान दिया जाता
है तथा इसके बाद आने वाली राशियों को कुंडली में क्रमश: दूसरे, तीसरे --- बारहवें घर में स्थान दिया जाता
है।
किसी भी कुंडली में लग्न स्थान
अथवा पहले भाव का महत्त्व सबसे अधिक होता है तथा जातक के जीवन के लगभग सभी
महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में इस भाव का प्रभाव पाया जाता है। जातक के स्वभाव तथा
चरित्र के बारे में जानने के लिए पहला भाव विशेष महत्त्व रखता है तथा इस भाव से
जातक की आयु, स्वास्थ्य,सामाजिक प्रतिष्ठा तथा अन्य कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के बारे में पता
चलता है। कुंडली का पहला भाव शरीर के अंगों में सिर, मस्तिष्क
तथा इसके आस-पास के हिस्सों को दर्शाता है तथा इस भाव पर अशुभ ग्रह का प्रभाव शरीर
के इन अंगों से संबंधित रोगों,चोटों अथवा परेशानियों का कारण
बन सकता है।
कुटुम्भ व धन भाव
बात करते हैं दुसरे भाव की यानि
कुटुम्भ व धन भाव की तो वहां का स्वामित्व शुक्र व् चन्द्र को दिया है और कारक
गुरु को माना गया है , एशिया क्यों
इसलिए की शुक्र भौतिक गृह है और भौतिक सुखों को प्राप्त करने के लिए धन की ज़रुरत
पड़ती ही है , विचारनिए बात यहाँ ये भी है के गुरु को दुसरे,
पांचवे , नवं और एकादस का कारक भी माना गया है
क्यों की सब असली निधियों का स्वामी गुरु ही होता है जो के किसी के साथ कभी
पक्षपात नहीं करता और अगर ये ही अधिकार दुसरे गृह को दिया गया होता तो व ज़रूरी
पक्षपात करता , तो यही वृहस्पति का बढ़प्पन माना जाता है जो
की किसी के साथ कभी अन्याय नहीं करते हैं और सबको सद्बुधि देने वाले गृह माने जाते
हैं ! हम यह भी देखते हैं के दूसरा भाव मारकेश का भी मन जाता है वजह चाहे जो भी
रही हो मसलन के अष्टम जो के आयु का भाव माना गया है उससे अष्टम यानी तृत भाव से दवाद्ष
भाव यानी दूसरा भाव इसलिए इसे मारकेश माना जाएगा परन्तु दर्शन के रूप में देखें तो
यही पता चलता है के शुक्र और चन्द्र के रूप में जो हम भौतिकता जब वृहस्पति रुपी
प्यूरिटी को हम एक्सक्लूड यानि बाहर करना शुरू करते हैं तो वह मारक का काम करना
शुरू कर देती है , जैसा के मैंने बोला के हम यहाँ इसको
लॉजिकल एंगल से देखें तो यही निष्कर्ष निकलता है के बिना मतलब का, बिना मेहनत और गलत तरीकों से कमाया भौतिक सुख आखिरकार हमारे लिए मारकेश का
ही काम करेगा,कुंडली का दूसरा भाव
कुंडली के दूसरे भाव को वैदिक
ज्योतिष में धन स्थान कहा जाता है तथा किसी भी व्यक्ति की कुंडली में इस भाव का
अपना एक विशेष महत्त्व होता है। इसलिए किसी कुंडली को देखते समय इस भाव का अध्ययन
बड़े ध्यान से करना चाहिए। कुंडली का दूसरा भाव कुंडली धारक के द्वारा अपने जीवन
काल में संचित किए जाने वाले धन के बारे में बताता है तथा इसके अतिरिक्त यह भाव
जातक के द्वारा संचित किए जाने वाले सोना, चांदी,
हीरे-जवाहरात तथा इसी प्रकार के अन्य बहुमूल्य पदार्थों के बारे में
भी बताता है। किन्तु कुंडली का दूसरा भाव केवल धन तथा अन्य बहुमूल्य पदार्थों तक
ही सीमित नहीं है तथा इस भाव से जातक के जीवन के और भी बहुत से क्षेत्रों के बारे
में जानकारी मिलती है। दूसरा भाव जातक की वाणी तथा उसके बातचीत करने के कौशल के
बारे में भी बताता है। शरीर के अंगों में यह भाव चेहरे तथा चेहरे पर उपस्थित अंगों
को दर्शाता है तथा कुंडली के इस भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने की स्थिति में
जातक को शरीर के इन अंगों से संबंधित चोटों अथवा बीमारियों का सामना करना पड़ सकता
है। कुंडली का दूसरा भाव जातक की सुनने, बोलने तथा देखने की
क्षमता को भी दर्शाता है तथा इन सभी के ठीक प्रकार से काम करने के लिए कुंडली के
इस घर का मज़बूत होना आवश्यक है।
तीसरा और आगे छठा भाव
तीसरा और आगे छठा भाव दोनों का
स्वामी और कारक बुध व मंगल को माना जाएगा , यहाँ
पर बुध भाई बहनों का और छठे भ्हाव में बंधू बांधवों का जो इए वे भी भाई बहनों के
रूप में हमारे सामने आते हैं का कारक बन जाता है दूसरा है मंगल तो इन दोनों ग्रहों
की इसलिए स्वामित्व मिला के बुध रुपी लचकता व जुबान से और पराक्रम से ही हम
बंधुयों के साथ इंटरैक्ट करते हैं , बुध यानी जुबान का उचित
प्रयोग ही हमें सबका मित्र या शत्रु बनाता है और सही व पॉजिटिव मंगल रुपी साहस और
पराक्रम हमें विजयी बनाता है ! इस के साथ हम इनके दुसरे भाव यानि छठे भाव को भी
देखें के जो की शत्रुता व रोग और ऋण का स्वामी होता है उस संधर्भ में हम देखते हैं
के दोनों ग्रहों का सही तालमेल हमें विजेता बनाता है , शत्रु
का यहाँ लॉजिकल मतलव जीवन रुपी संघर्ष से है तो यहाँ हम देखते हैं के कैसे वही
दोनों गृह उन चीजों का सही रूप में निपटारा करते नज़र आते हैं, और कैसे दो धारी तलवार की तरह बन जाते हैं कुंडली का तीसरा भाव
कुंडली के तीसरे भाव को वैदिक
ज्योतिष में बंधु भाव कहा जाता है,कुंडली
का तीसरा भाव कुंडली धारक के पराकर्म को भी दर्शाता है तथा इसिलिए कुंडली के इस
भाव को पराक्रम भाव भी कहा जाता है।
कुंडली के इस भाव से जातक के
अपने भाई-बंधुओं,दोस्तों,सहकर्मियों तथा पड़ोसियों के साथ संबधों का पता चलता है। किसी व्यक्ति के
जीवन काल में उसके भाईयों तथा दोस्तों से होने वाले लाभ तथा हानि के बारे में जानकारी
प्राप्त करने के लिए कुंडली के इस भाव का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक है। जिन
व्यक्तियों की कुंडली में तीसरा भाव बलवान होता है तथा किसी अच्छे ग्रह के प्रभाव
में होता है,ऐसे व्यक्ति अपने जीवन काल में अपने भाईयों,
दोस्तों तथा समर्थकों के सहयोग से सफलतायें प्राप्त करते हैं। जबकि
दूसरी ओर जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में तीसरे भाव पर अशुभ बुरे ग्रहों का
प्रभाव होता है, ऐसे व्यक्ति अपने जीवन काल में अपने भाईयों
तथा दोस्तों के कारण बार-बार हानि उठाते हैं तथा इनके दोस्त या भाई इनके साथ बहुत
जरुरत के समय पर विश्वासघात भी कर सकते हैं।
शरीर के अंगों में यह भाव कंधों
तथा बाजुओं को दर्शाता है तथा विशेष रूप से दायें कंधे तथा दायें बाजू को। इसके
अतिरिक्त यह भाव मस्तिष्क से संबंधित कुछ हिस्सों तथा सांस लेने की प्रणाली को भी
दर्शाता है तथा इस भाव पर किसी बुरे ग्रह का प्रभाव कुंडली धारक को मस्तिष्क
संबंधित रोगों अथवा श्व्सन संबंधित रोगों से पीड़ित कर सकता है।
चतुर्थ भाव
चतुर्थ भाव की बात करें तो यह
भाव सुख का मन जाता है और इस भाव का स्वामी चन्द्र और कारक वृहस्पति को माना जाता
है , ये दोनों गृह जब आपस में मिलते हैं तो कुंडली
में एक प्रकार का गजकेसरी योग बना देते हैं , यानी गज का
यहाँ मतलब हाथी से है तो केसरी शेर को कहते हैं जब दोनों ताक़तवर मिल जाएँ तो क्या
कहना , ठीक इसी प्रकार से इन दोनों ग्रहों की कल्पना की गयी
और उन्हें सुख स्थान का स्वामी बनाया गया , वैसे भी हम देखें
तो सिर्फ वृहस्पति ही ऐसा गृह नज़र आता है जो सौर मंडल में सबसे बड़ा और ज्ञान का
दाता माना गया है अगर और किसी गृह को ये अधिकार दे दिया होता जैसे शुक्राचार्य को
तो जो के सिर्फ वाहरी भौतिक सुखों का कारक है तो क्या होता ! चतुर्थ स्थान माँ का
भी माना गया है और ज्योतिष में चन्द्र को माँ का कारक माना जाता है , माँ के आँचल में ही संतान को सुख मिलता है ! कुंडली का चौथा भाव
कुंडली के चौथे भाव को वैदिक
ज्योतिष में मातृ भाव तथा सुख स्थान भी कहा जाता है,यह
भाव जातक के जीवन में माता की ओर से मिलने वाले योगदान तथा जातक के द्वारा किए
जाने वाले सुखों के भोग को दर्शाता है। चौथा भाव कुंडली का एक महत्त्वपूर्ण भाव है
तथा किसी भी क्रूर ग्रह का चौथे घर अथवा चन्द्रमा पर अशुभ प्रभाव कुंडली में मातृ
दोष बना देता है। किसी व्यक्ति के जीवन में उसकी माता की ओर से मिले योगदान तथा
प्रभाव को देखने के लिए तथा माता के साथ संबंध और माता का सुख देखने के लिए कुंडली
के इस घर का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक है।
कुंडली का चौथा भाव व्यक्ति के
ज़ीवन में मिलने वाले सुख, खुशियों,
सुविधाओं, तथा उसके घर के अंदर के वातावरण
अर्थात घर के अन्य सदस्यों के साथ उसके संबंधों को भी दर्शाता है। किसी व्यक्ति के
जीवन में वाहन-सुख, नौकरों-चाकरों का सुख, उसके अपने मकान बनने या खरीदने को भी कुंडली के इस भाव से देखा जाता है।
कुंडली में चौथे भाव के बलवान होने से तथा किसी अच्छे ग्रह के प्रभाव में होने से
कुंडली धारक को अपने जीवन काल में अनेक प्रकार की सुख-सुविधाओं तथा ऐश्वर्यों का
भोग करने को मिलता है तथा उसे बढिया वाहनों का सुख तथा नए मकान प्राप्त होने का
सुख़ भी मिलता है। दूसरी ओर कुंडली के चौथे भाव के बलहीन होने की स्थिति में जातक
के जीवन काल में सुख-सुविधाओं का आम तौर पर अभाव ही रहता है। कुंडली का चौथा भाव
शरीर के अंगों में छाती, फेफड़ों, हृदय
तथा इसके आस-पास के अंगों को दर्शाता है तथा इस भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव
कुंडली धारक को छाती, फेफड़ों तथा हृदय से संबंधित रोगों से
पीड़ित कर सकता है तथा इसके अतिरिक्त जाताकी मानसिक शांति पर बुरा प्रभाव डाल सकता
है।
पंचम भाव
पंचम भाव का स्वामी सूर्य और
कारक वही गुरु को बनाया गया क्यों की सूर्य रुपी प्रकाश द्वारा ही हम पंचम रुपी
विद्या ग्रहण करते हैं और इसके संतान कारक होने का कारण भी यही है के संतान ही
अपने माता पिता का नाम रौशन करती है , इसी
पंचम से हर व्यक्ति की मानसिकता भी देखी जाती है तो उन कारकों की पोजीशन के अनुसार
ही हम कोई निर्णय ले सकते हैं !कुंडली का पाँचवा भाव
कुंडली के पाँचवे भाव को वैदिक
ज्योतिष में संतान भाव कहा जाता है तथा अपने नाम के अनुसार ही कुंडली का यह भाव
संतान प्राप्ति के बारे में बताता है। हालांकि कुंडली के कुछ और तथ्य भी इस विषय
में अपना महत्त्व रखते है। यहां पर यह बात घ्यान देने योग्य है कि कुंडली का
पाँचवा घर केवल संतान की उत्पत्ति के बारे में बताता है तथा संतान के पैदा हो जाने
के बाद व्यक्ति के अपनी संतान से रिश्ते अथवा संतान से प्राप्त होने वाला सुख को
कुंडली के केवल इसी घर को देखकर नहीं बताया जा सकता तथा उसके लिए कुंडली के कुछ
अन्य तथ्यों पर भी विचार करना पड़ता है। कुंडली का पाँचवा भाव बलवान होने से तथा
किसी शुभ ग्रह के प्रभाव में होने से जातक स्वस्थ संतान पैदा करने में पूर्ण रुप
से सक्षम होता है तथा ऐसे व्यक्ति की संतान आम तौर पर स्वस्थ होने के साथ-साथ
मानसिक, शारीरिक तथा
बौद्भिक स्तर पर भी सामान्य से अधिक होती है तथा समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाने
में सक्षम होती है। दूसरी ओर कुंडली का पाँचवा भाव बलहीन होने की स्थिति में जातक
को संतान की उत्पत्ति में समस्याएं आती हैं।
कुंडली का पाँचवा भाव व्यक्ति
के मानसिक तथा बौद्धिक स्तर को दर्शाता है तथा उसकी कल्पना शक्ति, ज्ञान, शिक्षा,
तथा ऐसे ज्ञान तथा शिक्षा से प्राप्त होने वाले व्यवसाय, धन तथा समृद्धि के बारे में भी बताता है। कुंडली का पाँचवा भाव जातक के
प्रेम-संबंधों के बारे में बारे में भी बताता है।
शरीर के अंगों में कुंडली का यह
भाव जिगर, पित्ताशय,
अग्न्याशय, तिल्ली, रीढ
की हड्डी तथा अन्य कुछ अंगों को दर्शाता है। कुंडली के पाँचवे भाव पर किन्हीं
विशेष क्रूर ग्रहों का प्रभाव जातक को प्रजनन संबंधित समस्याएं तथा मधुमेह,
अल्सर तथा पित्ताशय में पत्थरी जैसी बीमारियों से पीड़ित कर सकता
है।
कुंडली का छठा भाव
कुंडली के छठे भाव को वैदिक
ज्योतिष में अरि अथवा शत्रु भाव कहा जाता है तथा कुंडली के इस भाव के अध्ययन से यह
पता चल सकता है कि जातक अपने जीवन काल में किस प्रकार के शत्रुओं तथा
प्रतिद्वंदियों का सामना करेगा तथा जातक के शत्रु अथवा प्रतिद्वंदी किस हद तक उसे
परेशान कर पाएंगे। कुंडली के छठे भाव के बलवान होने से तथा किसी विशेष शुभ ग्रह के
प्रभाव में होने से कुंडली धारक अपने जीवन में अधिकतर समय अपने शत्रुओं तथा
प्रतिद्वंदियों पर आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है तथा उसके शत्रु अथवा
प्रतिद्वंदी उसे कोई विशेष नुकसान पहुंचाने में आम तौर पर सक्षम नहीं होते।
कुंडली का छठा भाव जातक के जीवन
काल में आने वाले झगड़ों, विवादों,
मुकद्दमों तथा इनसे होने वाली लाभ-हानि के बारे में भी बताता है।
इसके अतिरिक्त कुंडली के इस भाव से जातक के जीवन में आने वाली बीमारियों तथा इन
बीमारियों पर होने वाले खर्च का भी पता चलता है। कुंडली का छठा भाव शरीर के अंगों
में पेट के निचले हिस्से को, आँतों को तथा उनकी कार्यप्रणाली
को, गुर्दों तथा आस-पास के कुछ और अंगों को दर्शाता है।
कुंडली के इस भाव पर किन्ही विशेष क्रूर ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को कब्ज,
दस्त, कमज़ोर पाचन-शक्ति के कारण होने वाली
बीमारियों,पेट में गैस-जलन जैसी समस्याओं, गुर्दों की बीमारीयों तथा ऐसी ही कुछ अन्य बीमारियों से पीड़ित कर सकता
है।
सातवाँ भाव
सातवाँ भाव पति या पत्नी और काम
का माना जाता है और इसका स्वामी फिर शुक्र बन जाता है , शुक्र जिसे हम इस दुनिया में भौतिक सुखों
का कारक मानते हैं वही नर यानी मंगल यानि रुधिर और मादा यानी शुक्र यानी वीर्य रूप
से श्रृष्टि का कारण बनता है वैसे भी लॉजिक एंगल से देखें तो शरीर में इन दोनों
तत्वों का होना ही जीवन का कारण बनता है ! अब यही सप्तम भाव फिर मारक बन जाता है
क्यों की जब हम भौतिकता की अधिकता या कह सकते हैं के भौतिक सुख को प्राप्त करने के
एवज में मारकता सहन करनी ही पड़ती है ! कुंडली के सातवें भाव को वैदिक ज्योतिष में
युवती भाव कहा जाता है तथा कुंडली के इस भाव से मुख्य तौर पर जातक के विवाह और
वैवाहिक जीवन के बारे में पता चलता है। इस प्रकार जातक के विवाह तथा वैवाहिक जीवन
से जुड़े अधिकतर प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए कुंडली के इस भाव का ध्यानपूर्वक
अध्ययन करना अति आवश्यक है। विवाह के अतिरिक्त बहुत लंबी अवधि तक चलने वाले प्रेम
संबंधों के बारे में तथा व्यवसाय में किसी के साथ सांझेदारी के बारे में भी कुंडली
के इस भाव से पता चलता है। कुंडली के सातवें भाव से कुंडली धारक के विदेश में
स्थायी रुप से स्थापित होने के बारे में भी पता चलता है, विशेष
तौर पर जब यह विवाह के आधार पर विदेश में स्थापित होने से जुड़ा हुआ हो।
अष्टम भाव
अष्टम भाव जिसे आयु और कष्टों
का भाव माना जाता है उसका स्वामी फिर वही मंगल और कारक शनि बन जाता है तो अगर मंगल
उर्जा के रूप में हमें जीवन देता है तो वही उर्जा दिए और वाती की तरह जब धीमी पड़नी
शुरू हो जाती है तो जीवन ख़तम हो जाता है , जैसे
जितना तेल हम दीपक में डालेंगे उतनी ही देर तक वह जलता रहेगा और उसके बाद उसे
बुझना ही पड़ेगा इसी प्रक्कर से अष्टम भाव कार्य करता है !कुंडली के आठवां भाव
कुंडली के आठवें भाव को वैदिक ज्योतिष में रंध्र भाव कहा जाता है तथा अपने नाम के
अनुसार ही कुंडली का यह भाव मुख्य तौर पर जातक की आयु के बारे में बताता है। किसी
कुंडली में आठवें भाव तथा लग्न भाव अर्थात पहले घर के बलवान होने पर या इन दोनों
घरों के एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों के प्रभाव में होने पर जातक की आयु सामान्य
या फिर सामान्य से भी अधिक होती है जबकि कुंडली में आठवें भाव के बलहीन होने से
अथवा इस भाव पर एक या एक से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक की आयु पर
विपरीत प्रभाव पड़ता है। कुंडली का आठवां भाव वसीयत में मिलने वाली जायदाद के बारे
में,अचानक प्राप्त हो जाने वाले धन के बारे में,किसी की मृत्यु के कारण प्राप्त होने वाले धन के बारे में तथा किसी भी
प्रकार से आसानी से प्राप्त हो जाने वाले धन के बारे में भी बताता है। कुंडली के
आठवां भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को बवासीर तथा गुदा से संबंधित अन्य
बीमारियों से पीड़ित कर सकता है।
नवम भाव
नवम भाव के बारे में चर्चा
करेंगे के यह भाव धरम का और भाग्य का माना जाता है और इसका स्वामी और कारक सिर्फ
एक की गृह बनता है वो है देव गुरु वृहस्पति जो के समस्त सुखों का कारक है और हमें
यही सन्देश देता है के हमें मानवता का धर्म अपनाते हुए ही करमरत रहना चाहिए क्यों
की चाहे इस संसार में आदमी ने कितने धरम बनाये हैं वो अपनी व्यक्तिगत सोच और
परम्परा के अनुसार बनाये जाते हैं पर कल्पुरुख लग्न के रूप में ईश्वर ने सिर्फ एक
ही धरम बनाया जो की सिर्फ मानवता ही है वैसे भी धरम का मतलब होता है धारण करना
यानी आप किसी विचार को धारण करते हैं और उसके बनाये नियम में चलते हैं ये सब कुछ
तभी बनाये गए क्यों की यह संसार विविद्ध संस्कृतियों के मेल जोल से बनता है और हम
एक दुसरे का आदर करते हुए सबसे कुछ न कुछ सीखते रहते हैं पर इस चीज़ को न भूलते हुए
के इश्वर को सिर्फ और सिर्फ मानवता का ही धरम अच्छा लगता है तभी जब काल्पुरुख कुंडली
की ब्रह्मा ने कल्पना की होगी तो शुक्र रुपी भौतिकता का ख्याल ना आते हुए
आध्यात्मिक देव गुरु वृहस्पति को ही इस पदवी का हक़दार बनाया गया क्यों की तमाम धरम
ग्रंथों व गीता का भी अंत का सन्देश सिर्फ मोक्ष को ही माना गया जिसका सन्देश
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था और इस पर निरर्थक वादविवाद से कोई फायदा
नहीं क्यों की मोक्ष का कांसेप्ट बहुत गहरा है जो हर किसी के बस की बात नहीं
!कुंडली के नवां भाव
कुंडली के नौवें भाव को वैदिक
ज्योतिष में भाग्य स्थान के नाम से जाना जाता है तथा कुंडली का यह भाव मुख्य तौर
पर जातक के पूर्व जन्मों में संचित अच्छे या बुरे कर्मों से इस जन्म में मिलने
वाले फलों के बारे में बताता है। कुंडली का नौवां भाव जातक के पूर्वजो के साथ भी
संबंधित होता है तथा इस भाव से जातक को अपने पूर्वजो से प्राप्त हुए अच्छे या बुरे
कर्मफलों के बारे में भी पता चलता है। कुंडली का नौवां भाव जातक की धार्मिक
प्रवृत्तियों के बारे में भी बताता है तथा उसकी धार्मिक कार्यों को करने की रुचि
एवम तीर्थ स्थानों की यात्राओं के बारे मे भी कुंडली के नौवें भाव से पता चलता है।
नौवें भाव पर शुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को बहुत धार्मिक बना देता है। कुंडली का
नौवां भाव विदेशों में भ्रमण तथा स्थायी रुप से स्थापित होने के बारे में भी बताता
है।
दसम भाव और एकादस भाव
दसम भाव का स्वामी और एकादस भाव
का स्वामी सिर्फ शनि को माना गया है और कारक दसम भाव का कर्म को माना गया है दसम
भाव ही कर्म करने की प्रेरणा देता है इसके और कारक जैसे सूर्य, बुध भी माने जाते हैं पर मुख्यता शनि को को
इसका अधिकार मिलता है, वहीँ ग्यारह भाव का स्वामी भी शनि ही
बनता है जिसका कारक गुरु को बनाया गया इससे यही निष्कर्ष निकलता है की शनि रुपी
करम जो के धीमी गति से चलता रहता है वही एकादस के रूप में धीमी गति से गुरु के रूप
में कैश फ्लो भी निरंतर देता रहता है यानी करम करोगे तभी फल के हकदार बन पायोगे
यही शनि का सन्देश है और शनि का एक और भी सन्देश है की निष्काम भाव से किये हुए
करम का असली फल गुरु के रूप में मिलता है , शनि सिर्फ और सिर्फ
करम वो भी असली करम यानी वह करम जिससे किसी को हानि न पहुंचे उसका फल ज़रूर अच्छा
देता है और गलत करम हालांकि हम कहीं ना कहीं करम करने को मजबूर भी होते हैं परन्तु
विवेक और बुधि का इस्तेमाल तो खुद ही करना पड़ता है उस रूप में भी शनि का न्याय
चक्र हमें नहीं छोड़ता उसकी चाहे जितनी पूजा कर लो, व्रत रख
लो मंत्र पढ़ लो इससे शनि कभी प्रभावित नहीं होते , शनि की
कृपा प्राप्त करने के लिए हमें सही कर्म करने पढेंगे तभी शनिदेव हमारी पुकार
सुनेगें नहीं तो ये कुछ ऐसा हुआ के कबूतर ने बिल्ली को देखा और आँखें बंद कर ली
उससे तो बिल्ली उसे ज़रूर खाएगी सो कर्म की असली परिभाषा को समझते हुए ही कर्म
करेंगे तो ज़रूर अच्छा फल मिलेगा !
कुंडली का दसवां भाव
कुंडली के दसवें भाव को वैदिक
ज्योतिष में कर्म भाव कहा जाता है,तथा
कुंडली का यह भाव मुख्य रूप से जातक के व्यवसाय के साथ जुड़े उतार-चढ़ाव तथा
सफलता-असफलता को दर्शाता है। कुंडली में दसवें भाव के बलवान होने से तथा इस भाव पर
एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने व्यवसायिक जीवन में
बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा उसका व्यवसायिक जीवन आम तौर पर बहुत सफल रहता है।
जातक के अपनी संतान के साथ संबंध तथा संतान से मिलने वाला सुख अथवा दुख देखने के
लिए भी कुंडली के इस भाव पर विचार करना आवश्यक है।
कुंडली का ग्यारवाँ भाव
कुंडली के ग्यारहवें भाव को वैदिक
ज्योतिष में लाभ भाव कहा जाता है तथा कुंडली का यह भाव मुख्य तौर पर जातक के जीवन
में होने वाले वित्तिय तथा अन्य लाभों के बारे में बताता है। ग्यारहवें भाव के
द्वारा बताए जाने वाले लाभ जातक द्वारा उसकी अपनी मेहनत से कमाए पैसे के बारे में
ही बताएं, यह आवश्यक
नहीं। कुंडली के इस भाव द्वारा बताए जाने वाले लाभ बिना मेहनत किए मिलने वाले लाभ
जैसे कि लाटरी में इनाम जीत जाना, सट्टेबाज़ी अथवा शेयर
बाजार में एकदम से पैसा बना लेना तथा अन्य प्रकार के लाभ जो बिना अधिक प्रयास किए
ही प्राप्त हो जाते हैं, भी हो सकते हैं
कुंडली के ग्यारहवें भाव के
बलवान होने पर तथा इस भाव पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर जातक
अपने जीवन में आने वाले लाभ प्राप्ति के अवसरों को शीघ्र ही पहचान जाता है तथा इन
अवसरों का भरपूर लाभ उठाने में सक्षम होता है जबकि कुंडली के ग्यारहवें भाव के
बलहीन होने पर जातक अपने जीवन में आने वाले लाभ प्राप्ति के अधिकतर अवसरों को सही
प्रकार से समझ नही पाता तथा इस कारण इन अवसरों से कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता।
बारहवां भाव
द्वादस यानी बारहवां भाव माना
जाता है उसका स्वामी भी वृहस्पति को बनाया गया जो के नवं भाग्य और धरम का भी
स्वामी है उसका सन्देश यही है के अच्छे कर्म करते रहने से ही मोक्ष की प्राप्ति
होगी और ये भाव खर्च का भी बनता है जो यही सन्देश देता है की अच्छे कामों में हमें
अपना धन लगाना चाहिए और इस संसार में प्रथम भाव के रूप में जनम लेने के बाद
सांसारिक जिम्मेदारियों का अच्छे रूप से निर्वहन करने के बाद मोक्ष की प्राप्ति की
और कदम बढ़ाने चाहियें तभी हमारा जीवन में आने का असली मकसद पूरण हो पायेगा,कुंडली के बारहवां भाव
कुंडली के बारहवें भाव को वैदिक
ज्योतिष में व्यय भाव कहा जाता है तथा कुंडली का यह भाव मुख्य रुप से जातक के
द्वारा अपने जीवन काल में खर्च किए जाने वाले धन के बारे में बताता है तथा साथ ही
साथ कुंडली का यह घर यह संकेत भी देता है कि जातक के द्वारा खर्च किए जाने वाला धन
आम तौर पर किस प्रकार के कार्यों में लगेगा। कुंडली के बारहवें भाव के बलवान होने
की स्थिति में आम तौर पर जातक की कमाई और व्यय में उचित तालमेल होता है तथा जातक
अपनी कमाई के अनुसार ही धन को खर्च करने वाला होता है, जिसके कारण उसे अपने जीवन में धन को
नियंत्रित करने में अधिक कठिनाई नहीं होती जबकि कुंडली के बारहवें भाव के बलहीन
होने की स्थिति में जातक का खर्च आम तौर पर उसकी कमाई से अधिक होता है तथा इस कारण
उसे अपने जीवन में बहुत बार धन की तंगी का सामना करना पड़ता है।
कुंडली का बारहवां भाव जातक की
विदेश यात्राओं के बारे में भी बताता है तथा किसी दण्ड के फलस्वरूप मिलने वाला देश
निकाला भी कुंडली के इसी भाव से देखा जाता है। किसी व्यक्ति का अपने परिवार के
सदस्यों से दूर रहना भी कुंडली के इस भाव से पता चल जाता है।जातक के जीवन के किसी
विशेष समय में उसके लंबी अवधि के लिए अस्पताल जाने अथवा कारावास में बंद होने जैसे
विषयों के बारे में जानने के लिए भी कुंडली के इस भाव को देखा जाता है।
बारहवां भाव व्यक्ति के जीवन
में मिलने वाले शय्या के सुख के बारे में भी बताता है तथा यह भाव जातक की निद्रा
के बारे में भी बताता है। कुंडली के इस भाव पर किन्ही विशेष बुरे ग्रहों का प्रभाव
जातक को निद्रा से संबंधित रोग या परेशानियों से पीड़ित कर सकता है।
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