60 संवसरो में जन्मे जातको के फल आपके जन्म की सम्वत का नाम और फल स्वयं देखे

ज्योतिष वर्ष संवत्सर विवेचन :60 संवत्सर के बारे में 


संवत्सर हमारे कैलेंडर में 2 आते है 1. शाके 2. विक्रम 

विक्रम से शाके और शाके से विक्रम संवत् ज्ञात करने की रीति


Ilविक्रमादित्यवर्षेभ्यःपञ्चत्रिंशोत्तरंशतम्।पातयित्वा भवेच्छाकं मानं तस्माच्च ते स्मृताः ll


विक्रम संवत् में से 135 घटाने से शाके संवत् ज्ञात होता है और

शाके संवत् में 135 जोड़ने पर विक्रम संवत ज्ञात होता है।

उदाहरण- मान लो विक्रम संवत् 2054 से शाके संवत् बनाना है

135 = 1919 अतः शाके संवत् 1919 ज्ञात हुआl और 

यदि शाके संवत् 1919 हो और विक्रम संवत् ज्ञात करना हो तो 1919 +135

= 2054 अतः विक्रम संवत् 2054 ज्ञात हुआ।

टिप्पणी-यह ध्यान रखें कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से विक्रम संवत् का प्रारम्भ

होता है जबकि मेष संक्रान्ति काल से शाके संवत् का प्रारम्भ होता है। अतः चैत्रशुक्ल प्रतिपदा से मेष संक्रान्ति के मध्य में विक्रम संवत् से शाके संवत् ज्ञातकरना हो तो विक्रम संवत् में से 136 घटाने से शाके संवत् होता है। मेष संक्रान्तिसे आगे 135 घटाना चाहिए ।

 नया वर्ष लगने पर नया संवत्सर भी प्रारंभ होता है। आओ जानते हैं कि संवत्सर किसे कहते हैं।

संवत्सर (संवत्सर) वैदिक साहित्य जैसे ऋग्वेद और अन्य प्राचीन ग्रंथों में "वर्ष" के लिए एक संस्कृत शब्द है। मध्ययुगीन युग के साहित्य में, एक संवत्सर "जोवियन वर्ष" को संदर्भित करता है, जो कि बृहस्पति ग्रह की सापेक्ष स्थिति पर आधारित वर्ष है, जबकि सौर वर्ष को वर्ष कहा जाता है ।पृथ्वी और सूर्य की सापेक्ष स्थिति के आधार पर एक जोवियन वर्ष एक सौर वर्ष के बराबर नहीं है।


एक संवत्सर को भारतीय कैलेंडर में उस समय के रूप में परिभाषित किया गया है जब बृहस्पति (बृहस्पति) हिंदू राशि चक्र (यानी राशी 30°) के एक संकेत से अपनी औसत गति के अगले सापेक्ष में पारगमन करता है।  प्राचीन पाठ सूर्य सिद्धांत में एक संवत्सर की गणना लगभग 361 दिनों की होती है, जो कि एक सौर वर्ष से कुछ ही कम है। इसलिए, राशि चक्र के सभी बारह राशियों के माध्यम से बृहस्पति की एक पूर्ण परिक्रमा 360° लगभग बारह सौर वर्षों के बराबर होगी। बृहस्पति की ऐसी पाँच परिक्रमाएँ (अर्थात् 12 गुणा 5 = 60 संवत्सर) संवत्सर चक्र कहलाती हैं । इस चक्र के प्रत्येक संवत्सर को एक नाम दिया गया है। एक बार जब सभी 60 संवत्सर समाप्त हो जाते हैं, तो चक्र फिर से शुरू हो जाता है।


प्राचीन ग्रंथ सूर्य सिद्धांत में जोवियन वर्ष की गणना लगभग 361.026721 दिन या पृथ्वी-आधारित सौर वर्ष से लगभग 4.232 दिन कम है।  इस अंतर की आवश्यकता है कि प्रत्येक 85 सौर वर्ष (~ 86 जोवियन वर्ष) में एक बार, नामित संवत्सर में से एक को दो कैलेंडरों को सिंक्रनाइज़ करने के लिए (छाया वर्ष के रूप में छोड़ दिया गया) हटा दिया जाता है। 


दक्षिण भारत में चूक की यह प्रणाली अनुपयोगी हो गई है। "यह दिखाने के लिए सबूत हैं कि बृहस्पति का चक्र शक 828 (905-6 ईस्वी) से पहले दक्षिणी भारत में उपयोग में था; लेकिन उस वर्ष से, आर्य सिद्धांत के अनुसार, या शक 831 (एडी 908-9) के अनुसार सूर्य-सिद्धांत, संवत्सरों का निष्कासन पूरी तरह से उपेक्षित था, जिसके परिणामस्वरूप दक्षिण में 60 साल का चक्र उस वर्ष से चंद्र-सौर बन गया। 


60 संवत्सर का यह चक्र आकाश में बृहस्पति और शनि की सापेक्ष स्थिति पर आधारित है। बृहस्पति और शनि की कक्षीय अवधि क्रमशः लगभग 12 और 30 सौर वर्ष है। इन दो कक्षीय अवधियों का सबसे कम सामान्य गुणक ~ 60 सौर वर्ष है। हर साठ साल में, दोनों ग्रह लगभग उसी नाक्षत्र निर्देशांक पर स्थित होंगे जहां उन्होंने साठ साल पहले शुरू किया था, इस प्रकार एक साठ साल का चक्र बनता है।


जैसे बारह माह होते हैं उसी तरह 60 संवत्सर होते हैं। संवत्सर अर्थात बारह महीने का कालविशेष। सूर्यसिद्धान्त अनुसार संवत्सर बृहस्पति ग्रह के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं। 60 संवत्सरों में 20-20-20 के तीन हिस्से हैं जिनको ब्रह्माविंशति (1-20), विष्णुविंशति (21-40) और शिवविंशति (41-60) कहते हैं।


02 अप्रैल 2022 चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष से नया हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2079 शुरू हो गया  जो वर्तमान में है  इस संवत्सर का नाम नल है। इन नव संवत्सर के राजा शनिदेव और मंत्री गुरू हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार हर हिंदू नववर्ष के आगमन पर इनके राजा,मंत्री और इनका मंत्रिमंडल निर्धारित होते है 

5 वर्षीय योजना का प्रारूप युग से है, प्रत्येक युग( जिनका फल अगली पोस्ट में ) के जो पांच वर्ष हैं, उनमें से प्रथम का नाम संवत्सर है। दूसरा परिवत्सर, तीसरा इद्वत्सर, चौथा अनुवत्सर और पांचवा युगवत्सर है। 12 वर्ष बृहस्पति वर्ष माना गया है। बृहस्पति के उदय और अस्त के क्रम से इस वर्ष की गणना की जाती है। इसमें 60 विभिन्न नामों के 361 दिन के वर्ष माने गए हैं। बृहस्पति के राशि बदलने से इसका आरंभ माना जाता है। 

चैत्र का महीना हिंदू नववर्ष का पहला माह होता है और  होता है।

संवत्सर का नाम जानने की सरल रीति


शाक रामाक्षि (23) संयुक्त कृत्वा षष्टया विभाजयेत् ।

शेषात् संवत्सरो ज्ञेयो प्रभवाद्यो बुधैः प्रभवाद्यो बुधैः सदा।


शाके संवत् में 23 जोड़कर 60 से भाग देने पर शेष तुल्य प्रभवादि संवत्सर संख्या जाननी चाहिए।


टिप्पणी-वस्तुत 23 जोड़कर 60 से भाग देने पर गत संवत्सर ठीक ज्ञात नहीं होता है। यदि गत संवत्सर जानना है तो शाके संवत्सर में 24 जोड़कर 60 से

भाग देना चाहिए या शेष में एक जोड़कर गत संवत्सर की संख्या समझनी चाहिए।


यहां श्लोक में वास्तव पाठ 'शाके वेदाक्षि संयुक्त समझना चाहिए।


उदाहरणतः पूर्व उदाहरण के शाके संवत् 1919 का संवत्सर नाम ज्ञात करते हैं।

1919 शाके संवत्

  +23

------------------

   1942

-------------------

60) 1942 (32

       180

--------------------

       142

       120

-------------------

         22

         +1

-------------------

         23

यहाँ शेष 22 में जोड़ने पर गत संवत्सर संख्या 23 प्राप्त हुई जोकि विरोधी नामक संवत्सर है।

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60 संवसरो में जन्मे जातको के फल आपके जन्म की सम्वत का नाम और फल स्वयं देखे

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प्रभवादि साठ संवत्सरों के नाम इस प्रकार हैं-


1. प्रभव 11. ईश्वर 21. सर्वजित् 31. हेमलम्बी 41. प्लवङ्ग 51.पिङ्गल


2. विभव 12. बहुधान्य 22. सर्वधारी 32. विलम्बी 42. कीलक 52. कालयुक्त


3. शुक्ल 13. प्रमाथी 23. विरोधी 33. विकारी 43. सौम्य 53. सिद्धार्थी


4. प्रमोद 14. विक्रम 24. विकृति 34. शार्वरी 44. साधारण 54. रुद्र


5. प्रजापति 15. वृष 25.खर 35. प्लव 45. विरोधकृत 55. दुर्मति


6. अङ्गिरा 16. चित्रभानु 26. नन्दन 36. शुभकृत् 46. परिधावी 56. दुन्दुभी


7.श्रीमुख 17.सुभानु 27.विजय 37. शोभन 47. प्रमादी 57.रुधिरोद्गारा।


8. भाव 18. तारण 28. जय 38. क्रोधी 48. आनन्द 58. रक्ताक्ष


9. युवा 19. पार्थिव 29. मन्मथ 39. विश्वास 49. राक्षस 59.क्रोधन।


10, धाता 20. व्यय 30. दुर्मुख 40. पराभव 50. नल 60. क्षय


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इन साठ संवत्सरों में प्रथम तीस की संज्ञा ब्रह्मविंशतिका है, अगले तीस

संवत्सरों की संज्ञा विष्णु विंशतिका और अगले बीस संवत्सरों की संज्ञा रुद्र

विंशतिका है। इनके प्रधान देवता क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं जो उत्तरोत्तर

क्रम से सृष्टि, स्थिति व प्रलय के तुल्य फलदायक हैं।


टिप्पणी- गुरु ग्रह मध्यम गति से जितने काल में एक राशि को भोगता है उतने

काल को संवत्सर कहते हैं। बृहस्पति की एक दिन की मध्यम गति 5 कला है।

एक राशि के 30 अंश (30 x 60 1800) में 1800 कलाएं होती हैं। इनमें

बृहस्पति की मध्यम गति 5 कला से भाग देने पर (1800 + 5 = 360) 360

दिन प्राप्त होते हैं जोकि एक संवत्सर के तुल्य हैं। एक संवत्सर एक वर्ष तक

रहता है। इस प्रकार प्रत्येक 60 वर्ष के एक चक्र में एक-एक संवत्सर का नाम

होता है। जोकि वर्षारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर फाल्गुन कृष्ण

अमावस्या तक रहता है। नित्य कर्म और अन्य संस्कारों में वर्ष पर्यन्त संकल्प में

संवत्सर का नाम लिया जाता है।

यह

प्रभवादि संवत्सर के आरम्भ में मध्यम बृहस्पति का कुम्भ राशि में प्रवेश

हुआ था, इसीलिए प्रभवादि संवत्सर संख्या में 12 का भाग देने से जो शेष बचे

वह क्रमश: कुम्भ आदि (1 कुम्भ, 2 मीन, 3 मेष, 4 वृष, 5 मिथुन, 6 कर्क, 7

सिंह, 8 कन्या, 9 तुला, 10 वृश्चिक, 11 धनु एवं 12 या 0 मकर) राशि समझनी

चाहिए। जैसे मान लो विकृति संवत्सर मध्यम गुरु की कौन सी राशि में है,

जानना है तो विकृति संवत्सर की क्रम संख्या 24 में 12 का भाग देने पर लब्धि

2 एवं शेष 0 आया, अतः बृहस्पति मकर राशि में था। जिस संवत्सर में स्पष्ट

गुरु की मार्गी गति से एक राशि में संचार हो तो वह शुद्ध संवत्सर होता है।

जिस संवत्सर में मार्गी गति से स्पष्ट गुरु की अग्रिम राशि में संचार हो तो वह

अधिक संवत्सर होता है। जिस संवत्सर में मार्गी गति से स्पष्ट गुरु का दो राशि

में संचार हो तो वह लुप्त (क्षय) संवत्सर कहलाता है।


01.प्रभव संवत्सर में जन्म लेने वाला व्यक्ति (जातक) अपनी जाति, कल -

धर्म का पालक, विद्वान्, महाबली, क्रूर बुद्धि और शास्त्रज्ञ (शास्त्रविहित का

करने वाला) होता है।


02.विभव संवत्सर में जन्म लेने वाला व्यक्ति (जातक) स्त्री सदृश स्वभाव

वाला, चंचल, चोर, धनी और परोपकारी होता है।


03.शुक्ल संवत्सर में जन्म लेने वाला व्यक्ति (जातक) शुद्ध, शान्त, सुशील, पराई

स्त्रियों से पूजित (सम्मानित), दूजों का उपकार करने वाला और स्वयं निर्धन होता है।


04.प्रमोद संवत्सर में जन्म लेने वाला व्यक्ति (जातक) कभी सम्पत्ति और

कभी स्त्री की प्राप्ति से सुखी, कभी अपने बन्धु मित्र व शत्रु से झगड़ा करता है

एवं राजा से पूजित या राजमन्त्री होता है।


05.प्रजापति संवत्सर में जन्म लेने वाला व्यक्ति (जातक) प्रजा का पालन करके

सन्तुष्ट होता है, दाता, भोगी, अधिक सन्तान वाला और विदेश में विख्यात होता है।।


06.अंगिरा नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला व्यक्ति (जातक) सत्क्रिया आप

आचार से युक्त, धर्म एवं आगम शास्त्रों का ज्ञाता, अतिथि और मित्रों का भक्त होता है


07.श्रीमुख नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला व्यक्ति (जातक) धनी, देवताओं का

भक्त धातुशास्त्र (Metallurgy) में प्रवीण और पाखण्ड पूर्ण कार्यों में निपुण होता है।


08.भाव नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला व्यक्ति (जातक) समस्त कार्यों

को करने की भावना रखने वाले और मछली व मांस को खाने वाला अर्थात्

मांसाहारी होता है।


09.युवा नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला व्यक्ति (जातक) पत्नी के लिए दुःखी,

जल से डरने वाला, आधि-व्याधि से दुःखी और सदैव प्रसन्नचित्त रहता है।


10.धाता नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) धनी, सुन्दर, सज्जन, धर्मात्मा,

निर्धनों का रक्षक, सुशील और सुन्दर रूप से युक्त होता है।


11.ईश्वर नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति धनी, भोगी, कामी,पशु-पालक एवं अर्थ व धर्म से युक्त होता है।


12.बहुधान्य नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) वेदशास्त्र का ज्ञाता,

कला और संगीत को जानने वाला, गर्वहीन और मदिरापान करने वाला होता है।


13.प्रमाथी नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) परस्त्रीगामी, परधनहर्ता

व्यसनी और जुआरी होता है।


14.विक्रम नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) सन्तुष्ट, व्यसन से

प्रतापी, जितेन्द्रिय, वीर एवं शास्त्रज्ञ होता है।


15.वृष नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) मोटे पेट, मोटे पैर एवं छोटे।

हाथ वाला, कुल पर अभिमान एवं कुल की पालना करने वाला धर्म व धन युक्त |

और बहुत सम्पत्ति अर्जित करने वाला होता है।


16.चित्रभानु नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) तेजस्वी, अधिक गर्व

करने वाला, अपना हित साधने वाला, स्थिर और नित्य देवताओं की आराधना में |

तत्पर रहता है।


17.सुभानु नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) शुभ कार्य करने वाला, मित्र

व शत्रु दोनों से लाभ पाने वाला और सब वस्तुओं का संग्रह करने वाला होता है।


18.तारण नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) सबका प्रिय, सभी धर्मो ।

को मानने वाला और राजा से सम्मान सहित धन पाने वाला होता है।


19.पार्थिव नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) शिव और ब्रह्मा सदृश ।

कार्य करने में समर्थ शुभ और सुख को देने वाला, कल्याण से युक्त और धर्मात्मा

होता है।


20.राय नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) दानी, भोगी, निज द्वारा

कार्यों से लोक में प्रधान, सुखी और मित्रों को लाभ कराने वाला होता है।


21.सर्वजित् नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला जातक (व्यक्ति) सब शत्रुओं

को जीतने वाला, वैष्णव धर्म में प्रवीण और पुण्य कर्मों को करने वाला होता है।


22.सर्वधारी नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला जातक (व्यक्ति) माता-पिता

का प्रिय, गुरु-भक्त, वीर, शान्त और प्रतापी होता है।


23.विरोधी नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला जातक (व्यक्ति) कार्य करने में

प्रवीण, मछली और मांस प्रिय अर्थात् मांसाहारी, धार्मिक बुद्धि, सदैव प्रशंसितं

और लोक में मान्य होता है।


24.विकृति नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) चित्रकार, नृत्य का ज्ञाता,

संगीतकार, संशय रहित, दानी, सम्मानित और भोगी होता है।


25.खर नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) दूजों को मारने वाला अर्थात्

हिंसक, मैत्री के बल पर दजों का धन निज कार्यों में लगाने वाला, कुटुम्ब का

पोषण करने वाला और उत्साही होता है।


26.नन्दन नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) सदैव प्रसन्नचित्त परिवार

का कल्याण करने वाला एवं राजा से विशेष रूप से मान्य होता है।


27.विजय नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) सुन्दर देह से युक्त, दी

यश, सुख, सब कार्यों से लाभ पाने वाला और युद्ध में शत्रुओं पर विजय पार

वाला होता है।


28.जय नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) युद्ध में शत्रु को जीतने

वाला, स्त्री, शत्रु व मित्र से लाभ पाने वाला और व्यापार में कुशल होता है।


29.मन्मथ नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) अत्यन्त कामुक, अति

बुद्धिमान, अधिक तृष्णा रखने वाला, धनी, अति निष्ठुर, अति भोगी और अत्यन्त

बलवान होता है।


30.दुर्मुख नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) पवित्र, शान्त, कार्यों में

दक्ष, गुणों के कारण सर्वत्र पूजित, परोपकारी और वाद-विवाद करने वाली कटुभाषिणी स्त्री का पति होता है।


31.हेमलम्बी नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) मणि, मोती, रत्न और।

अष्टधातु से परिपूर्ण होते हुए भी कृपण होता है, परन्तु धनी होने के कारण लोक

में मान्य होता है।


32.विलम्बी नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) आलसी, रोगी, दुःखा।

और बड़े परिवार वाला होता है जिनका पोषण उसके हाथों होता है।


33.विकारी नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) रक्त विकार से युक्त,

लाल नेत्र, पित्त प्रकृति, वन में भ्रमण करने का प्रेमी और दरिद्र होता है।


34.शर्वरी नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) वेद-शास्त्र का ज्ञाता, देवता

और ब्राह्मण में श्रद्धा रखने वाला और लोक द्वारा सम्मानित एवं पूजित होता है।


35.प्लव नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) निद्राप्रिय, अधिक भोगी,

व्यवसायी, यशस्वी और लोक द्वारा सम्मानित व पूजित होता है।


36.शुभ नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) कर्मठ, यशस्वी, धार्मिक,

तपस्वी, प्रजापालक और निपुण होता है।


37.शोभन नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) मनस्वी, शान्त चित्त,

शूर, दाता, बूढ़ा कभी न हो और न कभी निज पूर्णता से लाभ उठाता है।


38.क्रोधी नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) क्रोध करने वाला, वीर,

वैज्ञानिक, औषधि संग्रह करने वाला और दूजों को व्यर्थ दोष देने वाला होता है।


39.विश्वासु नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) राज चिह्नों (छत्र, दण्ड,

ध्वज, चामर आदि) से सुशोभित और संसार में प्रधान व्यक्ति (प्रधान, राजमन्त्री)

बनकर रहता है।


40.पराभव नामक संवत्सर में उत्पत्र जातक (व्यक्ति) डरपोक और ठण्ड से डरने वाला , कायर, अधर्मी और दूसरों का घात करने वाला होता है।


41.प्लवङ्ग नामक संवत्सर में उत्पत्र जातक भयंकर चोरी करने वाला, भूपति

जननायक तथा योगाभ्यासी होता है।


42.कीलक नामक संवत्सर में उत्पत्र जातक (व्यक्ति) चित्रकार, सम्मानित,

विप्रों का प्रिय और माता-पिता का भक्त होता है।


43.सौम्य नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) पवित्र, सुशील, समदृष्टि

रखने वाला, जितेन्द्रिय, अत्यन्त व्याकुल, जनता का सेवक एवं सुफलों को प्राप्त

करने वाला होता है।


44.साधारण नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) व्यवसायी, थोड़े से ।

सन्तुष्ट, धर्म-कर्म में तत्पर और मन्त्रज्ञ होता है।


45.विरोधकृत नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) स्वजनों या बन्धुवा ।

का विरोधी, जल्दी प्रसन्न होने वाला व जल्दी बरा मानने वाला और कुकना

(आवारा) होता है।


46.परिधावी नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) अल्पबुद्धि,

समय में कम कार्य करने वाला, देशाटन करने वाला, देवता एवं तीथों का भक्त

होता है।


47.प्रमादी नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) गन्ध, माला, चन्दनादि

(पंचोपचार) से शिवजी की पूजा करने वाला और आन्तरिक व बाह्य शुद्धि करने

में व्यस्त रहता है।


48.आनन्द नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) आनन्द से युक्त, सदैव

अतिथि का सत्कार करने वाला और प्रतिदिन स्वजनों से धन प्राप्त करने वाला

होता है।


49.राक्षस नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) मछली व मांस का शौकीन

(मांसाहारी), हिंसक, मद्य का सेवन करने वाला और व्यर्थ में पाप करने वाला

होता है।


50.नल नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) अनेक पुत्र व मित्र वाला,

धन का लोभी, झगड़ा करने वाला, हानि, शोक व दु:ख पाने वाला होता है।


51.पिङ्गल नामक सवंत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) पित्त प्रकोप से ग्रसित,

अनेक रोग से पीड़ित और अनेक प्रकार के वाहन की सवारी का सुख भोगने

वाला होता है।


52.कालयुक्त नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) कृषि और वाणिज्य

में निपुण, तेल व बर्तनों का संग्रह करने वाला और क्रय-विक्रय के कार्य में निपुण होता है।


53.सिद्धार्थी नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) वेद और शास्त्रीतत्त्व को जानने वाला, शुद्ध हृदयी, मृदुस्वभाव, सुकुमार शरीर, राजा से सम्मान पाने वाला और कवि होता है।


54.रुद्र नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला जातक (व्यक्ति) चोर, चंचल, ढीठ(जिद्दी), पराए धन का लोभी और कुकर्मों को करने वाला होता है।


55.दुर्मित नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला जातक (व्यक्ति) पाप बुद्धि,पापी, पापियों की संगति तथा सदैव वधकर्म (हिंसा) में तत्पर होता है।


56.दन्दभी नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला जातक (व्यक्ति) गायन, संगीत,शिल्प, मन्त्र और औषधि सम्बन्धी कार्यों को जानने वाला और सर्वगुण सम्पन्न


57.रूधिरोद्गारी नामक संवत्सर में जन्म लेने वाला जातक (व्यक्ति) वायु व रक्त विकार से ग्रसित, कफ व वात रोग वाला और झूठी गवाही देने वाला होता है।


58.रक्ताक्ष नामक संवत्सर में उत्पन्ने जातक (व्यक्ति) देश का त्याग करना वाला, धन का नाश करने वाला, सभी कार्यों में हानि उठाने वाला और रख (बिना विवाह के रखी हुई स्त्री) रखता है।


59.क्रोधन संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) क्रोध करने वाला, दूजों को भी क्रोध दिलाने वाला, सिंह सदृश पराक्रमी, वेदज्ञाता (ब्राह्मण) और दूजों से आजीविका पाने वाला होता है।


60.क्षय नामक संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) स्वजनों से कलह करने वाला, मदिरा और वेश्या में प्रेम रखने वाला तथा धर्म-अधर्म का विचार न रखनेवाला होता है।क्षय (लुप्त) संवत्सर में उत्पन्न जातक (व्यक्ति) दरिद्र, बुद्धिहीन, क्रोधी,

कृश शरीर और दूजों से द्वेष करने वाला होता है।


61.अधिक संवत्सर में जो मनुष्य जन्म लेता है, वह धन-धान्य व सुख से युक्त, बुद्धिमान, राजा से सम्मानित और पुत्र-पुत्रादि से युक्त होता है।

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