कुण्डली में धनकारक ग्रह ढूंढ़ना

 कुण्डली में धनकारक ग्रह ढूंढ़ना 


यह पूरा समाज अर्थ प्रधान है। पैसा आज एक बहुत बड़ी जरूरत बन गया है। अधिकांश लोगों के लिए आज पैसा ही भगवान/सब कुछ है। बाकी लोगों के लिए पैसा ’सब कुछ’ भले ही न हो, किन्तु ’बहुत कुछ’ अवश्य है। ऐसे लोग विरले ही होंगे जो पैसे को कुछ न समझते हों। अतः अपनी आर्थिक स्थिति या धन कब प्राप्त होगा ? के सम्बन्ध में प्रत्येक व्यक्ति जिज्ञासु रहता है। पीछे फलित में कुछ धन प्रदायक योगों की चर्चा कर आएं हैं। किन्तु ऐसे योग सभी लोगों की कुंडलियों में नहीं होते। तथापि समयानुसार धन तो सबके पास ही कम या अधिक आता ही रहता है।

इस सरल विधि द्वारा कुंडली के धनेश, भाग्येश, लाभेश, लग्नेश, सुखेश, व्ययेश, कर्मेश आदि को देखे बिना तथा अध्ययन विश्लेषण के झमेले में पड़े बिना मात्र 2 मिनट में ही कुंडली का/के वह ग्रह ज्ञात किया जा सकता/किए जा सकते हैं जिनकी महादशा/अंतर्दशा/प्रत्यंतर दशा में जातक को निश्चित ही अपनी आशा/अपेक्षा से अधिक धन की प्राप्ति होती है। अतः इसको ’धनकारक ग्रह को ढूंढ़ना’ कहते हैं। यदि दुर्भाग्यवश ऐसे धनकारक ग्रह की महादशा जातक के जन्म के साथ ही बचपन में निकल गई हो तो जातक के माता-पिता का आर्थिक स्तर उस दौरान अवश्य ही उन्नत हुआ होता है। किसी भी ग्रह की महादशा एक ही बार आती है। अतरू इसे जातक के लिए दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। फिर भी उस ग्रह की अन्तरदशा/प्रत्यंतर दशा में जातक अवश्य ही लाभान्वित होता है।

इसी प्रकार यदि ’धनकारक ग्रह’ की महादशा जातक की वृद्धावस्था में आए तो भी दुर्भाग्य ही मानना चाहिए। क्योंकि धन जवानी में मिले तभी आदमी सुखोपभोग/म्छश्रव्ल् कर सकता है। वे लोग निश्चित ही भाग्यशाली कहे जाने चाहिए जिनके धन कारक ग्रह की महादशा जवानी में आए अथवा उनकी कुंडली में एक से अधिक ग्रह धन कारक हों।

विधि

लग्नकुंडली के नवम भाव को देखें। अथवा लग्न से 9 गिनें। नवम भाव में जो राशि हो उसके स्वामी ग्रह के ’मानांक’ को नोट करें।

चन्द्रकुंडली से नवम भाव देखें। अथवा लग्नकुंडली में चन्द्रमा जहां बैठा हो, वहां से नौ गिनें। नौवें भाव में जो राशि हो उसके स्वामी ग्रह का ’मानांक’ भी नोट कर लें।

दोनों ’मानांकों’ का योग करें। योगफल को 12 द्वारा भाग दे दें और ’शेषफल’ को नोट कर लें।

जो ’शेषफल’ प्राप्त हुआ हो उस संख्या को लग्नकुंडली में चन्द्रमा जहां बैठा है, उस स्थान से गिनें। जहां गिनती समाप्त हो जाए उस भाव में जो ग्रह बैठा होता है, वह ’धनकारक’ होता है। यदि उस भाव में कोई ग्रह न बैठा हो तो भाव का स्वामी ’धनकारक’ होता है। यदि बहुत से ग्रह उस भाव में बैठे हों तो वे सभी ग्रह ’धनकारक’ होते हैं। 

विशेष

परन्तु बहुत से/एक से अधिक ’धनकारक’ ग्रह होने पर उनमें प्रधान/विशेष लाभ देने वाला उस भाव में पड़ने वाली राशि का स्वामी ही होता है। न कि भाव में बैठने वाले ग्रह।

आपका धनकारक ग्रह शनि हो या मंगल-उसके क्रूर होने की चिन्ता न करें। वह अपना जो प्रभाव कुंडली के अनुसार देगा वह नहीं बदलेगा। लेकिन उसकी दशा/अन्तर/प्रत्यंतर दशा में प्रचुर धन की प्राप्ति जातक को जरूर होगी। नीचे ग्रहों की मानांक सारिणी दी जा रही है। 

ग्रह मानांक सारिणी

सूर्य-30, चन्द्र-16, मंगल-6, बुध-8, गुरु-10, शुक्र-12, शनि-1 

उदाहरण-सुविधा के लिए एक उदाहरण देखें। प्रस्तुत कुंडली में धनकारक ग्रह गुरु है। देखिए उसे कैसे निकाला गया?

लग्न से नौवां भाव देखा। यहां गुरु की राशि है। अतरू गुरु वहां का स्वामी है (यह संयोग है कि वह वहीं बैठा है)। मानांक सारिणी में गुरु का मान नोट किया जोकि 10 है (प्रथम चरण पूर्ण हुआ)।

स्वयं लेखक की कुंडली 

चन्द्रमा चैथे भाव में है। चन्द्रमा से नौवां भाव गिना जो कि कुंडली का बारहवां भाव है। यहां बुध की राशि है। बुध यहां का स्वामी है। अतः मानांक सारिणो से बुध का मान 8 नोट किया।

दोनों मानांकों का योग करके 12 से भाग दिया। यानी 10$8 = 18(») 12 भाग करने से शेषफल 6 प्राप्त हुआ।

अब कुंडली में चन्द्रमा जहां बैठा है वहां से छठा भाव गिना जो कि कुंडली का नौवां भाव है। यहां गुरु की राशि है। अतः यहां का स्वामी गुरु धन कारक हुआ। (संयोग से गुरु वहीं बैठा है। यदि यह भाव खाली होता तो भी गुरु ही धनकारक होता, भले ही वह कुंडली में कहीं भी बैठा होता। इसी प्रकार यदि इस भाव में गुरु के अलावा कोई और ग्रह बैठा होता तो वह भी गुरु के साथ ’धनकारक’ ही माना जाता!)

उदाहरण में दी गई कुंडली मेरी है। मेरा जन्म गुरु की महादशा में ही हुआ था। और जैसा कि मेरे स्वर्गीय पिता मुझे बताते थे तथा माताजी बताती हैं। मैं उनके लिए अति भाग्यवान था। मेरे जन्म के साथ ही घर के हालात बहुत बेहतर होते चले गए थे। (क्योंकि बालक का भाग्य माता-पिता से जुड़ा होता है। यदि माता-पिता समर्थ व धनवान होंगे तभी बालक का लालन-पालन भली प्रकार कर पाएंगे)।

पाठकों की जानकारी के लिए. फिल्म अभिनेता श्री अमिताभ बच्चन की कुंडली में शनि धनकारक ग्रह है तथा शुक्र भी है। जब अमिताभ की कम्पनी ।ठब्स् घाटे में गई और वे करोड़ों के कर्ज में आ गए तब शनि की ही शनि दशा/अर्न्तदशा में उन्होंने ’कौन बनेगा करोड़पति’ सीरियल किया। जिससे उनको प्रचुर धन प्राप्त हुआ और वे उऋण हो पाए। पाठकों के विवेचन के लिए उनकी कुंडली भी प्रस्तुत है

फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की कुंडली 


प्रस्तुत कुंडली में सर्वप्रथम लग्न से नौ गिना तो नौवां भाव प्राप्त हुआ। यहां शुक्र की राशि है। अतः यहां के स्वामी शुक्र का मानांक-12 नोट कर लिया।

फिर चन्द्रमा (जो नौवें भाव में बैठा है) से नौवां भाव गिना तो पांचवां भाव प्राप्त हुआ। यहां बुध की राशि है। अतः यहां का स्वामी बुध हुआ, उसका मानांक-8 नोट कर लिया।

शुक्र व बुध के मानांक को जोड़ा (12़+8=20) तो 20 प्राप्त हुआ, जिसे 12 से भाग देने पर भागफल 8 आया।

अब चन्द्रमा से 8वां भाव गिना जो कि कुंडली का चैथा भाव है। यहां शनि बैठा है। अतः शनि अमिताभ बच्चन के लिए धनकारक हुआ तथा यहां की राशि का स्वामी शुक्र भी धनकारक हुआ। (शुक्र के धनकारक होने से सिनेमा/कला/फोटोग्राफी/अभिनय के माध्यम से धन प्राप्ति हुई) शनि की दशा/अंतर्दशा या शुक्र की दशा/अंतर्दशा तथा महादशा अमिताभ को प्रमुख रूप से धन प्राप्त करने वाली रही।

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