शनि महादशा, साढ़ेसाती, एवं अन्य महत्त्वपूर्ण विवरण

 शनि महादशा, साढ़ेसाती, एवं अन्य महत्त्वपूर्ण विवरण


शनि की साढ़ेसाती व ढैया

     मंगली दोष की ही भांति शनि की साढ़ेसाती या शनि की ढैया से भी जनमानस सामान्यतः आतंकित एवं भ्रमित रहता है। अपना उल्लू सीधा करने वाले ’पंडों’ ने शनि की साढ़ेसाती/ढया के आतंक को ’जजमानों’ से नोट कमाने वाले प्रभावशाली साधन के रूप में इतना प्रयोग किया है कि आम आदमी शनि की साढ़ेसाती/ढैया के नाम से ही कांपता है। अतः इसे तत्त्वतः समझ लेना आवश्यक है। ताकि अज्ञानवश आप ठगे न जाएं अथवा भ्रम/आतंक के कारण ही आधे न हो जाएं।

     प्रायः जनसाधारण शनि की साढ़ेसाती से शनि की महादशा का अर्थ लेते हैं। (जो कि गलत है। शनि की महादशा उन्नीस वर्ष की होती है। जिसका निर्धारण (जातक के जन्म नक्षत्र के स्वामी की शेष भोग्य दशा के काल से आगे की गणना के आधार पर होता है (जैसा कि जातकों को पहले बताया जा चुका है कि दशाओं का क्रम सदैव क्रमशः केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहू, गुरु, शनि व बुध होता है। यानी गुरु की महादशा के बाद ही सदैव शनि की महादशा आती है और शनि के बाद बुध की। जिस नक्षत्र में जातक का जन्म होता है। उसके स्वामी ग्रह की महादशा का शेष भोग्यकाल लेकर जातक पैदा होता है और आगे की दशाएं इसी क्रम में समयानुसार चक्राकार रूप से चलती रहती हैं। अतः साढ़ेसाती का अर्थ महादशा नहीं होता है। महादशा में अन्तरदशा, अन्तरदशा में प्रत्यंतरदशा का विचार किया जाता है। अतिसूक्ष्म व सटीक निष्कर्ष के लिए प्रत्यंतर दशा में प्राण दशा तथा प्राण दशा में सूक्ष्म दशा भी विचारी जाती है। ये सभी दशाएं-साढ़ेसाती या ढैया से अलग हैं)। साढ़ेसाती/ढ़ैया का निर्धारण गोचर के आधार पर होता है।

     गोचर-’गोचर’ का अर्थ है ग्रहों की चाल। यह ठीक है कि जातक के जन्म के समय ग्रह पृथक-पृथक राशियों में पृथक-पृथक अंशों पर होते हैं और उस समय के आकाश में ग्रह स्थितियों को जिस नक्शे में दर्शाया जाता है-वह नक्शा लग्न/जन्मकुंडली कहलाता है। जातक जीवनभर के लिए जन्म के समय ही उन ग्रहों व राशियों आदि से प्रभावित हो जाता है। किन्तु ग्रह स्थिर तो नहीं हैं। वे सदा चलायमान रहते हैं। अतः वर्तमान समय में कोई ग्रह किस राशि में कितने अंशों पर है-यह हम ’गोचर’ द्वारा जानते हैं। इनका असर भी जातक को लाभ/हानि आदि के रूप में झेलना पड़ता है और इसी ’गोचर’ के आधार पर शनि की साढ़ेसाती/ढैया का निर्धारण होता है।

     शनि की ढैया-जातक की जन्म/लग्नकुंडली में चन्द्रमा जिस राशि/भाव। में बैठा हो उस राशि/भाव से शनि गोचर में यदि चैथे या आठवें भाव/राशि में चल रहा हो या आ गया हो तो जातक पर शनि की ढैया मानी जाती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जातक की जन्मराशि से जब शनि गोचर में चैथी/आठवीं राशि में हो तो जातक को शनि की ढैया लगती है (यदि पाठकों को इस प्रकार कुंडली देखने में असुविधा हो तो आसानी के लिए वे अपनी चन्द्रकुंडली से देखें। चन्द्रकुंडली के चैथे या आठवें भाव में यदि गोचर का शनि हो तो वे अपने ऊपर शनि की ढैया समझें। गोचर कौन-सा ग्रह किस राशि में चल रहा है ? कितने अंशों पर है ? वक्री है या मार्गी है? और कब राशि परिवर्तन करेगा? आदि सभी जानकारी वार्षिक पंचांग में उपलब्ध हो जाती है। इच्छुक पाठकों को तथा ज्योतिष के विद्यार्थियों को अपना पंचांग प्रति वर्ष खरीदना चाहिए। ’आर्यभट्ट’ या ’विश्वविजय’ उत्तम पंचांगों में गिने जाते हैं)।

     शनि क्योंकि भचक्र/परिक्रमा पथ का एक चक्र 30 वर्षों में पूरा करता है (सबसे धीरे चलता है, इसीलिए इसे ’शनैश्चर’ यानी शनैः शनैः चलने वाला कहा गया है)। भचक्र को 12 राशियों में बांटा गया है (जिन्हें हम कुंडली में 12 भावों से दर्शाते हैं)। अतः एक राशि/भाव (30) में शनि 27 वर्ष रहता है अथवा एक राशि (30) पार करने में उसे ढाई साल लगते हैं। (इस प्रकार 12 राशियों/भावों को वह 30 वर्षों में पूर्ण कर अपने पूर्व स्थान पर लौटकर भचक्र/परिक्रमा पथ (360) का एक चक्र पूर्ण करता है।) इसलिए इसे शनि की ढैया कहते हैं। क्योंकि ढाई वर्ष तक वह चैथे/आठवें भाव में भी रहता है।

     ढैया खराब क्यों?-चैथे भाव में बैठकर शनि छठे भाव (रोग, ऋण, शोक, शत्रु, मुकदमेबाजी, झगड़ा आदि) को तीसरी दृष्टि से, दसवें (कार्यक्षेत्र, राज्य, उन्नति, व्यवसाय, पिता आदि) भाव को सातवीं दृष्टि से तथा लग्न/प्रथम भाव (जातक का मस्तिष्क एवं सम्पूर्ण शरीर तथा व्यक्तित्व) को दसवीं दृष्टि से देखता है। अतः इन तीनों भावों पर अपनी काली दृष्टि का प्रभाव डालता है तथा उस भाव से सम्बन्धित फलों को प्रभावित एवं दूषित करता है। चैथा भाव स्वयं जातक के परिवार, माता, सुख, घर, वाहन, शांति आदि का है। इसी प्रकार आठवां भाव जो आयु व मृत्यु के कारण का है, वहां बैठकर शनि तीसरी दृष्टि से दसवें स्थान को (व्यवसाय, राज्य, उन्नति, पिता आदि), सातवीं दृष्टि से दूसरे भाव को (धन, कुटुम्ब आदि तथा यह मारकेश भी है), तथा पांचवें भाव (बुद्धि, विवेक, विद्या, संतान, पुत्र, उदर आदि) को दसवीं दृष्टि से देखकर तत्सम्बन्धी फलों को दूषित करता है। अतः शनि का गोचर में चैथे/आठवें भाव में (चन्द्रमा से) आना ’ढैया’ के रूप में ढाई वर्ष तक जातक के लिए पीड़ादायी होता है। इसलिए ढैया को बुरा कहते हैं।

     शनि की साढ़ेसाती-जन्मकुंडली में चन्द्रमा जिस भाव या राशि में है, यानी जो जातक की जन्मराशि है-उससे बारहवें भाव/राशि में शनि जब गोचर में आए तो साढ़ेसाती होती है। दूसरे शब्दों में कहा/देखा जाए तो जातक की चन्द्रकुंडली के 12वें भाव में गोचर का शनि जब आए तब जातक को शनि की साढ़ेसाती लग जाएगी और यह तब तक रहेगी जब तक कि शनि गोचर में जातक की चन्द्रकुंडली के तृतीय भाव में न आ जाए। क्योंकि शनि एक राशिध्भाव में 27 वर्ष रहता है। अतः तीन भावों में 77 वर्ष रहेगा। इसलिए इसे साढ़ेसाती कहते हैं। (चन्द्रकुंडली का बारहवां भाव, चन्द्र लग्न तथा चन्द्रकुंडली का दूसरा भाव-इन तीन भावों से साढ़ेसाती का शनि गुजरता है। फिर वह तीसरे भाव में आए तो साढ़ेसाती समाप्त होती है।) दूसरे शब्दों में जातक की जन्मराशि तथा जन्मराशि से एक पहले की तथा एक बाद की ये तीन राशियां साढ़ेसाती के दौरान शनि की उपस्थिति को झेलती हैं। सरलता के लिए एक उदाहरण देखें -

     यदि जातक का चन्द्रमा चतुर्थ भाव में तुला राशि में बैठा है। यानी जातक की जन्मराशि तुला है तो शनि जब गोचर में कन्या राशि में आएगा तब उस जातक को शनि की साढ़ेसाती आरम्भ हो जाएगी और तब तक रहेगी जब तक गोचर का शनि वृश्चिक राशि से निकलकर धनु में प्रविष्ट न हो जाए। इस प्रकार वह साढ़ेसाती के दौरान उस जातक की कन्या, तुला व वृश्चिक तीन राशियों में रहेगा। यानी जन्म राशि से एक पहली व एक बाद की राशि तक। अथवा जन्मराशि से बारहवीं और जन्मराशि से दूसरी राशि तक। जाहिर है कि साढ़ेसाती ढैया के मुकाबले कहीं अधिक कष्टकारी होती है।

     चन्द्रमा मनसो जातः सूत्र के अनुसार चन्द्रमा जातक का मन है। अतः चन्द्रकुंडली का बीज है और लग्न जन्मकुंडली का फूल/फल है। जन्मराशि के अनुसार ही जातक की मानसिकता निर्मित होती है तथा लग्न के आधार पर जातक का व्यक्तित्व निर्मित होता है। अतः शनि की साढ़ेसाती के दौरान जातक मानसिक रूप से लगभग टूट जाता है। लाल किताब के मर्मज्ञ मेरे गुरु पं. सुरेश दत्त शर्मा के अनुसार लग्नकुंडली में भी शनि जब गोचर में लग्न से बारहवें आ जाए तो जातक को साढ़ेसाती होती है और लग्न से दूसरे भाव में शनि के रहने तक रहती है। इस साढ़ेसाती में जातक का व्यक्तित्व प्रभावित होता है। किन्तु मेरे आचार्य पंडित मदनमोहन कौशिक तथा श्री अरुण कुमार गुलाटी के अनुसार साढ़ेसाती चन्द्रमा से बारहवें भाव से ही आरम्भ होती है, न कि लग्न से। ज्योतिष के प्रामाणिक ग्रन्थों का मत भी मेरे आचार्यों के अनुसार है। तथापि अपने गुरु शर्माजी के कहने पर मैंने लग्न की दृष्टि से भी शनि की साढ़ेसाती झेल रहे जातकों का अध्ययन करने की कोशिश की है। यद्यपि ऐसे अधिक जातक मेरी नजर से नहीं गुजरे जिनका अध्ययन मैं लम्बे समय तक कर पाता, फिर भी यह जरूर देखने में आया है कि वे किसी चिंता/धर्म संकट/अन्तर्द्वन्द्व में फंसे हुए अवश्य थे और लग्न जातक के दिमाग का भी प्रतिनिधित्व करता है। बहरहाल! यह अभी शोध के अन्तर्गत है अतरू निर्णायक रूप से इस विषय में मैं नहीं कह सकता। ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति विशेष की बजाय शास्त्र को ही प्रमाण मानना बेहतर है और शास्त्र शनि की साढ़ेसाती जातक की जन्मराशि/चन्द्रकुंडली से बारहवीं राशि में गोचर के शनि के आने को मानते हैं।

     साढ़ेसाती खतरनाक क्यों?-शनि जब चन्द्र से बारहवें होगा तब चन्द्र से दूसरे स्थान को तीसरी, चन्द्र से छठे स्थान को सातवीं तथा चन्द्र से नौवें स्थान को दसवीं दृष्टि से देखेगा। यानी चन्द्रकुंडली के आधार पर धन/कुटुम्ब/मारकेश के घर को, रोग/ऋण/शत्रु/शोक के घर को तथा भाग्य/धर्म/उपासना के घर को दूषित व प्रभावित करेगा। जब वह ढाई वर्ष बाद चंद्रलग्न में आएगा तब चन्द्रकुंडली के तीसरे भाव (भाई, बन्धु, साहस तथा संघर्ष क्षमता), सातवें भाव (जीवनसाथी, प्रणय तथा साझेदारी एवं गुप्तांग) तथा दसवें भाव (राज्य, कार्यक्षेत्र, व्यवसाय, उन्नति, पिता) को क्रमशरू 3,7,10 दृष्टियों से प्रभावित एवं दूषित करेगा। इसी प्रकार 27 वर्ष बाद जब शनि चन्द्रकुंडली के दूसरे भाव में आएगा तब चन्द्रकुंडली के चैथे भाव (माता, सुख, शांति, मन, परिवार), आठवें भाव (आयु, मृत्यु का कारण, आकस्मिक नुकसान, विश्वासघात आदि) तथा ग्यारहवें भाव (आय व लाभ) को दूषित एवं प्रभावित करेगा।

यानी साढ़ेसाती के प्रथम खण्ड में 2,6,9य दूसरे खण्ड में 3,7,10 तथा तीसरे खण्ड में 4,8,11 भाव लगातार शनि के प्रभाव में रहेंगे और साढ़ेसाती के दौरान इन भावों से सम्बन्धित फलों को शनि दूषित व विकृत/  प्रभावित करेगा। इन तीनों ही खण्डों में एक न एक मारक भाव (पहले में 2, दूसरे में 7 तथा तीसरे में 8) शनि से प्रभावित होता है। अतः मृत्युतुल्य कष्ट भी शनि की साढ़ेसाती में सम्भावित होते हैं। धन, साहस, परिवार, रोग, ऋण, शत्रुता, शोक, पत्नी/पति, गृहस्थ/वैवाहिक जीवन, आकस्मिक नुकसान, धोखा, भाग्य, कर्म तथा आय, शांति, माता, पिता तथा जातक की मानसिकता और स्वाभिमान-ये सभी शनि की साढ़ेसाती के लपेटे में आते हैं और एक लम्बे समय तक प्रभावित रहते हैं। अतः शनि की साढ़ेसाती को खतरनाक समझा जाता है।

     शनि से भय क्यों? -शनि यदि क्रूर व पापी ग्रह है तो राहू, केतु, भी इसी श्रेणी के ग्रह हैं। सूर्य भी कठोर और क्रूर है और मंगल भी कर एवं कठोर है। शनि, राहू, केतु यदि विकृति एवं पृथक्कीकरण का प्रभाव रखते हैं तो सूर्य शोषण का तथा मंगल मारक प्रभाव रखता है। केतु तो ’टर्मिनेटर’ ही है। फिर भी इन सबमें शनि से इतना भय क्यों?.

     सूर्य आत्मबल, यश, प्रतिष्ठा, मान तथा राज्य दिलाने वाला भी है। भले ही कठोर, शोषक व दाहक है। केतु-अध्यात्म तथा मोक्ष की ओर प्रेरित करने वाला भी है। भले ही पृथक्कीकरण व टर्मिनेट करने के स्वभाव वाला है। मंगल यदि मारक और विनाशक प्रभाव रखता है तो शुभ स्थिति में ऊर्जा, उत्साह, साहस, पराक्रम, शक्ति तथा वीरता का कारक होने से सृजनात्मक भी है। राहू पृथक्कीकरण का स्वभाव रखता है और जातक को पापी, धोखेबाज, ढोंगी, छलिया तथा राजनीतिज्ञ/अवसरवादी एवं पतित बनाता है। जबकि शनि भले ही दृष्टि काली होने से विस्थापित/विकृति का प्रभाव रखता हो लेकिन अध्यात्म और वैराग्य की ओर ले जाने वाला भी है। तिस पर समस्त ग्रहों में मुख्य न्यायाधीश दर्जा शनि को ही प्राप्त है। अतः भयभीत होना हो तो राहू से हों, मारक प्रभाव वाले मंगल या अशुभ केतु या अशुभ सूर्य से हों। शनि तो न्यायकर्ता है। जीवात्मा के मन को परीक्षा व कष्टों की अग्नि में जलाकर परिष्कृत करता है। उसके मिथ्या अभिमान को नष्ट करके उसे प्रभु चरणों में अनुरक्त करता है। (हां, मगर उसके तरीके जरा कठोर है। ऐसा मंगल, राहू आदि में से कोई नहीं करता। वे कष्ट/पीड़ा/संकट तो देते हैं, रोग/शोक तो देते हैं परन्तु जातक के अभिमान को गलाते नहीं हैं। यह कार्य मात्र और केवल मात्र शनि ही करता है। शनि की कृपा के बिना विवाह, उन्नति, सुख, भोग, योग, अध्यात्म, वैराग्य आदि कुछ भी नहीं हो पाता। इन सब मामलों में गुरु व शुक्र के साथ शनि की कृपा भी आवश्यक होती है।

     वस्तुतः शनि, शुक्र और गुरु तीनों ही आचार्य हैं। तीनों की कृपा अनिवार्य है। किन्तु तीनों के तरीके अलग हैं। गुरु धर्मात्मा होने से जातक को दुखी किए बिना आध्यात्मिक व संस्कारी बनाता है। शुक्र जातक को भोग विलास की अति पर ले जाकर ज्ञान प्रदान करता है (रजनीश वाला तरीका)। किन्तु शनि जातक को डण्डे मार-मारकर उसे कष्टों, पीड़ा व अभावों की भट्ठी में जलाकर, उसे लोहे से सोना बनाता है। गुरु व शुक्र की कृपा से ज्ञान पाने/आध्यात्मिक उन्नति करने वालों में अभिमान शेष रह सकता है/उत्पन्न हो सकता है तथा उनका पुनः पतन हो सकता है। किन्तु शनि की कृपा से ज्ञान होने पर जातक सीधा मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। क्योंकि शनि जातक के अभिमान को खण्ड-खण्ड कर डालता है। जैसी कि कहावत है शनि साढ़ेसाती या महादशा में जातक की नाक एक बार जरूर जमीन पर रगड़वा देता है। इसका अर्थ यही है कि वह जातक में अभिमान शेष नहीं रहने देता। और अभिमान ही बन्धनकारी है। ’मैं’ भाव ही युक्त नहीं होने देता। जैसा कि महर्षि ’अष्टावक्र’ ने कहा है

     यदानाहं तदा मोक्षो, यदाह बन्धनं तदा।

     अर्थात् जहां अहम् नहीं है वहीं मुक्ति है और जहां अहम् है वहीं बन्धन है।

     इसीलिए शनि को मोक्ष का कारक कहा गया है। वह अपनी प्रत्यंतर या अंतर दशा में जातक को सुधारने का प्रयास करता है। ढैया में और अधिक प्रयास करता है। फिर भी विफल रहे तो साढ़ेसाती में कसर निकालता है। किन्तु जातक फिर भी न सुधरे तो महादशा में या पुनः साढ़ेसाती में जातक को सुधारने का प्रयास करता है। जो नहीं सुधरता उसकी मुक्ति भी नहीं होती, उसे फिर कष्ट भोगने को जन्म लेना पड़ता है।

     शनि की ढैया/साढ़ेसाती/महादशा आदि में सावधानियां व प्रमुख उपाय-शनि के विषय में कहा जाता है कि साढ़ेसाती में वह प्रथम ढाई वर्ष सिर पर, बीच के ढाई वर्ष छाती/हृदय पर तथा अंतिम ढाई वर्ष पैरों पर रहता है। इसे चढ़ती (सिर से) और उतरती (पैर से) साढ़ेसाती भी कहते हैं। इनमें हृदय की साढ़ेसाती (बीच के ढाई साल) अधिक कष्टकारी होती है। कारण यह कि शनि सर्वप्रथम सिर पर चढ़कर जातक की बुद्धि का हरण कर लेता है। शेष सारे दुष्परिणाम तो जातक अपनी दुर्बुद्धि के गलत फैसलों से स्वयं ही भोगता है। प्रथम ढाई वर्षों में बुद्धि भ्रष्ट हो जाने से जातक नुकसान वाले फैसले/काम करता है। नया कुछ प्राप्त नहीं होता, जीवनयापन में जो पुराना जोड़ रखा होता है, वह ढाई वर्षों में बराबर हो जाता है। अतः बीच के ढाई वर्ष उसे कर्ज और अभाव में विशेष पीडा के साथ गुजारने पड़ते हैं। उतरती साढ़ेसाती तक उसका अहम् चूर हो चुकता है। अतरू वह ईश्वराधना में ही संतोष प्राप्त करके अभाव में जीना सीख लेता है सो उसे अधिक कष्ट नहीं प्रतीत होता। ऐसे जातक को शनि कुछ ’पुरस्कार’ देकर जाता है। (जैसी कहावत है कि-शनि आता है तो छीनता है किन्तु जाता है तो देकर जाता है।)

     किन्तु बहुत से पापात्मा उन बीच के ढाई वर्षों में सुधरने की बजाय उधार मांगकर जीना सीख जाते हैं। ऋणं कृत्वा, घृतं पित्वा (उधार लेते रहो और घी पीते रहो) के चार्वाकी सिद्धांत पर अमल करने लगते हैं। उनकी आंख का पानी मर जाता है। वे उधार का तकाजा करने वालों से शर्मिंदा नहीं होते, निर्लज्ज या ढोंगी हो जाते हैं और निकम्मे होकर उधार दलाली या चोरी/भीख को ही सहजता से अपना लेते हैं। ऐसे जातकों को शनि जाते में कुछ देकर नहीं जाता, बल्कि ये वायदा करके जाता है कि अगली साढ़ेसाती या 19 साल की महादशा में तुझे सीधा करूंगा। ऐसे जातकों का न सुधरने पर घोर पतन होना निश्चित होता है।

     शनि क्योंकि पहला कार्य बुद्धि भ्रष्ट करने का ही करता है। अतः साढ़ेसाती के दौरान जातक को अपनी बुद्धि को सद्कार्यों में लगाने का प्रयास करना चाहिए तथा यथासम्भव बुरे कार्यों से बचना चाहिए। जुआ, वैश्यागमन, मांस-मदिरा का सेवन--इन तीन कार्यों से विशेष रूप से बचना चाहिए। क्योंकि शनि बुद्धि भ्रष्ट करके इन कार्यों की ओर धकेलता है और यही कार्य शनि के कोप को बढ़ाते हैं। जिस पर शनि की ढैया/साढ़ेसाती/महादशा हो अथवा जिसका जन्मकुंडली में ही शनि अशुभ हो-उसे चाहिए कि कहे गए तीनों कामों से दूर रहे अन्यथा शनि का कोप बढ़ेगा।

     शिव, हनुमान, काली, भैरव आदि की उपासना, तेल, उड़द (काले), काले तिल, लोहा, कीलें, चमड़ा, शराब, स्पिरिट, कोयला, काले वस्त्र, कम्बल आदि का यथाशक्ति दान करते रहना चाहिए-स्वयं को इनके सेवन से उस दौरान बचना चाहिए। पीपल, काले कुत्ते, भैंस, कौए आदि की सेवा करते रहना चाहिए। भंगियों को दान देना चाहिए। उल्कादेवी के स्तोत्र तथा शनि के स्तोत्र या मंत्रों का यथाशक्ति जाप करते रहना चाहिए। सेवकों तथा घर के बुजुर्गों को खुश रखना चाहिए तथा कर्मठ रहना चाहिए। शनि आलस्य व निकम्मापन बढ़ाकर जातक की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। अतः इस विषय में सावधान रहना चाहिए। यदि सूर्य को अर्घ्य देते हों तो इस दौरान नहीं देना चाहिए। उसकी बजाय पीपल पर या शिवलिंग पर जल चढ़ाना चाहिए। अनैतिक कार्यों से बचते हुए शुद्ध-बुद्ध रहने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि शनि की दशा या साढ़ेसाती का उद्देश्य ही जातक को सुधारना है। अतः डंडे खाकर सुधरने की बजाय स्वयं सुधर जाना अच्छा है।

     विशेष उपायों के विस्तार व विधि पाठक उपाय खण्ड के अंतर्गत इस पुस्तक के अन्त में पढ़ सकते हैं।

     सभी के लिए साढ़ेसाती/ढैया खराब नहीं होती-शनि की ढैया/साढ़ेसाती/महादशा सभी जातकों को समान रूप से खराब नहीं होती। (बल्कि कुछ लाभकारी भी रह सकती है)। क्योंकि जातक की लग्नकुंडली में शनि किन भावों का स्वामी है ? तथा कैसी स्थिति में है ? यह भी विचारना चाहिए। शनि उच्च का है ? नीच का है ? मित्र या शत्रु राशि का है ? स्वग्रही है ? अस्त है ? कितने अंशों का है ? बली है/निर्बल? किससे युति करता है ? किस भाव में बैठा है ? वक्री है या मार्गी है ? किन भावों को देखता है ? किन ग्रहों से दृष्ट है ? इत्यादि सब बातों को देखता है ? किन ग्रहों से दृष्टि है ? इत्यादि सब बातों को विचारकर ही शनि के फल की तीव्रता का या शुभता या अशुभता का निर्धारण किया जा सकता है।

     इसके अलावा शनि जिनका लग्नेश है (कुम्भ तथा मकर लग्न वाले), अथवा जिनका राशीश है (मकर या कुम्भ राशि वाले - यहां नाम राशि से नहीं, जन्म राशि से अभिप्राय है), अथवा जिनको शनि योगकारक है (तुला तथा वृष लग्न वाले)--उनको शनि (कुंडली में बली होकर शुभ स्थानों में शुभ ग्रहों से दृष्ट अवस्था में बैठा हो तो) अपनी दशाओं या साढ़ेसाती से लाभकारी भी होता है। किन्तु ढैया में फिर भी परेशान कर सकता है। यह बात और है कि उतना नहीं, जितना दूसरों को। परन्तु ऐसे जातकों को यह सावधानी अवश्य रखनी चाहिए कि वे सूर्य को अर्घ्य देने का नियम न बनाएं। अन्यथा वे शनि से उतना लाभ प्राप्त नहीं कर सकते, जितना उन्हें करना चाहिए। कई स्थितियों में उन्हें शनि के कोप का भाजन भी बनना पड़ सकता है। क्योंकि सूर्य के साथ शनि की प्रबल शत्रुता है और इस प्रकार जातक सूर्य को प्रसन्न करने के प्रयास में शनि को रुष्ट कर सकता है। अथवा शनि से प्राप्त होने वाले शुभ फलों में न्यूनता का अनुभव कर सकता है।

शनि के उत्कृष्ट दशा में वैभव, बुद्धि, नीति, यज्ञसिद्धि, क्षेत्र, नगर का आधिपत्य, व्यापार में दक्षता तथा उत्सुकता, विभव, ज्ञान, यज्ञ आदि फल मिलते है। अनेक प्रकार के आदान-प्रदान एवं व्यापार होते है।

शनि अपनी उच्च राशि में हो, स्वक्षेत्र में हो, मित्र क्षेत्र में हो, बलवान हो, मूल त्रिकोण में हो, भाग्य स्थान में हो, नवांश में हो, शुभ ग्रहो से युक्त हो, केंद्र में हो, त्रिकोण में हो, लाभ स्थान में हो, मीन राशि में हो, तथा धनु राशि में हो, तो राजसम्मान, वैभव, सत्कीर्ति, विद्यावाद का विनोद , महाराज प्रसाद द्वारा वाहन ,आभूषण, राजयोग, सेनाधीश के अधिकार की प्राप्ति, अत्यंत सुख, लक्ष्मी की कृपा कटाक्ष चिन्हो के द्वारा विविध वैभव, घर में कल्याण, सम्पति रूपी पुत्रादिक लाभ, महोत्सव, वस्त्रो की प्राप्ति, खच्चर, गधा, भेड़, बकरी, ऊट, वृद्ध स्त्री, पक्षी, कुधान्य का लाभ, किसी संस्था शहर या गाँव के अधिकारकत्व से द्रव्य प्राप्ति, जंगली या आदिवासी लोगो का आधिपत्य इत्यादि फल प्राप्त होते है।

शनि की दशा में क्रय - विक्रय से लाभ होता है। नीचे एव निम्न स्तर के कार्यो से धन संचय होता है। जातक नैतिकता एव ईमानदारी को तिलांजलि दे देता है। और येन केन प्रकारेण धन संचय में लग जाता है।

शनि की दशा भागयोदश में भी पूर्ण समर्थ होती है इस दशा में जातक अपने कुल तथा वंश के नाम उजागर करता है, तथा उसकी चतुर्दिक कीर्ति फैलती है। राजनीती के कार्यो में शनि की दशा सहायक होती है।

इस दशा में जातक को द्रव्य की विशेष प्राप्ति होती है। विदेश भ्रमण के योग भी बन सकते है। परन्तु इससे लाभ नहीं होता है। मुक़दमे में दशा के समय जीत होती है। जातक विलास और ऐशो - आराम का ज्यादा सुख भोगता है और भोगोपभोग की कई वस्तुओ का संग्रह करता है। जनता में व्यक्ति की ख्याति फैलती है और स्त्री लाभ होता है। तथा वृद्ध स्त्री से संगत होता है। व्यक्ति की उन्नति तीव्रता से अग्रसर होती है। काम करने वालो के ऊपर प्रभुता मोटे अन्न से लाभ प्राप्त होता है।

नीच राशि में बैठे शनि की महादशा में, अस्त शनि की दशा में, छठे, आठवे, व्ययस्थान में स्थिति शनि की महादशा में जातक को विष, शस्त्रादि से पीड़ा होती है। मनुष्य स्थानभ्रष्ट होता है। जातक को कोई भी झूठा अपवाद कलंक लगता है। उसे बंधन योग तथा जेल में जाने तक का योग बनता है। मित्रो से शत्रुता होती है, और मृत्यु का भी भय होता है। धन धन्य तथा स्त्री के करण महाशोक प्राप्त होता है। जातक जिस व्यक्ति से किसी चीज की आशा करे तो सब निष्फल हो जाती है। सारांश में चारो और शुन्य प्रतीत होता है। अर्थात जातक की खबर लेने वाला उस समय कोई नहीं दिखाई पड़ता है।

जातक को मर्मस्थान की पीड़ा से दुःख भोगना पड़ता है। चर्मयोग होने के करण नष्ट होता है। बंधू बान्धवो का वियोग भी सहना पड़ता है। कई प्रकार की विपत्तियाँ उसपर आती है और दिनों दिन ग्रहण उसपर बढ़ता ही है बुरे लोगो को संगती होने से भी जातक का संचिति धन नष्ट हो जाता है। उसे अपने मित्र, पुत्र, या स्त्री के द्वारा विश्वासघात भी होता है। इससे उसका हृदय सदेव चिंता से ग्रस्त रहता है। इस दशा में मृत्यु होती है अथवा मलिनता,सदा शराब के नशे में डूबा हुआ, नीच लोगो में स्त्री अथवा संतान से कलह , अंगो में चोट, प्रहार, पशु तथा भूमि का नाश, अपयश तथा अनेक प्रकार के दुःख ये फल प्राप्त होते है। राजकोप होता है, समय निष्फल होता है | विपरीत कृत्य होते है, जो काम सिद्ध हो जाते है उनका भी नाश होता है, वध तथा बंधन होता है, माता पिता से वियोग होता है, स्त्री संग में विपरीक्ति भी होती है, कफ वातादि, पितादि रोग आदि से कष्ट होता है।

शनि अपनी उच्च राशि में होकर नवांश में नीच राशि में हो गया हो तो उसकी दशा में पूर्वार्द्ध में सुख करक फलो की प्राप्ति होती है।

शनि अपनी नीच राशि में होकर उच्च नवांश में गया हो तो दशा के अंत में सुख प्राप्त होता है। पूर्वार्द्ध में शत्रु और चोर इनसे भय , दुःख , प्रदेश गमन इत्यादि फल प्राप्त होते है।

शनि षष्ठ में गया हो तो:- शत्रुपीड़ा, रोग , चोर और विष से पीड़ा , मकान , खेती का नाश होता है।

शनि अष्ठम स्थान में गया हो तो :- पुत्र, धन स्त्री का नाश, भृत्य हानि , पालतू पशुओ की हानि , भूमि का नाश होता है।

शनि द्वादश स्थान में गया हो तो :- चोर अग्नि तथा राजा से भय , नाना प्रकार की आपत्ति , दुःख , परदेश गमन , बंधू विनाश आदि फल प्राप्त होते है।

शनि की महादशा में :- पूर्व में अति दुःख, स्त्री माता- पिता का नाश, मध्य में :- विदेश गमन और दशा अंत में :- पराये घर में निवास, पराया अन्न भोजन कराती है।

शनि की महादशा में किये जाने वाले

उपाय जिन व्यक्तियों की कुण्डली में शनि कमज़ोर हैं या शनि पीड़ित है उन्हें काली गाय का दान करना चाहिए। काला वस्त्र, उड़द दाल, काला तिल, चमड़े का जूता, नमक, सरसों तेल, लोहा, खेती योग्य भूमि, बर्तन व अनाज का दान करना चाहिए। शनि ग्रह की शांति के लिए दान देते समय ध्यान रखें कि संध्या काल हो और शनिवार का दिन हो तथा दान प्राप्त करने वाला व्यक्ति ग़रीब और वृद्ध हो। शनि गृह की शांति के लिए शनि के मंत्रो का जाप, दसरथ कृत शनि स्त्रोत का पाठ और हनुमानजी की आराधना से भी उच्च लाभ प्राप्त होता है। दाए हाथ की मध्यमा ऊँगली में नीलम या नीली को पहना जा सकता है।

शनि की साढे साती

ज्योतिष के अनुसार शनि की साढेसाती की मान्यतायें तीन प्रकार से होती हैं, पहली लगन से दूसरी चन्द्र लगन या राशि से और तीसरी सूर्य लगन से, उत्तर भारत में चन्द्र लगन से शनि की साढे साती की गणना का विधान प्राचीन काल से चला आ रहा है। इस मान्यता के अनुसार जब शनिदेव चन्द्र राशि पर गोचर से अपना भ्रमण करते हैं तो साढेसाती मानी जाती है, इसका प्रभाव राशि में आने के तीस माह पहले से और तीस माह बाद तक अनुभव होता है। साढेसाती के दौरान शनि जातक के पिअले किये गये कर्मों का हिसाब उसी प्रकार से लेता है, जैसे एक घर के नौकर को पूरी जिम्मेदारी देने के बाद मालिक कुछ समय बाद हिसाब मांगता है, और हिसाब में भूल होने पर या गल्ती करने पर जिस प्रकार से सजा नौकर को दी जाती है उसी प्रकार से सजा शनि देव भी हर प्राणी को देते हैं। और यही नही जिन लोगों ने अच्छे कर्म किये होते हैं तो उनको साढेशाती पुरस्कार भी प्रदान करती है, जैसे नगर या ग्राम का या शहर का मुखिया बना दिया जाना आदि.शनि की साढेसाती के आख्यान अनेक लोगों के प्राप्त होते हैं, जैसे राजा विक्रमादित्य, राजा नल, राजा हरिश्चन्द्र, शनि की साढेसाती संत महात्माओं को भी प्रताडित करती है, जो जोग के साथ भोग को अपनाने लगते हैं। हर मनुष्य को तीस साल मे एक बार साढेसाती अवश्य आती है, यदि यह साढे साती धनु, मीन, मकर, कुम्भ राशि मे होती है, तो कम पीडाजनक होती है, यदि यह साढेसाती चौथे, छठे, आठवें, और बारहवें भाव में होगी, तो जातक को अवश्य दुखी करेगी, और तीनो सुख शारीरिक, मानसिक, और आर्थिक को हरण करेगी.इन साढेसातियों में कभी भूलकर भी "नीलम" नही धारण करना चाहिये, यदि किया गया तो वजाय लाभ के हानि होने की पूरी सम्भावना होती है। कोई नया काम, नया उद्योग, भूल कर भी साढेसाती में नही करना चाहिये, किसी भी काम को करने से पहले किसी जानकार ज्योतिषी से जानकारी अवश्य कर लेनी चाहिये.यहां तक कि वाहन को भी भूलकर इस समय में नही खरीदना चाहिये, अन्यथा वह वाहन सुख का वाहन न होकर दुखों का वाहन हो जायेगा.हमने अपने पिछले पच्चीस साल के अनुभव मे देखा है कि साढेसाती में कितने ही उद्योगपतियों का बुरा हाल हो गया, और जो करोडपति थे, वे रोडपति होकर एक गमछे में घूमने लगे.इस प्रकार से यह भी नौभव किया कि शनि जब भी चार, छ:, आठ, बारह मे विचरण करेगा, तो उसका मूल धन तो नष्ट होगा ही, कितना ही जतन क्यों न किया जाये.और शनि के इस समय का विचार पहले से कर लिया गया है तो धन की रक्षा हो जाती है। यदि सावधानी नही बरती गई तो मात्र पछतावा ही रह जाता है। अत: प्रत्येक मनुष्य को सही समयपर शनि आरम्भ होने के पहले ही जप तप और जो विधान हम आगे बातायेंगे उनको कर लेना चाहिये।

शनि सम्बन्धी रोग

उन्माद नाम का रोग शनि की देन है, जब दिमाग में सोचने विचारने की शक्ति का नाश हो जाता है, जो व्यक्ति करता जा रहा है, उसे ही करता चला जाता है, उसे यह पता नही है कि वह जो कर रहा है, उससे उसके साथ परिवार वालों के प्रति बुरा हो रहा है, या भला हो रहा है, संसार के लोगों के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं, उसे पता नही होता, सभी को एक लकडी से हांकने वाली बात उसके जीवन में मिलती है, वह क्या खा रहा है, उसका उसे पता नही है कि खाने के बाद क्या होगा, जानवरों को मारना, मानव वध करने में नही हिचकना, शराब और मांस का लगातार प्रयोग करना, जहां भी रहना आतंक मचाये रहना, जो भी सगे सम्बन्धी हैं, उनके प्रति हमेशा चिन्ता देते रहना आदि उन्माद नाम के रोग के लक्षण है।वात रोग का अर्थ है वायु वाले रोग, जो लोग बिना कुछ अच्छा खाये पिये फ़ूलते चले जाते है, शरीर में वायु कुपित हो जाती है, उठना बैठना दूभर हो जाता है, शनि यह रोग देकर जातक को एक जगह पटक देता है, यह रोग लगातार सट्टा, जुआ, लाटरी, घुडदौड और अन्य तुरत पैसा बनाने वाले कामों को करने वाले लोगों मे अधिक देखा जाता है। किसी भी इस तरह के काम करते वक्त व्यक्ति लम्बी सांस खींचता है, उस लम्बी सांस के अन्दर जो हारने या जीतने की चाहत रखने पर ठंडी वायु होती है वह शरीर के अन्दर ही रुक जाती है, और अंगों के अन्दर भरती रहती है। अनितिक काम करने वालों और अनाचार काम करने वालों के प्रति भी इस तरह के लक्षण देखे गये है।भगन्दर रोग गुदा मे घाव या न जाने वाले फ़ोडे के रूप में होता है। अधिक चिन्ता करने से यह रोग अधिक मात्रा में होता देखा गया है। चिन्ता करने से जो भी खाया जाता है, वह आंतों में जमा होता रहता है, पचता नही है, और चिन्ता करने से उवासी लगातार छोडने से शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है, मल गांठों के रूप मे आमाशय से बाहर कडा होकर गुदा मार्ग से जब बाहर निकलता है तो लौह पिण्ड की भांति गुदा के छेद की मुलायम दीवाल को फ़ाडता हुआ निकलता है, लगातार मल का इसी तरह से निकलने पर पहले से पैदा हुए घाव ठीक नही हो पाते हैं, और इतना अधिक संक्रमण हो जाता है, कि किसी प्रकार की एन्टीबायटिक काम नही कर पाती है।गठिया रोग शनि की ही देन है। शीलन भरे स्थानों का निवास, चोरी और डकैती आदि करने वाले लोग अधिकतर इसी तरह का स्थान चुनते है, चिन्ताओं के कारण एकान्त बन्द जगह पर पडे रहना, अनैतिक रूप से संभोग करना, कृत्रिम रूप से हवा में अपने वीर्य को स्खलित करना, हस्त मैथुन, गुदा मैथुन, कृत्रिम साधनो से उंगली और लकडी, प्लास्टिक, आदि से यौनि को लगातार खुजलाते रहना, शरीर में जितने भी जोड हैं, रज या वीर्य स्खलित होने के समय वे भयंकर रूप से उत्तेजित हो जाते हैं। और हवा को अपने अन्दर सोख कर जोडों के अन्दर मैद नामक तत्व को खत्म कर देते हैं, हड्डी के अन्दर जो सबल तत्व होता है, जिसे शरीर का तेज भी कहते हैं, धीरे धीरे खत्म हो जाता है, और जातक के जोडों के अन्दर सूजन पैदा होने के बाद जातक को उठने बैठने और रोज के कामों को करने में भयंकर परेशानी उठानी पडती है, इस रोग को देकर शनि जातक को अपने द्वारा किये गये अधिक वासना के दुष्परिणामों की सजा को भुगतवाता है।स्नायु रोग के कारण शरीर की नशें पूरी तरह से अपना काम नही कर पाती हैं, गले के पीछे से दाहिनी तरफ़ से दिमाग को लगातार धोने के लिये शरीर पानी भेजता है, और बायीं तरफ़ से वह गन्दा पानी शरीर के अन्दर साफ़ होने के लिये जाता है, इस दिमागी सफ़ाई वाले पानी के अन्दर अवरोध होने के कारण दिमाग की गन्दगी साफ़ नही हो पाती है, और व्यक्ति जैसा दिमागी पानी है, उसी तरह से अपने मन को सोचने मे लगा लेता है, इस कारण से जातक में दिमागी दुर्बलता आ जाती है, वह आंखों के अन्दर कमजोरी महसूस करता है, सिर की पीडा, किसी भी बात का विचार करते ही मूर्छा आजाना मिर्गी, हिस्टीरिया, उत्तेजना, भूत का खेलने लग जाना आदि इसी कारण से ही पैदा होता है। इस रोग का कारक भी शनि है, अगर लगातार शनि के बीज मंत्र का जाप जातक से करवाया जाय, और उडद जो शनि का अनाज है, की दाल का प्रयोग करवाया जाय, रोटी मे चने का प्रयोग किया जाय, लोहे के बर्तन में खाना खाया जाये, तो इस रोग से मुक्ति मिल जाती है।इन रोगों के अलावा पेट के रोग, जंघाओं के रोग, टीबी, कैंसर आदि रोग भी शनि की देन है।

शनि सम्बन्धी दान पुण्य

पुष्य, अनुराधा, और उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों के समय में शनि पीडा के निमित्त स्वयं के वजन के बराबर के चने, काले कपडे, जामुन के फ़ल, काले उडद, काली गाय, गोमेद, काले जूते, तिल, भैंस, लोहा, तेल, नीलम, कुलथी, काले फ़ूल, कस्तूरी सोना आदि दान की वस्तुओं शनि के निमित्त दान की जाती हैं।

शनि सम्बन्धी वस्तुओं की दानोपचार विधि

जो जातक शनि से सम्बन्धित दान करना चाहता हो वह उपरोक्त लिखे नक्षत्रों को भली भांति देख कर, और समझ कर अथवा किसी समझदार ज्योतिषी से पूंछ कर ही दान को करे.शनि वाले नक्शत्र के दिन किसी योग्य ब्राहमण को अपने घर पर बुलाये.चरण पखारकर आसन दे, और सुरुचि पूर्ण भोजन करावे, और भोजन के बाद जैसी भी श्रद्धा हो दक्षिणा दे.फ़िर ब्राहमण के दाहिने हाथ में मौली (कलावा) बांधे, तिलक लगावे.जिसे दान देना है, वह अपने हाथ में दान देने वाली वस्तुयें लेवे, जैसे अनाज का दान करना है, तो कुछ दाने उस अनाज के हाथ में लेकर कुछ चावल, फ़ूल, मुद्रा लेकर ब्राहमण से संकल्प पढावे, और कहे कि शनि ग्रह की पीडा के निवार्णार्थ ग्रह कृपा पूर्ण रूपेण प्राप्तयर्थम अहम तुला दानम ब्राहमण का नाम ले और गोत्र का नाम बुलवाये, अनाज या दान सामग्री के ऊपर अपना हाथ तीन बार घुमाकर अथवा अपने ऊपर तीन बार घुमाकर ब्राहमण का हाथ दान सामग्री के ऊपर रखवाकर ब्राहमण के हाथ में समस्त सामग्री छोड देनी चाहिये.इसके बाद ब्राहमण को दक्षिणा सादर विदा करे.जब ग्रह चारों तरफ़ से जातक को घेर ले, कोई उपाय न सूझे, कोई मदद करने के लिये सामने न आये, मंत्र जाप करने की इच्छायें भी समाप्त हो गयीं हों, तो उस समय दान करने से राहत मिलनी आरम्भ हो जाती है। सबसे बडा लाभ यह होता है, कि जातक के अन्दर भगवान भक्ति की भावना का उदय होना चालू हो जाता है और वह मंत्र आदि का जाप चालू कर देता है। जो भी ग्रह प्रतिकूल होते हैं वे अनुकूल होने लगते हैं। जातक की स्थिति में सुधार चालू हो जाता है। और फ़िर से नया जीवन जीने की चाहत पनपने लगती है। और जो शक्तियां चली गयीं होती हैं वे वापस आकर सहायता करने लगती है।

शनि मंत्र जप विधि

शनि ग्रह की पीडा से निवारण के लिये पाठ, पूजा, स्तोत्र, मंत्र और गायत्री आदि को लिख रहा हूँ, जो काफ़ी लाभकारी सिद्ध होंगे.नित्य १०८ पाथ करने से चमत्कारी लाभ प्राप्त होगा.

विनियोग:-शन्नो देवीति मंत्रस्य सिन्धुद्वीप ऋषि: गायत्री छंद:, आपो देवता, शनि प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:.नीचे लिखे गये कोष्ठकों के अन्गों को उंगलियों से छुयें. अथ देहान्गन्यास:-शन्नो शिरसि (सिर), देवी: ललाटे (माथा).अभिषटय मुखे (मुख), आपो कण्ठे (कण्ठ), भवन्तु ह्रदये (ह्रदय), पीतये नाभौ (नाभि), शं कट्याम (कमर), यो: ऊर्वो: (छाती), अभि जान्वो: (घुटने), स्त्रवन्तु गुल्फ़यो: (गुल्फ़), न: पादयो: (पैर).अथ करन्यास:-शन्नो देवी: अंगुष्ठाभ्याम नम:.अभिष्टये तर्ज्जनीभ्याम नम:.आपो भवन्तु मध्यमाभ्याम नम:.पीतये अनामिकाभ्याम नम:.शंय्योरभि कनिष्ठिकाभ्याम नम:.स्त्रवन्तु न: करतलकरपृष्ठाभ्याम नम:.अथ ह्रदयादिन्यास:-

शन्नो देवी ह्रदयाय नम:.अभिष्टये शिरसे स्वाहा.आपो भवन्तु शिखायै वषट.पीतये कवचाय हुँ.(दोनो कन्धे).शंय्योरभि नेत्रत्राय वौषट.स्त्रवन्तु न: अस्त्राय फ़ट.ध्यानम:-नीलाम्बर: शूलधर: किरीटी गृद्ध्स्थितस्त्रासकरो धनुश्मान.चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रशान्त: सदाअस्तु मह्यं वरदोअल्पगामी..शनि गायत्री:-औम कृष्णांगाय विद्य्महे रविपुत्राय धीमहि तन्न: सौरि: प्रचोदयात.वेद मंत्र:- औम प्राँ प्रीँ प्रौँ स: भूर्भुव: स्व: औम शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तु न:.औम स्व: भुव: भू: प्रौं प्रीं प्रां औम शनिश्चराय नम:.जप मंत्र :- ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम:। नित्य २३००० जाप प्रतिदिन.

शनि अष्टोत्तरशतनामावलि

शनि बीज मन्त्र –: ॐ प्राँ प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः ॥

ॐ शनैश्चराय नमः ॥ ॐ शान्ताय नमः ॥ ॐ सर्वाभीष्टप्रदायिने नमः ॥ ॐ शरण्याय नमः ॥ ॐ वरेण्याय नमः ॥ ॐ सर्वेशाय नमः ॥ ॐ सौम्याय नमः ॥ ॐ सुरवन्द्याय नमः ॥ ॐ सुरलोकविहारिणे नमः ॥ ॐ सुखासनोपविष्टाय नमः ॥ ॐ सुन्दराय नमः ॥ ॐ घनाय नमः ॥ ॐ घनरूपाय नमः ॥ ॐ घनाभरणधारिणे नमः ॥ ॐ घनसारविलेपाय न मः ॥ ॐ खद्योताय नमः ॥ ॐ मन्दाय नमः ॥ ॐ मन्दचेष्टाय नमः ॥ ॐ महनीयगुणात्मने नमः ॥ ॐ मर्त्यपावनपदाय नमः ॥ ॐ महेशाय नमः ॥ ॐ छायापुत्राय नमः ॥ ॐ शर्वाय नमः ॥ ॐ शततूणीरधारिणे नमः ॥ ॐ चरस्थिरस्वभा वाय नमः ॥ ॐ अचञ्चलाय नमः ॥ ॐ नीलवर्णाय नमः ॥ ॐ नित्याय नमः ॥ ॐ नीलाञ्जननिभाय नमः ॥ ॐ नीलाम्बरविभूशणाय नमः ॥ ॐ निश्चलाय नमः ॥ ॐ वेद्याय नमः ॥ ॐ विधिरूपाय नमः ॥ ॐ विरोधाधारभूमये नमः ॥ ॐ भेदास्पदस्वभावाय नमः ॥ ॐ वज्रदेहाय नमः ॥ ॐ वैराग्यदाय नमः ॥ ॐ वीराय नमः ॥ ॐ वीतरोगभयाय नमः ॥ ॐ विपत्परम्परेशाय नमः ॥ ॐ विश्ववन्द्याय नमः ॥ ॐ गृध्नवाहाय नमः ॥ ॐ गूढाय नमः ॥ ॐ कूर्माङ्गाय नमः ॥ ॐ कुरूपिणे नमः ॥ ॐ कुत्सिताय नमः ॥ ॐ गुणाढ्याय नमः ॥ ॐ गोचराय नमः ॥ ॐ अविद्यामूलनाशाय नमः ॥ ॐ विद्याविद्यास्वरूपिणे नमः ॥ ॐ आयुष्यकारणाय नमः ॥ ॐ आपदुद्धर्त्रे नमः ॥ ॐ विष्णुभक्ताय नमः ॥ ॐ वशिने नमः ॥ ॐ विविधागमवेदिने नमः ॥ ॐ विधिस्तुत्याय नमः ॥ ॐ वन्द्याय नमः ॥ ॐ विरूपाक्षाय नमः ॥ ॐ वरिष्ठाय नमः ॥ ॐ गरिष्ठाय नमः ॥ ॐ वज्राङ्कुशधराय नमः ॥ ॐ वरदाभयहस्ताय नमः ॥ ॐ वामनाय नमः ॥ ॐ ज्येष्ठापत्नीसमेताय नमः ॥ ॐ श्रेष्ठाय नमः ॥ ॐ मितभाषिणे नमः ॥ ॐ कष्टौघनाशकर्त्रे नमः ॥ ॐ पुष्टिदाय नमः ॥ ॐ स्तुत्याय नमः ॥ ॐ स्तोत्रगम्याय नमः ॥ ॐ भक्तिवश्याय नमः ॥ ॐ भानवे नमः ॥ ॐ भानुपुत्राय नमः ॥ ॐ भव्याय नमः ॥ ॐ पावनाय नमः ॥ ॐ धनुर्मण्डलसंस्थाय नमः ॥ ॐ धनदाय नमः ॥ ॐ धनुष्मते नमः ॥ ॐ तनुप्रकाशदेहाय नमः ॥ ॐ तामसाय नमः ॥ ॐ अशेषजनवन्द्याय नमः ॥ ॐ विशेशफलदायिने नमः ॥ ॐ वशीकृतजनेशाय नमः ॥ ॐ पशूनां पतये नमः ॥ ॐ खेचराय नमः ॥ ॐ खगेशाय नमः ॥ ॐ घननीलाम्बराय नमः ॥ ॐ काठिन्यमानसाय नमः ॥ ॐ आर्यगणस्तुत्याय नमः ॥ ॐ नीलच्छत्राय नमः ॥ ॐ नित्याय नमः ॥ ॐ निर्गुणाय नमः ॥ ॐ गुणात्मने नमः ॥ ॐ निरामयाय नमः ॥ ॐ निन्द्याय नमः ॥ ॐ वन्दनीयाय नमः ॥ ॐ धीराय नमः ॥ ॐ दिव्यदेहाय नमः ॥ ॐ दीनार्तिहरणाय नमः ॥ ॐ दैन्यनाशकराय नमः ॥ ॐ आर्यजनगण्याय नमः ॥ ॐ क्रूराय नमः ॥ ॐ क्रूरचेष्टाय नमः ॥ ॐ कामक्रोधकराय नमः ॥ ॐ कलत्रपुत्रशत्रु

त्वकारणाय नमः ॥ ॐ परिपोषितभक्ताय नमः ॥ ॐ परभीतिहराय न मः ॥ ॐ भक्तसंघमनोऽभीष्

टफलदाय नमः ॥.

इसका नित्य १०८ पाठ करने से शनि सम्बन्धी सभी पीडायें समाप्त हो जाती हैं। तथा पाठ कर्ता धन धान्य समृद्धि वैभव से पूर्ण हो जाता है। और उसके सभी बिगडे कार्य बनने लगते है। यह सौ प्रतिशत अनुभूत है।

शनि के रत्न और उपरत्न

नीलम, नीलिमा, नीलमणि, जामुनिया, नीला कटेला, आदि शनि के रत्न और उपरत्न हैं। अच्छा रत्न शनिवार को पुष्य नक्षत्र में धारण करना चाहिये.इन रत्नों मे किसी भी रत्न को धारण करते ही चालीस प्रतिशत तक फ़ायदा मिल जाता है।

शनि की जडी बूटियां

बिच्छू बूटी की जड या शमी जिसे छोंकरा भी कहते है की जड शनिवार को पुष्य नक्षत्र में काले धागे में पुरुष और स्त्री दोनो ही दाहिने हाथ की भुजा में बान्धने से शनि के कुप्रभावों में कमी आना शुरु हो जाता है।

 🎯 शनि देव की शांति के उपाय(अंत तक पढ़ें)


🎯यदि आप किसी भी प्रकार के शनिकृत कष्टों से जूझ रहे है तो ये उपाय आपको अवश्य ही शांति प्रदान करेंगे-

🎯शनि  घुटने, जंघा, पिंडली, तथा स्नायु का कारक है। इनका स्वभाव थोडा क्रूर है। धातु लोहा और रत्न नीलम है। अंगुलियों में मध्यमा पर इनका अधिकार है।

🎯कुंडली में शनि की दशा हो या साढ़े साती हो अथवा शनि अशुभ स्थिति में हो तो यहाँ बताए गए उपायों में से कोई भी उपाय करके कष्टों से मुक्ति प्राप्त कर सकते है। यहाँ बताये गए सभी उपाय पूर्ण रूप से सात्विक है। इनके करने से किसी भी प्रकार की हानि नहीं होगी। यदि आप किसी भी प्रकार के शनिकृत कष्टों से जूझ रहे है तो ये उपाय आपको अवश्य ही शांति प्रदान करेंगे-

🎯जिनकी कुण्डली में शनि कमजोर हैं या शनि पीड़ित है उन्हें काली गाय का दान करना चाहिए।

🎯काला वस्त्र, उड़द दाल, काला तिल, चमड़े का जूता, नमक, सरसों तेल, लोहा, खेती योग्य भूमि, बर्तन व अनाज का दान करना चाहिए।

🎯शनि से सम्बन्धित रत्न का दान भी उत्तम होता है।

🎯शनि ग्रह की शांति के लिए दान देते समय ध्यान रखें कि संध्या काल हो और शनिवार का दिन हो तथा दान प्राप्त करने वाला व्यक्ति गरीब और वृद्ध हो।

🎯शनि के कोप से बचने हेतु व्यक्ति को शनिवार के दिन व्रत रखना चाहिए।

🎯लोहे के बर्तन में दही चावल और नमक मिलाकर भिखारियों और कौओं को देना चाहिए।

🎯रोटी पर नमक और सरसों तेल लगाकर कौआ को देना चाहिए।

🎯तिल और चावल पकाकर ब्राह्मण को खिलाना चाहिए।

🎯अपने भोजन में से कौए के लिए एक हिस्सा निकालकर उसे दें।

🎯शनि ग्रह से पीड़ित व्यक्ति के लिए हनुमान चालीसा का पाठ, महामृत्युंजय मंत्र का जाप एवं शनिस्तोत्रम का पाठ भी बहुत लाभदायक होता है।

🎯शनि ग्रह के दुष्प्रभाव से बचाव हेतु गरीब, वृद्ध एवं कर्मचारियो के प्रति अच्छा व्यवहार रखे।

🎯मोर पंख धारण करने से भी शनि के दुष्प्रभाव में कमी आती है।

🎯शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ पर तिल्ली के तेल का दीपक जलाएँ।

🎯भड्डरी को कड़वे तेल का दान करना चाहिए।

🎯भिखारी को उड़द की दाल की कचोरी खिलानी चाहिए।

🎯किसी दुःखी व्यक्ति के आँसू अपने हाथों से पोंछने चाहिए।

🎯शनि के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, शनि के नक्षत्र (पुष्य, अनुराधा, उत्तरा-भाद्रपद) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ फल देता है।

🎯अथ शनि नाम स्तोत्र


पिप्पलाद उवाच

ओम नमस्ते कोण संस्थाय पिंगलाय नमोस्तुते। नमस्ते रौद्र देहाय नमस्ते चांतकाय च।।

नमस्ते यम संज्ञाय नमस्ते सौरये विभो। नमस्ते मंद संज्ञाय शनैश्चर नमोस्तुते।।

प्रसादं कुरू देवेश दीनस्य प्रणतस्य च।


शनिः- ओम प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः


इस शनि मंत्र के किसी विद्वान ब्राहमण से 23.000 जाप करवाये। अथवा आप भी प्रतिदिन एक माला जाप कर सकते है।

🎯शनि गायत्री- ओम कृष्णांगाय विद्महे रवि पुत्राय धीमहि तन्नः सौरिः प्रचोदयात।


शनि गायत्री मंत्र की एक माला प्रतिदिन जपने से शनि के शुभ फल प्राप्त होते है।


🎯शनि के हवन में शमी वृक्ष की लकडी की आहुति लगती है। अथवा शमी वृक्ष की जड को शनिवार को काले कपडे में सिलकर पुरूष दायें हाथ में और स्त्री बायें हाथ में बांध लें।

🎯कुंडली में यदि शनि लग्न में बैठा हो तो जमीन में सुरमा गाड़ें। शमी वृक्ष की जड़ के साथ सुरमा दूध में उबालें। और फिर उसका नियमित तिलक करें। शनि पीड़ा से शांति मिलेगी।

🎯शनिवार का व्रत अवश्य रखें और पीपल की सेवा करें। मीठा जल अर्पित करें।

🎯शनि देव की पीड़ा हो तो शराब, मांस आदि नशे की लत से दूर रहना चाहिए। अन्यथा व्यक्ति की जिंदगी ख़राब होने से कोई नहीं रोक सकता। इस समय में व्यक्ति को साफ़ सुथरा रहना चाहिए।

🎯शनिवार को अँधेरा होने पर पीपल के वृक्ष पर हनुमान जी का स्मरण करके तिल के तेल के दीपक में सिंदूर डालकर लाल पुष्प अर्पित करें।

🎯भोजन में काली मिर्च और काला नमक का जरूर प्रयोग करें।

🎯किसी के सामने अपने कष्टों और समस्याओं की चर्चा न करें। किसी को भी अपनी परेशानी न बताएं।

🎯घर के किसी अँधेरे कोने में किसी लोहे के पात्र में सरसों का तेल डालकर उसमें ताम्बे का सिक्का डालकर रखें।

🎯शनिदेव से जुडी कोई भी वस्तु किसी से भी बिना पैसे दिए न लें।

🎯काले घोड़े की नाल लेकर घर के मुख्य द्वार के नीचे दबाएं।

🎯शनिवार को काले घोड़े की पूंछ के आठ बाल लेकर उन्हें किसी लकड़ी की डिब्बी में रखकर 43 दिन तक अपने शयनकक्ष में रखें। अंतिम दिन बाल जलाकर उसकी राख को सरसों के तेल में मिलाकर बहते पानी में प्रवाहित कर दें।

🎯शुक्रवार को 800 ग्राम काले तिल पानी में भिगो दें। अगले दिन उन्हें पीस कर गुड़ के साथ मिलाकर लड्डू बनाएं और काले घोड़े को खिलाएं। यह उपाय आठ शनिवार करना है।

🎯यदि शनि की ढैया या साढ़े साती चल रही हो तो पैतृक सम्पत्ति न बेचें, वरना परेशानी ज्यादा हो जाएगी।

🎯रोजाना महामृत्युंजय मंत्र के जाप करने से शनि देव की पीड़ा शांत होती है।

🎯नियमित रूप से शनि चालीसा और शनि के 108 नाम का उच्चारण करना चाहिए।

🎯प्रातः उठते ही बासे मुख से शनिदेव के 10 नामों का उच्चारण और द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नामों का जप करना चाहिए।

🎯प्रत्येक शनिवार को काले कुत्ते को रोटी पर सरसों का तेल लगाकर गुड़ रखकर खिलाएं। बंदरों को चने खिलाएं।

🎯किसी शनिवार को यदि आपको रास्ते में चलते हुए किसी भी रंग के घोड़े की नाल मिल जाये तो आप उसे तुरंत उठाकर ले आये और अपने घर के बाहर किसी सुरक्षित जगह रख दें। शनि के नक्षत्र - पुष्य , अनुराधा , उत्तराभाद्रपद में किसी पात्र में सरसों का तेल भरकर नाल को उसमें रख दें। काले तिल , आठ कील , और सवा रुपए भी रख दें। अब जिस नक्षत्र में आपने नाल डुबोई है , उसके अगले माह जब वह नक्षत्र वापस आये तब नाल को पात्र से निकाल कर पंचामृत से शुद्ध करके घर के मुख्य द्वार पर अंदर की तरफ यू आकार में कीलों से लगा दें। फिर रोली से तिलक करके धूप दीप से आरती करें तथा तेल और दूसरी सामग्रियां पीपल में चढ़ा दें। नाल को रोजाना धूप दीपक से पूजन करें। इस दिन से ही आप अपने जीवन में होने वाले परिवर्तनों पर 27 दिन ध्यान दें। यदि लाभ न हो तो उस नाल को यू आकार के विपरीत , मुँह को नीचे करके लगा दें। इसके पश्चात् आपको लाभ अवश्य होगा। 

🎯शनिवार की रात को अपने पलंग के चारों पायों के नीचे एक एक कील रखें। सवा मीटर रेशमी काले कपड़े में आठ सौ ग्राम काले उड़द के साथ आठ लोहे के गोल सिक्के जैसे स्टील के पत्तर के साथ सवा सौ ग्राम लौंग और काजल में चंदन का इत्र मिलाकर कर सोते समय सिरहाने रखें। अगले दिन सुबह स्नान के बाद कीलो को निकाल कर काले कपड़े के कोनों में बांधकर बाकी सामग्री को भी कपड़े में रखकर पोटली जैसा रूप दें दें। अपने सर से सात बार उसार कर किसी बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें।

Qयदि शनि की अधिक पीड़ा है तो शनिवार को अंधकार होने के बाद पीपल पर मीठा जल अर्पित करके सरसों के तेल का दीपक व धूप अगरबत्ती अर्पित करने के साथ वहीँ बैठ कर क्रमश हनुमान ,भैरव और शनि चालीसा का पाठ करें। इस उपाय से तुरंत लाभ प्राप्त होता है। यदि सामान्य रूप से यह कार्य करना चाहते है तो उपरोक्त प्रकार से पीपल की सेवा करके सात परिक्रमा देते हुए हनुमान चालीसा का पाठ करें। इससे भी अच्छा फायदा होता है।

🎯शनिवार को आप एक ही माप की आठ बोतलें लें। ये किसी भी माप की हो सकती है। हर बोतल में एक ही माप का सरसों का तेल भरें। प्रत्येक में आठ साबुत उड़द के दानें व कील डालें। फिर आठों बोतलों को अपने ऊपर से उसार कर बहते जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रकार आप ये क्रिया लगातार आठ शनिवार करें।

🎯यह उपाय सिर्फ पुरुषों के लिए ही है। इस उपाय के लिए आप पहले शनिवार को अपने बालों में सरसों का तेल डालना आरम्भ करें। पीपल पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं। तथा सोते समय आँखों में सुरमा लगाएं। पहली बार एक जटा वाला नारियल अपने शयन कक्ष में किसी शुद्ध स्थान पर रखें। इसके बाद अगले दिन पुनः सिर में तेल डालें और दीपक जला कर आँखों में सुरमा लगाएं। इस प्रकार यह क्रिया सात दिन तक लगातार करें। आठवे दिन सुबह सिर में तेल डाल कर स्नान करें और सवा मीटर काला कपड़ा लेकर नाई के साथ किसी बहते जल के पास जाएँ। किनारे पर शनिदेव का स्मरण करें और प्रार्थना करें कि प्रभु मैंने ये कार्य सिर्फ आपकी कृपा पाने के लिए किये है। मैं अपने बाल आपके नाम अर्पित कर रहा हूँ। यह कह कर नाई से अपने सारे बाल उतरवा लें। बालों को आटे की लोई में रखकर गोला बना लें। नारियल को काले कपड़े में रखकर अपने सिर से सात बार उसार कर जल में प्रवाहित करदें। बालों को भी प्रवाहित करदें। पहने हुए कपड़े भी वहीँ छोड़ दें। और साथ लाए दूसरे कपड़े पहन कर वापस आ जायें। इस उपाय से आप कुछ ही समय में परिवर्तन देखेंगे कि आपके काम होने लगे है।

🎯शनिवार को काली गाय की सेवा करें। तिलक बिंदी करके उसके सींग पर कलावा बांध कर बूंदी के आठ लड्डू खिलाए और चरण स्पर्श करें।

🎯शुक्लपक्ष के पहले शनिवार को आठ मीटर काले कपड़े में 800 ग्राम काली उड़द , चावल , गुड़ , काली सरसों , काले तिल, जौ आठ बड़ी कीलें , और एक एक सुरमा व इत्र की शीशी को कपड़े में बांधकर पोटली के रूप में रख दें। अलग से दस छिलके वाले बादाम लेकर किसी भी हनुमान मंदिर में जाएँ। और पोटली व बादाम मंदिर में ही कहीं रख दें। फिर स्टील की कटोरी में सिन्दूर को चमेली के तेल में गीला करके प्रसाद और पीले फूल के साथ प्रभु को अर्पित करदें। बैठ कर हनुमान चालीसा का पाठ करें। और सात परिक्रमा दें। फिर पोटली को मंदिर में ही छोड़ दें। दस बादाम में से पांच बादाम मंदिर में छोड़ दें। बाकी के पांच लेकर किसी नए लाल कपड़ें में बांधकर अपने धन रखने के स्थान पर रख दें। इससे आपको पीड़ा में आराम मिलेगा।

🎯काले कुत्ते को प्रतिदिन मीठी रोटी खिलाएं।

🎯शनिवार को आप दूध , शहद , दही , शक़्कर , सरसों का तेल , ये प्रत्येक वस्तुएं सवा लीटर की मात्रा में तथा एक नील की बोतल , सफ़ेद सुरमा , काला नमक , काली मिर्च , 11 लोंग , सवा मीटर काला कपड़ा , सवा किलो काले तिल , सवा किलो उरद , थोड़े चावल , पहले शनिवार को शनिदेव का स्मरण करके पीपल पर धूप दीप सरसों के तेल का दीपक,अर्पित करें। दूध आदि गीली सामग्री पीपल की जड़ में अर्पित करें। व बाकी सामग्री डाकोत को दान दें। यह उपाय लगातार आठ शनिवार करें।

🎯क्या न करें:-

जो व्यक्ति शनि ग्रह से पीड़ित हैं उन्हें गरीबों, वृद्धों एवं नौकरों के प्रति अपमान जनक व्यवहार नहीं करना चाहिए। नमक और नमकीन पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए, सरसों तेल से बनें पदार्थ, तिल और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। शनिवार के दिन लोहे, चमड़े, लकड़ी की वस्तुएँ एवं किसी भी प्रकार का तेल नहीं खरीदना चाहिए।

🎯    शनिवार के दिन बाल, नाखुन एवं दाढ़ी-मूँछ नही कटवाने चाहिए।  जमीन पर नहीं सोना चाहिए। शनि से पीड़ित व्यक्ति के लिए काले घोड़े की नाल और नाव की कांटी से बनी अंगूठी भी काफी लाभप्रद होती है परंतु इसे किसी अच्छे पंडित से सलाह और पूजा के पश्चात ही धारण करना चाहिए। साढ़े साती से पीड़ित व्यक्तियों के लिए भी शनि का यह उपाय लाभप्रद है। शनि का यह उपाय शनि की सभी दशा में कारगर और लाभप्रद है।


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