ज्योतिष में जानिए "क्या है पंचक?"

 ज्योतिष में जानिए "क्या है पंचक"?



ज्योतिष पांच नक्षत्रों की कालावधि पंचक कहलाती है। यानी चंद्र ग्रह का धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण और शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद तथा रेवती नक्षत्र के चारों चरणों में भ्रमण काल पंचक होता है। मान्यता है कि इनमें संपादित अशुभ कर्मों का पांच बार दोहराव होता है।

खगोल विज्ञान की दृष्टि से समझें तो 360 अंशों वाले भचक्र में पृथ्वी जब 300 डिग्री से 360 डिग्री के मध्य भ्रमण की अवधि को पंचक काल कहते हैं, तब धरती पर चंद्रमा का प्रभाव अत्यधिक होता।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार 5 ऐसे नक्षत्र हैं जिनके विशेष संयोग से बनने वाले योग को पंचक कहा जाता है। यह पांच नक्षत्र शुभ कार्यों के लिए दूषित माने जाते हैं इसी कारण कुछ विशेष कार्यों को पूर्ण करने से पहले पंचक का विशेष ध्यान रखा जाता है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार नक्षत्र चक्र में 27 नक्षत्रों का वर्णन किया गया है। इन नक्षत्रों के आधार पर ही सभी 12 राशियों में सभी 27 नक्षत्रों को विभक्त किया गया है। जिसके अनुसार एक राशि में लगभग सवा दो नक्षत्र आते हैं। एक नक्षत्र का मान 13 अंश 20 मिनट होता है और प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं जिसमें प्रत्येक चरण 3 अंश 20 मिनट का होता है। एक राशि का मान 30 अंश का होता है। जब चंद्रमा अपनी गति करते हुए कुंभ और मीन राशि में गोचर करते हैं तो उसी समय पंचक लगते हैं।यानि

जैसे ही चंद्र देव कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं धनिष्ठा नक्षत्र के तीसरे चरण का प्रारंभ होता है। उसके बाद शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती से होकर चंद्र देव आगे बढ़ जाते हैं। इस प्रकार इन पांचों नक्षत्र में गति करते हुए चंद्र देव को लगभग 5 दिन का समय लगता है यही 5 दिन और यही पांच नक्षत्र पंचक कहलाते हैं। चूँकि 27 दिन में चंद्र देव सभी राशियों में भ्रमण करते हुए दोबारा उसी राशि में प्रवेश कर जाते हैं। इसलिए 27 दिन की आवृत्ति के बाद पुनः पंचक लगते हैं।

वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत किसी भी शुभ कार्य का मुहूर्त जानने के लिए हमें पंचांग की आवश्यकता होती है। पंचांग के द्वारा ही विभिन्न प्रकार के वार, तिथि, नक्षत्र, करण तथा योग की जानकारी प्राप्त होती है। इसी पंचांग के अंतर्गत मुहूर्त का ध्यान करते समय हमें पंचक का विशेष ध्यान रखना होता है क्योंकि पंचक लगने का समय मुहूर्त शास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए हमने पंचक कैलकुलेटर आपके सामने प्रस्तुत किया है। इस कैलकुलेटर के माध्यम से आप जान सकते हैं कि किस दिन पंचक प्रारंभ होंगे और किस दिन समाप्त होंगे। इसकी सहायता से आप पंचक के समय के बारे में भी पूरी जानकारी प्राप्त कर अपना कीमती समय बचा सकते हैं।

ज्योतिष के अनुसार, पंचक काल में 5 कार्य ऐसे होते हैं, जो निषेध बताए गए हैं। मान्यता है कि अगर आप इस दिन लकड़ी खरीदते हैं तो अग्नि का भय रहता है।

1. लकड़ी खरीदना, 2. घर पर छत का निर्माण, 3. शव जलाना, 4. शय्या का निर्माण 5. दक्षिण की यात्रा।

हिंदू संस्कृति में सभी कार्यों को मुहूर्त देखकर करने का विधान है। शुभ मुहूर्त में किए गए कार्य आसानी से तथा सफलता दायक होते हैं तथा मुहूर्त के बिना किए गए कार्यों में सफलता मिलने में संदेह होता है। इसी मुहूर्त का ध्यान रखते हुए कुछ विशेष कार्यों के निमित्त पंचक को विशेष महत्व दिया गया है।

पंचक के अनुसार कार्य की आवृत्ति

पंचक में पांच नक्षत्र का योग होता है इसलिए माना जाता है कि पंचक के समय में यदि कोई अशुभ कार्य हो जाए तो वह 5 बार पुनः होता है। अर्थात उसके बाद पांच बार उसकी पुनरावृत्ति होती है। इसलिए पंचक के दौरान हुए अशुभ कार्य का निवारण करना अति आवश्यक हो जाता है। विशेष रुप से यदि पंचक के दौरान किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो घर परिवार में पांच लोगों पर मृत्यु के समान संकट मंडराता रहता है। इसलिए उसकी मृत्यु के उपरांत दाह संस्कार के समय आटे और चावल के 5 पुतले बनाकर मृतक के साथ में उनका भी दाह संस्कार कर दिया जाता है ताकि परिवार के अन्य सदस्यों पर से पंचक के संकट की समाप्ति हो जाए और उन्हें किसी प्रकार का कोई कष्ट न उठाना पड़े।

पंचक के प्रकार

प्रत्येक दिन के हिसाब से पंचकों का वर्गीकरण किया गया है, अर्थात किसी खास दिन शुरू होने वाले पंचक एक अलग नाम से जाने जाते हैं और उनका अलग-अलग प्रभाव भी होता है।आइए जानते हैं विभिन्न प्रकार के पंचक के बारे में:पंचक के प्रकार

ज्योतिष के अनुसार, हर दिन पड़ने वाले पंचक काल का प्रभाव अलग होता है। कौन सा पंचक क्या प्रभाव देगा, यह इस हिसाब से शुरू होता है कि पंचक की शुरुआत किस दिन से हुई है।

1. रविवार का पंचक रोग पंचक कहलाता है।

2. सोमवार के पंचक को राज पंचक कहते हैं।

3. मंगलवार का पंचक अग्नि पंचक होता है।

4. बुधवार और गुरुवार की पंचक दोषमुक्त हैं।

5. शुक्रवार पंचक चोर पंचक कहलाता है।

6. शनिवार को पड़ने वाला पंचक मृत्यु पंचक है।

1. रोग पंचक

जब पंचक का प्रारंभ रविवार के दिन होता है तो ऐसे पंचक को रोग पंचक कहते हैं। रोग पंचक के कारण आने वाले 5 दिन विशेष रुप से सर्व कष्ट और मानसिक परेशानियों को देने वाले होते हैं। इस पंचक में शुभ कार्यों को सर्वथा त्यागना चाहिए क्योंकि यह हर तरह के शुभ कार्यों में अशुभ माने जाते हैं।

2. राज पंचक

जब पंचक सोमवार के दिन से शुरू होते हैं तो ऐसे पंचक को राज पंचक कहा जाता है। आमतौर पर यह पंचक शुभ माने जाते हैं और उनके प्रभाव से आने वाले सभी 5 दिन कार्य में सफलता और सरकारी कामकाज से लाभ दिलाते हैं तथा संपत्ति से जुड़े काम करने के लिए भी राज पंचक काफी उपयुक्त होता है।

3. अग्नि पंचक

मंगलवार के दिन से शुरू होने वाले पंचक अग्नि पंचक के नाम से जाने जाते हैं। इस दौरान आप कोर्ट कचहरी और विवाद आदि के फ़ैसलों पर अपना हक प्राप्त करने के लिए अनेक कार्य कर सकते हैं। यह पंचक अशुभ माना जाता है इसी वजह से इस पंचक में किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य तथा मशीनरी और औजार के काम की शुरुआत करना अशुभ होता है। क्योंकि ये देखा जाता है कि इस पंचक पर इन कार्यों को करने से नुकसान होने की पूरी संभावना रहती है।

4. चोर पंचक

शुक्रवार के दिन से शुरू होने वाले पंचक चोर पंचक कहलाते हैं। चोर पंचक विशेष रूप से यात्रा करने के उद्देश्य से त्याज्य माने जाते हैं। इसके अलावा इस पंचक पर किसी भी प्रकार का व्यापार, लेन-देन तथा किसी भी प्रकार का सौदा नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसे कार्य करते हैं तो आपको विशेष रूप से धन की हानि हो सकती है।

5. मृत्यु पंचक

इसी क्रम में जब पंचक की शुरुआत शनिवार के दिन से होती है तो ऐसा पंचक मृत्यु पंचक कहलाता है। इस पंचक के दौरान मृत्यु तुल्य कष्टों की प्राप्ति हो सकती है और यह पूरी तरह से अशुभ माना जाता है। इस दौरान आपको किसी भी प्रकार के कष्टकारी कार्य और किसी भी प्रकार के जोखिम भरे कामों को करने से बचना चाहिए, क्योंकि इस पंचक के प्रभाव से आपको किसी प्रकार की चोट लग सकती है अथवा आपके साथ कोई दुर्घटना भी हो सकती है। साथ ही अपने लोगों तथा अन्य लोगों से भी विवाद की स्थिति बन सकती है।

विशेष नोट: इसके अतिरिक्त जब कोई पंचक बुधवार या बृहस्पतिवार को शुरू होता है तो उनमें उपरोक्त किसी भी प्रकार की बात का पालन करना आवश्यक नहीं होता। इन 2 दिनों में शुरू होने वाले पंचक के दौरान उपरोक्त बताए गए कार्यों के अलावा किसी भी तरह के शुभ कार्य किए जा सकते हैं।

पंचक के दौरान न किए जाने वाले कार्य

हिंदू धर्म में शास्त्रों के अनुसार पंचक के समय के दौरान कुछ ऐसे कार्य बताए गए हैं जिन्हें नहीं करना चाहिए क्योंकि इनका समय अनुकूल नहीं होता।

इनमें विशेष रूप से दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना वर्जित माना जाता है।

साथ ही यदि आपका घर का निर्माण हो रहा है तो पंचक के समय में घर की छत नहीं बनानी चाहिए। अर्थात लेंटर नहीं डालना चाहिए।

इसके अलावा पंचक के दौरान लकड़ी, कण्डा या अन्य प्रकार के ईंधन का भंडारण नहीं करना चाहिए।

इनके अतिरिक्त भी कुछ ऐसे कार्य है जो पंचक के समय में नहीं करनी चाहिए उनमें विशेष रूप से किसी भी प्रकार का पलंग खरीदना अथवा पलंग बनवाना, बिस्तर खरीदना या बिस्तर का दान करना भी कष्टदायक माना जाता है।

इसी लिए इस दौरान यह सभी कार्य नहीं किए जाते। हालांकि इन सभी कार्यों के अतिरिक्त अन्य कोई भी कार्य आप पंचक के दौरान कर सकते हैं।

पंचक के दौरान किए जाने वाले कार्य

जैसा कि हमने पहले भी बताया की पंचक सभी कार्यों के लिए अशुभ नहीं होते बल्कि कई कार्यों को करने के लिए पंचक अत्यंत शुभकारी माने जाते हैं। आइए जानते हैं कि कौन से हैं वे कार्य जो पंचक के दौरान किए जा सकते हैं:

पंचक के दौरान जो नक्षत्र होते हैं उनमें कुछ विशेष योगों का निर्माण भी होता है। जैसे कि धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद तथा रेवती नक्षत्र यात्रा करने, मुंडन कार्य, तथा व्यापार आदि शुभ कार्यो के लिए प्रशस्त माने गए हैं।

इसके अलावा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वार के साथ मिलकर सर्वार्थ सिद्धि योग बनाता है। हालांकि हम पंचक को अशुभ की संज्ञा देते हैं लेकिन पंचक के दौरान अन्य शुभ कार्य जैसे कि सगाई समारोह, विवाह आदि शुभ कार्य भी किए जाते हैं।

पंचक के तीन नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद तथा रेवती यदि रविवार के दिन पड़े तो विभिन्न प्रकार के शुभ योग बनाते हैं जिनमें चर, स्थिर और प्रवर्ध मुख्य हैं। इन योग के कारण व्यक्ति को सफलता की प्राप्ति होती है व उसे धन लाभ भी होता है।

मुहूर्त चिंतामणि ग्रंथ मुहूर्त के बारे में विशेष रूप से प्रकाश डालता है। इसके अनुसार यदि पंचक के नक्षत्रों में से धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र चल संज्ञक माने जाते हैं। इसलिए नक्षत्रों के दौरान कोई भी चलने वाला काम अर्थात गति वाला काम करना अत्यंत अशुभ होता है। जैसे कि किसी प्रकार की यात्रा करना, वाहन खरीदना, कल पुर्जे और मशीनरी आदि से संबंधित काम करना आदि। वहीं दूसरी ओर उत्तरभाद्र पद नक्षत्र स्थिर संज्ञक नक्षत्र होता है। इसलिए इस नक्षत्र के दौरान ऐसे कार्य किए जाते हैं जिनमें स्थिरता की आवश्यकता होती है। इनमें मुख्य रूप से गृह प्रवेश करना, शांति पूजन कराना, बीज बोना तथा जमीन से जुड़े स्थिर प्रकृति के कार्य किए जा सकते हैं।

अंतिम नक्षत्र रेवती मैत्री संज्ञक नक्षत्र होता है। इसलिए इस नक्षत्र के दौरान किसी भी प्रकार के वाद विवाद का निपटारा करना, व्यापार अथवा कपड़े से संबंधित सौदा करना, नए आभूषण खरीदना आदि संबंधित शुभ कार्य किए जा सकते हैं।

पंचक के दौरान इन बातों का रखें विशेष ध्यान

शास्त्रों में कुछ ऐसी बातें बताई गई हैं जिन्हें पंचक के दौरान विशेष रुप से ध्यान में रखा जाता है।

1. इनमें प्रत्येक पंचक के लिए विशेष रूप से अलग अलग बातें बताई गई हैं, जैसे कि जिस समय धनिष्ठा नक्षत्र का पंचक हो, उस समय किसी प्रकार की लकड़ी, ईंधन, घास आदि एकत्रित नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से आग लगने का भय होता है।

2. यदि पंचक के दौरान किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो पंचक के समय में उसके शव का अंतिम संस्कार करने से पूर्व किसी विशेष और योग्य पंडित से पूरी जानकारी लेनी चाहिए और पंचक के समय में शव का अंतिम संस्कार करने से बचना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो गरुड़ पुराण के अनुसार उसके साथ आटे और कुश के 5 पुतलों का भी दाह संस्कार पूरे विधि विधान के अनुसार किया जाना चाहिए अन्यथा मृतक के कुटुंब और निकट के लोगों पर मृत्यु का संकट मंडराता रहता है।

3. पंचक के दौरान दक्षिण दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए क्योंकि दक्षिण दिशा को मृत्यु के देवता यम की दिशा माना जाता है। ऐसे में पंचक के दौरान दक्षिण दिशा की यात्रा हानिकारक और कष्टदायक हो सकती है।

4. पंचक के दौरान रेवती नक्षत्र चल रहा हो तो घर की छत नहीं बनानी चाहिए अर्थात लेंटर नहीं डालना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से धन की हानि होती है और परिवार में कलेश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

5. पंचक के दौरान किसी भी प्रकार का पलंग बनवाना भी बड़े से बड़े संकट को निमंत्रण दे सकता है। विशेष रुप से धनिष्ठा नक्षत्र के पंचक में अग्नि का भय होता है और शतभिषा नक्षत्र में कलह होने की संभावना होती है।

6. पूर्वाभाद्रपद के पंचक में रोग होने की संभावना काफी होती है तथा उत्तरा भाद्रपद के पंचक में धन हानि और कष्ट मिलने की संभावना होती है।

7. इसके अलावा रेवती नक्षत्र के पंचक में मानसिक कष्ट होने की प्रबल संभावना होती है। इसलिए पंचक के दौरान जो कार्य निषेध माने जाते हैं उनका त्याग कर अन्य शेष शुभ कार्यों का संपादन किया जा सकता है।

हम आशा करते हैं कि पंचक के बारे में दी गई जानकारी को पढ़कर आपके ज्ञान में वृद्धि हुई होगी और अब आप पंचक के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त करने के बाद अपने जीवन में सफलता पा सकेंगे।

क्या पंचक में मृत्यु पर पांच लोगों की होती है मौत?

भारत में वैदिक ज्योतिष की बहुत मान्यता है और सभी पर्व इसी ज्योतिष के आधार पर तय होते हैं। वैदिक ज्योतिष में ग्रह-नक्षत्रों का बहुत विचार होता है और इनमें पंचक काल का महत्वपूर्ण स्थान होता है। मान्यता है कि पंचक काल में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। इस काल को अमंगलसूचक माना गया है। पुराणों के अनुसार, जब भगवान राम द्वारा रावण की मृत्यु हुई थी, उसके बाद से ही पांच दिन का पंचक माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार, अगर पंचक काल में किसी की मृत्यु हो जाए तो उसे अशुभ मानते हैं क्योंकि उसके साथ ही कुल में पांच लोगों की मृत्यु की आशंका बनी रहती है। आइए जानते हैं पंचक में मृत्यु का क्या परिणाम होता है

पंचक काल में मृत्यु होने पर

पंचक काल में मृत्यु होना शुभ नहीं माना जाता। मान्यता है कि ऐसा करने से परिवार, कुल या रिश्तेदारी बड़ी जन हानि की आशंका बनी रहती है। इस बचने के लिए मृतक व्यक्ति के अंतिम संस्कार करते समय कुशा का एक पुतला बनाकर उसका भी मृतक के साथ दाह संस्कार करने का विधान है।धर्मसिन्धुके मतानुसार ..

नक्षत्रान्तरे मृतस्य पंचके दाह प्राप्तौ पुत्तल विधिरेव न शांतिकम।

पँचकमृतस्याशविण्यां दाहप्रापतौ शांतिकमेव न पुत्तलविधि: ।।

अर्थात यदि पँचकों में मृत्यु हो तो वह वंशजों को भी मार डालता है अतः , ऐसी स्थिति में अनिष्ट के निवारणार्थ कुशों की पाँच प्रतिमा ( पुत्तल) बनाकर सूत्र से वेष्टित कर जौ के आटे की पीठी से उनका लेपन कर उनका शव के साथ दाह करें ।अर्थात पँचक में तृण काष्ठ आदि का संचयन , दक्षिण दिशागत यात्रा, घर की छत डालना , प्रेतदाह और शय्या बीनना अर्थात खाट भरना ये कर्म निषिद्ध है।

इस विषय में मुहूर्त मार्तंड” , ” ज्योतिर्विदा भरणआदि बहुत से ज्योतिष के प्राचीन ग्रँथ मार्ग दर्शन करते हैं ।

इस विषय में प्रसिद्ध निर्णयसिन्धु ग्रँथ और धर्म सिंधुका मत है की इन पाँच नक्षत्रों में मृत्यु होने पर दोष निवारणार्थ शाँति विधान है जिसेपँचक शाँति कहा जाता है ।

इन धर्म ग्रन्थों के अनुसार जो विशेष बात कही गयी है वो है पुत्तल दाह अर्थात पुतलों को जलाना ।

इस विषय में विशेष जानने योग्य बात ये है की अगर , मृत्यु पँचक प्रारम्भ होने से पूर्व हुई है और शव का दाह पँचक में होना है तो पुत्तल दाह करें , फिर शांति करने की आवश्यकता नहीं रहती ।

इसके विपरीत यदि मृत्यु पँचक में हुई है तो और दाह पँचक समाप्ति के बाद होना हो , तो पँचक शांति करने का विधान है ।

और यदि मृत्यु भी पँचक में हुई और दाह भी पँचक में होना है तो पुत्तल दाहऔर शांति कर्म दोनों करें ।

पँचक शांति इसलिए भी आवश्यक है , इसका प्रभाव परिवार के सदस्यों पर भी पड़ता है ।

पँचक शांति सुतकान्त ( अर्थात सूतक के अंत में) बारहवें दिन , तेरहवें दिन या धनिष्ठा आदि नक्षत्रों में करनी चाहिए ।

और जो पुत्तल दाह विधान है वह इस प्रकार है इन पाँच पुतलों के वैधानिक नाम हैं प्रेतवाह ,प्रेतसखा , प्रेतप , प्रेत भूमिप , प्रेतहर्ता ।

पुत्तल दाह का विशेष संकल्प

अद्य ….. शर्मा / वर्मा/ गुप्तोहम ….गोत्रस्य ( गोत्राया:) अमुक नाम प्रेतस्य ( मरने वाले का नाम) धनिष्ठादि पँचक जनित वंशानिष्टपरिहारार्थ पँचक विधि करिष्ये ।

ऐसा बोल कर पाँचों पुतलों का निम्न रीति से पूजन हो ।

प्रेतवाहाय नमः , प्रेतसखाय नम, प्रेतपाय नमः,प्रेतभूमिपाय नमः, प्रेतहरत्रे नमः । इमानि गंधाक्षत पुष्पधूपदीपादिनी वस्तुनि युष्मभ्यं मया दीयन्ते युष्माकमुपतिष्ठन्ताम

ऐसे बोल पाँचों प्रेतों को गन्ध,अक्षत , पुष्प ,धूप दीप प्रदान करें ।

पूजन के बाद प्रेतवाह नामक पुतले को शव के सिर पर , दूसरे को नेत्रों पर ,तीसरे को बायीं काख पर चौथे को नाभि पर और पाँचवे को पैरों के ऊपर रख , ऊपर लिखित इन प्रेतों के नाम मंत्रों से क्रमानुसार घी की आहुति देनी चाहिए ,जैसे 1 प्रेतवाहाय स्वाहा 2 प्रेतसखाय स्वाहा 3 प्रेतपाय स्वाहा 4 प्रेत भूमिपाय स्वाहा 5 प्रेत हरत्रे स्वाहा ।

इसके बाद शव दाह होता है ।

हमारी वैदिक परम्पराएँ बहुत ही गूढ़ है और साथ ही इनके जानकार भी कम होते जा रहे हैं । वो विस्तृत रूप से कारण और विधान भी जानते हों । प्रस्तुत लेख को लिखने का कारण भी यही है और उद्देश्य भी की पारम्परिक ज्ञान अक्षुण्ण रहे ।

इसलिए धनिष्ठापंचके त्याज्यस्तृणकाष्ठादिसंग्रह: ।

त्याज्या दक्षिण दिगयात्रा ग्रहाणाम छादनम तथा ।।

उपाय

इसके निवारण हेतु केवल महामृत्युंजय मंत्र ही सहायक होता हैं- (ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !) का अनुष्ठान ही निवारण कर सकता है



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