अरुण ग्रह का सम्पूर्ण विवेचन भावगत और राशिगत फल
अरुण ग्रह का सम्पूर्ण विवेचन भावगत और राशिगत फल
हम नौ ग्रहों को तो जानते हैं परन्तु अब दो और ग्रहों का भी पता चल गया है। इनकी कक्षा के बारे में जानकारी प्राप्त हो रही है। आधुनिक ज्योतिष ग्रंथों में इन दोनों ग्रहों का नामकरण हर्षल और नेपच्यून किया गया है। इनका भी प्रभाव मानव के क्रिया-कलापों पर पड़ता है।
इंटेलिजेंस का प्रतीक यूरेनस 1781 ईस्वी में यूरेनस ग्रह की खोज हुई थी। भारतीय ज्योतिष में यूरेनस को ‘हर्षल‘ या ‘प्रजापति‘ भी कहा जाता है। ज्योतिष के अनुसार, यूरेनस और इसकी ऊर्जा काफी शक्तिशाली है। यह बुद्धि का प्रतीक है। इसलिए, यह अनुसंधान, तकनीकी प्रगति, सफलता और समग्र विकास के क्षेत्रों में बहुत योगदान देता है। पुरुषीय गृह है किन्तु वृद्ध, कोमल धुनि और योगिक बुद्धि वाला है
मौलिकता और विशिष्टता का पक्षधर यूरेनस आकाश और स्वर्ग का देवता है। यह कुंभ राशि का स्वामी भी है। यूरेनस आगे बढ़ने और आगे दिखने का प्रतीक है। इसमें परंपरा भी शामिल है और मौलिकता और व्यक्तित्व की पक्षधर है। यूरेनस प्रगतिशीलता से जुड़ा हुआ है। यह ज्ञान, निष्पक्षता, नवीनता और सरलता को भी व्यक्त करता है। यूरेनस की नकारात्मक अभिव्यक्ति व्यवस्था और गैर जिम्मेदाराना नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल देती है।
अरुण क्रांतिकारी सुधार व परिवर्तन तथा सामाजिक बंधन से मुक्ति पाकर अपनी मनपसन्द की जीवन शैली अपनाने की प्रवृत्ति देता है। सड़ी-गली सामाजिक मान्यता, परंपरा व आस्थाओं को ध्वस्त कर, जीवन व भाग्य की डोर अपने हाथों में लेने की प्रेरणा देता है। सामाजिक प्रतिबंधों को नकार कर उन्मुक्त जीवन शैली अपनाने के लिए कभी ऐसा जातक, असामाजिक तत्वों का सहयोग पाकर, अपना कड़ा विरोध जताता है। वह सामाजिक व्यवस्था को नष्ट करने में सुख का अनुभव करता है। विद्वानों ने इसे राहु सरीखा विस्फोटक तथा मंगल सरीखा क्रांतिकारी माना है। इसका दिन शनिवार माना गया है जातक के मस्तिष्क व स्नायुतन्त्र पर यह प्रभाव डालता है। दार्शनिकताए आध्यात्मिकता तथा गहन चिन्तन का स्वभाव जातक को पाश्चात्य ज्योतिषियों के अनुसार इसी ग्रह से मिलता है अचानक दुर्भाग्य या सौभाग्य का कारक भी यूरेनस को माना गया है। मौलिक चिन्तन एवं विषय की खोज की प्रवृत्ति का कारक भी यही है। क्रांति या बड़े परिवर्तन का प्रतीक यूरेनस की प्रकृति पुरानी मान्यताओं और कठोर विचारों को तोड़ते हुए नई संरचनाओं का पुनर्निर्माण करना है। इसे एक अत्यंत क्रांतिकारी ग्रह माना जाता है। यूरेनस लोकतंत्र और स्वतंत्र दिमाग में विश्वास करता है। यह अत्याचार सहन नहीं करता। यूरेनस किसी के नियंत्रण या दबाव में कुछ भी नहीं कर सकता है। यूरेनस अंतरिक्ष अनुसंधान, परमाणु अनुसंधान, पुरातत्व के क्षेत्र से भी संबंधित है।
जब से यूरेनस की खोज हुई है तभी से पाश्चात्य एवं भारतीय ज्योतिषीगण इस नवीन ग्रह के मानव पर पड़ने वाले प्रभाव को जानने की कोशिश करते रहे हैं। पाश्चात्य ज्योतिषियों ने इसका नाम यूरेनस तथा भारतीय ज्योतिषियों ने प्रजापति रखा है। जिस तरह गुरु की कक्षा के आगे शनि की कक्षा होने के कारण शनि को गुरु का पिता माना गया है। उसी तरह यूरेनस की कक्षा शनि के ऊपर होने के कारण यूरेनस को शनि का पिता और गुरु का पितामह और सब देवों में वृद्ध माना गया है। जब यूरेनस की खोज हुई तो इसे मिथुन राशि में देखा गया।
यूरेनस का एक दिन पृथ्वी के 16 घंटे 10 मिनट का है। किन्तु एक वर्ष पृथ्वी के 84ण्01 वर्ष के बराबर है। यूरेनस के वायुमंडल की प्रमुख गैसें मीथेनए हीलियम व हाइड्रोजन हैं। इसका व्यास 50ए800 किण्मीण् तथा तापमान.210 सेल्सियस है। सूर्य से लगभग 19ण्1894 तथा पृथ्वी से प्रायः 17ण्2894 निकटतम दूरी है। इसका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 1ण्17 गुना एवं द्रव्यमान पृथ्वी की अपेक्षा 14ण्6 गुना है। यूरेनस के पांच चन्द्रमा ;उपग्रह हैंद्ध.मिरांडाए एरियलए अम्ब्रायलए टिटेनिया तथा ओबेरान । यूरेनस के 9 वलय या छल्ले भी हैंए जो काफी धुंधले हैं। ये सभी छल्ले 64000 किण्मीण् की सीमा में हैं। इन्हें 1977 में खोजा गया था। मीलों में यूरेनस सूर्य से प्रायः 1ए783ए000ए000 मील दूर है तथा इसका डायामीटर 32ए200 मील है। बाद में यूरेनस के और चन्द्र भी खोजे गए और अब इनकी संख्या 15 तक हो चुकी है।
6 कन्या 3 मिथुन व 11कुम्भ राशियों में यूरेनस को शुभ फल देने वाला माना गया है। शुभ स्थिति में यह जातक को बौद्धिक कार्योंए गूढ़ खोजोंए आविष्कारोंए विद्युत विशेषज्ञताए सार्वजनिक भवन निर्माण के कार्यों तथा लॉटरी.सट्टे आदि में सफलता दिलाता है। अशुभ होने पर यह जातक को जन्म से ही दुख भोगने को विवश कर देता है। पिता से अलगावए जीवनसाथी से तलाक अथवा वियोग आदि दुष्परिणाम देने वाला होता है। जन्म समय में यूरेनस वक्री हो तो जातक कठिन.से.कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता। बुद्धि व कल्पना शक्ति प्रखर तथा सकारात्मकता एवं आशा बढ़ी हुई रहती है। वृष राशि में यह ग्रह नीच का हो जाता है। उदर रोगए हैजाए बुखारए हृदय रोग का भी कारक यही है। बिजली के उपकरणए विद्युत सामग्रीए विद्युत उत्पादन तथा शेयर बाजार में तेजी.मंदी अचानक आने का सम्बन्ध भी यूरेनस से जोड़ा जाता है। सत्य की खोज तथा आविष्कारी प्रवृत्ति के गुण भी यही देता है।
ज्योतिषियों का मानना है कि मनुष्य की कुंडली में जो असाधारणता देखने को मिलती है वह इसी ग्रह के कारण है। तत्व ज्ञानी लोगों की कुडली देखें तो उसमें इस यूरेनस की प्रबलता अधिक मिलेगी। वर्तमान समय में भी जो अध्यात्म और विज्ञान की प्रगति चल रही है वह इसी ग्रह के कारण है। फलित ज्योतिषशास्त्रियों का मानना है कि यूरेनस कुंभ राशि में स्वगृही और वृश्चिक राशि में उच्च का होता है। यह मिथुन, तुला तथा कुंभ इन वायु राशियों में विशेष बलवान दिखाई देता है।
यह कुंडली के भाव 1,3,5,7,9 या 10 में विशेष फलदायी होता है। लग्न की अपेक्षा दशम स्थान में अति अनिष्ट फल उत्पन्न करता है, परंतु इन स्थानों में यदि मिथुन, तुला या कंुभ राशि हो और शुभ दृष्ट हो तो यह अपनी अशुभता खोकर शुभ फल प्रदान करता है। यदि यह अग्निकारक राशि मेष, सिंह या धनु में हो तो जातक को हठी, कुशाग्र बुद्धि, अति महत्वाकांक्षी और हिम्मती बना देता है। ऐसे जातकों को अपघात आदि आकस्मिक संकटों का भय अधिक होता है।
यदि यूरेनस शास्त्रीय राशि मिथुन, तुला या कुंभ मे हो तो जातक को अनेक शाश्त्रो के प्रति विशेष प्रीति रखने वाला बना देता है। यदि जल राशि में हो तो जातक कामी, दुराचारी और दुष्ट स्वभाव का होता है। किंतु यदि यह किसी पृथ्वी तत्व राशि में हो तो जातक हंसमुख, हंसी-मजाक करने वाला, दूसरों को प्रसन्न करने वाला, मुंहफट, विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थों का शौकीन, हठी शीघ्र नाराज होने वाला, चुगली करने वाला और कामी होता है। ऐसा जातक स्त्रियों का प्रिय होता है। यूरेनस के भाव फल राशि फलों की अपेक्षा अधिक होते हैं, क्योंकि यह एक राशि में लगभग 7 वर्ष रहता है। इसलिए कुंडली में राशि की अपेक्षा भाव में इसकी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण होती है। 7 वर्ष तक जन्मे सभी जातकों के लिए राशि फल एक सा होगा, इसी लिए भावफल का महत्व अधिक है। वैसे इस नवीन ग्रह के अन्य प्रभावों का आकलन अभी चल ही रहा है। भविष्य में इस प्रभावों के बारे में और जानकारी मिलने की आशा है।
सूर्य की एक प्रदक्षिणा करने में इस ग्रह को 84 वर्ष लगते हैं अर्थात यह ग्रह एक राशि में 7 वर्ष तक रहता है। यह ग्रह शनि से अत्यंत बलिष्ठ और तमोगुणी है। आकस्मिक घटना तथा रोगोत्पादक, विलक्षण प्रकृति का संयोग देने वाला और स्थान परिवर्तन कराने वाला ग्रह है। मोटर, रेलवे, तार, बिजली, टेलीफोन, यंत्रों का शोध, प्रयोगशाला, इन्फ्लूएंजा व तलाक का यह कारक ग्रह है। इस ग्रह की राशि कुंभ है। इसका आशय यह नहीं कि शनि कुंभ का स्वामी नहीं है। जैसे वृष व तुला राशि का स्वामी ग्रह शुक्र है और राहु को भी वृष का स्वामी माना जाता है। इसी प्रकार कुंभ राशि में हर्षल ग्रह रहता है तो उसे स्वगृही माना जाता है। यह दाम्पत्य का भी कारक ग्रह है। जिस पुरुष की कुण्डली में चंद्रमा हर्षल से युक्त होता है और स्त्री की कुण्डली में सूर्य ग्रह हर्षल से युक्त होता है, ऐसे पुरुष या स्त्री को दाम्पत्य सुख नहीं मिलता है। इसके अतिरिक्त पांचवें या सातवें स्थान में हर्षल होता है तो चित्तवृत्ति को चंचल बनाता है।
हर्षल ग्रह मिथुन, तुला व कुंभ राशि में अत्यंत बलवान समझा जाता है तथा मेष व वृष राशि में यह अत्यंत घातक फल देता है। ये भीड़ से हटकर कभी अपनी असहमति जताते हैए तो कभी असामाजिक तत्वों का सहयोग पाकर सामाजिक परंपरा व बंधनों का कड़ा विरोध करते है। ये स्वतंत्रता तथा स्वाधीनता के समर्थक तथा सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति पाने के इच्छुक होते है। समाज की सड़ी गली पुरानी मान्यताएं इन्हें तनिक नहीं सुहाती। क्रांतिकारी सुधार व परिवर्तन तथा सामाजिक बंधन से मुक्ति पाकरए अपनी मन पसंद की जीवन शैली अपनाने की प्रवृति देता है। सड़ी गली सामाजिक मान्यताए परंपरा व आस्थाओं को ध्वस्त कर जीवन व भाग्य की डोर अपने हाथ में लेने की इच्छा देता है।
संसार के प्रजापति हर्शल से प्रभावित महान विभूतियां है आगस्टाइनए अब्राहम लिंकनएबेकनए इलियटए जॉर्ज वांशिगटनए जनरल फ्रेंकोए हक्सलेए महात्मा गांधीए लाल बहादुर शास्त्री आर डी वर्मन प्रिंस चार्ल्स आदि हैं। इन महान विभूतियों के उत्थानण्पतन पर प्रजापति का प्रभाव रहा था। प्रजापति जगत का संचालक व पोषक है।
अरुण ययूरेनस स्वतन्त्रता का पक्षधर विद्वानों ने अरुण को अहंतावादीए परम्परा विरोधी तथा सामाजिक बंधन से मुक्ति पाकर अपने मनपसन्द की जीवन शैली अपनाने वाला ग्रह माना है। अरुण ग्रह घिसी पिटी मान्यता व आस्थाओं को ध्वस्त करए जीवन तथा भाग्य की डोर अपने हाथ में लेने की प्रेरणा देता है। जलतत्व राशि यकर्कए वृश्चिकए मीनद्ध में जलतत्व ग्रह चंद्रमा या शुक्र के साथ अरुण की युति जातक को दुष्टए दुराग्रही व अपनी मनमानी करने वाला बनाती है। 10ण्2 विकास व परिवर्तन रू अरुण विकास तथा क्रान्तिकारी परिवर्तन का कारक है।
अग्नितत्व राशि का अरुण दशमस्थ होने पर जातक साहसीए निडरए दृढ़ निश्चयीए महत्वाकांक्षी तथा क्रांतिकारी कार्य करने वाला होता है। वस्तुतः ऐसा जातक परम्परा व नियमों को तोड़कर तीव्र गति से विकास करने के लिए बड़ी योजनाएँ आरम्भ करता है। विद्वान पाठक श्री जवाहर लाल नेहरू तथा अन्य नेताओं की कुंडली में तीनों ग्रह यूरेनसए नेपच्यूनए प्लूटो का अवलोकन करेंए अदभुत व रोचक परिणाम मिलेंगे।
शनि के बाद सौरमंडल का यह ग्रह सदस्य है। यद्यपि बृहस्पति व शनि से आकार की दृष्टि में यह बहुत छोटा है। परन्तु पृथ्वी आदि ग्रहों से काफी बड़ा है। 1781 सन् में विलियम हर्शल ने इस ग्रह की खोज की थी अतः यूरेनस को हर्शल भी कहा जाता है। यह हरे रंग का दिखाई देने वाला ग्रह पृथ्वी से करीब 15 गुना बड़ा है। यह भी एक ठंडा ग्रह है। इसका तापमान.210 सेल्सियस तक हो जाता है। इस ग्रह का अधिकतम भाग मीथेन गैस से निर्मित है।
उत्कृष्ट विचारक : वायु तत्व राशि का अरुण पंचम या नवम भाव से सम्बन्ध करने पर, जातक की कल्पना, विचार शक्ति एवम् दूरदृष्टि को पुष्ट करता है। ऐसा जातक समाज-सुधार व जनकल्याण के लिए सत्तापक्ष का विरोध करता है। कभी तो वह देशद्रोही या समाज विरोधी जान पड़ता है किन्तु दीन-दुखियों को न्याय दिलाने के लिए वह संघर्षरत होता है। नवम भाव, नवमेश अथवा गुरु से अरुण का दृष्टि युति सम्बन्ध, जातक को सत्य व न्याय का पक्षधर तथा परोपकारी बनाता है। निश्चय ही ऐसा जातक पूजास्थल में व्याप्त अनाचार व अव्यवस्था का खुल कर विरोध करने से कभी नास्तिक मान लिया जाता है।
संयम व अनुशासन का अभाव : सामान्यतः अरुण के कारण जातक में संयम व अनुशासन की कमी होती है। वह अधीर मन, उतावला तथा तेज गति से काम करने का इच्छुक होता है। पंचम भाव (बुद्धिस्थान) से अरुण का सम्बन्ध जुआ, सट्टा या लाटरी द्वारा शीघ्र धन कमाने की इच्छा देता है। कभी अष्टमस्थ अरुण, दुर्घटना, हानि व अचानक मृत्यु का कारण बनता है।
व्यवस्था विरोधी क्रांतिकारी : कुछ विद्वानों ने अरुण को राहु सरीखा अप्रत्याशित ढंग से काम करने वाला तथा मंगल सरीखा हिंसा, उत्पात व उपद्रव प्रिय माना है। सत्य तो ये है अरुण कदाचित् हिंसा व संघर्ष प्रेमी है, रक्त बहाने में इसे सुख मिलता है। चतुर्थ भाव, चतुर्थेश तथा मंगल या शनि से युक्त या दृष्ट अरुण, जातक को क्षुब्ध मन या व्यग्र बनाता है। वह भय व आतंक फैलाने में रुचि लेता है।
यूरेनियम तथा विस्फोटक पदार्थ : विद्वानों ने अरुण (यूरेनस) को परमाणु अस्त्र बनाने में उपयोगी यूरेनियम का कारक माना है। मतान्तर से मंगल के नियंत्रण में आने वाले विस्फोटक पदार्थ व अग्निशस्त्र अधिक परिष्कृत व कारक बनने पर अरुण के कारकत्व में आते हैं। 75 या अधिक गोलियाँ एक साथ चलाने में सक्षम ऑटोमैटिक बन्दूक अथवा मशीनगन तथा अधिक शक्तिशाली व मारक प्रभाव से युक्त, विस्फोटक पदार्थ अरुण के नियंत्रण में आते हैं।
अलगाववादी प्रवृत्ति : मूलतः अरुण परिवर्तन, प्रगति तथा स्वतंत्रता प्रेमी है। अरुण प्रधान व्यक्ति पूरी ईमानदारी के साथ समाज कल्याण उसे हिंसक व आतंकवादी बना देता है । मानसिक संतुलन खोने पर वह समाज का इच्छुक होता है किन्तु स्वार्थी व सत्तालोभी व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न गतिरोध, विरोधी कार्यों में लिप्त हो जाता है तो कभी, मुख्यधारा से हटकर अपनी अलग पहचान बनाने का इच्छुक, अलगाववादी होता है।
संघर्ष तथा विवाद प्रिय : विद्वानों का मत है कि अरुण ग्रह में शनि तथा मंगल के गुण पाए जाते हैं। वह विवाद तथा मतभेदों को बढ़ाने में रुचि लेता है। कभी कभी तो मामूली से विवाद भी दंगा, रक्तपात, आगजनी व जातीय संघर्ष तथा व्यापक हिंसा का भयावह रूप ले लेते हैं।
इलैक्ट्रॉनिक उत्पाद : सभी प्रकार के रिमोट कन्ट्रोल, उपग्रह संचार व्यवस्था, मोबाईल फोन,
कम्प्यूटर इन्टरनेट तथा लेजर रश्मि पुंज का सम्बन्ध अरुण से है। दशम भाव या दशमेश से अरुण का सम्बन्ध कुछ नया व अनोखा काम करने की इच्छा देता है।
अत्याधुनिक चिकित्सा प्रणाली : चिकित्सा विधि विकसित करने में अरुण का महत्वपूर्ण योगदान है। सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, रोबोशल्य क्रिया, रेडिएशन, डायथरमी व लेजर चिकित्सा का कारक अरुण होता है।
एक ठंडा ग्रह : विद्वानों ने अरुण को शनि व राहु सरीखा ठंडा ग्रह माना है। कभी पाप पीड़ित होने पर अरुण, जातक में घृणा, द्वेष व प्रतिशोध का भाव पुष्ट कर उसे थोड़ा सनकी तथा विद्रोही बनाता है।
संचार व्यवस्था : उपग्रह संचार प्रणाली, रेडियो, दूरदर्शन, कंप्यूटर, ईमेल, विमान सेवा, पथ परिवहन सेवा, रेल तथा सड़क की यातायात व्यवस्था का सम्बन्ध अरुण ग्रह से माना गया है। कभी तृतीय भाव तथा तृतीयेश हीन बली होकर यदि अरुण से सम्बन्ध करे तो जातक संचार माध्यमों से अवरोध पैदा करने में रुचि लेता है। रेल या बस सेवा अस्त-व्यस्त करना, तोड़-फोड़ करना उसे प्रसन्नता देता है।
गतिरोध या अव्यवस्था : विद्वानों का मत है कि अरुण के शुभत्व को आत्मसात करना सहज नहीं होता। बहुधा अरुण की शक्ति व क्षमता दिशाहीन होकर क्रान्ति, विद्रोह, अव्यवस्था व अराजकता का रूप धारण कर तबाही मचाने वाली घटनाएँ घटती हैं। अरुण के साथ षष्ठेश अष्टमेश का सम्बन्ध गतिरोध तथा अव्यवस्था में रुचि देता है।
देह का चुम्बकीय क्षेत्र : आधुनिक खोजकर्ताओं ने अरुण को मानव देह में व्याप्त चुम्बकीय क्षेत्र का नियंत्रक माना है। मानव शरीर में इलैक्ट्रोस्टैटिक चार्ज का कारक भी अरुण है। अरुण का शुभ प्रभाव जात को बुद्धिमान, कल्पनाशील, भविष्यदृष्टा तथा अन्तर्प्रज्ञा का धनी बनाता है। वह नई खोज कर धन व यश पाता है। इसके विपरीत अरुण पर पाप प्रमा जातक को हठी, क्रोधी, निष्ठुर, आततायी व हिंसाप्रिय बनाता है। अनुशासन भंग कर अराजकता को बढ़ावा देना उसे अच्छा लगता है।
जन संगठन : विद्वानों ने विभिन्न संगठन, नगर निगम बोर्ड कम्पनी आदि का कारक अरुण ग्रह को माना है। जन प्रतिनिधि सभाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार अरुण को असह्य जान पड़ता है। वह भ्रष्टाचार तथा भ्रष्ट अधिकारियों के विरोध में मानों युद्ध का बिगुल बजा देता है।
सफाई व शोधन : अरुण ग्रह का सम्बन्ध साफ-सफाई तथा शुद्धिकरण से है। वायु तथा पानी की सफाई के लिए छलनी या फिल्टर का उपयोग, जल शोधन प्लांट, मिनरल वाटर, शल्य चिकित्सा के उपकरणों की भाप द्वारा शुद्धि के कार्य अरुण के नियंत्रण में आते हैं।
अरुण (यूरेनस) की उच्च व नीच राशिया : विद्वानों ने अरुण की उच्च नीच राशियाँ निम्न प्रकार निश्चित की हैं। उच्च राशि : वृश्चिक मूलत्रिकोण : कुभ मित्र राशि मिथुन, तुला, कुंभ (वायु तत्व राशिया) सूर्य, बुध, गुरु, राहु, यम शत्रु ग्रह : चंद्रमा, शनि सम ग्रह : शुक्र, वरुण स्वराशि : कुंभ नीच राशि : वृष मित्र ग्रहः सरीखा
अरुण ग्रह का सम्पूर्ण विवेचन भावगत और राशिगत फल
हम नौ ग्रहों को तो जानते हैं परन्तु अब दो और ग्रहों का भी पता चल गया है। इनकी कक्षा के बारे में जानकारी प्राप्त हो रही है। आधुनिक ज्योतिष ग्रंथों में इन दोनों ग्रहों का नामकरण हर्षल और नेपच्यून किया गया है। इनका भी प्रभाव मानव के क्रिया-कलापों पर पड़ता है।
इंटेलिजेंस का प्रतीक यूरेनस 1781 ईस्वी में यूरेनस ग्रह की खोज हुई थी। भारतीय ज्योतिष में यूरेनस को ‘हर्षल‘ या ‘प्रजापति‘ भी कहा जाता है। ज्योतिष के अनुसार, यूरेनस और इसकी ऊर्जा काफी शक्तिशाली है। यह बुद्धि का प्रतीक है। इसलिए, यह अनुसंधान, तकनीकी प्रगति, सफलता और समग्र विकास के क्षेत्रों में बहुत योगदान देता है। पुरुषीय गृह है किन्तु वृद्ध, कोमल धुनि और योगिक बुद्धि वाला है
मौलिकता और विशिष्टता का पक्षधर यूरेनस आकाश और स्वर्ग का देवता है। यह कुंभ राशि का स्वामी भी है। यूरेनस आगे बढ़ने और आगे दिखने का प्रतीक है। इसमें परंपरा भी शामिल है और मौलिकता और व्यक्तित्व की पक्षधर है। यूरेनस प्रगतिशीलता से जुड़ा हुआ है। यह ज्ञान, निष्पक्षता, नवीनता और सरलता को भी व्यक्त करता है। यूरेनस की नकारात्मक अभिव्यक्ति व्यवस्था और गैर जिम्मेदाराना नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल देती है।
अरुण क्रांतिकारी सुधार व परिवर्तन तथा सामाजिक बंधन से मुक्ति पाकर अपनी मनपसन्द की जीवन शैली अपनाने की प्रवृत्ति देता है। सड़ी-गली सामाजिक मान्यता, परंपरा व आस्थाओं को ध्वस्त कर, जीवन व भाग्य की डोर अपने हाथों में लेने की प्रेरणा देता है। सामाजिक प्रतिबंधों को नकार कर उन्मुक्त जीवन शैली अपनाने के लिए कभी ऐसा जातक, असामाजिक तत्वों का सहयोग पाकर, अपना कड़ा विरोध जताता है। वह सामाजिक व्यवस्था को नष्ट करने में सुख का अनुभव करता है। विद्वानों ने इसे राहु सरीखा विस्फोटक तथा मंगल सरीखा क्रांतिकारी माना है। इसका दिन शनिवार माना गया है जातक के मस्तिष्क व स्नायुतन्त्र पर यह प्रभाव डालता है। दार्शनिकताए आध्यात्मिकता तथा गहन चिन्तन का स्वभाव जातक को पाश्चात्य ज्योतिषियों के अनुसार इसी ग्रह से मिलता है अचानक दुर्भाग्य या सौभाग्य का कारक भी यूरेनस को माना गया है। मौलिक चिन्तन एवं विषय की खोज की प्रवृत्ति का कारक भी यही है। क्रांति या बड़े परिवर्तन का प्रतीक यूरेनस की प्रकृति पुरानी मान्यताओं और कठोर विचारों को तोड़ते हुए नई संरचनाओं का पुनर्निर्माण करना है। इसे एक अत्यंत क्रांतिकारी ग्रह माना जाता है। यूरेनस लोकतंत्र और स्वतंत्र दिमाग में विश्वास करता है। यह अत्याचार सहन नहीं करता। यूरेनस किसी के नियंत्रण या दबाव में कुछ भी नहीं कर सकता है। यूरेनस अंतरिक्ष अनुसंधान, परमाणु अनुसंधान, पुरातत्व के क्षेत्र से भी संबंधित है।
जब से यूरेनस की खोज हुई है तभी से पाश्चात्य एवं भारतीय ज्योतिषीगण इस नवीन ग्रह के मानव पर पड़ने वाले प्रभाव को जानने की कोशिश करते रहे हैं। पाश्चात्य ज्योतिषियों ने इसका नाम यूरेनस तथा भारतीय ज्योतिषियों ने प्रजापति रखा है। जिस तरह गुरु की कक्षा के आगे शनि की कक्षा होने के कारण शनि को गुरु का पिता माना गया है। उसी तरह यूरेनस की कक्षा शनि के ऊपर होने के कारण यूरेनस को शनि का पिता और गुरु का पितामह और सब देवों में वृद्ध माना गया है। जब यूरेनस की खोज हुई तो इसे मिथुन राशि में देखा गया।
यूरेनस का एक दिन पृथ्वी के 16 घंटे 10 मिनट का है। किन्तु एक वर्ष पृथ्वी के 84ण्01 वर्ष के बराबर है। यूरेनस के वायुमंडल की प्रमुख गैसें मीथेनए हीलियम व हाइड्रोजन हैं। इसका व्यास 50ए800 किण्मीण् तथा तापमान.210 सेल्सियस है। सूर्य से लगभग 19ण्1894 तथा पृथ्वी से प्रायः 17ण्2894 निकटतम दूरी है। इसका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 1ण्17 गुना एवं द्रव्यमान पृथ्वी की अपेक्षा 14ण्6 गुना है। यूरेनस के पांच चन्द्रमा ;उपग्रह हैंद्ध.मिरांडाए एरियलए अम्ब्रायलए टिटेनिया तथा ओबेरान । यूरेनस के 9 वलय या छल्ले भी हैंए जो काफी धुंधले हैं। ये सभी छल्ले 64000 किण्मीण् की सीमा में हैं। इन्हें 1977 में खोजा गया था। मीलों में यूरेनस सूर्य से प्रायः 1ए783ए000ए000 मील दूर है तथा इसका डायामीटर 32ए200 मील है। बाद में यूरेनस के और चन्द्र भी खोजे गए और अब इनकी संख्या 15 तक हो चुकी है।
6 कन्याए 3मिथुन व 11कुम्भ राशियों में यूरेनस को शुभ फल देने वाला माना गया है। शुभ स्थिति में यह जातक को बौद्धिक कार्योंए गूढ़ खोजोंए आविष्कारोंए विद्युत विशेषज्ञताए सार्वजनिक भवन निर्माण के कार्यों तथा लॉटरी.सट्टे आदि में सफलता दिलाता है। अशुभ होने पर यह जातक को जन्म से ही दुख भोगने को विवश कर देता है। पिता से अलगावए जीवनसाथी से तलाक अथवा वियोग आदि दुष्परिणाम देने वाला होता है। जन्म समय में यूरेनस वक्री हो तो जातक कठिन.से.कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता। बुद्धि व कल्पना शक्ति प्रखर तथा सकारात्मकता एवं आशा बढ़ी हुई रहती है। वृष राशि में यह ग्रह नीच का हो जाता है। उदर रोगए हैजाए बुखारए हृदय रोग का भी कारक यही है। बिजली के उपकरणए विद्युत सामग्रीए विद्युत उत्पादन तथा शेयर बाजार में तेजी.मंदी अचानक आने का सम्बन्ध भी यूरेनस से जोड़ा जाता है। सत्य की खोज तथा आविष्कारी प्रवृत्ति के गुण भी यही देता है।
ज्योतिषियों का मानना है कि मनुष्य की कुंडली में जो असाधारणता देखने को मिलती है वह इसी ग्रह के कारण है। तत्व ज्ञानी लोगों की कुडली देखें तो उसमें इस यूरेनस की प्रबलता अधिक मिलेगी। वर्तमान समय में भी जो अध्यात्म और विज्ञान की प्रगति चल रही है वह इसी ग्रह के कारण है। फलित ज्योतिषशास्त्रियों का मानना है कि यूरेनस कुंभ राशि में स्वगृही और वृश्चिक राशि में उच्च का होता है। यह मिथुन, तुला तथा कुंभ इन वायु राशियों में विशेष बलवान दिखाई देता है।
यह कुंडली के भाव 1,3,5,7,9 या 10 में विशेष फलदायी होता है। लग्न की अपेक्षा दशम स्थान में अति अनिष्ट फल उत्पन्न करता है, परंतु इन स्थानों में यदि मिथुन, तुला या कंुभ राशि हो और शुभ दृष्ट हो तो यह अपनी अशुभता खोकर शुभ फल प्रदान करता है। यदि यह अग्निकारक राशि मेष, सिंह या धनु में हो तो जातक को हठी, कुशाग्र बुद्धि, अति महत्वाकांक्षी और हिम्मती बना देता है। ऐसे जातकों को अपघात आदि आकस्मिक संकटों का भय अधिक होता है।
यदि यूरेनस शास्त्रीय राशि मिथुन, तुला या कुंभ मे हो तो जातक को अनेक शाश्त्रो के प्रति विशेष प्रीति रखने वाला बना देता है। यदि जल राशि में हो तो जातक कामी, दुराचारी और दुष्ट स्वभाव का होता है। किंतु यदि यह किसी पृथ्वी तत्व राशि में हो तो जातक हंसमुख, हंसी-मजाक करने वाला, दूसरों को प्रसन्न करने वाला, मुंहफट, विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थों का शौकीन, हठी शीघ्र नाराज होने वाला, चुगली करने वाला और कामी होता है। ऐसा जातक स्त्रियों का प्रिय होता है। यूरेनस के भाव फल राशि फलों की अपेक्षा अधिक होते हैं, क्योंकि यह एक राशि में लगभग 7 वर्ष रहता है। इसलिए कुंडली में राशि की अपेक्षा भाव में इसकी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण होती है। 7 वर्ष तक जन्मे सभी जातकों के लिए राशि फल एक सा होगा, इसी लिए भावफल का महत्व अधिक है। वैसे इस नवीन ग्रह के अन्य प्रभावों का आकलन अभी चल ही रहा है। भविष्य में इस प्रभावों के बारे में और जानकारी मिलने की आशा है।
सूर्य की एक प्रदक्षिणा करने में इस ग्रह को 84 वर्ष लगते हैं अर्थात यह ग्रह एक राशि में 7 वर्ष तक रहता है। यह ग्रह शनि से अत्यंत बलिष्ठ और तमोगुणी है। आकस्मिक घटना तथा रोगोत्पादक, विलक्षण प्रकृति का संयोग देने वाला और स्थान परिवर्तन कराने वाला ग्रह है। मोटर, रेलवे, तार, बिजली, टेलीफोन, यंत्रों का शोध, प्रयोगशाला, इन्फ्लूएंजा व तलाक का यह कारक ग्रह है। इस ग्रह की राशि कुंभ है। इसका आशय यह नहीं कि शनि कुंभ का स्वामी नहीं है। जैसे वृष व तुला राशि का स्वामी ग्रह शुक्र है और राहु को भी वृष का स्वामी माना जाता है। इसी प्रकार कुंभ राशि में हर्षल ग्रह रहता है तो उसे स्वगृही माना जाता है। यह दाम्पत्य का भी कारक ग्रह है। जिस पुरुष की कुण्डली में चंद्रमा हर्षल से युक्त होता है और स्त्री की कुण्डली में सूर्य ग्रह हर्षल से युक्त होता है, ऐसे पुरुष या स्त्री को दाम्पत्य सुख नहीं मिलता है। इसके अतिरिक्त पांचवें या सातवें स्थान में हर्षल होता है तो चित्तवृत्ति को चंचल बनाता है।
हर्षल ग्रह मिथुन, तुला व कुंभ राशि में अत्यंत बलवान समझा जाता है तथा मेष व वृष राशि में यह अत्यंत घातक फल देता है। ये भीड़ से हटकर कभी अपनी असहमति जताते हैए तो कभी असामाजिक तत्वों का सहयोग पाकर सामाजिक परंपरा व बंधनों का कड़ा विरोध करते है। ये स्वतंत्रता तथा स्वाधीनता के समर्थक तथा सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति पाने के इच्छुक होते है। समाज की सड़ी गली पुरानी मान्यताएं इन्हें तनिक नहीं सुहाती। क्रांतिकारी सुधार व परिवर्तन तथा सामाजिक बंधन से मुक्ति पाकरए अपनी मन पसंद की जीवन शैली अपनाने की प्रवृति देता है। सड़ी गली सामाजिक मान्यताए परंपरा व आस्थाओं को ध्वस्त कर जीवन व भाग्य की डोर अपने हाथ में लेने की इच्छा देता है।
संसार के प्रजापति हर्शल से प्रभावित महान विभूतियां है आगस्टाइनए अब्राहम लिंकनएबेकनए इलियटए जॉर्ज वांशिगटनए जनरल फ्रेंकोए हक्सलेए महात्मा गांधीए लाल बहादुर शास्त्री आर डी वर्मन प्रिंस चार्ल्स आदि हैं। इन महान विभूतियों के उत्थानण्पतन पर प्रजापति का प्रभाव रहा था। प्रजापति जगत का संचालक व पोषक है।
अरुण ययूरेनस स्वतन्त्रता का पक्षधर विद्वानों ने अरुण को अहंतावादीए परम्परा विरोधी तथा सामाजिक बंधन से मुक्ति पाकर अपने मनपसन्द की जीवन शैली अपनाने वाला ग्रह माना है। अरुण ग्रह घिसी पिटी मान्यता व आस्थाओं को ध्वस्त करए जीवन तथा भाग्य की डोर अपने हाथ में लेने की प्रेरणा देता है। जलतत्व राशि यकर्कए वृश्चिकए मीनद्ध में जलतत्व ग्रह चंद्रमा या शुक्र के साथ अरुण की युति जातक को दुष्टए दुराग्रही व अपनी मनमानी करने वाला बनाती है। 10ण्2 विकास व परिवर्तन रू अरुण विकास तथा क्रान्तिकारी परिवर्तन का कारक है।
अग्नितत्व राशि का अरुण दशमस्थ होने पर जातक साहसीए निडरए दृढ़ निश्चयीए महत्वाकांक्षी तथा क्रांतिकारी कार्य करने वाला होता है। वस्तुतः ऐसा जातक परम्परा व नियमों को तोड़कर तीव्र गति से विकास करने के लिए बड़ी योजनाएँ आरम्भ करता है। विद्वान पाठक श्री जवाहर लाल नेहरू तथा अन्य नेताओं की कुंडली में तीनों ग्रह यूरेनसए नेपच्यूनए प्लूटो का अवलोकन करेंए अदभुत व रोचक परिणाम मिलेंगे।
शनि के बाद सौरमंडल का यह ग्रह सदस्य है। यद्यपि बृहस्पति व शनि से आकार की दृष्टि में यह बहुत छोटा है। परन्तु पृथ्वी आदि ग्रहों से काफी बड़ा है। 1781 सन् में विलियम हर्शल ने इस ग्रह की खोज की थी अतः यूरेनस को हर्शल भी कहा जाता है। यह हरे रंग का दिखाई देने वाला ग्रह पृथ्वी से करीब 15 गुना बड़ा है। यह भी एक ठंडा ग्रह है। इसका तापमान.210 सेल्सियस तक हो जाता है। इस ग्रह का अधिकतम भाग मीथेन गैस से निर्मित है।
उत्कृष्ट विचारक : वायु तत्व राशि का अरुण पंचम या नवम भाव से सम्बन्ध करने पर, जातक की कल्पना, विचार शक्ति एवम् दूरदृष्टि को पुष्ट करता है। ऐसा जातक समाज-सुधार व जनकल्याण के लिए सत्तापक्ष का विरोध करता है। कभी तो वह देशद्रोही या समाज विरोधी जान पड़ता है किन्तु दीन-दुखियों को न्याय दिलाने के लिए वह संघर्षरत होता है। नवम भाव, नवमेश अथवा गुरु से अरुण का दृष्टि युति सम्बन्ध, जातक को सत्य व न्याय का पक्षधर तथा परोपकारी बनाता है। निश्चय ही ऐसा जातक पूजास्थल में व्याप्त अनाचार व अव्यवस्था का खुल कर विरोध करने से कभी नास्तिक मान लिया जाता है।
संयम व अनुशासन का अभाव : सामान्यतः अरुण के कारण जातक में संयम व अनुशासन की कमी होती है। वह अधीर मन, उतावला तथा तेज गति से काम करने का इच्छुक होता है। पंचम भाव (बुद्धिस्थान) से अरुण का सम्बन्ध जुआ, सट्टा या लाटरी द्वारा शीघ्र धन कमाने की इच्छा देता है। कभी अष्टमस्थ अरुण, दुर्घटना, हानि व अचानक मृत्यु का कारण बनता है।
व्यवस्था विरोधी क्रांतिकारी : कुछ विद्वानों ने अरुण को राहु सरीखा अप्रत्याशित ढंग से काम करने वाला तथा मंगल सरीखा हिंसा, उत्पात व उपद्रव प्रिय माना है। सत्य तो ये है अरुण कदाचित् हिंसा व संघर्ष प्रेमी है, रक्त बहाने में इसे सुख मिलता है। चतुर्थ भाव, चतुर्थेश तथा मंगल या शनि से युक्त या दृष्ट अरुण, जातक को क्षुब्ध मन या व्यग्र बनाता है। वह भय व आतंक फैलाने में रुचि लेता है।
यूरेनियम तथा विस्फोटक पदार्थ : विद्वानों ने अरुण (यूरेनस) को परमाणु अस्त्र बनाने में उपयोगी यूरेनियम का कारक माना है। मतान्तर से मंगल के नियंत्रण में आने वाले विस्फोटक पदार्थ व अग्निशस्त्र अधिक परिष्कृत व कारक बनने पर अरुण के कारकत्व में आते हैं। 75 या अधिक गोलियाँ एक साथ चलाने में सक्षम ऑटोमैटिक बन्दूक अथवा मशीनगन तथा अधिक शक्तिशाली व मारक प्रभाव से युक्त, विस्फोटक पदार्थ अरुण के नियंत्रण में आते हैं।
अलगाववादी प्रवृत्ति : मूलतः अरुण परिवर्तन, प्रगति तथा स्वतंत्रता प्रेमी है। अरुण प्रधान व्यक्ति पूरी ईमानदारी के साथ समाज कल्याण उसे हिंसक व आतंकवादी बना देता है । मानसिक संतुलन खोने पर वह समाज का इच्छुक होता है किन्तु स्वार्थी व सत्तालोभी व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न गतिरोध, विरोधी कार्यों में लिप्त हो जाता है तो कभी, मुख्यधारा से हटकर अपनी अलग पहचान बनाने का इच्छुक, अलगाववादी होता है।
संघर्ष तथा विवाद प्रिय : विद्वानों का मत है कि अरुण ग्रह में शनि तथा मंगल के गुण पाए जाते हैं। वह विवाद तथा मतभेदों को बढ़ाने में रुचि लेता है। कभी कभी तो मामूली से विवाद भी दंगा, रक्तपात, आगजनी व जातीय संघर्ष तथा व्यापक हिंसा का भयावह रूप ले लेते हैं।
इलैक्ट्रॉनिक उत्पाद : सभी प्रकार के रिमोट कन्ट्रोल, उपग्रह संचार व्यवस्था, मोबाईल फोन,
कम्प्यूटर इन्टरनेट तथा लेजर रश्मि पुंज का सम्बन्ध अरुण से है। दशम भाव या दशमेश से अरुण का सम्बन्ध कुछ नया व अनोखा काम करने की इच्छा देता है।
अत्याधुनिक चिकित्सा प्रणाली : चिकित्सा विधि विकसित करने में अरुण का महत्वपूर्ण योगदान है। सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, रोबोशल्य क्रिया, रेडिएशन, डायथरमी व लेजर चिकित्सा का कारक अरुण होता है।
एक ठंडा ग्रह : विद्वानों ने अरुण को शनि व राहु सरीखा ठंडा ग्रह माना है। कभी पाप पीड़ित होने पर अरुण, जातक में घृणा, द्वेष व प्रतिशोध का भाव पुष्ट कर उसे थोड़ा सनकी तथा विद्रोही बनाता है।
संचार व्यवस्था : उपग्रह संचार प्रणाली, रेडियो, दूरदर्शन, कंप्यूटर, ईमेल, विमान सेवा, पथ परिवहन सेवा, रेल तथा सड़क की यातायात व्यवस्था का सम्बन्ध अरुण ग्रह से माना गया है। कभी तृतीय भाव तथा तृतीयेश हीन बली होकर यदि अरुण से सम्बन्ध करे तो जातक संचार माध्यमों से अवरोध पैदा करने में रुचि लेता है। रेल या बस सेवा अस्त-व्यस्त करना, तोड़-फोड़ करना उसे प्रसन्नता देता है।
गतिरोध या अव्यवस्था : विद्वानों का मत है कि अरुण के शुभत्व को आत्मसात करना सहज नहीं होता। बहुधा अरुण की शक्ति व क्षमता दिशाहीन होकर क्रान्ति, विद्रोह, अव्यवस्था व अराजकता का रूप धारण कर तबाही मचाने वाली घटनाएँ घटती हैं। अरुण के साथ षष्ठेश अष्टमेश का सम्बन्ध गतिरोध तथा अव्यवस्था में रुचि देता है।
देह का चुम्बकीय क्षेत्र : आधुनिक खोजकर्ताओं ने अरुण को मानव देह में व्याप्त चुम्बकीय क्षेत्र का नियंत्रक माना है। मानव शरीर में इलैक्ट्रोस्टैटिक चार्ज का कारक भी अरुण है। अरुण का शुभ प्रभाव जात को बुद्धिमान, कल्पनाशील, भविष्यदृष्टा तथा अन्तर्प्रज्ञा का धनी बनाता है। वह नई खोज कर धन व यश पाता है। इसके विपरीत अरुण पर पाप प्रमा जातक को हठी, क्रोधी, निष्ठुर, आततायी व हिंसाप्रिय बनाता है। अनुशासन भंग कर अराजकता को बढ़ावा देना उसे अच्छा लगता है।
जन संगठन : विद्वानों ने विभिन्न संगठन, नगर निगम बोर्ड कम्पनी आदि का कारक अरुण ग्रह को माना है। जन प्रतिनिधि सभाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार अरुण को असह्य जान पड़ता है। वह भ्रष्टाचार तथा भ्रष्ट अधिकारियों के विरोध में मानों युद्ध का बिगुल बजा देता है।
सफाई व शोधन : अरुण ग्रह का सम्बन्ध साफ-सफाई तथा शुद्धिकरण से है। वायु तथा पानी की सफाई के लिए छलनी या फिल्टर का उपयोग, जल शोधन प्लांट, मिनरल वाटर, शल्य चिकित्सा के उपकरणों की भाप द्वारा शुद्धि के कार्य अरुण के नियंत्रण में आते हैं।
अरुण (यूरेनस) की उच्च व नीच राशिया : विद्वानों ने अरुण की उच्च नीच राशियाँ निम्न प्रकार निश्चित की हैं। उच्च राशि : वृश्चिक मूलत्रिकोण : कुभ मित्र राशि मिथुन, तुला, कुंभ (वायु तत्व राशिया) सूर्य, बुध, गुरु, राहु, यम शत्रु ग्रह : चंद्रमा, शनि सम ग्रह : शुक्र, वरुण स्वराशि : कुंभ नीच राशि : वृष मित्र ग्रहः सरीखा
भाव विचार- यह ग्रह पांचवें, नौवें, दसवें व ग्यारहवें स्थान में शुभ फल देता है और अन्य स्थानों में अशुभ फल देता है। यदि लग्न में हर्षल हो तो मनुष्य विलक्षण स्वभाव का होता है परन्तु यदि मिथुन, तुला व कुंभ राशि का हो तो तीव्र बुद्धि और अन्वेषण करने वाला बनाता है। द्वितीय भाव में हो तो परिवार सुख के लिए प्रतिकूल और अशुभ राशि का हो तो द्रव्य हानि कराता है। तृतीय भाव में भ्रातृ सुख, बहुधा स्थानान्तरण और यांत्रिक वाहन से प्रवास का योग बनाता है। यदि हर्षल चतुर्थ भाव में होता है तो शत्रुओं की संख्या बढ़ाता है और जीवन के उत्तरार्द्ध में द्रव्य हानि और भूमि संबंधी कलह देता है। पंचम भाव में संतति प्रतिबंध अथवा संतति हानि या संतति सुख का अभाव देता है। षष्ठम भाव में मातुल (मामा) के सुख का अभाव व रोग वृद्धि देता है। सप्तम भाव में वैवाहिक, दाम्पत्य सुख का नाश और बाहरी लोगों से संबंध बनाता है। अष्टम में आकस्मिक मृत्यु। नवम भाव में धार्मिक संस्था से संबंध। ग्यारहवें भाव में संस्थाओं से अच्छा संबंध बनाता है। बारहवें भाव में द्रव्य हानि, ऋण योग और शत्रुओं से कष्ट प्राप्त कराता है।
पाश्चात्य ज्योतिष में प्रजापति को जाग्रति द्योतक और प्रेरणा शक्ति का अनुपम गृह माना गया है भारतीय ज्योतिष में इसे प्रजापति, ब्रम्हा, वारुनी, वरुण इंद्रा आदि अनेक नाम दिए है इसकी स्व राशि कुम्भ उच्च राशि वृश्चिक तथा नीच राशि वृष है यहाँ वायु तत्वीय राशियों जैसे मिथुन तुला व् कुम्भ पर बलवान माना गया है शनि व् चंद्र से इसकी शत्रुता है किन्तु बुध गुरु सूर्य शुक्र मित्र ृह है यह विकास और प्रगति का प्रतीक गृह है यहाँ अत्यधिक प्रगतिशील गृह है और मस्तिष्क व् नाड़ी मंडल पर प्रभाव डालता है
इस गृह स्वच्छंदता चरित्र बल असाधारण बुद्धि और संघर्ष शक्ति का आभास होता हैिकता विषमता आकस्मिक उठान और पतन का कारक है यह शोध का कारक है, विधुत लोकव्यवहार, सिनेमा हड़ताल क्रन्तिकारी विचारो के नियंत्रण, इंजीनियरिंग मैकेनिकल रिसर्च ज्योतिष तंमंत्र यन्त्र और गूढ़ विद्या अध्यरंगत और विलक्षण ज्ञान का द्योतक है
यह 1,5,6,8,10,11...भावो में उत्तम फल देता है, हर्षल की मेष सिंह धनु पर अनुकम्पा होती है यह व्यक्ति को कांशी साहसी और धीर घंभीर स्वाभाव का बनता है कर्क वृश्चिक मीन में अनिष्ट फल देकर भी दुस्ट प्रकृति का बनाता है
हर्षल के प्रभाव से ही भूकंप तूफान भूचाल आदि आपदाये आती है जाहजों का डूबना बेम विस्फोट रेडियो वायुयान टेलीविज़न कंप्यूटर IT बिजली रेलवेज पर हर्षल का स्पस्ट प्रभाव होता है इसके गुण शनि की भाति है चंद्र हर्षल से जो योग बनते है उन्हें अचानक मृत्यु की दुर्घटना कहा जाता है हर्षल सूर्य के सम्बन्ध पंचम सप्तम योग से प्रेका योग बनता है अंक ज्योतिष में इसको 4 अंक मिला है अप्रैल महीने एवं चर्तुर्थी तिथि को हर्षल का ही प्रभाव होता है यहाँ संघर्ष प्रधान जीवन का दाता है इससे प्रभावित जातको कय बोहोत कोमल और मृदु होता है और जीवन में आकस्मिकता का प्रभाव हर्षल ही देता इससे प्रभावित जातक बहुशात्रुवादी किन्तु ु परास्त करता होतके उल्हंगन करता और कानुन और नियमोंके जानने वाले होते है ऐसे जातक स्वार्थी होते है और अर्थ संग्रह करनेवाले होते है हर्षल गृह पितृ और मातृ सुख में कमीर पुत्र सुख रहित होते है यह रत्न नीलम लैपिज़ लाजुली खाकी फ़िरोज़ा श्रेष्ठ रहता है हर्षल प्रभावित व्यक्तियों के लिए गणेश चतुर्थी और सोमवार का व्रत श्रेष्ठ
यूरेनस और ज्योतिष:
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अरुण (हर्शल/यूरेनस) का भाव फल
भाव विचार- यह ग्रह पांचवें, नौवें, दसवें व ग्यारहवें स्थान में शुभ फल देता है और अन्य स्थानों में अशुभ फल देता है। यदि लग्न में हर्षल हो तो मनुष्य विलक्षण स्वभाव का होता है परन्तु यदि मिथुन, तुला व कुंभ राशि का हो तो तीव्र बुद्धि और अन्वेषण करने वाला बनाता है। द्वितीय भाव में हो तो परिवार सुख के लिए प्रतिकूल और अशुभ राशि का हो तो द्रव्य हानि कराता है। तृतीय भाव में भ्रातृ सुख, बहुधा स्थानान्तरण और यांत्रिक वाहन से प्रवास का योग बनाता है। यदि हर्षल चतुर्थ भाव में होता है तो शत्रुओं की संख्या बढ़ाता है और जीवन के उत्तरार्द्ध में द्रव्य हानि और भूमि संबंधी कलह देता है। पंचम भाव में संतति प्रतिबंध अथवा संतति हानि या संतति सुख का अभाव देता है। षष्ठम भाव में मातुल (मामा) के सुख का अभाव व रोग वृद्धि देता है। सप्तम भाव में वैवाहिक, दाम्पत्य सुख का नाश और बाहरी लोगों से संबंध बनाता है। अष्टम में आकस्मिक मृत्यु। नवम भाव में धार्मिक संस्था से संबंध। ग्यारहवें भाव में संस्थाओं से अच्छा संबंध बनाता है। बारहवें भाव में द्रव्य हानि, ऋण योग और शत्रुओं से कष्ट प्राप्त कराता है।
प्रथम स्थान (लग्न भाव)
दैवज्ञ विद्याओं का ज्ञाता, दर्शन, धर्म, अध्यात्म में रुचि, स्वतंत्रता का उपासक, एकांत प्रेमी, लंबा कद, वैवाहिक जीवन में कटुता, तीर्थ यात्राओं, पहाड़, समुद्र की यात्राओं का प्रेमी।लग्न में अरुण की स्थिति से जातक सनकी, उधेडबुन में लगे रहने वाला, उद्विग्न मन, नये प्रयगो मे रुचि लेने वाला, कुछ ज़िद्दि, हठि होता है, उसमे अंतर प्रग्या व बुद्धि विशेश मात्रा मे होति है, बोहोत शिश्ट और मैत्रि पूर्न व्यवहार करता है पाश्चात्य ज्योतिषी हर्षल ग्रह से काफी प्रभावित हैं। वर्तमान समय के महत्त्वपूर्ण संशोधनों एवं आध्यात्मिक प्रवाह का कारण हर्षल ही है।' यह उनकी धारणा है। हर्षल के फलित विषय में अनेक ग्रंथ अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित अंग्रेजी ग्रंथों के अनुसार हर्षल का फलित असाधारण एवं विलक्षण है। इस ग्रह की स्थिति शनि ग्रह जैसी होने से जिस राशि में शनि बलवान हो, उसी राशि का हर्षल बलवान माना जाता है। इस आधार पर कुंभ राशि को स्वराशि का स्वक्षेत्र एवं मीन राशि में वह उच्च का माना गया है। इसके अतिरिक्त तुला एवं मिथुन राशि में भी हर्षल के फलित शनि जैसे ही प्राप्त होते हैं। लग्न से 1, 3, 5, 7, 9, 10 स्थानों में हर्षल का प्रभाव विशेषरूप से अनुभव में आता है। जन्मकुंडली में जिस भाव में यह ग्रह हो उस भाव के फलित में यह ग्रह विलक्षणता दिखाता है। उदाहरणार्थ षष्ठ स्थान रोग का स्थान है। यहां हर्षल होने से जातक विलक्षण रोगी होता है। उसके रोग का कोई निदान नहीं होता। अष्टम स्थान मृत्यु का स्थान है। इस स्थान में हर्षल हो तो जातक की मृत्यु आकस्मिक रूप से होती है। धन स्थान-परिवार स्थान द्वितीय स्थान में हर्षल हो तो जातक की आर्थिक स्थिति एवं पारिवारिक जीवन सुचारू नहीं होता। इसी तरह दशम स्थान-राज्यभाव आजीविका भाव में हर्षल हो तो जातक आकस्मिक रूप से उच्च पद पर आसीन होता है या जातक बारबार अपनी नौकरी-व्यवसाय बदलता है। बारहवें स्थान यानी व्यय स्थान में हर्षल हो तो जातक के व्यवसाय का अचानक दिवाला पीट जाता है। भय, आकस्मिक आर्थिक नुकसान आदि फल भी उसे प्राप्त होते हैं। मेष या वृश्चिक राशि का हर्षल विशेष रूप से अशुभ फल प्रदान करता है। जन्मलग्न में 5, 8, 10, 11 स्थानों में हर्षल शुभ फलदायी होता है, तीव्र, बुद्धिमत्ता, उच्च शिक्षा, उच्च स्थान पर पदोन्नति, आकस्मिक लाभ होते हैं। अन्य स्थानों में हर्षल अशुभ फलदायी होता है। मीन का हर्षल लग्न में हो तो उसके शुभ फल प्राप्त होते हैं। बुध, गुरु, शुक्र एवं नेपच्यून ग्रहों से हर्षल की मैत्री होने से इन ग्रहों के साथ रहने पर हर्षल शुभ फलदायी होता है। सूर्य, चंद्र, मंगल एवं राहु के साथ हर्षल की शत्रुता होने से, इन ग्रहों के साथ होने पर वह अशुभ फलदायी होता है। शनि के साथ हर्षल हो तो समभाव रहने से हर्षल शनि के फल देता है। इन नियमों का अध्ययन करके, ग्रहों का बलाबल देखकर तारतम्य से हर्षल का फलित देखना चाहिए। लग्न में अरुण होने पर जातक उद्विग्न मन, नये प्रयोगों में रुचि लेने वाला, निरन्तर उधेड़बुन में लगे रहने वाला, थोड़ा सनकी व हठी होता है। निश्चय ही वह अन्तर्पज्ञा का धनी तथा बहुत बुद्धिमान होता है। कोई जातक विद्रोही स्वभाव का, अन्तर्मुखी, निराशावादी तथा दांपत्य जीवन में अलगाव पाने वाला होता है।
द्वितीय स्थान (धन भाव)
भाग्योदय में अवरोध, लेखा कार्यों में तथा बैंक आदि के ऑडिट कार्यों से लाभ, रेलवे, प्रेस से लाभ । शोधकर्ता, वैज्ञानिक व धन के क्षेत्र में अचानक उत्थान-पतन व अचानक मृत्यु।द्वितीय भाव में अरुण की स्थिति धन संपदा की स्थिति में उतार चढ़ाव देती है। जातक सट्टेबाजी व जोखिम वाले, संदिग्ध कार्यो में पैसा फंसा देता है। बहुधा लीक से हटकर, नया करने की धुन में भूल कर बैठता है। बिना सोचे समझे धन का लेन देन करता है व पैसा पास में न होने पर भी योजना में धन निवेश का आश्वासन देकर मुसीबत में फंस जाता है। द्वितीय स्थान में हर्षल हो तो जातक धनलोभी होता है। ऐसा जातक शेयरों, रेस, सट्टा बाजार एवं लॉटरी के मोहजाल में न फंसे तो आश्चर्य हो होगा। द्वितीय स्थान का शुभ हर्षल धन देता है किंतु अशुभ योग में हो तो आर्थिक स्थिति डांवाडोल करता है। यह हर्षल नेत्रदोष एवं वाणीदोष उत्पन्न करता है। जातक को पतक सुख प्राप्त नहीं होता। कोर्ट-कचहरी में जाना पड़ता है। झगड़े-मुकदमे में फस जाता है। जायदाद में अपघात या अपशकुन होते हैं एवं उसके कारण क्लेश होते है. बड़े-बड़े सांपत्तिक उतार-चढ़ाव इसी हर्षल के कारण होते हैं। द्वितीय भाव में अरुण धन संपदा की स्थिति में उतार-चढ़ाव देता है। जातक सट्टेबाजी व जोखिम भरे कार्यों में पैसा डुबो देता है। धन के लेन-देन में असावधानी तथा पैसा पास में न होने पर भी धन निवेश का आश्वासन कमी बड़ी मुसीबत पैदा करता है। कभी ऐसा जातक आकस्मिक रूप से बहुत लाभ तथा हानि पाता है।
तृतीय स्थान (सहज भाव)
अचानक समुद्र व पहाड़ की यात्राएं, परिवार में लड़ाई-झगड़ा, बुद्धिमान, प्रेस, टेलीविजन, पत्रिकाओं में सफलता तथा भाई-बहनों से हानि।तृतीय भाव में अरुण की स्थिति बेचैनी, अव्यवहारिकता परिवर्तनशीलता या लक्ष्य हीनता देती है। ऐसे जातक हानि उठाकर (ठोकर खाकर) अपने अनुभव से सीखने में विश्वास रखते हैं। ये मौलिक चिंतक, अनुसंधान व शोध में रुचि लेने वाले, प्रतिभा संपन्न व्यक्ति होते हैं। कभी जोवन के मध्य भाग तक पहुंचने पर, इनके आचार व्यवहार व जीवन शैली में परिवर्तन आ जाता है। ततीयस्थ हर्षल बड़े पैमाने पर शुभ फल प्रदान करता है। उत्तम अंतर्जान शक्ति, तर्कशक्ति एवं मन की एकाग्रता साधने की कला यह हर्षल ही जातक को प्रदान करता है। सूर्य, चंद्र एवं बुध के अंशात्मक शुभ योग में हर्षल हो तो यह हर्षल काव्यशक्ति, स्फूर्ति एवं कल्पनाशक्ति देता है। मिथुन, तुला या कुंभ राशि का हर्षल गुरु या शुक्र के अंशात्मक शुभ योग में हो तो जातक साहित्य सेवी, लेखक एवं विचारशील रहता है। ऐसे जातक को कोई-न-कोई शौक होता है। निठल्लापन इसे अच्छा नहीं लगता। फोटोग्राफी, रंगकला, टिकिटों का संग्रह करना, वाद्यवादन में से एक शौक जरूर रहता है। मित्र समुदाय विशाल रहता है। गूढ़शास्त्र के विषय में जिज्ञासा एवं प्रेम रहता है। सामुद्रिकशास्त्र एवं ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन उत्तम रहता है। पीड़ित हर्षल सहोदरों के सुख में न्यूनता उत्पन्न करता है। पीठ पर जन्मे भाई-बहन को दीर्घकालीन बीमारी होना, अपघात होना एवं उनके विषय में बुरा घटित होना ऐसे अशुभ फल प्राप्त होते हैं। आकस्मिक रूप से काफी प्रवास होता है। कान और मस्तिष्क को चोट पहुंचती है। अचानक आर्थिक नुकसान होता है। तृतीय भाव में अरुण जातक को बेचैनी तथा लक्ष्य से भटकाव देता है। वह अव्यावहारिक तथा परिवर्तनशील होता है तथा अपने अनुभव से सीखने में विश्वास रखता है। वह मौलिक चिंतन, अनुसंधान या शोध में रुचि लेने वाला प्रतिभासंपन्न व्यक्ति होता है। ऐसा जातक साहसी, नेतृत्व गुणों से युक्त तथा पहल करने वाला होता है। जीवन के उत्तरार्ध में जातक के आचार व्यवहार तथा जीवन शैली में महान परिवर्तन आ जाता है।
चतुर्थ स्थान (सुख भाव)
विदेश यात्रा, विदेश प्रवास में धन लाभ व भाग्योदय । घर में किसी की अचानक मृत्यु, बाढ़, भूकंप, आग से सम्पत्ति की हानि, प्राकृतिक प्रकोप, विवाह-विच्छेद, वियोग।चतुर्थ भाव में अरुण, जातक को चंचल व अस्थिर मन बनाता है। उसका पर्यटन प्रेम कभी उसे खानाबदोश सरीखी जिन्दगी दिया करता है। घर बदलना या कहां भी जाकर बस जाना उसकी विशेषता होती है। प्रायः चतुर्थ स्थान में हर्षल शुभ फलदायी नहीं होता। चतुर्थ स्थान में पापग्रहमुक्त या पापग्रहयुक्त हर्षल हो तो माता को कोई मानसिक बीमारी होती है। उदरशूल, अल्सर, कैन्सर, दमा एवं अन्य दीर्घकालीन रोग होते हैं। माता-पिता दोनों में मनमुटाव रहता है। अशुभ योग में स्थित हर्षल के कारण मां सौतेली होती है। निवास के लिए पुराना मकान मिलता है। मकान में जातक को हमेशा कष्ट होते हैं, मकान मालिक की आकस्मिक मृत्यु होती है। जायदाद को लेकर लड़ाई-झगड़े चलते हैं। ऐसा जातक निवास के लिए नई जगह खरीदे तो उसमें वास्तुदोष रहता है एवं वह जगह लाभकारी नहीं होती। ढलती उम्र में बाल-बच्चों से बनती नहीं, बड़े-बड़े परिवर्तन आते हैं। आर्थिक हालत बिगड़ती जाती है। जातक परावलंबी बनता है। चतुर्थ भाव में अरुण जातक को चंचल व अस्थिरमन बनाता है। उसका भ्रमणशील स्वभाव, कभी खानाबदोश सरीखी जिन्दगी देता है। जल्दी-जल्दी घर बदलना या कहीं भी जाकर बस जाना इसकी विशेषता होती है। कोई जातक माता, मकान, भू संपदा तथा वाहन संबंधी परेशानियाँ पाता है। उसका मन सदा अशान्त रहता है।
पंचम स्थान (सत भाव)
संतान हानि व संतान पक्ष को कष्ट, पेट में दर्द, शिक्षा में रुकावट, गर्भपात, नवीन खोज, अनैतिक प्रेम संबंध, रेस, सट्टा, लॉटरी एवं शर्त में धन हानि, किसी से विश्वासघात (धोखा)।पंचम भाव में स्थित अरुण जातक को परंपरा से हटकर जोखिम भरे कार्यों के प्रति आकर्षण या रुचि देता है। असामान्य व्यक्तियों से उसकी मैत्री होती है। कभी ये लोग, उन्मुक्त यौन संबंध अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के फेर में पड़कर, मुसीबत में फंस जाते है। रहने वाला, उद्विग्न मन, नए प्रयोगों में रूचि लेने वाला, कुछ जिद्दी या हठी होता है। उसमें अतप्रज्ञा व बुद्धि विशेष मात्रा में पंचम स्थान में स्थित ह स्थान में स्थित हर्षल बुद्धिमत्ता की दृष्टि से शुभ फलदायी होता है। विदता दर्शाता है। शिक्षा मर्य, शनि या मंगल भी रहती है। पंचमस्थ किसी भी राशि का हर्षल पंचम स्थान में हो तो वह विद्वता दर्शाता है। पूर्ण करने की जिद जातक में होती है। पंचम स्थान में सूर्य, शनि या के अशुभ योग में हर्षल पंचम स्थान में हो तो शिक्षा अधूरी रहती है। पंचा हर्षल के कारण विशेष रूप से संतान बुद्धिमान किंतु चंचल रहती है। लड़के या लड़की की उच्च शिक्षा में प्रगति होती है। दूषित या पीडित । का खत या पाड़ित हर्षल पंचम स्थान में हो तो एकाध लड़के-लड़की में शारीरिक दोष या विकार रहता है। स्त्री जातक की जन्म कुंडली में पापग्रह दृष्ट या अन्य कारणों से पीडित हर्षल पंचम स्थान में होने से अशुभ फलदायी होता है। गर्भ-विकृति, उदररोग अपूर्ण संतान, दो संतानों में काफी अंतर होना, एकाध लड़के के मस्तिष्क में विकृति रहना, संतानविहीन रहना, दीर्घकालीन बीमारी होना, एकाध लड़के-लड़की को अपघात होना आदि अशुभ फल पंचमस्थ पीडित हर्षल के प्राप्त होते हैं। पंचम स्थान में गुरु या शुक्र के अंशात्मक योग में हर्षल हो तो जातक को रेस, शब्द प्रतियोगिता, शेयरों एवं अन्य अकस्मात धनप्रदायक विषयों में रुचि रहती है। पंचमस्थ हर्षल बुध, शुक्र, चंद्र या सूर्य के शुभ योग में हो तो जातक बुद्धिजीवी बनता है। मंगल, सूर्य या शुक्र के शुभ योग में होने पर वह खेलकूद में प्रवीण होता है। पंचम स्थान में शुक्र या हर्षल हो तो जातक प्रेम-विवाह करता है। पंचमस्थ हर्षल गूढ़ शास्त्र, तंत्र-मंत्र या उपासना में जातक की प्रगति कराता है। पंचम भाव में अरुण जातक को जोखिम भरे कार्यों में रुचि देता है। उसके मित्र भी विचित्र या असामान्य प्रकृति के होते हैं। उन्मुक्त यौन संबंध, स्वेच्छाचार अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन, उसे प्रायः मुसीबत में डाल देता है। मतान्तर से ऐसा जातक, जुआ, सट्टा या लाटरी का शौकीन तथा उलटी सोच वाला होता है। उसके बच्चे निश्चय ही बुद्धिमान व कार्य कुशल डालता होते हैं।
शश्ट् भाव
पागलपन, स्नायु मंडल में कमजोरी, रोगी, अधिनस्थ लोगों से अनबन, लंबी बीमारी, बीमारी इलाज वाली नहीं।षष्ठ भाव में अरुण होने से जातक, इलैक्ट्रानिक्स, इन्जीनियरिंग व 306 होती है, कभी वो बहुत शिष्ट व मैत्री पूर्ण व्यवहार भी करता है। (शबुभाव) पष्ठ स्थान में पापग्रह शुभ फलदायी होता है, यह ज्योतिषशास्त्र का संकेत है, किंतु हर्षल इस नियम के लिए बड़ा अपवाद है। यह हर्षल पापग्रह होने बावजूद भी षष्ठ स्थान में शुभ फलदायी नहीं होता। पाठस्थ हर्षल कछ शाहों के साथ होने पर शुभ फल प्रदान करेगा। षष्ठ स्थान रोग का स्थान है। अकेला हर्षल रोग स्थान में बैठकर रोग पैदा नहीं कर सकता। सूर्य, चन्द्र, मंगल एवं शनि ग्रहों में से किसी एक ग्रह के साथ हर्षल का अशुभ योग हो तो पीड़ित हर्षल जातक के शरीर में दीर्घकालीन रोग उत्पन्न करेगा। संग्रहणी, अवयवों के विकार भी से होते हैं। पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार पष्ठस्थ हर्षल तरह-तरह के 'नर्वस डिसऑडर' करता है। कुछ मानसिक रोग भी उत्पन्न करता है। बीमारी के दौरान आवश्यक सहनशीलता जातक में नहीं रहती। किंत विद्यत । उपचार (अल्ट्रावायलट थ्योरी) के उपचार कारगर सिद्ध होते हैं। आकस्मिक रूप से उद्भव होनेवाले 'अपेंडिसाइटिस' या अर्धाग वायुरोग जातक के लिए कष्टकारक सिद्ध होते हैं। घर में बड़ी चोरी होना, अपघात होना, नौकरी में बाधा आना ये फल पष्ठस्थ हर्षल के हैं। षष्ठ भाव में अरुण जातक को इलैक्ट्रोनिक्स तथा औषधि विज्ञान में नई तकनीक विकसित करने की प्रेरणा देता है। उसकी विश्लेषण शक्ति अदभुत होती है। मंडी रुझान अथवा उपभोक्ता की रुचि का आकलन करने में वह निपुण होता है। कभी ऐसा जातक निदान न हो सकने वाले जटिल रोग से कष्ट पाता है। निष्ठावान सहायक उसकी पूंजी होते हैं।
सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव)
साझेदारी से लाभ, शराब या नशे वाली किसी अन्य वस्तु के ठेके
से लाभ। अचानक पति-पत्नी में विरोध, तलाक, एक से अधिक प्रेम संबंध।सप्तम भाव में स्थित अरुण जातक को विवाह व दांपत्य जीवन के विषय में अजीबोगरीब विचार व मान्यताएं देता है। वह दोनो पक्षों की पूर्ण स्वतंत्रता, निर्बाध जीवन शैली व स्वेच्छा से प्रेम व सहयोग का समर्थन करता है। बहुधा उसकी जीवन शैली व कार्य क्षेत्र, समाज में उसे सम्मनित स्थान दिया करता है। यों तो ऐसे जातक मौलिक चिंतन व उदार मानवतावादी दृष्टिकोण के लिए प्रशंसा पाते हैं, किंतु जीवन में सफलता बहुधा इस बात पर निर्भर करती है कि, उन्होंने अपने अनुभवों से कितना सीखा व जाना है। कुंडली का सप्तम स्थान पति-पत्नी का स्थान है। वैवाहिक जीवन, व्यापार-उद्योग, साझेदारी का भी यह स्थान है। इन दोनों दृष्टियों से सप्तम स्थान में स्थित हर्षल के फल अशुभ फलदायी होते हैं। विवाह में विलंब होना, निश्चित विवाह न होना, विवाह का मुहूर्त आगे जाना, विवाह निश्चित करने के समय या बाद में होना जैसे फल सप्तमस्थ हर्षल के प्राप्त होते हैं। सप्तम स्थान में स्थित हर्षल पापग्रहों के अंशात्मक अशुभ योग में, युति योग में या प्रतियोग में हो तो विवाह होने के बाद भी वैवाहिक जीवन में व्यवधान आता है। आपस में वैचारिक मतभिन्नता होती है। पति-पत्नी की आपस में नहीं बनती या दोनों में से किसी एक की शारीरिक अस्वस्थता के कारण वैवाहिक सुख में न्यूनता आती है। ये फल सप्तमस्थ हर्षल के प्राप्त होते हैं। स्त्री जातक की कुंडली में सूर्य, शुक्र या चंद्र के अंशात्मक योग में हर्षल हो तो वैवाहिक जीवन कम सुखी होता है। सप्तमस्थ हर्षल शुक्र के अंशात्मक अशुभ योग में होने पर पत्नी या पति को शारीरिक विकार उत्पन्न होता है। पत्नी लड़-झगड़कर पति से अलग हो जाती है। उसका स्वभाव विचित्र रहता है। सप्तमस्थ हर्षल के कारण प्रेम विवाह होता है। परंतु वह सफल नहीं होता। सप्तम स्थान का हर्षल शुक्र के अंशात्मक योग में हो तो जातक स्त्रियों में रमण करनेवाला एवं कामातुर रहता है। सप्तमस्थ हर्षलवाले जातक साझेदारी में व्यवसाय न करें अन्यथा घाटा, लडाई-झगडे एवं मतभेद उत्पन्न होंगे। कोर्ट-कचहरी के कामों में ऐसे जातक सफल नहीं होते। मूत्राशय के विकार, किडनी में दोष उत्पन्न होना एवं गर्मी के विकारों के कष्ट जातक को भुगतने पड़ते हैं। सप्तम भाव में अरुण जातक को विवाह व दांपत्य जीवन के विषय बडी विचित्र सी अवधारणाएँ देता है। वह पूर्ण स्वतंत्रता तथा बंधनमुक्त, स्वच्छन्द जीवन शैली का समर्थक होता है। उसका चिंतन, मौलिक व दृष्टि- कोण, उदार व मानवतावादी होता है। कभी ऐसे जातक की पत्नी प्रतिभायुक्त, विदुषी तथा स्वावलंबी होती है। मतभेद या विचार विषमता को, यदि प्रभावशाली ढंग से सुलझाया नहीं गया, तो अलगाव या तलाक होना सहज संभव है।
अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
विवाह के उपरांत कष्ट व आर्थिक हानि, दुर्घटना में चोट, किसी की अचानक मृत्यु, सट्टा, रेस, लॉटरी, बीमा कंपनी से अचानक लाभ, हृदय व हृदय से संबंधित रोग।अरुण यदि अष्टम भाव में हो तो जातक रहस्य, रोमांस व गुप्त विद्याओं में रुचि लेता है। कभी अप्राकृतिक यौन संबंधों में उसकी रुचि होती है। प्रकृति के रहस्यों को जानने की प्रबल इच्छा, कभी उसे शारीरिक, मानसिक या आर्थिक रुप से हानि पहुंचा सकती है। कुंडली में अष्टम स्थान में हर्षल हो तो उसके अनिष्ट एवं अशुभ फल प्राप्त होते हैं। क्रूर नक्षत्र का हर्षल अष्टम स्थान में अपघात या अपघाती मृत्यु देता है। दूषित या पीड़ित हर्षल अष्टम स्थान में अपघात दर्शाता है। मृत्यु के समय चमत्कारिक या अनियमित स्थिति यह हर्षल ही पैदा करता है। वृषभ, कन्या, मकर राशि का हर्षल गुरु या शुक्र के शुभ योग में अष्टम स्थान में होने पर आकस्मिक धनलाभ कराता है। अष्टम भाव में अरुण जातक को रहस्य, रोमांच तथा गूढ विद्याओं में रुचि देता है। कोई जातक अप्राकृतिक यौन संबंध के कारण शारीरिक व मानसिक कष्ट पाता है। मतान्तर से अष्टमस्थ अरुण दुर्घटना, आर्थिक क्षति तथा अचानक अप्रत्याशित मृत्यु का कारक होता है।
नवम स्थान (भाग्य भाव)
लंबी यात्रा, विदेश यात्रा से कष्ट, ईश्वर में आस्था की कमी, धार्मिक कार्यों से हानि, किसी शोध संस्था एवं धार्मिक समाज सुधारक संस्था के संचालक पद पर चुनाव। नवमस्थ अरुण से जातक आदर्शवादी व दार्शनिक होता है। धर्म, राजनीति व शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार लाने में उसकी रुचि होती है। कोई असामान्य या विचित्र वस्तु उसे आकर्षित करती है। वह बिना सोचे समझे, झटपट निष्कर्ष निकाल लेता है। उसमें अनुशासन व संयम की कमी होती है, तथा सहज ही लक्ष्य से भटक जाता है। नवम स्थान में हर्षल शुभ फलदायी होता है। नवमस्थ हर्षल के कारण जातक ज्योतिष, तत्त्व ज्ञान एवं अन्य गूढ शास्त्रों में रुचि रखता है। सूर्य, चंद्र या नेपच्यून के शुभ योग में स्थित हर्षल नवम स्थान में होने पर जातक को जल पर्यटन एवं परदेश प्रवास के योग प्राप्त होते हैं। यही हर्षल अशुभ योग में होने पर जातक नास्तिक, दंभी होता है। अंतर्ज्ञान सूचक स्वप्न एवं दूर-दृष्टि के संबंध में नवमस्थ हर्षल के शुभ फल प्राप्त होते हैं। नवम भाव में अरुण जातक को आदर्शवादी व दार्शनिक बनाता है। धर्म, राजनीति व शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार लाने का वह इच्छुक होता है। उसमें अनुशासन व संयम की थोड़ी कमी होती है। कभी तो वह बिना कुछ सोच-विचार किए झटपट निष्कर्ष निकाल लेता है। ऐसा जातक विद्रोही व नास्तिक स्वभाव का होता है। पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों को वह हेय दृष्टि से देखता है किन्तु जन कल्याण व लोक हित के कार्यों में बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाला होता है
दशम स्थान (कर्म भाव)
साझेदार से मनमुटाव, साझेदारी में नुकसान, पत्नी से अनबन. किसी कार्य में बदनामी मिले, राज्य, राज्यकर्मचारी से हानि व विरोध, शिक्षक, समाज सुधारक, मेयर, प्रयोगशाला सहायक।दशम भाव में अरुण की स्थिति जातक को प्रतिभा संपन्न, दृढ़ निश्चयी,साहसी व परिश्रमी बनाती है। ये अपने कार्यक्षेत्र में तेजी से प्रगति करते हैं। भले ही अपने अधिकारियों से इनके कुछ मतभेद हो दशम स्थान कर्म स्थान हा दशम स्थान में हर्षल हो तो जातक नाम कमाता है। कछ भव्य-दिव्य या नवीन करके लोगों के सम्मुख लाना दशमस्थ हर्षल का काम है। दशम स्थान व अशुभ योग में स्थित हर्षल जातक का अंत करता है। अपघात या अन्य अशुभ स्थिति का निर्माण करता है। शभ ग्रहों के शुभ योग का हर्षल दशम स्थान में हो तो जातक का राज, धर्म, समाज, प्रसिद्धि माध्यम, प्रिंटिंग, नवमतवादी संप्रदाय एवं भौतिक शास्त्र में संशोधन एवं अन्य पुरोगामी विचारों से संबंध होता है। दशम स्थान में हर्षल हो तो जातक चंचल, अस्थिर बुद्धि का, घुमक्कड़ होता है। उसके विचार अगुवा एवं क्रांतिकारी रहते हैं। पापग्रहों के अशुभ योग में दशमस्थ हर्षल हो तो जातक को उम्र के चौबीस वर्षों तक स्थिरता प्राप्त नहीं होती है। मुलाकात में कुछ मजेदार किस्से होते हैं, जिनकी वजह से तुरंत नौकरी मिल जाती है। पितृ-सुख प्राप्त नहीं होता। पिता-पुत्र में मतभेद रहते हैं। परिवार से अलग होकर स्वतंत्र रूप से कुछ करना पड़ता है। सामूहिक परिवार को तितर-बितर करने का काम दशमस्थ हर्षल करता है। पिता के व्यवसाय में दो या तीन परिवर्तन होते हैं या समय से पूर्व निवृत्त हो जाने से नौकरी आधी ही होती है। जातक स्वयं चौकस एवं बुद्धिमान होने से एक ही समय में कई क्षेत्रों में कार्यरत रहता है। जातक की जन्मकुंडली में हर्षल के साथ गुरु, बुध, शुक्र एवं चंद्र का शुभ योग न हो तो जातक अनेक विषयों में हिस्सा लेता है लेकिन एक भी विषय में प्रवीण नहीं बनता। कुलधर्म, त्योहार, व्रतधर्म, आचार-विचार, उपवासादि बातें जातक को मान्य नहीं होतीं। अनियमितता हर्षल का स्थायी भाव है। ऐसा जातक अहंकारी रहता है। दशम भाव में अरुण जातक को प्रतिभा संपन्न, दृढ़ निश्चयी, साहसी पराक्रमी बनाता है। बहुधा वह कार्यक्षेत्र में बहुत तेजी से उन्नति करता है। ऐसा जातक निष्ठावान कार्यकर्ता होता है। वरिष्ठ अधिकारियों से मतभेद होने पर भी वह निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए लक्ष्य प्राप्ति में पूर्ण सहयोग देता है तथा मान प्रशंसा पाता है। कभी ऐसा जातक थोड़ा सनकी, असामान्य, संवेगी किन्तु कार्य कुशल होता है।
एकादश स्थान (लाभ भाव) –
साहित्य, ललितकला, गायन व कला के क्षेत्र में सफलता, अनेक
व्यवसाय व एक से अधिक धन लाभ के साधन, कवि, साहित्यकार, लेखक, मित्रों द्वारा विश्वासघात। एकादश भाव में स्थित अरुण जातक को करुणा, अर्न्तप्रज्ञा सामाजिकता व प्रगति करने की शक्ति देता है। समूह में ये लोक प्रिय होते हैं। बहुधा मैत्री करने व मैत्री तोड़ने में कुछ दिखाते हैं। प्रायः किसी नई वस्तु का अनुभव पाने के लिए ये लालायित रहते हैं। बहुधा वृद्धावस्था में, ज्योतिष अथवा तंत्र में इनकी रुचि हो अधिक उतावलापन जाती है। कुंडली के एकादश स्थान यानी लाभ स्थान में स्थित हर्षल के शुभ फल प्राप्त होते हैं। पाश्चात्य ज्योतिषी एकादश स्थान का अधिपति हर्षल को ही मानते हैं। सामाजिक, शैक्षणिक, सहकारिता एवं बैंकिंग क्षेत्र में ऐसे जातक कुशल होते हैं। अशुभ हर्षल एकादशस्थ हो तो संतान सुख में बाधा उत्पन्न होती है। संतान कम होती है या उसे अपघात होता है। एकादश स्थान में स्थित हर्षल अष्टमेश, पंचमेश, धनेश एवं लाभेश के अंशात्मक शुभ योग में होने पर आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं। स्वपरिश्रम से, दत्तक विधान से, वसीयत के माध्यम से या अन्य मार्गों से जातक को बड़े आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं। पीड़ित हर्षल आर्थिक नुकसान, माता को दीर्घकालीन बीमारी आदि कुफल देता है। एकादश स्थान में स्थित हर्षल होने पर जातक कुशाग्र बुद्धि का, लगन से अध्ययन करनेवाला एवं अपनी शिक्षा पूर्ण करनेवाला होता है। ऐसे जातक के मित्र एवं अनुयायी काफी होते हैं। असामान्य बातों में या अपरिचित शास्त्र में वह लाभ कमाता है। शिक्षा पूर्ण न होने की स्थिति में भी जातक बौद्धिक क्षेत्र में अपना रौब जमाता है। एकादश भाव में अरुण जातक को अन्तप्रज्ञा का धनी, सामाजिक प्रगतिशील बनाता है। नयी वस्तु के प्रति सहज आकर्षण इसे उतावलापन देता है। मित्र व परिचितों के बीच स्नेह व सहयोग मिलता है। मैत्री करने मैत्री भंग करने में जल्दबाजी कभी कष्टदायक होती है। वृद्धावस्था में ज्योतिष या तंत्र में रुचि होती है। बहुधा मित्रों के सहयोग से उसे अप्रत्याशित लाम मिलता है
द्वादश स्थान (व्यय भाव)
जनता सेवा, दवाइयों, तरल पदार्थ, एक्स-रे इत्यादि से लाभ। डॉक्टर, नर्स, अस्पताल के कर्मचारी, वैज्ञानिक व जेलर, अपयश, अधिक शत्र, कामी व अव्यवहारशील तमोगुण से परिपूर्ण।द्वादश भाव का अरुण जातक को सनक की सीमा तक कल्पनाशील बना देता है। ये सहज विश्वास करने वाले अव्यवहारिक, श्रद्धालु किस्म के होते हैं दूसरों के भेद प्रायः प्रकट नहीं करते। अज्ञात का रोमांच इन्हें तंत्र, उपासना या अन्य गुप्त व रहस्यपूर्ण विधाओं की ओर धकेल दिया करता है।
द्वादश यानी व्यय स्थान में स्थित हर्षल विशेष प्रकार के फल प्रदान करता है। पाप ग्रहों के योग में स्थित या पीड़ित हर्षल जातक के जीवन में बड़े-बड़े आर्थिक संकट उत्पन्न करता है। बीच-बीच में आर्थिक संकट छाए रहते हैं। किसी की जमानत देने के कारण, घर पर डकैती होने के कारण या घर में हुई चोरी के कारण या व्यापार में अचानक आए आर्थिक नुकसान के कारण धनहानि होती है। भाईचारा या अन्य कारणों से कोर्ट-कचहरी में दीवानी मुकदमे चलते हैं। इस कारण भी काफी धन खर्च होता है। पिता का अपने भाई से मनमुटाव रहता है। बंधुओं में से एक बंधु से कष्ट पहुंचता है। पिता का कोई भाई घर से भाग जाता है तो कोई पुत्रहीन रहता है। पैरों में अधूरापन, दृष्टिदोष रहना, आंखों पर शल्य क्रिया जैसे फल भी व्ययस्थ हर्षल देता है। व्यय स्थान में स्थित हर्षल गुप्त पीड़ा देता है। पीड़ित व्ययस्थ हर्षल जातक को हिंसक बनाता है। आत्मघात करना, गृह त्याग करना, बड़ा कर्ज होना आदि कार्य भी व्ययस्थ हर्षल करवाता है। राजकीय या अन्य कारणों से बंधन योग आता है। परदेश गमन होता है। परदेश निवास भी संभव रहता है। अध्यात्म, गूढविद्या एवं असामान्य बौद्धिक कार्यों में जातक प्रगति करता है। चाल में अनियमितता, चलते समय कर्मठ चेष्टा करना, पैर छोटा होना या लकड़ी का पैर होना जैसी अवस्था व्ययस्थ हर्षल के कारण होती है। द्वादश भाव में अरुण जातक को सनक की सीमा तक कल्पनाशील बनाता है। अज्ञात का रोमांच तथा अलौकिक चमत्कार में दृढ़ आस्था, इसे तंत्र उपासना अथवा गुप्त व रहस्यपूर्ण विद्याओं की ओर धकेला करती है। निश्चय ही ऐसा जातक, कभी अप्रत्याशित दंड या आर्थिक हानि पाता है तो कभी इसे बहुत सुख भी मिलता है।
द्वादश राशि में हर्षल के फल
पाश्चात्य ज्योतिषी हर्षल ग्रह से काफी प्रभावित हैं। वर्तमान समय के महत्वपूर्ण संशोधनों एवं आध्यात्मिक प्रवाह का कारण हर्षल ही है।' यह उनकी धारणा है। हर्षल के फलित विषय में अनेक ग्रंथ अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुए हैं। अंग्रेजी ग्रंथों के अनुसार हर्षल का फलित असाधारण एवं विलक्षण है। इसी ग्रह की स्थिति शनि ग्रह जैसी होने से जिस राशि में शनि बलवान हो र राशि का हर्षल बलवान माना जाता है। इस आधार पर कुंभ राशि को शनि का स्वक्षेत्र एवं मीन राशि में वह उच्च का माना गया है। इसके अतिरित तुला एवं मिथुन राशि में भी हर्षल के फलित शनि जैसे ही प्राप्त होते है।
लग्न से 1, 3, 5, 7, 9, 10 स्थानों में हर्षल का प्रभाव विशेषरूप से अनभव में आता है। जन्मकुंडली में जिस भाव में यह ग्रह हो उस भाव के फलित में यह ग्रह विलक्षणता दिखाता है। उदाहरणार्थ षष्ठ स्थान रोग का स्थान है। यहां हर्षल होने से जातक विलक्षण रोगी होता है। उसके रोग का कोई निदान नहीं होता। अष्टम स्थान मृत्यु का स्थान है। इस स्थान में हर्षल हो तो जातक की मृत्यु आकस्मिक रूप से होती है। धन स्थान-परिवार स्थान द्वितीय स्थान में हर्षल हो तो जातक की आर्थिक स्थिति एवं पारिवारिक जीवन सचारू नहीं होता। इसी तरह दशम स्थान राज्यभाव आजीविका भाव में हर्षल हो तो जातक आकस्मिक रूप से उच्च पद पर आसीन होता है या जातक बारबार अपनी नौकरी-व्यवसाय बदलता है। बारहवें स्थान यानी व्यय स्थान में हर्षल हो तो जातक के व्यवसाय का अचानक दिवाला पीट जाता है। भय, आकस्मिक आर्थिक नुकसान आदि फल भी उसे प्राप्त होते हैं। मेष या वृश्चिक राशि का हर्षल विशेष रूप से अशुभ फल प्रदान करता है।
जन्मलग्न में 5, 8, 10, 11 स्थानों में हर्षल शुभ फलदायी होता है, तीव्र, बुद्धिमत्ता, उच्च शिक्षा, उच्च स्थान पर पदोन्नति, आकस्मिक लाभ होते हैं। अन्य स्थानों में हर्षल अशुभ फलदायी होता है। मीन का हर्षल लग्न में हो तो उसके शुभ फल प्राप्त होते हैं। बुध, गुरु, शुक्र एवं नेपच्यून ग्रहों से हर्षल की मैत्री होने से इन ग्रहों के साथ रहने पर हर्षल शुभ फलदायी होता है। सूर्य, चंद्र, मंगल एवं राहु के साथ हपल की शत्रुता होने से, इन ग्रहों के साथ होने पर वह अशुभ फलदायी होता है। शनि के साथ हर्षल हो तो समभाव रहने से हर्षल शनि के फल देता है। इन नियमों का अध्ययन करके, ग्रहों का बलाबल देखकर तारतम्य से हर्षल का फलित देखना चाहिए।
मेष: पराक्रमी, धैर्यवान, परिश् बलवान, महत्वकांशी, बौद्धिक प्रवृति शोधकर्ता मेष राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक विचित्र स्वभावी, जिदो, झगड़ालू, चिड़चिड़ा, अहकारी, दभी, उतावला, अभिमानी, महत्वाकांक्षी, बुद्धिमान एवं सुधारक रहता है। जीवन में आनेवाले उतार-चढ़ावों का उसे अनुभव प्राप्त होता है। जातक में सम्मान प्राप्त करने की लालसा निहित रहती है। अपघात एवं अग्निभय भी रहता है। सिर एवं मख पर जख्म या जख्म का कोई निशान होता है। मेष राशि में अरुण जातक को महत्वाकांक्षी, अभिमानी तथा वैचारिक स्वतंत्रता का पक्षधर, साहसी तथा नयी वस्तुओं को अपनाने वाला बनाता है। वह तीक्ष्ण बुद्धि, तर्ककुशल, वर्जनाओं का विरोधी तथा वाणी व कर्म में स्वच्छन्दता या उन्मुक्तता का समर्थक होता है। प्रगति, परिवर्तन, अनुसंधान व अन्वेषण में उसकी सहज रुचि होती है। बाधा या विरोध उसे विद्रोही बनाता है। कभी वह अनायास व अकारण ही मैत्री या स्नेह संबंध तोड़ लेता है।
वृष: ज्ञानवर्धक शास्त्र ज्ञाता हठी दृढ़ निश्चयी हानि धन नाश वैवाहिक जीवन में कटुता विचित्र स्वाभाव छोटा कद नीच स्थान वृषभ वृषभ राशि का हर्षल कंडली में हो तो जातक बहुत लालची और सट्टे, रेस, जुए का रंगकारी, चित्रकारी, फोटोग्राफी, नाट्य, वाद्य-वादन, टकण, लेखन एवं अन्य कलाकोशल के क्षेत्र में लाभान्वित होता है। विवाह के बाद ही भाग्योदय होता है। नाक में हड्डी बढ़ने जैसे रोगों से जातक त्रस्त रहता है। गले में खराबी भी आ सकती है। विवाह एवं प्रेम के विषय में उसके बडे चमत्कारिक विचार होते हैं। पत्नी से मनमुटाव रहता है। वृष राशि में अरुण होने से जातक हठी, दृढ़ निश्चयी, बुद्धिमान तथा यथार्थवादी होता है। वह व्यक्ति या वस्तुओं की व्यवस्था (Man or Material Management) के लिए नितान्त मौलिक व प्रभावी पद्धति अपनाता है। कोई जातक शीघ्र धन पाने के लिए जुआ या लाटरी का सहारा लेता है। ऐसा व्यक्ति कामुक, आराम पसन्द तथा अपनी सत्ता (अधिकार) का दुरुपयोग कर, धन व कामसुख पाने वाला होता है।
मिथुन: ज्योतिष इंजीनियर विधुत विषेधज्ञा शोधकर्ता प्रखर व् तेज बुद्धिवाला एक से अधिक विषयो में प्रवीणता लम्बा कद मिथुन-मिथुन राशि का हर्षल कुंडली में हो तो बौद्धिक दृष्टि से शभ फलदायी होता है। ऐसा जातक चिंतन, मनन एवं कंठस्थ करने में माहिर होता है। जातक होशियार, अत्यधिक आसक्त होता है। मिथुन राशि का हर्षल अलग-अलग भाषाओं, साहित्य, इतिहास फलज्योतिष, पुराण, तत्त्वज्ञान, ज्यातिष गणित विषयक क्षेत्र में जातक को आगे ले जाता है। पापग्रहों की यति में या अन्य योग में हर्षल हो तो जातक चिडचिडा बनता है। अडोस-पडोस के लोगों से स्नेहपूर्ण व्यवहार नहीं रहता। हर्षल पीडित हो तो दमा, सर्दी, खांसी अन्य कफविकार उत्पन्न होते हैं। पीड़ित हर्षल के कारण, मतिभ्रम, भुलक्कड़पन बढ़ता है। जातक को नींद में बड़बड़ाने की आदत होती है। मिथुन राशि में अरुण जातक को सुन्दर रंग-रूप, सुडौल देह, कल्पनाशीलमस्तिष्क तथा मनमौजी स्वभाव देता है। वह शास्त्र मर्मज्ञ, अन्वेषण या अनुसंधान में संलग्न, मौलिक विचारों का धनी व्यक्ति होता है। कभी शीघ्र ऊब जाने या अधीरता के कारण, उसकी योजनाएँ आधी-अधूरी छूट जाती है। यह वार्ताकुशन तथा यांत्रिक कार्य में निपुण, एक श्रेष्ठ शिल्पी होता है। कभी रनायुविक थकान या मानसिक दुर्बलता, उसकी कार्य क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
कर्क: अहंयुक्त अभिमानी उदारतायुक्त बलशाली स्वंतंत्र विचारो का उपासक पिता से मतभेद दुराग्रही छोटा कद कर्क कर्क राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक चंचल, मालकिन दृष्टि से दुर्बल, मौके पर घबरानेवाला होता है। पापपीड़ित हर्षल जातक की जिद्दी एवं चिड़चिड़ा बनाता है। वह बात-बात पर झुंझलाता है। मातसखल वैवाहिक सुख में न्यूनता रहती है। जीवन अस्थिर रहता है। किंतु उत्तरार्ध में मित्रों के सहयोग से जीवन में यश प्राप्त होता है। कर्क राशि में अरुण जातक को ठिगना कद, पुष्ट देह तथा मनमौजी स्वभाव देता है। वह मन में अधीरता, असहिष्णुता तथा परंपरा के प्रति वैर-विरोध के कारण कभी घर छोड़ कर अपनी राह स्वयं बनाता है। मूलतः वह स्नेह, सौमनस्य तथा परस्पर विश्वास का पक्षधर होता है किंतु मृत संबंधों के शव ढोने में उसकी तनिक भी रुचि नहीं होती। वह अन्तज्ञा का धनी, तीक्ष्ण बुद्धि तथा तंत्र विद्या के लोकोपयोगी व्यवहार में दक्ष होता है।
सिंह: पेट में गैस की पीड़ा ऑपरेशन विदेश यात्रा वैवाहिक जीवन में मनमुटाव अस्थिर जीवन शैली . सिंह सिंह राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक अभिमानी, दयाल. बलवान, स्वच्छंद, पिता से मतभिन्नता रखनेवाला किंतु स्थिर विचारी रहता है। शुभ योग में स्थित हर्षल सिंह राशि में हो तो जातक धैर्यवान एवं कर्तव्यपरायण बनता है। पापपीड़ित सिंह राशि का हर्षल 1,4,7, 10 में से किसी स्थान में हो तो जातक के जीवन में बड़े परिवर्तन होते हैं। अशभ योग में स्थित हर्षल के कारण पेट के विकार उत्पन्न होते हैं। स्त्री जातक की कुंडली में सिंहस्थ हर्षल अशुभ स्थिति में हो तो गर्भपात या प्रसव के समय शल्य क्रिया होती है। सिंह राशि में अरुण जातक को दृढ़ निश्चयी, साहसी व उद्यमी बनाता है। उसमें भावुकता या संवेदनशीलता का अभाव होता है। शायद इसी कारण वह मित्र, पुत्र या पत्नी की कोमल भावनाओं को समुचित महत्व नहीं दे पाता। वीरता व जोखिमपूर्ण, रोमांचक कार्यों में उसकी सहज रुचि होती है। अपने विचारों में फेर-बदल कर पाना उसके लिए संभव नहीं होता। अतः उसे अड़ियल या हठी कहा जाता है।
कन्या: जीवन वर्षो के बाद सफलता व उन्नति मिले कला, साहित्य में रूचि , चिकित्सा , आयुर्वेद , प्राकृतिक चिकित्सा में रूचि, पत्नी की आयु अपने से अधिक कन्या कन्या राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक की रुचि औषधि विज्ञान एवं साहित्य में रहती है। जीवन के उत्तरार्ध में सुख प्राप्त होता है। स्त्री जातक की कुंडली में कन्या राशि का हर्षल हो तो उसका विवाह अपने से बड़े किंतु प्रतिष्ठित सज्जन के साथ होता है। सीना-पिरोना, कशीदा-कढ़ाई जैसे कलाकौशल के कामों में उसे यश प्राप्त होता है। भाग्योदय शैक्षणिक क्षेत्र में होता है। भाषाशास्त्र, गणित एवं तत्त्वज्ञान आदि विषयों का सटीक अध्ययन रहता है। पापग्रह से युक्त हर्षल हो तो जातक मानसिक संतुलनविहीन होता है। कन्या राशि में अरुण जातक को धर्म व अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों को जानने की इच्छा देता है। वह शास्त्रानुशीलन तथा स्वाध्याय से विविध विषयों का ज्ञाता होता है। वह अपने ज्ञान को आधुनिक परिस्थितियों के अनुकूल तथा अधिक प्रभावशाली व उपयोगी बनाता है। पुरानी कार्य प्रणाली को छोड़कर आधुनिक, किफायती व प्रभावी कार्य पद्धति अपनाने में उसकी सहज रुचि होती है। शोध परक कार्य में, अपनी प्रतिभा का उपयोग कर, वह व्यापारिक दृष्टि से लाभप्रद योजना बनाने में कुशल, भविष्य दृष्टा होता है।
तुला: अनेक विधाओं का ज्ञाता शीग्र विवाह होता है तलाक का डर भी, साहित्य कला विधि के गूढ़ रहस्यों का ज्ञाता तुला तुला राशि का हर्षल कुंडली में हो तो साहित्य, कला, कानून आदि विषयों में जातक की रुचि रहती है। प्रेमविवाह या विवाह उतावलेपन में होता है और अल्पावधि में तलाक भी हो सकता है। जातक लेखक, वकील, या साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध होता है। तुला राशि का पीड़ित हर्षल 1, 5, 7, 12 या 8 में से किसी स्थान में शुक्र के शुभ योग में हो तो जातक अनैतिक रहता है। तुला राशि का हर्षल वैवाहिक सुख नहीं देता। सप्तम स्थान बहत ही अशुभ होने पर पति-पत्नी में अलगाव एवं तलाक होता है। तुला राशि में अरुण होने से विवाह, मैत्री व साझेदारी पर जातक के विचार अद्भुत तथा गैर पारंपरिक होते हैं। सामाजिक विधि निषेधों में उसकी आस्था नहीं होती है। किसी भी प्रकार की रोक-टोक या प्रतिबन्ध स्वीकारना उसे कठिन व असह्य जान पड़ता है। नीति व न्याय पर भी उसके विचार, सर्वथा मौलिक तथा स्थापित मान्यताओं से हटकर होते हैं।कभी ऐसा जातक ज्ञानी, महत्वाकांक्षी, चमत्कारिक व्यक्तित्व का धनी, प्रसन्नचित्त तथा मिलनसार व प्रतिभा संपन्न होता है।
वृश्चिक: लघुकद, कालरंग , हस्तरेखा ज्योतिष एवं मनोविज्ञान का पंडित उच्च कोटि का तांत्रिक मन्त्रिक यांत्रिक साधक उग्र स्वाभाव, लड़ाकू प्रवृति शोधकर्ता अध्यनशील, अभिमानी, दृढ निश्चयी वश्चिक वृश्चिक राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक गर्ममिजाज, हस्तरेखा विज्ञान एवं मनोविज्ञान में रुचि रखनेवाला होता है। कई बार व्यवसाय भी बदलना पड़ता है। स्वास्थ्य अच्छा रहता है। किंतु वृश्चिक के पीडित हर्षल के कारण मूत्राशय संबंधी विकार उत्पन्न होते हैं। वृश्चिक राशि में अरुण जातक को पुष्ट देह, श्यामल वर्ण ठिगना कद. सघन केश तथा सुन्दर नेत्र देता है। उसके मन में क्षोभ-जन्य बवण्डर साचला करता है। बहुधा वह सब कुछ या कुछ भी नहीं पाने वाली मानसिकता से यस्त एकाधिकार प्रिय होता है। साहस, रोमांच व जोखिम भरे कामों में उसकी सहज रुचि होती है। वह मित्रों के लिए स्नेही मित्र किंतु शत्रु के लिए क्रूर व दुर्जेय होता है। अरुण पर पापत्व जातक को कपटी, धूर्त, वाचाल व व्यसनी बनाता है।
धनु : खेल प्रेमी, राष्ट्रीय स्तर का खिलाडी , कोमल व् उदार ह्रदय, सम्मान युक्त, लोकप्रियता में आगे, धीर गंभीर व महत्वकांशी, प्रवृति धन धनु राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक लोकप्रिय, अच्छे व्यक्तित्व का, सम्माननीय, चतुर, उदार, बुद्धिमान एवं मैदानी खेलों में प्रवीण होता है। धनु राशि का हर्षल 1, 3, 4, या 10वें स्थान में हो तो जातक को
आर्थिक दृष्टि से कई उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। धनु राशि का पीड़ित हर्षल स्थान में, अष्टम स्थान में या व्यय स्थान में हो तो अशुभ फलदायी होता भी अपपात, बंधन योग, पिता से मुठभेड़, दीर्घकालीन बीमारी, अग्निभय, शल्यक्रिया आदि फल मिलते हैं। धनु राशि का हर्षल जातक को क्रोधी एवं चिडचिडा बनाता है। धनु राशि का अशुभ हर्षल जातक को वाहन से अपघात, नेत्रपीड़ा, त्वचा रोग, टिटनेस, पैर या घुटनों की पीड़ा जैसे रोगों का कष्ट उठाना पड़ता है। धनु राशि में अरुण जातक को व्यग्रता या बेचैनी देता है। रहस्य व रोमांचपूर्ण कामों में उसकी सहज रुचि होती है। घिसी-पिटी पुरानी पद्धति से उसे चिढ़ होती है। वह कुछ नया व अनोखा करने को व्याकुल रहता है। विदेश यात्रा, विदेशी सभ्यता व संस्कृति उसे आकर्षित करती है। विज्ञान तथा तर्कसंगत, तंत्र शास्त्र व प्राचीन विद्याएँ उसे रोचक जान पड़ती हैं। वह प्रगति व परिवर्तन के लिए उनका प्रयोग हितकर मानता है। वह उदार, स्पष्ट तथा स्नेहशील होने से सुख, वैभव तथा सफलता पाता है।
मकर: जन कार्यकर्त्ता, जन सेवक प्रॉपर्टी डीलर व् भवन निर्माण का व्यवसाय से लाभ पाने वाला पिता से मतभेद बाल्य अवस्था में मुसीबते व् आभाव युक्त जीवन मकर मकर राशि का हर्षल जन्मकुंडली में हो तो जातक पिता से अलग रहता है। बचपन में दुख भोगना पड़ता है। जातक सार्वजनिक एवं भवन निर्माण के कार्य में सफल होता है। हर्षल गुरु एवं शुक्र के शुभ योग में हो तो आर्थिक संपन्नता प्राप्त होती है। धन स्थान, पंचम स्थान, अष्टम स्थान में या लाभ स्थान में हर्षल होने पर आकस्मिक धन लाभ होता है। मकर राशि में अरुण जातक को गंभीर, स्वाभिमानी, व्यवस्था कुशल तथा मित्र व सहयोगियों का हितसाधक बनाता है। वह अपने विरोधियों के प्रति कठोर व निर्मम होता है। वह कुछ नया व अद्भुत करने को उत्सुक एक प्रगतिशील व्यक्ति होता है। लकीर का फकीर होना उसके स्वभाव में प्रायः नहीं होता।
कुम्भ: अनेक संप्रदाय के लोगो से मित्रता सफल व्यक्तित्व अपना मकान व् जायदाद कोमल व् उदार ह्रदय प्रसन्न चित धर्मात्मा व् परोपकारी प्रवृति कुंभ–कुंभ राशि का हर्षल कुंडली में होने पर जातक उदार, परोपकारी, प्रसन्न, दयालु, मित्रों से घिरा हुआ, सुस्वभावी, वैवाहिक जीवन में सुखी एवं सफल होता है। यही हर्षल शभ योग में हो तो जातक खगोलशास्त्री, ज्योतिषी. गढ एवं स्थिर विचारोंवाला, गणितज्ञ, अर्थशास्त्री, कलाकौशल एवं विदेशी भाषाओं का जानकार होता है। कुंभ राशि में अरुण जातक को प्रगतिशील, महत्वाकांक्षी तथा परिवर्तन प्रिय बनाता है। कदाचित् परिवर्तन या फेर-बदल करने से उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। वह स्वतंत्रता का पक्षधर, व्यवहारकुशल तथा विचारों को कार्य रूप देने में सक्षम होता है। गुप्त विद्या तथा धर्म एवं अध्यात्म में उसकी सहज रुचि होती है। "जिज्ञासा.व ज्ञान" उसके संकेत शब्द होते हैं।
मीन: शोधकर्ता गोताखोर दुर्भाग्यशालि गढ़ा हुवा धन मिले सट्टा लॉटरी जुवे से धन की प्राप्ति मीन मीन राशि का हर्षल कंडली में हो तो रेस, सट्टे, लॉटरी एवं अन्य प्रकार के स्रोतों से अनायास धनलाभ के योग आते हैं। जातक को प्रवास एवं सुधार में रुचि और अलग-अलग प्राणी पालने का शौक रहता है।मीन राशि में अरुण जातक को कल्पनाशील, रहस्यपूर्ण तथा अध्यात्म के गूढ रहस्यों का ज्ञाता एवं भविष्य दृष्टा बनाता है। वह प्रतिभाशाली औररंग तथा संगीत का प्रभाव जानने में कुशल होता है। कोई जातक जीवन की कठोरता व कटुता को सहन करने में अक्षम होने से, संसार को कारागार सरीखा मानता है। अरुण का पापत्व जातक को आलसी, उदासीन, कपटी, मिथ्यावादी तथा रोगी बनाता है।
मीन राशि का हर्षल 3, 5, 8, 10, 12 स्थानों में से किसी स्थान में हो तो जातक की अंतर्ज्ञान शक्ति उत्तम रहती है, फलज्योतिष, हस्त-सामुद्रिक शास्त्र एवं तंत्र-मंत्र शास्त्र में अच्छी प्रगति होती है। मीन का हर्षल 3, 5, 8, 12 में से किसी स्थान में होने से जातक होनी-अनहोनी के स्वप्न देखता है। हर्षल के साथ बिगड़ा हुआ शुक्र हो तो विवाह में विलंब होता है। वोंमें टान के शावना विचारावाला, गणितज्ञ, अर्थशास्त्री, कलाकौशल एवं दिशा भाषाओं का जानकार होता है। 12, मीन मीन राशि का हर्षल बांडली में हो तो रेस, सबटे, लॉटी एवं अन्य प्रकार के प्रांतों से अनायास धनलाभ के योग आते हैं। जातक को प्रवास एवं सुधार में रुचि और अलग-अलग प्राणी पालने का शौक रहता है। मीन राशि का हर्षल 3,5,8, 10, 12 स्थानों में से किसी स्थान में हो तो जातक की अंतान शक्ति उत्तम रहती है, फलज्योतिष, हरत-सामुद्रिक शास्त्र एवं तंत्र-मंत्र शास्त्र में अच्छी प्रगति होती है। मीन का हर्षल 3,5,8,12 में से किसी स्थान में होने से जातक होनी-अनहोनी के खप्न देखता है। हर्षल के साथ बिगड़ा हुआ शुक्र हो तो विवाह में विलंब होता है।
राशिगत फल 1. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन, तुला, कुंभ में से किसी राशि का हर्षल लग्न में हो तो जातक बुद्धिमान, उच्च शिक्षित एवं अनेक शास्त्रों में पारंगत, चिकित्सक एवं चौकस होता है। 2. मेष-सिंह-धनु : मेष-सिंह-धनु में से किसी राशि का हर्षल लग्न में हो तो जातक धैर्यवान, उद्यमी. महत्त्वाकांक्षी, जिद्दी, दुराग्रही, मनमौजी एवं झगड़ालू होता है। कर्क-वृश्चिक मीच : कर्क-श्चिक-मोन में से किसी राशि का हल जान में हो तो जातक चिड़चिड़ा, भालुक, कठोर, ईध्योल. शत्रता रखनेवाला एवं कलाकार होता है। बुद्धि एवं विचार विलक्षण होते हैं। वृषभ कन्या-मंगल : ज्यभ-कन्या-मंगल में से किसी राशि का हर्षल लान में हो तो जातक बुद्धिमान, शिक्षित, धनलोभी, कंजूस, पैसे के लोभ के कारण धोखा खानेवाला, गले एवं नेत्र विकारों से पीड़ित, संगीत में रुचि लेनेवाला होता है। स्त्री जातक की कुंडली में ऐसा हर्षल होने पर वह एम्बाइडरो एवं अन्य हस्तकौशल में प्रवीण रहती है।
राशिगत फल 1. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन-तुला-कंभ में से किसी राशि का हर्षल धन स्थान में हो तो जातक उद्यमी, यांत्रिक विषयों में सफल, हमेशा आर्थिक तनाव में रहनेवाला किंतु हर वक्त कार्यरत रहता है। 2. मेष-सिंह-धन : मेष-सिंह-धनु राशि का हर्षल धन स्थान में हो तो जातक कोर्ट-कचहरी एवं किसी को जमानत कराने से या साझेदारी के कारण धन व्यय करता है। गरु या शक्र के अंशात्मक योग में हर्षल होने पर वसीयत से या दत्तक विधान के कारण आर्थिक लाभ होता है। अशुभ योग में स्थित हर्षल आर्थिक तंगी रखता है। परिवार में अपमृत्यु होती है। कोई परिवारो सदस्य पागल होता है या उसे वास्तुदोष रहता है। उकर्क-वृश्चिक-मीन : कर्क-वृश्चिक-मोन में से किसी राशि का हल धन स्थान में हो तो जातक की आंखें बडी और तेज होती हैं। पीड़ित हर्षल के कारण जातक व्यसनी बनता है। धन स्थान में हर्षल अशुभ फलदायी होता हा शुक्र के शुभ योग में हर्षल हो तो जातक संगीत, नाट्य, वादनकला में प्रवीण होता है।4. वषभ-कन्या-मकर : वभष-कन्या-मकर में से किसी राशिका धन स्थान में हो तो वह शुभ फलदायी नहीं होता। बड़े आर्थिक खर्च कारण मानहानि एवं बदनामी होती है। नौकरी में पैसे के व्यवहार के कारण का रहना पड़ता है।
राशिगत फल 1. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन-तुला-कुंभ राशि का हर्षल तृतीय स्थान में हो तो जातक प्रथम श्रेणी का बुद्धिमान होता है। नाटककार, कवि एवं लेखक के रूप में नाम कमाता है। 2. मेष-सिंह-धनु : मेष-सिंह-धनु में से किसी भी राशि का हर्षल तृतीय स्थान में हो तो जातक को मां एवं बहन के सुख में न्यूनता प्राप्त होती है। भाई या बहन की जिम्मेदारी जातक के कंधों पर आती है। मैदानी खेलों में प्रवीण रहता है। नौकरी-व्यवसाय में परिवर्तन होते हैं। 3. कर्क-वृश्चिक-मीन : कर्क-वृश्चिक-मीन में से किसी भी राशि का हर्षल तृतीयस्थ हो तो जातक को अपना मकान बार-बार बदलना पड़ता है। धंधे-व्यवसाय में परिवर्तन होते हैं। परिवार में झगड़े होते हैं, कोई विपत्ति आती है। जातक चंचल एवं भावनाप्रधान, चिडचिडा एवं शिकायती स्वभाव का होता है। हस्तसामुद्रिक या फलित ज्योतिषी की हैसियत से नाम कमाता है।
वषभ-कन्या-मकर: वृषभ कन्या-मकर में से किसी भी राशि का जल ततीय स्थान में हो तो जातक विचित्र स्वभाव का होता है, एकाकी और अंधभक्त होता है।
राशिगत फल 1. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन-तुला या कुंभ राशि में से किसी एक राशि का हर्षल चतुर्थ स्थान में हो तो वैवाहिक सुख में न्यूनता रहती है। शुक्र के शुभ योग में शुक्र चतुर्थ स्थान में हो तो विविध कलाओं के क्षेत्र में प्रगति होती है। चतुर्थस्थ हर्षल बुद्धिमत्ता की दृष्टि से शुभदायी रहता है। 2. मेष-सिंह-धनु : मेष-सिंह या धनु में से किसी भी राशि का हर्षल चतुर्थ स्थान में हो तो अत्यधिक अशुभ फल प्राप्त होते हैं। माता का देहावसान, बंधन योग, नौकरी में दबकर रहना, जायदाद में धोखा, भाइयों में अनबन एवं अलगाव, जन्म स्थान में भाग्योदय न होना आदि अशुभ फल प्राप्त होते हैं। 3. कर्क-वृश्चिक-मीन : कर्क-वृश्चिक या मीन में से किसी भी राशि में हर्षल होकर वह चतुर्थ स्थान में बैठा हो तो जातक के जीवन में स्थिरता नहीं आती। पीड़ित हर्षल बंधन योग, कोर्ट-कचहरी करवाता है एवं सजा दिलाता है। 4. वृषभ-कन्या-मकर : वृषभ-कन्या या मकर राशि में से किसी राशि का हर्षल चतुर्थ स्थान में हो तो जातक शंकालु एवं जिद्दी होता है। बाल-बच्चा समतभेद रहते हैं। हस्तकला, बुनाई-कढ़ाई एवं अन्य हस्तकला में प्रगति होती है।
राशिगत फल 1. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन-तुला-कुंभ राशियों में से किसी एक राशि का हर्षल पंचम स्थान में हो तो कई दिक्कतों के बाद जातक की शिक्षा पूर्ण होती है किंतु शिक्षा का जीवन में उपयोग नहीं होता। समाज में जातक को सम्मान मिलता है। संतान होशियार रहती है। परदेशगमन का योग बनता है। प्रिंटिंग (मुद्रण) एवं उससे संबंधित क्षेत्र से जातक संबंद्ध होता है। 2. मेष-सिंह-धन : मेष-सिंह-धन राशि में से किसी भी राशि का हर्षल पंचम स्थान में हो तो संतान के लिए अशभ फलदायी होता है। संतान को अपघात या अन्य कष्ट सहने पड़ते हैं। जातक को मस्तिष्क की विकृति, निद्रानाश का कष्ट रहता है। एकाध संतान को शारीरिक विकार रहता है। 3. कर्क-वृश्चिक-मीन : कर्क-वश्चिक-मीन राशि में से किसी एक राशि का हर्षल पंचम स्थान में हो तो जातक के विद्या अध्ययन में बाधा आता है। शुक्र या चंद्र के शुभ योग में हर्षल पंचम स्थान में हो तो लड़का या लड़का किसी कला में प्रवीण होती है। वृषभ कन्या-मकर । वृषभ कन्या मकर में से किसी राशि का हर्पल में यह हल नपुंसक रहता है। पंचम स्थान में हो तो वा कम शुभ फलदायी होता है। फल देने के विषय व स्थान
राशिगत फल 1. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन-तुला-कुंभ राशि में से किसी एक राशि का हर्षल षष्ठ स्थान में हो तो जातक को फेफड़ों के रोग, कफ एवं वात विकार हाते हैं। पुराना ज्वर, पीलिया एवं अन्य उष्णताजन्य विकार भी उत्पन्न होते है। ऐसे जातक बीमारी के बाद काफी संवेदनशील होते हैं। इसलिए आबोहवा के लिए जगह बदलने से जातक की तंदरुस्ती में सुधार होता है। 2. मेष-सिंह-धन : मेष-सिंह-धन राशि में से किसी एक राशि का हर्षल षष्ठ स्थान में हो तो जातक को बचपन में ज्वर-पीडा रहती है। विघ्न एवं दिक्कता के कारण कोई काम पर्ण नहीं होता। बीच-बीच में आर्थिक नुकसान मा हाता है। ननिहाल पक्ष में कोई पागल होता है एवं किसी की अपघाती मौत होती है या जातक आत्मघात कर लेता है। ३. कक-वृश्चिक-मीन : कर्क-वश्चिक-मीन राशि में से किसी एक राशि का हर्षल पष्ठ स्थान में हो तो जातक का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता की कोई-न-कोई शारीरिक कष्ट रहता है। हृदयरोग, फेफड़ों की बीमारी, ला रोग, गप्त बीमारियां, पथरी, बवासीर इत्यादि उत्पन्न होने की अधिक संभावना रहती है। ___4. वृषभ-कन्या-मकर : वृषभ-कन्या-मकर राशि में से किसी एक राशि का हर्षल षष्ठ स्थान में हो तो नेत्रपीड़ा, नाक की हड्डी बढ़ना, गले के विकार, अतिसार, संग्रहणी, अवयव के विकार, पेट दुखना, जोड़ों का दर्द, वात विकार या स्नायु पीड़ा उत्पन्न होती है।
राशिगत फल 1. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन, तुला, कुंभ में से किसी एक राशि का हर्षलसप्तम स्थान में हो तो जातक का विवाह विलंब से होता है। विवाह में विलंब होना वैवाहिक सुख की दृष्टि से प्रतिकूल होता है। पति या पत्नी एक-दूसरे पर रौब जमाने की कोशिश करते हैं। स्वभाव विचित्र रहता है। पत्नी सुंदर, शिक्षित एवं कलाप्रेमी होती है। उसके शौक के कारण गृहस्थी में उसकी रुचि नहीं रहती। कुंभ राशि का हर्षल सप्तम स्थान में हो तो विवाह विलंब से यानी उम्र के 32 से 35 वर्ष के बाद होता है। पुनर्विवाह या द्विभार्या योग भी सप्तमस्थ हर्षल के कारण बनता है। 2. मेष-सिंह-धनु : मेष, सिंह, धनु राशि का हर्षल सप्तम स्थान में हो तो वैवाहिक जीवन क्लेशपूर्ण रहता है। अन्य अशुभ योग हो तो यह हर्षल मतभिन्नता, स्वभाव वैचित्र्य, अस्वस्थता, संतान का अभाव जैसे कारणों से जीवनभर वैवाहिक सुख में न्यूनता रखता है। 3. कर्क-वृश्चिक-मीन : कर्क, वृश्चिक, मीन में से किसी एक राशि का हर्षल सप्तम स्थान में हो तो हर्षल के अशुभ परिणाम सौम्य रहते हैं। पति या पत्नी को एकाध दीर्घ बीमारी होती है। विवाह विलंब से होता है। विवाह निश्चित होते समय परेशानी रहती है। विवाह में कोई विचित्र बात रहती है। 4. वृषभ-कन्या-मकर : वृषभ, कन्या, मकर में से किसी एक राशि का हर्षल सप्तम स्थान में हो तो पति या पत्नी का स्वभाव क्रूर रहता है। पत्नी में संग्रह करने की प्रवृत्ति रहती है। वृषभ राशि का हर्षल सप्तम स्थान में हो तो पत्नी सुंदर मिलती है। विवाह आकस्मिक रूप से निश्चित होता है। पति-पत्नी एक-दूसरे पर रौब झाड़ते हैं।
राशिगत फल 1. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन, तुला, कुंभ में से किसी एक राशि का हर्षल अष्टम स्थान में हो तो जातक को रक्तचाप, हृदय विकार, वायुविकार या मूत्राशय के विकार उत्पन्न होते हैं। मंगल के अशुभ योग में स्थित हर्षल आकस्मिक रूप से अशभ घटना को जन्म देता है। जातक के हाथों किसी का खून होता है। फलस्वरूप उसे सजा भोगनी पड़ती है।
2. मेष सिंह धनु । मेष, सिंह, धनु में से किसी एक राशि का हर्षला स्थान में हो तो उसके अशुभ फल प्राप्त होते है। बढ़ती उम्र में आर्थिक स्थिति डांवाडोल रहती है। जमीन पर चलनेवाले एवं अन्य जीव-जंतु एवं जानवरों से नाट होते है। 3. कर्क-वृश्चिक-मीन: कर्क, वृश्चिक, मीन में से किसी एक राशि का हर्षल चंद्र के या अन्य पाप ग्रहों के अंशात्मक अशुभ योग में हो तो जातक को पानी से भय रहता है। त्वचा रोग भी उत्पन्न होते हैं। 4. वृषभ-कन्या-मकर : वृषभ, कन्या, मकर में से किसी एक राशि का हर्षल अष्टम स्थान में हो तो धन लाभ होता है। अशुभ योग में हर्षल हो तो धन नाश होता है। धन लोभ के कारण दुर्घटना होती है।
राशिगत फल 1. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन, तुला, कुंभ में से किसी एक राशि का हर्षल नवम स्थान में हो तो जातक बुद्धिमान होता है। किसी क्षेत्र में संशोधन या चिकित्सापूर्ण लेखन जातक के हाथों द्वारा होता है। शुक्र या बुध के शुभ योग में हर्षल होने पर नवमस्थ हर्षल लेखन कार्य में यश देता है। दूर प्रवास के योग बनते हैं। 2. मेष-सिंह-धनु : मेष, सिंह, धनु में से किसी एक राशि का हर्षल नवम स्थान में हो तो जातक धर्म, परंपरा, ईश्वर एवं संस्कृति पर विश्वास नहीं रखता। दंभ, अगुवा विचार एवं अहंकार आदि हर्षल के सामान्य फल हैं। 3. कर्क-वृश्चिक-मीन : कर्क, वृश्चिक, मीन राशियों में से किसी एक राशि का हर्षल नवम स्थान में हो तो जातक घुमक्कड रहता है। नवमस्थ हर्षल विवाह के बाद भाग्योदय करता है। जातक की पारमार्थिक विषयों में रुचि रहती है। 4. वृषभ-कन्या-मकर : वृषभ, कन्या, मकर राशि में से किसी एक राशि का हर्षल नवम स्थान में हो तो जातक अनेक उद्योग करता है। किंतु हर्षलशुभ गहों के शुभ योग में हो तो उसे व्यवसाय में यश प्राप्त होता है। यही हर्षल अशभ योग में हो तो व्यवसाय में व्यापक परिवर्तन होते हैं। व्यवसाय का दिवाला पिट जाने तक की नौबत आती है।
राशिगत फल 1. वृषभ-सिंह-वृश्चिक-कंभ : वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ राशियों में स किसी एक राशि का हर्षल दशम स्थान में हो तो जातक हुनरवाला, कमकुशल किंतु स्वार्थी रहता है। जातक कुशाग्र बुद्धि का एवं कुछ दिव्य-भव्य करने की तमन्ना रखनेवाला होता है। सूर्य, गुरु, मंगल के शुभ योग में दशम स्थान में स्थित हर्षल हो तो जातक असामान्य क्षेत्र में नाम कमाता है। पापग्रहों के कयोग में स्थित हर्षल जातक की बदनामी करवाता है। दशमस्थ शाह लेखन एवं संशोधन कार्य में जातक को आगे ले जाता है। जातक का साहित एवं शिक्षा के क्षेत्र से संबंध रहता है। 2. मेष-सिंह-धनु : मेष, सिंह, धनु राशि में से किसी एक राशि का हर्षल दशम स्थान में हो तो जातक बड़ा अधिकारी बनता है। संघटन, क्रांतिकारी प्रवृत्तियां आदि में अगुआ रहता है। लोगों से काम करवाने की कला में वह पारंगत होता है। 3. मिथुन-कन्या-तुला-कुंभ मिथुन, कन्या, तुला, कुंभ में से किसी राशि का हर्षल बुध, गुरु के शुभ योग में रहकर दशम स्थान में हो तो जातक खगोलशास्त्र, मानसशास्त्र, योगशास्त्र, गणितशास्त्र एवं फल ज्योतिषशास्त्र में अच्छी प्रगति करता है।
राशिगत फल 1. मेष-सिंह-धनु : मेष, सिंह, धनु में से किसी भी राशि में स्थित हर्षल एकादश स्थान में हो तो जातक सहकारिता एवं शैक्षणिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करता है। 2. मिथुन-तुला-कुंभ : मिथुन, तुला, कुंभ राशि में से किसी एक राशि का हर्षल एकादशस्थ हो तो जातक की शिक्षा अधूरी रहती है। धार्मिक एव आध्यात्मिक क्षेत्र से जातक जुड़ा रहता है।वषभ-कन्या-मकर: वृषभ, कन्या, मकर में से किसी एक राशि का ल एकादश स्थान में हो तो वह महत्त्वपूर्ण शुभ फलदायी नहीं रहता।
पाश्चात्य ज्योतिष में प्रजापति को जाग्रति द्योतक और प्रेरणा शक्ति का अनुपम गृह माना गया है भारतीय ज्योतिष में इसे प्रजापति, ब्रम्हा, वारुनी, वरुण इंद्रा आदि अनेक नाम दिए है इसकी स्व राशि कुम्भ उच्च राशि वृश्चिक तथा नीच राशि वृष है यहाँ वायु तत्वीय राशियों जैसे मिथुन तुला व् कुम्भ पर बलवान माना गया है शनि व् चंद्र से इसकी शत्रुता है किन्तु बुध गुरु सूर्य शुक्र मित्र ृह है यह विकास और प्रगति का प्रतीक गृह है यहाँ अत्यधिक प्रगतिशील गृह है और मस्तिष्क व् नाड़ी मंडल पर प्रभाव डालता है
इस गृह स्वच्छंदता चरित्र बल असाधारण बुद्धि और संघर्ष शक्ति का आभास होता हैिकता विषमता आकस्मिक उठान और पतन का कारक है यह शोध का कारक है, विधुत लोकव्यवहार, सिनेमा हड़ताल क्रन्तिकारी विचारो के नियंत्रण, इंजीनियरिंग मैकेनिकल रिसर्च ज्योतिष तंमंत्र यन्त्र और गूढ़ विद्या अध्यरंगत और विलक्षण ज्ञान का द्योतक है
यह 1,5,6,8,10,11...भावो में उत्तम फल देता है, हर्षल की मेष सिंह धनु पर अनुकम्पा होती है यह व्यक्ति को कांशी साहसी और धीर घंभीर स्वाभाव का बनता है कर्क वृश्चिक मीन में अनिष्ट फल देकर भी दुस्ट प्रकृति का बनाता है
हर्षल के प्रभाव से ही भूकंप तूफान भूचाल आदि आपदाये आती है जाहजों का डूबना बेम विस्फोट रेडियो वायुयान टेलीविज़न कंप्यूटर IT बिजली रेलवेज पर हर्षल का स्पस्ट प्रभाव होता है इसके गुण शनि की भाति है चंद्र हर्षल से जो योग बनते है उन्हें अचानक मृत्यु की दुर्घटना कहा जाता है हर्षल सूर्य के सम्बन्ध पंचम सप्तम योग से प्रेका योग बनता है अंक ज्योतिष में इसको 4 अंक मिला है अप्रैल महीने एवं चर्तुर्थी तिथि को हर्षल का ही प्रभाव होता है यहाँ संघर्ष प्रधान जीवन का दाता है इससे प्रभावित जातको कय बोहोत कोमल और मृदु होता है और जीवन में आकस्मिकता का प्रभाव हर्षल ही देता इससे प्रभावित जातक बहुशात्रुवादी किन्तु ु परास्त करता होतके उल्हंगन करता और कानुन और नियमोंके जानने वाले होते है ऐसे जातक स्वार्थी होते है और अर्थ संग्रह करनेवाले होते है हर्षल गृह पितृ और मातृ सुख में कमीर पुत्र सुख रहित होते है यह रत्न नीलम लैपिज़ लाजुली खाकी फ़िरोज़ा श्रेष्ठ रहता है हर्षल प्रभावित व्यक्तियों के लिए गणेश चतुर्थी और सोमवार का व्रत श्रेष्ठ
यूरेनस और ज्योतिष:
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अरुण (हर्शल/यूरेनस) का भाव फल
भाव विचार- यह ग्रह पांचवें, नौवें, दसवें व ग्यारहवें स्थान में शुभ फल देता है और अन्य स्थानों में अशुभ फल देता है। यदि लग्न में हर्षल हो तो मनुष्य विलक्षण स्वभाव का होता है परन्तु यदि मिथुन, तुला व कुंभ राशि का हो तो तीव्र बुद्धि और अन्वेषण करने वाला बनाता है। द्वितीय भाव में हो तो परिवार सुख के लिए प्रतिकूल और अशुभ राशि का हो तो द्रव्य हानि कराता है। तृतीय भाव में भ्रातृ सुख, बहुधा स्थानान्तरण और यांत्रिक वाहन से प्रवास का योग बनाता है। यदि हर्षल चतुर्थ भाव में होता है तो शत्रुओं की संख्या बढ़ाता है और जीवन के उत्तरार्द्ध में द्रव्य हानि और भूमि संबंधी कलह देता है। पंचम भाव में संतति प्रतिबंध अथवा संतति हानि या संतति सुख का अभाव देता है। षष्ठम भाव में मातुल (मामा) के सुख का अभाव व रोग वृद्धि देता है। सप्तम भाव में वैवाहिक, दाम्पत्य सुख का नाश और बाहरी लोगों से संबंध बनाता है। अष्टम में आकस्मिक मृत्यु। नवम भाव में धार्मिक संस्था से संबंध। ग्यारहवें भाव में संस्थाओं से अच्छा संबंध बनाता है। बारहवें भाव में द्रव्य हानि, ऋण योग और शत्रुओं से कष्ट प्राप्त कराता है।
प्रथम स्थान (लग्न भाव)
दैवज्ञ विद्याओं का ज्ञाता, दर्शन, धर्म, अध्यात्म में रुचि, स्वतंत्रता का उपासक, एकांत प्रेमी, लंबा कद, वैवाहिक जीवन में कटुता, तीर्थ यात्राओं, पहाड़, समुद्र की यात्राओं का प्रेमी।लग्न में अरुण की स्थिति से जातक सनकी, उधेडबुन में लगे रहने वाला, उद्विग्न मन, नये प्रयगो मे रुचि लेने वाला, कुछ ज़िद्दि, हठि होता है, उसमे अंतर प्रग्या व बुद्धि विशेश मात्रा मे होति है, बोहोत शिश्ट और मैत्रि पूर्न व्यवहार करता है पाश्चात्य ज्योतिषी हर्षल ग्रह से काफी प्रभावित हैं। वर्तमान समय के महत्त्वपूर्ण संशोधनों एवं आध्यात्मिक प्रवाह का कारण हर्षल ही है।' यह उनकी धारणा है। हर्षल के फलित विषय में अनेक ग्रंथ अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित अंग्रेजी ग्रंथों के अनुसार हर्षल का फलित असाधारण एवं विलक्षण है। इस ग्रह की स्थिति शनि ग्रह जैसी होने से जिस राशि में शनि बलवान हो, उसी राशि का हर्षल बलवान माना जाता है। इस आधार पर कुंभ राशि को स्वराशि का स्वक्षेत्र एवं मीन राशि में वह उच्च का माना गया है। इसके अतिरिक्त तुला एवं मिथुन राशि में भी हर्षल के फलित शनि जैसे ही प्राप्त होते हैं। लग्न से 1, 3, 5, 7, 9, 10 स्थानों में हर्षल का प्रभाव विशेषरूप से अनुभव में आता है। जन्मकुंडली में जिस भाव में यह ग्रह हो उस भाव के फलित में यह ग्रह विलक्षणता दिखाता है। उदाहरणार्थ षष्ठ स्थान रोग का स्थान है। यहां हर्षल होने से जातक विलक्षण रोगी होता है। उसके रोग का कोई निदान नहीं होता। अष्टम स्थान मृत्यु का स्थान है। इस स्थान में हर्षल हो तो जातक की मृत्यु आकस्मिक रूप से होती है। धन स्थान-परिवार स्थान द्वितीय स्थान में हर्षल हो तो जातक की आर्थिक स्थिति एवं पारिवारिक जीवन सुचारू नहीं होता। इसी तरह दशम स्थान-राज्यभाव आजीविका भाव में हर्षल हो तो जातक आकस्मिक रूप से उच्च पद पर आसीन होता है या जातक बारबार अपनी नौकरी-व्यवसाय बदलता है। बारहवें स्थान यानी व्यय स्थान में हर्षल हो तो जातक के व्यवसाय का अचानक दिवाला पीट जाता है। भय, आकस्मिक आर्थिक नुकसान आदि फल भी उसे प्राप्त होते हैं। मेष या वृश्चिक राशि का हर्षल विशेष रूप से अशुभ फल प्रदान करता है। जन्मलग्न में 5, 8, 10, 11 स्थानों में हर्षल शुभ फलदायी होता है, तीव्र, बुद्धिमत्ता, उच्च शिक्षा, उच्च स्थान पर पदोन्नति, आकस्मिक लाभ होते हैं। अन्य स्थानों में हर्षल अशुभ फलदायी होता है। मीन का हर्षल लग्न में हो तो उसके शुभ फल प्राप्त होते हैं। बुध, गुरु, शुक्र एवं नेपच्यून ग्रहों से हर्षल की मैत्री होने से इन ग्रहों के साथ रहने पर हर्षल शुभ फलदायी होता है। सूर्य, चंद्र, मंगल एवं राहु के साथ हर्षल की शत्रुता होने से, इन ग्रहों के साथ होने पर वह अशुभ फलदायी होता है। शनि के साथ हर्षल हो तो समभाव रहने से हर्षल शनि के फल देता है। इन नियमों का अध्ययन करके, ग्रहों का बलाबल देखकर तारतम्य से हर्षल का फलित देखना चाहिए। लग्न में अरुण होने पर जातक उद्विग्न मन, नये प्रयोगों में रुचि लेने वाला, निरन्तर उधेड़बुन में लगे रहने वाला, थोड़ा सनकी व हठी होता है। निश्चय ही वह अन्तर्पज्ञा का धनी तथा बहुत बुद्धिमान होता है। कोई जातक विद्रोही स्वभाव का, अन्तर्मुखी, निराशावादी तथा दांपत्य जीवन में अलगाव पाने वाला होता है।
द्वितीय स्थान (धन भाव)
भाग्योदय में अवरोध, लेखा कार्यों में तथा बैंक आदि के ऑडिट कार्यों से लाभ, रेलवे, प्रेस से लाभ । शोधकर्ता, वैज्ञानिक व धन के क्षेत्र में अचानक उत्थान-पतन व अचानक मृत्यु।द्वितीय भाव में अरुण की स्थिति धन संपदा की स्थिति में उतार चढ़ाव देती है। जातक सट्टेबाजी व जोखिम वाले, संदिग्ध कार्यो में पैसा फंसा देता है। बहुधा लीक से हटकर, नया करने की धुन में भूल कर बैठता है। बिना सोचे समझे धन का लेन देन करता है व पैसा पास में न होने पर भी योजना में धन निवेश का आश्वासन देकर मुसीबत में फंस जाता है। द्वितीय स्थान में हर्षल हो तो जातक धनलोभी होता है। ऐसा जातक शेयरों, रेस, सट्टा बाजार एवं लॉटरी के मोहजाल में न फंसे तो आश्चर्य हो होगा। द्वितीय स्थान का शुभ हर्षल धन देता है किंतु अशुभ योग में हो तो आर्थिक स्थिति डांवाडोल करता है। यह हर्षल नेत्रदोष एवं वाणीदोष उत्पन्न करता है। जातक को पतक सुख प्राप्त नहीं होता। कोर्ट-कचहरी में जाना पड़ता है। झगड़े-मुकदमे में फस जाता है। जायदाद में अपघात या अपशकुन होते हैं एवं उसके कारण क्लेश होते है. बड़े-बड़े सांपत्तिक उतार-चढ़ाव इसी हर्षल के कारण होते हैं। द्वितीय भाव में अरुण धन संपदा की स्थिति में उतार-चढ़ाव देता है। जातक सट्टेबाजी व जोखिम भरे कार्यों में पैसा डुबो देता है। धन के लेन-देन में असावधानी तथा पैसा पास में न होने पर भी धन निवेश का आश्वासन कमी बड़ी मुसीबत पैदा करता है। कभी ऐसा जातक आकस्मिक रूप से बहुत लाभ तथा हानि पाता है।
तृतीय स्थान (सहज भाव)
अचानक समुद्र व पहाड़ की यात्राएं, परिवार में लड़ाई-झगड़ा, बुद्धिमान, प्रेस, टेलीविजन, पत्रिकाओं में सफलता तथा भाई-बहनों से हानि।तृतीय भाव में अरुण की स्थिति बेचैनी, अव्यवहारिकता परिवर्तनशीलता या लक्ष्य हीनता देती है। ऐसे जातक हानि उठाकर (ठोकर खाकर) अपने अनुभव से सीखने में विश्वास रखते हैं। ये मौलिक चिंतक, अनुसंधान व शोध में रुचि लेने वाले, प्रतिभा संपन्न व्यक्ति होते हैं। कभी जोवन के मध्य भाग तक पहुंचने पर, इनके आचार व्यवहार व जीवन शैली में परिवर्तन आ जाता है। ततीयस्थ हर्षल बड़े पैमाने पर शुभ फल प्रदान करता है। उत्तम अंतर्जान शक्ति, तर्कशक्ति एवं मन की एकाग्रता साधने की कला यह हर्षल ही जातक को प्रदान करता है। सूर्य, चंद्र एवं बुध के अंशात्मक शुभ योग में हर्षल हो तो यह हर्षल काव्यशक्ति, स्फूर्ति एवं कल्पनाशक्ति देता है। मिथुन, तुला या कुंभ राशि का हर्षल गुरु या शुक्र के अंशात्मक शुभ योग में हो तो जातक साहित्य सेवी, लेखक एवं विचारशील रहता है। ऐसे जातक को कोई-न-कोई शौक होता है। निठल्लापन इसे अच्छा नहीं लगता। फोटोग्राफी, रंगकला, टिकिटों का संग्रह करना, वाद्यवादन में से एक शौक जरूर रहता है। मित्र समुदाय विशाल रहता है। गूढ़शास्त्र के विषय में जिज्ञासा एवं प्रेम रहता है। सामुद्रिकशास्त्र एवं ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन उत्तम रहता है। पीड़ित हर्षल सहोदरों के सुख में न्यूनता उत्पन्न करता है। पीठ पर जन्मे भाई-बहन को दीर्घकालीन बीमारी होना, अपघात होना एवं उनके विषय में बुरा घटित होना ऐसे अशुभ फल प्राप्त होते हैं। आकस्मिक रूप से काफी प्रवास होता है। कान और मस्तिष्क को चोट पहुंचती है। अचानक आर्थिक नुकसान होता है। तृतीय भाव में अरुण जातक को बेचैनी तथा लक्ष्य से भटकाव देता है। वह अव्यावहारिक तथा परिवर्तनशील होता है तथा अपने अनुभव से सीखने में विश्वास रखता है। वह मौलिक चिंतन, अनुसंधान या शोध में रुचि लेने वाला प्रतिभासंपन्न व्यक्ति होता है। ऐसा जातक साहसी, नेतृत्व गुणों से युक्त तथा पहल करने वाला होता है। जीवन के उत्तरार्ध में जातक के आचार व्यवहार तथा जीवन शैली में महान परिवर्तन आ जाता है।
चतुर्थ स्थान (सुख भाव)
विदेश यात्रा, विदेश प्रवास में धन लाभ व भाग्योदय । घर में किसी की अचानक मृत्यु, बाढ़, भूकंप, आग से सम्पत्ति की हानि, प्राकृतिक प्रकोप, विवाह-विच्छेद, वियोग।चतुर्थ भाव में अरुण, जातक को चंचल व अस्थिर मन बनाता है। उसका पर्यटन प्रेम कभी उसे खानाबदोश सरीखी जिन्दगी दिया करता है। घर बदलना या कहां भी जाकर बस जाना उसकी विशेषता होती है। प्रायः चतुर्थ स्थान में हर्षल शुभ फलदायी नहीं होता। चतुर्थ स्थान में पापग्रहमुक्त या पापग्रहयुक्त हर्षल हो तो माता को कोई मानसिक बीमारी होती है। उदरशूल, अल्सर, कैन्सर, दमा एवं अन्य दीर्घकालीन रोग होते हैं। माता-पिता दोनों में मनमुटाव रहता है। अशुभ योग में स्थित हर्षल के कारण मां सौतेली होती है। निवास के लिए पुराना मकान मिलता है। मकान में जातक को हमेशा कष्ट होते हैं, मकान मालिक की आकस्मिक मृत्यु होती है। जायदाद को लेकर लड़ाई-झगड़े चलते हैं। ऐसा जातक निवास के लिए नई जगह खरीदे तो उसमें वास्तुदोष रहता है एवं वह जगह लाभकारी नहीं होती। ढलती उम्र में बाल-बच्चों से बनती नहीं, बड़े-बड़े परिवर्तन आते हैं। आर्थिक हालत बिगड़ती जाती है। जातक परावलंबी बनता है। चतुर्थ भाव में अरुण जातक को चंचल व अस्थिरमन बनाता है। उसका भ्रमणशील स्वभाव, कभी खानाबदोश सरीखी जिन्दगी देता है। जल्दी-जल्दी घर बदलना या कहीं भी जाकर बस जाना इसकी विशेषता होती है। कोई जातक माता, मकान, भू संपदा तथा वाहन संबंधी परेशानियाँ पाता है। उसका मन सदा अशान्त रहता है।
पंचम स्थान (सत भाव)
संतान हानि व संतान पक्ष को कष्ट, पेट में दर्द, शिक्षा में रुकावट, गर्भपात, नवीन खोज, अनैतिक प्रेम संबंध, रेस, सट्टा, लॉटरी एवं शर्त में धन हानि, किसी से विश्वासघात (धोखा)।पंचम भाव में स्थित अरुण जातक को परंपरा से हटकर जोखिम भरे कार्यों के प्रति आकर्षण या रुचि देता है। असामान्य व्यक्तियों से उसकी मैत्री होती है। कभी ये लोग, उन्मुक्त यौन संबंध अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के फेर में पड़कर, मुसीबत में फंस जाते है। रहने वाला, उद्विग्न मन, नए प्रयोगों में रूचि लेने वाला, कुछ जिद्दी या हठी होता है। उसमें अतप्रज्ञा व बुद्धि विशेष मात्रा में पंचम स्थान में स्थित ह स्थान में स्थित हर्षल बुद्धिमत्ता की दृष्टि से शुभ फलदायी होता है। विदता दर्शाता है। शिक्षा मर्य, शनि या मंगल भी रहती है। पंचमस्थ किसी भी राशि का हर्षल पंचम स्थान में हो तो वह विद्वता दर्शाता है। पूर्ण करने की जिद जातक में होती है। पंचम स्थान में सूर्य, शनि या के अशुभ योग में हर्षल पंचम स्थान में हो तो शिक्षा अधूरी रहती है। पंचा हर्षल के कारण विशेष रूप से संतान बुद्धिमान किंतु चंचल रहती है। लड़के या लड़की की उच्च शिक्षा में प्रगति होती है। दूषित या पीडित । का खत या पाड़ित हर्षल पंचम स्थान में हो तो एकाध लड़के-लड़की में शारीरिक दोष या विकार रहता है। स्त्री जातक की जन्म कुंडली में पापग्रह दृष्ट या अन्य कारणों से पीडित हर्षल पंचम स्थान में होने से अशुभ फलदायी होता है। गर्भ-विकृति, उदररोग अपूर्ण संतान, दो संतानों में काफी अंतर होना, एकाध लड़के के मस्तिष्क में विकृति रहना, संतानविहीन रहना, दीर्घकालीन बीमारी होना, एकाध लड़के-लड़की को अपघात होना आदि अशुभ फल पंचमस्थ पीडित हर्षल के प्राप्त होते हैं। पंचम स्थान में गुरु या शुक्र के अंशात्मक योग में हर्षल हो तो जातक को रेस, शब्द प्रतियोगिता, शेयरों एवं अन्य अकस्मात धनप्रदायक विषयों में रुचि रहती है। पंचमस्थ हर्षल बुध, शुक्र, चंद्र या सूर्य के शुभ योग में हो तो जातक बुद्धिजीवी बनता है। मंगल, सूर्य या शुक्र के शुभ योग में होने पर वह खेलकूद में प्रवीण होता है। पंचम स्थान में शुक्र या हर्षल हो तो जातक प्रेम-विवाह करता है। पंचमस्थ हर्षल गूढ़ शास्त्र, तंत्र-मंत्र या उपासना में जातक की प्रगति कराता है। पंचम भाव में अरुण जातक को जोखिम भरे कार्यों में रुचि देता है। उसके मित्र भी विचित्र या असामान्य प्रकृति के होते हैं। उन्मुक्त यौन संबंध, स्वेच्छाचार अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन, उसे प्रायः मुसीबत में डाल देता है। मतान्तर से ऐसा जातक, जुआ, सट्टा या लाटरी का शौकीन तथा उलटी सोच वाला होता है। उसके बच्चे निश्चय ही बुद्धिमान व कार्य कुशल डालता होते हैं।
शश्ट् भाव
पागलपन, स्नायु मंडल में कमजोरी, रोगी, अधिनस्थ लोगों से अनबन, लंबी बीमारी, बीमारी इलाज वाली नहीं।षष्ठ भाव में अरुण होने से जातक, इलैक्ट्रानिक्स, इन्जीनियरिंग व 306 होती है, कभी वो बहुत शिष्ट व मैत्री पूर्ण व्यवहार भी करता है। (शबुभाव) पष्ठ स्थान में पापग्रह शुभ फलदायी होता है, यह ज्योतिषशास्त्र का संकेत है, किंतु हर्षल इस नियम के लिए बड़ा अपवाद है। यह हर्षल पापग्रह होने बावजूद भी षष्ठ स्थान में शुभ फलदायी नहीं होता। पाठस्थ हर्षल कछ शाहों के साथ होने पर शुभ फल प्रदान करेगा। षष्ठ स्थान रोग का स्थान है। अकेला हर्षल रोग स्थान में बैठकर रोग पैदा नहीं कर सकता। सूर्य, चन्द्र, मंगल एवं शनि ग्रहों में से किसी एक ग्रह के साथ हर्षल का अशुभ योग हो तो पीड़ित हर्षल जातक के शरीर में दीर्घकालीन रोग उत्पन्न करेगा। संग्रहणी, अवयवों के विकार भी से होते हैं। पाश्चात्य ज्योतिषविदों के मतानुसार पष्ठस्थ हर्षल तरह-तरह के 'नर्वस डिसऑडर' करता है। कुछ मानसिक रोग भी उत्पन्न करता है। बीमारी के दौरान आवश्यक सहनशीलता जातक में नहीं रहती। किंत विद्यत । उपचार (अल्ट्रावायलट थ्योरी) के उपचार कारगर सिद्ध होते हैं। आकस्मिक रूप से उद्भव होनेवाले 'अपेंडिसाइटिस' या अर्धाग वायुरोग जातक के लिए कष्टकारक सिद्ध होते हैं। घर में बड़ी चोरी होना, अपघात होना, नौकरी में बाधा आना ये फल पष्ठस्थ हर्षल के हैं। षष्ठ भाव में अरुण जातक को इलैक्ट्रोनिक्स तथा औषधि विज्ञान में नई तकनीक विकसित करने की प्रेरणा देता है। उसकी विश्लेषण शक्ति अदभुत होती है। मंडी रुझान अथवा उपभोक्ता की रुचि का आकलन करने में वह निपुण होता है। कभी ऐसा जातक निदान न हो सकने वाले जटिल रोग से कष्ट पाता है। निष्ठावान सहायक उसकी पूंजी होते हैं।
सप्तम स्थान (पति-पत्नी भाव)
साझेदारी से लाभ, शराब या नशे वाली किसी अन्य वस्तु के ठेके
से लाभ। अचानक पति-पत्नी में विरोध, तलाक, एक से अधिक प्रेम संबंध।सप्तम भाव में स्थित अरुण जातक को विवाह व दांपत्य जीवन के विषय में अजीबोगरीब विचार व मान्यताएं देता है। वह दोनो पक्षों की पूर्ण स्वतंत्रता, निर्बाध जीवन शैली व स्वेच्छा से प्रेम व सहयोग का समर्थन करता है। बहुधा उसकी जीवन शैली व कार्य क्षेत्र, समाज में उसे सम्मनित स्थान दिया करता है। यों तो ऐसे जातक मौलिक चिंतन व उदार मानवतावादी दृष्टिकोण के लिए प्रशंसा पाते हैं, किंतु जीवन में सफलता बहुधा इस बात पर निर्भर करती है कि, उन्होंने अपने अनुभवों से कितना सीखा व जाना है। कुंडली का सप्तम स्थान पति-पत्नी का स्थान है। वैवाहिक जीवन, व्यापार-उद्योग, साझेदारी का भी यह स्थान है। इन दोनों दृष्टियों से सप्तम स्थान में स्थित हर्षल के फल अशुभ फलदायी होते हैं। विवाह में विलंब होना, निश्चित विवाह न होना, विवाह का मुहूर्त आगे जाना, विवाह निश्चित करने के समय या बाद में होना जैसे फल सप्तमस्थ हर्षल के प्राप्त होते हैं। सप्तम स्थान में स्थित हर्षल पापग्रहों के अंशात्मक अशुभ योग में, युति योग में या प्रतियोग में हो तो विवाह होने के बाद भी वैवाहिक जीवन में व्यवधान आता है। आपस में वैचारिक मतभिन्नता होती है। पति-पत्नी की आपस में नहीं बनती या दोनों में से किसी एक की शारीरिक अस्वस्थता के कारण वैवाहिक सुख में न्यूनता आती है। ये फल सप्तमस्थ हर्षल के प्राप्त होते हैं। स्त्री जातक की कुंडली में सूर्य, शुक्र या चंद्र के अंशात्मक योग में हर्षल हो तो वैवाहिक जीवन कम सुखी होता है। सप्तमस्थ हर्षल शुक्र के अंशात्मक अशुभ योग में होने पर पत्नी या पति को शारीरिक विकार उत्पन्न होता है। पत्नी लड़-झगड़कर पति से अलग हो जाती है। उसका स्वभाव विचित्र रहता है। सप्तमस्थ हर्षल के कारण प्रेम विवाह होता है। परंतु वह सफल नहीं होता। सप्तम स्थान का हर्षल शुक्र के अंशात्मक योग में हो तो जातक स्त्रियों में रमण करनेवाला एवं कामातुर रहता है। सप्तमस्थ हर्षलवाले जातक साझेदारी में व्यवसाय न करें अन्यथा घाटा, लडाई-झगडे एवं मतभेद उत्पन्न होंगे। कोर्ट-कचहरी के कामों में ऐसे जातक सफल नहीं होते। मूत्राशय के विकार, किडनी में दोष उत्पन्न होना एवं गर्मी के विकारों के कष्ट जातक को भुगतने पड़ते हैं। सप्तम भाव में अरुण जातक को विवाह व दांपत्य जीवन के विषय बडी विचित्र सी अवधारणाएँ देता है। वह पूर्ण स्वतंत्रता तथा बंधनमुक्त, स्वच्छन्द जीवन शैली का समर्थक होता है। उसका चिंतन, मौलिक व दृष्टि- कोण, उदार व मानवतावादी होता है। कभी ऐसे जातक की पत्नी प्रतिभायुक्त, विदुषी तथा स्वावलंबी होती है। मतभेद या विचार विषमता को, यदि प्रभावशाली ढंग से सुलझाया नहीं गया, तो अलगाव या तलाक होना सहज संभव है।
अष्टम स्थान (मृत्यु भाव)
विवाह के उपरांत कष्ट व आर्थिक हानि, दुर्घटना में चोट, किसी की अचानक मृत्यु, सट्टा, रेस, लॉटरी, बीमा कंपनी से अचानक लाभ, हृदय व हृदय से संबंधित रोग।अरुण यदि अष्टम भाव में हो तो जातक रहस्य, रोमांस व गुप्त विद्याओं में रुचि लेता है। कभी अप्राकृतिक यौन संबंधों में उसकी रुचि होती है। प्रकृति के रहस्यों को जानने की प्रबल इच्छा, कभी उसे शारीरिक, मानसिक या आर्थिक रुप से हानि पहुंचा सकती है। कुंडली में अष्टम स्थान में हर्षल हो तो उसके अनिष्ट एवं अशुभ फल प्राप्त होते हैं। क्रूर नक्षत्र का हर्षल अष्टम स्थान में अपघात या अपघाती मृत्यु देता है। दूषित या पीड़ित हर्षल अष्टम स्थान में अपघात दर्शाता है। मृत्यु के समय चमत्कारिक या अनियमित स्थिति यह हर्षल ही पैदा करता है। वृषभ, कन्या, मकर राशि का हर्षल गुरु या शुक्र के शुभ योग में अष्टम स्थान में होने पर आकस्मिक धनलाभ कराता है। अष्टम भाव में अरुण जातक को रहस्य, रोमांच तथा गूढ विद्याओं में रुचि देता है। कोई जातक अप्राकृतिक यौन संबंध के कारण शारीरिक व मानसिक कष्ट पाता है। मतान्तर से अष्टमस्थ अरुण दुर्घटना, आर्थिक क्षति तथा अचानक अप्रत्याशित मृत्यु का कारक होता है।
नवम स्थान (भाग्य भाव)
लंबी यात्रा, विदेश यात्रा से कष्ट, ईश्वर में आस्था की कमी, धार्मिक कार्यों से हानि, किसी शोध संस्था एवं धार्मिक समाज सुधारक संस्था के संचालक पद पर चुनाव। नवमस्थ अरुण से जातक आदर्शवादी व दार्शनिक होता है। धर्म, राजनीति व शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार लाने में उसकी रुचि होती है। कोई असामान्य या विचित्र वस्तु उसे आकर्षित करती है। वह बिना सोचे समझे, झटपट निष्कर्ष निकाल लेता है। उसमें अनुशासन व संयम की कमी होती है, तथा सहज ही लक्ष्य से भटक जाता है। नवम स्थान में हर्षल शुभ फलदायी होता है। नवमस्थ हर्षल के कारण जातक ज्योतिष, तत्त्व ज्ञान एवं अन्य गूढ शास्त्रों में रुचि रखता है। सूर्य, चंद्र या नेपच्यून के शुभ योग में स्थित हर्षल नवम स्थान में होने पर जातक को जल पर्यटन एवं परदेश प्रवास के योग प्राप्त होते हैं। यही हर्षल अशुभ योग में होने पर जातक नास्तिक, दंभी होता है। अंतर्ज्ञान सूचक स्वप्न एवं दूर-दृष्टि के संबंध में नवमस्थ हर्षल के शुभ फल प्राप्त होते हैं। नवम भाव में अरुण जातक को आदर्शवादी व दार्शनिक बनाता है। धर्म, राजनीति व शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार लाने का वह इच्छुक होता है। उसमें अनुशासन व संयम की थोड़ी कमी होती है। कभी तो वह बिना कुछ सोच-विचार किए झटपट निष्कर्ष निकाल लेता है। ऐसा जातक विद्रोही व नास्तिक स्वभाव का होता है। पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों को वह हेय दृष्टि से देखता है किन्तु जन कल्याण व लोक हित के कार्यों में बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाला होता है
दशम स्थान (कर्म भाव)
साझेदार से मनमुटाव, साझेदारी में नुकसान, पत्नी से अनबन. किसी कार्य में बदनामी मिले, राज्य, राज्यकर्मचारी से हानि व विरोध, शिक्षक, समाज सुधारक, मेयर, प्रयोगशाला सहायक।दशम भाव में अरुण की स्थिति जातक को प्रतिभा संपन्न, दृढ़ निश्चयी,साहसी व परिश्रमी बनाती है। ये अपने कार्यक्षेत्र में तेजी से प्रगति करते हैं। भले ही अपने अधिकारियों से इनके कुछ मतभेद हो दशम स्थान कर्म स्थान हा दशम स्थान में हर्षल हो तो जातक नाम कमाता है। कछ भव्य-दिव्य या नवीन करके लोगों के सम्मुख लाना दशमस्थ हर्षल का काम है। दशम स्थान व अशुभ योग में स्थित हर्षल जातक का अंत करता है। अपघात या अन्य अशुभ स्थिति का निर्माण करता है। शभ ग्रहों के शुभ योग का हर्षल दशम स्थान में हो तो जातक का राज, धर्म, समाज, प्रसिद्धि माध्यम, प्रिंटिंग, नवमतवादी संप्रदाय एवं भौतिक शास्त्र में संशोधन एवं अन्य पुरोगामी विचारों से संबंध होता है। दशम स्थान में हर्षल हो तो जातक चंचल, अस्थिर बुद्धि का, घुमक्कड़ होता है। उसके विचार अगुवा एवं क्रांतिकारी रहते हैं। पापग्रहों के अशुभ योग में दशमस्थ हर्षल हो तो जातक को उम्र के चौबीस वर्षों तक स्थिरता प्राप्त नहीं होती है। मुलाकात में कुछ मजेदार किस्से होते हैं, जिनकी वजह से तुरंत नौकरी मिल जाती है। पितृ-सुख प्राप्त नहीं होता। पिता-पुत्र में मतभेद रहते हैं। परिवार से अलग होकर स्वतंत्र रूप से कुछ करना पड़ता है। सामूहिक परिवार को तितर-बितर करने का काम दशमस्थ हर्षल करता है। पिता के व्यवसाय में दो या तीन परिवर्तन होते हैं या समय से पूर्व निवृत्त हो जाने से नौकरी आधी ही होती है। जातक स्वयं चौकस एवं बुद्धिमान होने से एक ही समय में कई क्षेत्रों में कार्यरत रहता है। जातक की जन्मकुंडली में हर्षल के साथ गुरु, बुध, शुक्र एवं चंद्र का शुभ योग न हो तो जातक अनेक विषयों में हिस्सा लेता है लेकिन एक भी विषय में प्रवीण नहीं बनता। कुलधर्म, त्योहार, व्रतधर्म, आचार-विचार, उपवासादि बातें जातक को मान्य नहीं होतीं। अनियमितता हर्षल का स्थायी भाव है। ऐसा जातक अहंकारी रहता है। दशम भाव में अरुण जातक को प्रतिभा संपन्न, दृढ़ निश्चयी, साहसी पराक्रमी बनाता है। बहुधा वह कार्यक्षेत्र में बहुत तेजी से उन्नति करता है। ऐसा जातक निष्ठावान कार्यकर्ता होता है। वरिष्ठ अधिकारियों से मतभेद होने पर भी वह निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए लक्ष्य प्राप्ति में पूर्ण सहयोग देता है तथा मान प्रशंसा पाता है। कभी ऐसा जातक थोड़ा सनकी, असामान्य, संवेगी किन्तु कार्य कुशल होता है।
एकादश स्थान (लाभ भाव) –
साहित्य, ललितकला, गायन व कला के क्षेत्र में सफलता, अनेक
व्यवसाय व एक से अधिक धन लाभ के साधन, कवि, साहित्यकार, लेखक, मित्रों द्वारा विश्वासघात। एकादश भाव में स्थित अरुण जातक को करुणा, अर्न्तप्रज्ञा सामाजिकता व प्रगति करने की शक्ति देता है। समूह में ये लोक प्रिय होते हैं। बहुधा मैत्री करने व मैत्री तोड़ने में कुछ दिखाते हैं। प्रायः किसी नई वस्तु का अनुभव पाने के लिए ये लालायित रहते हैं। बहुधा वृद्धावस्था में, ज्योतिष अथवा तंत्र में इनकी रुचि हो अधिक उतावलापन जाती है। कुंडली के एकादश स्थान यानी लाभ स्थान में स्थित हर्षल के शुभ फल प्राप्त होते हैं। पाश्चात्य ज्योतिषी एकादश स्थान का अधिपति हर्षल को ही मानते हैं। सामाजिक, शैक्षणिक, सहकारिता एवं बैंकिंग क्षेत्र में ऐसे जातक कुशल होते हैं। अशुभ हर्षल एकादशस्थ हो तो संतान सुख में बाधा उत्पन्न होती है। संतान कम होती है या उसे अपघात होता है। एकादश स्थान में स्थित हर्षल अष्टमेश, पंचमेश, धनेश एवं लाभेश के अंशात्मक शुभ योग में होने पर आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं। स्वपरिश्रम से, दत्तक विधान से, वसीयत के माध्यम से या अन्य मार्गों से जातक को बड़े आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं। पीड़ित हर्षल आर्थिक नुकसान, माता को दीर्घकालीन बीमारी आदि कुफल देता है। एकादश स्थान में स्थित हर्षल होने पर जातक कुशाग्र बुद्धि का, लगन से अध्ययन करनेवाला एवं अपनी शिक्षा पूर्ण करनेवाला होता है। ऐसे जातक के मित्र एवं अनुयायी काफी होते हैं। असामान्य बातों में या अपरिचित शास्त्र में वह लाभ कमाता है। शिक्षा पूर्ण न होने की स्थिति में भी जातक बौद्धिक क्षेत्र में अपना रौब जमाता है। एकादश भाव में अरुण जातक को अन्तप्रज्ञा का धनी, सामाजिक प्रगतिशील बनाता है। नयी वस्तु के प्रति सहज आकर्षण इसे उतावलापन देता है। मित्र व परिचितों के बीच स्नेह व सहयोग मिलता है। मैत्री करने मैत्री भंग करने में जल्दबाजी कभी कष्टदायक होती है। वृद्धावस्था में ज्योतिष या तंत्र में रुचि होती है। बहुधा मित्रों के सहयोग से उसे अप्रत्याशित लाम मिलता है
द्वादश स्थान (व्यय भाव)
जनता सेवा, दवाइयों, तरल पदार्थ, एक्स-रे इत्यादि से लाभ। डॉक्टर, नर्स, अस्पताल के कर्मचारी, वैज्ञानिक व जेलर, अपयश, अधिक शत्र, कामी व अव्यवहारशील तमोगुण से परिपूर्ण।द्वादश भाव का अरुण जातक को सनक की सीमा तक कल्पनाशील बना देता है। ये सहज विश्वास करने वाले अव्यवहारिक, श्रद्धालु किस्म के होते हैं दूसरों के भेद प्रायः प्रकट नहीं करते। अज्ञात का रोमांच इन्हें तंत्र, उपासना या अन्य गुप्त व रहस्यपूर्ण विधाओं की ओर धकेल दिया करता है।
द्वादश यानी व्यय स्थान में स्थित हर्षल विशेष प्रकार के फल प्रदान करता है। पाप ग्रहों के योग में स्थित या पीड़ित हर्षल जातक के जीवन में बड़े-बड़े आर्थिक संकट उत्पन्न करता है। बीच-बीच में आर्थिक संकट छाए रहते हैं। किसी की जमानत देने के कारण, घर पर डकैती होने के कारण या घर में हुई चोरी के कारण या व्यापार में अचानक आए आर्थिक नुकसान के कारण धनहानि होती है। भाईचारा या अन्य कारणों से कोर्ट-कचहरी में दीवानी मुकदमे चलते हैं। इस कारण भी काफी धन खर्च होता है। पिता का अपने भाई से मनमुटाव रहता है। बंधुओं में से एक बंधु से कष्ट पहुंचता है। पिता का कोई भाई घर से भाग जाता है तो कोई पुत्रहीन रहता है। पैरों में अधूरापन, दृष्टिदोष रहना, आंखों पर शल्य क्रिया जैसे फल भी व्ययस्थ हर्षल देता है। व्यय स्थान में स्थित हर्षल गुप्त पीड़ा देता है। पीड़ित व्ययस्थ हर्षल जातक को हिंसक बनाता है। आत्मघात करना, गृह त्याग करना, बड़ा कर्ज होना आदि कार्य भी व्ययस्थ हर्षल करवाता है। राजकीय या अन्य कारणों से बंधन योग आता है। परदेश गमन होता है। परदेश निवास भी संभव रहता है। अध्यात्म, गूढविद्या एवं असामान्य बौद्धिक कार्यों में जातक प्रगति करता है। चाल में अनियमितता, चलते समय कर्मठ चेष्टा करना, पैर छोटा होना या लकड़ी का पैर होना जैसी अवस्था व्ययस्थ हर्षल के कारण होती है। द्वादश भाव में अरुण जातक को सनक की सीमा तक कल्पनाशील बनाता है। अज्ञात का रोमांच तथा अलौकिक चमत्कार में दृढ़ आस्था, इसे तंत्र उपासना अथवा गुप्त व रहस्यपूर्ण विद्याओं की ओर धकेला करती है। निश्चय ही ऐसा जातक, कभी अप्रत्याशित दंड या आर्थिक हानि पाता है तो कभी इसे बहुत सुख भी मिलता है।
द्वादश राशि में हर्षल के फल
पाश्चात्य ज्योतिषी हर्षल ग्रह से काफी प्रभावित हैं। वर्तमान समय के महत्वपूर्ण संशोधनों एवं आध्यात्मिक प्रवाह का कारण हर्षल ही है।' यह उनकी धारणा है। हर्षल के फलित विषय में अनेक ग्रंथ अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुए हैं। अंग्रेजी ग्रंथों के अनुसार हर्षल का फलित असाधारण एवं विलक्षण है। इसी ग्रह की स्थिति शनि ग्रह जैसी होने से जिस राशि में शनि बलवान हो र राशि का हर्षल बलवान माना जाता है। इस आधार पर कुंभ राशि को शनि का स्वक्षेत्र एवं मीन राशि में वह उच्च का माना गया है। इसके अतिरित तुला एवं मिथुन राशि में भी हर्षल के फलित शनि जैसे ही प्राप्त होते है।
लग्न से 1, 3, 5, 7, 9, 10 स्थानों में हर्षल का प्रभाव विशेषरूप से अनभव में आता है। जन्मकुंडली में जिस भाव में यह ग्रह हो उस भाव के फलित में यह ग्रह विलक्षणता दिखाता है। उदाहरणार्थ षष्ठ स्थान रोग का स्थान है। यहां हर्षल होने से जातक विलक्षण रोगी होता है। उसके रोग का कोई निदान नहीं होता। अष्टम स्थान मृत्यु का स्थान है। इस स्थान में हर्षल हो तो जातक की मृत्यु आकस्मिक रूप से होती है। धन स्थान-परिवार स्थान द्वितीय स्थान में हर्षल हो तो जातक की आर्थिक स्थिति एवं पारिवारिक जीवन सचारू नहीं होता। इसी तरह दशम स्थान राज्यभाव आजीविका भाव में हर्षल हो तो जातक आकस्मिक रूप से उच्च पद पर आसीन होता है या जातक बारबार अपनी नौकरी-व्यवसाय बदलता है। बारहवें स्थान यानी व्यय स्थान में हर्षल हो तो जातक के व्यवसाय का अचानक दिवाला पीट जाता है। भय, आकस्मिक आर्थिक नुकसान आदि फल भी उसे प्राप्त होते हैं। मेष या वृश्चिक राशि का हर्षल विशेष रूप से अशुभ फल प्रदान करता है।
जन्मलग्न में 5, 8, 10, 11 स्थानों में हर्षल शुभ फलदायी होता है, तीव्र, बुद्धिमत्ता, उच्च शिक्षा, उच्च स्थान पर पदोन्नति, आकस्मिक लाभ होते हैं। अन्य स्थानों में हर्षल अशुभ फलदायी होता है। मीन का हर्षल लग्न में हो तो उसके शुभ फल प्राप्त होते हैं। बुध, गुरु, शुक्र एवं नेपच्यून ग्रहों से हर्षल की मैत्री होने से इन ग्रहों के साथ रहने पर हर्षल शुभ फलदायी होता है। सूर्य, चंद्र, मंगल एवं राहु के साथ हपल की शत्रुता होने से, इन ग्रहों के साथ होने पर वह अशुभ फलदायी होता है। शनि के साथ हर्षल हो तो समभाव रहने से हर्षल शनि के फल देता है। इन नियमों का अध्ययन करके, ग्रहों का बलाबल देखकर तारतम्य से हर्षल का फलित देखना चाहिए।
मेष: पराक्रमी, धैर्यवान, परिश् बलवान, महत्वकांशी, बौद्धिक प्रवृति शोधकर्ता मेष राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक विचित्र स्वभावी, जिदो, झगड़ालू, चिड़चिड़ा, अहकारी, दभी, उतावला, अभिमानी, महत्वाकांक्षी, बुद्धिमान एवं सुधारक रहता है। जीवन में आनेवाले उतार-चढ़ावों का उसे अनुभव प्राप्त होता है। जातक में सम्मान प्राप्त करने की लालसा निहित रहती है। अपघात एवं अग्निभय भी रहता है। सिर एवं मख पर जख्म या जख्म का कोई निशान होता है। मेष राशि में अरुण जातक को महत्वाकांक्षी, अभिमानी तथा वैचारिक स्वतंत्रता का पक्षधर, साहसी तथा नयी वस्तुओं को अपनाने वाला बनाता है। वह तीक्ष्ण बुद्धि, तर्ककुशल, वर्जनाओं का विरोधी तथा वाणी व कर्म में स्वच्छन्दता या उन्मुक्तता का समर्थक होता है। प्रगति, परिवर्तन, अनुसंधान व अन्वेषण में उसकी सहज रुचि होती है। बाधा या विरोध उसे विद्रोही बनाता है। कभी वह अनायास व अकारण ही मैत्री या स्नेह संबंध तोड़ लेता है।
वृष: ज्ञानवर्धक शास्त्र ज्ञाता हठी दृढ़ निश्चयी हानि धन नाश वैवाहिक जीवन में कटुता विचित्र स्वाभाव छोटा कद नीच स्थान वृषभ वृषभ राशि का हर्षल कंडली में हो तो जातक बहुत लालची और सट्टे, रेस, जुए का रंगकारी, चित्रकारी, फोटोग्राफी, नाट्य, वाद्य-वादन, टकण, लेखन एवं अन्य कलाकोशल के क्षेत्र में लाभान्वित होता है। विवाह के बाद ही भाग्योदय होता है। नाक में हड्डी बढ़ने जैसे रोगों से जातक त्रस्त रहता है। गले में खराबी भी आ सकती है। विवाह एवं प्रेम के विषय में उसके बडे चमत्कारिक विचार होते हैं। पत्नी से मनमुटाव रहता है। वृष राशि में अरुण होने से जातक हठी, दृढ़ निश्चयी, बुद्धिमान तथा यथार्थवादी होता है। वह व्यक्ति या वस्तुओं की व्यवस्था (Man or Material Management) के लिए नितान्त मौलिक व प्रभावी पद्धति अपनाता है। कोई जातक शीघ्र धन पाने के लिए जुआ या लाटरी का सहारा लेता है। ऐसा व्यक्ति कामुक, आराम पसन्द तथा अपनी सत्ता (अधिकार) का दुरुपयोग कर, धन व कामसुख पाने वाला होता है।
मिथुन: ज्योतिष इंजीनियर विधुत विषेधज्ञा शोधकर्ता प्रखर व् तेज बुद्धिवाला एक से अधिक विषयो में प्रवीणता लम्बा कद मिथुन-मिथुन राशि का हर्षल कुंडली में हो तो बौद्धिक दृष्टि से शभ फलदायी होता है। ऐसा जातक चिंतन, मनन एवं कंठस्थ करने में माहिर होता है। जातक होशियार, अत्यधिक आसक्त होता है। मिथुन राशि का हर्षल अलग-अलग भाषाओं, साहित्य, इतिहास फलज्योतिष, पुराण, तत्त्वज्ञान, ज्यातिष गणित विषयक क्षेत्र में जातक को आगे ले जाता है। पापग्रहों की यति में या अन्य योग में हर्षल हो तो जातक चिडचिडा बनता है। अडोस-पडोस के लोगों से स्नेहपूर्ण व्यवहार नहीं रहता। हर्षल पीडित हो तो दमा, सर्दी, खांसी अन्य कफविकार उत्पन्न होते हैं। पीड़ित हर्षल के कारण, मतिभ्रम, भुलक्कड़पन बढ़ता है। जातक को नींद में बड़बड़ाने की आदत होती है। मिथुन राशि में अरुण जातक को सुन्दर रंग-रूप, सुडौल देह, कल्पनाशीलमस्तिष्क तथा मनमौजी स्वभाव देता है। वह शास्त्र मर्मज्ञ, अन्वेषण या अनुसंधान में संलग्न, मौलिक विचारों का धनी व्यक्ति होता है। कभी शीघ्र ऊब जाने या अधीरता के कारण, उसकी योजनाएँ आधी-अधूरी छूट जाती है। यह वार्ताकुशन तथा यांत्रिक कार्य में निपुण, एक श्रेष्ठ शिल्पी होता है। कभी रनायुविक थकान या मानसिक दुर्बलता, उसकी कार्य क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
कर्क: अहंयुक्त अभिमानी उदारतायुक्त बलशाली स्वंतंत्र विचारो का उपासक पिता से मतभेद दुराग्रही छोटा कद कर्क कर्क राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक चंचल, मालकिन दृष्टि से दुर्बल, मौके पर घबरानेवाला होता है। पापपीड़ित हर्षल जातक की जिद्दी एवं चिड़चिड़ा बनाता है। वह बात-बात पर झुंझलाता है। मातसखल वैवाहिक सुख में न्यूनता रहती है। जीवन अस्थिर रहता है। किंतु उत्तरार्ध में मित्रों के सहयोग से जीवन में यश प्राप्त होता है। कर्क राशि में अरुण जातक को ठिगना कद, पुष्ट देह तथा मनमौजी स्वभाव देता है। वह मन में अधीरता, असहिष्णुता तथा परंपरा के प्रति वैर-विरोध के कारण कभी घर छोड़ कर अपनी राह स्वयं बनाता है। मूलतः वह स्नेह, सौमनस्य तथा परस्पर विश्वास का पक्षधर होता है किंतु मृत संबंधों के शव ढोने में उसकी तनिक भी रुचि नहीं होती। वह अन्तज्ञा का धनी, तीक्ष्ण बुद्धि तथा तंत्र विद्या के लोकोपयोगी व्यवहार में दक्ष होता है।
सिंह: पेट में गैस की पीड़ा ऑपरेशन विदेश यात्रा वैवाहिक जीवन में मनमुटाव अस्थिर जीवन शैली . सिंह सिंह राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक अभिमानी, दयाल. बलवान, स्वच्छंद, पिता से मतभिन्नता रखनेवाला किंतु स्थिर विचारी रहता है। शुभ योग में स्थित हर्षल सिंह राशि में हो तो जातक धैर्यवान एवं कर्तव्यपरायण बनता है। पापपीड़ित सिंह राशि का हर्षल 1,4,7, 10 में से किसी स्थान में हो तो जातक के जीवन में बड़े परिवर्तन होते हैं। अशभ योग में स्थित हर्षल के कारण पेट के विकार उत्पन्न होते हैं। स्त्री जातक की कुंडली में सिंहस्थ हर्षल अशुभ स्थिति में हो तो गर्भपात या प्रसव के समय शल्य क्रिया होती है। सिंह राशि में अरुण जातक को दृढ़ निश्चयी, साहसी व उद्यमी बनाता है। उसमें भावुकता या संवेदनशीलता का अभाव होता है। शायद इसी कारण वह मित्र, पुत्र या पत्नी की कोमल भावनाओं को समुचित महत्व नहीं दे पाता। वीरता व जोखिमपूर्ण, रोमांचक कार्यों में उसकी सहज रुचि होती है। अपने विचारों में फेर-बदल कर पाना उसके लिए संभव नहीं होता। अतः उसे अड़ियल या हठी कहा जाता है।
कन्या: जीवन वर्षो के बाद सफलता व उन्नति मिले कला, साहित्य में रूचि , चिकित्सा , आयुर्वेद , प्राकृतिक चिकित्सा में रूचि, पत्नी की आयु अपने से अधिक कन्या कन्या राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक की रुचि औषधि विज्ञान एवं साहित्य में रहती है। जीवन के उत्तरार्ध में सुख प्राप्त होता है। स्त्री जातक की कुंडली में कन्या राशि का हर्षल हो तो उसका विवाह अपने से बड़े किंतु प्रतिष्ठित सज्जन के साथ होता है। सीना-पिरोना, कशीदा-कढ़ाई जैसे कलाकौशल के कामों में उसे यश प्राप्त होता है। भाग्योदय शैक्षणिक क्षेत्र में होता है। भाषाशास्त्र, गणित एवं तत्त्वज्ञान आदि विषयों का सटीक अध्ययन रहता है। पापग्रह से युक्त हर्षल हो तो जातक मानसिक संतुलनविहीन होता है। कन्या राशि में अरुण जातक को धर्म व अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों को जानने की इच्छा देता है। वह शास्त्रानुशीलन तथा स्वाध्याय से विविध विषयों का ज्ञाता होता है। वह अपने ज्ञान को आधुनिक परिस्थितियों के अनुकूल तथा अधिक प्रभावशाली व उपयोगी बनाता है। पुरानी कार्य प्रणाली को छोड़कर आधुनिक, किफायती व प्रभावी कार्य पद्धति अपनाने में उसकी सहज रुचि होती है। शोध परक कार्य में, अपनी प्रतिभा का उपयोग कर, वह व्यापारिक दृष्टि से लाभप्रद योजना बनाने में कुशल, भविष्य दृष्टा होता है।
तुला: अनेक विधाओं का ज्ञाता शीग्र विवाह होता है तलाक का डर भी, साहित्य कला विधि के गूढ़ रहस्यों का ज्ञाता तुला तुला राशि का हर्षल कुंडली में हो तो साहित्य, कला, कानून आदि विषयों में जातक की रुचि रहती है। प्रेमविवाह या विवाह उतावलेपन में होता है और अल्पावधि में तलाक भी हो सकता है। जातक लेखक, वकील, या साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध होता है। तुला राशि का पीड़ित हर्षल 1, 5, 7, 12 या 8 में से किसी स्थान में शुक्र के शुभ योग में हो तो जातक अनैतिक रहता है। तुला राशि का हर्षल वैवाहिक सुख नहीं देता। सप्तम स्थान बहत ही अशुभ होने पर पति-पत्नी में अलगाव एवं तलाक होता है। तुला राशि में अरुण होने से विवाह, मैत्री व साझेदारी पर जातक के विचार अद्भुत तथा गैर पारंपरिक होते हैं। सामाजिक विधि निषेधों में उसकी आस्था नहीं होती है। किसी भी प्रकार की रोक-टोक या प्रतिबन्ध स्वीकारना उसे कठिन व असह्य जान पड़ता है। नीति व न्याय पर भी उसके विचार, सर्वथा मौलिक तथा स्थापित मान्यताओं से हटकर होते हैं।कभी ऐसा जातक ज्ञानी, महत्वाकांक्षी, चमत्कारिक व्यक्तित्व का धनी, प्रसन्नचित्त तथा मिलनसार व प्रतिभा संपन्न होता है।
वृश्चिक: लघुकद, कालरंग , हस्तरेखा ज्योतिष एवं मनोविज्ञान का पंडित उच्च कोटि का तांत्रिक मन्त्रिक यांत्रिक साधक उग्र स्वाभाव, लड़ाकू प्रवृति शोधकर्ता अध्यनशील, अभिमानी, दृढ निश्चयी वश्चिक वृश्चिक राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक गर्ममिजाज, हस्तरेखा विज्ञान एवं मनोविज्ञान में रुचि रखनेवाला होता है। कई बार व्यवसाय भी बदलना पड़ता है। स्वास्थ्य अच्छा रहता है। किंतु वृश्चिक के पीडित हर्षल के कारण मूत्राशय संबंधी विकार उत्पन्न होते हैं। वृश्चिक राशि में अरुण जातक को पुष्ट देह, श्यामल वर्ण ठिगना कद. सघन केश तथा सुन्दर नेत्र देता है। उसके मन में क्षोभ-जन्य बवण्डर साचला करता है। बहुधा वह सब कुछ या कुछ भी नहीं पाने वाली मानसिकता से यस्त एकाधिकार प्रिय होता है। साहस, रोमांच व जोखिम भरे कामों में उसकी सहज रुचि होती है। वह मित्रों के लिए स्नेही मित्र किंतु शत्रु के लिए क्रूर व दुर्जेय होता है। अरुण पर पापत्व जातक को कपटी, धूर्त, वाचाल व व्यसनी बनाता है।
धनु : खेल प्रेमी, राष्ट्रीय स्तर का खिलाडी , कोमल व् उदार ह्रदय, सम्मान युक्त, लोकप्रियता में आगे, धीर गंभीर व महत्वकांशी, प्रवृति धन धनु राशि का हर्षल कुंडली में हो तो जातक लोकप्रिय, अच्छे व्यक्तित्व का, सम्माननीय, चतुर, उदार, बुद्धिमान एवं मैदानी खेलों में प्रवीण होता है। धनु राशि का हर्षल 1, 3, 4, या 10वें स्थान में हो तो जातक को
आर्थिक दृष्टि से कई उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। धनु राशि का पीड़ित हर्षल स्थान में, अष्टम स्थान में या व्यय स्थान में हो तो अशुभ फलदायी होता भी अपपात, बंधन योग, पिता से मुठभेड़, दीर्घकालीन बीमारी, अग्निभय, शल्यक्रिया आदि फल मिलते हैं। धनु राशि का हर्षल जातक को क्रोधी एवं चिडचिडा बनाता है। धनु राशि का अशुभ हर्षल जातक को वाहन से अपघात, नेत्रपीड़ा, त्वचा रोग, टिटनेस, पैर या घुटनों की पीड़ा जैसे रोगों का कष्ट उठाना पड़ता है। धनु राशि में अरुण जातक को व्यग्रता या बेचैनी देता है। रहस्य व रोमांचपूर्ण कामों में उसकी सहज रुचि होती है। घिसी-पिटी पुरानी पद्धति से उसे चिढ़ होती है। वह कुछ नया व अनोखा करने को व्याकुल रहता है। विदेश यात्रा, विदेशी सभ्यता व संस्कृति उसे आकर्षित करती है। विज्ञान तथा तर्कसंगत, तंत्र शास्त्र व प्राचीन विद्याएँ उसे रोचक जान पड़ती हैं। वह प्रगति व परिवर्तन के लिए उनका प्रयोग हितकर मानता है। वह उदार, स्पष्ट तथा स्नेहशील होने से सुख, वैभव तथा सफलता पाता है।
मकर: जन कार्यकर्त्ता, जन सेवक प्रॉपर्टी डीलर व् भवन निर्माण का व्यवसाय से लाभ पाने वाला पिता से मतभेद बाल्य अवस्था में मुसीबते व् आभाव युक्त जीवन मकर मकर राशि का हर्षल जन्मकुंडली में हो तो जातक पिता से अलग रहता है। बचपन में दुख भोगना पड़ता है। जातक सार्वजनिक एवं भवन निर्माण के कार्य में सफल होता है। हर्षल गुरु एवं शुक्र के शुभ योग में हो तो आर्थिक संपन्नता प्राप्त होती है। धन स्थान, पंचम स्थान, अष्टम स्थान में या लाभ स्थान में हर्षल होने पर आकस्मिक धन लाभ होता है। मकर राशि में अरुण जातक को गंभीर, स्वाभिमानी, व्यवस्था कुशल तथा मित्र व सहयोगियों का हितसाधक बनाता है। वह अपने विरोधियों के प्रति कठोर व निर्मम होता है। वह कुछ नया व अद्भुत करने को उत्सुक एक प्रगतिशील व्यक्ति होता है। लकीर का फकीर होना उसके स्वभाव में प्रायः नहीं होता।
कुम्भ: अनेक संप्रदाय के लोगो से मित्रता सफल व्यक्तित्व अपना मकान व् जायदाद कोमल व् उदार ह्रदय प्रसन्न चित धर्मात्मा व् परोपकारी प्रवृति कुंभ–कुंभ राशि का हर्षल कुंडली में होने पर जातक उदार, परोपकारी, प्रसन्न, दयालु, मित्रों से घिरा हुआ, सुस्वभावी, वैवाहिक जीवन में सुखी एवं सफल होता है। यही हर्षल शभ योग में हो तो जातक खगोलशास्त्री, ज्योतिषी. गढ एवं स्थिर विचारोंवाला, गणितज्ञ, अर्थशास्त्री, कलाकौशल एवं विदेशी भाषाओं का जानकार होता है। कुंभ राशि में अरुण जातक को प्रगतिशील, महत्वाकांक्षी तथा परिवर्तन प्रिय बनाता है। कदाचित् परिवर्तन या फेर-बदल करने से उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। वह स्वतंत्रता का पक्षधर, व्यवहारकुशल तथा विचारों को कार्य रूप देने में सक्षम होता है। गुप्त विद्या तथा धर्म एवं अध्यात्म में उसकी सहज रुचि होती है। "जिज्ञासा.व ज्ञान" उसके संकेत शब्द होते हैं।
मीन: शोधकर्ता गोताखोर दुर्भाग्यशालि गढ़ा हुवा धन मिले सट्टा लॉटरी जुवे से धन की प्राप्ति मीन मीन राशि का हर्षल कंडली में हो तो रेस, सट्टे, लॉटरी एवं अन्य प्रकार के स्रोतों से अनायास धनलाभ के योग आते हैं। जातक को प्रवास एवं सुधार में रुचि और अलग-अलग प्राणी पालने का शौक रहता है।मीन राशि में अरुण जातक को कल्पनाशील, रहस्यपूर्ण तथा अध्यात्म के गूढ रहस्यों का ज्ञाता एवं भविष्य दृष्टा बनाता है। वह प्रतिभाशाली औररंग तथा संगीत का प्रभाव जानने में कुशल होता है। कोई जातक जीवन की कठोरता व कटुता को सहन करने में अक्षम होने से, संसार को कारागार सरीखा मानता है। अरुण का पापत्व जातक को आलसी, उदासीन, कपटी, मिथ्यावादी तथा रोगी बनाता है।
मीन राशि का हर्षल 3, 5, 8, 10, 12 स्थानों में से किसी स्थान में हो तो जातक की अंतर्ज्ञान शक्ति उत्तम रहती है, फलज्योतिष, हस्त-सामुद्रिक शास्त्र एवं तंत्र-मंत्र शास्त्र में अच्छी प्रगति होती है। मीन का हर्षल 3, 5, 8, 12 में से किसी स्थान में होने से जातक होनी-अनहोनी के स्वप्न देखता है। हर्षल के साथ बिगड़ा हुआ शुक्र हो तो विवाह में विलंब होता है। वोंमें टान के शावना विचारावाला, गणितज्ञ, अर्थशास्त्री, कलाकौशल एवं दिशा भाषाओं का जानकार होता है। 12, मीन मीन राशि का हर्षल बांडली में हो तो रेस, सबटे, लॉटी एवं अन्य प्रकार के प्रांतों से अनायास धनलाभ के योग आते हैं। जातक को प्रवास एवं सुधार में रुचि और अलग-अलग प्राणी पालने का शौक रहता है। मीन राशि का हर्षल 3,5,8, 10, 12 स्थानों में से किसी स्थान में हो तो जातक की अंतान शक्ति उत्तम रहती है, फलज्योतिष, हरत-सामुद्रिक शास्त्र एवं तंत्र-मंत्र शास्त्र में अच्छी प्रगति होती है। मीन का हर्षल 3,5,8,12 में से किसी स्थान में होने से जातक होनी-अनहोनी के खप्न देखता है। हर्षल के साथ बिगड़ा हुआ शुक्र हो तो विवाह में विलंब होता है।
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