उच्छिष्ट_गणपति_प्रयोग_विधि_एवं_माहात्म्य
#श्री_गुरुगणेभ्यो_नम: ।
आज का विषय अत्यन्त गूढ़ व समस्त सांसारिकों हेतु शुभकर जानते हैं #श्रीगणेश के अन्यस्वरूप #श्रीउच्छिष्ट_गणपति के अद्भुत प्रयोग व विधीवर्णन जो सर्वसुखकर हैं......
सर्वप्रथम वन्दना #श्रीउच्छिष्ट_गणपति का वन्दन करें ।
🔴।। वन्दना ।।🔴
उच्छिष्टंघोररूपं सतत भयहरं दीर्घदेहं सुनित्यं ,
घं घं घं घर्घर:स्त्वं अकुलकुलकरं राजतन्त्र:स्वरुपं ।
क्लीं क्लीं क्लीं क्लिष्टघोषं वर वर वरदं देवदेवंप्रधानं ,
उत्पल्लोत्पट्टपट्टंलिखिलिखिलिखितंल्लेखितंहस्तिमंत्रं ।।
अर्थ:— भयंकर विशालदेह स्वरूप धारण कर समस्त भय का निरन्तर हरण करने वाले जो सदा नित्य हैं ।
जो राजकुलहीन सामान्य प्राणी को भी राज्यप्रदान करने में समर्थ हैं । वह जो देवताओं में प्रधान व प्रथम हैं, स्वभक्त के दुर्भाग्य को शब्दमात्र से सौभाग्य रूपी वर प्रदान कर संसार को उसके अधीन (अनुकूल) कर देते हैं ।
जो सदा निर्विघ्न व शांत स्वरूप में स्थित हो भक्तों के पापों व कष्टों का नाश कर कृपा रूपी लेखनी द्वारा भाग्यरूपी पटल पर सुख सौभाग्य मयमन्त्र लिखते हैं । उन परम उदार भगवान् श्रीउच्छिष्ट गणपति की में वन्दना करता हूँ ।
भगवान #श्रीउच्छिष्ट_गणपति एक मात्र एसे देव हैं ।
जो प्रसन्न होने पर भक्त के कर्म एवं कल्पना को भी फलित कर देते हैं, यह देव ! अपने समस्त उपासकों की त्रुटियों को तत्क्षण क्षमा पापों का नाश व विधिहीन पूजन कर्म को भी सार्थकता प्रदान कर देते हैं ।
“सकल ब्रह्माण्ड” में दो उच्छिष्टमुर्ती हैं । एक तो स्वयं
#श्रीउच्छिष्टगणपति एवं द्वितीय #श्रीउच्छिष्टचाण्डालिनी
अर्थात् नवम् महाविद्या #श्रीभगवतीमातंगी” ।
यह जानना आवश्यक हे की #उच्छिष्ट का अर्थ क्या है ।
“उच्छिष्ट” का अर्थ होता है — “शेष बचा हुआ” अन्यरूपों में
(झूठा,अ-ग्रहित,अतिरिक्त,भिन्न,विशेष ) आदि ।
#प्रश्न —भगवान “श्रीगणेश” के स्वरूप का उच्छिष्टगणपति नाम क्यूँ व कैसे हुआ?
#उत्तर— एक बार श्रीगणेश नें कुबेर के अहंकार से क्रुद्ध होकर सहस्त्रों रूप धारण अलकापुरी को अवरुद्ध कर, उसके सम्पूर्ण अन्न, धन, ऐश्वर्य सहित कुबेर की राज्यलक्ष्मी,जयलक्ष्मी,विजयलक्ष्मी आदि का भक्षण कर कुबेर का भी भक्षण कर लिया तदुपरान्त भी क्षुधा शान्त न होने पर श्रीगणेश नक्षत्रमालाओं अन्तरिक्ष सहित पूर्णचराचर ब्रह्माण्ड का भक्षण करने को उद्यत हुए । समस्त देवतागण भयातुर हो प्रजापिताब्रह्मदेव व शेषशायी विष्णु सहित शिवशक्ति की शरण में गए ।
भगवान् श्रीगणेश का स्वरूप अत्यन्त उग्र होने के कारण भयविह्वलित देवगण स्वयं का भक्ष्य बन जाने से भय से समीप न जाकर दूर से हि प्रार्थना करने लगे ।
श्रीकृतयज्ञ_भट्टाऽचार्य के “गणेशोद्दीपन“ के अनुसार “श्री_गणेश”अथर्वशीर्ष” उसी काल में समस्त देवताओं द्वारा की गई स्तुति है ।
तत्पश्चात् भगवान् श्रीगणेश प्रसन्न होकर समस्त देवताओं को भयमुक्त किया । तथा वरदान स्वरूप सम्पूर्ण ऐश्वर्य व राज्यलक्ष्मीयों सहित कुबेर को पुनःमुक्त किया ।
तदुपरान्त #श्रीगणेश नें अपनें सम्पूर्ण स्वरूपों को पुनः स्वयं में समाविष्ट कर लिया तथा । किन्तु श्रीगणेश नें उच्छिष्ट स्वरूप को पृथक् कर लिया जिस उच्छिष्टमुख से देवताओं को वररूप में राज्यलक्ष्मीयुक्त कुबेर को प्रकट किया था । वही स्वरूप उच्छिष्टगणपति के रूप में तीनों लोकों में पूज्य है । भगवान् शिव के अवतार व शिष्य श्रीदुर्वासा ऋषि भी गणपति के परमउपासक थे उन्होंने आग्रह किया कि
हे देव ! आप अपने ईस दिव्यस्वरूप को जो आपने पृथक् किया है । यह सम्पूर्ण ऐश्वर्यप्रद व भक्तों हेतु परम् कल्याणकारी है । आप इसे भक्तों हेतु गुप्त हि रहने देवें अन्यथा आप कृपालु स्वभाव वश महापातकियों का भी सहज हि कल्याण करते रहेंगे । आपका यह रूप मन्त्रमय है । यन्त्रस्वरूप हैं तथा तन्त्रवित् है । कृपया आप मेरे साथ सिद्धलोक पधारें एवं वहीं कुछ कालतक विश्राम करें ।
दुर्वासा के निवेदनयुक्त निमंत्रण पर भगवान् उच्छिष्ट गणपति श्रीदुर्वासा सहित सिद्धलोक की ओर प्रस्थान करते हैं ।
भगवान् दुर्वासा के #कंकोल नामक प्रिय शिष्य हुए । वहि #उच्छिष्टगणपति विद्या के प्रवर्तक हुए ।
प्राचीन काल में महात्मागण मुट्ठीभर अन्न द्वारा सहस्त्रों महात्माओं का भोज सम्पन्न कर दिया करते थे । यह महान् कार्य श्री उच्छिष्ट देव ! की कृपा से हि पूर्ण किया करते थे । वर्तमान काल में भी अनेकों स्थान पर महात्माओं द्वारा किया गया, ईस प्रकार चमत्कारिक वर्णन यदा-कदा सुनने को प्राप्त हो हि जाता है ।
श्रीउ.गणपति ! वृद्धि के मूल कारक हैं स्वभक्तों की अलक्ष्मी,कष्ट,दुर्भाग्य का भक्षण कर ऐश्वर्ययुक्त श्री , सौभाग्य तथा सिद्धियों का वमन करते हैं । उ.गणेश अत्यन्त आनन्दवर्धक व भयहारी हैं ।
देव ! के साधक भक्त को कदापि दारिद्र्यता व्याप्त नहीं होती । #अपह्रता_विद्या भी श्रीउच्छिष्टदेव की हि एक कला है ।
#श्रीउच्छिष्टगणपति हि #चतुरशीतितम_चेटकों के अधिनायक हैं ।
तथा महान् अष्टनायिकाओं का भी प्रतिनिधित्व करते हैं । किंबहुना ! यदि श्रीउच्छिष्टगणपति प्रसन्न हो जाएँ तो देव! की कृपा से ईंद्र्त्व प्राप्ति भी असम्भव नहीं है ।
#उच्छिष्ट_गणपति स्वभक्तों हेतु सदैव तत्पर रहते हैं । राजकीय कार्यों में वरीयता प्राप्ति हेतु श्री उ.गणपति अद्वितीय हैं ।
सभाओं में प्रधानता प्रदान करते हैं ।
निष्क्रिय बुद्धी के समस्त कोषों का भेदन भी श्री उ.गणपति की कृपा से सम्भव हो जाता है । भगवान् #श्रीउच्छिष्ट_गणपति के प्रयोग चतुर्वर्ण के समस्त वर्गों हेतु शुभकर सिद्ध होते हैं । समस्त क्षेत्रों में देव! हि व्याप्त हैं ।
त्रिविधतापों अर्थात्। अधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक का प्रशमन होता है ।
वाक् चतुर्यता का स्फुरण होता है ।
विद्यार्थियों की मेधा,स्मृति वर्धन होता है ।
आध्यात्मिक जगत् व तन्त्रप्रयोगों में श्रीउ.गणपति की अध्यक्षता स्पष्ट प्रतीत होती है ।
किन्तु गुरुकुलों की परम्पराओं के लोप एवं आधुनिकता में समावेश होने के कारण श्रीगणेश के अनन्य अवतारों एवं रहस्यों से अधिकांश विश्व अनभिज्ञ हि रह गया ।
#श्रीउच्छिष्टगणपति के एकमात्र एसे देव हैं जिनकी कोई भी मनुष्य भक्ति,जप,साधना कर सकता है । उ.गणपति अथवा अन्य गणेश से भी दीक्षित न होने पर भी अन्य किसी भी देवता , मत, सम्प्रदाय अथवा गायत्री द्वारा दीक्षित व्यक्ति भी कर सकता है । केवल #दीक्षितमात्र होना हि पर्याप्त है । गुरु आज्ञा लेकर अनुष्ठान, प्रयोग प्रारम्भ करें । यदि आप दीक्षित न हों तो पूर्ण फलप्राप्ति हेतु यह प्रयोग से पूर्व अवश्य दीक्षा ग्रहण करें ।
अतिआपत्ति काल उपस्थित होने पर भी अदीक्षित व्यक्ति प्रयोग न करें, करने पर यह विद्या फलवती नहीं होगी ।
महाकरुणाकर श्रीउ.गणपति भक्तों के अपराधों को तत्क्षण क्षमा कर पुण्योदय करते हैं ।
किसी भी हानि होने का भय न होने के कारण कुछ मन्त्र एवं प्रस्तुत किए जा रहे हैं ।
किन्तु स्वराशि हेतु मन्त्र का मित्र,सम,अरी आदि का विचार अवश्य कर लेवें ।
#श्रीउच्छिष्ट_गणपति देव की कृपा से स्वयं को कृतार्थ कर सकते हैं ।
यह प्रत्येक साधक हेतु सरल व हितकर मार्ग है ।
साधना में समर्पण भावना का सर्वाधिक महत्व होता है ।
“मनसा” , “वाचा” , “कर्मणा” श्रीचरणों में समर्पित करना हि श्रेष्ठ है ।
#विशेष—> #श्रीउच्छिष्ट_गणपति की साधना, प्रयोग, अनुष्ठान उच्छिष्ट मुख से की जाती है । किन्तु भक्षण वर्जित है ।
अन्याऽन्य कामना पूर्ति हेतु पृथक्-पृथक् वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है ।
विधि: — विधि अन्य अनुष्ठान की हि भाँति सामान्य है ।
किन्तु - #दीपदान व #राजोपचार पूजा अनिवार्य है ।
🔸🔺।। ध्यानं ।।🔺🔸
ध्यायेयं रक्तवर्ण:स्फटिकमणिप्रभम् ,
हस्तेस्व दंतांकुशम् ।
पाशंपात्रंश्चमुदकं हसिति गणपतिम् ,
नेत्र: स्त्रयोन्मुत्तमम् ।।
विनियोग: —
ॐ अस्य श्री उच्छिष्टगणपति मन्त्रस्य, कंकोल ऋषि: , विराट् छन्द: , ग्ल: बीजं , अं शक्ति: , श्रीउच्छिष्ट गणपतिर्देवता , श्री उच्छिष्टगणपति पृत्यर्थे जपे विनियोग: ।
न्यास: —
ॐ हस्ति अंगुष्ठाभ्यां नम: । हृदयाय नम: ।
ॐ पिशाचि तर्जनीभ्यां नम: । शिरसे स्वाहा ।
ॐ लिखे मध्यमाभ्यां नम: । शिखाये वषट् ।
ॐ स्वाहा अनामिकाभ्यां नम: । कवचाय हुँ ।
ॐ हस्ति पिशाचि लिखे कनिष्ठकाभ्यां नम: । नैत्रत्रयाय वोषट् ।
ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । करतलकर पृष्ठाभ्यां नम: । अस्त्राय फट् ।
•१• ॐ हस्ति पिशाचिलिखे स्वाहा ।
•२• ॐ पिशाचिलिखेहस्ति ठ:स्वाहा ।
•३• ऊं ॐ ऊं अं उच्छिष्टगणपते हूं श्रूं फट् ।
•४• ॐ ग्ल: अं गं हस्तिपिशाचिलिखे नम: ।
भेदप्रकारा: - •५• ॐ ग्लां ग्लीं ग्लूं ग्लैं ग्लौं ग्ल: वर वरद हस्तिपिशाचिलिखे ग्ल: ग्लौं ग्लैं ग्लूं ग्लीं ग्लां ॐ ।।
यह षड्विंशक्षरी माला मन्त्र अत्यन्त प्रभावी है ।
अनिवार्य— रुद्राक्ष की माला , रक्तकम्बल आसन , दिवस में पूर्व एवं रात्रि में पश्चिमाऽभिमुख हो जप करें । मोदक का भोग अर्पित करें ।
धन प्राप्ति हेतु — मिश्री व इलायची ।
संकट नाश हेतु — लविंग (लौंग) ।
बुद्धिप्राप्ति हेतु — पान ।
भूमिलाभ हेतु — पुंगीफल (सुपारी) ।
ऋणमुक्ति हेतु —बिल्वपत्र व तुलसीमंजरी ।
विघ्ननाश हेतु — निम्बपत्र ।
सन्तानप्राप्ति हेतु — वंशलोचन ।
व्यापारवृद्धि हेतु — गुढ़ ।
को मुख में रख कर मानसिक जप करें ।
पंचममन्त्र का छःमास तक नाभि पर्यन्त जल में स्थित हो जप करने से ।
वाचा सिद्धि व आगम निगम का ज्ञान प्राप्त होता है ।
साधना अथवा प्रयोग करने से पूर्व अपने गुरुदेव को सुचित कर आज्ञा अवश्य ले लेवें । गुरु के न कहने पर कदापि न करें ।
शान्त मन द्वारा एकाग्रचित्त हो जप करें ।
श्रीमहागणपति हम सबका कल्याण करे ।
उच्छिष्ट गणपति मंत्र साधना.
आज का दिन अत्यंत कल्याणकारी दिवस है,आज गणेश जयंती है। इस अवसर पर आज यह दिव्य तांत्रिक साधना दे रहा हूं। उच्छिष्ट गणपति साधना करने में अत्यन्त सरल, शीघ्र फल को प्रदान करने वाला, अन्न और धन की वृद्धि के लिए, वशीकरण को प्रदान करने वाला भगवान गणेश जी का ये दिव्य तांत्रिक साधना है । इसकी साधना करते हुए मुह को जूठा रखा जाता है एवं सुबह दातुन भी करना वर्जित है ।
उच्छिष्ट गणपति साधना को जीवन की पूर्ण साधना कहा है। मात्र इस एक साधना से जीवन में वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है, जो अभीष्ट लक्ष्य होता है। अनेक इच्छाएं और मनोरथ पूरे होते हैं। इससे समस्त कर्जों की समाप्ति और दरिद्रता का निवारण,निरंतर आर्थिक-व्यापारिक उन्नति,लक्ष्मी प्राप्ति,रोजगार प्राप्ति,भगवान गणपति के प्रत्यक्ष दर्शनों की संभावना भी है। यह साधना किसी भी बुधवार को रात्री मे संपन्न किया जा सकता है।
साधक निम्न सामग्री को पहले से ही तैयार कर लें, जिसमें जल पात्र, केसर, कुंकुम, चावल, पुष्प, माला, नारियल, दूध,गुड़ से बना खीर, घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, मोदक आदि हैं। इनके अलावा उच्छिष्ट गणपति यंत्र और मुंगे की माला की आवश्यकता होती ही है।
सर्वप्रथम साधक, स्नान कर,लाल वस्त्र पहन कर,आसन भी लाल रंग का हो, पूर्व/उत्तर की ओर मुख कर के बैठ जाए और सामने उच्छिष्ट गणपति सिद्धि यंत्र को एक थाली में, कुंकुम से स्वस्तिक बनाकर, स्थापित कर ले और फिर हाथ जोड़ कर भगवान गणपति का ध्यान करें।
विनियोग :
ॐ अस्य श्रीउच्छिष्ट गणपति मंत्रस्य कंकोलऋषि:, विराट छन्द : उच्छिष्टगणपति देवता सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोग: ।
ध्यान मंत्र:
सिंदुर वर्ण संकाश योग पट समन्वितं लम्बोदर महाकायं मुखं करि करोपमं अणिमादि गुणयुक्ते अष्ट बाहुत्रिलोचनं विग्मा विद्यते लिंगे मोक्ष कमाम पूजयेत।
ध्यान मंत्र बोलने के बाद अपना कोइ भी एक इच्छा बोलकर यंत्र पर एक लाल रंग का पुष्प अर्पित करे।
द्वादशाक्षर मन्त्र :
।। ॐ ह्रीं गं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ।।
om hreeng gang hasti pishaachi likhe swaha
मंत्र का नित्य 21 माला जाप 11 दिनो तक करना है।
अंत में अनार का बलि प्रदान करें।
बलि मंत्र:-
।। ॐ गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्ट गणेशाय महायक्षायायं बलि: ।।
श्रीउच्छिष्ट-गणेश कवच
। Uchchhishta Ganesh Kavach
ऋषिर्मे गणकः पातु, शिरसि च निरन्तरम् । त्राहि मां देवी गायत्री, छन्दः ऋषिः सदा मुखे ।।
हृदये पातु मां नित्यमुच्छिष्टगणदेवता । गुह्ये रक्षतु तद्बीजं, स्वाहा शक्तिश्च पादयो ।।
कामकीलकं सर्वांगे, विनियोगश्च सर्वदा । पार्श्वद्वये सदा पातु, स्वशक्तिं गणनायकः ।।
शिखायां पातु तद्बीजं, भ्रूमध्ये तारबीजकं । हस्तिवक्त्रश्च शिरसि, लम्बोदरो ललाटके ।।
उच्छिष्टो नेत्रयोः पातु, कर्णी पातु महात्मने । पाशांकुशमहाबीजं, नासिकायां च रक्षतु ।।
भूतीश्वरः परः पातु, आस्यं जिह्वा स्वयंवपु । तद्बीजं पातु मां नित्यं, ग्रीवायां कण्ठदर्शके ।।
गं बीजं च तथा रक्षेत्, तथा त्वग्रे च पृष्ठके । सर्वकामश्च हृत्पातु, पातु मां च करद्वये ।।
उच्छिष्टाय च हृदये, वह्निबीजं तथोदरे । मायाबीजं तथा कट्यां, द्वावूरु सिद्धिदायकः ।।
जंघायां गणनाथश्च, पादौ पातु विनायकः । शिरसः पादपर्यन्तमुच्छिष्टगणनायकः ।।
आपाद्मस्तकान्तं च, उमापुत्रश्च पातु माम् । दिशोष्टौ च तथाऽऽकाशे, पाताले विदिशाष्टके ।।
अहर्निशं च मां पातु, मदचञ्चल-लोचनः । जलेऽनले च संग्रामे, दुष्टकारागृहे वने ।।
राजद्वारे घोरपथे, पातु मां गजनायकः । इदं तु कवचं गुह्यं, मम वक्त्रात् विनिर्गतम् ।।
त्रैलोक्ये सततं पातु, द्विभुजश्च चतुर्भुजः । बाह्यमभ्यन्तरं पातु, सिद्धिबुद्धिविनायकः ।।
सर्व-सिद्धि-प्रदं देवि ! कवचमृद्धिसिद्धिदम् । एकान्ते प्रजपेन्मन्त्रं, कवचं युक्तिसंयुतम् ।।
इदं रहस्यं कवचमुच्छिष्टगणनायकम् । सर्ववर्मसु देवेशि ! इदं कवचनायकम् ।।
एतत् कवचमाहात्म्यं, वर्णितु नैव शक्यते । धर्मार्थकाममोक्षादि, नानाफलप्रदं नृणाम् ।।
शिवपुत्रः सदा पातु, पातु मां च सुरार्चितः । गजाननः सदा पातु, गणराजश्च पातु माम् ।।
सदा शक्तिरतः पातु, पातु मां कामविह्वलः । सर्वाभरणभूषाढ्या, पातु मां सिन्दुरार्चितः ।।
पञ्चमोदकरः पातु, पातु मां पार्वतीसुतः । पाशांकुशधरः पातु, पातु मां च धनेश्वरः ।।
गदाधरः सदा पातु, पातु मां काममोहितः । नग्ननारीरतः पातु, पातु मां च गणेश्वर ।।
अक्षय्यवरदः पातु, शक्तियुक्तः सदाऽवतु । भालचन्द्रं सदा पातु, नानारत्नविभूषितः ।।
उच्छिष्टगणनाथश्च, मदघूर्णितलोचनः । नारीयोनिरसास्वादः, पातु मां गजकर्णकः ।।
प्रसन्नवदनः पातु, पातु मां भगवल्लभः । जटा-धरः सदा पातु, पातु मां च किरीटधृक् ।।
पद्मासनस्थितः पातु, रक्तवर्णश्च पातु माम् । नग्नसामपदोन्मतः, पातु मां गणदैचतः ।।
वामांगे सुन्दरीयुक्तः, पातु मां मन्मथ-प्रभुः । क्षेत्रप्रवसितः पातु, पातु मां श्रुतिपाठकः ।।
भूषणाढ्यस्तु मां पातु, नानाभोगसमन्वितः । स्मिताननः सदा पातु, श्रीगणेशकुलान्वितः ।।
श्रीरक्तचन्दनमयः, सुलक्षण गणेशः । श्वेतार्कगणनाथश्च, हरिद्रागणनायकः ।।
परिभद्रगणेशश्च, पातु सप्तगणेश्वरः । प्रवालक गणाध्यक्षो, गजदन्तो गणेश्वरः ।।
हरबीजगणेशश्च, भद्राक्षगणनायकः । दिव्यौषधिसमुद्भूतो, गणेशश्चिन्तितप्रदः ।।
लवणस्य गणाध्यक्षो, मृत्तिकागणनायकः । तण्डुलाक्षगणाध्यक्षो, गोमयस्य गणेश्वरः ।।
स्फटिकाक्षगणाध्यक्षो, रुद्राक्षगणदैवतः । नवरत्नगणेशश्च, आदिदेवो गणेश्वरः ।।
पञ्चाननश्चतुर्वक्त्रो, षडाननगणेश्वरः । मयूरवाहनः पातु, पातु मां मूषकासनः ।।
पातु मां देवदेवेशः, पातु माम् ऋषिपूजितः । पातु मां सर्वदा देवो, देवदानवपूजितः ।।
त्रैलोक्यपूजितो देवः, पातु मां च विभुः प्रभुः । रंगस्थं च सदा पातु, सागरस्थं सदाऽवतु ।।
भूमिस्थं च सदा पातु, पातालस्थं च पातु माम् । अन्तरिक्षे सदा पातु, आकाशस्थं सदाऽवतु ।।
चतुष्पथे सदा पातु, त्रिपथस्थं च पातु माम् । बिल्वस्थं च वनस्थं च, पातु मां सर्वतः स्थितम् ।।
राजद्वारस्थितं पातु, पातु मां शीघ्रसिद्धिदः । भवानीपूजितः पातु, ब्रह्माविष्णुशिवार्चितः ।।
।।फल-श्रुति।।
इदं तु कवचं देवि ! पठनात् सर्वसिद्धिदम् । उच्छिष्टगणनाथस्य, समन्त्रं कवचं परम् ।।
स्मरणाद् भूपतित्वं च, लभते सांगतां ध्रुवम् । वाचःसिद्धिकरं शीघ्रं, परसैन्यविदारणम् ।।
सर्वसौभाग्यदं शीघ्रं, दारिद्रयार्णवघातकम् । सुदारसुप्रजासौख्यं, सर्वसिद्धिकरं नृणाम् ।।
जले अनले निले अरण्ये सिंधुतिरे सरित्तटे।। स्मशाने दूरदेशे च रणे पर्वतगह्वरे ।।
राजद्वारे भये घोरे निर्भयो जायते ध्रुवम सागरे च महाशीते दुर्भिक्षे दुष्टसंकटे ।। भूतप्रेतपिशाचादि यक्षराक्षसजे भये ।।
राक्षसीयक्षिणी क्रूर शाकिनीडाकीनी भये ।। राज मृत्यु हरं देवी कवचं कामधेनुवत ।।
अनंत फलदं देवी तथा अमोघं च पार्वती ।। कवचेन विना मंत्र यो जपेदगणनायकम ।।
इह जन्मानि पापिष्ठो जन्मांते मूषकोभवेत ।। इति परमरहस्यं देवदैवार्चितस्य कवचमुदितमेतत्पार्वतीशेन दैव्यै ।।
पठति स लभ्यते वैभक्तितो भक्तवर्य: प्रचुरसकलसौख्यं शक्तिपुत्रप्रसादात ।।
इति श्रीरूद्रयामलतंत्रे उमामहेश्वर संवाद श्रीमदउच्छिष्ठ गणपती कवच निरूपणं नाम तृतीय रत्न समाप्तम ।।
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