चन्द्रमा स्वभाव ग्रह भाव राशि नक्शत्र विवेचन

 ज्‍योतिष : कुण्‍डली में चंद्रमा राशि भाव नक्षत्र सकारात्मक  नकारात्‍म विवेचन 
चंद्र प्रभावित जातक उन्‍हें कहेंगे जिनकी कुण्‍डली में चंद्रमा बहुत ही बलशाली स्थिति में बैठा हो। कर्क अथवा वृषभ लग्‍न में बैठा चंद्रमा जातक को चंद्र प्रभावित जातक बना देता है। कुण्‍डली में अन्‍य स्‍थानों पर भी अगर चंद्रमा दूसरे ग्रहों से बल प्राप्‍त कर पावरफुल स्थिति में हो तो वह जातक को चंद्र प्रभावित जातक बना देता है।

सामान्‍य तौर पर चंद्र प्रभावित जातक मानसिक रूप से दृढ़ किंतु संवेदनशील होते हैं। चंद्रमा पानी की तरह होता है, जिस प्रकार के ग्रह का उसे प्रभाव मिल रहा हो, वह वैसा ही होने लगता है। चंद्रमा के मूल स्‍वभाव में रचनात्‍मकता और उत्‍पादकता शामिल होती है। अब अगर चंद्रमा मंगल के प्रभाव में हो तो इस रचनात्‍मकता में एक सहज तेजी आ जाती है वहीं शुक्र के साथ हो तो एक लग्‍जरी का सेंस आता है, शनि के साथ हो तो नकारात्‍मकता आएगी और बुध के साथ हो तो गणनाओं में चतुर बना देगी। हालांकि बुध और चंद्र नैसर्गिक रूप से शत्रु हैं, ऐसे में गणनाओं की चतुरता अधिकांशत: नकारात्‍मक पक्ष लिए हुए होगी। कुल मिलाकर अकेला चंद्रमा केवल संवेदनशीलता और भावनाओं की प्रबलता ही दिखा सकता है, किसी दूसरे ग्रह का साथ मिलने पर स्‍वच्‍छ निर्मल जल में उस तत्‍व के गुण समाहित हो जाते हैं। यही कुण्‍डली में भावों में विचरण करते चंद्रमा के साथ भी होता है। बजाय चंद्रमा अपने स्‍वतंत्र फल देने के, भाव से संबंधित फल अधिक तीव्रता से देने लगता है।

अगर कुण्‍डली में चंद्रमा नकारात्‍मक परिणाम दे तो सामान्‍य तौर पर यह मति को भ्रष्‍ट कर देता है। इससे जातक अनिर्णय की स्थिति में फंस जाता है, मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है, झूठ बोलने की प्रवृत्ति बनने लगती है और अफवाहें उड़ाने लगता है। बहुधा ऐसे जातक एंजाइटी के शिकार भी हो जाते हैं।

चंद्रमा लग्‍न में
नकारात्‍मक हो तो जातक चिंता युक्त, स्त्री से अपमानित, स्त्री को पूर्ण तृप्ति न करने वाला, संतान की प्राप्ति विलंब से होती है, रोगी, मानसिक बीमारियों का रोगी, पागल होता है, जातक को डूबकर मरने का भय रहता है।

चंद्रमा द्वितीय में
नकारात्मक हो तो जातक के विद्या अध्ययन में बताती है, पैतृक धन का लाभ नहीं होता, धन का अधिक व्यय करता है, स्त्री की अल्पायु होती है, जातक मदिरापान नशीली वस्तुओं का व्यसनी होता है, पिता के लिए रोगकारक होता है।

चंद्रमा तृतीय में
नकारात्मक हो तो जातक मानसिक चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है, भरम रोग से पीड़ित होता है, कई बार निद्रा में चलने की बीमारी भी होती है, यात्रा में हानि होती है, पिता की आयु होती है, भाई बहनों द्वारा अपमानित होता है, पड़ोसी तथा रिश्तेदारों से विरोध होता है।

चन्द्रमा चतुर्थ भाव में
नकारात्मक हो तो जातक पैतृक धन का नाश करता है, गृहस्थ जीवन दुखी होता है, स्त्री द्वारा विरोध झेलना पड़ता है, स्वयं माता का विरोधी होता है, वाहन से दुर्घटना का भय होता है, गृहस्थ जीवन के संबंध में चिंतित रहता है।

चन्द्रमा पंचम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक अस्थिर मन वाला, दुखी, माता से अपमानित होता है, जातक की संतान उसकी विरोधी होती है, विद्या में विघ्न पड़ता है, व्यापार में हानि होती है।

चंद्रमा छठे भाव में
नकारात्मक हो तो जातक दुबले पतले शरीर का होता है, जातक को लकवा, गुर्दे का रोग, मूत्र रोग आदी होने की आशंका रहती है, कई बार आंत के रोग भी हो जाते हैं, जातक को पालतू पशु रखने तथा मुर्गीखाना खोलने पर हानि होती है, अधिकांश जीवन में कर्जदार बना रहता है, धन का व्यय अधिक करता है, माता से झगड़ा करते हैं, मानसिक रूप से विक्षिप्त रहता है, गैस तथा अतिसार रोगों की आशंका सर्वाधिक होती है। यहाँ चन्द्रमा शनि से दृष्ट अथवा शनि के साथ हो तो विवाह विलम्ब से होता है अथवा विवाह नहीं होता।

चन्द्रमा सप्तम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक दुबले पतले शरीर का होता है, स्त्री का मन अस्थिर होता है, दूसरों से ईर्ष्या रखने वाला होता है, माता से कलह करने वाला होता है, नशीली वस्तुओं का सेवन करने वाला होता है, यहाँ चन्द्रमा पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो स्त्री की मृत्यु होती है और दूसरा विवाह करना पड़ता है।

चन्द्रमा अष्टम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक अल्पायु और माता के लिए अशुभ होता है, जातक परस्त्रीरत तथा गुप्त रोगों से ग्रस्त होता है, पर स्त्री पर धन नाश करने वाला होता है, अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है।

चन्द्रमा नवम भाव में
नकारात्मक हो तो पिता की अल्पायु का योग होता है तथा माता के लिए रोगकारक होता है, विदेश में अपेक्षित सफलता नहीं मिलती।

चन्द्रमा दशम भाव में
नकारात्मक हो तो जातक का मन अस्थिर रहता है, नौकरी तथा व्यापार बदलने में हानि उठाता है, पैतृक धन प्राप्त करने में अड़चनें आती है, स्त्री से कलह रहती है, माता की अल्पायु होती है, अगर चुनाव लड़े तो पराजय होती है, स्त्री पक्ष से धन का लाभ नहीं होता, जातक रोगी होता है।

चन्द्रमा एकादश भाव में
नकारात्मक परिणाम दे रहा हूँ तो सन्तान का सुख अल्प होता है, पुत्र संतति कम होती है, माता से कलह रहती है, नपुंसकता के रोग का भय होता है।

चन्द्रमा द्वादश भाव में
नकारात्मक हो तो जातक आंख का रोगी होता है, ससुराल का धन नाश करने वाला होता है, परस्त्रीरत होता है, गुप्त रोग का रोगी होता है, अपनी स्त्री के लिए रोगकारक और दुष्चरित्र होता है। विदेश भ्रमण में असफलता मिलती है तथा धन का नाश होता है।

चन्द्रमा विवेचन और उसके के रुष्ट होने के संकेत केमद्रुम दोष और उपाय -

मन और मानव जीवन को प्रभावित करता है चन्द्रमा

चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। ब्रह्मांड में जितने भी ग्रह हैं, उन सभी का व्यक्ति के ‍जीवन पर विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। मानव ने जब से काल के चिंतन का आरंभ किया, उसी समय से चन्द्रमा उसके लिए अपने घटने-बढ़ने की प्रक्रिया के कारण प्रकृति का अखंड और निर्विवाद पंचांग रहा है। संसार के सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में प्रत्येक काल में चन्द्रमा की ति‍थियों के अनुसार ही धार्मिक विधि रचने का उल्लेख पाया जाता है।

व्यक्ति के चरित्र के सूक्ष्म रूप, विशिष्ट गुण, उसकी प्रतिभा, भावनाओं, प्रवृत्तियों, योग्यताओं तथा भावनात्मक प्रवृत्ति आदि का ज्ञान जन्मकाल के ग्रहों की स्थिति से मालूम हो जाता है।

समुद्र में उत्पन्न होने वाले ज्वार-भाटे का मूल कारण चन्द्रमा की स्थिति है। पूर्णिमा का प्रभाव पशु-पक्षियों और रेंगने वाले कीड़ों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि उन्मादग्रस्त मनुष्यों पर भी पड़ता है। वे सभी अन्य दिनों की अपेक्षा पूर्णिमा के दिन ही अधिक उत्तेजित और अव्यवस्थित दिखाई देते हैं। संसार के जितने की ऊष्ण प्रदेश हैं, वहां को लोगों को पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की चांदनी में सोने पर विचित्र स्वप्न दिखाई देते हैं। इस प्रकार के विचित्र स्वप्न अन्य किसी दिन में दिखाई नहीं देते। यही नहीं, स्त्रियों के मासिक धर्म और चंद्रमा के 28 दिवस चक्र के बीच सीधा संबंध है।

चंद्रमा के घटने-बढ़ने का व्यक्ति के मस्तिष्क के साथ परंपरागत संबंध होता है। शुक्ल पक्ष में मनुष्य का मस्तिष्क जागरूक होता है। इन दिनों उसे नींद भी अच्‍छी आती है। हम अपने जीवन में चंद्रमा के प्रभाव का स्पष्ट अनुभव करते हैं। चंद्रमा का सृष्टि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। संपूर्ण प्रकृति, भले ही वह जड़ हो या चेतन, उसमें धड़कन होती है, स्पंदन होता है और वह नित्य परिवर्तनशील है।

चन्द्रमा का अपनी तिथियों के अनुसार विश्व के जड़ और चेतन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जो मछुआरे नाव लेकर मछलियां पकड़ने जाते हैं, वे चंद्रमा के इस प्रभाव से भलीभांति परिचित होते हैं।

चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। मन की कल्पनाशीलता चन्द्रमा की स्थिति से प्रभावित होती है। स्त्रियों में स्थित कामभावना चंद्रमा की कलाओं के उपचय-अपचय के अनुसार विभिन्न अंगों में तिथिक्रम से केंद्रित रहा करती है। कामशास्त्र इस संबंध में सलाह देता है कि तिथि के अनुसार स्त्री के संबंधित अंग को सहलाने से वह जल्दी उत्तेजित हो जाते है

चंद्रमा सुख स्थान का और माता का कारक होता है। यह मन की संकल्प-विकल्पमूलक कल्पनाशक्ति का ‍परिचायक होता है। शारीरिक स्थित‍ि में यह जल ग्रह होने के कारण न्यूमोनिया तथा कफजनित रोग सर्दी-जुकाम आदि का सूचक रहता है। जन्म कुंडली में जिन पर चंद्रमा निर्बल रहता है, वे प्राय: शीतजनित रोगों से पीड़ित रहते हैं। रक्त प्रवाह और हृदय इसके अधिकृत क्षेत्र हैं, किंतु अन्य ग्रह के साथ अशुभ य‍ुति करने पर ही यह रक्तचाप, हृदय रोग आदि दिया करता है।

चंद्रमा द्विस्वभाव रहता है अर्थात अकेला ही यह पाप और शुभ बन जाता है। शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक पूर्ण प्रकाशमान रहने के कारण यह बली रहता है। यह पश्चिम दिशा का स्वामी माना जाता है। चंद्रमा कर्क राशि में उच्च का एवं वृश्चिक राशि में नीच का माना जाता है। चंद्रमा उच्च राशि का होने पर मिष्ठान्न भोजी और अलंकार प्रिय बनाता है तथा इनके प्राप्त होने के योग भी बनाता है। मूल त्रिकोणी होने पर यह धनी और सुखी भी करता है। चंद्रमा नीच राशिगत होने पर धर्म, बुद्धि का ह्रास करता है तथा दुरात्मा व दुखी बनाता है। शुक्र ग्रही होने पर यह माता के स्नेह और सुख से वंचित करता है।

ज्योतिष एवं चन्द्रमा का सम्बन्ध,महत्त्व एवं प्रभाव.तथा उपाय

भारतीय वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व दिया जाता है तथा व्यक्ति के जीवन से लेकर विवाह और फिर मृत्यु तक बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानने के लिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हों, उसी नक्षत्र को उस व्यक्ति का जन्म नक्षत्र माना जाता है जिसके साथ उसके जीवन के कई महत्त्वपूर्ण तथ्य जुड़े होते हैं जैसे कि व्यक्ति का नाम भी उसके जन्म नक्षत्र के अक्षर के अनुसार ही रखा जाता है। भारतीय ज्योतिष पर आधारित दैनिक, साप्ताहिक तथा मासिक भविष्य फल भी व्यक्ति की जन्म के समय की चन्द्र राशि के आधार पर ही बताए जाते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में स्थित होते हैं, वह राशि उस व्यक्ति की चन्द्र राशि कहलाती है।

पूर्णिमा का चंद्रमा मन को बहुत आनंद देता है। इसकी तुलना बिजली की सजावट से नहीं हो सकती। चंद्रमा की इसी विशेषता के कारण स्नेह के लिए उसे देखा जाता है। स्नेह के बारे में सोचते ही मां का चेहरा सामने आ जाता है, इसलिए चंद्रमा को मातृकारक कहा गया है, इसीलिए बच्चे उसे मामा कहते हैं। भूखा बच्चा जब मां की गोद में बैठकर स्तनपान करता है तब मां के मन से जो स्नेह भावना उभरती है, उसी स्नेह का कारक ग्रह है चंद्रमा। चंद्रमा सबसे गति वाला ग्रह है और उसकी गति में सर्वदा परिवर्तन होता है, इसलिए जहां गति से जुड़ी बातें आ जायं, वहां चंद्रमा महत्वपूर्ण हो जाता है। धरती पर सबसे अधिक गति होती है मन की। पल भर में गति बदलने वाला मन चंद्रमा से भी गतिशील है, अत: चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। मन को बेहद खुशी या गम हो तो आंखों से आंसू आ जाते हैं, अत: पानी, दूध, शरबत जैसी बहने वाली चीजें चंद्रमा के अधिकार में होती हैं। पानी के साथ पानी से जुड़े पौधे, मछली, कुएं, तालाब, सागर आदि का भी कारक ग्रह चंद्रमा है।

शास्त्रों के अनुसार भी चन्द्रमा मन का कारक है। चन्द्रमा दिल का स्वामी है। चांदी की तरह चमकती रात चन्द्रमा का विस्तार राज्य है। इसका कार्य सोने चांदी का खजाना शिक्षा और समृद्घि व्यापार है। चन्द्रमा के घर शत्रु ग्रह भी बैठे तो अपने फल खराब नहीं करता। प्रकृति की हलचल में चंद्र के प्रभाव विशेष होते हैं।

चन्द्रमा एवं विश्व—–

चन्द्रमा धरती का सबसे निकटतम ग्रह है. इसमें प्रबल चुम्बकीय शक्ति है. यही कारण है क़ि समुद्र के जल को यह बहुत ही ऊपर तक खींच देता है. और जब घूमते हुए धरती से कुछ दूर चला जाता है तो यही जल वापस पुनः समुद्र में बहुत भयानक गति से वापस आता है. जिसके कारण समुद्र में ज्वार भाटा एवं तूफ़ान आदि आते है. जिस तरह एक साधारण चुम्बक के दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति का केंद्र होता है. उसी प्रकार इसके भी दोनों सिरों पर चुम्बकीय शक्ति बहुत ज्यादा होती है. इसका आकार पूर्णिमा को छोड़ कर शेष दिनों में नाल चुम्बक के आकार का होता है. किन्तु पूर्णिमा के दिन जब इसका आकार पूरा गोल होता है, उस समय में इसमें भयानक आकर्षण शक्ति होती है. किन्तु यह शक्ति इसके चारो और की परिधि पर होने के कारण भयावह नहीं होती है. इसके विपरीत यह द्वितीया के दिन जब बिलकुल ही पतला होता है, बहुत ही हानि कारक होता है. कारण यह है क़ि इस दिन यह धरती से दूर होता है. तथा धरती के पदार्थो को बहुत दूर तक खींच देता है. और जब छोड़ता है तब बहुत ही ऊंचाई से उन पदार्थो के गिरने के कारण धन जन की बहुत हानि होती है. आप लोगो ने ध्यान दिया होगा क़ि अभी भी ग्रामीण इलाको में द्वितीया के चन्द्रमा को देखने की तथा उसे प्रणाम करने की होड़ या उत्सुकता लगी रहती है. और यह मान्यता है क़ि कम से कम हाथ में या शरीर के किसी न किसी हिस्से में सोने का कोई आभूषण हो तो और भी शुभ होता है. सोने की चमक दार सतह चन्द्रमा की किरणों को परावर्तित कर देती है. तथा उसकी परम लाभकारी ऊर्जा को शरीर में अवशोषित कर लेती है. परावर्तित करने की क्षमता तो दर्पण में ज्यादा होती है. किन्तु दर्पण विद्युत् या ऊष्मा का कुचालक होता है. इसलिए उससे केवल प्रकाश का परावर्तन ही हो पाता है. किन्तु चन्द्रमा की किरणों की लाभ कारी ऊर्जा शरीर को नहीं मिल पाती. इसीलिए शरीर के किसी भी अँग में सोने के आभूषण की उपस्थिति अनिवार्य बताई गयी है.

चन्द्रमा को सुधांशु भी कहा जाता है. पौराणिक मतानुसार चन्द्रमा पर अमृत पाया जाता है. इसके अलावा इसकी सतह पर अनेक अमोघ औषधियों की उपस्थिति भी है. संभवतः इसी को ध्यान में रखते हुए कहा गया है क़ि

यातीति एकतो अस्त शिखरं पतिरोषधीनाम आविषकृतो अरुण पुरः सरः एकतो अर्कः.

तेजो द्वयस्य युगपद व्यसनोदयाभ्याम लोको नियम्यदिव आत्म दशांतरेषु.

अर्थात एक तरफ तो औषधियों के एक मात्र स्वामी चन्द्रमा अस्ताचल पर जा रहे है. तथा दूसरी तरफ उदयाचल पर अरुण को आगे किये हुए सूर्य उदय हो रहे है. इस प्रकार ये दोनों अपनी अपनी इस अस्त एवं उदय की स्थिति से यह समस्त विश्व को बता रहे है क़ि यह संसार का उत्थान एवं पतन चक्र है.

शुक्ल पक्ष की द्वितीया लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा निरंतर धरती के नज़दीक आता चला जाता है. तथा कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावश्या तक चन्द्रमा धरती से दूर चलता जाता है. चन्द्रमा ज्यो ज्यो धरती से दूर चलता जाता है. यह पतला होता चला जाता है. उस समय इसके दोनों नुकीले हिस्से बहुत ही शक्ति शाली चुम्बक की तरह धरती की समस्त वस्तुओ को खींचता चला जाता है. संभवतः इसीलिए कृष्ण पक्ष और उसमें भी रात के समय और उसमें भी पाप राशि एवं लग्न में जन्म लेना थोड़ा अशुभ माना गया है.

चन्द्रमा के घर घर अर्थात कर्क राशि में होते हुए अपने घर अर्थात सिंह राशि में विश्राम करते हुए दुबारा फिर से धरती से दूर जाने लगेगा तो वर्षा शुरू हो जायेगी. क्योकि जो भाप अंतरिक्ष में एकत्र हुआ है, सूर्य के दूर जाते ही ठंडा होकर धरती पर गिरना शुरू हो जाएगा. कहा भी गया है क़ि 14 जनवरी या मकर संक्रांति से दिन बड़ा होने लगता है. दिन बड़ा होगा तो ज्यादा देर तक सूर्य की किरणे धरती के ऱस को अवशोषित करेगी, और ज्यादा भाप आकाश में जाएगा.

यदि किसी की कुंडली में पांचवे भाव में सूर्य हो तथा चौथे भाव में चन्द्रमा हो और ये दोनों मीन से लेकर सिंह राशि के मध्य ही हो तो वह बालक कुशाग्र बुद्धि, उच्च संस्कार से उक्त संतान एवं देश विदेश में ख्याति अर्जित करने वाला होगा. कारण यह है क़ि ऐसी अवस्था में मष्तिष्क के परासवी द्रव्यों का सघनी करण एवं शोधन दोनों ही सूक्षमता एवं गहनता से होता रहेगा. क्योकि जितने द्रव्य चन्द्रमा के द्वारा उद्वेलित होगे, सूर्य के द्वारा उतने का सघनी करण एवं शोधन होता चला जाएगा. इसके विपरीत यदि सूर्य तुला राशि में हो तथा चन्द्रमा मीन में हो तो ऐसी अवस्था में इनकी चौथे भाव की उपस्थिति माता पिता एवं धन संपदा के लिए हानि कारक होगी. कारण यह है क़ि न तो चन्द्रमा का प्रभाव मष्तिष्क पर पडेगा और न तो सूर्य के द्वारा इसका कोई शोधन या सघनीकरण होगा. क्योकि चंद्रामा सूर्य से बहुत ही दूर जा चुका होगा.

चन्द्रमा से ही मनुष्य का मन और समुद्र से उठने वाली लहरे दोनों का निर्धारण होता है। माता और चंद्र का संबंध भी गहरा होता है। मूत्र संबंधी रोग, दिमागी खराबी, हाईपर टेंशन, हार्ट अटैक ये सभी चन्द्रमा से संबंधित रोग है।

वैसे तो चन्द्रमा को सुख-शांति का कारक माना जाता हैलेकिन यही चन्द्रमा जब उग्र रूप धारण कर ले तो प्रलयंकर स्वरूप दिखता है। तंत्र ज्योतिष में तो ये कहावत है कि चन्द्रमा का पृथ्वी से ऐसा नाता है कि मानो मां-बेटे का संबंध हो, जैसे बच्चे को देख कर मां के दिल में हलचल होने लगती है, वैसे ही चन्द्रमा को देख कर पृथ्वी पर हलचल होने लगती है, चन्द्रमा जिसकी सुन्दरता से मुग्ध हो कवि रसीली कविताओं और गीतों का सृजन करते हैं वहीँ भारतीय तंत्र शास्त्र इसे शक्तियां अर्जित करने का समय मानता है।

आकाश में पूरा चांद निकलते ही कई तांत्रिक सिद्घियां प्राप्त करने में जुट जाते हैं। चन्द्रमा प्राकृतिक तौर पर बहुत सूक्ष्म प्रभाव डालता है जिसे साधारण तौर से नहीं आंका जा सकता लेकिन कई बार ये प्रभाव बहुत बढ जाता है जिसके कई कारण हो सकते हैं।

ज्योतिष शास्त्र इसके संबंध में कहता है कि चन्द्रमा का आकर्षण पृथ्वी पर भूकंप, समुद्री आंधियां, तूफानी हवाएं, अति वर्षा, भूस्खलन आदि लाता हैं। रात को चमकता पूरा चांद मानव सहित जीव-जंतुओं पर भी गहरा असर डालता है।

चन्द्रमा एक शीत और नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें स्त्री ग्रह माना जाता है। चन्द्रमा प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में मुख्य रूप से माता तथा मन के कारक माने जाते हैं और क्योंकि माता तथा मन दोनों ही किसी भी व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्त्व रखते हैं, इसलिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति कुंडली धारक के लिए अति महत्त्वपूर्ण होती है। माता तथा मन के अतिरिक्त चन्द्रमा रानियों, जन-संपर्क के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों, परा-शक्तियों के माध्यम से लोगों का उपचार करने वाले व्यक्तियों, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों, होटल व्यवसाय तथा इससे जुड़े व्यक्तियों तथा सुविधा और ऐशवर्य से जुडे ऐसे दूसरे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों, सागरों तथा संसार में उपस्थित पानी की छोटी-बड़ी सभी इकाईयों तथा इनके साथ जुड़े व्यवसायों और उन व्यवसायों को करने वाले लोगों के भी कारक होते हैं।

किसी व्यक्ति की कुंडली से उसके चरित्र को देखते समय चन्द्रमा की स्थिति अति महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि चन्द्रमा सीधे तौर से प्रत्येक व्यक्ति के मन तथा भावनाओं को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा वृष राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा इस राशि में स्थित चन्द्रमा को उच्च का चन्द्रमा कहा जाता है। वृष के अतिरिक्त चन्द्रमा कर्क राशि में स्थित होने से भी बलवान हो जाते हैं जो कि चन्द्रमा की अपनी राशि है। चन्द्रमा के कुंडली में बलशाली होने पर तथा भली प्रकार से स्थित होने पर कुंडली धारक स्वभाव से मृदु, संवेदनशील, भावुक तथा अपने आस-पास के लोगों से स्नेह रखने वाला होता है। ऐसे लोगों को आम तौर पर अपने जीवन में सुख-सुविधाएं प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास नहीं करने पड़ते तथा इन्हें बिना प्रयासों के ही सुख-सुविधाएं ठीक उसी प्रकार प्राप्त होती रहतीं हैं जिस प्रकार किसी राजा की रानी को केवल अपने रानी होने के आधार पर ही संसार के समस्त ऐशवर्य प्राप्त हो जाते हैं।

शरीर के हिस्से——

चंद्रमा का मन पर प्रभाव होता है। सीना, बहती वस्तुओं का कारक ग्रह होने से शरीर में स्थित द्रव्य जैसे रक्त, मूत्र, पाचक रस, पाचन क्रिया पर चंद्रमा का प्रभाव होता है। रात में प्राकृतिक रोशनी चंद्रमा से ही मिलती है इसलिए दृष्टि व आंख चंद्रमा के अधिकार में है। पुरुषों की बांयी तथा स्त्रियों की दायीं आंख तथा वक्षस्थल पर चंद्रमा का प्रभाव होता है।

गुण——

चंद्रमा की रोशनी शीतल है इसलिए शीतलता, ठंडक, पानी से जुड़ा हुआ, हवा में स्थित भांप, गति में बदलाव, सैर की चाह इत्यादि चंद्रमा का गुण धर्म है। चंद्रमा की कर्क राशि कुण्डली में (कालपुरुष की गणना में) चतुर्थ स्थान पर है। यह चतुर्थ स्थान भवन, भूमि, मातृभूमि को दर्शाता है, इसलिए भूमि, भवन, देशप्रेम की भावना का भी विचार चंद्रमा से किया जाता है।

बीमारियां——

चंद्रमा का मन पर प्रभाव है। इसलिए मन के रोग, अजीब व्यवहार, चिड़चिड़ापन, उन्माद की बीमारियां आदि चंद्रमा से देखी जाती हैं। पाचन की शिकायतें, बहती वस्तुओं पर अधिकार जैसे खांसी, जुकाम, ब्राकायटीस, हाइड्रोशील, कफ से जुड़ी बीमारियां, दृष्टि दोष चंद्रमा से देखे जाते हैं।

कारोबार—–

चंद्रमा जल से जुड़ा है इसलिए सिंचाई, जल विभाग, मछली, नौसेना, मोती आदि का कारोबार इससे देखा जाता है। चूंकि चंद्रमा बहती वस्तुओं से संबंधित है इसलिए कैरोसिन, पेट्रोल के कारोबार पर इसका नियंत्रण है। स्नेह का कारक ग्रह होने से फूल, नर्सरी व रसों से जुड़ा कारोबार इसके अधिकार क्षेत्र में आता है।

उत्पाद—–

चंद्रमा तेज गति वाला ग्रह है इसलिए जल्दी बढ़ने वाली सब्जियां, रसदार फल, गन्ना, शकरकंद, केसर और मक्का इसके उत्पाद हैं। चंद्रमा रंगों का भी कारक ग्रह है इसलिए निकिल, चांदी, मोती, कपूर, मत्स्य निर्माण, सिल्वर प्लेटेड मोती जैसे वस्तुएं बनाने का कारोबार चंद्रमा के अधिकार में है।

स्थान—–

शीतलता का कारक ग्रह होने से हिल स्टेशन, पानी से जुड़े स्थान, टंकियां, कुएं, हरे पेड़ों से सजे जंगल, दूध से जुड़ा स्थान, गाय-भैंसों का तबेला, फ्रिज, पीने का पानी रखने का स्थान, हैंडपंप आदि को चंद्रमा का स्थान माना जाता है।

जानवर व पंक्षी—–

छोटे पालतू जानवर, कुत्ता, बिल्ली, सफेद चूहे, बत्तख, कछुआ, केकड़ा, मछली के शरीर पर चंद्रमा का अधिकार होता है। चंद्रमा रस निर्माण का कारक ग्रह है इसलिए रसदार फल, गन्ना, फूल-गोभी, ककड़ी, खीरा, व जल में पनपने वाली सब्जियों पर चंद्रमा का अधिकार है।

चन्द्रमा मनुष्य के शरीर में कफ प्रवृति तथा जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शरीर के अंदर द्रव्यों की मात्रा, बल तथा बहाव को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा के प्रबल प्रभाव वाले जातक सामान्य से अधिक वजनी हो सकते हैं जिसका कारण मुख्य तौर पर चन्द्रमा का जल तत्व पर नियंत्रण होना ही होता है जिसके कारण ऐसे जातकों में सामान्य से अधिक निद्रा लेने की प्रवृति बन जाती है तथा कुछेक जातकों को काम कम करने की आदत होने से या अवसर ही कम मिलने के कारण भी उनके शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ जाती है। ऐसे जातकों को आम तौर पर कफ तथा शरीर के द्रव्यों से संबंधित रोग या मानसिक परेशानियों से संबंधित रोग ही लगते हैं।

कुंडली में चन्द्रमा के बलहीन होने पर अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर दूषित होने पर जातक की मानसिक शांति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा उसे मिलने वाली सुख-सुविधाओं में भी कमी आ जाती है। चन्द्रमा वृश्चिक राशि में स्थित होकर बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति विशेष और अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण भी चन्द्रमा बलहीन हो जाते हैं। किसी कुंडली में अशुभ राहु तथा केतु का प्रबल प्रभाव चन्द्रमा को बुरी तरह से दूषित कर सकता है तथा कुंडली धारक को मानसिक रोगों से पीड़ित भी कर सकता है। चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को अनिद्रा तथा बेचैनी जैसी समस्याओं से भी पीड़ित कर सकता है जिसके कारण जातक को नींद आने में बहुत कठिनाई होती है। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा की बलहीनता अथवा चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण विभिन्न प्रकार के जातकों को उनकी जन्म कुंडली में चन्द्रमा के अधिकार में आने वाले क्षेत्रों से संबंधित समस्याएं आ सकती हैं।

गोचर और चन्द्रमा

व्यक्ति के जन्म के समय जो ग्रह जिस राशि में होते हैं, लग्न निकालकर कुंडली में उस राशि में लिखे जाते हैं। ग्रहों की गति के आकार पर राशि परिवर्तन की अवधि होती है। सूर्य की गति स्थिर अर्थात् एक अंश प्रतिदिन के हिसाब से 30 दिवस में राशि परिवर्तन कर लेता है। चंद्रमा की गति काफी तीव्र होने से राशि परिवर्तन सवा दो दिन में कर लेता है।समाचार पत्रों में जो दैनिक भविष्यफल दिया जाता है, उसके अंत में आमतौर पर लिखा होता है, गोचर देखें। आम व्यक्ति गोचर समझता नहीं है। ग्रहों के एक राशि से दूसरी राशि में भ्रमण को गोचर कहते हैं। पाश्चात्य देशों में लग्न एवं सूर्य जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर गोचर फलादेश तैयार करते हैं, लेकिन हमारे यहां चंद्रमा जिस राशि में होता है, उसे लग्न मानकर गोचर फलकिया जाता है।

कल्याण शकट योग

वैद्यनाथ दीक्षित के अनुसार कल्याण शकट योग का निर्माण तभी होता है जब गुरू से चन्द्रमा 6 या आठ भाव में हो। इस योग का केवल एक ही अपवाद है कि यदि चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में स्थित हो तो यह योग भंग हो जाता है।

शषष्टमा गताश्चन्द्र सूर्य राज पुरोहित: केन्द्र दान्य गतो लग्नाद्योग: शकट समग्नित:।। परिणामों पर विचार करते हैं तो

अपि राजा कुले जातो निश्व शकट योगज:। क्लेश यशवस नित्यम संतोप्त निरूप विप्रय:।।

अर्थचाहे कोई व्यक्ति राज परिवार में क्यों नहीं जन्मे, इस योग वाले को निर्धनता, दिन-प्रतिदिन दु:ख-कष्ट और अन्य राजाओं के क्रोध का भाजन बनना प़डता है।

मंत्रेश्वर, फलदीपिकाकार के अनुसार, जीवन्त्यश्तरी समष्टे शशिनितु शकट:, केन्द्रगे नास्ते लग्नथ:।।

जब बृहस्पति से छठे, आठवें या बारहवें भाव में चन्द्र हो तो शकट योग बनता है परन्तु यदि चन्द्र केन्द्र में हो तो शकट योग भंग हो जाता है।

क्वचित क्वचित भाग्य परिचयत: सन् पुन: सर्वा मुपैते भाग्य:,

लोके प्रस्तीधो परिहर्य मन्त: सल्यम प्रपन्न: शकटे ति दु:खी:।।

इस शकट योग में जन्मा जातक प्राय: भाग्यहीन होता है अथवा भाग्यहीन हो जाता है और जीवन में खोए हुए को पुन: पा भी सकता है और प्रतिष्ठा आदि में एक सामान्य व्यक्ति होता है और इस दुनिया में उसका कोई महत्व नहीं होता है। वह नि:स्संदेह भारी मानसिक वेदना सहता है और जीवन में दु:खी ही रह जाता है। दूसरे विद्वानों के विचारों पर दृष्टिपात करते हैं तो यह देखते हैं कि

यदि चन्द्र अपनी उच्चा राशि में हो, स्वग्रही हो अथवा बृहस्पति के भावों में हो और चन्द्रमा बृहस्पति से छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो यह शकट योग का अपवाद बन जाता है। ऎसी स्थिति में शकट योग ही भंग नहीं होता अपितु उसके दुष्परिणाम भी आते हैं परन्तु यही योग जातक को मुकुट योग देकर ऊंचाइयों पर भी पहुंचा देता है।

यदि चन्द्रमा बृहस्पति से छठे-आठवें भाव में हो परन्तु वह मंगल से दृष्ट हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।

यदि राहु-चन्द्र की युति हो अथवा राहु उन्हें देखें तो भी शकट योग भंग हो जाता है।

बृहस्पति से छठे, आठवें या बारहवें भाव में पूर्ण चन्द्र स्थित हो तो भी शकट योग भंग हो जाता है।

यदि षड्बल में बृहस्पति चन्द्र से बली हों तो भी शकट योग भंग हो जाता है।

यदि चन्द्र बृहस्पति से छठे आठवें भाव में स्थित होकर द्वितीय भाव में बैठे तो शकट योग भंग हो जाता है और व्यक्ति धनी होता है। ऎसी ग्रह स्थिति मिथुन लग्न वाले जातकों की ही होती है। चन्द्र से छठे भाव में स्थित बृहस्पति से हंस योग का निर्माण होता है क्योंकि वे निज भाव में होंगे जो सप्तमेश और दशमेश का लग्न से केन्द्र स्थान होगा, चन्द्रमा से अष्टम भाव में स्थित होने पर जातक धनवान नहीं बन सकता है। सूर्य नवम भाव में स्थित होकर गुरू से युति करें और द्वितीय भाव में चन्द्रमा पर उनकी पूर्ण रश्मियां प़डें तो जातक प्रचुर धन का स्वामी हो सकता है परन्तु ऎसी स्थिति में गुरू अस्तंगत दोष से मुक्त हों अथवा दुष्प्रभाव में नहीं हों।

द्वितीय भाव में स्थित उच्चा के गुरू से अष्टम भाव में चन्द्र की स्थिति शुभ नहीं होती है और ऎसे जातक संभवत: 40 वर्ष की आयु होते-होते सब कुछ गंवा देते हैं परन्तु यह बाद में आने वाली दशाओं पर निर्भर करता है कि वह अपना खोया धन और सम्मान पुन: प्राप्त कर लें। माना कोई जातक शनि महादशा में हो और 40 वर्ष की आयु का हो चुका है तो वह बृहस्पति की दशा में सब कुछ गंवा देगा और शनि की अंतर्दशा में पुन: प्राप्त कर लेगा। यदि शनि उनकी कुंडली में शुभ स्थिति में हो। तुला और मीन लग्न के जातकों का शनि शुभ स्थिति में होता है। वृश्चिक में भी शनि की स्थिति ठीक होती है। बृहस्पति से द्वादश भाव में स्थित चन्द्रमा अनफा योग का सृजन करते हैं। द्वितीय भाव के स्वामी लग्नस्थ होकर चन्द्र या बृहस्पति की अन्तर्दशा में किसी जातक को बर्बाद नहीं करते। बहुत सी कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद अब मुझे यह विश्वास हो गया है कि शकट योग के कुछ भी परिणाम होते हों परन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा कि जीवन में बुरे दिन सदा नहीं रहते। जीवन परिवर्तनशील है। बुरा समय जीवन में परीक्षा लेता है और इस परीक्षा एवं कसौटी के लिए शकट योग एक महत्वपूर्ण स्थिति है। योग जीवन में बहुत लंबे समय तक फलीभूत नहीं होते हैं। कुछ समय बाद ये योग स्वत: विलीन होने लगते हैं। यहां मंत्रेश्वर महाराज हमें आशा दिलाते हैं कि रूठा हुआ भाग्य पुन: मनाया जा सकता है, खोई हुई प्रतिष्ठा और धन पुन: अर्जित किए जा सकते हैं। एक साधारण एवं गरीब व्यक्ति भी मानसिक रूप से बहुत प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो सकता है अथवा वही व्यक्ति बहुत अधिक दु:खी, पीç़डत और कष्ट से भरा जीवन व्यतीत करता है। ये सभी परिस्थितियां विभिन्न प्रकार के योगायोग, शकट योगादि के कारण बनती हैं और कई बार इनके अपवाद भी पाए जाते हैं।

चन्द्र ग्रह शांति के उपाय—–

क्या दान करें..???

चन्द्रमा के नीच अथवा मंद होने पर शंख का दान करना उत्तम होता है. इसके अलावा सफेद वस्त्र, चांदी, चावल, भात एवं दूध का दान भी पीड़ित चन्द्रमा वाले व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है. जल दान अर्थात प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाना से भी चन्द्रमा की विपरीत दशा में सुधार होता है. अगर आपका चन्द्रमा पीड़ित है तो आपको चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न दान करना चाहिए. चन्दमा से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करते समय ध्यान रखें कि दिन सोमवार हो और संध्या काल हो. ज्योतिषशास्त्र में चन्द्रमा से सम्बन्धित वस्तुओं के दान के लिए महिलाओं को सुपात्र बताया गया है अत: दान किसी महिला को दें. आपका चन्द्रमा कमज़ोर है तो आपको सोमवार के दिन व्रत करना चाहिए. गाय को गूंथा हुआ आटा खिलाना चाहिए तथा कौए को भात और चीनी मिलाकर देना चाहिए. किसी ब्राह्मण अथवा गरीब व्यक्ति को दूध में बना हुआ खीर खिलाना चाहिए. सेवा धर्म से भी चन्द्रमा की दशा में सुधार संभव है. सेवा धर्म से आप चन्द्रमा की दशा में सुधार करना चाहते है तो इसके लिए आपको माता और माता समान महिला एवं वृद्ध महिलाओं की सेवा करनी चाहिए.

जन्म कुंडली में चंद्र ग्रह यदि अशुभ कारक हो तो निम्न लिखित मन्त्रों का जप करने से चंद्र ग्रह की शांति हो जाती है।

वैदिक मंत्रॐइमं देवा असपत्न सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना राजा।

पुराणोक्त मंत्र- ॐ दधिशंख, तुषाराम्भं क्षीरोदार्णव सम्भवम्।नमामि शशिनं सोमं शंभोः मुकुट भूषणम्।।

स्नान तथा दान काल में यह मंत्र का उच्चारण लाभप्रद होता है।

तंत्रोक्त मंत्र- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः।

चन्द्रमा के जप की संख्या 11000 है।

चन्द्र गायत्री मंत्र- ॐ अमृतांगाय विद्महे कला रूपाय धीमहि तन्नो सोमः प्रचोदयात्।

अर्घ्य मंत्र- ॐ सों सोमाय नमः।

चन्द्र रत्न- चन्द्र ग्रह की अशुभता के निवारण हेतु मोती रत्न धारण किया जाता है।

औषधि स्नान चन्द्र ग्रह की शांति के लिए पंचगव्य, बेल गिरी, गजमद, शंख, सिप्पी, श्वेत चंदन, स्फटिक से स्नान करना चंद्रमा जनित अनिष्ट प्रभावों को कम करता है। भगवान शिव का पूजन सोमवार के दिन करना तथा पूर्ण चन्द्र के दिन चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करने से चन्द्र ग्रह की शांति हो जाती है।

चन्द्र यंत्र- चन्द्रमा ग्रह की शान्ति हेतु चन्द्र होरा में चांदी के पत्र में चन्द्र यंत्र खुदवाकर या अष्टगन्ध से भोजपत्र पर लिखकर उसकी विधिवत, पूजन कर गले या दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए। अन्य उपाय- सोमवार का व्रत रखकर चावल सफेद वस्त्र, आदि सफेद वस्तुओं का दान करना चाहिए। सोमवार को प्रातः काल स्नानादि करके भगवान शंकर की मूर्ति पर जल तथा दूध चढाना चाहिए।

कुछ मुख्य अन्य उपाय/टोटके निम्न है-

व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए। रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।

ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।

वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।

वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए।

सोमवार के दिन मीठा दूध नहीं पीना चाहिए।

सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।

क्या न करें..???

ज्योतिषशास्त्र में जो उपाय बताए गये हैं उसके अनुसार चन्द्रमा कमज़ोर अथवा पीड़ित होने पर व्यक्ति को प्रतिदिन दूध नहीं पीना चाहिए. श्वेत वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए. सुगंध नहीं लगाना चाहिए और चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न नहीं पहनना चाहिएल

वैसे तो चन्द्र देव का स्वभाव स्वभाव बहुत शांत और ठंडा होता है और यही वजह है कि वो हम सभी को शीतलता प्रदान करते है किन्तु जब वे गुस्से में आते है तो उसके परिणाम बहुत भयंकर और विनाशकारी हो सकते है. इसलिए कभी भी चन्द्र देव को कुपित ना होने दें और अगर वे कभी आपसे रुष्ट हो भी जाएँ तो आप तुरंत कुछ उपायों को अपनाकर उन्हें जल्दी से प्रसन्न कर लें. आज हम चन्द्र देव से जुडी कुछ ऐसी बातें बताने वाले है जिन्हें जानकार आप पता लगा सकते हो कि चन्द्र देव आपसे रुष्ट है या नहीं और अगर है तो उन्हें किस तरह मनाया जा सकता है.

कुपित चन्द्रमा के संकेत

1. मानसिक परेशानी  : चंद्रमा के रुष्ट होते ही जो पहला संकेत सामने आता है वो है मानसिक चिंता व परेशानी, ऐसे में जातक खुद को फंसा फंसा महसूस करता है, उसे समझ नहीं आता कि वो अपनी समस्याओं से कैसे बाहर निकलें.

2. माता से दूर होना : जातक की माता भी उससे रुष्ट हो जाती है और वो अपनी माँ के सुख की कमी महसूस करता है. कहने का अर्थ ये है कि उसके और उसकी माता के बीच का रिश्ता पहले जैसा नहीं रहता.

3. बायीं आँख में कमजोरी :  अगर किसी व्यक्ति की बायीं आँख अचानक कमजोर हो जाती है तो उन्हें समझ जाना चाहियें कि उनकी कुंडली में चन्द्रमा रुष्ट हो चुके है.

4. आँखों के पास कालापन  : यहीं नहीं जातक की आँखों के पास कालापन भी दिखने लगता है जो उसके बुरे समय और थकान को दर्शाता है.

5. छाती में मलगम जमना  : सुनने में तो ये आपको सामान्य सा लक्षण लगता है किन्तु जब अगर आप बाकी संकेतों के साथ इसे देखा जाए तो ये पुष्टि करता है कि हाँ सच में चन्द्रमा कुपित हो चुके है. यहीं नहीं उन्हें अन्य वात रोग भी अपना शिकार बना लेते है.

6. पुराने दिनों का स्मरण : क्योकि चन्द्रमा के गुस्सा होने पर जातक का बुरा समय आरम्भ हो जाता है इसलिए उसे बार बार अपने पुराने दिन स्मरण होते रहते है.

7. अधिक नींद आना  : ऐसे में जातक खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से इतना थका लेता है कि उसे नींद आने लग जाती है और वो बिस्तर पर पड़ा रहता है.

8. मासिक धर्म में अनियमितता : अगर किसी महिला पर चन्द्र रुष्ट होते है तो उनके माहवारी चक्र में अनियमितता होनी शुरू हो जाती है.

9. बालों का सफ़ेद होना  : कहा जाता है कि चिंता करने से बाल सफ़ेद होते है जबकि बालों के सफ़ेद होने के पीछे भी चन्द्र देव का ही हाथ होता है.

10. सिर दर्द : जातक को धीरे धीरे अन्य बीमारियाँ अपना शिकार बना लेती है और उनमे सबसे पहले आता है साइनस.

11. जल का असंतुलन  : इसके अलावा जातक के अंदर जल का अभाव व असंतुलन बना रहता है, उसकी त्वचा शुष्क हो जाती है, वो खुद को कमजोर महसूस करने इस स्थिति में कुछ लोग तो जल्दी जल्दी पानी पीना आरम्भ कर देते है.

12. शरीर में कैल्शियम की कमी : पानी के साथ साथ पीड़ित के शरीर का कैल्शी लगातार कम होता जाता है और उसके शरीर से दुर्गन्ध भी आने लगती है.

तत्व अनुसार रुष्ट चंद्रमा को मनाएं -

अग्नि तत्व : अगर चन्द्अग्नि तत्व में होने पर कुपित होता है तो जातक को सोमवार के व्रत रखने के साथ साथ चंद्रा की हवन सामग्री से हवन अवश्य कराना चाहियें.

वायु तत्व : वहीँ उनके वायु तत्व में नाराज होने पर आपको चन्द्रमा के सामान को जमीन में दबा देना चाहियें. अगर आप ये ना कर सकें तो आप चन्द्रमा की अंगूठी को अवश्य पहनें.

जल तत्व : लेकिन अगर चन्द्र जल तत्व में रुष्ट है तो आपको सोमवार के दिन कच्चे चावल लेने है और उन्हें बहते पानी में प्रवाहित करना है. इसके अलावा आप किसी महिला को चन्द्रमा का सामान भी अवश्य दें.

पृथ्वी तत्व  : पृथ्वी तत्व में चन्द्र के गुस्सा होने पर आपको ॐ श्राम् श्रीं श्रोम् सः चंद्रमसे नमः मंत्र का जाप करना है, ध्यान रहें कि मंत्र जाप रात को या शिवजी की पूजा के वक़्त ही करें.

चंद्रमाँ के लिए शिव, कृष्ण, भगवती पार्वती, की उपासना और संकस्टी चतुर्थी और पूर्णिमा को सत्यनारायण का व्रत श्रेष्ठ 

कस्टप्रद नीच या बल हीन चंद्र के दान करे

चावल, पानी, दूध , चाँदी, सफ़ेद वस्त्र , का दान करे l पीने के पानी की व्यवस्था करे

पुष्य नक्षत्र में शिव अभिषेक जल और दूध से श्रेष्ठ, पितरो को प्रसन्न करे, माता को सम्मान करे और उन्हें खुश रखे ल

 चन्द्र

चांदी, शंख, सीपी, गौदुग्ध, गोदही, मोती, सफेद कमल/सफेद गुलाब,

गौमूत्र, गौघृत, गाय का मट्ठा आदि जल में डालकर प्रथम उससे स्नान करें, फिर

शुद्ध जल से।

कपूर, मोती, चांदी, चावल, चीनी, खीर, दूध, मिश्री, खांड़, दही, मट्ठा,

बताशे, सफेद गाय/बैल, सफेद वस्त्र, पेठा आदि का सोमवार को दान करें तथा

सफेद वस्त्र पहनें। यह पूर्णमासी की शाम को भी कर सकते हैं।

→ अश्विनी पूर्णिमा से वर्षभर पूर्णमासी का व्रत करें अथवा शुक्ल पक्ष के

प्रथम सोमवार से दस सोमवार का व्रत करें तथा रात को चन्द्र पूजन करके सफेद

फूल, सफेद चन्दन मिले जल से चन्द्र को अर्घ्य दें। चन्द्र मन्त्र का जाप करें। सफेद


वस्त्र व सफेद चंदन धारण करें। प्रदोष व्रत या सावन के सोमवार के शिव के व्रत


करें। शिवलिंग पर जल व दूध का नित्य अभिषेक करें। शिव चालीसा का पाठ करें


तथा रुद्राक्ष पूजन करें।


→ चन्द्र के 11000 मंत्रों का जाप करें अथवा 'ॐ हिम् नमः शिवाय' यंत्र


का सवा लाख जाप का अनुष्ठान करे और बाद में किसी सुन्दर स्त्री को भोजन


कराकर चन्द्र सम्बन्धी वस्तुएं दान दें।


चांदी के आभूषण तथा मोतियों की माला पहनें, सोमवार को नमक न


खाएं व भोजन एक बार ही करें। ब्राह्मण/सुंदर स्त्री को खीर/दूध खिलाएं/पिलाएं।


सफेद शंख को घर में रखें तथा उसका पूजन नित्य करें।


शिवपुराण से चन्द्रमा के शापग्रस्त होकर क्षय रोगी हो जाने तथा फिर


शिवोपासना से स्वस्थ हो जाने वाले प्रसंग का नित्य पाठ करें अथवा चन्द्र स्तोत्र का


पाठ करें। सफेद गाय को सफेद खाद्य पदार्थ नित्य खिलाएं व उसकी सेवा करें।


पूर्णमासी (विशेषकर शरद पूर्णिमा) की रात को खीर छलनी से ढककर


रात भर खुली छत पर चांदनी में रखें और प्रात: उसका सेवन बिना गरम किए ही


करें। माता, मौसी का आशीर्वाद लें व सेवा करें।


चंद्र माता योगिनी मङ्गला स्तोत्र (सिद्ध साबर तन्त्र)

श्री पार्वत्युवाच
सृष्टिस्थित्यन्तकारक |
मंगलायाश्चन्द्रमातुः स्तवनं ब्रूहि शंकर । '
देवदेव महादेव श्री शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मंगलायाः स्तवं शुभम् ।
ग्रहशान्तिकरं दिव्यं यदुक्तं सिद्धसाबरे ||
मंगला मंगलाचारा मंगलोदयकारिणी।
चन्द्र प्रसादजननी चन्द्रमाता कृथोदरी ॥
चन्द्र मण्डल मध्यस्था चन्द्रायुत समप्रभा ।
शीतला श्वेतवर्णा च श्वेताम्बर विधारिणी ॥
वराभयकरा शान्ता स्मितास्या पद्मलोचना ।
त्रिनेत्रा च स्वयंभूता श्वेतपर्वतवासिनी ॥
दशाशान्तिकरी रम्या गोभूस्वर्णादिदायिनी।
सामान्यन्तर्दशारूपा पञ्चत्रिंशद्विभेदतः ॥
एतानि शुभनामानि पठेत् प्रातः समुत्थितः ।
चक्रजन्यं दशाजन्यं पीडा तस्य विनश्यति ।
मंगलायाः प्रसादेन सर्व भवति शोभनम् ॥
(शिव द्वारा पार्वती को कहा गया)

श्री शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मंगलायाः स्तवं शुभम् ।
ग्रहशान्तिकरं दिव्यं यदुक्तं सिद्धसाबरे ||
मंगला मंगलाचारा मंगलोदयकारिणी।
चन्द्र प्रसादजननी चन्द्रमाता कृथोदरी ॥
चन्द्र मण्डल मध्यस्था चन्द्रायुत समप्रभा ।
शीतला श्वेतवर्णा च श्वेताम्बर विधारिणी ॥
वराभयकरा शान्ता स्मितास्या पद्मलोचना ।
त्रिनेत्रा च स्वयंभूता श्वेतपर्वतवासिनी ॥
दशाशान्तिकरी रम्या गोभूस्वर्णादिदायिनी।
सामान्यन्तर्दशारूपा पञ्चत्रिंशद्विभेदतः ॥
एतानि शुभनामानि पठेत् प्रातः समुत्थितः ।
चक्रजन्यं दशाजन्यं पीडा तस्य विनश्यति ।
मंगलायाः प्रसादेन सर्व भवति शोभनम् ॥
(शिव द्वारा पार्वती को कहा गया)
अथ चंद्र कवच 
विनियोग : अस्य
छन्द, श्रीचन्द्रो देवता, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
चन्द्रकवचम्
श्रीचन्द्रकवचस्तोत्रमन्त्रस्य
गौतम-ऋषिः, अनुष्टुप्-
अथ कवचम्
केयूरमुकुटोज्वलम् ।
समं चतुर्भुजं वन्दे
वासुदेवस्य नयनं शङ्करस्य च भूषणम् ॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं शशिनः कवचं शुभम् ।
शशी पातु शिरोदेशं भालं पातु कलानिधिः ॥
चक्षुषी चन्द्रमा पातु श्रुती पातु निशापतिः ।
प्राणं छपाकरः पातु मुखं कुमुदबान्धवः ॥
पातु कण्ठं च मे सोमः स्कन्धे जैवातृकस्तथा।
करौ सुधाकरः पातु वक्षः पातु निशाकरः
हृदयं पातु मे चंद्रौ नाभि शंकरभूषणः ।
मध्यं पातु सुरश्रेष्ठः कटिं पातु सुधाकरः ।।
ऊरू तारापतिः मृगाको जानुनी सदा।
पातु
अब्धिजः पातु मे जङ्घे पातु पादौ विधुः सदा ॥
सर्वाण्यन्यानि चाङ्गानि पातु चन्द्रोऽखिलं वपुः ।
एतद्धि कवचं दिव्यं भुक्ति मुक्ति प्रदायकम् ।
यः पठेच्छृणुयाद् वाऽपि सर्वत्र विजयी भवेत् ॥
॥ इतिश्री चन्द्रकवचम् ॥
चन्द्राऽष्टाविंशतिनामस्तोत्रम्
विनियोग : अस्य श्रीचन्द्राष्टाविंशतिनामस्तोत्रस्य गौतम ऋषिः, सोमो
देवता, विराट् छन्दः, चन्द्रप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
अथ स्तोत्रम्
चन्द्रस्य शृणु नामानि शुभदानि महीपते ।
यानि श्रुत्वा नरो दुःखान् मुच्यते नाऽत्र संशयः ॥
सुधाकरश्च सोमश्च ग्लौरजः कुमुदप्रियः ।
लोकप्रियः शुभ्रभानुश्चन्द्रमा रोहिणीपतिः ॥
शशी हिमकरो राजा द्विजराजो निशाकरः ।
नक्षत्रनायकः
आत्रेय इन्दुः शीतांशुरोषधीशः कलानिधिः ॥
जैवातृको रमाभ्राता क्षीरोदार्णव संभवः ।
शम्भुशिरश्चूडामणिर्विभुः ॥
तापहर्त्ता नभोदीपो नामान्येतानि यः पठेत् ।
प्रत्यहं भक्तिसंयुक्तस्तस्य पीडा विनश्यति ॥
तद्दिने च पठेद्यस्तु लभेत् सर्वं समीहितम् ।
ग्रहादीनां च सर्वेषां भवेच्चन्द्रबलं सदा ॥
॥ इतिश्री चन्द्राष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् ॥
चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम्
चन्द्रः कर्कटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेय गोत्रोद्भव-
श्चाग्नेयश्तुरस्त्र वारुणमुखश्चापोऽप्युमाधीश्वरः
1
षट् सप्तानि दशैक शोभनफल शौरिः प्रियोऽकर्को गुरुः
स्वामी यामुनदेशजो हिमकरः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥
॥ इति श्री चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम् ॥

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