कुंडलीमिलान-विवाह कब - सप्तमभाव-स्त्री सुखससुराल और सप्तम भाव विवेचन
कुंडलीमिलान-विवाह कब - सप्तमभाव-स्त्री सुखससुराल और सप्तम भाव विवेचन
पत्नी का भाव l प्रेमी या प्रेमिका का भाव l शादी का भाव l अय्याशी या अवैध संबंध का भाव l बिजनेस पार्टनर का भाव l गुरु और चेला का भाव l एक दूसरे के प्रति त्याग का भाव l दिल के करीब का रिश्ता l गहरा धक्का , आघात , सदमा l शत्रु नाशक भाव l विदेश भ्रमण का भाव l व्यापार भाव l मार्केश भाव I जन्म कुंडली में सप्तम भाव व्यक्ति के वैवाहिक जीवन, जीवनसाथी तथा पार्टनर के विषय का बोध कराता है। यह नैतिक, अनैतिक रिश्ते को भी दर्शाता है। शास्त्रों में मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं। इनमें काम का संबंध सप्तम भाव से होता है। सातवां भाव व्यक्ति की सामाजिक छवि तथा कार्य व व्यवसाय संबंधित विदेश यात्रा को भी दिखाता है। कुंडली में सप्तम भाव केन्द्रीय भाव में आता है। इसलिए यह व्यक्ति के जीवन में निजी और कार्यक्षेत्र के बीच तालमेल बनाता है।सप्तम भाव के कारकत्व कुंडली में सप्तम भाव से जीवनसाथी, मूत्रांग, वैवाहिक ख़ुशियाँ, यौन संबंधी रोग, व्यापार, सट्टा, कूटनीति, सम्मान, यात्राएँ, व्यापारिक रणनीति एवं व्यक्ति की गुप्त ऊर्जा को देखा जाता है।
कुंडली में सातवें भाव का महत्व
ज्योतिष विद्या के महान विद्वान सत्याचार्य के अनुसार, जन्म कुंडली में सातवां भाव गृह परिवर्तन एवं विदेश यात्राओं के विषय में बताता है। वहीं ऋषि पराशर के अनुसार, यदि प्रथम भाव का स्वामी सातवें भाव में स्थित होता है तो व्यक्ति अपने मूल स्थान से दूर धन संपत्ति को बनाता है। सप्तम भाव क़ानूनी रूप से दो लोगों के बीच साझेदारी को भी दर्शाता है। यह साझेदारी वैवाहिक अथवा व्यापारिक हो सकती है। काल पुरुष कुंडली में तुला राशि को सातवें भाव का स्वामित्व प्राप्त है। जबकि तुला राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है। उत्तर-कालामृत के अनुसार, कुंडली में सातवाँ भाव व्यक्ति द्वारा गोद ली गई संतान को भी दर्शाता है।
प्रश्न ज्योतिष के अनुसार, सप्तम भाव का संबंध खोए हुए धन की उपलब्धता, चोर एवं जेबकतरों से भी होता है। कुंडली में जहाँ प्रथम भाव जातकों की प्रॉपर्टी में हानि अथवा चोरी को दिखाता है तो वहीं सप्तम भाव यह बताता है कि किस व्यक्ति ने उस प्रॉपर्टी को चोरी किया है। मेदिनी ज्योतिष के अनुसार, सप्तम भाव कैबिनेट, आंतरिक एवं विदेशी मामले, सुविधाजनक मनोरंजन के रिसोर्ट, यात्रा, जनता के साथ संबंध, व्यापार एवं संधि आदि के बारे में बताता है। यह भाव विवाह एवं तलाक़ को लेकर जनता के व्यवहार को भी दर्शाता है। यह भाव किसी राष्ट्र में महिलाओं का स्वामी माना जाता है। सप्तम भाव विदेश मंत्रालय, अन्य राष्ट्रों से संबंध, वैश्विक युद्ध या विवाद, विदेश व्यापार आदि का बोध कराता है।
ज्योतिष में सप्तम भाव से क्या देखा जाता है?
वैवाहिक जीवन – ज्योतिष में सप्तम भाव से जातकों के वैवाहिक जीवन का पता चलता है। इस भाव में ग्रह की स्थिति व्यक्ति के वैवाहिक जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। यह भाव जातकों के जीवनसाथी के गुण दोष तथा उसके शारीरिक रूप की भी व्याख्या करता है। कुंडली में सप्तम भाव के द्वारा व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में मिलने वाले सुखों और दुःखों को जाना जाता है।
साझेदारी – साझेदारी दो लोगों के बीच एक सामंजस्य भाव को दर्शाती है। सप्तम भाव से दो लोगों के बीच होने वाली पार्टनरशिप को भी दर्शाता है। यह साझेदारी, जीवन, व्यापार, खेल या हर क्षेत्र में हो सकती है। सप्तम भाव के द्वारा यह विचार किया जाता है कि व्यक्ति को साझेदारी से लाभ मिलेगा या नहीं और उसके संबंध अपने पार्टनर के साथ कैसे रहेंगे।
विदेश यात्रा – कुंडली में सप्तम भाव व्यक्ति के जीवन में विदेश यात्रा को दर्शाता है। हालाँकि कुंडली में तृतीय भाव तथा नवम भाव भी विदेश यात्राओं से प्रत्यक्ष संबंध रखते हैं। सप्तम भाव में विदेश यात्रा की अवधि क्या रहने वाली है, यह भाव में स्थित ग्रह की स्थिति पर निर्भर करता है।
यौन अंग – शरीर में यौनांग भी सप्तम भाव से संबंध रखता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, सप्तम भाव कालपुरुष के यौन अंगों का प्रतीक होता है, इसलिए सप्तम भाव पर किसी भी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव पड़ने पर व्यक्ति को यौन संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
कामेच्छा – सप्तम भाव व्यक्ति की कामुक भावना, काम इच्छा को भी प्रकट करता है। यदि इस भाव में क्रूर ग्रहों तथा शुक्र का सप्तम भाव पर प्रभाव व्यक्ति को विकृत कामेच्छा भी प्रदान कर सकता है।
समृद्धिशाली जीवन – सप्तम भाव के साथ इस भाव के स्वामी का बलशाली होना एवं शुभ ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति को भौतिक सुखों से संपन्नता बनाता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति का जीवन समृद्धिशाली होता है। वह अनेक प्रकार के भौतिक सुख प्रदान करने वाले संसाधनों का उपभोग करता है।
सातवें घर का अन्य भाव से अंतर्संबंध
कुंडली में स्थित 12 भावों का एक-दूसरे से संबंध होता है। एकादश भाव से प्रभावित सप्तम भाव किसी स्त्री एवं पुरुष के बीच स्थाई रिश्ते को दर्शाता है जो मिलकर वंशानुक्रम को आगे बढ़ाते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि सप्तम भाव का संबंध व्यक्ति के विवाह, व्यापार, पार्टनरशिप, करियर, ख़्याति, दुश्मन, यौन अंग, सेक्स लाइफ और जीवनसाथी से है। इसके अलावा उस वस्तु का संबंध भी सप्तम भाव से है, जिससे व्यक्ति को ख़ुशियाँ प्राप्त होती है। इसके अतंर्गत व्यक्ति का विलासितापूर्ण जीवन भी आता है। पारिवारिक शत्रु और परिवार में आने वाली परेशानियाँ का पता सातवें घर से चलता है।
यदि किसी जातक का विवाह होता है तो सप्तम भाव स्वतः ही सक्रिय हो जाता है। इसमें व्यक्ति ख़ुद को पुनः युवा महसूस कर सकता है अथवा इससे उसका आध्यात्मिक जीवन भी प्रभावित हो सकता है। जीवनसाथी आपकी छाया प्रति के समान है और प्रथम भाव आपके व्यक्तित्व और स्वभाव, शारीरिक रचना के बारे में बताता है। सप्तम भाव आपके भाई बहनों की बुद्धिमता, क्रिएटिविटी तथा उनके बच्चों को भी दर्शाता है। यह आपके ननिहाल पक्ष, मूल स्थान से दूर जमा की गई संपत्ति या ज़मीन जायदाद और महिलाओं के साथ संबंधों को भी बताता है।
ज्योतिष में सप्तम भाव जातक की दूसरी संतान, कौशल, बोलने का अंदाज़ और पहली संतान को किसी भी खेल को खेलने की काबिलियत, नृत्य एवं यात्रा करने की रुचि को दर्शाता है। यह माता की संपत्ति, निवास स्थान में परिवर्तन, शत्रुओं का धन, शत्रुओं पर विजय, धन-संपत्ति में वृद्धि आदि को भी बताता है।
जन्म कुंडली में सप्तम भाव व्यक्ति की दीर्घायु, कामेच्छा एवं गूढ़ विज्ञान आदि में कमी को दर्शाता है। किसी ग्रह के गोचर के दौरान सातवां भाव व्यक्ति के अंदर ज्योतिष, रहस्यमय ज्ञान अथवा गूढ़ विज्ञान जैसे विषयों के प्रति उदासीनता का भाव पैदा कर सकता है। जबकि इसके विपरीत इस दौरान व्यक्ति की इच्छा पूर्ण होती है एवं पिताजी एवं गुरु जी को सफलता प्राप्त होती है। जातकों के करियर और व्यवसाय में उन्नति को भी इसी भाव से देखा जाता है। इसके अलावा यह भाव बड़े भाई-बहनों के धार्मिक दृष्टिकोण, उनकी लंबी यात्रा एवं उनकी नैतिकता का भी परिचय देता है।
लाल किताब के अनुसार सप्तम भाव
लाल किताब के अनुसार, कुंडली में सप्तम भाव परिवार, नर्स, जन्मस्थान, आँगन आदि को बताता है। लाल किताब का सिद्धांत कहता है कि सप्तम भाव में बैठे ग्रह प्रथम भाव में स्थित ग्रहों के द्वारा संचालित होते हैं। इसको सरल भाषा में समझें तो, प्रथम भाव में ग्रहों की अनुपस्थिति होने पर सातवें घर में जो ग्रह होंगे वे निष्क्रिय और प्रभावहीन होंगे। सप्तम भाव में केवल मंगल और शुक्र का प्रभाव देखने को मिलेगा। लाल किताब के अनुसार, जन्म कुंडली में स्थित सातवां भाव जीवनसाथी के बारे में भी बताता है।
इस प्रकार हम जान सकते हैं कि कुंडली में सातवाँ भाव किसी जातक के जीवन में कितना शक्तिशाली और कितना महत्वपूर्ण होता है।
आप इस भाव को जरा अपने अनुसार से देखिए I बहुत विचित्र नजर आएगा I ऐसा इसलिए मैंने कहा कि इसके द्वादश में षष्ट भाव और इसके द्वितीय भाव में अष्टम भाव l
यह भाव षष्ट भाव यानी शत्रु से निजात पाने के लिए , जीवन की समस्याओं को दूर करने के लिए हम सहयोगी को चुनते हैं I
(( जैसे घर सहयोग के लिए के लिए हम विवाह करते हैं अर्थात हमारी पत्नी l व्यापार की समस्या को दूर करने के लिए हम व्यापारिक सहयोगी खोजते हैं l ))
इसे सिर्फ आप विवाह के भाव को ही मान कर मत देखिए l यह आपके हर समस्याओं के निदान को लेकर चलता है l किसी भी चीज के सहयोग में जो प्यार मोहब्बत उत्पन्न होती है वह सप्तम भाव ही दर्शाता है l
(( जैसे गुरु और शिष्य का प्यार l अर्जुन और द्रोणाचार्य का प्यार l
एक सखा का दूसरे सखा के प्रति प्यार l जैसे कृष्ण और अर्जुन का प्यार l ))
यह भाव त्याग़ को भी दर्शाता है I अगर पति पत्नी होते हैं तो उनके बीच त्याग के भी भावना होती है I
गुरु शिष्य के बीच में भी त्याग की भावना होती है I दोस्त दोस्त के बीच भी त्याग की भावना होती है I
किसी भी प्रकार के शत्रु से निजात पाने के लिए सप्तम भाव बहुत ही उपयोगी है I चाहे वह शारीरिक शत्रु हो या मानसिक शत्रु हो I शारीरिक शत्रु दूर करने के लिए भी हमें सहयोगी की जरूरत पड़ती है और मानसिक शत्रु को भी दूर करने के लिए हमें सहयोगी की जरूरत पड़ती है I
सप्तम तथा द्वादश भाव को हम विदेश यात्रा का भी भाव कहते हैं I यह भाव दशम भाव से दशम है इसलिए यह व्यापार भाव भी है I
यह भाव अष्टम भाव से द्वादश है इसलिए इसे मार्केश भी कहते हैं l यह मारता नहीं है लेकिन मरना तुल्य दुख जरूर देता है l मरना तुल्य दुख आपको किसी से भी पहुंच सकता है चाहे वह आपकी पत्नी हो , व्यापार सहयोगी हो, मित्र हो या कोई भी हो l यानी आपको किसी भी प्रकार के धोखा से गहरा धक्का , आघात या चोट पहुंचता है I जो आपके जीवन में काफी सदमा दायक होता है I वही आपके लिए मार्केश है l
कोई भी ग्रह अगर लग्न में रहेगा तो सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि उसकी रहेगी अगर सप्तम भाव में कोई ग्रह है तो उसकी लग्न पर पूर्ण दृष्टि रहती है I अतः इस भाव से दिल का या मानसिक रिश्ता बहुत मजबूत जुड़ा हुआ रहता है I
कुछ तथ्यों द्वारा इसे समझते हैं I
1.) इस भाव में बैठा शनि शादीशुदा स्त्री , विधवा, तलाकशुदा या उम्र में बड़ी लड़की से शादी या प्रेम करवाता है I
2.) इस भाव में बैठा राहु नीचे स्त्रियों से संगति कराता है l
जातक या जातिका अपने से नीचे स्तर के स्त्री या पुरुष के अवैध संबंध में रत रहते हैं l हालांकि जिस के भाव में राहु रहता है चाहे वह जातक हो या जातिका हो वह शक्की प्रवृत्ति का होता है अपने पति या पत्नी पर शक करते हैं I
3.) इस भाव में बैठा गुरु जिस जातक या जातिका की कुंडली में हो I उसे संस्कारी पति या पत्नी मिलता है I पूजा पाठ करने वाली , पढ़ी-लिखी तथा धैर्यवान होती है I
4.) जिस जातक या जातिका की कुंडली में सप्तम भाव में चंद्रमा या शुक्र हो I उसे लाखों में एक सुंदर पत्नी और पति मिलता है I
5.) सप्तम भाव में मंगल I जिद्दी और उदंड जीवन सहयोगी देता है I
इसी प्रकार अगर सप्तम भाव में दो ग्रहों का योग हो जैसे:-
1.) सप्तम भाव में अगर शुक्र और राहु एक साथ बैठे हो I तो व्यक्ति का पत्नी कितनी भी सुंदर हो लेकिन वह नीच स्त्रियों में ही रत रहता है I
2.) सप्तम भाव में बैठा सूर्य और शुक्र पत्नी पर शासन करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है I
3.) अगर सप्तम भाव में उच्च का गुरु या शुक्र बैठा हो जातक या जातिका क़ा अपने से उच्च परिवार में शादी कर आता है l
4.) सप्तम भाव में शनि और राहु या बुध और राहु कभी शादी को सफल नहीं होने देता l बहुत बार ऐसा देखा गया है कि शनि और राहु कई शादियां करा देता है l
5.) सप्तम भाव में अंगारक योग यानी मंगल और राहु जेल योग कराता है l
इसी प्रकार आप भाव को भी देखिए l
1.) लगनेश और सप्तमेश की युति या राशि परिवर्तन जिस जातक या जातिका की कुंडली में होता है उसे अगाद प्यार करने वाली पति या पत्नी मिलता है I
2.) सप्तमेश का नवमऎश के साथ संबंध या सप्तमेश का भाग्यऎश के साथ संबंध प्रेम विवाह को दर्शाता है I
3.) सप्तमेश का द्वादश भाव में होना I पति या पत्नी हमेशा अलग- अलग ही रहते हैं I यानि कहने का अर्थ है हो सकता है कि पति का नौकरी कहीं विदेश में हो और मजबूरी बस पत्नी ना जा सकती हो I कभी-कभी ऐसा योग ट्रांसफरेबल जॉब में भी होता है I
4.) लेकिन सप्तमेश का द्वादश भाव में होना अगर वह शुभ ग्रह नहीं है I राहु शनि से दृष्ट है या राहु शनि से युति है I तो विवाह विच्छेद निश्चित है I
5.) सप्तमेश का षष्ट भाव में बैठना कोर्ट कचहरी और मुकदमे को दर्शाता है ी
*कुंडली में सप्तम भाव से पत्नी का भाव होता है, तथा इसका कारक शुक्र होता है, जब सप्तम भाव ,सप्तमेश तथा शुक्र शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट होतो, पत्नी सुख मिलता है और ये पाप प्रभाव अथवा अशुभ भाव में होतो पत्नी सुख में बाधा आती है। निम्न योग पत्नी सुख में बाधा डालते है।*
*१. जब लग्न, द्वितीय , चतुर्थ, सप्तम, अष्टम , द्वादश भाव में मंगल शत्रु राशी में हो.*
*२. चतुर्थ भाव का मंगल घर में क्लेश करता है।*
*३. सप्तम भाव में शनि नीच (मेष) अथवा शत्रु राशी का हो तथा उस पर मंगल की दृष्टी होतो, दाम्पत्य जीवन कष्टमय होता है।*
*४. सप्तम भाव में बुध +शुक्र की युती ४५-५० साल की उम्र में पत्नी सुख मिलता है।*
*५. सप्तम भाव पर सूर्य, राहू का प्रभाव जातक को अपने पत्नी/पति से अलग करते है। अथवा तलाक करवा देते है।*
*६. लग्न (१) भाव में सूर्य+राहू की युती दाम्पत्य जीवन में बाधा डालते है।*
*७. लग्न में सूर्य जातक को क्रोधी बनाता है।*
*८. सप्तम भाव में सूर्य पत्नी को क्रोधी बनाता है।*
*९. सप्तम में नीच राशी का चन्द्रमा (८) वृश्चिक राशी का अथवा पाप राशी का चन्द्रमा हो और उस पर पाप ग्रह की दृष्टी होतो, जातक अपनी पत्नी/पति को खो बैठता है।*
*१०. यदि सप्तम भाव में शनि +चन्द्र की युती जातक को विधवा स्त्री दिलवा देते है।*
*११. यदि सप्तमेश राहू या केतू से युक्त होतो, जातक पर-स्त्री गामी होता है।*
*१२. सप्तम भाव में राहू जातक को दूसरे की स्त्री में आशक
सामान्यत: सभी माता-पिता अपनी कन्या का विवाह करने के लिए वर की कुंडली का गुण मिलान करते हैं। कन्या के भविष्य के प्रति चिंतित माता-पिता का यह कदम उचित है। किन्तु इसके पूर्व उन्हें यह देखना चाहिए कि लड़की का विवाह किस उम्र में, किस दिशा में तथा कैसे घर में होगा? उसका पति किस वर्ण का, किस सामाजिक स्तर का तथा कितने भाई-बहनों वाला होगा? ज्योतिष के अनुसार यह पता किया जा सकता है कि किसी व्यक्ति के जीवन साथी का स्वभाव और भविष्य कैसा हो सकता है। यहां भृगु संहिता के अनुसार बताया जा रहा है कि किसी स्त्री के जीवन साथी का स्वभाव कैसा और उनका वैवाहिक जीवन कैसा होगा।
कुंडली का सप्तम भाव विवाह का कारक स्थान माना जाता है। अलग-अलग लग्न के अनुसार इस भाव की राशि और स्वामी भी बदल जाते हैं। अत: यहां जैसी राशि रहती है, व्यक्ति का जीवन साथी भी वैसा ही होता है। लड़की की जन्म लग्न कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टत: पता चल सकता है। ज्योतिष विज्ञान में फलित शास्त्र के अनुसार लड़की की जन्म लग्न कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है। इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र परिवार से संबंध आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यहां सप्तम भाव के आधार पर कन्या के विवाह से संबंधित विभिन्न तथ्यों का विश्लेषण प्रस्तुत है।
ससुराल की दूरी : सप्तम भाव में अगर वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ राशि स्थित हो तो लड़की की शादी उसके जन्म स्थान से 90 किलोमीटर के अंदर ही होगी।
यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र तथा गुरु हों तो लड़की की शादी जन्म स्थान के समीप होगी। यदि सप्तम भाव में चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो तो विवाह उसके जन्म स्थान से 200 किलोमीटर के अंदर होगा। अगर सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि स्थित हो तो विवाह जन्म स्थान से 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर होगा। यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा।
शादी की आयु :
यदि जातक या जातक की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में सप्तमेश बुध हो और वह पाप ग्रह से प्रभावित न हो तो शादी 13 से 18 वर्ष की आयु सीमा में होती है। सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल पापी ग्रह से प्रभावित हो तो शादी 18 वर्ष के अंदर होगी। शुक्र ग्रह युवा अवस्था का द्योतक है। सप्तमेश शुक्र पापी ग्रह से प्रभावित हो तो 25 वर्ष की आयु में विवाह होगा। चंद्रमा सप्तमेश होकर पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो विवाह 22 वर्ष की आयु में होगा। बृहस्पति सप्तम भाव में सप्तमेश होकर पापी ग्रहों से प्रभावित न हो तो शादी 27-28वें वर्ष में होगी। सप्तम भाव को सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रह से युक्त होकर चर राशि हो तो जातक का विवाह उचित आयु में सम्पन्न हो जाता है। यदि किसी लड़की या लड़की की जन्म कुंडली में बुध स्वर राशि मिथुन या कन्या का होकर सप्तम भाव में बैठा हो तो विवाह बाल्यावस्था में होगा।
विवाह वर्ष :
आयु के जिस वर्ष में गोचरस्थ गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में आता है, उस वर्ष शादी होना निश्चित समझें परंतु शनि की दृष्टि सप्तम भाव या लग्न पर न हो। लग्न या सप्तम में बृहस्पति की स्थिति होने पर उस वर्ष शादी होती है।
विवाह कब होगा
यह जानने की दो विधियां यहां प्रस्तुत हैं। जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में स्थित राशि अंक में 10 जोड़ दें। योग फल विवाह का वर्ष होगा। सप्तम भाव पर जितने पापी ग्रहों की दृष्टि हो, उनमें प्रत्येक की दृष्टि के लिए 4-4 वर्ष जोड़ योग फल विवाह का वर्ष होगा।
जहां तक विवाह की दिशा का प्रश्र है
जन्मांक में सप्तम भाव में स्थित राशि के आधार पर शादी की दिशा ज्ञात की जाती है। उक्त भाव में मेष, सिंह या धनु राशि एवं सूर्य और शुक्र ग्रह होने पर पूर्व दिशा वृष, कन्या या मकर राशि और चंद्र, शनि ग्रह होने पर दक्षिण दिशा, मिथुन, तुला या कुंभ राशि और मंगल, राहु, केतु ग्रह होने पर पश्चिम दिशा, कर्क, वृश्चिक, मीन या राशि और बुध और गुरु होने पर उत्तर दिशा की ओर शादी होगी। अगर जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस भाव पर अन्य ग्रह की दृष्टि न हो, तो बलवान ग्रह की स्थिति राशि में शादी की दिशा समझें।
पति कैसा मिलेगा : ज्योतिष विज्ञान में सप्तमेश अगर शुभ ग्रह (चंद्रमा, बुध, गुरु या शुक्र) हो या सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव को देख रहा हो, तो लड़की का पति सम आयु या दो-चार वर्ष के अंतर का, गौरांग और सुंदर होना चाहिए। अगर सप्तम भाव पर या सप्तम भाव में पापी ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो तो बड़ी आयु वाला अर्थात लड़की की उम्र से 5 वर्ष बड़ी आयु का होगा।
सूर्य का प्रभाव हो तो गौरांग, आकर्षक चेहरे वाला, मंगल का प्रभाव हो तो लाल चेहरे वाला होगा। शनि अगर अपनी राशि का उच्च न हो तो वर काला या कुरूप तथा लड़की की उम्र से काफी बड़ी आयु वाला होगा। अगर शनि उच्च राशि का हो तो पतले शरीर वाला गोरा तथा उम्र में लड़की से 12 वर्ष बड़ा होगा।
सप्तमेश अगर सूर्य हो तो पति गोल मुख तथा तेज ललाट वाला, आकर्षक, गोरा सुंदर, यशस्वी एवं राज कर्मचारी होगा। चंद्रमा अगर सप्तमेश हो, तो पति शांत चित्त वाला गौर वर्ण का, मध्यम कद तथा सुडौल शरीर वाला होगा। मंगल सप्तमेश हो, तो पति का शरीर बलवान होगा। वह क्रोधी स्वभाव वाला, नियम का पालन करने वाला, सत्यवादी, छोटे कद वाला, शूरवीर, विद्वान तथा भ्रातृ प्रेमी होगा तथा सेना, पुलिस या सरकारी सेवा में कार्यरत होगा।
पति कितने भाई बहनों वाला होगा : लड़की की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव से तृतीय भाव अर्थात नवम भाव उसके पति के भाई-बहन का स्थान होता है। उक्त भाव में स्थित ग्रह तथा उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रह की संख्या से 2 बहन, मंगल से 1 भाई व 2 बहन बुध से 2 भाई 2 बहन वाला कहना चाहिए।
लड़की की जन्मकुंडली में पंचम भाव उसके पति के बड़े भाई-बहन का स्थान है। पंचम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टि डालने वाला ग्रहों की कुल संख्या उसके पति के बड़े भाई-बहन की संख्या होगी। पुरुष ग्रह से भाई तथा स्त्री ग्रह से बहन समझना चाहिए।
पति का मकान : लड़की की जन्म लग्न कुंडली में उसके लग्न भाव से तृतीय भाव पति का भाग्य स्थान होता है। इसके स्वामी के स्वक्षेत्री या मित्रक्षेत्री होने से पंचम और राशि से या तृतीयेश से पंचम जो राशि हो, उसी राशि का श्वसुर का गांव या नगर होगा।
प्रत्येक राशि में 9 अक्षर होते हैं। राशि स्वामी यदि शत्रुक्षेत्री हो, तो प्रथम, द्वितीय अक्षर, सम राशि का हो, तो तृतीय, चतुर्थ अक्षर मित्रक्षेत्री हो, तो पंचम, षष्ठम अक्षर, अपनी ही राशि का हो तो सप्तम, अष्टम अक्षर, उच्च क्षेत्री हो तो नवम अक्षर प्रसिद्ध नाम होगा। तृतीयेश के शत्रुक्षेत्री होने से जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि ससुराल या भवन की होगी।
यदि तृतीय भाव से शत्रु राशि में हो और तृतीय भाव में शत्रु राशि में पड़ा हो तो दसवीं राशि ससुर के गांव की होगी। लड़की की कुंडली में दसवां भाव उसके पति का भाव होता है। दशम भाव अगर शुभ ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो, या दशमेश से युक्त या दुष्ट हो तो पति का अपना मकान होता है। राहु, केतु, शनि से भवन बहुत पुराना होगा। मंगल ग्रह में मकान टूटा होगा। सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र से भवन सुंदर, सीमैंट का बहुमंजिला होगा। अगर दशम स्थान में शनि बलवान हो तो मकान बहुत विशाल होगा।
पति की नौकरी : लड़की की जन्म लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव पति का राज्य भाव होता है। अगर चतुर्थ भाव बलयुक्त हो और चतुर्थेश की स्थिति या दृष्टि से युक्त सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र की स्थिति या चंद्रमा की स्थिति उत्तम हो तो नौकरी का योग बनता है।
पति की आयु : लड़की के जन्म लग्न में द्वितीय भाव उसके पति की आयु भाव है। अगर द्वितीयेश शुभ स्थिति में हो या अपने स्थान से द्वितीय स्थान को देख रहा हो तो पति दीर्घायु होता है। अगर द्वितीय भाव में शनि स्थित हो या गुरु सप्तम भाव, द्वितीय भाव को देख रहा हो तो भी पति की आयु 75 वर्ष की होती है।
आइये जानने और समझने का प्रयास करें जन्म कुंडली के सप्तम भाव के परिणाम और प्रभाव तथा उपाय—
प्रिय पाठकों, ज्योतिषशास्त्र के अनुसार भाग्य बलवान होने से जीवन में मुश्किलें कम आती हैं, व्यक्ति को अपने कर्मों का फल जल्दी प्राप्त होता है. भाग्य का साथ मिले तो व्यक्ति को जीवन का हर सुख प्राप्त होता. यही कारण है कि लागों में सबसे ज्यादा इसी बात को लेकर उत्सुकता रहती है कि उसका भाग्य कैसा होगा. कुण्डली के भाग्य भाव में सातवें घर का स्वामी बैठा होने पर व्यक्ति का भाग्य कितना साथ देता है, आइये जानने/समझने का प्रयास करें–
जन्मकुंडली में सप्तम स्थान से शादी का विचार किया जाता है | अब आप भी अपनी कुंडली में सप्तम स्थान को देखकर अपने विवाह और जीवन साथी के बारे में जान सकते हैं | नीचे लिखे कुछ साधारण नियम हर व्यक्ति पर लागु होते हैं | कुल १२ राशियों का सप्तम स्थान में होने पर क्या प्रभाव जीवन पर पढता है यह मेरे स्वयं के अनुभवों से संकलित किया ज्ञान है |
शुक्र यहाँ का कारक ग्रह है और शनि सप्तम भाव में बलवान हो जाता है | गुरु यहाँ निर्बल हो जाता है तो सूर्य तलाक की स्थिति उत्पन्न करता है | मंगल यदि सप्तम स्थान में हो तो मांगलिक योग तो होता ही है साथ में घर में क्लेश और नौकरी में समस्याएं उत्पन्न करता है | बुध का बल भी यहाँ क्षीण हो जाता है तथा राहू केतु पत्नी से अलगाव उत्पन्न करते हैं | राहू सप्तम में हो तो जातक अपनी पत्नी से या पत्नी जातक से दूर भागती है | यदि जीवनसाथी की कुंडली में भी राहू या केतु सप्तम स्थान में हो तो तलाक एक वर्ष के भीतर हो जाता है |
केतु के सप्तम स्थान में होने पर संबंधों में अलगाव की स्थिति जीवन भर बनी रहती है | पति पत्नी दोनों एक दुसरे को पसंद नहीं करते |
सप्तम स्थान का स्वामी यदि सप्तम में ही हो तो व्यक्ति विवाह के पश्चात उन्नति करता है और व्यक्ति का दाम्पत्य जीवन अत्यंत मधुर और शुभ फलदायी साबित होता है |
पाठकों, सुखी दाम्पत्य जीवन तभी सही चलता है जब एक-दूसरे में सही तालमेल हो अन्यथा जीवन नश्वर ही समझो। दाम्पत्य की गाडी़ सही चले इसके लिए अपने जीवनसाथी का स्वभाव व व्यवहार के साथ वाणी भी अच्छी होना चाहिए। सुखी दाम्पत्य जीवन हेतु पति को भी अपनी पत्नी के प्रति सजग व वफादार होना चाहिए।
अनेक दफा दाम्पत्य जीवन आर्थिक दृष्टिकोण की वजह से, अन्य संबंधों के चलते भी टूट जाता है। शंका भी दाम्पत्य जीवन में दरार का कारण बनती है। कभी-कभी पारिवारिक तालमेल का अभाव भी एक कारण बनता है।
इन सबके लिए किसी भी जातक की जन्म कुंडली का सप्तम भाव, लग्न, चतुर्थ, पंचम भाव के साथ-साथ शुक्र-शनि-मंगल का संबंध भी महत्वपूर्ण माना गया है।
यदि चतुर्थ भाव में शनि सिंह राशि का हो या मंगल की मेष या वृश्चिक राशि का हो या राहु के साथ हो तो पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण रहता है।
यदि जन्म किुंडली में शनि-मंगल का दृष्टी संबंध हो या युति हो तो भी पारिवारिक जीवन नष्ट होता है। कोई भी नीच का ग्रह हो तब भी पारिवारिक कलह का कारण बनता है। यदि ऐसी स्थिति हो तो उस ग्रह से संबंधित वस्तु को जमीन में गाड़ देवें।
लग्न का स्वामी नीच का हो या लग्न में कोई नीच ग्रह हो तो वह जातक को बुरी प्रवृति का बना देता है।
आइये जाने सातवें भाव का अर्थ—-
जन्म कुन्डली का सातंवा भाव विवाह पत्नी ससुराल प्रेम भागीदारी और गुप्त व्यापार के लिये माना जाता है। सातवां भाव अगर पापग्रहों द्वारा देखा जाता है,उसमें अशुभ राशि या योग होता है,तो स्त्री का पति चरित्रहीन होता है,स्त्री जातक की कुंडली के सातवें भाव में पापग्रह विराजमान है,और कोई शुभ ग्रह उसे नही देख रहा है,तो ऐसी स्त्री पति की मृत्यु का कारण बनती है,परंतु ऐसी कुंडली के द्वितीय भाव में शुभ बैठे हों तो पहले स्त्री की मौत होती है,सूर्य और चन्द्रमा की आपस की द्रिष्टि अगर शुभ होती है तो पति पत्नी की आपस की सामजस्य अच्छी बनती है,और अगर सूर्य चन्द्रमा की आपस की १५० डिग्री,१८० डिग्री या ७२ डिग्री के आसपास की युति होती है तो कभी भी किसी भी समय तलाक या अलगाव हो सकता है।केतु और मंगल का सम्बन्ध किसी प्रकार से आपसी युति बना ले तो वैवाहिक जीवन आदर्शहीन होगा,ऐसा जातक कभी भी बलात्कार का शिकार हो सकता है,स्त्री की कुंडली में सूर्य सातवें स्थान पर पाया जाना ठीक नही होता है,ऐसा योग वैवाहिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है,केवल गुण मिला देने से या मंगलीक वाली बातों को बताने से इन बातों का फ़ल सही नही मिलता है,इसके लिये कुंडली के सातंवे भाव का योगायोग देखना भी जरूरी होता है।
आइये जाने सातवां भाव और पति पत्नी—-
सातवें भाव को लेकर पुरुष जातक के योगायोग अलग बनते है,स्त्री जातक के योगायोग अलग बनते है,विवाह करने के लिये सबसे पहले शुक्र पुरुष कुंडली के लिए और मंगल स्त्री की कुन्डली के लिये देखना जरूरी होता है,लेकिन इन सबके बाद चन्द्रमा को देखना भी जरूरी होता है,मनस्य जायते चन्द्रमा,के अनुसार चन्द्रमा की स्थिति के बिना मन की स्थिति नही बन पाता है। पुरुष कुंडली में शुक्र के अनुसार पत्नी और स्त्री कुंडली में मंगल के अनुसार पति का स्वभाव सामने आ जाता है।
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आइये जाने कुण्डली में प्रेम विवाह—-
ज्योतिषशास्त्र में “शुक्र ग्रह” को प्रेम का कारक माना गया है । कुण्डली में लग्न, पंचम, सप्तम तथा एकादश भावों से शुक्र का सम्बन्ध होने पर व्यक्ति में प्रेमी स्वभाव का होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पंचम भाव प्रेम का भाव होता है और सप्तम भाव विवाह का। पंचम भाव का सम्बन्ध जब सप्तम भाव से होता है तब दो प्रेमी वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं। नवम भाव से पंचम का शुभ सम्बन्ध होने पर भी दो प्रेमी पति पत्नी बनकर दाम्पत्य जीवन का सुख प्राप्त करते हैं।
पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है । शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है।
शुक्र अगर लग्न स्थान में स्थित है और चन्द्र कुण्डली में शुक्र पंचम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह संभव होता है। अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है और नवमांश कुण्डली में सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तो प्रेम विवाह की संभावना 100 प्रतिशत बनती है। शुक्र ग्रह लग्न में मौजूद हो और साथ में लग्नेश हो तो प्रेम विवाह निश्चित समझना चाहिए । शनि और केतु पाप ग्रह कहे जाते हैं लेकिन सप्तम भाव में इनकी युति प्रेमियों के लिए शुभ संकेत होता है।
राहु अगर लग्न में स्थित है तोनवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में से किसी में भी सप्तमेश तथा पंचमेश का किसी प्रकार दृष्टि या युति सम्बन्ध होने पर प्रेम विवाह होता है। लग्न भाव में लग्नेश हो साथ में चन्द्रमा की युति हो अथवा सप्तम भाव में सप्तमेश के साथ चन्द्रमा की युति हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है। सप्तम भाव का स्वामी अगर अपने घर में है तब स्वगृही सप्तमेश प्रेम विवाह करवाता है। एकादश भाव पापी ग्रहों के प्रभाव में होता है तब प्रेमियों का मिलन नहीं होता है और पापी ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्त है तो व्यक्ति अपने प्रेमी के साथ सात फेरे लेता है। प्रेम विवाह के लिए सप्तमेश व एकादशेश में परिवर्तन योग के साथ मंगल नवम या त्रिकोण में हो या फिर द्वादशेश तथा पंचमेश के मध्य राशि परिवर्तन हो तब भी शुभ और अनुकूल परिणाम मिलता है।
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आइये जाने सप्तम भाव व भावी पति—-
प्रत्येक कन्या के मन में उसके भावी पति की तस्वीर कुछ इस तरह की होती है कि उसका पति सुंदर, आकर्षक, हृष्ट-पुष्ट, उत्तम चरित्र वाला, पढ़ा-लिखा, डॉक्टर, इंजीनियर या उद्योगपति होगा लेकिन वधू की पत्रिका द्वारा जाना जा सकता है कि उसका वर सपनों का राजा होगा या फिर लड़ाकू, कामुक या शराबी। कन्या की जन्म कुंडली में सप्तम स्थान उसके पति का होता है। यदि पत्रिका सही है तो उसके पति के संबंध में जाना जा सकता है।
यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण सूत्र देकर कुछ भावी पति के बारे में बताया जा रहा है लेकिन इन्हीं सूत्रों को ब्रह्म वाक्य नहीं माना जा सकता क्योंकि पुरुष की यानी वर की जन्म कुंडली को भी महत्व देना चाहिए। जन्म कुंडली का सप्तम भाव भावी पति के बारे में दर्शाता है। वहीं नवांश कुंडली भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है और नवांश प्रत्येक तीन मिनट में बदलती रहती है।
– सप्तम भाव में शुक्र स्वराशि वृषभ का हुआ तो पति अति सुन्दर होगा। सुन्दर से तात्पर्य गोरा नहीं, बल्कि नाक-नक्श उत्तम व चेहरा आकर्षक होगा। वृषभ का शुक्र कामुक भी बनाता है अतः वह कामुक भी होगा।
– सप्तम भाव में तुला का शुक्र हुआ तो वह वर कामुक न होकर सरल स्वभाव वाला सुन्दर आकर्षक व्यक्तित्व का व नपी-तुली बात करने वाला अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करने वाला होगा। कलाकार, संगीतप्रेमी, सौन्दर्य प्रिय, इंजीनियर या डॉक्टर भी हो सकता है।
– सप्तम भाव में कन्या की कुंडली में मीन राशि का शुक्र हुआ तो वह उच्च का होगा अतः उसका भावी जीवनसाथी काफी पैसे वाला होगा तथा भाग्यवान होकर धनी होगा।
– सप्तम भाव में यदि नीच राशि का शुक्र होता है तो उसका भावी पति अर्थहीन व स्त्री के धन का प्रयोग करने वाला होगा।
– सप्तम भाव में सूर्य सिंह दिशा में हो या नवांश में सिंह राशि हो तो वह कामुक होगा एवं दाम्पत्य जीवन सुखद कम ही रहेगा।
– सप्तम भाव में मेष का मंगल हुआ तो उसका पति पुलिस, सैनिक या संगठनकर्ता होगा, उसका स्वभाव उग्र भी हो सकता है एवं कामुक भी रहेगा।
– सप्तम भाव में वृश्चिक राशि का मंगल हुआ तो वह तुनकमिजाज होगा, कुछ व्यसनी भी हो सकता है या लड़ाकू प्रवृत्ति का भी हो सकता है। उसका चरित्र संदेहास्पद भी हो सकता है।
– सप्तम भाव में मंगल उच्च राशि का हुआ तो वह अत्यंत प्रभावशाली, महत्वाकांक्षी, उच्चपदस्थ अधिकारी या डॉक्टर, सेना या पुलिस विभाग में भी हो सकता है।
– सप्तम भाव में कर्क का चंद्रमा हुआ तो वह भावुक, सहनशील, स्नेही स्वभाव वाला, मधुरभाषी, पत्नी से अधिक प्रेम करने वाला, गौरवर्ण का सुन्दर होगा।
– सप्तम भाव में उच्च का चंद्रमा हुआ तो वह अत्यंत सुंदर, अनेक स्त्री मित्रों वाला, सौंदर्यप्रेमी, कामुक भी होगा।
– सप्तम भाव में मकर या कुंभ का शनि हो तो उसका पति उसकी उम्र से अधिक होगा।
– सप्तम भाव में शुक्र-चंद्र की युति हुई तो वह अत्यंत मनोविनोदी, सुंदर और अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करने वाला होगा।
– सप्तम भाव में बुध मिथुन राशि का हुआ तो उसका पति व्यापारिक या बैंककर्मी, लेखक, पत्रकार या विद्वान होगा।
– सप्तम भाव में उच्च का बुध हुआ तो उसका पति सुन्दर होने के साथ-साथ उच्च व्यापारी या बौद्धिक गुणों से भरपूर, उच्च पदस्थ अधिकारी भी हो सकता है।
– सप्तम भाव में धनु राशि का गुरु हुआ तो उसका भावी पति विद्वान, सुन्दर, गोल चेहरे वाला, प्रोफेसर या न्यायविद, अधिवक्ता या राजपत्रित अधिकारी, पत्नी से प्रेम करने वाला सद्चरित्र व ईमानदार होगा।
– सप्तम भाव में बुध-शनि की युति हो और उस पर मंगल की दृष्टि हो एवं उसे कोई भी शुभ ग्रह न देखता हो ना ही शुभ ग्रहों से मध्यस्थ हो तो उसका पति नपुंसक होता है।
– सप्तम भाव में उच्च का राहू या केतु हो तो उसका पति आधुनिक विचारों वाला व दार्शनिक भी हो सकता है।
– सप्तम भाव में चर राशि हो एवं चर ग्रह हो या चर ग्रहों से दृष्टिपात हो तो उसका पति सदैव बाहर रहने वाला होता है।
– सप्तम भाव पर नीच दृष्टि किसी भी ग्रह की पड़ रही हो तो उसका पति मध्यम स्तर वाला होगा।
– सप्तम भाव में सूर्य-चंद्र की युति हो तो उसका पति सदैव भ्रमणशील व परेशान रहकर गृहस्थ जीवन में बाधक होगा।
– सप्तम भाव पर गुरु-चंद्र की युति हो तो उसका पति विद्वान, गुणवान, चरित्रवान, सुन्दर, यशस्वी, मधुरभाषी, ईमानदार, उच्च पदस्थ अधिकारी, डॉक्टर या प्रोफेसर या न्यायाधीश भी हो सकता है।
– सप्तम भाव में मंगल-चंद्र की युति हो तो उसका पति सुंदर या उद्यमी हो सकता है। वहीं स्वभाव में मिला-जुला रुख रहेगा व भावुक भी होगा।
– सप्तम भाव में मंगल-चंद्र-शुक्र की युति वाली कन्या का पति अत्यंत सेक्सी स्वभाव वाला व चरित्र का कमजोर भी हो सकता है। गुरु की दृष्टि पड़ने पर चरित्रहीन नहीं होगा।
– शनि-चंद्र की युति सप्तम भाव में होने से उसका वर इंजीनियर या अस्थिरोग का या दाँतों का डॉक्टर भी हो सकता है।
– गुरु या राहू की युति वाली कन्या का पति गुप्त विधाओं का जानकार लेकिन चिन्ताग्रस्त चरित्र वाला रहेगा।
– यदि कन्या के जन्म लग्न में नीच का गुरु व चंद्रमा हो तो उसका पति गुणी व सुन्दर होगा।
– यदि कन्या की जन्म कुंडली में शनि की उच्च दृष्टि सप्तम भाव पर पड़ रही हो तो उसका पति प्रशासनिक अधिकारी या शासकीय सर्विस में उच्च पदस्थ या लोहे का व्यापारी या ट्रेवल्स एजेंसी का मालिक होगा।
उपरोक्त सूत्र कन्या की पत्रिका से ही संबंधित है अतः वर की जानकरी उक्त सूत्रों से जानी जा सकती है।
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कब होगा विवाह? प्रश्न: कैसे जानें विवाह कब होगा एवं वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा?
सुखी वैवाहिक जीवन एवं संबंध विच्छेद होने वाले ज्योतिशीय योग कौन-कौन से हैं?
वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने हेतु क्या-क्या उपाय किए जा सकते हैं ?
लग्न चक्र के आधार पर किसी का विवाह कब होगा, यह जानने के लिए भारतीय ज्योतिष के अनुसार जन्म कुंडली के प्रथम, द्वितीय, सप्तम और नवम भावों का विचार किया जाता है। मतांतर से इन भावों के अतिरिक्त चतुर्थ, पंचम और द्वादश भावों का विचार भी किया जाता है।
सप्तम भाव इन सब में प्रधान माना गया है। सप्तम भाव, उसमें स्थित ग्रह, सप्तम भाव पर पड़ने वाली शुभाशुभ ग्रहों की दृष्टि आदि का विचार विवाह काल जानने के लिए किया जाता है। विवाह के समय का आकलन करने के लिए विंशोत्तरी दशा, गोचर, गणितीय पद्धति आदि का विचार किया जाता है। विंशोत्तरी दशा के आधार पर: सप्तमेश की या सप्तम स्थान में विराजमान ग्रह की अथवा सप्तम भाव पर दृष्टि रखने वाले ग्रह या ग्रहों की दशा भुक्ति काल में विवाह होने की आशा रहती है। चंद्र, गुरु अथवा शुक्र की दशाओं में भी विवाह हो सकता है। सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो उसके स्वामी ग्रह की दशा में विवाह हो सकता है। द्वितीयेश की दशा में अथवा द्वितीयेश जिस राशि में स्थित हो उसके स्वामी की दशा में विवाह होता है। सप्तमेश राहु या केतु से युत हो तो इनकी दशा भुक्ति में विवाह होता है। नवमेश और दशमेश की दशा में विवाह होता है।
विवाह का समय गोचर के आधार पर: विवाह के समय का अनुमान लगाने के लिए अर्थात् विवाह काल जानने के लिए विवाह की आयु होने पर उस समय की गोचर ग्रहों की स्थिति के आधार पर लग्नेश, सप्तमेश, बृहस्पति और शुक्र का विचार किया जाता है। जब गुरु गोचरवश सप्तम भाव वाली राशि अथवा उस राशि से पांचवीं या नौवीं राशि अथवा जन्मकालिक शुक्र जिस राशि में स्थित हो उस राशि में भ्रमण कर रहा हो, तब विवाह होता है।
विवाह योग्य आयु होने पर उस समय गोचरस्थ शनि और गुरु जन्म लग्न और लग्नेश, सप्तम भाव और सप्तमेश को निम्न स्थितियों में से किसी एक को देख रहे हों तो विवाह होता है-
सप्तम (जाया) स्थान और जन्म लग्न को। सप्तमेश और लग्नेश को। सप्तम स्थान और लग्नेश को। सप्तमेश और जन्म लग्न को। शनि का गोचर लगभग 30 मास या ढाई वर्ष एक राशि पर रहता है। शनि की ऐसी 30 मासीय प्रति राशि की गोचर अवधि में 12 या 13 माह के लगभग का समय ऐसा आता है जब शनि-गुरु पूर्वोक्त चार बिंदुओं में से किसी एक बिंदु में दर्शाए गए भाव एवं भावेश पर दृष्टि रखकर उन्हें बल प्रदान करते हैं। इस तरह स्थूल रूप में लगभग एक वर्ष या इससे भी कम अवधि में विवाह होने की संभावना रहती है। गुरु का गोचर काल तेरह मास का होता है जो मध्य के दो महीनों में अपना शुभाशुभ फल प्रदान करने में समर्थ होता है।
इस तरह गुरु का गोचर काल 390 दिनों का (30ग13=390) हुआ जिसके मध्य वाले 60 दिन अर्थात् 166वें दिन से लेकर 225 वें दिन तक (165$60$165=390) गुरु शुभ फल देने में समर्थ होता है। इस अवधि में विवाह हो सकता है, बशर्ते गुरु के गोचर वाले मध्य के ये 60 दिन विवाह विहित मास में पड़ते हों। गुरु के गोचर की विवाह हेतु सूक्ष्म गणना: त्रयोदश मासिक गुरु के गोचर काल की उक्त अवधि जिसमें गुरु निम्न बिंदुओं में दर्शाए गए जन्म कालिक ग्रह विशेष और भाव विशेष दोनों के साथ युति करे अथवा दृष्टि उन पर डाले तब जातक के विवाह होने की पूर्ण संभावना रहती है- जन्म कंुडली का पंचम भाव और पंचमेश।
जन्म कुंडली में विराजमान शुक्र और पंचमेश। जन्म कुंडली का नवम एवं नवमेश। जन्म कुंडली का पंचम एवं नवम भाव और पंचमेश एवं नवमेश। विवाह विषयक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए जन्मपत्रिका के प्रथम, पंचम, नवम, एकादश एवं तृतीय भावों से विचार करते हैं। सप्तम भाव से सप्तम भाव प्रथम भाव या लग्न होता है। सप्तम भाव से पंचम भाव एकादश और सप्तम भाव तृतीय होता है। अतः ये तीनों स्थान वर-कन्या के लिए त्रिकोण तुल्य होते हैं। जब लग्नेश, सप्तमेश और कलत्र कारक शुक्र का गोचर ऊपर वर्णित किसी भी एक भाव पर हो तब विवाह होता है। लग्नेश आदि के स्पष्ट राशि अंशों के जोड़ के आधार पर: अंक गणितीय सूत्र से विवाह काल का आकलन, गुरु ग्रह के गोचर पर से लग्नेश, सप्तमेश, चंद्र और शुक्र के राशि अंशों के जोड़ से प्राप्त राशि से 5 वीं या 9 वीं राशि पर गुरु के गोचर में आने पर निम्न रूप में किया जा सकता है-
शुक्र, जन्म लग्नेश और सप्तमेश-इन तीनों ग्रहों के स्पष्ट राशि अंशों को परस्पर जोड़ें। जोड़ने पर यदि योग 12 से ज्यादा हो तो उसमें 12 राशियां घटा देनी चाहिए। शेष राशियों और अंशों के आधार पर जो राशि प्राप्त हो उससे पांचवीं या नौवीं राशि में जब गुरु गोचर करे तब विवाह होगा। लग्नेश एवं सप्तमेश या सप्तमेश और चंद्र के स्पष्ट राशि अंशों के योग द्वारा पूर्वोक्त बिंदु क्रमांक एक में दर्शाई गई विधि से गुरु के गोचर के अनुसार विवाह का समय ज्ञात किया जा सकता है।
प्रश्न कुंडली के आधार पर:—
यदि प्रश्न काल में चंद्र, प्रश्न-कुंडली के तीसरे, पांचवें, सातवें, दसवें या ग्यारहवें स्थान में विराजमान हो तथा उसे गुरु पूर्ण दृष्टि देख रहा हो तो विवाह जल्दी होगा, ऐसा जानना चाहिए। प्रश्न कुंडली में सप्तम स्थान के स्वामी ग्रह का शुक्र से युति या दृष्टि संबंध हो तो विवाह शीघ्र होता है। प्रश्नकालीन लग्नेश और चंद्र प्रश्न कुंडली के सप्तम स्थान में विराजमान हो तो शीघ्र विवाह का योग समझना चाहिए। प्रश्नकालिक सप्तमेश और चंद्र की प्रश्न लग्न में स्थिति शीघ्र विवाह का द्योतक है। प्रश्नकालीन लग्न से सम स्थान में शनि होने पर विवाह शीघ्र होता है। शनि प्रश्नकालिक लग्न से किसी विषम भाव में स्थित हो तो विवाह शीघ्र होता है। प्रश्न-काल में प्रश्न-कुंडली में लग्न से चैथे स्थान का स्वामी बली हो तो प्रेम-विवाह हो सकता है, क्योंकि चैथा स्थान मित्र और मित्रता का स्थान है। चैथे स्थान और उसके स्वामी का लग्न, सप्तम भाव और इनके स्वामियों से अथवा शुक्र ग्रह से शुभ संबंध होना स्वयं वरण का बोधक होता है। यदि प्रश्नकालिक लग्न से सप्तम भाव का स्वामी बली हो तो समाज और कुल की रीति-रिवाजों के अनुरूप सर्वमान्य पारंपरिक विवाह होता है। प्रश्नकालीन लग्न से सप्तम भाव में विराजमान योगकारक बली ग्रह अथवा सप्तम भाव पर अपनी दृष्टि रखने वाला योगकारक बली ग्रह भी अपने योग काल में विवाह कराने में समर्थ होता है।
शनि के योगकारक होने पर विवाह संवत् (षठमास) में, बुध के योगकारक होने पर ऋतु (दो मास में), गुरु के योगकारक होने पर मास में, शुक्र के योगकारक होने पर पखवाड़े में, मंगल के योग कारक होने पर मात्र कुछ दिवसों में और चंद्र के योगकारक होने पर तत्काल होता है। वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा: वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा, यह जानने के लिए लग्न और चंद्र दोनों कुंडलियों के आधार पर सप्तमेश, शुक्र, स्त्रीकारक ग्रह आदि की स्थिति का विचार किया जाता है। साथ ही सप्तम स्थान और सप्तमेश पर दृष्टि रखने और युति करने वाले ग्रहों का अध्ययन करना भी आवश्यक होता है। इन सभी की अच्छी स्थिति होने पर वैवाहिक जीवन सुखमय होता है।
यदि सप्तम भाव में षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव का स्वामी स्थित हो अथवा सप्तम भाव पापयुत प्रभाव वाला हो, सप्तम स्थान में कोई पापी ग्रह हो अथवा उस पर पापी ग्रह की दृष्टि हो तो वैवाहिक जीवन दुखमय होता है। यदि सप्तम स्थान से पापग्रहों का युति या दृष्टि संबंध न हो और सप्तम भाव का स्वामी भाव 1,4,7,10 अथवा त्रिकोण 5,9 अथवा भाव 11 में हो तो दाम्पत्य जीवन मधुर होता है। यदि लग्न और सप्तम भाव के स्वामी परस्पर मित्र हों तो पति-पत्नी में प्रेम प्रगाढ़ रहता है। सम होने पर तकरार हो सकती है। शत्रु हों तो तनाव, वैचारिक मतभेद और कटुता रहेगी।
यदि सप्तम स्थान का स्वामी लग्नस्थ और लग्न का स्वामी सप्तमस्थ हो अथवा लग्नेश एवं सप्तमेश का केंद्र स्थान, मूल त्रिकोण या लाभ स्थान से संबंध युति या दृष्टि हो तो दोनों में अटूट प्रेम रहता है और जीवन सुखदायक होता है। सप्तमेश और सप्तम भाव के बली होने पर दाम्पत्य जीवन सुखद होता है। वैवाहिक संबंध विच्छेद वाली ज्योतिषीय ग्रह स्थितियां: विवाहोपरांत जब दम्पति के जीवन में ऐसी विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो जाएं कि उन्हें एक-दूसरे से अलग होकर जीवन निर्वाह करने को विवश होना पड़े तो ऐसी स्थिति के संबंध-विच्छेद की स्थिति माना जाता है। वैधानिक दृष्टि से ऐसे अलगाव को तलाक कहते हैं।
तलाक या संबंध-विच्छेद वाली परिस्थिति उत्पन्न होने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे चारित्रिक दोष, संतानाभाव, वैचारिक मतभेद, शारीरिक अपंगता, नशे की लत, आपसी तकरार, घमंडवश एक-दूसरे को तुच्छ समझने की कोशिशें, रुचियों और आदतों में अकल्पित असमानताएं, विदेश वास, संन्यास आदि। भारतीय ज्योतिष के आधार पर जन्मांग चक्र में ग्रहों की निम्न स्थितियां संबंध विच्छेद का कारण बन सकती हैं- सप्तम भाव और उसके स्वामी एवं स्त्री-पुत्र कारक ग्रह शुक्र पर विच्छेदात्मक ग्रहों शनि-राहु, सूर्य-राहु का दुषप्रभाव होना पति-पत्नी के रिश्ते पर पृथकतावादी असर छोड़ता है। यदि ये विच्छेदात्मक ग्रह द्वितीय और चतुर्थ भावों पर भी प्रभाव डालें तो तलाक हो सकता है।
कुंडली का षष्ठ भाव वैमनस्यता का भाव है। षष्ठेश भी संबंध-विच्छेद का कारक ग्रह बन जाता है, क्योंकि सप्तम स्थान से द्वादश भाव, षष्ठम स्थान ही होता है। यही कारण है कि कुंडली मिलान करते समय इस बात का विचार किया जाता है कि षष्ठ भाव की राशियां परस्पर वर-कन्या की राशियां न हों अर्थात वर की राशि से कन्या की अथवा कन्या की राशि से वर की राशि छठी नहीं हो।
विवाह-विच्छेद के योग:—
सप्तमेश का लग्न से द्वितीयस्थ, द्वितीयेश का सप्तमस्थ और राहु या केतु का द्वितीयस्थ या सप्तमस्थ होना। सप्तमस्थ राहु पर किसी पापग्रह की दृष्टि होना या दोनों की युति होना। स्त्री जातक की कुंडली के सप्तम भाव में राहु, मंगल और सूर्य में से एक, दो अथवा तीनों ग्रहों का विराजमान होना। स्त्री जातक की कुंडली में राहु अथवा शनि से दृष्ट सप्तमस्थ सूर्य का होना। स्त्री जातक की कुंडली में सूर्य का जन्म लग्न से सप्तमस्थ होना और सप्तमेश का नीचस्थ, शत्रु राशिस्थ या त्रिक भावस्थ होना। सप्तमेश और द्वादशेश का परस्पर राशि विनिमय होना तथा सप्तम भाव में मंगल, राहु या शनि का स्थित होना। षष्ठेश से दृष्ट किसी पाप ग्रह का सप्तम भाव में तथा सप्तमेश का द्वादश भाव में होना। सूर्य, शनि, राहु या केतु का सप्तम भाव में तथा सप्तमेश और व्ययेश का त्रिक भाव में होना।
सुखी वैवाहिक जीवन के योग:—
वर और वधू दोनों पक्षों के प्रत्येक व्यक्ति की यही कामना होती है कि दोनों का वैवाहिक जीवन सुखमय, समृद्ध और सफल रहे। इस हेतु लोग श्रेष्ठ वर और कन्या का चयन करने का प्रयास करते हैं। वर और कन्या की भी यही कामना रहती है कि उनका वैवाहिक जीवन और सफल हो।
सुखी वैवाहिक जीवन के संकेत जिन योगों में प्राप्त होते हैं, उनका संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है। प्रथम और सप्तम भाव में स्थित राशियां और उनके स्वामी एक-दूसरे के मित्र नहीं हो सकते। हां इतना अवश्य है कि लग्नेश एवं सप्तमेश की शुभ स्थिति से वर और कन्या के वैवाहिक जीवन के सुखमय होने की अत्यधिक संभावना रहती है। अगर लग्न और सप्तम स्थान के स्वामी एक साथ स्थित हों तो वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बना रहता है। यदि लग्न में सप्तम भाव का स्वामी स्थित हो तो पत्नी पति के अनुकूल चलने वाली होती है और उनका गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है।
यदि लग्नेश सप्तम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति पत्नी का अनुगमन करने वाला होता है। फलतः उनमें सामंजस्य बना रहता है। पति-पत्नी में से किसी भी एक की जन्म-कुंडली में यदि प्रथम एवं सप्तम भाव के स्वामियों में परस्पर दृष्टि विनिमय हो अथवा प्रथम भाव का स्वामी सप्तम भाव में और सप्तम भाव का स्वामी प्रथम भाव में स्थित हो तो वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है।
यदि किसी स्त्री जातक की जन्म पत्रिका के सप्तम, अष्टम और नवम भावों में शुभ ग्रह स्थित हों तो वह सौभाग्यवती, पुत्रवती, धनी और दीर्घायु होती है। स्त्री जातक की जन्म-कुंडली के प्रथम भाव में यदि चंद्र और बुध, बुध और शुक्र, चंद्र-बुध-शुक्र अथवा बुध-बृहस्पति-शुक्र स्थित हों तो वह रूपसी, गुणी, धनी, विदुषी, पुत्रवती, कुलवंती, पतिव्रता और सौभाग्यवती होती है। उसका जीवन सदा सुखमय रहता है। जिस स्त्री के जन्म काल में स्वगृही या उच्चस्थ बृहस्पति केंद्र या त्रिकोण में होता है उसका पति गुणज्ञ और संतान सद्गुणी होती हैं। वह संपन्न ससुराल की पुत्रवधू होती है और दोनों कुलों का कल्याण करती है। उसका वैवाहिक जीवन सफल होता है।
यदि किसी स्त्री की जन्म पत्रिका के दशम भाव में स्वगृही शुक्र, प्रथम भाव में गुरु और सप्तम भाव में चंद्र हो तो वह साम्राज्ञी सदृश सुखोपभोग करने वाली होती है। उसका वैवाहिक जीवन उत्तम होता है। लाभ भाव में स्थित उच्चस्थ गुरु और लग्न में स्थित उच्चस्थ बुध स्त्री जातक को रानी जैसा सुख-वैभव देता है। सभी शुभ ग्रहों की लग्न पर दृष्टि होने से वैवाहिक जीवन सुखी रहता है।
किसी के वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने के कुछ उपाय:—
वर और कन्या के भावी वैवाहिक जीवन की सफलता हेतु जन्म-कुंडली का मिलान कराएं। 18 से कम गुण मिलने पर विवाह न करें। लगभग समान आयु वर्ग के वर और कन्या का चयन करें। वर और कन्या की आयु में अधिक अंतर न हो। मौलिया मंगल वाले वर का विवाह चुनरी मंगल वाली कन्या से करना उनके सुखी वैवाहिक जीवन के लिए ज्योतिष शास्त्र सम्मत माना गया है। कुंडलियों का मिलान करवाने के पूर्व उनकी शुद्धता की जांच कराएं। कुंडली मिलान के समय नाड़ी दोष का विचार अवश्य करें। दाम्पत्य-प्रेम और सुखी जीवन के लिए वर व कन्या दोनों की गण-मैत्री का ध्यान रखना चाहिए। वर की राशि से कन्या की राशि का 9वीं और कन्या की राशि से वर की राशि का 5वीं होना सुखी वैवाहिक जीवन के लिए अशुभ माना गया है। वर व कन्या दोनों की राशि समान होने पर विवाहोपरांत दोनों में सदैव स्नेह बना रहता है।
परस्पर सप्तम राशियां होने पर उत्तम संतति सुख, चतुर्थ-दशम होने पर सुखमय जीवन और तृतीय-एकादश होने पर धन का प्राचुर्य रहता है, जो सुखी वैवाहिक जीवन के लिए आवश्यक होता है। यदि वर और कन्या के नामाक्षर एक ही वर्ग के हों तो दोनों में बढ़िया प्रीति रहती है। अग्नि एवं वायु तत्व तथा भूमि एवं जल तत्व वाली राशियों के वर और कन्या के वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बना रहता है, अत एव कुंडली मिलाते समय राशि का मिलान हंसानुसार (तत्वानुसार) कर लेना चाहिए।
विभिन्न तत्वों की राशियों का संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है- अग्नि तत्व राशियां- मेष, सिंह, धनु वायु तत्व राशियां- मिथुन, तुला, कुंभ भूमि तत्व राशियां- वृष, कन्या, मकर जल तत्व राशियां- कर्क, वृश्चिक, मीन कुंडली मिलान के समय ग्रह मैत्री के साथ-साथ युंजा (नाड़ी) का विचार भी अवश्य करना चाहिए। यदि वर और कन्या दोनों का राशि स्वामी एक ही हो तो विवाहोपरांत दोनों में परस्पर मैत्री भाव बना रहता है। यदि दोनों की यंुजा (नाड़ी) आदि-आदि, मध्य-मध्य या अन्त्य-अन्त्य होगी तो दोनों में हार्दिक स्नेह आजीवन बना रहेगा। वर और कन्या के षष्ठ, अष्टम और द्वादश भावों की राशियां समान नहीं होनी चाहिए।
यदि वर व कन्या दोनों की राशि अथवा लग्न एक ही हों तो उनका वैवाहिक जीवन सुखमय होता है, किंतु एक राशि होने पर नक्षत्र भेद और एक ही नक्षत्र होने पर चरण भेद आवश्यक होता है। वर और कन्या दोनों की लग्न राशि परस्पर सप्तम होने पर जीवन सुखमय रहता है। सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए कन्या के चयन के पूर्व यह अवश्य देखें कि उसकी कुंडली में ये पंच महादोष योग न हों- दारिद्र् योग, मृत्यु योग, वैधव्य योग, व्यभिचार योग और संतानाभाव योग। इसी तरह यह भी आवश्यक कि वर की कुंडली में निम्न योग न हों- भार्यानाश योग, अल्पायु योग, व्यभिचार योग, उन्माद योग, नपुंसकत्व योग। विष-कन्या योग वाली कन्या से विवाह वर्जित माना गया है।
उक्त सभी उपाय सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए विवाह पूर्व के हैं।
विवाह के पश्चात् निम्न उपाय करने चाहिए-
पति-पत्नी दोनों को भगवान गणेश का पूजन नवीन दूर्वांकुरों से श्रद्धा और भक्ति भावना के साथ नियमित रूप से करते रहना चाहिए। परिवार में आपस में प्रेम बना रहे, इसके लिए आदि शंकराचार्य विरचित गणपति-स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करना चाहिए। वर्ष में कम से कम एक बार सत्यनारायण व्रत-कथा करनी चाहिए। समय-समय पर अपने कुल देवता और कुल देवी का पूजन करना चाहिए। दुर्गा-पाठ और रुद्राभिषेक क्रमशः नवरात्रिकाल एवं श्रावण मास में करते रहना चाहिए। वर और कन्या दोनों को सुख-समृद्धि हेतु भाग्यदायी रत्न धारण करना चाहिए।
वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बनाए रखने लिए प्रेम वृद्धि यंत्र एवं आकर्षण यंत्र की स्थापना शुभ मुहूर्त में करनी चाहिए। सुख-समृद्धि और धन की प्राप्ति तथा वैवाहिक जीवन में खुशहाली लाने के लिए फेंगशुई की वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। विशेष पर्वों पर तीर्थ स्थलों का भ्रमण तथा गंगा, नर्मदा आदि पवित्र नदियों में स्नान-दान करना चाहिए। माता-पिता और गुरुजनों की सदा सेवा करनी चाहिए।
गौ-माता, विप्रजन, कुमारी कन्याओं का आदर सत्कार करते हुए उन्हें अन्न्ा, वस्त्र, भोजनादि से संतुष्ट करना चाहिए। संतानों को सद्गुणी, उदार, विद्यावान, धनवान और कर्मशील बनाने के लिए सदैव प्रयासरत रहना चाहिए।
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आइये जाने जन्म कुंडली के दूषित/ख़राब सप्तम भाव के कुछ उपयोगी टोटके/उपाय–
आज दांपत्य जीवन की सबसे बड़ी समस्या हैं पति-पत्नी के बीच छोटे-छोटे विवाद। कभी-कभी यही छोटे-छोटे विवाद तलाक का कारण बनते हैं। तलाक के कारण क्या-क्या हैं? ऐसा क्यों होता है? क्यों कुछ दंपत्ति अपना दांपत्य जीवन का निर्वाह ठीक ढंग से कर नहीं पाते? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसका कारण जन्म पत्रिका का सप्तम स्थान होता है। कुण्डली के इस स्थान में यदि सूर्य, गुरु, राहु, मंगल, शनि जैसे ग्रह हो या इस स्थान पर इनकी दृष्टि हो तो जातक का वैवाहिक जीवन परेशानियों से भरा होता है। सप्तम स्थान पर सूर्य का होना निश्चित ही तलाक का कारण है। गुरु के सप्तम होने पर विवाह तीस वर्ष की आयु के पश्चात करना उत्तम होता है। इसके पहले विवाह करने पर विवाह विच्छेद होता हैं या तलाक का भय बना रहता है। मंगल तथा शनि सप्तम होने पर पति-पत्नी के मध्य अवांछित विवाद होते हैं। राहु सप्तम होने पर जीवन साथी व्यभिचारी होता है। इस कारण उनके मध्य विवाद उत्पन्न होते हैं, जिनसे तलाक होने की संभावना बढ़ जाती है।एक परिवार में पति-पत्नी में अथाह प्रेम है। दोनों एक दूसरे के लिए पूर्ण समर्पित हैं। आपस में एक दूसरे का सम्मान करते हैं। अचानक उनमें कटुता व तनाव उत्पन्न हो जाता है। जो पति-पत्नी कल तक एक दूसरे के लिए पूर्ण सम्मान रखते थे, आज उनमें झगड़ा हो गया है। स्थिति तलाक की आ गई है। आखिर ऐसा क्यों हुआ?
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घर-परिवार में बाधा के लक्षण—-
परिवार में अशांति और कलह।
बनते काम का ऐन वक्त पर बिगड़ना।
आर्थिक परेशानियां।
योग्य और होनहार बच्चों के रिश्तों में अनावश्यक अड़चन।
विषय विशेष पर परिवार के सदस्यों का एकमत न होकर अन्य मुद्दों पर कुतर्क करके आपस में कलह कर विषय से भटक जाना।
परिवार का कोई न कोई सदस्य शारीरिक दर्द, अवसाद, चिड़चिड़ेपन एवं निराशा का शिकार रहता हो।
घर के मुख्य द्वार पर अनावश्यक गंदगी रहना।
इष्ट की अगरबत्तियां बीच में ही बुझ जाना।
भरपूर घी, तेल, बत्ती रहने के बाद भी इष्ट का दीपक बुझना या खंडित होना।
पूजा या खाने के समय घर में कलह की स्थिति बनना।
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व्यक्ति विशेष का बंधन—
हर कार्य में विफलता।
हर कदम पर अपमान।
दिल और दिमाग का काम नहीं करना।
घर में रहे तो बाहर की और बाहर रहे तो घर की सोचना।
शरीर में दर्द होना और दर्द खत्म होने के बाद गला सूखना।
इष्ट पर आस्था और विश्वास रखें।
हमें मानना होगा कि भगवान दयालु है। हम सोते हैं पर हमारा भगवान जागता रहता है। वह हमारी रक्षा करता है। जाग्रत अवस्था में तो वह उपर्युक्त लक्षणों द्वारा हमें बाधाओं आदि का ज्ञान करवाता ही है, निद्रावस्था में भी स्वप्न के माध्यम से संकेत प्रदान कर हमारी मदद करता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम होश व मानसिक संतुलन बनाए रखें। हम किसी भी प्रतिकूल स्थिति में अपने विवेक व अपने इष्ट की आस्था को न खोएं, क्योंकि विवेक से बड़ा कोई साथी और भगवान से बड़ा कोई मददगार नहीं है। इन बाधाओं के निवारण हेतु हम निम्नांकित उपाय कर सकते हैं।
उपाय : पूजा एवं भोजन के समय कलह की स्थिति बनने पर घर के पूजा स्थल की नियमित सफाई करें और मंदिर में नियमित दीप जलाकर पूजा करें। एक मुट्ठी नमक पूजा स्थल से वार कर बाहर फेंकें, पूजा नियमित होनी चाहिए।
स्वयं की साधना पर ज्यादा ध्यान दें।
गलतियों के लिये इष्ट से क्षमा मांगें।
इष्ट को जल अर्पित करके घर में उसका नित्य छिड़काव करें।
जिस पानी से घर में पोछा लगता है, उसमें थोड़ा नमक डालें।
कार्य क्षेत्र पर नित्य शाम को नमक छिड़क कर प्रातः झाडू से साफ करें।
घर और कार्यक्षेत्र के मुख्य द्वार को साफ रखें।
हिंदू धर्मावलंबी हैं, तो गुग्गुल की और मुस्लिम धर्मावलम्बी हैं, तो लोबान की धूप दें।
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व्यक्तिगत बाधा निवारण के लिए उपाय —-
व्यक्तिगत बाधा के लिए एक मुट्ठी पिसा हुआ नमक लेकर शाम को अपने सिर के ऊपर से तीन बार उतार लें औरउसे दरवाजे के बाहर फेंकें। ऐसा तीन दिन लगातार करें। यदि आराम न मिले तो नमक को सिर के ऊपर वार कर शौचालय में डालकर फ्लश चला दें। निश्चित रूप से लाभ मिलेगा।
हमारी या हमारे परिवार के किसी भी सदस्य की ग्रह स्थिति थोड़ी सी भी अनुकूल होगी तो हमें निश्चय ही इन उपायों से भरपूर लाभ मिलेगा।
अपने पूर्वजों की नियमित पूजा करें। प्रति माह अमावस्या को प्रातःकाल ५ गायों को फल खिलाएं।
गृह बाधा की शांति के लिए पश्चिमाभिमुख होकर क्क नमः शिवाय मंत्र का २१ बार या २१ माला श्रद्धापूर्वक जप करें।
यदि बीमारी का पता नहीं चल पा रहा हो और व्यक्ति स्वस्थ भी नहीं हो पा रहा हो, तो सात प्रकार के अनाज एक-एक मुट्ठी लेकर पानी में उबाल कर छान लें। छने व उबले अनाज (बाकले) में एक तोला सिंदूर की पुड़िया और ५० ग्राम तिल का तेल डाल कर कीकर (देसी बबूल) की जड़ में डालें या किसी भी रविवार को दोपहर १२ बजे भैरव स्थल पर चढ़ा दें।
बदन दर्द हो, तो मंगलवार को हनुमान जी के चरणों में सिक्का चढ़ाकर उसमें लगी सिंदूर का तिलक करें।
पानी पीते समय यदि गिलास में पानी बच जाए, तो उसे अनादर के साथ फेंकें नहीं, गिलास में ही रहने दें। फेंकने से मानसिक अशांति होगी क्योंकि पानी चंद्रमा का कारक है।
शास्त्रों के अनुसार मनुष्य के जीवन के 16 महत्वपूर्ण संस्कार बताए गए हैं, इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार में से एक है विवाह संस्कार। सामान्यत: बहुत कम लोगों को छोड़कर सभी लोगों का विवाह अवश्य ही होता है। शादी के बाद सामान्य वाद-विवाद तो आम बात है लेकिन कई बार छोटे झगड़े भी तलाक तक पहुंच जाते हैं। इस प्रकार की परिस्थितियों को दूर रखने के लिए ज्योतिषियों और घर के बुजूर्गों द्वारा एक उपाय बताया जाता है।
अक्सर परिवार से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए मां पार्वती की आराधना की बात कही जाती है। शास्त्रों के अनुसार परिवार से जुड़ी किसी भी प्रकार की समस्या के लिए मां पार्वती भक्ति सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। मां पार्वती की प्रसन्नता के साथ ही शिवजी, गणेशजी आदि सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है। अत: सभी प्रकार के ग्रह दोष भी समाप्त हो जाते हैं।
ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कुछ विशेष ग्रह दोषों के प्रभाव से वैवाहिक जीवन पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में उन ग्रहों के उचित ज्योतिषीय उपचार के साथ ही मां पार्वती को प्रतिदिन सिंदूर अर्पित करना चाहिए। सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। जो भी व्यक्ति नियमित रूप से देवी मां की पूजा करता है उसके जीवन में कभी भी पारिवारिक क्लेश, झगड़े, मानसिक तनाव की स्थिति निर्मित नहीं होती है।
– सप्तम स्थान में स्थित क्रूर ग्रह का उपाय कराएं।
– मंगल का दान करें ।
– गुरुवार का व्रत करें।
– माता पार्वती का पूजन करें।
– सोमवार का व्रत करें।
– प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाएं और पीपल की परिक्रमा करें।
विवाह
प्रेम विवाह में ग्रहयोग
ज्योतिष के अनुसार ग्रहों की युति भी प्रेम को विवाह की परिणिति तक लेजाने में मददगार होती है.
जब किसी लड़का और लड़की के बीच प्रेम होता है तो वे साथ साथ जीवन बीताने की ख्वाहिश रखते हैं और विवाह करना चाहते हैं। कोई प्रेमी अपनी मंजिल पाने में सफल होता है यानी उनकी शादी उसी से होती है जिसे वे चाहते हैं और कुछ इसमे नाकामयाब होते हैं। ज्योतिषशास्त्री इसके लिए ग्रह योग को जिम्मेवार मानते हैं। देखते हैं ग्रह योग कुण्डली में क्या कहते हैं।
ज्योतिषशास्त्र में "शुक्र ग्रह" को प्रेम का कारक माना गया है (Venus is the significator of love according to Vedic Jyotish)। कुण्डली में लग्न, पंचम, सप्तम तथा एकादश भावों से शुक्र का सम्बन्ध होने पर व्यक्ति में प्रेमी स्वभाव का होता है। प्रेम होना अलग बात है और प्रेम का विवाह में परिणत होना अलग बात है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पंचम भाव प्रेम का भाव होता है और सप्तम भाव विवाह का। पंचम भाव का सम्बन्ध जब सप्तम भाव से होता है तब दो प्रेमी वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं। नवम भाव से पंचम का शुभ सम्बन्ध होने पर भी दो प्रेमी पति पत्नी बनकर दाम्पत्य जीवन का सुख प्राप्त करते हैं।
ऐसा नहीं है कि केवल इन्हीं स्थितियो मे प्रेम विवाह हो सकता है। अगर आपकी कुण्डली में यह स्थिति नहीं बन रही है तो कोई बात नहीं है हो सकता है कि किसी अन्य स्थिति के होने से आपका प्रेम सफल हो और आप अपने प्रेमी को अपने जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करें। पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है (If the lord of fifth house Venus is placed in the seventh house, there is a possibility of love-marriage)। शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है।
शुक्र अगर लग्न स्थान में स्थित है और चन्द्र कुण्डली में शुक्र पंचम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह संभव होता है। नवमांश कुण्डली जन्म कुण्डली का शरीर माना जाता है अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है और नवमांश कुण्डली में सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तो प्रेम विवाह की संभावना 100 प्रतिशत बनती है। शुक्र ग्रह लग्न में मौजूद हो और साथ में लग्नेश हो तो प्रेम विवाह निश्चित समझना चाहिए (If Venus is placed in the Ascendant along with the Ascendant-lord then there is a very strong chance of a love-marriage)। शनि और केतु पाप ग्रह कहे जाते हैं लेकिन सप्तम भाव में इनकी युति प्रेमियों के लिए शुभ संकेत होता है। राहु अगर लग्न में स्थित है तो
नवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में से किसी में भी सप्तमेश तथा पंचमेश का किसी प्रकार दृष्टि या युति सम्बन्ध होने पर प्रेम विवाह होता है। लग्न भाव में लग्नेश हो साथ में चन्द्रमा की युति हो अथवा सप्तम भाव में सप्तमेश के साथ चन्द्रमा की युति हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है। सप्तम भाव का स्वामी अगर अपने घर में है तब स्वगृही सप्तमेश प्रेम विवाह करवाता है। एकादश भाव पापी ग्रहों के प्रभाव में होता है तब प्रेमियों का मिलन नहीं होता है और पापी ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्त है तो व्यक्ति अपने प्रेमी के साथ सात फेरे लेता है। प्रेम विवाह के लिए सप्तमेश व एकादशेश में परिवर्तन योग के साथ मंगल नवम या त्रिकोण में हो या फिर द्वादशेश तथा पंचमेश के मध्य राशि परिवर्तन हो तब भी शुभ और अनुकूल परिणाम मिलता
बृहस्पति एवं शुक्र का दाम्पत्य जीवन पर प्रभाव
बृहस्पति और शुक्र दोनों ही शुभ ग्रह हैं (Venus and Jupiter are benefic planets).सप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है (7th House is of the spouse).इस घर में इन दोनों ग्रहों की स्थिति एवं प्रभाव के अनुसार विवाह एवं दाम्पत्य सुख का सुखद अथवा दुखद फल मिलता है.पुरूष की कुण्डली में शुक्र ग्रह पत्नी एवं वैवाहिक सुख का कारक होता है और स्त्री की कुण्डली में बृहस्पति.ये दोनों ग्रह स्त्री एवं पुरूष की कुण्डली में जहां स्थित होते हैं और जिन स्थानों को देखते हैं उनके अनुसार जीवनसाथी मिलता है और वैवाहिक सुख प्राप्त होता है.
ज्योतिषशास्त्र का नियम है कि बृहस्पति जिस भाव में होता हैं उस भाव के फल को दूषित करता है (Jupiter has bad effect on the house it is in) और जिस भाव पर इनकी दृष्टि होती है उस भाव से सम्बन्धित शुभ फल प्रदान करते हैं.जिस स्त्री अथवा पुरूष की कुण्डली में गुरू सप्तम भाव में विराजमान होता हैं उनका विवाह या तो विलम्ब से होता है अथवा दाम्पत्य जीवन के सुख में कमी आती है.पति पत्नी में अनबन और क्लेश के कारण गृहस्थी में उथल पुथल मची रहती है.
दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने में बृहस्पति और शुक्र का सप्तम भाव और सप्तमेश से सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है (Jupiter & Venus relationship with seventh house).जिस पुरूष की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह शुक बृहस्पति से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर गुणों वाली अच्छी जीवनसंगिनी मिलती है.इसी प्रकार जिस स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह बृहस्पति शुक्र से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर और अच्छे संस्कारों वाला पति मिलता है.
शुक्र भी बृहस्पति के समान सप्तम भाव में सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है.सप्तम भाव का शुक्र व्यक्ति को अधिक कामुक बनाता है जिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध की संभावना प्रबल रहती है.विवाहेत्तर सम्बन्ध के कारण वैवाहिक जीवन में क्लेश के कारण गृहस्थ जीवन का सुख नष्ट होता है.बृहस्पति और शुक्र जब सप्तम भाव को देखते हैं अथवा सप्तमेश पर दृष्टि डालते हैं (Jupiter & Venus aspect the seventh lord) तो इस स्थिति में वैवाहिक जीवन सफल और सुखद होता है.लग्न में बृहस्पति अगर पापकर्तरी योग (Papkartari Yoga) से पीड़ित होता है तो सप्तम भाव पर इसकी दृष्टि का शुभ प्रभाव नहीं होता है ऐसे में सप्तमेश कमज़ोर हो या शुक्र के साथ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखद और सफल रहने की संभावना कम रहती है.ज्योतिष शास्त्र प्राचीन विद्या है। जिसके सहारे किसी भी व्यक्ति के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण किया जा सकता है। ज्योतिष विज्ञान है जो न कभी गलत था और न होगा। अब तो विश्वविद्यालयों में एक विषय के रूप में इसके पठन-पाठन की व्यवस्था भी होने जा रही है।
भारतीय ज्योतिष में जन्म कुंडली के बारह भावों का व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं से संबंध है। जीवन साथी का चयन, प्रेम, विवाह आदि जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर ज्योतिष ने स्पष्ट विचार व्यक्त किए हैं।
लग्न व्यक्तित्व का परिचालक है। इसके (लग्न) बलवान होने से ही व्यक्ति सुंदर और आकर्षक होता है। 12 भावों में से सप्तम भाव जीवन साथी का भाव है। जीवन साथी के विषय में जानकारी सप्तम भाव से प्राप्त होती है। शिक्षा बौद्धिक क्षमता एवं निर्णय क्षमता का परिचालक पंचम भाव है। एकादश भाव से मित्रों तथा सहयोगियों के विषय में जानकारी मिलती है। नवम भाव भाग्य का तथा पंचम भाव पराक्रम का है। इन सभी भावों का प्रेम विवाह, गंधर्व विवाह आदि में महत्वपूर्ण योगदान होता है। मित्रता या जीवन साथी के चुनाव तथा प्रेम विवाह में चंद्रमा,मंगल तथा शुक्र की अति महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
चंद्रमा शीघ्र गति से चलने वाला रहस्यमय और मन का कारक है। मन पर अधिकार होने के कारण चित्त की चंचलता का चंद्रमा ही निर्धारण करता है। मंगल ऊर्जा और साहस प्रधान ग्रह है। रक्त पर इसी का अधिकार है। प्रेम विवाह या गंधर्व विवाह के लिए साहस की आवश्यकता होती है। चंद्रमा युवा ग्रह है तथा तेज गति से चलता है इसलिए युवाओं, प्रेमी और नवविवाहितों पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। प्रेम-विवाह में इन तीनों ग्रहों की अहम भूमिका होती है। चंद्रमा मन, मंगल साहस और शुक्र आकर्षण से युवक-युवतियों की मित्रता में छिपे रहस्य को जाना जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र के विभिन्न फलित ग्रंथों तथा व्यावहारिक अनुभव से प्रेम-विवाह के कुछ योग इस प्रकार कहे जा सकते है।
1. यदि सप्तम भाव का स्वामी तथा तृतीय भाव के स्वामी मिलते हैं तो प्रेम-विवाह का योग बनता है।
2. शुक्र और मंगल परस्पर भाव परिवर्तन का योग निर्मित करते हैं तथा इनका संबंध बृहस्पति से होता है तो जातक पहले शारीरिक संबंध कायम करता है तथा उसके बाद विवाह करता है।
3. शुक्र एवं मंगल का संयोग लग्न या सप्तम भाव से हो तथा चंद्रमा का इस पर प्रभाव पड़ता है तो ऐसा जातक प्रेम-विवाह करता है। इसके कारण शारीरिक संयोग भी विवाह का कारण बन सकता है।
4. कुंडली में बृहस्पति और सप्तम भाव के स्वामी के सबल होने से प्रेम विवाह सफल होते है। बृहस्पति की कृपा से वैवाहिक जीवन समृद्ध और स्थिर होता है। सप्तम भाव का सबल स्वामी वैवाहिक जीवन को सफलता प्रदान करता है।
5. शनि और बृहस्पति के गोचर भाव से प्रेम-विवाह की अवधि का पता चलता है। गोचर में जब शनि और बृहस्पति का संबंध सप्तम भाव के स्वामी से होता है तो विवाह अवश्यंभावी हो जाता है।
सामाजिक जीवन व्यवस्था का मूलाधार विवाह संस्कार
बांसुरी के छिद्रों में बहता हुआ पवन, जैसे मधुर स्वर बन कर बाहर गुंजायमान होता है, उसी प्रकार सनातन धर्म के 16 संस्कारों को जीवन के अलग अलग खण्डों में बाट कर मनुष्य की मानसिक, शारीरिक, आध्यात्मिक शक्ति को विकसित, किया जाता है।
मानव को अपने स्वास्थ्य, व्यवहार, अनुशासन और संयम को स्वीकारोक्त बनाने का काम करते हैं- संस्कार! संस्कार वे क्रियायें एवं रीतियां है, जो व्यक्ति को सार्वभौमिक योग्यता प्रदान करने के साथ ही व्यक्ति को समाज व्दारा निर्धारित आदर्शो, मूल्यों एवं प्रतिमानों के अनुरूप विकास करने योग्य बनाते हें!
संस्कारो पर गहराई से चिन्तन मनन कर हमारे ऋषि मुनियों, विव्दानों ने मानव जीवन को सुखी, सम्पन्न और श्रेष्ठ बनाने के लिए 16 संस्कारों की माला उसे पहनाई है।
ये संस्कार है- गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोनयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुण्डन, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास और अन्त्येष्टि संस्कार। भारतीय संस्कृति में संस्कार इतने महीनता से घुल मिल गये हैं कि उनसे अलग होकर मानव जीवन को चलाना संभव नहीं है।
गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि संस्कार तक के 15 संस्कार तो एक व्यक्ति के व्यक्तित्व को तराशते हैं। किन्तु विवाह संस्कार दो आत्माओं, दो परिवारों के आपसी संबंधों को जोडता है।
विवाह संस्था का पहला उदाहरण महर्षि उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु के समय का मिलता जिसने बलात अपनी माता के अपहरण को देखा। जिसका उसके मन पर गहरा असर हुआ और वयस्क होने पर उसने समाज में विवाह नामक संस्था की नींव रखी। संभवतः समाज में वैवाहिक परम्परा यही से प्रारम्भ होकर शनै शनै विकसित होती गई।
पुरातन समय में विवाह के लिऐ वर, वधु के चयन में परिवार वाले बहुत सावधानी बरतते रहे हैं। इसके लिए एक कहावत भी प्रचलित है ‘‘ पानी पीना छानकर और रिश्ता करना जानकर‘‘।
पुराने समय में तो रिश्ता तय करने से पहले दोनों पक्ष की कई पीढीयों को खंगाला जाता था। वर के कुल, शील, शरीर, आयु, विद्या, वित्त व साधन सम्पन्नता, इन सात बातों की जानकारी तथा इसी प्रकार वधु में वित, रूप, प्रज्ञा और कुल ये चार लक्षणों की जानकारी लेने के बाद दोनों पक्षों की सहमति होने पर ही रिश्ते तय किए जाते थे। विवाह को वैदिक विधियों तथा कुल धर्म के अनुसार सम्पन्न कराया जाता था। ऐसे विवाह संबंधो में स्थायित्व बना रहता था।
वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों का ह्रास, बढती हुई उम्र, भौतिक सम्पन्नता, विलासिता, दूरस्थ स्थानों पर नौकरी, परिवारजनों के आपसी संबंधों में गिरावट, समाज से दूरी, माता पिता एवं बीचवान की जिम्मेदारी का अभाव आदि अनेक कारणों की वजह से, वैदिक विधी विधान और कुल धर्म, लोकाचार से सम्पन्न होने वाले विवाह पध्दति में निरन्तर गिरावट आती जा रही है।
पहले गाये जाने वाली प्रभाती, दूल्हा दूल्हन को हल्दी लेपन,बाना झेलना,ढोल की धुन पर नृत्य आदि अनेक विधियों लोप होगई है। वैदिक विधि के मान से आज भी, रिश्तों का चयन, गणेश पूजन, माता पूजन, मण्डप, गृहशान्ति, पाणिग्रहण, सप्तपदी में वर वधु के व्दारा एक दूसरे को दिए जाने वाले वचन, स्नेह भोज, आदि सभी सम्पन्न होने के बाद भी इनके सम्पन्न होने की क्रियाओं में गिरावट पैदा हो रही हैं। जैसे रिश्तों के चयन में परिवारजन अपनी जिम्मेदारी से हटकर लडके लडकियों की आपसी सहमति को ही महत्व दे रहे हैं। पहले शादी घर से सम्पन्न होने के कारण बाराती और घराती लडकी के घरबार से वाकिफ हो जाते थे। अब धर्मशालाओं या गार्डन में ही शादी और विदाई होरही है।
स्थान परिवर्तन से भी कई प्रकार के दोष उत्पन्न हो रहे हैं । लग्न समय का बहुत महत्व है किन्तु, बैण्ड बाजों की धुन पर फुहड डांस के कारण बारात समय पर व्दारचार के लिए नहीं पहुंच पाने से वधु पक्ष के मन में कई प्रकार के विचार जन्म लेते है।
लग्न मण्डप में बारातियों व्दारा अक्षत को वर्षा की फुहार की तरह बरसाने के बजाय तुफान की तरह फेका जाना, फूहड हंसी मजाक में लग्न होना आदि। जबकि मंगलाष्टक का प्रभाव वर वधु के जीवन में प्रेम रस घोलता है, सावधान शब्द भविष्य में आने वाली असामान्य परिस्थितियों से निपटने के लिऐ पहले से ही सावधानी बरतने की और इशारा है। इसी प्रकार अक्षत वर्षा अक्षत की तरह मन से साफ रह कर एक दूसरे के परिवार में घुलमिल कर एक हो जाने का संदेश देती है। सप्तपदी में सात वचन जो वर वधु व्दारा एक दूसरे को दिये जाते है उनको भी यार दोस्तों,सखी सहेलियों व्दारा सस्ती हंसी मजाक में महत्वहीन कर दिया जा रहा है।
इस प्रकार वैवाहिक संस्कार के नियमों कई प्रकार से तहस नहस होने के कारण वैवाहिक विच्छेदों एवं आपसी अनबन में वृध्दि हो रही है ! इस पर प्रबुध्दजनों,युवाओं को चिन्त मनन कर ऐसा रास्ता निकालना चाहिए ताकि संस्कार की गरिमा और वर वधु के जीवन की डोर मजबूत हो सके।
परिचय के विस्तार, और समय की मांग को देखते हुए विवाह संस्कार में परिवर्तन तो अवश्यभांवी है। किन्तु इसमें भावनात्मक अलगाव एवं उथलेपन का विस्तार थोडा कष्टप्रद है। अन्त में जब रिश्तों के चयन में लडके लडकी की व्यक्तिगत सहमति जिम्मेदार है, तो विवाह संस्कार की गरिमा , आपसी रिश्तों को निभाने, दोनों परिवारों में आपसी सौहार्द ,सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों आदि में पति पत्नि दोनों को ही समझोतावादी और सुधारवादी बनना होगा। दोनों के मन में हक नहीं फर्ज की आवाज गूंजना चाहिए ।
गुण-मिलान ही काफी नहीं सफल विवाह के लिये
विवाह मानव जीवन का एक पड़ाव है जिसके बाद इंसान अपनी पूर्व की जीवन शैली को छोड़कर एक नये जीवन के सफर पर चलता है। हर स्त्री पुरुष विवाह के समय अपना जीवन एक अन्जान व्यक्ति के साथ सिर्फ यह सोचकर जोड़ता है कि मेरा हम सफर जीवन में सदैव मेरा साथ निभायेगा। मेरे हर सुख-दुख को अपना सुख-दुख समझेगा और जिन्दगी में आने वाली सभी कठिनाइयों का मिलकर मुकाबला करेगा। विवाह को पड़ाव इसलिए कहा गया है क्योंकि विवाह से पूर्व व्यक्ति सिर्फ अपने लिये सोचता है, स्वयं के लिये जीता है किन्तु विवाह के पश्चात वह अपने परिवार के लिये अपनी आने वाली संतानों के लिये जीता है। पर आज विवाह का मतलब ही बदल गया है। रोज हम हमारे समाज में कई मामलों में देखतें हैं कि व्यक्ति ग्रस्त वैवाहिक जीवन के फलस्वरूप हत्या और आत्महत्या जैसा अपराध भी कर देते हैं।
तलाक, अलगाव, दूसरा विवाह, झगड़ा आये दिन हम देखते हैं। तमाम ऐसी परिस्थितियों के लिये जिम्मेदार हैं हमारी आधुनिक शैली जो समाज को पथभ्रष्ट करती है। टीवी संस्कृति ऐसे धारावाहिक जिनका कोई अर्थ नहीं है, जिनकी तरफ इंसान खिचता चला जा रहा है और आधे से ज्यादा समय वही टीवी देखने में ही गुजारता है। इसका पूरा प्रभाव हमारे समाज, संस्कृति, बच्चों आदि पर पड़ता है। धारावाहिकों की उल्टी-सीधी कहानियों का कोई तत्व नहीं होता पर व्यक्ति अपनी रीयल जिन्दगी में इसको उतार लेता है।
हमारे देश में 80 प्रतिशत शादियां सिर्फ गुण-मिलान के आधार पर कर दी जाती हैं जो कि किसी भी गली-मुहल्ले में किसी मंदिर में बैठे पूजारी से मिलवा लिये जाते हैं, क्योंकि प्राय: सभी मंदिरों में पूजारी के पास पंचांग होता है और सभी पंचांगों में गुण-मिलान की सारणी होती है, मात्र वो सारणी देखकर जो कि एक आम आदमी भी देख सकता है, पूजारी जी कह देते हैं कि लड़के-लड़की के 28 गुण मिल रहे हैं कोई दोष नहीं हैं आप विवाह कर सकते हैं और मात्र इतने से गुण मिलान मानकर किसी के भाग्य का निर्णय हो जाता है और विवाह हो जाता है। बाद में परिणाम चाहे जो हों यहां मैं यह कहना चाहुंगा कि मेरे उक्त कथन का तात्पर्य यह कतई नहीं हैं कि मैं गुण-मिलान को आवश्यक नहीं मानता या गुण-मिलान का कोई औचित्य नहीं है, बल्कि मेरा भी यह कहना है कि एक सफल विवाह के लिये गुण मिलना भी अत्यन्त आवश्यक हैं किन्तु इसके साथ यह भी कहना है कि सिर्फ गुण-मिलान ही काफी नहीं है बल्कि पूर्ण कुंडली मिलान उससे भी ज्यादा आवश्यक है।
यहां मैं पाठकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहुंगा कि प्राय: एक दिन या चौबीस घंटों में एक ही नक्षत्र होता है। मात्र एक यो दो घंटे ही चौबीस घंटों में दूसरा नक्षत्र होता है और गुण-मिलान सिर्फ किस नक्षत्र के किस चरण में जातक का जन्म हुआ है, उसके आधार पर होता है। किन्तु उन चौबीस घंटों में बारह लग्नों की बारह कुंडलियां बनती है। कहने का तात्पर्य यह कि उन चौबीस घंटों में जन्में सभी जातकों की जन्म नक्षत्र और जन्म राशि तो समान होंगी किन्तु उन सभी की कुंडलियां अलग-अलग होगी किसी के लिये गुरु, सूर्य, चंद्रमा, मंगल कारक ग्रह होगें तो किसी के लिये शुक्र, शनि या बुध कोई मांगलिक होगा। किसी की कुंडली में राजयोग तो किसी की कुंडली में दरिद्र योग होगा।
कोई अल्पायु होगा, कोई मध्यायु होगा, तो कोई दीर्घायु तो किसी कुंडली में उसका वैवाहिक जीवन बहुत अच्छा होगा तो किसी की कुंडली में बहुत खराब होगा। किसी के द्वि-विवाह, त्रि-विवाह योग होता है तो कोई अविवाहित रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि उन चौबीस घंटों में जन्में सभी जातकों को जन्म नक्षत्र तो एक ही होगा किन्तु सभी की कुंडलियां और उनका भाग्य अलग-अलग होगा। यहां पुन: ध्यान देने योग्य यह बात है कि गुण-मिलान सिर्फ जन्म नक्षत्रों के आधार पर ही होता है ऐसे में यदि किन्ही दो लड़के-लड़की के गुण मिलायेंगे और उनके गुण मिल भी गये किन्तु उनकी कुंडलियों में कोई दोष है तो वह विवाह कतई सफल नहीं हो सकता।
मेरे व्यक्तिगत ज्योतिषीय अनुभवों में मैंने सैकड़ों ऐसी कुंडलियां देखी हैं जिनके गुण तो 28-28, 30-30 मिल जाते हैं किन्तु उनका वैवाहिक जीवन अतियन्त कष्टप्रद है। उनके तलाक के मुकदमें चल रहे हैं या तलाक हो चुके हैं या उनका जीवन ही खत्म हो चुका है और सैकड़ों ऐसी कुंडलियां देखी गयी हैं। जिसके मात्र 8-8, 10-10 गुण ही मिलते हैं किन्तु फिर भी उनका पारिवारिक वैवाहिक जीवन सुखद उन्नतिपूर्ण चल रहा है।
अत: यहां मैं पुन: लिखना और कहना चाहुंगा कि मैं गुण मिलान के खिलाफ नहीं हूं गुण मिलान भी आवश्यक है किन्तु मेरा पाठकों से सिर्फ यह निवेदन है कि मात्र गुण मिलान पर ही पूर्ण भरोसा नहीं करें किसी योग्य ज्योतिषी से बालक-बालिका की कुंडलियां मिलवाकर ही उसके विवाह का निर्णय लें क्योंकि गुण-मिलान से ज्यादा आवश्यक है कुंडलियों का मिलना और दोनों की कुंडलियों में उनके वैवाहिक जीवन की स्थिति।
मेरी शादी कब होगी ?
वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी जातक का विवाह तब होता है जब उसकी कुंडली के अनुसार सप्तमेश की दशा या अन्तर्दशा , सातवे घर में स्थित ग्रहों की दशा या अन्तर्दशा अथवा सातवे घर को देखने वाले ग्रहों दशा अन्तर्दशा आती है , यदि छठे घर से सम्बंधित दशा या अन्तर्दशा चल रही हो तो विवाह में देरी अथवा विघ्न आते है!
अब यदि दशा या अंतर दशा विवाह के लिए मंजूरी देते है तो गोचर के ग्रहों की मंजूरी लेना भी आवशयक होता है, सबसे पहले गुरु और शनि की मंजूरी होनी चाहिए ! जब गुरु और शनि गोचर में कुडली में लग्न से सातवे स्थान से सम्बन्ध बनाते है , चाहे दृष्टि द्वारा या अपनी स्थिति द्वारा , तो वह कुंडली में विवाह के योग का निर्माण करते है , लेकिन इस स्थिति में गोचर के ग्रहों का मूर्ति निर्णय जाचना आवश्यक होता है ! क्योकि यदि मूर्ति निर्णय शुभ न हुआ तो विवाह में परेशानिया उत्पन्न हो सकती है ! जिस घरों में गृह गोचर करते है उन घरों से सम्बंधित अष्टक वर्ग के नंबर अवश्य अवश्य होने चाहिए, अन्यथा ग्रहों की मंजूरी के उप्रात्न भी विवाह नहीं हो सकता !
इसके बाद मंगल और चन्द्र ग्रहों का सम्बन्ध, पाचवे और नौवे घर से होना चाहिए ! शुभ और सुखी विवाहित जीवन के लिए १२ वे और ११ वे घरों की शुभता भी आवशयक है ! यदि विवाह प्रेम से सम्बंधित है तो पाचव घर के बल की आवशयकता होती है ! छठा और दसवां घर विवाह में रूकावट उत्पन्न करता है , यदि दशा और अन्तर्दशा इस घरों से सम्बंधित है तो विवाह नहीं होगा , इन दशाओं में यदि विवाह हो भी जाए तो ज्यादा समय तक सम्बन्ध नहीं चलता तथा तलाक हो जाता है!
यदि दशानाथ और अन्तर्दशा नाथ विवाह की मंजूरी नहीं देते और गोचर के गृह विवाह का योग नहीं बनाते तो विवाह में देरी , विवाह न होना अथवा विवाह के पश्चात् तलाक हो सकता है!
एस्ट्रो से जानें विवाह के योग
आजकल लड़के-लड़कियाँ उच्च शिक्षा या अच्छा करियर बनाने के चक्कर में बड़ी उम्र के हो जाने पर विवाह में काफी विलंब हो जाता है। उनके माता-पिता भी असुरक्षा की भावनावश बच्चों के अच्छे खाने-कमाने और आत्मनिर्भर होने तक विवाह न करने पर सहमत हो जाने से भी विवाह में विलंब निश्चित होता है।
अच्छा होगा किसी विद्वान ज्योतिषी को अपनी जन्म कुंडली दिखाकर विवाह में बाधक ग्रह या दोष को ज्ञात कर उसका निवारण करें।
ज्योतिषीय दृष्टि से जब विवाह योग बनते हैं, तब विवाह टलने से विवाह में बहुत देरी हो जाती है। वे विवाह को लेकर अत्यंत चिंतित हो जाते हैं। वैसे विवाह में देरी होने का एक कारण बच्चों का मांगलिक होना भी होता है।
इनके विवाह के योग 27, 29, 31, 33, 35 व 37वें वर्ष में बनते हैं। जिन युवक-युवतियों के विवाह में विलंब हो जाता है, तो उनके ग्रहों की दशा ज्ञात कर, विवाह के योग कब बनते हैं, जान सकते हैं।
जिस वर्ष शनि और गुरु दोनों सप्तम भाव या लग्न को देखते हों, तब विवाह के योग बनते हैं। सप्तमेश की महादशा-अंतर्दशा या शुक्र-गुरु की महादशा-अंतर्दशा में विवाह का प्रबल योग बनता है। सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश के साथ बैठे ग्रह की महादशा-अंतर्दशा में विवाह संभव है।
अन्य योग निम्नानुसार हैं
(1) लग्नेश, जब गोचर में सप्तम भाव की राशि में आए।
(2) जब शुक्र और सप्तमेश एक साथ हो, तो सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में।
(3) लग्न, चंद्र लग्न एवं शुक्र लग्न की कुंडली में सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में।
(4) शुक्र एवं चंद्र में जो भी बली हो, चंद्र राशि की संख्या, अष्टमेश की संख्या जोड़ने पर जो राशि आए, उसमें गोचर गुरु आने पर।
(5) लग्नेश-सप्तमेश की स्पष्ट राशि आदि के योग के तुल्य राशि में जब गोचर गुरु आए।
(6) दशमेश की महादशा और अष्टमेश के अंतर में।
(7) सप्तमेश-शुक्र ग्रह में जब गोचर में चंद्र गुरु आए।
(8) द्वितीयेश जिस राशि में हो, उस ग्रह की दशा-अंतर्दशा में।
मुहूर्त का महत्त्व
दूल्हा दुल्हन के लिए सिर्फ कुंडली मिलाना ही सबकुछ नहीं है बल्कि विवाह के शुभ मुहूर्त भी सफल वैवाहिक जीवन के लिए बहुत मायने रखता है। अगर ग्रहों कि चाल सही नहीं है या लग्न को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं या मुहूर्त के सातवें घर में या फिर अगर चन्द्रमा शादी के समय पर बुरी तरह प्रभावित होता है तो खुशियां कम हो जाती हैं। चन्द्रमा को पाप ग्रह के नक्षत्र से नहीं गुजरना चाहिए या कम से कम उस राशि में नहीं होना चाहिए जो मजबूत पाप ग्रह – शनि, राहू और केतु के मार्ग में हो। मुहूर्त को पूरे भारत में उचित महत्त्व दिया जाता है। कुंडली का मिलान तब अधिक प्रभावी और उपयोगी हो जाता है जब गणना में सभी कारकों पर विचार किया जाए। कुंडली मिलान के साथ ही उससे संबंधित विवरणों की उचित व्याख्या जरुरी है ताकि भविष्यवाणी सटीक हो। यह वैवाहिक जीवन में बड़े झटके को कम कर देता है। भारतीय संस्कृति में कुंडली मिलान बहुत ही सामान्य बात है। यह शायद लम्बे भारतीय वैवाहिक जीवन का एक मुख्य कारणों में से एक है क्योंकि कुंडली युगल के गुणों के मिलान का अनुपात जांचता है। यह गलत धारणा है कि कुंडली मिलान सिर्फ घरवालों कि मर्जी से की जानेवाली शादी के लिए ही जरुरी है। प्रेम विवाह के लिए भी यह नियम समान रूप से लागू होता है। यह रिश्ते की लम्बी उम्र की भविष्यवाणी करता है और उन कारकों पर विचार करता है जिसके बारे में लोग प्रेम में डूबे होने के कारण ध्यान नहीं देते। समय बीतने के साथ ही अब प्रेम विवाह में भी कुंडली मिलान की मांग की जाने लगी है, विशेष रूप से होनेवाले दूल्हा दुल्हन के माता पिता की ओर से यह मांग काफी होती है।
वर्षों पहले शेक्सपियर ने हमेशा की तरह बहुत ही पते की बात कही थीः
विवाह अटोर्नीशीप में निपटने से भी
लायकता के विषय से भी अधिक विषय है
क्योंकि विवाह नर्क की राह ले जाता है
एक असहमति और निरंतर कलह की अवधि है?
इसके विपरित की स्थिति परमसुख प्रदान करती है,
और यह स्वर्गीय शान्ति का एक पैटर्न है।
विवाह और नाड़ी मिलान
विवाह में वर-वधू के गुण-मिलान में नाड़ी का महत्व इसी से ज्ञात होता है कि 36 गुणांक में 8 गुणांक नाड़ी के होते हैं। दो अपरिचितों की मनःस्थिति और शारीरिक सामंजस्य की जानकारी नाड़ियों के मिलान से की जाती है। भावी संतान सुख की जानकारी भी नाड़ी से ही मिलती है।
वर-कन्या के जन्म नक्षत्र एक ही नाड़ी के नहीं होने चाहिए। दोनों की नाड़ियाँ भिन्ना होना शुभ माना जाता है। वर-कन्या की यदि नाड़ियाँ आद्य-आद्य या अन्त्य-अन्त्य हैं तो अच्छा मिलान नहीं माना जाता है, परंतु दोनों की यदि मध्य नाड़ियाँ हैं तो अति अशुभ माने जाने से यदि नाड़ी दोष का परिहार न हुआ हो तो विवाह करना उचित नहीं होता है।
नाड़ियाँ तीन- आद्य, मध्य और अन्त्य मानी गई हैं, जो नक्षत्रानुसार इस प्रकार होती हैं- अश्वनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, पू. फाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पू. भाद्र की आद्य नाड़ी, भरणी, मृगशिरा, पुष्य, उ. फाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पू.षा. घनिष्ठा, उ. भाद्र की मध्य नाड़ी और कृतिका, रोहिणी, श्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उ.षा., श्रवण, रेवती की अंत्य नाड़ी होती है।
गण दोष, योनि दोष, वर्ण दोष और षड़ाष्टक ये चारों दोष वर-कन्या में गुण ग्रहमैत्री होने पर दोष नहीं रहते परंतु नाड़ी दोष बना रहता है। नाड़ी दोष का विचार ब्राह्मणों में विशेष रूप से करने का उल्लेख है।
नाड़ी दोष परिहार
निम्नांकित परिस्थितियों में नाड़ी दोष परिहार स्वतः ही हो जाता है। (उद्धरण चिह्न) राश्यैक्ये चेद्भिन्नामृक्षं द्वियों स्वान्नाक्ष त्रैम्ये राशि युग्मं तथैव। नाड़ी दोषो नो गणानां च दोषो नक्षत्रैक्ये पाद भेदे शुभं स्यात। अर्थात (1) एक ही राशि हो, परंतु नक्षत्र भिन्ना हों, (2) एक नक्षत्र हो परंतु राशि भिन्न हो, (3) एक नक्षत्र हो परंतु चरण भिन्न हों। (4) नक्षत्र एवं चरण एक होने पर भी भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुष्य, विशाखा, श्रवण, घनिष्ठा, पू. भाद्र, उ. भाद्र एवं रेवती में जन्म होने पर नाड़ी दोष नहीं रहता है। (5) कन्या के नक्षत्र से मध्य नाड़ी नहीं है तो पार्श्व नाड़ी पर दोष नहीं रहता है।
एक राशि-नक्षत्र होने पर गुण मिलान में 36 में से 28 गुणों का मिलान हो जाता है और नाड़ी दोष का परिहार होने पर विवाह विचारणीय होता है। नाड़ी से भावी संतान सुख ज्ञात किया जाता है। इसलिए नाड़ी दोष होने पर भी यदि वर-कन्या दोनों की जन्म कुंडलियों के पंचम भाव में शुभ ग्रह है, शुभ ग्रहों से दृष्ट है तथा पंचमेश की शुभ स्थिति है तो विवाह विचारणीय हो सकता है।
विवाह में कोई बाधा नहीं है। पहले चिकित्सा सुविधाएँ नहीं होने से नाड़ी मिलान की संतान सुख की दृष्टि से उपयोगिता रही है। जाँच के परिणाम निर्दोष हों तो नाड़ी दोष होने पर भी विवाह किया जा सकता है। नाड़ी के संबंध में आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर केवल नाड़ी दोष देखकर विवाह को अविचारणीय मान लेना भूल होगी।
संभावित दूल्हा और दुल्हन के मध्य संवादिता सुनिश्चित करने के लिये उनकी कुडली का मिलान करना ही एक विकल्प है। विवाह के बाद युगल एक दूसरे को प्रभावित करते हैं और उनकी कुंडली का सम्मिलित असर उनके भविष्य पर होता है। एक बार विवाह हो जाये उसके पश्चात उनकी कुडली जीवन भर के लिये उनके भविष्य और जीवनप्रणली को सामुहिक रूप से प्रभावित करती है।
सामान्यतः उत्तर और दक्षिण भारत में कुंडली मिलाने का तरीका एक जैसा है। फिर भी कुछ बातें दक्षिण भारत में थोड़ी अलग हैं। कुंडली मिलाते समय आठ मुख्य चीजें उत्तर और दक्षिण भारत में एक सामान रूप से देखी जाती हैं । ये हैं-
वर्ण
वश्य
तारा या दिन
योनि
ग्रह मैत्री
गण
भकुट
नाड़ि
हर घटक को एक निश्चित अंक दिया गया है जो इस तरह हैं-
वर्ण को1 अंक , वैश्य को 2, दिन को 3, योनी को 4, ग्रह मैत्री को 5, गण को 6, भकूट को 7 और नाड़ी को 8 अंक दिया गया है । सबका जोड़ कुल 36 अंक होते हैं।
इस मानदंड के आधार पर, दो संभावित लोगों की कुंडली को मिलाना और उसके फल की गणना करना ही गुण मिलान - कहलाता है.
36 में 18 अंक 50 % हुआ जिसे औसत माना जाता है और 28 अंक मिले तो संतोषजनक मानते हैं। कुंडली मिलाने के समय कम से कम 18 अंक मिलने चाहिए।
यदि होनेवाले दूल्हा दुल्हन एक ही नाड़ी के हों तो यह नाड़ी दोष कहलाता है। उदहारण के लिए, यदि दोनों की मध्य नाड़ी हो तो इस नाड़ी दोष से बच्चे के जन्म में समस्या आती है। इस तरह के मामले में बच्चे के जन्म की सम्भावना नहीं के बराबर रहती है। इसमें शामिल युगल का रक्त समूह से सीधा संबंध रहता है।
यह एक गहन अध्ययन का विषय है और संवादिता की गणना के दौरान केवल इन्ही कारकों को क्यों देखा गया । फिर भी इसकी वैधता पर सवाल नहीं किये जा सकते। उदहारण के लिए, यदि लड़की श्वान योनी (श्वान -कुत्ता) में पैदा हुई और लड़का मंजर योनी (मंजर- बिल्ली) का है, तो ऐसी स्थिति में लड़की हमेशा लड़के पर हावी रहेगी। यह भविष्यवाणी कुत्ता बिल्ली के स्वाभाव के आधार पर की जा सकती है।
पूरे भारत में कुंडली मिलाते समय मंगल दोष को गंभीरता से लिया जाता है जबकि ज्योतिषी शनि दोष को उतना गंभीर नहीं मानते हैं। कुंडली मिलाते समय राशि यानि चन्द्र राशि का सही तरीके से मिलान और उसके फल पर विचार करना चाहिए। कुंडली मिलाते समय लग्न का भी उतना ही महत्त्व है। दक्षिण भारत में कुंडली मिलाते समय इन 10 कारकों पर विचार किया जाता है-
धिना- सितारों के आधार पर होनेवाले दूल्हा दुल्हन के दापंत्य जीवन की आयु के आधार पर गणना की जाती है।
गण – सुखी जीवन और सामान्य भलाई का प्रतिनिधित्व करता है।
महेंद्र- बच्चे के जन्म की संभावना से संबंधित है।
स्त्री दीर्घा-यह भी सुखी और सामान्य जीवन के लिए होता है।
योनी-आनंददायक और संतुलित वैवाहिक जीवन के लिए देखा जाता है।
राशि-यह संतान तथा उनकी खुशी के लिए होता है।
रहस्याधिपति- यह भी वंश और धन के बारे में होता है।
वैस्य- यह विवाह से मिलने वाले प्यार और खुशियों के लिए होता है।
रज्जू- यह लम्बे वैवाहिक जीवन के लिए काफी महत्वपूर्ण है और साथ ही साथ दूल्हा दुल्हन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
वेधई -यदि वेधई शून्य हो तो वैवाहिक जीवन, सभी तरह की विपदाओं से बचा रहता है।
कुंडली मिलान और गुण गणना भारत में बहुत प्रचलित प्रथा है। यहां सामान्य लोग जानते हैं की वैवाहिक बंधन में बंधने के लिए कितने गुणों की आवश्यकता होती है। कुछ ज्योतिषी कुंडली मिलाने के परंपरागत तरीकों का ही अनुसरण करते हैं। गणेशजी कुंडली मिलाने के दौरान पाश्चात्य ज्योतिषिय अवधारणाओं पर अमल करते हैं। यह तरीका कॉम्पोसाईट चार्ट कहलाता है। गणेशजी का मानना है कि कुंडली मिलाने में पारंपरिक तरीके के अलावा कॉम्पोसाईट चार्ट भी सफल वैवाहिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कॉम्पोसाईट चार्ट एक विधि है जिसमें एक कुंडली के प्रभाव की तुलना को दूसरे की कुंडली से की जाती है। जैसे- दूल्हे का लग्न तुला है और दुल्हन का मकर, ऐसे में वैवाहिक गठबंधन नहीं होना चाहिए क्योंकि दोनों एक दूसरे के वर्ग में हैं। इस कारण दोनों में विचारक मतभेद और संघर्ष होता रहेगा। दूसरी ओर अगर दूल्हा तुला लग्न में और दुल्हन कुंभ में हो तो उनका जीवन बहुत ही आनंदमय बितेगा क्योंकि दोनों की राशि में एक ही तत्व है -वायु। दूसरी स्थिति में यदि दूल्हा अपना व्यवसाय करता है और दूल्हन का राहू और शनि दूल्हे के तीसरे घर को प्रभावित करता है तो शादी के बाद दूल्हे को व्यवसाय में हानि उठानी पड़ेगी।
आपसी शारीरिक आकर्षण के लिए दूल्हा के साथ ही दुल्हन का शुक्र अनुकूल स्थिति में होना चाहिए। अगर वे त्रिकोण में हैं तो यह अच्छा हो सकता है, अगर वे केन्र्द में होंगे तो यह प्रेम जीवन में तनाव का संकेत है। इसी तरह, युगल के लिए सामान्य खुशियां और दोनों के बीच मजबूत बंधन के लिए दोनों कुंडली में सप्तम भाव के मालिक के बीच अच्छे संबंध होने चाहिए।
इस तरह से संबंधों की अनुकूलता मिलाने की लम्बी सूची है जो कि कुंडली मिलाने के लिए अन्य भारतीय ज्योतिषों के बीच लोकप्रिय होने में थोड़ा समय ले सकता है। गणेशजी को विश्वास है कि पुरानी प्रणाली के साथ यदि कोम्पोसाईट चार्ट को प्रभावी तरीके से मिलाया जाए तो कुंडली मिलान और भी ज्यादा सटीक और विश्वसनीय हो सकता है।
वर्ण
अष्ट कूटो में प्रथम कूट वर्ण माना गया हैं इसके आधार पर कार्य क्षमता का मूल्यांकन किया जाता हैं ज्योतिष शास्त्र और भारतीय संस्कृति में चार वर्ण माने गये हैं। इनकी परस्पर कार्य क्षमता भी अलग अलग मानी गयी हैं। कन्या से वर का वर्ण उत्तम या परस्पर एक ही हो तो दंपत्ति अपने जीवन का निर्वाह भली प्रकार से कर पाएंगे इसका मिलान होने पर एक गुण मिलता हैं।
वश्य
वश्य पांच प्रकार के माने गए हैं। चतुष्पद ,द्विपद ,जलचर ,वनचर और किट। मेष ,वृषभ ,सिंह, धनु का उत्तरार्ध और मकर का पूर्वार्ध चतुष्पद माने गये हैं। इनमे से सिंह राशी चतुष्पद होते हुए भी वनचर मानी गयी हैं। मिथुन ,कन्या ,तुला ,धनु का पूर्वार्ध और कुम्भ राशी द्विपद मानी गयी हैं। मकर का उत्तरार्ध और कर्क राशी को जलचर माना हैं , इसमे कर्क राशी को जलचर होते हुए भी किट माना हैं। वश्य के द्वारा स्वभाव और परस्पर सम्बन्ध के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती हैं यदि वश्य एक ही अथवा परस्पर मित्र हैं तो सम्बन्ध अच्छा बना रहेगा परन्तु वश्य परस्पर शत्रु हैं तो दोनों में शत्रुता की भावना सामान्य बात पर भी हो जाएगी। भक्ष्य होने पर एक दुसरे का ख्याल रखने पर भी ऐसे विचार आएंगे की मेरा जीवन साथी मुझे किसी भी प्रकार से दबाना चाहता हैं। मेरी भावनाओ की कोई क़द्र नहीं हैं। ऐसे विचार आपके प्रेमी को भी आ सकते हैं इसका शुभ मिलान होने पर दो गुण प्राप्त होते हैं।
तारा
जन्म नक्षत्र के आधार पर तारा ९ प्रकार की मानी गयी हैं। जन्म ,संपत ,विपत ,क्षेम ,प्रत्यरी ,साधक ,वध , मित्र और अतिमित्र। तारा का मिलान होने पर दोने में परस्पर एक दुसरे को समझने की शक्ति प्राप्त होती हैं इसके लिए वर या पुरुष के जन्म नक्षत्र से गिनकर कन्या के नक्षत्र पर जाये और प्राप्त संख्या में ९ का भाग देवे इसी प्रकार कन्या के नक्षत्र से वर या पुरुष के नक्षत्र पर जाकर गिनने पर प्राप्त संख्या में ९ का भाग देवे। इससे प्राप्त शेष संख्या से तारा जानी जाती हैं। तीसरी विपत , पांचवी प्रत्यरी और सातवी वध अपने नाम के अनुसार अशुभ हैं ,शेष शुभ हैं। इसका मिलान होने पर तीन गुण प्राप्त होते हैं।
योनी
योनी चौदह मानी गयी हैं। अश्व ,गज ,मेष ,सर्प ,मार्जार मूषक, गौ, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल और सिंह । इसके द्वारा निर्णय लेने की क्षमता ,परस्पर संतुलन और विवेक का विचार किया जाता हैं। इसके द्वारा किसी कार्य को करते समय विचारो का मिलना जाना जाता हैं। विचार अलग होने पर अर्थात योनी अलग होने पर कार्य में बाधा आती हैं इसके मिलने पर चार गुण प्राप्त होते हैं। समान योनी होने पर चार गुण ,मित्र योनी होने पर तीन गुण ,सम योनी होने पर दो गुण और शत्रु योनी होने पर शून्य गुण प्राप्त होता हैं।
ग्रह मैत्री
रह मैत्री के द्वारा परस्पर स्वभाव और उनकी प्रकृति के बारे में जाना जाता हैं। ग्रहों में परस्पर नैसर्गिक रूप से तीन प्रकार के सम्बन्ध बनते हैं। यदि दोनों के राशी स्वामी परस्पर मित्र अर्थात एक ही हो तो परस्पर प्रेम रहता हैं परन्तु शत्रु होने पर विरोध रहता हैं। दोनों के राशी स्वामी परस्पर सम हो तो कभी ख़ुशी कभी गम की स्थिति बनती हैं। इसका मिलान होने पर पांच गुण प्राप्त होते हैं।
गण
गण तीन होते हैं देव , मनुष्य और राक्षस। गण के द्वारा शालीनता ,उदारता ,सहृदयता सुशीलता का विचार किया जाता हैं। देव गण में उत्तपन जातक उदार ,दयालु ,दानी और आत्म विश्वासी होते हैं। मनुष्य गण में उत्त्पन्न जातक चतुर ,स्वार्थी और स्वाभिमानी होते हैं। राक्षस गण में उत्त्पन्न जातक क्रोधी ,जिद्दी ,लापरवाह ,निर्दयी होते हैं। गण मिलान होने पर ६ गुण मिलते हैं।
भकूट
भकूट छः प्रकार के होते हैं। वर की राशी से कन्या की राशी एवम कन्या की राशी से वर की राशी तक गिनने पर इसकी जानकारी प्राप्त होती हैं। षडाष्टक ,द्विद्वादश ,नव पंचम अदि अशुभ हैं। षडाष्टक में दोनों के राशी स्वामी एक हो या परस्पर मित्र हो तो प्रीति षडाष्टक शुभ होता हैं। शेष मिलान शुभ हैं। इसका मिलान होने पर अधिकतम ७ गुण प्राप्त होते हैं।
नाड़ी
नाडीया तीन होती हैं आदि ,मध्य और अन्त। इनमे दोनों की एक ही नाड़ी अशुभ हैं अलग अलग नाड़ी होना शुभ हैं। इनका मिलान होने पर आठ गुण प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यदि दिल मिलाने के उपरांत भी गुण मिलान नहीं हो रहा हो तो किसी न किसी कारणवश परस्पर वैचारिक मतभेद ,सामंजस्य का अभाव होने से उनमे अपनत्व की भावना कमजोर रहती हैं। इसलिए दिल मिलाने से ज्यादा जरुरी गुण मिलान को कहा जा सकता हैं।
क्या विवाह के लिए कुंडली मिलान जरूरी है?
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कैसे दूर होते हैं कुण्डली के दोष?
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भारतीय हिन्दू परिवारों में यह माना जाता है कि लड़के या लड़की के विवाह से पूर्व किसी ज्योतिषी से कुण्डली जरूर मिलवा लेनी चाहिए। ज्यादातर भारतीय हिन्दू परिवार ज्योतिषी के पास अपने पुत्र या पुत्री के विवाह के लिए कुंडली मिलवाने या जन्मपत्रिका मिलान के लिए इसलिए जाते हैं, ताकि विवाहित होने वाला जोड़ा किसी प्रकार के दुर्भाग्य का शिकार न हो, और अपनी जिंदगी हंसी खुशी से काट सके। लोग ये विश्वास रखते हैं कि विवाह के बाद एक दूसरे के भाग्य एवं दुर्भाग्य का असर अपने साथी पर पड़ता है तो क्यों नहीं पहले ही ये जान लिया जाए कि क्या उनका भाग्य आपस में अच्छा तालमेल रखता है। या नहीं, इसलिए ज्योतिष अनुरूप कुण्डली मिलान करके गुण दोष का विवाह पूर्व पता लगाया जाता है।
मेलापकः वर-वधू की कुंडली मिलाना
विवाह के लिए कुंडली मिलाना भी एक समस्या है जो आम आदमी के सामने रहती है। प्रायः इस मामूली से काम के लिए ज्योतिषियों को मोटी रकम देने के बाद भी लोग तलाक/असफल गृहस्थ के रूप में दुष्परिणाम भोगते हैं और बाद में ज्योतिषी के स्थान पर ज्योतिष को गालियां देते हैं। अतः संक्षेप में हम यहां मेलापक विधि का वर्णन भी पाठकों के लाभार्थ करेंगे।
मेलापक विधि-मेलापक गुण 36 होते हैं। इनमें से कम से कम 18 गुण मिलने चाहिए। जितने अधिक गुण मिलते हों उतना ही आदर्श जोड़ा माना जाता है। भगवान राम व सीता के 32 गुण मिलते थे। मंगली आदि दोषों को भी इस मिलान के अलावा विचारते हैं। इन अंकों की निर्धारण व्यवस्था इस प्रकार है
वर्णों वश्यं तथा तारा योनिश्च ग्रहमैत्रकम्।
गणमैत्रं भकूटं च नाड़ी चैते गुणाधिकाः॥
-मुहूर्त चिन्तामणि
अर्थात् वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रहमैत्री, गणमैत्री, भकूट व नाड़ी ये 8 प्रकार के गुण/कूट एक से दूसरे एकाधिक गुण वाले हैं (यानी बढ़ते क्रम में-1,2,3,4 आदि अंक वाले हैं)।
आठ गुण-आठ गुण जो कि मेलापक में मिलाए जाते हैं।
वर्ण 1 अंक/गुण
वश्य 2 अंक
तारा 3 अंक
योनि 4 अंक
ग्रहमैत्री 5 अंक
गण 6 अंक
भकूट 7 अंक
नाड़ी 8 अंक
कुल 32 अंक/गुण
नोट-उपरोक्त में ’नाड़ी’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है तथा उसके बाद ’भकूट’ व ’गण’।
वर्ण-जातक की जन्मराशि यदि मीन, वृश्चिक, कर्क हो तो ब्राह्मणय मेष, धनु, सिंह हो तो क्षत्रियय वृष, कन्या, मकर हो तो वैश्य तथा मिथुन, तुला, कुम्भ हो तो शूद्र होती है।
मेलापक में वधू का वर्ण वर के वर्ण से उत्तम नहीं होना चाहिए (समान हो सकता है)। यदि ऐसा है तो पूरा एक अंक प्राप्त होगा। ऐसा नहीं है तो शून्य।
वश्य-सभी जलचर राशियां (सिंह को छोड़कर) नर राशि (यानी द्विपद राशि) के वश में होती हैं। वृश्चिक को छोड़कर अन्य सभी राशियां सिंह राशि के वश में होती हैं। अतः सिंह राशि की शत्रु वृश्चिक राशि है। इसी प्रकार लौकिक व्यवहार में शत्रु राशि से (यानी जो जिसका भक्ष्य है वह उसका शत्रु है) सम्बन्ध न करें। शत्रु सम्बन्ध में अंक शून्य तथा मित्र होने पर 2 अंक प्राप्त होंगे। पाठकों की सुविधा के लिए स्पष्ट कर दें कि 3, 6, 7, 11 व 9 राशियों का पूर्वार्ध ’नरराशि’ है। 2,1,9 का उत्तरार्ध तथा 10 का पूर्वार्ध ’चतुष्पद’ है। 4,10 का उत्तरार्ध तथा 12 ’जलचर’ है। 8 ’कीट’ है तथा 5 ’वनचर’ है।
तारा-कन्या के जन्म नक्षत्र से वर का जन्म नक्षत्र गिनें तथा वर के जन्म नक्षत्र से कन्या का गिनें। दोनों में जो-जो संख्या आए उनमें 9 का भाग दें। जो शेष रहे वह ’तारा’ कहा जाएगा। यदि यह तारा-3, 5 या 7 हो तो शुभ नहीं होती। यदि दोनों की तारा शुभ हों तो 3 अंक, यदि एक की शुभ व दूसरे की अशुभ हो तो 1) अंक तथा दोनों की ही अशुभ हो तो 0 अंक मिलता है।
योनि-योनी का विचार जन्म नक्षत्र से करते हैं।
अश्विन-अश्व/घोड़ा विशाखा-व्याघ/बाघ
भरणी-हाथी/हस्ती अनुराधा,ज्येष्ठा-मृग/हिरण
कृतिका-मेढ़ा/मेष मूल-श्वान/कुत्ता
रोहिणी व मृगशिरा-सर्प/सांप पूर्वाषाढ़ा-वानर/बंदर
आर्द्रा-श्वान/कुत्ता उत्तराषाढ़, अभिजत-नेवला
पुनर्वसु-मार्जार/बिल्ला श्रवण-वानर/बंदर
पुष्य-मेष/मेढ़ा धनिष्ठा-सिंह/शेर
अश्लेषा-मार्जार शतभिषा-घोटक (घोड़ा)
मघा व पू. फाल्गुनी-मूषक/चूहा पूर्वाभाद्रपद-सिंह/शेर
उत्तराफाल्गुनी-गौ/गाय उत्तराभाद्रपद-गौ/गाय
हस्त-महिष/भैंसा रेवती-हस्ती/हाथी
चित्रा-व्याघ्र/बाघ
स्वाति-महिषी/भैंस
उपरोक्त नक्षत्रों की उपरोक्त योनि हैं।
सिंह व हाथी, भैंसा व घोड़ा, मार्जार व चूहा, कुत्ता व हिरण, वानर व मेष, गौ तथा व्याघ्र, नेवला व सर्प-इनमें प्राकृतिक वैर होता है। अतः यह देखना चाहिए कि वर-वधू के नक्षत्रों/योनियों में शत्रुता न हो (यह विचार सेवक तथा मालिक में भी नौकरी के समय करते हैं)।
वर-वधू दोनों की एक ही योनि हो तो 4 अंक, दोनों मित्र हों तो 3 अंक, स्वाभाविक गुण वाले हों तो 2 अंक, शत्रु हों तो 1 अंक तथा महाशत्रु हों तो 0 अंक मिलता है। जैसे सिंह की हाथी से महाशत्रुता है पर हिरण/गौ से भी शत्रुता है, किन्तु व्याघ्र से स्वाभाविक गुण हैं आदि।
ग्रहमैत्री-सूर्य के गुरु, मंगल व चंद्र मित्र हैं। शुक्र, शनि शत्रु तथा बुध सम है। चन्द्रमा के बुध व सूर्य मित्र हैं। शत्रु कोई नहीं, शेष ग्रह सम हैं। मंगल के सूर्य, गुरु, चन्द्र मित्र हैं। बुध शत्रु है तथा शुक्र, शनि सम हैं। बुध के मित्र शुक्र व सूर्य हैं। चन्द्रमा शत्रु तथा गुरु, शनि, मंगल सम हैं। गुरु के सूर्य, मंगल, चंद्र मित्र हैं। बुध, शुक्र, शत्रु तथा शनि सम है। शुक्र के बुध, शनि मित्र हैं। चन्द्र, सूर्य, शत्रु तथा गुरु, मंगल सम हैं। शनि के मित्र बुध व शुक्र हैं। चन्द्र, सूर्य, मंगल शत्रु तथा गुरु सम हैं।
इस आधार पर वर व वधू की जन्मराशियों के स्वामियों का सम्बन्ध विचारते हैं। यदि दोनों के राशीश समान हों अथवा मित्र हों तो 5 अंक। यदि एक का सम व दूसरे का शत्रु हो तो ) अंक। एक का सम व दूसरे का मित्र हो तो 4 अंक। दोनों के सम हों तो 3 अंक। एक का मित्र व एक का शत्रु हो तो 1 अंक तथा दोनों के ही शत्रु हों तो 0 अंक मिलता है।
गणमैत्री-गणों को भी जन्म नक्षत्रों द्वारा विचारा जाता है। मघा, अश्लेषा, धनिष्ठा, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, कृतिका, चित्रा, विशाखा-इन 9 नक्षत्रों का गण राक्षस होता है। तीनों पूर्वा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, भरणी व आर्द्रा इन 9 नक्षत्रों का गण मनुष्य होता है। अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, श्रवण, रेवती, स्वाति तथा लघु संज्ञक इन शेष 9 नक्षत्रों का गण देव होता है। वर तथा वधू का गण समान हो तो उनमें अच्छी पटती है। दोनों विरोधी हों तो क्लेश रहता है। महाशत्रु हो तो एक की मृत्यु हो जाती है।
देवता तथा मनुष्य में मध्यम प्रीति होती है। देवता तथा राक्षस में वैर रहता है। देवता तथा मनुष्य हो तो एक की मृत्यु हो जाती है। अतः समान गण देखना चाहिए।
वर-वधू दोनों के गण समान हों तो 6 अंक। मध्यम प्रीति वाले हों तो 5 अंक। वैर वाले हों तो एक अंक तथा महाशत्रु हों तो 0 अंक मिलता है।
भकूट-भकूट दोष का विचार जन्मराशि से होता है। यदि वर तथा वधू की राशियां एक-दूसरे से द्विद्वादश (2,12) हों तो निर्धनता रहती है। यदि षडाष्टक (6,8) हों तो एक की मृत्यु होती है अथवा कलह खूब रहती है। नव पंचम (9,5) हों तो संतान की हानि होती है। इससे भिन्न हो तो शुभ रहता है।
दुष्ट भकूट में अंकों का विचार विभिन्न तालमेला के हिसाब से किया जाता है। उन सबका वर्णन पाठकों के लिए ’कन्फ्यूजिंग’ हो सकता है। (क्योंकि विस्तार तथा उलझाव काफी है) अतः संक्षेप में इतना ही समझें कि षडाष्टक, द्विद्वादश या नव पंचम बिल्कुल न हो। यह एक अति महत्त्वपूर्ण गुण है। अतः इसे विशेष रूप से देख लेना चाहिए। अन्यथा वैवाहिक जीवन ’महाभारत’ या ’नरक’ में भी बदल सकता है।
नाड़ी-नाड़ी का विचार जन्मनक्षत्र के द्वारा होता है। आदि, मध्य व अन्त्यज तीन नाड़ियां होती हैं। वर या वधू की नाड़ी समान कभी नहीं होनी चाहिए। यदि समान नाड़ी हो तो 0 अंक मिलता है। यदि नाड़ी असमान हो तो पूर्ण 8 अंक मिलते हैं। इसी बात से नाड़ी का महत्त्व सिद्ध हो जाता है। यह मेलापक विचार से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।
ज्येष्ठा, मूल, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, अश्विनी नक्षत्रों की आदि नाड़ी मानी गई है। पुष्य, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, भरणी, धनिष्ठा, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वा फाल्गुनी तथा उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों की मध्य नाड़ी कही गई है तथा स्वाति, विशाखा, कृतिका, रोहिणी, अश्लेषा, मघा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण नक्षत्रों की अन्त्यज नाड़ी मानी जाती है।
विशेष-वर-वधू एक ही नाड़ी के हों तो विवाह अति अशुभ होता है। यदि दोनों मध्य नाड़ी के हों तो मृत्यु होती है। अतः मध्य नाड़ी दोनों की हरगिज नहीं होनी चाहिए।
यह कुल मिलाकर 32 गुण मेलापक में मिलाए जाते हैं। इनमें 16 तक अंक (गुण) मिलें तो विवाह निन्दित होता है। 20 तक मिले तो मध्यम कहा जाता है। इससे अधिक मिलें उतना ही श्रेष्ठ है (जैसा कि कहा जा चुका है राम व सीता के 32 गुण मिलते थे)। 18 से कम गुण मिलें तो विवाह नहीं करना चाहिए।
यद्यपि नाड़ी आदि दोष होने पर नाम बदलवा देना आदि बहुत से परिहार (उपाय) भी प्रचलित हैं। परन्तु सुरक्षा इसी में है कि 18 गुण से कम में विवाह किया ही न जाए।
क्योंकि, जैसा कि कहा गया है
राश्यैक्ये चेद्भिन्नमृक्षं द्वयोः स्यान्नक्षत्रैक्ये राशियुग्मं तथैव।
नाडीदोषो नो गणानांच दोषो नक्षत्रैक्ये पाद भेदे शुभं स्यात्॥
-मुहूर्त चिन्तामणि
अर्थात् वर-कन्या दोनों की एक ही जन्मराशि हो किन्तु जन्मनक्षत्र भिन्न हों अथवा एक ही नक्षत्र हो किन्तु राशियां दो (भिन्न) हों तो नाड़ी और गण दोष नहीं होता। यदि दोनों का नक्षत्र एक ही हो किन्तु नक्षत्र के चरण अलग-अलग हों तो भी विवाह शुभ होता है। अतः यदि नक्षत्र एक ही हो तो जन्मराशि व नक्षत्रों के चरण भी विचारें। उनमें भी साम्यता होगी तभी दोष माना जाएगा। अन्यथा नहीं।
इस सूत्र को आधार मानकर कन्या का नाम बदलवा दिया जाता है। ताकि उसकी राशि भिन्न हो जाए।
सरल विधि-यह पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए संक्षेप में मेलापक विधि कही है। इस सब झमेले में जाने की वैसे आवश्यकता नहीं होती। भकूट के अलावा शेष सभी जानकारी कम्प्यूटराइज्ड जन्मपत्री के प्रथम पृष्ठ पर ही उपलब्ध होती है और स्वयं कम्प्यूटर से भी 5 मिनट में मेलापक कुंडली बनाई जा सकती है। तथापि यदि कम्प्यूटर उपलब्ध न हो और इस झमेले से बचना हो तो मेलापक की एक सरल किन्तु सटीक विधि पाठकों को बताते हैं। यह मेलापक विधि शास्त्रोक्त विधि है। जो सरल विधि पाठकों के सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूं वो मेरे सुयोग्य आचार्य श्री अरुण कुमार गुलाटीजी ने कृपा कर मुझे बताई थी। मेरा अपना मानना है कि मेलापक कुंडली बनाने या मिलाने के बाद तथा 18 से अधिक गुण मिल जाने के बाद भी इस विधि से विचार अवश्य कर लेना चाहिए।
कम्प्यूटर आदि उपलब्ध न हो तो विस्तार में जाए बिना फटाफट विवाह कुंडली कैसे मिलाएं ? (ैभ्व्त्ज् ब्न्ज्)
इस विधि के अनुसार कन्या तथा वर की कुंडली में निम्नलिखित ग्रहों की तुलना अवश्य करें। क्योंकि ये विवाह के सम्बन्ध में अति महत्वपूर्ण हैं। (वैसे तो सभी ग्रह मिलाकर देखे जाने चाहिए। परन्तु निम्नलिखित तो अनिवार्य ही हैं)
1. वर के लग्न से कन्या के लग्न की राशि गिनें।
2. वर के चन्द्र से कन्या के चन्द्र को गिनें।
3. वर के सूर्य से कन्या के सूर्य को गिनें।
4. वर के शुक्र से कन्या के शुक्र को गिनें।
5. वर के गुरु से कन्या के गुरु को गिनें।
निष्कर्ष-किसी भी गणना का फल ‘षडाष्टक’ (6/8) ’द्विद्वादश’ (2/12) अथवा ’नवपंचम’ (9/5) नहीं होना चाहिए। (यहां ध्यान रखें कि फलित में ’नवपंचम’ अच्छा है। किन्तु मेलापक में ’नवपंचम’ होना त्याज्य माना गया है।) इनसे भिन्न कुछ भी हो तो कुंडली मेल खाती है। ’समसप्तक’ (7/7) जन्म राशि या चन्द्र न हो। यह भी ध्यान रखें। अन्यथा सदैव वैचारिक मतभेद बना रहेगा।
अन्य-लड़के की कुंडली में शुक्र बारहवें भाव में हो तो ैम्ग् की दृष्टि से उत्तम है। परन्तु कन्या की कुंडली में उतना अच्छा नहीं है। तब कन्या की ैम्ग्न्।स् क्म्ड।छक्ै अधिक होती हैं।
ऽ लड़के की कुंडली में शुक्र छठे भाव में तथा कन्या की कुंडली में आठवें भाव में नहीं होना चाहिए। न ही लड़के की कुंडली के बारहवें भाव में शुक्र उच्च स्थिति में मंगल के साथ होना चाहिए।
ऽ लड़के की कुंडली में अन्य भावों में मंगल-शुक्र साथ हों या एक-दूसरे को देखें तो कन्या को जीवनभर पूर्ण ैम्ग् सुख लड़के से मिलता है तथा गृहस्थ सफल रहता है।
ऽ लड़के की कुंडली में शुक्र शनि से प्रभावित हो तो भी अच्छा है किन्तु बुध के साथ शुक्र की युति दोनों कुंडलियों में शुभ नहीं है। विशेषकर लड़के के सातवें और बारहवें भाव में।
ऽ लड़के का लग्नेश भी (लग्न के अतिरिक्त और कहीं) बुध के साथ नहीं होना चाहिए।
ऽ यह भी ध्यान देना चाहिए कि लड़के या लड़की के पांचवें भाव में या सातवें भाव में केतु न हो। अथवा उनके पांचवें भाव में गुरु अकेला न हो या सिंह राशि में न हो। यदि हों तो शुभ ग्रहों से दृष्ट अवश्य हों अन्यथा सन्तान प्राप्ति में बाधा पड़ती है।
ऽ कन्या की कुंडली में सूर्य या केतु आठवें भाव में भी न हो। अथवा लग्न में न हो तथा कोशिश करें कि कन्या का लग्न श्सिंहश् न हो (जिन भावों में मंगल मंगली दोष बनाता है। उन्हीं भावों में चन्द्र, शनि, केतु व सूर्य भी मंगली दोष बनाते हैं अतः उन सबसे बचना चाहिए)।
मेलापक से भिन्न-इनके अतिरिक्त कुछ और बातों का भी ध्यान रखें-
ऽ ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न जातक का विवाह ज्येष्ठा में ही उत्पन्न जातक से न करें। ज्येष्ठ मास में भी न करें। ऐसे घर में भी न करें जहां विवाह के बाद कन्या का कोई ज्येष्ठ (जेठ) बन जाए। अन्यथा ’त्रिखलदोष’ होता हो जो ’जेठ’ के लिए विशेषरूप से हानिकारक माना गया है
ऽ प्रथम गर्भ से उत्पन्न कन्या व लड़के (बड़ा लड़का व बड़ी लड़की) का विवाह उनके जन्म मास, जन्म नक्षत्र तथा जन्म तिथि में करना शुभ नहीं होता। (कम से कम ज्येष्ठ मास में तो बिल्कुल ही न करें। यद्यपि कुछ विद्वान मानते हैं कि ज्येष्ठ मास में तब तक न करें, जब तक सूर्य कृतिका नक्षत्र पर रहे। इसके बाद ज्येष्ठ मास में भी कर सकते हैं।)
ऽ पुत्र के विवाह से 6 महीनों तक अपनी कन्या का विवाह भी न करें (न केवल आप अपितु पूरा कुल)। दो सगे भाइयों का विवाह दो सगी बहनों से न करें। अपने कुल में विवाह के 6 मास तक मुंडन भी न करें।
ऽ यह ध्यान दें कि कन्या व वर का जन्म नक्षत्र अश्लेषा, मूल तथा ज्येष्ठा अथवा विशाखा न हो। क्योंकि अश्लेषा में उत्पन्न कन्या या लड़का विवाहोपरांत अपनी सास का नाश करते हैं (सास मर जाती है)। मूल में जन्मे कन्या/वर अपने ससुर का नाश करते हैं। ज्येष्ठा में जन्मी कन्या अपने जेठ का तथा विशाखा में जन्मी कन्या अपने देवर का नाश करती है। अतः यदि विवाह करना ही हो तो अश्लेषा में उत्पन्न जातक का विवाह उससे करें जिसकी माता का देहांत हो चुका हो, मूल में उत्पन्न जातक का विवाह उससे करें जिसके पिता का देहांत हो चुका हो तथा ज्येष्ठा एवं विशाखा में जन्मी कन्या का विवाह उससे करें जिसका क्रमशः बड़ा व छोटा भाई न हो अथवा पहले ही मर चुका हो। (विशाखा का अंतिम तथा अश्लेषा का प्रथम चरण हो तो ऐसा खतरा नहीं होता। मूल का भी अंतिम चरण निरापद होता है। परन्तु ज्येष्ठा में चारों चरण छोड़ देने चाहिए।)
ऽ विवाह में लग्न, चन्द्र व नवमांश तीनों कुंडलियां मिलानी चाहिए। क्योंकि विवाह सम्बन्ध में नवमांश कुंडली अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है (पुरुष कुंडली में पत्नी का कारक शुक्र है। स्त्री कुंडली में पति का कारक गुरु है। अतः इन्हें विशेष रूप से देखें।) गुरु व शुक्र अस्त हों, सन्धिकाल में हों, पंचक हों या गुरु सिंह राशि के नवमांश में हों तब विवाह का मुहूर्त नहीं निकलता।
अद्भुत एवं कठिन कार्य है गुण मिलान
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कुण्डली गुण मिलान एक अद्भुत एवं कठिन कार्य है जिसमें कई ज्योतिष संयोग और नियमों को परखा जाता है। गुण मिलान की प्रक्रिया दो तरह से की जा सकती है। केवल प्रचलित नाम के उपयोग से, या जन्मपत्री के द्वारा जो कि जन्म तारीख के आधार पर बनाई जाती हैं। जन्मपत्री में जन्म राशि का उपयोग करके गुण मिलान किया जाता है। अगर किसी की जन्म तारीख पता नहीं हो तो फिर उसके नाम के पहले अक्षर से गुण मिलान करते हैं। ज्यादातर ज्योतिषी अष्टकूट चक्र या अवकहडा चक्र का उपयोग लड़के और लड़की के गुण दोष मिलान के लिए करते हैं।
कुंडली मिलान के माध्यम से वर-वधु की कुंडलियों का आकलन किया जाता है ताकि वह जीवनभर एक-दूसरे के पूरक बने रहें. लेकिन वर्तमान समय में केवल यह देखा जाता है कि यह मेरे लिए फायदेमंद रहेगा या नहीं। दुनिया भर के प्रश्न व्यक्ति एक ज्योतिषी के समक्ष रख देते हैं जबकि कुण्डली मिलान में वर-वधु का आपसी सामंजस्य, विवाह का मांगलिक सुख तथा आने वाला दशाक्रम देखा जाना चाहिए. लेकिन लगता है कि इन सब बातों को आम व्यक्ति की तरह ज्योतिषी भी शायद भूल गये हैं।
कुंडली मिलान को अधिकतर व्यक्ति एक सरसरी निगाह से देखते हैं. उनकी नजर में जितने अधिक गुण मिलते हैं उतने अच्छा होता है जबकि यह पैमाना बिलकुल गलत हैैं। कई बार 36 में से 36 गुण मिलने पर भी वैवाहिक सुख का अभाव रहता है क्योंकि गुण मिलान तो हो गया लेकिन जन्म कुंडली का आंकलन नहीं हुआ। सबसे पहले तो यह देखना चाहिए कि व्यक्ति की अपनी कुंडली में वैवाहिक सुख कितना है? तब उसे आगे बढऩा चाहिए।
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि आजकल आँख मूंदकर यही देखा है कि गुण कितने मिल रहे हैं और जातक मांगलिक है या नहीं. बस इसके बाद सब कुछ तय हो जाता है. यदि हम सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो अधिकतर कुंडलियों में गुण मिलान दोषों या मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है अर्थात अधिकतर दोष कैंसिल हो जाते हैं लेकिन इतना समय कौन बर्बाद करें. आइए आपको कुछ दोषों के परिहार के विषय में जानकारी देने का प्रयास करते हैं।
गुणमिलान के बाद लड़के लड़की की लग्न, चंद्र, सूर्य, नवमांश, कुंडली में ग्रहो की व्यवस्था दृस्टि और विशेष करके 7, भाव और उसके पति या उसपर आसीन ग्रहो की स्थिति साथ में 12 भाव और 10, 4 भाव आसीन गृह और पति की क्या व्यवस्था है देखे , मंगल 1,2,4,7,8,10,12 में मांगलिक बनाता है किन्तु मांगलिक न हो और सूर्य, शनि, राहु केतु जैसे गरम और पृथकता जनक गृह भी मांगलिक जैसा योग निर्माण करते है, नीच का शुक्र, बृहस्पति, दुर्बल चंद्र और ख़राब सांगत का बुद्ध भी हानि कारक है l
क्या होते हैं दोष?
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कुंडली मिलान के मुख्य दोष इस प्रकार हैं-
गण दोष:-
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यदि किन्हीं जन्म कुंडलियों में गण दोष मौजूद है तब सबसे पहले कुछ बातों पर ध्यान दें -
चंद्र राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता या राशि स्वामियों के नवांशपति में भिन्नता होने पर भी गणदोष नहीं रहता है।
ग्रहमैत्री और वर-वधु के नक्षत्रों की नाडयि़ों में भिन्नता होने पर भी गणदोष का परिहार होता है। यदि वर-वधु की कुंडली में तारा, वश्य, योनि, ग्रहमैत्री तथा भकूट दोष नहीं हैं तब किसी तरह का दोष नहीं माना जाता है।
भकूट दोष का परिहार-
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भकूट मिलान में तीन प्रकार के दोष होते हैं- जैसे षडाष्टक दोष, नव-पंचम दोष और द्वि-द्वादश दोष होता है। इन तीनों ही दोषों का परिहार भिन्न-भिन्न प्रकार से हो जाता है।
षडाष्टक परिहार-
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यदि वर-वधु की मेष/वृश्चिक, वृष/तुला, मिथुन/मकर, कर्क/धनु, सिंह/मीन या कन्या/कुंभ राशि है तब यह मित्र षडाष्टक होता है अर्थात इन राशियों के स्वामी ग्रह आपस में मित्र होते हैं. मित्र राशियों का षडाष्टक शुभ माना जाता है।
यदि वर-वधु की चंद्र राशि स्वामियों का षडाष्टक शत्रु वैर का है तब इसका परिहार करना चाहिए।
मेष/कन्या, वृष/धनु, मिथुन/वृश्चिक, कर्क/कुंभ, सिंह/मकर तथा तुला/मीन राशियों का आपस में शत्रु षडाष्टक होता है इनका पूर्ण रुप से त्याग करना चाहिए।
यदि तारा शुद्धि, राशियों की मित्रता हो, एक ही राशि हो या राशि स्वामी ग्रह समान हो तब भी षडाष्टक दोष का परिहार हो जाता है।
नव-पंचम का परिहार-
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नव पंचम दोष का परिहार भी शास्त्रों में दिया गया है. जब वर-वधु की चंद्र राशि एक-दूसरे से 5/9 अक्ष पर स्थित होती है तब नव पंचम दोष माना जाता है. नव पंचम का परिहार निम्न से हो जाता है।
यदि वर की राशि से कन्या की राशि पांचवें स्थान पर पड़ रही हो और कन्या की राशि से लड़के की राशि नवम स्थान पार पड़ रही हो तब यह स्थिति नव-पंचम की शुभ मानी गई है।
मीन/कर्क, वृश्चिक/कर्क, मिथुन/कुंभ और कन्या/मकर यह चारों नव-पंचम दोषों का त्याग करना चाहिए।
यदि वर-वधु की कुंडली के चंद्र राशिश या नवांशपति परस्पर मित्र राशि में हो तब नव-पंचम का परिहार होता है।
द्वि-द्वादश योग का परिहार-
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लड़के की राशि से लड़की की राशि दूसरे स्थान पर हो तो लड़की धन की हानि करने वाली होती है लेकिन 12वें स्थान पर हो तब धन लाभ कराने वाली होती है।
द्वि-द्वादश योग में वर-वधु के राशि स्वामी आपस में मित्र हैं तब इस दोष का परिहार हो जाता है।
मतान्तर से सिंह और कन्या राशि द्वि-द्वादश होने पर भी इस दोष का परिहार हो जाता है।
नाड़ी दोष का परिहार-
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नाड़ी दोष का कई परिस्थितियों में परिहार हो जाता है-
वर तथा वधु की एक ही राशि हो लेकिन नक्षत्र भिन्न तब इस दोष का परिहार होता है।
दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चंद्र राशि भिन्न हो तब परिहार होता है।
दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चरण भिन्न हों तब परिहार होता है।
शास्त्रानुसार नाड़ी दोष ब्राह्मणों के लिए, वर्णदोष क्षत्रियों के लिए, गणा दोष वैश्यों के लिए और योनि दोष शूद्र जाति के लिए देखा जाता है।
ज्योतिष चिन्तामणि के अनुसार रोहिणी, मृृगशिरा, आद्र्रा, ज्येष्ठा, कृतिका, पुष्य, श्रवण, रेवती तथा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र होने पर नाड़ी दोष नहीं माना जाता है।
विवाह एवं संतान (कब होंगे?)
अक्सर विवाह में/संतान में विलम्ब होने पर लोग जिज्ञासापूर्वक ज्योतिषियों के चक्कर काटते हैं कि विवाह कब होगा? या संतान कब होगी? इस समस्या के निराकरण तथा पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए संक्षेप में इन दोनों से सम्बन्धित प्रमुख सूत्र व निर्देश भी यहां दे रहे हैं। इससे न केवल समस्त पाठक लाभान्वित होंगे, बल्कि विषय को पूर्णता भी मिलेगी।
विवाह
ऽ यदि कुंडली में डिनाइल मैरिज या आजन्म अविवाहित रहने का योग न बन रहा हो तो निम्नलिखित प्रमुख स्थितियों में जातक का विवाह होता है (यदि जातक मंगली हो या सप्तमेश वक्री हो या सप्तम भाव में क्रूर ग्रह उपस्थित हो और गुरु की वहां दृष्टि न हो तो जातक का विवाह विलम्ब से ही होता है, अतः ऐसे मामलों में अधीर नहीं होना चाहिए)।
ऽ द्वितीय तथा सप्तम भाव के स्वामी की दशा में विवाह होता है। (दशा/अन्तर/प्रत्यंतर) किन्तु साथ में शनि भी अन्तर/प्रत्यंतर/प्राण/सूक्ष्म आदि दशाओं में होना चाहिए।
ऽ गुरु या शनि दोनों में से कोई भी लग्न को या लग्नेश को देखे (गोचर में) अथवा सप्तम भाव/सप्तमेश को देखे या लग्न या सप्तम में आए। अथवा चन्द्रमा गोचर में लग्न या सप्तम भाव को देखे, तब विवाह होता है (चन्द्रमा के देखते ही दो दिनों में विवाह हो जाता है)।
ऽ पस्त्रियों में गुरु तथा पुरुषों में शुक्र की दशा/अंतर्दशा में भी विवाह होता है। सप्तम भाव में जो ग्रह बैठा हो उसकी दशा/अंतर्दशा में भी विवाह होता है। सप्तमेश के साथ जो ग्रह बैठा हो उसकी दशा/अंतर्दशा में भी विवाह होता है।
ऽ विवाह योग्य आयु हो तो दशमेश तथा अष्टमेश की दशा/अंतर्दशा में भी कई बार विवाह हो जाता है।
ऽ शुक्र से त्रिकोण (1,5,9) या सप्तम भाव में गोचर का गुरु आ जाए तब भी विवाह हो जाता है
ऽ चंद्रमा सातवें भाव में हो तथा चंद्र राशि का स्वामी मंगल से दृष्ट हो तो जातक का विवाह विज्ञापन/प्रचार के माध्यम से होता है।
विवाह में विलम्ब
सप्तमेश यदि अपने भाव से 6,8,12 में हो अथवा सप्तमेश वक्री हो और मंगल अष्टमस्थ हो। अथवा सप्तमेश निर्बल हो तथा शनि व मंगल लग्न, दूसरे, सातवें या ग्यारहवें भाव में हो जातक का विवाह विलम्ब से (विवाह की आयु निकल जाने के बाद) होता है।
शुक्र शनि से युति करे अथवा शुक्र की दृष्टि शनि पर हो। अथवा सप्तम भाव में पाप ग्रह व शनि की दृष्टि हो। अथवा अष्टमेश पंचमस्थ हो या मंगल व शुक्र 5.7 या 9 भाव में शनि से दृष्ट हों तब भी जातक का विवाह आयु निकल जाने के बाद ही होता है।
शुक्र नीच राशि का हो, सप्तमेश अस्त हो तथा सातवें भाव में चन्द्रमा और राहू बैठे हों तो जातक का विवाह विलम्ब से होता है। अथवा गुरु नीच राशि का हो और लग्न या चन्द्र से-6,8,12 स्थानों में हो तो भी जातक का विवाह विलम्ब से होता है।
शनि एवं चन्द्र 1, 2, 7, 11 भाव में हों तथा शुक्र सातवें भाव में कर्क, वृश्चिक या मकर राशि का हो तो जातक का विवाह अत्यंत विलम्ब से होता है।
लग्नेश व सप्तमेश अपने स्थान से नवपंचम या षडाष्टक हो तो भी विवाह अत्यंत विलम्ब से होता है। अथवा द्वितीय भाव में शुक्र पापग्रहों के साथ व त्रिकोण स्थानों में सप्तमेश पापग्रहों के साथ हो तब भी विवाह बहुत देर से होता है।
राहू दूसरे व शुक्र तीसरे भाव में हो। अथवा लग्नेश की शुक्र से युति हो और अष्टमेश स्वग्रही हो तो भी जातक का विवाह 32-35 वर्ष में हो पाता है। अथवा शुक्र तीसरे भाव में तथा सप्तमेश नवम भाव में हो तो भी विलम्ब होता है।
पांचवें भाव में शुक्र, सातवें भाव में शनि तथा चैथे भाव में राहू हो तो जातक का विवाह 35 वर्ष के आसपास होता है अथवा लग्न में राहू तथा पांचवें भाव में शुक्र हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है।
विशेष-शुक्र चन्द्रमा से सातवें भाव में हो और बुध से चन्द्रमा सातवें भाव में हो और अष्टमेश पांचवें भाव में हो तो ऐसे जातक के प्रायः तीन विवाह होते हैं।
ऽ सप्तमेश तथा लग्नेश की युति हो जाए तो जातक का विवाह अतिशीघ्र (20-21 वर्ष तक) हो जाता है। अथवा लग्न में जिस राशि का नवमांश हो, यदि उसका स्वामी केन्द्र में हो तो भी विवाह अतिशीघ्र हो जाता है।
ऽ चन्द्रमा सातवें भाव में हो तथा सप्तमेश मंगल से दृष्ट हो तो जातक का विवाह प्रायः विज्ञापन या प्रचार के माध्यम से होता है। ऐसा देखा गया है।
ऽ चन्द्रमा तथा सप्तमेश में से जो अधिक बली हो और जिस दिशा में बैठा हो, जातक का विवाह जन्म स्थान से उसी दिशा में होता है (पाठक जानते ही हैं कि लग्न कुंडली के-1,7,4,10 भाव क्रमशः पूरब, पश्चिम व उत्तर-दक्षिण दिशा को प्रकट करते हैं)।
मांगलिक दोष एवं विवाह विलम्ब
पाठकों से निवेदन
सभी पाठकों से हम ये निवेदन करना चाहते हैं कि - ये अच्छी बात है की आप ज्योतिष शास्त्र में सुझाये जीवन दर्पण का लाभ उठाये, पर ज्योतिष पर आवश्यकता से ज्यादा भरोसा करना , ज्योतिष के चक्कर में अपना या अपनों का नुकसान करा देना , ढोंगी और पाखंडी लोगों के झाँसे में फँसना आदि से अपना बचाव करे. ज्योतिष कोई पत्थर की लकीर नहीं हैं, और सभी ज्योतिषी सर्वज्ञ नहीं हैं.
याद रहे ज्योतिष आपके भले के लिए इस्तेमाल हो तो ही अच्छा हैं , ये अगर आपका अहित करने लगेगा तो ज्योतिष सही मायने में अपना उपयोग खो देगा .
मैंने देखा हैं की मांगलिक दोष , नाड़ी दोष , और मिलाप ना होने के चक्कर में कई वर - कन्या के विवाह में अनावश्यक देरी होती हैं और बाद में उम्र निकल जाने के नाम पर उनका विवाह होना और मुश्किल हो जाता हैं.
राम चरितमानस में , गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा हैं -
होइहि सोइ जो राम रचि राखा.
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
इसका अर्थ हैं की जो होना हैं वो तो पहले ही राम (परमात्मा ) ने बना के रखा हुआ हैं , उसमे तर्क वितर्क करके आप क्यूँ जटिल करना चाहते हैं .
जो होना हैं वो होगा , आप उसको बदलने की कोशिश ना करे . यदि किसी कारण से कोई मांगलिक का विवाह किसी गैर मांगलिक से होता हैं तो कोई ज़रूरी नहीं की उसके वैवाहिक जीवन में सदा अड़चने ही आएँगी . मैं ऐसे कई सुखी दम्पत्तियों को जानता हूँ जिनके कुंडली ज़रा भी मेल नहीं खाते . आप ज्योतिष को जरूरत से ज्यादा तूल ना दे , हाँ जहा तक हो सके उसका लाभ उठाये.
यदि परिस्थिति अनुकूल ना हो तो और आपको अपने या अपनों का विवाह मांगलिक - गैर मांगलिक के साथ करना पड़े तो कुछ जोख टोना करके , हरि का नाम ले और आगे की ओर प्रस्थान करे .
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा.
हृदयँ राखि कौसलपुर राजा..
1. क्या हैं मांगलिक दोष?
आज के समाज में जहाँ एक ओर ज्योतिष के नकारने वालों की संख्या बढ़ी हैं , वही आश्चर्यजनक ढंग से ज्योतिष को मानने वालों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुयी हैं . जब आप ज्योतिष के चमत्कारों को खुद महसूस करते हैं तो आपका मन ज्योतिष को मानने पर मजबूर होता हैं और साथ ही साथ ज्योतिष के प्रति आपकी श्रद्धा को भी बढ़ाता हैं . ज्योतिष को लेकर तमाम भ्राँतिया मौजूद हैं , जिसका लाभ ढोंगी और पाखंडी ज्योतिषी उठाते हैं, इस ऐप को बनाने में हमारा यह प्रयास है की आप मांगलिक दोष के बारे में जाने और तब उसके अनुसार अपना फैसला ले .
शनि के बाद मंगल ही ऐसा ग्रह हैं जो आपको ख़ुश होने पर अतिशुभ फल देगा और क्रुद्ध होने पर सब कुछ हर लेगा . हम मंगल देव को ना पूरी तरह पोषक , ना पूरी तरह विनाशक कह सकते हैं . जातक की कुंडली में मंगल की परोस्थिति का असर जातक को ताउम्र भोगना पड़ता हैं.
कुंडली मिलान में मंगल पर ध्यान
विवाह में कुंडली के मिलान में तीन सबसे महत्वपूर्ण बाते होती हैं -
* नाड़ी दोष ना हो
* मांगलिक दोष या तो दोनों में ना हो या दोनों में हो
* गुण १६ से अधिक मिलते हो
इसका ये मतलब हैं की विवाह के समय वर कन्या की कुंडली मिलान में मांगलिक दोष का विचार बहुत ही महत्वपूर्ण हैं .
ऐसा माना जाता हैं की जिस वर या कन्या की कुंडली में मांगलिक दोष हैं , उसे किसी मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए. मांगलिक का मांगलिक से विवाह अति उत्तम और शुभ फलदायक हैं .
लेकिन अगर मांगलिक का विवाह गैर मांगलिक से हो जाए तो हो सकता हैं - वैवाहिक जीवन में अड़चने आये , तलाक़ की या झगड़े की स्तिति हो , गैर मांगलिक जीवन साथी की आयु कम हो जाए .
मांगलिक दोष पर विशेष ध्यान देने से पहले ये याद रखे की यदि वर या कन्या का विवाह २८ साल के आयु के बाद हो रहा हैं तो मांगलिक दोष का प्रभाव नहीं या आंशिक पड़ता हैं . आज के समाज में जहाँ विवाह देर से हो रहा हैं , वह बहुत संभव हैं की वर या कन्या २८ साल के बाद ही विवाह करे .
क्या होता हैं मांगलिक दोष?
जहां एक ओर मंगल की स्थिति से रोजी रोजगार एवं कारोबार मे उन्नति और प्रगति होती है तो दूसरी ओर इसकी उपस्थिति वैवाहिक जीवन के सुख बाधा डालती है.
कुण्डली में जब प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल होता है तब मंगलिक दोष (manglik dosha)लगता है. लेकिन सिर्फ इतने से ही मांगलिक दोष नहीं माना जाता , कुंडली में कुछ ऐसी परिस्थितियां होती हैं , जिनके रहते हुए मंगल दोष होते हुए भी नहीं माना जाता . हमने आगे के टॉपिक में ऐसी स्थिति की व्याख्या की हैं .
कुण्डली में चतुर्थ और सप्तम भाव में मंगल मेष अथवा कर्क राशि के साथ योग बनाता है तो मंगली दोष लगता है .
इस दोष को विवाह के लिए अशुभ माना जाता है. यह दोष जिनकी कुण्डली में हो उन्हें मंगली जीवनसाथी ही तलाश करनी चाहिए ऐसी मान्यता है. सातवाँ भाव जीवन साथी एवम गृहस्थ सुख का है. इन भावों में स्थित मंगल अपनी दृष्टि या स्थिति से सप्तम भाव अर्थात गृहस्थ सुख को हानि पहुँचाता है ज्योतिशास्त्र में कुछ नियम (astrological principles)बताए गये हैं जिससे वैवाहिक जीवन में मांगलिक दोष नहीं लगता है.
2. मांगलिक जातक का स्वभाव
कोई जातक चाहे वह स्त्री हो या पुरुष उसके मांगलिक होने का अर्थ है कि उसकी कुण्डली में मंगल अपनी प्रभावी स्थिति में है.
शादी के लिए मंगल को जिन स्थानों पर देखा जाता है वे 1,4,7,8 और 12 भाव हैं. इनमें से केवल आठवां और बारहवां भाव सामान्य तौर पर खराब माना जाता है. सामान्य तौर का अर्थ है कि विशेष परिस्थितियों में इन स्थानों पर बैठा मंगल भी अच्छे परिणाम दे सकता है.
मांगलिक होने का विशेष गुण यह होता है कि मांगलिक कुंडली वाला व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण निष्ठा से निभाता है, कठिन से कठिन कार्य वह समय से पूर्व ही कर लेते हैं, नेतृत्व की क्षमता, उनमें जन्मजात होती है, ये लोग जल्दी किसी से घुलते-मिलते नहीं परन्तु जब मिलते हैं तो पूर्णतः संबंध को निभाते हैं.
मांगलिक जातक कठोर निर्णय लेने वाला, कठोर वचन बोलने वाला, लगातार काम करने वाला, विपरीत लिंग के प्रति कम आकर्षित होने वाला, प्लान बनाकर काम करने वाला, कठोर अनुशासन बनाने और उसे फॉलो करने वाला, एक बार जिस काम में जुटे उसे अंत तक करने वाला, नए अनजाने कामों को शीघ्रता से हाथ में लेने वाला और किसी भी लड़ाई से नहीं घबराने वाला होता है.
अति महत्वकांक्षी होने से इनके स्वभाव में क्रोध पाया जाता है परन्तु यह बहुत दयालु, क्षमा करने वाले तथा मानवतावादी होते है, गलत के आगे झुकना इनकी पसंद नहीं होता और खुद भी गलती नहीं करते. इन्हीं विशेषताओं के कारण गैर मांगलिक व्यक्ति अधिक देर तक मांगलिक के सानिध्य में नहीं रह पाता.
लग्न का मंगल व्यक्ति की व्यक्तित्व को बहुत अधिक तीक्ष्ण बना देता है, चौथे का मंगल जातक को कड़ी पारिवारिक पृष्ठभूमि देता है.
सातवें स्थान का मंगल जातक को साथी या सहयोगी के प्रति कठोर बनाता है.
आठवें और बारहवें स्थान का मंगल आयु और शारीरिक क्षमताओं को प्रभावित करता है. इन स्थानों पर बैठा मंगल यदि अच्छे प्रभाव में है तो जातक के व्यवहार में मंगल के अच्छे गुण आएंगे और खराब प्रभाव होने पर खराब गुण आएंगे.
3. मांगलिक दोष नहीं लगता
मंगल भी निम्न लिखित परिस्तिथियों में दोष कारक नहीं होगा :
* यदि जन्म कुन्डली के प्रथम भाव में मंगल मेष राशि का हो, द्वादस भाव में धनु राशि का हो, चौथे भाव में वृश्चिक का हो, सप्तम भाव में मीन राशि का हो और आठवें भाव में कुम्भ राशि का हो, तो मांगलिक दोष नहीं होता है.
* चतुर्थ और सप्तम भाव में मंगल मेष, कर्क, वृश्चिक अथवा मकर राशि में हो और उसपर क्रूर ग्रहों की दृष्टि नहीं हो
* मंगल राहु की युति होने से मंगल दोष का निवारण हो जाता है.
* यदि जन्म कुन्डली के सप्तम, लगन, चौथे, नौवें और बारहवें भाव में शनि विराजमान हो तो मांगलिक दोष नहीं होता है.
* लग्न स्थान में बुध व शुक्र की युति होने से इस दोष का परिहार हो जाता है.
* कर्क और सिंह लग्न में लगनस्थ मंगल अगर केन्द्र व त्रिकोण का स्वामी हो तो यह राजयोग बनाता है जिससे मंगल का अशुभ प्रभाव कम हो जाता है.
* वर की कुण्डली में मंगल जिस भाव में बैठकर मंगली दोष बनाता हो कन्या की कुण्डली में उसी भाव में सूर्य, शनि अथवा राहु हो तो मंगल दोष का शमन हो जाता है.
* जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व ,उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का ,वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा
* यदि 1,4,7,8,12 भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो.
* यदि जन्म कुन्डली में मंगल गुरु अथवा चन्द्रमा के साथ हो, अथवा चन्द्रमा केन्द्र में विराजमान हो, तो मांगलिक दोष नहीं होता है.
* केन्द्र और त्रिकोण भावों में यदि शुभ ग्रह हो तथा तृतीय षष्ठ एवं एकादस भावों में पापग्रह तथा सप्तम भाव का स्वामी सप्तम में विराजमान हो तो भी मांगलिक दोष का प्रभाव नहीं होता है.
* यदि वर कनों की जन्म कुन्डली के समान भावों मेमंगलल अथा वैसे ही कोई अन्य पापग्रह बैठे हों तो मांगलिक दोष नही लगता. ऐसा विवाह शुभप्रद दीर्घायु देने वाला और पुत्र पौत्र आदि को प्रदान करने वाला माना जाता है.
ऊपर दिए गए कुंडली के परिस्तिथियों को बारीकी से जांच कर ले . जातक के कुंडली में मंगल का दोष होते हुए भी वो उसको हानि नहीं पहुचायेगा .
4. मांगलिक दोष के लक्षण
मंगल को उग्रता वाला गृह माना जाता है इसलिए मांगलिक दोष वाले लोगों का स्वाभाव गर्म माना जाता है| ऐसे लोग कटु भाषी होते हैं , पर होते हैं दिल के साफ़.
मांगलिक लोगों में बहुत गर्म और उग्र ऊर्जा होता है जिसका यदि सही इस्तेमाल नहीं किया जाए तो यह कुछ ना कुछ गलत हो सकता है|
मांगलिक दोष के कारण शादी में देरी होती है| ऐसे लोगों का दुसरे लिंग के लोगों के प्रति आकर्षण कम होता हैं .
मंगल दोष के कारण शादी में कलह और तनाव रहता है|
दो मांगलिक लोगों का आपस में विवाह करने से इसका बुरा प्रभाव दूर होता है| ऐसा माना जाता हैं की मांगलिक लोग, मांगलिक से ही विवाह हेतु बने हैं .
वैसे मांगलिक होने से रोजी रोटी , कारोबार में लाभ होता हैं .
मंगल टेस्ट्रोसोन को बढ़ता है जो उग्रता कामुकता और आक्रामकता को शरीर पर हावी करता है
5. मंगल दोष के लिए उपाय
अगर कुण्डली में मंगल दोष का निवारण ग्रहों के मेल से नहीं होता है तो व्रत और अनुष्ठान द्वारा इसका उपचार करना चाहिए.
* मांगलिक जातक को मंगवार के दिन व्रत रखना चाहिए, इससे फायदा मिलेगा. इसके साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ करें. याद रहे मंगलवार के व्रत में नमक नहीं खाते हैं . मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर जाकर भगवान की पूजा करें तो प्रभाव कम होगा .
* मंगला गौरी और वट सावित्री का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाला है. अगर जाने अनजाने मंगली कन्या का विवाह इस दोष से रहित वर से होता है तो दोष निवारण हेतु इस व्रत का अनुष्ठान करना लाभदायी होता है.
* जिस कन्या की कुण्डली में मंगल दोष होता है वह अगर विवाह से पूर्व गुप्त रूप से घट से अथवा पीपल के वृक्ष से विवाह करले फिर मंगल दोष से रहित वर से शादी करे तो दोष नहीं लगता है.
* प्राण प्रतिष्ठित विष्णु प्रतिमा से विवाह के पश्चात अगर कन्या विवाह करती है तब भी इस दोष का परिहार हो जाता है.
* मंगलवार के दिन व्रत रखकर सिन्दूर से हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से मंगली दोष शांत होता है.
* कार्तिकेय जी की पूजा से भी इस दोष में लाभ मिलता है.
* इसके अलावा 28 साल की उ्रम के बाद विवाह करें. क्योंकि माना जाता है कि इस उम्र के बाद इस दोष का असर कम हो जाता है.
* महामृत्युजय मंत्र का जप सर्व बाधा का नाश करने वाला है. इस मंत्र से मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक जीवन में मंगल दोष का प्रभाव कम होता है.
* लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है.
7. मंगलवार का व्रत
मांगलिक लोगों को चाहिए के वह मंगलवार का व्रत करे .
स्नान आदि करके हनुमान जी की पूजा करे .
हनुमान चालीसा का पाठ करे .
हनुमान मंदिर में जाकर अर्चना करे .
लाल वस्तुओ - लाल कपडा , मसूर की दाल , ताम्बे के बर्तन , लाल फल आदि का दान करे .
व्रत में आपको नमक नहीं खाना चाहिए , आप सेंधा नमक भी नहीं खा सकते हैं.
8. ये रत्न करे धारण
्योतिषचार्य के अनुसार मंगलवार के दिन मूंगा पहनना शुभ होगा. इसके लिए इसे सोनो की अंगूठी में बनवाकर दाहिने हाथ की अनामिक उंगूली में पहनें.
निम्न बातो को रखे ध्यान -
* मूंगा पांच रत्ती या उससे बड़ा पहने .
* मूंगा चमकदार, साफ, स्वच्छ निर्दोष एवं चिकनापन लिये होना चाहिये . टूटे हुए , खरोंच लगे हुए या पहले से किसी के धारण किये हुए मुंगे को ना पहने.
* मुंगे की अंगूठी आप सोना, तम्बा, पञ्च धातु या चांदी में उसे बनवा सकते हैं , पर अच्छा हो यदि सोने में बनाया जाये .
* मंगलवार को मुंगे की अंगूठी को एक लाल कपडे में लपेट कर अपने बाज़ू पर बाँध ले , उसे एक सप्ताह तक वैसे ही पहने , यदि इन दिनों के दौरान कोई अशुभ घटना होती हैं तो इसका मतलब मूंगा आपको लाभकारी नहीं हैं.
* अगर इस बीच सब सामान्य रहे तो आप अगले मंगलवार को मुंगे की अंगूठी का धारण कर सकते हैं.
* धारण करते वक़्त - ओम् क्रॉं क्रीं क्रौं स: भौमाय नम: मंत्र का जाप करे , वैसे तो १००८ जाप का विधान हैं , लेकिन आप अपनी यथा शक्ति से १०८ बार भी जप सकते हैं .
* पुरूषो को सीधे हाथ की तर्जनी उंगली (इ्रंडेक्स फिंगर) मे व महिलाओ को बॉए हाथ की तर्जनी उंगली मे धारण करना चाहिए .
मूंगा का धारण करने से आपके मांगलिक दोष में कमी आती हैं, साथ ही साथ ये आपके मंगल को शुभ फल दायक बनाता हैं .
9. कुम्भ विवाह या पीपल विवाह
मांगलिक दोष के निवारण के लिए पीपल विवाह , कुम्भ (घड़ा) विवाह , मूर्ति विवाह का भी उपाय बताया जाता हैं . ऐसा तब करते हैं जब कन्या की कुंडली में मंगल का स्थान मारक हो या कुंडली दो विवाह दर्शाता हो .
यदि वर की कुंडली में मंगल मारक हो तो ऐसा विधान नहीं बताया गया हैं . ऐसा विवाह करते समय यह याद रखे की इसको बहुत गोपनीय ढंग से करे . ऐसे विवाह की जानकारी कन्या के पिता को भी ना हो .
मांगलिक कन्या को चाहिए की वो कम से कम पांच साल तक मंगला गौरी का व्रत करे. यदि कन्या मांगलिक हो तो ऐसा माना जाता हैं की लड़की का विवाह देखने उसका पिता नहीं बल्कि ताऊ , चाचा , भाई या कोई अन्य रिश्तेदार जाए . ऐसे में विवाह के तय होने की संभावना ज्यादा रहती हैं .
10. असरदार टोटके
मंगल का प्रभाव शुभ करने के लिए आप नीचे लिखे टोटको का प्रयोग कर सकते हैं .
लाल वस्तुओ - लाल कपडा , मसूर की दाल , ताम्बे के बर्तन , लाल फल आदि का दान करे नौ मंगलवार तक करे.
मंगलवार से प्रारम्भ करके शहद एवं सिंदुर मिलाकर 43 दिन तक प्रतिदिन बहती नदी में प्रवाहित करे .
मीठी रोटी का दान करें .
हनुमानजी की आराधना करें एवं ग्यारह मंगलवार सिंदुर एवं चमेली के तेल से सने हुए चोला को चढ़ॉए .
मंगलवार के दिन किसी वट वृक्ष की जड़ पर मीठा दूध चढ़ाए, और फिर उसके बाद दूध से भीगी मिट्टी को लेकर स्वयं को तिलक लगाये .
पक्षियों को मीठा खिलाएं .
विवाह विलम्ब के योग
विवाह एक संश्लिष्ट और बाहू आयामी संस्कार है। इसके सम्बन्ध में किसी प्रकार के फल के लिए विस्तृत एवं धैर्यपूर्व अध्ययन मनन- चिंतन की अनिवार्यता होती है किसी जातक के जन्मांग से विवाह संबंधित ज्ञान प्राप्ति के लिए द्वितीय, पंचम, सप्तम एवं द्वादश भावों का विश्लेषण करना चाहिए। विवाह विलम्ब के योगों की गणना भी महत्वपूर्ण है।
अनेकानेक कन्याओं की वरमाला उनके हाथों ही मुरझा जाती है अर्थात उनका परिणय तब सम्पन्न होता है जब उनके जीवन का ऋतुराज पत्र पात के प्रतीक्षा में तिरोहित हो जाता है वैवाहिक विलम्ब के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे आर्थिक विषमता, शिक्षा की स्थिति, शारीरिक संयोजन, मानसिक संस्कार, ग्रहों की स्थिति इत्यादि।
शनि और मंगल यदि लग्न में या नवांश लग्न से सप्तमस्थ हो तो विवाह नहीं होता विशेषतः लग्नेश और सप्तमेश के बलहीन होने पर
यदि मंगल और शनी, शुक्र और चन्द्रमा से सप्तमस्थ हो तब विवाह विलम्ब से होता है
शनि और मंगल यदि षष्ठ और अष्टम भावगत हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है
यदि शनि और मंगल में से कोई भी ग्रह द्वितीयेश अथवा सप्तमेश हो और एक दुसरे से दृष्ट से तो विवाह में विलम्ब होता है
यदि लग्न, सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र स्थिर राशिगत हों एवं चन्द्रमा चर राशि में हो तो विवाह विलम्ब से होता है
यदि द्वितीय भाव में कोई वक्री ग्रह स्थित हो या द्वितीयेश स्वयं वक्री हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है
यदि द्वितीय भाव पापग्रस्त हो तथा द्वितीयेश द्वादश्थ हो तब भी विवाह विलम्ब से होता है
पुरुषों की कुण्डली में सूर्य मंगल अथवा चन्द्र शुक्र की सप्तम भाव की स्थिति यदि पापाक्रांत हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है
राहू और शुक्र के लग्नस्थ होने पर भी विवाह में विलम्ब होता है
यदि सप्तम बी हव का स्वामी त्रिक (६,८,१२) भाव में स्थित या त्रिक भाव का स्वामी सप्तम भाव में स्थित हो तो विवाह में अत्यन्त विलम्ब होता है
यदि लग्नेश और शुक्र वन्ध्या राशिगत हो (मिथुन, सिंह,कन्या एवं धनु) तो भी विवाह में विलम्ब होता है।
वैदिक ज्योतिष में विवाह के संदर्भ में आवश्यक निश्चित नियम निरूपित किए गए हैं, जिसके आधार पर विवाह के सम्बंध मे भविष्यवाणी की जा सकती है, हां इसके रूप अलग-अलग हो सकते हैं।
जैसे कुंडली मे निश्चित विवाह योग है या विवाह योग नहीं है? इसके अलावा विवाह विलंब के योग हैं, द्वि-विवाह या तलाक के योग हैं या सुखद वैवाहिक जीवन के योग हंै या प्रेम विवाह के योग है, साथ ही विवाह के समय व जीवन साथी कैसा होगा इन सभी बातों का कुंडली से पता चलता है
जातक की कुंडली मे विवाह प्रकरणों में शुक्र व मंगल महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हंै, इन दोनों ग्रहों को विवाह संस्कार के आधार स्तम्ंभ कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी शुक्र विवाह के कारक है तो मंगल विच्छेदक ग्रह है
विवाह का भाव कुंडली मे सप्तम भाव है। इसके अलावा कन्या की कुंडली में देवगुरू बृहस्पति व वर की कुंडली में सूर्य की महत्ता भी होती है।
सुखद वैवाहिक जीवन का आकलन करते समय कुंडली के चतुर्थ भाव का भी अध्ययन किया जाता है। सप्तम भाव के आधार पर ही नही वरन विवाह के बारे मे निर्णय लेते समय चतुर्थ भाव, पंचम भाव व एकादश भाव का भी गहन अध्ययन आवश्यक है
जैसे मयूरों के शिखा और नागों का मणि शिरोभूषण है वैसे ही वेदाग शास्त्रों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरक्त, छन्द और ज्योतिष) में ज्योतिष शिरोभूषण है| मानव जीवन की प्रत्येक निमिष को किसी न किसी का अनुग्रह प्राप्त है| इस अनिवार्य अनुभव को शब्द सम्भव और विवेक सम्मत बनाकर भारतीय ऋषि मुनियों ने जन्मांक चक्र की परिकल्पना की नन्मंक चक्र का प्रत्येक भाव कुछ विशिष्ट तथ्यों का नइयामन करता है| सप्त भाव जन्मांक चक्र का मध्यवर्ती भाव है शत्रु भाव में क्रूर सम्पुट में स्थित यह भाव काम कलित तथा वासना वलयित भावों अनुभवों संबंधों रहस्यों की वैकृतिक स्मिता और सामाजिकता की विवेचना का मूल स्थान है|
एक नजर सप्तमस्थ ग्रहों पर डालें-
सूर्य
स्त्रीभिःगतः परिभवः मदगे पतंगे (आचार्य वराहमिहिर)
जिसके जन्म समय में लग्न से सप्तम में सूर्य स्थित हो तो इसमें स्त्रियों का तिरस्कार प्राप्त होता है| सूर्य की सप्तम भाव में स्थिति सर्वाधिक वैवाहिक जीवन एवं चरित्र को प्रभावित करता है| सूर्य अग्निप्रद ग्रह होता है|जिसके कारण जातक के विवेक तथा वासना पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है|
चन्द्रमा
सौम्यो ध्रिश्यः सुखितः सुशरीररः कामसंयुतोद्दूने|
दैन्यरुगादित देहः कृष्णे संजायते शशिनि||
-(चमत्कार चिन्तामणि)
सप्तम भाव मे चन्द्रमा हो तो मनुष्य नम्र विनय से वश में आने वाला सुखी सुन्दर और कामुक होता है और चन्द्र यदि हीन वाली हो तो मनुष्य दीन और रोगी होता है|
भौम
स्त्रियाँ दारमरणं नीचसेवनं नीच स्त्री संगमः|
कुजेतिसुस्तनी कठिनोर्ध्व कुचा||
-(पराशर)
सप्त्मस्थ मंगल की स्थिति प्रायः आचार्यों ने कष्ट कर बताया सप्तम भाव में भौम होने से पत्नी की मृत्यु होती है| नीच स्त्रियों से कामानल शांत करता है| स्त्री के स्तन उन्नत और कठिन होते हैं| जातक शारीरिक दृष्टि से प्रायः क्षीण, रुग्ण, शत्रुवों से आक्रांत तथा चिंताओं में लीं रहता है|
बुध
बुधे दारागारं गतवति यदा यस्य जनने|
त्वश्यं शैथिल्यं कुसुमशररगोत्सविधौ||
मृगाक्षिणां भर्तुः प्रभवति यदार्केणरहिते|
तदा कांतिश्चंचत् कनकस द्रिशीमोहजननी||
-(जातक परिजात)
जिस मनुष्य के जन्म समय मे बुध सप्तम भाव मे हो वह सम्भोग में अवश्य शिथिल होता है| उसका वीर्य निर्बल होता है| वह अत्यन्त सुन्दर और मृगनैनी स्त्री का स्वामी होता है यदि बुध अकेला हो तो मन को मोहित करने वाली सुवर्ण के समान देदीप्यमान कान्ति होती है|
जीव
शास्त्राभ्यासीनम्र चितो विनीतः कान्तान्वितात्यंतसंजात सौष्ठयः|
मन्त्री मर्त्यः काव्यकर्ता प्रसूतो जायाभावे देवदेवाधिदेवः|
जिस जातक के जन्म समय में जीव सप्तम भाव में स्थित हो वह स्वभाव से नम्र होता है| अत्यन्त लोकप्रिय और चुम्बकीय व्यक्ति का स्वामी होता है उसकी भार्या सत्य अर्थों में अर्धांगिनी सिद्ध होती है तथा विदुषी होती है| इसे स्त्री और धन का सुख मिलता है| यह अच्छा सलाहकार और काव्य रचना कुशल होता है|
शुक्र
भवेत किन्नरः किन्नराणां च मध्ये||
स्वयं कामिनी वै विदेशे रतिः स्यात्|
यदा शुक्रनामा गतः शुक्रभूमौ|| (चमत्कारचिंतामणि)
जिस जातक के जन्म समय में शुक्र सप्तम भाव हो उसकी स्त्री गोरे रंग की श्रेष्ठ होती है| जातक को स्त्री सुखा मिलता है गान विद्द्या में निपुण होता है, वाहनों से युक्त कामुक एवं परस्त्रियों में आसक्त होता है विवाह का कारक ग्रह शुक्र है| सिद्धांत के तहत कारक ग्रह कारक भाव के अंतर्गत हो तो स्थिति को सामान्य नहीं रहने देता है इसलिए सप्तम भाव में शुक्र दाम्पत्य जीवन में कुछ अनियमितता उत्पन्न करता है ऐसे जातक का विवाह प्रायः चर्चा का विषय बनता है|
शनि
शरीरदोषकरः कृशकलत्रः वेश्या संभोगवान् अति दुःखी|
उच्चस्वक्षेत्रगते अनेकस्त्रीसंभोगी कुजयुतेशिश्न चुंवन परः||
-(भृगु संहिता)
सप्तम भाव में शनि का निवास किसी प्रकार से शुभ या सुखद नहीं कहा जा सकता है| सप्तम भाव में शनि होने से जातक का शरीर दोष युक्त रहता है| (दोष का तात्पर्य रोग से है) उसकी पत्नी क्रिश होती है जातक वेश्यागामी एवं दुखी होता है| यदि शनि उच्च गृही या स्वगृही हो तो जातक अनेक स्त्री का उपभोग करता है यदि शनि भौम से युक्त हो तो स्त्री अत्यन्त कामुक होती है उसका विवाह अधिक उम्र वाली स्त्री के साथ होता है|
राहु
प्रवासात् पीडनं चैवस्त्रीकष्टं पवनोत्थरुक्|
कटि वस्तिश्च जानुभ्यां सैहिकेये च सप्तमे||
-(भृगु सूत्र)
जिस जातक के जन्म समय मे राहु सप्तम भावगत हो तो उसके दो विवाह होते हैं| पहली स्त्री की मृत्यु होती है दूसरी स्त्री को गुल्म रोग, प्रदर रोग इत्यादि होते हैं| एवं जातक क्रोधी, दूसरों का नुकसान करने वाला, व्यभिचारी स्त्री से सम्बन्ध रखने वाला गर्बीला और असंतुष्ट होता है|
केतु
द्दूने च केतौ सुखं नैव मानलाभो वतादिरोगः|
न मानं प्रभूणां कृपा विकृता च भयं वैरीवर्गात् भवेत् मानवानाम्|
-(भाव कौतुहल)
यदि सप्तम भाव में केतु हो तो जातक का अपमान होता है| स्त्री सुख नहीं मिलता स्त्री पुत्र आदि का क्लेश होता है| खर्च की वृद्धि होती है रजा की अकृपा शत्रुओं का डर एवं जल भय बना रहता है| वह जातक व्यभिचारी स्त्रियों में रति करता है|
वैवाहिक विलम्ब के योग-
विवाह एक संश्लिष्ट और बाहू आयामी संस्कार है| इसके सम्बन्ध में किसी प्रकार के फल के लिए विस्तृत एवं धैर्यपूर्व अध्ययन मनन- चिंतन की अनिवार्यता होती है किसी जातक के जन्मांग से विवाह संबंधित ज्ञान प्राप्ति के लिए द्द्वितीय, पंचम, सप्तम एवं द्वादश भावों का विश्लेषण करना चाहिए| आज के वर्तमान समय में कन्याओं का विवाह विशेष रूप से समस्या पूर्ण बन गया है| अनेकानेक कन्याओं की वरमाला उनके हाथों ही मुरझा जाती है अर्थात उनका परिणय तब सम्पन्न होता है जब उनके जीवन का ऋतुराज पत्र पात के प्रतीक्षा में तिरोहित हो जाता है वैवाहिक विलम्ब के अनेक कारण हो सकते हैं| जैसे आर्थिक विषमता, शिक्षा की स्थिति, शारीरिक संयोजन, मानसिक संस्कार, ग्रहों की स्थिति इत्यादि| आइये हम ज्योतिष का माध्यम से कुछ योगों का अध्ययन चिंतन करें-
१. शनि और मंगल यदि लग्न में या नवांश लग्न से सप्तमस्थ हो तो विवाह नहीं होता विशेषतः लग्नेश और सप्तमेश के बलहीन होने पर|
२. यदि मंगल और शनी, शुक्र और चन्द्रमा से सप्तमस्थ हो तब विवाह विलम्ब से होता है|
३. शनि और मंगल यदि षष्ठ और अष्टम भावगत हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है|
४. यदि शनि और मंगल में से कोई भी ग्रह द्वितीयेश अथवा सप्तमेश हो और एक दुसरे से दृष्ट से तो विवाह में विलम्ब होता है|
५. यदि लग्न, सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र स्थिर राशिगत हों एवं चन्द्रमा चर राशि में हो तो विवाह विलम्ब से होता है|
६. यदि द्वितीय भाव में कोई वक्री ग्रह स्थित हो या द्वितीयेश स्वयं वक्री हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है|
७. यदि द्वितीय भाव पापग्रस्त हो तथा द्वितीयेश द्वादश्थ हो तब भी विवाह विलम्ब से होता है|
८. पुरुषों की कुण्डली में सूर्य मंगल अथवा चन्द्र शुक्र की सप्तम भाव की स्थिति यदि पापाक्रांत हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है|
९. राहू और शुक्र के लग्नस्थ होने पर भी विवाह में विलम्ब होता है|
१०. यदि सप्तम बी हव का स्वामी त्रिक (६,८,१२) भाव में स्थित या त्रिक भाव का स्वामी सप्तम भाव में स्थित हो तो विवाह में अत्यन्त विलम्ब होता है|
११. यदिलाग्नेश और शुक्र वन्ध्या राशिगत हो (मिथुन, सिंह,कन्या एवं धनु)तो भी विवाह में विलम्ब होया है
विवाह एवं वैवाहिक जीवन…आइये जाने तलाक के योग,कारण और उपचार—
कुंडली और जीवनसाथी—
युवक/वर की कुंडली—
यदि वर की कुंडली के सप्तम भाव में वृषभ या तुला राशि होती है तो उसे सुंदर पत्नी मिलती है। यदि कन्या की कुंडली में चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र में से कोई भी हो तो उसका पति राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है तथा धनवान होता है।
जब सप्तमेश सौम्य ग्रह होता है तथा स्वग्रही होकर सप्तम भाव में ही उपस्थित होता है तो जातक को सुंदर, आकर्षक, प्रभामंडल से युक्त एवं सौभाग्यशाली पत्नी प्राप्त होती है। जब सप्तमेश सौम्य ग्रह होकर भाग्य भाव में उपस्थित होता है तो जातक को शीलयुक्त, रमणी एवं सुंदर पत्नी प्राप्त होती है तथा विवाह के पश्चात जातक का निश्चित भाग्योदय होता है।
जब सप्तमेश एकादश भाव में उपस्थित हो तो जातक की पत्नी रूपवती, संस्कारयुक्त, मृदुभाषी व सुंदर होती है तथा विवाह के पश्चात जातक की आर्थिक आय में वृद्धि होती है या पत्नी के माध्यम से भी उसे आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं।
यदि जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में वृषभ या तुला राशि होती है तो जातक को चतुर, मृदुभाषी, सुंदर, सुशिक्षित, संस्कारवान, तीखे नाक-नक्श वाली, गौरवर्ण, संगीत, कला आदि में दक्ष, भावुक एवं चुंबकीय आकर्षण वाली, कामकला में प्रवीण पत्नी प्राप्त होती है।
यदि जातक की जन्मकुंडली में सप्तम भाव में मिथुन या कन्या राशि उपस्थित हो तो जातक को कोमलाङ्गी, आकर्षक व्यक्तित्व वाली, सौभाग्यशाली, मृदुभाषी, सत्य बोलने वाली, नीति एवं मर्यादाओं से युक्त बात करने वाली, श्रृंगारप्रिय, कठिन समय में पति का साथ देने वाली तथा सदैव मुस्कुराती रहने वाली पत्नी प्राप्त होती है। उन्हें वस्त्र एवं आभूषण बहुत प्रिय होते हैं।
जिस जातक के सप्तम भाव में कर्क राशि स्थित होती है, उसे अत्यंत सुंदर, भावुक, कल्पनाप्रिय, मधुरभाषी, लंबे कद वाली, छरहरी तथा तीखे नाक-नक्श वाली, सौभाग्यशाली तथा वस्त्र एवं आभूषणों से प्रेम करने वाली पत्नी प्राप्त होती है।
यदि किसी जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में कुंभ राशि स्थित हो तो ऐसे जातक की पत्नी गुणों से युक्त धार्मिक, आध्यात्मिक कार्यो में गहरी अभिरुचि रखने वाली एवं दूसरों की सेवा और सहयोग करने वाली होती है।
सप्तम भाव में धनु या मीन राशि होने पर जातक को धार्मिक, आध्यात्मिक एवं पुण्य के कार्यो में रुचि रखने वाली, सुंदर, न्याय एवं नीति से युक्त बातें करने वाली, वाक्पटु, पति के भाग्य में वृद्धि करने वाली, सत्य का आचरण करने वाली और शास्त्र एवं पुराणों का अध्ययन करने वाली पत्नी प्राप्त होती है।
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कन्या/युवती की कुंडली-जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में चन्द्र, बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित होता है, उसे धनवान पति प्राप्त होता है।
जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में गुरु उपस्थित हो तो उसे सुंदर, धनवान, बुद्धिमान पति व श्रेष्ठ संतान मिलती है।भाग्य भाव में या सप्तम, अष्टम और नवम भाव में शुभ ग्रह होने से ससुराल धनाढच्य एवं वैभवपूर्ण होती है।
कन्या की जन्मकुंडली में चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र आदि में से कोई उपस्थित हो तो उसका पति राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है तथा उसे सुख व वैभव प्राप्त होता है। कुंडली के लग्न में चंद्र हो तो ऐसी कन्या पति को प्रिय होती है और चंद्र व शुक्र की युति हो तो कन्या ससुराल में अपार संपत्ति एवं समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करती है।
कन्या की कुंडली में वृषभ, कन्या, तुला लग्न हो तो वह प्रशंसा पाकर पति एवं धनवान ससुराल में प्रतिष्ठा प्राप्त करती है।कन्या की कुंडली में जितने अधिक शुभ ग्रह गुरु, शुक्र, बुध या चन्द्र लग्न को देखते हैं या सप्तम भाव को देखते हैं, उसे उतना धनवान एवं प्रतिष्ठित परिवार एवं पति प्राप्त होता है।
कन्या की जन्मकुंडली में लग्न एवं ग्रहों की स्थिति की गणनानुसार त्रिशांश कुंडली का निर्माण करना चाहिए तथा देखना चाहिए कि यदि कन्या का जन्म मिथुन या कन्या लग्न में हुआ है तथा लग्नेश गुरु या शुक्र के त्रिशांश में है तो उसके पति के पास अटूट संपत्ति होती है तथा कन्या सदैव ही सुंदर वस्त्र एवं आभूषण धारण करने वाली होती है।
कुंडली के सप्तम भाव में शुक्र उपस्थित होकर अपने नवांश अर्थात वृषभ या तुला के नवांश में हो तो पति धनाढच्य होता है।सप्तम भाव में बुध होने से पति विद्वान, गुणवान, धनवान होता है, गुरु होने से दीर्घायु, राजा के संपत्ति वाला एवं गुणी तथा शुक्र या चंद्र हो तो ससुराल धनवान एवं वैभवशाली होता है। एकादश भाव में वृष, तुला राशि हो या इस भाव में चन्द्र, बुध या शुक्र हो तो ससुराल धनाढच्य और पति सौम्य व विद्वान होता है।हर पुरुष सुंदर पत्नी और स्त्री धनवान पति की कामना करती है।
यदि जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो उसकी पत्नी शिक्षित, सुशील, सुंदर एवं कार्यो में दक्ष होती है, किंतु ऐसी स्थिति में सप्तम भाव पर यदि किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो दाम्पत्य जीवन में कलह और सुखों का अभाव होता है।
जातक की जन्मकुंडली में स्वग्रही, उच्च या मित्र क्षेत्री चंद्र हो तो जातक का दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है तथा उसे सुंदर, सुशील, भावुक, गौरवर्ण एवं सघन केश राशि वाली रमणी पत्नी प्राप्त होती है। सप्तम भाव में क्षीण चंद्र दाम्पत्य जीवन में न्यूनता उत्पन्न करता है।
जातक की कुंडली में सप्तमेश केंद्र में उपस्थित हो तथा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि होती है, तभी जातक को गुणवान, सुंदर एवं सुशील पत्नी प्राप्त होती है।पुरुष जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में शुभ ग्रह बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित हो तो ऐसा जातक सौभाग्यशाली होता है तथा उसकी पत्नी सुंदर, सुशिक्षित होती है और कला, नाटच्य, संगीत, लेखन, संपादन में प्रसिद्धि प्राप्त करती है। ऐसी पत्नी सलाहकार, दयालु, धार्मिक-आध्यात्मिक क्षेत्र में रुचि रखती है।
दाम्पत्य सुख के उपाय—-
१॰ यदि जन्म कुण्डली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, द्वादश स्थान स्थित मंगल होने से जातक को मंगली योग होता है इस योग के होने से जातक के विवाह में विलम्ब, विवाहोपरान्त पति-पत्नी में कलह, पति या पत्नी के स्वास्थ्य में क्षीणता, तलाक एवं क्रूर मंगली होने पर जीवन साथी की मृत्यु तक हो सकती है। अतः जातक मंगल व्रत। मंगल मंत्र का जप, घट विवाह आदि करें।
२॰ सप्तम गत शनि स्थित होने से विवाह बाधक होते है। अतः “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मन्त्र का जप ७६००० एवं ७६०० हवन शमी की लकड़ी, घृत, मधु एवं मिश्री से करवा दें।
३॰ राहु या केतु होने से विवाह में बाधा या विवाहोपरान्त कलह होता है। यदि राहु के सप्तम स्थान में हो, तो राहु मन्त्र “ॐ रां राहवे नमः” का ७२००० जप तथा दूर्वा, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें। केतु स्थित हो, तो केतु मन्त्र “ॐ कें केतवे नमः” का २८००० जप तथा कुश, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें।
४॰ सप्तम भावगत सूर्य स्थित होने से पति-पत्नी में अलगाव एवं तलाक पैदा करता है। अतः जातक आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ रविवार से प्रारम्भ करके प्रत्येक दिन करे तथा रविवार कप नमक रहित भोजन करें। सूर्य को प्रतिदिन जल में लाल चन्दन, लाल फूल, अक्षत मिलाकर तीन बार अर्ध्य दें।
५॰ जिस जातक को किसी भी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो नवरात्री में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक ४४००० जप निम्न मन्त्र का दुर्गा जी की मूर्ति या चित्र के सम्मुख करें।
“ॐ पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम्।।”
६॰ किसी स्त्री जातिका को अगर किसी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो श्रावण कृष्ण सोमवार से या नवरात्री में गौरी-पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जप करना चाहिए-
“हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।।”
७॰ किसी लड़की के विवाह मे विलम्ब होता है तो नवरात्री के प्रथम दिन शुद्ध प्रतिष्ठित कात्यायनि यन्त्र एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर स्थापित करें एवं यन्त्र का पंचोपचार से पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जइ लड़की स्वयं या किसी सुयोग्य पंडित से करवा सकते हैं।
“कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोप सुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।।”
८॰ जन्म कुण्डली में सूर्य, शनि, मंगल, राहु एवं केतु आदि पाप ग्रहों के कारण विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो गौरी-शंकर रुद्राक्ष शुद्ध एवं प्राण-प्रतिष्ठित करवा कर निम्न मन्त्र का १००८ बार जप करके पीले धागे के साथ धारण करना चाहिए। गौरी-शंकर रुद्राक्ष सिर्फ जल्द विवाह ही नहीं करता बल्कि विवाहोपरान्त पति-पत्नी के बीच सुखमय स्थिति भी प्रदान करता है।
“ॐ सुभगामै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात्।।”
९॰ “ॐ गौरी आवे शिव जी व्याहवे (अपना नाम) को विवाह तुरन्त सिद्ध करे, देर न करै, देर होय तो शिव जी का त्रिशूल पड़े। गुरु गोरखनाथ की दुहाई।।”
उक्त मन्त्र की ११ दिन तक लगातार १ माला रोज जप करें। दीपक और धूप जलाकर ११वें दिन एक मिट्टी के कुल्हड़ का मुंह लाल कपड़े में बांध दें। उस कुल्हड़ पर बाहर की तरफ ७ रोली की बिंदी बनाकर अपने आगे रखें और ऊपर दिये गये मन्त्र की ५ माला जप करें। चुपचाप कुल्हड़ को रात के समय किसी चौराहे पर रख आवें। पीछे मुड़कर न देखें। सारी रुकावट दूर होकर शीघ्र विवाह हो जाता है।
१०॰ जिस लड़की के विवाह में बाधा हो उसे मकान के वायव्य दिशा में सोना चाहिए।
११॰ लड़की के पिता जब जब लड़के वाले के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें तो लड़की अपनी चोटी खुली रखे। जब तक पिता लौटकर घर न आ जाए तब तक चोटी नहीं बाँधनी चाहिए।
१२॰ लड़की गुरुवार को अपने तकिए के नीचे हल्दी की गांठ पीले वस्त्र में लपेट कर रखे।
१३॰ पीपल की जड़ में लगातार १३ दिन लड़की या लड़का जल चढ़ाए तो शादी की रुकावट दूर हो जाती है।
१४॰ विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब हो और जातिकाएँ अपने अहं के कारण अनेल युवकों की स्वीकृति के बाद भी उन्हें अस्वीकार करती रहें तो उसे निम्न मन्त्र का १०८ बार जप प्रत्येक दिन किसी शुभ मुहूर्त्त से प्रारम्भ करके करना चाहिए।
“सिन्दूरपत्रं रजिकामदेहं दिव्ताम्बरं सिन्धुसमोहितांगम् सान्ध्यारुणं धनुः पंकजपुष्पबाणं पंचायुधं भुवन मोहन मोक्षणार्थम क्लैं मन्यथाम।
महाविष्णुस्वरुपाय महाविष्णु पुत्राय महापुरुषाय पतिसुखं मे शीघ्रं देहि देहि।।”
१५॰ किसी भी लड़के या लड़की को विवाह में बाधा आ रही हो यो विघ्नकर्ता गणेशजी की उपासना किसी भी चतुर्थी से प्रारम्भ करके अगले चतुर्थी तक एक मास करना चाहिए। इसके लिए स्फटिक, पारद या पीतल से बने गणेशजी की मूर्ति प्राण-प्रतिष्टित, कांसा की थाली में पश्चिमाभिमुख स्थापित करके स्वयं पूर्व की ओर मुँह करके जल, चन्दन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करके १०८ बार “ॐ गं गणेशाय नमः” मन्त्र पढ़ते हुए गणेश जी पर १०८ दूर्वा चढ़ायें एवं नैवेद्य में मोतीचूर के दो लड्डू चढ़ायें। पूजा के बाद लड्डू बच्चों में बांट दें।
यह प्रयोग एक मास करना चाहिए। गणेशजी पर चढ़ये गये दूर्वा लड़की के पिता अपने जेब में दायीं तरफ लेकर लड़के के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें।
१६॰ तुलसी के पौधे की १२ परिक्रमायें तथा अनन्तर दाहिने हाथ से दुग्ध और बायें हाथ से जलधारा तथा सूर्य को बारह बार इस मन्त्र से अर्ध्य दें- “ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्त्र किरणाय मम वांछित देहि-देहि स्वाहा।”
फिर इस मन्त्र का १०८ बार जप करें-
“ॐ देवेन्द्राणि नमस्तुभ्यं देवेन्द्र प्रिय यामिनि। विवाहं भाग्यमारोग्यं शीघ्रलाभं च देहि मे।”
१७॰ गुरुवार का व्रत करें एवं बृहस्पति मन्त्र के पाठ की एक माला आवृत्ति केला के पेड़ के नीचे बैठकर करें।
१८॰ कन्या का विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो तो एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी-सी हल्दी, एक सिक्का डाल कर लड़की के सिर के ऊपर ७ बार घुमाकर उसके आगे फेंक दें। उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।
१९॰ जो माता-पिता यह सोचते हैं कि उनकी पुत्रवधु सुन्दर, सुशील एवं होशियार हो तो उसके लिए वीरवार एवं रविवार के दिन अपने पुत्र के नाखून काटकर रसोई की आग में जला दें।
२०॰ विवाह में बाधाएँ आ रही हो तो गुरुवार से प्रारम्भ कर २१ दिन तक प्रतिदिन निम्न मन्त्र का जप १०८ बार करें-
“मरवानो हाथी जर्द अम्बारी। उस पर बैठी कमाल खां की सवारी। कमाल खां मुगल पठान। बैठ चबूतरे पढ़े कुरान। हजार काम दुनिया का करे एक काम मेरा कर। न करे तो तीन लाख पैंतीस हजार पैगम्बरों की दुहाई।”
२१॰ किसी भी शुक्रवार की रात्रि में स्नान के बाद १०८ बार स्फटिक माला से निम्न मन्त्र का जप करें-
“ॐ ऐं ऐ विवाह बाधा निवारणाय क्रीं क्रीं ॐ फट्।”
२२॰ लड़के के शीघ्र विवाह के लिए शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को ७० ग्राम अरवा चावल, ७० सेमी॰ सफेद वस्त्र, ७ मिश्री के टुकड़े, ७ सफेद फूल, ७ छोटी इलायची, ७ सिक्के, ७ श्रीखंड चंदन की टुकड़ी, ७ जनेऊ। इन सबको सफेद वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु व्यक्ति घर के किसी सुरक्षित स्थान में शुक्रवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
२३॰ लड़की के शीघ्र विवाह के लिए ७० ग्राम चने की दाल, ७० से॰मी॰ पीला वस्त्र, ७ पीले रंग में रंगा सिक्का, ७ सुपारी पीला रंग में रंगी, ७ गुड़ की डली, ७ पीले फूल, ७ हल्दी गांठ, ७ पीला जनेऊ- इन सबको पीले वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु जातिका घर के किसी सुरक्षित स्थान में गुरुवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
२४॰ श्रेष्ठ वर की प्राप्ति के लिए बालकाण्ड का पाठ करे।
मंगली दोष का ज्योतिषीय आधार (Astrological analysis of Manglik Dosha)—-
मंगल उष्ण प्रकृति का ग्रह है.इसे पाप ग्रह माना जाता है. विवाह और वैवाहिक जीवन में मंगल का अशुभ प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है. मंगल दोष जिसे मंगली के नाम से जाना जाता है इसके कारण कई स्त्री और पुरूष आजीवन अविवाहित ही रह जाते हैं.इस दोष को गहराई से समझना आवश्यक है ताकि इसका भय दूर हो सके.
वैदिक ज्योतिष में मंगल को लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है.इन भावो में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है.जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार चार गुणा.मंगल का पाप प्रभाव अलग अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है
जैसे: लग्न भाव में मंगल (Mangal in Ascendant ) लग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है.लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है.यह मंगल हठी और आक्रमक भी बनाता है.इस भाव में उपस्थित मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख सुख स्थान पर होने से गृहस्थ सुख में कमी आती है.सप्तम दृष्टि जीवन साथी के स्थान पर होने से पति पत्नी में विरोधाभास एवं दूरी बनी रहती है.अष्टम भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि जीवनसाथी के लिए संकट कारक होता है.
द्वितीय भाव में मंगल (Mangal in Second Bhava) भवदीपिका नामक ग्रंथ में 2 भावस्थ मंगल को भी मंगली दोष से पीड़ित बताया गया है.यह भाव कुटुम्ब और धन का स्थान होता है.यह मंगल परिवार और सगे सम्बन्धियों से विरोध पैदा करता है.परिवार में तनाव के कारण पति पत्नी में दूरियां लाता है.इस भाव का मंगल पंचम भाव, अष्टम भाव एवं नवम भाव को देखता है.मंगल की इन भावों में दृष्टि से संतान पक्ष पर विपरीत प्रभाव होता है.भाग्य का फल मंदा होता है.
चतुर्थ भाव में मंगल (Mangal in Fourth Bhava) चतुर्थ स्थान में बैठा मंगल सप्तम, दशम एवं एकादश भाव को देखता है.यह मंगल स्थायी सम्पत्ति देता है परंतु गृहस्थ जीवन को कष्टमय बना देता है.मंगल की दृष्टि जीवनसाथी के गृह में होने से वैचारिक मतभेद बना रहता है.मतभेद एवं आपसी प्रेम का अभाव होने के कारण जीवनसाथी के सुख में कमी लाता है.मंगली दोष के कारण पति पत्नी के बीच दूरियां बढ़ जाती है और दोष निवारण नहीं होने पर अलगाव भी हो सकता है.यह मंगल जीवनसाथी को संकट में नहीं डालता है.
सप्तम भाव में मंगल (Mangal in Seventh Bhava) सप्तम भाव जीवनसाथी का घर होता है.इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है.इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव बना रहता है.जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है.यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है.मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है.यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर सम्बन्ध भी बनाता है.संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है.मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति पत्नी में दूरियां बढ़ती है जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं.जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए.
अष्टम भाव में मंगल (Mangal in Eigth Bhava) अष्टम स्थान दुख, कष्ट, संकट एवं आयु का घर होता है.इस भाव में मंगल वैवाहिक जीवन के सुख को निगल लेता है.अष्टमस्थ मंगल मानसिक पीड़ा एवं कष्ट प्रदान करने वाला होता है.जीवनसाथी के सुख में बाधक होता है.धन भाव में इसकी दृष्टि होने से धन की हानि और आर्थिक कष्ट होता है.रोग के कारण दाम्पत्य सुख का अभाव होता है.ज्योतिष विधान के अनुसार इस भाव में बैठा अमंलकारी मंगल शुभ ग्रहों को भी शुभत्व देने से रोकता है.इस भाव में मंगल अगर वृष, कन्या अथवा मकर राशि का होता है तो इसकी अशुभता में कुछ कमी आती है.मकर राशि का मंगल होने से यह संतान सम्बन्धी कष्ट देता है।
द्वादश भाव में मंगल (Mangal in Twelth Bhava) कुण्डली का द्वादश भाव शैय्या सुख, भोग, निद्रा, यात्रा और व्यय का स्थान होता है.इस भाव में मंगल की उपस्थिति से मंगली दोष लगता है.इस दोष के कारण पति पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम व सामंजस्य का अभाव होता है.धन की कमी के कारण पारिवारिक जीवन में परेशानियां आती हैं.व्यक्ति में काम की भावना प्रबल रहती है.अगर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष भी हो सकता है..
भावावेश में आकर जीवनसाथी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं.इनमें गुप्त रोग व रक्त सम्बन्धी दोष की भी संभावना रहती है.
जब दो कुंडली के मिलान में ग्रहों का माकूल साथ हो तो प्रेम भी होगा और प्रेम विवाह भी। ज्योतिष की मानें तो चंद्र और शुक्र का साथ किसी भी व्यक्ति को प्रेमी बना सकता है और यही ग्रह अगर विवाह के घर से संबंध रखते हों तो इस प्रेम की परिणति विवाह के रूप में तय है। ऐसा नहीं कि प्रारब्ध को मानने से कर्म की महत्ता कम हो जाती है लेकिन इतना तय है कि ग्रहों का संयोग आपके जीवन में विरह और मिलन का योग रचता है। किसी भी व्यक्ति के प्रेम करने के पीछे ज्योतिषीय कारण भी होते हैं। कुंडली में शुक्र और चंद्र की प्रबलता है तो किसी भी जातक का प्रेम में पड़ना स्वाभाविक है। कुंडली में पाँचवाँ घर प्रेम का होता है और सातवाँ घर दाम्पत्य का माना जाता है। लग्न, पंचम, सप्तम या एकादश भाव में शुक्र का संबंध होने से प्रेम होता है। जब पाँचवें और सातवें घर में संबंध बनता है तो प्रेम विवाह में तब्दील हो जाता है।शुक्र या चंद्र के अलावा वृषभ, तुला और कर्क राशि के जातक भी प्रेम करते हैं। शुक्र और चंद्र प्रेम विवाह करवाते हैं तो सूर्य की मौजूदगी संबंधों में विच्छेद का कारण भी बनती है। सूर्य और शुक्र या शनि का आपसी संबंध जोड़े को अलग करने में मुख्य भूमिका निभाता है। सप्तम भाव का संबंध यदि सूर्य से हो जाए तो भी युवा प्रेमी युगल का नाता लंबे समय तक नहीं चलता। इनकी युति तलाक तक ले जाती है। अब आँखें चार हों तो कुंडली देख लें, संभव है शुक्र और चंद्र का साथ आपको प्रेमी बना रहा हो।
प्राय: सभी माता-पिता यह चाहते हैं कि उनकी बेटी या बेटे की शादी होने के बाद उनका जीवन सुखमय और सौहार्दपूर्ण रहे। दोनों में वैचारिक मतभेद नहीं हों और वे तरक्की करें। लेकिन शादी होने के बाद यदि पति-पत्नी के बीच क्लेश और विवाद होने लगें और नौबत तलाक तक आ जाए, तो यह विचारणीय विषय है।
विवाह के बाद यदि दांपत्य सुख न मिले या पति-पत्नी के बीच मतभेद जीवनपर्यन्त चलते रहें, आपसी सामंजस का अभाव हो, तो इसका ज्योतिषीय कारण कुंडली में कुछ बाधक योगों का होना हो सकता है। क्योंकि बाधक योग होने पर ही पति-पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद होते हैं और उनमें एक-दूसरे के प्रति भावनात्मक लगाव कम होने लगता है। यदि ऎसी स्थिति किसी के साथ हो तो भयभीत नहीं हों, इन बाधक योगों के उपचार कर लेने से प्रतिकूल प्रभावों में कमी आती है। दांपत्य सुख में बाधक योग कौन से संभव हैं और उनका परिहार ज्योतिष में क्या बताया गया है इसे समझें।
विवाह भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण संस्कार है। कहते हैं कि जोड़ियां संयोग से बनती हैं जो कि परमात्मा द्वारा पहले से ही तय होती हैं। यह भी सत्य है कि अच्छी पत्नी व अच्छी सन्तान भाग्य से ही मिलती है। पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार ही जीवन साथी मिलता है, यदि सुकर्म अधिक हैं तो वैवाहिक जीवन सुखमय और कुकर्म अधिक हैं तो वैवाहिक जीवन दुखमय होता है।
जन्मकुंडली में विवाह का विचार सातवें भाव से होता है। इस भाव से पति एवं पत्नी, काम (भोग विलास), विवाह से पूर्व एवं पश्चात यौन संबंध, साझेदारी आदि का विचार मुख्य रूप से किया जाता है।
फलित ज्योतिष में योग की महत्ता—
सप्तम यानी केन्द्र स्थान विवाह और जीवनसाथी का घर होता है. इस घर पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर या तो विवाह विलम्ब से होता है या फिर विवाह के पश्चात वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य की कमी रहती है.
जिनकी कुण्डली में ग्रह स्थिति कमज़ोर हो और मंगल एवं शुक्र एक साथ बैठे हों उनके वैवाहिक जीवन में अशांति और परेशानी बनी रहती है. ग्रहों के इस योग के कारण पति पत्नी में अनबन रहती है.
शनि और राहु का सप्तम भाव होना भी वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है क्योंकि दोनों ही पाप ग्रह दूसरे विवाह की संभावना पैदा करते हैं.
राहु, सूर्य, शनि व द्वादशेश पृथकतावादी ग्रह हैं, जो सप्तम (दाम्पत्य)और द्वितीय (कुटुंब) भावों पर विपरीत प्रभाव डालकर वैवाहिक जीवन को नारकीय बना देते हैं। दृष्टि या युति संबंध से जितना ही विपरीत या शुभ प्रभाव होगा उसी के अनुरूप वैवाहिक जीवन सुखमय या दुखमय होगा।
राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है।
चन्द्रमा मन का कारक है,और वह जब बलवान होकर सप्तम भाव या सप्तमेश से सम्बन्ध रखता हो तो चौबीसवें साल तक विवाह करवा ही देता है।
अष्टकूट मिलान(वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी) आवश्यक है और ठीक न हो तो भी वैचारिक मतभेद रहता है।
जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में चन्द्र, बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित होता है, उसे धनवान पति प्राप्त होता है।
जब सप्तमेश एकादश भाव में उपस्थित हो तो जातक की पत्नी रूपवती, संस्कारयुक्त, मृदुभाषी व सुंदर होती है तथा विवाह के पश्चात जातक की आर्थिक आय में वृद्धि होती है या पत्नी के माध्यम से भी उसे आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं।
क्यों हे आजकल मेलापक की जरुरत/आवश्यकता—विवाह योग्य वर वधु का भली-भांति विचार कर इन दोनों का मेलापक मिलान करना चाहिए| दम्पति की प्रकृति, मनोवृति एंव अभिरुचि तथा स्वाभावगत अन्य विशेषताओं में कितनी समानता है| यह हम नक्षत्र मेलापक से जान सकते है प्रणय या दांम्पत्य संबधों के लिए वर वधु का मेलापक अनिवार्य रूप से विचारणीय है|
कुछ लोग यह कह सकते है कि ज्योतिषियों द्धारा मेलापक के बाद किए गये विवाह भी बहुधा असफल होते देखें गये है| अनेक दांम्पत्यो में वैचारिक मतभेद या वैमनस्य रहता है| अनेक युगल गृह-क्लेश से परेशान होकर तलाक ले लेते है तथा अनेक लोग धनहीन, सन्तानहीन या प्रेमहीन होकर बुझे मन से गाड़ी ढकेलते देखें जाते है| मेलापक का विचार करने के बाद विवाह करना सुखमय दांमपत्य जीवन की क्या गारंटी है| यह कैसे कहां जा सकता है इस प्रकार की शंकाएं अनेकलोगों के मन में रहती है ज्योतिषी द्धारा मेलापक मिलवाने के बाद विवाह करने पर भी काफी लोगों का दांमपत्य जीवन आज सुखमय नहीं है इसके कुछ कारण है |
1 बिना जन्मपत्री मिलाएं विवाह करना 2 नकली जन्मपत्री बनवाकर मिलान करवाना 3 प्रचलित नाम से मिलान करवाना 4 जन्मकुंडली का ठीक न होना 5 जिस किसी व्यक्ति से जन्मपत्रियों का मिलान का निणर्य करा लेना|
जिस किसी से मिलवान करा लेना आज ज्योतिष कुछ ऐसे लोगों के हाथों में फंस गया है जिनको ज्योतिष शास्त्र की यथार्थ जानकारी तो क्या प्रारंभिक बातें भी ठीक-ठीक रूप से पता नहीं है ज्योतिष शास्त्र से अनभिज्ञ ज्योतिषीयो की संख्या हमारे देश में ज्यादा है यधपि तो पांच प्रतिशत व्यक्ति ज्योतिष शास्त्र के अधिकारी विदा्न भी है किन्तु मेलापक का कार्य करने वाले लोगों में अधिकांश लोग इस शास्त्र की पुरी जानकारी नही रखते| जो लोग इस शास्त्र के अच्छे ज्ञाता या विद्वान है सामान्य लोग उनके पास पहुंच नहीं पाते तथा ये विद्वान अपने स्तर से उतर कर कार्य नहीं करते| इन्ही कारणों से मेलापक का कार्य अनेक नीम-हकीम ज्योतिषीयो द्दारा हो जाता है|
कुडंलीयो का मेलापक करना या विधी मिलाना एक जिम्मेदारीपूर्ण कार्य है| जिसमें सुझबुझ की आवश्यकता है| बोलते नाम से नक्षत्र व राशियां ज्ञात कर उनके आधार पर रेडीमेड मेलापक सारणी से गुण संख्या निकाल लेते है यदि 18 से गुण कम हो तो विवाह को अस्वीकृत कर देते है| यदि 18 से ज्यादा गुण हो तो विवाह की स्वीकृति दे देते है यदि जन्मपत्री उपलब्ध हो तो यह देखते हैं कि वर कि कुडंली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्धादश, में मंगल तो नहीं है| अगर मंगल इन्ही भावों में हो तो कन्या की कुडंली में इन्ही भावों में मंगल ढुढते है| यदि कन्या कि कुडंली में इन्ही भावो में मंगल मिला तो गुण-दोष का परिहार बता देते है|
मंगल की बजाय यदि इन्ही भावों में से किसी में शनि, राहु, केतु, या सूर्य मिल जाय तो भी गुण दोष का परिहार बताकर जन्मपत्रियों के मिल जाने की घोषणा 5-10 मिनटों में ही कर देते है| मेलापक करना एक उत्तरदायित्य पूर्ण कार्य है इसे नामधारी ज्योतिषी दो अपरिचित व्यक्तीयो के भावी भाग्य एवं दामपत्य जीवन का फैसला कर देता है यह कैसी विडम्बना है कि आज हर एक पण्डित, करमकाण्डी, कथावाचक, पुजारी, साधु एवं सन्यासी स्वयं को ज्योतिषी बतलाने में लगा हुआ है| इससे भी दुभाग्य की बात यह है कि जनता ऐसे तथाकथित ज्योतिषीयों के पास अपने भाग्य का निणर्य कराने, मुहूर्त और मेलापक पूछने जाती है तथा ये नामधारी ज्योतिषी लोगों के भाग्य का फैसला चुटकियाँ बजाते-बजाते कर देते है| यही कारण है कि इन लोगों से मेलापक मिलवाने के बाद ही वैवाहिक जीवन सुखमय न होने के असंख्य उदाहरण सामने आते है|
मै यह नहीं कहता कि पण्डित, करमकाण्डी, कथावाचन या पुजारियों में सभी लोग ज्योतिष से अनभिज्ञ होते है इनमें भी कुछ लोग ज्योतिष शास्त्र के अच्छे ज्ञात होते है परन्तु इनकी संख्या प्रतिशत की दष्टि काफी कम है| ज्योतिष को न जानने वाले लोगो की संख्या सवाधिक है|
मेरी राय में मेलापक का विचार ज्योतिष शास्त्र के अच्छे विद्वान से कराना चाहिए| उन्हें विचार करने के लिए भी पुरा अवसर देना चाहिए| मेलापक विचार कोई बच्चों का खेल नहीं है यह एक गूढ़ विषय है, जिसका सावधानी पूवर्क विचार करना चाहिए तथा नक्षत्र मेलापक के साथ-साथ लड़के की कुडंली से स्वास्थ्य, शिक्षा, भाग्य, आयु, चरित्र एवं संतान क्षमता का विचार अवश्य है| कन्या की कुडंली से स्वा स्वास्थ्य, स्वभाव, भाग्य, आयु, चरित्र एवं प्रजनन क्षमता का विचार कर लेना चाहिए|
बाधक योग—–
जन्म कुंडली में 6, 8, 12 स्थानों को अशुभ माना जाता है। मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य को क्रूर ग्रह माना है। इनके अशुभ स्थिति में होने पर दांपत्य सुख में कमी आती है।
-सप्तमाधिपति द्वादश भाव में हो और राहू लग्न में हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा होना संभव है।
-सप्तम भावस्थ राहू युक्त द्वादशाधिपति से वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है। द्वादशस्थ सप्तमाधिपति और सप्तमस्थ द्वादशाधिपति से यदि राहू की युति हो तो दांपत्य सुख में कमी के साथ ही अलगाव भी उत्पन्न हो सकता है।
-लग्न में स्थित शनि-राहू भी दांपत्य सुख में कमी करते हैं।
-सप्तमेश छठे, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है।
-षष्ठेश का संबंध यदि द्वितीय, सप्तम भाव, द्वितीयाधिपति, सप्तमाधिपति अथवा शुक्र से हो, तो दांपत्य जीवन का आनंद बाधित होता है।
-छठा भाव न्यायालय का भाव भी है। सप्तमेश षष्ठेश के साथ छठे भाव में हो या षष्ठेश, सप्तमेश या शुक्र की युति हो, तो पति-पत्नी में न्यायिक संघर्ष होना भी संभव है।
-यदि विवाह से पूर्व कुंडली मिलान करके उपरोक्त दोषों का निवारण करने के बाद ही विवाह किया गया हो, तो दांपत्य सुख में कमी नहीं होती है। किसी की कुंडली में कौन सा ग्रह दांपत्य सुख में कमी ला रहा है। इसके लिए किसी विशेषज्ञ की सलाह लें।
विवाह योग के लिये जो कारक मुख्य है वे इस प्रकार हैं-
सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है।
सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है।
कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है।
यदि सप्तम भाव में सम राशि है।
सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है।
सप्तमेश बली है।
सप्तम में कोई ग्रह नही है।
किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है।
दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है।
सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है।
विवाह नही होगा अगर—–
सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है।
सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है।
सप्तमेश नीच राशि में है।
सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है।
चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों।
शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों।
शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों।
शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो।
शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों।
पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों।
सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो।
विवाह में देरी—–
सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।
चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।
सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।
चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है।
सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।
सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।
लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान नही होती है।
महिला की कुन्डली में सप्तमेश या सप्तम शनि से पीडित हो तो विवाह देर से होता है।
राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है।
विवाह का समय—–
सप्तम या सप्तम से सम्बन्ध रखने वाले ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
कन्या की कुन्डली में शुक्र से सप्तम और पुरुष की कुन्डली में गुरु से सप्तम की दशा में या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
सप्तमेश की महादशा में पुरुष के प्रति शुक्र या चन्द्र की अन्तर्दशा में और स्त्री के प्रति गुरु या मंगल की अन्तर्दशा में विवाह होता है।
सप्तमेश जिस राशि में हो,उस राशि के स्वामी के त्रिकोण में गुरु के आने पर विवाह होता है।
गुरु गोचर से सप्तम में या लगन में या चन्द्र राशि में या चन्द्र राशि के सप्तम में आये तो विवाह होता है।
गुरु का गोचर जब सप्तमेश और लगनेश की स्पष्ट राशि के जोड में आये तो विवाह होता है।
सप्तमेश जब गोचर से शुक्र की राशि में आये और गुरु से सम्बन्ध बना ले तो विवाह या शारीरिक सम्बन्ध बनता है।
सप्तमेश और गुरु का त्रिकोणात्मक सम्पर्क गोचर से शादी करवा देता है,या प्यार प्रेम चालू हो जाता है।
चन्द्रमा मन का कारक है,और वह जब बलवान होकर सप्तम भाव या सप्तमेश से सम्बन्ध रखता हो तो चौबीसवें साल तक विवाह करवा ही देता है।
तलाक/विवाह विच्छेद के प्रमुख करक—
राहु तथा केतु गृह–
ज्योतिष शास्त्रानुसार राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। राहु या केतु जिस भाव में बैठते हैं, उस भाव के स्वामी के समान बन जाते हैं तथा जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उस ग्रह के गुण ग्रहण कर लेते हैं। राहु, शनि के अनुरू प विच्छोदात्मक ग्रह हैं। अत: ये जिस भाव में होता है संबंधित भाव में विच्छेद कर देता है। उदाहरण के लिए ये चौथे भाव में होने पर माता से विच्छेद, पांचवें भाव में होने पर पुत्र से, सप्तम में होने पर पत्नी से, दसवें भाव में होने पर पिता से विच्छेद करा देता है। केतु ग्रह जिस ग्रह के साथ बैठता है उसके प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है।
ऋषि पराशर मत में राहु की उच्च राशि वृषभ तथा केतु की उच्च राशि वृश्चिक मानी गई है। अन्य ज्योतिषियों ने राहु की उच्च राशि मिथुन तथा केतु की उच्च राशि धनु मानी है। वर्तमान में यही मत प्रभावी है। अत: ये दोनों ग्रह अपना शुभाशुभ फल किसी अन्य ग्रह के सहयोग से दे पाते हैं। तीसरे, छठे, दसवें भाव का कारक ग्रह राहु है। दूसरे तथा आठवें भाव का कारक ग्रह केतु है। राहु-केतु से निर्मित विशिष्ट अशुभ योग- [1] जब चंद्र, सूर्य ग्रह राहु के संसर्ग में आते हैं, तो कुंडली में ग्रहण योग निर्मित होता है। जो कि एक अशुभ योग है।
[2] राहु और केतु के मध्य सभी ग्रह आ जाने पर कुंडली में कालसर्प योग निर्मित होता है।
सावधानी: इस योग के अध्ययन में ध्यान रखना चाहिए कि राहु मुख का कारक है। जब ग्रह केतु से राहु की ओर अग्रसर होते हैं, तो उस स्थिति में सभी ग्रहों का ग्रहण काल की ओर अग्रसर होना कहलाता है। वे ग्रह राहु के मुख में जाकर पीडि़त होते हैं। [यह एक अशुभ योग है]।
जब ग्रह राहु से केतु के मध्य होते हैं, तो उस स्थिति को ग्रहण से मुक्ति की स्थिति कहते हैं। क्योंकि सभी ग्रह राहु के मुख से बाहर की ओर अग्रसर होते हैं। अगर कुंडली में ये योग पाए जाते हैं, तो भी डरने की आवश्यकता नहीं है।
मंगल का सप्तम में प्रभाव—
मंगल का सप्तम में होना पति या पत्नी के लिये हानिकारक माना जाता है,उसका कारण होता है कि पति या पत्नी के बीच की दूरिया केवल इसलिये हो जाती है क्योंकि पति या पत्नी के परिवार वाले जिसके अन्दर माता या पिता को यह मंगल जलन या गुस्सा देता है,जब भी कोई बात बनती है तो पति या पत्नी के लिये सोचने लायक हो जाती है,और अक्सर पारिवारिक मामलों के कारण रिस्ते खराब हो जाते है। पति की कुंडली में सप्तम भाव मे मंगल होने से पति का झुकाव अक्सर सेक्स के मामलों में कई महिलाओं के साथ हो जाता है,और पति के कामों के अन्दर काम भी उसी प्रकार के होते है जिनसे पति को महिलाओं के सानिध्य मे आना पडता है। पति के अन्दर अधिक गर्मी के कारण किसी भी प्रकार की जाने वाली बात को धधकते हुये अंगारे की तरफ़ मारा जाता है,जिससे पत्नी का ह्रदय बातों को सुनकर विदीर्ण हो जाता है,अक्सर वह मानसिक बीमारी की शिकार हो जाती है,उससे न तो पति को छोडा जा सकता है और ना ही ग्रहण किया जा सकता है,पति की माता और पिता को अधिक परेशानी हो जाती है,माता के अन्दर कितनी ही बुराइयां पत्नी के अन्दर दिखाई देने लगती है,वह बात बात में पत्नी को ताने मारने लगती है,और घर के अन्दर इतना क्लेश बढ जाता है कि पिता के लिये असहनीय हो जाता है,या तो पिता ही घर छोड कर चला जाता है,अथवा वह कोर्ट केश आदि में चला जाता है,इस प्रकार की बातों के कारण पत्नी के परिवार वाले सम्पूर्ण जिन्दगी के लिये पत्नी को अपने साथ ले जाते है। पति की दूसरी शादी होती है,और दूसरी शादी का सम्बन्ध अक्सर कुंडली के दूसरे भाव से सातवें और ग्यारहवें भाव से होने के कारण दूसरी पत्नी का परिवार पति के लिये चुनौती भरा हो जाता है,और पति के लिये दूसरी पत्नी के द्वारा उसके द्वारा किये जाने वाले व्यवहार के कारण वह धीरे धीरे अपने कार्यों से अपने व्यवहार से पत्नी से दूरियां बनाना शुरु कर देता है,और एक दिन ऐसा आता है कि दूसरी पत्नी पति पर उसी तरह से शासन करने लगती है जिस प्रकार से एक नौकर से मालिक व्यवहार करता है,जब भी कोई बात होती है तो पत्नी अपने बच्चों के द्वारा पति को प्रताणित करवाती है,पति को मजबूरी से मंगल की उम्र निकल जाने के कारण सब कुछ सुनना पडता है।
मंगली दोष के उपाय—-
लगन दूसरे भाव चतुर्थ भाव सप्तम भाव और बारहवें भाव के मंगल के लिये वैदिक उपाय बताये गये है,सबसे पहला उपाय तो मंगली जातक के साथ मंगली जातक की ही शादी करनी चाहिये। लेकिन एक जातक मंगली और उपरोक्त कारण अगर मिलते है तो दूसरे मे देखना चाहिये कि मंगल को शनि के द्वारा कहीं द्रिष्टि तो नही दी गयी है,कारण शनि ठंडा ग्रह है और जातक के मंगल को शांत रखने के लिये काफ़ी हद तक अपना कार्य करता है,दूसरे पति की कुंडली में मंगल असरकारक है और पत्नी की कुंडली में मंगल असरकारक नहीं है तो शादी नही करनी चाहिये। वैसे मंगली पति और पत्नी को शादी के बाद लालवस्त्र पहिन कर तांबे के लोटे में चावल भरने के बाद लोटे पर सफ़ेद चन्दन को पोत कर एक लाल फ़ूल और एक रुपया लोटे पर रखकर पास के किसी हनुमान मन्दिर में रख कर आना चाहिये। चान्दी की चौकोर डिब्बी में शहद भरकर रखने से भी मंगल का असर कम हो जाता है,घर में आने वाले महिमानों को मिठाई खिलाने से भी मंगल का असर कम रहता है,मंगल शनि और चन्द्र को मिलाकर दान करने से भी फ़ायदा मिलता है,मंगल से मीठी शनि से चाय और चन्द्र से दूध से बनी पिलानी चाहिये।
सातवें भाव का अर्थ—-
जन्म कुन्डली का सातंवा भाव विवाह पत्नी ससुराल प्रेम भागीदारी और गुप्त व्यापार के लिये माना जाता है। सातवां भाव अगर पापग्रहों द्वारा देखा जाता है,उसमें अशुभ राशि या योग होता है,तो स्त्री का पति चरित्रहीन होता है,स्त्री जातक की कुंडली के सातवें भाव में पापग्रह विराजमान है,और कोई शुभ ग्रह उसे नही देख रहा है,तो ऐसी स्त्री पति की मृत्यु का कारण बनती है,परंतु ऐसी कुंडली के द्वितीय भाव में शुभ बैठे हों तो पहले स्त्री की मौत होती है,सूर्य और चन्द्रमा की आपस की द्रिष्टि अगर शुभ होती है तो पति पत्नी की आपस की सामजस्य अच्छी बनती है,और अगर सूर्य चन्द्रमा की आपस की १५० डिग्री,१८० डिग्री या ७२ डिग्री के आसपास की युति होती है तो कभी भी किसी भी समय तलाक या अलगाव हो सकता है।केतु और मंगल का सम्बन्ध किसी प्रकार से आपसी युति बना ले तो वैवाहिक जीवन आदर्शहीन होगा,ऐसा जातक कभी भी बलात्कार का शिकार हो सकता है,स्त्री की कुंडली में सूर्य सातवें स्थान पर पाया जाना ठीक नही होता है,ऐसा योग वैवाहिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है,केवल गुण मिला देने से या मंगलीक वाली बातों को बताने से इन बातों का फ़ल सही नही मिलता है,इसके लिये कुंडली के सातंवे भाव का योगायोग देखना भी जरूरी होता है।
सातवां भाव और पति पत्नी—-
सातवें भाव को लेकर पुरुष जातक के योगायोग अलग बनते है,स्त्री जातक के योगायोग अलग बनते है,विवाह करने के लिये सबसे पहले शुक्र पुरुष कुंडली के लिए और मंगल स्त्री की कुन्डली के लिये देखना जरूरी होता है,लेकिन इन सबके बाद चन्द्रमा को देखना भी जरूरी होता है,मनस्य जायते चन्द्रमा,के अनुसार चन्द्रमा की स्थिति के बिना मन की स्थिति नही बन पाता है। पुरुष कुंडली में शुक्र के अनुसार पत्नी और स्त्री कुंडली में मंगल के अनुसार पति का स्वभाव सामने आ जाता है।
स्त्री कुन्डली में ग्रह-फ़ल—
House Sun Moon Mars Mercury Jupiter Venus Saturn Rahu Ketu
1st क्रोधी अल्पायु विधवा भाग्यवान परिव्रता सुखी बांझ नि:संतान दुखी
2nd गरीब धनी नि:संतान धनी धनी भाग्यवान दुखी गरीब कपटी चिंतित
3rd संतान अच्छी सुखी भाई नही संतान सहित अच्छे भाई धनी होशियार धनी रोगी
4th रोगी दुर्भागिन दुखी अच्छे घरवाली सुखी सुखी करुणावाली रोगी माता को कष्ट
5th पुत्र से दुखी अच्छी संतान नि:संतान समझदार कलाकुशल बहुसंतान नि:संतान नि:संतान संतान से दुख
6th सुखी रोगी स्वस्थ क्रोधी संकटवाली गरीब शिल्पी धनी धनी
7th दुखी पतिप्रिया विधवा पतिव्रता इज्जतदार पतिप्रिया विधवा दुखी पति से दुखी
8th विधवा दुखी चरित्रहीन कृतघ्न रोगी दुखी दुखी पति से दुखी दुखी
9th धार्मिक बेकार संतान शुभकार्य शिष्ट धनी आचारहीन दुष्कर्मा दुष्कर्मा चिन्तित
10th उच्चाभिलाषी धार्मिक बेकार संतान शुभकार्य सुशील धनी आचारहीन दुष्कर्मा आचारहीन
11th धनी कलाकुशल धनी पतिव्रता शिष्ट संतान अतिधनी शिष्ट संतान स्वस्थ भाग्यवान
12th क्रोधी अपंग पापिनी वैरागिन शुभव्यय शुभकार्य मूर्ख मक्कार बीमार
पुरुष कुण्डली में ग्रह फ़ल—-
भाव सूर्य चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु
1st बहादुर सुखी घायल सुखी विद्वान सुखी दुखी बीमार अय्याश
2nd गरीब धनी ऋणी विद्वान धनी धनी निर्धन निर्धन पापी
3rd स्वस्थ सराहनीय साहसी विजयी पापी पापी साहसी साहसी बहादुर
4th दुखी सुखी दुखी सुखी सुखी सुखी दुखी घर में अशुभ दुखी
5th कम संतान बहुसंतान नि:संतान निकम्मी संतान प्रतापी बुद्धिमान संतान से कष्ट कुबुद्धि निर्बुद्धि
6th विजयी अल्पायु विजयी बीमार अय्याश रोगी विजयी बहादुर शक्तिवान
7th कुलटा स्त्री सुभार्या पत्नी से कष्ट धर्मात्मा सुभार्या अय्याश कुलटा स्त्री रोगी पत्नी कुभार्या
8th अल्पायु रोगी शरारती कलाकुशल अल्पायु आचारहीन नेत्ररोगी रोगी कलहकर्ता
9th अधर्मी धर्मी आचारहीन सुखी धर्मी तपस्वी अधर्मी वक्ता कुलपालक
10th बहादुर पितृहीन कटुवक्ता राजपुरुष अधर्मी स्त्रीपालक गरीब इज्जतदार पिता को कष्ट
11th धनी धनी धनी धनी धनी बुद्धिमान धनी विख्यात धनी
12th मूडी कामी कुभार्या गरीब कपटी रोगी दुखी कुजाति दु:स्वभाव
कुण्डली में प्रेम विवाह—-
ज्योतिषशास्त्र में “शुक्र ग्रह” को प्रेम का कारक माना गया है । कुण्डली में लग्न, पंचम, सप्तम तथा एकादश भावों से शुक्र का सम्बन्ध होने पर व्यक्ति में प्रेमी स्वभाव का होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पंचम भाव प्रेम का भाव होता है और सप्तम भाव विवाह का। पंचम भाव का सम्बन्ध जब सप्तम भाव से होता है तब दो प्रेमी वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं। नवम भाव से पंचम का शुभ सम्बन्ध होने पर भी दो प्रेमी पति पत्नी बनकर दाम्पत्य जीवन का सुख प्राप्त करते हैं।
पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है । शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है।
शुक्र अगर लग्न स्थान में स्थित है और चन्द्र कुण्डली में शुक्र पंचम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह संभव होता है। अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है और नवमांश कुण्डली में सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तो प्रेम विवाह की संभावना 100 प्रतिशत बनती है। शुक्र ग्रह लग्न में मौजूद हो और साथ में लग्नेश हो तो प्रेम विवाह निश्चित समझना चाहिए । शनि और केतु पाप ग्रह कहे जाते हैं लेकिन सप्तम भाव में इनकी युति प्रेमियों के लिए शुभ संकेत होता है। राहु अगर लग्न में स्थित है तोनवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में से किसी में भी सप्तमेश तथा पंचमेश का किसी प्रकार दृष्टि या युति सम्बन्ध होने पर प्रेम विवाह होता है। लग्न भाव में लग्नेश हो साथ में चन्द्रमा की युति हो अथवा सप्तम भाव में सप्तमेश के साथ चन्द्रमा की युति हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है। सप्तम भाव का स्वामी अगर अपने घर में है तब स्वगृही सप्तमेश प्रेम विवाह करवाता है। एकादश भाव पापी ग्रहों के प्रभाव में होता है तब प्रेमियों का मिलन नहीं होता है और पापी ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्त है तो व्यक्ति अपने प्रेमी के साथ सात फेरे लेता है। प्रेम विवाह के लिए सप्तमेश व एकादशेश में परिवर्तन योग के साथ मंगल नवम या त्रिकोण में हो या फिर द्वादशेश तथा पंचमेश के मध्य राशि परिवर्तन हो तब भी शुभ और अनुकूल परिणाम मिलता है।
क्या उपाय करें–
आज दांपत्य जीवन की सबसे बड़ी समस्या हैं पति-पत्नी के बीच छोटे-छोटे विवाद। कभी-कभी यही छोटे-छोटे विवाद तलाक का कारण बनते हैं। तलाक के कारण क्या-क्या हैं? ऐसा क्यों होता है? क्यों कुछ दंपत्ति अपना दांपत्य जीवन का निर्वाह ठीक ढंग से कर नहीं पाते? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसका कारण जन्म पत्रिका का सप्तम स्थान होता है। कुण्डली के इस स्थान में यदि सूर्य, गुरु, राहु, मंगल, शनि जैसे ग्रह हो या इस स्थान पर इनकी दृष्टि हो तो जातक का वैवाहिक जीवन परेशानियों से भरा होता है। सप्तम स्थान पर सूर्य का होना निश्चित ही तलाक का कारण है। गुरु के सप्तम होने पर विवाह तीस वर्ष की आयु के पश्चात करना उत्तम होता है। इसके पहले विवाह करने पर विवाह विच्छेद होता हैं या तलाक का भय बना रहता है। मंगल तथा शनि सप्तम होने पर पति-पत्नी के मध्य अवांछित विवाद होते हैं। राहु सप्तम होने पर जीवन साथी व्यभिचारी होता है। इस कारण उनके मध्य विवाद उत्पन्न होते हैं, जिनसे तलाक होने की संभावना बढ़ जाती है।एक परिवार में पति-पत्नी में अथाह प्रेम है। दोनों एक दूसरे के लिए पूर्ण समर्पित हैं। आपस में एक दूसरे का सम्मान करते हैं। अचानक उनमें कटुता व तनाव उत्पन्न हो जाता है। जो पति-पत्नी कल तक एक दूसरे के लिए पूर्ण सम्मान रखते थे, आज उनमें झगड़ा हो गया है। स्थिति तलाक की आ गई है। आखिर ऐसा क्यों हुआ?
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घर-परिवार में बाधा के लक्षण—-
परिवार में अशांति और कलह।
बनते काम का ऐन वक्त पर बिगड़ना।
आर्थिक परेशानियां।
योग्य और होनहार बच्चों के रिश्तों में अनावश्यक अड़चन।
विषय विशेष पर परिवार के सदस्यों का एकमत न होकर अन्य मुद्दों पर कुतर्क करके आपस में कलह कर विषय से भटक जाना।
परिवार का कोई न कोई सदस्य शारीरिक दर्द, अवसाद, चिड़चिड़ेपन एवं निराशा का शिकार रहता हो।
घर के मुख्य द्वार पर अनावश्यक गंदगी रहना।
इष्ट की अगरबत्तियां बीच में ही बुझ जाना।
भरपूर घी, तेल, बत्ती रहने के बाद भी इष्ट का दीपक बुझना या खंडित होना।
पूजा या खाने के समय घर में कलह की स्थिति बनना।
व्यक्ति विशेष का बंधन—
हर कार्य में विफलता।
हर कदम पर अपमान।
दिल और दिमाग का काम नहीं करना।
घर में रहे तो बाहर की और बाहर रहे तो घर की सोचना।
शरीर में दर्द होना और दर्द खत्म होने के बाद गला सूखना।
इष्ट पर आस्था और विश्वास रखें।
हमें मानना होगा कि भगवान दयालु है। हम सोते हैं पर हमारा भगवान जागता रहता है। वह हमारी रक्षा करता है। जाग्रत अवस्था में तो वह उपर्युक्त लक्षणों द्वारा हमें बाधाओं आदि का ज्ञान करवाता ही है, निद्रावस्था में भी स्वप्न के माध्यम से संकेत प्रदान कर हमारी मदद करता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम होश व मानसिक संतुलन बनाए रखें। हम किसी भी प्रतिकूल स्थिति में अपने विवेक व अपने इष्ट की आस्था को न खोएं, क्योंकि विवेक से बड़ा कोई साथी और भगवान से बड़ा कोई मददगार नहीं है। इन बाधाओं के निवारण हेतु हम निम्नांकित उपाय कर सकते हैं।
उपाय : पूजा एवं भोजन के समय कलह की स्थिति बनने पर घर के पूजा स्थल की नियमित सफाई करें और मंदिर में नियमित दीप जलाकर पूजा करें। एक मुट्ठी नमक पूजा स्थल से वार कर बाहर फेंकें, पूजा नियमित होनी चाहिए।
स्वयं की साधना पर ज्यादा ध्यान दें।
गलतियों के लिये इष्ट से क्षमा मांगें।
इष्ट को जल अर्पित करके घर में उसका नित्य छिड़काव करें।
जिस पानी से घर में पोछा लगता है, उसमें थोड़ा नमक डालें।
कार्य क्षेत्र पर नित्य शाम को नमक छिड़क कर प्रातः झाडू से साफ करें।
घर और कार्यक्षेत्र के मुख्य द्वार को साफ रखें।
हिंदू धर्मावलंबी हैं, तो गुग्गुल की और मुस्लिम धर्मावलम्बी हैं, तो लोबान की धूप दें।
व्यक्तिगत बाधा निवारण के लिए उपाय —-
व्यक्तिगत बाधा के लिए एक मुट्ठी पिसा हुआ नमक लेकर शाम को अपने सिर के ऊपर से तीन बार उतार लें औरउसे दरवाजे के बाहर फेंकें। ऐसा तीन दिन लगातार करें। यदि आराम न मिले तो नमक को सिर के ऊपर वार कर शौचालय में डालकर फ्लश चला दें। निश्चित रूप से लाभ मिलेगा।
हमारी या हमारे परिवार के किसी भी सदस्य की ग्रह स्थिति थोड़ी सी भी अनुकूल होगी तो हमें निश्चय ही इन उपायों से भरपूर लाभ मिलेगा।
अपने पूर्वजों की नियमित पूजा करें। प्रति माह अमावस्या को प्रातःकाल ५ गायों को फल खिलाएं।
गृह बाधा की शांति के लिए पश्चिमाभिमुख होकर क्क नमः शिवाय मंत्र का २१ बार या २१ माला श्रद्धापूर्वक जप करें।
यदि बीमारी का पता नहीं चल पा रहा हो और व्यक्ति स्वस्थ भी नहीं हो पा रहा हो, तो सात प्रकार के अनाज एक-एक मुट्ठी लेकर पानी में उबाल कर छान लें। छने व उबले अनाज (बाकले) में एक तोला सिंदूर की पुड़िया और ५० ग्राम तिल का तेल डाल कर कीकर (देसी बबूल) की जड़ में डालें या किसी भी रविवार को दोपहर १२ बजे भैरव स्थल पर चढ़ा दें।
बदन दर्द हो, तो मंगलवार को हनुमान जी के चरणों में सिक्का चढ़ाकर उसमें लगी सिंदूर का तिलक करें।
पानी पीते समय यदि गिलास में पानी बच जाए, तो उसे अनादर के साथ फेंकें नहीं, गिलास में ही रहने दें। फेंकने से मानसिक अशांति होगी क्योंकि पानी चंद्रमा का कारक है।
शास्त्रों के अनुसार मनुष्य के जीवन के 16 महत्वपूर्ण संस्कार बताए गए हैं, इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार में से एक है विवाह संस्कार। सामान्यत: बहुत कम लोगों को छोड़कर सभी लोगों का विवाह अवश्य ही होता है। शादी के बाद सामान्य वाद-विवाद तो आम बात है लेकिन कई बार छोटे झगड़े भी तलाक तक पहुंच जाते हैं। इस प्रकार की परिस्थितियों को दूर रखने के लिए ज्योतिषियों और घर के बुजूर्गों द्वारा एक उपाय बताया जाता है।
अक्सर परिवार से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए मां पार्वती की आराधना की बात कही जाती है। शास्त्रों के अनुसार परिवार से जुड़ी किसी भी प्रकार की समस्या के लिए मां पार्वती भक्ति सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। मां पार्वती की प्रसन्नता के साथ ही शिवजी, गणेशजी आदि सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है। अत: सभी प्रकार के ग्रह दोष भी समाप्त हो जाते हैं।
ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कुछ विशेष ग्रह दोषों के प्रभाव से वैवाहिक जीवन पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में उन ग्रहों के उचित ज्योतिषीय उपचार के साथ ही मां पार्वती को प्रतिदिन सिंदूर अर्पित करना चाहिए। सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। जो भी व्यक्ति नियमित रूप से देवी मां की पूजा करता है उसके जीवन में कभी भी पारिवारिक क्लेश, झगड़े, मानसिक तनाव की स्थिति निर्मित नहीं होती है।
– सप्तम स्थान में स्थित क्रूर ग्रह का उपाय कराएं।
– मंगल का दान करें ।
– गुरुवार का व्रत करें।
– माता पार्वती का पूजन करें।
– सोमवार का व्रत करें।
– प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाएं और पीपल की परिक्रमा करें।
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सौभाग्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्र—-
किसी भी श्रद्धा-विश्वास-युक्त स्त्री के द्वारा स्नानादि से शुद्ध होकर सूर्योदय से पहले नीचे लिखे मन्त्र की १० माला प्रतिदिन जप किये जाने से घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है तथा उसका सौभाग्य बना रहता है। किसी शुभ दिन जप का आरम्भ करना चाहिये तथा प्रतिवर्ष चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में विधिपूर्वक हवन करवा कर यथाशक्ति कुमारी, वटुक आदि को भोजनादि से संतुष्ट करना चाहिये। इस मन्त्र के हवन में समिधा केवल वट-वृक्ष की लेनी चाहिये।
मन्त्रः- ” ॐॐ ह्रीं ॐ क्रीं ह्रीं ॐ स्वाहा।”
साथ ही नीचे लिखे “सौभाग्याष्टित्तरशतनामस्तोत्र” का प्रतिदिन कम-से-कम एक पाठ करना चाहिये। इससे सौभाग्य की रक्षा होती है।
सौभाग्याष्टित्तरशतनामस्तोत्र—
निशम्यैतज्जामदग्न्यो माहात्म्यं सर्वतोऽधिकम्।
स्तोत्रस्य भूयः पप्रच्छ दत्तात्रेयं गुरुत्तमम्।।१
भगवंस्त्वन्मुखाम्भोजनिर्गमद्वाक्सुधारसम्।
पिबतः श्रोत्रमुखतो वर्धतेऽनुरक्षणं तृषा।।२
अष्टोत्तरशतं नाम्नां श्रीदेव्या यत्प्रसादतः।
कामः सम्प्राप्तवाँल्लोके सौभाग्यं सर्वमोहनम्।।३
सौभाग्यविद्यावर्णानामुद्धारो यत्र संस्थितः।
तत्समाचक्ष्व भगवन् कृपया मयि सेवके।।४
निशम्यैवं भार्गवोक्तिं दत्तात्रेयो दयानिधिः।
प्रोवाच भार्गवं रामं मधुराक्षरपूर्वकम्।।५
श्रृणु भार्गव यत्पृष्टं नाम्नामष्टोत्तरं शतम्।
श्रीविद्यावर्णरत्नानां निधानमिव संस्थितम्।।६
श्रीदेव्या बहुधा सन्ति नामानि श्रृणु भार्गव।
सहस्त्रशतसंख्यानि पुराणेष्वागमेषु च।।७
तेषु सारतरं ह्येतत् सौभाग्याष्टोत्तरात्मकम्।
यदुवाच शिवः पूर्वं भवान्यै बहुधार्थितः।।८
सौभाग्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रस्य भार्गव।
ऋषिरुक्तः शिवश्छन्दोऽनुष्टुप् श्रीललिताम्बिका।।९
देवता विन्यसेत् कूटत्रयेणावर्त्य सर्वतः।
ध्यात्वा सम्पूज्य मनसा स्तोत्रमेतदुदीरयेत्।।१०
।।अथ नाममन्त्राः।।
ॐ कामेश्वरी कामशक्तिः कामसौभाग्यदायिनी।
कामरुपा कामकला कामिनी कमलासना।।११
कमला कल्पनाहीना कमनीय कलावती।
कमलाभारतीसेव्या कल्पिताशेषसंसृतिः।।१२
अनुत्तरानघानन्ताद्भुतरुपानलोद्भवा।
अतिलोकचरित्रातिसुन्दर्यतिशुभप्रदा।।१३
अघहन्त्र्यतिविस्तारार्चनतुष्टामितप्रभा।
एकरुपैकवीरैकनाथैकान्तार्चनप्रिया।।१४
एकैकभावतुष्टैकरसैकान्तजनप्रिया।
एधमानप्रभावैधद्भक्तपातकनाशिनी।।१५
एलामोदमुखैनोऽद्रिशक्रायुधसमस्थितिः।
ईहाशून्येप्सितेशादिसेव्येशानवरांगना।।१६
ईश्वराज्ञापिकेकारभाव्येप्सितफलप्रदा।
ईशानेतिहरेक्षेषदरुणाक्षीश्वरेश्वरी।।१७
ललिता ललनारुपा लयहीना लसत्तनुः।
लयसर्वा लयक्षोणिर्लयकर्त्री लयात्मिका।।१८
लघिमा लघुमध्याढ्या ललमाना लघुद्रुता।
हयारुढा हतामित्रा हरकान्ता हरिस्तुता।।१९
हयग्रीवेष्टदा हालाप्रिया हर्षसमुद्धता।
हर्षणा हल्लकाभांगी हस्त्यन्तैश्वर्यदायिनी।।२०
हलहस्तार्चितपदा हविर्दानप्रसादिनी।
रामा रामार्चिता राज्ञी रम्या रवमयी रतिः।।२१
रक्षिणी रमणी राका रमणीमण्डलप्रिया।
रक्षिताखिललोकेशा रक्षोगणनिषूदिनी।।२२
अम्बान्तकारिण्यम्भोजप्रियान्तभयंकरी।
अम्बुरुपाम्बुजकराम्बुजजातवरप्रदा।।२३
अन्तःपूजाप्रियान्तःस्थरुपिण्यन्तर्वचोमयी।
अन्तकारातिवामांकस्थितान्तस्सुखरुपिणी।।२४
सर्वज्ञा सर्वगा सारा समा समसुखा सती।
संततिः संतता सोमा सर्वा सांख्या सनातनी ॐ।।२५
।।फलश्रुति।।
एतत् ते कथितं राम नाम्नामष्टोत्तरं शतम्।
अतिगोप्यमिदं नाम्नां सर्वतः सारमुद्धृतम्।।२६
एतस्य सदृशं स्तोत्रं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम्।
अप्रकाश्यमभक्तानां पुरतो देवताद्विषाम्।।२७
एतत् सदाशिवो नित्यं पठन्त्यन्ये हरादयः।
एतत्प्भावात् कंदर्पस्त्रैलोक्यं जयति क्षणात्।।२८
सौभाग्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं मनोहरम्।
यस्त्रिसंध्यं पठेन्नित्यं न तस्य भुवि दुर्लभम्।।२९
श्रीविद्योपासनवतामेतदावश्यकं मतम्।
सकृदेतत् प्रपठतां नान्यत् कर्म विलुप्यते।।३०
अपठित्वा स्तोत्रमिदं नित्यं नैमित्तिकं कृतम्।
व्यर्थीभवति नग्नेन कृतं कर्म यथा तथा।।३१
सहस्त्रनामपाठादावशक्तस्त्वेतदीरयेत्।
सहस्त्रनामपाठस्य फलं शतगुणं भवेत्।।३२
सहस्त्रधा पठित्वा तु वीक्षणान्नाशयेद्रिपून्।
करवीररक्तपुष्पैर्हुत्वा लोकान् वशं नयेत्।।३३
स्तम्भेत् पीतकुसुमैर्णीलैरुच्चाटयेद् रिपून्।
मरिचैर्विद्वेषणाय लवंगैर्व्याधिनाशने।।३४
सुवासिनीर्ब्राह्मणान् वा भोजयेद् यस्तु नामभिः।
यश्च पुष्पैः फलैर्वापि पूजयेत् प्रतिनामभिः।३५
चक्रराजेऽथवान्यत्र स वसेच्छ्रीपुरे चिरम्।
यः सदाऽऽवर्तयन्नास्ते नामाष्टशतमुत्तमम्।।३६
तस्य श्रीललिता राज्ञी प्रसन्ना वाञ्छितप्रदा।
एतत्ते कथितं राम श्रृणु त्वं प्रकृतं ब्रुवे।।३७
।।श्रीत्रिपुरारहस्ये श्रीसौभाग्याष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं।।
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शुभ ग्रह हमेशा शुभ नहीं होते(पति पत्नी में अलगाव के ज्योतिषीय कारण )—
ज्योतिषीय नियम है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल का ह्वास और शुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल की समृद्धि होती है। जैसे, मानसागरी में वर्णन है कि केन्द्र भावगत बृहस्पति हजारों दोषों का नाशक होता है। किन्तु, विडंबना यह है कि सप्तम भावगत बृहस्पति जैसा शुभ ग्रह जो स्त्रियों के सौभाग्य और विवाह का कारक है, वैवाहिक सुख के लिए दूषित सिद्ध हुआ हैं।
यद्यपि बृहस्पति बुद्धि, ज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण एक अति शुभ और पवित्र ग्रह है, मगर कुंडली में सप्तम भावगत बृहस्पति वैवाहिक जीवन के सुखों का हंता है। सप्तम भावगत बृहस्पति की दृष्टि लग्न पर होने से जातक सुन्दर, स्वस्थ, विद्वान, स्वाभिमानी और कर्मठ तथा अनेक प्रगतिशील गुणों से युक्त होता है, किन्तु ‘स्थान हानि करे जीवा’ उक्ति के अनुसार यह यौन उदासीनता के रूप में सप्तम भाव से संबन्धित सुखों की हानि करता है। प्राय: शनि को विलंबकारी माना जाता है, मगर स्त्रियों की कुंडली के सप्तम भावगत बृहस्पति से विवाह में विलंब ही नहीं होता, बल्कि विवाह की संभावना ही न्यून होती है।
यदि विवाह हो जाये तो पति-पत्नी को मानसिक और दैहिक सुख का ऐसा अभाव होता है, जो उनके वैवाहिक जीवन में भूचाल आ जाता हैं। वैद्यनाथ ने जातक पारिजात, अध्याय 14, श्लोक 17 में लिखा है, ‘नीचे गुरौ मदनगे सति नष्ट दारौ’ अर्थात् सप्तम भावगत नीच राशिस्थ बृहस्पति से जातक की स्त्री मर जाती है। कर्क लग्न की कुंडलियों में सप्तम भाव गत बृहस्पति की नीच राशि मकर होती है। व्यवहारिक रूप से उपयरुक्त कथन केवल कर्क लग्न वालों के लिए ही नहीं है, बल्कि कुंडली के सप्तम भाव अधिष्ठित किसी भी राशि में बृहस्पति हो, उससे वैवाहिक सुख अल्प ही होते हैं।
एक नियम यह भी है कि किसी भाव के स्वामी की अपनी राशि से षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान पर स्थिति से उस भाव के फलों का नाश होता है। सप्तम से षष्ठ स्थान पर द्वादश भाव- भोग का स्थान और सप्तम से अष्टम द्वितीय भाव- धन, विद्या और परिवार तथा उनसे प्राप्त सुखों का स्थान है। यद्यपि इन भावों में पाप ग्रह अवांछनीय हैं, किन्तु सप्तमेश के रूप में शुभ ग्रह भी चंद्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र किसी भी राशि में हों, वैवाहिक सुख हेतु अवांछनीय हैं। चंद्रमा से न्यूनतम और शुक्र से अधिकतम वैवाहिक दुख होते हैं। दांपत्य जीवन कलह से दुखी पाया गया, जिन्हें तलाक के बाद द्वितीय विवाह से सुखी जीवन मिला।
पुरुषों की कुंडली में सप्तम भावगत बुध से नपुंसकता होती है। यदि इसके संग शनि और केतु की युति हो तो नपुंसकता का परिमाण बढ़ जाता है। ऐसे पुरुषों की स्त्रियां यौन सुखों से मानसिक एवं दैहिक रूप से अतृप्त रहती हैं, जिसके कारण उनका जीवन अलगाव या तलाक हेतु संवेदनशील होता है। सप्तम भावगत बुध के संग चंद्रमा, मंगल, शुक्र और राहु से अनैतिक यौन क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, जो वैवाहिक सुख की नाशक है।
‘‘यदि सप्तमेश बुध पाप ग्रहों से युक्त हो, नीचवर्ग में हो, पाप ग्रहों से दृष्ट होकर पाप स्थान में स्थित हो तो मनुष्य की स्त्री पति और कुल की नाशक होती है।’’सप्तम भाव के अतिरिक्त द्वादश भाव भी वैवाहिक सुख का स्थान हैं। चंद्रमा और शुक्र दो भोगप्रद ग्रह पुरुषों के विवाह के कारक है। चंद्रमा सौन्दर्य, यौवन और कल्पना के माध्यम से स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण उत्पन्न करता है।
दो भोगप्रद तत्वों के मिलने से अतिरेक होता है। अत: सप्तम और द्वादश भावगत चंद्रमा अथवा शुक्र के स्त्री-पुरुषों के नेत्रों में विपरीत लिंग के प्रति कुछ ऐसा आकर्षण होता है, जो उनके अनैतिक यौन संबन्धों का कारक बनता है। यदि शुक्र -मिथुन या कन्या राशि में हो या इसके संग कोई अन्य भोगप्रद ग्रह जैसे चंद्रमा, मंगल, बुध और राहु हो, तो शुक्र प्रदान भोगवादी प्रवृति में वृद्धि अनैतिक यौन संबन्धों की उत्पत्ति करती है।ऐसे व्यक्ति न्यायप्रिय, सिद्धां
विवाह-मिलान के साथ शुभ मुहूर्त निर्धारण कैसे और क्यों करें ?
हिंदुओं में शुभ विवाह की तिथि वर-वधू की जन्म राशि के आधार पर निकाली जाती है। वर या वधू का जन्म जिस चंद्र नक्षत्र में हुआ होता है उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है। विवाह कि तिथि सदैव वर-वधू की कुंडली में गुण-मिलान करने के बाद निकाली जाती है। विवाह की तिथि तय होने के बाद कुंडलियों का मिलान नहीं किया जाता।
शादी के बंधन में बंधने जा रहे नवयुगल जोडे के लिए सात फेरों के लिए शुभ मुहुर्त का बडा महत्व है। शादी की तैयारियों, मेहमानों के स्वागत, नाच-गाने की मौज-मस्ती में शुभ मुहुर्त की अहमियत को हम अकसर समझ नहीं पाते हैं।
हमारे पूर्व जन्मों के कर्मो या इस जन्म में अनजाने में बुरे कर्म का परिणाम भोगना पडता है। ऎसी स्थिति में शुभ मुहुर्त, मंत्र जाप तथा दानादि ही रक्षा करते हैं।
ब्रह्मलीन पं. तृप्तिनारायण झा शास्त्री द्वारा रचित पुस्तक ‘विवाह-विमर्श’ पुस्तक के अनुसार उपरोक्त चरण अनिष्टकारी होते हैं। बाकी के सोलह नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृतिका, आद्र्रा, पुनर्वसु, पुण्य, अश्लेषा, तीनों पूर्वा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, श्रवण, घनिष्ठा तथा शतभिषा नक्षत्रों को विवाह के लिए शुभ नहीं माना जाता।
‘ज्योतिष रत्न’ पुस्तक के अनुसार कृतिका, भरणी, आद्र्रा, पुनर्वसु और अश्लेषा नक्षत्रों में विवाह होने पर कन्या छह वर्षों के अंदर ही विधवा हो जाती है। पुण्य नक्षत्र में विवाहित पुरूष अपनी पत्नी का परित्याग कर दूसरी औरत से शादी रचा लेता है। चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, तीनों पूर्वाषाढा नक्षत्र तलाक के कारण बनते हैं।
विशाखा नक्षत्र में विवाहित कन्या अपने पति का परित्याग कर दूसरे पुरूष से पुन: विवाह कर लेती है या गुपचुप यौन संबंध स्थापित करती है। श्रवण, घनिष्ठा तथा अश्विनी नक्षत्र पति-पत्नी में मनमुटाव पैदाकर उनके जीवन को कठिन बना देते हैं। अशुभ नक्षत्रों में हुए विवाह की अधिकतम आयु दस वर्षों की होती है।
नक्षत्रों के अतिरिक्त विवाह मुहूर्तों में लग्न का उचित चुनाव भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि तुला और वृश्चिक दिन में मकर और धनु राशि में बधिर संज्ञक, मेष-वृष राशि दिन में तथा कन्या-मिथुन और कर्क राशि में अंध संज्ञक होती हैं। कुंभ राशि दिन में और मीन राशि रात्रि में पंगु संज्ञक होती हैं। बधिर संज्ञक राशि में विवाह करने से दरिद्रता, दिन में अगर अंध संज्ञक लग्न हो तो वैधव्य, अगर यह लग्न रात्रि में हो तो संतान की मृत्यु आदि का योग बनता है।
विवाह जीवन भर सुख-शांति को बनाये रखने के लिए किया जाता है, अतएव विवाह का दिन निर्धारण करने से पूर्व शुभ मुहूर्त का चयन करना अनिवार्य है। योग्य पंडित से विवाह की तिथि का निर्धारण कराया जाना चाहिए।
पंडित जी वर-वधू के शुभ-अशुभ ग्रहों का मिलान करके ही विवाह का मुहुर्त निकालते हैं। शुभ मुहुर्त में लिए गए सात फेरे व्यक्ति का दुर्घटनाओं से बचाव करते हैं। विवाह के समय का निर्णय करने के लिए कुंडली में विवाह संबंधित भाव व भावेश की स्थिति, विवाह का योग देने वाले ग्रहों की दशा, अंतर्दशा तथा वर्तमान ग्रहों के गोचर की स्थित देखी जाती है।
विवाह के सही समय के निर्धारण के लिए पंचाग के 5 तत्व तिथि, नक्षत्र, वार, योग व करण मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य व चंद्र पर आधारित महीने, लग्न व राशि के भिन्न-भिन्न योग या युति के साथ मिलाकर विवाह के शुभ मुहुर्त का चयन किया जाता है। मुहुर्त का एक महत्वपूर्ण भाग लग्न है, जिस पर साधारणतया अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। मुहुर्त में बहुत शुभ या अनुकूल बातें ना भी हों, किन्तु यदि लग्न का समय ध्यान से निकाला गया हो, तो वह मुहुर्त के दूसरे अंगों द्वारा आई बाधाओं व दोषों को दूर कर देता है। जब बृहस्पति और शुक्र अस्त हो, तो वह समय विवाह के लिए वर्जित है। महीने में आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक का समय विवाह के लिए ठीक नहीं है। इस समय से बचना चाहिए। सात फेरों के समय शुभ मुहूर्त का विचार करना आवश्यक हैं।
बृहस्पति के कर्क, सिंह के नवमांश में, स्वयं के नवमांश में तथा मंगल के नवमांश अर्थात् उच्च मित्र क्षेत्री तथा स्वक्षेत्री होने पर विवाह किया जा सकता है। अधिक मास, गुरु और शुक्र के अस्तकाल तथा समय शुद्धि का ध्यान रखते हुए विवाह किया जा सकता है। ऊपर वर्णित दोषों के बावजूद हमारे देश में अधिकांश विवाह अबूझ मुहूर्तों में सम्पन्न होते आ रहे हैं।
विशेष मत तो यह है कि वर और कन्या की कुंडली का समग्र रूप से मिलान किया जाए, जिसमें मंगल दोष, संतान, आयु, आपसी तालमेल, वैधव्य स्थिति, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति, शिक्षा के स्तर इत्यादि पर विशेष विचार करने के उपरांत शुभ नक्षत्र और समय में विवाह किया जाना चाहिए।
शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए ‘विवाह संस्कार’ का होना अत्यावश्यक होता है। यह संस्कार मनुष्य के पूरे जीवन को प्रभावित करने वाला होता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर-कन्या के चुनाव हेतु उनकी कुंडलियों का समग्रता के साथ अध्ययन किया जाता है। उनके लग्न, नक्षत्र और अष्टकुट मिलान के द्वारा यह तय किया जाता है कि अमुक कन्या अमुक वर के योग्य है, या नहीं? उनके बीच सुखद दांपत्य स्थापित होगा या नहीं? अब प्रश्न उठता है कि तय होने के बाद विवाह किस मुहूर्त में करना चाहिए? क्योंकि मुहूर्त का बहुत बडा प्रभाव भी वर-कन्या के भावी जीवन पर पडता है।
मुहू्र्त शास्त्र के अनुसार शुभ समय पर किये गये कार्यों का प्रतिफल शुभ होता है, इसलिए विवाह जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए शुभ मुहूर्त का चयन अनिवार्य हो जाता है। सामान्यत: मुहूर्त चयन के लिए तिथि, वार, नक्षत्र, करण और योग का अध्ययन किया जाता है परंतु विवाह मुहूर्त के लिए तिथि, वार और नक्षत्रों पर बल दिया जाता है।
इसमें भी नक्षत्र पर विशेष बल दिया जाता है। तिथि, वार पर इसलिए भी अधिक जोर नहीं दिया गया है क्योंकि अशुभ तिथियां किसी खास स्थितियों में काफी शुभ हो जाती है। उदाहरण के लिए चतुर्थी तिथि अगर शनिवार को हो तो सिद्घ योग बन जाता है। यद्यपि पृथक रूप से दोनों ही अशुभ तिथि तथा दिन होते हैं लेकिन नक्षत्रों के साथ ऐसी कोई बात नहीं होती।
विवाह के लिए रोहिणी, मृगाशिरा, मघा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, स्वाति, हस्त, मूल एवं रेवती नक्षत्र माने जाते हैं। रोहिणी नक्षत्र में विवाह सम्पन्न होने पर दंपति में आपसी प्रेम बढता है और संतान-पक्ष सुदृढ होता है। मृगाशिरा नक्षत्र संतान की प्रगति का कारक होता है और सुखमय लम्बा दांपत्य देता है।
मघा-नक्षत्र सुखी संतान का कारक और हस्त नक्षत्र मान-सम्मान प्राप्त कराने वाला होता है। अनुराधा नक्षत्र पुत्र-पुत्रियां प्रदान कराने वाला होता है। उत्तरा नक्षत्र विवाह के दो-तीन वर्षों के अंदर ही उन्नति देने वाला होता है। स्वाति नक्षत्र विवाह के तुरंत बाद उन्नति कराता है। रेवती नक्षत्र धन-संपत्ति और समृद्घि विवाह के चार साल बाद देता है।
मूल, मघा और रेवती नक्षत्र का चयन करते समय उनके चरणों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मूल और मघा के प्रथम और रेवती के चतुर्थ चरण का परित्याग करना चाहिए।
किन गुण दोषों का ध्यान रखें, विवाह मुहूर्त निर्धारण में :-
विवाह संस्कार मानव जीवन का एक प्रमुख और सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह संस्कार शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का पालन करते हुए विधि विधानपूर्वक करना चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर और कन्या की जन्म कुंडलियां मिलाकर किए जाने वाले विवाह के मुहूर्त में प्रमुख दोषों का विवेचन प्रस्तुत है।
सामान्य रूप से सभी शुभ कार्यों में वर्जित 21 प्रमुख दोष —
पंचांग शुद्धि अभाव, सूर्योदयास्त या गुरु, शुक्रास्त विभिन्न देश के रीति रिवाज को छोड़कर, संक्रांति दिन, पाप षडवर्ग में लग्न होना, विवाह लग्न में छठे शुक्र व अष्टम में मंगल, त्रिविध गणांत, लग्न कारी योग, विकंगत चंद्रमा, वर-वधू की राशि से अष्टम लग्न, विषघटी, दुर्मुहूर्त पाप ग्रह वार दोष, लतादि दोष, ग्रहण नक्षत्र, उल्पात नक्षत्र, पाप विद्ध नक्षत्र, पापयुत नक्षत्र, पाप नवांश व क्रांतिसाम्य (महापाप)।
विवाह मास सूर्य संक्रमण की मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक, मकर, कुंभ राशियों के चांद्र मासों में विवाह उत्तमोत्तम होता है।श्रावण, भाद्रपद एवं आश्विन मास विवाह के लिए उत्तम हैं।
विवाह तिथियां द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी एवं त्रयोदशी तिथियां विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। प्रतिपदा (कृष्ण), षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी एवं पूर्णिमा तिथियां विवाह के लिए उत्तम हैं।
विवाह वार सोमवार, बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। रविवार विवाह के लिए उत्तम हैं। विवाह नक्षत्र रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्र एवं रेवती नक्षत्र विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। अश्विनी, चित्रा, श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र विवाह के लिए उत्तम हैं।
विवाह योग प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, धु्रव, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल एवं ब्रह्म योग विवाह के लिए प्रशस्त हैं। विवाह करण बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर और वणिज विवाह के लिए प्रशस्त हैं। शकुनि, चतुष्पद, नाग एवं किंस्तुघ्न करण विवाह के लिए सामान्य हैं। विष्टि करण विवाह के लिए सर्वथा त्याज्य है।
गुरु/शुक्र अस्त विचार गुरु और शुक्र ग्रह यदि अस्त चल रहे हों, तो उसे तारा डूबा कहते हैं। इसलिए गुरु-शुक्र का अस्त काल विवाह मुहूर्त के लिए त्याज्य है। देव शयन विचार जब सूर्य उत्तरायण होता है, उस काल को देवताओं का दिन माना जाता है।
सूर्य दक्षिणायन काल देवताओं की रात्रि मानी जाती है। यही काल देवताओं का शयन काल कहलाता है।
देव शयन काल में भी विवाह मुहूर्त त्याज्य होता है। विवाह में विशेष लत्तादि दोष विवाह लग्न में मुख्य रूप से 10 दोष वर्जित हैं, जो इस प्रकार हैं :-
“लत्ता पात युति वेध जामित्र बाणपंचक एकार्गल उपग्रह क्रांतिसाम्य दग्धा।”
इनमें वेध व क्रांतिसाम्य अति गंभीर दोष हैं, अतः विवाह लग्न में इनका त्याग अवश्य करना चाहिए।
1. लत्ता दोष :— लत्ता दोष एक गंभीर दोष है जिसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। इसकी दो स्थितियां होती हैं।
2. पात दोष :– सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसी नक्षत्र में यदि फेरों का समय आ जाए तो पात दोष होता है। मघा, आश्लेषा, चित्रा, अनुराधा, रेवती और श्रवण ये 6 पातकी नक्षत्र हैं। ये सभी सूर्य के संयोग से पतित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त साध्य, हर्षण, शूल, वैधृत, व्यतिपात व गंड इन योगों का अंत यदि उस दिन के नक्षत्र में हो, तो पात दोष होता है। इसे चंडायुध दोष भी कहते हैं। यह प्रायः सभी शुभ कार्यों में वर्जित है।
3. युति दोष :— विवाह नक्षत्र में पाप ग्रह का विचरण या युति हो, तो युति दोष होता है। सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु पाप ग्रह हैं। यदि चंद्र षडवर्ग में श्रेष्ठ, उच्च, स्वक्षेत्री या मित्र हो, तो युति दोष का परिहार हो जाता है। शुभ ग्रहों में बुध और गुरु यदि चंद्र के नक्षत्र में हों और मित्र राशि में हों, तो भी युति दोष नहीं माना जाता। शुक्र की युति को शुभ माना गया है, इसका दोष नहीं लगता है।
युति दोष के शुभ-अशुभ फल इस प्रकार हैं :-
4. वेध दोष :— विवाह नक्षत्र का जिस नक्षत्र में वेध हो, उसमें कोई क्रूर या पाप ग्रह चल रहा हो, तो वेध दोष ओर के 12 वें नक्षत्र को सूर्य, तीसरे को मंगल, छठे को बृहस्पति और आठवें को शनि लात मारता है।
दूसरी स्थिति में बायीं ओर के सातवें नक्षत्र को बुध, नौवें को राहु, पांचवें को शुक्र और 22 वें को पूर्ण चंद्र लात मारता है। इसका फल इस प्रकार है। पंचशलाका चक्र में एक रेखा पर पड़ने वाले निम्न नक्षत्रों में ग्रह होने से नक्षत्रों का परस्पर वेध हो जाता है। रोहिणी-अभिजित, भरणी-अनुराधा, उत्तराषाढ़ा-मृगशिरा, श्रवण-मघा, हस्त – उत्तराभाद्रपद, स्वाति-शतभिषा मूल-पुनर्वसु, रेवती – उत्तराफलगुनि , चित्रा-पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा-पुष्य, पूर्वाषाढ़-आद्र्रा, धनिष्ठा-अश्लेषा, अश्विनी-पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा-कृत्तिका का आपस में वेध होता है।।
यदि विवाह नक्षत्र में शुभ ग्रह का वेध हो तो ‘पादवेध’ होता है। पादवेध में पूरा नक्षत्र दूषित नहीं होता, सिर्फ चरण दूषित होता है। यदि नक्षत्र के चतुर्थ चरण पर ग्रह हो, तो सामने वाले नक्षत्र के प्रथम चरण पर वेध होगा। यदि ग्रह द्वितीय चरण पर हो, तो सामने वाले नक्षत्र के तृतीय चरण पर वेध होगा।
विवाह मुहूर्त में पादवेध के काल का ही त्याग करना चाहिए, संपूर्ण नक्षत्र का नहीं। पापग्रहों द्वारा भोगकर छोड़े हुए नक्षत्र को यदि चंद्र भोग ले, तो नक्षत्र शुद्ध होकर वेध दोष दूर हो जाता है।
‘रवि वेधे च वैधकं, पुत्रशोको भवेत कुजे।’अर्थात सूर्य के वेध में विवाह करने से कन्या विधवा हो जाती है और मंगल वेध से पुत्रशोक होता है। शनि के वेध से मृतसंतान उत्पन्न होती है तथा राहु के वेध से स्त्री व्यभिचारिणी हो जाती है। अतः लग्न में इसका परित्याग अवश्य ही करना चाहिए।
5. यामित्र दोष :— विवाह नक्षत्र से 14 वें नक्षत्र पर कोई ग्रह हो, तो यामित्र या जामित्र दोष लगता है। जामित्र अर्थात सप्तम स्थान। विवाह के समय चंद्र या लग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह हो, तो यह दोष होता है। अतः सप्तम स्थान की शुद्धि आवश्यक होती है। पूर्ण चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र के होने से जामित्र शुभ तथा पाप ग्रहों के होने से अशुभ फलदायक होता है। सप्तम अशुभ ग्रह व्याधि और वैधव्य का कारक होता है।
6. बाण पंचक दोष :— संक्रांति के व्यतीत दिनों (लगभग 16 दिन) में 4 जोड़कर 9 का भाग देने पर शेष 5 रहे तो मृत्यु पंचक दोष होता है। यदि गतांश में 6 जोड़कर 9 का भाग देने 5 शेष बचे, तो रोग पंचक, 3 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो अग्नि पंचक, यदि 1 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो राज पंचक और यदि 8 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो चोर पंचक दोष होता है। यदि शेष 5 नहीं रहे, तो बाण दोष नहीं होगा। यदि रविवार को रोग पंचक लगे तो सोमवार को राज पंचक, मंगल को अग्नि पंचक, शुक्र को चोर पंचक और शनि को मृत्यु पंचक होता है। ये सभी दोष विवाह में वर्जित हैं। रोग और चोर पंचक रात्रि में, राज और अग्नि पंचक दिन में और दोनों की संधि में मृत्यु पंचक वर्जित है। मृत्यु पंचक को छोड़ कर 4 पंचकों में दोष का निर्वाह हो जाता है। लेकिन मृत्यु पंचक सर्वथा वर्जित है। इसमें विवाह नहीं करना चाहिए।
07. एकार्गल दोष :– विष्कुम्भ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिघ, वैधृति ये अशुभ योग विवाह के दिन हों तथा सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र विषम हो तो एकार्गल दोष होता है। इसमें नक्षत्र गणना 28 मानकर की जाती है। इस दोष में खोड़ी (ऽ) लगती है दोष नहीं हो तो रेखा (।) लगाते हैं।
8. उपग्रह दोष : — सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र तक गणना में 5, 7, 8, 10, 14, 15, 18, 19, 21, 22, 23, 24 या 25वें नक्षत्र में कोई ग्रह आए, तो उपग्रह दोष होता है।
9. क्रांतिसाम्य दोष : — जब स्पष्ट चंद्रक्रांति सूर्य क्रांति के बिल्कुल समान हो तब क्रांतिसाम्य दोष होता है। एक ही अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 360 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर वैधृति नामक महापात होता है। विभिन्न अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 180 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर यह व्यतिपात संज्ञक होता है। क्रांतिसाम्य काल का निर्धारण गणित विधि से सिद्धांतोक्त पाताध्यायों के अनुसार किया जाता है।
साधारण तौर पर मेष-सिंह, वृष-मकर, तुला-कुंभ, कन्या-मीन, कर्क-वृश्चिक और धनु-मिथुन इन राशि युग्मों में, एक में सूर्य व एक में चंद्र हो, तो क्रांतिसाम्य दोष संभावित होता है। क्रांतिसाम्य दोष शुभ कार्यों में सभी शुभ गुणों को नष्ट कर देता है। विवाह पटल के अनुसार शस्त्र से कटा, अग्नि में जला या सर्प के विषदंश से पीड़ित व्यक्ति तो जीवित बच सकता है, किंतु क्रांतिसाम्य में विवाह करने पर वर-वधू दोनों ही जीवित नहीं रहते। अतः लग्न शुभ (शुद्ध) होने पर भी उक्त दोषों (क्रांतिसाम्य, वेधदोष) में विवाह नहीं करना चाहिए। सूक्ष्म क्रांति साम्य (महापात) की गणित गणना होती है। इसमें सभी शुभ कार्य वजिर्त हैं।।
10.दग्धा तिथि :— सूर्य राशि से तिथि को वर्जित माना गया है।
नीचे दिए गए तिथि चक्र में जिस माह के सूर्य के नीचे जो तिथि लिखी गई है, वह दग्धा तिथि मानी जाती है। इसमें विवाहादि शुभ कार्य वर्जित हैं। विशेष रूप से त्याज्य चार दोष विवाह लग्न में निम्नोक्त 4 दोष भी त्याज्य हैं :-
मर्म वेध :-
लग्न में पाप ग्रह होने से मर्म वेध होता है।
कंटक दोष :-
त्रिकोण में पाप ग्रह होने से कंटक दोष होता है।
शल्य दोष :-
चतुर्थ और दशम में पाप ग्रह होने से शल्य दोष होता है।
छिद्र दोष :-
सप्तम भाव में पाप ग्रह होने से छिद्र दोष होता है। ज्येष्ठा विचार ज्येष्ठ मास में उत्पन्न व्यक्ति का ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित होता है। वर और कन्या दोनों का जन्म ज्येष्ठ मास में हुआ हो, तो इस स्थिति में भी ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित है। विवाह के समय तीन ज्येष्ठों का एक साथ होना वर्जित है। दो या चार या छह ज्येष्ठा होने से विवाह हो सकता है।
सिंह-गुरु वर्जित :-
सिंह राशि में गुरु हो तो विवाह वर्जित होता है। लेकिन मेष का सूर्य रहे तो सिंह के गुरु में विवाह हो सकता है।
होलाष्टक :-
फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में होलिका दहन से 8 दिन पहले अर्थात् शुक्लाष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक रहते हैं जो कि शतरुद्रा, विपाशा, इरावती और तीनों पुष्कर को छोड़कर सर्वत्र शुभ हैं, इसलिए इन स्थानों के अतिरिक्त सर्वत्र विवाहादि शुभ कार्य हो सकते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रमुख दोषों का फल इस प्रकार है। व्यतिपात में विवाह होने पर मृत्यु और वंश नाश की संभावना रहती है।
गंडांत में विवाह होने पर मृत्यु, वज्र में विवाह होने पर अग्निदाह, गंड में रोग होता हैं।।
विवाह में लग्न शुद्धि दिन और रात के 24 घंटों में 12 राशियों के 12 लग्न होते हैं। सभी मुहूर्तों में लग्न की सर्वाधिक प्रधानता होती है। विवाह आदि शुभ कार्यों में लग्न का शोधन गंभीरता से किया जाता है। विवाह हेतु वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु लग्न शुभ कहे गए हैं, इन लग्नों में विवाह उत्तम फलदायी होता है। अलग-अलग भावों में स्थित ग्रह विवाह लग्न हेतु अशुभ होते हैं।
इस संदर्भ में एक संक्षिप्त विवरण नीचे की सारणी में दी गई है। इनमें से कुछ ग्रहों की पूजा कराकर लग्न शुद्धि की जा सकती है। इनकी शांति के उपरांत विवाह में तथा दाम्पत्य जीवन में बाधाएं नहीं आतीं।
विवाह लग्न में शुभ ग्रह केंद्र, त्रिकोण या द्वितीय, द्वादश में हों और पाप ग्रह भाव 3, 6 या 11 में स्थित हों तो शुभफल देते हैं। लग्न (प्रथम भाव) से षष्ठ में शुक्र व अष्टम में मंगल अशुभ होता है। सप्तम भाव ग्रह रहित हो, विवाह लग्न से चंद्र भाव 6, 8 या 12 में न हो, तो लग्न शुभ होता है।
लग्न भंग :-
मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के लग्न के व्यय भाव में शनि हो, तो उस लग्न में विवाह नहीं करना चाहिए। दशम में मंगल, तृतीय में शुक्र, लग्न में चंद्र या पाप ग्रह हो, लग्नेश, सूर्य, चंद्र छठे भाव में हो अथवा चंद्र, लग्न का स्वामी या कोई शुभ ग्रह आठवें भाव में हो अथवा सप्तम भाव में कोई भी ग्रह हो, तो लग्न भंग होता है।
विवाह लग्न में कन्या, मिथुन, धनु का पूर्वाधि नवांश शुभ होता है, बशर्ते ये अंतिम नवांश में न हो। उक्त राशियों का नवांश हो, तो दम्पति को पुत्र, धन व सौभाग्य की प्रप्ति होती है। वर और कन्या की जन्म राशियों या लग्नों से अष्टम या द्वादश भाव का नवांश यदि अनेक गुणों से युक्त हो तो त्याज्य है।
श्री रामदैवज्ञ के अनुसार, लग्न का स्वामी लग्न में स्थित हो या उसे देखता हो, अथवा नवांश का स्वामी नवांश में स्थित हो या उसे देखता हो, तो वह वर को शुभफल प्रदान करता है। इसी प्रकार नवांश का सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो, तो वधू के लिए शुभ फलदायक होता है।
कर्तरी दोष एवं परिहार :-
विवाह लग्न से दूसरे या 12वें भाव में यदि पाप ग्रह हो, तो कर्तरी दोष होता है, जो कैंची की तरह दोनों ओर से लग्न की शुभता को काटता है। लग्न से द्वितीय स्थान में पापग्रह वक्री और द्वादश में पाप ग्रह मार्गी हो, तो यह दोष महाकर्तरी होता है, इसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। लग्न में बलवान शुभग्रह हो, तो कर्तरी दोष भंग हो जाता है। केंद्र या त्रिकोण में गुरु, शुक्र या बुध हो, या कर्तरीकारक ग्रह नीचस्थ अथवा शत्रुक्षेत्री हो, तो कर्तरी दोष होता है।
पंगु, अंध, बधिर लग्न :-
तुला और वृश्चिक दिन में तथा धनु एवं मकर रात्रि में बधिर (बहरी) होते हैं। बधिर लग्न में विवाह करने से जीवन दुखमय होता है। मेष, वृष और सिंह दिन में तथा मिथुन, कर्क और कन्या रात्रि में अंधे होते हैं। दिन में कुंभ एवं रात्रि में मीन लग्न पंगु (विकलांग) होता है। पंगु लग्न में विवाह होने पर धन का नाश होता है। दिवा अंध लग्न में कन्या विधवा हो जाती है, जबकि रात्रि अंध लग्न संतान के लिए मृत्युकारक होता है। इसलिए इन दोषपूर्ण लग्नों से बचना चाहिए। किंतु, यदि लग्न का स्वामी या गुरु लग्न को देखता हो, तो पंगु, बधिर आदि लग्न दोष नहीं होते हैं। त्रिबल शुद्धि विचार वर व कन्या की जन्मराशि से सूर्य, चंद्र व गुरु का गोचर नाम त्रिबल विचार है। विवाह मुहूर्त के दिनों में से जिस दिन त्रिबल शुद्धि बन जाए, उसी दिन विवाह निश्चय करके बता देना चाहिए।
कन्या के लिए गुरुबल व वर के लिए सूर्यबल का विचार और चंद्रबल का विचार दोनों के लिए करना चाहिए। सूर्य, चंद्र और गुरु की शुिद्ध होने पर ही विवाह शुभ होता है।
वरस्य भास्कर बलं :-
विवाह के समय वर के लिए सूर्य का बलवान और शुभ होना अति आवश्यक है। सूर्य के बलवान होने से दाम्पत्य जीवन में पति का पत्नी पर प्रभाव व नियंत्रण रहता है। दोनों में वैचारिक सामंजस्य रहता है एवं जीवन के कठिन समय में संघर्ष करने की क्षमता भी सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य की शुभतासे संपूर्ण वैवाहिक जीवन सुखमय होता है।
विवाह के समय वर की जन्म राशि से तीसरे, छठे, 10वें और 11वें भाव में सूर्य का गोचर श्रेष्ठ किंतु चैथे, आठवें और 12वें भाव में अनिष्ट होने के कारण त्याज्य है। पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें और नौवें भाव का सूर्य पूजनीय है अर्थात विवाह से पहले सूर्य की पूजा व लाल दान करने से ही विवाह शुभ हो पाता है। इनमें पहले और सातवें स्थान का सूर्य वर द्वारा विशेष पूज्य माना गया है।
दाम्पत्य जीवन में वर के वर्चस्व के लिए यह आवश्यक है कि सूर्य के उत्तरायण काल, शुक्ल पक्ष व दिवा लग्न में ही विवाह करे। दिवा लग्न में भी अभिजित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ है। सूर्य जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि का लग्न अभिजित लग्न कहलाता है। यह स्थानीय मध्याह्न काल (दोपहर) में पड़ता है। स्थानीय समयानुसार दिन के 12 बजने से 24 मिनट पूर्व 24 मिनट पश्चात तक 48 मिनट का अभिजित मुहूर्त होता है। उत्तम जाति ब्राह्मण व क्षत्रियों के लिए यह विवाह लग्न श्रेष्ठ कही गया है।
दक्षिण भारतीय ब्राह्मण अभिजित लग्न में ही विवाह करते हैं और यही कारण है कि उत्तर भारतीयों की अपेक्षा उनका वैवाहिक जीवन अधिक सफल रहता है। जन्मगत जाति के आधार पर ही नहीं बल्कि जन्म नक्षत्र के अनुसार यदि वर का वर्ण ब्राह्मण या क्षत्रिय हो, तो भी अभिजित लग्न में ही विवाह शुभफलदायी होता है।
विवाह लग्न में सूर्य यदि एकादश भाव में हो, तो यह सोने में सुहागा होता है। विवाह हेतु अन्य लग्न शुद्धि न हो सके, तो अभिजित मुहूर्त या लग्न में विवाह सभी वर्गों के लिए शुभ होता है।
कन्यायां गुरौ बलं :-
कन्या के दाम्पत्य सुख व पति भाव का कारक गुरु है, इसलिए गुरु की शुद्धि में कन्या का विवाह शुभ होता है। कन्या की जन्म राशि से दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें या 11वें में स्थित गुरु विवाह हेतु शुभ माना जाता है, क्योंकि इन स्थानों में गुरु बलवान होता है। पहले, तीसरे, छठे या 10वें में स्थित गुरु मध्यम होता है, जो पूजा से शुभ हो जाता है।
कन्या से पीला दान करा कर विवाह करना चाहिए। चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु अशुभ होता हैं, यह पूजा से भी शुभ नहीं होता। अतः कन्या की जन्म राशि से चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु विवाह हेतु वर्जित है।
इन स्थानों में गुरु का गोचर वैधव्यप्रद होता है। मिथुन या कन्या राशि में हो, तो कन्या की हानि होती है। कर्क या मकर राशि में हो, तो कन्या के लिए दुखदायी होता है। किंतु उक्त स्थानों में स्वराशि या परमोच्च हो, तो शुभ होता है।
सिंह राशि के नवांश में गुरु हो, तो विवाह नहीं करना चाहिए। कन्या के विवाह हेतु गुरु शुद्धि का इतना गहन विचार तो उस समय किया जाता था जब उसका विवाह दस वर्ष या इससे भी कम की आयु में होता था।
आजकल तो लड़की का विवाह सोलह वर्ष के बाद ही होता है। इस उम्र तक वह कन्या नहीं रहती, वह तो रजस्वला होकर युवती हो जाती है। इसलिए गुरुबल शुद्धि रहने पर भी पूजा देकर लड़की का विवाह कराना शास्त्रसम्मत है। ऐसे में विवाह लग्न शुद्धि के लिए चंद्रबल देखना ही अनिवार्य है।
विवाहे चंद्रबलं :–
श्री बादरायण के अनुसार गुरु और शुक्र के बाल्य दोष में कन्या का और वृद्धत्व दोष में पुरुष का विनाश होता है। गुरु अस्त हो तो पति का, शुक्रास्त हो, तो कन्या का तथा चंद्रास्त हो, तो दोनों का अनिष्ट होता है। अतः विवाह के समय वर और कन्या दोनों के लिए चंद्रबल शुद्धि आवश्यक है। चंद्र का गोचर दोनों की जन्म राशियों से तीसरे, छठे, सातवें, 10वें या 11वें भाव में शुभ (उत्तम) होता है। पहले, दूसरे, पांचवें, नौवें या 12वें में चंद्रमा पूज्य है। चैथे, आठवें या 12वें स्थान का चंद्र दोनों के लिए अशुभ होता है। विवाह पटल के अनुसार चैथा और 12वां चंद्र ही अशुभ होने के कारण त्याज्य है।
एकार्गलादि विवाह संबंधी दोष चंद्र एवं सूर्य के बलयुक्त होने के कारण नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् दोनों उच्चस्थ या मित्र क्षेत्री होकर विवाह लग्न में बैठे हो, तो समस्त दोष दूर हो जाते हैं। चंद्र बुध के साथ शुभ और गुरु के साथ सुखदायक होता है। विवाह लग्न में चंद्र की निम्नलिखित युतिस्थितियां दोषपूर्ण होती हैं, इनका त्याग करना चाहिए।
सूर्य-चंद्र की युति – यह युति दंपति को दारिद्र्य दुख देती है।
चंद्र-मंगल की युति – इस युति के फलस्वरूप मरणांतक पीड़ा होती है।
चंद्र-शुक्र की युति – इस युति के फलस्वरूप पति पराई स्त्री से प्रेम करता है, अर्थात् पत्नी को सौतन का दुख झेलना पड़ता है।
चंद्र-शनि की युति – यह युति वैराग्य देती है चंद्र-राहु की युति – राहु से युत चंद्र कलहकारी होता है।
चंद्र-केतु की युति – यह युति कष्ट प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त यदि विवाह लग्न में चंद्र दो पाप ग्रहों से युत हो तो मृत्यु का कारक होता है। विवाह में गोधूलि विचार भी किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें सभी दोष त्याज्य हैं।
ऎसी मान्यता है कि शनि जो काल का प्रतीक है, समय का निर्णय करता है और बृहस्पति विवाह के लिए आशीर्वाद देता है। इस प्रकार मंगल जो पौरूष, साहस व पराक्रम का प्रतीक है, उसका भी विवाह संबंधित भाव व ग्रहों के ऊपर से विवाह की तिथि की 6 मास की अवधि के गोचर में विचरण होना चाहिए अथवा गोचर से दृष्टि होनी चाहिए। विवाह का समय निश्चित करने के लिए अष्टकवर्ग विधि का प्रयोग किया जाता है।
व्यक्तिगत, सामाजिक तथा राजनैतिक सभी प्रकार के कार्यो को शुभ मुहुर्त में आरंभ करने से सिद्धि व सफलता प्राप्त होती है। अंग्रेजी शासकों से स्वतंत्रता प्राप्ति के 24 घंटे बाद इस महत्वपूर्ण घोषणा के लिए हमारे महान नेताओं ने शुभ मुहुर्त का बेताबी से इंतजार किया था। यही वजह है कि हमारा देश आज संसार का सबसे बडा गणतंत्र और समृद्धशाली देशों की पंक्ति में गिना जाता है।
क्यों किया जाता है कुंडली मिलान?
विवाह स्त्री व पुरुष की जीवन यात्रा की शुरुआत मानी जाती है। पुरुष का बाया व स्त्री का दाहिना भाग मिलाकर एक-दूसरे की शक्ति को पूरक बनाने की क्रिया को विवाह कहा जाता है। भगवान शिव और पार्वती को अर्द्धनारीश्वर की संज्ञा देना इसी बात का प्रमाण है। ज्योतिष में चार पुरुषार्थो में काम नाम का पुरुषार्थ विवाह के बाद ही पूर्ण होता है।
आइये जाने शुभ मूहूर्त के अनुसार विवाह में वर्जित काल -
वैवाहिक जीवन की शुभता को बनाये रखने के लिये यह कार्य शुभ समय में करना उत्तम रहता है अन्यथा इस परिणय सूत्र की शुभता में कमी होने की संभावनाएं बनती है।कुछ समय काल विवाह के लिये विशेष रुप से शुभ समझे जाते है।इस कार्य के लिये अशुभ या वर्जित समझे जाने वाला भी समय होता है जिस समय में यह कार्य करना सही नहीं रहता है।
आईये देखे की विवाह के वर्जित काल कौन से है :-
1. नक्षत्र व सूर्य का गोचर-
27 नक्षत्रों में से 10 नक्षत्रों को विवाह कार्य के लिये नहीं लिया जाता है इसमें आर्दा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुणी, उतराफाल्गुणी, हस्त, चित्रा, स्वाती आदि नक्षत्र आते है।इन दस नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र हो व सूर्य़ सिंह राशि में गुरु के नवांश में गोचर कर तो विवाह करना सही नहीं रहता है।
2. जन्म मास, जन्मतिथि व जन्म नक्षत्र में विवाह -
इन तीनों समयावधियों में अपनी बडी सन्तान का विवाह करना सही नहीं रहता है व जन्म नक्षत्र व जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र, 16वां नक्षत्र, 23 वां नक्षत्र का त्याग करना चाहिए।
3. शुक्र व गुरु का बाल्यवृ्द्धत्व-
शुक्र पूर्व दिशा में उदित होने के बाद तीन दिन तक बाल्यकाल में रहता है।इस अवधि में शुक्र अपने पूर्ण रुप से फल देने में असमर्थ नहीं होता है। इसी प्रकार जब वह पश्चिम दिशा में होता है 10 दिन तक बाल्यकाल की अवस्था में होता है। शुक्र जब पूर्व दिशा में अस्त होता है तो अस्त होने से पहले 15 दिन तक फल देने में असमर्थ होता है व पश्चिम में अस्त होने से 5 दिन पूर्व तक वृ्द्धावस्था में होता है।इन सभी समयों में शुक्र की शुभता प्राप्त नहीं हो पाती है।गुरु किसी भी दिशा मे उदित या अस्त हों, दोनों ही परिस्थितियों में 15-15 दिनों के लिये बाल्यकाल में वृ्द्धावस्था में होते है।
उपरोक्त दोनों ही योगों में विवाह कार्य संपन्न करने का कार्य नहीं किया जाता है,शुक्र व गुरु दोनों शुभ है इसके कारण वैवाहिक कार्य के लिये इनका विचार किया जाता है।
4. चन्द्र का शुभ/ अशुभ होना-
चन्द्र को अमावस्या से तीन दिन पहले व तीन दिन बाद तक बाल्य काल में होने के कारण इस समय को विवाह कार्य के लिये छोड दिया जाता है।ज्योतिष शास्त्र में यह मान्यता है की शुक्र, गुरु व चन्द्र इन में से कोई भी ग्रह बाल्यकाल में हो तो वह अपने पूर्ण फल देने की स्थिति में न होने के कारण शुभ नहीं होता है और इस अवधि में विवाह कार्य करने पर इस कार्य की शुभता में कमी होती है।
5. तीन ज्येष्ठा विचार-
विवाह कार्य के लिये वर्जित समझा जाने वाला एक अन्य योग है जिसे त्रिज्येष्ठा के नाम से जाना जाता है। इस योग के अनुसार सबसे बडी संतान का विवाह ज्येष्ठा मास में नहीं करना चाहिए। इस मास में उत्पन्न वर या कन्या का विवाह भी ज्येष्ठा मास में करना सही नहीं रहता है।ये तीनों ज्येष्ठ मिले तो त्रिज्येष्ठा नामक योग बनता है।इसके अतिरिक्त तीन ज्येष्ठ बडा लडका, बडी लडकी तथा ज्येष्ठा मास इन सभी का योग शुभ नहीं माना जाता है। एक ज्येष्ठा अर्थात केवल मास या केवल वर या कन्या हो तो यह अशुभ नहीं होता व इसे दोष नहीं समझा जाता है।
6. त्रिबल विचार-
इस विचार में गुरु कन्या की जन्म राशि से 1, 8 व 12 भावों में गोचर कर रहा हो तो इसे शुभ नहीं माना जाता है।
गुरु कन्या की जन्म राशि से 3,6 वें राशियों में हों तो कन्या के लिये इसे हितकारी नहीं समझा जाता है।तथा 4, 10 राशियों में हों तो कन्या को विवाह के बाद दु:ख प्राप्त होने कि संभावनाएं बनती है।गुरु के अतिरिक्त सूर्य व चन्द्र का भी गोचर अवश्य देखा जाता है।इन तीनों ग्रहों का गोचर में शुभ होना त्रिबल शुद्धि के नाम से जाना जाता है।
7. चन्द्र बल-
चन्द्र का गोचर 4, 8 वें भाव के अतिरिक्त अन्य भावों में होने पर चन्द्र को शुभ समझा जाता है. चन्द्र जब पक्षबली, स्वराशि, उच्चगत, मित्रक्षेत्री होने पर उसे शुभ समझा जाता है अर्थात इस स्थिति में चन्द्र बल का विचार नहीं किया जाता है।
8. सगे भाई बहनों का विचार-
एक लडके से दो सगी बहनों का विवाह नहीं किया जाता है. व दो सगे भाईयों का विवाह दो सगी बहनों से नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त दो सगे भाईयों का विवाह या बहनों का विवाह एक ही मुहूर्त समय में नहीं करना चाहिए. जुडंवा भाईयों का विवाह जुडवा बहनों से नहीं करना चाहिए. परन्तु सौतेले भाईयों का विवाह एक ही लग्न समय पर किया जा सकता है. विवाह की शुभता में वृ्द्धि करने के लिये मुहूर्त की शुभता का ध्यान रखा जाता है।
9. पुत्री के बाद पुत्र का विवाह-
पुत्री का विवाह करने के 6 सूर्य मासों की अवधि के अन्दर सगे भाई का विवाह किया जाता है. लेकिन पुत्र के बाद पुत्री का विवाह 6 मास की अवधि के मध्य नहीं किया जा सकता है. ऎसा करना अशुभ समझा जाता है. यही नियम उपनयन संस्कार पर भी लागू होता है. पुत्री या पुत्र के विवाह के बाद 6 मास तक उपनयन संस्कार नहीं किया जाता है दो सगे भाईयों या बहनों का विवाह भी 6 मास से पहले नहीं किया जाता है।
10. गण्ड मूलोत्पन्न का विचार-
मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या अपने ससुर के लिये कष्टकारी समझी जाती है. आश्लेषा नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या को अपनी सास के लिये अशुभ माना जाता है. ज्येष्ठा मास की कन्या को जेठ के लिये अच्छा नहीं समझा जाता है. इसके अलावा विशाखा नक्षत्र में जन्म लेने पर कन्या को देवर के लिये अशुभ माना जाता है. इन सभी नक्षत्रों में जन्म लेने वाली कन्या का विवाह करने से पहले इन दोषों का निवारण किया जाता है।
वैवाहिक जीवन में.. बाधाकारक सभी ग्रह, नक्षत्र , या विवाह प्रतिबन्धक दोषों का .... योग्य ज्योतिष-तंत्र के ज्ञानी के मार्गदर्शन में... निदान विधिवत करा लेना चाहिए।
पं. कृपाराम उपाध्याय
कब होगी शादी | कैसा होगा जीवनसाथी
भारतीय संस्कृति में 16 संस्कारों में विवाह संस्कार भी आता है यही नहीं निर्धारित चार आश्रमो में गृहस्थ आश्रम विवाहोपरान्त ही प्रारम्भ होता है। इसीलिए विवाह संस्कार को दुसरा जन्म माना जाता है । शादी के बाद व्यक्ति का पारिवारिक जीवन आरम्भ होता है। समाज में ऐसे बहुत लोग है जिनकी शादी ही नहीं होती है । ऐसे कई लोग है जिनकी शादी तो होती है किंतु किसी कारणवश सम्बन्ध विच्छेद ( Divorce) हो जाता है और पूरी जिंदगी अकेले व्यतीत करना पड़ता है। कई लोग दूसरी शादी भी ( Second Marriage ) कर लेते है । शादी का न होना तथा शादी का देर से होना दोनों में बहुत अंतर है आज हम इस लेख में शादी के देर होने के कारण तथा कब और किस दशा अन्तर्दशा में होगी की चर्चा करने वाले है।
शादी में देर होने का मुख्य कारण
उच्च शिक्षा ग्रहण करना
नौकरी देर से करना
आर्थिक अभाव
कोई पारिवारिक समस्या
मनोनुकूल वर वा वधू की तलाश
प्यार-मोहब्बत के कारण शादी न करना
पाश्चात्यकरण का प्रभाव
घर में बहन की शादी में देर होने के कारण लड़का की शादी में देर होना
जन्मकुंडली में देर से शादी होने का योग
जन्मकुंडली में मांगलिक दोष का होना।
उपर्युक्त कारण, किसी न किसी तरह से विवाह बंधन को प्रभावित करता है ।वास्तव में आज के युवा वर्ग उच्च शिक्षा या मनोवांछित कैरियर बनाने के चक्कर में अधिक उम्र के हो जाने पर भी शादी नहीं करते है और परिणाम स्वरूप धीरे धीरे इतना विलम्ब हो जाता है कि मनोनुकूल वर या वधू ही नहीं मिल पाता है। उसके बाद जातक किसी ज्योतिषी से मिलता है और पूछता है मेरी शादी नहीं हो रही है इसका क्या कारण है शादी नहीं होने के प्रति कौन से ग्रह जिम्मेदार इत्यादि प्रश्नों की ऐसे बौछार हो जाती है जैसे ज्योतिषी ने शादी रोक रखी है।
ज्योतिषी जन्मकुंडली का ज्योतिषीय विश्लेषण करता है और विवाह में देर होने के लिए बाधक ग्रह दोष का विवेचन करता है तथा उसका समाधान भी बताता है । अंततः जातक यह स्वीकार करता है कि जीवन यात्रा में मेरे द्वारा समय को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया गया । अगर महत्त्व दिया गया होता तो उचित समय में शादी कर लेता।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से जब भी विवाह का योग बनता हैं, और किसी कारण से विवाह स्थगित हो जाता है तो फिर लड़का या लड़की की शादी में बहुत देर हो जाती है इसलिए यदि कोई ज्योतिषी यह बताता है की अभी विवाह का योग बन रहा है तो शादी कर लेना चाहिए अन्यथा देर तो होगी ही होगी इसमें कोई संदेह नहीं है।
किसी भी जातक के विवाह में देरी होने का एक कारण मांगलिक होना भी होता है। सामान्यतः मांगलिक लोगो के विवाह का योग 27, 29, 31, 33, 35 व 37वें वर्ष में बनते हैं। जिन युवक-युवतियों के विवाह में विलंब हो जाता है, तो जन्मकुंडली में स्थित ग्रहों की दशा अन्तर्दशा ज्ञात कर, विवाह का योग कब बन रहा हैं, जान सकते हैं और जातक को विवाह हेतु प्रयत्न तेज कर देनी चाहिए।
विवाह का भाव | Houses of Marriage
जन्म कुन्डली में सप्तम भाव विवाह, पत्नी, साझेदारी में कार्य इत्यादि का भाव माना जाता है। इसी भाव से विवाह तथा पति पत्नी के बीच कैसा सम्बन्ध रहेगा की जानकारी मिलती है। इस भाव को कलत्र भाव भी कहा जाता है। सप्तम भाव से ही विवाह तथा विवाह के समय का निर्धारण किया जाता है।
दुसरा भाव ( Second House) परिवार का भाव होता है अतः जब भी शादी होती है तो परिवार में एक फॅमिली मेंबर की बढ़ोतरी होती है इसलिए यह भाव भी विवाह के लिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
ग्यारहवा भाव ( Eleventh House) व्यक्ति की इच्छा पूर्ति का भाव होता है तथा यह भाव सप्तम से पंचम भाव है अतः यह भाव भी विवाह के लिए देखा जाता है।
प्रथम भाव ( First House) – यह भाव कुंडली में सबसे महत्त्वपूर्ण भाव होता है इस भाव का प्रतिनिधि व्यक्ति स्वयं करता है । सभी प्रकार के सुख यथा शादी, नौकरी आदि का उपभोग जातक स्वयं ही करता है अतः प्रथम भाव का सम्बन्ध जिस जिस भाव से होगा व्यक्ति अपने जीवन में उस भाव से समबन्धित सुख वा दुःख की प्राप्ति जरूर करेगा। यदि प्रथम भाव का सम्बन्ध कलत्र भाव से है तो जातक को पत्नी सुख की प्राप्ति अवश्य होगी।
जन्मकुंडली में विवाह सुख है या नहीं
विवाह का समय जानने से पहले यह जानना जरुरी होता है की जातक की जन्मकुंडली में विवाह का योग है या नहीं। यदि जन्मकुंडली में शादी का योग है तो निश्चित ही शादी होगी। यह जानने के लिए हमें कुंडली में निम्नलिखित योग देखना चाहिए।
सप्तम भाव पर शुभ ग्रहो यथा गुरु शुक्र आदि की दृष्टि हो तो अवश्य ही शादी होती है।
सप्तमेश लग्न में या लग्नेश सप्तम में हो तो शादी होती है।
सप्तम भाव का स्वामी केंद्र अथवा त्रिकोण में स्थित हो।
सप्तमेश ग्यारहवे भाव ( लाभ भाव ) में हो तो शादी होती है।
सप्तम भाव का कारक ग्रह शुक्र पर अशुभ की दृष्टि या युति न हो तथा शुक्र ग्रह केंद्र अथवा त्रिकोण भाव में स्थित हो
सप्तमेश उच्च होकर लग्नेश से युति बना रहा हो.
नवमेश सप्तमेश हो और सप्तमेश नवम भाव में हो तो शादी होती है।
जन्मकुंडली में विवाह देर होने के कारण
जन्मकुंडली के विश्लेषण से जब यह निर्धारित हो जाता है की जातक के जीवन में विवाह सुख है तब यह देखना चाहिए की विवाह में देर होने का क्या कारण है। आइये यह जानते है की किसी भी व्यक्ति की कुंडली में किस प्रकार के ग्रह योग होने पर विवाह देर से होती है।
यदि आपकी कुंडली में मंगल प्रथम, चतुर्थ सप्तम तथा बारहवे भाव में स्थित हो तो विवाह में विलम्ब होता है।
यदि सप्तम भाव या भावेश पर किसी दो या तीन अशुभ ग्रहो की दृष्टि है तो विवाह विलम्ब से होता है।
यदि सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि हो तो भी शादी देर से होती है।
यदि बारहवे भाव या भावेश पर शनि की दृष्टि या युति हो तो भी शादी देर से होती है।
जन्मकुंडली में मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य को क्रूर ग्रह माना है। इनके अशुभ स्थिति में होने पर दांपत्य सुख मिलकर भी न मिला जैसा होता है।
सप्तम भाव में अशुभ ग्रह राहु केतु शनि सूर्य आदि हो तो विवाह में विलम्ब या सुख में कमी होती है
सप्तमाधिपति द्वादश भाव में हो और राहू लग्न में हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा होना संभव है।
सप्तम भावस्थ राहू युक्त द्वादशाधिपति से वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है।
यदि सप्तमेश बारहवे भाव में हो तथा बारहवे भाव का स्वामी सप्तम स्थित हो और किसी तरह से शनि या राहु ग्रह से सम्बन्ध बना रहा हो तो जातक का विवाह देर से होता है तथा विवाह सुख में कमी भी होती है।
यदि राहू – केतु तथा शनि की युति हो तो दांपत्य सुख में कमी के साथ ही अलगाव भी उत्पन्न होता है।
सप्तमेश छठे, अष्टम या द्वादश भाव में हो या षष्ठेश अष्टमेश तथा द्वादशेश के साथ सप्तमेश या सप्तम भाव का सम्बन्ध हो और यदि शुक्र ग्रह भी सम्मलित हो तो क्या कहाँ निश्चित ही वैवाहिक सुख में कमी होती है।
कैसे करे विवाह के समय का निर्धारण | Timing of Marriage
ज्योतिषी के लिए किसी भी घटना के लिए समय का निर्धारण करना चुनौती भरा कार्य होता है। यही कारण है की आज ज्योतिषी फलादेश कम उपाय ज्यादा बताते है खैर इस बात से क्या मतलब आज हम आपको विवाह का समय निर्धारण कैसे करते है इसका टिप्स देने का प्रयास करने जा रहे है। नवरात्रि में महागौरी की पूजा से दूर करें वैवाहिक बाधाएं
जन्मकुंडली में सप्तमेश की महादशा-अंतर्दशा चल रही हो तो उस समय शादी होने के प्रबल चांस होते है।
विवाह कारक ग्रह शुक्र या गुरु की महादशा-अंतर्दशा में भी विवाह का योग बनता है।
सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश के साथ बैठे ग्रह की महादशा-अंतर्दशा में भी विवाह संभव होता है।
शुक्र चंद्रमा की महादशा मे जब देवगुरू का अंतर आए तो विवाह होने के चांस होते हैं।
यदि कुंडली में शुक्र ग्रह से अन्य कोई ग्रह जो किसी न किसी रूप में सप्तम भाव या भावेश से सम्बन्ध बना रहा हो तो ऎसे ग्रह की महादशा में शादी होती है।
जब एक साथ द्वितीयेश, सप्तमेश तथा एकादशेश की दशा अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा आये तथा गोचर में
सप्तम भाव से सम्बन्ध बन रहा हो तो शादी होगी ऐसा समझना चाहिए
नवांश के लग्नेश या सप्तमेश या लग्नस्थ ग्रह या सप्तमस्थ ग्रह की दशा अन्तर्दशा में भी शादी होती ऐसा जानना चाहिए।
गोचर में जिस साल सप्तम भाव पर गुरु तथा शनि का डबल गोचर बन रहा हो तो समझना चाहिए की विवाह का योग बन रहा है।
लग्नेश, जब गोचर में सप्तम भाव की राशि में आए अथवा सप्तम भाव, भावेश से युति या दृष्टि सम्बन्ध स्थापित करे तो भी शादी का योग बनता है।
जन्मकुंडली में लग्न, चंद्र लग्न एवं शुक्र लग्न से सप्तमेश, सप्तमस्थ वा सप्तम को देखने वाले ग्रह की दशा-अंतर्दशा चल रही है तो भी शादी होती है।
जन्मकुंडली में राहु की दशा चल रही हो तो भी शादी होने के प्रबल चांस होते है।
जीवनसाथी कैसा होगा
आपका जीवनसाथी कैसा होगा का विचार मुख्य रूप से सप्तम भाव के स्वामी तथा उस भाव में स्थित ग्रह के आधार पर करना चाहिए। जन्मकुंडली में सप्तमेश चतुर्थ, पंचम, नवम अथवा दशम भाव में हाने पर जीवन साथी निश्चित ही अच्छे परिवार से सम्बन्ध रखने वाला होगा तथा सामान्यतः वैवाहिक जीवन भी सुख पूर्वक व्यतीत होता है। यदि सप्तमेश उच्च होकर केंद्र या त्रिकोण भाव में स्थित है तो आपका जीवन साथी शिक्षित धनवान तथा मान सम्मान से युक्त होगा।
आपके जीवनसाथी की आर्थिक स्थति
यदि चतुर्थ भाव के स्वामी केन्द्रभाव के स्वामी के साथ युति या दृष्टि सम्बन्ध बनता है तो जीवनसाथी व्यवसायी हो सकता है।
इसी प्रकार अगर सप्तमेश, दूसरे, पंचम, नवम, दशम या एकादश भाव में हो और सप्तमेश चन्द्र, बुध या शुक्र हो तो जीवनसाथी व्यापारी होगा।
यदि आपकी जन्म कुण्डली में चतुर्थ भाव का स्वामी दूसरे अथवा बारहवे भाव में है तो जीवनसाथी नौकरी करने वाला होगा।
यदि सप्तमेश तथा चतुर्थेश नवमांश में उच्च या स्वराशि में हो तथा एक दूसरे से युति या दृष्टि सम्बन्ध बना रहा हो तो जीवनसाथी नौकरी करने वाला, तथा उच्चपद पर कार्य करने वाला होता है।
यदि चतुर्थेश अथवा चतुर्थ भाव से शनि का सम्बन्ध बन रहा हो तो आपका जीवनसाथी नौकरी करने वाला होगा।
कुण्डली में अगर राहु केतु सप्तम भाव में हो अथवा सप्तमेश षष्टम, अष्टम, द्वादश में हो साथ ही नवमांश कुण्डली में भी कमज़ोर हो तो जीवनसाथी समान्य नौकरी करने वाला होता है ।
√●●सप्तम भाव हिरण्यम् है। हिरण्य का अर्थ है सोना, सोने का पात्र, वीर्य, जिसका हरण किया जाय वा जो हरण करे, मूल्यवान् वस्तु स्त्री की योनि हरिण्यम् अर्थात् स्वर्णपात्र है। यह पुरुष के शुक्र/वीर्य को हरती है, खींच कर अपने में समाहित करती है, आकर्षित करती है। पुरुष का वीर्य हिरण्य वा मूल्यवान वस्तु है। यह स्त्री द्वारा खींचा जाता है, स्त्री की योनि की ओर स्वतः आकर्षित होता है। इसलिये यह हरिण्य है।
√●●स्त्री हिरण्यगर्भा है। पुरुष हिरण्यगर्भ है। दोनों के योग से प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। ये दोनों प्रजापति हैं। प्रजनन स्थान सप्तम है। इसके लिये दोनों को क्या करना चाहिये ? ऋषि कहता है...
"अथ यद्युदक आत्मानं परिपश्येत् तदभिमन्त्रयेत मयि तेज:
इन्द्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत।"
(बृहदारण्यक् उप. ६।४।६ )
√●●अथ = और। यदि = जो ।उदक (उद् + अक) = वीर्य [सामान्यतः उदक को जल कहते हैं। अक् गतौ धातु से निष्पन्न होने के कारण उदक का अर्थ है-श्रेष्ठ वा तीव्र गति वाला। आकाश से गिरने वाले जल को उदक कहते हैं। इसकी गति तीव्र एवं अनवरोध्य है। ऐसे ही वीर्य तीव्रगति से स्त्री की योनि में गिरता है। जब एक बार यह चल देता है तो इसे स्त्री की योनि में जाने से रोकना अति कठिन वा असंभव है। अनवरोध्य होने से उदक को वीर्य कहते हैं वा वीर्य को उदक कहते हैं। इस मन्त्र में उदक = शुक्र ।]
√●●आत्मानम् = अपने स्वरूप को, अपने आपको। परिपश्येत् = भली भाँति देखे, पहिचाने। तत् = उसे। अभिमन्त्रयेत = विचार करे। मयि = मुझमें ।तेजः= तेज, तीक्ष्णता। इन्द्रियम् =बल,ज्ञान।यशः=विस्तार, व्यापकत्व। द्रविणं= समृद्धि, ऐश्वर्यमयता। सुकृतम्= पुण्य, सत्कर्म, शुभत्व । इति = ऐसा । यहाँ उदक = उदके (सप्तम) = वीर्य में।
√●●पुरुष का यह जो वीर्य है, इसमें वह अपनी आत्मा का दर्शन करे। पुरुष अपने वीर्य में सर्वस्व देखे, मूल्यवान समझे अपने वीर्य को अपने वीर्य की महत्ता का विचार करे और यह जाने की मेरे इस वीर्य में तेज है, बल है, यश है, धन है तथा पुण्य है।
√●●श्रीः = शोभा, लक्ष्मी, कान्तिमती। ह वै = निश्चय हो। एषा = यह स्वी/ भार्या। यत् = जो। मलोद्वासाः = ऋतुस्नान की हुई, मैले वस्त्र उतारी हुई, पवित्रमन वाली, शुद्धाचार युक्ता, निर्मला । तस्नात् = उससे मलोद्वाससम् = ऋतुस्नाता स्त्री को यशस्विनीम् = (सदाचार के कारण) यश प्राप्त करने वाली। अभिक्रम्य = पास जाकर। उपमन्त्रयेत = (सन्तति हेतु मैथुन के लिये) विचारविमर्श करे, तैयार करे।
√●●स्त्रियों में यह पत्नी निश्चय ही पुरुष की शोभा है लक्ष्मीरूपा है क्योंकि यह निर्मल स्वाली, पवित्र मानसम्मान वाली अदूषित आचार वाली, अकलंकित चरित्रवाली, विशुद्धा है। इसलिये पुरुष ऐसी निर्मला ऋतुस्नाता स्त्री के पास जाकर सन्तान की प्राप्ति के लिये, मैथुन हेतु उस यश प्रिया अंगना से वार्तालाप करे, सम्भोग के लिये मनावे तैयार करे। यही इस मंत्र का अर्थ है। स्त्रियों को मानिनी कहा गया है। स्त्रियाँ मान करती हैं, रूठती हैं। ऐसी दशा में पुरुष को उन्हें मनाना पड़ता है, प्रसन्न करना पड़ता है इच्छुक स्त्रियों का नकार/ अस्वीकार, हाँ/ सकार, स्वीकृति का बोधक होता है। इसके लिये पुरुष प्रेम से उनको स्वीकृति (मौन स्वीकृति) अवश्य ले ऋषि कहता है ।
"सा चेदस्मै न दद्यात्काममेनामवक्रीणीयात्
सा चेदस्मै नैव दद्यात्काममेनां यष्ट्या वा
पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ।"
★ सा चेत् अस्मैनदद्यात् = वह (स्त्री) यदि इस (पुरुष) को न (स्वीकृति) देवे।
★कामम् = चाहे।
★एनाम्= इसको।
★अवक्रीणीयात्= खरीदे (भूषणादि से प्रलोभित करे, अनुकूल करे)।
★सा चेत् = वह यदि।
★अस्मै न एवं दद्यात् = फिर भी (पति पुरुष को) अनुमति न दे (तो)।
★कामम् = चाहे।
★ एनाम् = इसको।
★ यष्ट्या वा = दण्ड से।
★ पाणिना वा= हाथ से ।
अपहत्य मारकर।
★अतिक्रामेत् = (रतिकर्म का विचार) छोड़ दे।
★इन्द्रियेण = इन्द्रियबल से ज्ञान से।
★ ते= तेरे।
★ यशसा = यश से ।
★यशः =कीर्ति को।
★आददे= (मैं) लेता हूँ, छीन लेता हूँ।
★इति = ऐसा (कहे)।
★अयशा= (वह अपयशवाली ।
★एव= ही ।
★भवति =हो जाती है।
√●●पुरुष अपनी स्त्री के पास मैथुन यज्ञ का प्रस्ताव रखे और वह स्त्री इसके लिये तैयार न हो, अपनी योनि वेदी न दे तो पुरुष को चाहिये कि वह उसे कोमल उपायों से वश में करे। पर पुरुष की कामना वाली, स्वपति से घृणा करने वाली वह स्त्री यदि पुरुष को स्वीकृति न दे तो पुरुष उसे डण्डे से या हाथ से पीटे मारे मारकर वश में कर बलपूर्वक उसका यश ले, उसे सुधारे। इतना करने वा मारने पर भी वह न सुधरे तो वह अपकीर्ति वाली होती है। यही इसका अर्थ है।
√●●ऋषि ने इस मंत्र में यही कहा है कि रतिमहायज्ञ के लिये यदि स्त्री (पत्नी) सौम्य साधनों से न तैयार हो तो उसके साथ कुछ बर्ताव करे। इतने पर भी वह नहीं सुधरती, व्यभिचार से विमुख नहीं होती तो वह स्वतः अयशस्वी (कलंकिनी) हो जाती है। बलपूर्वक स्त्री के साथ मैथुन करने का निषेध है- यही तात्पर्य है। आगे ऋषि कहता है ..
"सा चेदस्मै दद्यादिन्द्रियेण ते यशसा यश
आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ।"
(बृह.उप.६/४/८)
√●●यदि वह स्त्री मारपीट धौंस से पुरुष को मैथुन करने दे तो पुरुष उससे कहे कि मैं तुम्हें अपने यश से तुम्हें यशसवी बनाता हूँ, तुम्हें आदर देता हूँ। ऐसा होने पर दोनों यशस्वी होते हैं। अर्थात् सन्तान यज्ञ द्वारा अपने यश का विस्तार करते हैं। इस मन्त्र में रतियज्ञ से यशविस्तार की बात कही गई है। पुनः ऋषि कहता है ...
"स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन
मुखं संध्योपस्थमस्या अभिमृश्य जपेत् । अङ्गादङ्गात्संभवी हृदयादधि जायसे।
स त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्धमिद्धाभिव मादयेमाममूं मयीति ।"
(बृह.उप.६/४/९)
√●● इस मंत्र में मैथुन यज्ञ की प्रकृया / प्रक्रिया का वर्णन हुआ है।
सः =वह पुरुष। याम् = जिस स्त्री को। इच्छेत् = चाहे। कामयेत = (यह स्त्री) इच्छा करे, आकृष्ट हो, कामभाव को पूरा करे। मा = मुझको ।इति=ऐसा।तस्याम् = उस (स्त्री) में। अर्थम् = अपने अभिप्राय को ।निष्ठाय = रखकर, निष्ठा से प्रकट कर। मुखेन =अपने मुख से । मुखम् = (स्त्री के) मुखको=। संघाय = मिलाकर उपस्थम् = जननेन्द्रिय को। अस्याः =इस (स्त्री) के। अभिमृश्य = अन्दर से स्पर्श कर, गाढ़स्पर्श कर। जपेत् । = जप करे (आगे के मन्त्र का)। अंगात् अंगात्= प्रत्येक अंग से, देह के हर अंग से। सम्भवसि = उत्पन्न होता है। हृदयात् = हृदय (भावना) से। अभिजायते= पैदा होता है। सः = वह ।त्वम् = तू। अंगकषाय = अंग का रस । असि= है। दिग्धविद्धाम् = विषबुझे वाण से विधी। इव =तरह ।मादय= मस्त कर दें। इमाम् = इसको अमूम् = उसको। मयि = मुझ (पुरुष) पर इति यह (मन्त्र जपे) ।
√●●पुरुष संभोग यज्ञ करने जा रहा है। इस याग को प्रयाग भी कहते हैं। यहाँ गंगा-यमुना का संगम नहीं, प्रत्युत स्त्री-पुरुष का संगम होता है। स्त्री की देह का पुरुष की देह से शिश्न का योनि से संगम होना ही प्रयाग है। दोनों स्त्री-पुरुष का एकाकार होना ब्रह्मानन्द है।
√●●अब इस मंत्र के अर्थ का अवलोकन करता हूँ। वह पुरुष जिस स्त्री को चाहे कि वह मुझको चाहे, वह स्त्री मुझसे सतत प्रेम करती रहे, हमारे काम भाव की पूर्ति करती रहे, मुझे काम सुख दे तो वह पुरुष उस स्त्री में अपने प्रयोजन को स्थापित करे, अपनी भावना से उसे अवगत कराये अपने अर्थ को अर्थात् अपनी संभोगेच्छा के प्रस्ताव को रखकर उससे अनुराग करे।
√●●मुखेन मुखे संधाय = मुख से मुख को मिलाकर अर्थात् चुम्बन करे, अधर रस पान करे। यह अधरामृत वस्तुतः अ-धरामृत है। पुरुष अपने दोनों होठों को स्त्री के दोनों होठों से मिलाये। स्त्री के अधर को अपने दोनों अधरों के बीच में रख करे उसे चूसे, चूमे। उपस्थम् अस्या अभिमृश्य= स्त्री की योनि को भीतर से दूर तक अर्थात् उसकी योनि में अपने शिश्न को अन्दर गहराई तक डालकर, योनि से उपस्थ को एक करे। फिर क्या करे ? जपेत् = इस मन्त्र का जप करे, इस विचार में डूब जाय। कौन सा मन्त्र वा विचार ?
√●●अंगद अंगात् सम्भव हृदयाद अधिजायते =यह प्रेम मेरे अंग प्रत्यंग से पैदा हो रहा है तथा यह प्रेम हार्दिक है-मेरे हृदय की गहराई से उत्पन्न हो रहा है। इस बात को पुरुष उस स्त्री से कहे कि वह उससे तन-मन से प्रेम करता है, हर प्रकार से चाहते हुए उसमें अनुरक्त है तथा उस पर न्यौछावर है। सः त्वम् अंगकषाय असि = त्वम् सः असि, अंगकपाय असि।
√●● हे स्त्री ! तुम वह (विष्णु) हो। मेरे लिये तुम सब कुछ हो। तुम ब्रह्म हो। ब्रह्म आनन्द है। तुम मेरे लिये आनन्द हो, सुख की स्रोत हो। इसलिये तुम वह बस हो। तुम अंगकपाय हो, मेरे अंगों की रस हो, सार हो। कोष में कषाय का अर्थ है- मधुर स्वर वाली, सुगन्धित अतः यहाँ पर पुरुष यह भाव लाये कि यह स्त्री मधुकण्ठा है, सुगन्धी है। (अतएव) प्रेय है। दिग्वविद्धाम् इव मादव इमाम् अमूम् मवि इति = जैसे विषलिप्त वाणों के लगने से मृगी चेतना शून्य हो जाती है, अधिकार में आ जाती है, समर्पण कर देती है, वैसे ही यह स्वी मेरे प्रेम से विद्ध होकर मुझमे मत्त हो जाय, मेरे लिये मतवाली हो जाय सतत सम्भोग के लिये उत्सुक रहे। इमाम्= इस स्त्री को, अमूम् = वह मेरा प्रेम, मयि= मुझमें मादय = मतवाली कर दे। बिना मेरे वह रह न सके। यह मंत्र है।
√●●ऋषि का आदेश है कि पुरुष सम्भोग के समय / सम्भोग काल में/सम्भोग करते समय / देहाश्लेष होने पर, एकामचित्त होकर स्त्री को ध्येय बनाकर, सम्भोग क्रिया का ध्यान करते हुए मन ही मन मन्त्र का जप करे। इससे ध्याता पुरुष जो सुख पाता है और जो सुख उस स्त्री को देता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यह अनिर्वाच्य ब्रह्मानन्द सदृश होता है।
√●●"उपस्थम् अस्या अभिमृश्य" वाक्यांश का अर्थ यह भी है-इसके उपस्थ को हाथ से छूकर। कामशास्त्र की यह विधि है कि स्त्री की योनि को हाथ से छूने, मालिश करने पर वह पुरुष के प्रति शीघ्र अनुरक्त होती है आत्मसमर्पण करती है। इसके बाद उपस्थ का उपस्थ से संस्पर्श करना बताया गया है अर्थात् तब योनि छिद्र में कृच्छ लिंग डाले। 'मुखेन मुखम् संघाय - चुम्बन / मुख चुम्बन/ ओष्ठ चुम्बन से स्त्री के योनि की कठोरता दूर होती है, मृदुता आती है साथ ही साथ पुरुष का लिंग कठोरता को धारण करता है, कोमलता त्यागता है। इसलिये, ओष्ठ दंशन एवं उपस्थ स्पर्श मैथुन यज्ञ के दो आवश्यक पूर्व कर्म हैं। विज्ञ गृहस्थ इसे करता है।
√●●संभोग यज्ञ में शुक्र ग्रह की मुख्य भूमिका होती है। भाव २ वृषराशि मुख है। भाव ७ तुला राशि उपस्थ है। दोनों राशियों शुक्र की हैं। इस यज्ञ में पुरुष का मुख स्त्री के मुख से मिलता है, उपस्थ उसके उपस्थ से मिलता है। ये दोनों द्वितीय (मुख) एवं सप्तम (उपस्थ) मारक भाव हैं। इन्हीं दो के चक्कर में सारा संसार फँसा है। इससे निकलने का कौन प्रयास करता है ?
√●● मुख के अन्तर्गत कई अंगों की अवधारणा होती है।【 यथा- २ आँख, २ कान, २ नासाछिद्र २ ओष्ठ, २ जबड़े दंत पंक्ति, २ कपोल, १ चिबुक (ठोढी), १ जिह्वा, १ ललाट इनका कुल योग होता है- १५ अर्थात् पूरा एक पक्ष पक्ष की कालावधि का विचार शुक्रमह से होता है। क्षण =लग्न, मूहूर्त २ घटी = चन्द्रमा, बार १ दिन= मंगल, पक्ष १५ दिन= शुक्र, ऋतु २ मास= बुध, मास ३० दिन गुरु, आयन ६ मास = सूर्य, वर्ष = शनि】स्त्री पुरुष एक दूसरे को देखते हैं यह चक्षु व्यापार है। दोनों एक दूसरे के वाक्य सुनते हैं। यह श्रोत्र व्यापार है। जब दोनों में दैहिक निकटता आती है तो दोनों ओठ आपस में मिलते हैं। यह ओष्ठ व्यापार (अधरामृतपान) है रतियुद्ध में दोनों परस्पर दोनों दन्त पंक्तियों को एक दूसरे पर गड़ाते हैं, दन्तक्षत करते हैं। यह दन्त व्यापार है। एक दूसरे से अपने कपोल सटाते हैं, चूमते हैं। यह कपोल व्यापार है। संभोग में नाक मिलती है, श्वाँस वायु से फुफ्फुस का सिंचन करते हैं। यह बाण व्यापार है। चिबुक से चिबुक टकराता है, जिह्वा से जिहा लड़ती है, माथे से माया छूता है। यह सब भाव २ से, मुख क्षेत्र से सम्पन्न होता है। वृष भोग राशि है। सप्तम भाव से तुला व्यापार होता है। इसमें योनि और लिंग एक दूसरे में लीन हो जाते हैं। इस प्रकार दोनों स्त्री-पुरुष अपने-अपने सप्तम एवं द्वितीय भावों से जूझते हैं। इस रति कलह में दोनों घायल होते हैं, मरते हैं, पराजित होते हैं। इसीलिये ऋषियों ने इन दो भावों २ एवं ७ को मारक की संज्ञा दी है।
√●●और कौन-कौन से ग्रह है ? जो रतियज्ञ में शुक्रग्रह के सहायक हैं। शुक्र के बाद चन्द्रमा का स्थान है। चन्द्रमा मन है। बिना मन के यज्ञ सम्भव ही नहीं है। चन्द्रमा वक्ष/स्तन है। पुरुष तो स्त्री के स्तनों से कोड़ा करता ही है तथा स्त्री अपने स्तनों से / पर पुरुष के वक्ष का कठोर स्पर्श/ भार की आकांक्षा रखती है चन्द्रमा के बाद आता है, बुध बुध की दो राशियों हैं-मिथुन और कन्या मिथुन दोनों भुजाएँ हैं, कंन्या कटि प्रदेश है। स्त्रीपुरुष परस्पर अपनी भुजाओं में बँधते हैं, आलिंगन, परिरम्भन में भुजाओं से एक दूसरे को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं। कटि प्रदेश जननांगों के सर्वाधिक निकट है। इसकी लोच्यता से रतिकर्म सफल एवं सुखद होता है।
√●●मिथुन और कन्या का स्वामी बुध है। अतः बुध पूरी शक्ति से इस यज्ञ में भाग लेता है। बुध कोमल/ सैण ग्रह है। बुध के बाद गुरु का स्थान है। गुरु की मूल त्रिकोणराशि है, धनु। धनु है जघन प्रदेश, नितम्ब। शरीर का सर्वाधिक पुष्ट भाग है, यह जनननांगों की स्थिति इसी में है। नितम्ब काम का रहस्यमय निवास है। दोनों जायें और नितम्ब रतिक्रिया को आह्लादक बनाते हैं। ये उत्प्रेरक हैं। केवल यही चार ग्रह- शुक्र चन्द्र बुध गुरु हैं जो रति कर्म को बढ़ावा देते हैं, संचालित करते हैं, सम्भालते हैं, स्थायित्व देते हैं। ये सभी शुभ ग्रह हैं। इसलिये रति कर्म एक शुभ कर्म है, पुण्य कर्म है, दिव्य कर्म है। इसका वर्णन शब्दों में सम्भव नहीं।
√●●अशुभ ग्रहों के प्रवेश से रतिकर्म का आनन्द चला जाता है, यह क्रिया अभिशाप बन जाती है। इसको दूषित करने वाले ग्रह हैं तीन सूर्य, मंगल शनि ये तीनों पापी और पृथक्कारक यह शुष्क हैं, कठोर हैं निर्दय हैं। यहाँ भावना का स्थान नहीं। सूर्य क्या करता है ? सूर्य की राशि सिंह= पेट। स्त्री गर्भवती होती है, पेट फूल आता है, मैथुन में बाधा होती है। पुरुष वा स्त्री की तोंद निकलने पर भी मैथुन में व्यवधान खड़ा होता है। मंगल क्या करता है ? मंगल की मूल त्रिकोण राशि मेष =सिर= विचार ।विचार दूषित कर बलात्कार कराता है, झगड़ा कराता है। इस प्रकार रतिसुख को यह सबसे ज्यादा चौपट करता है। शनि क्या करता है ? शनि की रशि/मूलत्रिकोण राशि है, कुम्भ= टाँग ।मैथुन में टांगों का कोई प्रयोग नहीं होता। शनि है ठण्डा, पुरुष नपुंसक। यह मैथुनशक्ति क्षीण करता है, मैथुन कर्म से विलग करता है। यह है बूढ़ा। वृद्धावस्था में मैथुन से प्रायः उदासीनता ही रहती है। इस प्रकार ये तीनों यह रतियज्ञ के बाधक है, साधक नहीं।
√●●शुभ ग्रहों की उपस्थिति में रति संग्राम रोचक होता है। गुरू देह को मांसल एवं भरी पुरी रखता है। बुध विनोदप्रिय एवं क्रीड़ाकुशल बनाता है। शुक्र मुख को आकर्षक करता तथा जननांगों को सामर्थ्य देता है। चन्द्रमा मन को भोगी एवं चञ्चल किये रहता है। इस कारण से रतियुद्ध ध्वंसक न होकर सर्जक होता है। इसके लिये जोड़ा ठीक होना चाहिये। दोनों स्त्री-पुरुष तन-मन से एक दूसरे के पूरक एवं सहयोगी हों, गुण पर्याप्त मिलते हो !
√●●जब इस युद्ध में बुध गुरु शुक्र चन्द्र पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है तो खटपट होना निश्चित है। न्यूनाधिक रूप से हर कुण्डली में ये पाप ग्रह- सूर्य मंगल शनि प्रभाव डालते ही हैं। इनके कारण दाम्पत्य जीवन नरक हो जाता है। जीवन का रस चला जाता है। राहु एक ऐसा ग्रह है जो जीवन को नीरस नहीं अपितु कुरस कर देता है। केतु का प्रभाव विचित्र एवं अवाच्य है।
√●●गीता का एक श्लोक है...
"त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
काम क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।"
(अध्याय १६, श्लोक २१ )
त्रिविधम् नरकस्य इदम् द्वारम् नाशनम् आत्मनः । कामः क्रोधः तथा लोभः तस्मात् एतत् त्रयम् त्यजेत् ॥
√●●यहाँ काम को नरक के तीन द्वारों में से एक द्वार कहा गया है। वस्तुतः है ऐसा नहीं ! इसमें काम, क्रोध, लोभ का अर्थ कुछ और है।
काम= अयुक्त इच्छा / दुरिच्छा ।
क्रोध= असहनशीलता।
लोभ = अदेयता / दान न देने की वृत्ति।
नरक= दुःख ।
√●● जिसमें सदिच्छा नहीं है, वह कामी है। जिसमें सहनशक्ति का अभाव है, वह क्रोधी है। जो अर्जन करता है, पर दान नहीं करता वह लोभी है। कामी क्रोधी लोभी- ये तीनों दुःखी रहते हो। ये तीनो मैथुन यज्ञ के लिये अयोग्य होते हैं। जो अकाम है, अक्रोध है, अलोभ है, वही सम्भोग के महासमर में प्रफुल्लित रहता है, वही शुक्राभिषेक का सुख भोगता है, वही रतियाग से निकले हुए धुएँ की सुगन्धित वायु में साँस लेता है- आनन्दित होता है। सप्तम भाव का यह प्रवचन ऐसे ही लोगों के लिये है। ऐसे वैष्णवजन को मेरा शत-शत प्रणाम ।
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्