सनातन व्रत के वैज्ञानिक लाभ

सनातन व्रत के वैज्ञानिक लाभ

किसी उद्देश्य प्राप्ति के लिए दिनभर में भोजन का सेवन न करना व्रत कहलाता है। हिंदू धर्म में व्रत रखने को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। कहा जाता है कि लोग अपनी आस्था के अनुसार अगल-अलग देवी-देवताओं के लिए व्रत रखते हैं। ज्योतिषियों का कहना है कि व्रत रखने से देवी-देवता खुश होते हैं। व्रत को खास मौके पर रखा जाता है। कई बार साप्ताहिक व्रत रखा जाता है तो कई बार किस खास मौके पर व्रत रखा जाता है।व्रत धर्म के मार्ग पर चलने का एक साधन है। यह अपवित्रता का नाश करता है। यह तन-मन व आत्मा की शुद्धीकरण करता है। यही नहीं, यह पुण्य के उदय का आरंभ है। यह मनोकामना की पूर्ति का मार्ग है। और तो और, सफल व्रत परम पुरुषार्थ की सिद्धी होता है। यह शरीर के शोधन की वैज्ञानिक पद्धति है। कहा गया है- लघनम् सर्वोत्तम् औषधं, अर्थात् व्रत ही सर्वश्रेष्ठ औषधि है।

तन का शुद्धीकरण
व्रत रखने से रक्त शुद्ध होता है। इससे आतों की सफाई होती है। पेट को आराम मिलता है। उत्सर्जन तंत्र और पाचन तंत्र, दोनों ही अपनी अशुद्धियों से छुटकारा पाते हैं।

रोगों से मुक्ति
व्रत कई तरह के रोगों से मुक्ति का रास्ता है। इससे सांस लेने की क्रिया ठीक होती है। फेफड़ों की सफाई हो जाती है। उपवास रखना हृदय के लिए बहुत अच्छा माना गया है। यह कैलोस्ट्रोल के स्तर को घटाता है। अर्थराइटिस, अस्थमा, इरिटेवल बॉवेल, आदि बीमारियों में यह कारगर है।

ऊर्जा का स्रोत
व्रत ताजगी का एहसास देता है। आप यह महसूस करने लगते हैं कि आप खुल रहे हैं। आपके विकार दूर हो रहे हैं। शरीर हल्का हो रहा है। यह शरीर में पहले से संचित कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन को इस्तेमाल होने का अवसर देता है। उपवास से आपकी स्मरण-शक्ति बढ़ती है।

सहनशक्ति प्रदान करना
व्रत आपकी सहनशक्ति को बढ़ाता है। आप अपनी इन्द्रियों पर काबू रखना सीख जाते हैं। मन को शांति की प्राप्ति होती है।

बेरुचि घटाने का काम
कई बार कई कारणों से भोजन अरुचिकर लगने लगता है। दरअसल, इसमें स्वाद ग्रहण करने वाली ग्रंथियां काम करना बंद कर देती हैं। ऐसे में, उपवास मुंह, जीभ और स्वाद ग्रहण करने वाली ग्रंथियों को आराम देता है। और फिर से ये ग्रंथियां जागृत हो उठती हैं। भोजन प्रिय लगने लगते हैं।व्र
त रखने के धार्मिक महत्व होने के अलावा कई वैज्ञानिक महत्व भी हैं। आयुर्वेद में बताया गया है कि व्रत रखने से पाचन क्रिया को आराम मिलता है। अगर हम एक दिन कुछ नहीं खाते हैं तो हमारा पाचन तन्त्र ठीक रहता है। इससे शरीर के हानिकारक तत्व बाहर निकलते हैं। जिस दिन व्रत रखा जाता है उस दिन फैट बर्निंग प्रोसेस तेज हो जाता है, जिसेस शरीर की चर्बी तेजी से गलना शुरू हो जाती है। जिस दिन व्रत रखा जाता है उस दिन मेटाबॉलिक रेट में तीन से 14 फीसदी तक बढ़ोत्तरी होती है। साथ ही व्रत रखने दिमाग भी स्वास्थ्य रहता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया के जानकारों के अनुसार कैंसर के मरीजों के लिए व्रत रखना बहुत फायदेमंद होता है। जो मरीज कीमोथेरेपी ले रहे हैं उन लोगों के लिए व्रत रखना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। कहा जाता है कि व्रत रखने से नई प्रतिरोधक कोशिकाएं बनती हैं।

अगर हर सप्ताह उपवास रखा जाता है तो शरीर में कोलेस्ट्राल की मात्रा घटती है, जो धमनियों के लिए बहुत लाभदायक होता है।

व्रत रखने से डिप्रेशन जैसे परेशानियों से निजात मिलती है। इससे तनाव दूर होता है। जिस दिन व्रत रखा जाता है उस दिन शरीर में ऊर्जा कम हो जाती है। शरीर की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए लगातार पानी पीते रहने की जरूरत होती है।

डॉयबिटीज के रोगियों के लिए व्रत रखना बहुत फायदेमंद माना जाता है। इससे हमारे शरीर को कार्बोहाइड्रेट्स को प्राप्त करने की क्षमता बढ़ती है।

हमारी पौराणिक कथाओं में प्रत्येक उपवास का कोई न कोई वैज्ञानिक आधार भी बताया गया है। उन्हें कर्मकांडों से इसलिए जोड़ा गया, ताकि जनसाधारण उपवास का वैज्ञानिक आधार समझे बिना भी उनकी जरूरत समझ सकें। 

उपवास और भूख हड़ताल को लेकर लोग अक्सर भ्रमित रहते हैं। भूख हड़ताल में कुछ भी खाया-पीया नहीं जाता है, जबकि उपवास का अर्थ पांच ज्ञानेंद्रियों और पांच कर्मेंद्रियों पर नियंत्रण से है। व्रत या उपवास में खाने-पीने पर रोक नहीं है, लेकिन वह अनुशासित होना चाहिए। वैदिक या आध्यात्मिक व्रत की चर्चा यजुर्वेद के कर्मकांड में भी की गई है। 

भगवद्गीता के अनुसार हमारा व्यवहार, विचार, भोजन और जीवनशैली तीन चीजों पर आधारित होती है- सत्व, तमस और राजस। सात्विक विचारों वाला व्यक्ति निश्चिंत स्वभाव का होता है और सृजनशील भी। राजसी विचारों वाला व्यक्ति महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ लालची भी होता है। वहीं तामसी प्रवृत्ति का व्यक्ति न सिर्फ नकारात्मक सोच रखता है, बल्कि वह गलत कार्यों में भी संलग्न रहता है। 

योगी या ऋषि बनने का मार्ग सात्विक विचारों से खुलता है। हम सभी सत्व, रजस और तमस के बीच झूलते रहते हैं। हमारा झुकाव राजसी और तामसी प्रवृत्तियों की ओर न होने पाए, इसके लिए जरूरी है कि हम खुद को संतुलित करना सीखें। इसका एक प्रभावी तरीका है वैदिक उपवास। 

वैदिक उपवास कुछ और नहीं, बल्कि 24 घंटे तक शरीर और मस्तिष्क को सत्व की स्थिति में रखने की एक कोशिश है। यह कार्य समर्पण और अनुशासन के बिना हो पाना असंभव है। यह भी जरूरी है कि उपवास जबर्दस्ती नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेरणा के तहत रखा जाए। साथ ही, उपवास के दौरान राजसी-तामसी वस्तुओं के इस्तेमाल से पूरा परहेज बरता जाए।

अब सवाल है कि वह कौन सा सात्विक भोजन है, जो उपवास में ग्रहण किया जा सकता है। इसका जवाब है- दूध, घी, फल और मेवे। इनका भोजन उपवास में इसलिए मान्य है, क्योंकि ये भगवान को अर्पित की जाने वाली वस्तुएं हैं। वैसे भी प्रकृति प्रदत्त यह भोजन शरीर में सात्विकता बढ़ाता है। भगवद्गीता के अनुसार मांस, अंडे, खट्टे और तले हुए, नमकीन व ठंडे पदार्थ राजसी-तामसी प्रवृतियों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए वैदिक उपवास के दौरान इनका सेवन नहीं किया जाना चाहिए। 

उपवास के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठानों का भी व्यापक अभिप्राय है। असल में इस तरह के अनुष्ठानों से शरीर में पैदा होने वाले विषैले पदार्थों के प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है। शारीरिक शुद्धि के लिए तुलसी जल, अदरक का पानी या फिर अंगूर इस दौरान ग्रहण किया जा सकता है। जबकि मानसिक शुद्दिकरण के लिए जाप, ध्यान, सत्संग, दान और धार्मिक सभाओं में भाग लेना चाहिए। 

उपवास के दौरान हिंसा और सेक्स से भरपूर दृश्यों और बातों से भी बचना चाहिए। इस प्रकार कह सकते हैं कि वैदिक उपवास शारीरिक, मानसिक और अंतःकरण के संपूर्ण शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। यह धारणा गलत है कि उपवास सिर्फ महिलाओं को ही करना चाहिए। उपवास का लाभ किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष उठा सकते हैं। 

उपवास से धार्मिक अनुष्ठानों को इसलिए जोड़ा गया, ताकि स्वास्थ्य के पहलू पर ध्यान दिया जा सके। जैसे संतोषी मां का व्रत। शुक्रवार के दिन शादीशुदा महिलाएं यह व्रत रखती हैं और गुड़-चने का प्रसाद लेती हैं। गुड़ शरीर में आयरन (लोहा) की पूर्ति करता है, तो चने से प्रोटीन मिलता है। 

उपवास की प्रक्रिया सिर्फ कम खाने या सात्विक भोजन से ही पूर्ण नहीं हो जाती। इस दौरान सुबह-शाम ध्यान करना भी जरूरी है। इससे दिमाग शांत होता है और मन में सद्विचारों का प्रवाह होता है। उपवास की अवधि में न तो किसी का अहित सोचना चाहिए और न ही किसी से गलत व्यवहार करना चाहिए। रमजान के दौरान उपवास रखने वाले मुसलमान लड़ाई-झगड़े या अपशब्द कहने आदि से भी परहेज करते हैं।

इसी आक्सीजन को भारतीय योगियों ने 'प्राणवायु' कहा है। जब हम भोजन नहीं करते तो इतनी प्राणवायु खर्च नहीं होती जितनी भोजन करने पर होती है। योग विज्ञान के अनुसार शरीर में 🌈सात चक्र होते हैं – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धाख्या, आज्ञाचक्र एवं सहस्रहार। 

हृदय में स्थित अनाहत चक्र के नीचे के तीन चक्रों में मन तथा प्राणों की स्थिति साधारण अथवा निम्नकोटि की मानी जाती है जबकि अनाहत चक्र से ऊपर वाले चक्रों में मन तथा प्राणों की स्थिति साधारण अथवा निम्नकोटि की मानी जाती है जबकि अनाहत चक्र से ऊपर वाले चक्रों में मन तथा प्राण स्थित होने से व्यक्ति की गति ऊँची साधनाओं में होने लगती है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार जब हम भोजन करते हैं तो उसे पचाने के लिए आक्सीजन की आवश्यकता होती है। 
भोजनको पचाने के लिए प्राणवायु को नीचे के केन्द्रों (पेट में स्थित आँतों) में आना पड़ता है। मन तथा प्राणों का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है अतः प्राणों के निचले केन्द्रों में आने से मन भी इन केन्द्रों में आता है। *योग शास्त्र में इन्हीं केन्द्रों को काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों का स्थान बताया गया है।

उपवास रखने से मन तथा प्राण सूक्ष्म होकर ऊपर के केन्द्रों में रहते हैं जिससे आध्यात्मिक साधनाओं में  गति मिलती है तथा एकादशी को मनः शक्ति का केन्द्र चन्द्रमा की ग्यारहवीं कक्षा पर अवस्थित होने से इस समय मनोनिग्रह की साधना अधिक फलित होती है। 

अर्थात् उपयुक्त समय भी हो तथा मन और प्राणों की स्थिति ऊँचे केन्द्रों पर हो तो यह सोने में सुहागा वाली बात हो गयी। ऐसे समय जब साधना की जाय तो उससे कितना लाभ मिलेगा इस बात का अनुमान सभी लगा सकते हैं।
अक्सर श्रद्धा और भक्ति के लिए और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए व्रत रखते हैं। व्रत या उपवास वैज्ञानिक रूप से भी रखा जाता है और आध्यात्मिक रूप से भी रखा जाता है। विज्ञान भी कहता है कि व्रत-उपवास रखना फायदेमंद है और आध्यात्म भी कहता है कि व्रत और उपवास रखना लाभकारी होता है। इसका मूल उद्देश्य वैज्ञानिक रूप से ये होता है कि शरीर हमारा स्वस्थ हो जाए, शरीर शुद्ध हो जाए।

आध्यात्मिक रूप से व्रत रखने से मन और आत्मा को नियंत्रित किया जाता है। मन और आत्मा दोनों नियंत्रण में आ जाते हैं। अलग-अगल तिथियां और अलग-अलग तरह के दिन आपके मन को और आपके शरीर को अलग-अलग तरह से प्रभावित करते हैं। या अलग-अलग तिथियों के हिसाब से या अलग-अलग दिनों के हिसाब से मन विभिन्न प्रकार से प्रभावित होता है। इसको ध्यान में रखकर अलग-अलग तिथियों और दिनों को उपवास या व्रत का विधान बनाया गया है। किस तिथि का हमारे शरीर पर, हमारे मन पर कैसा असर पड़ेगा। या किस दिन का हमारे मन पर शरीर पर कैसा असर पड़ेगा उसको ध्यान में रखकर व्रत और उपवास के नियम बनाए गए हैं।

विशेष तिथियों या दिनों को व्रत-उपवास रखने से शरीर और मन तो शुद्ध होता ही है साथ ही इससे मनचाही इच्छा भी पूरी हो जाती है। व्रतों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण जो व्रत माने जाते हैं वे हैं-एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या और नवरात्रि। ये व्रत सामान्य तौर पर पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा पवित्र माने जाते हैं। कहते हैं कि मनुष्य एकादशी का नियमित रूप से व्रत रखता है तो उसके मन की चंचलता समाप्त हो जाती है। साथ ही साथ धन और आरोग्य की भी प्राप्ति होती है। अगर कोई व्यक्ति पूर्णिमा या अमावस्या का व्रत रखता है क्योंकि ये भी व्रत बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। पूर्णिमा और अमावस्या का व्रत रखने से हार्मोन्स की समस्या ठीक हो जाती है।

साथ ही जिन्हें मानसिक बीमारियां हैं वे भी इससे निजात पा लाते हैं। इसके अलावा साल में 4 बार ऋतुओं की संधियां पड़ती है। उस समय शरीर की धातुओं को संतुलित करने के लिए नवरात्रि के व्रत का विधान है। उस समय मौसम के बदलने से हमारे शरीर पर, हमारे मन पर कोई असर न पड़े। इसलिए नवरात्रि के व्रत का विधान बनाया गया है। वर्ष में अगर कोई व्यक्ति केवल दोनों नवरात्रियों में नौ-नौ दिन का उपवास रखता है तो उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसके अलावा साल भर स्वस्थ भी बने रह सकते हैं।

गृहस्तियों हेतु शंकराचार्य जी के बनाये मासिक श्रेष्ठ व्रत आपको सभी कस्टो से मुक्ति दिलाएंगे:साथ में गृह जो नियंत्रित, शुभ और प्रभावित होते है 

1.गणपति: (हर महीने में दो बार)
(सूर्य,चंद्र ,केतु, मंगल, बुद्ध, गुरु,शुक्र,राहु)
मासिक कृष्ण और शुक्ल चतुर्थी को संकष्टी गणेश एवं विनायकी गणपति   क्रमशः

2.सूर्य एवं कार्तिकेय : (हर महीने में दो बार)
(सूर्य, मंगल, बुद्ध,गुरु)
मासिक कृष्ण और शुक्ल षष्ठी￰￰ को 
सूर्य एवं स्कंध क्रमशः,

3.दुर्गा भैरव : (हर महीने में दो बार)
(सूर्य,चंद्र,शुक्र,मंगल,बुध,शनि,राहु केतु)
मासिक कृष्ण और शुक्ल अष्ट्मी नवमी भैरव और दुर्गा क्रमशः, 
 
4.श्री हरिविष्णु :(हर महीने में दो बार)
(बुद्ध,गुरु,शुक्र,शनि,राहु,केतु एवं नवग्रहपीड़ा मुक्ति , पापहरण, पापशमन)
मासिक कृष्ण और शुक्लएकादशी 
द्वादशी पूर्णिमा  

5.शिव-गौरी :(हर महीने में दो बार)
(सूर्य,चंद्र,बुद्ध,शुक्र,)
मासिक कृष्ण और शुक्ल त्रयोदशी प्रदोष काल को शिवजी, मासिक कृष्ण शुक्ल चतुर्दशी शिवरात्रि,

6.सत्य नारायण एवं पितरेश्वर:
(हर महीने में दो बार)
चंद्र ,गुरु,शुक्र, बुद्ध, शनि,राहु, केतु 
मासिक पूर्णिमा एवं अमावस्या क्रमशः

इस प्रकार 12 व्रत हर महीने और 12×12=144 दिन साल के और अंकशास्त्र के हिसाब से 1+4+4=9
पूर्णांक है जो पूर्ण सिद्धि कारक है 

दूसरा तरीका जो 108 दिनों का है
4 नवरात्री त्रेमासिक  - 9x4= 36. दिन 
2 प्रदोष प्रतिमाह -  2x12=24
2 एकाद्शी प्रतिमाह -  2x12=24
2 चतुर्थी प्रतिमाह  -  2x12=24
2 पूर्णिमा एवं अमावस -  2x12=24

सूर्य आदि सात ग्रहों के नाम पर सप्ताह के सात दिन तय किए गए हैं। हर वार का अधिपति कोई एक ग्रह है, लेकिन ग्रह देवों को भी अन्य प्रधान देवों के साथ जोड़ा गया है। इस सबके पीछे विज्ञान, ग्रहों की चाल, ऋतुचर्या, दिनचर्या और स्वस्थ सुखी रहने के तौर-तरीके बड़ी कुशलता के साथ पिरोए गए हैं।

वारों का क्रम किस प्रकार तय है यह समझने के लिए हमें आसमान में ग्रहों की कक्षाओं के क्रम को समझना होगा। ये इस प्रकार हैं-  1. शनि 2. गुरु 3. मंगल 4. रवि 5. शुक्र  6. बुध 7. चंद्रमा। इनमें हर चौथा ग्रह अगले वार का मालिक होता है जैसे, रविवार के बाद उससे चौथे चन्द्रमा का, फिर चन्द्र से चौथे मंगल का क्रमश: वार आता-जाता है।

वारों के अधिदेवता

ग्रहों को मूल रूप से विष्णु या महादेव के अंश से उत्पन्न समझा जाता है। सूर्य की पूजा, नमस्कार, अर्घ्य देना तो खास तौर पर विष्णु और शिव ही क्यों, सब तरह की पूजा में अनिवार्य कहा गया है। वारपति ग्रह और अवतारों का संबंध इस तरह से है- 
1. सूर्य- रामावतार, 2. चन्द्र- श्रीकृष्णावतार, 3. मंगल- नृसिंह अवतार, 4. बुध- बुद्ध अवतार, 5. गुरु-वामन अवतार, 6. शुक्र- परशुराम अवतार, 7. शनि- कर्म अवतार।
इससे हम आसानी से समझ सकते हैं कि सब ग्रह आदि देव विष्णु या शिव जो भी नाम दें, उसी से निकले हैं।

रविवार का वारपति सूर्य स्वयं जीवन का आधार होने से विष्णु रूप कहा गया है। अत: ’आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ के नियम से रोग के प्रकोप को कम करने, स्वस्थ रहने, दवा का अनुकूल प्रभाव पैदा करने और आयु की रक्षा तथा आत्मबल, तन व मन की ताकत को देने वाला सूर्य है। जन्म का कारण होने से सविता, प्रसविता, प्रसव कराने वाला परिवार वृद्धि का देवता है। जो लोग प्रजनन अंगों के विकार के कारण, अज्ञात कमी की वजह से औलाद का सुख नहीं देख पाते हैं, उनके लिए सूर्य की उपासना बहुत मुफीद होती है। सूर्य के लिए गायत्री मंत्र, केवल ओम् नाम या ‘ओम् घृणि: सूर्य आदित्य:’ का जप करना, जल चढ़ाना, माता पिता या उनके जैसे जनों को ठेस न पंहुचाना अच्छा है। 
सूर्य को प्रसन्न रखने के कुछ अन्य मार्ग ये हैं-
सुबह मुंह को गीला रखकर सूर्य के सामने गायत्री मन्त्र या ओम् नाम का 10 या 28 बार जप करना चाहिए। 
घर में धूप और खुली हवा का प्रबंध, धूप सेंकना, बुजुर्गो के मन को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए।
घर में गंगाजल या किसी कुदरती सोते का जल सहेजना चाहिए।
संक्रान्ति, अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी के दिन और दोनों वक्त मिलने के समय कलह, बहस, देर तक सोना और संभोग से बचें। इनसे सारे ग्रहों की अनुकूलता बनती है।

सोमवार का पति चंद्रमा मन, विचार, भावुकता, चंचलता, आवेग और आवेश का प्रतीक है। चंद्र की अनुकूलता से मन पर नियंत्रण, निर्णय करने की सही दिशा और दिल के बजाए दिमाग से अधिक काम लेने की आदत बनती है। सोम जल का ग्रह होने से शिव को खास प्रिय है। इस दिन शिवजी की पूजा, आराधना करना उपयुक्त है। ध्यान रखें शिव की पूजा सदा माता पार्वती के साथ ही साम्बसदाशिव के रूप में ही सांसारिक सुखों के लिए अधिक फलदायी है। 
चंद्र को प्रसन्न रखने के कुछ  तरीके ये हैं-
दूध, खीर, सेवई, मिठाई, पनीर, दान करना चाहिए और तारों की छांव या चांदनी में कुछ देर बैठना चाहिए।
बड़, पीपल, गूलर की गोलियां, फल या जड़ घर में रखें। अपनी कुल प्रतिष्ठा, सम्पदा को संभालें। पानी का सेवन करना और माता-पिता से अलगाव या दूरी न रखना चन्द्रमा को प्रसन्न रखने का कारगर तरीका है।
दूध में मुल्तानी मिट्टी, चोकर या बेसन मिला कर उबटन करें। किसी के सामने अपनी व्यथा का रोना न रोएं।

मंगलवार का वारपति मंगल, युद्घ और हथियारों का ग्रह हैं। इसके देवता वीर हनुमान, एकदंत गणेश और मलय स्वामी हैं। हनुमान जी की पूजा, प्रसाद चढ़ाना, मंगल का व्रत रखना और इस दिन शाकाहार करना अच्छा है। हनुमान चालीसा का पाठ आसान और कारगर उपाय है। अतिरिक्त शुभता के लिए-
अपने सगे भाई बहनों के लिए अपशब्द न कहें और स्त्रियों से बहस न करें।
मीठी सुहाल, पूए, चीले, पूरनपोली खाएं, खिलाएं और बांटें।
भाभियों से सामान्य व्यवहार रखें और कभी विकलांगों की सहायता करें।
नीम, बबूल का सेवन किसी तरह से करें और पेड़-पौधों की देखभाल करते रहें।

बुधवार का वारपति बुध, बुद्धि, हास-परिहास, अभिनय और कला और वनस्पतियों का ग्रह है। इसके प्रधान देव विष्णु हैं। अत: विष्णु जी के किसी रूप की आराधना करना शुभ है। 
ओम् नमो भगवते वासुदेवाय या 
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।।
का जप करना श्रेयस्कर है। 
कुछ बोनस शुभता पानी हो तो अपनाएं-
मांस मदिरा, मानसिक हिंसा, पक्षियों को पालना, ससुराल से गहरे संबंध रखना आदि बातों से बचें।
वनस्पति, जड़ी-बूटी पाले प्रसाधन इस्तेमाल करना, सोना धारण करना, पौधे रखना, बहन बेटी और उनके परिवार जनों का आदर करना, केसर लगी मिठाई या केसरी हलुवा या मूंग दाल के पदार्थ खाना खिलाना शुभ है।
दादी को कोई भेंट देने, सांड को गुड़ रोटी खिलाने, केले और बताशे बांटने से बुध प्रसन्न रहता है।
स्नान जल में चावल डालना, पीपल में जल देना, हरी सब्जी शिवजी को भेंट करना, कभी पत्ते के दोने में कुछ खाना, कभी दान करना मंगलकारक है।

गुरुवार का देवता संसार का सृजनहार ब्रह्मा है। अत: विवाह, संतान सुख, परिवार सुख, ज्ञान, वाणी और हुनर के साथ बड़प्पन अधिकार का स्वामी बृहस्पति है। इसके लिए सिर्फ ओम् नाम का जप करना काफी फायदेमंद है। 
अधिक शुभता के लिए-
किसी के साथ कपड़े शेयर न करें। चरित्र, जुबान और आचरण को मजबूत रखें।
हल्दी वाली रोटी, चने की दाल, पीला वस्त्र, घी, बूरे का सेवन वितरण करें।
कन्याओं का आदर करें।

शुक्रवार देवी के आधीन है। अत: दुर्गा पूजा, दीपक जलाना, खेतड़ी बोकर रखना, कन्यापूजन, करना और जालसाजी, झूठी गवाही से बचना अच्छा है। दुर्गाचालीसा आदि पढ़ना, खुशबू का प्रयोग, धूपबत्ती जलाना, साफ-सुथरा और आकर्षक बनने की कोशिश करना शुभ है।

शनिवार के अधिपति भैरव, हनुमान, महाकाली, नृसिंह हैं। भावनानुसार इनमें से किसी की पूजा आराधना करना अच्छे परिणाम देगा। बस्ती के बाहर किसी शिवमंदिर में पूजा करना भी लाभदायक है। अधिक शुभता के लिए-
मजदूरों, मेहनतकशों का दिल न दुखाना, जीवन में अनुशासन रखना, साफ-सुथरा रहना, रोज नहाना और हाथ-पैर, दाढ़ी, नाखूनों को साफ सलीकेदार रखना, तेल मालिश, शनि को खुश रखने की रामबाण दवा है।

वार के हिसाब से व्रतोपासना 
सूर्य राम नारायण भैरव :  रविवार 
चंद्र सरस्वती, शिव-पारवती : सोमवार 
मंगलगणेश दुर्गा,कार्तिकेय,हनुमान:मंगलवार 
बुद्ध देवी, दुर्गा, विष्णु, गणेश,पितृ :  बुद्धवार 
गुरु,नारायणहरी विष्णु,इंद्र,कृष्ण:  गुरुवार  
शुक्र,दुर्गा,लक्ष्मी,कमला,पद्मावती:शुक्रवार 
शनि,हनुमान,भैरव,पितृ,काली, :  शनिवार 

इसके अलावा और भी गहरायी  में ग्रह ग्रहों के देवी-देवता
1 सूर्य विष्णु
2 चन्द्रमा शिवजी
3 मंगल-
दो प्रकार के देवता मंगल नेक - हनुमान जी
मंगल बद - भूत प्रेत पिशाच
4 बुध दुर्गा
5 गुरु ब्रह्मा जी
6 शुक्र लक्ष्मी
7 7=शनि शिवजी शासमशानी भैरो के रूप में
8 8=राहू के देवता सर्प होते है
9 9=केतु गणेश जी और वाहन भी
10 सूर्य और चन्द्र पार्वती
11 सूर्य और मंगल भगवान राम
12 सूर्य और बुध इंद्र को माना जाता है
13 सूर्य और गुरु विश्वामित्र
14 सूर्य और शुक्र विष्णु लक्ष्मी
15 सूर्य और शनि गायत्री को माना जाता है
16 सूर्य और राहू राजा बलि
17 सूर्य और केतु अश्विनी कुमार
18 चन्द्र मंगल दक्षिण मुखी शिवजी -माता भद्रकाली
19 चन्द्र और बुध सरस्वती को माना जाता है
20 चन्द्र और गुरु पवन देवता
21 चन्द्र और शुक्र गाय
22 चन्द्र और शनि अर्धनारीश्वर को माना जाता है
23 चन्द्र और राहू स्थान देवता
24 चन्द्र और केतु पार्वती सहित गणेश जी
25 मंगल और बुध गरुण पर सवार विष्णु
26 मंगल और गुरु माता तारा
27 मंगल और शुक्र गरुण पर सवार गायत्री
28 मंगल और शनि ज्वालामुखी देवी
29 मंगल और राहू प्रेतात्मक शक्तियों
30 मंगल केतु काली और शाकिनी आदि
31 बुध और गुरु वैदिक पूजा को माना जाता है
32 बुध और शुक्र कुलदेवी की पूजा
33 बुध और शनि कार्तिकेय
34 बुध और राहू सरस्वती
35 बुध और केतु कार्तिकेय को पूजा जाता है.
36 गुरु और शुक्र इन्द्रानी की पूजा की जाती है
37 गुरु और शनि अमरनाथ को पूजा जाता है
38 गुरु और राहू केदार नाथ
39 गुरु केतु बद्रीनाथ को पूजा जाता है.
40 शुक्र और शनि भोमिया जी की पूजा
41 शुक्र और राहू गज लक्ष्मी
42 शुक्र और केतु, गणेश जी के साथ लक्ष्मी
43 शनि राहू भैरो
44 शनि केतु रूद्र की पूजा
इस प्रकार अतिरिक्त कोशिकाएं समाप्त होजाएंगी और कैंसर जैसे रोग का निराकरण भी और आप ये तो देखिये की किसी भूखे का भोजन बचा रहे है आटोमेटिक सिस्टम से दान भी होजायेगा
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