कन्या लग्न का सम्पूर्ण विवेचन (लग्नेश बुध)

कन्या लग्न का सम्पूर्ण विवेचन (लग्नेश बुध)
जन्मकुण्डली के प्रथम भाव में कन्या राशि होने पर जातक का लग्न कन्या
होता है। यह बुध के स्वामित्व का दूसरा लग्न है (मिथुन का स्वामी भी बुध है और
कन्या का भी)। अतः बुध इस लग्न का लग्नेश होता है। इस लग्न के जातकों का
विवेचन करते समय बुध के गुण-स्वभाव तथा लग्न/राशि के प्रतीक चिह्न कन्या
(VIRGIN) गर्ल  की विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए (यहां पाठकों का ध्यान
एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर दिला दूं कि मात्र कर्क और सिंह को छोड़कर शेष
सब लग्नों या राशियों में दो-दो का स्वामित्व एक-एक ग्रह के पास होता है। 
कन्या राशि एवं लग्न सम्पूर्ण परिचय
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कन्या लग्ने भवेत् जातो नाना शास्त्र विशारद:।
सौभाग्य गुण सम्पन्न: सुरूपः सुरतप्रियः।।
षष्ठे साधुत्व युतः शिक्षा गान्धर्व काव्य शिल्प पटु:।
प्रिय वल्गु कथा भाषी प्रणयी दानोपचारोतः।।

भचक्र में कन्या राशि का क्रम छठा माना जाता है। इसका विस्तार १५०° से १८०° तक होता है  इस राशि के अंतर्गत उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के अंतिम ३ चरण, हस्त के चारो चरण, तथा चित्रा के प्रथम २ चरण समाविष्ट है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का स्वामी सूर्य, हस्त का चंद्र तथा चित्रा का स्वामी मंगल माना जाता है।

आकाश मंडल में इसकी स्थिति का स्वरूप नौका में बैठी युवती है। जिसके हाथों में सस्य (अन्न) और (नौस्था ससस्यानला) है। इस राशि का अधिपति ग्रह बुध है। बुध इस राशि के १५ अंश पर उच्च तथा १५ से २५ अंश तो मूल त्रिकोण कहलाता है। तथा २५ से ३० अंश तक स्वराशि होता है।

कन्या राशि के अन्य पर्यायवाची नाम👉 कांता, तन्वी, रामा, वामा, अंगना, अबला, कामिनी, कुमारी, तरुणी, पापोन, महिला, रमणी, सुंदरी, सुवासिनी इत्यादि है। अंग्रेजी में इसको (virgo) बोला जाता है। 

यह राशि पृथ्वी तत्त्व प्रधान, प्रेम और बौद्धिकता की प्रतीक, सौम्य, सत्वगुणी, हरित, एवं मिश्रित वर्ण विश्वभाव, वृद्धत्व में भी युवा दिखने वाली, दिवस बलि वात प्रकृति, वैश्य जाती जीव एवं सम संज्ञक, शीर्षोदय राशि दक्षिण दिशा की स्वामिनी, चंचल, सौम्य एवं शांत दोनो प्रकार के गुण में युक्त लघुकाय सत्व गुणी राशि है। इसके अतिरिक्त यह राशि हरि भरी भूमि, कृषि, बागीचा, खेती, स्त्री-पुरुष युगलों की क्रीड़ास्थली तथा शिल्प तंत्र की विचरण राशि मानी जाती है। इसकी प्रिय धातु कांस्य एवं सुवर्ण है। तथा प्रिय रत्न पन्ना है। काल पुरुष में इस राशि का आधिपत्य कटि प्रदेश, (कमर, पेट व आंतो) से है। किसी व्यक्ति के जन्म समय निरयण चंद्र कन्या राशि ने संचारित हो तो उसकी जन्म राशि कन्या मानी जायेगी। गोचर में निरयण सूर्य प्रति वर्ष लगभग १६ सितंबर से १६ अक्टूबर तक कि अवधि में कन्या राशि में संचार करता है। 

मुख्य गुण एवं विशेषताये👉 पृथ्वी तत्त्व प्रधान होने से जातक धैर्यवान, परिश्रमी, बुद्धिमान, तीव्रस्मरण शक्ति, व्यवहार कुशल, मिलनसार, मधुरभाषी, तर्क-वितर्क करने वाला स्वयं को परिस्थिति के अनुसार ढाल लेने की क्षमता, विश्लेषण एवं आलोचना करने में कुशल, विलंब से निर्णय लेने वाला, अध्ययन शील एवं बौद्विक कार्यो में विशेष रुचि लेने वाला एवं कुछ लज्जाशील स्वभाव एव आत्म विश्वास की कमी होती है।

कन्या लग्न के जातक
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शारीरिक संरचना एवं स्वभाव👉 कन्या लग्न जातक का इकहरा एवं पतला संतुलित शरीर, मध्यम कद, गोरा रंग, सुन्दर आकर्षक नेत्र, सीधी नाक, ऊंचा मस्तक, उभरी हुई छाती, प्रिय भाषी किन्तु तीखी और बारीक आवाज, तीव्र एवं स्फूर्तिवान चाल, काले घने बाल, कोमल एवं संतुलित शरीर, तथा आंखों में मासूमियत एवं ईमानदारी की झलक होती है। ऐसे जातक अपनी वास्तविक आयु की अपेक्षा युवा दिखते है। जातक प्रायः कमनीय, सुन्दर तथा स्त्रियों के समान लज्जाशील एवं शर्मीले स्वभाव के होते है।

मानसिक एवं चारित्रिक विशेषताये👉
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कन्या लग्न में बुध की स्थिति अच्छी हो तो ऐसे जातक अत्यंत बुद्धिमान, चतुर, तीव्र स्मरणशक्ति वाला, अध्ययनशील, गणित, लेखनादि में विशेष रुचि लेने वाला, गुणी, विश्लेषण करने में कुशल, विचारशील, व्यवहार कुशल, विनम्र, पृथ्वी तत्त्व राशि होने के कारण उच्चाभिलाषी, धन-संपदा एवं सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिये विशेष संघर्ष करने वाला सतर्क एवं सावधान रहने वाला, योजनाबद्ध तरीके से काम करने वाला, अपनी उन्नति के प्रति सजग होगा परन्तु स्वयं नियमबद्ध करके आचरण करना इनको कठिन लगता है।

शनि गुरु के कारण जातक परिश्रमी, शांत चित्त, और अपने गुणों के द्वारा समाज मे मान-प्रतिष्ठा पाने वाला, धैर्यवान एवं भले-बुरे की पहचान की क्षमता रखने वाला विचारशील व्यक्ति होगा। चंद्र-शनि, चंद्र-शुक्र अथवा चंद्र-गुरु का योग या दृष्टि हो तो जातक अस्थिर किन्तु मौलिक विचारों से युक्त, संवेदनशील, परोपकारी, व्यवहार कुशल, तर्क-वितर्क करने में कुशल, तथा स्वयं को हर प्रकार की परिस्थितियों में ढाल लेने की क्षमता रखने वाला, मनोविज्ञान, क्रय-विक्रय व्यवसाय के कुशल होता है।

शुक्र के शुभास्थ होने से जातक भावुक, तीव्र सौंदर्याभूति, संगीत कला एवं साहित्य का प्रेमी, धीमे स्वर से बोलने वाला, समन्वयवादी, दयालु एवं सत्यनिष्ठ होता है। शुभ ग्रहों के प्रभाव से यद्यपि बहुमुखी प्रतिभा की योग्यता होती है। परन्तु द्विस्वभाव राशि होने से जातक एक ही समय मे एक से अधिक कार्य आरंभ कर लेता है। जिससे बहुत से कार्य अधूरे रह जाते है। कई बार अपने द्वारा किये कार्य से असंतुष्ट भी हो जाता है। तथा एक विषय पर चिरकाल तक स्थिर नही रहता। 

गुरु के प्रभाव से आत्म प्रदर्शन एवं आडम्बर की प्रवृति नही होती। धार्मिक साहित्य एवं ज्योतिष तंत्रादि, गूढ़ विषयो के प्रति भी विशेष रुचि होती है। कन्या जातक को ज्ञान अर्जन करने की अभिलाषा जीवन पर्यंत बनी रहती है।

शनि-बुध👉 का संबंध हो तो प्रत्येक विषय की गहराई तक जाने की प्रवृति होगी। विश्लेषण करने की योग्यता भी विशेष होगी। पर अपने अधिकांश कार्य गुप्त रखने की प्रवृति होगी।

द्वितीयेश शुक्र के प्रभाव से जातक को संगीत, कला एवं साहित्य (कविता आदि) का भी विशेष शौक रहता है।

कल्पनाशील होने के कारण कन्या जातक नई-नई योजनाएं एवं युक्तियों की रचना करने में कुशल होते है। परन्तु धैर्य की कमी के कारण एक ही कार्य पर अधिक समय तक क्रियाशील नही रह पाते। 
कन्या जातक वैसे तो जीवन पर्यंत कर्मठ एवं क्रियाशील होते है। परन्तु जीवन का पहला भाग विशेष संघर्षपूर्ण एवं कठिन परिस्थितियों में गुजरता है। प्रायः इनमे आत्मविश्वाश की भी कमी होती है।

स्वास्थ्य एवं रोग👉 कन्या जातक की कुंडली मे यदि कोई विशेष अरिष्ट योग ना पड़ा हो तो सामान्यतः इनका स्वास्थ्य अच्छा और दीर्घायु होते है। जीवन मे सक्रिय एवं युवा रहते है। अपने स्वास्थ्य के संबंध में भी सतर्क रहते है। कुंडली मे चंद्र या शनि अशुभ हो तो मानसिक रोगों से ग्रस्त होने की अधिक संम्भावना रहती है। जातक में शीघ्र उत्साहित एवं शीघ्र ही निराश होने की प्रवृति होती है जिससे इनको मानसिक उद्वेग चिड़चिड़ापन, शीघ्र क्रोधित एवं शीघ्र उत्तेजित होने का स्वभाव बन जाता है। इनका मन और पेट दोनो अत्यंत संवेदनशील होते है। जिससे प्रकृति विरुद्ध असंतुलित एवं अनियमित भोजन करने से इनको स्नायु विकृति एवं पाचन संबंधित रोग जैसे मंदाग्नि, पथरी, वायु रोग, जोड़ो का दर्द, रीढ़ का दर्द, पीलिया, मधुमेह, प्रमेह, त्वचा रोग, आदि गुप्त रोगों का भय भी रहता है। अधिक चिंता, असंतोष एवं क्रोधाधिक्य के कारण उच्च रक्तचाप, सर वेदना, नेत्र रोग, नाक-कान-गले आदि रोगों की संभावना रहती है।

सावधानी👉 कन्या जातक को मानसिक तनाव, उत्तेजना तथा तामसिक भोजन एवं उत्तेजक पदार्थो का सेवन से बचना चाहिये तथा योग एयर ध्यान द्वारा अपना जीवन बेहतर बनाना चाहिए।

कन्या लग्न जातको की शिक्षा
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कन्या लग्न की कुंडली मे यदि बुध, शुक्र, शनि, गुरु आदि ग्रह शुभस्थ पड़े हो तथा इन्ही में से किसी ग्रह की दशा अंतर्दशा चल रही हो  तो जातक को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलती है। विशेषकर कॉमर्स, कम्प्यूटर शिक्षा, गणित, सूचना एवं प्रसारण शिक्षा, संगीत, गायन चार्टेड अकाउंटेंट, गणित, व्यापार-प्रबंध, मेडिकल, विज्ञान, साहित्यिक एवं अनुसंधात्मक विद्या आदि। कन्या जातक को ऐसा व्यवसाय अधिक उपयुक्त रहता है जिसमे बौद्धिकता का अधिक उपयोग हो।

व्यवसाय एवं आर्थिक स्थिति👉 कन्या जातक चाहे स्त्री हो या पुरुष मेहनती, बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी, तथा अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान होने के कारण लगभग प्रत्येक क्षेत्र में लाभ व उन्नति पा लेते है। ग्रहों के प्रभावस्वरूप यह उन्नति चाहे विघ्न/बाधाओं एवं विलंब से युक्त ही हो फिर भी कन्या जातक धैर्य व उद्धम द्वारा अभिलषित कार्य मे सफलता अवश्य प्राप्त कर लेते है। कन्या जातक अपनी प्रतिभा अनुसार आगे लिखे व्यवसायों में से किसी एक मे समुचित सफलता पा सकते है।

अध्यापन, वकालात, क्रय-विक्रय, प्रतिनिधि, लेखाकार, लेखन, पत्रकार, पुस्तक विक्रेता, प्रकाशन, ज्योतिषी, शिल्पकार, कम्प्यूटर विशेषज्ञ, व्यापारी, अभिनेता, गायक, इंजीनियर, चिकित्सक, फोटोग्राफी, स्टेशनरी, वस्त्र उद्योग, मैनेजर, भूमि जायदाद, बैंकिंग, सौन्दर्यप्रसाधन, फैशन डिजाइनिंग, आयात निर्यात, उद्योग पति, करियाना व्यवसायी, आढ़ती, अध्यापन, वकालात जैसे बौद्धिक कार्य मे अच्छी सफलता मिल सकती है। चादर यदि जल या वायु राशि मे हो तो विदेश जाने के अवसर भी प्राप्त होते है।

आर्थिक स्थिति👉 कन्या लग्न वाले जातक की कुंडली मे बुध, शुक्र व चंद्र शनि ग्रह शुभस्थ हों तथा इन्ही शुभ व योगकारक ग्रहों की दशा अंतर्दशा चल रही हो तो जातक की आर्थिक स्थिति ठीक होगी। अधिकांशतः कन्या जातक किफायती व सोच समझकर खर्च करते है।  आज के साधन चाहे सीमित हो फिर भी अपने परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों से निर्वाह योग्य धनार्जन कर ही लेते है। थोड़े थोड़े बचत से भी धनराशि का संचय कर लेते है। यदि शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो आय के स्तोत्र एक से अधिक होते है। आडम्बर, अपव्यय एवं फिजूल खर्च से यथा सम्भव परहेज करते है। फिर भी अत्यधिक परिश्रम के बाद भी अधिक मात्रा में धन संचय नही करपाते।

प्रेम और वैवाहिक सुख👉 प्रेम के संबंध में कन्या लग्न के जातक अत्यधिक भावुक एवं संवेदनशील होने पर भी अपनी प्रेमाभिव्यक्ति शीघ्र प्रकट नही कर पाते तथा न ही वह प्रेम में प्रदर्शन को अधिक महत्त्व देते है। लज्जाशील प्रकृति होने के कारण अपनी प्रेम भावनाओ को सीधा स्पष्ट प्रकट नही करते। बल्कि विभिन्न भूमिकाओं के बाद अपने प्रेमी को अपना मतलब समझा पाते है। ये जिससे प्रेम करे उससे पूरी निष्ठा और हृदय से करते है। अपनी पत्नी और परिवार के प्रति पूरे उत्तरदायी , सहानुभूति एवं समर्पण के साथ निर्वाह करेंगे, यदि कुंडली मे सप्तम भाव क्रूर ग्रह से आक्रांत, दृष्ट हो या सप्तमेश गुरु-मंगल, राहु-शनि आदि पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो दाम्पत्य जीवन मे विषमता व कटुता पैदा होने की संभावना होती है। इसके अतिरिक्त कन्या जातक को प्रेम संबंधों में अत्यधिक संदेहशील, दुविधापूर्ण एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण का त्याग करना चाहिए। आत्म विश्वास को भी बढ़ाना चाहिए, भली प्रका मिलान करके किया गया संबंध कल्याणकारी होगा।

कन्या लग्न की जातिका
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कन्योदये वा वनिताभीजिता सौभाग्य सौख्ये: सहिता हिता च।
भवेत्स्ववर्गे बहुधर्मरक्ता, जितेंद्रिया, सर्वकलासु दक्षा।।

अर्थात कन्या लग्न में उत्पन्न जातिका सौभाग्यशाली, सबका हित चाहने वाली, धर्म एवं मर्यादा का पालन करने वाली तथा अनेक गुणों से युक्त होंगी। कन्या लग्न में उत्पन्न लड़की का कद मध्यम, इकहरा गोरा बदन, सुन्दर नेत्र, कोमलांगी, लज्जाशील, परन्तु बारीक व कुछ तीखी आवाज युक्त प्रियभाषिणी, घने काले बाल, चुस्त-स्फूर्तिवान, कमनीय व आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी होती है।

चारित्रिक विशेषताये👉 कन्या जातिका की कुंडली मे ग्रह स्थिति शुभ हो तो जातिका बुद्धिमान, भावुक, संवेदनशील, सौभाग्यशाली, मधुरभाषी, व्यवहार कुशला, स्त्रियोचित गुणों से युक्त, आंखों में मासूमियत एवं ईमानदारी की झलक लिए हुए, धार्मिक विचारों वाली होंगी।

कुंडली मे बुध-शुक्र शुभस्त हो तो जातिका तीव्र बुद्धिमान, समझदार, कर्मठ, तीव्र स्मरणशक्ति रखने वाली, अध्ययनशील, उच्चशिक्षित, गुणवान,1 तथा अपने गुणों के द्वारा अपने परिवार व समाज मे प्रतिष्ठा पाने वाली, इनमे हर प्रकार की कठिन परिस्थितियों में भी स्वयं को ढाल लेने की योग्यता होगी। गुरु शुक्र के कारण मानवीय भावनाओ और संवेदनाओं से युक्त अपना स्वभाव रखेंगी। मानसिक एवं बौद्धिक शक्ति अच्छी रहेगी।

उपयुक्त व्यवसाय👉 ये जातिकाये शिक्षा के क्षेत्र में नई-नई जानकारियां पाने को उत्सुक रहती है। गणित-कम्प्यूटर, वस्त्र एवं फैशन व ड्रेस डिजिनिंग, संगीत-कला, चित्रकारी, साहित्य व अध्यापन, चिकित्सा, पर्यटन, एक्टिंग, वकालत, पत्रकारिता, दूरदर्शन, लेखाकार, पठन-पाठन व बौद्धिक कार्य के क्षेत्रों में अधिक सफलता पा सकती है। ये जातिका छोटी-छोटी बचत से भी अच्छा धन संग्रह कर लेती है। परिवार व पति को आर्थिक क्षेत्र में भी सहयोग करती है। अपने घर व बच्चों को बड़े ही कलात्मक तरीके से सजाने-संवारने में रुचि लेती है।

प्रेम और वैवाहिक सुख👉 लज्जाशील और संकोची स्वभाव होने के कारण कन्या लग्न की जातिकाये प्रेम का प्रदर्शन नही कर पाती। इनके प्रेम में केवल भावुकता की ही प्रधानता नही होती बल्कि अपने साथी के प्रति पूर्ण निष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी व समर्पण की भावना भी रहती है। धर्मपरायणता एवं पति व परिवार के प्रति उत्तरदायित्व, सहानुभूति एवं प्रेम द्वारा पारिवारिक दायित्वों को निभाती है। कठिन परिस्थितियों में भी स्वयं को ढाल लेती है। कन्या जातिका की कुंडली मे बुध, गुरु, शुक्र, शनि ग्रह शुभस्थ हो तो इनका दाम्पत्य जीवन अच्छा व मधुर रहता है। फिर भी वर-कन्या की कुंडली मे परस्पर भलीभांति मिलान करके विवाह किया जाए तो वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है।

उपयुक्त जीवन साथी का चुनाव👉 कन्या जातिकाओ के लिये वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक, मकर व मीन राशि वालो के साथ मैत्री व वैवाहिक संबंध शुभ व सुखमय रहने की संभावना रहती है। इनमे भी तुला व वृश्चिक राशि वालो के साथ कन्या राशि लग्न के मिलान को सामान्य ही कहा जायेगा।
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जैसे बुध मिथुन व कन्या का, मंगल मेष व वृश्चिक का, गुरु धनु व मीन का, शुक्र वृष
व तुला का तथा शनि मकर व कुम्भ का स्वामी होता है-जैसा कि पाठकों को
स्मरण ही होगा। केवल चन्द्र व सूर्य एक-एक राशि क्रमशः कर्क व सिंह के
स्वामी होते हैं। अत: कर्क में चन्द्रमा का तथा सिंह में सूर्य का सम्पूर्ण प्रभाव
मिलता है। क्योंकि ये राशियां इन ग्रहों के एकछत्र स्वामित्व में हैं। शेष राशियों/लग्नों
में स्वामी ग्रह का सम्पूर्ण प्रभाव नहीं पड़ने पाता क्योंकि वह दो राशियों में बंट
जाता है। उदाहरण के लिए बुध की कुछ विशेषताएं मिथुन में तो कुछ कन्या में
मिलेंगी। इसी प्रकार अन्य ग्रहों से सम्बन्धित राशियों में भी समझना चाहिए)।
बुध के स्वभाव तथा कन्या की विशेषताओं की रोशनी में कन्या लग्न के
जातकों का विश्लेषण करते समय कुछ मोटे तथ्य सहज ही जाने जा सकते हैं।कन्या लग्न के जातक व्यावहारिक व शांत होते हैं, और अक्सर उन्हें राशि चक्र का पूर्णतावादी कहा जाता है। वे सबसे सूक्ष्म विवरणों को नोटिस करते हैं जिन्हें अन्य लोग देख व समझ नहीं पाते हैं।
कन्या का अर्थ तो नाम से ही कुछ स्पष्ट हो जाता है. कन्या का अर्थ है सौम्य, सरल, धैर्यवान, भावुक, सुंदर, बुद्धिमान व श्रृंगार पसंद. कन्या राशि एक द्विस्वभाव राशि है. द्विस्वभाव का अर्थ है ऐसे जातक के दो स्वभाव होते हैं. कभी कुछ तो कभी कुछ. यही कारण है कि यह अस्थिरता इन्हें ‘ क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा, रुष्टा तुष्टा क्षणे क्षणे’ जैसी प्रकृति का बना देता है. इस लग्न का स्वामी बुध है. कन्या लग्न उत्तरा फाल्गुनी के तीन चरण, हस्त के चार चरण और चित्रा नक्षत्र के दो चरणों से मिलकर बनी है. यह शीर्षोदय राशि है और दक्षिण दिशा पर इसका अधिकार है. यह लग्न प्रकृति से सौम्य और राशि से स्त्री है. इस लग्न में खास बात यह होती है, कि इसका स्वामी और इसके कर्मक्षेत्र का स्वामी एक ही होता है. दशम भाव अर्थात कर्मक्षेत्र के भाव में मिथुन राशि पड़ती है, जिससे कन्या और मिथुन दोनों घरों का स्वामी बुध बहुत ही शुभ फल देता है

कन्या लग्न ( Kanya Lagna ) सौम्य चारित्रिक गुणों से परिपूर्ण होता है, और इस लग्न में जन्मे लोग स्त्री तत्व से भरपूर होते हैं।

इस लग्न की एक खासियत ये भी है, कि इसका स्वयं का स्वामी और व्यक्ति की कुंडली में कार्य क्षेत्र का स्वामी ग्रह एक ही होता है।

इसका शासक ग्रह बुध होता है। इस लग्न के व्यक्ति में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को विजय करने की इच्छा अत्यंत बलवती होती है। जिसके लिए समस्त जीवन वो प्रयासरत रहता है, परन्तु ऐसा हो नहीं पाता।  

इस लग्न के लोग थोड़े तुनक मिज़ाज होते है। शुक्र की स्थिति भी इस लग्न वालों की कुंडली में अच्छी होती है,और शनि द्वारा मिश्रित फल की प्राप्ति होती है। शनि इस लग्न के पाँचवे और छटवें घर का स्वामी होता है। 

राहु की उपस्थिति भी छटवे घर में होने की वजह से कन्या लग्न वालों को हानि का सामना करना पड़ता है। 

इनकी कुंडली में मंगल ग्रह सबसे अधिक हानिकारक ग्रह बन जाता है, जब तक उसकी स्थिति किसी विपरीत राजयोग वाले स्थान या ग्रह के साथ न बने। इसके कारण व्यक्ति के जीवन में उग्रता की अधिकता देखी जा सकती है। 

 नया सीखने का शौक, सक्रिय दिमाग, अच्छी मानसिक क्षमता, आलोचनात्मक, विधिपूर्वक, सरल मानसिकता का वास होता है।

आमतौर पर सटीक वार्तालाप करते है, लेकिन कभी-कभी  नर्वस  हो जाते है, और आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है।

इन लोगों की सोच काफी हद तक अवधारणात्मक और सहज ज्ञान युक्त होती है। हर चीज़ को व्यवस्थित रखते है और उसी प्रकार इनकी सोच भी व्यवस्थित होती है। ज्ञानी, गहरी और विश्लेषणात्मक सोच के धनी होते हैं।

यह लोग महत्वाकांक्षी, रूढ़िवादी, विनम्र, विचारशील, चिंतनशील और मेहनती स्वभाव के होते हैं। इनमे बहुत धीरज होता है, और अपना निर्णय आसानी से नहीं बदलते हैं।  

अपने विचारों की ही भांति अपना निवास बदलना भी इनको बिलकुल पसंद नहीं होता है। इनके पास  वाणिज्यिक, विधिपूर्वक और व्यावहारिक रूप से किसी काम को करने की बहुत अच्छी सोच होती है

दूसरों की कमियां निकालने में उस्ताद होते है। इसी स्वभाव की वजह से यह लोग परीक्षा  के निरीक्षक, लेखा परीक्षक, आयकर अधिकारी के पद के लिए सबसे उपयुक्त दावेदार होते हैं।

इस लग्न में जन्मे लोग  बचत स्वभाव,सावधान और संवेदनशील, चीजों और खातों का विवरण, थोड़े काल्पनिक, अपने हित को लेकर सतर्क,राजनयिक, बागवानी में खुश, बौद्धिक और किफायती विचारधारा वाले होते हैं। 

विवेकपूर्ण और सोच-समझकर कार्य करना, विज्ञान का  अध्ययन करने में रुचि  विशेष रूप से चिकित्सा विज्ञान, भोजन, आहार, स्वच्छता आदि के बारे में अध्ययन करना इनको अच्छा लगता है। 

इस लग्न वाले स्वस्थ और लम्बे जीवन का आनंद अपने बुढ़ापे तक उठाते हैं।  स्वस्थ बुढ़ापे के साथ मज स्वास्थ्य लंबे जीवन का आनंद लेते हैं।

ये लोग अपनी आयु के अंतिम पलों तक युवा और सक्रीय दिखने वाले होते हैं। अपने स्वास्थ्य के बारे में वे विशेष रूप से सजग रहते हैं।

इनका पेट और तंत्रिका तंत्र बहुत संवेदनशील होते हैं,अपने आहार में ज्यादा विटामिन बी के उपयोग द्वारा ये लोग इन परेशानियों से बच सकते हैं।    

इनको अत्यधिक चिंता, असंतोष, चिड़चिड़ापन और जल्द क्रोधित होने के अपने स्वाभाव पर काबू रख कर ये अपने स्वास्थ्य को बिगड़ने से बचा सकते हैं।  

आम तौर पर इन लोगों में जीवन में अधिक पाने के लिए लोभ होता है  जो अक्सर इनको ज़्यादा मेहनत और गहरी सोच में डाल कर इनकी सेहत बिगाड़ सकता है। इसलिए इनको उच्च जीवन की चाह और गहरी सोच से भी बचना चाहिए।

इनको पित्ताशय की पथरी की शिकायत हो सकती है, जिससे बचने के लिए इनको सादा और समय पर भोजन करना चाहिए। जहाँ तक हो सके शराब से बचें और शाकाहारी और संतुलित आहार का उपयोग करें।

भरपूर विश्राम करें और शांत परिवेश में जीवन का आनंद लें। जब कन्या लग्न में जन्मे व्यक्ति की कुंडली में ग्रहों की कोई हानिकारक युति बनती है।

तब ये लोग पेचिश, आंत्र ज्वर या टाइफाइड और गले में दर्द के रोग का सामना करते हैं। आपको बहुत बार मामूली चोटें लगेंगी।

संभावना है, कि आप जीवन में दुर्घटनाओं का सामना भी कर सकते हैं। इसलिए वाहन इत्यादि थोड़ा संभालकर चलायें। 

जब इस लग्न का शासक ग्रह बुध पीड़ित अवस्था में होता है, तब आंत, गुर्दे, बड़ी आंत, अन्त्रपेशी, गुदा,  तंत्रिका प्रणाली की बिमारियों से ग्रसित हो सकते हैं।

लग्न के जातक की वाणिज्यिक प्रवृत्ति के होने के नाते, आपको अपने पैसे के बारे में सावधान रहना चाहिए। कड़ी मेहनत आपको जीवन में सफलता प्रदान करेगी और आपको शीर्ष पर लाएगी। यदि जातक की कुंडली में  यदि 6 वें घर का स्वामी शनि उच्च का होता है, तो जातक अच्छे भाग्य को प्राप्त करता है।आप बहुत बुद्धिमान होते हैं, इसलिए उन्हें साथी का चयन करने में बहुत कठिनाई होती है, क्योंकि वो चयन करते समय हर बात से अधिक साथी के बुद्धिमान होने पर अधिक ज़ोर देते हैं।  वे स्वाभाव से शर्मीले होते हैं, और प्यार के प्रदर्शन में अत्यंत कमज़ोर होते हैं। क्योंकि इनमे दूसरों में कमियां ढूंढ़ने की प्रवृति होती है।

जिसके कारण इनकी अपने साथी से अच्छी तरह निभ नही पाती और ये सदैव उनके साथ समझौता करने की बजाय उनसे अपने अनुरूप ढलने की आशा करते है। 

अपनी इसी कमी के कारण इनको काफी लम्बे समय तक अविवाहित जीवन गुज़ारना पड़ता है। लेकिन जब विवाहित होते है तो अपने स्वाभाव को थोड़ा सुधारें तो खुशहाल जीवन व्यतीत कर सकते हैं।  

वृषभ, मकर, कर्क, वृश्चिक लग्न में  पैदा हुए व्यक्ति कन्या राशि के व्यक्तियों के लिए सबसे उपयुक्त जीवन साथी होते  हैं।

सोमवार, रोहिणी, हस्त, सर्वन क्षुद्रग्रहों में पैदा हुए व्यक्ति खुश और समृद्ध संबंधों और साझेदारी के लिए उपयुक्त हैं।आपकी मूल प्रवृत्ति परिवर्तन की होती है। अपने जैसे विचारों और वातावरण की खोज में कई बार आप अपना निवास बदलते हो।आपको अपने घर में सुन्दर और व्यवस्थित वातावरण अच्छा लगता है। आपको दोस्तों और मेहमानों से भरा घर सुख प्रदान करता है। 

एक सुंदर और व्यवस्थित घर की इच्छा को पूरा करने के लिए आप हमेशा प्रयासरत रहते है, और आपको ये सब जीवन में प्राप्त भी होता है। 

आपका जीवन साथी स्वभाव से धार्मिक और भगवान के प्रति श्रद्धा रखने वाला होता है। उसका यही गुण आपको जीवन में सुख और संतोष प्रदान करने के लिए काफी होता है। 

जातकों को व्यापार में अपने साथी का चयन बहुत सावधानी से करना चाहिए। एक ऐसा साझेदार जो आपके मन की बात को पूरी तरह समझते हुए आपका साथ दे सके। आप काम करने के लिए जन्म लेते हैं, जो कठिन कार्यपालक होते है जो सब कुछ छोड़ छड़ कर अपने काम की धुन में मग्न रह सकता है। 

इनकी कुंडली में जब बुध अच्छी दशा में होता है, तब ये  दलाल, एकाउंटेंट, वकील, पत्रकार, इंजीनियर, सर्जन, शराब से जुड़े कामों का हिस्सा हो सकते हैं ।

ये सब बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है, कि कुंडली  में 2, 6 या 10 वें भाव के स्वामी के साथ अच्छे सम्बन्ध बन रहे हैं या नहीं।वित्त के संबंध में, उनके पास एक वाणिज्यिक और व्यावसायिक वृत्ति की समझ होती है। इसलिए इनको जमीन और उसके उत्पादों से जुड़े कामों में सफलता प्राप्त हो सकती है ।

यथा-कन्या लग्न के जातक भावुक, सीखने के शौकीन, कला व संगीतप्रेमी,
आत्मविश्वास की कमी/संकोची स्वभाव वाले, औसत कद के, स्त्रैण स्वभाव
वाले, विनोदी, मित्रों में रहना पसंद करने वाले, चतुर (व्यापारिक बुद्धि वाले),
गणितज्ञ व अपने लाभ के प्रति सतत् जागरूक रहने वाले (बहुत अर्थों में स्वार्थी/
SELFCENTERED) होते हैं।
कन्या लग्न के जातकों का माथा चौड़ा, नाक सीधी, कद दरम्याना तथा छाती
प्राय: चौड़ी होती है (बुध खराब हो तो जातकों की छाती कमजोर होती है)। यदि
बुध की स्थिति अच्छी हो तो जातकों के गाल भी गोलगप्पों की भांति गोल व उभरे।
हुए हो सकते हैं। कन्या लग्न के जातकों में आत्मविश्वास की कमी होती है।
इनकी सोच व प्रकृति भी प्राय: निम्न स्तर की होती है। ये लोग भावुक तथा सीखने
के शौकीन और कला व संगीत के प्रेमी होते हैं। इनका दिमाग सक्रिय रहता है।
बुद्धि तेज होती है। ये लोग चतुर तथा अपने लाभ/स्वार्थ के प्रति जागरूक रहने
वाले होते हैं। दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता इनमें होती है। ये लोग
गणितज्ञ/ज्योतिष/लेखन/अध्ययन से प्रायः जुड़े होते हैं। फिजीकल व केमिकल
साइंसिज में ये जातक प्रगति कर सकते हैं। ऐसे जातकों को लकवा/नर्वस ब्रेकडाउन
आदि की सम्भावना होती है। संगीत में विशेष रुचि होती है तथा ये अकेले न
रहकर संगति पसंद करने वाले होते हैं।
कन्या लग्न वालों का शरीर व संरचना कोमल होती है। इनका शरीर दुबला-
पतला भी हो सकता है, परन्तु सुगठित होता है। ये लोग चुस्त व संज-संवरकर
रहने वाले होते हैं। विशेषकर पोशाक के प्रति जागरूक रहते हैं और प्रायः अपनी
वास्तविक उम्र से कम दिखाई देते हैं। इनका रंग गेहुआं परन्तु साफ होता है। शरीर
चिकना या कम बालों का हो सकता है। ये जातक लज्जालु/संकोची हो सकते हैं
झिझक या दब्बू प्रकृति के होते हैं। किन्तु अत्यधिक सावधान रहने वाले होते हैं।
प्रेम सम्बन्धों में प्रायः असफल रहते हैं। प्राय: ये कई विषयों में सीमित पक्ष तक
सूक्ष्म जानकारी रखने वाले होते हैं, भले ही इन्हें उस विषय की पूर्ण जानकारी नहीं
होती। वृष, मकर व मीन लग्न के जातकों से इनकी मित्रता शुभ रहती है।
मनोविज्ञान, आलोचना, दुकान्दारी, व्यापार, गणित, लेखन, दलाली व नौकरी
इनके लिए सफल व्यवसाय होते हैं।
यदि कन्या लग्न के जातकों का लग्नेश लग्न में ही हो तो ऐसे जातक अच्छे
शिल्पी होते हैं। विद्वान, गणितज्ञ या मुंशी होते हैं। वर्ण कांतियुक्त व सलोना होता
है तथा जातक बुद्धिमान व दयालु होता है। दसवें घर में बुध हो तो जातक को
राजा/सरकार से सम्मान प्राप्त होता है तथा पिता का धन प्राप्त होता है। ऐसा जातक
सफल व्यापारी हो सकता है। आठवें घर का बुध जातक को रक्तविकार या शस्त्र
द्वारा मारे जाने की सम्भावना बनाता है। ग्यारहवें घर का बुध जातक को ऊंचा
व्यापारी बनाता है। किन्तु बारहवें घर में बुध हो तो जातक को अदालती चक्करों में
उलझना पड़ता है।
कन्या लग्न के जातक खेलों में काफी रुचि लेते हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि
वे स्वयं उम्दा खिलाड़ी भी हों। ये लोग अपना सब कार्य योजनाबद्ध ढंग से करते
हैं। प्रायः लिखकर, टाइम टेबल बनाकर/एक्शन प्लान आदि बनाकर। ये लोग
विनम्र होते हैं। इनकी आवाज में भारीपन/मर्दानगी का कुछ अभाव-सा रहता है।
कई बार स्त्रियों जैसी ही आवाज होती है। ये लोग बोलते समय दीर्घसूत्रता से काम
लेते हैं। दो वाक्यों में कह दी जाने वाली बात को विस्तार से बीस वाक्यों में कहते
हैं। अपने खर्चों का भी ये हिसाब-किताब रखते हैं। प्राय: ये मन का भेद किसी को
नहीं देते। ये लोग भौतिकवादी होते हैं। परन्तु अपने प्रिय व्यक्ति की बीमारी आदि,
उनकी छोटी-छोटी ज़रूरतों का भी ध्यान रखते हैं। ये परिवर्तन के इच्छुक होते हैं।
अक्सर मैंने कन्या लग्न वाले बहुत से जातक कई बार नौकरियां बदलते भी देखे
हैं। ये तकनीक पसंद करने वाले तथा कार्यों को निश्चित ढंग से करने वाले होते हैं।
ये लोग कंजूस तो नहीं कहे जा सकते परन्तु सोच-विचार कर खर्च करने वाले व
• हिसाब-किताब से चलने वाले होते हैं। प्राय: मेरे देखने में आया है कि ये जातक
• गृहस्थी में पत्नी का हाथ (खाना बनाना/कपड़े धोना आदि) बढ़ाने वाले होते हैं।
रोग ज्योतिष के अनुसार कन्या लग्न के जातकों की पेट तथा त्वचा के रोगों
की तीव्र सम्भावना होती है (इसमें नर्वस ब्रेकडाउन/नाड़ी तंत्र सम्बन्धी रोग भी
शामिल होते हैं, विशेषकर तब जब लग्न व लग्नेश अशुभ प्रभाव में हो तथा शुभ
दृष्टि से रहित/निर्बल हो)।
विशेष (रोग) - कन्या लग्न में मकर का शनि (पंचमस्थ) हो, बुध तथा
गुरु सातवें भाव (मीन राशि) में हों तो जातक नपुंसक होता है। अथवा कामशक्ति
अत्यंत अल्प होती है।

कन्या लग्न व्यक्तित्व विशेषता

कन्या लग्न के जातक काफी विस्तार उन्मुख होते हैं। उनका अपने परिवार और दोस्तों के प्रति देखभाल करने वाला व्यक्तित्व है। इन लग्न के लोग भी निरीक्षण व परीक्षण संपंन्न बुद्धि के धनी होते हैं। ये ठीक से जानते हैं कि जब उनके वातावरण में कुछ संतुलन से बाहर है, तो उसे वे नहीं झेड़ते हैं। कुछ ऐसा जो उन स्रोतों से अधिक है तो कन्या लग्न जातकों का ध्यान नहीं हटा सकता है। वे हमेशा चीजों या लोगों को अपनाने से पूर्व चीजों का विश्लेषण करने के लिए समय लेते हैं।इस लग्न में जन्में जाजकों का स्वभाव  ही कुछ ऐसा होता है कि ये हर कार्य में जल्दी करते है, कोई भी कार्य करने से पहले उसके बारे में पूर्णतया विचार नहीं करते। भावुक होने के कारण अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते। ऐसे जातक सदा दिवास्वप्न देखते रहते हैं। चारपाई पर पड़े-पड़े ही इनके मस्तिष्क में योजनाऐं बनती रहती है और ये उनके पूरा होने के बारे में सोचते रहते हैं। यदि इन्हें हवाई किले बनाने वाला कहा जाये तो भी असत्य नहीं होगा।

अधिक भावुकता के कारण कभी कभी बिना सोचे समझे आप निर्णय ले लेते हैं और अपनी हानि करा बैठते हैं. कोमल प्रकृति के कारण शीघ्र ही घबरा जाना आपके स्वभाव में है. कन्या लग्न में जन्मे जातक को अक्सर दूसरों के धन एवं मकान प्राप्त करते देखा गया है. जन्म स्थान से दूर रहकर कन्या लग्न के जातक अपने जीवन में उन्नत्ति कर  पाते हैं. कन्या लग्न के जातक स्वभाव से लोभी  और सदैव गुरु की संगती की लालसा रखने वाला होता है. स्त्रियों के संग की लालसा सदैव इनके ह्रदय में रहती है. रति क्रिया से प्रेम करने वाला और समाज में मान सम्मान की इच्छा रखने वाला भी होता है.

इनकी बातों से कोई निष्कर्ष निकालना आसान नहीं होता, क्योंकि ऐसे जाते द्विअर्थी बातें करते हैं। विद्याध्ययन की ओर इनका विशेष रुझान होता है तथा राजनीति के क्षेत्र में ये प्रसिद्धि अर्जित कर लेते हैं। अपने थोड़े-से लाभ के लिए दूसरे की बड़ी से बड़ी हानि कर सकते हैं, अतः इन्हें स्वार्थी भी कहा जा सकता है।

भावुक होने के कारण निरन्तर संघर्ष करते-करते जब ये हिम्मत हार जाते हैं तब इनमें हीनता की भावना आ जाती है। विपरीत योनि के प्रति इनका झुकाव होना स्वाभाविक है, किन्तु प्रणय-प्रसंगों में इन्हें सफलता भी मिल जाये, ऐसा नहीं देखा गया।

कन्या लग्न में पैदा हुआ जातक मधुर भाषी , सौभाग्यशाली एवं अनेक गुणों से युक्त होता है. आपको पत्नी पक्ष से तनाव रहता है तथा  इनके घर कन्या संतति की अधिकता रहती है. कन्या लग्न में जन्मे जातक अपने भाई बहनों से बहुत प्रेम करते हैं.कन्या लग्न का जातक दो विरोधी पक्ष में मेल बैठाने में निपुण होता है. मीठे वचनों द्वारा अपना कार्य निकलवाना कन्या लग्न के जातकों को बहुत अच्छे से आता है.

स्वभाव से विलासी, चंचल और मनोरंजन प्रिय होते हैं कन्या लग्न के जातक. बुध की प्रधानता के कारण कन्या लग्न में जन्मे जातकों पर संगत का असर अति शीघ्र पड़ता है. सामने वाले की दिल की बात समझने में आप तेज़ होते हैं और उसकी गलतियां बताने में भी आप आगे रहते हैं.  अत्यंत बुद्धिमानी और अनेक कलाओं में निपुण कन्या लग्न के जातक धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं.

 ये लचीले और व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ समस्याओं से निपटते हैं। आप कन्या लग्न जातक है तो आप लोग थोड़े गंभीर और आरक्षित होते हैं। सिंह लग्न के लगभग विपरीत। आप द्र के मंच से दूर पर्दे के पीछे काम करना पसंद करते हैं। उनका व्यक्तित्व बुद्धिमत्ता की आभा को प्रदर्शित करता है क्योंकि आप काफी अनुशासित, संगठित और स्मार्ट हैं। कन्या लग्न एक बहुत ही जिम्मेदार लग्न राशि हैं, जो दूसरों को बहुत पुरस्कृत करने में मदद करते हैं।

 इस लग्न से मूल निवासी लोगों और स्थितियों की महत्वपूर्ण टिप्पणियों के लिए भी जाने जाते हैं। कन्या के जातकों को अपने जीवन में चीजों और लोगों को नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है।कन्‍या लग्न में लग्न का स्‍वामित्‍व बुध के पास होता है | ऐसा जातक लम्‍बा, पतला, आंखें काली, भौंहें झुकी हुई, आवाज पतली और कर्कश होती है | ऐसे जातक हमेशा तेज चलते हैं और अपनी उम्र से कम के दिखाई देते हैं | ये लोग लेखा कार्यों में होशियार होते हैं और अपनी नौकरी को लाभ के अवसर के अनुसार लगातार बदलते रहते हैं | आप तर्क-वितर्क में भी कुशल होते हैं और हाजिर जवाब भी होते हैं | आपके इसी गुण के कारण सभी लोग आपसे प्रभावित रहते हैं | यहीं पर बुध उच्‍च का भी होता है | सो ये लोग किसी न किसी रूप में फायनेंस, पब्लिकेशन या अन्य पढ़ने लिखने के काम से जुड़े हुए होते हैं |

कन्या लग्न शारीरिक विशेषता

कन्या लग्न के जातकों की शारीरिक बनावट, विशेषकर चेहरे के बारे में हमेशा कुछ ख़ास और अलग होता है। उनके पास आम तौर पर नाजुक और युवा विशेषताएं हैं। कन्या लग्न के जातक अक्सर अपनी उम्र से कम दिखते हैं। इनके पास गाल, सुंदर माथा और एक सीधी नाक होती है। ये चलते समय सावधानी से मापे गए कदम को उठाते हैं। इनकी चाल सधी हुई होती है।

कन्या लग्न मानसिक विशेषता

बुध, कन्या राशि पर शासन करता है, और यह बुद्धिमान और विश्लेषणात्मक गुणों से कन्या लग्न जातकों को सर्वश्रेष्ठ बनाता है। इस लग्न के मूल जातक आसानी से नहीं खुलते हैं, खासकर जहां भावनाओं का संबंध है। क्योंकि, वे अपनी भेद्यता प्रकट नहीं करना चाहते हैं, एक कमजोरी जिसका फायदा उठाया जा सकता है।

कन्या लग्न प्रेम और संबंध विशेषता

जब कन्या लग्न के लोग प्यार में पड़ते हैं, तो वे पूरे जोश के साथ ऐसा करते हैं। एक पृथ्वी तत्व राशि होने के नाते, आपका प्यार स्थिर और स्थायी होता है। आप प्यार व संबंधों को बखूबी निभाना जानते हैं। इनका महत्व भी आप जानते हैं। वृष और मकर के जातक कन्या लग्न के लोगों के लिए सबसे अनुकूल साथी हैं। जल तत्व की राशि कर्क और मीन कन्या राशि के लिए अच्छा मेल साबित हो सकते हैं।

कन्या लग्न स्वास्थ्य विशेषता

आंत्र, श्वसन प्रणाली और साइनस की समस्याएं इस लग्न के जातको के लिए आम विकारो में से कुछ हैं। कन्या लग्न स्वास्थ्य समस्याएं हैं। ये जातक अक्सर सर्दी, फ्लू, एलर्जी, कब्ज और आंतों के साथ समस्याओं की शिकायत करते रहते हैं। इन जातकों को भोजन के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता होती है।

कन्या लग्न राशि के लिए शुभ ग्रह

कन्या राशि के लिए शुक्र सबसे फायदेमंद ग्रह है। जबकि तटस्थ ग्रह सूर्य और बुध हैं।

कन्या लग्न राशि के लिए अशुभ ग्रह

कन्या राशि के लिए, मंगल ग्रह सबसे अधिक नकारात्मक ग्रह है, जो तीसरे और 8 वें घर का मालिक है। रेखा में अन्य पुरुष ग्रह बृहस्पति, चंद्रमा, राहु और केतु हैं।

कन्या लग्न राशि के लिए अनुकूल रंग

हल्का हरा, गहरा हरा, रॉयल ब्लू कन्या राशि के लिए भाग्यशाली रंग हैं।

कन्या लग्न राशि के लिए भाग्यशाली रत्न

हरा पन्ना नीलम और हीरा पुखराज मोती आपके लिए शुभ रत्न हैं।

कन्‍या लग्न में ग्रहों के प्रभाव :-

1.बुध :- कन्या लग्न में बुध ग्रह पहले और दशम भाव के मालिक हैं | इसलिए यह लग्नेश होकर कुण्डली के अतियोग कारक ग्रह माने जाते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बुध देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देतें हैं | तीसरे, छठें, सातवें (नीच), आठवें और बारहवें भाव में बुध अशुभ बन जाते हैं | इनकी दशा-अन्तर्दशा में दान और पाठ करके इनकी अशुभता दूर की जाती है | निर्बल अवस्था में बुध का रत्न पन्ना पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है |

2.शुक्र :- शुक्र देवता इस लग्न कुण्डली में दूसरे और नवम भाव के स्वामी होने के कारण अति योगकारक ग्रह होते हैं | दूसरे, चौथे, पाँचवें, सातवें, नौवें, दशम और एकादश भाव में शुक्र देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देते हैं | पहले (नीच), तीसरे, छठे, आठवाँ और द्वादश भाव में शुक्र देव उदय अवस्था में मारक बनकर अशुभ फल देते हैं | किसी भी भाव में अस्त शुक्र देव का रत्न हीरा और ओपल पहनकर उनका बल बढ़ाया जाता है |

3.मंगल :- मंगल देवता इस लग्न कुण्डली में तीसरे और आठवें भाव के स्वामी हैं | लग्नेश बुध के अति शत्रु होने के कारण वह कुण्डली के अति मारक ग्रह माने जाते हैं | मंगल देवता कुण्डली के किसी भी भाव में अपनी दशा-अन्तर्दशा में क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं | कुण्डली के छठे, आठवें और बारहवें भाव में मंगल देवता विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की भी क्षमता रखते हैं | परन्तु इसके लिए बुध देव का शुभ और बलि होना अनिवार्य है | इस कुण्डली में मंगल का रत्न मूंगा कभी नहीं पहना जाता है | मंगल की अशुभता उसका दान-पाठ करके दूर की जाती है |

4.बृहस्पति :- कन्या लग्न की कुण्डली में बृहस्पति देवता चौथे और सातवें दो केन्द्रों के मालिक होते हैं | सातावां भाव मारक स्थान होने के कारण बृहस्पति मारकेश भी होते हैं | इस लग्न की कुंडली में बृहस्पति अपनी स्थित के अनुसार अच्छा या बुरा फल देते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, नवम, दशम और एकादश भाव में बृहस्पति देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं | कुण्डली के किसी भी भाव में यदि गुरु देव अस्त अवस्था में विराजमान हैं तो उनका रत्न पुखराज पहन कर उनका बल बढ़ाया जाता है |

5.शनि :- कन्या लग्न की कुण्डली में शनि देव पाँचवें और छठे भाव के मालिक होते हैं | शनि देव लग्नेश बुध के भी अतिमित्र हैं इसलिए वह कुण्डली के योगकारक गृह माने जाते हैं | पहले, दूसरे, चौथे, पाँचवें, सातवें, नवम, दसम और एकादश भाव में शनि देव उदय अवस्था में अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार शुभ फल देते हैं | कुण्डली के किसी भी भाव में सूर्य के साथ अस्त अवस्था में पड़े शनि देव का रत्न नीलम पहन कर उनके बल को बढ़ाया जाता है | तीसरे, छठे, आठवें और बारहवें भाव में शनि देव यदि उदय अवस्था में हैं तो वह अशुभ हो जाते हैं | उनका पाठ पूजन और दान करके ही उनकी अशुभता को दूर किया जाता है |

6.चंद्र :- चंद्र देवता इस लग्न कुण्डली में ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं परन्तु लग्नेश बुध के अति शत्रु होने के कारण चन्द्रमा कुण्डली के मारक ग्रह माने जाते हैं | कुण्डली के सभी भावों में चन्द्र देवता अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देंगे | चन्द्रमा का रत्न मोती इस लग्न में उनकी स्थिति के अनुसार ज्योतिषी के परामर्श अनुसार पहना जाता है | चन्द्रमा की दशा अन्तरा में उनका दान-पाठ करके उनकी अशुभता को दूर किया जाता है |

7.सूर्य :- इस लग्न कुण्डली में सूर्य देव द्वादश भाव के मालिक हैं इसलिए वह कुण्डली के अति मारक ग्रह  माने जाते हैं | कुण्डली के सभी भागों में सूर्य देव अपनी दशा-अन्तर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं | परन्तु कुण्डली के छठे, आठवें और बारहवें भाव में स्थित सूर्य देव विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता भी रखते हैं इसके लिए बुध का बलवान और शुभ होना अति अनिवार्य है | सूर्य का रत्न माणिक इस लग्न कुण्डली में कभी नहीं पहना जाता अपितु उनकी दशा-अन्तर्दशा में पाठ और दान करके उनके मारकेत्व को कम किया जाता है |

→कन्या लग्न में चन्द्रमा हो, गुरु आठवें और राहू नौवें भाव में हो तो राहू
की महादशा और गुरु की अंतर्दशा में जातक भयंकर रोगों से पीड़ित होता है।
→कन्या लग्न, चौथे भाव में राहू व चन्द्र शनि से दृष्ट किन्तु शुभ दृष्टि से
हीन हों तो निश्चित रूप से क्षय रोग (T.B.) जातक को अपना शिकार बनाता है।
कन्या लग्न में षष्ठेश (शनि) लग्न में हो तथा पापग्रहों से दृष्ट हो तो नेत्रों
से जलस्राव के कारण जातक अंधा हो जाता है (निश्चितता के लिए सूर्य तथा दूसरे
व बारहवें भाव को भी विचारना चाहिए)।
कन्या लग्न, सूर्य व शनि सप्तमस्थ, चन्द्र व बुध छठे भाव में हो तो जातक
को मिरगी का रोग होता है।
→कन्या लग्न चौथे भाव में पापग्रह, चतुर्थेश (गुरु) पापग्रहों के मध्य हो तो
जातक को हृदय रोग होता है या चौथे या पांचवें दोनों भावों में पापग्रह हों तो भी
हृदय रोग होता है। अथवा चौथे में राहू अन्य पापग्रहों से दृष्ट हो व बुध (लग्नेश)
निर्बल हो तो हार्टअटैक होता है।
कन्या लग्नस्थ मंगल हो, शुक्र छठे भाव में हो और गुरु या शनि की दृष्टि
हो तो जातक को अल्सर या पेट में घाव होता है। कन्या लग्न में पापग्रह हों तथा
बुध निर्बल हो अथवा राहू कन्या लग्न में षष्ठमस्थ हो तो जातक सदा रोगी रहता है।
कन्या लग्न में चन्द्रमा आठवें भाव में हो, बुध व सूर्य, मंगल की युति
किसी भी भाव में हो तो जातक की मृत्यु ब्लडप्रेशर के रोग द्वारा कराती है।
कन्या लग्न शनि व बुध के प्रभाव में हो तथा शुक्र मकर या कुम्भ राशि
में हो तो जातक पत्नी को संतुष्ट नहीं कर पाता।
कन्या लग्न हो, बुध, गुरु, मंगल की युति दुःस्थानों में कहीं एकसाथ हो
तो दुर्घटना का शिकार होकर जातक मरता है।
कन्या लग्न, लग्नेश, बुध चतुर्थस्थ या द्वादश भाव में मंगल व शनि के
साथ हो तो जातक को कुष्ठ सम्भव होता है।
कन्या लग्न, निर्बल चन्द्र आठवें भाव में शनि के साथ हो तो जातक की
अकाल मृत्यु होती है।
कन्या लग्न, बुध व लग्न दोनों पाप मध्य हों, सातवें भाव में भी पापग्रह
हों और सूर्य निर्बल हो तो जातक जीवन से निराश होकर आत्महत्या कर लेता है।
पांचवें या छठे भाव में सूर्य, मंगल, गुरु या राहू हो तो कन्या लग्न के
जातक को सदा रुग्ण रखते हैं।
कन्या लग्न, सूर्य, मंगल शनि की युति आठवें भाव में हो, शुभ ग्रहों की
दृष्टि न हो तो जातक की मृत्यु एक वर्ष की अवस्था में हो जाती है। अथवा राहू,
बुध, शनि बारहवें भाव में युति करें और गुरु पंचमस्थ हो तथा कोई शुभ योग
कुंडली में न हो तो जातक की मृत्यु जन्म लेते ही हो जाती है।
बुध प्राय: सूर्य या शुक्र के साथ ही होता है। अपवाद रूप से अकेला होता
है। अतः बुध सम्बन्धी फलादेश उसकी युति को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
वैसे यदि बुध बलिष्ठ स्थिति में लग्नस्थ हो तो अन्य अरिष्टों का नाश करता है।
अन्यथा (निर्बल हो तो) चिकित्साविदों की चिकित्सा भी व्यर्थ होती है। जातक
सदा रुग्ण रहता है। जैसा कि चमत्कार चिन्तामणि में कहा गया है-
-
बुधो मूर्तिगो मार्जयेदन्यरिष्टं
गरिष्टाधियो बैखरी वृत्तिभाजः ।
जनादिव्य चामीकरी भूतदेहाश्चिकित्साविदो
दुश्चिकित्सा भवन्ति ॥
कन्या लग्न 
सम्पूर्ण उपाय मंत्र दान 
ॐ गंऎंश्रींक्लींह्रींह्रौंक्रींभ्रंसौः भुवनेश्वरयै नमः |

सूर्य : अंक 1 शेश सूर्य की महादशा में व्ययों की अधिकता रहती है।अशुभ दान करे सर्वदा अशुभ रानी और लाल कलर न पहने माणक ना पहने सूर्य के दान दे 

चंद्रमा : अंक 2 लाभेश चंद्रमा पक्षबली होने पर शुभ फल करता है।शुभ मोती धारण करे चावल खावे दूध पिए मोती मूनस्टोन पहने चाँदी की गिलास में पानी पिए, पूर्णिमा का व्रत रखे खिरनी की जड़ और 2 मुखीद्राक्ष पहने दूज के चाँद देखे 

मंगल : अंक 9 तृतीयेश और अष्टमेश होकर मंगल अनिष्ट फल करता है। मंगल की दशा में पर्याप्त सावधान रहना चाहिए। रक्त का दान मंगल को शांत करता है।सर्वदा अरिस्ट अशुभ कारक इसका दान करे मंगल के दान करे त्रिकोण खाद्य पदार्थ ∆ का दान करे मूंगा न पहने मंगल का दान करे

बृहस्पति : अंक 3 मिथुन लग्न की तरह यहां भी बृहस्पति दो केंद्रों का संयुक्त स्वामी है। महर्षि पराशर लिखते हैं :
                केंद्राधिपत्यदोषस्तु बलवान् गुरुशुक्रयोः।
                मारकत्वेपि च तयोर्मारकस्थानसंस्थितिः ॥
अर्थात् बृहस्पति और शुक्र को केंद्राधिपति होने पर दोष लगता है। बृहस्पति की महादशा अच्छी नहीं होती है। पीला अंडरवियर पहने किन्तु इस लग्न में शुभकारी पुखराज धारण करेl 5मुखी रुद्राक्ष भारंगी की जड़ बेसन चनादाल खावे गुरु दत्तात्रेय का विशेष ध्यान करे 

शनि : अंक 8 पंचमेश होकर शनि जितना शुभ है, षष्ठेश होकर उतना अशुभ भी है। उच्चस्थ या मकर का शनि ही शुभ फल करता है। सर्वदा शुभ नीलम धारण करे काल भैरव शिव कृष्ण काली जी को पूजे बिच्छू की जड़ पहने 7 मुखी रुद्राक्ष पहने काली उपासना करे फिरोज़ी रंग  साडी दान करे फिरोज़ी पंखे दान करे फ़िरोज़ा रत्न दान करे 

बुध : अंक 5 लग्नेश और दशमेश बुध शुभ और सकारात्मक फलदायी है।
पन्ना पहने हरी बनियान पहने हरी सब्ज़िया खूब खावे सर्वदा शुभ करक सर्वदा दुर्गा षोडशी भुवनेश्वरी पूजे आरोग्य शुभ धन सिद्धि कारी पन्ना पहने, पेरिडॉट पहने, विदारा जड़ी पहने, 4 मुखी रुद्राक्ष पहने 


शुक्र : अंक 6 भाग्येश और धनेश शुक्र की महादशा जीवन का स्वर्णकाल हो सकती है, बशर्ते शुक्र अस्त, नीचगत, शत्रुक्षेत्री न हो। कमला लक्ष्मी की उपासना करे ओपल हीरा पहने आलू छोला दही लस्सी खुशबू वाली वस्तुवे खावे सर्वदा शुभ लाभ कारी सफ़ेद स्फटिक  पुखराज पहने हीरा पहने, सर्पोखे की जड़ी पहने, 6 मुखी रुद्राक्ष पहने

राहु अंक 4 केतके दान ही शुभ रहेंगे 

6. कन्या लग्न ईष्ट- मंत्र- 

कन्या राशि : इन्हें हरे या श्वेत गणपति देवी दुर्गा काली भैरव शिव शक्ति  माता भुवनेश्वरी या माता चन्द्रघंटा की उपासना करनी चाहिए।
ॐ वं विघ्नेश्वराय नमः 
ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवायै च नमः शिवाय 
ॐ ऐंश्रींश्रींयै नमः 
ॐ दं वैष्णवे नमः 
कन्या राशि लग्न के जातक इस मंत्र का जप 108 बार रोज करें l इसमें आपकी कुंडली के अनुसार सारी पूजा समाहित हो जाएगी 

ॐ गंऎंश्रींक्लींह्रींह्रौंक्रींभ्रंसौः भुवनेश्वरयै नमः |

और कोई मन्त्र में ये 
ॐ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम:
इसके अलावा ये गृह आपके शुभ अनुकूल रहेंगे तो इनका जाप करते रहे दान न करे साथ में यह गृह बीज मंत्र 
बुध अंक 5
बुध मंत्र- 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:'।
बुध का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ बुं बुधाय नम:'l
गुरु अंक 3
गुरु मंत्र- 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:'। 
गुरु का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ ब्रं बृहस्पतये नम:'।
शुक्र अंक 6
शुक्र मंत्र- 'ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:'।
शुक्र का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शुं शुक्राय नम:'।
शनि अंक 8
शनि मंत्र- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:'। 
शनि का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:' 
चंद्र अंक 2
चंद्र मंत्र 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:'।चंद्र एकाक्षरी मंत्र- 
ॐ सों सोमाय नम:।

कन्या लग्न के लिए बुध, शुक्र, शनि, गुरु , चंद्र, योग कारक हैं इसलिए पन्ना, हीरा, नीलम, पुखराज, मोती, धारण करना शुभ रहेगा l 2,4,5,6,7,मुखी रुद्राक्ष भी धारण करे। खिरनी, विदारा, भारंगी, बिच्छू,सरपौंखा की जड़िया शुभ  
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दान :  दान के गृह : सूर्य, मंगल

दान मंगल के 9 का अंक 
ताम्बा, गुलाब जामुन, सिकी हुई, माटी, ईट, चूल्हा, अगरबत्ती,लाल शरबत जूस, लाइटर, गैस लैंप, स्टोव, गुलाब शरबत, सेब, मिठाई, गुलाल,लाल रंग के पुष्प, टमाटर, सिन्दूर, मूंगा, त्रिकोण वस्तुवे, आतिश बाज़ी , अग्नि की वस्तुवे, क़ुमकुम, शहद , मसूर दाल , खजूर , मिठाई सिका हुवा मावा रबड़ी बेसन के लड्डू पकोड़े ,समोसे, तिकोण पुरिया बिंगो, पेटीज़, सैंडविच, मालपुवे लाल मसूर की दाल, लाल कपड़े का दान करना चाहिए। इसके अलावा योग्य ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय को गेहूं, गुड़, माचिस,लाइटर, गैस, चूल्हा, ताम्बा, स्वर्ण, दुधारू गौ, मसूर की दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्ठान्न एवं द्रव्य तथा भूमि दान करने से मंगल दोष दूर होता है। 

सूर्य की दान देने वाली वस्तुओं में

 1 अंक सांड,रोटी,अनार, कमल, गुलाबी रंग, चौरस आकर के आसान  सोने की 1ग्राम  गिंनी, कमल का फूल, आम, चुकुंदर, गाजर, रानी रंग के वस्त्र, अनार, आम, नारंगी, बन्दर के खिलोने, कुमकुम, बिस्कुट, गुलाल, आटा, तांबा, गुड़, गेहूं, मसूर दाल दान की जा सकती है। पीला बल्ब  रौशनी की वस्तुवे टोर्च, टेबल लैंप  यह दान प्रत्येक रविवार या सूर्य संक्रांति के दिन किया जा सकता है। सूर्य ग्रहण के दिन भी सूर्य की वस्तुओं का दान करना लाभकारी रहता है।
Combo उपाय 
मीठे+गेहू  गायी को खिलावे 
मंगल+सूर्य 
राहु+केतु मंगल+सूर्य 
जौ+बाजरी+मसूर+रागी+गेहू  @  9,18,27,54,81,108,kg
गुड़ की पेटी और मुफ़ली तेल का एक कैन गौशाला में देवे हर अमावस्या को हलवा लापसी बिस्किट्स दान करे 
गणेश मंदिर :  बुद्धवार
लड्डू, पान, दूर्वा चढ़ावे और गणेश अष्टक का पाठ करे मॉस की चतुर्थी का व्रत करे मंत्र स्तोत्र कवच का पाठ करे गणेश यंत्र केतु यन्त्र NE
में लगावे वी दुर्गा मंदिर 
/लक्ष्मी/सरस्वती/काली दुर्गा की उपासना, सोम, बुध, शुक्रवार की शाम को करे वैभव लक्ष्मी, कीलक,अर्गला, कवच 
सिद्धकुंजिका का पाठ करे, बीसा, नवदुर्गा, दशविद्या, श्री  यन्त्र स्थापित करे पूजा में, तीज, शुक्लस्ट्मी, शुक्ल नवमी को व्रत रखे   

 काली मंदिर : शनिवार  चढ़ावे :
मोगरा माला मोगरा धुप , मोगरा इत्र कटार,त्रिशूल, कटार, मालपुआ, इमरती, मूंग दाल कचौड़ी, दही बडा,मोगरे इत्र,धुप, बेसन की चकी,मीश्री गूंजा ,सेव, अनार, पान, सरसो के तेल का दिया लगावे  108 बार मंत्र बोले 
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कालिकायै नमः कवच स्तोत्र का पाठ काली यंत्र शनि यंत्र पश्चिम में लगाए   

भैरव मंदिर : शनिवार, रविवार, कृष्ण पक्षअस्टमी कालाष्टमी का व्रत, कट्टार, त्रिशूल, शनि या रवि वार को मालपुआ  इमरती कचौी बड़े, दाल के बड़े, पापड,  उड़द की दाल,चूरमा, शसिगरेट पान चढ़ावे और मंत्र है ॐ भ्रं भैरवाय नमः
भैरव यंत्र sw में लगावे राहु यन्त्र लगावे

कृष्ण:  मासिक जन्मास्टमी का व्रत रखे, काले रंग की कृष्ण मूर्ति श्रीनाथ जी, वृन्दावन मथुरा गिरिराज जी द्वारिका, नाथद्वारा में दुग्धाभिषेक करावे ॐ क्लीं कृष्णाय नमः का जाप करे, माखन मिश्री का भोग इलाइची लगावे 


 शिव मंदिर : काले शिवलिंग की पूजा कच्चादूध जल और शक्कर का घोल शिवलिंग पर चढ़ावे 
सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, पुष्य नक्षत्र,  व्रत , रुद्रास्टाध्यायी, अभिषेक लोटा जल, कच्चा दूध, शक्कर, बिल्वपत्र(बुधवार),  पान, गन्ने का रास दीप, पान 
मंत्र ॐ ह्रीं नमः शिवायै च 
ह्रौं नमः शिवाय ,पूर्व उत्तर में केतु गुरु यन्त्र उत्तर में मृत
 इमरती  का दान करे

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