ज्योतिष दर्शन और सनातन इष्टसाधना व्रत उपासन :

 ज्योतिष दर्शन और सनातन इष्टसाधना : देव साधना व्रत उपासना  विवेचन उपचार विशेषांक

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इष्ट देवता : अपने इष्‍ट देवता को कैसे चुनें?

हमारी परंपरा में अक्सर किसी परिवार, कुल या फिर व्यक्ति विशेष के अपने इष्ट देवता होते हैं। क्या हम खुद ही अपना इष्ट देव चुन सकते हैं? क्या इष्ट देव आध्यात्मिकता उन्नति दे सकते हैं,इष्ट देवता एक साधन

सबसे पहले आपको यह समझना होगा कि इष्ट देवता का मतलब है आपकी पसंद का देवता। इसका मतलब है कि आपने देवता को बनाया। हो सकता है कि आपने भावनात्मक रूप से कोई देवता बना लिया - दरअसल आपने ऊर्जा का एक स्वरूप तैयार कर लिया, जिसके साथ आप एक खास तरीके से जुड़े रहते हैं।

हनुमान जबर्दस्त शक्ति और भक्ति के प्रतीक हैं। इन चीजों को अपने जीवन का अंग बनाएं। आपके जीवन में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आएंगे। यह है कि यह एक तरह का उपकरण या साधन है। उपकरण वह चीजें भी कर सकता है, जो आप आम तौर पर नहीं कर सकते। उपकरणों को इस्तेमाल करने की योग्यता होने के कारण ही इंसान इस धरती पर सबसे प्रभावशाली ताकत है।

आप एक माइक्रोफोन के जरिए अपनी बात दूर तक पहुंचा सकते हैं। माइक्रोफोन आपकी आवाज को केवल बढ़ा रहा है। माइक्रोफोन आपके लिए तभी कारगर है जब आप बोल सकते हैं। अगर आप बोल ही नहीं पाते तो माइक्रोफोन आपके लिए बेकार होता। यानी उपकरण आपकी योग्यताओं को बढ़ाने का काम करते हैं। तो हमने इसी तरह से उपकरण के रूप में ऊर्जा के स्वरूप स्थापित कर लिए हैं, जिनके साथ हमारा बेहद गहरा संबंध है। लेकिन ये सभी स्वरूप ऊर्जा-पिंड नहीं हैं। इनमें से कई तो केवल भावनाओं की उपज हैं, क्योंकि जो कोई इंसान भक्ति में होता है, वह इस बात की परवाह नहीं करता कि ऐसी किसी चीज का अस्तित्व है या नहीं। उसे बस अपनी भावनाओं की शक्ति के बारे में पता होता है। जिस तरह से आप अपनी बुद्धि की शक्ति का इस्तेमाल करते हैं, उसी तरह आप अपनी भावनाओं की शक्ति का इस्तेमाल करके भी शानदार काम कर सकते हैं।

जब आप एक भक्त बन जाते हैं, तब इससे फ र्क नहीं पड़ता कि आपकी भक्ति किसके लिए है - किसी देवता, बंदर या भैंसे के लिए। बस आप समर्पित होते हैं। चूंकि आपमें भक्ति है, आप समर्पित हैं, इसलिए आपका रूपांतरण होगा। यह रूपांतरण देवता के द्वारा नहीं, आपकी भक्ति के द्वारा होगा। अगर आप किसी से प्रेम करने लगें, भले ही वह शख्स बेवकूफ ही क्यों न हो, तो प्रेम करने के कारण आप भी खूबसूरत हो जाते हैं। किसी देवता के प्रेम में पडऩे का फायदा यह है कि वह आपको निराश नहीं करेंगे। इंसानों से आपको निराशा मिल सकती हैं। इसलिए नहीं कि उनमें कोई कमी है, बल्कि इसलिए क्योंकि आपकी उनसे अपेक्षाएं अवास्तविक होती हैं। एक काम करके देखिए। कोई ऐसा शख्स ढूंढिए जिसे आपने प्रेम किया और अब आपको उससे समस्या होने लगी है। अब उन उम्मीदों की सूची बनाइए जो आपने उस शख्स से लगा ली थीं। अब खुद से पूछिए कि अगर आप उनकी जगह होते तो क्या आप उन उम्मीदों को पूरा कर पाते? आप पाएंगे कि उन उम्मीदों को पूरा कर पाना संभव नहीं है। लेकिन आप चाहते हैं कि वे इन उम्मीदों को पूरा करें, क्योंकि आपको लगता है कि वह तो सुपरमैन हैं। सोचने में अच्छा लग सकता है, लेकिन सच्चाई तो यही है कि वह भी आपकी ही तरह एक आम इंसान है।

इष्ट देवता प्राण प्रतिष्ठित हो सकते हैं

अब हनुमान की बात पर आते हैं। वह सुपरमैन हैं। बस एक पूंछ है और चेहरा थोड़ा अलग है, बाकी तो वह सुपरमैन ही लगते हैं। आप कह सकते हैं कि वह सुपर सुपरमैन हैं। तो अगर आपके पास हनुमान की ऐसी मूर्ति है जिसकी प्राण प्रतिष्ठा हुई है और आपको वहां कुछ खास महसूस होता है तो हो सकता है कि इसमें कुछ सच्चाई भी हो। नहीं तो यह सब आपकी भावनाएं ही हैं। तो अब सवाल है कि जो आपके साथ होता है वह वास्तविकता है या मतिभ्रम? मैं कहूंगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बल्कि आपके मन में जो भी हो रहा है वह सब मतिभ्रम ही है। बताइए है या नहीं?

बस अब आपको यह सीखना है कि आपका मतिभ्रम आपके लिए काम करे, आपके खिलाफ नहीं। विचारों व भावनाओं का यही काम है। मैं आपके विचारों और भावनाओं की मूलभूत रचना के बारे में बात कर रहा हूं। वे एक नाटक की तरह हैं, एक मनोवैज्ञानिक नाटक। क्या आप अपने इस मनोवैज्ञानिक नाटक का इस्तेमाल अपने जीवन को बेहतर बनाने में करेंगे या इस नाटक से खुद को बर्बाद कर लेंगे? ये दोनों ही विकल्प आपके पास हैं। कल्पनाशक्ति

सभी देवी देवताओं की पूजा उपासना करने के बाद भी अक्सर इंसान का मन भटकता ही रहता है. ज्योतिष के जानकारों की मानें तो हर इंसान का मन किसी एक देवी या देवता की ओर सबसे ज्यादा आकर्षित होता है और वही देवी या देवता आपके इष्ट देव हो सकते हैं. अगर आपकी कोई कुल देवी या देवता हैं तो वो भी आपके इष्ट हो सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि कौन हैं आपके इष्ट देव जिनकी उपासना से होगा आपका कल्याण....

इष्ट देव कौन हैं?

- धार्मिक मान्यताओं में हर व्यक्ति के एक इष्ट देव या देवी होते हैं

- इनकी उपासना करके ही व्यक्ति जीवन में उन्नति कर सकता है

- इष्ट देव या देवी का निर्धारण लोग कुंडली के आधार पर करते है

- ग्रहों की समस्या को दूर करने के लिए विशेष देवी देवताओं की उपासना की जा सकती है

धार्मिक परंपराओं में ईश्वरीय शक्ति की उपासना अलग-अलग रूपों में की जाती है. ज्योतिष के जानकारों की मानें तो हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवताओं को उपासना के योग्य माना गया है. अलग-अलग शक्तियों के रूप में उनकी पूजा की जाती है. अगर आपकी कुंडली में ग्रहों से जुड़ी कोई समस्या है तो आइए जानते हैं कि कौन से ग्रह के लिए कौन से देव की उपासना सबसे उत्तम होगी....

ग्रहों की समस्या के लिए क्या करें?

- सूर्य के लिए सूर्य की ही उपासना करें या गायत्री मंत्र की साधना करें

- चन्द्रमा के लिए भगवान शिव की उपासना करना उत्तम होगा

- मंगल के लिए कुमार कार्तिकेय या हनुमान जी की उपासना करें

- बुध के लिए मां दुर्गा की उपासना करें

- बृहस्पति के लिए श्रीहरि की उपासना करें

- शुक्र के लिए मां लक्ष्मी या मां गौरी की उपासना करें

- शनि के लिए श्रीकृष्ण या भगवान शिव की उपासना करें

- राहु के लिए भैरव बाबा की उपासना करें 

- केतु के लिए भगवान गणेश की उपासना करें

विशेष समस्याओं के लिए किसकी उपासना करें ?

- मानसिक समस्याओं के लिए शिवजी की उपासना करें

- शारीरिक दर्द और चोट -चपेट की समस्या के लिए हनुमान जी की उपासना करें

- शीघ्र विवाह के लिए पुरुष मां दुर्गा उपासना करें

- शीघ्र  विवाह के लिए स्त्रियां भगवान शिव की उपासना करें

- बाधाओं के नाश के लिए भगवान गणेश की पूजा करें

- धन के लिए मां लक्ष्मी की उपासना करें 

- मुक्ति मोक्ष या आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए श्रीकृष्ण या महादेव की उपासना करें 

संसार का प्रत्येक जीव अपने अपने समय में अपने-अपने गण को लेकर पैदा होता है। जो जिसका गण होता है उसी के अनुसार व्यक्ति के इष्ट को समझा जाता है। जन्म कुंडली में बारह राशियां है और लगन में जो राशि होती है उस राशि का मालिक ही व्यक्ति के गण का मालिक होता है उस मालिक के गण का प्रमुख देवता कौन सा है वह अपने अपने धर्म के अनुसार ही माना जाता है। शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं। भारतीय संस्कृति ज्ञान, कर्म और भक्ति का संगम है। इनकी अपनी अपनी महत्ता है कोई ज्ञान के आधार पर अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढता है तो तो कोई कर्म को अपना माध्यम बनाता है तो कोई भक्ति भाव को आधार बनाकर मुक्ति पाना चाहता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति में भक्ति को सहज और शीघ्र प्राप्ति वाला मार्ग बताया गया है।

किसी जातक की कुंडली से इष्ट देव जानने के अलग-अलग सूत्र व सिद्धांत समय-समय पर ऋषि मुनियों ने बताये व सम्पादित किये हैं। जेमिनी सूत्र के रचयिता महर्षि जेमिनी इष्टदेव के निर्धारण में आत्मकारक ग्रह की भूमिका को सबसे अधिक मह्त्वपूर्ण बताया है। कुंडली में लगना, लग्नेश, लग्न नक्षत्र के स्वामी एवं ग्रह जो सबसे अधिक अंश में हो चाहे किसी भी राशि में हो आत्मकारक ग्रह होता है।

अपना इष्ट देव चुनने में निम्न बातों का ध्यान देना चाहिए।

आत्मकारक ग्रह के अनुसार ही इष्ट देव का निर्धारण व उनकी अराधना करनी चाहिए।

भक्ति और आध्यात्म से जुड़े अधिकांश लोगों के मन में हमेशा यह प्रश्न उठते रहता है मेरा इष्ट देव कौन है और हमें किस देवता की पूजा अर्चना करनी चाहिए।

किसी भक्त के प्रिय शिव जी हैं तो किसी के विष्णु तो कोई राधा कृष्ण का भक्त है तो कोई हनुमानजी का। और कोई कोई तो सभी देवी देवताओं का एक बाद स्मरण करता है। परन्तु एक उक्ति है कि "एक साधै सब सधै, सब साधै सब जाय"। जैसा की आपको पता है कि अपने अभीष्ट देवता की साधना तथा पूजा अर्चना करने से हमें शीघ्र ही मन चाहे फल की प्राप्ति होती है।

अब प्रश्न होता है कि देवी देवता हमें कैसे लाभ अथवा सफलता दिलाते हैं वस्तुतः जब हम किसी भी देवी-देवता की पूजा करते हैं तो हम अपने अभीष्ट देवी देवता को मंत्र के माध्यम से अपने पास बुलाते है और आह्वान करने पर देवी देवता उस स्थान विशेष तथा हमारे शरीर में आकर विराजमान होते है ।

वास्तव में सभी दैवीय शक्तियां अलग-अलग निश्चित चक्र में हमारे शरीर में पहले से ही विराजमान होती है आप हम पूजा अर्चना के माध्यम से ब्रह्माण्ड सेउपस्थित दैवीय शक्ति को अपने शरीर में धारण कर शरीर में पहले से विद्यमान शक्तियों को सक्रिय कर देते है और इस प्रकार से शरीर में पहले से स्थित ऊर्जा जागृत होकर अधिक क्रियाशील हो जाती है। इसके बाद हमें सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है। ज्योतिष के माध्यम से हम पूर्व जन्म की दैवीय शक्ति अथवा ईष्टदेव को जानकर तथा मंत्र साधना से मनोवांछित फल को प्राप्त करते है।

इष्ट देव को जानने की विधियों में भी विद्वानों में एक मत नहीं है। कुछ लोग नवम् भाव और उस भाव से सम्बन्धित राशि तथा राशि के स्वामी के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करते हैं।

वहीं कुछ लोग पंचम भाव और उस भाव से सम्बन्धित राशि तथा राशि के स्वामी के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करते हैं।

कुछ विद्वान लग्न लग्नेश तथा लग्न राशि के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करते हैं।

त्रिकोण भाव में सर्वाधिक बलि ग्रह के अनुसार भी इष्ट देव का चयन किया जाता है।

महर्षि जैमिनी जैसे विद्वान के अनुसार कुंडली में आत्मकारक ग्रह के आधार पर इष्ट देव का निर्धारण करना चाहिए।

अब प्रश्न उठता है कि कुंडली में आत्मकारक ग्रह का निर्धारण कैसे होता है? महर्षि जेमिनी के अनुसार जन्मकुंडली में स्थित नौ ग्रहों में जो ग्रह सबसे अधिक अंश पर होता है चाहे वह किसी भी राशि में कयों न हो वह आत्मकारक ग्रह होता है।

इष्ट देव या देवी का निर्धारण हमारे जन्म-जन्मान्तर के संस्कारों से होता है। ज्योतिष में जन्म कुंडली के पंचम भाव से पूर्व जन्म के संचित धर्म, कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा,भक्ति और इष्टदेव का बोध होता है। यही कारण है अधिकांश विद्वान इस भाव के आधार पर इष्टदेव का निर्धारण करते है। नवम् भाव से उपासना के स्तर का ज्ञान होता है।

हालांकि यदि आप अपने इष्ट देव निर्धारण नहीं कर पा रहे तो बिना किसी कारण के ईश्वर के जिस स्वरुप की तरफ आपका आकर्षण हो, वही आपके इष्ट देव हैं ऐसा समझकर पूजा उपासना करना चाहिए।

सूर्य- विष्णु तथा राम

चन्द्र- शिव, पार्वती, कृष्ण

मंगल- हनुमान, कार्तिकेय, स्कन्द,

बुध- दुर्गा, गणेश,वृहस्पति- ब्रह्मा, विष्णु, वामन

शुक्र- लक्ष्मी, मां गौरी

शनि- भैरव, यम, हनुमान, कुर्म,

राहु- सरस्वती, शेषनाग, भैरव

केतु- गणेश, मत्स्य

मेष: सूर्य, विष्णुजी

वृष: गणेशजी।

मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।

कर्क: हनुमानजी।

सिह: शिवजी।

कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली।

तुला: भैरव, हनुमानजी, काली।

वृश्चिक: शिवजी।धनु: हनुमानजी।

मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।

कुंभ: गणेशजी।

मीन: दुर्गा, सीता या कोई देवी।

मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें। वृष: गणेशजी। मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी। कर्क: हनुमानजी। सिंह: शिवजी। कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली। तुला: भैरव, हनुमानजी, काली। वृश्चिक: शिवजी धनु: हनुमानजी। मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी। कुंभ: गणेश जी मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।

जन्म कुंडली से :  जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं।

ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव।

सूर्य: विष्णु। चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा। मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय। बुध- गणेश, विष्णु गुरू- शिव। शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती। शनि- भैरव, काली।

 जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें। फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें। मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें। अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें। मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें। जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।

जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे। रविवार- विष्णु सोमवार- शिवजी। मंगलवार- हनुमानजी बुधवार- गणेशजी गुरूवार- शिवजी शुक्रवार- देवी शनिवार- भैरवजी।

मेष लग्न अग्नि तत्व कर्तिकेय, देवि दुर्गा, सुर्य,

सूर्य देवता, गायत्री देवी आपके इष्ट है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

वृषभ लग्न जल तत्व शिव-गौरि,

बुध देवता, गणेश जी आपके इष्ट है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

मिथुन लग्न

शुक्र देवता , माँ दुर्गा आपके इष्ट है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

कर्क लग्न

मंगल देवता , हनुमान जी आपके इष्ट देव है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

सिंह लग्न

देव गुरु बृहस्पति, विष्णु जी आपके इष्ट देव है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

कन्या लग्न

शनि देवता, शिव जी आपके इष्ट देव है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

तुला लग्न

शनि देवता, शिव जी आपके इष्ट देव है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

वृश्चिक लग्न

देव गुरु बृहस्पति, विष्णु जी आपके इष्ट देव है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

धनु लग्न

मंगल देवता, हनुमान जी आपके इष्ट देव है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

मकर लग्न

शुक्र देवता , माँ दुर्गा आपके इष्ट है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

कुम्भ लग्न

बुध देवता, गणेश जी आपके इष्ट है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

मीन लग्न

चंद्र देवता, शिव जी आपके इष्ट देव है उनका मंत्र , पूजन , पाठ आरती आपके लिए सदैव लाभकारी रहेगी.

इस तरह अपने सही इष्ट को पहचान कर उसकी नित्य आराधना करने वाले को आरोग्य, सौभाग्य, सम्मान, इष्टवल, एवं योग्यता की प्राप्ती होती है।

पारिवारिक व् व्यक्तिगत पूजा-अनुष्ठान के सन्दर्भ में सिद्धि-साधना भिन्न पथ है किन्तु सामान्य पूजा अनुष्ठान में सर्वत्र सामान्य लोग अपने कल्याण -सुख -संमृद्धि के लिए देवी-देवता की पूजा करते है ,किन्तु फिर भी उन्हें कभी -कभी अपेक्षित लाभ नहीं मिलता ,कल्याण नहीं होता ,,कभी-कभी तो कष्ट -परेशानिया बढ़ भी जाती है ,इसमें थोड़ी सी नासमझी के कारण लोग भारी अनिष्ट और भाग्य विकार को आमंत्रित करते है भला कल्याणकारक देवी-देवता अनिष्ट कैसे कर सकते है ,तो यहाँ गलती गलती यह हो रही है की सभी देवी-देवता कल्याणकारी है ,परन्तु वे तब कल्याणकारी है जब आपको उनकी आवश्यकता है |

आप मोटे है चर्बी बढ़ रही है और लक्ष्मी जी की निरंतर पूजा कर रहे है ,धन सम्पत्ति तो बाद की चीज है ,आप का स्वास्थय बिगड जाएगा ,मोटापा ,मधुमेह हो सकता है ,आप अपनी अकाल मृत्यु और घोर दुःख शारीरिक कष्ट को आमंत्रित कर रहे है ,,इसी प्रकार आप में काम-क्रोध-उत्तेजना अधिक है और आप काली जी या भैरव जी की पूजा कर रहे है ,आप कलह -झगड़े -राजदंड और अकालमृत्यु को आमंत्रित कर रहे है ,आपको तो शिव की पूजा करनी चाहिए ,,इसी प्रकार सरस्वती की पूजा भावुक व्यक्तियों के लिए उचित नहीं है ,,चंचल प्रकृति के सक्रीय व्यक्ति के लिए दुर्गा जी की पूजा उनमे अति सक्रियता ,चंचलता बढा देगी जिसे उनकी शान्ति समाप्त हो जायेगी ,,सोचिये यदि सभी देवी देवता सभी के लिए उपयुक्त होते तो उनमे इतनी विभिन्नता क्यों होती आप किसी भी देवी-देवता की पूजा कर रहे है तो इसका मतलब है आप उस देवी देवता को आप अपने शरीर में बुला रहे है ,वास्तव में तो सभी पहले से आपके शरीर के अलग-अलग निश्चित चक्र में है ,पूजा से आप ब्रह्माण्ड से उसकी शक्ति को शरीर में खीच कर उनकी शक्ति बढा रहे है ,जिससे वे जाग्रत हो अधिक क्रियाशील हो सके यदि वह शक्ति पहले से आपके शरीर में अधिक है ,तो अब शरीर का सारा उर्जा समीकरण असंतुलित हो जाएगा ,शक्ति बढने के कारण ही आप विनष्ट हो जायेगे ,,उदाहरण के लिए यदि आप क्रोधी है और भैरव जी या काली जी की शक्ति आमंत्रित कर रहे है ,तो क्रोध की अधिकता ऐसा अनर्थ करवा देगी की आप या तो आत्म ह्त्या कर लेगे या ह्त्या करके जेल चले जायेगे ,कलह-कटुता-झगडा तो आपसे आम हो जाएगा ,क्रोध को जबरदस्ती दवायेंगे तो पागल हो जायेंगे।

 प्रत्येक देवी-देवता ब्रह्माण्ड के एक निश्चित गुण और उर्जा का प्रतिनिधित्व करते है ,उनके मंत्रों ,पूजा पद्धति,उनके रूप में एक विशिष्टता होती है जो उसके गुणों को व्यक्त करती है ,उसकी पूजा करने पर आपमें वह गुण बढने लगते है ,यदि उसकी आपको आवश्यकता नहीं है तो वह आपमें अधिक होने पर कष्ट देने लगेगा ,अनर्थ करने लगेगा ,,अतः जिसकी कमी हो उसे ही बढाना और संतुलन बनाना चाहिए ,जिससे अधिकतम लाभ मिल सके ,विषमय है की ज्योतिष में रत्न ,अंगूठी ,ताबीज ,आदि के चुनाव में इसकी सावधानी बरती जाती है ,परन्तु पूजा-अनुष्ठान में हम जाने किस अंधश्रद्धा के शिकार है ,फलतः परिश्रम भी करते है और लाभ के बदले हानि और अनिष्ट के शिकार हो जाते है अतः अपने दैनिक लाभ के लिए आपको ऐसे देवी-देवता का चुनाव करना चाहिए जिनकी शक्ति और गुणों की आपको आवश्यकता है ,नाकि उनकी जिनके गुण आपमें पहले से ही अधिक है

उदाहरण के लिये कर्क लगन की कुंडली है और इस लगन का मालिक चन्द्रमा है,चन्द्रमा तीसरे भाव मे है और चन्द्रमा की राशि कन्या है। कन्या राशि का मालिक बुध है,बुध ही जातक का इष्टदेव का कारक है,बुध अगर तुला राशि का होकर चौथे भाव मे सूर्य और शुक्र के साथ बैठा है तो जातक के लिये माना जाता है कि जातक के पिता और माता ने मिलकर मनौती को मांग कर पुत्र को प्राप्त किया है वह मनौती जातक के पिता के ही इष्ट का दूसरा रूप रखने वाली देवी के लिये कहा जा सकता है।  हर ग्रह का अलग अलग देवता होता इस बात को वैसे तो मतान्तर से भेद रखने वाली बाते मिलती है लेकिन सही रूप में जानने के लिये लाल किताब ने बहुत ही बारीकी से ग्रह और उसके देवता का वर्णन किया है। जैसे सूर्य से विष्णु को मानते है,चन्द्रमा से शिवजी को मानते है मंगल से हनुमान जी को भी मानते है और अगर मंगल बद होता है तो हनुमान जी की जगह पर भूत प्रेत पिशाच की सेवा करने के कारण मिलने लगते है,बुध को दुर्गा के लिये जाना जाता है गुरु को ब्रह्मा जी से जोडा गया है शुक्र को लक्ष्मी से जोड कर देखा गया है,शनि को भैरों बाबा के लिये पूजा जाता है और राहु को सरस्वती के लिये तथा केतु को गणेशजी के लिये समझा जाता है।

लालकिताब के अनुसार जातक का इष्टदेव देवी दुर्गा ही मानी जायेगी। अगर कुंडली मे शनि की स्थिति मार्गी है तो देवी की मूर्ति की पूजा मे ध्यान लगाना फ़ायदा देने वाला माना जाता है शनि के वक्री होने पर मूर्ति की जगह पर दिमागी पूजा यानी मंत्र जाप आदि से फ़ल मिलना माना जा सकता है। इसी प्रकार से जैसे इस कुंडली मे बुध के साथ सूर्य भी है और शुक्र भी है शनि सामने होकर दसवे भाव मे विराजमान है.तुला राशि को पश्चिम की दिशा मानी जाती है,भारत मे चार दिशाओं में भगवान विष्णु के चार धाम है,पूर्व मे जगन्नाथ को विष्णु को रूप में उत्तर में बद्री विशाल को पश्चिम मे द्वारिकाधीश को और दक्षिण में भगवान विष्णु को राम के रूप मे पूजा जाता है.शुक्र और बुध तुला राशि के सूर्य के साथ है तो राधा और रुक्मिणी के साथ द्वारकाधीश की प्रतिमा को जाहिर करते है।

सूर्य और शुक्र के साथ बुध की स्थिति पानी वाले भाव यानी चौथे भाव मे है इसलिये अष्टम भाव का राहु समुद्र के किनारे की बात को उजागर करता है,इसलिये इस कुन्डली मे द्वारिकाधीश के साथ राधा और रुक्मिणी की पूजा को करना और उन्हे मानना सही और फ़लदायी माना जा सकता है। राधा लक्ष्मी रूप मे और रुक्मिणी शक्ति के रूप मे अपना अपना फ़ल जातक को देने वाली है। लेकिन यहां एक शंका यह पैदा होती है कि अगर जातक इन्ही ग्रहों को लेकर इंग्लेंड मे पैदा हुआ है तो वह द्वारिकाधीश और राधा रुक्मिणी को कहां से प्राप्त करेगा। भारतीय भू-भाग पर पैदा होने के बाद तो चारो दिशाओं के सूर्य को विष्णु के रूप में मान भी लिया गया है। इंगेलंड मे इन ग्रहों के कारक बदल जायेंगे,इन कारकों में सूर्य के स्थान पर राज्य का मालिक या राजा होगा,और शुक्र तथा बुध के कारको में वह राजकीय धन और कानूनो का मालिक होगा। जहां लोग ईश्वर पर विश्वास रखते है वहां पर यह ग्रह ईश्वरीय शक्ति के रूप मे देखे जाते है और जहां मनुष्य केवल कर्म पर विश्वास रखता है वहां यह ग्रह मनुष्य रूप में स्थापित अधिकारियों के रूप मे काम करने लगते है।

 अपने ईष्टदेव को पहचानने के लिए आपको आपकी जन्म-कुंडली की आवश्यकता होगी। जन्म कुंडली को ध्यान से देखें उसमें जिस स्थान पर ग्रहों के अंश दिए गए होते हैं वहां किस ग्रह को सबसे अधिक अंश प्राप्त हैं। जिस ग्रह को सबसे अपने ईष्टदेव को पहचानने के लिए आपको आपकी जन्म-कुंडली की आवश्यकता होगी। जन्म कुंडली को ध्यान से देखें उसमें जिस स्थान पर ग्रहों के अंश दिए गए होते हैं वहां किस ग्रह को सबसे अधिक अंश प्राप्त हैं। जिस ग्रह को सबसे अधिक अंश प्राप्त होंगे वो ग्रह आपकी कुंडली का आत्मकारक ग्रह कहलाता है।

1. सूर्य- सूर्य आपके आत्म्कारक ग्रह हैं तो भगवान विष्णु और उनके अवतार भगवान राम आपके ईष्ट देवता होंगे।

2.चंद्रमा- भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान कृष्ण ईष्ट देव होंगे।

3.मंगल- मंगल आत्म्कारक ग्रह होने पर हनुमान, भगवान कार्तिकेय और नरसिंह भगवान आपके ईष्टदेवता होंगे।

4. बुध- भगवान गणेश और माता दुर्गा आपके ईष्ट देव होंगे।

5. बृहस्पति- भगवान विष्णु और उनके वामन अवतार आपके ईष्ट देवता होंगे अगर बृहस्पति आपके आत्म्कारक ग्रह हैं।

6. शुक्र- माता लक्ष्मी और परशुराम अवतार आपके ईष्ट देवता होंगे।

7.शनि- भैरव, यमराज, कुर्मावतार और हनुमान जी आपके ईष्ट देवता होंगे।

8.राहु- माता सरस्वती और शेषनाग आपके ईष्ट देवता होंगे।

9. केतु- भगवान गणेश और मत्स्य अवतार आपके ईष्ट देवता होंगे।

ईश्वर एक हैं और उन्होंने हमारी सुविधा के लिए इतने सारे अवतार लिए हैं चाहे उनकी जिस रूप में पूजा करो, वो पूजा लगती उसी ईश्वर को लगती है। इसलिए ये बात हमेशा ध्यान रहनी चाहिए कि किसी के धर्म और रास्ते को गलत नहीं बताना चाहिए अंश प्राप्त होंगे वो ग्रह आपकी कुंडली का आत्मकारक ग्रह कहलाता है। ये ग्रह ही आपके जीवन में महत्वपूर्ण है।

ज्योतिष के जानकारों की मानें तो हर व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं..अगर समय रहते उन्हें पहचान लिया जाए तो ग्रहों के हर दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है. तो आप भी अपने इष्ट देव को पहचानें और उनकी उपासना करें. फिर सुखी जीवन के लिए किसी दूसरे उपाय की ज़रूरत नहीं पड़ेगीl

कुंडली के पंचमभाव से ईश्वर प्रेम और नवम भाव से धार्मिक कर्मकांड , अनुष्ठान क विचार होता है । जब नवम और पंचम दोनों शुभलक्षण युक्त हों तभी अनुष्ठान क्रिया भक्ति के साथ होती है । पंचम भाव प्रगाढ़ भक्ति का द्योतक है । जब पंचम और नवम भाव में सकारत्मक सम्बन्ध बनता है बनता है तो जातक भक्ति और अनुष्ठान दोनों के साथ रहने से उच्च कोटि का साधक बनता है ।

दशम स्थान कर्मस्थान होता है और सन्यास योग भी इंगित करता है, यदि पंचमेश और नवमेश का नवम भाव या नवमेश से सम्बन्ध हो तो साधना में उत्कृष्टता आती है ।

पंचम में पुरुष ग्रह उपस्थित हो या पुरुष ग्रह की दृष्टि पड़ती हो तो जातक पुरुष देवता की उपासना करता है । पंचम समराशि हो और उसमें चण्द्रमा या शुक्र बैठे हो या इन दोनों में से किसी की दृष्टि पड़ती हो तो जातक किसी स्त्री शक्ति की उपासना करने वाला होता है ।

 यदि सूर्य पंचम स्थान पर हो दृष्टि हो तो जातक सूर्य का उपासक होता है । यदि चण्द्रमा व सूर्य पंचम भाव में बैठे हों या पंचम भाव पर दृष्टि डालते हों तो जातक अर्द्ध -नारीश्वर स्वरुप की साधना करने वाला होता है ।

 यदि पंचम भाव पर मंगल स्थित हो या दृष्टि हो तो जातक कर्तिकेय, गणेश दुर्गा हनुमान , बुद्ध पंचम भव में स्थित हो या दृष्टि डाले तो श्री विष्णु,दुर्गा,गणेश, पंचम भाव में बृहस्पति स्थित हो या दृष्टि डाले तो जातक भगवान शंकर और विष्णु  की उपासना करने वाला होता है । यदि शनि या राहु और केतु का समबन्ध पंचम भाव या पंचमेश से हो तो जातक तांत्रिक क्रिया करने वाला या उग्र  तामसिक पूजा , भैरव शिव काली तारा या निर्गुणवादी, शक्तियों को मानने वाला होता है

शनि का समबन्ध यदि पंचम भाव या विशेष कर नवम भाव से हो तो जातक कठोर तपस्या करने वाल होता है ऐसा जातक धर्मिक आडम्बर और जातिगत भेदभाव को न मानने वाला और स्पर्शदोषादि को ना मानने वाला होता है । जातक प्रायः रीती-रिवाजों का विरोधी और दर्शन को अपनी तार्किकता पर घिसने वाला होता है ।

जन्म कुंडली द्वारा लग्न पंचम, नवम स्थान में जिन ग्रहों का प्रभाव हो उन ग्रहों के बल अनुसार साधक को उन देवताओं की साधना करना चाहिए-

1. सूर्य- गणेश,विष्णु, शिव, दुर्गा,सूर्य, दत्तात्रय, हनुमान, ज्वालादेवी, नरसिंघ, ज्वालामालिनी, गायत्री,आदित्य, अय्यप्पा  स्वर्णाकर्षणभैरव की उपासना करें।

सूर्य-चंद्र  शिव-गौरी ,राम-कृष्ण-हरी, नारायण, सौम्य स्वरुप देवी पारवती गायत्री, सरस्वती, भुवनेश्वरी,हयग्रीव, पितृ उपासना  कात्यायनी

2. सूर्य शनि, सूर्य राहु-

हनुमान, दत्तात्रय, श्रीनाथ जी, शिवहरी,राम,पितृ, महाकाली, तारा, शरभराज, नीलकंठ, यम, उग्रभैरव, वराह कालभैरव, श्मशान भैरव की पूजा करें।

3. सूर्य बुध, सूर्य मंगल-

विष्णु,गणपति,दुर्गा, कार्तिकेय, हनुमान, नारायण, मातंगी, भुवनेश्वरी  गायत्री, सरस्वती, दुर्गा उपासना।

4. सूर्य शुक्र- नर्सिंगी, गणपती, वासुदेव, मातडंगी, तारा, कुबेर, भैरवी, श्रीविद्या की उपासना करें।

5. सूर्य केतु- हयग्रीव, गणपति, छिन्नमस्ता,पितृ, आशुतोष शिव,भैरव अघोर शिव।

6. सूर्य शनि राहु- पशुपतास्त्र तंत्र, मंत्र मरणादि षट्कर्म से व्यक्ति अधिकतर पीड़ित होगा। रक्षा के लिए काली, तारा, प्रत्यंगिरा, जातवेद दुर्गा की उपासना करें।

7. सूर्य, गुरु, राहु- बगलामुखी, बगलाचामुंडा, उचिष्ट गणपति, वीरभद्र। केवल बगलामुखी उपासना से सिद्धि मिले, परंतु या तो सिद्धि दूसरों के लिए नष्ट होगी या देवी नाराज होकर वापस ले लेंगी।

8. चन्द्रमा- लक्ष्मी, श्रीविद्या षोडशी, यक्षिणी, वशीकरणादि प्रयोग शिव, कामेश्वर उपासना शुभ रहे।

9. चन्द्र, मंगल- देवी महालक्ष्मी उच्छिष्ट चांडालिनी, मातंगी, शबरी, नरसिंह, वनदुर्गा, भैरवी उपासना शुभ रहे।

10. चन्द्र-बुध- श्री राधा, नवदुर्गा, देवी चंद्रघंटा, बगला, कर्णपिशाची, उच्छिष्ट चांडालिनी नरसिंह, सरस्वती, वैष्णवी, वाराही, हयग्रीव, दुर्गा, विष्णु उपासना शुभ रहे।

11. चन्द्र, गुरु- बगलामुखी, भुवनेश्वरी, लक्ष्मी पितृ, कुबेर, ब्राह्म, शिव, कृष्ण, नारायण, राम, दत्तात्रेय, अजपाजप, सोह साधना करें।

12. चन्द्र, शुक्र- शिव-गौरी, शारदा, कृष्ण, गंगा  महालक्ष्मी, महासरस्वती, पद्मावती, चंद्रघंटा, कमला, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, शाकंभरी, यक्षिणी, वामन, दत्तात्रेतांत्रिक उपासनाएं।

13. चन्द्र शनि-  श्रीनाथजी, श्री कृष्ण, वेंकटेश्वर, यमुना, महाकाली, दुर्गा,तंत्र- मंत्र सिद्धि, यक्षिणी, पिशाची, भैरव, काली, तारा, उपासना करें।

14. चन्द्र राहु- भैरवी, काली, छिन्नमस्ता, धूमावती, वाराही, उग्रचंडा, गणेश, विघ्नेश, हयग्रीव, शिव मृत्युञ्जय उपासना करें

15. चन्द्र, केतु- हनुमान, स्वामी कार्तिकेय, छिन्नमस्ता, भैरव, उच्छिष्ट गणेश, वासुदेव, विष्णु, गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ करें।

16. मंगल- हनुमान, भैरव, वीरभद्र, स्वामी कार्तिकेय, दुर्गा उपासना करें।

17. मंगल, बुध- बगलामुखी, भैरवी, नारसिंही, ब्राह्मी आदि अष्टमातृका, दुर्गा,

 सरस्वती, कृष्ण, गणपति, उपासना श्रेष्ठ रहे।

18. मंगल, गुरु- हनुमान, गायत्री, विष्णु, शिव, पितृ, यक्ष, कुबेर भिन्नपाद नेत्रों की उपासना शुभ रहे। संतान चिंता हेतु षष्ठी देवी का पाठ करें।

19. मंगल, शुक्र- वामन, लक्ष्मी, कामेश्वरी, ललिता, भुवनेश्वरी, कामाख्या, दुर्गा, अष्टभैरव, कृष्ण उपासना शुभ रहे।

20. मंगल, शनि- काली, तारा, श्मशान साधना, शरभ, भैरव, मंगल चंडिका, उग्रदेवता की उपासना करें।

21. मंगल, राहु- निम्न श्रेणी की उपासना, भैरव, छिन्नमस्ता, धूमावती, नीलतारा की उपासना करें।

22. मंगल, केतु- वाराही, दुर्गा, शिव, विष्णु, गणेश, हनुमान व भैरव की उपासना शुभ रहे।

23. बुध- गणेश, दुर्गा, विष्णु, सरस्वती, गंधर्व उपासना शुभ रहे।

24. बुध, गुरु- बगलामुखी, सरस्वती, गायत्री, विष्णु उपासना शुभ रहे।

25. बुध, शुक्र- कामाख्या, कामेश्वरी, लक्ष्मी, भैरवी, मातंगी, भुवनेश्वरी, कृष्ण उपासना शुभ रहे।

26. बुध, शनि- राम, शिव, हनुमान, उच्छिष्ट गणपति, यक्षिणी सिद्धि उपासना करें।

27. बुध, राहु- पिशाची विद्या, गारूड़ी विद्या, धूमावती विघ्नेश गणपति व आशुतोष शिव की उपासना करें।

28. बुध, केतु- मृत्युञ्जय शिव, गणेश, कार्तिकेय, हनुमान, भैरव, दुर्गा उपासना करें।

29. गुरु- विष्णु, शिव याज्ञिक कर्म बगलामुखी उपासना करें। यदि कुंडली में 6, 8,12वें स्थान में हो तो बगलामुखी उपासना में विलंब से लाभ होए, गुरु राहु, गुरु शनि योग से भी विलंब से लाभ होए, सिद्धि प्राप्त होए किंतु पुनः क्षय हो जाए। गायत्री उपासना अवश्य करें।

30. गुरु- शुक्र, गुरु शनि, गुरु मंगल, गुरु राहु, गुरु केतु योग से साधना में विलंब आते हैं या सिद्धि विलंब से होती है जिससे साधना में श्रद्धा-अश्रद्धा पैदा हो जाती है अतः गुरु का उपयोग करें।

31. शुक्र- लक्ष्मी, तंत्र-मंत्र मार्ग का ज्ञाता होए। शिव, मृत्युञ्जय श्री विद्या, त्रिपुर सुंदरी, दुर्गा उपासना, हेरंब, गणपति, मातंगी, शाकंभरी, शबरी उपासना शुभ रहे। शुक्र-शनि, शुक्र-राहु, शुक्र-केतु, योग से क्षुद्र सिद्धि की ओर साधक का मन दौड़ता है।

32. शनि- शनि उपासना से पूर्व पापों का क्षय होता है। दुर्गा, काली, तारा, आसुरी दुर्गा व भैरवादि की उपासना करता है।

33. शनि- राहु, शनि, केतु आदि के कारण भी मानसिक यातनाएं प्राप्त होती हैं अतः शत्रुओं को दंड देने हेतु उग्र साधनाएं करता है।

34. कभी-कभी धूमावती की उपासना से भी ऐसे पापों व विघ्नों का निवारण होता है, परंतु धूमावती उपासना आसान नहीं है। सोच-समझकर ही करें, क्योंकि धूमावती विघ्नों की अधिष्ठात्री हैं, अमंगलयुक्ता हैं, अतः आह्वान घर में न करें।

व्रत के वैज्ञानिक लाभ

किसी उद्देश्य प्राप्ति के लिए दिनभर में भोजन का सेवन न करना व्रत कहलाता है। हिंदू धर्म में व्रत रखने को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। कहा जाता है कि लोग अपनी आस्था के अनुसार अगल-अलग देवी-देवताओं के लिए व्रत रखते हैं। ज्योतिषियों का कहना है कि व्रत रखने से देवी-देवता खुश होते हैं। व्रत को खास मौके पर रखा जाता है। कई बार साप्ताहिक व्रत रखा जाता है तो कई बार किस खास मौके पर व्रत रखा जाता है।व्रत धर्म के मार्ग पर चलने का एक साधन है। यह अपवित्रता का नाश करता है। यह तन-मन व आत्मा की शुद्धीकरण करता है। यही नहीं, यह पुण्य के उदय का आरंभ है। यह मनोकामना की पूर्ति का मार्ग है। और तो और, सफल व्रत परम पुरुषार्थ की सिद्धी होता है। यह शरीर के शोधन की वैज्ञानिक पद्धति है। कहा गया है- लघनम् सर्वोत्तम् औषधं, अर्थात् व्रत ही सर्वश्रेष्ठ औषधि है।

तन का शुद्धीकरण

व्रत रखने से रक्त शुद्ध होता है। इससे आतों की सफाई होती है। पेट को आराम मिलता है। उत्सर्जन तंत्र और पाचन तंत्र, दोनों ही अपनी अशुद्धियों से छुटकारा पाते हैं।

रोगों से मुक्ति

व्रत कई तरह के रोगों से मुक्ति का रास्ता है। इससे सांस लेने की क्रिया ठीक होती है। फेफड़ों की सफाई हो जाती है। उपवास रखना हृदय के लिए बहुत अच्छा माना गया है। यह कैलोस्ट्रोल के स्तर को घटाता है। अर्थराइटिस, अस्थमा, इरिटेवल बॉवेल, आदि बीमारियों में यह कारगर है।

ऊर्जा का स्रोत

व्रत ताजगी का एहसास देता है। आप यह महसूस करने लगते हैं कि आप खुल रहे हैं। आपके विकार दूर हो रहे हैं। शरीर हल्का हो रहा है। यह शरीर में पहले से संचित कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन को इस्तेमाल होने का अवसर देता है। उपवास से आपकी स्मरण-शक्ति बढ़ती है।

सहनशक्ति प्रदान करना

व्रत आपकी सहनशक्ति को बढ़ाता है। आप अपनी इन्द्रियों पर काबू रखना सीख जाते हैं। मन को शांति की प्राप्ति होती है।

बेरुचि घटाने का काम

कई बार कई कारणों से भोजन अरुचिकर लगने लगता है। दरअसल, इसमें स्वाद ग्रहण करने वाली ग्रंथियां काम करना बंद कर देती हैं। ऐसे में, उपवास मुंह, जीभ और स्वाद ग्रहण करने वाली ग्रंथियों को आराम देता है। और फिर से ये ग्रंथियां जागृत हो उठती हैं। भोजन प्रिय लगने लगते हैं।व्र

त रखने के धार्मिक महत्व होने के अलावा कई वैज्ञानिक महत्व भी हैं। आयुर्वेद में बताया गया है कि व्रत रखने से पाचन क्रिया को आराम मिलता है। अगर हम एक दिन कुछ नहीं खाते हैं तो हमारा पाचन तन्त्र ठीक रहता है। इससे शरीर के हानिकारक तत्व बाहर निकलते हैं। जिस दिन व्रत रखा जाता है उस दिन फैट बर्निंग प्रोसेस तेज हो जाता है, जिसेस शरीर की चर्बी तेजी से गलना शुरू हो जाती है। जिस दिन व्रत रखा जाता है उस दिन मेटाबॉलिक रेट में तीन से 14 फीसदी तक बढ़ोत्तरी होती है। साथ ही व्रत रखने दिमाग भी स्वास्थ्य रहता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया के जानकारों के अनुसार कैंसर के मरीजों के लिए व्रत रखना बहुत फायदेमंद होता है। जो मरीज कीमोथेरेपी ले रहे हैं उन लोगों के लिए व्रत रखना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। कहा जाता है कि व्रत रखने से नई प्रतिरोधक कोशिकाएं बनती हैं।

अगर हर सप्ताह उपवास रखा जाता है तो शरीर में कोलेस्ट्राल की मात्रा घटती है, जो धमनियों के लिए बहुत लाभदायक होता है।

व्रत रखने से डिप्रेशन जैसे परेशानियों से निजात मिलती है। इससे तनाव दूर होता है। जिस दिन व्रत रखा जाता है उस दिन शरीर में ऊर्जा कम हो जाती है। शरीर की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए लगातार पानी पीते रहने की जरूरत होती है।

डॉयबिटीज के रोगियों के लिए व्रत रखना बहुत फायदेमंद माना जाता है। इससे हमारे शरीर को कार्बोहाइड्रेट्स को प्राप्त करने की क्षमता बढ़ती है।

हमारी पौराणिक कथाओं में प्रत्येक उपवास का कोई न कोई वैज्ञानिक आधार भी बताया गया है। उन्हें कर्मकांडों से इसलिए जोड़ा गया, ताकि जनसाधारण उपवास का वैज्ञानिक आधार समझे बिना भी उनकी जरूरत समझ सकें।

उपवास और भूख हड़ताल को लेकर लोग अक्सर भ्रमित रहते हैं। भूख हड़ताल में कुछ भी खाया-पीया नहीं जाता है, जबकि उपवास का अर्थ पांच ज्ञानेंद्रियों और पांच कर्मेंद्रियों पर नियंत्रण से है। व्रत या उपवास में खाने-पीने पर रोक नहीं है, लेकिन वह अनुशासित होना चाहिए। वैदिक या आध्यात्मिक व्रत की चर्चा यजुर्वेद के कर्मकांड में भी की गई है।

भगवद्गीता के अनुसार हमारा व्यवहार, विचार, भोजन और जीवनशैली तीन चीजों पर आधारित होती है- सत्व, तमस और राजस। सात्विक विचारों वाला व्यक्ति निश्चिंत स्वभाव का होता है और सृजनशील भी। राजसी विचारों वाला व्यक्ति महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ लालची भी होता है। वहीं तामसी प्रवृत्ति का व्यक्ति न सिर्फ नकारात्मक सोच रखता है, बल्कि वह गलत कार्यों में भी संलग्न रहता है।

योगी या ऋषि बनने का मार्ग सात्विक विचारों से खुलता है। हम सभी सत्व, रजस और तमस के बीच झूलते रहते हैं। हमारा झुकाव राजसी और तामसी प्रवृत्तियों की ओर न होने पाए, इसके लिए जरूरी है कि हम खुद को संतुलित करना सीखें। इसका एक प्रभावी तरीका है वैदिक उपवास।

वैदिक उपवास कुछ और नहीं, बल्कि 24 घंटे तक शरीर और मस्तिष्क को सत्व की स्थिति में रखने की एक कोशिश है। यह कार्य समर्पण और अनुशासन के बिना हो पाना असंभव है। यह भी जरूरी है कि उपवास जबर्दस्ती नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेरणा के तहत रखा जाए। साथ ही, उपवास के दौरान राजसी-तामसी वस्तुओं के इस्तेमाल से पूरा परहेज बरता जाए।

अब सवाल है कि वह कौन सा सात्विक भोजन है, जो उपवास में ग्रहण किया जा सकता है। इसका जवाब है- दूध, घी, फल और मेवे। इनका भोजन उपवास में इसलिए मान्य है, क्योंकि ये भगवान को अर्पित की जाने वाली वस्तुएं हैं। वैसे भी प्रकृति प्रदत्त यह भोजन शरीर में सात्विकता बढ़ाता है। भगवद्गीता के अनुसार मांस, अंडे, खट्टे और तले हुए, नमकीन व ठंडे पदार्थ राजसी-तामसी प्रवृतियों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए वैदिक उपवास के दौरान इनका सेवन नहीं किया जाना चाहिए।

उपवास के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठानों का भी व्यापक अभिप्राय है। असल में इस तरह के अनुष्ठानों से शरीर में पैदा होने वाले विषैले पदार्थों के प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है। शारीरिक शुद्धि के लिए तुलसी जल, अदरक का पानी या फिर अंगूर इस दौरान ग्रहण किया जा सकता है। जबकि मानसिक शुद्दिकरण के लिए जाप, ध्यान, सत्संग, दान और धार्मिक सभाओं में भाग लेना चाहिए।

उपवास के दौरान हिंसा और सेक्स से भरपूर दृश्यों और बातों से भी बचना चाहिए। इस प्रकार कह सकते हैं कि वैदिक उपवास शारीरिक, मानसिक और अंतःकरण के संपूर्ण शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। यह धारणा गलत है कि उपवास सिर्फ महिलाओं को ही करना चाहिए। उपवास का लाभ किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष उठा सकते हैं।

उपवास से धार्मिक अनुष्ठानों को इसलिए जोड़ा गया, ताकि स्वास्थ्य के पहलू पर ध्यान दिया जा सके। जैसे संतोषी मां का व्रत। शुक्रवार के दिन शादीशुदा महिलाएं यह व्रत रखती हैं और गुड़-चने का प्रसाद लेती हैं। गुड़ शरीर में आयरन (लोहा) की पूर्ति करता है, तो चने से प्रोटीन मिलता है।

उपवास की प्रक्रिया सिर्फ कम खाने या सात्विक भोजन से ही पूर्ण नहीं हो जाती। इस दौरान सुबह-शाम ध्यान करना भी जरूरी है। इससे दिमाग शांत होता है और मन में सद्विचारों का प्रवाह होता है। उपवास की अवधि में न तो किसी का अहित सोचना चाहिए और न ही किसी से गलत व्यवहार करना चाहिए। रमजान के दौरान उपवास रखने वाले मुसलमान लड़ाई-झगड़े या अपशब्द कहने आदि से भी परहेज करते हैं।

ज्योतिषीय उपचार में इष्टसाधना चयन एवं  मासिक उपासना  मासिक श्रेष्ठ व्रत आपको सभी कस्टो से मुक्ति दिलाएंगे:साथ में गृह जो प्रभावित होते है

गणपति:

(सूर्य,चंद्र ,केतु, मंगल, बुद्ध, गुरु,शुक्र,राहु)

मासिक कृष्ण और शुक्ल चतुर्थी को संकष्टी गणेश एवं विनायकी गणपति   क्रमशः

सूर्य एवं कार्तिकेय :

(सूर्य, मंगल, बुद्ध,गुरु)

मासिक कृष्ण और शुक्ल षष्ठी￰￰ को

सूर्य एवं स्कंध क्रमशः,

दुर्गा भैरव :

(सूर्य,चंद्र,शुक्र,मंगल,बुध,शनि,राहु केतु)

मासिक कृष्ण और शुक्ल अष्ट्मी

भैरव और दुर्गा क्रमशः,

श्री हरिविष्णु

(बुद्ध,गुरु,शुक्र,शनि,राहु,केतु एवं नवग्रहपीड़ा मुक्ति , पापहरण, पापशमन)

मासिक कृष्ण और शुक्लएकादशी

शिव-गौरी

(सूर्य,चंद्र,बुद्ध,शुक्र,)

मासिक कृष्ण और शुक्ल त्रयोदशी प्रदोष काल को शिवजी, मासिक कृष्ण शुक्ल चतुर्दशी शिवरात्रि,

सत्य नारायण एवं पितरेश्वर

चंद्र ,गुरु,शुक्र, बुद्ध, शनि,राहु, केतु

मासिक पूर्णिमा एवं अमावस्या क्रमशः

सूर्य आदि सात ग्रहों के नाम पर सप्ताह के सात दिन तय किए गए हैं। हर वार का अधिपति कोई एक ग्रह है, लेकिन ग्रह देवों को भी अन्य प्रधान देवों के साथ जोड़ा गया है। इस सबके पीछे विज्ञान, ग्रहों की चाल, ऋतुचर्या, दिनचर्या और स्वस्थ सुखी रहने के तौर-तरीके बड़ी कुशलता के साथ पिरोए गए हैं। बता रहे हैं डॉ. सुरेश चंद्र मिश्र

वारों का क्रम किस प्रकार तय है यह समझने के लिए हमें आसमान में ग्रहों की कक्षाओं के क्रम को समझना होगा। ये इस प्रकार हैं-  1. शनि 2. गुरु 3. मंगल 4. रवि 5. शुक्र  6. बुध 7. चंद्रमा। इनमें हर चौथा ग्रह अगले वार का मालिक होता है जैसे, रविवार के बाद उससे चौथे चन्द्रमा का, फिर चन्द्र से चौथे मंगल का क्रमश: वार आता-जाता है।

वारों के अधिदेवता

ग्रहों को मूल रूप से विष्णु या महादेव के अंश से उत्पन्न समझा जाता है। सूर्य की पूजा, नमस्कार, अर्घ्य देना तो खास तौर पर विष्णु और शिव ही क्यों, सब तरह की पूजा में अनिवार्य कहा गया है। वारपति ग्रह और अवतारों का संबंध इस तरह से है-

1. सूर्य- रामावतार, 2. चन्द्र- श्रीकृष्णावतार, 3. मंगल- नृसिंह अवतार, 4. बुध- बुद्ध अवतार, 5. गुरु-वामन अवतार, 6. शुक्र- परशुराम अवतार, 7. शनि- कर्म अवतार।

इससे हम आसानी से समझ सकते हैं कि सब ग्रह आदि देव विष्णु या शिव जो भी नाम दें, उसी से निकले हैं।

रविवार का वारपति सूर्य स्वयं जीवन का आधार होने से विष्णु रूप कहा गया है। अत: आरोग्यं भास्करादिच्छेत्के नियम से रोग के प्रकोप को कम करने, स्वस्थ रहने, दवा का अनुकूल प्रभाव पैदा करने और आयु की रक्षा तथा आत्मबल, तन व मन की ताकत को देने वाला सूर्य है। जन्म का कारण होने से सविता, प्रसविता, प्रसव कराने वाला परिवार वृद्धि का देवता है। जो लोग प्रजनन अंगों के विकार के कारण, अज्ञात कमी की वजह से औलाद का सुख नहीं देख पाते हैं, उनके लिए सूर्य की उपासना बहुत मुफीद होती है। सूर्य के लिए गायत्री मंत्र, केवल ओम् नाम या ओम् घृणि: सूर्य आदित्य:का जप करना, जल चढ़ाना, माता पिता या उनके जैसे जनों को ठेस न पंहुचाना अच्छा है।

सूर्य को प्रसन्न रखने के कुछ अन्य मार्ग ये हैं-

सुबह मुंह को गीला रखकर सूर्य के सामने गायत्री मन्त्र या ओम् नाम का 10 या 28 बार जप करना चाहिए।

घर में धूप और खुली हवा का प्रबंध, धूप सेंकना, बुजुर्गो के मन को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए।

घर में गंगाजल या किसी कुदरती सोते का जल सहेजना चाहिए।

संक्रान्ति, अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी के दिन और दोनों वक्त मिलने के समय कलह, बहस, देर तक सोना और संभोग से बचें। इनसे सारे ग्रहों की अनुकूलता बनती है।

सोमवार का पति चंद्रमा मन, विचार, भावुकता, चंचलता, आवेग और आवेश का प्रतीक है। चंद्र की अनुकूलता से मन पर नियंत्रण, निर्णय करने की सही दिशा और दिल के बजाए दिमाग से अधिक काम लेने की आदत बनती है। सोम जल का ग्रह होने से शिव को खास प्रिय है। इस दिन शिवजी की पूजा, आराधना करना उपयुक्त है। ध्यान रखें शिव की पूजा सदा माता पार्वती के साथ ही साम्बसदाशिव के रूप में ही सांसारिक सुखों के लिए अधिक फलदायी है।

चंद्र को प्रसन्न रखने के कुछ  तरीके ये हैं-

दूध, खीर, सेवई, मिठाई, पनीर, दान करना चाहिए और तारों की छांव या चांदनी में कुछ देर बैठना चाहिए।

बड़, पीपल, गूलर की गोलियां, फल या जड़ घर में रखें। अपनी कुल प्रतिष्ठा, सम्पदा को संभालें। पानी का सेवन करना और माता-पिता से अलगाव या दूरी न रखना चन्द्रमा को प्रसन्न रखने का कारगर तरीका है।

दूध में मुल्तानी मिट्टी, चोकर या बेसन मिला कर उबटन करें। किसी के सामने अपनी व्यथा का रोना न रोएं।

मंगलवार का वारपति मंगल, युद्घ और हथियारों का ग्रह हैं। इसके देवता वीर हनुमान, एकदंत गणेश और मलय स्वामी हैं। हनुमान जी की पूजा, प्रसाद चढ़ाना, मंगल का व्रत रखना और इस दिन शाकाहार करना अच्छा है। हनुमान चालीसा का पाठ आसान और कारगर उपाय है। अतिरिक्त शुभता के लिए-

अपने सगे भाई बहनों के लिए अपशब्द न कहें और स्त्रियों से बहस न करें।

मीठी सुहाल, पूए, चीले, पूरनपोली खाएं, खिलाएं और बांटें।

भाभियों से सामान्य व्यवहार रखें और कभी विकलांगों की सहायता करें।

नीम, बबूल का सेवन किसी तरह से करें और पेड़-पौधों की देखभाल करते रहें।

बुधवार का वारपति बुध, बुद्धि, हास-परिहास, अभिनय और कला और वनस्पतियों का ग्रह है। इसके प्रधान देव विष्णु हैं। अत: विष्णु जी के किसी रूप की आराधना करना शुभ है।

ओम् नमो भगवते वासुदेवाय या

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।।

का जप करना श्रेयस्कर है।

कुछ बोनस शुभता पानी हो तो अपनाएं-

मांस मदिरा, मानसिक हिंसा, पक्षियों को पालना, ससुराल से गहरे संबंध रखना आदि बातों से बचें।

वनस्पति, जड़ी-बूटी पाले प्रसाधन इस्तेमाल करना, सोना धारण करना, पौधे रखना, बहन बेटी और उनके परिवार जनों का आदर करना, केसर लगी मिठाई या केसरी हलुवा या मूंग दाल के पदार्थ खाना खिलाना शुभ है।

दादी को कोई भेंट देने, सांड को गुड़ रोटी खिलाने, केले और बताशे बांटने से बुध प्रसन्न रहता है।

स्नान जल में चावल डालना, पीपल में जल देना, हरी सब्जी शिवजी को भेंट करना, कभी पत्ते के दोने में कुछ खाना, कभी दान करना मंगलकारक है।

गुरुवार का देवता संसार का सृजनहार ब्रह्मा है। अत: विवाह, संतान सुख, परिवार सुख, ज्ञान, वाणी और हुनर के साथ बड़प्पन अधिकार का स्वामी बृहस्पति है। इसके लिए सिर्फ ओम् नाम का जप करना काफी फायदेमंद है।

अधिक शुभता के लिए-

किसी के साथ कपड़े शेयर न करें। चरित्र, जुबान और आचरण को मजबूत रखें।

हल्दी वाली रोटी, चने की दाल, पीला वस्त्र, घी, बूरे का सेवन वितरण करें।

कन्याओं का आदर करें।

शुक्रवार देवी के आधीन है। अत: दुर्गा पूजा, दीपक जलाना, खेतड़ी बोकर रखना, कन्यापूजन, करना और जालसाजी, झूठी गवाही से बचना अच्छा है। दुर्गाचालीसा आदि पढ़ना, खुशबू का प्रयोग, धूपबत्ती जलाना, साफ-सुथरा और आकर्षक बनने की कोशिश करना शुभ है।

शनिवार के अधिपति भैरव, हनुमान, महाकाली, नृसिंह हैं। भावनानुसार इनमें से किसी की पूजा आराधना करना अच्छे परिणाम देगा। बस्ती के बाहर किसी शिवमंदिर में पूजा करना भी लाभदायक है। अधिक शुभता के लिए-

मजदूरों, मेहनतकशों का दिल न दुखाना, जीवन में अनुशासन रखना, साफ-सुथरा रहना, रोज नहाना और हाथ-पैर, दाढ़ी, नाखूनों को साफ सलीकेदार रखना, तेल मालिश, शनि को खुश रखने की रामबाण दवा है।

वार के हिसाब से व्रतोपासना

सूर्य राम नारायण भैरव :  रविवार

चंद्र सरस्वती, शिव-पारवती : सोमवार

मंगल, गणेश दुर्गा,कार्तिकेय,हनुमान:मंगलवार

बुद्ध, देवी, दुर्गा, विष्णु, गणेश,पितृ :  बुद्धवार

गुरु,नारायणहरी विष्णु,इंद्र,कृष्ण:  गुरुवार 

शुक्र,दुर्गा,लक्ष्मी,कमला,पद्मावती:शुक्रवार

शनि,हनुमान,भैरव,पितृ,काली, :  शनिवार

इसके अलावा और भी गहरायी  में ग्रह ग्रहों के देवी-देवता

1 सूर्य विष्णु

2 चन्द्रमा शिवजी

3 मंगल-

दो प्रकार के देवता मंगल नेक - हनुमान जी

मंगल बद - भूत प्रेत पिशाच

4 बुध दुर्गा

5 गुरु ब्रह्मा जी

6 शुक्र लक्ष्मी

7 7=शनि शिवजी शासमशानी भैरो के रूप में

8 8=राहू के देवता सर्प होते है

9 9=केतु गणेश जी और वाहन भी

10 सूर्य और चन्द्र पार्वती

11 सूर्य और मंगल भगवान राम

12 सूर्य और बुध इंद्र को माना जाता है

13 सूर्य और गुरु विश्वामित्र

14 सूर्य और शुक्र विष्णु लक्ष्मी

15 सूर्य और शनि गायत्री को माना जाता है

16 सूर्य और राहू राजा बलि

17 सूर्य और केतु अश्विनी कुमार

18 चन्द्र मंगल दक्षिण मुखी शिवजी -माता भद्रकाली

19 चन्द्र और बुध सरस्वती को माना जाता है

20 चन्द्र और गुरु पवन देवता

21 चन्द्र और शुक्र गाय

22 चन्द्र और शनि अर्धनारीश्वर को माना जाता है

23 चन्द्र और राहू स्थान देवता

24 चन्द्र और केतु पार्वती सहित गणेश जी

25 मंगल और बुध गरुण पर सवार विष्णु

26 मंगल और गुरु माता तारा

27 मंगल और शुक्र गरुण पर सवार गायत्री

28 मंगल और शनि ज्वालामुखी देवी

29 मंगल और राहू प्रेतात्मक शक्तियों

30 मंगल केतु काली और शाकिनी आदि

31 बुध और गुरु वैदिक पूजा को माना जाता है

32 बुध और शुक्र कुलदेवी की पूजा

33 बुध और शनि कार्तिकेय

34 बुध और राहू सरस्वती

35 बुध और केतु कार्तिकेय को पूजा जाता है.

36 गुरु और शुक्र इन्द्रानी की पूजा की जाती है

37 गुरु और शनि अमरनाथ को पूजा जाता है

38 गुरु और राहू केदार नाथ

39 गुरु केतु बद्रीनाथ को पूजा जाता है.

40 शुक्र और शनि भोमिया जी की पूजा

41 शुक्र और राहू गज लक्ष्मी

42 शुक्र और केतु, गणेश जी के साथ लक्ष्मी

43 शनि राहू भैरो

44 शनि केतु रूद्र की पूजा

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