आयु-मृत्यु संबंधी प्रमुख फलित सूत्र
आयु-मृत्यु संबंधी प्रमुख फलित सूत्र
कुंडली में आयु निर्णय का सामान्य सिद्धांत
अल्पायु तथा दीर्घायु योगों के विषय में ग्रहों से सम्बन्धित फलित में
पहले काफी कुछ कहा जा चुका है। किन्तु यहां स्थूल रूप से आयु विचार के लिए यह सरल
सूत्र पाठकगण स्मरण करें -
पूर्णायु-लग्नेश तथा अष्टमेश चर राशि में हों। अथवा एक (लग्नेश) चर
राशि में हो दूसरा स्थिर या द्विस्वभाव में हो तो जातक पूर्णायु होता है (प्रथम
स्थिति में 90-100
वर्ष, दूसरी
स्थिति में 66-90
वर्ष आयु समझें)।
अल्पायु-लग्नेश तथा अष्टमेश स्थिर राशि में हों। अथवा एक (लग्नेश)
स्थिर राशि में तथा दूसरा चर या द्विस्वभाव राशि में हो तो जातक अल्पायु होता है
(प्रथम स्थिति में आयु 20 वर्ष तक तथा दूसरी स्थिति में 33 वर्ष तक मानें)।
मध्यायु-लग्नेश व अष्टमेश द्विस्वभाव राशि में हो। अथवा एक (लग्नेश)
द्विस्वभाव राशि में तथा दूसरा चर या स्थिर राशि में हो तो जातक मध्यायु होता है
(प्रथम स्थिति में आयु 66 वर्ष तक तथा दूसरी स्थिति में 50 वर्ष के आस-पास तक की आयु समझनी चाहिए)।
निष्कर्ष-पूर्ण पूर्णायु के लिए लग्नेश व अष्टमेश का चर राशि में होना
अनिवार्य है तथा पूर्ण अल्पायु के लिए लग्नेश व अष्टमेश का स्थिर राशियों में होना
अनिवार्य है (अष्टम भाव की तथा वहां बैठे ग्रहों की स्थिति भी विचारें)।
यहां हम जातक की आयु एवं मृत्यु के
सम्बन्ध में बताने वाले कुछ प्रमुख सूत्रों की चर्चा करेंगे। (पीछे भावेशों के
विभिन्न भावों में तथा विभिन्न ग्रहों से युतियों के बारे में प्रमुख सूत्र हमने
बताए हैं और उनका कन्सन्ट्रेशन रोगों पर विशेष रूप से रखा है। यहां मृत्यु के
सम्बन्ध में आयु निर्णय के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख फलित सूत्र दे रहे हैं) -
ऽ लग्नेश
व अष्टमेश का म्ग्ब्भ्।छळम् हो, दोनों पर पापग्रहों का प्रभाव हो तथा चन्द्र, सूर्य व शनि छठे भाव में हों तो जातक का अतिशीघ्र मरण होता है।
ऽ वृश्चिक
लग्न में सूर्य लग्नस्थ हो, गुरु विभाजित हो, अष्टमेश केन्द्र में हो और चन्द्र व राहू 7 या 8 भाव
में हो तो जातक अल्पायु होता है।
ऽ अष्टमेश
मंगल के साथ लग्नस्थ हो अथवा अष्टमेश स्थिर राशि के साथ लग्न/आठवें/बारहवें भाव
में हो तो जातक की मृत्यु युवावस्था में ही हो जाती है।
ऽ बुध
या गुरु लग्नेश हो, लग्न
में शनि हो तथा द्वादशेश तथा अष्टमेश निर्बल हो तो जातक अल्पायु होता है (बुध या
गुरु लग्नेश का अर्थ है लग्न-मिथुन, कन्या, धनु
या मीन का हो तो)।
ऽ अष्टमेश
नीच राशि में हो, पापग्रह
अष्टमस्थ हो, लग्नेश
निर्बल हो तो भी अल्पायु योग बनता है।
ऽ अष्टमेश
अष्टम भाव तथा लग्नेश तीनों ही पापाक्रांत हों तथा बारहवां भाव भी पापग्रह से
युक्त हो तो जातक की मृत्यु जन्म के उपरांत ही हो जाती है।
ऽ अष्टमेश
अष्टम भाव में/स्वग्रही हो, चन्द्रमा पापग्रह से युत और शुभ दृष्टि से हीन हो तो जातक की आयु एक
महीना ही होती है।
ऽ राहू
या केतु के साथ सूर्य सातवें, शुक्र आठवें व पापग्रह लग्न में हो तो जातक की मृत्यु जेल में होती
है।
ऽ सिंह
राशि का शनि पंचमस्थ हो, मंगल अष्टमस्थ हो और चन्द्रमा नवमस्थ हो तो जातक की मृत्यु बिजली के
झटके से या मकान के मलबे के नीचे दबकर अथवा पेड़ से गिरकर/ऊंचाई से गिरकर होती है।
ऽ सूर्य
व चन्द्र कन्या राशि में अष्टमस्थ हों तो जातक की मृत्यु विष के कारण होती है।
ऽ सूर्य
व मंगल चतुर्थस्थ, शनि
दशमस्थ तथा अष्टम भाव पापाक्रांत हो तो जातक की मौत फांसी से होती है।
ऽ राहू
दृष्ट चन्द्र व मंगल अष्टमस्थ हों तो बाल्यावस्था में ही जातक को माता सहित मर
जाना पड़ता है।
ऽ अष्टमस्थ
शनि यदि क्षीण चन्द्र व उच्च के मंगल से दृष्ट हो तो भगंदर, पथरी या कैंसर जैसे रोग तथा ऑपरेशन के
कारण जातक की मृत्यु होती है।
ऽ शनि
व चन्द्र छठे या आठवें भाव में पाप मध्य हों/पाप दृष्ट हों तथा अष्टमेश स्वग्रही
होकर पापमध्य या पाप दृष्ट हो तो जातक की मृत्यु समूह में होती है।
ऽ लग्नेश
व अष्टमेश पापग्रह से युत या दृष्ट होकर छठे भाव में हों तो जातक की मौत लड़ाई-झगड़े
में होती है।
ऽ मंगल
व शनि छठे भाव में हों और लग्नेश सूर्य व राहू से दृष्ट होकर आठवें भाव में हो तो
क्षय रोग से मृत्यु होती है।
ऽ मंगल
व चन्द्र छठे या आठवें भाव में हो तो जातक शस्त्र, रोग, अग्नि, करंट या गोली से मरता है
ऽ शनि
व चन्द्रमा छठे या आठवें भाव में हों तो जातक वायुविकार या पत्थर की चोट से मरता
है।
ऽ सिंह
लग्न में निर्बल चन्द्र अष्टमस्थ हो तथा शनि की युति हो तो प्रेतबाधा, शत्रुकृत अभिचार से पीड़ा तथा अकाल
मृत्यु का परिणाम जातक भोगता है।
ऽ सिंह
लग्न हो, सूर्य
व शनि का म्ग्ब्भ्।छळम् हो, शुभग्रहों की दृष्टि न हो तो 12 वर्ष की आयु में मृत्यु होती है।
ऽ लग्न
में सिंह राशि का सूर्य हो, पापग्रहों के मध्य हो (बारहवें व दूसरे भाव में पापग्रह हों) तथा लग्न
में शत्रु ग्रह (राहू, शनि, शुक्र) की युति हो तो जातक
अस्त्र-शस्त्र या विस्फोटक सामग्री से प्रायः 47 वर्ष में मरता है।
ऽ लग्नेश
सूर्य तथा लग्न पापग्रहों के बीच हों सातवें भाव में कुम्भ राशि का शनि हो और
चन्द्र निर्बल हो तो जातक आत्महत्या करता है।
ऽ भाग्य
स्थान में मेष का गुरु तथा अष्टम भाव में मीन का मंगल हो यानी म्ग्ब्भ्।छळम् तो भी
जातक की मृत्यु बारह वर्ष की अवस्था में हो जाती है।
ऽ द्वितीय
व द्वादश भाव पापग्रहों से युत हो, सूर्य लग्नेश होकर निर्बल हो तथा 1, 2 व 12 भाव
शुभ ग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक 32वें वर्ष में मर जाता है।
ऽ दूसरे
भाव में कन्या राशि का राहू हो तथा शुक्र व सूर्य से युति करे, किन्तु शुभ ग्रहों से दृष्ट न हो तो
जातक युवा होकर पिता को मारे, फिर खुद मरे।
ऽ चन्द्रमा
5, 7, 9, 8 तथा
लग्न में पापग्रह से युत हो तो ’बालारिष्ट योग’ बनाता है। जिसमें जातक की मृत्यु
बाल्यकाल में ही हो जाती है (यदि किसी अन्य योग से उसका निराकरण न हो रहा हो तो)।
ऽ लग्नेश
केन्द्र में दो पापग्रहों के साथ हो तथा अष्टम भाव खाली न हो तो हृदय गति रुकने से
मौत होती है।
ऽ कर्क
लग्न में निर्बल चन्द्र अष्टमस्थ होकर शनि से युति करे तो प्रेतबाधा या शत्रुओं से
पीड़ित होकर जातक अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है।
ऽ लग्नेश
चन्द्र व लग्न दोनों पाप प्रभाव/पाप मध्य में हो, सप्तम में भी पापग्रह हों और सूर्य निर्बल हो तो जातक जीवन से निराश
होकर आत्महत्या करता है।
ऽ तुला
का सूर्य चैथे, कुम्भ
का गुरु आठवें, मिथुन
का चन्द्र बारहवें हो तथा चन्द्र पर शुभ दृष्टि न हो तो जातक जन्म लेते ही मर जाता
है।
ऽ द्वितीय
द्वादश भाव में पापग्रह हों (लग्न पापमध्य हो), चन्द्रमा लग्नेश होकर निर्बल हो तथा 1,
2, 12 भावों पर शुभ दृष्टि न हो तो भी 32वें वर्ष में मृत्यु होती है।
ऽ कर्क
लग्न हो तथा दुःस्थानों में चन्द्र, शनि, शुक्र
की युति हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की मृत्यु होती है।
ऽ सूर्य
पांचवें भाव में वृश्चिक राशि का हो तथा दो पाप ग्रहों के मध्य हो और चन्द्र
निर्बल हो तो हार्ट अटैक के कारण जातक की मृत्यु होती है।
ऽ चन्द्र, मंगल, शनि तीनों दुःस्थानों में एकसाथ हों और लग्न मेष हो तो वाहन दुर्घटना
में मृत्यु होती है।
ऽ वृष
लग्न में सूर्य, गुरु, शुक्र की युति एकसाथ दुःस्थानों में
हो तो भी वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है।
ऽ कन्या
लग्न हो, चन्द्र
अष्टमस्थ हो तथा बुध, सूर्य, मंगल आदि किसी भी भाव में इकट्ठे हो
जाएं तो जातक की मृत्यु ब्लडप्रेशर से होती है।
ऽ कन्या
लग्न में बुध, गुरु
व मंगल की युति एकसाथ दुःस्थानों में हो तो वाहन दुर्घटना से जातक मृत्यु होती है।
ऽ धनु
लग्न हो चन्द्र सप्तमस्थ मंगल, राहू के साथ और शुभ ग्रहदृष्टि न हो तो जातक जन्मते ही मर जाता है।
ऽ गुरु
लग्नेश (धनु लग्न) होकर वृश्चिक राशि में हो और मंगल धनु राशि में हो (द्वादशेश व
लग्नेश का म्ग्ब्भ्।छळम् धनु लग्न में हो) तो 12 वर्ष की आयु में जातक की मृत्यु होती है (लाल किताब के अनुसार ग्रह
दोष निवारक सिद्ध यंत्र धारण करने से आयु बढ़ जाती है)।
ऽ वृश्चिक
राशि में चन्द्र, शुक्र
की युति दुःस्थानों में हो और धनु लग्न हो तो जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में
होती है।
ऽ लग्नेश
व चतुर्थेश होकर गुरु मकर राशि में हो तथा निर्बल या अस्त हो तो हार्ट अटैक से
मृत्यु होती है या सूर्य वृश्चिक का दो पाप ग्रहों के मध्य बारहवें भाव में हो तो
भी हार्टअटैक से जातक की मृत्यु होती है।
ऽ मीन
लग्न में अष्टमस्थ शनि के साथ निर्बल चन्द्र हो तो प्रेतबाधा से अकाल मृत्यु होती
है।
ऽ लग्नेश
गुरु व लग्न दोनों पाप ग्रहों के बीच हों, सातवें भाव में कन्या राशि में भी पापग्रह हों और सूर्य निर्बल हो तो
जातक आत्महत्या को विवश होता है।
ऽ सप्तम
भाव में कन्या राशि का चन्द्र यदि मंगल व राहू से युति करता हो और शुभ ग्रह की
दृष्टि न हो तो जातक की मृत्यु एक वर्ष में होती है (लाल किताब के अनुसार अनिष्ट
निवारक सिद्ध मंत्र से लाभ संभावित है)।
ऽ सप्तम
भाव में कन्या राशि का शनि हो तथा बारहवें भाव में मेष राशि का शुक्र व राहू
लग्नेश के साथ हो (कोई शुभ योग या शुभ दृष्टि न हो) तो भी जातक की मृत्यु एक वर्ष
में हो जाती है।
ऽ मीन
लग्न में बुध, गुरु, शुक्र की युति एकसाथ दुःस्थानों में
हो तो जातक की वाहन दुर्घटना से मौत होती है।
ऽ तुला
लग्न में निर्बल चन्द्र आठवें भाव में शनि के साथ हो तो शत्रु के अभिचार या
प्रेतबाधा के कारण जातक की मृत्यु होती है। अथवा शुक्र व लग्न दोनों पापग्रहों के
साथ व शनि सातवें हो तो भी शत्रु के अभिचार या देवशाप से मृत्यु होती है।
ऽ तुला
लग्न में गुरु, शुक्र
व शनि दुःस्थानों में युति करें तो वाहन दुर्घटना में जातक मारा जाता है।
ऽ मकर
लग्न में लग्नेश व लग्न पापग्रहों के मध्य हों, सप्तम भाव में भी पाप ग्रह हों तो जातक जीवन से निराश होकर आत्महत्या
करता है।
ऽ मकर
लग्नस्थ सूर्य, मंगल, गुरु, राहू व चन्द्र एकसाथ हों तो भी शीघ्र मृत्यु होती है।
ऽ चतुर्थेश
मंगल बारहवें हो, सप्तम
भाव में कर्क का शनि हो, सप्तमेश चन्द्र अष्टमस्थ हो तो 14वंश वर्ष में विमान दुर्घटना से मृत्यु सम्भावित होती है।
ऽ मकर
लग्न हो, मंगल, सूर्य व शनि दुःस्थानों में एकसाथ
युति करें तो वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है।
ऽ कुंभ
लग्न में लग्नेश व लग्न दोनों पापग्रहों के बीच हों, सूर्य निर्बल व सप्तम भाव में भी पापग्रह हों तो भी जातक आत्महत्या
करता है।
ऽ कुंभ
लग्न में बुध, शुक्र, शनि की युति दुःस्थानों में एकसाथ हो
तो वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है।
ऽ निर्बल
चन्द्र शनि के साथ मेष राशि में अष्टमस्थ हो तो जातक की अकाल मृत्यु होती है।
ऽ बुध
व लग्न पापग्रहों के बीच तथा सातवें भाव में मीन राशि में पापग्रह और सूर्य निर्बल
हो तो भी जातक आत्महत्या करता है।
ऽ राहू, शनि व बुध बारहवें भाव में सिंह राशि
में हों, गुरु
पंचम भाव में मकर राशि में हो तथा कोई अन्य शुभ योग न हो तो जातक जन्मते ही मर
जाता है।
ऽ सूर्य, मंगल, शनि अष्टम भाव में मेष राशि में हो, शुभ ग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक की एक वर्ष में मृत्यु होती है।
विशेष-उपरोक्त सूत्र ’लाल किताब’ पर आधारित हैं। पाराशरी मत में आयु
निर्णय के लिए लग्न, लग्नेश
तथा अष्टम भाव व अष्टमेश की स्थिति को विचारना चाहिए। सटीक परिणाम के लिए सूर्य
तथा चन्द्र की स्थिति भी विचारी जानी चाहिए।
पाठकों की सुविधा के लिए यहां अष्टमेश व लग्नेश से सम्बन्धित सिद्धांत
विचार को संक्षेप में सरल सूत्रों में कह रहे हैं। इससे जातक की आयु का स्थूल
निर्णय सरलता से हो जाता है।
दीर्घायु-लग्नेश तथा अष्टमेश चर राशि में हों। अथवा दोनों में से एक
चर राशि में और दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो जातक पूर्णायु/दीर्घायु होता है।
क्रमशः 90-100, 66-90
वर्ष आदि।
अल्पायु-लग्नेश व अष्टमेश स्थिर राशि में हों। या दोनों में से एक
स्थिर राशि और एक द्विस्वभाव राशि में हो तो जातक अल्पायु होता है। पहले में 20 वर्ष से कम, दूसरे में 33 वर्ष से कम।
मध्यायु-लग्नेश व अष्टमेश द्विस्वभाव राशि में हों। अथवा एक
द्विस्वभाव राशि में हो, दूसरा चर/स्थिर राशि में हो तो जातक मध्यायु होता है । क्रमशः 66 वर्ष तक, या 50
वर्ष के आसपास।
विशेष-तीनों नियमों में दो-दो स्थितियां हैं, अतः क्रमशः दो-दो आयु मान दिए गए हैं। तीसरे नियम की दूसरी स्थिति में
पाठक भ्रमित हो सकते हैं क्योंकि वह पहले दो नियमों की दूसरी स्थिति से मेल खाती
है। अतः अनिवार्यता के रूप में लग्नेश को विचारें। पूर्णायु में लग्नेश का चर में, अल्पायु में ल ग्नेश का स्थिर में तथा
मध्यायु में लग्नेश का द्विस्वभाव राशि में होना अनिवार्य है। फिर अष्टमेश को
देखें।
अतिविशेष-सटीक परिणाम प्राप्ति के लिए लग्न व चन्द्रकुंडली तथा लग्न व
होरा कुंडली में तुलना करनी चाहिए। यह मेरे सुयोग्य आचार्य श्री अरुण कुमार गुलाटी
का मत है।
मेरे सुयोग्य आचार्य श्री मदनमोहन कौशिक के अनुसार यदि अष्टम भाव में
चर राशि हो तो जातक की मृत्यु चलते-फिरते होती है। यदि स्थिर राशि हो तो जातक पलंग
या अस्पताल में हफ्तों/महीनों पड़ा रहने के बाद मरता है। द्विस्वभाव राशि में
मृत्यु से दो एक दिन पूर्व या कुछ ही घंटे पूर्व पलंग पर लेटता है। यदि अष्टमेश भी
चर, स्थिर या
द्विस्वभाव राशि में हो तो फल शत-प्रतिशत निश्चित हो जाता है। (अष्टमेश व अष्टम
दोनों चर राशि में हों तो डॉक्टर तक पहुंचने की नौबत ही नहीं आती। जातक बात/काम
करते-करते ही तुरंत मर जाता है।) इसी प्रकार छठे भाव में चर राशि हो तो रोग
आते-जाते रहते हैं (जातक कम बीमार पड़ता है परन्तु शीघ्र ठीक हो जाता है)। स्थिर
राशि हो तो रोग आने के बाद जाता नहीं (गुरु की दृष्टि न हो तो आजीवन रहता है), द्विस्वभाव राशि में कष्टसाध्य या
कठिनाई से ठीक होता है।
