विशोंतरी दशा विवेचन
विशोंतरी दशा
फलादेश की सत्यता दशाओ से जानी जा सकती है।
इसलिये जातक के भूत भविष्य वर्तमान के विवेचन हेतु ग्रहो के फल पाक समय
या किसी योग के फल पाक समय को ज्ञात करने के लिये दशाओ का ज्ञान आवश्यक है।
आचार्यो ने लगभग 104 प्रकार की दशाओ का वर्णन कर उनके स्पष्ट करने की रीतिया भी बताई है।
बृहत्पाराशरी ग्रन्थ मे 42 प्रकार की दशाओ का वर्णन और उनके स्पष्ट करने की रीति है।
सम्पूर्ण भारत मे लगभग 52 प्रकार की दशाएं प्रचलित है।
दशाओ के 1- निसर्गायु, 2- पिण्डायु, 3- अंशायु, 4- नक्षत्रायु ये चार भेद प्रसिद्ध है।
निसर्गायु - जिसमे ग्रहो की संख्या नियत होती है।
पिण्डायु - जिसमे ग्रहो के उच्च-नीच के कारण संख्या कम-ज्यादा होती है।
अंशायु - जिसमे नवांश आदि द्वारा संख्या निर्धारित होती है।
नक्षत्रायु - जिसमे जन्म नक्षत्र के भुक्त भोग्य से दशा निर्धारित की होती है।
भारतीय दशा पद्धतिया : भारत मे मुख्यतया नक्षत्र दशा पद्धति 1-विंशोत्तरी, 2-अष्टोत्तरी, 3-योगिनी तथा 4-कालचक्र दशा, 5-मुद्दा दशा प्रचलित है।
पाश्चात्य दशा पद्धतिया : 1- दिन वर्ष one day - one year (एलेन लियो) 2- सूर्य भ्रमण पद्धति या वर्ष प्रवेश solar return प्रचलित है।
नाक्षत्र दशाएं : इनमे तीन अष्टोत्तरी, योगिनी, विंशोत्तरी प्रमुख है।
योगिनी दशा - यह नक्षत्र दशा है। इसका आधार चंद्र नक्षत्र ही है। कुछ विद्जनो अनुसार इसका हिमालय की तराई, हिमाचल प्रदेश मे प्रचलन अधिक है तथा अक्षांश देशांश अनुसार वहा के जनजीवन पर विशेष प्रभाव देखा गया है। इसका मुख्य आधार अष्ट योगिनिया 1 मंगला, 2 पिंगला, 3 घन्या, 4 भ्रामरी, 5 भद्रिका, 6 भद्रा, 7 सिद्धा, 8 संकटा है। इनके दशा वर्ष 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 है। यह कुल 36 वर्ष की होती है। इनके स्वामी क्रमशः चंद्र, सूर्य, गुरु, मंगल, बुध, शनि, शुक्र, राहु है। संकटा के पूर्वार्द्ध का स्वामी राहु और उत्तरार्ध का स्वामी केतु माना जाता है। एक चक्र पूर्ण हो जाने पर पुनः दूसरा चक्र प्रारम्भ हो जाता है।
➧ इसके साधन हेतु जन्म नक्षत्र मे 3 जोड़कर 8 का भाग दे। जो शेष बचे उस अनुसार योगिनी होती है। प्रथम आवृत्ति मे आर्द्रा से आठ नक्षत्र हस्त तक, द्वितीय आवृत्ति मे चित्र से आठ नक्षत्र उत्तराषाढ़ा तक, तृतीय आवृत्ति मे श्रवण से रेवती तक तथा रोहिणी और मृगशीर्ष एवं मंगल मे अश्विनी, बुध मे भरणी, शनि मे कृतिका से गणना की जाती है।
➧ योगिनी का साधन विंशोत्तरी अनुसार ही करते है। अन्तर्दशा ज्ञात करने के लिए ग्रह दशा वर्ष से ग्रह अन्तर्दशा वर्ष का गुना करे। गुणनफल मे 36 का भाग देने पर लब्धि ग्रह के अन्तर्दशा वर्षादि होगे।
➧ कुछ विद्जन विंशोत्तरी या अष्टोत्तरी और योगिनी दोनो से गणना करते है। फल दोनो से शुभ आये तो शुभ और विपरीत आये तो मध्यम मानते है।
अष्टोत्तरी दशा - यह भी नक्षत्र दशा है। इसका आधार भी चंद्र नक्षत्र है। इस दशा का विशेष प्रचलन नही है। यह दक्षिण भारत, गुजरात, पंजाब में प्रचलित है। इसमे मानव की पूर्णायु 108 वर्ष मानी गई है। इसमे केवल आठ ग्रहो की गणना की जाती है। केतु की गणना नही की जाती है। उनके क्रम तथा दशा वर्ष सूर्य 6 वर्ष, चंद्र 15 वर्ष, मंगल 8 वर्ष, बुध 17 वर्ष, शनि 10 वर्ष, गुरु 19 वर्ष, राहु 12 वर्ष, शुक्र 21 वर्ष कुल 108 वर्ष होते है। यह दो प्रकार की होती है। 1- कृतिकादि इसमे गणना कृतिका नक्षत्र से होती है इसका स्वामी सूर्य और दशा वर्ष 6 है। 2- आर्द्रादि इसमे गणना आर्द्रा नक्षत्र से होती है इसका स्वामी सूर्य और दशा वर्ष 6 है। अष्टोत्तरी मे अन्तर्दशा हेतु ग्रह दशा वर्षो से ग्रह अन्तर्दशा वर्षो का गुना करे, गुणनफल मे 108 का भाग दे लब्धि वर्षादि अन्तर्दशा ग्रह के वर्ष, मास, दिनादि होगे।
➧ इसमे कही-कही अभिजीत (उत्तराषाढ़ा चतुर्थ चरण + श्रवण का आरम्भ का पन्द्रहवा भाग या 4 घटी) सहित 28 नक्षत्रो की गणना की जाती है। नक्षत्रो का समान विभाजन नही है। कही-कही केवल 27 नक्षत्र ही गणना मे लिये जाते है अभिजीत की गणना नही करते है। उत्तराषाढ़ा जन्म नक्षत्र होने पर केवल इसके प्रथम तीन चरण की गणना भभोग मे कर दशा स्पष्ट करते है।
➧ अष्टोत्तरी कृतिकादि मे नक्षत्र इस प्रकार 3, 4, 5 चंद्र 6, 7, 8, 9 मंगल 10, 11, 12 बुध 13, 14, 15, 16 शनि 17, 18, 19 गुरु 20, 21, 22, अभिजित राहु 23, 24, 25 शुक्र 26, 27, 1, 2 है। इसमे शुभ ग्रह चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र के चार-चार नक्षत्र होते है।
➧ अष्टोत्तरी आर्द्रादि मे नक्षत्र इस प्रकार सूर्य 6, 7, 8, 9 चंद्र 10, 11, 12 मंगल 13, 14, 15, 16 बुध 17, 18, 19 शनि 20, 21, 22, अभिजित गुरु 23, 24, 25 राहु 26, 27, 1, 2 शुक्र 3, 4, 5 है। इसमे अशुभ ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु के चार-चार नक्षत्र होते है। (नक्षत्र 1 = अश्विनी ---------27 = रेवती)
विंशोत्तरी या अष्टोत्तरी
● कई विद्जन इस दुविधा में रहते है कि विंशोत्तरी या अष्टोत्तरी मे से किस दशा से गणना की जाये। ज्योतिषियो का मानना है कि उत्तर भारत के लिए विंशोत्तरी दशा और दक्षिण भारत के लिए अष्टोत्तरी दशा ज्यादा प्रभावी है पर इस कथन का कोई तर्क सम्मत एवं वैज्ञानिक आधार नही है।
● बृहद्पाराशर होराशास्त्र अनुसार जिसका जन्म कृष्णपक्ष मे दिन मे और शुक्लपक्ष मे रात्रि मे हो, तो जातक के जीवन मे अष्टोत्तरी घटित होती है। यह परिक्षण पर घटित नही होता है।
● मानसागरी ग्रन्थ अनुसार शुक्लपक्ष मे जन्म लेने वालो के लिए अष्टोत्तरी और कृष्णपक्ष मे जन्म लेने वालो के लिए विंशोत्तरी ग्रहण करना चाहिये। परिक्षण पर यह सिद्धांत सटीक नही उतरता है।
● एक अन्य मत है कि लग्नेश से त्रिकोण (5, 9) मे राहु और लग्न मे शुक्र हो, तो अष्टोत्तरी दशा ग्रहण करना चाहिये। परन्तु इसका भी कोई प्रमाण नही मिलता है।
विंशोत्तरी दशा
उपरोक्त दशा पद्धतिया न्यूनाधिक रूप से प्रभावित है।
फल कथन मे किसको लिया जाय यह विवादस्पद है। इस पर मतमतान्तर है। परन्तु विंशोत्तरी दशा सर्वाधिक प्रभाव युक्त वैज्ञानिक है यह निर्विवाद है। विंशोत्तरी दशा मे मानव का जो शुभाशुभ कथन किया जाता है वह सत्य और प्रामाणिक होता है। इसे कई देशी और विदेशी विद्जन प्रामाणिक और विश्वसनीय मानते है।
दशाओ मे विंशोत्तरी सटीक, प्रामाणिक, और पूर्णतया वैज्ञानिक नक्षत्र दशा पद्धति है। भारतीय आचार्यो ने कलियुग मे मानव की पूर्ण आयु 120 वर्ष मानकर इस दशा पद्धति को विकसित किया ! इसके महर्षि पाराशर जनक माने जाते है। विंशोत्तरी नाक्षत्र दशा का आधार चंद्र नक्षत्र ही है।
(1) सम्पूर्ण भचक्र (वृत्त या 360 अंश) 27 नक्षत्रो में विभाजित है तथा 27 नक्षत्रो का तीन बार भाग करने पर प्रत्येक भाग मे 9 नक्षत्र आते है। जिनके स्वामी सूर्यादि नवग्रह माने गए है। इनका क्रम सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु शुक्र है। इनके दशा वर्ष सूर्य 6 वर्ष, चंद्र 10 वर्ष, मंगल 7 वर्ष, राहु 18 वर्ष, गुरु 16 वर्ष, शनि 19 वर्ष, बुध 17 वर्ष, केतु 7 वर्ष और शुक्र 20 वर्ष है। ग्रहो की दशा वर्ष का कुलमान 120 तथा तीन आवृत्तियो के 360 सौरवर्ष या एक चक्र होता है।
(2) दशा का प्रारम्भ कृतिका नक्षत्र से होता है। कृतिका से पूर्वाफाल्गुनी तक प्रथम आवृत्ति या जन्म नक्षत्र आवृत्ति, उत्तराफाल्गुनी से पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र तक द्वितीय आवृत्ति या अनुजन्म आवृत्ति, उत्तराषाढ़ा से भरणी नक्षत्र तक तृतीय आवृत्ति या त्रिजन्म आवृत्ति कहलाती है। इस तरह प्रथम नक्षत्र का स्वामी दसवे और उन्नीसवे नक्षत्र का स्वामी होता है।
(3) महर्षि पराशर ने ग्रहो का क्रम सू-चं-मं-रा-गु-श-बु-के-शु रखा है। सूर्य सितारा, पृथ्वी गृह, चंद्र पृथ्वी का उपग्रह, राहु-केतु छाया ग्रह है। गगन मंडल सूर्य को केन्द्र मानकर ग्रहो की कक्षा क्रम बु-शु-पृ-चं-मं-गु-श होगा। किन्तु पृथ्वी को केन्द्र माने तो कक्षा क्रम सू, चं, मं, गु, श, बु, शु होगा। इसमे राहु-केतु सम्मलित करने पर कक्षा क्रम सू, चं, मं, रा, गु, श, बु, के, शु होगा। अतः महर्षि पाराशर द्वारा निर्धारित यह ग्रह क्रम पूर्णतः तर्क संगत, युक्तियुक्त और वैज्ञानिक है।
(4) यदि सूर्य को कृतिका नक्षत्र पर अवस्थित कर देखे तो एक ओर बुध और दूसरी ओर शुक्र (सूर्य से इनकी दूरी क्रमशः 28 और 48 अंश से ज्यादा नही होती है) दिखाई देता है। पृथ्वी से अवलोकन करने पर एक छोर पर मंगल और दूसरे छोर पर बुध दिखाई देते है। इसलिये मंगल के बाद राहु और बुध के बाद केतु को रखा गया।
(5) ग्रहो के दशा वर्ष आचार्यो का गहन चिंतन तथा वैज्ञानिक दृष्टि ही है। खगोलीय दृष्टि से ग्रहो के जो दशा वर्ष निश्चित किये है प्रायः ग्रह उतने समय पश्चात उसी बिन्दु पर दिखाई पड़ते है जहा से उन ग्रहो ने भ्रमण प्रारम्भ किया था। यही इस दशा का वैज्ञानिक तथ्य है।
➤ ज्योतिषाचार्य डा, नारायणदत्त श्रीमाली ने विंशोत्तरी दशा मे पाश्चात्य ग्रह हर्षल 22 वर्ष, नेपच्यून 25 वर्ष प्लूटो 28 वर्ष की गणना शनि के बाद शामिल कर मानव आयु 196 वर्ष मानी है। उनका यह तथ्य हास्यास्पद है। प्लूटो को तो सन 2006 मे ही ज्योतिष गणना से पृथक कर दिया गया है । हर्षल (द्वादश राशि भोग काल 84 वर्ष) नेप्च्यून (बारह राशि भोग काल 146 वर्ष 6 माह) अत्यधिक दूर, मंदगति और दूरबीन द्वारा ही दृश्य होने से पृथक है। इन ग्रहो की खोज को केवल तीन शताब्दी ही हुये है।
➤ नेपाल मे ज्योतिर्विदो के सम्मलेन मे विंशोत्तरी दशा मे तृतीयांश कम करके मानव की आयु 80 वर्ष मानकर उस पर विंशोत्तरी घटित की है। अंतर प्रत्यंतर दशा मे ⅔ भाग ही ग्रहण करते है। विंशोत्तरी दशा मे मानव की आयु आधार नही है वरण ग्रहो का भ्रमण है। ख मंडल के सम्पूर्ण भ्रमण का काल ही उस ग्रह का दशा काल होने से यह तथ्य निर्मूल है।
दशा साधन : विंशोत्तरी दशा का कुलमान 120 सौर वर्ष है। इसमे दशा वर्षो की गणना संवत, सूर्य के राशि अंश कला विकला या ईसवी सन, माह तारीख घण्टा मिनिट के अनुसार करते है। चक्र मे ग्रह क्रम, दशा वर्ष और अधीनस्थ नक्षत्र स्पष्ट किये गए है।
विंशोत्तरी दशा सारणी
● जन्म नक्षत्र की संख्या मे से 2 घटाकर 9 का भाग दे। शेष अनुसार ग्रहो की दशा 1 सूर्य, 2 चंद्र, 3 मंगल, 4 राहु, 5 गुरु, 6 शनि, 7 बुध, 8 केतु, 9 शुक्र होगी।
● जातक का जिस नक्षत्र मे जन्म हो वह जन्म नक्षत्र, उससे दसवा कर्म नक्षत्र, उससे उन्नीसवा आधान नक्षत्र कहा जाता है।
●यदि कृतिका से गणना करने पर फलादेश नही मिले और सूर्य की होरा का जन्म हो, तो आर्द्रा से गनणा करना चाहिये। यदि चन्द्रमा की होरा मे जन्म हो, तो कृतिका से गणना करना चाहिये।
● विंशोत्तरी दशा के फल प्रतिपादन के लिए कई विभाग किये जाते है। 1 दशा (वर्ष) 2 अन्तर्दशा या भुक्ति (वर्ष, मास) 3 प्रत्यन्तर्दशा या विदशा (मास, दिन) 4 सूक्ष्मदशा (दिन, घटी) 5 प्राणदशा (घटी, पल) 6 गोचरदशा 7 दिनदशा। इनमे प्रथम से पंचम विभाग तक ग्रहो का क्रम सामान रहता है। सामान्यतया महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा का ही उपयोग किया जाता है। बाद मे गणित इतना सूक्ष्म हो जाता है कि जन्म समय मे स्वल्प अंतर भी हो तो ग्रहो का फलपाक का समय गड़बड़ा जाता है।
दशा के भुक्त भोग्य साधन - जन्म समय ग्रह के दशा वर्षो मे से कितने बीत चुके है अर्थात भुक्त और कितने वर्ष भोगना है अर्थात भोग्य। जन्म नक्षत्र के भयात भभोग मे 60 का गुना कर पलात्मक भयात भभोग बनाले। भयात कभी 60 घटी से अधिक नही होता है। फिर पलात्मक भयात को जन्म नक्षत्र के अनुसार ग्रह के दशा वर्षो से गुणा करे। गुणनफल मे पलात्मक भभोग का भाग दे लब्धि वर्ष होगे, शेष मे 12 का गुणा करे गुणनफल मे पुनः पलात्मक भभोग को भाग दे लब्धि मास होगे। इस प्रकार दिन, घटी, पल तक निकाल ले। जो वर्षादि आएंगे वे भुक्त वर्षादि होगे। भुक्त वर्षादि को ग्रह वर्ष मे से घटाने पर भोग्य वर्षादि होगे।
➤ फलदीपिका मे मंत्रेश्वर ने उपरोक्त विधि से अलग विधि बताई है। उनका मानना है कि प्रत्येक नक्षत्र 60 घटी का ही नही होता वह कम ज्यादा का हो सकता है। इसलिए नक्षत्र की व्यतीत हो चुकी घट्यादि को व्यतीत होने वाली घटी मे जोड़े। योगफल किसी ग्रह के दशा वर्ष तुल्य होगे। तो भोग्य नक्षत्र की घट्यादि अनुसार शेष दशा के भोग्य वर्षादि होगे। (अर्थात नक्षत्र का वास्तविक मान लिया जावे)
स्पष्ट चंद्र से भोग्य वर्षादि - विभिन्न सारणियो से जन्म समय स्पष्ट चंद्र से विंशोत्तरी दशा का भोग्य वर्ष त्रुटि रहित सरलता से निकला जा सकता है।
ऐस्ट्रॉलॉजी सॉफ्टवेयर से विंशोत्तरी दशा - आजकल ऐस्ट्रॉलॉजी सॉफ्टवेयर से जन्म पत्रिका बनाना प्रचलन मे है। इससे विंशोत्तरी दशा और उसके विभाग (अंतर, प्रत्यंतर) सरलता से त्रुटि रहित बन जाते है।
अन्तर्दशा :
प्रत्येक ग्रह की दशा मे सूर्यादि नौ ग्रह की अन्तर्दशा / भुक्ति होती है। प्रारम्भ मे उसी ग्रह की अंतर दशा रहती है जिसकी महादशा होती है। फलित की सूक्ष्मता और समय निर्धारण मे इसकी आवश्यकता रहती है।
अन्तर्दशा निकलने का नियम :
(1) ग्रह के दशा वर्षो को जिस ग्रह की अन्तर्दशा निकालनी हो उस ग्रह के दशा वर्षो से गुणा करे। गुणनफल मे 10 का भाग देने पर लब्धि मास होगे, शेष मे 3 का गुना करे गुणनफल दिन होगे। या शेष मे 30 का गुणा कर गुणनफल मे 10 का भाग दे लाब्धि दिन होगे। शेष मे 60 का गुणा कर गुणनफल मे 10 का भाग देने पर लब्धि घटी होगी।
(2) ग्रह के दशा वर्षो को अन्तर्दशा ग्रह के वर्षो से गुणा करे। गुणनफल की दाहिने ओर की संख्या को 3 से गुणा करे गुणन फल दिन होगे. बांयी ओर की संख्या वैसे ही माह होगी।
◾ गणित की क्लिष्टता और त्रुटि से बचने के लिए सारणियो का उपयोग करे।
प्रत्यन्तर्दशा :
फलादेश की अधिक सूक्ष्मता के लिए प्रत्यन्तर्दशा का ज्ञान आवश्यक है। ग्रह की अन्तर्दशा मे सबसे पहले उसी ग्रह की प्रत्यन्तर्दशा होती है, आगे ग्रहो के क्रम अनुसार प्रत्यन्तर्दशा रहती है।
नियम - ग्रह दशा वर्षेा मे अन्तर्दशा ग्रह वर्षेा का गुणा करे। गुणनफल मे जिस ग्रह की प्रत्यन्तर्दशा निकालनी हो उसके दशा वर्षो से गुणा करे, गुणनफल में 40 का भाग देने पर लब्धि दिन होगे, इस प्रकार घटी, पल तक निकाल ले। वे ही प्रत्यन्तर्दशा के दिनादि होगे।
◾ गणित की क्लिष्टता और त्रुटि से बचने के लिए सारणियो का उपयोग करे।
सूक्ष्म दशा :
विंशोत्तरी प्रत्यंतर दशा के पुनः भाग करने पर सूक्ष्म दशा स्पष्ट होगी। यह दशा व्यापारिक उतार चढ़ाव के लिये ज्यादा उपयोगी है। इसमें लगभग 15 मिनिट के अंतर पर व्यापारिक तेजी-मंदी ज्ञात की जा सकती है।
स्पष्ट करने की विधि :
प्रत्यन्तर्दशा ग्रह के मास, दिन, घटी आदि की घटी बना कर दो का भाग दे, लब्धि पलो मे जिस ग्रह की सूक्ष्म दशा निकालनी हो उसके दशा वर्षो से गुणा करे, गुनणफल सूक्ष्म दशा के पल होगे इनके घट्यादि बनाले यही सूक्ष्म दशा होगी। (60 पल = 1 घटी, 60 घटी = 1 दिन)
प्राण दशा :
सूक्ष्म दशा को नवग्रह मे विभाजित करने पर प्राण दशा होगी। सूक्ष्म दशा पल मे दो का भाग दे, शेष मे ग्रह दशा वर्षो का गुना करे या आधे पलो मे ग्रह दशा वर्षो का गुना करे। गुनण फल मे 60 का भाग दे, लब्धि पल तथा शेष विपल होगे। यही प्राण दशा दशा है। (60 विपल = 1 पल)
विंशोत्तरी दशा फलादेश :
दशा के द्वारा प्रत्येक ग्रह की फल प्राप्ति का समय जाना जाता है। सभी ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा, सूक्ष्मदशा काल मे फल देते है। दशा ही फल कथन का आधार है।
● जो ग्रह उच्चराशि या मित्रराशि या स्वगृही हो, वह अपनी दशा मे अच्छा फल देता है। विद्या प्राप्ति, यश प्राप्ति, नौकरी मे उन्नति होती है। विविध मनोरथ पूर्ण होते है।
● जो ग्रह उच्च या शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो, तो उसकी दशा मे तीर्थ यात्रा, ख्याति प्राप्ति, धनोपार्जन, भूमि लाभ, धन-धान्य की वृद्धि, सफलता होती है।
● जो ग्रह नीच या शत्रु राशि मे हो या अशुभ ग्रह से दृष्ट या युत हो, तो धनहानि, मानहानि, विछोह, कलह, रोग, अवनति, भय, परदेश निवास, शत्रुओ से हानि, दुराग्रह, विवाद, नाना प्रकार की विपत्तिया आदि अशुभ फल होते है। यदि ये ग्रह सौम्य ग्रह से युत या दृष्ट हो तो बुरा फल कुछ न्यून रूप मे मिलता है।
● जो गृह वक्री हो, तो स्थान, धन, सुख का नाश होता है। नया रोग होता है। परदेश गमन, तथा सम्मान की हानि होती है। वक्री, अस्त ग्रह अपनी दशा मे अशुभ फल ही देते है।
● जो ग्रह मार्गी हो, उसकी दशा मे सम्मान, सुख, धन की वृद्धि, यश प्राप्ति, लाभ, नेतागिरी, उद्योग की प्राप्ति, कार्यसिद्धि होती है। यदि मार्गी ग्रह 6।8।12 वे भाव मे हो, तो अभीष्ट सिद्धि मे बाधा होती है।
● दशा का फल विचार करते समय ग्रह किस भाव का स्वामी है और उसका सम्बन्ध कैसे ग्रहो से है इसका ध्यान अवश्य रखना चाहिये। फल प्रतिपादन मे यह आवश्यक है।
"जातक परिजात" अनुसार फल :
ग्रह भाव के मध्य मे हो, तब अपेक्षाकृत बेहतर या असाधारण परिणाम देता है। जैसे-जैसे वह भाव मध्य से दूर होता जाता है उसकी फल देने की शक्ति कम होती जाती है। यदि ग्रह सर्वाष्टक वर्ग मे शुभ बिन्दुओ मे हो या लग्न, दशम, एकादश भाव मे हो या स्वयं अथवा मित्र के वर्ग मे हो या उच्च राशि मे हो या शुभ भाव मे शुभ ग्रह या कारक ग्रहो के साथ हो, तो अपनी दशा में शुभ फल देता है।
ग्रह, मांदी के साथ हो या अष्टकवर्ग मे कम बिंदु युक्त हो या शत्रु या हानिकारक राशि मे हो या अस्त हो या पापग्रह से दृष्ट या युत हो या राशि अथवा भाव संधि मे हो, तो अपनी दशा मे खराब परिणाम देता है।
दशा फल समय :
(1) बृहद्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार ग्रहो के दशा फल दो तरह के होते है एक सामान्य और दूसरा विशिष्ट। ग्रहो की प्राकृतिक अवस्था के कारण सामान्य प्रभाव होते है और दूसरा कुंडली मे उनकी स्थिति अनुसार विशिष्ट प्रभाव होते है। ग्रह के दशा वर्ष का प्रभाव दशा काल मे एकसा नही होता है किन्तु ग्रह प्रथम द्रेष्काण मे हो, तो दशा के प्रारम्भ मे, द्वितीय द्रेष्काण मे हो, तो मध्य मे, तथा तृतीय द्रेष्काण मे अंत मे होता है। वक्री ग्रह हो, तो विपरीत अर्थात तृतीय द्रेष्काण मे प्रारम्भ मे, द्वितीय मे मध्य मे और प्रथम द्रेष्काण मे अंत मे होता है। राहु-केतु हमेशा वक्री रहते है इसलिये वक्री ग्रह अनुसार दशा फल होता है।
(2) जातक परिजात अनुसार महादशा नाथ दशा के प्रारम्भ मे जिस भाव मे बैठा है उस अनुसार फल देता है, दशा के मध्य मे राशि अनुसार फल देता है और दशा के अंत मे अन्य ग्रहो के प्रभाव अनुसार फल देता है।
(3) फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार वस्तुओ की लाभ-हानि और भाव दर्शित घटना जब लग्न का स्वामी कुण्डली के भाव स्वामी से प्रथम या पांचवे या नवमे (ट्राइन 120 अंश) गोचर करे तब या भाव स्वामी लग्न के अंशादि से प्रथम या पांचवे या नवमे (ट्राइन 120 अंश) गोचर करे तब या उनकी दृष्टि (aspect) अनुसार गोचर (transit) करे तब, या भाव कारक ग्रह लग्न के अंशादि (लग्न स्पष्ट) पर गोचर करे तब या जन्म चंद्र राशि स्वामी या लग्न स्वामी उस भाव से गोचर करे तब वह घटना या लाभ हानि होते है।
" भारतीय ज्योतिष पर सभी प्राचीन ग्रन्थ सामान्य रूप से स्वास्थ्य, धन, ख़ुशी, गतिविधि, आयु और मनुष्यो के सामान्य कल्याण पर ग्रहो की दशा का प्रभाव बताते है कि सभी घटनाओ मे फिर से होने की प्रवृत्ति होती है। नौ ग्रहो की विंशोत्तरी महादशा के सम्रग प्रभाव उनके सम्बंधित अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा के प्रभावो के अधीन है। यह ग्रहो के महादशा नाथ से दूरी तथा उनके प्राकृतिक और अस्थाई सम्बन्धो पर निर्भर है। "
सूर्य दशा फल - 6 वर्ष
सूर्य की दशा मे परदेश गमन, राज्य कार्य मे पदोन्नति, धन लाभ, व्यापार से आमदनी मे वृद्धि, ख्याति लाभ, धर्म मे अभिरुचि होती है। यदि सूर्य नीच राशि गत हो या पापयुत या पापदृष्ट हो, ऋण, पीड़ा, प्रियजनो का वियोग, कष्ट, राज्य से भय, कलह, रोगादि (मष्तिष्क पीड़ा, शूल, उदर पीड़ा, नेत्र रोग) अशुभ फल होते है।
यदि सूर्य बलवान और अनुकूल हो, तो आत्मा का विकास, आध्यात्म प्राप्ति, शानदार जीवन, लम्बी दूरी की यात्रा, अच्छा लाभांश उत्पन्न करने वाले संघर्ष या विरोध, प्रतिष्ठा और पद मे उन्नति, व्यापार से लाभ, पिता से लाभ या पिता को लाभ होता है। यदि सूर्य बलहीन अथवा पीड़ित हो, तो आतंरिक विकृति, मानसिक और शारीरिक कौशल मे पतन, शारीरिक कष्ट, प्रतिष्ठा और पद मे अवनति, सरकार की नाराजी, पिता से पीड़ित या पिता को रोग या पिता की मृत्यु होती है।
बृहद्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार यदि सूर्य स्वगृही, उच्च, केंद्र स्थान, लाभ भाव, नवमेश (धर्मेश) या दशमेश (कर्मेश) के साथ, वर्ग मे बलवान हो, तो धनार्जन, सरकार से महान सौहार्द्र और सम्मान होता है। जातक को पंचम भाव के स्वामी (पुत्रेश) के साथ होने पर पुत्र की प्राप्ति होती है। धनेश से युत होने पर सम्पत्ति की प्राप्ति, बंधु भाव के स्वामी (चतुर्थ स्थान) से युत होने पर वाहन सुख और आनन्द होता है। सूर्य की दशा मे जातक को सेनाध्यक्ष, राजा से सभी प्रकार की ख़ुशी का आनंद प्राप्त होता है। इस प्रकार बलवान और अनुकूल सूर्य की दशा मे वस्त्राभूषण, सम्पत्ति, वाहन, सभी प्रकार की कृषि उपज, सम्मान प्राप्त होता है।
यदि सूर्य नीच राशि, शत्रु राशि, अरि या रन्ध्र या व्यय स्थान, अशुभ ग्रह से युत या दृष्ट, अरि या रन्ध्र या व्यय के स्वामी ग्रह से युत हो, तो चिंताऐ, धन हानि, सरकार से दंड, अपमान, स्वजनो से कष्ट, घर मे अशुभ घटनाऐ, पिता को कष्ट, पैतृक और मातृक चाचाओ को कष्ट, अकारण ही दूसरो से तनाव और शत्रुता के सम्बन्ध होते है।
(बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार भावो के नाम : 1 प्रथम = तनु, 2 द्वितीय = धन, 3 तृतीय = सहज, 4 चतुर्थ = बंधु, 5 पंचम = पुत्र, 6 षष्ठ = अरि, 7 सप्तम = युवती, 8 अष्टम = रन्ध्र, 9 नवम = धर्म, 10 दशम = कर्म, 11 एकादश = लाभ, 12 द्वादश = व्यय।)
फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार यदि सूर्य शुभ*well placed हो, तो सूर्य की दशा मे क्रूर कर्मो के माध्यम से धन अर्जन, यात्रा और झगड़े, पहाड़ो पर घूमना, उद्योगो का रखरखाव, उद्यम मे सफलता, स्वभाव और प्रकृति (मनोवृत्ति) मे कठोरता, वास्तविकता, कर्तव्य भक्ति, ख़ुशी होती है।
यदि सूर्य अशुभ* badly placed हो, तो लड़ाई-झगडे, राजा का अचानक कोप, रिश्तेदारो मे रोग, जातक व्यर्थ घूमने वाला, तीव्र पीड़ा, छुपे धन से खतरा, आग लगने का भय, स्त्री-पुत्र को कष्ट होता है।
* "well placed" means by sign, house, or aspect, and whether it is dignified or exalted.
* "badly placed" means by sign, house, or aspect, and whether it is debilitated.
सूर्य मेष राशि मे हो, तो नेत्र रोग, धन हानि. राजभय, नाना प्रकार के कष्ट; वृषभ मे हो, तो स्त्री पुत्र के सुख से हीन, हृदय और नेत्र रोगी, मित्रो से विरोध; मिथुन मे हो, तो अन्न-धन युक्त, शास्त्र - काव्य से आनंद, विलास ; कर्क मे हो, तो राज सम्मान, धन प्राप्ति, माता-पिता व बन्धुवर्ग से पृथकता, वातजन्य रोग; सिंह मे हो, तो राजमान्य, उच्च पदासीन, प्रसन्न; कन्या मे हो, तो कन्या रत्न की प्राप्ति, धन लाभ, धर्म मे अभिरुचि होती है।
सूर्य तुला राशि मे हो, तो स्त्री-पुत्र चिंता, परदेश यात्राऐ, प्रदेश के अनेक प्रसंग; वृश्चिक मे हो, तो प्रताप मे वृद्धि, ख्याति, विष अग्नि से पीड़ा; धनु मे हो, तो राज्य से प्रतिष्ठा, विद्या प्राप्ति; मकर मे हो, तो स्त्री-पुत्र की चिंता, धन आदि की चिंता, चिंतातुर, त्रिदोष विकार, पर कार्यो से प्रेम; कुंभ मे हो, तो पिशुनता, हृदय रोग, अल्प धन, कुटुम्बियों से विरोध और मीन मे हो, तो वाहन लाभ, प्रतिष्ठा मे वृद्धि, धनमान की प्राप्ति, विषम ज्वर होते है।
चंद्र दशा फल - 10 वर्ष
चंद्र की दशा साधारणतया सौभाग्य सूचक रहती है। पूर्ण, उच्च, शुभ ग्रह से युत चन्द्रमा हो, तो उसकी दशा मे अनेक सम्मान, धारासभा (विधानसभा, राजयसभा, लोकसभा, विधान परिषद्) का सदस्य, चुनाव मे विजयी, विद्या धन आदि प्राप्त करने वाला होता है। यदि चन्द्रमा नीच, शत्रु राशि, पापमध्य मे हो, तो कलह, क्रूरता, क्रूर कार्यो से प्रसन्नता, शूल, सिरदर्द, धननाश, मानसिक आघात, रोग, शोक, चिंता आदि होते है।
यदि चन्द्रमा बलवान और अनुकूल स्थति मे हो. तो प्रसन्न हृदय, सुखी और तेज दिमाग, सूक्ष्म-ख़ुशी और सुविधा का आनंद लेने वाला होता है। यदि चन्द्रमा बलहीन और पीड़ित हो, तो ख़राब स्वास्थ्य, आलस्य, निष्क्रियता, नौकरी खोना या पदावनति, स्त्री से झगड़ा, माता को रोग या माता की मृत्यु होती है।
बृहत्पाराशर होरा शाश्त्र अनुसार चन्द्रमा की दशा प्रारम्भ से अंत तक यदि चंद्र उच्च, स्वराशि, केंद्र या लाभ या धर्म या पुत्र भाव मे हो, शुभग्रह से युत या दृष्ट, बलवान, धर्म या कर्म या बंधु भाव के स्वामी से युत हो, तो समृद्धि और प्रताप, सौभाग्य, धनागम, घर मे मांगलिक उत्सव, भाग्योदय, सरकार मे उच्चपद, वाहन, वस्त्र, शिशु जन्म, पशु होते है। यदि ऐसा चंद्र धन भाव मे हो तो असाधारण विपुल धन और विलासता होती है।
यदि चन्द्रमा क्षीण, नीच हो तो उसकी दशा मे धन हानि होती है। यदि चंद्र सहज भाव मे हो, तो खुशिया आती-जाती रहती है। यदि चंद्र अशुभ ग्रहो से युत हो, तो मूर्खता, मानसिक तनाव, कर्मचारियो और माता से परेशानी, धन की हानि होती है। यदि क्षीण चंद्र अरि या रंध्र या व्यय भाव मे हो या अशुभ ग्रहो से युत हो, तो सरकार से शत्रुता पूर्ण सम्बन्ध, धन हानि माँ को इसी तरह के दुष्प्रभाव से परेशानी होती है। यदि बलवान चंद्र अरि या रंध्र या व्यय भाव मे हो, तो क्लेश और अच्छाइया आती जाती रहती है।
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर) अनुसार यदि चन्द्रमा पूर्ण बलवान हो, तो मानसिक शांति, सभी उद्यमो मे सफलता, संपत्ति का अधिग्रहण, अच्छा भोजन, पत्नी-पुत्र की प्राप्ति, वस्त्राभूषण, कृषि भूमि की प्राप्ति और ब्राह्मणो की भक्ति चंद्र दशा के प्रभाव होते है। शुक्ल पक्ष की एकम से दशमी तक चन्द्रमा मध्यम बली होता है, इस अवधि वाले चंद्र की दशा के प्रभाव भी मध्यम होगे। शुक्ल पक्ष की एकादशी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक चन्द्रमा पूर्ण बलि होता है, इस अवधि वाले चंद्र की दशा के प्रभाव भी प्रबल व अच्छे होगे। कृष्ण पक्ष की षष्ठी से अमावस्या तक चन्द्रमा निरंतर बलहीन होता जाता है, इस अवधि वाले चंद्र की दशा के प्रभाव भी कमजोर होगे।
चंद्र मेष राशि मे हो, तो स्त्री सुख, विदेश से प्रीति, कलह, सिर रोग; वृषभ मे हो, तो धन और वाहन लाभ, स्त्री से सुख, माता की मृत्यु, पिता को कष्ट; मिथुन मे हो, तो देशांतर गमन, संपत्ति लाभ; कर्क मे हो, तो गुप्त रोग, योन रोग, धन धान्य मे वृद्धि, कला प्रेम; सिंह मे हो, तो बुद्धिमान, सम्मान, प्रतिष्ठा, धन लाभ; कन्या राशि मे हो, तो विदेश गमन, महिला प्रेम, स्त्री प्राप्ति, काव्य प्रेम, धनागम होता है।
चंद्र तुला राशि मे हो, तो विरोध, चिंता, अपमान, व्यापार से धन लाभ, मर्म स्थान मे रोग; वृश्चिक मे हो, तो मानसिक चिंता, रोग, साधारण धनलाभ या धनहानि, धर्म हानि; धनु राशि मे हो, तो धन नाश, आर्थिक हानि, वाहन लाभ; मकर राशि मे हो, तो स्त्री-पुत्र-धन प्राप्ति, उन्माद या वायु रोग से कष्ट; कुम्भ मे हो, तो व्यसन, ऋण, नाभि के ऊपर और नीचे पीड़ा, नेत्र-दन्त रोग और मीन राशि मे चंद्र हो, तो अर्थागम, धन संग्रह, पुत्र लाभ और शत्रु नाश आदि होता है।
मंगल दशा फल - 7 वर्ष
मंगल की दशा धन योग बनाती है, परन्तु यह शुभकार्यो की अपेक्षा क्रूरकार्यो से ही धनागम योग बनाती है। इसकी दशा मे गृह-भूमि सम्बन्धी मामले, शस्त्र-चोर भय, शस्त्र-शत्रु तथा झगडे विवाद से अर्थ लाभ होता है।
यदि मंगल उच्च या स्वग्रही या मूलत्रिकोणगत या केन्द्रगत या त्रिकोणस्थ हो, तो उसकी दशा मे यश लाभ, स्त्री-पुत्र का सुख, साहस, धन लाभ, गृह-भूमि की प्राप्ति, कृषि से लाभ, मानसिक शांति, आय के अनेक स्त्रोत होते है। यदि मंगल वक्री, अस्त, नीच, का हो तो पित्त प्रकोप, रुधिर रोग, पक्षाघात, मूर्च्छा रोग होते रहते है। पत्नी से कलह, भाइयो से वैमनस्य, अधिकारियो से उग्र मतभेद, नई-नई चिन्ता होती है।
यदि मंगल बलवान और अनुकूल स्थिति मे हो, तो भाइयो से या भाइयो के द्वारा लाभ, सेना मे प्रवेश या पदोन्नति, भूमि लाभ, अच्छा स्वास्थ्य, आशावादी, साहसी, दृढ़, पारा मिलटरी या पुलिस मे सेवारत होता है। यदि मंगल बलहीन और पीड़ित हो, तो गिरना, घाव, रक्तल्पता, दण्डित, झगड़ालू, कटुभाषी, शत्रु बनाने वाला, नफ़रत करने वाला, मुकदमेबाज होता है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार मंगल की दशा मे यदि मंगल उच्च, मूलत्रिकोण, स्वगृही, केंद्र या धन या लाभ भाव मे बलवान हो या शुभ नवांश मे या शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो, तो राज्य की प्राप्ति (उच्च प्रशासनिक पद या सरकार मे सुदृढ़ राजनैतिक स्थति, धन व कृषि भूमि का अर्जन, सरकार द्वारा मान्यता) विदेशो से धन, वस्त्राभूषण, वाहन होते है। भाइयो से सुख व मधुर सम्बन्ध होते है। यदि बलवान मंगल केंद्र या सहज (तृतीय) भाव में हो, तो वीरता से धनार्जन, शत्रु पराजय, पत्नी और बच्चो से ख़ुशी होती है। हलाकि दशा के अंत में कुछ प्रतिकूल प्रभावो की सम्भावना रहती है। यदि मंगल नीच, बलहीन या अशुभ भाव या अशुभ ग्रहो से युत या दृष्ट हो, तो धननाश, संकट और उपरोक्त प्रभाव प्रतिकूल होते है।
फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार आग और झगडे आदि से धनाजर्न, मिथ्या प्रशासन से धन लाभ, धोखाधड़ी और क्रूर कार्य, हमेशा पित्त विकारो से ग्रस्त, ताप, रक्त अशुद्धता, निम्न वर्ग की महिलाओ के साथ साजिश, अपनी पत्नी, बच्चो, रिश्तेदारो और बुजर्गो से झगड़ा और इसके कारण दुःख, दूसरो के भाग्य का आनंद जैसे प्रभाव अनुभव मे मंगल की दशा मे आते है।
मंगल मेष राशि मे हो, तो उसकी दशा मे धन लाभ, ख्याति, अग्नि पीड़ा, गृह-भूमि प्राप्ति; वृषभ मे हो, तो रोग, अन्य से धन लाभ, परोपकारी; मिथुन मे हो, तो विदेश वासी, कुटिल, खर्चीला, पित्त और वायु विकार, कर्ण रोग; कर्क में हो, तो धनयुक्त, स्त्री-पुत्र से दूर निवास, क्लेश; सिंह मे हो, तो शासन से लाभ, राज्य से धनागम, शस्त्राग्नि पीड़ा, धन व्यय और कन्या मे हो, तो पुत्र, भूमि, धन-धान्य से भरपूर होता है।
तुला राशि मे मंगल हो, तो स्त्री हीन, उत्सव हीन, अधिक झंझट, क्लेश; वृश्चिक मे हो, तो धन-धान्य से परिपूर्ण, अग्नि व शस्त्र से पीड़ा; धनु मे हो, तो विजय लाभ, धनागम, राजमान; मकर मे हो, तो अधिकार प्राप्त, स्वर्ण-रत्न लाभ, कार्यसिद्धि; कुम्भ मे हो तो आचार हीन, दरिद्र, रोग, चिंताए और मीन राशि मे हो, तो ऋण, विसूचिका रोग, चिंता, हानि, खुजली आदि रोग होते है।
राहु दशा फल - 18 वर्ष
राहु की दशा सामान्यतया कष्ट दायक मानते है। कुछ मत तो 18 वर्षो मे छठा, आठवा वर्ष अनिष्टकारी मानते है।उच्च का राहु हो, तो धन-संपत्ति का लाभ, विजय, उच्चपद आदि की प्राप्ति होती है। लघु पाराशरी अनुसार राहु-केतु छाया ग्रह होने से भाव अनुसार व अन्य ग्रह से युति अनुसार फल देते है। लघु पाराशरी अनुसार ही राहु-केतु केंद्र या त्रिकोण मे हो या केंद्र, त्रिकोण के स्वामियो से युत हो, तो योगकारक होने से अपनी दशा, अन्तर्दशा मे अत्यंत शुभ फल देते है।
यदि राहु अनुकूल हो, तो सत्तारूढ़ शक्तियो की प्राप्ति या झूठ के सहारे शासकीय पक्षो मे वृद्धि, चालाक, बेईमानी से धन लाभ ज्यादा अर्जित करना, रहवास बदलना होता है। यदि राहु प्रतिकूल हो, तो अनेक प्रकार की हानिया, सर्पदंश, दिमागी विघटन, भ्रम, दृष्टिभ्रम, अस्थमा और एक्जिमा आदि होते है। यह शिक्षा और तरक्की के लिये सबसे ख़राब दशा है जिसमे व्यवधान आते है या शिक्षा खंडित होती है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार राहु की उच्च राशि वृषभ और केतु की उच्च राशि वृश्चिक, राहु-केतु की मूलत्रिकोण राशि मिथुन व धनु, राहु-केतु की स्वराशि कुम्भ व वृश्चिक, (कुछ महर्षि अनुसार कन्या और मीन) होती है। यदि राहु उच्च, मूलत्रिकोण या स्वगृही (कुम्भ या कन्या) हो, तो धनार्जन व कृषि उपज से महा ख़ुशी, मित्रो और सरकार की सहायता से वाहन की प्राप्ति, नये भवन (घर) का निर्माण, पुत्र जन्म, धार्मिक झुकाव, विदेशी सरकार से मान्यता, धनार्जन, वस्त्राभूषण आदि होते है। राहु शुभ ग्रह से दृष्ट, युत, या शुभ राशि या तनु या बंधु या युवती या कर्म या लाभ या सहज भाव मे हो, तो उसकी दशा मे सरकार के उपकार से सभी प्रकार के आराम, विदेशी सरकार या सम्प्रभु और घर के सौहार्द्र के माध्यम से संपत्ति की प्राप्ति होती है।
यदि राहु रन्ध्र या व्यय भाव मे हो, तो राहु दशा मे विपत्ति और परेशानिया होती है। यदि राहु अशुभ ग्रह या मारक ग्रह या नीच राशि मे हो, तो राहु की दशा मे प्रतिष्ठा की हानि, आवासीय घर का विनास, मानसिक संताप, पत्नी और बच्चो को कष्ट, दुर्भाग्यवश ख़राब भोजन आदि फल होते है। राहु की दशा के प्रारम्भ मे धनहानि, स्वदेश मे कुछ आर्थिक लाभ व राहत और दशा के अंत मे परेशानी व चिंताए होती है।
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर) अनुसार राहु की दशा मे राजा, चोर, अग्नि, शस्त्र, जहर का खतरा, बच्चो से मानसिक तनाव, भाइयो की हानि, नीचजाति के लोगो से अपमान, बेइज्जती, सभी उद्यमो मे हानि और असफलता, पदावनति होती है। यदि राहु शुभ ग्रह से युत या शुभ स्थान (भाव) मे हो, तो राजा की तरह वैभवशाली, उद्यमो में सफल, सुखी जीवन, अतुल सम्पदा, विश्व प्रसिद्ध होता है। यदि राहु कन्या, मीन, वृश्चिक में हो तो अपने दशा काल मे ख़ुशी, प्रतिष्ठा, जमीन का स्वामित्व वाहन, सेवक देता है परन्तु यह सब दशा समाप्त होने पर नष्ट हो जाता है। प्रभाव जैसे शत्रु से खतरा, चोरी, राजा का क्रोध, शस्त्र आघात का भय, गर्मी के रोग, पारिवारिक कलंक, अग्नि भय, गंभीर अपराधो के कारण मूल स्थान से निर्वासन फल भी होते है।
◾मन्त्रेश्वर ने उपरोक्त फल ग्रहो के सामान्य क्रम अनुसार बताये है। विंशोत्तरी ग्रह क्रम अनुसार राहु दशा काल मे स्वभाव मे दुष्ट बनना, गंभीर रोग से पीड़ित होना, जातक की पत्नी और संतान का नष्ट होना, विष का भय या खतरा, शत्रु से कष्ट या परेशानी, नेत्र और हृदय रोग, मित्र, कृषि कर्मी, राजा से वैर अनुभव मे आते है।
मेष राशि मे राहु हो, तो उसकी दशा मे अर्थलाभ, साधारण सफलता, घरेलू झगडे, भाइयो से विरोध; वृषभ मे हो, तो राज्य से लाभ, कष्ट, अधिकार प्राप्ति, सहिष्णुता, सफलता; मिथुन मे हो. तो दशा प्रारम्भ मे कष्ट, मध्य मे सुख; कर्क मे हो, तो अर्थलाभ, पुत्रलाभ, कार्य प्रारम्भ करना, धन संचित करना; सिंह मे हो, तो प्रेम, ईर्ष्या, रोग, सम्मान, कार्यो मे सफलता और कन्या राशि मे हो, तो मध्यम वर्ग के लोगो से लाभ, व्यापार से लाभ, नीच कार्यो से प्रेम, संतोष होता है।
तुला राशि मे राहु हो, तो झंझट, अचानक कष्ट, बंधु-बांधवो से क्लेश, धन लाभ, यश और प्रतिष्ठा मे वृद्धि; वृश्चिक मे हो, तो नीच कार्यो में रत, शत्रुओ से हानि, आर्थिक कष्ट; धनु मे हो, तो यश लाभ, धारा सभाओ मे प्रतिष्ठा, उच्चपद की प्राप्ति; मकर मे हो, तो सिर रोग, वात रोग आर्थिक संकट; कुम्भ मे हो तो धन लाभ, व्यापार मे साधारण लाभ, विजय और मीन राशि मे राहु हो, तो विरोध, झगड़ा, रोग, अल्पलाभ आदि फल होते है।
गुरु दशा फल - 16 वर्ष
गुरु की दशा जीवन में श्रेष्ट ही रहती है। गुरु दशा काल मे ज्ञान लाभ, धन-अस्त्र-वाहन लाभ, परीक्षा-साक्षात्कार मे सफलता, राजयकार्य मे लाभ, देवार्चना मे सलग्नता, भोग, समाज मे सम्मान, राज्य से पुरस्कार, अधिकारियो से संपर्क, धार्मिक यज्ञादि कर्म आदि फल होते है। यदि गुरु नीच, अस्त, वक्री हो, तो कण्ठरोग, गुल्मरोग, पिल्हारोग, असफलता आदि फल होते है।
यदि गुरु बलवान, शुभ भाव और योग कारक हो, तो अध्ययन के प्रति झुकाव, ज्ञान मे वृद्धि होती है। यदि गुरु की दशा आयु की मध्य अवस्था मे आती है, तो धनागम, पुत्र की प्राप्ति, तीर्थ यात्रा, शुभ उत्सव होते है। यदि गुरु की दशा आयु की अंतिम अवस्था मे आती है, तो बेहतर आय और वित्त होता है। यदि गुरु प्रतिकूल या पीड़ित हो, तो अधुरी शिक्षा, असफलता, प्रतिष्ठा गिरने से दुर्गति, ख़राब स्वास्थ्य, दरिद्रता, बुरे कर्म, निराशा, पुत्र या पोते को पीड़ा होती है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार गुरु महा शुभ और देवताओ का शिक्षक यदि उच्च, स्वगृही, मूलत्रिकोण, कर्म या पुत्र या धर्म भाव या स्वनवांश या उच्च नवांश मे हो, तो अपने दशा काल मे साम्राज्य अभिग्रहण, अत्यंत सुविधा, शासन से मान्यता, वस्त्राभूषण और वाहन प्राप्ति, देव-ब्राह्मण की भक्ति, पत्नी और संतान से ख़ुशी, धार्मिक बलिदान (यज्ञ, चढ़ावा) के प्रदर्शन मे सफलता होती है।
यदि गुरु नीच, अस्त, अशुभ ग्रहो से युत या अरि या रंध्र भाव मे हो, तो उसकी दशा मे रहवास परिसर का नाश, तनाव, संतान को पीड़ा, पशु हानि, तीर्थ हानि होती है। दशा प्रारम्भ मे कुछ प्रतिकूल प्रभाव देती है बाद मे अनुकूल प्रभाव अर्थ लाभ, सरकार से मान्यता और पुरस्कार आदि फल होते है।
फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार गुरु की दशा मे धर्मिक मामलो मे भागीदारी, शिशु जन्म या शिशु से ख़ुशी, राजा द्वारा सम्मान, प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा प्रशंसा, हाथी-घोड़े व अन्य वाहन की प्राप्ति, इच्छाओ की पूर्ति, पत्नी और बच्चो से स्नेहपूर्ण आत्मीय सम्बन्ध, मित्रो से मिलन आदि फल अनुभव मे आते है।
मेष राशि मे गुरु हो, तो उसकी दशा मे अफसरी अर्थात अधिकार पद, विद्या, स्त्री, पुत्र, धन, सम्मान आदि का लाभ; वृषभ राशि मे हो, तो रोग, विदेश मे निवास, धनहानि; मिथुन मे हो, तो क्लेश, विरोध, धननाश; कर्क मे हो, तो राज्य से लाभ, ऐश्वर्यलाभ, ख्यातिलाभ, मित्रता, उचपद, सेवावृत्ति; सिंह मे हो, तो राजा से मान, स्त्री-पुत्र-बंधु लाभ, हर्ष, धन-धान्य पूर्ण; कन्या मे हो, तो स्त्री के आश्रय से धनलाभ, शासन मे योगदान, भ्रमण या देशाटन, विवाद, कलह आदि फल होते है।
तुला राशि मे गुरु हो, तो फोड़ा-फुंशी, विवेक हीनता, अपमान, शत्रुता; वृश्चिक मे हो, तो पुत्रलाभ, निरोगता, धनलाभ, पूर्ण ऋण अदा होना; धनु राशि मे हो, तो मंत्री, धारासभा सदस्य (लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा) उच्च पदासीन, अल्पलाभ; मकर मे हो, तो आर्थिक कष्ट, गुह्य स्थानो मे रोग; कुम्भ मे हो, तो राज्य से सम्मान, धारासभा सदस्य, विद्यालाभ, साधारण धनागम तथा साधारण आर्थिक सुख और मीन राशि मे हो, तो विद्या, धन, स्त्री-पुत्र अदि से संपन्न, प्रसन्नता, सुख आदि फल होते है।
शनि दशा फल 19 वर्ष
राजनैतिक कार्यो मे शनि की दशा सहायक होती है। बलवान शनि की दशा मे जातक को धन, जन, सवारी, भ्रमण, प्रताप, कीर्ति, रोग, क्रय-विक्रय से लाभ, भाग्योदय आदि फल होते है। नीच, अस्त या वक्री शनि की दशा मे आलस्य, निद्रा, त्रिदोष के रोग, व्यभिचार, स्त्री प्रसंग से विरक्ति, चर्म रोग, अनैतिकता, बेईमानी आदि होते है।
यदि शनि अनुकूल है, तो अपने सख्त प्रायसो और कठिन मेहनत से सेवा मे उन्नति करता है, शनि द्वारा संकेतित चीजो से लाभ प्राप्त करता है और विरासत पाता है। किन्तु शनि प्रतिकूल हो, तो कुपोषण आदि के कारण रोग ग्रस्त, गरीबी, मुकदमा, झगड़ा, वृद्धो से अनबन, परिवार या निकट सम्बन्ध मे मृत्यु, प्रगति की राह मे रूकावट और बाधा, जीवन मे चारो ओर संकट होता है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार शनि जो सब ग्रहो मे सबसे कमजोर और निचला माना जाता है यदि उच्च, स्वगृही, मूलत्रिकोण, मित्र राशि, स्वनवांश या उच्च नवांश या सहज या लाभ भाव मे हो, तो शनि दशा काल मे शासन से मान्यता, समृद्धि और महिमा, नाम और प्रसिद्धि, शिक्षा के क्षेत्र मे सफलता, आभूषण और वाहनादि का अर्जन, धन लाभ, सम्पत्ति की प्राप्ति, सरकार से समर्थन, सेना अध्यक्ष जैसा उच्च पद, देवी लक्ष्मी की उदारता, राज्य की प्राप्ति, शिशु जन्म होता है।
यदि शनि अरि या रंध्र या व्यय भाव मे हो, नीच या अस्त हो, तो उसकी दशा मे जहर से दुष्प्रभाव, शस्त्राघात, पिता से विछोह, पत्नी और बच्चो को कष्ट, सरकार की नाराजी से आपदा, जेल इत्यादि होते है। यदि शनि शुभ ग्रह से युत या दृष्ट, केंद्र या त्रिकोण, धनु या मीन मे हो, तो राज्य, वाहन, वस्त्र का अर्जन (अधिग्रहण) होता है ।
फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार शनि की दशा मे पत्नी और बच्चो को रूमेटिस्म या गाउट रोग की पीड़ा, कृषि मे नुकसान, ख़राब बात, दुष्ट महिलाओ के साथ सम्भोग, नौकरो द्वारा नौकरी छोड़ना, धन का नाश होना फल जातक को अनुभव मे आते है।
मेष मे शनि हो, तो दशा मे स्वतंत्रता, मर्म स्थान मे रोग, चर्म रोग, प्रवास, बंधु-बांधव से वियोग; वृषभ मे हो, तो निरुद्यम, वायु पीड़ा, कलह, वमन, आंत के रोग, राज्य से सम्मान, विजय लाभ; मिथुन मे हो, तो कष्ट, ऋण, चिंता, परतंत्रता; कर्क मे हो, तो नेत्र-कर्ण रोग, बंधु वियोग, विपत्ति, दरिद्रता; सिंह मे हो, तो रोग, आर्थिक कष्ट; कन्या राशी मे हो, तो गृह निर्मण, भूमि लाभ, सुखी होना आदि फल होते है।
तुला राशि मे हो, तो धन-धान्य का लाभ, विलास, भोगोपभोग की वस्तुओ की प्राप्ति, विजय; वृश्चिक मे हो, तो भ्रमण, कृपणता, साधारण आर्थिक कष्ट, नीच का संग; धनु मे हो, तो राजा के समान, जनता मे ख्याति, आनन्द, प्रसन्ता, यश लाभ; मकर मे हो, तो आर्थिक संकट, विश्वासघात, बुरे व्यक्तियो का साथ; कुम्भ मे हो, तो पुत्र-धन और स्त्री का लाभ, विजय और मीन मे हो, तो अधिकार प्राप्ति, सुख, सम्मान, उन्नति आदि फल होते है।
बुध दशा फल - 17 वर्ष
बुध की दशा मे व्यापर मे वृद्धि, व्यवसाय मे विस्तारीकरण, गृह मे उत्सव, शुभ समाचारो की प्राप्ति, दुत्कारी मे वृद्घि, आजीविका की प्राप्ति, धार्मिक कृत्य होते है। बुध उच्च, स्वगृही, बलवान हो, तो विद्या, विज्ञान, व्यापार-व्यवसाय, शिल्पकर्म मे उन्नति, धन लाभ, स्त्री पुत्र को सुख होता है। यदि बुध नीच, अस्त, वक्री हो अथवा त्रिक 6, 8 12 भाव मे हो, तो त्रिदोष (वात-पित्त-कफ) विकार, संचित पूंजी का नाश, हानि होते है।
यदि बुघ बलवान और अनुकूल हो, तो अध्ययन और लेखन आदि मे समर्पित, सक्रीय, वाणिज्य या राजनीति या कूटनीति मे संलग्न, व्यापार और दूसरो से लेनदेन मे लाभ, मित्रो की संगती का आनंद, तनाव रहित शांत वातावरण मे रहने वाला होता है। यदि बुध बलहीन और पीड़ित हो, तो तंत्रिका (स्नायु) रोग से पीड़ित, यकृत रोग, मित्रो और रिश्तेदारो से हानि, अपनो के कारण दूसरे बईमान, मानहानि, नापसन्दी होती है।
बृहत्पराशर होरा शास्त्र अनुसार यदि बुध उच्च, स्वगृही, मित्र राशि या लाभ या पुत्र या धर्म भाव मे हो तो बुध दशा मे धन संचय, प्रतिष्ठा मे वृद्धि, ज्ञान वृद्धि, सरकार से हितकारिता, घर मे मांगलिक कार्य (उत्सव) पत्नी और बच्चो से ख़ुशी, अच्छा स्वास्थ्य, मिष्ठानो की उपलब्धता, व्यापार मे लाभ इत्यादि होते है। यदि बुध पर धर्मेश और कर्मेश की दृष्टि हो, तो उपरोक्त फायदेमंद परिणाम पूर्ण अनुभव मे आते है और पूरे दशा काल मे हर प्रकार की सुविधा रहती है।
यदि बुध अशुभ ग्रहो से दृष्ट हो, तो सरकार द्वारा सजा, भाइयो से वैर, विदेश यात्रा, दूसरो पर निर्भरता, संभवतया मूत्र कष्ट होते है। यदि बुध अरि या रंध्र या व्यय भाव मे हो, तो स्वास्थ्य हानि, कामुक गतिविधियो मे आसक्ति होने से धन हानि, संधिशोथ, पीलिया रोग की संभावना, चोरी का खतरा और सरकार से अपमान इत्यादि होते है। बुध की दशा के प्रारम्भ मे संपत्ति मे वृद्धि, शैक्षणिक क्षेत्र मे सुधार, शिशु जन्म और ख़ुशी, मध्य दशा मे सरकार से मान्यता और अंतिम दशा काल रंजीदा (शोकाकुल) होती है।
फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार दोस्तो से मिलन, ख़ुशी, विद्वानो से प्रशंसा, प्रसिद्धि की प्राप्ति, गुरु से लाभ, भाषण मे विशिष्टता या वाक्पटुता , दूसरो की सहायता, पत्नी बच्चो रिश्तेदारो को सुख बुध की दशा मे होते है।
बुध मेष राशि मे हो, तो धन हानि, छल कपट युक्त व्यवहार के लिए प्रवृत्ति; वृषभ मे हो, तो धनागम, यश लाभ, स्त्री-पुत्र की चिंता, विष से कष्ट: मिथुन मे हो, तो अल्प लाभ, कष्ट, माता को सुख; कर्क मे हो, तो धनार्जन, काव्य सृजन, विदेश गमन, योग्य प्रतिभा की जागृति; सिंह मे हो, तो ज्ञान, यश, धननाश; कन्या राशि मे हो, तो ग्रंथो की रचना, प्रतिभा का विकास, धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
बुध तुला राशि मे हो, तो स्त्री से कलह या पीड़ा, दान या भेट देना, धार्मिक कृत्य; वृश्चिक मे हो, तो कामपीड़ा व अधिक अनाचार, व्यय; धनु मे हो, तो केंद्र या राज्य मे मंत्री, शासन की प्राप्ति, नेतागिरी, नेतृत्व; मकर मे हो, तो नीचो से मित्रता, अल्प लाभ, धनहानि; कुम्भ मे हो, तो बंधुओ को कष्ट, रोग, दरिद्रता, दुर्बलता और मीन मे हो, तो दमा-खांसी से कष्ट, क्षय रोग, विष-अग्नि-शस्त्र से पीड़ा, नाना प्रकार की झंझटें, व्याधि आदि फल होते है।
केतु दशा फल - 7 वर्ष
राहु की दशा की अपेक्षा केतु की दशा शुभ होती है फिर भी जातक इस दशा मे अपने कार्यो पर पछताता रहता है। योजनाओ मे असफलता, शारारिक कष्ट, मित्रो से बिगाड़, राजयकार्य मे बाधा, व्यर्थ का व्यय, धन हानि, व्याधि आदि फल होते है। शुभ दृष्टि हो, तो केतु की दशा मे अर्थ प्राप्ति, शान्ति, उन्नति आदि फल होते है।
यदि केतु अनुकूल हो, तो दर्शन ग्रंथो का अध्ययन और पूजा मे सलग्न, दवाइयो से अत्यधिक आमदनी, धरेलू आराम और विलासता, सौभाग्य और रोगो से मुक्ति होती है। यदि केतु प्रतिकूल हो, तो शरीर मे तीव्र दर्द, दिमागी पीड़ा, दुर्घटना, धाव, बुखार, नीच लोगो की संगती और उनसे बुरे परिणाम होते है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार यदि केतु केन्द्र, त्रिकोण, लाभ भाव, शुभ ग्रह की राशि या स्वराशि मे हो, तो राजा से मधुर सम्बन्ध, देश या गांव प्रमुख बनने की इच्छा, वाहन सुख, बच्चो से ख़ुशी, विदेशो से लाभ, पत्नी से सुख, पशु धन की प्राप्ति होती है। यदि केतु सहज या अरि या लाभ भाव मे हो, तो राज्य अधिग्रहण, मित्रो से मधुर सम्बन्ध होते है। केतु की दशा प्रारम्भ मे राज योग, मध्य मे भयानकता और दशा अंत मे बीमारियो और दूर देश की यात्राओ से कष्ट होता है। यदि केतु धन या रंध्र या व्यय मे हो, या अशुभ ग्रह से दृष्ट हो, तो जेल, भाइयो और रहवास का नाश, तनाव, भृत्य लोगो की संगति होती है।
फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार केतु की दशा मे स्त्रियो से दुःख और भ्रम, अमीरो से कष्ट, सम्पत्ति का नाश होता है। व्यक्ति दूसरो के साथ अन्याय करेगा, देश या मूल स्थान से निर्वासित होगा। दांतो मे परेशानी, पैरो मे दर्द और कट्टरपंथी परेशानिया होती है।
केतु यदि मेष राशि मे हो, तो धन लाभ, यश, स्वास्थ्य; वृषभ मे हो, तो कष्ट, हानि, पीड़ा, चिंता, अल्पलाभ; मिथुन मे हो, तो कीर्ति, बंधुओ से विरोध, रोग, पीड़ा; कर्क मे हो, तो सुख, कल्याण, मित्रता, स्त्री-पुत्र लाभ; सिंह मे हो, तो अल्प सुख, धन लाभ और कन्या राशि मे हो, तो निरोग, प्रसिद्ध, सत्कार्य प्रेम आदि फल होते है।
यदि केतु तुला राशि मे हो, तो व्यसनों मे रूचि, कार्य हानि, अल्प लाभ; वृश्चिक मे हो, तो धन-सम्मान- स्त्री-पुत्र लाभ, कफ, बंधन जन्य (कारावास) कष्ट; धनु मे हो तो सिर मे रोग, नेत्र पीड़ा, भय; मकर मे हो, तो आर्थिक संकट, पीड़ा, चिंता, बंधु-बांधवो का वियोग और मीन राशि मे हो तो साधारण लाभ, अकस्मात धन प्राप्ति, लोक मे ख्यति, विद्या लाभ कीर्ति लाभ आदि फल होते है।
शुक्र दशा फल - 20 वर्ष
शुक्र की दशा मे भोग विलास की इछाओ की पूर्ति, रत्न, आभूषण, सम्मान, नवीन कार्य, मदन पीड़ा, वाहन सुख, आकस्मिक द्रव्य लाभ, ललित कला से सम्मान होते है। निर्बल शुक्र की दशा मे चित्त संताप, कलह, विरोध, धन हानि, गुप्तांगो के रोग आदि होते है।
शुक्र की दशा मे कलात्मक वस्तु और आनंद की प्राप्ति, दूसरो के साथ सामंजस्य पूर्ण तरीके लाभ मे पारस्परिक रूप से सहसञ्चालन, प्रेम मे पड़ना, विवाह होना, पत्नी से प्रेम और स्नेह मे वृद्धि, कन्या जन्म, कुछ महिला या शुभचिंतको के पक्ष के कारण उन्नति होती है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार यदि शुक्र उच्च, स्वराशि, केंद्र या त्रिकोण मे हो तो उसकी दशा मे वस्त्राभूषण, वाहन, जमीन, पशु, प्रतिदिन मिष्ठान की उपलब्धता, संप्रभु से मान्यता, नाट्य संगीत के विलासता पूर्ण उत्सव, देवी लक्ष्मी की उदारता (आशीर्वाद) होती है। यदि शुक्र मूल त्रिकोण मे हो, तो निश्चित ही राज्य व धर की प्राप्ति, पुत्र या पोते का जन्म, परिवार मे विवाह का जश्न, मित्रो से मिलन, उच्च पद, खोई संपत्ति, राज्य, जमीन-जायदाद वापस प्राप्त होती है।
यदि शुक्र अरि या रंध्र या व्यय भाव मे हो, तो भाइयो से रिश्तेदारी मे कटुता, पत्नी को कष्ट, व्यापार मे घाटा, पशुओ का नष्ट होना रिश्तेदारी मे अलगाव होता है। यदि शुक्र धर्मेश या कर्मेश होकर बंधु स्थान मे स्थित हो, तो उसकी दशा काल मे देश या गावं का शासन प्रमुख, पवित्र कर्म करने वाला, जलाशय और मंदिर निर्माण कराने वाला, अनाज दान करने वाला, हर रोज मिष्ठान प्राप्त वाला, कठोर परिश्रमी, नामी और प्रसिद्ध, पत्नी बच्चो से सुखी होता है। यदि शुक्र धन या युवती स्थान का स्वामी हो, तो उसकी दशा मे दर्द, कष्ट होता है।
फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार अपने मनोरंजन और ख़ुशी अनुसार साम्रग्री और सुविधा, श्रेष्ट वाहन, गाय, रत्न, आभूषण, खजाना की प्राप्ति, युवती के साथ सम्भोग (आनंद) बौद्धिक गतिविधिया, समुद्री यात्राएं, राजा द्वारा सम्मान और घर मे शुभ कार्य का उत्सव शुक्र की दशा मे होते है।
मेष राशि मे शुक्र हो, तो उसकी दशा मे चंचलता, विदेश भ्रमण, उद्वेग प्रेम, धन हानि; वृषभ मे हो, तो विद्या लाभ, कन्या रत्न की प्राप्ति, धन; मिथुन मे हो, तो काव्य प्रेम, प्रसन्नता, धन लाभ, प्रदेश गमन, व्यवसाय मे उन्नति; कर्क मे हो, तो उद्यम से धन लाभ, आभूषण लाभ, स्त्रियो से विशेष प्रेम; सिंह मे हो, तो साधारण आर्थिक कष्ट, स्त्रियो से धन लाभ, पुत्र हानि, पशुओ से लाभ और कन्या राशि मे हो, तो आर्थिक कष्ट, दुखी, प्रदेश गमन, स्त्री पुत्र से विरोध होता है।
कन्या राशि मे शुक्र हो, तो ख्याति लाभ, भ्रमण, अपमान; वृश्चिक मे हो, तो प्रताप, क्लेश, धन लाभ, सुख, चिंता; धनु राशि मे हो, तो काव्य प्रेम, प्रतिभा का विकास; मकर राशि मे हो, तो चिंता, कष्ट, वात रोग; कुम्भ राशि हो, तो व्यसन, कष्ट, धन हानि, दुर्घटना और मीन राशि मे हो, तो राजा से धन लाभ, व्यापार मे लाभ, कारोबार मे वृद्धि, नेतागिरी आदि फल होते है।
विशोंत्तरी भावेश दशा फल :
(1) लग्नेश : लग्नेश की दशा सौभाग्य सूचक रहती है। शारारिक सुख, निरोगता, धनागम, ख्याति, कठिन कार्यो के लिये उद्यत आदि फल होते है। परन्तु स्त्री कष्ट देखा जाता है। लग्नेश की दशा मे शनि की अन्तर्दशा मे धन हानि, परिवार मे झगड़ा-बटवारा, शत्रुता, कष्ट होते है।
फलदीपिका अनुसार - यदि लग्न का स्वामी बलवान हो तो विश्व गौरवशाली स्थिति, सुखी जीवन व्यापन, निरोग पुष्ट शरीर, चहरे पर लावण्य, समृद्धि मे वृद्धि, वृद्धिगत चन्द्रकला के समान जीवन उन्नतिशील होता है। यदि लग्नेश बलहीन, अशुभ स्थान या प्रतिकूल हो तो कारावास, संज्ञान मे जीवन व्यापन, भयग्रस्त, रोग, मानसिक पीड़ा, अंतिम संस्कार मे भाग लेने वाला, पद का नुकसान व अन्य दुर्भाग्य होते है।
(2) द्वितीयेश : द्वितीयेश की दशा अशुभ सूचक होती है। धनेश की दशा मे धनलाभ, शारारिक कष्ट, मानहानि, पदावनति होती है। यदि धनेश पापयुत हो तो कारावास या मृत्यु भी हो जाती है। द्वितीयेश पापग्रह हो या पापग्रह से युत या दृष्ट हो या द्वितीय स्थान मे पापग्रह बैठा हो तो इस दशा मे भीषण आर्थिक क्षति होती है, दिवालिया बनने की नौबत तक आ जाती है।
द्वितीयेश की दशा मे शनि, मंगल, सूर्य तथा राहु की अन्तर्दशाये कष्टकर, भाई-स्वजन का मरण या विछोह कारक होती है। परन्तु द्वितीयेश शुभग्रह हो या शुभग्रह से युत या दृष्ट हो तो इस दशा मे धन-धान्य की वृद्धि और सन्तान सुख भी होता है।
फलदीपिका अनुसार - यदि द्वितीय भाव के स्वामी की दशा हो तो परिवार की वृद्धि, सुकन्या की प्राप्ति, सुस्वादु भोजन का आनन्द, व्याख्यान से अर्थ, भाषण की वाग्मिता और श्रोताओ की परिणामी प्रशंसा होती है। द्वितीयेश बलहीन, अशुभ स्थान या प्रतिकूल हो तो जातक लोगो से मूर्खता पूर्ण व्यवहार करेगा, अपने वचन और परिवार पर कायम नही रहेगा, आपत्तिजनक पत्र लिखेगा, नेत्र पीड़ा से ग्रस्त होगा, कठोर वाणी होगी, अनाप-शनाप खर्च करेगा, राजा की नाराजगी सहन करेगा।
(3) तृतीयेश : तृतीयेश की दशा मे निरंतर उत्थान-पतन होता रहता है। इसकी दशा कष्टकारक, चिंताजनक, साधारण आमदनी करने वाली होती है। यदि तृतीयेश शुभग्रह हो या शुभग्रह से युत हो तो दशा शुभ कारक और पापग्रह या पापग्रह से युत हो तो धनक्षय, झूठा कलंक लगना, मानहानि, शत्रु वृद्धि होती है।
अशुभ तृतीयेश की दशा मे शनि, मंगल, सूर्य तथा राहु की अन्तर्दशा हो तो भाई-बहन की मृत्यु, बन्धुजनो का विछोह, मानहानि आदि फल होते है। अधिकतर अनुभव मे आता है की तृतीयेश चाहे शुभ या अशुभ गृह हो उसकी दशा मे पापग्रह का अंतर आने पर स्वजन का विछोह होता ही है।
फलदीपिका अनुसार यदि तृतीय स्थान और उसका स्वामी बलवान है तो तृतीयेश की दशा आने पर जातक को भाइयो से पूर्ण सहयोग मिलता है। शुभ समाचार की प्राप्ति, साहस और वीरता प्रदर्शन का अवसर, सेना अध्यक्ष और सम्मान, जन सहयोग और अच्छे गुणो के लिये प्रसिद्ध होता है। यदि तृतीयेश कमजोर (बलहीन) हो तो उसकी दशा मे भाई और बहनो की हानि होगी, कार्य की आलोचना होगी और गुप्त शत्रु परेशान करेगे, जातक विपरीतता का शिकार होगा जिसके कारण अपमानित होगा और अपना गौरव खोयेगा।
(4) चतुर्थेश : चतुर्थश की दशा शुभ कारक मानी गई है। इसकी दशा मे वाहन, घर, भूमि आदि के लाभ, माता तथा मित्र व स्वयम को शारीरिक सुख होता है। चतुर्थेश सौम्यग्रह मे सौम्यग्रह की अन्तर्दशा आने पर घर, वाहन की श्री वृद्धि, मांगलिक कार्य, सर्वोतोमुखी प्रगति आदि फल होते है।
चतुर्थेश बलवान शुभग्रहो से दृष्ट हो तो नया मकान बनता है। मंगल की अन्तर्दशा आने पर गृह निर्माण, कृषि कार्यो से लाभ होता है। शुक्र की दशा आने पर वाहन लाभ लाभेश (एकादशेश) की दशा आने पर नवीन कारोबार, एकाधिक स्रोत से धनागम होता है। सूर्य की अन्तर्दशा आने पर नौकरी मे उन्नति, लाभ किन्तु पिता को धोर कष्ट होता है। लाभेश या चतुर्थेश दोनो दशम या चतुर्थ मे हो तो कारोबार करता है। लेकिन इस दशाकाल मे पिता को कष्ट होता है। विद्या लाभ, विश्विद्यालय की उच्च उपाधिया इस दशा काल मे प्राप्त होती है। यदि यह दशा विद्यार्थी कल मे नही मिले तो इस दशा कल मे विद्या विषयक उन्नति, और विद्या द्वारा यश की प्राप्ति होती है। चतुर्थेश पापीग्रह हो या उसमे पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो बन्धु विरोध, बटवारा, कृषि हानि, पशु हानि, अर्थ क्षय, स्थानांतरण होता है। अस्त या वक्री ग्रह की अन्तर्दशा आने पर धोर कष्ट होता है।
फलदीपिका अनुसार - रिश्तो मे मधुर सम्बन्ध, कृषि मामलो मे सफलता, पत्नी से सुखद संबंध, वाहन, कृषि भूमि, घर तथा धन उच्च स्तर की प्राप्ति इस दशा काल मे होती है। यदि चतुर्थेश निर्बल हो तो माता, स्वजन, मित्रो को पीड़ा, घर, कृषिभूमि, मवेशियो के विनाश का खतरा और जल से खतरा होता है।
(5) पंचमेश : पंचमेश की दशा जीवन की सर्वतोमुखी उन्नति की सूचक है। इस दशा मे विद्याप्राप्ति, सम्मान प्राप्ति , सुबुद्धि, परीक्षा या प्रतियोगिता मे सफलता, मंगल कार्य, समाज व राज्य मे सम्मान, माता की मृत्यु या पीड़ा होती है। यदि संतान प्राप्ति योग हो तथा पुरुषग्रह हो तो पुत्र और स्त्रीग्रह हो तो कन्या संतति की प्राप्ति का योग रहता है। यदि पंचमेश शुभ ग्रह हो तो समस्त ऐश्वर्य और भोग, शुभग्रह की अन्तर्दशा मे ईश्वराधन, पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो पुत्रो पर विपत्ति, गृह कलह आदि होता है।
फलदीपिका अनुसार पंचम स्थान व पंचमेश बलवान हो तो पुत्र जन्म, भाइयो से खुशी सहयोग व रिश्ते, राजा का मंत्री बनना, सम्मान का सम्मान, पुण्य कार्यो मे भागीदारी और लोगो द्वारा उसकी प्रशंसा, दूसरो द्वारा अनेक प्रकार के व्यजन पांचवे भाव के स्वामी द्वारा व्युत्पन्न किये जाते है। यदि पंचमेश कम शक्ति या अशुभ स्थान मे हो तो उसकी दशा मे पुत्र हानि, दिमागी विचलितता, धोखाधड़ी से पीड़ित, उद्येश्य विहीन इधर-उधर भटकना, पेट के विकारो से पीड़ित, राजा का कोप भाजन होता है।
(6) षष्ठेश : छठे भाव के स्वामी की दशा मुख्यतः रोग वृद्धि या नवीन रोग सूचक होती है। इसकी दशा मे रोग वृद्धि, संतान को कष्ट, अधिकारियो से मतभेद, शत्रु भय, पदावनति, रोग-ऋण-रिपु होते है। यदि षष्ठेश पाप ग्रह हो तो मुक़दमेबाजी, प्लीहा, गुल्म, क्षय आदि रोगो से ग्रस्त होना पड़ता है।
फलदीपिका अनुसार यदि 6 ठा भाव व षष्ठेश बलवान है तो जातक की वीरता से शत्रु पर विजय, दशा काल मे रोग मुक्ति, उदार और शक्तिशाली, स्वस्थता का आनंद, वैभव और सृमद्धि षष्ठेश की दशा मे अनुभव मे आते है। यदि षष्ठेश बलहीन हो तो चोरी का भय, गरीबी, दूसरो के द्वारा जबर्जस्ती, रोगो से त्रस्त, नीच उपचार या अवांछनीय कार्यवाही मे शामिल, दूसरो की सेवा, अपमान, प्रतिष्ठा का ह्राष, शारीरिक क्षति होती है।
(7) सप्तमेश : जायेश या कलत्रेश की दशा कष्टकर ही होती है। इस दशा मे शोक शारीरिक कष्ट, मानसिक चिंता, आर्थिक कष्ट, अवनति, राज्य पक्ष से अपमान होता है। सप्तमेश शुभग्रह हो तो स्त्री को साधारण कष्ट और पापग्रह हो या पाप मध्यत्व मे हो तो स्त्री को विशेष शारीरिक कष्ट होता है, और पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो स्त्री, सम्बन्धी का शिकार, स्थानांतरण, गुर्दे के रोग होते है। यदि सप्तमेश क्रूर ग्रह हो और उसमे पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो स्त्री से वंचित होना पड़ता है।
फलदीपिका अनुसार यदि सप्तम भाव पूर्ण बलवान है तो सप्तमेश की दशा मे नए वस्त्र, आभूषण, प्रसन्नता से पत्नी के साथ जीवन व्यापन, विनम्रता या शारारिक शक्ति मे वृद्धि, घर मे परिणय जैसा शुभ समारोह होता है। आनंद दायक लघु यात्राये होती है। यदि सप्तमेश कमजोर हो तो जातक का दामाद (जामाता) पीड़ित होगा, विपरीत लिंग के अवांछनीय कृत्य के कारण पत्नी से तलाक या विछोह, दुष्ट महिलाओ से सम्बन्ध के कारण गुप्त रोगो का शिकार, उद्देश्य विहीन इधर-उधर भटकना होता है।
(8) अष्टमेश : रंध्रेश की दशा प्रत्येक प्रकार हानि कारक होती है। इसकी दशा मे मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट, मृत्यु भय, स्त्री मृत्यु, विवाह, स्त्री से विछोह या स्त्री चिररोगिनी होती है। यदि अष्टमेष पापग्रह हो और द्वितीयस्थ हो, तो निश्चित मृत्यु होती है। यदि अष्टमेश पापग्रह की दशा मे पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो शत्रु आघात से आहत, आर्थिक धोर कष्ट होता है।
फलदीपिका अनुसार यदि अष्टम का स्वामी पूर्ण बलवान हो तो उसकी दशा मे जातक समस्त ऋण अदा कर देता है। वह अपने व्यवसाय और अन्य कार्यो मे उन्नति करता है और जातक के समस्त विवाद समाप्त होते है। यदि बलहीन अष्टमेश की दशा हो तो महादुःख, बुद्धि का नाश, सम्भोग की तीव्र इच्छा, ईर्ष्या, मिर्गी, निर्धनता, फलहीन पर्यटन, प्रतिष्ठा खोना, अपमान, रोग होते है। यहा तक की ऐसे ग्रह की दशा मे मृत्यु भी हो सकती है।
(9) नवमेश : भाग्येश की दशा बिरले जातक को ही मिलती है क्योकि इसकी दशा मे जातक अत्यंत उच्च स्तर पर जाने मे समर्थ होता है। इसकी दशा मे तीर्थ यात्रा, भाग्योदय, दान-पुण्य, विद्या द्वारा उन्नति, भाग्यवृद्धि, सम्मान, राज्य से लाभ और किसी महान कार्य की पूर्ण सफलता प्राप्त होती है। सभी अभावगत वस्तुऐ प्राप्त होती है। आर्थिक लाभ, राज्य सेवा मे उन्नति, योजना की आपूर्ति से यश, मान, धन, कीर्ति आदि की प्राप्ति होती है। कहावत है कि ' वारे न्यारे ' इसकी दशा मे होते है। यदि नवमेश पापग्रह हो और उसमे पापग्रह की अन्तर्दशा या राहु शनि मंगल सूर्य की अंतर दशा हो तो विदेश यात्रा होती है।
फलदीपिका अनुसार यदि नवम का स्वामी बलवान हो तो जातक उसकी दशा मे समृद्धि, ख़ुशी धन का अपनी पत्नी, बच्चो, पोते, रिश्तेदारो के साथ लगातार आनंद लेगा, मेघावी कर्म करेगा, शाही पक्ष प्राप्त करेगा और देवताओ, ब्राह्मणो का सम्मान करेगा। यदि नवमेश कमजोर हो तो पत्नी और बच्चो को कष्ट, अपने पूर्व के इष्ट की नाराजी से अनेक प्रकार के कष्ट होते है। जातक कई अवांछनीय कार्यो मे सलग्न, पिता और भाई की मृत्यु और स्वयं दरिद्रता से पीड़ित होता है।
(10) दशमेश : कर्मेश या राज्येश की दशा भी उन्नति कारक होती है। इस दशा मे राज्याश्रय की प्राप्ति, धन लाभ, सम्मान वृद्धि, सुखोदय, पदोन्नति, शासकीय सेवा, उच्चपद प्राप्त होता है। इसकी दशा मे माता को कष्ट होता है। दशमेश की दशा मे पापग्रह की अन्तर्दशा आने पर मित्रो से विछोह, द्रव्यहानि, अपमान होता है। दशमेश नीचग्रह मे पापग्रह की दशा आने पर मातृ विछोह, यशहानि, वित्तक्षय आदि झंझटे झेलनी पड़ती है।
फलदीपिका अनुसार दशम का स्वामी बलवान हो तो उसकी दशा मे सभी उद्यमो मे सफलता, आरामदायक जीवन, नाम और प्रसिद्धि, अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। जातक अपने को ऐसे कार्यो मे शामिल करता है जिससे वह अपमानित होता है। दशमेश बलहीन हो तो सभी उद्यमो में असफलता, दुष्ट कार्यो मे शामिल, मातृभूमि से दूर रहना जिससे परेशानी, अवांछित घटनाओ का सामना और सम्मान मे क्षति होती है।
(11) एकादशेश : लाभेश की दशा साधारणतया शुभ फल दायक होती है। इसकी दशा मे धन लाभ, ख्याति, व्यापार मे प्रचुर लाभ, आय के नए स्रोत, पिता की मृत्यु होती है। यदि एकादशेश क्रूर ग्रह से दृष्ट हो तो रोगोत्पादक, यदि पापग्रह या शनि, राहु, मंगल, सूर्य की अन्तर्दशा हो तो कृषि कार्यों से हानि, धनहानि, सम्मान हानि उठानी पड़ती है।
फलदीपिका अनुसार लाभेश बलवान हो तो समृद्धि मे लगातार वृद्धि, निकट सम्बन्धी से मिलन, अनेक नौकरो से सेवाशुश्रा, पारवारिक ख़ुशी और महान सपन्नता होती है। यदि एकादश भाव का स्वामी प्रतिकूल व अशुभ स्थान मे हो तो उसकी दशा मे जातक के बड़े भाई को कष्ट, बेटा बीमार, स्वयं दुर्गति और धोखे का शिकार व कान के रोग से पीड़ित होता है।
(12) द्वादशेश : व्ययेश की दशा अशुभ होती है। इसमे चिंताए, धन हानि, शारीरिक कष्ट, विपत्तिया, व्याधिया, कुटम्बियो को कष्ट होता है। द्वादशेश की दशा मे पापग्रह की अन्तर्दशा आने पर कुटम्बियो से मतभेद. पुरुषार्थ की क्षति, अपमान होता है। द्वादशेश की दशा मे अष्टमेश की अन्तर्दशा आने पर विदेश यात्राऐ और विदेश के कार्य, विदेश निवास होता है।
फलदीपिका अनुसार व्यय भाव के स्वामी की दशा मे जातक अच्छे कारणो से असाधारण खर्च करेगा। जातक मेघावी कृत्य करेगा और पापो के प्रभाव से मुक्त होगा। जातक शाही सम्मान से सम्मानित किया जायेगा। बाहरवे स्थान का स्वामी कमजोर हो तो उसकी दशा मे अनेक रोग, अपमान, गुलामी होती है। जातक की सारी संपत्ति चन्द्रमा के अंधेर पक्ष की तरह गायब हो जाती है।
➧ फलदीपिका अनुसार दशा के अच्छे प्रभाव जब दशा स्वामी 6, 8 12 भाव मे नही हो, वह स्वग्रही, या उच्च या वक्री हो। शत्रु राशि या नीच या अस्त ग्रह की दशा मे बुरे प्रभाव होते है।
➧ फलदीपिका अनुसार ग्रहो द्वारा इंगित प्रभाव अच्छे या बुरे उनकी दशा, अन्तर्दशा मे देखे जाते है। केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी योगकारक कहलाते है।
➧ फलदीपिका अनुसार वर्गोत्तमी ग्रह बहुत अच्छे प्रभाव देता है। ग्रह की नीच राशि मे वर्गोत्तमी ग्रह या अस्त ग्रह मिश्रित प्रभाव देता है। 6, 8, 12 भाव के स्वामी की दशा मे उनकी अंतर दशा आने पर विपरीत प्रभाव होते है। इसी प्रकार 6, 8, 12 भाव मे स्थित ग्रहो की दशा, अन्तर्दशा मे भी विपरीत प्रभाव होते है।
➧ फलदीपिका अनुसार क्रूर (हानिकारक) ग्रहो की दशा मे घर मे चोरी, शत्रुओ द्वारा कष्ट, महादुःख होता है। जन्म नक्षत्र से 3, 5, 7 नक्षत्र के स्वामी की अंतर दशा मे चोरी, शत्रु द्वारा कष्ट, महादुःख होता है। इसी प्रकार अशुभ (हानिकारक) ग्रह की दशा, चंद्र राशि स्वामी या अष्ठम के स्वामी की अंतर दशा मे जातक के घर मे चोरी, शत्रु से कष्ट और महादुःख होता है।
➧ फलदीपिका अनुसार जन्म समय की दशा से शनि की दशा चौथी, गुरु की दशा छठी, मंगल और राहु की दशा पांचवी तथा राशि के अंतिम अंशो मे ग्रह की दशा, 6, 8, 12 भाव के स्वामी की दशा दुर्भाग्य और पीड़ा दायक होती है। (नोट : कोई मंगल की दशा मे जन्मा है तो शनि की दशा चौथी, शुक्र दशा मे जन्मा है तो राहु की दशा पांचवी, गुरु की दशा छठी और केतु मे जन्मा है तो मंगल की दशा पांचवी होगी।)
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार भावेश दशा फल :
● यदि कर्म भाव का स्वामी शुभ भाव, उच्च राशि आदि मे अपनी दशा मे अनुकूल प्रभाव देता है वही कर्म भाव का स्वामी अशुभ भाव, नीच राशि मे प्रतिकूल प्रभाव देता है। यह सिद्ध करता है कि अशुभ ग्रह उच्च राशि, शुभ भाव मे प्रतिकूल प्रभाव नही देगा और शुभ ग्रह अशुभ भाव, नीच राशि मे प्रतिकूल प्रभाव देगा।
● लग्न के स्वामी की दशा मे तंदुरुस्ती; धन भाव के स्वामी की दशा मे दुर्गति या मृत्यु की सम्भावना; सहज भाव के स्वामी की दशा प्रतिकूल; बंधु भाव के स्वामी की दशा मे गृह और भूमि का अधिग्रहण; पुत्र भाव के स्वामी की दशा मे शिक्षा के क्षेत्र मे प्रग्रति, बच्चो से ख़ुशी; अरि स्वामी की दशा मे शत्रु से खतरा, ख़राब स्वास्थ्य होता है। युवती भाव के स्वामी की दशा मे जातक की मृत्यु, जातक की पत्नी को संकट; रंध्र के स्वामी की दशा मे मृत्यु, वित्तीय घाटा; धर्म भाव के स्वामी की दशा मे शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति, धर्मान्धता, अप्रत्यशित आर्थिक लाभ; कर्म भाव के स्वामी की दशा मे सरकार से मान्यता और सम्मान; लाभ भाव के स्वामी की दशा मे धनार्जन मे बाधा, संभवतया रोग; व्यय भाव के स्वामी की दशा मे रोगो से कष्ट और खतरा होता है।
➤ ग्रह शुभ भाव मे स्थित हो तो उसकी दशा आने पर दशा मे अनुकूल फल देता है। ग्रह जो अरि, रंध्र, व्यय स्थान मे हो तो अपनी दशा मे प्रतिकूल फल देता है। इसलिए यह आवश्यक है कि जन्म के समय और दशा के प्रारंभ मे एक ग्रह की स्थिति को दशा प्रभावो के आकलन के लिए ध्यान मे रखा जाना चाहिये।
● अरि, रन्ध्र, व्यय भाव के स्वामियो की दशा अनुकूल हो सकती है यदि वे त्रिकोण के स्वामी से जुड़े हो या यदि केंद्र का स्वामी त्रिकोण या त्रिकोण का स्वामी केंद्र मे हो से युति हो। जिस ग्रह पर केंद्र अथवा त्रिकोण के स्वामियो की दृष्टि हो उसकी दशा भी अनुकूल होती है। यदि धर्म भाव का स्वामी लग्न मे हो या लग्नेश धर्म भाव मे हो तो दोनो की दशा अत्यंत लाभकारी, अनुकूल, शुभ, राज्य अधिग्रहण कारक होती है।
● सहज, अरि, लाभ भाव के स्वामी और इन तीनो भावो मे स्थित ग्रह, और इनसे युत ग्रह की दशा प्रतिकूल होती है। मारक भाव (धन, युवती) के स्वामियो से सम्बंधित ग्रह और धन, युवती, रंध्र भावो मे स्थित ग्रहो की दशा प्रतिकूल प्रभाव देती है। इस प्रकार दशा को एक ग्रह की स्थिति और दूसरे के साथ एक ग्रह के रिश्ते को ध्यान मे रखते हुए अनुकूल या प्रतिकूल माना जाना चाहिये।
विशोंत्तरी भावेश दशा फल :
(1) लग्नेश : लग्नेश की दशा सौभाग्य सूचक रहती है। शारारिक सुख, निरोगता, धनागम, ख्याति, कठिन कार्यो के लिये उद्यत आदि फल होते है। परन्तु
स्त्री कष्ट देखा जाता है। लग्नेश की दशा मे शनि की अन्तर्दशा मे धन हानि, परिवार मे झगड़ा-बटवारा, शत्रुता, कष्ट होते है।
फलदीपिका अनुसार - यदि लग्न का स्वामी बलवान हो तो विश्व
गौरवशाली स्थिति, सुखी जीवन व्यापन, निरोग पुष्ट शरीर, चहरे पर लावण्य, समृद्धि मे वृद्धि, वृद्धिगत चन्द्रकला के समान जीवन उन्नतिशील होता है।
यदि लग्नेश बलहीन, अशुभ स्थान या
प्रतिकूल हो तो कारावास, संज्ञान मे जीवन
व्यापन, भयग्रस्त, रोग, मानसिक पीड़ा, अंतिम संस्कार मे भाग लेने वाला, पद का नुकसान व अन्य दुर्भाग्य होते है।
(2) द्वितीयेश :
द्वितीयेश की दशा अशुभ सूचक होती है। धनेश की दशा मे धनलाभ, शारारिक कष्ट, मानहानि, पदावनति होती है। यदि धनेश पापयुत हो तो कारावास या
मृत्यु भी हो जाती है। द्वितीयेश पापग्रह हो या पापग्रह से युत या दृष्ट हो या
द्वितीय स्थान मे पापग्रह बैठा हो तो इस दशा मे भीषण आर्थिक क्षति होती है, दिवालिया बनने की नौबत तक आ जाती है।
द्वितीयेश की दशा मे शनि, मंगल, सूर्य तथा राहु की अन्तर्दशाये कष्टकर, भाई-स्वजन का मरण या विछोह कारक होती है। परन्तु
द्वितीयेश शुभग्रह हो या शुभग्रह से युत या दृष्ट हो तो इस दशा मे धन-धान्य की
वृद्धि और सन्तान सुख भी होता है।
फलदीपिका अनुसार - यदि द्वितीय भाव के स्वामी की दशा हो तो परिवार
की वृद्धि, सुकन्या की
प्राप्ति, सुस्वादु भोजन का
आनन्द, व्याख्यान से
अर्थ, भाषण की वाग्मिता
और श्रोताओ की परिणामी प्रशंसा होती है। द्वितीयेश बलहीन, अशुभ स्थान या प्रतिकूल हो तो जातक लोगो से मूर्खता
पूर्ण व्यवहार करेगा, अपने वचन और
परिवार पर कायम नही रहेगा, आपत्तिजनक पत्र
लिखेगा, नेत्र पीड़ा से
ग्रस्त होगा, कठोर वाणी होगी, अनाप-शनाप खर्च करेगा, राजा की नाराजगी सहन करेगा।
(3) तृतीयेश :
तृतीयेश की दशा मे निरंतर उत्थान-पतन होता रहता है। इसकी दशा कष्टकारक, चिंताजनक, साधारण आमदनी करने वाली होती है। यदि तृतीयेश शुभग्रह
हो या शुभग्रह से युत हो तो दशा शुभ कारक और पापग्रह या पापग्रह से युत हो तो धनक्षय, झूठा कलंक लगना, मानहानि, शत्रु वृद्धि होती है।
अशुभ तृतीयेश की दशा मे शनि, मंगल, सूर्य तथा राहु की अन्तर्दशा हो तो भाई-बहन की मृत्यु, बन्धुजनो का विछोह, मानहानि आदि फल होते है। अधिकतर अनुभव मे आता है की
तृतीयेश चाहे शुभ या अशुभ गृह हो उसकी दशा मे पापग्रह का अंतर आने पर स्वजन का
विछोह होता ही है।
फलदीपिका अनुसार यदि तृतीय स्थान और उसका स्वामी बलवान है
तो तृतीयेश की दशा आने पर जातक को भाइयो से पूर्ण सहयोग मिलता है। शुभ समाचार की
प्राप्ति, साहस और वीरता
प्रदर्शन का अवसर, सेना अध्यक्ष और
सम्मान, जन सहयोग और
अच्छे गुणो के लिये प्रसिद्ध होता है। यदि तृतीयेश कमजोर (बलहीन) हो तो उसकी दशा मे भाई और बहनो की हानि होगी, कार्य की आलोचना होगी और गुप्त शत्रु परेशान करेगे, जातक विपरीतता का शिकार होगा जिसके कारण अपमानित होगा
और अपना गौरव खोयेगा।
(4) चतुर्थेश :
चतुर्थश की दशा शुभ कारक मानी गई है। इसकी दशा मे वाहन, घर, भूमि आदि के लाभ, माता तथा मित्र व स्वयम को शारीरिक
सुख होता है। चतुर्थेश सौम्यग्रह मे सौम्यग्रह की अन्तर्दशा आने पर घर, वाहन की श्री वृद्धि, मांगलिक कार्य, सर्वोतोमुखी प्रगति आदि फल होते है।
चतुर्थेश बलवान शुभग्रहो से दृष्ट हो तो नया मकान बनता है।
मंगल की अन्तर्दशा आने पर गृह निर्माण, कृषि कार्यो से लाभ होता है। शुक्र की दशा आने पर वाहन लाभ लाभेश (एकादशेश) की दशा
आने पर नवीन कारोबार, एकाधिक स्रोत से
धनागम होता है। सूर्य की अन्तर्दशा आने पर नौकरी मे उन्नति, लाभ किन्तु पिता को धोर कष्ट होता है। लाभेश या चतुर्थेश दोनो दशम या चतुर्थ
मे हो तो कारोबार करता है। लेकिन इस दशाकाल मे पिता को कष्ट होता है। विद्या लाभ, विश्विद्यालय की उच्च उपाधिया इस दशा काल मे प्राप्त
होती है। यदि यह दशा विद्यार्थी कल मे नही मिले तो इस दशा कल मे विद्या विषयक
उन्नति, और विद्या द्वारा
यश की प्राप्ति होती है। चतुर्थेश पापीग्रह हो या उसमे पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो
बन्धु विरोध, बटवारा, कृषि हानि, पशु हानि, अर्थ क्षय, स्थानांतरण होता है। अस्त या वक्री ग्रह की अन्तर्दशा
आने पर धोर कष्ट होता है।
फलदीपिका अनुसार - रिश्तो मे मधुर सम्बन्ध, कृषि मामलो मे सफलता, पत्नी से सुखद संबंध, वाहन, कृषि भूमि, घर तथा धन उच्च स्तर की प्राप्ति इस दशा काल मे होती है। यदि चतुर्थेश
निर्बल हो तो माता, स्वजन, मित्रो को पीड़ा, घर, कृषिभूमि, मवेशियो के विनाश का खतरा और जल से खतरा होता है।
(5) पंचमेश : पंचमेश
की दशा जीवन की सर्वतोमुखी उन्नति की सूचक है। इस दशा मे विद्याप्राप्ति, सम्मान प्राप्ति , सुबुद्धि, परीक्षा या प्रतियोगिता मे सफलता, मंगल कार्य, समाज व राज्य मे सम्मान, माता की मृत्यु या पीड़ा होती है। यदि संतान प्राप्ति
योग हो तथा पुरुषग्रह हो तो पुत्र और स्त्रीग्रह हो तो कन्या संतति की प्राप्ति का
योग रहता है। यदि पंचमेश शुभ ग्रह हो तो समस्त ऐश्वर्य और भोग, शुभग्रह की अन्तर्दशा मे ईश्वराधन, पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो पुत्रो पर विपत्ति, गृह कलह आदि होता है।
फलदीपिका अनुसार पंचम स्थान व पंचमेश बलवान हो तो पुत्र
जन्म, भाइयो से खुशी
सहयोग व रिश्ते, राजा का मंत्री
बनना, सम्मान का सम्मान, पुण्य कार्यो मे भागीदारी और लोगो द्वारा उसकी प्रशंसा, दूसरो द्वारा अनेक प्रकार के व्यजन पांचवे भाव के
स्वामी द्वारा व्युत्पन्न किये जाते है। यदि पंचमेश कम शक्ति या अशुभ स्थान मे हो
तो उसकी दशा मे पुत्र हानि, दिमागी विचलितता, धोखाधड़ी से पीड़ित, उद्येश्य विहीन इधर-उधर भटकना, पेट के विकारो से पीड़ित, राजा का कोप भाजन होता है।
(6) षष्ठेश : छठे भाव
के स्वामी की दशा मुख्यतः रोग वृद्धि या नवीन रोग सूचक होती है। इसकी दशा मे रोग वृद्धि, संतान को कष्ट, अधिकारियो से मतभेद, शत्रु भय, पदावनति, रोग-ऋण-रिपु होते है। यदि षष्ठेश पाप ग्रह हो तो मुक़दमेबाजी, प्लीहा, गुल्म, क्षय आदि रोगो से ग्रस्त होना पड़ता है।
फलदीपिका अनुसार यदि 6 ठा भाव व षष्ठेश बलवान है तो जातक की वीरता से शत्रु पर विजय, दशा काल मे रोग मुक्ति, उदार और शक्तिशाली, स्वस्थता का आनंद, वैभव और सृमद्धि षष्ठेश की दशा मे अनुभव मे आते है।
यदि षष्ठेश बलहीन हो तो चोरी का भय, गरीबी, दूसरो के द्वारा जबर्जस्ती, रोगो से त्रस्त, नीच उपचार या अवांछनीय कार्यवाही मे शामिल, दूसरो की सेवा, अपमान, प्रतिष्ठा का ह्राष, शारीरिक क्षति होती है।
(7) सप्तमेश : जायेश
या कलत्रेश की दशा कष्टकर ही होती है। इस दशा मे शोक शारीरिक कष्ट, मानसिक चिंता, आर्थिक कष्ट, अवनति, राज्य पक्ष से अपमान होता है। सप्तमेश शुभग्रह हो तो स्त्री को साधारण कष्ट और
पापग्रह हो या पाप मध्यत्व मे हो तो स्त्री को विशेष शारीरिक कष्ट होता है, और पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो स्त्री, सम्बन्धी का शिकार, स्थानांतरण, गुर्दे के रोग होते है। यदि सप्तमेश क्रूर ग्रह हो और
उसमे पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो स्त्री से वंचित होना पड़ता है।
फलदीपिका अनुसार यदि सप्तम भाव पूर्ण बलवान है तो सप्तमेश
की दशा मे नए वस्त्र, आभूषण, प्रसन्नता से पत्नी के साथ जीवन व्यापन, विनम्रता या शारारिक शक्ति मे वृद्धि, घर मे परिणय जैसा शुभ समारोह होता है। आनंद दायक लघु
यात्राये होती है। यदि सप्तमेश कमजोर हो तो जातक का दामाद (जामाता) पीड़ित होगा, विपरीत लिंग के अवांछनीय कृत्य के कारण पत्नी से तलाक
या विछोह, दुष्ट महिलाओ से
सम्बन्ध के कारण गुप्त रोगो का शिकार, उद्देश्य विहीन इधर-उधर भटकना होता है।
(8) अष्टमेश : रंध्रेश की दशा प्रत्येक प्रकार हानि कारक होती है।
इसकी दशा मे मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट, मृत्यु भय, स्त्री मृत्यु, विवाह, स्त्री से विछोह या स्त्री चिररोगिनी होती है। यदि
अष्टमेष पापग्रह हो और द्वितीयस्थ हो, तो निश्चित मृत्यु होती है। यदि अष्टमेश पापग्रह की
दशा मे पापग्रह की अन्तर्दशा हो तो शत्रु आघात से आहत, आर्थिक धोर कष्ट होता है।
फलदीपिका अनुसार यदि अष्टम का स्वामी पूर्ण बलवान हो तो
उसकी दशा मे जातक समस्त ऋण अदा कर देता है। वह अपने व्यवसाय और अन्य कार्यो मे उन्नति करता है
और जातक के समस्त विवाद समाप्त होते है। यदि बलहीन अष्टमेश की दशा हो तो महादुःख, बुद्धि का नाश, सम्भोग की तीव्र इच्छा, ईर्ष्या, मिर्गी, निर्धनता, फलहीन पर्यटन, प्रतिष्ठा खोना, अपमान, रोग होते है। यहा तक की ऐसे ग्रह की दशा मे मृत्यु भी
हो सकती है।
(9) नवमेश : भाग्येश
की दशा बिरले जातक को ही मिलती है क्योकि इसकी दशा मे जातक अत्यंत उच्च स्तर पर
जाने मे समर्थ होता है। इसकी दशा मे तीर्थ यात्रा, भाग्योदय, दान-पुण्य, विद्या द्वारा उन्नति, भाग्यवृद्धि, सम्मान, राज्य से लाभ और किसी महान कार्य की पूर्ण सफलता
प्राप्त होती है। सभी अभावगत वस्तुऐ प्राप्त होती है। आर्थिक लाभ, राज्य सेवा मे उन्नति, योजना की आपूर्ति से यश, मान, धन, कीर्ति आदि की प्राप्ति होती है। कहावत है कि ' वारे न्यारे ' इसकी दशा मे होते है। यदि नवमेश पापग्रह हो और उसमे
पापग्रह की अन्तर्दशा या राहु शनि मंगल सूर्य की अंतर दशा हो तो विदेश यात्रा होती
है।
फलदीपिका अनुसार यदि नवम का स्वामी बलवान हो तो जातक उसकी
दशा मे समृद्धि, ख़ुशी धन का अपनी
पत्नी, बच्चो, पोते, रिश्तेदारो के साथ लगातार आनंद लेगा, मेघावी कर्म करेगा, शाही पक्ष प्राप्त करेगा और देवताओ, ब्राह्मणो का सम्मान करेगा। यदि नवमेश कमजोर हो तो
पत्नी और बच्चो को कष्ट, अपने पूर्व के इष्ट की नाराजी से अनेक प्रकार के कष्ट होते है।
जातक कई अवांछनीय कार्यो मे सलग्न, पिता और भाई की मृत्यु और स्वयं दरिद्रता से पीड़ित
होता है।
(10) दशमेश : कर्मेश या राज्येश की दशा भी उन्नति कारक होती है। इस
दशा मे राज्याश्रय की प्राप्ति, धन लाभ, सम्मान वृद्धि, सुखोदय, पदोन्नति, शासकीय सेवा, उच्चपद प्राप्त होता है। इसकी दशा मे माता को कष्ट होता है। दशमेश की दशा मे पापग्रह की अन्तर्दशा आने
पर मित्रो से विछोह, द्रव्यहानि, अपमान होता है। दशमेश नीचग्रह मे पापग्रह की दशा आने
पर मातृ विछोह, यशहानि, वित्तक्षय आदि झंझटे झेलनी पड़ती है।
फलदीपिका अनुसार दशम का स्वामी बलवान हो तो उसकी दशा मे सभी
उद्यमो मे सफलता, आरामदायक जीवन, नाम और प्रसिद्धि, अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। जातक अपने को ऐसे
कार्यो मे शामिल करता है जिससे वह अपमानित होता है। दशमेश बलहीन हो तो सभी उद्यमो
में असफलता, दुष्ट कार्यो मे
शामिल, मातृभूमि से दूर
रहना जिससे परेशानी, अवांछित घटनाओ का
सामना और सम्मान मे क्षति होती है।
(11) एकादशेश : लाभेश
की दशा साधारणतया शुभ फल दायक होती है। इसकी दशा मे धन लाभ, ख्याति, व्यापार मे प्रचुर लाभ, आय के नए स्रोत, पिता की मृत्यु होती है। यदि एकादशेश क्रूर ग्रह से
दृष्ट हो तो रोगोत्पादक, यदि पापग्रह या
शनि, राहु, मंगल, सूर्य की अन्तर्दशा हो तो कृषि कार्यों से हानि, धनहानि, सम्मान हानि उठानी पड़ती है।
फलदीपिका अनुसार लाभेश बलवान हो तो समृद्धि मे लगातार
वृद्धि, निकट सम्बन्धी से
मिलन, अनेक नौकरो से सेवाशुश्रा, पारवारिक ख़ुशी और महान सपन्नता होती है। यदि एकादश
भाव का स्वामी प्रतिकूल व अशुभ स्थान मे हो तो उसकी दशा मे जातक के बड़े भाई को
कष्ट, बेटा बीमार, स्वयं दुर्गति और धोखे का शिकार व कान के रोग से पीड़ित होता है।
(12) द्वादशेश :
व्ययेश की दशा अशुभ होती है। इसमे चिंताए, धन हानि, शारीरिक कष्ट, विपत्तिया, व्याधिया, कुटम्बियो को कष्ट होता है। द्वादशेश की दशा मे
पापग्रह की अन्तर्दशा आने पर कुटम्बियो से मतभेद. पुरुषार्थ की क्षति, अपमान होता है। द्वादशेश की दशा मे अष्टमेश की
अन्तर्दशा आने पर विदेश यात्राऐ और विदेश के कार्य, विदेश निवास होता है।
फलदीपिका अनुसार व्यय भाव के स्वामी की दशा मे जातक अच्छे कारणो
से असाधारण खर्च करेगा। जातक मेघावी कृत्य करेगा और पापो के प्रभाव से मुक्त होगा। जातक शाही सम्मान से
सम्मानित किया जायेगा। बाहरवे स्थान का स्वामी कमजोर हो तो उसकी दशा मे अनेक रोग, अपमान, गुलामी होती है। जातक की सारी संपत्ति चन्द्रमा के
अंधेर पक्ष की तरह गायब हो जाती है।
➧ फलदीपिका अनुसार
दशा के अच्छे प्रभाव जब दशा स्वामी 6, 8 12 भाव मे नही हो, वह स्वग्रही, या उच्च या वक्री हो। शत्रु राशि या नीच या अस्त ग्रह
की दशा मे बुरे प्रभाव होते है।
➧ फलदीपिका अनुसार
ग्रहो द्वारा इंगित प्रभाव अच्छे या बुरे उनकी दशा, अन्तर्दशा मे देखे जाते है। केन्द्र और त्रिकोण के
स्वामी योगकारक कहलाते है।
➧ फलदीपिका अनुसार
वर्गोत्तमी ग्रह बहुत अच्छे प्रभाव देता है। ग्रह की नीच राशि मे वर्गोत्तमी ग्रह
या अस्त ग्रह मिश्रित प्रभाव देता है। 6, 8, 12 भाव के स्वामी की दशा मे उनकी अंतर दशा आने पर विपरीत
प्रभाव होते है। इसी प्रकार 6, 8,
12 भाव मे स्थित ग्रहो की दशा, अन्तर्दशा मे भी विपरीत प्रभाव होते है।
➧ फलदीपिका अनुसार
क्रूर (हानिकारक) ग्रहो की दशा मे घर मे चोरी, शत्रुओ द्वारा कष्ट, महादुःख होता है। जन्म नक्षत्र से 3, 5, 7 नक्षत्र के स्वामी की अंतर दशा मे चोरी, शत्रु द्वारा कष्ट, महादुःख होता है। इसी प्रकार अशुभ (हानिकारक) ग्रह की
दशा, चंद्र राशि स्वामी या अष्ठम के स्वामी की अंतर दशा मे
जातक के घर मे चोरी, शत्रु से कष्ट और
महादुःख होता है।
➧ फलदीपिका अनुसार
जन्म समय की दशा से शनि की दशा चौथी, गुरु की दशा छठी, मंगल और राहु की दशा पांचवी तथा राशि के अंतिम अंशो
मे ग्रह की दशा, 6, 8, 12 भाव के स्वामी की
दशा दुर्भाग्य और पीड़ा दायक होती है। (नोट : कोई मंगल की दशा मे जन्मा है तो शनि
की दशा चौथी, शुक्र दशा मे
जन्मा है तो राहु की दशा पांचवी, गुरु की दशा छठी
और केतु मे जन्मा है तो मंगल की दशा पांचवी होगी।)
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार भावेश दशा फल :
● यदि कर्म भाव का
स्वामी शुभ भाव, उच्च राशि आदि मे
अपनी दशा मे अनुकूल प्रभाव देता है वही कर्म भाव का स्वामी अशुभ भाव, नीच राशि मे प्रतिकूल प्रभाव देता है। यह सिद्ध करता
है कि अशुभ ग्रह उच्च राशि, शुभ भाव मे
प्रतिकूल प्रभाव नही देगा और शुभ ग्रह अशुभ भाव, नीच राशि मे प्रतिकूल प्रभाव देगा।
● लग्न के स्वामी
की दशा मे तंदुरुस्ती; धन भाव के स्वामी
की दशा मे दुर्गति या मृत्यु की सम्भावना; सहज भाव के स्वामी की दशा प्रतिकूल; बंधु भाव के स्वामी की दशा मे गृह और भूमि का
अधिग्रहण; पुत्र भाव के
स्वामी की दशा मे शिक्षा के क्षेत्र मे प्रग्रति, बच्चो से ख़ुशी; अरि स्वामी की दशा मे शत्रु से खतरा, ख़राब स्वास्थ्य होता है। युवती भाव के स्वामी की दशा
मे जातक की मृत्यु, जातक की पत्नी को
संकट; रंध्र के स्वामी
की दशा मे मृत्यु, वित्तीय घाटा; धर्म भाव के स्वामी की दशा मे शिक्षा के क्षेत्र में
उन्नति, धर्मान्धता, अप्रत्यशित आर्थिक लाभ; कर्म भाव के स्वामी की दशा मे सरकार से मान्यता और
सम्मान; लाभ भाव के
स्वामी की दशा मे धनार्जन मे बाधा, संभवतया रोग; व्यय भाव के स्वामी की दशा मे रोगो से कष्ट और खतरा
होता है।
➤ ग्रह शुभ भाव मे
स्थित हो तो उसकी दशा आने पर दशा मे अनुकूल फल देता है। ग्रह जो अरि, रंध्र, व्यय स्थान मे हो तो अपनी दशा मे प्रतिकूल फल देता
है। इसलिए यह आवश्यक है कि जन्म के समय और दशा के प्रारंभ मे एक ग्रह की स्थिति को दशा प्रभावो के आकलन के लिए ध्यान मे रखा जाना
चाहिये।
● अरि, रन्ध्र, व्यय भाव के स्वामियो की दशा अनुकूल हो सकती है यदि
वे त्रिकोण के स्वामी से जुड़े हो या यदि केंद्र का स्वामी त्रिकोण या त्रिकोण का स्वामी केंद्र
मे हो से युति हो। जिस ग्रह पर केंद्र अथवा त्रिकोण के स्वामियो की दृष्टि हो उसकी
दशा भी अनुकूल होती है। यदि धर्म भाव का स्वामी लग्न मे हो या लग्नेश धर्म भाव मे
हो तो दोनो की दशा अत्यंत लाभकारी, अनुकूल, शुभ, राज्य अधिग्रहण
कारक होती है।
● सहज, अरि, लाभ भाव के
स्वामी और इन तीनो भावो मे स्थित ग्रह, और इनसे युत ग्रह की दशा प्रतिकूल होती है। मारक भाव
(धन, युवती) के स्वामियो से सम्बंधित ग्रह और धन, युवती, रंध्र भावो मे स्थित ग्रहो की दशा प्रतिकूल प्रभाव
देती है। इस प्रकार दशा को एक ग्रह की स्थिति और दूसरे के साथ एक ग्रह के रिश्ते
को ध्यान मे रखते हुए अनुकूल या प्रतिकूल माना जाना चाहिये।
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