ज्योतिष और मानसिक तनाव
ज्योतिष और मनोरोग मानसिक तनाव
मानसिक तनाव बहुत ही
भयानक बीमारी है। मानसिक तनाव का रोगी कई स्तर पर जूझता है मानसिक शारीरिक व
सामाजिक। प्रारम्भ में शरीर से तो व्यक्ति स्वस्थ दिखते हैं लेकिन अंतरिक स्थिति
बहुत दयनीय होती है जो कि धीरे-धीरे शारीरिक व सामाजिक रूप से भी व्यक्ति को
प्रभावित करती है। मानसिक तनाव का पता हम ज्योतिष के माध्यम से भी लगा सकते हैं।
जन्मकुंडली में बारह भाव और नौ ग्रह होते हैं।
ज्योतिष के अनुसार षष्टम
भाव, अष्टम भाव तथा द्वादश भाव
अशुभ होते हैं। इन भावों का सम्बंध शुभ भावों से होने पर उस भाव से सम्बंधित दोष
उत्पन्न हो जाता है । चतुर्थ भाव माता, मातृभूमि, रिश्तेदार,
जमीन, जायदाद, वाहन तथा वाहन सुख,
मानसिक शान्ति, स्वयं की उन्नति, हृदय, औपचारिक शिक्षा, सामान्य सुख, घर तथा खुशी को प्रदर्शित करता है । चतुर्थ भाव का किसी भी
जातक की कुंडली में विशेष महत्व होता है। यह भाव सुख, माता तथा वाहन का होता है। इससे मानसिक शान्ति को भी देखते
हैं। साधारणतया चतुर्थ भाव को ज्योतिषी वाहन, माता, मकान के सुख के
रुप में देखते हैं। पर मानसिक शान्ति (उमदजंस चमंबम) तथा व्यक्ति के स्वभाव (पददमत
चनतपजल) पर भी चतुर्थ भाव का विशेष प्रभाव होता है।
चंद्र, बुध और राहु विश्लेषण
(Mental Disorder : Moon, Mercury and Rahu)
मानसिक रोग को अधिकांशत: पागलपन (Lunatic) मान लिया जाता है, जबकि हकीकत यह है कि मानसिक रोग mental disorder किसी भी स्वस्थ दिखने वाले इंसान को हो सकता है और उसके लक्षण भी सालों तक सामने नहीं आते। ऐसे में ज्योतिष में मानसिक रोग (Mental disorder) की चर्चा करते समय हम न केवल मानसिक रूप से विक्षिप्त जातकों के बारे में बात करेंगे, बल्कि अवसाद और ओबसेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर से लेकर स्किजोफ्रेनिया के आरंभिक लक्षणों तक को शामिल करने का प्रयास करेंगे।
मनोचिकित्सकों (Psychiatrist) और मनोविज्ञानियों (Psychologist) की मानें तो दुनिया का लगभग हर इंसान मानसिक रोग से महज दो प्रतिशत की दूरी पर खड़ा है। मानसिक संतुलन 49 प्रतिशत पर है तो कोई भी व्यक्ति संतुलित दिखाई देता है और यह संतुलन 51 प्रतिशत खराबी पर आए तो इंसान का व्यवहार असंतुलित हो जाता है।
ज्योतिषीय कोण से हमें मानसिक रोग को दो स्तर पर देखना होगा। पहला यह कि क्या जातक में रोग होने के लक्षण विद्यमान हैं और अगर हां तो रोग के लक्षण प्रकट होने की आशंका कब सर्वाधिक है। कोई इंसान अपनी युवावस्था अथवा अधेड़ावस्था तक सामान्य जीवन जीने के बाद भी विक्षिप्त हो सकता है तो कुछ मामलों में बचपन से ही लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
सामान्य तौर पर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (Central nervous system) को चंद्रमा से जोड़ा गया है। अगर किसी जातक की कुण्डली में चंद्रमा कमजोर हो तो उसके अवसाद (Depression) में आने की आशंका बहुत अधिक होती है। दूसरा पक्ष बुध से जुड़ा है। बुध को वाणी और बुद्धि या कहें reasoning यानी तार्किकता का ग्रह माना गया है। बुध के पीडि़त होने पर जातक की सहज सोचने समझने की बुद्धि भ्रष्ट होती है। इन दोनों ग्रहों की स्थिति से जातक में मानसिक रोग के लक्षणों को स्थिर किया जा सकता है। इसके अलावा दूसरे भी कारक हो सकते हैं, जिन पर आगे विस्तार में बात करेंगे।
जब समय की बात हो तो बुध, चंद्रमा और राहु की महादशा, अंतरदशा और प्रत्यंतर में मानसिक रोग के ट्रिगर trigger होने की आशंका सर्वाधिक होती है। यानी मन का कारक चंद्रमा, तार्किकता का कारक बुध और अनिश्चिता का ग्रह राहु ये तीनों अपनी दशा, अंतरदशा और प्रत्यंतरदशा के दौरान रोग के लक्षणों को स्पष्ट उजागर कर सकते हैं अथवा बढ़ा सकते हैं।
जिन जातकों में ज्योतिषीय कोण से रोग के लक्षण मौजूद हों, यानी चंद्रमा खराब हो, उनके जीवन में पूर्णमासी (Full moon) और अमावस्या के दौरान मानसिक विचलन अधिक देखे जाते रहे हैं, ऐसे में कुछ क्षेत्रों में ऐसे जातकों को चांदमारा भी कहा जाता है। अगर मानसिक रोगों को समझना शुरू करना है तो पहले हमें तंत्रिका तंत्र और इसके कारक चंद्रमा को समझना होगा। ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है। यहां मन केवल अधिभौतिक तथ्य नहीं बल्कि मानव जीवन को दैनंदिन प्रभावित करने वाला कारक है।
ज्योतिष में चंद्रमा के मानसिक रोग (Mental Disorder due to Moon)
मन के कारण चंद्रमा को ज्योतिष में सभी विचार का जनक माना गया है। यह तब तक ही शुभफलदायी होता है, जब तक यह शुभ प्रभाव में और शक्तिशाली हो। अगर चंद्रमा दुर्बल है, अगर चंद्रमा अशुभ प्रभाव में है तो जातक को मानसिक रूप से परेशान करता है।
रूपक या कहें Metaphorically समझा जाए तो चंद्रमा को पानी माना जा सकता है। चाहे वह RO का संशोधित पानी हो, नदी का प्रवाहमान जल हो अथवा समुद्र का नमकीन जल Saline water हो। हर प्रकार का जल जो कि गुणों को साथ में लेने के बाद भी अपने स्वरूप को बरकरार रखे, वह चंद्रमा है। अब इस चंद्रमा में कई प्रकार के भेद इसमें शामिल होने वाले गुणों के कारण आते हैं। मूल रूप से द्रव चंद्रमा है, अब जो भी बाह्य वस्तु इसमें शामिल है, वह इसके प्रभाव में परिवर्तन कर देती है।
रक्त में द्रव है, अब चूंकि इस द्रव में रक्त के एलीमेंट मिल गए हैं, तो यह चंद्रमा नहीं रह जाएगा, इसका कारकत्व मंगल के पास चला जाएगा। मंगल के पास भी रक्त का कारकत्व तब तक है, जब तक यह जीवंत है, अगर रक्त पुराना है और मृत है, तो यह मंगल नहीं रह जाएगा, तब यह विकृत चंद्रमा होगा।
इसी तरह सुगंधित जल या कहें शर्बत में मूल रूप से चंद्र का द्रव है, लेकिन चूंकि इसमें पृथ्वीतत्व की गंध आ मिली है, ऐसे में यह शुक्र का पदार्थ बन जाता है। यह शुक्र का पदार्थ तब तक रहेगा, जब तक सुगंध बनी रहेगी, जैसे ही द्रव में से सुगंध निकल जाएगी, यह फिर से चंद्रमा का द्रव बन जाएगा।
नदी का निर्मल जल, जिसमें पहाड़ों और नदी किनारों की धूल और लवण शामिल है, शुद्ध चंद्रमा के हिस्से ही आएंगे, लेकिन जैसे ही इस जल में मूल मूत्र अथवा गंदे नाले का पानी शामिल होता है, यह शुक्र और राहु के पास चला जाता है, तब इसे चंद्र मूल नहीं मान सकते।
इस प्रकार हम देखते हैं कि चंद्र तब तक चंद्र के मूल स्वरूप में है, जब तक द्रव की संरचना में किसी प्रकार का विचलन नहीं हुआ होता है। जैसे ही संरचना बदलेगी, चंद्र भी नदारद हो जाएगा।
कुण्डली में भी चंद्रमा सदैव अकेला नहीं होता है, सदैव शुभ प्रभाव में नहीं होता है। जब यह सूर्य के साथ होगा, तो अपने विपरीत प्रभाव वाले ग्रह के साथ होगा, ऐसे में सूर्य और चंद्रमा साथ में होने पर जातक में भी ऐसा ही द्विस्वभाव दिखाई देता है। बुध के साथ होने पर चंद्रमा शुभता को प्राप्त करता है, लेकिन चूंकि बुध की चंद्रमा से नैसर्गिक शत्रुता है, ऐसे में यहां बुध पीडि़त हो जाएगा। पीडि़त बुध और मानसिक रोग पर हम आगे चर्चा करेंगे। लेकिन चंद्रमा के कारण से यहां पीड़ा नहीं होगी। गुरू के साथ चंद्रमा गजकेसरी जैसा राजयोग कारक योग बनाता है, चंद्रमा के साथ मंगल होने पर लक्ष्मी योग बनता है और शुक्र होने पर भी अनुकूलता मिलती है। चंद्रमा अगर राहु, केतुु, शनि और स्वयं क्षीण हो तो कष्टदायक होता है।
चंद्रमा की स्थिति और प्रभाव (Moon’s position for Mental Disorder)
अगर चंद्रमा अकेला और क्षीण हो तो जातक को भीतर से खाली–खाली महसूस होता है। विचारों में विविधता नहीं होती। अगर लग्न में ऐसा क्षीण चंद्रमा हो तो जातक में कुछ सनक (Craze) की मात्रा भी होती है। अगर यहां पर चंद्रमा किसी क्रूर ग्रह द्वारा पीडि़त भी हो रहा हो तो यह सनक कुछ अधिक हो जाती है। ऐसे जातकों में मानसिक रोग होने की आशंका सर्वाधिक होती है। जरूरी नहीं है कि हर बार मानसिक रोग हो ही, लेकिन बहुत से मामलों में होने की आशंका बलवती रहती है। कह सकते हैं कि ऐसे जातक में मानसिक रोग के बीज होते हैं, अब अगर प्रतिकूल परिस्थितियां मिलें तो ये बीज पेड़ का रूप ले लेते हैं।
चंद्रमा अगर राहु के साथ हो तो विचार शृंखला (Thought process) को प्रभावित करता है। विचारों को प्रवाह को रोकता नहीं है, बल्कि प्रवाह को पथभ्रष्ट कर देता है।
अगर चंद्र शनि के साथ अथवा शनि की दृष्टि में हो तो विचार प्रवाह या तो नकारात्मक (Negative thoughts) रहता है, अथवा विचार संदमित रहते हैं। ऐसे जातकों के डिप्रेशन में आने की आशंका सर्वाधिक होती है।
अगर चंद्र केतुु के साथ हो तो जातक के स्वभाव में चिड़चिड़ापन (Irritating) लेकर आता है। ऐसा जातक किसी एक काम को सालों तक करते हुए सहज रह सकता है, लेकिन काम में होने वाले प्रतिकूल बदलाव या परिस्थितियों में होने वाले प्रतिकूल बदलाव ऐसे जातक को पूरी तरह हिलाकर रख देते हैं।
बुध की स्थिति और प्रभाव (Mercury and it’s effect on Mental Depression)
सभी प्रकार के जातक इमोशंस पर चलने वाले नहीं होते, कुछ बहुत ही बुद्धिमान और तार्किक rational होते हैं। तर्कण का आधार लेकर जीवन जी रहे जातकों की कुण्डली में अगर बुध प्रभावित हो तो मानसिक रोग होने की आशंका प्रबल होती है। ऐसे लोग अपने जीवन का बड़ा भाग बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से जी रहे होते हैं कि किसी घटना अथवा स्थिति के ठीक बाद अचानक इनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। ऐसा सामान्य तौर पर बुध पर राहु की दृष्टि, बुध के साथ राहु की युति अथवा छठे भाव और बुध का संबंध होने की स्थिति में होता है। इसके अलावा चंद्रमा और बुध की युति के दौरान अगर चंद्रमा पीडि़त हो रहा हो तो भी ऐसी स्थिति बनना संभव है।
राहु की दशा के कारण (Rahu Mahadasha and Depression)
राहु की दशा के दौरान भी जातक की मनोस्थिति खराब रहती है। चंद्रमा की बेहतर स्थिति और बुध के अप्रभावित होन के बावजूद भी राहु की महादशा के दौरान अनिश्चितता (uncertainty) का ऐसा माहौल बनता है कि जातक की सहज बुद्धि उसका साथ छोड़ देती है। इसका परिणाम ऐसा होता है कि सामान्य परिस्थितियां दिखाई देने के बावजूद जातक का व्यवहार असामान्य हो जाता है। इस दौर में केवल बहुत अधिक शक्तिशाली बुध और बहुत अनुकूल चंद्रमा वाले जातक ही बच पाते हैं। अगर राहु लाभकारी स्थितियों में हो तो भी राहु की दशा के दौरान प्रतिकूल प्रभाव कम दिखाई देता है, लेकिन कुछ असर बना रहता है।
उपरोक्त स्थितियां बहुत साधारण स्थितियां हैं, इन्हें देखने पर आसानी से निर्णय किया जा सकता है कि जातक का मानसिक संतुलन किस प्रकार का है। परन्तु इन स्थितियों के इतर भी बहुत से योग और कारण ऐसे होते हैं, जिनका वर्णन किसी एक विशेष कोण से किया जाना संभव नहीं होता। मसलन कन्या लग्न के जातकों की विश्लेषण क्षमता गजब की होती है, लेकिन जिस दौर में कन्या के जातक किसी विशेष विचार शृंखला में फंस जाएं, तो उनका व्यवहार मानसिक रोगियों जैसा हो जाता है।
केतुु की दशा के दौरान एक ही काम में लगा जातक सामान्य व्यवहार करता है, लेकिन जैसे ही अनिश्चितता का माहौल बनता है, उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ने की आशंका बलवती हो जाती है।
कुण्डली में उच्च का चंद्रमा अथवा लग्न में चंद्रमा होने के बावजूद मैंने निजी तौर पर कई कुण्डलियों में मानसिक रोगी देखे हैं।
गंडमूल नक्षत्रों में पैदा हुए जातक अतिमहत्वाकांक्षी (Too ambitious) होते हैं, अगर इन्हें विकास करने अथवा सैटल होने का समय पर रास्ता मिल जाता है तो ये नॉर्मल रहते हैं, लेकिन यदि किन्ही कारणों से इनके प्रयास विफल चले जाएं अथवा आगे बढ़ने के रास्ते बंद हो जाएं तो इनका मानसिक संतुलन बिगड़ने की प्रबल आशंका रहती है।
इन स्थितियों के इतर भी मानसिक अथवा स्नायु रोग (Neurological disorder) की कई स्थितियां देखी जाती हैं, जिनका किसी विशेष योग अथवा ग्रह की स्थिति से निर्धारण करने क बजाय पूरी कुण्डली का विश्लेषण करने से ही पता चलता है कि रोग के कारण क्या हैं और ऐसे मानसिक रोगियों की किस प्रकार मदद की जा सकती है।
डिप्रेशन, ऑब्सेसिस कंपल्सिव डिसऑर्डर (OCD), फ्रस्ट्रेशन जैसे मानसिक रोगों में ज्योतिषीय उपचारों से बहुत हद तक मदद की जा सकती है, हालांकि इनमें भी पूरी तरह मुख्य चिकित्सा पद्धतियों को अनदेखा कर केवल ज्योतिष के भरोसे उपचार नहीं किया जाना चाहिए, फिर भी मदद की जा सकती है।
स्किजोफ्रेनिया Schizophrenia, मल्टीपल स्केलेरोसिस Multiple sclerosis, एक्यूट डिप्रेशन, आत्महंता प्रवृत्ति Suicidal tendencies आदि मामलों में ज्योतिषीय उपचार सामान्यत: बहुत मदद नहीं कर पाते हैं, ऐसे मामलों में पहले चिकित्सा की मदद ली जाए और बाद में ज्योतिषी से संपर्क किया जाए तो बेहतर है।
साधारणतया जब छठे भाव का
स्वामी चतुर्थ भाव में हो तो व्यक्ति मन, वचन तथा कर्म से चोर प्रवृत्ति को धारण करता है। चतुर्थ भाव में जब पापी ग्रह
हों तथा चतुर्थ भाव के स्वामी को पापी ग्र्रह देखते हां या उसके साथ युति सम्बंध
बनाते हों तो व्यक्ति दुष्ट प्रकृति का तथा दूसरों को धोखा देने वाला होता है।
इससे व्यक्ति की मानसिक शांति पूरी तरह नष्ट हो जाती है जो उस पर मानसिक दबाव
बनाती है जो कि अन्ततः ब्लड प्रेशर, हदय सम्बंधी तथा अन्य रोगों को जन्म देती है।
ज्योतिष में राहु और केतु
को छाया ग्रह का नाम दिया गया है। जब राहु चतुर्थ भाव में और केतु दसवें भाव में
होता है तो यह स्थिति माता, मन और मकान के
लिए पीड़ादायक होती है, जातक को मानसिक
रूप से भटकाव देती है। चतुर्थ भाव के स्वामी के अतिरिक्त चतुर्थ भाव के कारक ग्रह
भी व्यक्ति की मानसिक स्थिति को प्रभावित करते हैं। चतुर्थ भाव के चार कारक ग्रह
चंद्रमा, बुध, शुक्र तथा मंगल हैं। चतुर्थ भाव को समझने के
लिए हमें चन्द्रमा, बुध, शुक्र तथा मंगल की स्थिति को समझना होगा।
चंद्रमा मन का कारक है। चंद्रमा माता का भी कारक ग्रह है।
जब कुंडली में चन्द्रमा
नीच का या फिर दुष्ट प्रभाव में होता है साथ ही चतुर्थ भाव का स्वामी भी दुष्ट
प्रभाव में हो तो व्यक्ति मातृ सुख से वंचित रहता है। जब चन्द्रमा दुष्ट प्रभाव
में होता है तो जातक की माता से उसे किसी भी तरह का सुख नहीं मिलता तथा कभी-कभी
माता ही उसकी दुश्मन बन जाती है जिसके कारण व्यक्ति में बचपन से ही मानसिक
तनाव/विकार विकसित होने लगता है। यदि चन्द्रमा तथा बुध कुंडली में पूरी तरह से
दुष्ट प्रभाव में हो तो व्यक्ति मानसिक रोगी भी हो सकता है।
बुध बुद्धि के साथ कुछ
संवेगों जैसे हास्य व्यंग्य का भी कारक होता है । मंगल भूमि का कारक होता है। यदि
जातक की कुंडली में मंगल चतुर्थ भाव में दुष्ट प्रभाव में है तो भी व्यक्ति की
जमीन जायदाद के कारण मानसिक शांति प्रभावित होती है। शुक्र को भी चतुर्थ भाव का
कारक माना जाता है। शुक्र चतुर्थ भाव में वाहन सुख साधनों को प्रदर्शित करता है।
यदि जातक की कुंडली में शुक्र पाप प्रभाव में हो तो व्यक्ति की मानसकि शांति वाहन
तथा अन्य भौतिक सुख-सुविधा के साध् ानों के कारण प्रभावित होती है। शुक्र जीवन
साथी का भी कारक है। संक्षेप में, जातक मानसिक
शांति, भौतिक सुख-साधनों को तभी
भोग सकता है जबकि उसका चतुर्थ भाव तथा चतुर्थ भाव का स्वामी तथा कारक ग्रह किसी भी
दुष्ट प्रभाव में न हों। शुभ ग्रहों का प्रभाव चतुर्थ भाव में होने से व्यक्ति खुश
मिजाज, मिलनसार और उत्साह से
परिपूर्ण होता है तथा माता, वाहन, मकान तथा भौतिक सुखों की प्राप्ति करता है।
व्यक्ति अच्छे चरित्र का तथा मानसिक रुप से संतुलित होता है ।
डिप्रेशन
दे सकता है केतु
डिप्रेशन
दे सकता है केतु राहु-केतु को ज्योतिष में छाया ग्रह की
संज्ञा दी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार राहु को असुर का ऊपरी धड़ और केतु को
पूँछ का हिस्सा माना जाता है। इस तरह से विचार किया जाए तो केतु ग्रह के पास मस्तिष्क
नहीं है अर्थात यह जिस भाव में या जिस ग्रह के साथ रहता है, उसी के
अनुसार फल देने लगता है। केतु का सीधा प्रभाव मन से है अर्थात केतु की निर्बल या
अशुभ स्थिति चंद्रमा अर्थात मन को प्रभावित करती है और आत्मबल कम करती है। केतु से
प्रभावित व्यक्ति अक्सर डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। भय लगना, बुरे
सपने आना, शंकालु वृत्ति हो जाना भी केतु के ही
कारण होता है। केतु और चंद्रमा की युति-प्रतियुति होने से व्यक्ति मानसिक रोगी हो
जाता है। व्यसनाधीनता बढ़ती है और मिर्गी, हिस्टीरिया जैसे रोग होने की आशंका बढ़
जाती है। केतु प्राय: लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, दशम व व्यय में होने से अच्छा फल नहीं
देता। तृतीय, पंचम, षष्ठ, नवम व एकादश में केतु अच्छा फल देता
है। साथ ही मेष, वृषभ, मिथुन, कन्या, धनु व मीन राशि में केतु अच्छा फल देता
है। ज्योतिष में राहु-केतु को छाया ग्रह की संज्ञा दी जाती है। पौराणिक कथा के
अनुसार राहु को असुर का ऊपरी धड़ और केतु को पूँछ का हिस्सा माना जाता है। इस तरह
से केतु के पास मस्तिष्क नहीं है अर्थात जिस ग्रह के साथ रहता है, उसी
अनुसार फल देने लगता है। यदि किसी कुंडली में केतु अशुभ भाव में बैठा हो तो उसका
उपाय करना आवश्यक है अन्यथा व्यक्ति को ताउम्र परेशानियों का सामना करना पड़ सकता
है। शांति के उपाय 1. केतु से बचने का सबसे अच्छा उपाय है
हमेशा प्रसन्न रहना, जोर से हँसना... इससे केतु आपके मन को
वश में नहीं कर पाएगा। 2. प्रतिदिन गणेशजी का पूजन-दर्शन करें। 3. मजदूर, अपाहिज
व्यक्ति की यथासंभव मदद करें। 4. लहसुनिया पहनने से भी केतु के अशुभ
प्रभाव में कमी आती है। 5. काले, सलेटी रंगों का प्रयोग न करें। 6. लोगों
में उठने-बैठने, सामाजिक होने की आदत डालें।
हर व्यक्ति की जन्म कुंडली ऐसे कई संकेत देती है जिससे पता चल सकता है कि व्यक्ति कैसे बीमार पड़ सकता है। सभी चंद्र राशियों के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष होते हैं, लेकिन जल तत्व की राशियों को मानसिक बीमारी होने का खतरा अधिक होता है।
जल तत्व की राशियां बहुत सहानुभूतिपूर्ण और दूसरों का भला चाहने वाली होती हैं। जल तत्व की राशियों पर यदि कुंडली में कोई बुरा प्रभाव हो तो यह अवसाद, चिंता, दवा या शराब की लत, बाईपोलर बीमारी या सिज़ोफ्रेनिया का कारण बन सकता है।
ज्योतिष विज्ञान, विज्ञान की शाखाओं में से एक है और यह व्यक्ति को खुद के बारे में जानने और जीवन का मूल्यांकन करने में मदद करता है। यह हमें पारिवारिक जीवन के बारे में, वित्तीय और स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में जानकारी देता है, हमारा भाग्य कैसा होगा इसकी भविष्यवाणी करता है, प्रयासों के लिए सही दिशा प्रदान करता है और बेहतर भविष्य के लिए कर्मों को बेहतर बनाने के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। ज्योतिष विज्ञान व्यक्ति के सभी प्रश्नों का उत्तर दे सकता है और उसे मार्गदर्शन कर सकता है कि उसके लिए क्या अच्छा है और उसे क्या सावधानी बरतनी चाहिए। आपको बता दें कि कुंडली में चंद्रमा, बुध और बृहस्पति मानसिक स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार होते हैं। जब ये ग्रह जन्म कुंडली के पांचवें और छठे भाव में किसी भी तरह से पीड़ित होते हैं तब मानसिक बीमारी होने की संभावना अधिक होती है।
चंद्रमा मन और व्यक्ति की बुद्धि को नियंत्रित करता है और यदि किसी की कुंडली में चंद्रमा पीड़ित है तो यह मानसिक उत्तेजना या अवसाद का कारण बनता है। बुध पूरे तंत्रिका तंत्र, संचार, सक्रिय सोच प्रक्रियाओं, बुद्धिमत्ता को नियंत्रित करता है और यदि कुंडली में बुध अनुकूल नहीं है तो यह मानसिक असंतुलन का कारण बन सकता है। मिथुन राशि तर्क को दर्शाती है और कर्क राशि भावनाओं को दर्शाती है। यह दोनों राशियां यदि पीड़ित हों तो, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह मानसिक विकार का कारण बन सकते हैं। मानसिक स्थिति का पूरा आकलन चंद्रमा (मन की स्थिरता), बुध
(तंत्रिका तंत्र) और बृहस्पति (परिपक्वता / ज्ञान / नैतिक मूल्य) द्वारा किया जा सकता है। जब यह तीनों ग्रह किसी व्यक्ति की कुंडली में पीड़ित होते हैं तो मानसिक बीमारी होने की संभावना अधिक होती हैं। पंचम भाव सीखने, शिक्षा, तर्क और ज्ञान का कारक माना जाता है वहीं छठा घर मानसिक क्षमता और विचार प्रक्रिया को संदर्भित करता है। पांचवें घर में बृहस्पति की स्वराशि या मित्र राशि में उपस्थिति, सर्वश्रेष्ठ परिणाम देती है लेकिन इस पर किसी क्रूर ग्रह का प्रभाव न हो खासकर एकादश भाव से। पांचवें घर में बृहस्पति की उपस्थिति से छात्र उच्च रैंक प्राप्त करने में सफल होते हैं। अपनी राशि कन्या में छठे भाव में राहु की उपस्थिति व्यक्ति को सबसे कुशल व्यवसायी और बुद्धिजीवी बनाती है। वहीं कुंडली के छठे भाव में शनि यदि तुला राशि में हो तो यह व्यक्ति को उच्च बौद्धिक स्तर देता है।
कुंडली के पहले घर (मस्तिष्क का कारक) में विराजमान ग्रह भी मानसिक स्वास्थ्य में समान रूप से योगदान देता है। एक नियम के अनुसार हर भाव पर उसके सातवें भाव का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इसलिए प्रथम और सप्तम, पंचम और एकादश, षष्ठम और द्वादश घरों में स्थित ग्रहों की स्थिति का आकलन गंभीरता से किया जाना चाहिए। मनोवैज्ञानिक विकार के मामलों से संबंधित कई कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद प्राप्त परिणामों के आधार पर, निष्कर्षों को व्यवस्थित रूप से नीचे संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है। यह निष्कर्ष लोगों की मदद कर सकते हैं। यदि किसी की कुंडली में मानसिक विकार के लक्षण दिखते हैं तो वो समय पर रोकथाम शुरू कर सकते हैं और उपाय ढूंढ सकते हैं।
1. पीड़ित चंद्रमा के कारण मनोवैज्ञानिक विकार
चंद्रमा के पीड़ित होने पर मानसिक समस्याएं होती हैं। ये मानसिक असामान्यताओं से लेकर न्यूरो-साइकोटिक विकारों तक कई तरह की हो सकती हैं। जब चंद्रमा कमजोर स्थिति मे छठे, आठवें और बारहवें घर में होता है और इस पर किसी क्रूर ग्रह का प्रभाव भी होता है तो यह पीड़ित माना जाता है।
सूर्य से पीड़ित चंद्रमा व्यक्ति को झगड़ालू, आत्म आलोचक बनाता है।
मंगल द्वारा पीड़ित चंद्रमा व्यक्ति को आक्रामक बनाता है और उसे हिंसक भी बना सकता है।
शनि से पीड़ित चंद्रमा तीव्र अवसाद, उन्माद पैदा कर सकता है।
राहु द्वारा पीड़ित चंद्रमा सिज़ोफ्रेनिया, फोबिया और आत्महत्या को प्रेरित कर सकता है।
केतु द्वारा पीड़ित चंद्रमा आत्मघाती प्रवृत्ति और तर्कहीन व्यवहार का कारण बनता है।
बुध से पीड़ित चंद्रमा अवसाद, अलगाव और आत्महत्या की प्रवृत्ति का कारण बनता है।
डिप्रेशन, पीड़ित चंद्रमा से जुड़ी एक बहुत ही आम समस्या है। स्थिति और भी खराब हो सकती है यदि चंद्रमा प्रथम भाव में किसी शत्रु राशि में विराजमान हो और व्यक्ति चंद्रमा की दशा से गुजर रहा हो। रोगी की स्थिति में अमावस्या और पूर्णिमा की रात में बड़े परिवर्तन देखने को मिलते हैं। बृहस्पति यदि चंद्रमा के साथ कर्क राशि में हो तो व्यक्ति अत्यधिक भावुक होता है। कर्क राशि में चंद्रमा, अति उत्साह और बार-बार मूड स्विंग की स्थिति पैदा करता है। छठे, आठवें और बारहवें घर में चंद्रमा की उपस्थिति असामयिक मृत्यु की ओर भी इशारा करती है।
2. पीड़ित बुध के कारण मनोवैज्ञानिक प्रभाव
स्वस्थ तंत्रिका तंत्र के लिए कुंडली में बुध का अच्छी स्थिति में होना अनिवार्य होता है, क्योंकि यह तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित करता है। कुंडली में बुध-शनि के संयोजन से नर्वस ब्रेकडाउन की भविष्यवाणी आसानी से की जा सकती है। यदि बुध कमजोर हो या किसी भी ग्रह से पीड़ित हो तो अक्सर वाणी विकार होता है। कमजोर या वक्री बुध यदि पांचवें घर में हो तो यह पागलपन, मानसिक समस्याओं या खराब रिफ्लेक्स का कारण बन सकता है।
3. पीड़ित शनि के कारण मनोवैज्ञानिक प्रभाव
शनि एक न्याय प्रिय ग्रह है जो मुश्किल परिस्थितियों, बुरे समय में मानव शक्ति का मूल्यांकन करता है। यह हमारे कार्यों का आकलन करता है और कुंडली के अनुसार जब यह किसी भी दशा या महादशा में आता है तो हमारे कर्मों के अनुसार हमें फल देता है। कुंडली में यदि शनि अकेले या राहु के साथ प्रथम और द्वितीय भाव में विराजमान हो तो यह व्यक्ति को ड्रग्स, धूम्रपान, तंबाकू या शराब का आदी बना देता है। शत्रु राशि में विराजमान शनि आसानी से व्यक्ति को अविवेकी, अमानवीय व्यवहार करने वाला, अनैतिक बना देता है। प्रथम भाव में शनि और पांचवें, सातवें या नौवें स्थान पर मंगल विक्षिप्त व्यवहार की ओर ले जाता है। बारहवें घर में चंद्रमा के साथ शनि भी व्यक्ति के पागलपन का कारण बन सकता है। सूर्य के साथ मिलकर शनि आक्रामक व्यवहार, चिंता, अलगाव और मनोवैज्ञानिक विकारों की ओर ले जाता है। शनि आठवें घर में बुरे परिणाम देता है।
4. पीड़ित शुक्र के कारण मनोवैज्ञानिक प्रभाव
शुक्र मुख्य रूप से व्यक्ति के यौन व्यवहार को दर्शाता है। शुक्र कन्या राशि में नीच का माना जाता है और कुंडली के छठे घर में भी यह अच्छा नहीं माना जाता है। यह कर्क राशि में अति उत्साह को दर्शाता है। शनि, केतु और राहु द्वारा पीड़ित होने पर शुक्र यौन व्यवहार को प्रभावित करता है।
सूर्य द्वारा शुक्र के पीड़ित होने पर यौन इच्छा बहुत बढ़ जाती है। चंद्रमा द्वारा शुक्र के पीड़ित होने पर यौन इच्छा बहुत कम हो जाती है। शुक्र के राहु-केतु और शनि द्वारा पीड़ित होने पर यौन कुंठा में वृद्धि होती है। शनि, केतु और राहु से पीड़ित शुक्र के कारण व्यक्ति का नैतिक पतन भी संभव है। ऐसे लोगों में यौन कुंठा के कारण मानसिक विकार भी हो सकते हैं और यह बेवजह की चिंताओं का कारण भी बन सकता है। ऐसे लोग कई लोगों के साथ यौन संबंध बनाने के इच्छुक होते हैं, बलात्कार की प्रवृत्ति या अपराधी कामों में भी ऐसे लोग शामिल होते हैं। इस संयोजन के साथ-साथ सूर्य की उपस्थिति भी हो तो यह यौन इच्छा को आगे बढ़ाता है। शुक्र और राहु का संयोजन व्यक्ति को यौन इच्छाओं का गुलाम बना देता है, कन्या राशि में यह युति व्यक्ति को सभी नैतिक सीमाओं को पार करवा सकती है और समलैंगिक व्यवहार भी करवा सकती है। इसके साथ ही, सूर्य का प्रभाव, बृहस्पति और बुध की अशुभ स्थिति आगे चलकर हालात को और भी बिगाड़ सकती है। शुक्र पर राहु के प्रभाव से यौन रूप से व्यक्ति को असंतोष होता है, यौन रोग होने की भी संभावना होती है और व्यक्ति अपने स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
5. पीड़ित मंगल के कारण मनोवैज्ञानिक प्रभाव
मनुष्य के साहस, निष्ठा, ऊर्जा और खेलकूद पर मंगल का बड़ा प्रभाव होता है। मंगल के प्रतिकूल प्रभाव से पुरानी बीमारियां बार-बार परेशान कर सकती हैं और शारीरिक बीमारियां हो सकती हैं। पहले, तीसरे, पांचवें घर में मंगल और राहु की युति के चलते व्यक्ति का झुकाव आपराधिक कामों में हो सकता है या वह आतंकवादी हो सकता है। अगर मंगल, शनि और राहु, चंद्रमा और बुध पर बुरा प्रभाव डालते हैं या पांचवें, छठे और आठवें भाव पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं तो गंभीर मानसिक विकारों से व्यक्ति को जूझना पड़ सकता है। प्रत्येक सामान्य मनुष्य अपने जीवनकाल के दौरान मंगल या शनि के प्रभाव के कारण किसी मानसिक परेशानी से जूझ सकता है, लेकिन इसका ज्यादा बुरा प्रभाव कुछ मामलों में ही होता है। मंगल और शनि के संयोजन से व्यक्ति का व्यवहार अलगाववादी, कठोर और असामाजिक हो जाता है।
6. पीड़ित राहु, केतु का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
राहु सोच और कल्पना को प्रभावित करता है। यदि कुंडली में प्रथम भाव का स्वामी कमजोर अवस्था में हो या शत्रु राशि में छठे, आठवें और बारहवें भाव में हो तो व्यक्ति भयग्रस्त हो सकता है और नकारात्मक शक्तियों से संपर्क की शिकायत कर सकता है। यह तब होता है जब राहु पहले घर में विराजमान होता है या प्रथम भाव का स्वामी किसी भाव में राहु के साथ युति करता है। राहु और चंद्रमा का संयोजन भी समान परिणाम देता है। कुंडली में राहु / केतु / शनि / सूर्य यदि द्वितीय भाव में हों तो ऐसे व्यक्ति “वाणी दोष” से परेशान हो सकते हैं। ऐसे लोग अपनी वाणी से लोगों को आहत कर सकते हैं। यह व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन को बहुत आसानी से बर्बाद कर सकता है और अवसाद की ओर ले जा सकता है। राहु और केतु पांचवें स्थान में विराजमान हों तो व्यक्ति अतार्किक, तर्कहीन बकबक करता है। आठवें घर में विराजमान राहु व्यक्ति को ऐसा रोग दे सकता है जिसका आसानी से पता नहीं चलता या जिसका निदान मुश्किल होता है।
7. पीड़ित बृहस्पति और सूर्य का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
कुंडली में बृहस्पति की अनुकूल स्थिति कई मानसिक विकारों को दूर कर सकती है। वक्री स्थिति में या प्रतिकूल स्थिति और छठे, आठवें, बारहवें घर में इसकी स्थिति कई अप्राकृतिक समस्याओं, मनोवैज्ञानिक / तंत्रिका संबंधी विकार और भय पैदा कर सकती है। यदि कुंडली में या वर्षफल में ऐसी स्थिति हो तो धार्मिक स्थलों, मंदिर आदि में जाना अनुकूल नहीं माना जाता। दूसरे भाव में सूर्य व्यक्ति को अहंकारी बना सकता है और अति आत्मविश्वास दे सकता है। यदि सूर्य कन्या या मिथुन राशि में हो तो व्यक्ति अति उत्साही हो सकता है। कुंडली में सूर्य यदि छठे और बारहवें स्थान में हों तो व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी देखी जा सकती है।
मनोवैज्ञानिक विकार के उपाय:
मनोवैज्ञानिक विकारों के कई ज्योतिषीय उपाय हैं। इन उपायों के तरीकों और महत्व को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ हम आपको मन की शांति के लिए ज्योतिषीय उपाय बताने जा रहे हैं। कुछ उपाय इस प्रकार हैं:
पीड़ित ग्रहों की पूजा और मंत्रों के जाप।
मानसिक तनाव को दूर रखने के लिए चंद्रमा यंत्र को स्थायी रूप से पहनें।
चांदी और अन्य संबंधित धातुओं का दान यह आपके मानसिक तनाव को दूर करने में मदद करेगा।
नियमित रूप से भगवान सूर्य, चंद्रमा और बुध की पूजा फूल, मिठाई और धूप से करें।
मानसिक तनाव के लिए जिम्मेदार ग्रह को प्रसन्न करने के उपाय करें।
पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव की पूजा करना सबसे अच्छे ज्योतिषीय उपाय में से एक है।
ओम श्री गणेशाय नमः का जप करने से आपको सभी मानसिक तनावों से राहत मिलेगी।
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