ताजिक ज्योतिष एवं वर्षफल
ताजिक ज्योतिष एवं वर्षफल कैसे तैयार किया जाता है और मुंथा की कौन सी स्थिति कैसी होती है
आज जानिएताजिका ज्योतिष , या ताजिका शास्त्र , अर्थात्, ज्योतिष की ताजिका प्रणाली , भारतीय ज्योतिष की तीन प्रणालियों में से एक है, जैसा कि व्यक्तिगत चार्ट (कुंडली) पर लागू होता है। [1] अन्य दो प्रणालियाँ पारासरी और जैमिनी प्रणालियाँ हैं। ताजिका शब्द (शायद उर्दू मूल [1] ) का अर्थ है एक अरब या फारसी [2] [3]और यह भारत में ज्योतिष की इस प्रणाली के विकास के इतिहास को इंगित करता है। ज्योतिष की इस प्रणाली की उत्पत्ति अरब/फारसी दुनिया में हुई होगी। 7वीं शताब्दी के बाद से, उत्तर-पश्चिम भारत के अरब आक्रमणों के साथ, या अरबों, अर्मेनियाई और फारसियों के साथ भारतीय व्यापारिक व्यापार के साथ, ताजिका ज्योतिष का ज्ञान भारत में आया। 1544 ईस्वी में, श्रीमद अनंत दैवज्ञ के पुत्र एक भारतीय विद्वान नीलकंठ ने अपने पाठ " ताजिका नीलकंठी " में इस प्रणाली का अरबी / फारसी से संस्कृत में अनुवाद किया । [4]
ताजिका प्रणाली किसी व्यक्ति के जीवन के एक वर्ष में होने वाली संभावित घटनाओं के बारे में विस्तार से भविष्यवाणी करने का प्रयास करती है। सिस्टम इस तरह के विवरणों तक जाता है जैसे कि दिन-प्रतिदिन या आधे दिन के आधार पर भी घटनाओं की भविष्यवाणी करना। इस कारण इस प्रणाली को वर्णाफल प्रणाली भी कहा जाता है । वर्षाफल शब्द का अर्थ है सौर वापसी के क्षण में ग्रहों के एक वर्ष के लिए परिणाम, प्रभाव या परिणाम। जांच के तहत एक वर्ष उस समय शुरू होता है जब सूर्य उसी देशांतर पर लौटता है जैसा कि व्यक्ति के जन्म के समय था। इस क्षण को सौर वापसी का क्षण कहा जाता है। सौर वापसी के एक क्षण के बीच की अवधि सौर वापसी के अगले क्षण तक की अवधि एक वार्षिक चार्ट या वर्ण-कुंडली द्वारा कवर की गई अवधि है।. इस तरह के एक वार्षिक चार्ट का निर्माण हर साल किया जाना था और विस्तार से जांच की गई थी।
व्यय, पदोन्नति, स्थानांतरण, यात्रा, कैरियर में वृद्धि और गिरावट, कारावास, मृत्यु, आदि। यह कहना सही है कि ताजिका वह नहीं दे सकती जो जन्म कुंडली वादा नहीं करती है। यह कहना सही है कि ताजिका अधिक स्पष्टता के साथ बताती है कि किस वर्ष जन्म कुंडली का वादा पूरा होगा। इस प्रकार ताजिका प्रकृति में पूरक, पूरक और पुष्टिकारक है।"[1]
ताज़िक ज्योतिष
सहम के द्वारा घटना के समय का ज्ञान
सहम फलित ज्योतिष के लिए ताज़क ज्योतिष का विशिष्ट योगदान है। मानव जीवन के विविध पक्षों के सम्बन्ध में वर्ष विशेष में फल की प्राप्ति कब होनी है, इसका निर्धारण सहम से किया जाता है। सहम शब्द का शाब्दिक अर्थ है, ‘आशंका करना’ या ‘डरना’। इस प्रकार जीवन के जिन पक्षों के विष्य के सम्बन्ध में व्यक्ति आशंकित रहता है, डरा रहता है अर्थात् सहमा रहता है, उन्हें ही सहम के अन्तर्गत सम्मिलित कर ताज़क ज्योतिष में सहम की अवधारणा की गई है।
सहम के प्रकार
ता़जकशास्त्र में सहम के प्रकारों या संख्या के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं। गणेश दैवज्ञ ने 19, केशव ने 25 सहम एवं आचार्य नीलकण्ठ ने 50 सहमों का उल्लेख किया है।
आचार्य नीलकण्ठ ने निम्नलिखित 50 प्रकार के सहम बताएँ हैं :
1. पुण्य सहम, 2. गुरु सहम, 3. ज्ञान (विद्या) सहम, 4. यश सहम, 5. मित्र सहम, 6. माहात्म्य सहम, 7. आशा सहम, 8. समर्थता या सामर्थ्य सहम, 9. भ्रातृ सहम, 10. गौरव सहम, 11. राज सहम, 12. पिता या तात सहम, 13. माता या मातृ सहम, 14. पुत्र सहम,15. जीवन सहम, 16. जल सहम, 17. कर्म सहम, 18. रोग सहम, 19. काम या मन्मथ सहम, 20. कलि सहम, 21. क्षमा सहम, 22. शास्त्र सहम, 23. बन्धु सहम, 24. बन्दक सहम, 25. मृत्यु सहम, 26. परदेश सहम, 27. धन सहम, 28 परदारा या परस्त्री सहम, 29. परकर्म सहम, 30. वणिक, 31. कार्यसिद्धि सहम, 32. विवाह सहम, 33. प्रसूति या प्रसव सहम, 34. सन्ताप सहम, 35. श्रद्धा सहम, 36. प्रीति सहम, 37. बल सहम, 38. देह सहम, 39. जाड्य सहम, 40. व्यापार (हानि-लाभ) सहम, 41. पानीयपात सहम, 42. शत्रु सहम, 43. शौर्य सहम, 44. उपाय सहम, 45. दरिद्र सहम, 46. गुरुता सहम, 47. जलपथ सहम,48. बन्धन सहम, 49. कन्या सहम, 50. अश्व सहम।
सहम साधन
सहम साधन के लिए निम्नलिखित उपकरणों की आवश्यकता होती है :
1. वर्षप्रवेशकालिक ग्रहस्पष्ट एवं लग्न स्पष्ट (शोध्य या शोधक के रूप में)
2. वर्षप्रवेशकालिक भावस्पष्ट (शोध्य, शोधक या शुद्धाश्रय के रूप में)
3. वर्षप्रवेशकालिक समय (वर्षप्रवेश दिवा अथवा रात्रि में है, को निर्धारित करने हेतु)
4. वर्षप्रवेशकालिक दिनांक के सूर्योदय एवं सूर्यास्त।
5. वर्षप्रवेशकालिक कुण्डली अर्थात् वर्ष कुण्डली इत्यादि।
सहम साधन ग्रहस्पष्ट या भावस्पष्ट में से भावस्पष्ट या ग्रहस्पष्ट घटाकर किया जाता है। तदुपरान्त ‘क्षेपक’ जोड़ा जाता है। अन्त में आवश्यकतानुसार ‘सैकता’ किया जाता है, जिसके अन्तर्गत एक राशि सहम में जोड़ी जाती है। जिस (ग्रहस्पष्ट या भावस्पष्ट) में से घटाया जाता है, उसे ‘शुद्धाश्रय’ या ‘शोधक’ और जिस (ग्रहस्पष्ट या भावस्पष्ट) को घटाया जाता है, उसे ‘शोध्य’ या ‘शोध्यर्क्ष’ (शोध्य की राशि) कहा जाता है। जिसे (ग्रहस्पष्ट या भावस्पष्ट को) जोड़ा जाता है उसे ‘क्षेपक’ कहते हैं। सैकता तब किया जाता है,
जब शोध्य और शुद्धाश्रय के मध्य क्षेपक स्थित न हो। ऐसी स्थिति में सैकता के रूप में प्राप्त सहम में एक राशि या 30 अंश जोड़ दिया जाता है। एक राशि जोड़ने के कारण ही इसे ‘सैकता’ (स + एकता) कहा जाता है। वर्षप्रवेश समय दिन अथवा रात्रि होने पर सहम साधन में भिन्नता आ जाती है। एक ही प्रकार के सहम साधन हेतु दिन में जो शोध्य एवं शोधक होते हैं, रात्रि में उनसे भिन्न शोध्य एवं शोधक होते हैं। सहम साधन में इस अन्तर का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है।
निम्नांकित तालिका में उपर्युक्त 50 सहमों के साधन के सूत्र दिए गए हैं, उनके आधार पर सहम साधन किया जा सकता है :
क्रम सहम साधन सूत्र (शोधक – शोध्य) + क्षेपक
दिन में वर्षप्रवेश समय रात्रि में वर्षप्रवेश समय 1 पुण्य सहम (चन्द्रस्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + वर्षलग्न स्पष्ट (सूर्यस्पष्ट – चन्द्रस्पष्ट) + वर्षलग्नस्पष्ट 2 गुरु सहम (सूर्यस्पष्ट – चन्द्रस्पष्ट) + वर्षलग्न स्पष्ट (चन्द्रस्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + वर्षलग्नस्पष्ट 3 ज्ञान सहम (सूर्यस्पष्ट – चन्द्रस्पष्ट) + वर्षलग्न स्पष्ट (चन्द्रस्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + वर्षलग्नस्पष्ट 4 यश सहम (गुरुस्पष्ट – पुण्य सहम) + वर्षलग्नस्पष्ट (पुण्य सहम – गुरुस्पष्ट) + वर्षलग्न स्पष्ट 5 मित्र सहम (गुरु सहम – पुण्य सहम) + शुक्रस्पष्ट (पुण्य सहम – गुरु सहम) + शुक्रस्पष्ट 6 माहात्म्य सहम (पुण्य सहम – मंगलस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (मंगलस्पष्ट – पुण्य सहम) + लग्नस्पष्ट 7 आशा सहम (शनिस्पष्ट – शुक्रस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शुक्रस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 8 सामर्थ्य सहम (मंगलस्पष्ट – लग्नेश स्पष्ट) + लग्न स्पष्ट (लग्नेश स्पष्ट – मंगलस्पष्ट) + लग्न स्पष्ट 9 भ्रातृ सहम (गुरुस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (गुरुस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 10 गौरव सहम (गुरुस्पष्ट – चन्द्रस्पष्ट) + सूर्यस्पष्ट (गुरुस्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + चन्द्र स्पष्ट 11 राज सहम (शनिस्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (सूर्यस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 12 तात सहम (शनिस्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (सूर्यस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 13 मातृ सहम (चन्द्रमास्पष्ट – शुक्रस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शुक्रस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 14 पुत्र सहम (गुरुस्पष्ट – चन्द्रमा स्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (गुरुस्पष्ट – चन्द्रमा स्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 15 जीवन सहम (शनिस्पष्ट – गुरुस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (गुरुस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 16 जल सहम (चन्द्रमास्पष्ट – शुक्रस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शुक्रस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 17 कर्म सहम (मंगलस्पष्ट – बुधस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (बुधस्पष्ट – मंगलस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 18 रोग सहम (लग्नस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (लग्नस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 19 काम सहम (चन्द्रस्पष्ट – लग्नेश स्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (लग्नेश स्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 20 कलि सहम (गुरुस्पष्ट – मंगलस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (मंगलस्पष्ट – गुरुस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 21 क्षमा सहम (गुरुस्पष्ट – मंगलस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (मंगलस्पष्ट – गुरुस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 22 शास्त्र सहम (गुरुस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + बुध स्पष्ट (शनिस्पष्ट – गुरुस्पष्ट) + बुध स्पष्ट 23 बन्धु सहम (बुधस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (बुधस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 24 बन्दक सहम (चन्द्रमास्पष्ट – बुधस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (बुधस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 25 मृत्यु सहम (अष्टम भाव मध्य स्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + शनिस्पष्ट (अष्टम भाव मध्य स्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + शनिस्पष्ट 26 परदेश सहम (नवम भाव मध्य स्पष्ट – नवमेश स्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (नवम भाव मध्य स्पष्ट – नवमेश स्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 27 धन सहम (द्वितीय भाव मध्य स्पष्ट – द्वितीयेश स्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (द्वितीय भाव मध्य स्पष्ट – द्वितीयेश स्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 28 परदारा सहम (शुक्रस्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शुक्रस्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 29 परकर्म सहम (चन्द्रस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्न स्पष्ट (शनिस्पष्ट – चन्द्रस्पष्ट) + लग्न स्पष्ट 30 वणिक सहम (चन्द्रस्पष्ट – बुधस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (चन्द्रस्पष्ट – बुधस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 31 कार्यसिद्धि सहम (शनिस्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + सूर्यराशीश स्पष्ट (शनिस्पष्ट – चन्द्रस्पष्ट) + चन्द्रराशीश स्पष्ट 32 विवाह सहम (शुक्रस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शुक्रस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 33 प्रसूति सहम (गुरुस्पष्ट – बुधस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (बुधस्पष्ट – गुरुस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 34 संताप सहम (शनिस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + षष्ठ भाव मध्य स्पष्ट (शनिस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + षष्ठ भाव मध्य स्पष्ट 35 श्रद्धा सहम (शुक्रस्पष्ट – मंगलस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शुक्रस्पष्ट – मंगलस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 36 प्रीति सहम (ज्ञान सहम – पुण्य सहम) + लग्नस्पष्ट (ज्ञान सहम – पुण्य सहम) + लग्नस्पष्ट 37 बल सहम (गुरुस्पष्ट – पुण्य सहम) + वर्षलग्नस्पष्ट (पुण्य सहम – गुरुस्पष्ट) + वर्षलग्न स्पष्ट 38 देह सहम (गुरुस्पष्ट – पुण्य सहम) + वर्षलग्नस्पष्ट (पुण्य सहम – गुरुस्पष्ट) + वर्षलग्न स्पष्ट 39 जाड्य सहम (मंगलस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + बुध स्पष्ट (शनिस्पष्ट – मंगलस्पष्ट) + बुधस्पष्ट 40 व्यापार सहम (मंगलस्पष्ट – बुधस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (मंगलस्पष्ट – बुधस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 41 पानीयपात सहम (शनिस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (चन्द्रमास्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 42 शत्रु सहम (मंगलस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शनिस्पष्ट – मंगलस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 43 शौर्य सहम (पुण्य सहम स्पष्ट – मंगलस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (मंगलस्पष्ट – पुण्य सहम स्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 44 उपाय सहम (शनिस्पष्ट – गुरुस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (गुरुस्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 45 दरिद्र सहम पुण्य सहम स्पष्ट (बुधस्पष्ट – पुण्य सहम स्पष्ट) + बुधस्पष्ट 46 गुरुता सहम (सूर्य परमोच्च – सूर्यस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (चन्द्र परमोच्च – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 47 जलपथ सहम (03ऽ15° – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शनिस्पष्ट – 03ऽ15°) + लग्नस्पष्ट 48 बन्धन सहम (पुण्य सहम स्पष्ट – शनिस्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शनिस्पष्ट – पुण्य सहम स्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 49 कन्या सहम (शुक्रस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट (शुक्रस्पष्ट – चन्द्रमास्पष्ट) + लग्नस्पष्ट 50 अश्व सहम (पुण्य सहम स्पष्ट – सूर्यस्पष्ट) + एकादश भाव मध्य स्पष्ट (सूर्यस्पष्ट – पुण्य सहम स्पष्ट) + एकादश भाव मध्य स्पष्ट
सहम स्पष्ट जिस राशि का होता है, उसके स्वामी को ‘सहमेश’ कहते हैं।
सहम के बलाबल का आकलन
सहम के आधार पर फलकथन करने से पूर्व उसके बलाबल का निर्णय करना आवश्यक है। यदि सहम बली नहीं होगा, तो वह निष्फल होगा। कोई सहम निम्नलिखित स्थितियों में बली होता है : 1. जो सहम अपने स्वामी और शुभ ग्रह से युत अथवा द्रष्ट हो तथा उसका स्वामी बली हो, तो वह सहम बली होता है। सहम का स्वामी निम्नलिखित स्थितियों में बली होता है : (अ) स्वराशि, अपनी उच्चराशि, मित्र ग्रह की राशि, स्वनवांश, स्वहद्दा में स्थिति, (ब) शुभ भाव में स्थिति, (स) लग्न पर दृष्टि , (द) पंचवर्ग में बली, (य) अपने हर्ष स्थान में स्थित यदि सहमेश की लग्न पर दृष्टि नहीं है, तो वह निर्बल होता है। इसके विपरीत यदि वह समाधिकारी भी हो, तो लग्न को देखने पर उसे बली माना जाता है। इस प्रकार वह सहमेश बली है, जो लग्न को देखता हो। इसके अतिरिक्त उक्त स्थितियों में से जितनी अधिक स्थितियों में सहमेश हो, वह उत्तरोत्तर बली होता है। 2. जो सहम अपने स्वामी या शुभ ग्रहों से युत अथवा द्रष्ट न हो वह सहम निर्बल होता है। 3. जिस सहम का स्वामी वर्षेश से इत्थशाल करता है, उसकी अवश्य प्राप्ति होती है अर्थात् वह बली एवं पूर्णफलदायी होता है। 4. जिस सहम का स्वामी अस्त हो, वक्री हो, नीच हो, अशुभ भावेश एवं पाप ग्रहों से युत, द्रष्ट या इत्थशाल कर रहा हो, वह सहम अपने स्वामी से द्रष्ट होने पर भी निर्बल होता है। 5. शुभ सहम सबल होने पर शुभ फल देते हैं, अशु सहम (रोग, शत्रु, कलि, मृत्यु आदि) निर्बल होने पर शुभफल देते हैं।
सहम की निष्फलता
यदि कोई सहम उपर्युक्त स्थितियों के कारण बली है, फिर भी निम्नलिखित स्थितियों में वह निष्फल होता है : 1. जो सहम जन्मकुण्डली में बली होता है, तो वर्षकुण्डली में बली होने पर ही फल प्रदान करता है और यदि सहम जन्मकुण्डली में बली नहीं है, तो वर्षकुण्डली में बली होने पर भी वह निष्फल होता है। 2. जो सहम अष्टमेश से युत हो अथवा द्रष्ट हो, वह बली होने पर भी निष्फल होता है। 3. जो सहम पापग्रहों से युत अथवा द्रष्ट हो, वह बली होने पर भी निष्फल होता है। 4. जो सहमेश अष्टमेश अथवा पाप ग्रहों से इत्थशाल या ईसराफ योग का निर्माण करता हो, वह बली होने पर भी निष्फल होता है। 5. यदि कोई शुभ सहम वर्ष कुण्डली में षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान में स्थित हो, तो वह बली होने पर भी निष्फल होता है। 6. यदि कोई सहम पाप ग्रहों से युक्त हो और शुभ ग्रहों से द्रष्ट हो, तो उसके मिश्रित फल प्राप्त होते हैं। पहले अशुभ फल प्राप्त होते हैं और बाद में शुभ फल प्राप्त होते हैं। इस प्रकार युत ग्रह के प्रभावजनित फल पहले और द्रष्टा ग्रह के प्रभावजनित फल बाद में प्राप्त होते हैं। 7. यदि कोई सहम शुभ ग्रहों से युत हो और पाप ग्रहों से द्रष्ट हो, तो शुभफल पहले प्राप्त होते हैं और बाद में अशुभ फल प्राप्त होते हैं 8. जन्मकुण्डली में यदि कोई सहम निर्बलता एवं उक्त कारणों से निष्फल है, तो वर्ष कुण्डली में सबल एवं पूर्ण फलयुक्त होने पर भी निष्फल ही होता है।
सहम के फलों की समयावधि
यदि कोई सहम जन्मकुण्डली एवं वर्षकुण्डली दोनों में बली है और उपर्युक्त कारणों से निष्फल नहीं है, तो उसके फल कब प्राप्त होंगे, इसका निर्धारण निम्नलिखित प्रक्रिया से किया जाता है : 1. सहम स्पष्ट में से सहमेश स्पष्ट को घटाएँ। यदि सहमेश स्पष्ट अधिक होने के कारण सहम स्पष्ट में से नहीं घट रहा हो, तो उसमें 12 राशि या 360 अंश जोड़कर घटाएँ। 2. उक्त प्रक्रिया से प्राप्त शेषफल को अंश, कला, विकला में परिवर्तित कर लें अर्थात् राशि के अंश बना लें। 3. उक्त अंश कलादि में सहम की राशि के स्वोदय पलों से गुणा करें और 300 का भाग लगाएँ। जो लब्धि प्राप्त होती है, वह वर्ष प्रवेश के उपरान्त उन दिनों की द्योतक है, जिसमें सहम के फल की प्राप्ति सम्भव है। 4. यदि सहम और सहमेश का अन्तर शून्य हो अथवा लब्धि शून्य हो, तो सहमेश की दशा में सहम का फल प्राप्त होता है। उदाहरण : यदि किसी जातक का वर्ष विशेष में पुण्य सहम स्पष्ट 02ऽ23°28’14’’ एवं सहमेश बुध के भोगांश 06ऽ24°58’58’’ हैं तथा जयपुर में मिथुन राशि के स्वोदय लग्न पल 302 हैं, तो पुण्य सहम के फलों की प्राप्ति की समयावधि ज्ञात कीजिए। हल : नियमानुसार सर्वप्रथम पुण्य सहम स्पष्ट में से पुण्य सहमेश के स्पष्ट घटाएँगे :
पुण्य सहमस्पष्ट – पुण्य सहमेश स्पष्ट
= 2ऽ23°28’14’’- 6ऽ24°58’58’’
= 7ऽ28°29’16’’ (पुण्य सहम में 12 राशि जोड़कर घटाया गया है)
= 238°29’16’’
नियमानुसार उक्त शेषफल में पुण्य सहम की राशि मिथुन के स्वोदय लग्न पल का गुणा किया जाएगा तथा 300 का भाग लगाया जाएगा :
= 240°04’40’’
इस प्रकार वर्ष प्रवेश से 240 दिनों के भीतर पुण्य सहम का फल प्राप्त होगा।
की वर्षफल कैसे तैयार किया जाता है और मुंथा की कौन सी स्थिति कैसी होती है जातक के लिए आने वाले वर्ष का फलादेश करने हेतु वर्षफल, दशाफल, गोचरफल, लाल किताब एवं अन्य विधियों का विस्तृत वर्णन करें। विभिन्न ज्योतिषी जातक के लिए आने वाले वर्ष का फलादेश करने हेतु अपनी-अपनी विद्या के अनुसार फलादेश करते हैं। फलादेश करने हेतु विभिन्न पद्धतियां होती हैं जैसे वर्षफल, दशाफल, गोचरफल, लाल किताब, हस्त रेखा, कृष्णामूर्ति पद्धति, माइंडस्कोप, अंक शास्त्र आदि। वर्षफल द्वारा आने वाले वर्ष का फलादेश: वर्षफल में संपूर्ण जीवन की घटनाओं का वर्णन न होकर, किसी एक या दो विशेष वर्ष की मुख्य एवं आकस्मिक घटनाओं, स्वास्थ्य रोगादि का विचार, पदोन्नति, स्त्री एवं संतान सुख, परीक्षा में सफलता, व्यापार में उतार-चढ़ाव या स्थानांतरण आदि मुख्य विषयों का समावेश रहता है। वर्षफल द्वारा फलादेश करने हेतु किसी जातक का इष्टकालीन सूर्य आगामी वर्ष जब ठीक उसी राशि, अंश, कला, विकला पर आ जाता है, तो तत्कालीन वार, तिथि, नक्षत्र एवं इष्टकाल पर आधारित जो वर्ष कुंडली बनाई जाती है, उस समय की कुंडली को वर्ष प्रवेश कुंडली कहा जाता है। वर्ष कुंडली में ग्रहों की स्थिति एवं मुंथा या मुंथेश ग्रह की स्थिति अशुभ हो, तो जन्म के दिन संबद्ध ग्रहों की पूजा, जप एवं दानादि करने से ग्रह-जनित दोषों की शांति हो जाती है तथा वर्ष में संभावित बाधाएं दूर होकर अभीष्ट कार्यों में सफलता एवं सिद्धि प्राप्त होती है। वर्षफल में मुंथा का विशेष महत्व होता है। वर्ष कुंडली में चैथे, छठे, सातवें, आठवें एवं 12वें भावों में स्थित मुंथा अशुभ फलदायक होती है। जैसे यदि वर्ष कुंडली में मुंथा छठे या आठवें भाव में हो, तो शत्रु, रोग एवं ऋण में वृद्धि, शारीरिक कष्ट, कलह आदि का कारक होती है। इसी तरह द्वादश भाव में मुंथा स्थान हानि एवं व्यय कारक होती है। मुंथा यदि पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो शुभ स्थानों में होने पर भी अशुभ फल देती है। यदि दुःस्थान पाप ग्रस्त हो, तो और भी अधिक अनिष्टकारक होती है। किंतु यदि मंुथा शुभ ग्रह के साथ या दृष्ट हो, तो शुभ फलदायक होती है। यदि भाव 4, 6, 7, 8 या 12 में शुभ ग्रह युक्त हो, तो अधिक अनिष्टकारी नहीं होती है। मुंथा जिस राशि में स्थित होती है, उस राशि के स्वामी को मंुथेश कहा जाता है। मुंथा की तरह मुंथेश फल का भी विचार करना चाहिए। यदि मंुथेश और अष्टमेश वर्ष कुंडली में एक साथ स्थित हों, तो वर्ष में मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। यदि मुंथा या मुंथेश को अष्टमेश या अन्य कोई पाप ग्रह 4, 7, 10 दृष्टि से देखता हो, तो धन हानि एवं शारीरिक कष्ट होता है। द्वादश भावों में मुंथेश की श्रेष्ठ स्थिति लग्न, द्वितीय, तृतीय, पंचम, नवम, दशम तथा एकादश भाव में होती है। तृतीय, चतुर्थ, षष्ठ, सप्तम, अष्टम या द्वादश में स्थित मंुथेश अनिष्ट फल प्रदान करता है। पंचाधिकारी निर्णय: जैसा कि नीचे उल्लिखित है, वर्ष कुंडली में पांच ग्रह पंचाधिकारी कहलाते हैंै तथा इनमें से जो ग्रह पंचवर्गीय बल में सर्वाधिक बली है और लग्न को देखता हो वर्षेश कहलाता है। जन्म लग्न का स्वामी: जन्म कुंडली में जो ग्रह लग्न राशि का स्वामी हो, वही लग्न का स्वामी कहलाता है। वर्ष लग्नपति: वर्ष कुंडली में जो ग्रह वर्ष लग्न राशि का स्वामी हो, वह वर्ष लग्नपति कहलाता है। मुंथाधिपति: वर्ष
कुंडली में मुंथा जिस राशि में हो, उस राशि का स्वामी ग्रह मुंथाधिपति कहलाता है।
राशिपति: दिन में वर्ष प्रवेश होने की स्थिति में सूर्य जिस राशि में हो, उस राशि का स्वामी तथा रात्रि में वर्ष प्रवेश होने
की स्थिति में चंद्र जिस राशि में हो, उस राशि का स्वामी राशिपति कहलाता है। त्रिराशिपति:
नीचे चित्रित चक्र में देखते हुए दिन में वर्ष लग्न प्रवेश हुआ तो दिवात्रिराशिपति
ग्रह तथा यदि रात्रि को वर्ष प्रवेश हुआ हो, तो तदनुसार रात्रि त्रिराशिपति ग्रह मानना चाहिए।
उदाहरणार्थ यदि किसी जातक का लग्न कुंभ है ओर रात्रिकालीन जन्म है तो कुंभ राशि के
नीचे और रात्रि त्रिराशिपति के आगे बृहस्पति लिखा है तो बृहस्पति त्रिराशिपति होगा
जन्म लग्न से वर्ष लग्न का विचार वर्षफल की दृष्टि से वर्ष कुंडली का लग्न भी
विशेष महत्व रखता है। यदि किसी जातक का वर्ष लग्न जन्म कुंडली के प्रथम, छठे, अष्टम अथवा
बारहवें भावस्थ की राशि का उदित हो, तो अशुभ फलदायी होता है। द्वितीय भावस्थ राशि का लग्न
हो, तो मिश्रित फलदायी होता है। अगर किसी जातक का जन्म
लग्न कन्या हो और उसका आगामी वर्ष लग्न कन्या आ जाए, तो वह द्विजन्मा लग्न कहलाता है। इसी प्रकार जन्म
कुंडली के द्वादश भावों की राशियां अगर वर्ष लग्न में लग्न बनकर प्रकट हों, तो वह अपना अलग-अलग प्रभाव देती हैं। वर्ष लग्न जन्म
कुंडली का प्रथम भाव उदित हो, तो वह द्विजन्मा
लग्न कहलाता है। द्विजन्मा वर्ष लग्न होने की स्थिति में शारीरिक कष्ट, अनावश्यक व्यय, गुप्त चिंताओं, स्वास्थ्य हानि एवं बनते कार्यों में विघ्न की
संभावना रहती है। वर्ष लग्न जन्म कुंडली का द्वितीय भाव हो, तो जातक को उस वर्ष आकस्मिक आय एवं धन लाभ, वाहन सुख आदि की प्राप्ति की संभावना रहती है, परंतु उसका स्वास्थ्य प्रतिकूल रहता है। वर्ष लग्न
जन्म कुंडली के तृतीय भाव की राशि का हो, तो जातक को उस वर्ष भाई-बंधुओं एवं मित्रों का सहयोग
मिलता है। बिगड े़ काम बनत े ह ंै और धन की पा्र प्ति हाते ी है, परतं ु साथ ही खर्च एवं आकस्मिक यात्राओं और पराक्रम
में वृद्धि होती है। वर्ष लग्न जन्म कुंडली की चतुर्थ भावस्थ राशि का हो, तो उस वर्ष आय में वृद्धि के साथ-साथ वाहन सुख की
प्राप्ति होती है। साथ ही भूमि, भवन आदि की
प्राप्ति के अवसर प्राप्त होते हैं। वर्ष लग्न जन्म कुंडली की पंचमस्थ राशि का हो, तो उस वर्ष पूर्व से चल रही योजनाओं में आंशिक सफलता
प्राप्त होती है। विद्या में सफलता तथा स्त्री एवं संतान सुख की प्राप्ति होती है।
घर में कोई न कोई मंगल कार्य होता है। कार्य व्यवसाय संबंधी गुप्त योजनाएं बनती
हैं। वर्ष लग्न कुंडली की छठी राशि का हो, तो उस वर्ष जातक को संघर्ष अधिक करना पड़ता है। रोग
आदि के कारण शारीरिक कष्ट तथा ऋण की संभावना एवं शत्रु का भय रहता है। इसके
अतिरिक्त आय कम तथा खर्च अधिक होते हैं। साथ ही गृह-कलह, मानसिक तनाव एवं धन हानि होती है। वर्ष लग्न जन्म
कुंडली की सातवीं राशि का हो, तो घर परिवार में विवाह आदि मांगलिक कार्य होते हैं।
विद्या या विवाद आदि में सफलता अथवा पूर्व से चल रही योजनाओं में कामयाबी मिलती
है। स्त्री सुख एवं विलासादि कार्यों पर अधिक खर्च होते हैं। वर्ष लग्न जन्म
कुंडली की आठवीं राशि का हो, तो उस वर्ष रोग, एवं शारीरिक कष्ट या दुर्घटना का डर रहता है। आय में
रुकावटें एवं धन हानि तथा खर्च भी आशा के विपरीत अधिक होते हैं। पारिवारिक उलझनंे
बढ़ती हैं। वर्ष लग्न यदि जन्म कुंडली का नवम भाव हो, तो उस वर्ष धन लाभ के अवसर प्राप्त होते हैं। धार्मिक
कार्यों में अभिरुचि बढ़ती है। भाग्योन्नति एवं मान-सम्मान में वृद्धि होती है।
वर्ष लग्न यदि जन्म कुंडली का दशम भाव हो, तो कार्य व्यवसाय में लाभ व उन्नति के अवसर मिलते
हैं। सरकारी क्षेत्र में या सर्विस में उन्नति के अवसर बनते हैं तथा मान-सम्मान
में वृद्धि होती है। वर्ष लग्न यदि जन्मकुंली का ग्यारहवां भाव हो, तो उस वर्ष जातक को धन प्राप्ति व प्रगति के विशेष
अवसर प्राप्त होते हैं। बिगड़े हुए कार्य बनते हैं। पारिवारिक सुख एवं आकस्मिक लाभ
प्राप्त होते हैं। वर्ष लग्न यदि जन्मकुंडली का बारहवां भाव हो, तो उस वर्ष जातक को अधिक संघर्ष करना पड़ता है। आय कम
व खर्च अधिक होता है। शारीरिक कष्ट एवं गुप्त चिंताओं के कारण वह मानसिक तनाव से
ग्रस्त रहता है। उसके अपने भी परायों जैसा व्यवहार करते हैं। वर्षफल में विभिन्न
ग्रहों की दशाओं का फल: वर्षफल बनाने के उपरांत मुद्दा दशा निकालने हेतु गत वर्ष
में जन्मकालीन नक्षत्र को जोड़कर उसमें से 2 घटाकर तथा 9 से भाग देने पर जो शेष अंक बचता है, उसी अंक क अनुरूप विभिन्न ग्रहों की दशा जाननी चाहिए।
इस तरह, यदि 1 शेष बचे तो सूर्य की, 2 बचे तो चंद्र की, 3 बचे तो मंगल की, 4 बचे तो राहु की, 5 बचे तो गुरु की, 6 बचे तो शनि की, 7 बचे तो बुध की, 8 बचे तो केतु की और 9 अथवा 0 बचे तो शुक्र की दशा जाननी चाहिए। वर्ष कुंडली में
फलादेश करने हेतु जरूरी नियम: वर्ष कुंडली एवं जन्म कुंडली में छठे, आठवें और द्वादश भावों में क्रूर, शुभ तथा सौम्य ग्रह अशुभ फलदायी माने जाते हैं। यदि
वर्ष लग्न जन्म लग्न से अष्टम या षष्ठ हो, तो उस वर्ष जातक को मृत्यु तुल्य कष्ट होता है तथा धन
की हानि होती है। वर्ष लग्नेश तथा मुंथेश दोनों ग्रह अस्त, वक्री या नीच राशिगत हों, तो उस वर्ष शारीरिक कष्ट, मानसिक तनाव, संतान संबंधी चिंता और धन की हानि होती है। यदि जन्म
कुंडली का अष्टमेश ग्रह वर्ष में लग्नस्थ हो या लग्नेश हो, तो उस वर्ष जातक को बहुत अधिक संघर्ष एवं कठिनाइयों
का सामना करना पड़ता है। जन्म कुंडली में जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी हों, वे यदि वर्ष कुंडली में केंद्र, त्रिकोण या शुभ भाव में हों, तो वर्ष में उन भावांे के फलों की वृद्धि होती है।
वर्ष कुंडली में सूर्य और चंद्र एक ही राशि में हों, या दोनों छठे, आठवें या बाहरवें भाव में हों, तो वह वर्ष अनिष्टकारी होता है। यदि वर्ष लग्नेश
निर्बल हो तथा मंुथेश सूर्य, मंगल या बुध पाप
युक्त हो, तो कार्य हानि, नेत्र रोग, एवं नजदीकी भाई-बंधुओं या मित्रों के कारण दुःख होता
है। चंद्र या शुक्र पाप युक्त हांे, तो स्त्री, माता या पुत्री के कारण चिंता, गुरु पाप युक्त हों, तो पति, ज्येष्ठ भाई या संतान की चिंता होती है। शनि
पापाक्रांत हो, तो बुरे कार्यों
में अभिरुचि, धन की कमी, रोग व शत्रु भय की संभावना रहती है तथा कर्मचारियों
के कारण परेशानियां पैदा होती हैं। यदि वर्ष कुंडली में चंद्र छठे, आठवें या द्वादश भाव अथवा लग्न में हो और उस पर मंगल
की दृष्टि हो, तो शस्त्र से भय
या दुर्घटना से चोट, शनि की दृष्टि हो, तो रोग भय, सूर्य की दृष्टि हो तो शत्रु भय तथा बुध, गुरु या शुक्र की दृष्टि हो, तो धन लाभ के साथ-साथ रोग व शारीरिक कष्ट होता है।
जन्म लग्नेश, वर्ष लग्नेश, अष्टमेश, वर्षेश और मुंथेश बलवान हों तथा पांचवें, छठे, आठवें और बारहवें
भावों में न हों, तो उस वर्ष शुभ
फल घटित होते हैं तथा जातक को धन एवं सुख के साधन प्राप्त होते रहते हैं। यदि उक्त
ग्रह बल रहित हों और इन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि भी न हो, तो जातक को धन हानि, दुख, पीड़ा एवं रोग या
शत्रु भय देते हैं। वर्ष कुंडली में वर्ष लग्नेश, जन्म लग्नेश, मुंथा या मुंथेश तथा वर्षेश का विशेष महत्व होता है।
ये सब अपने बल के अनुसार अपनी दशा में फल देते हैं। ये सभी अथवा इनमें से अधिकांश
ग्रह षष्ठ, अष्टम या व्यय
भाव में हों, अथवा इन पर पाप
ग्रहों की दृष्टि हो या ये पाप ग्रहों से युक्त हों, तो उस वर्ष जातक को मृत्युतुल्य कष्ट होता है एवं उसे
अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है। जिस भाव का स्वामी अपने भाव में शुभ ग्रहों से युक्त
या दृष्ट हो, उस भाव के फल की
वृद्धि होती है। जैसे यदि वर्ष लग्न का स्वामी नवम भाव में पड़कर लग्न भाव को पंचम
मित्र दृष्टि से देखता हो, तो उस वर्ष जातक
के भाग्य में उन्नति होती है और उसे धन लाभ के अवसर प्राप्त होते हैं। इसी तरह, जो भाव पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, उस भाव के फल की हानि होती है। शुभ एवं पापी दोनों
प्रकार के ग्रहों से युक्त अथवा शुभ ग्रह से युक्त व क्रूर ग्रह से दृष्ट हो, तो मिश्रित फल मिलते हैं। यो यो भाव, स्वामि सौम्यैः दृष्टो युक्तोऽमेद्यते। पाप दृष्ट
युतैर्नाशो मिश्रैः मिश्रफल वदेत्।। वर्ष लग्न, मुंथा, मुंथेश, वर्ष लग्नेश ये सब पाप ग्रहों के मध्य में हों, तो उस वर्ष जातक को रोग होने का भय रहता है। नीच राशि
का एवं शत्रु के घर स्थित ग्रह, उस भाव के फल का
नाश करता है। समराशि में मध्यम फलदायी होता है। मित्र राशिगत या स्वराशिगत, अथवा त्रिकोण भाव में स्थित ग्रह उच्च राशिस्थ हो या
मित्र ग्रह से दृष्ट हो, तो उस भाव की
वृद्धि अवश्य करता है। वर्ष कुंडली संबंधी 16 विशेष योग ताजिक ग्रंथों में वर्ष कुंडली संबंधी सोलह
योगों को विशेष महत्व दिया गया है। इन योगों के आधार पर किया गया फलादेश सटीक व
चमत्कारिक होता है। वर्ष कुंडली के समान इन योगों का प्रयोग जन्म कुंडली तथा
प्रश्न कुंडली में भी किया जा सकता है। इन योगों के नाम इस प्रकार से हैं: इक्कबाल
योग इंदुवार योग इत्थशाल योग इशराफ योग नक्त योग यमया योग मणऊ योग कंबूल योग गैरी
कंबूल योग खल्लासर यागे रदद् योग दफु ालिकत्ु थ यागे दत्ु थकत्ु थीर यागे तबं ीर
यागे कुत्थ योग दुरुफ योग ऊपर वर्णित सभी 16 योग प्रायः फारसी भाषा से प्रभावित लगते हैं, परंतु इनका उपयोग भारतीय ज्योतिष प्रणाली में ही हुआ
है। इक्कबाल योग: वर्ष कुंडली में यदि सभी ग्रह केंद्र तथा पणफर भावों में अर्थात 1, 4, 7, 10 तथा 2, 5, 8, 12वें भावों में स्थित हों, तो इक्कबाल नामक योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप
वर्ष में व्यवसाय में तरक्की, सर्विस में
पदोन्नति, स्त्री या संतान
सुख के साथ-साथ भूमि, भवन, वाहन आदि के सुखों की प्राप्ति तथा सौभाग्य में
वृद्धि होती है। इंदुवार योग: वर्ष कुंडली में यदि सभी ग्रह आपोक्लिम भाव 3, 6, 9, 12 में हों, तो इंदुवार नामक योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप
वर्ष में आय कम तथा खर्च अधिक होता है। स्त्री, संतान एवं व्यवसाय संबंधी चिंता, अवांछित स्थान पर स्थानांतरण, मानसिक तनाव व शारीरिक कष्ट, शत्रु भय आदि अशुभ फल घटित होते हैं। इत्थशाल योग:
वर्ष कुंडली में लग्नेश और कार्येश ग्रहों का परस्पर दृष्टि संबंध दीप्तांशों के
भीतर हो, तो इत्थशाल योग
बनता है। फलस्वरूप वर्ष भर भाग्य में उन्नति के योग बनते हैं तथा अभीष्ट कार्य की
सिद्धि होती है। इशराफ योग: इसे मुशरिफ योग भी कहते हैं। यह इत्थशाल योग के विपरीत
है। जब शीघ्रगामी ग्रह मंदगामी ग्रह से आगे हो, तब इशराफ नामक योग बनता है। इस योग में लग्नेश और
कार्येश परस्पर कभी नहीं मिल पाते हैं। फलस्वरूप वर्ष में हानि एवं कार्य निष्फल
होता है तथा अनेकानेक विघ्न उत्पन्न होते हैं। परंतु यदि दोनों शुभ ग्रह हों, तो अशुभ फल नहीं होता है। नक्त योग: जब वर्ष कुंडली
में लग्नेश और कार्येश की परस्पर एक दूसरे पर दृष्टि न हो, परंतु दोनों ग्रहों के मध्य दीप्तांशों के अभ्यंतर
तीव्र गति वाला कोई अन्य ग्रह हो, जो लग्नेश और
कार्येश दोनों पर दृष्टि डालता हो अथवा अन्य प्रकार से संबंध रखता हो, तब वह ग्रह शीघ्र गति वाले ग्रह का तेज मंद गति वाले
ग्रह को देता है। नक्त योग में किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से कार्य सिद्ध होता
है। यमया योग: जब लग्नेश और कार्येश (जिस भाव के फल का ज्ञात करना हो, उसके स्वामी को कार्येश कहते हैं।) ग्रहों के परस्पर
दृष्टि न हो और अन्य कोई मंद गति का ग्रह दीप्तांशों के भीतर ही दोनों ग्रहों को
देखता हो, तब वह शीघ्रगामी
ग्रह की शक्ति (तेज) मंद ग्रह को देता है। इसी का नाम यमया योग है। इस योग के कारण उस वर्ष जातक के कार्य की सिद्धि तो
होती है, किंतु उसे
विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता है। मणऊ योग: यदि लग्नेश व कार्येश ग्रहों में
इत्थशाल हो रहा हो, परंतु कोई पाप
ग्रह मंगल और शनि दोनों को अथवा किसी एक को भी शत्रु दृष्टि 1, 4, 7 या 10 से देखता हो और
यह दृष्टि संबंध दीप्तांशों के भीतर हो, तो मणऊ योग बनता है। यह योग कार्य का नाश करने वाला
एक अशुभ योग है। कंबूल योग: लग्नेश और कार्येश ग्रहों में परस्पर इत्थशाल हो और
चंद्र इन दोनों में से किसी एक से भी इत्थशाल करता हो, तो कंबूल नामक योग बनता है। यदि लग्नेश, कार्येश और चंद्र तीनों उच्च राशिस्थ या स्वराशिगत
हों, तो अति उŸाम कंबूल योग बनता है। यह अत्यंत शुभ फलदायक एवं कार्य
सिद्धि कारक योग है। यदि लग्नेश, कार्येश तथा
चंद्र नीचस्थ, शत्रु राशिस्थ या
अस्त हों, तो निर्बल कंबूल
योग बनता है। उŸाम कंबूल योग से
वर्ष में संतान सुख की प्राप्ति होती है। गैरी कंबूल योग: यदि लग्नेश और कार्येश
दोनों ग्रहों का परस्पर इत्थशाल हो और चंद्र की इन पर दृष्टि न हो, परंतु चंद्र अग्रिम राशि में जाकर किसी अन्य बलवान या
शुभ ग्रह के साथ परिवर्तन करे, तो गैरी कंबूल
योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप वर्ष में जातक किसी गैर व्यक्ति की सहायता से काम
करता है। खल्लासर योग: जब लग्नेश और कार्येश ग्रहों का परस्पर इत्थशाल हो, परंतु शून्य मार्गी चंद्र स्वराशि, उच्च अथवा किसी ग्रह द्वारा दृष्ट न हो और दोनों में
से किसी से भी इत्थशाल न करता हो, तो खल्लासर नाम
का अशुभ योग बनता है। यह कार्य में बाधा उत्पन्न करने वाला एक विनाशक योग है। इस
योग के कारण कंबूल योग नष्ट हो जाता है। यह पुत्र संतान की प्राप्ति में बाधा
उत्पन्न करता है। रद्द योग: यदि लग्नेश या कार्येश नीच, अस्त, शत्रु क्षेत्री अथवा भाव 6, 8 या 12 में हो और वह
परस्पर इत्थशाल करते हुए किसी क्रूर ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तब रद्द नामक योग होता है। यह योग कार्यों में बाधक
तथा हानिकारक होता है। कई बार कार्य सिद्ध होकर भी निष्फल हो जाता है। दुफालि
कुत्थयोग: यदि लग्नेश और कार्येश ग्रहों में इत्थशाल हो तथा इनमें से मंद गति वाला
ग्रह स्वराशि, स्वोच्च या
स्वद्रेष्काण में बली हो तथा शीघ्रगामी ग्रह स्वराशि या उच्च राशि में स्थित न हो, तो दुफालि कुत्थ नामक योग बनता है। इस योग के
फलस्वरूप कठिनाई एवं अड़चनों के साथ कार्य की सिद्धि होती है। दुत्थकुत्थीर योग:
यदि लग्नेश और कार्येश ग्रह निर्बल (शत्रु क्षेत्री) पाप ग्रहों से युक्त होकर
इत्थशाल करें और उनमें से एक ग्रह किसी अन्य उच्चस्थ, स्वक्षेत्री या बली ग्रह के साथ इत्थशाल करंे, तो दुत्थकुत्थीर नामक योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप
कार्य का सिद्ध होना किसी दूसरे व्यक्ति की सहायता से मुमकिन होता है। तंबीर योग:
जब लग्नेश और कार्येश ग्रहों में परस्पर दृष्टि न हो, परंतु दोनों में से एक ग्रह राशि के अंत में स्थित हो
और आगामी राशि में स्थित ग्रह स्वगृही और उच्चादि बल से युक्त हो तथा राश्यंत वाला
ग्रह निकट भविष्य में बली ग्रह से मिलकर कार्येश और लग्नेश के साथ इत्थशाल करे, तो तंबीर नामक योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप पूर्व
निर्धारित कार्य की सिद्धि होती है। कुत्थ योग: जब वर्ष कुंडली में लग्नेश और
कार्येश ग्रह बली (सर्वोच्च, स्वगृही, स्वनवांश, शत्रु-युत, उदयी) हों, तो कुत्थ नामक योग बनता है। कुत्थ योग होने से
कार्य-व्यवसाय में विशेष सफलता तथा उन्नति व सुख साधनों में वृद्धि होती है। दुरुफ
(निर्बली) योग: यह कुत्थ योग का विपरीत है। इसके फलस्वरूप शारीरिक कष्ट, विपŸिा, मानसिक तनाव, धन-हानि, कलह-क्लेश आदि होते हैं। यदि वर्ष कुंडली में लग्नेश
एवं अन्य ग्रह निर्बल हों, तब यह योग होता
है। जातक के लिए आने वाले वर्ष के फलोदश के लिए गोचरीय ग्रहों का फल जन्मकालिक
नक्षत्र, राशि एवं लग्न
कुंडली को आधार मानकर वर्तमान कालिक नव ग्रहों के उस वर्ष में विभिन्न राशियों के
भ्रमण के अनुसार गोचर फल का विचार किया जाता है। जातक पर चल रहे वर्तमान समय की
शुभाशुभ जानकारी के लिए गोचरफल का विचार अत्यंत सुगम्य एवं उपयोगी साधन है। गोचर
ग्रहों के प्रभाव उनकी राशि एवं नक्षत्र परिवर्तन के साथ-साथ बदलते रहते हैं।
सामान्यतः गोचर विभिन्न ग्रहों का गोचरीय फल सूर्य: जन्म राशि से सूर्य गोचरवश
प्रथम भाव में हानि, द्वितीय में रोग
भय, तृतीय में धन लाभ, चैथे में मान हानि, पांचवें में धन का नाश, छठे में शत्रु नाश, सातवें में धन हानि, व्यर्थ यात्रा, आठवें में रोग भय, नौवंे में मान हानि, दसवें में कार्य सिद्धि, ग्यारहवें में धन लाभ एवं बारहवें में धन का नाश होता
है। चंद्र: जन्म राशि से लग्न, द्वितीय, तृतीय, षष्ठ, सप्तम, दशम या एकादश भाव में स्थित चंद्र धन लाभ कराता है।
मित्रों से साहचर्य और बुद्धि का विकास कराता है। जन्म राशि से चतुर्थ, पंचम, अष्टम, नवम या द्वादश में स्थित चंद्र के फलस्वरूप धन की
हानि, चोरी, अग्नि आदि का भय एवं प्रिय व्यक्ति का वियोग, कष्ट आदि होते हैं। मंगल: जन्म राशि से तीसरे, छठे एवं ग्यारहवें भाव में मंगल हो, तो भूमि और धन लाभ, भ्रातृ सुख, शत्रुओं पर विजय और राज्य कृपा, आरोग्य आदि की प्राप्ति हाती है। इसके अलावा लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम या द्वादश
में स्थित मंगल क्रमशः भय, कष्ट, धनहानि, नेत्र पीड़ा, कष्ट, अस्वस्थता, रोग भय, पाप-वृद्धि, कष्ट, फिजूल खर्च आदि का कारक हाते ा ह।ै बुध: जन्म राशि से
द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम या एकादश में स्थित बुध लाभ, भाग्य वृद्धि, सुख, प्रसन्नता, आय एवं आकस्मिक लाभ का कारक होता है। अन्य राशियों
में होने से धन-सुख का नाश, भाइयों से विरोध, शोक, शारीरिक कष्ट, शत्रु भय और चिंताएं पैदा करता है। गुरु: गुरु जन्म
राशि से द्वितीय, पंचम, सप्तम, नवम या एकादश भाव में हो, तो मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि, धन-हानि, विवाह, संतान सुख की प्राप्ति और व्यापार में वृद्धि होती
है। राशि 3, 4, 8, 10 या 12 में हो, तो व्याधि और विदेश यात्रा तथा पदोन्नति में बाधा आदि
अशुभ फल होते हैं। शुक्र: शुक्र जन्म से प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, अष्टम, नवम, एकादश या द्वादश
में हो, तो जातक को धन, ऐश्वर्य, वाहन सुख, मित्रों से सहयोग आदि की प्राप्ति होती है। इसके जन्म
से षष्ठ, सप्तम या दशम भाव
में स्थित होने से धन, ऐश्वर्य, वाहन आदि सुखों की हानि होती है। इसके अतिरिक्त
कार्यों में बाधाएं आती हैं एवं स्त्री से विरोध उत्पन्न होता है। शनि: शनि जन्म
राशि से तीसरे, छठे या ग्यारहवें
भाव में हो, तो धन का लाभ और
सुख संपŸिा की प्राप्ति
होती है। इसके अतिरिक्त अभीष्ट कार्य की सिद्धि, व्यापार में लाभ, अधिकारी वर्ग से मेल-मिलाप और शत्रुओं का नाश होता
है। शनि जन्म राशि से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम या द्वादश
राशि में हो, तो जातक को अपने
परिवारजनों से कष्ट मिलता है, उसके धन की हानि
होती है और शत्रु भय बना रहता है। जन्म से चैथी, आगामी राशि में स्थित शनि व्याधि, बंधुओं से विरोध, कष्ट, और चिंता पैदा करता है। जन्मराशि से प्रथम, द्वितीय या द्वादश में स्थित होने पर शनि मानसिक
संताप, शारीरिक कष्ट, धन हानि, स्त्री, पुत्रादि के कारण कष्ट और प्रयत्नों में विफलता का
कारक होता है। शनि के जन्म राशि से प्रथम, द्वितीय और बारहवें में गोचर को ही शनि की साढ़ेसाती
का नाम दिया गया है। इसके प्रभावस्वरूप जातक को धन हानि, कलह-क्लेश, शत्रु व रोग भय एवं शारीरिक कष्ट आदि अशुभ फल भोगने
पड़ते हैं। जन्म राशि पर शनि की चतुर्थ, अष्टम संचार गति को शनि की ढैया कहा जाता है। इसके
प्रभावस्वरूप जातक को लगभग ढाई वर्ष तक मानसिक संताप, वृथा खर्च, भाई-बंधुओं से वियोग, धन हानि व शरीर कष्ट आदि अशुभ फल भोगने पड़ते हैं।
राहु: राहु जन्म राशि से तृतीय, छठे, दसवें या ग्यारहवें जन्म राशि तथा नवम भाव में हो, तो पुत्र तथा स्त्री सुख की प्राप्ति और धन लाभ होता
है। यदि जन्म राशि से भाव 2, 4, 5, 7, 8 या 12 में हो, तो धन की हानि होती है और शत्रु एवं रोग भय तथा अनेक
प्रकार की विपत्तियां पैदा होते हैं। केतु: केतु जन्म राशि से तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव में हो, तो धन का लाभ, सुख-संपŸिा की प्राप्ति, अभीष्ट कार्य की सिद्धि, व्यापार में उन्नति तथा शत्रुओं का नाश होता है। इसके
विपरीत लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, अष्टम, नवम, दशम या द्वादश
भाव में होने पर कुटुंब से कष्ट मिलता है, प्रयत्नों एवं धन की हानि होती है और शत्रु भय बना
रहता है। जन्म राशि से चतुर्थ या अष्टम राशि में स्थित केतु व्याधि, भाई-बंधुओं से विरोध, कष्ट और चिंता उत्पन्न करता है। जन्म राशि से भाव 1, 2 या 12 में होने पर केतु
मानसिक संताप, शारीरिक कष्ट, धन हानि और स्त्री, पुत्रादि के कारण कष्ट पैदा करता है। जातक के लिए आने
वाले वर्ष हेतु लाल-किताब के अनुसार फल विचार प्राचीन भारतीय परंपरागत ज्योतिष के
अनुसार लग्न एवं भाव स्पष्ट के उपरांत ही लग्न कुंडली का निर्धारण किया जाता है।
परंतु लाल-किताब ज्योतिष के अनुसार भावांे तथा ग्रहों के प्रथमादि (स्थिर) घर
निश्चित किए जाते हैं। प्राचीन भारतीय ज्योतिष के अनुसार वर्ष कुंडली का निर्माण
जातक की जन्म-कुंडली, वार, जन्मेष्ट तथा जन्मकालिक सूर्य स्पष्टादि के आधार पर
होता है। परंतु लाल किताब ज्योतिष के अनुसार जातक का वर्ष प्रवेश चाहे किसी भी
वर्ष का हो, वर्ष कुंडली के
प्रथम भाव की संख्या 1 से ही प्रारंभ
किया जाएगा। कुंडली को नंबर 1 से शुरू करके 12 तक की संख्या में लिखकर पूरा कर लेना चाहिए। फिर जन्म
कुंडली में पड़े ग्रहों की स्थिति के अनुसार चार्ट में दी गई आयु के वर्षों के
सामने लिखी गई भाव संख्या के अनुसार नव वर्ष प्रवेश कुंडली में ग्रहों की स्थापना
की जाती है।यतिन एस उपाध्याय के अनुसार इसे लालकिताब से भी सम्बंध्द किया जायेतो
लाल किताब अनुसार वर्षफल कथन के नियम: प्रत्येक ग्रह
से संबंधित सजीव वस्तुओं पर उसका साधारण प्रभाव देखने के लिए जन्म कुंडली वाले की
आयु के वर्षों को उस अंक से भाग दें, जिस खाना नंबर में वह ग्रह जन्म कुंडली में स्थित हो।
भाग देने के पश्चात् जो अंक शेष बचेगा, लाल किताब वर्ष कुंडली उसी शेष बची संख्या के अनुसार
खाना से संबंधित ग्रह उस आयु के साल में अपना प्रभाव करेंगे। शून्य बचने अथवा शेष
अंक बचने वाला घर खाली होने की स्थिति में संबंधित ग्रह जन्म कुंडली वाले घर में
ही प्रभावकारी होता है। उदाहरणस्वरूप यदि किसी जातक की आयु का 27वां वर्ष शुरू हो और जन्म कुंडली में खाना नंबर चार
में अर्थात चतुर्थ भाव में हो, तो 27 को 4 से भाग देने पर
शेष 3 बचा अर्थात जन्म
कुंडली का मंगल, जो चतुर्थ भाव
में था, 27वें वर्ष वही
प्रभाव देगा जो तृतीय भाव संबंधी लिखा गया है। इसी प्रकार शेष आठ ग्रहों के फलों
का निर्णय करना चाहिए। लाल किताब के अनुसार ग्रहों के लिए विभिन्न भावों पक्के भाव
नियत किए गए हैं। जैसे सूर्य का पक्का घर प्रथम भाव, बृहस्पति का पक्का घर द्वितीय, पंचम, नवम और एकादश, मंगल का तृतीय और अष्टम, चंद्र का चतुर्थ, शनि का अष्टम, केतु का छठा, शुक्र और बुध का सातवां, राहु का बारहवां पक्के घर निर्धारित किए गए हैं। यदि 27वें वर्ष संतान संबंधी फलादेश जानना हो, तो संतान संबंधी पंचम घर के अंक 5 से 27 को भाग देने पर
शेष 2 बचेंगे। इस
प्रकार वर्ष कुंडली के दूसरे घर के अनुसार फल होगा। यदि शून्य बचे तो संतान संबंधी
फल, वर्ष में भी पंचम घर की स्थिति के अनुसार ही होगा।
जैसे किसी जातक की जन्म कुंडली में पंचम भाव में राहु है, तो राहु पंचम घर में अशुभ है। ऐसी स्थिति में यदि
वर्षफल में भी राहु पांचवें घर में आ जाए, तो पांचवां महीना संतान के लिए कष्टकारी होगा। जन्म
कुंडली में कई भाव खाली होते हैं। ऐसे में वर्ष कुंडली में कोई भी ग्रह अपना
निर्धारित फल उसी महीने में देगा, जिस घर में सूर्य
नव वर्ष कुंडली में बैठा हो, जैसे यदि टेवे
में खाना नंबर 4 खाली हो और
वर्षफल के अनुसार मंगल नंबर 4 में और सूर्य
नंबर 8 में हो, तो मंगल नंबर 4 का अशुभ फल जन्म दिन से आठ महीने में प्रकट हो जाएगा।
आयु के वर्ष का आरंभ और अंत देशी महीनों की तारीख के हिसाब से ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि सूर्य से वर्ष का प्रारंभ वैशाख से होता है।
सूर्य को एकम के हिसाब से खाना नंबर 1 में लाकर बाकी सब महीनों को भी उसी तरह बदल दिया जाना
चाहिए। प्रत्येक ग्रह केवल इसी तरह घुमाया जा सकता है। अर्थात जितने नंबर के खाने
(जन्मकुंडली) में कोई ग्रह बैठा हो, देखना चाहिए कि आयु का कौन सा वर्ष है। उस आयु के
वर्षों के अंक को जन्म कुंडली में ग्रह तिष्ठित खाना नंबर से भाग दें। शेष जो बचे
वर्ष कुंडली के उसी खाना नंबर के अनुसार प्रभाव होगा। शून्य बचने की स्थिति में भी
वही प्रभाव करेगा, जैसा कि जन्म
कुंडली में फल दे रहा होगा। उदाहरणस्वरूप किसी कुंडली में यदि सूर्य नंबर 11 में हो और जातक को 52वां वर्ष चल रहा हो, तो 52 करें। अब 52 को 11 से भाग देने पर
शेष 8 बचा, तो 52 वर्ष की आयु
सूर्य नंबर 8 में गिना जाएगा
और शेष अन्य ग्रहों को जन्म कुंडली में स्थित ग्रहों के अनुसार ही स्थापित करके
सूर्य से संबंधित वस्तुओं का प्रभाव देखा जाएगा। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह के फल
का निर्णय करना चाहिए। जिस ग्रह का प्रभाव जानना हो, उसी ग्रह को घुमाना चाहिए, शेष ग्रहों को जन्म कुंडली के हिसाब से ही रहने देना
चाहिए। इस प्रकार कारक ग्रहों को अलग-अलग करके जो कुंडली बनेगी वह उस वर्ष का लाल
किताब के अनुसार वर्षफल होगी। जातक के लिए आने वाले वर्ष का फलादेश करने हेतु अन्य
विधियां: योगिनी दशाफल विचार: योगिनियां आठ प्रकार की होती हैं। अगर जन्म कुंडली
में खराब ग्रहों की दशा भी चल रही हो, लेकिन योगिनी दशा अच्छी हो, तो जातक पर ज्यादा बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि विभिन्न योगिनियों के स्वामी विभिन्न ग्रह
होते हैं। इसलिए जातक के लिए आने वाले वर्ष का फलादेश करने हेतु योगिनी दशा जानना
भी अनिवार्य है।
वर्षफल में मुंथा विचार
अक्सर जब भी नववर्ष आता है और कैलेंडर का साल बदलता
है तो विभिन्न न्यूज़ चैनलों एवं पत्र-पत्रिकाओं में समस्त 12 राशियों के जातकों का वार्षिक भविष्यफल बताने की होड़
सी लग जाती है। जनमानस भी नववर्ष में अपने भाग्य के अनुसार लाभ-हानि का गणित
बिठाने लग जाता है किंतु क्या आप जानते हैं कि नववर्ष के आगमन पर आपके वार्षिक
भविष्यफल के बारे में कहना एक मिथ्याभाषण एवं भ्रामक बात है।
ऐसा इसलिए क्योंकि प्रत्येक जातक की वर्षकुंडली उसके
स्वयं के जन्मदिवस की दिनांक से परिवर्तित होती है ना कि कैलेंडर के वर्ष बदलने
से। वर्ष कुंडली का भी प्रत्येक जातक के जीवन में उतना ही महत्त्व है जितना अन्य
ज्योतिषीय कारकों का।
आइए आज आपको वर्ष कुंडली के एक और महत्वपूर्ण पहलू
मुंथा के बारे में जानकारी देने का प्रयास करें. मुंथा का उपयोग वर्ष कुंडली में
किया जाता है. जन्म के समय मुंथा लग्न भाव में मौजूद होती है और एक वर्ष तक वही
रहती है. उसके बाद एक भाव आगे बढ़ जाती है और इस प्रकार जब बच्चा बारहवें साल में
प्रवेश करता है तब वह जन्म कुण्डली के बारहवें भाव में होती है. माना जन्म के समय
लग्न में कन्या राशि उदय होती है तो मुंथा लग्न में कन्या राशि में होगी. अगले
वर्ष की जब वर्ष कुण्डली बनाई जाएगी उसमें मुंथा एक भाव आगे अर्थात जन्म कुण्डली
के दूसरे भाव तुला राशि में होगी. वर्ष कुण्डली में तुला राशि जिस भाव में पड़ेगी
मुंथा उसी भाव में मानी जाएगी.
मुंथा का विचार वर्षफल में किया जाता है. वर्षफल के
चतुर्थ, छठे, सप्तम, अष्टम और बारहवें भाव में मुंथा की स्थिति को अच्छा
नहीं माना गया है. इन भावों में मुंथा जीवन में कुछ ना कुछ परेशानी पैदा करती है.
वर्ष कुंडली में मुंथा के साथ मुंथा स्वामी का भी विचार किया जाता है कि वह
कुण्डली में किस हालत में है. आइए वर्ष कुण्डली के विभिन्न भावों में मुंथा फल का विचार
करें.
प्रथम भाव में मुंथा फल | Muntha in First House
वर्ष कुंडली के यदि पहले भाव अर्थात लग्न में ही
मुंथा स्थित होती है तब उसका फल ना तो बहुत अच्छा होता है और ना ही बहुत खराब होता
है. वर्ष सामान्य सा ही रहता है. व्यक्ति यदि परिश्रम करता है तो कुछ लाभ उसे हो जाता है और
कुछ धन लाभ मिल जाता है. लेकिन स्वास्थ्य की दृष्टि से लग्न की मुंथा को अच्छा नही
माना गया है. लग्न में होने से यह बेकार की चिन्ताएँ और क्लेश पैदा करति है.
मुंथा फल दूसरे भाव में | Muntha in Second House
यदि वर्ष कुण्डली के दूसरे भाव में मुंथा स्थित है तब
व्यक्ति नए उद्योग अथवा व्यवसायों में धन का निवेश करता है. जातक पूरे वर्ष
अत्यधिक परिश्रम व कठोर मेहनत करता है. व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों को भी अपने
परिश्रम से अपने अनुकूल बनाने में सफलता पाता है. धन प्राप्ति में बहुत सी बाधाओं
और संकटो का सामना करना पड़ता है.
मुंथा फल तीसरे भाव में | Muntha in Third House
वर्ष कुण्डली के तीसरे भाव में अगर मुंथा स्थित है तब
व्यक्ति अपनी नवीन योजनाओं से आगे बढ़ता है और सफलता पाता है. समाज में उसे
मान-सम्मान मिलता है और आदर की दृष्टि से देखा जाता है. व्यक्ति ऎसा कुछ काम करता
है कि उसे समाज में प्रसिद्धि मिलती है. लेकिन तीसरे भाव की मुंथा निजी जीवन के
लिए शुभ नहीं मानी जाती है. पारीवारिक कलह पैदा होता है. भाई से मतभेद होता है और
कलह इतना बढ़ सकता है कि भाईयों में तनाव होकर घर का बंटवारा तक हो सकता है. पारीवारिक
कलह के कारण मुकदमा आदि भी हो सकता है.
मुंथा फल चतुर्थ भाव में | Muntha in Fourth House
चतुर्थ भाव की मुंथा को ज्यादा शुभ नही माना गया है.
यह मिश्रित फल प्रदान कर सकती है. मन व्याकुल तथा बेचैन रह सकता है. घर में कलह
क्लेश बने रह सकते हैं. साल भर आपको अनिष्ट फलों का सामना करना पड़ सकता है.
स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ भी व्यक्ति को घेरे रह सकती है. शरीर में दर्द की
शिकायत, हड्डियों में
दर्द, वायु संबंधी
विकार, शत्रुओं से
चिन्ता आदि बातों से परेशानी होने की संभावना बनती है. इस वर्ष व्यक्ति को झूठी
बदनामी का भी खतरा बना रह सकता है.
चतुर्थ भाव की मुंथा नौकरी अथवा व्यापार में भी
अड़चने अटकाने का काम कर सकती है. मुंथा के इस स्थान में होने से स्थान परिवर्तन
भी हो सकता है जिसे व्यक्ति नहीं चाहता है. बिना मन के स्थान परिवर्तन से दुख और
अधिक बढ़ जाते हैं.
मुंथा फल पंचम भाव में | Muntha in Fifth House
वर्ष कुण्डली के पांचवें भाव की मुंथा को शुभ माना
गया है. इस वर्ष व्यक्ति को सुख शांति मिलती है, वह उन्नति प्राप्त करता है. विद्यार्थियों को परीक्षा
में सफलता मिलती है. संतान प्राप्ति होती है अथवा संतान की उन्नति होती है. इस भाव
में मुंथा की स्थिति से व्यक्ति को आर्थिक लाभ होता है. नौकरी तथा व्यापार में
उन्नति के अवसर मिलते हैं. मान प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है. पंचम भाव को धर्म
त्रिकोण भी कहा गया है इसलिए जिस वर्ष पंचम भाव में मुंथा होती है उस वर्ष व्यक्ति
को धर्म संबंधी कामों में रुचि रह सकती है, व्यक्ति तीर्थ यात्राएँ करता है. विवाह अथवा अन्य शुभ
मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं. सुख सौभाग्य में वृद्धि भी होती है.
छठे भाव में मुंथा फल | Muntha in Sixth House
वर्ष कुण्डली के छठे भाव में मुंथा का स्थित होना शुभ
नही माना गया है. छठे भाव की मुंथा व्यक्ति को बुरे काम की ओर प्रेरित करती है.
व्यक्ति बुरे व्यसनो और दुष्कर्म में लिप्त हो सकता है. लड़ाई झगड़े कर सकता है और
इस कारण मुकदमें आदि में भी फंस सकता है. मन में बुरे ख्याल पनप सकते हैं. बुरी
आदतों का शिकार होने से बदनामी भी हो सकती है. व्यक्ति के स्वभाव में चिड़चिड़ापन
समा सकता है. हर छोटी बात पर वह परेशान हो जाएगा. मन में हर समय उत्तेजना व अशांति
बनी रहेगी. शरीर में आलस्य की मात्रा बढ़ सकती है और अकसर सिरदर्द की शिकायत भी
बनी रह सकती है. इस वर्ष व्यक्ति अनैतिक संबंधो में भी फंस सकता है और उनके कारण
बदनामी होने की भी संभावना बनती है.
सप्तम भाव में मुंथा फल | Muntha in Seventh House
जिस वर्ष कुण्डली के सप्तम भाव में मुंथा होती है उस
वर्ष स्त्री को रोग होने की संभावना बनती है यदि स्त्री की कुण्डली है तब उसके पति
को बीमारी होने की संभावना बनती है. इस वर्ष व्यर्थ के व्यय बने रह सकते हैं.
भाईयों से परेशानी अथवा हानि की संभावना बनती है. परिवार में आपस में विरोध तथा
वैर की भावना बढ़ सकती है. व्यक्ति झूठे मुकदमों में फंस सकता है. मान हानि का
सामना करना पड़ सकता है. मन में उद्वेग्निता बनी रह सकती है. अधर्म की ओर रुचि बढ़
सकती है. उत्साह की कमी रह सकती है. व्यक्ति जुए और सट्टे अदि जैसी बातों में भी
संलग्न रह सकता है. इस वर्ष भाग्य आपसे रूष्ट रह सकता है और आपके बने हुए काम
बिगड़ सकते हैं.
अष्टम भाव में मुंथा फल | Muntha in Eighth House
वर्ष कुण्डली के आठवें भाव में भी मुंथा की स्थिति को
शुभ नहीं माना गया है. आठवें भाव की मुंथा व्यक्ति को बिना उद्देश्य भटकाने का काम करती है. सम्पत्ति का नुकसान हो सकता
है या व्यापार में हानि होने की भी संभावना बनती है. बुरे कार्यों की ओर रुझान हो
सकता है और इस कारण आर्थिक हानि भी होती है और बाद में आपको इस बात का पश्चाताप भी
हो सकता है. व्यक्ति को शारीरिक व मानसिक पीड़ा दोनो ही बनी रह सकती हैं. व्यक्ति
शरीर से दुर्बल हो सकता है और रोगों की बढ़ोतरी हो सकती है. स्थान परिवर्तन हो
सकता है.
नवम भाव में मुंथा फल | Muntha in Ninth House
नवम भाव की मुंथा को शुभ माना गया है. वर्ष कुण्डली
के जिस वर्ष में मुंथा नवम भाव में होती है उस वर्ष व्यक्ति का भाग्योदय होने की
संभावना बनती है. इस वर्ष इच्छाएँ पूरी होने की संभावना भी बनती है. यदि व्यक्ति
अपना व्यवसाय करता है तो उस वर्ष उसका व्यवसाय फलता-फूलता है. यदि व्यक्ति नौकरी
करता है तब उस वर्ष व्यक्ति को नौकरी में प्रमोशन व तरक्की मिलती है. व्यक्ति शुभ
तथा मांगलिक कार्यों में संलग्न रह सकता है. तीर्थ यात्राएँ भी कर सकता है.
श्रेष्ठ पद की प्राप्ति भी होती है और समाज में सम्मानित भी होता है.
दशम भाव में मुंथा फल | Muntha in Tenth House
यदि दशम भाव में मुंथा हो तब उस वर्ष व्यक्ति को पद लाभ मिलता है, प्रमोशन मिलती है और सरकार की ओर से सम्मान भी मिलता
है. व्यक्ति तरक्की पाता है. मन में जिन कार्यों को करने की ईच्छा होती है वह पूरे
होते हैं. व्यवसाय उन्नति की ओर अग्रसर होता है. व्यक्ति को सुयश व सम्मान मिलता
है. इस भाव की मुंथा व्यक्ति को ऎश्वर्य और पूरा सुख उपभोग प्रदान करती है.
एकादश भाव में मुंथा फल | Muntha in Eleventh House
वर्ष कुण्डली के एकादश भाव में अगर मुंथा होती है तब
वह वर्ष आर्थिक दृष्टि से श्रेष्ठ रहता है. इस वर्ष व्यक्ति को आकस्मिक धन लाभ
होने की संभावना बनती है. साथ ही विभिन्न अन्य स्त्रोतो से भी आय के साधन बनने की
संभावना बनती है. सरकार से लाभ मिल सकता है. रुका हुआ पैसा वापिस मिलने की संभावना
बनती है. व्यक्ति के आमोद-प्रमोद में वृद्धि होती है. व्यक्ति सभी प्रकार के मनोरथ
सिद्ध होने की संभावना बनती है.
द्वादश भाव में मुंथा फल | Muntha in Twelfth House
बारहवें भाव की मुंथा को शुभफलदायी नही माना गया है.
इस वर्ष यह व्यक्ति को अनिष्टकारी फल प्रदान करने वाली हो सकती है. इस वर्ष आपके
व्यय अधिक हो सकते हैं और आपका संचित धन भी खर्च हो सकता है. कार्य बनने में
बाधाओं का सामना करना पड़ता है. इस भाव की मुंथा दुष्ट लोगो का संग करा सकती है.
चित्त में चंचलता बनी रह सकती है. व्यक्ति धर्म विरुद्ध काम कर सकता है और स्वास्थ्य
संबंधी समस्याएँ भी परेशानी उत्पन्न करती है.
आइए जानते हैं कि वर्ष कुंडली के महत्वपूर्ण कारक कौन
से हैं जो आपके जीवन पर अपना प्रभाव डालते हैं।
1. मुंथा राशि- वर्ष कुंडली में मुंथा राशि का बहुत
महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। लग्न संख्या में जातक की वर्तमान आयु के वर्ष जोड़कर 12 से भाग देने पर जो शेष बचे वही मुंथा राशि होती है।
2. मुंथा की अशुभ स्थिति- वर्ष लग्न कुंडली में यदि
मुंथा वर्षलग्न से 4,6,7,8,12 वें स्थित हो तो
यह अशुभ होती है। यदि मुंथा राशि पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो यह विशेष अशुभ व
हानिकारक होती है।
3. राहु-केतु युक्त मुंथा- यदि मुंथा राहु-केतु से युक्त
तो अशुभ फ़लदायक होती है।
4. मुंथेश- वर्ष कुंडली में मुंथा राशि का स्वामी ग्रह
मुंथेश कहलाता है। मुंथेश यदि 4,6,8,12
भाव में अस्त, वक्री या पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो यह अशुभ होता है।
मुंथेश यदि वर्षलग्न से अष्टमेश से युत व दृष्ट हो तो यह विशेष हानिकारक होता है।
5. वर्षकुंडली में जन्म लग्नेश की स्थिति- वर्षकुंडली
में यदि जन्मकुंडली का लग्नेश निर्बल, अष्टम या सूर्य आदि क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो तो उस
वर्ष जातक को मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।
-मुंथेश यदि वर्ष कुंडली में अस्त होकर शनि द्वारा दृष्ट हो
तो उस वर्ष जातक का सर्वनाश, मानसिक कष्ट व
भयंकर रोग से ग्रस्त होने की संभावना होती है।
6. वर्षलग्न- वर्षलग्न यदि जन्मलग्न या जन्मराशि से
अष्टम राशि का हो तो उस वर्ष जातक को भीषण कष्ट व रोग होने की संभावना होती है।
7. वर्षकुंडली में चन्द्र की स्थिति- वर्षकुंडली में यदि
चन्द्र 1,6,7,8,12 भाव में पाप
ग्रहों से दृष्ट हो तो उस वर्ष जातक का प्रबल अरिष्ट होता है। जातक को मृत्यु
तुल्य कष्ट या मृत्यु होने की संभावना होती है।
-यदि वर्षकुंडली में चन्द्र मंगल से दृष्ट हो अग्नि के
द्वारा, यदि राहु-केतु से
दृष्ट हो तो शत्रुओं के द्वारा, सूर्य से दृष्ट
हो तो आर्थिक हानि के कारण जातक को कष्ट होता है।
-यदि वर्षकुंडली में चन्द्र गुरु से दृष्ट हो तो शुभफलदायक
होकर अशुभता में कमी करता है।
**मुंथा कैसे वर्ष कुण्डली में प्रवेश करती है जन्म
कुण्डली में कहाँ रहती कब आती है**
वर्ष कुण्डली में गणना के संदर्भ में मुंथा का
अत्यधिक उपयोग किया जाता है. जन्म कुण्डली में मुन्था सदैव लग्न में स्थित रहती है
और हर वर्ष यह एक राशि आगे बढ़ जाती है. उदाहरण के लिए यदि किसी का जन्म मेष लग्न
में हो तो जातक के जन्म समय मुन्था मेष राशि में होगी तथा आने वाले वर्ष में यह
मुंथा वृष राशि में और इससे आगे आने वाले वर्ष में यह मिथुन में स्थित होगी इस तरह
से प्रत्येक वर्ष मुंथा एक राशि आगे बढ़ जाती है.
मुंथा कोई ग्रह नहीं है लेकिन यह नवग्रहों के समान ही
महत्व रखती है और इसके विचार द्वारा कुण्डली के अनेक प्रभावों का वर्णन किया जा
सकता है. मुन्था के शुभ और अशुभ प्रभाव जातक के जीवन को पूर्ण रुप से प्रभावित
करते हैं. ज्योतिष के अनेक शास्त्रों में हमें मुन्था के विषय में बहुत कुछ जानने
को मिलता है जिसके द्वारा मुंथा का महत्व परिलक्षित होता है और मुथा की गणना को
वर्ष कुण्डली में करके जातक के जीवन में घटने वाली घटनाओं को बताया जा सकता है.
मुंथा की गणना
मुंथा की गणना के लिए चाहिए की जन्म कुण्डली में लग्न
की राशि संख्या ज्ञात करनी चाहिए जैसे यदि वह संख्या पांच है तो लग्न की राशि सिंह
होगी.
जिन वर्षों के लिए मुंथा की गणना करनी होती है जन्म
से उन पूरे वर्षों की संख्या को लग्न की संख्या से जोड़ देना होता है. यदि यह जोड़
12 वर्ष से अधिक आता है तो इसे 12 से भाग दिजिए और जो शेष संख्या आए उसी में मुंथा
स्थित होगी. यदि शेष संख्या शून्य आती है तो इसे बारहवीं राशि कहेंगे.
मुंथा का प्रभाव
वर्ष कुण्डली में जन्म कुण्डली के लग्न की भांति
मुंथा अत्याधिक महत्वपूर्ण होती है. वर्ष के फल तभी शुभ होंगे जब मुंथेश उच्च
युक्त या स्वराशि से युक्त हो.
मुन्थेश शुभ ग्रहों से युक्त या उनसे प्रभावित है तो
परिणाम अच्छे प्राप्त हो सकते हैं.
मुन्था 2, 9 10, 11 भाव में स्थित होने पर आर्थिक पक्ष की मजबूती को
दर्शाती है. यह अच्छी व्यवसायिक स्थिति को दर्शाता है.
मुन्था की विपरित स्थिति
भाव 4, 6, 8, 12 और सप्तम भाव में मुन्था अच्छी नहीं मानी जाती यह
अशुभ परिणामदायक हो सकती है. इस प्रकार यदि मुन्था षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश युक्त हो तो शुभ परिणाम प्रदान
करने वाली होती है.
मुन्थेश यदि नीच का हो या नीचता से युक्त हो अथवा
पिड़ित, निर्बल या शत्रु
भाव में स्थित हो तो यह शुभ परिणाम प्रदान नहीं करता है.
मुन्था यदि क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो तो विपरित फल
प्रदान करती है.
वर्ष कुण्डली में मुन्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाती
है. मुन्था को ग्रह के जैसा ही महत्वपूर्ण माना जाता है. वर्ष कुण्डली में जिस भाव
में मुन्था स्थित होती है उस भाव तथा भाव के स्वामी कि स्थिति को देखा जाता है.
बली हैं या निर्बल है. 4,6,7,8,12 भाव में मुन्था
का स्थित होना शुभ नहीं माना जाता है. इसी प्रकार हम वर्ष कुण्डली में वर्षेश तथा
पंचाधिकारियों की स्थिति को भी देखा जाता है. वर्षेश की स्थिति कुण्डली में यदि
कमजोर है तो शुभ नहीं है.इसके आधार पर वर्ष कुण्डली का फलित काफी हद तक निर्भर
वर्ष फल पद्धति अपने आप में एक महत्वपूर्ण पद्धति है।
वर्ष फल के द्वारा हम एक वर्ष में होने वाली घटनाओं का अनुमान लगा सकते हैं।
वर्ष फल कुण्डली में ग्रहों की आपसी दृष्टियाँ पराशरी
दृष्टि से भिन्न होती हैं। यहाँ हम ताजिक दृष्टियों का प्रयोग करते हैं। वर्ष
कुण्डली में 3,5,9,11 भावों में स्थित
ग्रहों की आपसी दृष्टि मित्र दृष्टि कहलाती है। 2,6,8,12 भावों में स्थित ग्रहों की आपसी दृष्टि सम दृष्टि
कहलाती है। 1,4,7,10 भावों में स्थित
ग्रहों की आपसी दृष्टि शत्रु दृष्टि कहलाती है।
वर्ष फल में ताजिक योगों का बहुत ज्यादा महत्व है। यह
ताजिक योग शुभ और अशुभ दोनों प्रकार से बनते हैं। योग तो बहुत से हैं लेकिन सोलह
योगों का महत्व अधिक है। जो निम्न लिखित हैं -
• इक्कबाल योग
• इन्दुवार योग
• इत्थशाल योग
• ईशराफ योग
• नक्त योग
• यमया योग
• मणऊ योग
• कम्बूल योग
• गैरी कम्बूल योग
• खल्लासर योग
• रद्द योग
• दुष्फाली कुत्थ योग
• दुत्थकुत्थीर योग
• ताम्बीर योग
• कुत्थ योग
• दुरुफ योग
वर्ष कुण्डली में मुन्था का भी महत्व काफी है। मुन्था
को हम ग्रह के जैसे मानते हैं। वर्ष कुण्डली में जिस भाव में मुन्था स्थित होती है
उस भाव तथा भाव के स्वामी कि स्थिति को देखा जाता है। बली हैं या निर्बल है। 4,6,7,8,12 भाव में मुन्था का स्थित होना शुभ नहीं माना जाता है।
इसी प्रकार हम वर्ष कुण्डली में वर्षेश तथा पंचाधिकारियों की स्थिति को भी देकहते
हैं। वर्षेश की स्थिति कुण्डली में यदि कमजोर है तो शुभ नहीं है। इनके अलावा
त्रिपताकी चक्र का निर्माण भी किया जाता है। इसके आधार पर भी वर्ष कुण्डली का फलित
किया जाता है। वर्ष कुण्डली में सहम का भी महत्व है। यदि अच्छे सहम बन रहें हैं तो
फल अच्छे मिल सकते हैं।
वर्ष कुण्डली में तीन प्रकार की दशाओं का प्रयोग किया
जाता है। प्रथम दशा विंशोत्तरी मुद्दा दशा है। द्वितीय दशा विंशोत्तरी योगिनी दशा
है। तृ्तीय दशा सबसे महत्वपूर्ण दशा है जो पात्यायनी दशा कहलाती है। मुद्दा दशा और
योगिनी दशा की गणना पराशरी गणना के जैसी है लेकिन पात्यायनी दशा की गणना इनसे
भिन्न है, इस दशा में वर्ष
कुण्डली में ग्रहों के भोगांश के आधार पर दशा क्रम निश्चित किया जाता है।
वर्ष कुण्डली में विंशोपक बल या विश्व बल की गणना का
भी महत्व होता है। यह बल राहु/केतु को छोड़कर सात ग्रहों पर आधारित होता है। इस बल
को हम गणितीय विधि से निकालते हैं। इस बल के अधिकतम अंक 20 होते हैं। जिस ग्रह के 15 से 20 के मध्य बल है वह
बहुत बली हो जाता है। जो ग्रह 10 से 15 के मध्य बल पाता है वह बली होता है। जो 5 से 10 के मध्य बल पाता
है वह ग्रह निर्बल होता है। 5 से नीचे बल
प्राप्त करने वाला बहुत अधिक कमजोर होता है।
उपरोक्त नियमों के आधार पर वर्ष वर्ष कुण्डली का
निर्माण होता है। वर्ष फल कुण्डली का अपना स्वतंत्र रूप से कोई महत्व नहीं है। यदि
व्यक्ति की जन्म कुण्डली में कोई अच्छा योग नहीं है और वर्ष कुण्डली उस वर्ष में
अच्छे योग दिखा रही है तो वर्ष कुण्डली के अच्छे फलों का कोई महत्व नहीं होगा।
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