ज्योतिष से संगीत का सम्बन्ध
ज्योतिष से संगीत का सम्बन्ध
प्राचीन भारत में तीन शास्त्रों को महत्वपूर्ण माना जाता था। वह तीन शास्त्र
है भारतीय ज्योतिष अर्थात् गणित, भारतीय वैदिक
शास्त्र (आयुर्वेद) और भारतीय संगीत अर्थात् “नाद योग”। मानवीय काल के
इतिहास को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि जबसे मनुष्य में जागृति आई तब से यह
तीनों शास्त्र मनुष्य के विकास में अग्रेसर रहे है।
ऋग्वेद में हजारों वर्ष पूर्व के नक्षत्रों की दर्शनी का वर्णन मिलता है।
भारतीय चिंतको ने गृह तारे व नक्षत्रो की स्थिति, उनके भ्रमण और उसके कारण सृष्टि पर होने वाले परिणाम
परिवर्तन का सूक्ष्म अध्ययन किया तथा उनके पारस्चरिक सम्बन्ध को अत्यंत शास्त्र
शुद्ध एवं सूत्रबद्ध करके अपने ग्रंथो में समाविष्ट किया।
आकाश में भ्रमण करने वाले गृह अपनी गति का भ्रमण करते समय विशिष्ट प्रकार की
ध्वनि का निर्माण करते है और उन ध्वनियों के मिश्रण से संगीत की निर्मिती होती है।
ऐसा प्राचीन विचारकों का मत है। इसमें प्रमुखता से पायथागोरस का उल्लेख कर सकते
है। उन्होंने भारत तथा अन्य देशों का भ्रमण करके निरुपित किया कि प्रत्येक गृह,
उपग्रह, नक्षत्र और तारा भ्रमण करते समय ध्वनि उत्पन्न करता है तथा
उन ध्वनियों के मिलने पर एक प्रकार का संगीत निर्मित होता है। यह नक्षत्र संगीत
अथवा नक्षत्र नाद मनुष्य के जन्म के समय उसके मन या चित्त पर अंकित हो जाता है,
वस्तुतः यह उसका जीवन संगीत ही होता है। यह
सुसंवादी होने पर मनुष्य का जीवन सुखमय होता है तथा विसंवादी होने पर दुखी रहता
है।
१९५० के आसपास “वैश्विक रसायन
शास्त्र” नामक शास्त्र का उदय हुआ।
इस शास्त्र का कथन है कि यह संपूर्ण विश्व एक पूर्ण शरीर है, इसका कोई भी अंग भिन्न नहीं है। गृह, तारे और नक्षत्रों से पृथ्वी के अणु परमाणु तक
प्रभावित होते है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आकाश में व्याप्त गृह-नक्षत्र का नाद
संगीत भी पृथ्वी के अणु-परमाणु को प्रभावित करता है। इस निष्कर्ष पर पहुच सकते है
कि ज्योतिष और संगीत दोनों पूरक है।
संगीत में सात स्वर है “सा रे ग म प ध नि”
किन्तु तार सप्तक के “सां” को लिए बिना
पूर्णता नहीं आती है। यह अंतिम “सां” आठवां स्वर नहीं है अपितु प्रथम “सा” की पुनरावृत्ति है। स्वर सात ही है। लेकिन इन स्वरों के कोमल और तीव्र ऐसे भेद
होते है। ‘सा’ और ‘प’ में भेद नहीं होते इसलिए
इनको अचल स्वर कहते है। “रे, ग, ध, नि” के कोमल और शुद्ध ये दो भेद होते है। इस प्रकार
हमारे संगीत में कुल १२ स्वर होते है। और हमरे सौर मंड्ल मे भी 12 ग्रह है इसी
प्रकार यदि हम ज्योतिष शास्त्र की चर्चा करे तो कुल गृह १२ है—रवि, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, राहू और केतु अरुण, वरुण, और यम,
रवि,चन्द्र, अरुण, वरुण और यम को छोड़कर शेष सभी ग्रहों को दो-दो राशियों का स्वामी माना
गया है। रवि तथा चन्द्र को अत्यंत महत्वपूर्ण गृह माना गया है। रवि मुख्य गृह है
इसी दृष्टिकोण से यदि संगीत के विषय में देखा जाये तो ‘सा’ अथवा षड्ज को सभी
स्वरों का पिता माना गया है। षड्ज (सा) एक मात्र स्वर है जो अन्य छः स्वरों का
जन्म दाता भी कहा गया है क्योंकि उसी के आधार पर अन्य स्वरों की स्थिति तय होती
है। इसलिए यह स्वर षड्ज कहलाता है और रवि तथा षड्ज की तुलना की जाती है।षड्ज के
समान ही महत्वपूर्ण स्वर पंचम अर्थात् ‘प’। इस स्वर में भी कोमल और
तीव्र भेद नहीं होते। रवि के बाद का महत्वपूर्ण गृह है चन्द्र उसकी राशी कर्क
निर्धारित की गयी है। पंचम स्वर का स्वामी चन्द्र तथा उसी क्रम में पंचम स्वर की
कर्क राशी होगी।अब अन्य स्वरों का सम्बन्ध देखते है। ऋषभ ‘रे’ स्वर ‘सा’ के निकट है। सा का स्वामी रवि है, इसलिए रे का स्वामी बुध ठहरता है। इसके बाद ‘ग’ स्वर आता है। बुध
के बाद का गृह शुक्र है अर्थात् ‘ग’ का स्वामी शुक्र हुआ। अब ‘म’ अर्थात् इसका स्वामी मंगल है। इसके बाद ‘प’ का स्वामी चन्द्र
पहले ही निश्चित हो चूका है। ‘प’ के बाद ‘ध’ आता है इस स्वर
का स्वामी गुरु है। ‘नि’ अर्थात् निषाद ‘सा’ से सर्वाधिक
अंतराल पर है और सूर्य भी शनि से सर्वाधिक दूरी पर स्थित है, इसलिए ‘नि’ स्वर का
१२ ग्रहों में से रवि,चन्द्र, अरुण, वरुण और यम को छोड़कर 7 ग्रहों में प्रत्येक को दो राशी का स्वामित्व दिया गया
है। उसी प्रकार सात स्वरों में से ‘सा’ और ‘प’ को छोड़कर शेष पांच स्वरों में से
प्रत्येक शुद्ध एवं कोमल तीव्र ये दो भेद होते है। इसी आधार पर यह ग्रह और इनकी
राशियाँ किस स्वर से सम्बंधित है यह दर्शाया गया है—इस प्रकार स्वर, राशि, ग्रह उनके तत्व
तथा उनके सम्बन्ध का स्पष्टीकरण हुआ उपरोक्त्त सातों
गृह और उनके सात स्वर इस प्रकार है—
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स्वर |
ग्रह |
राशि |
|
सा |
रवि |
सिह |
|
रे |
बुध, राहु |
मिथुन-रे(शुद्ध)
राहु-बुद्ध; कन्या-रे(कोमल)बुद्ध-राहु
|
|
ग |
शुक्र |
शुक्र ग(शुद्ध वृषभ); तुला ग(कोमल) |
|
म |
मंगल, यम |
मेष-म-(शुद्ध)मंगल
; वृश्चिक-म(तीव्र)-मंगल-केतु-यम |
|
प |
चन्द्र |
कर्क |
|
ध |
गुरु, वरुण, केतु |
धनु-ध(शुद्ध) ; मीन-ध(कोमल)-गुरु,वरुण, केतु |
|
नि |
शनि, अरुण |
मकर-नि(शुद्ध); कुम्भ-नि(कोमल)-अरुण |
इन्हि ग्रह के स्वरो से रशियो के लिये
प्रचलित रागो क विभाजन हो गया जो इस प्रकार है:
|
राशि |
राग |
|
मेष |
अहीरभैरव, आभोगि, सिंधभैरवी,
जोगिया, ललित, बागेश्री,
माल्कौंस, पहाडी, मेघरंजनि,
भैरवी |
|
वृषभ |
खमाज, गारा, गौड्सारंग, दुर्गा(खमाज), झिझोटी, दीपक, यमन, मारुबिहाग, धानि, भूपलि, रागेश्री, पूरिया, शंकरा, हिंडौल, |
|
मिथुन |
जैजैवंति, कामोद, छयानट,
देश, व्रिंदावनिसारंग, शुध्कल्यान, तिलकामोद, देश्कार,
दर्बारि और कन्ह्ड |
|
कर्क |
कान्हड, मल्हार, सारंग, शुधकलावति, आनंद्भैर्वि, काफि, धनाश्री, शाह्नाकान्हड, |
|
सिह |
अडाना, केदार, चम्पाकलि,
देव्रंजनि, नट्बिहाग, नंद,
परज, पहाडी, पट्मंजरि,
बसंत, श्यामकल्यान, मांड,
|
|
कन्या |
अहीरभैरव, गुणकलि, गुर्जरितोडि,
गौरि, त्रिवेनि, पुर्व्कल्यान,
मार्वा, श्री, |
|
तुला |
शिव्रंजनि, तोडी, भीपलासि,
मुल्तानि, मधुवंति, धानि,
काफि, जौंनपुरि, देव्घंधार,
पीलु |
|
व्रिश्चिक |
यमन, श्याम कल्यान, शुध्सारन्ग,
सरस्वति, केदार, पूरिया,
हन्डौल, श्याम केदार, ललित
पंचम, भटीयार, प्रभातपंचम |
|
धनु |
हमीर, दुर्गा, देश्कार,
गुणकलि, जौनपूरि, बिलावल,
विभास, मार्वा, सोहनि,
हिंडौल |
|
मकर |
प्रदीप, दीपक, यमन,
खमाज, तिलक, दीपक,
पूर्वि, पूरिया, मारुबिहाग,
शंकरा |
|
कुम्भ |
आभोगि, गारा, झिंझोटि,
धानि, पीलु, रागेशवरि,
कलावति, सरस्वति, मधुकौस,
आसावरि |
|
मीन |
भैरव, तोडि, जोगिया,
बसंत, ललित, च्न्द्रकौंस,
विभास, गांधारि(आसव्रि), गुंणकलि, जौंनपुरि, दर्बारि,
गंधार, देव् गंधार, बिलासखानि
तोडि, भैरव भैरवी
|
वर्तमान समय में भारतीय चिकित्सक और विदेशी चिकित्सकों ने भारतीय शास्त्रीय
संगीत के महत्व को स्वीकार किया है। संगीत के द्वारा चिकित्सा, यह कुशल चिकित्सक और प्रवीण संगीतज्ञ के द्वारा की जा सकती है। लेकिन यदि
शास्त्रीय संगीत को एक व्यायाम के रूप में उपयोग में लिया जाए तो वह प्रत्येक
मनुष्य के लिए लाभप्रद होगा। संगीत की तीनों विधाएँ गायन, वादन और नृत्य व्यायाम का कार्य करती है।गायन के लिए शरीर को पर्याप्त प्रयास
करने पड़ते है, जिसके कारण
रक्तसंचार में वृद्धि और पाचन क्रिया में सुधार होता है। वक्ष और उदर की
मांसपेशियाँ भी प्रभावित होती है। आलाप-तान आदि क्रियाओं से फेफड़े अधिक सक्रिय
होकर श्वास सम्बंधित व्यायाम हो जाता है। उसी प्रकार ओम् शब्द पर साधना करते समय ‘ओ’ शब्द से संपूर्ण शरीर में तथा ‘म’ शब्द के उच्चारण से मस्तिष्क में कम्पन्न
उत्पन्न होता है। जो हमारे शारीरिक और मानसिक स्वस्थ के लिए लाभप्रद है। इस प्रकार
गायन से फेफड़ो के साथ उदर, वक्ष और
मांसपेशियों में भी सक्रियता आती है। रक्तसंचार के बढ़ने से स्फूर्ति रहती है।
चित्त प्रसन्न रहता है। यह पाचन तंत्र को विशेष रूप से प्रभावित करता है। वाद्य-संगीत
की अपेक्षा कंठ संगीत का प्रभाव मानसिक और शारीरिक दोनों दृष्टियों से अधिक हितकर
है।
भारतीय चिंतन के अनुसार संगीत के सात स्वर मानव शरीर में स्थित सात चक्रों को
झंकृत करते हुए निकलते है। यदि हम संयमपूर्वक मेरु दण्ड को सीधा और स्थिर रखते हुए
संगीत के सप्त स्वरों का और अलंकारों का अभ्यास नियमित करें तो शरीर-स्थित सप्त
चक्र झंकृत होते हुए स्पष्ट प्रतीत होने लगते है। यह चक्र दूषित हो गए तो शरीर में
विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते है। उदाहणार्थ—मणिपूर चक्र के दूषित होने पर पाचन सम्बन्धी रोग और अनाहत
चक्र के दूषित होने से ह्रदय सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते है। प्राचीन काल से ही
संगीतज्ञों की यह मान्यता थी कि ध्वनि स्थायु-विद्युत के रूप में नाभि-केंद्र से
उठकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचती है। इससे स्वर-संधान के साथ षट् चक्रों के सुप्त
संधान भी जागृत होते है। इस प्रकार शारीरिक और मानसिक असंतुलन को स्वर-विज्ञान कि
सहायता से संतुलित किया जा सकता है। अनेक शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष प्रस्तापित
किया है कि ध्वनी-तरंगे कानों द्वारा ग्रहण किये जाने के पश्चात् संवेदी
तंत्रिकाओं के माध्यम से मस्तिष्क के मध्य तक पहुँचती है और वही से न्यूरॉन की
संरचना द्वारा मस्तिष्क के अन्य भागों तक पहुँचती है।
संगीत के माध्यम से मानसिक दशा के साथ-साथ बुनियादी शारीरिक दशाओं को भी बदला
जा सकता है। कुछ शास्त्रज्ञों का मानना है कि प्रतिदिन संगीत का अभ्यास करने वाले
व्यक्ति के मस्तिष्क में कोशिकाओं की संख्या अन्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक
होती है।
गायन के समान वादन भी एक मृदु और मनोरंजक व्यायाम है। इससे शरीर और मन पर
अनुकूल प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य की हथेलियों और पैरों के तलवों में ऐसे
केंद्र होते है जिनका सम्बन्ध शरीर के विभिन्न अंगों से होता है। वैदिक शास्त्र
में इसे प्रेशर-पॉइंट कहते है। एक्यूप्रेशर पद्धति में इन्ही प्रेशर पॉइंटो पर
दबाव डालकर रोगों की चिकित्सा की जाती है। जब तबला या पखावज का वादन करते है तब इन
प्रेशर-पॉइंट पर दबाव पड़ता है और रोग निवारण में सहायता होती है।
नृत्य से शरीर के सभी अंगों का व्यायाम पूर्णरूप से हो जाता है। भ्रू, नयन, भुजा, करि, पाद, ग्रीवा आदि का संचालन नृत्य में विशेष महत्व रखता है। इन्ही के साथ-साथ उदर,
वक्ष, फेफड़े, श्वास-तंत्र, पाचन तंत्र, रक्त संचालन भी विशेष रूप से प्रभावित होते है। नृत्य से
बाह्य और आंतरिक अंग सक्रिय हो जाते है।
शास्त्रीय नृत्य और ‘ऐरोबिक’ के बीच प्रख्यात नृत्यांगना डॉ नीलम वर्मा ने
ताल-मेल बैठाया है। उनका मानना है कि नृत्य से रीढ़ और पॉस्चर सम्बन्धी विभिन्न
परेशानियों से राहत मिलती है और व्यक्तित्व का विकास भी होता है। इस प्रकार शारीरिक
स्वस्थ्य के साथ ही मस्तिष्क को तरौ-ताज़ा बनाये रखने में भी सहायक है।
सारांश स्वरुप कह सकते है कि शरीर के प्रत्येक अवयव पर स्वास्थवर्धक और
अतिशीघ्र प्रभाव डालने वाली संगीत ही उपयुक्त पद्धति है। पाईथागोरस का भी मानना था
कि संगीत न केवल व्याधियों से छुटकारा दिलाता है अपितु चरित्र निर्माण में भी
सहायक सिद्ध होता है
ज्योतिष में जिस प्रकार हर रोग का संबंध किसी न किसी ग्रह विशेष से होता है
उसी प्रकार संगीत की हर ध्वनि या हर सुर व राग का संबंध किसी न किसी ग्रह से अवश्य
होता है। गंधर्व-वेद जो उपवेद भी कहलाता है, संगीत पर आधारित है। इसमें भी रोगियों के उपचार के लिए
संगीत का उपयोग किए जाने का उल्लेख है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार यदि किसी जातक
को किसी ग्रह विशेष से संबंधित रोग हो और उसे उस ग्रह से संबंधित राग, सुर अथवा गीत सुनाए जाएं तो जातक विशेष जल्दी
ही स्वस्थ हो जाता है। आइए जानते हैं कि ऐसे बहुत से रोग व उनसे राहत देने वाले और
रागों के विषय में...निम्न शास्त्रीय रागों का उल्लेख किया किया गया है। इन रागों
में कोई भी गीत, संगीत, भजन या वाद्य यंत्र बजाकर लाभ प्राप्त किया जा
सकता है।
1) हृदयरोग : इस रोग में राग दरबारी व राग सारंग से संबंधित
संगीत सुनना लाभदायक है। मध्यम सितार वादन से फायदा होता है, तेज संगीत न सुनें।
2) अनिद्रा : यह रोग हमारे जीवन में होने वाले सबसे साधारण
रोगों में से एक है। इस रोग के होने पर राग भैरवी व राग सोहनी सुनना लाभकारी होता
है। बिस्तर पर शांतचित्त होकर मध्यम बांसुरी वादन सुनने से फायदा होता है।
3) पित्त रोग : इस रोग के होने पर राग खमाज सुनने से लाभ मिलता
है। खाना खाते समय विशेषकर पानी-हवा जैसी प्राकृतिक ध्वनियों से परिपूर्ण मध्यम
स्वर लहरियां सुनने से फायदा होता है।
4) कमजोरी : यह रोग शारीरिक शक्तिहीनता से संबंधित है। इस रोग
से पीड़ित व्यक्ति कुछ भी काम कर पाने में खुद को असमर्थ महसूस करता है। इस रोग के
होने पर राग जय जयवंती सुनना या गाना लाभदायक होता है। उत्साह का संचार करने के
लिए थोड़ा तेज संगीत सुनें।
5) याददाश्त : जिन लोगों की याददाश्त कम हो या कम हो रही हो,
उन्हें राग शिवरंजनी सुनने से बहुत लाभ मिलता
है। वीणा वादन और बांसुरी सुनने से अत्यधिक फायदा होता ।
6) खून की कमी या शारीरिक कमजोरी से पीड़ित होने पर व्यक्ति
निस्तेज रहता है। राग पीलू से संबंधित गीत सुनने से लाभ पाया जा सकता है। मृदंग और
ढोलक से उत्साह का संचार होता है।
7) मनोरोग अथवा डिप्रेशन : इस रोग में राग बिहाग व राग मधुवंती
सुनना लाभदायक होता है। घुंघरू और तबला सुनना मन प्रसन्न करता है।
8) रक्तचाप : उच्च रक्तचाप में धीमी गति और निम्न रक्तचाप में
तीव्र गति का गीत-संगीत लाभ देता है। वीणा वादन सुनना अति लाभदायक होता है।
9) सांस संबधी रोग जैसे अस्थमा : इस रोग में आस्था-भक्ति पर
आधारित गीत-संगीत सुनने व गाने से लाभ होता है। राग मालकौंस व राग ललित से संबंधित
गीत इस रोग में सुने जा सकते हैं। प्राकृतिक स्वर लहरियां जैसे समुद्र की लहरें या
पानी की कल-कल से अत्यंत फायदा होता है।
ज्योतिष ग्रह संगीत में सफलता
कैसे हो गायन या वादन में सफल बनेंगे ?
आज का युग कठिन प्रतिस्पर्धा का युग है। पहले के जमाने में हीरो बनने आए गायक
बन गए। कई सफल उदाहरण है - जैसे स्वर्गीय मुकेश, स्वर्गीय मोहम्मद रफी, स्वर्गीय किशोर कुमार, के.एल.सहगल, उमादेवी, सुलक्षणा पंडित आदि कई ऐसे कलाकार हैं, जो गायन और अभिनय दोनों में काफी सफल रहे। उनके
गाए गीत आज भी यादगार हैं। आज प्रतिस्पर्धा का युग है इसमें वही सफल होता है जिसकी
आवाज में दम है। जो वास्तव में सफल होना चाहते हैं, वे जानें कि क्या कहते हैं उनके सितारे।
गायन के लिए आवाज सुरीली होना चाहिए और हौंसले बुलंद हों। बगैर रियाज के कोई
भी, किसी भी क्षेत्र में सफल
नहीं हो सकता। अतः सबसे पहले संगीत की जिस विधा में जाना हो उस विधा में अपनी
अच्छी पकड़ बनाना चाहिए। तभी जाकर प्रतियोगिता में उतरना चाहिए। गायन के क्षेत्र
में सुर के ज्ञान के साथ-साथ सितारों का भी भरपूर सहयोग होना चाहिए।
बचपन से ही अपने ग्रहों की स्थिति देखकर इस क्षेत्र में उतरना चाहिए। ग्रह
बलवान हो व भाग्य का साथ हो तो सफलता भी कदम चूमती है। जन्मपत्रिका में लग्न स्वयं
को दर्शाता है व द्वितीय भाव वाणी को, तृतीय भाव स्वर को दर्शाता है। नवम भाव भाग्य का होता है वहीं आस्था का भी
प्रतीक है। स्वर व आवाज के बगैर गायन में सफलता मिलना संभव नहीं है। अतः द्वितीय
भाव के साथ-साथ तृतीय भाव का शुभ होना भी आवश्यक है। नवम भाव का स्वामी शुभ स्थिति
में हो व लग्न के साथ-साथ लग्नेश भी शुभ हो।
उपरोक्त भावों का लग्न में शुभ होना आवश्यक है, वही नवमांश में भी उनकी स्थिति शुभ होना चाहिए। तभी जाकर
उत्तम सफलता मिलती है। आप जिस गाने को गा रहे हैं उसे कई-कई बार सुने व खूब अच्छी
तरह समझे। इस समझ के लिए आपकी पत्रिका में गुरु का शुभ होना आवश्यक है। गुरु
सूझबूझ व समझ का कारक है।
इसके शुक्र कला का कारक है इसका भी शुभ स्थिति में होना अनिवार्य है। चन्द्रमा
के बगैर गायन की स्थिति का अन्दाजा नहीं लगा सकते अत: चन्द्र का शुभ स्थिति में
होना अति आवश्यक है।
लग्न खुद के व्यक्तित्व को दर्शाता है। वृषभ लग्न शुक्र प्रधान होता है। गायन
के क्षेत्र में इसी का योगदान होता है। इस लग्न में शुक्र तृतीय भाव में हो व
द्वितीय भाव में शुभ ग्रह होने के साथ-साथ तृतीयेश शुभ होकर चतुर्थ स्थान में हो
तो ऐसा जातक सफल गायक बनता है। धनवान होता है और जनता के बीच प्रसिद्घ होता है।
कन्या लग्न में बुध स्वराशि का हो या लग्न में हो द्वितीय भाव का स्वामी शुक्र
नवम में हो या द्वितीय भाव में स्वराशि का हो व मंगल तृतीय में हो या तृतीयेश को
देखता हो तो ऐसा जातक संगीत में अच्छी सफलता पाता हैं। कर्क लग्न में चंद्र या
उच्च का हो व सूर्य बुध की युति तृतीय या द्वितीय में हो तो गायन में अच्छी सफलता
पाता है। तुला लग्न में शुक्र लग्न में ही हो तो ऐसा जातक शास्त्रीय गायन में सफल
होता है। इस लग्न में गुरु मंगल शुक्र के स्थान में हो तो ऐसा जातक आधुनिक गायन के
क्षेत्र में अच्छी सफलता पाता है।
मीन लग्न में गुरु शुभ स्थिति में, द्वितीय भाव में मंगल या द्वितीय भाव में शुभ ग्रह हो तृतीयेश शुक्र शुभ स्थान
में हो तो सुगम संगीत में अच्छी सफलता दिलाता है। कोई भी ग्रह लग्न, द्वितीय, तृतीय व नवम भाव में न तो नीच का हो, ना ही इन भावों के स्वामी नीच के हो, ना ही इन दृष्टि हो। तब ही जाकर संगीत में उत्तम सफलता पाई
जा सकती है।
गायन के लिए सूर्य चंद्र बुद्ध शुक्र बृहस्पति,राहू
वादनके लिए गायन के लिए सूर्य चंद्र बुद्ध शुक्र बृहस्पति मंगल शनि केतु
द्वितीय में बुध शुक्र की राशि में हो तो
बांसुरी वादन करे
हस्त नक्षत्र में जन्मा व्यक्ति harmonium, tabla, dholak,वादन करे
तृतीया में या तृतीयेश से चंद्र बुध शुक्र केतु हो चर्म वादन करे शनि होतो
हारमोनियम या तार के साज़ बजाये
का आपस में लग्न द्वितीय, तृतीया, चतुर्थ, पंचम नवम अष्टम दशम और एकदाश में अनुकूल दृस्टि मैत्री या
युति सम्बन्ध हो क्यूकि
लग्न शारीरिक शक्ति, इच्छाशक्ति,
सहज सफलता, आकर्षण गठन सौंदर्य
अभिव्यक्ति और सफलता का सूचक है
द्वितीय गायन मुख कंठ वाणी और वचन का है इसका अच्छा होना अति आवश्यक है
तृतीया आपके कर्ण का है आप अच्छे काँन सेन होंगे तभी स्वर श्रुति नाद भेद करके
ग्रहण करेंगे और उसी ध्वनि नाद में स्पस्ट
और स्वर भाव रास काव्य लय का प्रयोग करोगे या बाहुबल से साज़ से बजाने के पराक्रम
और प्रसिद्धि का है
चतुर्थ जनता का है, जनताजनार्दन आपके संगीत को स्वीकार करे उन्हें सुख मिले वो Mass
popularity in less concerts यहाँ से निर्णय होगा
पंचम सबसे महत्वपूर्ण शुभ भाव ये आपके सुनने का श्रवण श्रुति के
प्रतिबिम्बन करने का भी है अच्छा काँनसेन
ही श्रेष्ठ तानसेन बनसकता है और सुनकर वैसे आवाज़ निकलना या बजना बारीकी से आवाज़ को तराशने चमकाने और तैयार करने का घर है
..केवल कॉपी करना या अच्छी आवाज़ या सुरीलेपन से बात नहीं बनेगी वो तो प्राकृतिक है
किन्तु जबतक गुरु से शिक्षा लेकर पत्थर से मूर्ति की तरह आवाज़ का निर्माण न हो तो
...असफल ही होंगे...ये स्थान इंजन की तरह महत्व पूर्ण है ...आपके वाणी व्याकरण
संगीत ज्ञान की अभिव्यक्ति कल्पना रचनात्मकता स्वर विन्यास और वाणी के सुख का
स्थान है
नवम भाग्य है बिना भाग्य के मंच ही न मिले तो सब ख़तम
दशम कार्यक्षेत्र कर्म है रिआज़ मेहनत और
सफलता के साथ व्यावसायिक दृश्टिकोण नहीं तो लोग शोषण करेंगे इसलिए प्रोफ़ेशनल
बने,पैसा सभी की ज़रूरत है,
जिस क्षेत्र को समय दिया वो देने को तत्पर होता
है किन्तु नॉनप्रॉफेशनल या लिहाज़ या रूढ़िवादी
संगीत का व्यावसायिक उच्च नीच वर्गीकरण या बेमतलब की साधुगिरी या सूफिज्म ये वो करते है जो इनएक्टिव या
परिवर्तन शील ना होकर सामाजिक दार्शनिकता की तारीफ या मनघडंत नियम बनाते है वे
अच्छे कलाकार होकर भी गुमनाम ही रहते है ....एक स्पस्ट सूत्र याद रखिये जो इन
व्यवसायो डॉक्टर,वकील, ज्योतिष, कंसलटेंट, मास्टर, कलाकार,
के लिए एकदम सटीक है
"विद्या अनमोल है कोई उसको खरीद नहीं सकता या कीमत नहीं लगा
सकता किन्तु समय बेश कीमती है जो सिद्ध कलाकार साधकर कुछ समय के लिए प्रस्तुत करता
है"
अंत में एकादश भाव यश मान प्रतिष्ठा लाभ और प्रशंशा प्राप्ति का है
उपरोक्त सभी अवयवोका समन्वय आपको सफल बनाएगा
कलाकार बनने के योग
1-अभिनय या गायन में आवाज का प्रमुख रोल होता है। यदि आवाज अच्छी नहीं है तो
अभिनय व गायन क्षेत्र में सफल होना मुश्किल है। कुण्डली में द्वितीय भाव वाणी से
सम्बन्धित होता है और पंचम भाव मनोरंजन का कारक होता है। दशम भाव जो अजीविका का
कारक होता है, उसका द्वितीय व पंचम
भाव से सम्बन्ध होना जरूरी है।
2-वृष लग्न अथवा तुला लग्न की कुण्डली में बुध व शुक्र की यूति दशम या पंचम भाव
में हो साथ में राहु बलवान हो तो व्यक्ति अभिनय के संसार में ख्याति प्राप्त करता
है।
3-यदि कुण्डली में पंचम भाव पर लग्नेश की दृष्टि हो व साथ में शुक्र व गुरू
देखते हो तो कलाकार बनने के योग होते है।
4-बुध, शुक्र व लग्नेश जिस जातक
की कुण्डली में हो और राहु उच्च का या त्रिकोण में तो व्यक्ति कलाकार के क्षेत्र
में अपना करियर बना सकता है।
5-लग्न पर कम से कम दो शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और तृतीय भाव का स्वामी शुक्र के
साथ युति सम्बन्ध बना रहा हो तो जातक कलाकार बन सकता है।
6-चन्द्रमा पंचम, दशम व एकादश भाव
में उच्च का या स्वराशि का हो और शुक्र द्वितीय भाव में हो या चन्द्रमा के साथ
उसकी युति हो तो व्यक्ति कला के क्षेत्र में अपना करियर चुनता है।
7-यदि आपकी कुण्डली में मालव्य योग, शश योग, गजकेसरी योग, सरस्वती योग व प्रसिद्ध योग आदि है तो आप कला
की दुनिया में अपना नाम कमा सकते है।
8- उच्च के शुक्र का 3 रे
चन्द्र को देखना
शुक्र
बनाता है कलाकार
शुक्र
बनाता है कलाकार कला के क्षेत्र में प्रसिद्धि और
लक्ष्मी दोनों ही भरपूर होती है। कोई व्यक्ति कलाकार (विशेषत: गायक, वादक, नर्तक)
बनेगा या नहीं यह उसकी कुंडली में शुक्र की स्थिति पर निर्भर करता है। वृष और तुला
लग्न या राशि चूँकि स्वयं शुक्र के स्वामित्व होते हैं अत: इन व्यक्तियों का कला
की तरफ स्वाभाविक झुकाव रहता है। अन्य लग्नों में यदि शुक्र लग्न या पंचम भाव से
संबंध रखता हो, केंद्र या पंचम भाव में स्थित हो तो
व्यक्ति की कला में रूचि रहती है। शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति
कला को व्यवसाय के रूप में अपनाता है। शुक्र की नवम-दशम स्थिति भी यही फल दर्शाती
है। शुक्र की चंद्रमा से युति-प्रतियुति व्यक्ति को कल्पनाशील बनाती है (लेखन आदि)। गुरु
का साथ गीत-संगीत में आध्यात्मिक अनुभूति वाला है, शुक्र-बुध की युति कला क्षेत्र में
व्यावसायिक सफलता दिलाती है। मजबूत सूर्य का होना भी कुंडली में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाता है। सूर्य और शुक्र प्रबल होने पर ही व्यक्ति को कला से धन व यश दोनों
मिलता है अन्यथा कला केवल जीवनयापन का साधन बनकर रह जाती है। शुक्र को मजबूत करने
के लिए कुछ उपाय : * दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या लक्ष्मी चालीसा का
पाठ करें। * सफेद वस्तु का दान व सेवन करें। * शुक्रवार को खीर खाने से भी शुक्र
मजबूत होता है। * हीरा धारण किया जा सकता है। * स्त्री का आदर-सम्मान करें। शुक्र
के अतिरिक्त सूर्य को मजबूत करने के भी उपाय करें ताकि धन और यश दोनों ही आपके
सहभागी बन सकें।
कलाकार बनने के योग कुण्डली में (Astrology Yogas For Artist Profession)
कला जगत में नाम, शोहरत एवं पैसा है, इस कारण से लोगों कला जगत में अपनी किस्मत आजमाने की कोशिश करते हैं. परंतु, सच यह है कि किसे किस क्षेत्र में सफलता मिलेगी वह ईश्वर पहले से तय करके धरती पर भेजता है. कला जगत में भी कई काम हैं जैसे अभिनय, गायन, नृत्य, लेखन आदि. कौन व्यक्ति अभिनेता बन सकता है कौन गीतकार तथा कौन गायक यह उस व्यक्ति की कुण्डली से ज्ञात किया जा सकता है. जिस व्यक्ति की कुण्डली में जो योग मजबूत होगा कला के उस क्षेत्र में व्यक्ति के सफल होने की उतनी ही अधिक संभावना रहेगी.
आपके लिए कौन व्यवसाय उपयुक्त होगा?
ज्योतिष में जातक अपने कार्य क्षेत्र से जुड़े सभी प्रश्नों के हल समझ पाने में सक्षम होता है. ज्योतिष शास्त्र में बहुत से ऎसे योगों का विवरण प्राप्त होता है, जो जातक के व्यवसाय में सहायक बन सकते हैं. कई ऐसे योगों का निर्माण होता है जो बताते हैं कि जातक किस क्षेत्र में बेहतर कर सकता है. कुछ लोग सैना में तो कुछ लोग लेखन में तो कुछ लोग कला जगत इत्यादि स्थानों पर प्रसिद्धि पाते हैं. इन सभी बातों के बारे में बेहतर रुप से जानने में ज्योतिष मदद करता है. अगर हम इस बात को समझ पाएं तो ये स्थिति हमारे लिए बहुत सहायक बन सकती है. ज्योतिष के द्वारा संभावनाओं की तलाश में हम सफल भी होते हैं.
कला जगत में सफलता दिलाने वाले ग्रह (Planets that bring success in the arts)
ज्योतिषशास्त्र में शुक्र को कला एवं सौंदर्य का कारक माना जाता है. शुक्र से ही संगीत, नृत्य, अभिनय की योग्यता आती है. शुक्र के द्वारा रुप सौदर्य से और अपनी भाव भंगिमाओं से ही एक कलाकार अच्छे अभिनय को जन्म दे सकता है.
बुध बुद्धि और वाणी का प्रभाव देता है. एक प्रभावशाली रुप से बोले गए संवाद से दूसरों के मन में जातक अपनी पहचान को स्थापित कर पाएगा. कला जगत में कामयाबी के लिए इन तीनों ग्रहों का शुभ एवं मजबूत होना बहुत ही आवश्यक है.
चंद्रमा को कला के क्षेत्र में काम करने की अभिरुचि देने वाला कहा गया है. क्योंकि सिनेमा जगत में कलाकार के साथ सफलता और असफलता बनी ही रहती है ऐसे में इस स्थिति का सामना वही कर सकता है जिसका मन मजबूत हो. अगर जातक का मन कमजोर हुआ तो वह जल्द ही हार मान जाएगा और उस स्थान से लौट आएगा.
इस लिए शुक्र, बुध, चंद्रमा का सहयोग कला के क्षेत्र में आपके लिए बहुत सहायक बनता है.
कला जगत में सफलता के लिए भाव एवं भावेश की स्थिति (The position of Bhava and Bhavesh for success in arts)
अभिनय तथा गायन में वाणी प्रमुख होता है. वाणी का भाव दूसरा भाव होता है. पांचवां भाव मनोरंजन स्थान होता है. इन दोनों भावों के साथ ही साथ दशम भाव जो आजीविका का भाव माना जाता है इन सभी से यह आंकलन किया जाता है कि कोई व्यक्ति कलाकार बनेगा या नहीं अथवा कला के किस क्षेत्र में उसे अधिक सफलता मिलेगी. लग्न तथा लग्नेश भी इस विषय में काफी प्रमुख माने जाते हैं (Lagna and lagna lord are also important to judge whether person will be artistic).
एक्टिंग के लिए लग्न और उसका प्रभाव
जातक का लग्न व लग्नेश अत्यधिक बली होना चाहिए. लग्न के मजबूत होने के कारण ही जातक अपने काम में कितना मजबूती से आगे बढ़ सकता है, क्या उसके व्यक्तित्व में वो छाप है जो उसे दूसरों से अलग दिखा सके, उसके द्वारा की गई एक्टिंग को लोग हमेशा याद रख पाएं. इन बातों को समझने के लिए लग्न और लग्नेश की स्थिति देखनी अत्यंत आवश्यक होती है.
जातक के लग्न और लग्नेश के मजबूत होने पर व्यक्ति के भीतर कार्य करने की उत्सुकता आती है और उसका लगाव अपने क्षेत्र से कितना होगा, इसे समझने के लिए भी हमे लग्न और लग्नेश की स्थिति को देखना ज़रुरी होता है.
अभिनय और तीसरा भाव
कुण्डली के तीसरे भाव से जातक के साहस और उसकी क्षमताओं को समझने में मदद मिलती है. इस भाव से व्यक्ति में संघर्ष करने की क्षमता, उसके रुझान उसकी रुचि जैसे की उसे किस चीज में काम को करना ज्यादा पसंद है इत्यादि बातें इसी भाव से देखी जाती हैं. इसके साथ ही कलात्मक अभिरुचि से जुड़ा कोई भी क्षेत्र रहा हो उसे हम इस तीसरे भाव से देख सकते हैं.
तीसरे भाव पर शुभ ग्रहों का प्रभाव अधिक होने पर जातक कला से जुड़े क्षेत्रों में ज़रुर जाता है. तीसरे भाव के प्रभाव स्वरूप जातक में रचनात्मक गुण आते हैं और वह चीजों को कलात्मक रुप से कर सकता है. सृजनात्मकता करने में भी वह योग्य होता है.
पंचम भाव या पंचमेश का संबंध तीसरे भाव और शुक्र से बनने पर जातक में अभिनय करने की योग्यता देखने को मिलती है. जातक अभिनय के क्षेत्र में अपना नाम भी कमा सकेगा. जन्म कुण्डली में लग्न या लग्नेश से तीसरे भाव का संबध बनता है तो ये योग भी कला की वृद्धि करने में सहायक होता है. कुण्डला का तीसरा भाव मीडिया, लेखन और संचार साधनों को दर्शाता है. यदि इस भाव में शुभ प्रभाव हुआ तो व्यक्ति को अपने काम में सकारात्मकता और प्रसिद्धि भी मिल सकेगी.
एक्टिंग में पांचवें भाव का महत्व
कला के क्षेत्र में जन्म कुण्डली के पांचवें भाव का आंकलन भी किया जाता है. एक कलाकार की जन्म कुण्डली में पांचवा भाव उसकी बुद्धि कौशल एवं अपने डॉयलाग को याद रख पाने, उसे पेश कर पाने की अभिव्यक्ति इसी से देखी जा सकती है. जातक की कुण्डली में पंचम भाव का संबंध जब दशम भाव से या दशमेश से बनता है तो व्यक्ति कला क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर पाता है.
जन्म कुण्डली का पांचवां भाव को एन्टरटेन्मेंट का भाव भी होता है. इसलिए पांचवां भाव मनोरंजन और दसवां भाव कमाई का भाव कहलाता है और जब इन दोनों का संबंध बनता है तो जातक को कला क्षेत्र से काम और लाभ दोनों मिल सकते हैं.
कालाकार बनने में दसवां भाव और उसका महत्व
जन्म कुण्डली का हर भाव महत्वपूर्ण होता है और कुण्डली में भाव के विचार द्वारा आधार द्वारा जातक के विषय में विस्तार से समझने में मदद मिल सकती है. जन्म कुण्डली का दसवां भाव कर्म भाव कहलाता है और इस भाव से जातक के काम उसके व्यवसाय को समझने में मदद मिलती है. दसवें भाव का राशि स्वामी और इस भाव में स्थित ग्रहों के द्वारा जातक के व्यवसाय और उसके रुझान को समझने में सहायता मिलती है. इसके साथ ही दशम भाव पर दृष्ट ग्रहों का प्रभाव भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
विशेष :बली लग्न-लग्नेश, बली पंचम-पंचमेश, बली तृतीय भाव व तृतीयेश तथा बली दशम भाव व दशमेश का आपस में जितना शुभ संबंध बनेगा उतना ही अच्छा कलाकार व्यक्ति बनेगा. इन सभी भावों का जितना कमजोर संबंध होगा व्यक्ति की अभिनय क्षमता भी उसी प्रकार से होगी.
अभिनय, गायन एवं संगीत में सफलता दिलाने वाले योग (Yogas that bring success in Acting, Singing and Music)
वृष लग्न अथवा तुला लग्न की कुण्डली शुक्र एवं बुध की युति दशम अथवा पंचम में भाव में हो तो व्यक्ति अभिनय की दुनियां में ख्याति प्राप्त कर सकता है. पंचम भाव जिसे मनोरंजन भाव कहते हैं उस पर लग्नेश की दृष्टि हो साथ ही शुक्र या गुरू भी उसे देखते हों तो व्यक्ति अभिनय की दुनियां में अपना कैरियर बना सकता है. शुक्र, बुध एवं लग्नेश जिस व्यक्ति की कुण्डली में केन्द्र भाव में बैठे हों उन्हें कला जगत में कामयाबी मिलने की अच्छी संभावना रहती है. तृतीय भाव का स्वामी शुक्र के साथ युति सम्बन्ध बनाता है तो व्यक्ति कलाकर बना सकता है.
कुण्डली में मालव्य योग, शश योग, गजकेशरी योग, सरस्वती योग (Malavya yoga, shasha yoga, gajkesari yoga, saraswati yoga) हों तो व्यक्ति के अंदर कलात्मक गुण मौजूद होता है. अपनी रूचि के अनुरूप वह जिस क्षेत्र में अपनी योग्यता को निखारता है उसमें सफलता मिलने की पूरी संभावना रहती है. चंद्रमा पंचम, दशम अथवा एकादश भाव में स्वराशि में बैठा हो तथा शुक्र शुक्र दूसरे घर में स्थित हो या चन्द्र के साथ इन भावों में युति बनाये तो कलाकार बनने के लिए व्यक्ति को प्रेरणा मिलता है. शुक्र चन्द्र की इस स्थिति में व्यक्ति अभिनय या गीत, संगीत में नाम रोशन कर पाता है. गुरू चन्द्र एक दूसरे को षष्टम अष्टम दृष्ट से देखता है साथ ही गुरू यदि आय भाव का स्वामी हो तो व्यक्ति कला जगत से आय प्राप्त करता है.
हर व्यक्ति के मन में एक कलाकार होता ही है. कुछ में वह सामने नहीं आ पाता है तो कुछ में यह प्रतिभा स्वयं ही बाहर आ जाती है. कला क्षेत्र में बहुत लोग प्रयास करते हैं लेकिन उनमें से कुछ को अभिनय की दुनिया में सफलता मिल जाती है तो कुछ को बहुत अधिक सफल नही हो पाते हैं, और यही बात को हम ज्योतिष द्वारा बहुत आसानी से समझ सकते हैं
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