ज्योतिष और सनातन व्रत उपासना विशेषांक
ज्योतिष और सनातन व्रत उपासना विशेषांक
उपवास या व्रत किसी
देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए नहीं किया जाता है । देवी-देवता का रोल यही
होता है कि वह साक्षी रहते है, आपके उपवास या
व्रत के।
व्रत का मतलब होता है -
प्रतिज्ञा। किस चीज़ को किस अमुक दिन को खाना है या करना है, और कितनी मात्रा में खाना है और कितनी बार खाना है या नहीं
खाना है, यह व्रत मनुष्य ही ले
सकता है, जानवर नहीं। जानवर के
सामने जो भी रखगो, जब भी रखगो,
खाना शुरू कर देता है।
मनुष्य, मनुष्य इसलिए है क्योकि उसमे चुनाव करने की
क्षमता है, निर्णय लेने की क्षमता
है। मनुष्य के अंदर वह क्षमता है कि अपनी प्रतिज्ञा से अपने मन-मुताबिक काम को
अंजाम दे सकता है।
कुछ लोग इसे उपवास भी
कहते है। उपवास दो शब्दो से मिलकर बना है - उप और वास । यह दोनों संस्कृत शब्द है।
उप का मतलब होता है - नजदीक और वास का मतलब होता है - निवास। इस तरह से उपवास का
मतलब हुआ - नजदीक में निवास ।
नजदीक में निवास ! क्या
मतलब ?
हम शरीर या मष्तिष्क नहीं
है, यह तो क्षणिक और निश्चित
नश्वर है। शरीर के नष्ट होने की वस्तु इसके अंदर ही विद्यमान है। धीरे-धीरे समय के
साथ, वह अपना काम कर रही है।
कोई भी उपाय कर लो, इसको रोका नहीं
जा सकता। हम आत्मा है, जो अजर और अमर है,
जो शाश्वत है। इसको किसी भी विधि से नष्ट नहीं
किया जा सकता, और शरीर को किसी
भी विधि से बचाया नहीं जा सकता।
भोजन शरीर के लिए है।
हमारी इन्द्रिया, तरह-तरह के भोजन
और वासना की मांग करती रहती है। हम इस नश्वर चीज़ के शाश्वत मांग को पूरा करते-करते,
हम अपने आत्मा को दरकिनार कर देते है। आत्मा
सत्य और शरीर झूठा और धोखेबाज़। सत्य को पकडे रहने के लिए, सत्य का एहसास होना और इसके करीब होना बहुत ही ज़रूरी है।
उपवास इसलिए किया जाता है,
ताकि हम शारीरिक मांगो से ऊपर उठकर, अपने आत्मा के नज़दीक आ सके, और इसको समझ सके, और हमारे अंदर जो दैविक शक्ति है, उसको हम जागृत कर सके।
भूखे रहने से यही भी
एहसास होता है कि भूख या प्यास क्या होती है। भोजन और जल की अहमियत समझ में आता
है। भूखे और प्यासे सोने वालो की पीड़ा समझ में आती है । इससे मनुष्य भाव बढ़ता है।
उपवास ईश्वर से कुछ
माँगने के लिये नहीं, बल्कि अंदर की
जानवर की प्रवृति त्याग कर, मनुष्य बन कर
मनुष्य की सेवा के लिए की जाती है। तभी तो, उपवास के बाद, भंडरा या प्रसाद बाटने का प्रावधान है, ताकि सबको भोजन प्राप्त हो, और सभी खुश रहे। यह तभी संभव है, जब मनुष्य भौतिक चीज़ों से ऊपर उठकर, आत्मितकता को अपना जीवन का केंद्र बनाने का व्रत ले।
उपवास - आत्मा के होने का
एहसास के साथ-साथ, शरीर के
अशुद्धियो को भी नष्ट कर देती है। यानि उपवास में शारीरिक, मानसिक, आत्मिक, दैविक और सामाजिक(प्रसाद वितरण, भंडारा आदि) स्वस्थता लाने की शक्ति होती है।
व्रत के वैज्ञानिक लाभ
किसी उद्देश्य प्राप्ति
के लिए दिनभर में भोजन का सेवन न करना व्रत कहलाता है। हिंदू धर्म में व्रत रखने
को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। कहा जाता है कि लोग अपनी आस्था के अनुसार अगल-अलग
देवी-देवताओं के लिए व्रत रखते हैं। ज्योतिषियों का कहना है कि व्रत रखने से
देवी-देवता खुश होते हैं। व्रत को खास मौके पर रखा जाता है। कई बार साप्ताहिक व्रत
रखा जाता है तो कई बार किस खास मौके पर व्रत रखा जाता है।व्रत धर्म के मार्ग पर
चलने का एक साधन है। यह अपवित्रता का नाश करता है। यह तन-मन व आत्मा की शुद्धीकरण
करता है। यही नहीं, यह पुण्य के उदय
का आरंभ है। यह मनोकामना की पूर्ति का मार्ग है। और तो और, सफल व्रत परम पुरुषार्थ की सिद्धी होता है। यह शरीर के शोधन
की वैज्ञानिक पद्धति है। कहा गया है- लघनम् सर्वोत्तम् औषधं, अर्थात् व्रत ही सर्वश्रेष्ठ औषधि है।
तन का शुद्धीकरण
व्रत रखने से रक्त शुद्ध
होता है। इससे आतों की सफाई होती है। पेट को आराम मिलता है। उत्सर्जन तंत्र और
पाचन तंत्र, दोनों ही अपनी अशुद्धियों
से छुटकारा पाते हैं।
रोगों से मुक्ति
व्रत कई तरह के रोगों से
मुक्ति का रास्ता है। इससे सांस लेने की क्रिया ठीक होती है। फेफड़ों की सफाई हो
जाती है। उपवास रखना हृदय के लिए बहुत अच्छा माना गया है। यह कैलोस्ट्रोल के स्तर
को घटाता है। अर्थराइटिस, अस्थमा, इरिटेवल बॉवेल, आदि बीमारियों में यह कारगर है।
ऊर्जा का स्रोत
व्रत ताजगी का एहसास देता
है। आप यह महसूस करने लगते हैं कि आप खुल रहे हैं। आपके विकार दूर हो रहे हैं।
शरीर हल्का हो रहा है। यह शरीर में पहले से संचित कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन को इस्तेमाल होने का अवसर देता
है। उपवास से आपकी स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
सहनशक्ति प्रदान करना
व्रत आपकी सहनशक्ति को
बढ़ाता है। आप अपनी इन्द्रियों पर काबू रखना सीख जाते हैं। मन को शांति की
प्राप्ति होती है।
बेरुचि घटाने का काम
कई बार कई कारणों से भोजन
अरुचिकर लगने लगता है। दरअसल, इसमें स्वाद
ग्रहण करने वाली ग्रंथियां काम करना बंद कर देती हैं। ऐसे में, उपवास मुंह, जीभ और स्वाद ग्रहण करने वाली ग्रंथियों को आराम देता है।
और फिर से ये ग्रंथियां जागृत हो उठती हैं। भोजन प्रिय लगने लगते हैं।व्र
त रखने के धार्मिक महत्व
होने के अलावा कई वैज्ञानिक महत्व भी हैं। आयुर्वेद में बताया गया है कि व्रत रखने
से पाचन क्रिया को आराम मिलता है। अगर हम एक दिन कुछ नहीं खाते हैं तो हमारा पाचन
तन्त्र ठीक रहता है। इससे शरीर के हानिकारक तत्व बाहर निकलते हैं। जिस दिन व्रत
रखा जाता है उस दिन फैट बर्निंग प्रोसेस तेज हो जाता है, जिसेस शरीर की चर्बी तेजी से गलना शुरू हो जाती है। जिस दिन
व्रत रखा जाता है उस दिन मेटाबॉलिक रेट में तीन से 14 फीसदी तक बढ़ोत्तरी होती है। साथ ही व्रत रखने दिमाग भी
स्वास्थ्य रहता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ
कैलिफोर्निया के जानकारों के अनुसार कैंसर के मरीजों के लिए व्रत रखना बहुत
फायदेमंद होता है। जो मरीज कीमोथेरेपी ले रहे हैं उन लोगों के लिए व्रत रखना बहुत
ही महत्वपूर्ण होता है। कहा जाता है कि व्रत रखने से नई प्रतिरोधक कोशिकाएं बनती
हैं।
अगर हर सप्ताह उपवास रखा
जाता है तो शरीर में कोलेस्ट्राल की मात्रा घटती है, जो धमनियों के लिए बहुत लाभदायक होता है।
व्रत रखने से डिप्रेशन
जैसे परेशानियों से निजात मिलती है। इससे तनाव दूर होता है। जिस दिन व्रत रखा जाता
है उस दिन शरीर में ऊर्जा कम हो जाती है। शरीर की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए
लगातार पानी पीते रहने की जरूरत होती है।
डॉयबिटीज के रोगियों के
लिए व्रत रखना बहुत फायदेमंद माना जाता है। इससे हमारे शरीर को कार्बोहाइड्रेट्स
को प्राप्त करने की क्षमता बढ़ती है।
हमारी पौराणिक कथाओं में
प्रत्येक उपवास का कोई न कोई वैज्ञानिक आधार भी बताया गया है। उन्हें कर्मकांडों
से इसलिए जोड़ा गया, ताकि जनसाधारण
उपवास का वैज्ञानिक आधार समझे बिना भी उनकी जरूरत समझ सकें।
उपवास और भूख हड़ताल को
लेकर लोग अक्सर भ्रमित रहते हैं। भूख हड़ताल में कुछ भी खाया-पीया नहीं जाता है,
जबकि उपवास का अर्थ पांच ज्ञानेंद्रियों और
पांच कर्मेंद्रियों पर नियंत्रण से है। व्रत या उपवास में खाने-पीने पर रोक नहीं
है, लेकिन वह अनुशासित होना
चाहिए। वैदिक या आध्यात्मिक व्रत की चर्चा यजुर्वेद के कर्मकांड में भी की गई है।
भगवद्गीता के अनुसार
हमारा व्यवहार, विचार, भोजन और जीवनशैली तीन चीजों पर आधारित होती है-
सत्व, तमस और राजस। सात्विक
विचारों वाला व्यक्ति निश्चिंत स्वभाव का होता है और सृजनशील भी। राजसी विचारों
वाला व्यक्ति महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ लालची भी होता है। वहीं तामसी
प्रवृत्ति का व्यक्ति न सिर्फ नकारात्मक सोच रखता है, बल्कि वह गलत कार्यों में भी संलग्न रहता है।
योगी या ऋषि बनने का
मार्ग सात्विक विचारों से खुलता है। हम सभी सत्व, रजस और तमस के बीच झूलते रहते हैं। हमारा झुकाव राजसी और
तामसी प्रवृत्तियों की ओर न होने पाए, इसके लिए जरूरी है कि हम खुद को संतुलित करना सीखें। इसका एक प्रभावी तरीका है
वैदिक उपवास।
वैदिक उपवास कुछ और नहीं,
बल्कि 24 घंटे तक शरीर और मस्तिष्क को सत्व की स्थिति में रखने की
एक कोशिश है। यह कार्य समर्पण और अनुशासन के बिना हो पाना असंभव है। यह भी जरूरी
है कि उपवास जबर्दस्ती नहीं, बल्कि आंतरिक
प्रेरणा के तहत रखा जाए। साथ ही, उपवास के दौरान
राजसी-तामसी वस्तुओं के इस्तेमाल से पूरा परहेज बरता जाए।
अब सवाल है कि वह कौन सा
सात्विक भोजन है, जो उपवास में
ग्रहण किया जा सकता है। इसका जवाब है- दूध, घी, फल और मेवे। इनका
भोजन उपवास में इसलिए मान्य है, क्योंकि ये भगवान
को अर्पित की जाने वाली वस्तुएं हैं। वैसे भी प्रकृति प्रदत्त यह भोजन शरीर में
सात्विकता बढ़ाता है। भगवद्गीता के अनुसार मांस, अंडे, खट्टे और तले हुए,
नमकीन व ठंडे पदार्थ राजसी-तामसी प्रवृतियों को
बढ़ावा देते हैं। इसलिए वैदिक उपवास के दौरान इनका सेवन नहीं किया जाना चाहिए।
उपवास के दौरान किए जाने
वाले अनुष्ठानों का भी व्यापक अभिप्राय है। असल में इस तरह के अनुष्ठानों से शरीर
में पैदा होने वाले विषैले पदार्थों के प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है। शारीरिक
शुद्धि के लिए तुलसी जल, अदरक का पानी या
फिर अंगूर इस दौरान ग्रहण किया जा सकता है। जबकि मानसिक शुद्दिकरण के लिए जाप,
ध्यान, सत्संग, दान और धार्मिक सभाओं में
भाग लेना चाहिए।
उपवास के दौरान हिंसा और
सेक्स से भरपूर दृश्यों और बातों से भी बचना चाहिए। इस प्रकार कह सकते हैं कि
वैदिक उपवास शारीरिक, मानसिक और
अंतःकरण के संपूर्ण शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। यह धारणा गलत है कि उपवास सिर्फ
महिलाओं को ही करना चाहिए। उपवास का लाभ किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष उठा सकते
हैं।
उपवास से धार्मिक
अनुष्ठानों को इसलिए जोड़ा गया, ताकि स्वास्थ्य
के पहलू पर ध्यान दिया जा सके। जैसे संतोषी मां का व्रत। शुक्रवार के दिन शादीशुदा
महिलाएं यह व्रत रखती हैं और गुड़-चने का प्रसाद लेती हैं। गुड़ शरीर में आयरन
(लोहा) की पूर्ति करता है, तो चने से
प्रोटीन मिलता है।
उपवास की प्रक्रिया सिर्फ
कम खाने या सात्विक भोजन से ही पूर्ण नहीं हो जाती। इस दौरान सुबह-शाम ध्यान करना
भी जरूरी है। इससे दिमाग शांत होता है और मन में सद्विचारों का प्रवाह होता है।
उपवास की अवधि में न तो किसी का अहित सोचना चाहिए और न ही किसी से गलत व्यवहार
करना चाहिए। रमजान के दौरान उपवास रखने वाले मुसलमान लड़ाई-झगड़े या अपशब्द कहने आदि
से भी परहेज करते हैं।
ज्योतिषीय उपचार में
इष्टसाधना चयन एवं मासिक उपासना मासिक श्रेष्ठ व्रत आपको सभी कस्टो से मुक्ति
दिलाएंगे:साथ में गृह जो प्रभावित होते है प्रस्तुत है कुछ पैटर्न
1)
गणपति:
(सूर्य,चंद्र ,केतु, मंगल, बुद्ध, गुरु,शुक्र,राहु)
मासिक कृष्ण और शुक्ल
चतुर्थी को संकष्टी गणेश एवं विनायकी गणपति
क्रमशः
सूर्य एवं कार्तिकेय :
(सूर्य, मंगल, बुद्ध,गुरु)
मासिक कृष्ण और शुक्ल
षष्ठी को
सूर्य एवं स्कंध क्रमशः,
दुर्गा भैरव :
(सूर्य,चंद्र,शुक्र,मंगल,बुध,शनि,राहु केतु)
मासिक कृष्ण और शुक्ल
अष्ट्मी
भैरव और दुर्गा क्रमशः,
श्री हरिविष्णु
(बुद्ध,गुरु,शुक्र,शनि,राहु,केतु एवं नवग्रहपीड़ा मुक्ति , पापहरण, पापशमन)
मासिक कृष्ण और
शुक्लएकादशी
शिव-गौरी
(सूर्य,चंद्र,बुद्ध,शुक्र,)
मासिक कृष्ण और शुक्ल
त्रयोदशी प्रदोष काल को शिवजी, मासिक कृष्ण
शुक्ल चतुर्दशी शिवरात्रि,
सत्य नारायण एवं
पितरेश्वर
चंद्र ,गुरु,शुक्र, बुद्ध, शनि,राहु, केतु
मासिक पूर्णिमा एवं
अमावस्या क्रमशः
इसप्रकार 12 व्रत हर मास के और 12x12=144 व्रत और 1+4+4=9 पूर्णांक है
सूर्य आदि सात ग्रहों के
नाम पर सप्ताह के सात दिन तय किए गए हैं। हर वार का अधिपति कोई एक ग्रह है,
लेकिन ग्रह देवों को भी अन्य प्रधान देवों के
साथ जोड़ा गया है। इस सबके पीछे विज्ञान, ग्रहों की चाल, ऋतुचर्या,
दिनचर्या और स्वस्थ सुखी रहने के तौर-तरीके
बड़ी कुशलता के साथ पिरोए गए हैं। बता रहे हैं डॉ. सुरेश चंद्र मिश्र
वारों का क्रम किस प्रकार
तय है यह समझने के लिए हमें आसमान में ग्रहों की कक्षाओं के क्रम को समझना होगा।
ये इस प्रकार हैं- 1. शनि 2. गुरु 3. मंगल 4. रवि 5. शुक्र 6. बुध 7. चंद्रमा। इनमें
हर चौथा ग्रह अगले वार का मालिक होता है जैसे, रविवार के बाद उससे चौथे चन्द्रमा का, फिर चन्द्र से चौथे मंगल का क्रमश: वार
आता-जाता है।
वारों के अधिदेवता
ग्रहों को मूल रूप से
विष्णु या महादेव के अंश से उत्पन्न समझा जाता है। सूर्य की पूजा, नमस्कार, अर्घ्य देना तो खास तौर पर विष्णु और शिव ही क्यों, सब तरह की पूजा में अनिवार्य कहा गया है।
वारपति ग्रह और अवतारों का संबंध इस तरह से है-
1. सूर्य- रामावतार,
2. चन्द्र- श्रीकृष्णावतार, 3. मंगल- नृसिंह अवतार, 4. बुध- बुद्ध अवतार, 5. गुरु-वामन अवतार, 6. शुक्र- परशुराम अवतार, 7. शनि- कर्म अवतार।
इससे हम आसानी से समझ
सकते हैं कि सब ग्रह आदि देव विष्णु या शिव जो भी नाम दें, उसी से निकले हैं।
रविवार का वारपति सूर्य
स्वयं जीवन का आधार होने से विष्णु रूप कहा गया है। अत: ’आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ के नियम से रोग के प्रकोप को कम करने, स्वस्थ रहने, दवा का अनुकूल प्रभाव पैदा करने और आयु की रक्षा तथा आत्मबल,
तन व मन की ताकत को देने वाला सूर्य है। जन्म
का कारण होने से सविता, प्रसविता,
प्रसव कराने वाला परिवार वृद्धि का देवता है।
जो लोग प्रजनन अंगों के विकार के कारण, अज्ञात कमी की वजह से औलाद का सुख नहीं देख पाते हैं, उनके लिए सूर्य की उपासना बहुत मुफीद होती है। सूर्य के लिए
गायत्री मंत्र, केवल ओम् नाम या ‘ओम् घृणि: सूर्य आदित्य:’ का जप करना, जल चढ़ाना, माता पिता या
उनके जैसे जनों को ठेस न पंहुचाना अच्छा है।
सूर्य को प्रसन्न रखने के
कुछ अन्य मार्ग ये हैं-
सुबह मुंह को गीला रखकर
सूर्य के सामने गायत्री मन्त्र या ओम् नाम का 10 या 28 बार जप करना
चाहिए।
घर में धूप और खुली हवा
का प्रबंध, धूप सेंकना, बुजुर्गो के मन को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए।
घर में गंगाजल या किसी
कुदरती सोते का जल सहेजना चाहिए।
संक्रान्ति, अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी के दिन और
दोनों वक्त मिलने के समय कलह, बहस, देर तक सोना और संभोग से बचें। इनसे सारे
ग्रहों की अनुकूलता बनती है।
सोमवार का पति चंद्रमा मन,
विचार, भावुकता, चंचलता, आवेग और आवेश का प्रतीक है। चंद्र की अनुकूलता
से मन पर नियंत्रण, निर्णय करने की
सही दिशा और दिल के बजाए दिमाग से अधिक काम लेने की आदत बनती है। सोम जल का ग्रह
होने से शिव को खास प्रिय है। इस दिन शिवजी की पूजा, आराधना करना उपयुक्त है। ध्यान रखें शिव की पूजा सदा माता
पार्वती के साथ ही साम्बसदाशिव के रूप में ही सांसारिक सुखों के लिए अधिक फलदायी
है।
चंद्र को प्रसन्न रखने के
कुछ तरीके ये हैं-
दूध, खीर, सेवई, मिठाई, पनीर, दान करना चाहिए और तारों की छांव या चांदनी में कुछ देर बैठना चाहिए।
बड़, पीपल, गूलर की गोलियां, फल या जड़ घर में
रखें। अपनी कुल प्रतिष्ठा, सम्पदा को
संभालें। पानी का सेवन करना और माता-पिता से अलगाव या दूरी न रखना चन्द्रमा को प्रसन्न
रखने का कारगर तरीका है।
दूध में मुल्तानी मिट्टी,
चोकर या बेसन मिला कर उबटन करें। किसी के सामने
अपनी व्यथा का रोना न रोएं।
मंगलवार का वारपति मंगल,
युद्घ और हथियारों का ग्रह हैं। इसके देवता वीर
हनुमान, एकदंत गणेश और मलय स्वामी
हैं। हनुमान जी की पूजा, प्रसाद चढ़ाना,
मंगल का व्रत रखना और इस दिन शाकाहार करना
अच्छा है। हनुमान चालीसा का पाठ आसान और कारगर उपाय है। अतिरिक्त शुभता के लिए-
अपने सगे भाई बहनों के
लिए अपशब्द न कहें और स्त्रियों से बहस न करें।
मीठी सुहाल, पूए, चीले, पूरनपोली खाएं, खिलाएं और बांटें।
भाभियों से सामान्य
व्यवहार रखें और कभी विकलांगों की सहायता करें।
नीम, बबूल का सेवन किसी तरह से करें और पेड़-पौधों
की देखभाल करते रहें।
बुधवार का वारपति बुध,
बुद्धि, हास-परिहास, अभिनय और कला और
वनस्पतियों का ग्रह है। इसके प्रधान देव विष्णु हैं। अत: विष्णु जी के किसी रूप की
आराधना करना शुभ है।
ओम् नमो भगवते वासुदेवाय
या
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे
मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।।
का जप करना श्रेयस्कर है।
कुछ बोनस शुभता पानी हो
तो अपनाएं-
मांस मदिरा, मानसिक हिंसा, पक्षियों को पालना, ससुराल से गहरे संबंध रखना आदि बातों से बचें।
वनस्पति, जड़ी-बूटी पाले प्रसाधन इस्तेमाल करना, सोना धारण करना, पौधे रखना, बहन बेटी और उनके
परिवार जनों का आदर करना, केसर लगी मिठाई
या केसरी हलुवा या मूंग दाल के पदार्थ खाना खिलाना शुभ है।
दादी को कोई भेंट देने,
सांड को गुड़ रोटी खिलाने, केले और बताशे बांटने से बुध प्रसन्न रहता है।
स्नान जल में चावल डालना,
पीपल में जल देना, हरी सब्जी शिवजी को भेंट करना, कभी पत्ते के दोने में कुछ खाना, कभी दान करना मंगलकारक है।
गुरुवार का देवता संसार
का सृजनहार ब्रह्मा है। अत: विवाह, संतान सुख,
परिवार सुख, ज्ञान, वाणी और हुनर के
साथ बड़प्पन अधिकार का स्वामी बृहस्पति है। इसके लिए सिर्फ ओम् नाम का जप करना
काफी फायदेमंद है।
अधिक शुभता के लिए-
किसी के साथ कपड़े शेयर न
करें। चरित्र, जुबान और आचरण को
मजबूत रखें।
हल्दी वाली रोटी, चने की दाल, पीला वस्त्र, घी, बूरे का सेवन वितरण करें।
कन्याओं का आदर करें।
शुक्रवार देवी के आधीन
है। अत: दुर्गा पूजा, दीपक जलाना,
खेतड़ी बोकर रखना, कन्यापूजन, करना और जालसाजी,
झूठी गवाही से बचना अच्छा है। दुर्गाचालीसा आदि
पढ़ना, खुशबू का प्रयोग, धूपबत्ती जलाना, साफ-सुथरा और आकर्षक बनने की कोशिश करना शुभ है।
शनिवार के अधिपति भैरव,
हनुमान, महाकाली, नृसिंह हैं।
भावनानुसार इनमें से किसी की पूजा आराधना करना अच्छे परिणाम देगा। बस्ती के बाहर
किसी शिवमंदिर में पूजा करना भी लाभदायक है। अधिक शुभता के लिए-
मजदूरों, मेहनतकशों का दिल न दुखाना, जीवन में अनुशासन रखना, साफ-सुथरा रहना, रोज नहाना और हाथ-पैर, दाढ़ी, नाखूनों को साफ सलीकेदार रखना, तेल मालिश, शनि को खुश रखने की रामबाण दवा है।
वार के हिसाब से
व्रतोपासना
सूर्य राम नारायण भैरव
: रविवार
चंद्र सरस्वती, शिव-पारवती : सोमवार
मंगलगणेश दुर्गा,कार्तिकेय,हनुमान:मंगलवार
बुद्ध देवी, दुर्गा, विष्णु, गणेश,पितृ :
बुद्धवार
गुरु,नारायणहरी विष्णु,इंद्र,कृष्ण: गुरुवार
शुक्र,दुर्गा,लक्ष्मी,कमला,पद्मावती:शुक्रवार
शनि,हनुमान,भैरव,पितृ,काली, : शनिवार
व्रत रखने के नियम दुनिया
को हिंदू धर्म की देन है। हिंदू धर्म में व्रत रखने के कई नियम है और इसका बहुत ही
महत्व है। व्रत रखना एक पवित्र कर्म है और यदि इसे नियम पूर्वक नहीं किया जाता है
तो न तो इसका कोई महत्व है और न ही लाभ अलबत्ता इससे नुकसान भी हो सकते हैं।
हालांकि आप व्रत बिल्कुल भी नहीं रखते हैं तो भी आपको इस कर्म का भुगतान करना ही
होगा। आखिर क्यों व्रत रखना जरूरी है इसके लिए पढ़ें संपूर्ण आलेख।
व्रत रखने का पहला
उद्येश्य:-
व्रत रखने से दैहिक,
मानसिक और आत्मिक ताप कम तो होते ही हैं साथ ही
इससे ग्रह-नक्षत्रों के बुरे प्रभाव से भी बचा जा सकता है। हालांकि व्रत रखने का
मूल उद्येश्य होता है संकल्प को विकसित करना। संकल्पवान मन में ही सकारात्मकता,
दृढ़ता और एकनिष्ठता होती है। संकल्पवान
व्यक्ति ही जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता हैं। जिस व्यक्ति में मन, वचन और कर्म की दृढ़ता या संकल्पता नहीं है वह
मृत समान माना गया है। संकल्पहीन व्यक्ति की बातों, वादों, क्रोध, भावना और उसके प्रेम का कोई भरोसा नहीं। ऐसे
व्यक्ति कभी भी किसी भी समय
व्रत रखने का दूसरा
उद्येश्य:-
लोग अपनी अपनी श्रद्दा और
आस्था के अनुसार अलग-अलग देवी, देवताओं को मानते
हैं और उनकी पूजा करते हैं। इसी क्रम में वे सप्ताह में एक दिन, या खास मौकों या त्योहारों पर अपने देवी
देवताओं के लिए व्रत रखते हैं। जिसमें वे पूरे दिन बगैर अन्न खाए सिर्फ फल खाकर ही
रहते हैं। धर्म और मान्यता के अनुसार व्रत रखने से देवी, देवता प्रसन्न होते हैं तथा कष्टों और परेशानियों को दूर
करके, मनोकामनाओं को पूर्ण करते
हैं।
व्रत रखने का तीसरा
उद्येश्य:-
इस व्रत या उपवास में
व्यक्ति अपने आध्यात्मिक उद्येश्य की प्राप्ति हेतु काया का शुद्धिकरण करता रहता
है। यह बहुत कठिन व्रत होते हैं। इसमें धीरे-धीरे व्यक्ति अन्न और फिर जल भी पीना
छोड़ देता है। इसके अंतर्गत क्रिया योग भी किया जाता है।
यदि आप आध्यात्मिक लक्ष्य
प्राप्त नहीं करना चाहते मात्र अपनी सेहत को सुधारना चाहते हैं तो यह व्रत आपके
लिए बहुत ही फायदेमंद साबित होगा। लोग अक्सर अपने वजन को कम करने या पेट को अंदर
करने के लिए भी व्रत रखते हैं। यदि आप व्रत नहीं रखेंगे तो आपकी सेहत पर इसका बुरा
असर होगा।
दरअसल, आप बचपन से ही खाते आ रहे हैं अर्थात आपकी
आंतों सहित आपके शरीर के अन्य अंग लगातर आपके भोजन को पचाने का कार्य करते रहे
हैं। ऐसे में उन्होंने एक दिन भी आराम नहीं किया और ही छुट्टी ली। क्या आप चाहते
हैं कि वे हमेशा के लिए ही आराम करें। नहीं चाहते हैं तो उन्हें बीच बीच में
छुट्टी देते रहें। व्रत से हमारे शरीर को स्वच्छ होने और आराम करने का समय मिलता
है। क्या आप अपनी बाइक या कार को लगातार वर्षभर तक चलाते रह सकते हैं? जब
क्या है व्रत : व्रत शब्द
की उत्पत्ति (वृत्त वरणे अर्थात वरण करना या चुनना) से मानी गई है। ऋग्वेदानुसार-
संकल्प, आदेश विधि, निर्दिष्ट व्यवस्था, वशता, आज्ञाकारिता,
सेवा, स्वामित्व, व्यवस्था,
निर्धारित उत्तराधिकर वृत्ति, आचारिक कर्म, प्रवृत्ति में संलग्नता, रीति धार्मिक कार्य, उपासना, कर्तव्य, अनुष्ठान, धार्मिक तपस्या, उत्तम कार्य आदि वृत से ही व्रत की उत्पत्ति मानी गई है।
वेदों में कहीं-कहीं व्रत
को किसी धार्मिक कृत्य या संकल्प कहा गया है जबकि उपनिषदों में व्रत का दो अर्थों
में प्रयोग हुआ है- एक संकल्प, आचरण एवं भोजन
संबंधी रोक के संदर्भ में और दूसरा उपवास करते समय भक्ष्य-अभक्ष्य भोजन के संदर्भ
में।
संकल्पपूर्वक किए गए कर्म
को व्रत कहते हैं। किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दिनभर के लिए अन्न या जल या
अन्य तरह के भोजन या इन सबका त्याग व्रत कहलाता है। व्रत धर्म का साधन माना गया
है। उपवास का अर्थ होता है ऊपर वाले का मन में निवास। उपवास को व्रत का अंग भी
माना गया है।
आप समझते हैं कि भोजन न
करना ही उपवास या व्रत है तो आपकी यह समझ अधूरी है। उपवास या व्रत का अर्थ बहुत
व्यापक है। शास्त्रों में मुख्यत: 4 तरह के व्रत और 13 तरह के उपवास
बताए गए हैं। बहुत से तपस्वी अपने तप की शुरुआत उपवास से ही करते हैं।
व्रत के प्रकार :
राजा भोज के राजमार्तण्ड
में 24 व्रतों का उल्लेख है।
हेमादि में 700 व्रतों के नाम
बताए गए हैं। गोपीनाथ कविराज ने 1622 व्रतों का उल्लेख अपने व्रतकोश में किया है।
व्रतों के प्रकार तो
मूलत: 1.नित्य, 2.नैमित्तिक और 3.काम्य कहे गए हैं और.. उपवास के प्रकार- 1.प्रात: उपवास, 2.अद्धोपवास, 3.एकाहारोपवास, 4.रसोपवास,
5.फलोपवास, 6.दुग्धोपवास, 7.तक्रोपवास, 8.पूर्णोपवास,
9.साप्ताहिक उपवास, 10.लघु उपवास, 11.कठोर उपवास, 12.टूटे उपवास,
13.दीर्घ उपवास। बताए गए हैं, लेकिन हम यहां वर्ष में जो व्रत होते हैं उसके
बारे में बता रहे हैं।
1.साप्ताहिक व्रत :
सप्ताह में एक दिन व्रत रखना चाहिए।
2.पाक्षिक व्रत : 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं कृष्ण पक्ष और शुक्ल
पक्ष। प्रत्येक पक्ष में चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी, अमावस्या और पूर्णिमा के व्रत महतवपूर्ण होते हैं। उक्त में
से किसी भी एक व्रत को करना चाहिए।
3.त्रैमासिक : वैसे
त्रैमासिक व्रतों में प्रमुख है नवरात्रि के व्रत। हिंदू माह अनुसार पौष, चैत्र, आषाढ और अश्विन मान में नवरात्रि आती है। उक्त प्रत्येक माह की प्रतिपदा यानी
एकम् से नवमी तक का समय नवरात्रि का होता है। इन नौ दिनों तक व्रत और उपवास रखने
से सभी तरह के क्लेश समाप्त हो जाते हैं।
4.छह मासिक व्रत :
चैत्र माह की नवरात्रि को बड़ी नवरात्रि और अश्विन माह की नवरात्रि को छोटी
नवरात्रि कहते हैं। उक्त दोंनों के बीच छह माह का अंतर होता है। इसके अलावा
5.वार्षिक व्रत :
वार्षिक व्रतों में पूरे श्रावण मास में व्रत रखने के विधान है। इसके अलवा जो लोग
चतुर्मास करते हैं उन्हें जिंदगी में किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता है।
व्रत के नियम :
अग्निपुराण में कहा गया है कि व्रत करने वालों को प्रतिदिन स्नान करना चाहिए,
सीमित मात्रा में भोजन करना चाहिए। इसमें होम
एवं पूजा में अंतर माना गया है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में व्यवस्था है कि जो
व्रत-उपवास करता है, उसे इष्टदेव के
मंत्रों का मौन जप करना चाहिए, उनका ध्यान करना
चाहिए उनकी कथाएं सुननी चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए। किंतु अशौच अवस्था में
व्रत नहीं करना चाहिए। जिसकी शारीरिक स्थिति ठीक न हो व्रत करने से उत्तेजना बढ़े
और व्रत रखने पर व्रत भंग होने की संभावना हो उसे व्रत नहीं करना चाहिए।
व्रत करते समय निम्नोक्त 10 गुणों का होना आवश्यक है। क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियनिग्रह, देवपूजा, अग्निहवन, संतोष एवं अस्तेय। व्रत के दिन मधुर वाणी का प्रयोग करना
चाहिए। पतित पाखंडी तथा नास्तिकों से दूर रहना चाहिए और असत्य भाषण नहीं करना
चाहिए। उसे सात्विक जीवन का पालन और प्रभु का स्मरण करना चाहिए। साथ ही कल्याणकारी
भावना का पालन करना चाहिए।
व्रत नहीं रखने के नुकसान
: यदि आप व्रत नहीं रखते हैं तो निश्चित ही एक दिन आपकी पाचन क्रिया सुस्त पड़
जाएगी। आंतों में सड़ाव लग सकता है। पेट फूल जाएगा, तोंद निकल आएगी। आप यदि कसरत भी करते हैं और पेट को न भी
निकलने देते हैं तो आने वाले समय में आपको किसी भी प्रकार का गंभीर रोग हो सकता
है। व्रत का अर्थ पूर्णत: भूखा रहकर शरीर को सूखाना नहीं बल्कि शरीर को कुछ समय के
लिए आराम देना और उसमें से जहरिलें तत्वों को बाहर करना होता है। पशु, पक्षी और अन्य सभी प्राणी समय समय पर व्रत रखकर
अपने शरीर को स्वास्थ कर लेते हैं। शरीर के स्वस्थ होने से मन और मस्तिष्क भी
स्वस्थ हो जाते हैं। अत: रोग और शोक मिटाने वाले चतुर्मास में कुछ विशेष दिनों में
व्रत रखना चाहिए। डॉक्टर परहेज रखने का कहे उससे पहले ही आप व्रत रखना शुरू कर
दें।
यदि आप कठिन उपवास या
व्रत रखने हैं तो पहले आपके शरीर की शक्कर या श्वेतसार खत्म होगी या जलेगी फिर
चर्बी गलेगी। फिर प्रोटीन जलने लगते हैं। प्रोटिन के जलने से पहले ही आपको उपवास
तोड़कर पहले ज्यूस फिर, फल और बाद में
नियमित किए जाने वाले भोजन की शुरुआत करना चाहिए। हमें उतना ही भोजन करना चाहिए
जितना की हमारे शरीर को उसकी जरूरत है। हां, भोजन में आयरन, कैल्शियम, मैग्निेशियम,
पोटेशियम और शरीर को जरूरी अन्य प्रोटिन,
खनीज लवणों का ध्यान रखना चाहिए।
अनाहार या उपवास के समय
श्वेतसार, चर्बी और कुछ प्रोटीन
जलती रहती है। चर्बी का भंडार जिस मात्रा में खाली होता जाता है उसी मात्रा में
प्रोटीन अधिक खर्च होने लगती है। जब चर्बी बिलकुल खत्म हो जाएगी तो शरीर का कार्य
केवल प्रोटीन को खर्च करके चलता है, इसका अर्थ है कि उस समय मनुष्य के शरीर का मांस, हड्डी और चमड़ा खर्च होता रहता है।
अनशन के समय अंगों का
उपयोग या क्षय एक निश्चित प्राकृतिक नियम के अनुसार होता है। पहले पेट से अनावश्यक
खाद्य पदार्थ बहार हो जाते हैं। फिर पेट और उसके आसपास की चर्बी घटने लगती है।
इसका मतलब की पहले कम आवश्यक अंग क्षय होते हैं। उसके बाद उससे कुछ अधिक आवश्यक
अंगों के ऊपर हाथ लगता है। सब के अन्त में नितान्त आवश्यक अंग काम में आते हैं
इसके बाद जब जीवन के सबसे प्रधान अंगों पर हस्तक्षेप होने लगता है तो मृत्यु हो
जाती है। लेकिन इसे जैन धर्म में संथारा कहते हैं।
उपवासी मनुष्य अपने सेहत
को दुरुस्त करने के लिए तब तक उपवास करता है जब तक की उसका पेट पूर्णत: अंदर और
नरम नहीं हो जाता है। यही शरीर को स्वस्थ करने की कारगर तकनीक है। भोजन तो शरीर को
जरूरी ही चाहिए लेकिन कौन सा भोजन आप शरीर को दे रहे हैं यह भी तय करना जरूरी है।
शरीर को पुष्ट करने वाला भोजन या कि अपने मन को पुष्ट करने वाला भोजन?
वैज्ञानिकों अनुसार
शारीरिक ताप की सबसे छोटी मात्रा का नाम 'कैलोरी' है। कैरोली क्या है?
करीब एक सेर पानी को एक डिग्री गर्म करने में
एक घण्टे में जितना ताप खर्च होता है वह एक कैलोरी है। एक पूरा नौजवान आदमी जिसकी
ऊंचाई और मोटाई मध्यम दर्जे की है वजन में लगभग 70 सेर होगा और इस 70 सेर वजन को पूर्ण निष्क्रिय अवस्था में ताप देने के लिए अथवा जीवित रखने के
लिए प्रति घण्टे 70 कैलोरी ताप खर्च
होगा, जिसका परिणाम 24 घण्टे में 1680 कैलोरी हो जाएगा। अगर आदमी नाटा या दुबला पतला होगा तो
उसका खर्च इसी हिसाब से कम होगा।
लेकिन जहां तक जिंदा रहने
के बात है तो व्यक्ति मात्र दो कैलोरी पर भी जिंदा रह सकता है। यदि आप परिश्रम
नहीं करते हैं तो इतनी कैलोरी चलेगी। दर्जी-44, दफ्तरी-51, मोची 90, लोहा घिसने वाला कारीगर 141, पालिश का काम करने वाला 145, बढ़ई 146, लकड़ी चीरने वाला 378 कैलोरी खर्च करता है।
जैसे अगर एक बढ़ई प्रति
दिन आठ घंटा काम करता है तो 1 घंटा में 146 कैलोरी के हिसाब से वह प्रति दिन 146&8=1168 कैलोरी खर्च करेगा। उस आदमी का वजन अगर डेढ़
मन या 60 सेर हो तो 60+24=1440 कैलोरी ताप उसके मूल आत्मीकरण में खर्च होगा।
इसके सिवाय चलने, फिरने, बैठने-उठने का काम भी वह कुछ न कुछ अवश्य करेगा
और उसमें भी कुछ शक्ति अवश्य खर्च होगी। इस प्रकार सब बातों पर विचार करने से यह
अनुमान लगाया जाता है कि एक आदमी को साधारण रूप से जीवित रहने और जीवन निर्वाह का
कोई पेशा करने के लिए इतने भोजन की आवश्यकता है जो प्रति दिन 3000 कैलोरी ताप उत्पन्न कर सके।
शास्त्रों के अनुसार शरीर
को बीमारियों से दूर रखने के लिए कई उपाय बताए गए हैं इन्हीं उपायों में से एक है
व्रत-उपवास।
अधिकांश बीमारियां
खाने-पीने की वस्तुओं और पेट से संबंधित होती है, अत: इन बातों की विशेष ध्यान देने आवश्कता होती है। यदि
हमारा पाचन तंत्र व्यस्थित और स्वस्थ रहेगा तो काफी हद तक हम बीमारियों पर रोक लगा
सकते हैं। पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है कि हम एक महीने में कम से कम
दो बिना खाना खाए रहें। इसी बात का ध्यान रखते हुए प्राचीन काल से ही व्रत-उपवास
रखने की परंपरा बनाई गई है। ताकि व्यक्ति व्रत-उपवास के नाम पर शरीर के पाचन तंत्र
को आराम दे।
व्रत-उपवास का धार्मिक
महत्व भी है। व्रत का अर्थ है संकल्प या दृढ़ निश्चय तथा उपवास का अर्थ ईश्वर या
इष्टदेव के समीप बैठना भारतीय संस्कृति में व्रत तथा उपवास का इतना अधिक महत्व है
कि हर दिन कोई न कोई उपवास या व्रत होता ही है। सभी धर्मों में व्रत उपवास की
आवश्यकता बताई गई है। इसलिए हर व्यक्ति अपने धर्म परंपरा के अनुसार उपवास या व्रत
करता ही है। वास्तव में व्रत उपवास का संबंध हमारे शारीरिक एवं मानसिक शुद्धिकरण
से है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ रहता है।
कब करें व्रत-उपवास- हर
महीने दो एकादशी रहती हैं, शास्त्रों के
अनुसार एकादशी का व्रत अक्षय पुण्य प्रदान करता है। अत: हर माह में दोनों ही
एकादशी का व्रत करना चाहिए। अर्थात् इन दो दिनों में बिना खाना खाए रहना चाहिए।
फलाहार किया जा सकता है। इसके अलावा प्रति रविवार को बिना नमक का खाना खाएंगे तो
यह आपके स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी रहेगा। किसी-किसी दिन दूध और फलाहार करके
भी रहना चाहिए।
व्रत उपवास से शरीर
स्वस्थ रहता है। निराहार रहने, एक समय भोजन लेने
अथवा केवल फलाहार से पाचनतंत्र को आराम मिलता है। इससे कब्ज, गैस, एसिडीटी अजीर्ण, अरूचि, सिरदर्द, बुखार, आदि रोगों का नाश
होता है। आध्यत्मिक शक्ति बढ़ती है। ज्ञान, विचार, पवित्रता बुद्धि
का विकास होता है। इसी कारण उपवास व्रत को पूजा पद्धति को शामिल किया गया है।
किन लोगों को व्रत-उपवास
नहीं करना चाहिए- सन्यासी, बालक, रोगी, गर्भवती स्त्री, वृद्धों को उपवास
करने पर छूट प्राप्त है।
कैंसर, से बचना हैं तो एकादशी का व्रत करो!!!!!
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●मनोनिग्रह की अदभुत साधनाः एकादशी व्रत,*एकादशी व्रत पर एक वैज्ञानिक विश्लेषण*!!!!!!
सभी धर्मानुष्ठानों का
अंतिम लक्ष्य चंचल मन को वश में करना है। मन के संयत होने से सभी इन्द्रियाँ वश
में हो जाती हैं। शास्त्रों ने मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय माना है। सनातन धर्म के
अनुसार ब्रह्म (आत्मा) निष्क्रिय है तथा शरीर जड़ है अर्थात् उसमें कार्य करने का
सामर्थ्य नहीं है।
यह मन ही है जो आत्मा की
शक्ति (सत्ता) लेकर शरीर से विभिन्न प्रकार की चेष्टाएँ करवाता है। दूसरे शब्दों
में, आत्मा को कोई बंधन नहीं
और शरीर नश्वर है तो फिर जन्म-मरण के चक्र में कौन ले जाता है ? यह मन ही है जो सूक्ष्म वासनाओं को साथ लेकर एक
शरीर के बाद दूसरा शरीर धारण करता है। इसीलिए कहा गया हैः
मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयो।* मन ही
मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
विभिन्न धर्मानुष्ठानों
के द्वारा मन को पवित्र करके इससे मुक्ति का आनंद भी मिल सकता है और यदि इसे
स्वतंत्र या उच्छ्रंखल बनने दिया जाये तो यही मन मिल सकता है और यदि इसे स्वतन्त्र
या उच्छ्रंखल बनने दिया जाय तो यही मन जीव को जन्म मरण की परम्परा में भटकाकर अनेक
कष्टों में डालता रहता है।
हमारे ऋषियों का विज्ञान
बड़ा ही सूक्ष्मतम विज्ञान है। उन्होंने मात्र भौतिक जड़ वस्तुओं को ही नहीं अपितु
जो परम चैतन्य है और जिससे जड़ चेतन सत्ता प्राप्त करके स्थित हुए हैं उसको भी
अनुभव किया।
अपनी संतानों को भी उस
परम चैतन्य का अनुभव कराने के लिए उन महापुरूषों ने वेदों, उपनिषदों तथा पुराणों में अनेक प्रकार के विधि-विधानों तथा
धर्मानुष्ठानों का वर्णन किया।
ऐसे ही धर्मानुष्ठानों
में आता है एकादशीव्रत'।
प्रत्येक माह में दो
एकादशियाँ आती हैं एक शुक्ल पक्ष में तथा दूसरी कृष्ण पक्ष में। एकादशी के दिन
मनःशक्ति का केन्द्र चन्द्रमा क्षितिज की एकादशवीं (ग्यारहवीं) कक्षा पर अवस्थित
होता है। यदि इस अनुकूल समय में मनोनिग्रह की साधना की जाय तो वह अत्य़धिक फलवती
होती है।
एकादशी को उपवास किया
जाता है। भारतीय योग दर्शन के अनुसार मन का स्वामी प्राण है। जब प्राण सूक्ष्म
होते हैं तो मन भी वश हो जाता है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार
जब हम भोजन करते हैं तो उसे पचाने के लिए आक्सीजन की आवश्यकता होती है।
इसी आक्सीजन को भारतीय
योगियों ने 'प्राणवायु' कहा है। जब हम भोजन नहीं करते तो इतनी
प्राणवायु खर्च नहीं होती जितनी भोजन करने पर होती है। योग विज्ञान के अनुसार शरीर
में 🌈सात चक्र होते
हैं – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धाख्या, आज्ञाचक्र एवं सहस्रहार।
हृदय में स्थित अनाहत
चक्र के नीचे के तीन चक्रों में मन तथा प्राणों की स्थिति साधारण अथवा निम्नकोटि
की मानी जाती है जबकि अनाहत चक्र से ऊपर वाले चक्रों में मन तथा प्राणों की स्थिति
साधारण अथवा निम्नकोटि की मानी जाती है जबकि अनाहत चक्र से ऊपर वाले चक्रों में मन
तथा प्राण स्थित होने से व्यक्ति की गति ऊँची साधनाओं में होने लगती है।
भोजनको पचाने के लिए
प्राणवायु को नीचे के केन्द्रों (पेट में स्थित आँतों) में आना पड़ता है। मन तथा
प्राणों का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है अतः प्राणों के निचले केन्द्रों में आने से
मन भी इन केन्द्रों में आता है। *योग शास्त्र में इन्हीं केन्द्रों को काम,
क्रोध, लोभ आदि विकारों का स्थान बताया गया है।
उपवास रखने से मन तथा
प्राण सूक्ष्म होकर ऊपर के केन्द्रों में रहते हैं जिससे आध्यात्मिक साधनाओं
में गति मिलती है तथा एकादशी को मनः शक्ति
का केन्द्र चन्द्रमा की ग्यारहवीं कक्षा पर अवस्थित होने से इस समय मनोनिग्रह की
साधना अधिक फलित होती है।
अर्थात् उपयुक्त समय भी
हो तथा मन और प्राणों की स्थिति ऊँचे केन्द्रों पर हो तो यह सोने में सुहागा वाली
बात हो गयी। ऐसे समय जब साधना की जाय तो उससे कितना लाभ मिलेगा इस बात का अनुमान
सभी लगा सकते हैं।
*इसी वैज्ञानिक आशय से
हमारे ऋषियों द्वारा एकादशेन्द्रियभूत मन को एकादशी के दिन व्रत-उपवास द्वारा
निगृहीत करने का विधान किया गया है।*
यदि किसी जातक की कुंडली
में कोई अशुभ ग्रह है अथवा किसी विशेष कार्य में बाधा आ रही हो तो उसे सम्बंधित
वार में विधि पूर्वक व्रत रखने से उस फल की अवश्य प्राप्ति होती है-
रविवार के व्रत की विधि –
सर्व मनोकामना की पूर्ती विशेषकर शत्रु विजय,
पुत्र प्राप्ति, नेत्र रोग, कुष्ठ रोग के
निवारण हेतु रविवार का व्रत किया जाता है | इस व्रत को सुर्याश्श्ठी , रथ सप्तमी अथवा शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से आरम्भ कर के
प्रतेक रविवार कम से कम 12 या एक वर्ष रखे |
व्रत के दिन स्नानादि से
निर्वित हो कर सूर्य के बीज मन्त्र “ॐ ह्रं ह्रीं ह्रोंम सः सूर्य नम: ” का कम से कम तीन माला कर के सूर्य भगवान का ध्यान करे |
उस दिन नमक तेल आदि से
परहेज करे | सूर्य शांति हेतु माणक
रत्न धारण करे | उस दिन लाल
वस्त्र दान करना शुभ रहता है |
सोमवार के व्रत की विधि –
यह व्रत श्रावण, चेत्र, वैशाख, कार्तिक या मार्गशीर्ष के महीनो के शुक्ल पक्ष
के प्रथम सोमवार से आरम्भ करे | इस व्रत को पांच
वर्ष अथवा सोलह सोमवार श्रद्धा के साथ विधिपूर्वक करे |
व्रत आरंभ करने वाले
स्त्री पुरुष प्रातकाल जल में कुछ काले तिल डाल कर स्नान करे | स्नानान्तर “ ॐ नमः शिवाय ” शिव मंत्रो द्वारा तथा श्वेत फूलों, सफेद चन्दन, चावल, पंचामृत, सुपारी, फल, गंगाजल से शिव पार्वती का पूजन करे |
भोजन एक समय नमक रहित
होना चाहिए | व्रत के उधाप्पन में सफेद
वस्तुओ का दान करना चाहिए जैसे -चावल, सफेद वस्त्र , बर्फी, दूध, दही, चांदी आदि |यह व्रत करने से मानसिक शांति हो कर मनोरथ सिधि
होती है | उधाप्पन के दिन
ब्राह्मणों तथा बच्चो को खीर पूरी मिष्ठान भोजन करवा कर यथाशक्ति दान दे |
चंद्रमा की शांति हेतु
चांदी की अंगूठी में मोती धारण करे |
मंगलवार के व्रत की विधि –
सर्व प्रकार के सुखो, रक्त विकार ,शत्रु दमन,
स्वास्थ्य लाभ के लिए मंगलवार का व्रत उत्तम है|
यह व्रत शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से आरम्भ
कर के 21 सप्ताह तक यथाशक्ति रखे |
इस व्रत में गेहू और
शक्कर सहित भोजन करे | भोजन नमक रहित एक
समय करना चाहिए | इस व्रत से मंगल
गृह के दोष दूर हो जाते है |
इस व्रत में हनुमानजी की
लाल पुष्पों ,ताम्र बर्तन तथा नारियल
से पूजा करनी चाहिए तथा हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए | मंगल की शुभता के लिए ताम्बे की अंगूठी में मूंगा धारण करना
शुभ होता है|
बुधवार के व्रत की विधि
-इस व्रत का प्रारंभ शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार से करे |21 व्रत रखे | बुधवार के व्रत
से बुध गृह की शांति तथा धन बुधि, विद्या और
व्यापार में वृद्धि होती है|
व्रत के दिन स्नानौप्रांत
हरे वस्त्र पहन कर श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करे| इस दिन एक समय नमक रहित जैसे -मूंगी से बना हलवा, मीठी पंजीरी, व मूंग के लड्डू का दान करे और स्वयं भी सेवन करे | व्रत के अंतिम बुधवार को मूंगी सहित भोजन ,हरे फल, हरा पीला वस्त्रदान करे | गाओं को हरा चारा डाले|
बुध गृह की शांति के लिए
हरा वस्त्र धारण करना, छोटी इलाइची,
तुलसी तथा कांसे के बर्तन में भोजन करना तथा
पन्ना रत्न धारण करना शुभ रहता है |
ब्रहस्पतिवार के व्रत की
विधि – यह व्रत गुरु गृह की
शांति तथा विद्या बुधि, धन धान्य,
पुत्र पोत्र विवाह आदि सुखो के लिए किया जाता
है | यह व्रत शुकल पक्ष के
प्रथम वीरवार से आरम्भ करके तीन वर्ष अथवा 16 वीरवार तक करना चाहिए |
व्रत के दिन स्नानादि से
निर्वित होकर पीले वस्त्र धारण कर के पीले पुष्पों ,चने की दाल, पीला चन्दन,
बेसन की बर्फी हल्दी व् पीले चावलों सहित भगवन
विष्णु तथा ब्रहस्पति गुरु की पूजा करनी चाहिए|
वर्ती को उस दिन सिर नहीं
धोना चाहिए तथा एक समय ही नमक रहित भोजन करना चाहिए| वर्ती को उस दिन भोग लगा कर किसी ब्राह्मन व् बालक को चने
की दाल, बेसन की बर्फी, बेसन का हलुआ, लड्डू, पीले चावल,
पीले वस्त्र दान करने चाहिए |
इस दिन केले की पूजा करनी
चाहिए| बह्रास्पति की शुभता के
लिए सोने की अंगूठी में पुखराज पहनना भी शुभ रहता है|
शुक्रवार के व्रत की विधि
-यह व्रत धन,विवाह, संतान आदि भौतिक सुखो में वृद्धि कारक होता है|
यह व्रत शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार से शुरू
किया जाता है|
इस व्रत को श्रावण मास के
प्रथम शुक्रवार को प्रारंभ करने से विशेषकर लक्ष्मी की कृपा रहती है|
व्रत के दिन स्नानोपरांत
सफेद वस्त्र धारण करके श्री लक्ष्मी देवी की धूप, दीप, श्वेत पुष्प,
चन्दन, चावल,चीनी, सुपारी से पूजा करके बच्चों में बाँट दे|
स्वयं भी एक समय श्वेत वस्तुओ का सेवन करे|
नमक का प्रयोग न करे| यही पदार्थ हो सके तो एक आँख वाले भिक्षुक या श्वेत गाए को
दे|
उधाप्पन उपरांत
ब्राह्मणों एवं बालको में श्वेत वस्तुओ का दान करे|ये व्रत 21 या 31 मात्रा में करे|
शनिवार के व्रत की विधि
-यह व्रत शनिग्रह की अरिष्ट शांति तथा शत्रुभय, आर्थिक संकट, मानसिक संताप का निवारण करता है,और धन धान्य और व्यापर में वृद्धि करता है|
यह व्रत शुक्ल पक्ष के
शनिवार विशेषकर श्रावण मास के शनिवार के दिन लोह निर्मित शनि की प्रतिमा को
पंचम्रित से स्नान करा कर धूप गंध ,नीले पुष्प,
फल,तिल, लौंग,सरसों का तेल,चावल, गंगाजल,दूध ड़ाल कर पश्चिम दिशा की और अभिमुख होकर
पीपल वृक्ष पर ड़ाल दे| 19 शनिवार करने के
उपरांत उधापन के समय पिपलेश्वर महादेव का पूजन करे|
इस दिन शनि स्तोत्र का
पाठ करे|जूते, जुराब, नीले रंग का वस्त्र, काली छतरी,
काले तिल,,काले चने ,चाकू और तेल
निर्मित पदार्थो का दान करे और एक समय नमक रहित भोजन करना चाहिए |
घोड़े की नाल का छल्ला
पहनना चाहिए| हनुमानजी को तेल चढ़ाना
चाहिए और संकटमोचन का पाठ करना चाहिए |
हमारी पौराणिक कथाओं में
प्रत्येक उपवास का कोई न कोई वैज्ञानिक आधार भी बताया गया है। उन्हें कर्मकांडों
से इसलिए जोड़ा गया, ताकि जनसाधारण
उपवास का वैज्ञानिक आधार समझे बिना भी उनकी जरूरत समझ सकें।
उपवास और भूख हड़ताल को
लेकर लोग अक्सर भ्रमित रहते हैं। भूख हड़ताल में कुछ भी खाया-पीया नहीं जाता है,
जबकि उपवास का अर्थ पांच ज्ञानेंद्रियों और
पांच कर्मेंद्रियों पर नियंत्रण से है। व्रत या उपवास में खाने-पीने पर रोक नहीं
है, लेकिन वह अनुशासित होना
चाहिए। वैदिक या आध्यात्मिक व्रत की चर्चा यजुर्वेद के कर्मकांड में भी की गई है।
भगवद्गीता के अनुसार
हमारा व्यवहार, विचार, भोजन और जीवनशैली तीन चीजों पर आधारित होती है-
सत्व, तमस और राजस। सात्विक
विचारों वाला व्यक्ति निश्चिंत स्वभाव का होता है और सृजनशील भी। राजसी विचारों
वाला व्यक्ति महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ लालची भी होता है। वहीं तामसी
प्रवृत्ति का व्यक्ति न सिर्फ नकारात्मक सोच रखता है, बल्कि वह गलत कार्यों में भी संलग्न रहता है।
योगी या ऋषि बनने का
मार्ग सात्विक विचारों से खुलता है। हम सभी सत्व, रजस और तमस के बीच झूलते रहते हैं। हमारा झुकाव राजसी और
तामसी प्रवृत्तियों की ओर न होने पाए, इसके लिए जरूरी है कि हम खुद को संतुलित करना सीखें। इसका एक प्रभावी तरीका है
वैदिक उपवास।
वैदिक उपवास कुछ और नहीं,
बल्कि 24 घंटे तक शरीर और मस्तिष्क को सत्व की स्थिति में रखने की
एक कोशिश है। यह कार्य समर्पण और अनुशासन के बिना हो पाना असंभव है। यह भी जरूरी
है कि उपवास जबर्दस्ती नहीं, बल्कि आंतरिक
प्रेरणा के तहत रखा जाए। साथ ही, उपवास के दौरान
राजसी-तामसी वस्तुओं के इस्तेमाल से पूरा परहेज बरता जाए।
अब सवाल है कि वह कौन सा
सात्विक भोजन है, जो उपवास में
ग्रहण किया जा सकता है। इसका जवाब है- दूध, घी, फल और मेवे। इनका
भोजन उपवास में इसलिए मान्य है, क्योंकि ये भगवान
को अर्पित की जाने वाली वस्तुएं हैं। वैसे भी प्रकृति प्रदत्त यह भोजन शरीर में
सात्विकता बढ़ाता है। भगवद्गीता के अनुसार मांस, अंडे, खट्टे और तले हुए,
नमकीन व ठंडे पदार्थ राजसी-तामसी प्रवृतियों को
बढ़ावा देते हैं। इसलिए वैदिक उपवास के दौरान इनका सेवन नहीं किया जाना चाहिए।
उपवास के दौरान किए जाने
वाले अनुष्ठानों का भी व्यापक अभिप्राय है। असल में इस तरह के अनुष्ठानों से शरीर
में पैदा होने वाले विषैले पदार्थों के प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है। शारीरिक
शुद्धि के लिए तुलसी जल, अदरक का पानी या
फिर अंगूर इस दौरान ग्रहण किया जा सकता है। जबकि मानसिक शुद्दिकरण के लिए जाप,
ध्यान, सत्संग, दान और धार्मिक सभाओं में
भाग लेना चाहिए।
उपवास के दौरान हिंसा और
सेक्स से भरपूर दृश्यों और बातों से भी बचना चाहिए। इस प्रकार कह सकते हैं कि
वैदिक उपवास शारीरिक, मानसिक और
अंतःकरण के संपूर्ण शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। यह धारणा गलत है कि उपवास सिर्फ
महिलाओं को ही करना चाहिए। उपवास का लाभ किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष उठा सकते
हैं।
उपवास से धार्मिक
अनुष्ठानों को इसलिए जोड़ा गया, ताकि स्वास्थ्य
के पहलू पर ध्यान दिया जा सके। जैसे संतोषी मां का व्रत। शुक्रवार के दिन शादीशुदा
महिलाएं यह व्रत रखती हैं और गुड़-चने का प्रसाद लेती हैं। गुड़ शरीर में आयरन
(लोहा) की पूर्ति करता है, तो चने से
प्रोटीन मिलता है।
उपवास की प्रक्रिया सिर्फ
कम खाने या सात्विक भोजन से ही पूर्ण नहीं हो जाती। इस दौरान सुबह-शाम ध्यान करना भी
जरूरी है। इससे दिमाग शांत होता है और मन में सद्विचारों का प्रवाह होता है। उपवास
की अवधि में न तो किसी का अहित सोचना चाहिए और न ही किसी से गलत व्यवहार करना
चाहिए। रमजान के दौरान उपवास रखने वाले मुसलमान लड़ाई-झगड़े या अपशब्द कहने आदि से
भी परहेज करते हैं।
1 आहार विशेषज्ञों के
अनुसार उपवास के दौरान अनाज की कमी की पूर्ति करते हुए संतुलित भोजन लेना बहुत
जरूरी है। अधिक तला-भुना, मीठा या बिना नमक
का खाना लेने से जहां ब्लडप्रेशर में कमी, शुगर या वजन बढ़ने जैसी परेशानियां हो सकती हैं।
वहीं केवल फलों पर निर्भर
रहने व कम मात्रा में पानी पीने से भी कमजोरी, कब्ज आदि की समस्या हो सकती है इसलिए फलाहारी सामग्री से इस
तरह का भोजन तैयार करना चाहिए जिससे शरीर को पर्याप्त मात्रा में पोषण मिल सके।छाछ
और नींबू पानी जैसे पेय पदार्थ दिन भर लेते रहें, ताकि शरीर में पानी की कमी भी न हो और एनर्जी भी मिलती रहे।
2 छाछ और दही को शामिल
करें - डाइटीशियन के अनुसार उपवास के
दौरान दिन में कई बार छाछ व नींबू पानी लेने से शरीर में पानी की कमी नहीं होगी और
ऊर्जा भी मिलती रहेगी। इसके अलावा पपीते, स्ट्राबेरी, चीकू का शेक,
पाइनएपल, मौसम्बी व संतरे का जूस आदि भी बीच-बीच में लिया जा सकता
है।
3 नहीं होगा गरिष्ठ - वहीं
उपवास के दौरान अगर एक बार फलाहार ग्रहण कर रहे हैं तो सिर्फ साबूदाने की खिच़ड़ी
या आलू का हलवे जैसे किसी एक गरिष्ठ व्यंजन पर निर्भर रहने के बजाए कुट्टु,
सिंघाड़े या राजगीर के आटे में उबला आलू मैश कर
रोटी का आटा तैयार करें। इससे रोटी या पराठा बनाकर दही या लौकी के रायते के साथ
खाने से पेट भी भरेगा और वजन बढ़ने की समस्या भी नहीं होगी। साबूदाना खिचड़ी में अगर
आलू के बजाए लौकी का उपयोग किया जाए तो वह गरिष्ठ नहीं होगी।
4 ज्यादा देर न रहें भूखे
- सुबह उठने के बाद ज्यादा देर तक भूखे रहने से एसीडिटी और लो ब्लडप्रेशर आदि की
परेशानी हो सकती है। व्रत के दौरान सुबह
चाय पीने के बाद छाछ, दही, अधपकी सब्जियों का सलाद, फल आदि खाने से शरीर को एनर्जी मिलने लगती है।
5 फलाहारी खाने में
हरी चटनी, रायते, खीरा जैसी चीजें शामिल कर विविधता लाई जा सकती
है । इस दौरान यह ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है कि नमक व शकर का तालमेल न बिगड़ने
पाए साथ ही पानी भी पर्याप्त मात्रा में पीना चाहिए।
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