ज्योतिष में पाप कर्तरी और शुभ कर्तरी योग
ज्योतिष में पाप कर्तरी और शुभ कर्तरी योग शुभ योगों के आधार पर जातक जीवन में अपना मुकाम हासिल कर पाता है। अशुभ योगों के प्रभाव से राजपरिवार में जन्मे जातक को भी दर-दर की ठोकर खानी पड़ सकती हैं और रंक सा जीवन जीना पड़ सकता है। वहीं शुभ योगों के प्रभाव से भिक्षा मांग कर जीवन यापन करने वाले का भाग्य भी बदलने में वक्त नहीं लगता। हालांकि जन्म के समय जातक की कुंडली में जो योग ग्रह बना रहे होते हैं उनका प्रभाव दीर्घकालीन होता है लेकिन क्योंकि परिवर्तन सृष्टि का नियम है और समय के साथ हर चीज गतिमान है। इसी कारण ग्रहों के गोचर से समयानुसार शुभाशुभ दौर जातक के जीवन में आते रहते हैं। ऐसा ही एक दौर तब आता है जब गोचर करते-करते ग्रह जातक की कुंडली में शुभ एवं पापकर्तरि योग का निर्माण करते हैं। आइये जानते हैं कैंची की तरह काम करने वाले इस शुभ और पाप कर्तरियोग के बारे में।
कर्तरी संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है काटना या कैंची। जन्मपत्रिका
में जब किसी भाव के दोनों ओर पाप ग्रह स्थित हों तो वे कैंची के समान उस भाव के फल
को काट देते हैं अर्थात् उस भाव का शुभ फल नष्ट कर देते हैं। इसे ही ज्योतिष की
भाषा में पापकर्तरी योग कहा जाता है। जब यह स्थिति शुभ भाव के दोनों ओर बनती है तो
इसे विशेष अशुभ समझा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में पापकर्तरी योग को बहुत ही हानिकारक माना गया है।
पापकर्तरी योग जिस जातक की जन्मपत्रिका में होता है उसे संघर्षमय व कष्टप्रद जीवन
व्यतीत करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। आइए जानते हैं कि जन्मपत्रिका में किन ग्रहस्थितियों
में पापकर्तरी योग का सृजन होता है।
फलित ज्योतिष में जन्मकुंडली की ग्रहस्थिति के आंकलन और परिणाम के लिए ग्रहों
के सीधे सीधे विश्लेषण के अतिरिक्त ग्रहों की कुछ विशेष स्थिति से उत्पन्न बहुत से
योगों का भी वर्णन किया गया है जिनका हमारे जीवन के घटकों को प्रभावित करने में
बड़ा विशेष महत्व होता है फलित ज्योतिष के ऐसे ही योगों में से बहुत महत्वपूर्ण हैं
शुभ कत्री और पाप कत्री योग इन्हें शुभ कर्तरी और पाप कर्तरी के नाम से भी वर्णित
किया गया है इन दोनों ही योगो का कुंडली में बनना हमारे जीवन की गतिविधियों पर
बहुत गहरा प्रभाव डालता है ज्योतिषीय दृष्टि में बृहस्पति, शुक्र, चन्द्रमाँ और बुध को नैसर्गिक रूप से शुभ ग्रह तथा सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु को नैसर्गिक रूप से पाप या उग्र
ग्रह माना गया है इसी आधार पर कुंडली में इन ग्रहों की एक विशेष स्थिति से शुभ कत्री और पाप कत्री योग का
निर्माण होता है तो आईये जानते हैं इन दोनों योगो के बारे में –
शुभ कत्री योग – कुंडली के बारह
भावों में से जब किसी भी भाव के दोनों और अर्थात किसी भी भाव के आगे और पीछे वाले
भाव में यदि शुभ ग्रह स्थित हों तो इसे शुभ कत्री योग कहते हैं इसमें भाव दो शुभ
ग्रहों के बीच में आ जाता है जिससे उस भाव की शुभता बढ़ जाती है इस लिए इसे शुभ
कत्री योग कहते हैं। इस योग को भाव की वृद्धि करने वाला माना गया है कुंडली के जिस
भाव में शुभ कत्री योग बन रहा हो उस भाव से नियंत्रित होने वाले घटकों की जीवन में
अच्छी स्थिति देने में यह योग सहायक होता है उदाहरण के लिए यदि लग्न भाव के दोनों
और शुभ ग्रह (बृहस्पति,शुक्र,चन्द्रमाँ,बुध) बैठे हों तो ऐसे में लग्न भाव बली हो जाता है है जिससे
स्वास्थ, प्रसिद्धि और यश की अच्छी
प्राप्ति होती है इसी प्रकार धन भाव शुभ कटरी योग में होने पर जीवन में धन की
अच्छी स्थिति बनती है सप्तम भाव में बना शुभ कत्री योग अच्छा वैवाहिक जीवन देता है
अतः कुंडली का जो भाव शुभ कत्री योग में होता है उसके कारक तत्वों में वृद्धि होती
है।
पाप कत्री योग – कुंडली के बारह भावों में से यदि किसी भी भाव
के दोनों और अर्थात भाव के आगे और पीछे वाले भाव में पाप ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु) स्थित हों तो इसे पाप कत्री योग कहते हैं
इसमें भाव दो पाप ग्रहों के बीच में आ जाता है जिससे भाव की शुभता में कमी और
संघर्ष आता है, जिस भी भाव में
पाप कत्री योग बनता है या जो भी भाव पाप कत्री योग में आ जाता है उस भाव से
नियंत्रित होने वाले घटकों को लेकर जीवन में संघर्ष उत्पन्न होता है जैसे यदि लग्न
भाव पाप कत्री योग में आ रहा हो अर्थात लग्न के दोनों और पाप ग्रह हो तो ऐसे में
स्वास्थ की स्थिति में उतार चढ़ाव बना रहता है यश और प्रसिद्धि नहीं मिल पाती यदि
धन भाव में पाप कत्री योग बन रहा हो तो जीवन में आर्थिक पक्ष को लेकर संघर्ष आता
है इसी प्रकार कुंडली के किसी भी भाव के दोनों और पाप ग्रह उपस्थित होने पर बना
पाप कटरी योग उस भाव के कारक तत्वों की हानि करता है।
अब यहाँ एक बात और महत्वपूर्ण है शुभ कत्री और पाप कत्री योग केवल कुंडली के
भावों को ही प्रभावित नहीं करते बल्कि ग्रहों को भी प्रभावित करते हैं अर्थात यदि
कोई ग्रह शुभ कत्री योग में हो तो उस ग्रह के कारक तत्वों में वृद्धि होती है और
यदि कोई ग्रह पाप कत्री योग में हो तो उस ग्रह के कारक तत्वों में संघर्ष उपस्थित
होता है उदहारण के लिए यदि कुंडली में धन और समृद्धि का कारक शुक्र दो शुभ ग्रहों
के बीच में हो अर्थात शुभ कत्री योग में हो तो ऐसे में अच्छी आर्थिक स्थिति और
समृद्धि देने में यह योग साहयक होगा और यदि शुक्र के आगे और पीछे पाप ग्रह होने से
शुक्र पाप कत्री योग में हो तो ऐसे में जीवन में आर्थिक संघर्ष उत्पन्न होता है और
आर्थिक स्थिति अपेक्षित नहीं होती। इसी प्रकार कोई भी ग्रह शुभ कत्री योग में होने पर बली और पाप कत्री योग में कमजोर हो जाता है।
उपाय -
1. प्रदोष व्रत रुद्राभिषेक, बिल्व पत्र शिव पर
2. गायत्री मन्त्र के जप से कई ग्रह अनुकूल हो जाते है ग्रहो
की शुभता और शुभ फल देने की क्षमता में वृद्धि होती है।अशुभ फलदायक ग्रहो की दशा
में गायत्री मन्त्र का जप लाभ देता है।
3. सतनाजा दान