वैदिक रोग ज्यौतिष और आयुर्वेद रोग ज्योतिष अध्यन
वैदिक रोग ज्यौतिष और आयुर्वेद
रोग ज्योतिषरोग ज्योतिष एक विशुद्ध विषय है और स्वयं में एक पृथक पुस्तक की अपेक्षा रखता है। क्योंकि सभी रोगों तथा रोग सम्बन्धी समस्त सूत्रों व योगों की व्याख्या एक अध्याय में सम्भव ही नहीं है। तथापि सर्वांगीण लाभ के लिए तथा सम्पूर्णता के लिए हम प्रमुख रोगों के सम्बन्ध में रोग ज्योतिष की संक्षिप्त चर्चा करेंगे तथा पाठकों के लाभार्थ कुछ कुंडलियों के उदाहरणों से रोग ज्योतिष के सूत्रों के फलित की व्याख्या भी करेंगे।
ग्रहों का कारकत्व
ग्रहों के कारकत्व आदि के सम्बन्ध में पहले पढ़ चुके हैं। परन्तु यहां रोग सम्बन्धी कारकों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। उसके अनुसार -
सूर्य-हृदय, अग्नि, हड्डी, पेट, आंख, पित्त, दाह, ताप।
सूर्यकृत रोग प्रत्येक जन्मकुण्डली में सूर्य एक महत्वपूर्ण ग्रह होता है। पुरुषों की की /डली में सूर्य एवं स्त्रियों की कुण्डली में चंद्र का बलवान होना आवश्यक ।
पुरुषों की कुण्डली में सूर्य क्षितिज पर उदितावस्था में लग्न, एकादश, दशम, नवम, अष्टम में मुख्यतः नवम, दशम, एकादश में हो तो स्वास्थ्य अच्छा रहता है। 9, 10, 11वें स्थान में स्थित सूर्य पर किसी भी पाप ग्रह की दृष्टि हो तो रात्रि भागों में 2 से 7 स्थानों में से किसी भी स्थान में होने पर दोषकारक स्थिति निश्चय ही नहीं रहती। सूर्य अग्नि तत्त्वीय और पुरुष ग्रह है। 1, 3, 5, 9 स्थानों की स्थिति उत्तम होती है। आरोग्य की दृष्टि से मेष, सिंह, घनु यानी अग्नि तत्त्व की राशियों में से किसी भी राशि का सूर्य उत्तम कार्य करता है। ये राशियां सूर्य की मित्र राशियां हैं। इनमें से किसी भी राशि में सूर्य होने से जातक स्वस्थ एवं सुंदर शरीरधारी होते हैं। उन पर रोगों का आक्रमण कम होता है। रोगों से मुकाबला करने की अद्भुत शक्ति उनमें निहित रहती है। शोगग्रस्त होने पर भी जातक शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करते हें। इन्हें साधारण रोग होते हैं, जीर्ण नहीं। अग्नि राशि में सूर्य जिनकी कुण्डली में होता है, वे दीर्घायु होते हैं और उनका डीलडौल भी अच्छा रहता है। हड्डियां मजबूत एवं चौड़ी होती हैं। मिथुन राशि का सूर्य भी अच्छा फल देता है। कारण कि वह अग्नि तत्त्व की मित्र वायु तत्त्व की राशि में है। वायु तत्त्व की राशि मिथुन में स्थित सूर्य स्तायु की दुर्बलता एवं चिंताजनक रोग देता है। इन रोगों का केंद्र मन है। मानसिक तनाव दुर करने हेतु सत्संग, विश्राम एवं आबोहवा में परिवर्तन करने पर यह बीमारी दूर हो जाएगी। अच्छे साहित्य को पढ़ते रहने से तथा नेसर्गिक शोभा देखते रहने पर भी इस रोग से मुक्ति मिल जाएगी। उदित भाग में सूर्य उत्तम फल देता है। रात्रि भाग का सूर्य मध्यम, अग्नि राशि में सर्वोत्तम, वायु तत्त्व में मध्यम, मिथुन में उत्तम, पृथ्वी तत्त्व में मध्यम, जल तत्त्व में निर्बल, कर्क एवं मीन राशि में विशेष निर्बल। सूर्य त्रिक् स्थानों 6, 8, 12 में निर्बल होता है। ऐसे में जिस भाव का भावेश है और जिसका कारक है उस पर दुष्प्रभाव पडेगा। सूर्य का सप्तधातु में अस्थि, त्रिदोष में पित्त, शरीर में हृदय, नेत्र, पीठ की रीढ़, प्राणवायु और मणिपूर चक्र पर आधिपत्य रहता है। इसलिए सूर्य के अशुभ होने से इन आंगों पर दुष्प्रभाव बढ़ता है। सूर्य के अशुभत्व से पित्त विकार, ज्वर, दाह, अपस्मार, हृदय रोग, बस्ति रोग, नेत्र रोग, चर्म रोग, अस्थि रोग, कुष्ठ रोग, अग्नि, विषभय, भूत-प्रेतादि का भय, पशुभय, चोर, देवता, सर्प इत्यादि का भय जैसे रोगों से जातक को कष्ट पहुंचता है। ये रोग गोचर सूर्य की अनिष्टता के कार्यकाल में होते हैं। कुछ विद्वानों की राय में ये रोग भाद्रपद महीने में होते हैं। 15 सितंबर के आसपास जब सूर्य सिंह राशि में रहता है तब अधिक शक्तिमान रहता है।
राशिगत सूर्य के रोग
मेष: इस राशि में सूर्य होने पर जातक का शरीर पुष्ट होता है। मेष अग्नि तत्त्व की व सूर्य की उच्च राशि है। रोग निवारक शक्ति इसमें बड़े परिमाण में रहती है। यही कारण है कि रोगों का प्रादुर्भाव होने की संभावना कम रहती है। इस राशि में स्थित सूर्य के अशुभ होने, दु:स्थान में आने एवं अनिष्ट होने पर दृष्टि मंद होती है। सूर्य के साथ केतु हो तो मोतियाबिंद होता है। 2, 6, 8 12 स्थानों में से किसी भी स्थान में सूर्य होने पर एवं वह पाप युति या दृष्टि में होने पर युवावस्था में ही आंखों की ज्योति कम करता है।
वृषभ: इस राशि का सूर्य बलिष्ठ शरीर प्रदान करता है। अनिष्ट होने पर हृदय रोग, मूर्च्छा, हिस्टीरिया का प्रादुर्भाव होता है।
मिथुन: इस राशि का सूर्य अनिष्ट होने पर 6, 8, 12 में से किसी भी स्थान में होने या गोचर से आने पर स्नायु, रक्त, फेफड़ों के विकार उत्पन्न करता है।
कर्क: सूर्य के लिए यह राशि निर्बल है। शरीर दुबला एवं कमजोर रहता है। अपचन का कष्ट होता है। शनि से सूर्य बिगड़ने पर जोड़ों का दर्द, वातविकार एवं जीर्ण विकार होते हैं।
सिंह: यह सूर्य की स्व राशी है। ऐसे जातक प्राय: स्थूल होते हैं। उन्हें बहुत कम रोगों की शिकायत होती है और यदि रोग लग भी जाएं तो तुरंत ठीक हो जाते हैं। सिंहस्थ सूर्य से प्रभावित व्यक्तियों को आयुर्वेदिक दवाएं तुरंत लाभ पहुंचाती हैं। सूर्य शनि से प्रभावित हो एवं चतुर्थेश एवं चतुर्थ भाव भी अनिष्ट हो तो हृदय रोग से कष्ट पहुंचता है।
कन्या: कन्या राशि का सूर्य पाचन-क्रिया में अवरोध उत्पन्न करता है। साथ है स्वभाव में चिड्ृचिडापन भी लाता है और आंखों के विकार उत्पन्न करता है।
तुला: तुला राशि का सूर्य हो तो कमर, मूत्रविकार, मधुमेह, किडनी एवं मृत्राशय के विकारों का प्रादुर्भाव होता है।
वृश्चिकः इस राशि का सूर्य रोग-प्रतिकार शक्ति प्रदान करता है। गला, हृदय, पित्ताशय, मूत्र रोग सूर्य के बिगड़ने पर ही होते हैं।
धनु: इस राशि का सूर्य अष्टम में अनिष्ट हो तो स्नायु, फेफड़ों के रोगों का प्रादुर्भाव होता है। दुर्घटना के कारण चोट लगना भी संभव है।
मकरः मकर राशि का सूर्य शरीर को निर्बल बनाता है। रोग-प्रतिकार शक्ति कम रहती है। संधिवात, बद्धकोष्ठता, मानसिक रोग, उदास लगना जैसे कष्ट होते हैं।
कुंभ: इस राशि में सूर्य हो तो मानसिक चिंता के कारण होने वाले रोग, हृदय रोग, नेत्र रोग, रक्त संचार में अवरोध जैसे रोग होते हैं।
मीन: मीन राशि का सूर्य शरीर को दुर्बल बनाता है। संसर्गजन्य रोगों का प्रादर्भाव होता है। रक्तविकार एवं पाचनेंद्रिय संबंधी विकार भी होते हैं।
सूर्य के रोगकारक योग
जख्म-ब्रण: सूर्य षष्ठेश से युक्त हो लग्न या अष्टम स्थान में होने पर।
तापगंड: सूर्य लग्नेश से युक्त हो, 6, 8, 12 में से किसी स्थान में होने पर।
क्षय रोग: सूर्य एवं चंद्र परस्पर राशि परिवर्तन कर नवम स्थान में हों या कर्क राशि में सूर्य-चंद्र युति होने पर।
हृदय रोग: चतुर्थ भाव में सूर्य के साथ बृहस्पति व शनि होने पर।
वीर्य विकार: शनि, मंगल, सूर्य, चंद्र ये चारों ग्रह 8, 6, 2, 12 भावों में क्रमश: या इकट्ठे होने पर।
मुख रोग: लग्न में सूर्य-मंगल युति होने पर।
कुष्ठ रोग: अष्टम में सूर्य, लग्न में मंगल, चतुर्थ में शनि होने पर या सप्तम में सूर्य, लग्न में चंद्र, धन स्थान में मंगल एवं व्यय स्थान में शनि होने पर।
त्वचा रोग: लग्न में अनिष्ट सूर्य होने पर।
अग्निस्फोट भय: लग्न, सप्तम या अष्टम में सूर्य मंगल से दृष्ट होने पर।
पशुभय: कर्क या सिंह राशि में सूर्य, राहु होने पर या द्वितीय स्थान में सूर्य ष्ठेश की युति होने पर।
चन्द्र-मन, पानी, रस, रक्त, कफ, आंख, फेफड़े, छाती, बचपन, स्मरणशक्ति।
अद्रकृत रोग
तीब्र गति के ग्रह से चंद्र अनिष्ट होने पर खांसी, सर्दी, जुकाम, पीलिया, पीनस, मूर्च्छ, मंदाग्नि, दमा, लकवा, गर्भ एवं गुप्तांग से संबंधित विकार, स्त्रियों के ऋतुचक्र से संबंधित रोग, निमोनिया, फेफड़े के रोग, त्वचा रोग, पेर के रोग एवं मनोविकार होते हैं। जब चंद्र अपनी ही राशि 1, 3, 6, 7, 10, | स्थानों में भ्रमण करेगा तब वह शुभ फल प्रदान करेगा। शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक 2, 5, 9 स्थानों से चंद्र भ्रमण शुभ फलदायी होता है। राशिगत चंद्र के रोग
मेष: मेष राशि में चंद्र होने पर नेत्र, अनिद्रा, शिरोशूल, विषम ज्वर, मिरगी, वीर्य दोष जैसे रोग होते हैं।
यृषभ: वृषभ राशि में चंद्र होते पर गला, मुखरोग, मेदवृद्धि, शोथ, ब्रण, भस्तिष्क के अधोभाग से संबंधित रोग होते हैं।
मिथुन: चंद्र मिथुन राशि में होने पर फेफड़े या वक्षस्थल के रोग, श्वास, दमा, क्षय एवं वातविकार होते हैं।
कर्क: चंद्र कर्क राशि में होने पर हृदय, उदर, वीर्य एवं यकृत से संबंधित रोग होते हैं।
कन्या: चंद्र कन्या राशि में होने पर वीर्य दोष, गुप्त रोग, आंतों के रोग, प्लीहा, बद्धकोष्ठता जैसे विकार होते हैं।
तुला: चंद्र तुला राशि में होने पर मृत्रनलिका से संबंधित रोग तथा मूत्राशय के विकार एवं त्वचा रोग होते हैं।
थृश्चिकः वृश्चिक राशि में चंद्र होने पर स्नायु, मूत्राशय, मलमूत्र संबंधी एवं भगंदर, क्षय जेसे रोग होते हैं।
धनु: धनु राशि में चंद्र होने पर रक्तसंचरण व वक्षस्थल से संबंधित रोग, जोर्डा का रोग, पक्षाघात, जांघों के विकार होते हैं।
मकर: चंद्र मकर राशि में होने पर अस्थि, घुटने आदि से संबंधित रोग एवं कुष्ठ रोग होता है।
कुंभ: चंद्र कुंभ राशि में होने पर स्नायु, श्वासनलिका, पिंड, रक्त से संबंधित रोग, क्षय, ब्रण विकार होते हैं।
मीन: मीन राशि में चंद्र होने पर रक््तवाहिनी, नाड़ी एवं पैरों से संबंधित तथा क्षय रोग उत्पन्न होता है।
मंगल-पुट्ठे/मांसपेशियीं, मांस, मज्जा, अंडकोष, गुदा, चोटध्व्रण, कटना, सिर, कंधे, हिंसा, चोरी, पित्त, करंट लगना, उत्साह आदि।
मंगलकृत रोग
मंगल अग्नि तत्त्व का ग्रह है। विध्वंस करना उसका स्थायी भाव है। दाह से जुडे रोग, प्लेग, दाह, सूजन, शस्त्राघात, मस्तिष्क विकार, रक्तस्राव, टाइफाइड, निमोनिया, गर्भपात, नाक में फुसियां, उष्माघात, मृत्रपिंड के विकार, बवासीर, भगंदर, ऑपरेशन एवं उष्णता के विकार मंगल के कन्या, मीन व कर्क राशि में होने पर होते हैं। चंद्र राशि से 3, 6, 11 स्थानों में जब गोचरवश मंगल का भ्रमण होता है तब रोगों का प्रादुर्भाव नहीं होता। चंद्र राशि से 1, 2, 4, 5, 7, 8, 9, 12 स्थानों में से भ्रमण करते समय मंगलकृत रोग उत्पन्न होते हैं।
मंगल के राश्यानुसार रोग
मेष: मेष राशि में हो तो मस्तिष्क विकार एवं अम्लपित्त के रोग होते हैं। मेष लग्न में मंगल होने पर कुष्ठ रोग, बवासीर, फोड़े-फूसियां, कंठ, श्वासनलिका, अर्श, भगंदर, अपस्मार, मेदवृद्धि, मलोत्सर्ग क्रिया में अवरोध होता हे।
वृषभ: मंगल वृषभ राशि में हो तो स्वर में विकृति आती है। वृषभ लग्न में मंगल होने पर मुंह, कंठ, श्वास नलिका, अर्श, भगंदर, अपस्मार, मेदवृद्धि, मलोत्सर्ग क्रिया में अवरोध जैसे रोग होते हैं।
मिथुन: ऑपरेशन करना पड़े ऐसे रोग-विकार मिथुन राशि में मंगल होने पर उत्पन्न होते हैं। मिथुन लग्न में मंगल होने पर फेफड़े, बाजू एवं क॒धों में विकार उत्पन्न होते हैं। खांसी-दमा एवं रक््तविकार भी उत्पन्न होते हैं।
कर्क: कर्क राशि में मंगल होने पर नेत्रों को कष्ट, अति मैथुन से होने वाले रोग, शराब पीने से होने वाले रोग, दन्तरोग उत्पन्न होते हैं। कर्क लग्न में होने पर दमा, खांसी, फेफडों के रोग एवं संसर्गजन्य रोग, प्रसूति ज्वर होते हैं। सिंह: सिंह राशि में मंगल हो तो उदर रोग, गर्भपात के कारण कष्ट जैसे विकार उत्पन्न होते हैं। सिंह लग्न में मंगल होने पर कामवासना बढ़ती है। लेकिन सिंह लग्न में मंगल होने पर ऐसे जातक जल्द ही रोगमुक्त हो जाते हैं। कन्या: कन्या राशि में मंगल होने पर उष्णता के विकार उत्पन होते हैं। कन्या लग्न में मंगल हो तो संसर्गजन्य रोग होते हैं। तुला: मंगल तुला राशि में होने पर उदासीनता बढ़ती है। किसी भी काम में मन नहीं लगता। तुला लग्न में मंगल होने पर संसर्गजन्य रोग होते हैं। वृश्चिक: मंगल वृश्चिक राशि में होने पर उष्णता के विकार उत्पन होते हैं। वृश्चिक लग्न में मंगल हो तो संसर्गजन्य रोग एवं मलोत्सर्ग तथा गुदा के रोग उत्पन्न होते हैं। धनु: मंगल धनु राशि में होने पर अपघात, संधिज्वर, ब्रण, मज्जातन्तु या फेफड़ों से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं। धनु लग्न में मंगल होने पर खेल-कूद या अपघात के कारण कष्ट पहुंचता है। मकरः मकर राशि में मंगल होने पर त्वचा रोग, वातविकार, संधिवात, उष्णता के विकार, ऑपरेशन के कारण कष्ट होता है। मकर लग्न में मंगल होने पर मधुमेह, जलना, जख्म होना जैसे विकार उत्पन्न होते हैं। कुंभ: कुंभ राशि का मंगल होने पर उष्णता तथा त्वचा विकार होते हैं। कुंभ लग्न में मंगल होने पर रक्तविकार एवं संसर्गजन्य रोग उत्पन होते हैं। मीन: मीन राशि में मंगल हो तो रक्तचाप, हृदय विकार, रक्त जम जाना, व्यसन के अधीन होना, व्यभिचार में बढ़ोत्तरी होना, ऊंचाई पर से नीचे गिरने से कष्ट होना, रक्तक्षीणता (एनीमिया) जैसे रोग उत्पन्न होते हैं। मीन लगन में मंगल होने पर मादक पदार्थों के अतिसेवन के कारण रोग उत्पन्न होते हें। इसके अलावा कुण्डली के किसी भी स्थान में मंगल-हर्षल युति हो तो रक्त विकार, भयंकर ज्वर, रक्त बहना, झटके लगना जैसे रोग होते हें। लग्न में मंगल हो और उसकी दृष्टि चंद्र पर हो तो जातक को शिरोरोग, रक््तपात एवं नेत्र रोग होता है। मंगल एवं चंद्र की युति षष्ठम स्थान में होने पर पीलिया होता है। ये सभी रोग मंगल अनिष्ट होने पर होते हैं। भरणी, मघा, पूर्वाषाढ़ा एवं पूर्वा भाद्रपद जैसे क्रूर नक्षत्रों में से किसी नक्षत्र में या आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा एवं मूल जैसे तीक्ष्ण नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में मंगल होने पर वह दूषित एवं अनिष्ट होता है।
षष्ठम स्थान की राशियां एवं रोग कुण्डली में षष्ठम स्थान रोग का है। षष्ठम स्थान में मेष से मीन राशि में
मंगल होने पर किन-किन रोगों का प्रादुर्भाव होता है। इस संबंध में जानकारी नीचे दी जा रही है।
प्रेष: यदि षष्ठम स्थान में मंगल मेष राशि में हो तो सिर में चोट लगती है, रक्त जम जाता है, सूजन, ज्वर, मेदवृद्धि एवं नेत्र रोग से कष्ट मिलता है।
वृषभ: षष्ठम स्थान में वृषभ राशि में मंगल होने पर श्वास नलिका में दाह होता है एवं मूत्राशय के रोग उत्पन्न होते हैं।
मिथुन: षष्ठम स्थान में मिथुन राशि में मंगल होने पर फेफड़ों की बीमारी, प्रदाह, उदर वृद्धि, रक्तविकार एवं खांसी जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।
कर्क: षष्ठम स्थान में कर्क राशि का मंगल होने पर रक्तविकार, पित्तविकार, मंदाग्नि जैसे रोग उत्पन्न होते हैं। जातक स्त्री हो तो उसे प्रसूति रोग होते हैं।
सिंह: षष्ठम स्थान में सिंह राशि में मंगल होने पर रक्तचाप, फेफड़ों में दाह, हड़कप जैसी बीमारियां होती हैं।
कन्या: षष्ठम स्थान में कन्या राशि में मंगल हो तो प्रदाह, आमाशय के विकार, हैजा, अतिसार जैसे विकार उत्पन्न होते हैं।
तुला: षष्ठम स्थान में तुला राशि में मंगल होने पर मूत्रपिंड एवं मूत्राशय संबंधी विकार उत्पन्न होते हैं।
वृश्चिक: षष्ठम स्थान में वृश्चिक राशि में मंगल होने पर उपदंश, भगंदर, मूत्रविकार, रक््तविकार जैसे रोग उत्पन्न होते हैं। स्त्री की कुण्डली में वृश्चिक राशि का मंगल छठे स्थान में होने पर उसे प्रसूति ज्वर एवं मासिक धर्म संबंधी बीमारी होती है।
धनु: षष्ठम स्थान में धनु राशि में मंगल होने पर जांघों के रोग, ज्वर, गुदा के रोग, फेफड़ों का प्रदाह जैसे विकार उत्पन्न होते हैं।
मकर: षष्ठम स्थान में मकर राशि में मंगल होने पर चर्म रोग, वायुविकार, संधिवात एवं आमाशय के रोग उत्पन्न होते हैं।
कुंभ: षष्ठम स्थान में कुंभ राशि में मंगल होने पर विषम एवं अन्य ज्वर, हृदय विकार एवं लंबे समय तक चलने वाले रोग उत्पन्न होते हैं।
मीन: षष्ठम स्थान में मीन राशि में मंगल होने पर रक्ताल्पता, क्षय एवं संक्रामक बीमारियां होती हैं।
बुध-वाणी, त्वचा, श्वासनली, आंतें, चेतना, बुद्धि, हंसी, श्रवण शक्ति, नसें, नपुंसकत्व, आकाश।
बुधकृत रोग *. मेष राशि में बुध के साथ सूर्य हो तो बौद्धिक विकार होते हैं। * वृषभ राशि में बुध हो तो स्वर विकृति होती है। . # मिथुन राशि में बुध हो तो फेफड़ों के विकार होते हैं। * कर्क शशि में बुध हो तो मानसिक विकार होते हैं। * सिंह शशि में बुध हो तो छाती के विकार होते हैं। * कन्या राशि में बुध हो तो मानसिक भय उत्पन्न होता है। ७ तुला राशि में बुध हो तो मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं।
$ वृश्चिक राशि में बुध हो तो उदासीनता व विस्मृति का विकार होता है।
* धनु राशि में बुध हो तो अधिक परिश्रम से अस्वस्थता आती है।
* मकर राशि में बुध हो तो उदासीनता एवं आलस्य बढ़ता है।
* कुंभ राशि में बुध हो तो मानसिक विकृति का कष्ट होता है।
* मीन राशि में बुध हो तो पैरों के रोग होते हैं।
* बुध नपुंसकत्व के अलावा कोई भी गंभीर बीमारी उत्पन्न नहीं करता। आंखें, वाणी में न्यूनता, मस्तिष्क के विकार, बुद्धिभ्रंश, पागलपन, मज्जातंतु के विकार, कफ, छाती के विकार, गूंगापन, मानसिक चिंता, त्वचा रोग, पैरों को कष्ट आदि रोग अनिष्ट बुध के कारण उत्पन्न होते हैं।
* लग्नेश और षष्ठेश के साथ बुध होने पर पित्तरोग, अरुचि, अजीर्ण, कै (उल्टी) , उदर रोग होते हैं।
* लग्न में षष्ठेश बुध के साथ हो या उस पर षष्ठेश की दृष्टि हो तो गुह्य रोग होते हें।
घष्ठम स्थान की राशि एवं रोग
मेष: षष्ठम स्थान में मेष राशि हो ओर वहीं बुध हो तो सिरदर्द, आधासीसी, अनिद्रा जैसे विकार उत्पन्न होते हैं।
वृषभ: षष्ठम स्थान में वृषभ राशि हो और वहीं पर बुध हो तो श्वासनलिका संबंधी विकार, सूजन एवं ज्वर विकार उत्पन्न होते हैं।
मिथुन: षष्ठम स्थान में मिथुन राशि हो और वहीं पर बुध हो तो श्वासोच्छवास में बाधा आती है। हाथ-पैर सिकुड़ते हैं। करों में दर्द होता है।
कर्क: षष्ठम स्थान में कर्क राशि हो और वहीं पर बुध हो तो पेट में दर्द होना, अपचन, व्याकुल होना जैसी व्याधियां उत्पन्न होती हैं।.
सिंह: षष्ठम स्थान में सिंह राशि हो ओर वहीं पर बुध हो तो मूर्च्छा, रीढ की हड्डी में दर्द, हृदय कप जैसी व्याधियां उत्पन्न होती हैं।
कन्या: षष्ठमस्थ कन्या राशि में बुध हो तो मलोत्सर्ग संबंधी विकार, कृमि, आमाशय से संबंधित विकार एवं उदर विकार उत्पन्न होते हैं।
तुला: षष्ठम स्थान में तुला राशि हो और वहीं पर बुध हो तो मूत्रकृच्छ या
मूत्राशय संबंधी विकार उत्पन्न होते हैं। वृश्चिक: षष्ठम स्थान में वृश्चिक राशि हो और वहीं पर बुध हो तो
मूत्राशय एवं जननेन्द्रिय संबंधी विकार उत्पन्न होते हैं। धनु: षष्ठम स्थान में धनु राशि हो और वहीं पर बुध हो तो जांघ, नितंब, कमर एवं गुदाद्वार से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं।
मकर: षष्ठम स्थान में मकर राशि हो ओर वहीं पर बुध हो तो हाथ-पैर सूजना, संधिवात, कब्ज जैसे विकार उत्पन्न होते हैं।
कुंभ: षष्ठम स्थान में कुंभ राशि हो और वहीं पर बुध हो तो दुर्बलता, वायुविकार एवं स्त्रियों को हिस्टीरिया जैसे रोग होते हैं।
मीन: षष्ठम स्थान में मीन राशि हो और वहीं पर बुध हो तो मूर्च्छा आना, हाथपैर में पसीना छूटना एवं क्षय रोग उत्पन्न होते हैं।
गुरु-चर्बी/मेद, जिगर, नितम्ब, पीठ, पांव, वात।
बहस्पतिकृत रोग
जन्मकुण्डली में बृहस्पति 4, 6, 8, 12 स्थानों में से किसी स्थान में होने पर या इन स्थानों में से किसी स्थान में गोचर भ्रमण से बृहस्पति का संचार होने के समय में फेफड़ों के रोग, मस्तिष्क की रक्तवाहिनी में क्षति होकर इंद्रिय ज्ञान लुप्त होना, यकृत के रोग, आंतों की सृजन, हृदयकंप, पेट में वायु उत्पन्न होना, रीढ़ में दर्द, रक्तवाहिनियां एवं पसलियों संबंधी रोग, घटसर्प, रक्तदोष, बड़ा ज्वर जैसे रोग होते हैं।
* मेष राशि में बृहस्पति होने पर मुख्य रूप से सिर, मस्तिष्क, मेदवृद्धि के सा संबंध बनता हे। मेष लग्न में ब॒हस्पति होने पर रक््तविकार होते हैं।
* वृषभ राशि का बृहस्पति मुख्य रूप से मेदवृद्धि, मुंह, कंठ, श्वासनलिका एवं भोजननलिका से संबंधित रोग उत्पन्न करता है। वृषभ लग्न में बृहस्पति होने पर गला, पेट एवं मेदवृद्धि का रोग होता है।
* मिथुन राशि का बृहस्पति प्रमुख रूप से कंधा, कंठ, बोद्धिक शक्ति, रक्त एवं श्वास क्रिया से संबंधित रोग देता है।
७ कर्क राशि के बृहस्पति का संबंध वक्षस्थल, छाती एवं पाचनेंद्रियों से है। कर्क लग्न हो तो पेट की बीमारियां, वायु विकार, मानसिक दुर्बलता, संधिवात, पाचन क्रिया में गड़बड़, जलोदर, गंडमाला आदि रोग उत्पन्न. होते हैं। कर्क लग्न में बृहस्पति हो तो आलस तथा उदासीनता बढती है।
* सिंह राशि के बृहस्पति का प्रमुख रूप से हृदय से संबंध है। सिंह लग्न हो तो हृदयकंप, रक्तचाप, मूर्च्छा, कमर का दर्द इत्यादि रोग उत्पन्न होते हैं। सिंह लग्न में बृहस्पति हो एवं पाप ग्रह की युति या दृष्टि में हो तो ये रोग उत्पन्न होते हैं।
* कन्या राशि के बृहस्पति का प्रमुख रूप से पेट तथा आंखों से संबंध है। कन्या लग्न हो तो अग्निमांच,, अतिसार आदि रोग होते हें। कन्या लग्न में बृहस्पति होने पर और उस पर अन्य ग्रहों का दुष्प्रभाव रहने पर या अनिष्ट बृहस्पति होने पर ये विकार उत्पन्न होते हैं।
* तुला राशि के बृहस्पति का प्रमुख रूप से कमर, गुदाद्वार, मूत्राशय से संबंध है। तुला लग्न हो तो मूत्र रोग, कमर का दर्द, त्वचा रोग आदि होते हैं। तुला लग्न में बृहस्पति हो और वह पाप ग्रह की युति में हो तो इन रोगों का प्रादुर्भाव होगा।
* वृश्चिक राशि के बृहस्पति के साथ पाचनेंद्रिय तथा गुदाद्वार का संबंध रहता
है। वृश्चिक लग्न हो तो मूत्राशय संबंधी रोग, वीर्यदोष, संसर्गजन्य रोग, छूत की बीमारियां तथा गले व हृदय से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं।
* धनु राशि के बृहस्पति का संबंध विशेष रूप से नितंब, जांघ तथा सस््नायुओं से रहता है। धनु लग्न होने पर हड्डी टूटना, जख्म होना, व्रण, आमवात, संधिज्वर, भज्जात॑तु एवं फेफड़ों से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं। घनु लग्न में बृहस्पति होने पर या अधिक परिमाण में भोजन करने पर पाचनेंद्रियां जिगड जाती हैं।
* भकर राशि के बृहस्पति का संबंध विशेषतया त्वचा एवं घुटनों से रहता है। ज्यर, सन्निपात, संधिवात, घुटनों का दर्द, त्वचा रोग जैसे विकार उत्पन्न होते हैं। मकर लग्न में बृहस्पति होने पर इन विकारों का जोर कम रहता है।
* कभ राशि के बृहस्पति का संबंध घुटने, घुटनों के नीचे का हिस्सा तथा पैरों से होता है। कुंभ लग्न होने पर पैर एवं घुटने कमजोर रहते हैं। नेत्ररोग, मज्जातंतु के विकार, पेट में मरोड़ उत्पन्न होना आदि विकार उत्पन्न होते हैं। कुंभ लग्न होने पर ये विकार कम होते हैं।
# मीन राशि के बृहस्पति का संबंध प्रमुख रूप से पैर, पैरों के तलवे, शरीर के भीतर के रस से होता है। प्रतिकार शक्ति कम रहती है। मीन लग्न होने पर पैरों के रोग, उदर रोग, आमवात, पैरों में पसीना निकलना आदि विकार उत्पन्न होते हैं। मीन लग्न में बृहस्पति होने पर इनका प्रकोप कम रहता है।
# वष्ठेश के साथ बृहस्पति होने पर नाभि के नीचे ब्रण होता है।
थष्ठम स्थान की राशि एवं रोग
प्रेष: वष्ठम स्थान में मेष राशि में बृहस्पति होने पर रक्त कौ अधिकता के कारण चक्कर आना, मूच्छित होना जैसे विकार उत्पन्न होते हैं।
वृषभ: वष्ठम स्थान में वृषभ राशि में बृहस्पति होने पर वात-रक्त संबंधी व्याधियां उत्पन्न होती हैं।
मिथुन: वष्ठम स्थान में मिथुन राशि में बृहस्पति होने पर वक्ष एवं फेफड़ों में जलन होती है।
कर्क: षष्ठम स्थान में कर्क राशि में बृहस्पति होने पर जलोदर, मेदवृद्धि वं दांतों से संबंधित विकार उत्पन्न होते हैं।
सिंह: षष्ठम स्थान में सिंह राशि में बृहस्पति होने पर अपस्मार, हृदयकंप, प्रदाह, मेदवद्धि जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।
कन्या: षष्ठम स्थान में कन्या राशि में बृहस्पति होने पर बार-बार मूत्र आना, मुधमेह एवं मूत्राशय से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं।
तुला: वष्ठम स्थान में तुला राशि में बृहस्पति होने पर जननेंद्रिय एवं वीर्य संबंधी विकार होते हैं।
यृश्चिकः षष्ठम स्थान में वृश्चिक राशि में बृहस्पति होने पर वीर्यविकार, उपदश, मूत्ररोग, नाभिरोग एवं जलोदर जैसी व्याधियां उत्पन्न होती हैं।
# थनुः षष्ठम स्थान में धनु राशि में बृहस्पति होने पर नितंब एवं गुदाद्वार से
रूबंधित रोग होते हैं।
मकरः षष्ठम स्थान में मकर राशि में बृहस्पति होने पर त्वचा रोग, रक््तविकार एवं श्वास से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं।
कुंभ: षष्ठम स्थान में कुंभ राशि में बृहस्पति होने पर मेदवृद्धि, वातविकार एवं कटिशूल जैसी बीमारियां उत्पन्न होती हैं।
मीन: षष्ठम स्थान में मीन राशि में बृहस्पति होने पर मेदवृद्धि होकर जातक स्थूलकाय बनता है।
शुक्र--वीर्य, मुख, गला (कण्ठ), जननेन्द्रिय, मूत्र, पौरुष, काम, जल, दृष्टि/नेत्र।
शुक्रकृत रोग | गुप्तेन्द्रियों संबंधी सभी प्रकार के रोग, स्त्रियों के जननेन्द्रियों से संबंधित
रोग, स्तनों के रोग, मूत्रपिंड, मूत्राशय से संबंधित सभी विकार, जहरीली दवाइयां, धुआं, स्त्रियों के बंध्यत्व, गत आर्तव दोष, उपदंश, सूजन, इंद्रियां सिकुडना, कैंसर, पथरी, गंडमाला, गॉलसुआ, गरमी, परमा आदि रोग अनिष्ट शुक्र के कारण उत्पन्न होते हैं। अनिष्ट शुक्र या गोचर से बने अनिष्ट शुक्र के कारण भी इन रोगों का उद्भव होता है।
+ डा राशि में शुक्र हो तो मस्तकशूल, विषजन्यविकार, नेत्र विकार होते
। + वृषभ राशि में शुक्र होने पर गले में सूजन, टॉन्सिल्स, गलसुआ, खांसी, मुंह एवं जबान पर फोडे आना आदि विकार होते हैं।
७ मिथुन राशि में शुक्र हो तो चेहरे पर फुन्सियां, कील-मुंहासे, नाखुडें जैसे विकार उत्पन्न होते हैं। मिथुन लग्न हो तो रक््तविकार व चर्मरोग होते हैं। * कर्क राशि में शुक्र हो तो पेट फूलना, स्तनों पर सूजन आना, जी मिचलाना दि विकार होते हैं। कर्क लग्न में शुक्र हो तो विविध रोग उत्पन्न होते
* सिंह राशि में शुक्र हो तो हृदय विकार, पीठ में रीढ़ से संबंधित विकार, रक्ताशय की धमनियों के विकार उत्पन्न होते हैं।
* कन्या राशि में शुक्र होने पर अग्निमांध, जुलाब-दस्त, अतिसार का प्रादुर्भाव होता है।
* तुला राशि में शुक्र होने पर मूत्रपिंड से संबंधित रोग एवं मूत्र संबंधी अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
* वृश्चिक राशि में शुक्र होने पर अंडकोष से संबंधित रोग, हर्निया, उपदंश तथा हो के गर्भाशय एवं योनिमार्ग व गुदाद्वार से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं।
* धनु राशि में शुक्र होने पर कमर, नितंब, शिश्न, मलाशय से संबंधित एवं स्नायु विकार उत्पन्न होते हैं।
+ हा राशि में शुक्र होने पर घुटनों की सूजन व त्वचा रोग उत्पन्न होते
||
* कुंभ राशि में शुक्र होने पर रक््तदोष, नसों एवं घुटनों से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं।
* मीन राशि में शुक्र होने पर पैरों की एडियों का फटना, जूते के काटने से होने वाली क्षतनारु जैसी बीमारियां होती हैं।
* थष्ठेश शुक्र के साथ होने पर आंखों पर ब्रण रहता है।
ष्ठम स्थान की राशि एवं रोग
मेष: षष्ठम स्थान में मेष राशि हो और उस राशि में शुक्र हो तो त्वचा, वास, सुंदरता में न्यूनता जैसे रोग होते हैं।
वृषभ: वष्ठम स्थान में वृषभ राशि हो और उस राशि में शुक्र हो तो टरसर्प, कंठ के विकार, वाणी दोष आदि उत्पन्न होते हैं।
मिथुनः षष्ठम स्थान में मिथुन राशि हो और उस राशि में शुक्र हो तो त्रास संबंधी रोग उत्पन्न होते हैं, सांस लेने में कठिनाई होती है।
कर्क: षष्ठम स्थान में कर्क राशि में शुक्र होने पर पेट के विकार होते हैं।
सिंह: षष्ठम स्थान में सिंह राशि में शुक्र होने पर छाती में पीड़ा, होना जैसे विकार होते हैं।
तुला: षष्ठम स्थान में तुला राशि में शुक्र होने पर मूत्राशय से संबंधित रोग एवं मेदरोग होते हैं।
वृचिक पषष्ठम स्थान में वश्चिक राशि में शुक्र होने पर उपदंश, मूत्राशय एवं जननेन्द्रियों के विकार होते हैं।
धनु: षष्ठम स्थान में धनु राशि का शुक्र होने पर गुदाद्वार संबंधी रोग उत्पन्न होते हैं। फेफड़े कमजोर बनते हैं।
मकर: षष्ठम स्थान में मकर राशि का शुक्र होने पर घुटनों में पीड़ा होती है, पेट की बीमारियां एवं कृमि रोग होते हैं।
कुंभ: षष्ठम स्थान में कुंभ राशि का शुक्र होने पर रक््ताल्पता एवं स्त्री की कुंडली में हो तो भूतबाधा का कष्ट होता है।
मीन: षष्ठम स्थान में मीन राशि में शुक्र होने पर शीतवात के विकार उत्पन्न होते हैं।
शनि-ठंडक, नपुंसकत्व, श्रम, चर्म रोग, नसें, विष, मंथर गति, कर्कश वाणी, दीर्घ प्रभाव, पैरों का मध्य व निचला भाग, वायु-स्नायु अभावात्मक।
शनिकृत रोग सभी प्रकार के संधि रोग, वातरोग, कफविकार, पैरों की पीड़ा, कांख के नीचे दोनों पसलियों में दर्द होना, शरीर के किसी भी अवयव को आघात पहुंचना, पेड से गिरने या पत्थर से जख्म होना, पिशाचबाधा, दांत एवं दाहिने कान में दर्द, शीत एवं उष्णता के रोग, कुष्ठरोग, महारोग, क्षय, पीलिया, शरीरकंप, पागलपन के झटके, जलोदर, हाथ-पेरों का संधिवात, अत्यधिक रक्तस्राव होना, शरीर की हडिडयों में टूटफूट, बांझपन आना, हड्डी ब्रण, गजकर्ण, यकृत, प्लीहा, घुटने, इंद्रियों के रोग, पैरों में हाथी रोग, गूंगापन, तुतलाहट, पसीने में दुर्गंध आना इत्यादि रोग शनि अनिष्ट होने पर होते हैं। कुण्डली या गोचर से शनि अनिष्ट होने पर ये रोग भी अक्सर होते पाए गए हैं। * मेष राशि या मेष लग्न में शनि होने पर शीत संबंधी रोग, कर्णरोग, मस्तिष्क के रोग, मूर्च्छा, बधिरता, पक्षाघात आदि रोग होते हैं। * वृषभ या वृषभ लग्न में शनि होने पर गले से संबंधित बीमारियां होती हैं। « मिथुन राशि में शनि होने पर शीत विकार, निमोनिया जैसे रोग होते हें। * कर्क राशि में शनि होने पर आंतों की बीमारियां, पाचनेंद्रियों से संबंधित बीमारियां एवं शीत विकार होते हैं।
७ सिंह राशि में शनि होने पर आंतों तथा पाचन क्रिया संबंधी बीमारियां होती हैं।
* कन्या राशि में शनि होने पर उदासीनता, आलस्य की बीमारी होती है। * तुला राशि में शनि होने पर अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।
* वृश्चिक राशि में सनि पर मलावरोध तथा मृत्रावरोध की बीमारी होती है।
+* धनु राशि में शनि होने पर शीतज्वर, हैजा, संधिवात एवं वातरोग उत्पन्त होते हैं।
+* मकर राशि में शनि होने पर पैरों के घिकार होते हैं।
$ कुंभ राशि में शनि होने पर आत्महत्या करने की प्रवृत्ति होती है।
* मीन राशि में शनि होने पर शीतरोग होता है।
+ लग्नेश के साथ शनि होने पर बात विकार, ठदर विकार, अपचन जैसी बीमारियां होती हैं।
षष्ठम स्थान की राशि एवं रोग
मेष: षष्ठम स्थान में मेष राशि हो और उसमें शनि हो तो सिर पर आघात, सिरदर्द, यकृत पीड़ा, दंतरोग एवं उदर रोग होते हैं।
वृषभ: षष्ठम स्थान में वृषभ राशि हो और उसमें शनि हो तो बहरापन, गले में सूजन, घटसर्प, गला रुंधना जैसे विकार होते हैं।
मिथुन: षष्ठम स्थान में मिथुन राशि हो और उसमें शनि हो तो दमा, क्षय, फेफड़े की बीमारियां, निमोनिया आदि व्याधियां होती हैं।
कर्क: षष्ठम स्थान में कर्क राशि हो और उसमें शनि हो तो दमा, मंदाग्नि, पेट का दर्द जैसे विकार उत्पन्न होते हैं।
सिंह: षष्ठम स्थान में सिंह राशि हो और उसमें शनि हो तो यकृत विकार, हृदय रोग, मेरुदंड सिकुड़ना जैसी बीमारियां होती हैं।
कन्या: षष्ठम स्थान में कन्या राशि हो और उसमें शनि हो तो पाचन क्रिया संबंधी विकार, कब्ज, पेट में बायु होना जैसे विकार उत्पन्न होते हैं।
तुला: षष्ठम स्थान में तुला राशि हो और उसमें शनि हो तो मूत्राशय संबंधी रोग, पथरी एवं सिरदर्द होता है।
वृश्चिक: षष्ठम स्थान में वृश्चिक राशि हो ओर उसमें शनि हो तो बहुमूत्र (बार-बार पेशाब होना) , भगंदर एवं रक््तविकार होते हैं।
धनु: षष्ठम स्थान में धनु राशि हो और उसमें शनि हो तो क्षय, खांसी, जांघों में शूल एवं मज्जातंतु के रोग होते हैं।
मकर: षष्ठम स्थान में मकर राशि हो और उसमें शनि हो तो त्वचा रोग, संधिवात, कब्ज एवं काला बुखार जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।
कुंभ: षष्ठम स्थान में कुंभ राशि हो और उसमें शनि हो तो नेत्रविकार, पेट बढ जाना एवं मेरुदंड से संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं।
मीन: वष्ठम स्थान में मीन राशि हो और उसमें शनि हो तो संधिवात, क्षय, सूजन, एडियों में व्याधि जैसे रोग होते हैं। “
राहुकृत रोग
उन्मादावस्था, हिस्टीरिया, मैस्मेरिज्म, भय, भूतबाधा, मूर्च्छा, अपस्मार, रक्तविकार, फोडे-फुन्सियां, खाज इत्यादि रोग होते हैं। ये रोग जन्मकुण्डली में अनिष्ट राहु के कारण या गोचर भ्रमण में अनिष्ट राहु के कारण होते हैं। लग्न में या अष्टम स्थान में षष्ठेश राहु युक्त होने पर मुंह का बव्रण रहता है।
* राहु के सप्तम स्थान में हो, लग्न में चंद्र-राहु हो एवं पंचम या नवम स्थान में शनि या मंगल हो तब पिशाच बाधा होती है। -
* लग्न में शनि राहु की युति हो, द्वितीय स्थान में शनि-राहु हो, अष्टम कस क्षीण चंद्र एवं मंगल राहु से युक्त हो तब भी पिशाच बाधा होती है।
* इसी तरह मंगल-राहु या शनि-राहु क्षीण चंद्र से युक्त होकर अष्टम
' स्थान में या व्यय स्थान में हों अथवा अष्टम स्थान में राहु क्षीण चंद्र से युक्त हो एवं द्वितीय स्थान में कोई भी पाप ग्रह हो तो पिशाच बाधा के कारण जातंक की मृत्यु तक हो जाती है। |
राहू-केतू-शारीरिक अवयवों को छोड़कर, अन्य सबमें क्रमशः शनि व मंगल के समान। इसके अलावा-आकस्मिकता, पृथकता, विभ्रम, दीर्घकालीन प्रभाव, मवाद/सड़ना/गलना।
राशियों का कारकत्व
मेष-सिर, दिमाग, वृष-नेत्र, मुख, मिथुन-श्वास नली, हाथ, कर्क-छाती, सीना, सिंह- हृदय, उदर, कन्या-आंतें, किडनी, तुला-गुप्तांग, जननांग, वृश्चिक-अंडकोष, गुदा, धनु-नितम्ब, पीठ, मकर-घुटने, कुम्भ-पिंडली, मीन-पैर।
कालपुरुष की कुंडली
कालपुरुष की कुंडली लग्नेश सम्बन्धी नियम
कोई भी ग्रह जब लग्नेश हो तो शरीर के उस भाग का कारक विशेष रूप से हो जाता है, जिस भाग में वह अधिकतर/व्यापक रूप से रहता है। जैसे -
सूर्य आंख, हड्डी, हृदय आदि का कारक है। पर जब यह किसी कुंडली में लग्नेश होगा तब वहां हड्डियों का विशेष रूप से कारक होगा, क्योंकि आंख, हृदय आदि के मुकाबले हड्डियां सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हैं।
चन्द्रमा मन, नेत्र, फेफड़े, रक्त आदि का कारक है। किन्तु लग्नेश होने पर यह रक्त का विशेष रूप से प्रतिनिधित्व करेगा, क्योंकि रक्त अन्य घटकों की अपेक्षा शरीर में अधिक व्याप्त/व्यापक है।
मंगल मांसपेशियों, मज्जा, मांस आदि का कारक है, परन्तु लग्नेश होकर मांस का प्रतिनिधित्व विशेष रूप से करेगा।
बुध वाणी, श्रवण शक्ति, बुद्धि, त्वचा आदि का कारक है। किन्तु जब लग्नेश होगा तब त्वचा का विशेष कारक हो जाएगा। क्योंकि त्वचा अन्य घटकों की अपेक्षा शरीर में कहीं अधिक व्यापक है।
गुरू यकृत, पीठ, नितम्ब, मेद आदि का कारक है। परन्तु लग्नेश होने पर मेद (चर्बी) का विशेष कारक होगा, क्योंकि मेद अन्य घटकों की अपेक्षा शरीर में अधिक व्यापक है।
शुक्र वीर्य, आंख, मुख, काम तथा मूत्र आदि का कारक है। किन्तु लग्नेश होने पर मूूत्र का विशेष प्रतिनिधित्व करेगा क्योंकि मूत्र अन्य घटकों की अपेक्ष शरीर में अधिक होता है।
शनि टांगों, नसों, नपुंसकता आदि का कारक है। परन्तु लग्नेश होने पर रोग ज्योतिष के अनुसार वह नसों का विशेष प्रतिनिधित्व करेगा, क्योंकि नसे अधिक व्यापक हैं।
विशेष-उपरोक्त नियमानुसार विशेष कारक को देखते हैं। यदि सूर्यादि उपरोक्त सात ग्रह कुंडली में लग्नेश नहीं हैं तो हड्डी आदि उन घटकों के सामान्य कारक ही रहेंगे। परन्तु लग्नेश होकर वे अन्य घटकों के सामान्य कारक होते हुए भी हड्डी आदि व्यापक घटकों के विशेष कारक हो जाएंगे।
दूसरे शब्दों में हम इन बातों को सूत्र रूप से इस प्रकार भी कह सकते हैं
सूर्य लग्नेश हो और नीच/पापयुक्त/पापदृष्ट हो तो जातक को हड्डियों से सम्बन्धित रोग देगा।
चंद्र लग्नेश हो और नीचध्पाप दृष्ट/पापयुक्त हो तो जातक को रक्त सम्बन्धी रोग देगा।
बुध लग्नेश हो और नीच/पापदृष्ट/पापयुक्त हो तो जातक को त्वचा सम्बन्धी रोग देगा।
गुरु लग्नेश और नीच/पापदृष्ट/पापयुक्त हो तो जातक को चर्बी के रोग देगा।
शुक्र लग्नेश हो और नीच/पापदृष्ट/पापयुक्त हो तो जातक को मूत्रेन्द्रिय मूत्र से सम्बन्धित रोग देगा।
मंगल लग्नेश हो और नीच/पापदृष्ट/पापयुक्त हो तो जातक को मांस सम्बन्धी रोग देगा।
शनि लग्नेश हो और नीच/पापदृष्ट/पापयुक्त हो तो जातक को नसों से सम्बन्धी रोग देगा।
विशेष-राहू, केतु किसी ग्रह को पाप प्रभाव में लाएंगे। शनि, सूर्य, मंगल भी क्रूर ग्रह होने से युति व दृष्टि से ऐसे ही परिणाम पैदा करेंगे।
नीच राशि में लग्नेश
सूर्य-सूर्य यदि लग्नेश हो और नीच राशि में बैठे तो कान में रोग होता है। (कन्धे या हाथ की हड्डी में विकार भी सम्भव है)। क्योंकि नीच का सूर्य लग्नेश भी होने का अर्थ है कि वह सिंह लग्न के जातक के तृतीय भाव में बैठा होगा जो हाथ, कंधे व कान का भाव है।
चन्द्र-चन्द्र लग्नेश हो राशि में बैठे तो जलोदर रोग देता है (रक्त विकार भी सम्भव होता है)। क्योंकि चन्द्र लग्नेश व नीच राशि में होने का अर्थ कि जातक कर्क लग्न का होगा और चन्द्रमा कुंडली के पांचवें भाव में बैठा होगा जो पेट का भाव है।
मंगल-मंगल लग्नेश होकर यदि नीच का होगा तो मेष लग्न वालों को चतुर्थ भाव में होने से छाती के रोग देगा (क्योंकि चौथा भाव छाती का है) तथा वश्चिक लग्न में नवम भाव में होने के कारण पीठ/नितम्बों के रोग देगा, क्योंकि नवम भाव पीठ/नितम्बों का है।
जातक को ’सूखा रोग’ आदि सम्भावित होंगे। क्योंकि मंगल मांस सम्बन्धी रोग देगा।
विशेष-नीच का मंगल अग्निकांड भी कराता है। या करंट आदि का भय भी जातक को रहेगा।
बुध-बुध लग्नेश होकर नीच का हो तो मिथुन लग्न वालों को दशम भाव में बैठकर भी नियमानुसार घुटनों के रोग नहीं देगा, क्योंकि बुध की स्थिति केन्द्र में बलदायक होती है। परन्तु दशम भाव पाप प्रभाव में होगा तो वहां बुध बैठा होने पर घुटनों का दर्द जरूर देगा, क्योंकि दशम भाव घुटने का भाव है।
लेकिन कन्या लग्न वालों को बुध सप्तम भाव में बैठकर, यानी नीच का होकर मूत्र सम्बन्धी रोग देगा न कि त्वचा सम्बन्धी। क्योंकि केन्द्र में बुध की स्थिति बलदायक होती है। अतः सातवें भाव पर पाप प्रभाव होगा तो बुध मूत्र रोग इसलिए देगा क्योंकि सातवां भाव मूत्र से सम्बन्धित भाव है।
हां लेकिन कन्या/मिथुन लग्न वालों का बुध यदि नीच का न हो (तब वह केन्द्र में नहीं होगा) तब केन्द्र से बाहर बैठा होने पर वह पाप प्रभाव में हुआ तो तत्सम्बन्धी अंग में त्वचा सम्बन्धी रोग देगा। जैसे-दाद, एग्जिमा, खुजली/सफेद दाग आदि।
गुरु-गुरु लग्नेश होकर नीच का होगा तो धनु लग्न वालों को दूसरे भाव में बैठा होने से मुख के रोग देगा। किन्तु मीन लग्न वालों को ग्यारहवें भाव में बैठने के बाद भी पैर के रोग तब तक नहीं देगा, जब तक ग्यारहवां भाव पाप प्रभाव में न हो। क्योंकि ग्यारहवें भाव में बैठा गुरु बलशाली हो जाता है। अतः पाप प्रभाव होगा तभी वह पैर की तकलीफ देगा।
शुक्र-शुक्र लग्नेश होकर नीच का हो तो वृष लग्न वालों को पांचवें भाव में बैठा होने से पेट की तकलीफ ही देगा (क्योंकि पांचवां भाव पेट का है)। यद्यपि शुक्र मूत्र के रोग देता है। इसी प्रकार तुला लग्न वालों को नीच का शुक्र द्वादश भाव में बैठने से पैर (तलवा, एड़ी, टखना आदि) की तकलीफ देगा या नींद की समस्या अथवा दृष्टि का रोग देगा। क्योंकि बारहवां भाव इन सबका कारक है। हां, यदि सप्तम भाव पाप प्रभाव में हुआ अथवा शुक्र, सप्तम भाव में पापग्रस्त हुआ तो मूत्र मूत्र रोगों की सम्भावना बनाएगा।
शनि-शनि लग्नेश होकर नीच का हुआ तो एक साल पारी की है। भाव में बैठे होने से छाती के रोग देगा, क्योंकि चौथा मात्र छाती में है। कुम्भ लग्न वालों को तीसरे भाव में बैठकर श्वास नली विकार या में नाड़ी तंत्र की समस्या दे सकता है। क्योंकि तीसरा भाव हाथ, कंधे व कंठ का है।
नोट-नीच के लग्नेश पर यदि पाप प्रभाव भी हो तो रोग का होना भी निश्चित हो जाता है तथा रोग दीर्घकाल तक चलने वाला, गम्भीर या भयानक होता है।
लग्नेश की स्थिति व राशीश
उपरोक्त विवेचनों के बाद यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि लाया कि भाव में बैठा है ? अथवा भाव का भावपति/राशीश किस स्थिति में है? जैसे-कोई ग्रह यदि लग्नेश न हो, किन्तु पापयुक्त/पापदृष्ट होकर किसी भाव में बैट तो का कुछ हद तक ही उस अंग को रोग/विकार/हानि देता है, जिसका खामिल कर अपनी राशि से दर्शाता है। परन्तु पूर्णतः हानि वह तभी देता है, जब कालपुरुष की कुंडली के अनुसार तत्सम्बन्धी अंग वाला भाव भी पीड़ित हो। लेकिन वही ग्रह यदि लग्नेश हो तो उस अंग का पूर्ण प्रतिनिधित्व करेगा जिस अंग की राशि लान में हो। यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है। इसे भली प्रकार समझ लेना चाहिए, अन्यथा रोग सम्बन्धी फलित गलत हो सकता है। उदाहरणार्थ -
सूर्य-कुंडली में सूर्य कहीं पर भी बैठा हो, सामान्यतः पेट का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि पांचवीं राशि/पांचवां भाव कालपुरुष की कुंडली के अनुसार पेट से सम्बन्धित है और स्वयं सूर्य पांचवीं राशि (सिंह) का स्वामी है। किन्तु यदि सूर्य लग्नेश हो तब किसी भी भावं में बैठे, विशेष रूप से और निश्चित रूप से पेट का प्रतिनिधित्व करेगा। ऐसे में यदि सूर्य पाप प्रभाव में हुआ तो पेट के रोग अवश्य देगा। साथ ही लग्नेश होने पर सूर्य हड्डियों का भी विशेष कारक होगा तथा जिस भाव में नीच का होकर बैठे या पाप प्रभाव में बैठे, वहां हड्डी सम्बन्धी रोग भी सम्भावित होंगे (हृदय, नेत्र, पित्त आदि जिनका भी सूर्य कारक है, तत्सम्बन्धी रोग भी सम्भावित होंगे, बशर्ते कि इन अंगों से सम्बन्धित भाव भी पाप प्रभाव में हो)।
चन्द्र-इसी प्रकार कुंडली में चन्द्रमा कहीं भी बैठा हो छाती का प्रतिनिधित्व सामान्यतः करता है। क्योंकि वह चौथी राशि (कर्क) का स्वामी है और चौथा भाव/चौथी राशि कालपुरुष के अनुसार छाती का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन यदि चन्द्रमा लग्नेश भी हो तो कहीं भी बैठकर छाती का प्रतिनिधित्व विशेष रूप से व निश्चितता से करेगा। ऐसे में यदि चन्द्रमा पाप प्रभाव में/निर्बल हुआ तो छाती के रोग अवश्य देगा। साथ ही लग्नेश होने से वह रक्त का भी विशेष प्रतिनिधित्व कर रहा होगा, अतः नीच/पाप प्रभाव में होने पर रक्त विकार भी सम्भावित होंगे। (कफ, नेत्र, जल, मन, स्मरणशक्ति आदि जिनका भी चन्द्र कारक है, तत्सम्बन्धी रोग भी सम्भावित होंगे, बशर्ते तत्सम्बन्धी भाव/राशि पाप प्रभाव में हों)।
मंगल-कुंडली में मंगल कहीं भी बैठे सिर व अंडकोष या गुदा का सामान्यतः प्रतिनिधित्व करेगा। क्योंकि वह पहली (मेष) और आठवीं (वृश्चिक) राशि का स्वामी है तथा काल पुरुष के अनुसार पहली राशि/भाव सिर का तथा आठवीं राशि/भाव अंडकोष या गुदा का प्रतिनिधित्व करते हैं। परन्तु यदि मंगल लग्नेश होगा तो कहीं भी बैठा हो मेष लग्न वालों के लिए सिर का विशेष प्रतिनिधित्व करेगा और वृश्चिक लग्न वालों के लिए अंडकोष या गुदा का विशेष प्रतिनिधित्व करेगा। जाहिर है कि मेष लग्न में मंगल पाप प्रभाव में होगा तो सिर/मस्तिष्क के रोग देगा। जबकि वृश्चिक लग्न में पाप प्रभाव का मंगल अंडकोष के रोग देगा। साथ ही लग्नेश मंगल क्योंकि मंगल का भी विशेष प्रतिनिधि होगा। अतः मेष हो या वृश्चिक दोनों लग्नों के जातकों को नीच/पाप प्रभाव में होने पर सूखा रोग आदि मांस सम्बन्धी रोगों की सम्भावना रहेगी (मांसपेशियों, कंधे, हाथ आदि जिन-जिनका कारक मंगल है, उनसे सम्बन्धित रोग भी सम्भावित होंगे, न बशर्ते की तत्सम्बन्धी भाव भी पाप प्रभाव में हों)।
बुध-इसी प्रकार कुंडली में बुध कहीं भी बैठा हो तो श्वास नली, कान, कंधे तथा आंतों व किडनी आदि का सामान्यतः प्रतिनिधित्व करेगा। क्योंकि वह तीसरी व छठी राशि (मिथुन व कन्या) का स्वामी है और कालपुरुष के अनुसार तीसरा व छठा भाव/राशि वर्णित घटकों के प्रतिनिधि हैं। लेकिन बुध यदि लग्नेश होगा तो कहीं भी बैठकर वर्णित घटकों का विशेष प्रतिनिधित्व करेगा (मिथुन लग्न में श्वास नली/कान/कंधे का तथा कन्या लग्न में आंत/किडनी आदि का)। साथ ही वह लग्नेश होकर त्वचा का भी विशेष प्रतिनिधि होगा। अतः वर्णित न घटकों से सम्बन्धित रोग पाप प्रभाव होने पर देगा और त्वचा रोग भी सम्भावित होंगे। (बुध-वाणी, बुद्धि, चेतना आदि जिनका भी कारक है। पाप प्रभाव में उनसे सम्बन्धित रोग भी सम्भावित होंगे, बशर्ते तत्सम्बन्धी भाव भी पाप प्रभाव में हो।)।
गुरु-कुंडली में गुरु कहीं भी बैठा हो। सामान्यतः पीठ, नितम्ब, यकृत नथा पैरों (तलवों) का प्रतिनिधित्व करेगा। क्योंकि वह नौवीं, बारहवीं राशि (धनु व मीन) का स्वामी है और कालपुरुष के अनुसार इन भावों/राशियों का इन अंगों से सम्बन्ध है पर गुरु यदि लग्नेश भी हो तो धनु लग्न में पीठ, नितम्ब व यकृत का विशेष प्रतिनिधित्व करेगा तथा मीन लग्न में तलवे/एड़ी/टखने/निद्रा आदि का। अतः यदि पाप प्रभाव में हुआ तो तत्सम्बन्धी रोग भी देगा। क्योंकि तब गुरु इनका विशेष प्रतिनिधि होगा। साथ ही मेद (चर्बी) सम्बन्धी रोग भी गुरु के लग्नेश हो। पर, नीच/पाप प्रभाव में होने पर सम्भव होंगे क्योंकि तब वह चर्बी का भी विशे प्रतिनिधि होगा (ज्ञान, विवेक, निर्णय शक्ति आदि जिनका भी गुरु कारक है उनसे सम्बन्धी रोग भी सम्भव होंगे। यदि तत्सम्बन्धी भाव भी पाप प्रभाव में हुए तो)।
शुक्र-कुंडली में शुक्र कहीं भी बैठे मुख, नेत्र, गला तथा जननांग/गुप्तांग का सामान्यतः प्रतिनिधित्व कर रहा होगा। क्योंकि वह वृष तथा तुला (2 व 1). राशियों का स्वामी है और कालपुरुष के अनुसार इन दोनों भावों/राशियों से ये घटक। सम्बन्धित हैं। अतः पाप प्रभाव में होने पर शुक्र लग्न वालों को गले, नेत्र व मुख सम्बन्धी रोग देगा, जबकि तुला लग्न वालों को गुप्तांग/जननांग सम्बन्धी रोग देगा क्योंकि तब शुक्र इन घटकों का विशेष प्रतिनिधि होगा। शुक्र लग्नेश होने पर मर का विशेष प्रतिनिधि भी होगा। अतः वृष व तुला दोनों ही लग्नों को नीच/पार प्रभाव में होने पर मूत्र रोग/मूत्रेन्द्रिय विकार सम्भव होंगे (नेत्र, कामशक्ति, कंठ आदि जिनका भी शुक्र कारक है, उनसे सम्बन्धित रोग भी सम्भावित होंगे बशर्ते, तत्सम्बन्धी भाव भी पाप प्रभाव में हुए तो)।
शनि-इसी प्रकार कुंडली में शनि कहीं भी बैठे घुटने/पिंडलियों का सामान्यतः प्रतिनिधित्व करेगा। क्योंकि वह 10-11 राशियों (मकर, कुम्भ) का स्वामी है तथा कालपुरुष के अनुसार दसवें-ग्यारहवें भाव/राशि में ये अंग समाहित हैं । परन्तु शनि लग्नेश होकर कहीं भी बैठा हो-तब इन अंगों का विशेष प्रतिनिधित्व करेगा। अतः पाप प्रभाव में इन अंगों के रोग/विकृति/पीड़ा देगा। साथ ही शनि लग्नेश होने पर क्योंकि नसों का भी विशेष प्रतिनिधि होगा, अतः नीच/पाप प्रभाव में होने पर नसों से सम्बन्धित रोग भी देगा (नपुंसकता, ठंडक, वायु आदि जिनका शनि कारक है-उनसे सम्बन्धी रोग भी सम्भावित होंगे, बशर्ते तत्सम्बन्धी भाव भी पार प्रभाव में हों तो)।
निष्कर्ष-कोई भी ग्रह जिस राशि का स्वामी है, उस राशि/भाव से सम्बन्धि अंगों में रोग/विकार दे सकता है। यदि पाप प्रभाव में हो तो। लेकिन यदि वही ग्रा लग्नेश हो तो अपनी राशि से सम्बन्धित अंगों में पाप प्रभाव होने पर अवश् रोग/विकार देता है। साथ ही जिस धातु/घटक का वह ग्रह लग्नेश होकर विशेष रूप से प्रतिनिधित्व करता है-उससे सम्बन्धित रोग भी तीव्र सम्भावित होते हैं। यदि लग्नेश नीच का/पाप प्रभाव में हो तो। इसके अलावा अन्य जिन अंगों धातुओं का वह ग्रह कारक होता है, उनसे सम्बन्धित रोग भी तब तीव्र सम्भावि हो जाते हैं जब उनसे सम्बन्धित भाव तथा वह ग्रह दोनों ही पाप प्रभाव में होते हैं। (पाप प्रभाव का अर्थ है-पाप ग्रह की राशि में स्थित होना/नीच का अथवा होना या शत्रु क्षेत्रीय
विभिन्न ग्रहों का शरीर पर प्रभाव
ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन, भोगों, कर्मों तथा घटनाओं पर ही नहीं अपितु उसके शरीर, मन, बुद्धि पर भी पड़ता है। शरीर के अध्ययन द्वारा भी यह जाना जाता है कि व्यक्ति किस ग्रह विशेष से अधिक प्रभावित है। यह विद्या सामुद्रिक शास्त्र कहलाती है। शरीर के अंग लक्षण, मुखाकृति, कपाल, ग्रीवा, चाल-ढाल, तौर-तरीके तथा चेष्टाएं आदि द्वारा व्यक्ति के चरित्र एवं गुणावगुणों के विषय में ज्ञान प्राप्त करना सामुद्रिक शास्त्र का विषय है। यह एक विस्तृत शास्त्र है जो एक पृथक पुस्तक की मांग करता है। किन्तु हम यहां मात्र शरीर पर ग्रहों के पड़ने वाले प्रमुख प्रभावों को संक्षेप में कहेंगे। ताकि कुण्डली देखे बिना भी पाठक जान सकें कि अमुक व्यक्ति किस ग्रह से विशेष रूप से प्रभावित है। अथवा कुंडली देखकर इस अध्ययन के निष्कर्षों को श्कन्फर्मश् कर सकें।
इस विवेचन में हम भारतीय आधार पर प्रमुख नवग्रहों के प्रभावों की ही संक्षिप्त चर्चा करेंगे। यह पाठकों के लिए न केवल नया व रोचक होगा, बल्कि ज्ञानवर्धक, उपयोगी तथा लाभकारी भी होगा।
शरीर के अंगादि से ग्रहों का मूल सम्बन्ध (शास्त्रोक्त मत)
ग्रह देवता धातु ज्ञानेन्द्रिय कर्मेन्द्रिय
सूर्य अग्नि मांस आंख, आत्मा, प्राण पैर
चंद्र जल रस मन -
मंगल पृथ्वी, वायु रक्त त्वचा हाथ
बुध आकाश, वायु चर्बी कान वाणी
गुरु पृथ्वी, अग्नि मज्जा बुद्धि -
शुक्र जल वीर्य रसना (जीभ) लिंग
शनि पृथ्वी हड्डी नासिका गुदा
राहू-केतू पृथ्वी - - -
सूर्य का शरीर पर प्रभाव
ऽ सूर्य स्वराशि/उच्च राशि का हो अथवा शुभ ग्रहों की राशियों-कन्या, वृष, धनु, मीन में हो तथा शुभग्रहों से दृष्ट हो अथवा उनसे युति हो तो मनुष्य शक्तिशाली, पवित्रात्मा तथा तीक्ष्ण दृष्टि वाला होता है।
ऽ सूर्य नीच राशि/शत्रु राशि में हो अथवा पापग्रहों से दृष्ट या उनके साथ हो, निर्बल हो तो मनुष्य की दृष्टि निर्बल एवं पाप युक्त होती है। वह पापात्मा होता है।
ऽ सूर्य वक्री ग्रहों के साथ या उनसे दृष्ट हो तो जातक की दृष्टि टेढ़ी भेंगापान) तथा आत्मा भी निर्बल और मलिन होती है। जातक को श्वास रोग भी होता है।
ऽ वक्री या नीच राशि के शुक्र के साथ सूर्य हो तो जातक काना व बुद्धिहीन होता है। अन्य नीच ग्रहों के साथ सूर्य हो तो भी जातक पापात्मा व नेत्र रोगी होता है।
ऽ लग्न में सूर्य हो तो जातक क्रोधी तथा दुर्बल या अविकसित कद-काठी का होता है।
अनुभवजन्य समग्र प्रभाव-सूर्य से प्रभावित जातकों का शरीर अस्थिप्रधान संरचना वाला, कुछ वर्गाकार-सा तथा प्रायरू इकहरा (इन्हें मोटा नहीं कहा जा सकता) होता है। ऐसे जातकों की नाक उन्नत व तीखी होती है तथा दृष्टि पैनी व गहन होती है। प्रायरू ये उच्च पद पर पहुंचने वाले व सम्मानित होते हैं। सूर्य लग्न के जितने निकट हो जातक के शरीर पर उतने ही बाल कम होते हैं। लग्न से जितना दूर हो, जातक के शरीर पर उतने ही बाल अधिक होते हैं। सूर्य से प्रभावित जातक ऊर्जावान, प्रभावशाली किन्तु अतिस्वाभिमानी तथा कुछ गरम मिजाज के होते हैं। बहुधा ये लोग ैन्च्म्त्प्व्त्प्ज्ल् ब्व्डच्स्म्ग् से ग्रस्त भी होते हैं किन्तु सिद्धांतवादी व अडिग होते हैं।
चन्द्रमा का शरीर पर प्रभाव
ऽ यदि पूर्ण चन्द्र केन्द्र, लग्न, ग्यारहवें या पांचवें भाव में हो तो जातक का मन प्रफुल्लित होता है। वह समाधिस्थ (भली प्रकार कन्सन्ट्रेट) हो सकता है। और कार्यों में मन लगाता है। यदि नौवें घर में पूर्ण चन्द्र का गुरु से दृष्टि/युति/इत्थसाल सम्बन्ध हो जाए तो जातक योगी व संयमी होता है।
ऽ यदि शुक्र से चन्द्रमा का संयोग युति/दृष्टि द्वारा हो जाए तो जातक शृंगारप्रिय, रसिक तथा स्त्रियों को प्रिय होता है।
ऽ यदि नीच का चन्द्र लग्न या नवम स्थान में हो तो जातक का मन विक्षिप्त रहता है तथा पाप में रत रहता है।
ऽ तीसरे, पांचवें, नौवें, ग्यारहवें स्थान में बुध से चन्द्र का संयोग हो जाए तो जातक गणितज्ञ, ज्योतिषी, शिल्पकार या मुंशी होता है, शुक्र से संयोग हो तो कवि या कलाकार अथवा संगीतज्ञ आदि होता है।
ऽ क्षीण चन्द्रमा नीच ग्रहों के साथ दुखदायी होता है। चन्द्रमा राहू से दृष्ट युत हो तो भ्रम, भय आदि मनोरोगों की सम्भावना रहती है तथा मनोबल नहीं होता।
ऽ लग्न या द्वितीय भाव का चन्द्र प्रायः जातक को ब्स्म्।छ ैभ्।टम्क् बनाता है। द्वितीय भाव का चन्द्र हो तो जातक की वाणी स्त्रियों के समान तथा सौग्य व नरम होती है। तीसरे भाव का चन्द्र जातक को योगी/स्त्रियों के विषय में संयमी बनाता है।
अनुभवजन्य समग्र प्रभाव-चन्द्र से प्रभावित जातकों का चेहरा प्रायः गोल होता है। ये सुन्दर व गोरे होते हैं। अक्सर खाने-पीने के शौकीन होते हैं। श्रृंगारप्रिय, रसिक मिजाज तथा साहित्य या कला आदि में रुचि रखने वाले और विनम्र होते हैं। ऐसे जातक लड़ाई-झगड़े (विशेषकर हाथापाई) से दूर रहने वाले होते हैं। कुछ नाजुक मिजाज प्रकृति के भी होते हैं। ये लोग शारीरिक परिश्रम की बजाय मानसिक परिश्रम को अधिक उत्साह से करने वाले होते हैं। किन्तु अस्थिर बुद्धि वाले होते हैं। पूर्णिमा की रात को ये विशेष आनन्द अनुभव करते हैं तथा जलीय स्थानों पर इनका मन लगता है।
मंगल का शरीर पर प्रभाव
ऽ यदि कुंडली में मंगल स्वग्रही/उच्च राशि का हो तो जातक तंदुरुस्त और बलिष्ठ होता है। किन्तु उसकी दृष्टि हो तो प्रायः शरीर पर वहां चोट का निशान होता है। लेकिन यदि मंगल लग्न में ही हो तो जातक क्रोधी प्रवृत्ति का, गरम दिमागवाला होता है और उसके चेहरे (विशेषकर माथा) पर चोट का निशान होता है।
ऽ यदि नीच राशि का मंगल सूर्य से दृष्ट हो तो शरीर में रक्त का रोग या दूषण होता है। नीच मंगल यदि शत्रु ग्रह से युत हो तो जातक रक्ताल्पता का शिकार होता है। बुध व मंगल की युति यदि राहू-केतु या शनि से दृष्ट हो तो त्वचा या खून के रोग-एग्जिमा, दाद, सफेद कोढ़ या गलित कोढ़ आदि सम्भावित होते हैं।
ऽ मंगल यदि शुभ घरों में गुरु से उत्तम योग करे तो जातक शूर, साहसी तथा रक्षक स्वभाव का होता है। वह अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाला होता है।
ऽ नीच मंगल राहू/केतु से युति करे/दृष्ट हो तो रुधिर विकार होते हैं। राहू के कारण मुंह से खून थूकना या नकसीर छूटना आदि तथा केतु से बवासीर, अर्श या पेशाब से खून आने का रोग होता है तथा फोड़े-फुसी आदि अधिक निकलते हैं।
ऽ मंगल तीसरे घर में सबल हो तो जातक झगड़ालू स्वभाव का होता है। छठे घर में हो तो जातक अपने शत्रुओं पर भारी पड़ने वाला एवं शत्रुजित् होता है। दूसरे भाव का मंगल जातक को कठोर/कड़ी वाणी वाला बनाता है। साथ में केतु या राहू भी हों तो जातक गालियां भी देता है।
अनुभवजन्य समग्र प्रभाव-मंगल से प्रभावी जातक उत्साही, क्रोधी, साहसी, नुकीली ठोड़ी वाले, भारी सिर वाले, चौड़ी छाती व कंधे वाले तथा कुछ लाल रंगत वाले होते हैं।
बुध का शरीर पर प्रभाव
ऽ लग्न, तृतीय, पंचम या एकादश भाव में बुध बली हो तो जातक बुद्धिमान तथा उत्तम वक्ता होता है। अथवा लेक्चरर (व्याख्याता) या गायक होता है।
ऽ नीच का बुध नीच ग्रहों या नीच राशियों से सम्बन्ध रखे तो जातक की वाणी में हकलाहट, तुतलाहट या गूंगापन आदि वाणीदोष उत्पन्न करता है।
ऽ बुध का यदि गुरु से शुभ सम्बन्ध हो तो जातक विद्वान, पंडित, ज्ञानी, सत्यवादी (कथावाचक/धर्मोपदेशक आदि होना भी सम्भव है) होता है। किन्तु नीच ग्रहों से बुध का योग हो तो जातक अपनी बोलने की कुशलता का प्रयोग ठगी, बेईमानी, झूठ, धोखा या बात बदलने में करता है।
ऽ नीच चन्द्रमा से बुध का संयोग जातक को कानों का कच्चा तथा मन का अति चंचल बनाता है। किन्तु उच्च के चन्द्रमा से बुध का योग हो तो जातक विचारों और प्रण (वायदे) का पक्का होता है।
ऽ नीच का बुधं या नीच का मंगल किसी भाव से युत हो जाए तथा राहू/केतु/शनि से दृष्ट हो अथवा युत हो तो त्वचा में रक्त विकार के दोष-फोड़ेफुसी, एग्जिमा, कुष्ठ आदि चर्म रोग पूर्णतः सम्भावित होते हैं।
अनुभवजन्य समग्र प्रभाव-बुध ग्रह से प्रभावित व्यक्ति अधिक बोलने वाले (बातूनी), विनोदप्रिय तथा प्रसन्नचित्त रहने वाले होते हैं। ये बात करतेकरते हंसते-मुस्कराते रहते हैं। इनके गाल प्रायः गोलगप्पों की तरह फूले हुए होते हैं। माथा चौड़ा होता है। बुध अशुभ हो तो वाणी में कुछ दोष रहता है और सिर के आगे के बाल झड़ जाते हैं (मध्यायु के आसपास)। इनमें चुगलखोरी की आदत होती है। शरीर से कुछ मोटे होते हैं। बुध ग्रह से प्रभावित जातक मनोरंजन के प्रेमी, संगतिपसंद होते हैं। कुछ मामलों में ये खिलाड़ी या खेल के शौकीन भी होते हैं। लेकिन विद्वान और कुशाग्र बुद्धि तथा गणित/लेखन से जुड़े होते हैं।
गुरु का शरीर पर प्रभाव
ऽ लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में गुरु हो तथा स्वराशि/उच्च राशि का बली अवस्था में हो तो जातक धुरंधर विद्वान, वेदज्ञ तथा परम बुद्धिमान होता है। ऐसे जातक के सामने वादी का बोलने का साहस नहीं होता। अथवा वादविवाद में जातक की विजय होती है। वह भाग्यशाली होता है।
ऽ लग्नेश, पंचमेश, आयेश इन तीनों में से कोई यदि बृहस्पति हो और बली हो तो जातक बुद्धिमान, विद्वान तथा प्रायः धन की स्थिति से बेहतर होता है।
ऽ किसी पापग्रह के साथ छठे, आठवें या बारहवें भाव में गुरु की युति हो तो विद्या तथा बुद्धि के योग में कमी आती है और जातक जड़बुद्धि हो सकता है। ऐसे में यदि गुरु नीच का हो तो जातक अवश्य ही मूर्ख/लंठबुद्धि होता है।
ऽ वैसे गुरु भले ही नीच का हो किन्तु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम व एकादश भाव में हो तो जातक कुछ न कुछ पढ़ा-लिखा अवश्य होता है। इसी प्रकार गुरु कहीं भी बैठे परन्तु यदि लग्न पर उसकी दृष्टि हो तो जातक अपनी कमिटमेंट को पूरा करने वाला, न्यायप्रिय तथा प्रायः धोखा न देने वाला होता है। ऐसा जातक अनैतिक कार्य भी करता है तो बताकर करता है।
अनुभवजन्य समग्र प्रभाव-गुरु ग्रह से प्रभावित जातकों का चेहरा प्रायः यूनानियों की भांति लम्बोतरा व ैभ्।त्च् होता है। नासिका उत्तम व माथा चौड़ा होता है। कद-काठी भी अच्छी होती है किन्तु शरीर स्थूल होता है तथा पध्यायु के आसपास तोंद अवश्य निकल जाती है। फिर भी कुल मिलाकर उनका व्यक्तित्व प्रभावित करता है। ऐसे जातक धार्मिक, अध्ययनप्रिय/पुस्तकों से जुड़े रहने वाले तथा विद्वान, सज्जन और न्यायप्रिय होते हैं। गुरु अशुभ हो तो सिर के पीछे के बाल मध्यायु के आसपास उड़ जाते हैं तथा जातक गले में माला/चेन पहनने का शौकीन हो जाता है।
शुक्र का शरीर पर प्रभाव
ऽ शुक्र यदि लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव हो तो जातक वीर्यवान, तेजस्वी, बुद्धिमान, सुदर्शन, कला या संगीतप्रिय, शृंगारप्रिय, विनम्र व नीतिवान होता है। यदि उच्च या स्वग्रही भी हो तो और भी उच्च कोटि के फल होते हैं तथा सौभाग्य एवं ऐश्वर्य में वृद्धि होती है।
ऽ यदि नीच का शुक्र अष्टम भाव में क्षीण चन्द्र व मंगल के साथ हो अथवा नीच का मंगल शुक्र व क्षीण चन्द्र के साथ अष्टमस्थ हो तो जातक को प्रमेह या धात जाने का रोग होता है।
ऽ छठे घर में शुक्र नीच राशि में हो या मंगल की राशियों में हो तथा मंगल से दृष्ट हो तो प्रमेह, सूजाक आदि गुप्त रोग होते हैं और पेशाब में खून आता है। छठे घर का शुक्र अकेला होने पर भी वीर्य रोग तथा नपुंसकत्व या पौरुष की अल्पता देता है और कामी बनाता है।
ऽ शुक्र यदि छठे घर में शनि से सम्बन्धित हो तथा नीच हो तो जातक अल्पवीर्यता के कारण युवावस्था में ही वृद्ध हो जाता है तथा बाल सफेद हो जाते हैं।
ऽ लग्न या द्वितीय भाव में शुक्र हो तो जातक क्लीन शेव्ड रहता है। सुन्दर होता है तथा आयु बढ़ने पर भी उसका सौंदर्य, मोहकता, लावण्य व आकर्षण बना रहता है। परन्तु दूसरे भाव का शुक्र जातक को चटोरा बनाता है।
अनुभवजन्य समग्र प्रभाव-शुक्र से प्रभावित जातक गोरे, सुंदर, लावण्यपूर्ण त्वचा वाले किन्तु कोमल अंगों वाले या स्त्रैण स्वभाव के होते हैं। रसिक, शृंगारप्रिय, फैशनेबल व कलाप्रेमी भी होते हैं। संगीत में विशेष रुझान रहता है। विपरीत लिंग के प्रति अत्यंत आकर्षण रहता है। किन्तु उनमें आकर्षित कर लेने की क्षमता भी रहती है। ऐसे जातकों का यौवन तथा सौंदर्य/आकर्षण वृद्धावस्था में भी बना रहता है। वे आभूषणप्रेमी होते हैं।
शनि का शरीर पर प्रभाव
ऽ शनि उच्च राशि/स्वराशि का हो तथा बली होकर लग्न, तृतीय, अष्टम या एकादश भाव में हो तो जातक सांवला, पुष्ट शरीर वाला, चौड़ी हड्डियों वाला तथा बहादुर होता है। न्याय का पक्षधर हो भी सकता है।
ऽ शनि किसी भी घर में बलवान स्थिति में हो, जातक को आयु एवं सुदृढ़ अस्थियां प्रदान करता है। आठवें घर में शनि को विशेष रूप से दीर्घायु प्रदाता माना गया है।
ऽ शनि नीच का/शत्रु राशि का हो तथा नीच ग्रहों से युति करे या कम अंशों का हो तो जातक निर्बल, पतला-दुबला तथा रोगी शरीर वाला होता है।
ऽ नीच शनि यदि राहू/केतु से दृष्ट हो या उनके साथ युति करे तो गठिया आदि रोग विशेष रूप से देता है।
ऽ छठे घर में शनि बली अवस्था में हो तो जातक बड़े-बड़े शत्रुओं तथा दुर्जनों पर विजय प्राप्त करने वाला होता है। जबकि तीसरे भाव का शनि जातक को अन्ततः वैराग्य अथवा संन्यास की तरफ ले जाता है।
ऽ दसवें या ग्यारहवें भाव में शनि हो या इनको देखे तो जातक राजनीति में रुचि लेने वाला तथा नौकरी करने वाला होता है। सूर्य का सम्बन्ध साथ हो तो जातक प्रायः सरकारी नौकरी करता है।
अनुभवजन्य समग्र प्रभाव-शनि से प्रभावित जातक सांवलेध्काले रंग के, प्रायः लम्बे शरीर वाले तथा तेज चलने वाले अक्सर होते हैं। इनकी गर्दन या सिर कंधों से आगे की ओर झुका रहता है तथा शरीर की नसें प्रायः मोटी व दर्शनीय होती हैं। अशुभ प्रभाव में जातक आलसी, बहुभोजी, निद्रालु, लापरवाह तथा काम टालने वाले, मलिनवेषी, अस्वच्छ व शरीर पर ज्यादा बालों वाले एवं तमोगुणी होते हैं।
राहू-केतु का शरीर पर प्रभाव
बली राहू लग्न या आठवें घर में हो तो जातक पुष्ट शरीर वाला, दीर्घजीवी, साहसी तथा वीर होता है। यदि राहू निर्बल हो तो जातक पतला व दुर्बल होता है।
राहू बली हो तथा शनि व शुक्र से दृष्ट हो तो भी जातक पुष्ट शरीर का तथा साहसी होता है। किन्तु कामी भी अधिक होता है। अथवा व्यभिचारी होता है।
राहू के साथ क्षीण चन्द्र या नीच का सूर्य हो या दृष्टि सम्बन्ध हो तो जातक हल्के शरीर का, अल्पायु और आलसी होता है। ऐसे जातक का मनोबल व आत्मबल अल्प होता है तथा जातक पापी होता है। उसे मनोरोग भ्रम आदि सम्भावित होते हैं।
केतु का प्रभाव बहुत कुछ मंगल के समान ही होता है। किन्तु केतु बली हो तो जातक को रहस्य तथा आध्यात्मिक विषयों की तरफ प्रेरित करता है। ऐसे जातक को तन्त्र मंत्र की सिद्धि सम्भव होती है (विशेषकर तब जब केतु छठे भाव में उच्च का हो)। केतु आठवें भाव में बवासीर तथा दूसरे भाव में कड़वी वाणी देता है, बारहवें भाव में मोक्ष।
राहू बारहवें भाव में जातक को व्यभिचारी व पतित बनाता है। दूसरे भाव में मांसाहारी व मदिराप्रेमी बनाता है। राहू, केतु या शनि का द्वितीय स्थान पर प्रभाव हो तो जातक प्रायः मूंछ-दाढ़ी रखने वाला भी होता है। दसवेंध्ग्यारहवें भाव से राहू का सम्बद्ध हो तो जातक राजनेता या अनैतिक कार्य करने वाला (अपराधी/स्मगलर आदि) होता है।
अनुभवजन्य समग्र प्रभाव-राहू से प्रभावित जातक दुष्ट स्वभाव का, अहसानफरामोश तथा राजनीतिज्ञ होता है। ऐसे जातक के (विशेषकर स्त्रियों में ये प्रभाव अधिक देखने में आया है) ऊपर के दांत कुछ बाहर निकले होते हैं। ये जातक शेखीखोर, बकवादी, कलहप्रिय, चिल्लाकर बोलने वाले, कर्कश तथा अड़ियल प्रवृत्ति के होते हैं। ऐसी स्त्रियों को विधवा/तलाक/परित्याग आदि कारणों से पति वियोग झेलना पड़ता है। केतु सातवें स्थान में हो तो विधवा ही बनाता है।
वैदिक ज्योतिष एक प्राचीन विज्ञान है जो सार्वभौमिक और कालातीत हैण्ज्ञान के इस विशाल सागर में सभी सांसारिक घटनाएँ वे चाहे अतीतए वर्तमान और भविष्य से सम्बन्ध क्यों ना रखती होंए परन्तु यह सर्वविदित सत्य है की वह घटना इस महान विद्या से सम्बन्ध रखती हैं वैदिक ज्योतिष जो जीवन की विविधता के भीतर एकता व्यक्त करता है ए और एक अंतर्निहित महान परिशुद्धता और करुणा के साथ सब बातों को संचालित करता है और इन विचारों का समर्थन प्रकृति के नियमों पर आधारित हैण्वैदिक ज्योतिष के लिए मानव जाति एक उपकरण हैं और जो प्रकृति के साथ अधिक से अधिक सद्भाव में रहते हैंए जिसका उपयोग मानव जाति को विकास के लिए अधिकतम अवसरों को प्रदान करना और न्यूनतम असफलता के लिए है
वैदिक ज्योतिष पृथ्वी पर आकाश से उत्पन्न ऊर्जा का सूक्ष्म जीवों एपौधोंए पशुओंए मानव के उपर प्रभाव का अध्ययन हैण्यह ऊर्जा एसभी स्तरों पर मानव शरीर और मन को प्रभावित कर रही हैंण्ज्यौतिष कुंडली में व्यक्ति के रोगों का ना केवल सकेंत बल्कि उसके अच्छे या बुरे स्वास्थ्यएकमजोर जीवन शक्तिए रोगों की प्रवृतिए दुर्घटनाएं एभावनात्मक स्थिरता और अस्थिरता एबौद्धिक सुदृढ़ता के बारे में बताते हैं अपितु इन रोगों के कारक भी है इसलिए ग्रहों की भुमिकों को कम नहीं आंकना चाहिए
भारत के प्राचीन ऋषि और मुनियों ने प्रकृति और मानव जाति के बीच के घनिष्ट सम्बन्धों को समझा ए और इस प्राकृतिक सम्बन्ध का एक परिणाम के रूप में एक स्वास्थ्य होने की एक प्रणाली विकसित की जिसे आयुर्वेद कहा गया हैण्हालांकि पश्चिमी जगत की सोच क्वांटम भौतिकी की खोज के साथ कुछ स्तर तक इस ज्ञान को अपनाने के लिए बाध्य हुई ए जो वैदिक ज्ञान के उपर आधारित और सहस्रों वर्षों के शोध का परिणाम है
वेद समग्र रूप में और समकालीन सन्दर्भ में ज्ञान का सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैंण् मानव रोगग्रहों की गुरुत्वाकर्षणए घूर्णनए भ्रमण की शक्ति का परिणाम है ज्योतिष और आयुर्वेद के घनिष्ट सम्बन्धों को इनके परिणामो के साथ जोड़ा जा सकता है आयुर्वेदिक चिकित्सक एज्योतिष को एक उपकरण की भांति प्रयोग कर सकते है ज्योतिषए चिकित्सक को रोगी के कर्म और ग्रहों के अनूकुल बनाने में सहायता करता है जो रोगों की अवधि और रोग के ठीक होने का समय पूर्ण रूप से बताने का सामर्थ्य चिकित्सक को प्रदान करता है
ज्योतिष शास्त्र रोगों के बारे में संकेत देता है जबकि आयुर्वेद शरीरिक विश्लेषण के पश्चात उसके दोषों जिन्हें आयुर्वेद में त्रिदोष कहा जाता है या जैविक शारीरिक द्रव्य की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करता है ये त्रिदोष वात एपित और कफ के नाम से जाने जाते है वात एपित और कफ जो शरीर में शारीरिक पदार्थ की तरह विद्यमान है समान रूप से गति करते हैं वात गतिएपित्त गर्मी और प्रकाश और कफ स्थूलता और स्थिरता का संकेत है
वैदिक ज्योतिष जवाहरातए मंत्रोंए और अनुष्ठानों के उपचारात्मक उपायों के लिए प्रसिद्ध हैए यह इस बात का प्रमाण हैकि हमारे मानव जीवन में ब्रह्मांड की सकारात्मकऊर्जा लाने के क्रम में परिवर्तन और उसपरिवर्तन कोशक्तिशाली विधियों से नकारात्मक उर्जा को कम करने के लिए इन विधियों को हम अपने जीवन के कर्मों और आध्यत्मिक उत्थान के लिए प्रयोग में लाते हैं और इन्ही उपचारों को आयुर्वेद के सम्बन्ध में भी प्रयोग किया जा सकता है आयुर्वेद ना केवल सकारात्मक कर्म और आध्यत्मिक उत्थान के लिए है बल्कि उचित जीवन शैलीएआहार -दकंेीय विहार ए जड़ी .बूटी एव्यायाम और उचित व्यवहार सिखाता है और ज्योतिष इस ज्ञान को समग्र रूप मे इसे मानव जीवन को निरोग बनाने में सहयता और उपचारात्मक उपायप्रदान करता है
पश्चिमी जगत ने जो उपचारात्मक ओषधि प्रणाली विकसित की है वह प्रणाली शरीर के एक भाग उपचार करती हैं और इस बात को अनदेखा करते हैं कि यह भी शरीर का ही भाग है यह दृष्टिकोण उपचार के अन्तर्निहित कारणों के उपचार पर ध्यान ना दे कर केवल शरीर के केवल उस भाग का उपचार के लिए कुख्यात हो गयी है यह शरीर को समग्र रूप में ना लेकर केवल शरीर के उस भाग को ही पूर्ण मान कर उपचार करते है इस प्रक्रिया में यह प्रणाली अक्सर उपचार के बजाय कई दुष्प्रभावों को जन्म देती है इसके विपरीत आयुर्वेद शरीर को समग्र रूप में शरीर ही नहीं मन और आत्मा से सम्बन्ध बनाता है पश्चिमी जगत की उपचारात्मक प्रणाली ज्योतिष या ग्रहों का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है इस विचार के बिना ही रोग का उपचार करने की कोशिश करता है और इसलिए कई अनावश्यक और परिहार्य कठिनाइयों को जन्म देता है और उपचार्धीन व्यक्ति अंन्य अनेकों व्याधियों से ग्रस्त हो जाता है और एक अनंत के चक्र में फंस कर अपने जीवन को दुष्कर ही नहीं दुस्साध्य बना लेता है
होना आदि)।
प्रमुख नियम/सूत्र
ग्रह, राशि तथा भाव के कारकत्व, लग्नेश के नीच होने या अन्य भावों में होने की स्थिति, लग्नेश व राशीश से सम्बन्धित आधारभूत नियमों को जान लेने के बाद हम रोग ज्योतिष में फलित के कुछ प्रमुख नियमों की चर्चा भी संक्षेप में करेंगे। इनको और भी ध्यान से समझना चाहिए क्योंकि इनमें से कुछ नियम फलित ज्योतिष के ऐन विपरीत हैं।
नियम 1-यो यो भावः स्वामियुक्तो दृष्टो वा।
तस्य तस्य अस्ति वृद्धिः।।
-पृथुयशस
अर्थात् जिस जिस भाव पर उसके स्वामी की दृष्टि होती है अथवा भावेश जब अपने ही भाव में बैठता है तो उस भाव से सम्बन्धित फलों की वृद्धि होती है।
(पाठक किसी भ्रम में न पड़ें। अतः पुनः स्मरण दिला दें कि भाव कारक जब अपने भाव में बैठता है तो भाव सम्बन्धी फलों को नष्ट करता है-कारकः भावो नाशाय।। किन्तु भाव स्वामी जब भाव में बैठता है तो भाव के फलों में वृद्धि करता है। अतः भावेश को प्रमादवश कारक समझेंगे तो विभ्रमित हो जाएंगे)।
स्मरणीय-उपरोक्त नियम फलित ज्योतिष में भाव की शुभता व प्रभाव वृद्धि करने वाला महत्त्वपूर्ण नियम है। किन्तु रोग ज्योतिष में यह नियम हानिकारक है। रोग ज्योतिष में यदि किसी भाव का स्वामी अपने भाव पर दृष्टि डालता है, या जहां बैठता है तो भाव से सम्बन्धित अंग की हानि करता है। विशेषरूप से तब जब वह ग्रह पाप/क्रूर ग्रह हो।
नियम 2-’फलित ज्योतिष’ के अनुसार सौम्य ग्रह यदि वक्री हो जाए तो उसकी शुभता बढ़ जाती है तथा क्रूर ग्रह यदि वक्री हो जाए तो उसकी अशुभता बढ़ जाती है। परन्तु रोग ज्योतिष में इसका ऐन विपरीत होता है। यानी अशुभ/पापग्रह यदि वक्री हो जाए तो उसकी अशुभता कम हो जाती है तथा शुभ ग्रह यदि वक्री हो जाए तो उसकी शुभता कम हो जाती है। दूसरे शब्दों में फलित ज्योतिष में शुभ ग्रह का वक्री होना अच्छा तथा पाप ग्रह का वक्री होना बुरा होता है। परन्तु रोग ज्योतिष में पाप ग्रह का वक्री होना अच्छा तथा शुभ ग्रह का वक्री होना बुरा होता है। यह ध्यान रखना चाहिए।
नियम 3 -रोग ज्योतिष के अनुसार तीसरे तथा छठे भाव में गुरु, शुक्र तथा बुध बलवान नहीं होते। किन्तु यहां सूर्य, मंगल, शनि, राहू, केतु बलवान माने जाते हैं। (स्त्री जातकों में पांचवें/सातवें स्थान का सूर्य भी बुरा होता है।)
नियम 4-लग्नकुंडली में यदि लग्नेश अकेला बैठे तो अपनी राशि तथा व्यापक धातु से सम्बन्धित अंग या धातु का प्रतिनिधित्व विशेष रूप से करता है।
अतः पाप प्रभाव में उन्हीं अंगों व धातुओं के रोग देता है। परन्तु यदि वह किसी अन्य ग्रह के साथ बैठा हो और पाप प्रभाव में हो तो रोग या कष्ट लग्नेश। सम्बन्धित राशि के अंग में न होकर उसके साथ बैठने वाले ग्रह की राशि से सम्बन्धित अंग में होता है। उदाहरण के लिए सिंह लग्न की कुंडली में यदि सूर्य बुध से युति कर रहा हो और पाप प्रभाव में हो तो रोग सूर्य के विशेष प्रतिनिधि अंग ’पेट’ या धातु ’हड्डी’ में न होकर बुध की प्रतिनिधि धातु ’त्वचा’ या प्रतिनिधि अंग किडनी, आंत, श्वास नलिका आदि में होगा। क्योंकि तब लग्नेश लग्न का स्वामी होने से मानो अपनी बला/पाप प्रभाव अपने साथ बैठने वाले ग्रह पर टालकर स्वयं बरी हो जाएगा। लेकिन अकेले लग्नेश को यह सुविधा प्राप्त नहीं होती।
नियम 5-सामान्यतः कुंडली में कोई राशि तथा उस राशि का स्वामी दोनों पाप प्रभाव में हों तो तत्सम्बन्धी अंग में रोग/कष्ट/चोट देंगे। जैसे कर्क राशि व चंद्र दोनों पाप प्रभाव में हों तो छाती/फेफड़ों के रोग होंगे। अथवा अधिक सम्भावित होंगे मात्र राशि या राशीश एक ही ’इन्फैक्टिड’ होगा तब मामूली सम्भावना होगी।
नियम 6-किन्तु राशि व राशिपति के साथ यदि तत्सम्बन्धी अंग का प्रतिनिधि भाव एवं उस भाव का स्वामी भी पाप प्रभाव होंगे तो अवश्य ही तत्सम्बन्धी अंग में विकृति/रोग/पीड़ा/चोट देंगे। तब सम्भावना न रहकर रोग निश्चित हो जाएगा। क्योंकि एक ही तथ्य को परिलक्षित करने वाले जितने कारण/संकेत कुंडली में पाप पीड़ित हों तो उतना ही पापफल निश्चित एवं अटल होता जाता है (इसीलिए 100ः कन्फर्मेशन के लिए चन्द्रकुंडली व सूर्यकुंडली भी विचारते हैं)।
नियम 7-ग्रह अपने निज प्रभाव को छोड़कर उन ग्रहों का प्रभाव ग्रहण करते हैं जिनकी राशि में वे स्थित होते हैं। अतः अपनी दृष्टि में वे न केवल अपने प्रभाव बल्कि उस भाव के राशीश के प्रभाव को (अधिक मात्रा में) तथा उस ग्रह के प्रभाव को (कम मात्रा में) भी दृष्ट स्थान पर डालते हैं, जिस ग्रह से वे युति कर रहे होते हैं। यह एक अत्यंत विशिष्ट नियम है जो फलित ज्योतिष में भी उपयोगी है, परन्तु इसे प्रायः कम ही लोग जानते हैं। रोग ज्योतिष में यह आधारभूत नियमों में से एक है। सरल तरीके से हम कह सकते हैं कि कोई ग्रह अपना शुद्ध प्रभाव तभी देता है, जब वह स्वराशि में अकेला हो और किसी से दृष्ट न हो। अन्यथा दृष्टि, युति व अन्य राशि में स्थिति उसके प्रभाव को दूषित या मिलावटी करते हैं, शुद्ध नहीं रहने देते।
नियम 8-सूर्य, राहू व शनि-ये तीनों पृथकताजन्य प्रभाव रखते हैं। अतः इन तीनों ग्रहों से अधिष्ठित राशि का स्वामी भी पृथकताजन्य प्रभाव रखता है तथा किसी भी लग्नकुंडली का द्वादशेश भी पृथकताजन्य प्रभाव रखता है।
उक्त चारों में से किसी का भी प्रभाव जिस भाव पर पड़ेगा (या अधिक का पड़ेगा) उस भाव से सम्बन्धित व्यक्तियों, वस्तुओं, लाभों आदि से जातक को पृथक हो जाना पड़ता है। निश्चितता तभी होगी जब भाव, भावेश और भाव का कारक-तीनों ही इस पृथकताजन्य प्रभाव में हों। जैसा कि फलित सूत्रों में कहा भी गया है-भावात् भावपतेश्च कारकवशात् तत्तत् फलं योजयत्।-(उत्तर कालामृत) अर्थात् किसी मुद्दे पर विचार करते समय उस मुद्दे से सम्बन्धित भाव, कारक तथा भावेश द्वारा विचार करना चाहिए (तीनों से कन्फर्म होने पर ही फल घटित होगा)। तथा -
छायात्मजः पंगुदिवाकरेषु खेटद्वयो दिशति यत्रनज प्रभावम्।
नूनं पृथकता विषयाद्धि तस्मतादृशमे यथा राज्यन्या समाहु।।
अर्थात् राहू, शनि व सूर्य में से किन्हीं दो का भी प्रभाव जिस भाव पर पड़ रहा हो उस भाव के विषय से निश्चयपूर्वक जातक पृथक हो जाता है। जैसे दसवें भाव पर कुंडली में ऐसा प्रभाव हो तो जातक राज्य से अलग हो जाता है। या राज्य को त्याग देता है या त्याग देना पड़ता है।
नियम 9-किसी भी भाव/राशि/ग्रह पर उससे दसवें स्थान पर स्थित ग्रह का भी प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव दृष्टा के नैसर्गिक गुणों के अनुसार ही होता है। इस ’गुप्त दृष्टि’ को भी रोग ज्योतिष में ग्रहों की पूर्ण व आंशिक दृष्टियों के अलावा याद रखना चाहिए। इस दृष्टि को ैफन्।त्म् ।ैच्म्ब्ज् कहते हैं। फलित ज्योतिष में हम इस ’गुप्त दृष्टि’ को केन्द्रीय प्रभाव के नाम से जानते हैं। जिसके अनुसार हर ग्रह अपने से चौथे भाव/राशि/स्थान पर बैठे हुए ग्रह को भी अपने प्रभाव से प्रभावित करता है।
नियम 10-हमने फलित ज्योतिष में पढ़ा है कि किसी भी राशि का स्वामी उस राशि के प्रभाव को अपनी दृष्टि में लेकर काम करता है। यह एक सामान्य नियम है। किन्तु एक विशिष्ट नियम यह भी है कि किसी भी राशि का स्वामी उस राशि में स्थित ग्रहों के प्रभाव को अपनी दृष्टि में लेकर भी काम करता है। (फलित ज्योतिष में इस नियम का प्रयोग विरले ही करते हैं। परंतु रोग ज्योतिष में यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण नियम है।)
विशेष-पाठक इसे नियम (7) की पुनरावृत्ति न समझें। यह उससे भिन्न तथा गहन है। नियम 7 के अनुसार कोई ग्रह जिस राशि या जिन ग्रहों के साथ बैठता है। उनका प्रभाव भी अपनी दृष्टि में लेकर काम करता है। यानी स्वयं उसका निज प्रभाव शुद्ध नहीं रहता। जैसे यदि गुरु मंगल की राशि में शुक्र के साथ बैठा हैं तो वह मंगल व शुक्र के नैसर्गिक गुणों से भी प्रभावित होगा और अपनी दृष्टि में अपने प्रभाव के साथ उनका प्रभाव भी अन्य भावों पर डालेगा। परन्तु नियम 10 के अनुसार किसी ग्रह की राशि में जो ग्रह बैठा हो राशिपति ग्रह उस बैठे हुए ग्रह का प्रभाव भी लेगा और अपनी दृष्टि से अपने अलावा उस बैठे हुए ग्रह का प्रभाव भी दृष्ट स्थान पर डालेगा। जैसे धनु राशि में यदि मंगल बैठा है तो गुरु (जहां-कहीं भी बैठा होगा) अपनी दृष्टि में अपना प्रभाव कम तथा मंगल का प्रभाव अधिक रखेगा। तब उसकी दृष्टि सौम्य न रहकर मारक प्रभाव वाली हो जाएगी अथवा शनि यदि शुक्र की राशि में बैठा होगा तो शुक्र में भी शनि का पृथकताजन्य स्वभाव आ जाएगा।
नियम 11-चन्द्रमा सूर्य के जितना समीप होगा, उतना ही निर्बल होगा और सूर्य से जितना दूर होगा उतना ही बलवान होगा। (इसे मोटे तौर पर कृष्ण पक्ष का चन्द्र निर्बल व शुक्ल पक्ष का सबल होना फलित ज्योतिष में कह देते हैं। परन्तु वास्तव में शुक्ल पक्ष की षष्ठी के बाद चन्द्र बलवान होता है और कृष्ण पक्ष की दशमी तक बलवान रहता है।) इस आधार पर पूर्णिमा का चन्द्र सर्वाधिक सबल व अमावस्या का सर्वाधिक निर्बल होता है। किन्तु यदि सूर्य स्वयं निर्बल हो/नीच राशि में हो अथवा सन्धि में हो तो चन्द्रमा उसके साथ बैठा होने पर (अमावस में) भी बलवान ही माना जाएगा, चन्द्र के सम्बन्ध में यह ध्यान रखें।
नियम 12-कोई भी ग्रह यदि नीच का होगा तो अपने तत्त्व सम्बन्धी अनिष्ट फल प्रदान करता है (पाप प्रभाव में निश्चितता बढ़ जाती है)। जैसे सूर्य, मंगल अग्नि तत्त्व प्रधान होने से शरीर को/सम्बन्धित अंग को जलाने का कार्य कर सकते हैं। शुक्र व चन्द्र जल तत्त्व प्रधान होने से सम्बन्धित अंग में जल का समावेश करके रोग प्रदान करेंगे। जैसे पांचवें भाव में ’जलोदर’ (पेट में पानी भर जाना) या आठवें भाव में ’हाइड्रोसिल’ (अंडकोषों में पानी भर जाना) आदि। गुरु तथा शनि वायु तत्त्व प्रधान होने से क्रमशः सूजन व दर्द/चुभन देंगे। (गुरु क्योंकि चर्बी का कारक है। अतः सूजन देगा और शनि क्योंकि नसों व पृथकता का कारक है। अतः वायुशूल किस्म के दर्द जैसे गठिया आदि देगा।) बुध आकाश एवं वायु दोनों तत्त्व प्रधान होने से श्रवण शक्ति में विकार (क्योंकि आकाश की तन्मात्रा शब्द है) अथवा अचेतना तथा त्वचा के रोग (क्योंकि वायु की तन्मात्रा स्पर्श है) आदि देगा।
जबकि क्षत, घाव, कटना, छिलना, खून निकलना आदि मामलों में मंगल काय टूटना, सड़ना, विकृत होना (टेढ़ा होना) अथवा अलग होना जैसे मामलों में राहू का प्रभाव सामान्यतः अवश्य शामिल होगा। गलने में केतु, विषाक्त होने में शनि/राहू का प्रभाव शामिल होगा। (नीच का बुध वात, पित्त, कफ सम्बन्धी रोगों के अलावा सन्निपात भी देता है।)
नियम 13-उपरोक्त नियमों में ग्रहों के तत्त्वों पर हमने कन्सन्ट्रेट किया है। इस नियम में भावों के तत्त्वों पर ध्यान देंगे। क्योंकि ग्रहों के तत्त्व व भावों के तत्त्व समान रूप से दूषित होने पर ही रोग/विकृति होगी। कुंडली का प्रथम, पंचम तथा नवम भाव अग्नि तत्त्व के प्रतिनिधि हैं। द्वितीय, षष्ठ एवं दशम भाव पृथ्वी तत्त्व के, चतुर्थ, अष्टम व द्वादश भाव जल तत्त्व के प्रतिनिधि हैं तथा तृतीय, सप्तम व एकादश भाव वायु तत्त्व के प्रतिनिधि माने गए हैं। इस नियम के अनुसार सूर्य या मंगल 1,5,9 भाव में होंगे तभी अग्नि के पूर्ण प्रतिनिधि होंगे। यदि ये 4,8,12 में होंगे तो अग्नि तत्त्व होते हुए भी जल तत्त्व का प्रतिनिधित्व करेंगे। अथवा शुक्र या चन्द्र जल तत्त्व के पूर्ण प्रतिनिधि 4,8,12 भावों में बैठने पर ही होंगे। यदि वे 1,5,9 भाव में बैठेंगे तो जल तत्त्व प्रधान होते हुए भी अग्नि तत्त्व का प्रतिनिधित्व करेंगे।
विशेष-इसके अलावा कोई ग्रह जिस भाव में बैठा होगा। उस भाव का स्वामी भी उस भाव में बैठे ग्रह के अनुसार ही तत्त्व का प्रतिनिधि बन जाता है। जैसे सूर्य तथा मंगल यदि आठवें भाव में वृष राशि में हों तो अग्नि तत्त्वीय होते हुए भी स्वयं जलतत्त्व के भाव में बैठने से जल तत्त्व के प्रतिनिधि होंगे कि आठवें भाव/वृष राशि का स्वामी शुक्र जलतत्त्व प्रधान होते हुए भी अपने भाव में अग्नि तत्त्व के ग्रहों (सूर्य-मंगल) के बैठने से स्वयं अग्नितत्त्व का प्रतिनिधि हो जाएगा।
नियम 14-’कन्फर्मेशन’ (भले ही फलित ज्योतिष के सम्बन्ध में हो, अथवा रोग ज्योतिष के) के लिए ’सुदर्शन पद्धति’ का उपयोग सर्वथा उपयुक्त होता है। सुदर्शन पद्धति पाराशर ऋषि की पद्धति है जो फलों या निष्कर्षों को अपने नाम की भांति भली प्रकार स्पष्ट कर देती है। इस पद्धति में लग्न को प्रथम भाव में रखकर (लग्नकुंडली) ही नहीं अपितु जातक के मन (चन्द्रमा) को प्रथम भाव में रखकर (चंद्रकुंडली) तथा जातक की आत्मा (सूर्य) को भी प्रथम भाव में रखकर (सूर्यकुंडली) विचारा जाता है। इस प्रकार तीनों कुंडलियों में से कम से कम दो में कन्फर्म होने वाला फल सुनिश्चित होता है। या एक में ही कन्फर्म होने वाला फल सम्भावित होता है तथा तीनों में ही कन्फर्म होने वाला फल अटल होता है (उसका उपाय द्वारा निराकरण भी सम्भव नहीं हो पाता)। इसी पद्धति को हम फलित ज्योतिष में ’सुदर्शन चक्र’ द्वारा लागू करते हैं तथा ’भावात् भावम्’ सूत्र के अनुसार छठे से छठा (ग्यारहवां) तथा आठवें से आठवां (तीसरा) आदि भाव देखकर भी फल को सुनिश्चित किया जाता है।
नियम 15-यदि मंगल की दो ग्रहों पर दृष्टि हो तो सावधानीपूर्वक अध्ययन करके विचारें कि ’सुदर्शन चक्र’ में दोनों ग्रह शरीर के किसी एक ही अंग का प्रतिनिधित्व न कर रहे हों। यदि ऐसा है तो उस अंग में महान कष्ट होता है। यदि सुदर्शन पद्धति से शरीर के किसी अंग विशेष पर मंगल का कई गुना (तिगुना/चौगुना) प्रभाव सिद्ध हो तो शरीर का वह अंग कट जाता है। अथवा काट दिया जाता है या काट देना पड़ता है। इसी प्रकार यदि एक अग्नितत्त्व व एक जलतत्त्व प्रधान ग्रह किसी दुर्घटना योग में संयुक्त प्रभाव शरीर के किसी अंग पर डालें तो वह अंग गरम/खौलते पानी से जलता है।
मृत्यु का कारण बननेवाले रोग का ज्ञान
रोग ज्योतिष का यह एक विशिष्ट पहलू है। जातक के मात्र निश्चित या सम्भावित रोग ही नहीं, अपितु उस रोग को जानना भी आवश्यक होता है, जिससे जातक के जीवन का अन्त होने वाला हो। इस रोग को जानने के सम्बन्ध में लग्न व अष्टम भाव ही आधार हैं।
क्योंकि मृत्यु का कारण आठवां भाव बताता है और मृत्यु जिसकी होगी (ैम्स्थ्/जातक) उसको लग्न दर्शाता है। अतः लग्न, लग्नेश, अष्टम भाव, अष्टमेश इन चारों का अध्ययन इस सम्बन्ध में अनिवार्य है। ये चारों जिस ग्रह/ग्रहों से दृष्टि युति या राशि द्वारा सम्बन्धित हों, उन्हीं ग्रहों से सम्बन्धित रोग/दोष/विकार/घटक ही मृत्यु का कारण बनते हैं। उदाहरण के लिए माना कि सब पर राहू या शनि की दृष्टि/युति आदि का प्रभाव है तो जातक स्नायु रोग (सन्निपात/कम्पन) अथवा नाड़ीतंत्र के दोष से मृत्यु को प्राप्त होगा। अथवा विष द्वारा भी मर सकता है (क्योंकि राहू व शनि विष के भी कारक हैं)। दोनों में से कौन-सी बात सही होगी? इसके लिए द्वितीय व पंचम भाव को देखना होगा। क्योंकि विष मुख/पेट में जाकर ही मृत्यु का कारण बनता है। अतः दूसरे भाव (मुख) तथा पांचवें भाव (पेट) पर यदि पाप प्रभाव होगा तभी विष की सम्भावना बनेगी। अन्यथा पृथक निष्कर्ष ही मान्य होगा।
(कब?) नोट -इस सम्बन्ध में मारकेश को भी जरूर ध्यान में रखें। क्योंकि मारकेश की ही दशा/अंतर्दशा/प्रत्यंतर दशा आदि में मृत्यु होती है। अतः रोग कारक ग्रह (उपरोक्त उदाहरण में राहू/शनि जब मारकेश ग्रह के साथ दशाओं में संयुक्त होंगे, वही समय मृत्युकारी होगा)।
इसी प्रकार रोगकारी ग्रहों का अध्ययन करके किसी रोग का होना निश्चित हो जाए तो यह जानने के लिए कि रोग कब होगा? उस रोगकारी ग्रह की दशा/अंतर्दशा आदि पर ध्यान देकर ही नतीजा निकालना होगा (स्थूल रूप से)।
विशेष तथ्य
रोग ज्योतिष तथा फलित ज्योतिष दोनों ही दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण इन तथ्यों को भी ध्यान रखें -
तथ्य 1-धनु व मीन लग्न के जातकों को शुक्र सौम्य न रहते हुए शत्रु हो जाता है। स्थूल रूप से इसलिए कि एक देव गुरु व दूसरा दैत्य गुरु है, अतः गुरु व शुक्र में शत्रुता है। किन्तु सूक्ष्म रूप से इसलिए क्योंकि धनु लग्न में शुक्र छठे भाव तथा ग्यारहवें भाव का स्वामी होता है (छठा भाव रोग का है तथा ग्यारहवां भाव भी छठे से छठा होने के कारण रोग की कन्फर्मेशन का है)। मीन लग्न में शुक्र तीसरे व आठवें भाव का स्वामी होता है (आठवां भाव मृत्यु का कारण बताने वाला है तो तीसरा भाव आठवें से आठवां होने के कारण मृत्यु की कन्फर्मेशन का है)। अतः रोग ज्योतिष के हिसाब से धनु व मीन लग्न वालों को शुक्र विशेष रूप से खराब होता है (खासकर धनु लग्न वालों को)।
तथ्य 2- इसी प्रकार वृष एवं तुला लग्न के जातकों को गुरु भी रहता। यद्यपि यह उस तरह शत्रु भी नहीं बनता जैसे धनु व मीन लग्न वालों का शुक्र बनता है। स्थूल रूप से इसलिए कि गुरु स्वभाव से महात्मा है। किन्तुं सूक्ष्म रूप से इसलिए क्योंकि वृष लग्नों वालों के लिए गुरु 8 व 11 भाव का स्वामी होता है। जबकि तुला लग्न वालों के लिए यह 3 व 6 भाव का स्वामी होता है। इस प्रकार यह एक ओर मृत्यु के कारण भाव तथा दूसरी ओर रोग भाव का स्वामी होने से अशुभ होता है परन्तु दूसरी ओर आय/लाभ भाव तथा जीवन/पराक्रम भाव का स्वामी होने से बुरा नहीं होता। क्योंकि ये भाव आठवें से आठवां या छठे से छठा न होने से रोग के या मृत्यु के कारण के कन्फर्मेशन के भाव नहीं होते। जैसा कि धनु व मीन लग्न में शुक्र के स्वामित्व वाले भाव होते हैं।
तथ्य 3- इसी प्रकार मकर लग्न वालों को सूर्य शुभ नहीं होता। क्योंकि स्थूल रूप से शनि व सूर्य में शत्रुता है तथा सूक्ष्म रूप से सूर्य मकर लग्न वालों के आठवें भाव का स्वामी (अष्टमेश) होता है। ऐसे में लग्न का शत्रु ग्रह मारकेश बन जाता है जो किसी अन्य ग्रह के मारकेश बनने की अपेक्षा अधिक खराब होता है। साथ ही चन्द्र भी उनको सप्तमेश होने से मारकेश भी होता है। लेकिन कुम्भ लग्न वालों के साथ सूर्य के खराब होने की समस्या नहीं होती, क्योंकि उनका सूर्य भाग्येश होता है। हां, मंगल चंद्र जैसा शुभ ग्रह उनको मारकेश व अष्टमेश होने से खराब हो जाता है। इसी प्रकार कर्क लग्न वालों को शनि सप्तमेश व अष्टमेश होने से डबल मारकेश होता है। इसलिए अशुभ रहता है। स्थूल रूप से शनि की चन्द्र से शत्रुता भी है (शत्रु डबल मारकेश हो तो अधिक खतरनाक माना जाएगा)। सिंह लग्न वालों को भी शनि शुभ नहीं होता क्योंकि स्थूल रूप से शनि सूर्य का शत्रु है तथा सूक्ष्म रूप से वह सप्तमेश होने से उनका मारकेश भी है और षष्ठेश होने से रोग भाव का स्वामी भी है।
तथ्य 4-मेष तथा वृश्चिक लग्न वालों को शुक्र शुभ (पूरी तरह) नहीं रहता। क्योंकि मेष लग्न में वह द्वितीय व सप्तम भाव का स्वामी होने से डबल मारकेश होता है तथा वृश्चिक लग्न में शुक्र सप्तमेश व द्वादशेश होने से हानिकारक मारकेश हो जाता है (यद्यपि धन, पत्नी भाव तथा पत्नी और शयन भाव का स्वामी होने से पूर्ण अशुभ भी नहीं होता)। यहां तक कि स्वयं उनका लग्नेश मंगल भी रोग ज्योतिष के अनुसार उन्हें पूरी तरह शुभ नहीं होता, क्योंकि मेष लग्न में मंगल लग्न के साथ छठे भाव का भी स्वामी होता है तथा वृश्चिक लग्न में मंगल लग्न के साथ आठवें भाव का भी स्वामी होता है (फिर भी ये सभी स्थितियां धनु व मीन लग्न वालों की भांति पूर्णतः अशुभ या शत्रुतापूर्ण नहीं होतीं)।
तथ्य 5-मिथुन व कन्या लग्न में गुरु तथा धनु व मीन लग्न में बुध अपना प्रभाव ’केन्द्राधिपति दोष’ के कारण नैसर्गिक रूप से लगभग खो देते हैं। इसी प्रकार किसी भी लग्न में जो ग्रह केन्द्राधिपति दोष में आ जाए वह भी अपना प्रभाव प्रायः खो देता है। इस बात को भी ’रोग ज्योतिष’ में फलित के समय याद रखना चाहिए।
निष्कर्ष-यह बताने की आवश्यकता शायद नहीं होगी की छठे भाव (रोग), आठवें भाव (मृत्यु का कारण) तथा बारहवें भाव (स्व्ैै व्थ् ैम्स्थ्) पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। इन भावों में कौन-सी राशियां तथा ग्रह बैठे हैं ? वे ग्रह किन ग्रहों से दृष्ट हैं तथा किन पर दृष्टि डाल रहे हैं ? ये भाव स्वामी किन राशियों/भावों में बैठे हैं ? किनसे दृष्ट हैं तथा किन पर दृष्टि डाल रहे हैं ? तथा इन सबसे संबंधित ग्रहों/राशियों/भावेशों का अपना बलाबल क्या है ? (यानी वे वक्री हैं, मार्गी हैं, नीच के हैं, उच्च के हैं, निर्बल हैं, अस्त हैं, कितने अंशों पर हैं, शत्रु क्षेत्रीय हैं या मित्र क्षेत्री हैं ? आदि) और यह कि वे राहू व केतु से कितने प्रभावित हैं ? आदि समस्त तथ्य गहनता से देखे जाने चाहिए। रोग/मृत्यु/हानि क्योंकि ैम्स्थ् की होगी अतः लग्न व लग्नेश का अध्ययन तो अनिवार्य है ही। साथ ही सुनिश्चितता के लिए सुदर्शन पद्धति या भावात् भावम् (अर्थात् भाव से भाव को देखना/यानी छठे से छठा तथा आठवें से आठवां यानी तीसरा और ग्यारहवां भाव) भी विचारणीय है तथा मारकेश की प्रबलता आदि को भी देखना चाहिए। फिर इन ग्रहों से जो भाव आदि प्रभावित हो रहे हैं, उनके भावपतियों आदि का सम्पूर्ण अध्ययन करके किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए। तभी रोग ज्योतिष का सफल व सटीक प्रयोग हो सकेगा।
निष्कर्ष रूप में राशि व रोग विचार
मेष राशि-मेष राशि, राशीश मंगल, प्रथम भाव व भावेश पाप प्रभाव में होंगे तो सिर/दिमाग की चोट/रोग निश्चित रूप से होगा (जब भी दशा/अंतर्दशा में मंगल और उस भावेश का सम्बन्ध बनेगा)।
वृष राशि-वृष राशि, शुक्र, दूसरा भाव व भावेश पाप प्रभाव में होंगे तो मुख, नासिका, नेत्र सम्बन्धी रोग होंगे (चंद्र, सूर्य साथ में इन्फेक्टिड होंगे तो नेत्र रोग होंगे, यदि बुध इन्फेक्टिड होगा तो वाणी रोग होंगे-यह सब साथ में निश्चितता के लिए विचारें)। काल निर्धारण दशा से होगा।
मिथुन राशि-मिथुन राशि, बुध, तीसरा भाव, तृतीयेश पाप प्रभाव में होंगे तो कान, कंधे, श्वास नली के रोग होंगे (दीर्घकालीन रोग देने वाले ग्रह-शनि/राहू आदि का प्रभाव हो व फेफड़ों का कारक चन्द्रमा भी इफैक्टिड हो तो श्वास नली का रोग दमा/अस्थमा में भी बदल जाता है। ध्यान रखें)।
कर्क राशि-कर्क राशि, चन्द्र, चतुर्थ भाव, चतुर्थेश चारों पाप प्रभाव में होंगे तो छाती व फेफड़ों के रोग होंगे। क्षयरोग या टी.बी. तथा कैंसर आदि रोगों में राहू शनि का दीर्घकालिक रोग देने वाला प्छटव्स्म्डम्छज् जरूरी है। अन्यथा मात्र सर्दी, जुकाम, खांसी, निमोनिया आदि ही होंगे।
सिंह राशि-सिंह राशि, सूर्य, पंचम भाव तथा पंचमेश पाप प्रभाव में होंगे तो उदर रोग देंगे (यदि राहू/केतु/शनि का भी इन्वॉल्वमेंट होगा तभी हृदय सम्बन्धी रोग/हृदयाघात होगा। यदि मंगल का मारक प्रभाव भी शामिल हो तो हार्टफेल होगा)।
कन्या राशि-कन्या राशि, बुध, छठा भाव तथा भावपति पाप प्रभाव में हुए तो आंतों/गुर्दो के रोग होंगे। मंगल का प्रभाव साथ हो तो अल्सर या ऑपरेशन (अपेंडिक्स आदि का) हो सकता है। किन्तु राहू/शनि का पृथकताजन्य प्रभाव साथ होगा तो आंतों का अपने स्थान से हट जाने का रोग ’हर्निया’ (आंतों का नीचे उतर जाना) आदि होंगे।
तुला राशि - तुला राशि, राशीश शुक्र, सप्तम भाव, सप्तमेश चारों पाप प्रभाव में होंगे तो प्रजनन, यौन, गुप्त, मूत्र रोग होंगे। स्त्री जातकों में राहू या सूर्य आदि का पृथकताजन्य प्रभाव साथ हुआ तो बांझपन, ठंडापन या सम्भोग सुख का अभाव हो जाएगा। मंगल केतु शामिल हुए तो गर्भाशय का कैंसर सम्भावित होगा। पुरुष जातकों में बुध व शनि का प्रभाव साथ होने पर नपुंसकता/लिंग शैथिल्य उत्पन्न हो सकता है (सम्भोग सुख के लिए बारहवें भाव व द्वादशेश की स्थिति भी देखनी चाहिए)।
वृश्चिक राशि-वृश्चिक राशि, मंगल, आठवां भाव, अष्टमेश चारों पाप प्रभाव में होंगे तो अंडकोष/गुदा के रोग देंगे। केतु की इन्वॉल्वमेंट हो तो निश्चित ही बवासीर/फिशर जैसे रोग होंगे। मात्र मंगल प्रायः अंडकोष का रोग ’एस्ट्रॉफी’ देता है। नीच का चंद्रध्नीच शुक्र इन्वॉल्व होंगे तो श्हाइड्रोसिलश् आदि रोग होंगे। नीच का गुरु इन्वॉल्व होगा तो अंडकोषों में सूजन होगी। (आठवां भाव मृत्यु का कारण भी बताता है। अतः इसको ध्यान से देखा जाना आवश्यक है।)
धनु राशि-धनु राशि, गुरु, नवम भाव, नवमेश चारों पाप प्रभाव में हों तो जिगर, नितम्ब, जांघों के ऊपरी जोड़ आदि में रोग/कष्ट होता है विशेषकर सूजन। क्योंकि गुरु सूजन का कारक व राशीश दोनों है। पीलिया आदि रोग भी के इन्फेक्टिड होने से सम्भव होता है।
मकर राशि-मकर राशि, शनि, दशम भाव, दशमेश यदि पाप प्रभाव में हों तो घुटनों में कष्ट रोग/गठिया आदि होंगे। राहू का पृथकताजन्य प्रभाव साथ हो तो घुटने की हड्डी भी टूट जाती है।
कुम्भ राशि-कुम्भ राशि, शनि, ग्यारहवां भाव तथा. एकादशेश पाप प्रभाव में हों तो पिंडलियां/निचले पैर को कष्ट/रोग होंगे।
मीन राशि-मीन राशि, गुरु, बारहवां भाव तथा द्वादशेश पाप प्रभाव में हों तो पैरों के तलवे/एड़ी/टखने आदि के रोग/दर्द होंगे (दूसरा तथा बारहवां भाव नेत्रों के भी हैं । अतः दोनों भाव और सूर्य-चन्द्र पाप प्रभाव में हों तो नेत्रों की बीमारी/दृष्टि मंद होती है)।
रोग ज्योतिष का प्रयोग-उदाहरण 1
डिप्रेशन दे सकता है केतु
डिप्रेशन दे सकता है केतु राहु.केतु को ज्योतिष में छाया ग्रह की संज्ञा दी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार राहु को असुर का ऊपरी धड़ और केतु को पूँछ का हिस्सा माना जाता है। इस तरह से विचार किया जाए तो केतु ग्रह के पास मस्तिष्क नहीं है अर्थात यह जिस भाव में या जिस ग्रह के साथ रहता हैए उसी के अनुसार फल देने लगता है। केतु का सीधा प्रभाव मन से है अर्थात केतु की निर्बल या अशुभ स्थिति चंद्रमा अर्थात मन को प्रभावित करती है और आत्मबल कम करती है। केतु से प्रभावित व्यक्ति अक्सर डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। भय लगनाए बुरे सपने आनाए शंकालु वृत्ति हो जाना भी केतु के ही कारण होता है। केतु और चंद्रमा की युति.प्रतियुति होने से व्यक्ति मानसिक रोगी हो जाता है। व्यसनाधीनता बढ़ती है और मिर्गीए हिस्टीरिया जैसे रोग होने की आशंका बढ़ जाती है। केतु प्रायरू लग्नए द्वितीयए चतुर्थए सप्तमए अष्टमए दशम व व्यय में होने से अच्छा फल नहीं देता। तृतीयए पंचमए षष्ठए नवम व एकादश में केतु अच्छा फल देता है। साथ ही मेषए वृषभए मिथुनए कन्याए धनु व मीन राशि में केतु अच्छा फल देता है। ज्योतिष में राहु.केतु को छाया ग्रह की संज्ञा दी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार राहु को असुर का ऊपरी धड़ और केतु को पूँछ का हिस्सा माना जाता है। इस तरह से केतु के पास मस्तिष्क नहीं है अर्थात जिस ग्रह के साथ रहता हैए उसी अनुसार फल देने लगता है। यदि किसी कुंडली में केतु अशुभ भाव में बैठा हो तो उसका उपाय करना आवश्यक है अन्यथा व्यक्ति को ताउम्र परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। शांति के उपाय 1ण् केतु से बचने का सबसे अच्छा उपाय है हमेशा प्रसन्न रहनाए जोर से हँसनाण्ण्ण् इससे केतु आपके मन को वश में नहीं कर पाएगा। 2ण् प्रतिदिन गणेशजी का पूजन.दर्शन करें। 3ण् मजदूरए अपाहिज व्यक्ति की यथासंभव मदद करें। 4ण् लहसुनिया पहनने से भी केतु के अशुभ प्रभाव में कमी आती है। 5ण् कालेए सलेटी रंगों का प्रयोग न करें। 6ण् लोगों में उठने.बैठनेए सामाजिक होने की आदत डालें।
प्रस्तुत कुंडली स्व. केशव कौशिक की है (जो मेरे पूज्य पिता थे और डॉक्टर थे। सच तो यह है कि उनकी आकस्मिक मृत्यु ने ही मुझे ज्योतिष सीखने के लिए प्रेरित किया था)। उनकी न केवल दृष्टि कमजोर थी। अपितु पैर के निचले भाग की दोनों हड्डियों में फ्रैक्चर हुआ था तथा उनकी मृत्यु हृदयाघात से हुई थी-हम इन तथ्यों को इस कुंडली में कन्फर्म करेंगे। एक उदाहरण के रूप में।
नेत्र रोग-नेत्रों के कारक सूर्य व चन्द्र हैं। सूर्य मंगल व शनि के साथ होने से पाप मध्य में है। केतु से दृष्ट है। चन्द्रमा यद्यपि उच्च का है। किन्तु केतु से दृष्ट है तथा शत्रु राशि में है। राशीश शुक्र के केन्द्रीय प्रभाव में है, जो स्वयं शनि की राशि में होने से शनि का प्रभाव साथ लिए है। अतः सूर्य व चन्द्र दोनों पाप प्रभाव में हैं। दूसरा तथा बारहवां भाव भी (नेत्रों के कारक) पाप प्रभाव में है। क्योंकि दूसरे भाव पर राहू का केन्द्रीय प्रभाव है तथा द्वितीयेश बुध स्वयं दूसरे भाव से समसप्तक होकर अष्टम भाव में बैठा है (वह भी शत्रु राशि में, केतु के केन्द्रीय प्रभाव में) तथा दूसरे भाव को देखता है। इधर बारहवें भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि तथा शनि व सूर्य का केन्द्रीय प्रभाव है। मंगल द्वादशेश होकर सूर्य व शनि के साथ बैठकर पाप मध्य में फंस गया है, यद्यपि उच्च का है। अतः सूर्य, चन्द्र (आंखों के कारक), द्वितीय व द्वादश भाव (आंखों के प्रतिनिधि) तथा इन दोनों भावों के स्वामी बुध व मंगल पाप प्रभाव में सिद्ध हुए। जिससे आंखों का निर्बल या रोगी होना सिद्ध हुआ। पाठक देख रहे हैं कि द्वादश भाव की स्थिति दूसरे भाव से अधिक खराब है तथा मंगल की दृष्टि चोट/कटने के लिए भी जिम्मेदार होती है। सो जातक की बाईं आंख न केवल अधिक कमजोर थी। बल्कि बचपन में उस आंख के निकट चोट भी लगी (भौंह के निकट सलाख घुस गई थी) तथा बुढ़ापे में इस आंख का मोतियाबिंद का ऑपरेशन भी हुआ।
पैर की हड्डियां टूटने के सम्बन्ध में-पिंडलियों/निचले पैर के लिए ग्यारहवां भाव देखा जाता है। पाठक देखें कि इस भाव में स्वयं राहू केतु व शनि से दृष्ट होकर बैठा है। इस प्रकार न केवल ग्यारहवें भाव को दोहरे पाप प्रभाव में (अपने व शनि के) ला रहा है, बल्कि वहां पड़ने वाली मीन राशि को भी दूषित कर रहा है। जिससे गुरु भी राहू के असर से दूषित हो गया है। स्वयं वक्री भी है तथा ग्यारहवें व आठवें भाव का स्वामी एवं वक्री होने से (बावजूद उच्च का होते हुए भी) सौम्य नहीं रह गया है। उस पर गुरु स्वयं राहू, शनि, मंगल व सूर्य से दृष्ट है। अतः जबरदस्त पाप प्रभाव में है। इस प्रकार निचले पैर का प्रतिनिधि-ग्यारहवां भाव तथा उस भाव का स्वामी गुरु दोनों तगड़े पाप प्रभाव में हैं। हड्डी को तोड़ने के गुण वाला राहू स्वयं ग्यारहवें घर में विद्यमान है। अतः दोहरे पाप प्रभाव से जातक के पैर की दोनों हड्डियां टूटी (लेकिन उच्च के गुरु की दृष्टि भी ग्यारहवें भाव पर है। अतः बुढ़ापे में फ्रैक्चर होने के बावजूद जुड़ भी गईं)। यहां पाठकों को बता दें कि -
विशेष-यह फ्रैक्चर जातक को 68 वर्ष की आयु के आसपास हुआ। सभी मार्डन डॉक्टरों (जो मेरे पिता के मित्र भी थे) का मानना था कि बिना रॉड डाले/प्लेट कसे-इस आयु में फ्रैक्चर ठीक नहीं हो सकता। क्योंकि ‘सैंग्मेंटल फ्रैक्चर’ था। किन्तु बावजूद विरोध के मेरे पिता ने आयुर्वेदीय चिकित्सा से (शिलाजीत व लाक्षादि गुग्गुल आदि के विधिवत नियमित प्रयोग से) हड्डियां जोड़ ली थीं और बाद में भेड़ के घी आदि की मालिश से उस स्थान को ऐसा सुदृढ़ बना लिया था कि बिना लाठी/बैसाखी/बेंत के वे सहजता से सभी कार्य करते थे और उनका पैर या चाल देखकर कोई ये अनुमान नहीं लगा सकता था कि उनके पैर की हड्डियां बुढ़ापे में टूटी भी होंगी। (यह पूरी कथा इसलिए बताई कि इससे न केवल आयुर्वेद का महत्व और मेरे पिता की योग्यता पर प्रकाश पड़ता है, अपितु ज्योतिषीय फलित भी सिद्ध होता है।)
हृदयाघात व मृत्यु के संबंध में-सिंह राशि, हृदय का कारक व राशीश सूर्य, पंचम भाव तथा पंचमेश हृदय रोग के लिए हमें देखने चाहिए। यह पाठकों को याद ही होगा तथा मृत्यु के लिए इनके साथ लग्न व अष्टम भाव तथा लग्नेश व अष्टमेश का सम्बन्ध भी देखना चाहिए। सो इसी आधार पर विवेचन करेंगे।
सिंह राशि न केवल उच्च के मंगल से पूर्ण दृष्ट होने से पाप प्रभाव में है। अपितु मंगल स्वयं शनि व सूर्य के साथ पाप मध्य में तथा केतु से दृष्ट होने के कारण और भी पापी व घातक हो गया है जो उच्च का होने से पूरी शक्ति से सिंह राशि तथा छाती के कारक चतुर्थ भाव दोनों को जबरदस्त तरीके से पीड़ित कर रहा है। यह मंगल जातक का सप्तमेश व द्वादशेश होने से दोहरा मा केश भी है तथा कुंडली के अष्टमेश होने से मारकेश हो गए उच्च के वक्री गुरु से भी दृष्ट है। अतः न केवल पाप प्रभाव बल्कि मरणात्मक प्रभाव को बहुगुणित करके सिंह राशि पर डाल रहा है। कहना न होगा कि सिंह राशि अत्यंत दयनीय स्थिति में है।
सिंह राशि का स्वामी तथा हृदय का कारक सूर्य स्वयं न केवल शनि व मंगल के बीच पाप मध्य में है। अपितु शत्रु राशि में तथा केतु से दृष्ट भी है। उस पर डबल मारकेश मंगल के साथ बैठकर शनि व सूर्य दोनों ही मारकेश बन गए हैं तथा कुंडली के अन्य मारकेश गुरु से पूर्णतः दृष्ट हैं। (गुरु न सिर्फ मारकेश होने से बल्कि वक्री तथा राहू अधिष्ठित राशि का होने से और भी अशुभ हो चुका है तथा उच्च का होने से शक्तिशाली है। वह भी गुरु की नीच दृष्टि से।) अतः सूर्य की स्थिति भी सिंह राशि की ही भांति बहुगुने पाप प्रभाव में है। ऊपर से वह अपने भाव में ’षडाष्टक’ भी है।
कुंडली के पांचवें भाव पर न केवल राहू की पूर्ण दृष्टि है तथा स्वयं केतु वहां विराजमान है। अपितु वक्री होने से कुछ हद तक मारकेश गुरु का केन्द्रीय प्रभाव तथा शनि, मंगल सूर्य की चन्द्र, शुक्र सहित आंशिक दृष्टि भी है। इसके अलावा पांचवां भाव पाप मध्य/पाप दबाव में है। क्योंकि चौथे भाव पर मंगल तथा छठे भाव पर शनि की दृष्टि भी है। अतः पांचवां भाव किसी भी तरह निरापद स्थिति में नहीं है। यद्यपि सिंह राशि सूर्य की भांति एकदम दयनीय स्थिति में नहीं है।
पंचमेश बुध स्वयं केतु का प्रभाव लेकर आठवें घर (गड्डे) में चला गया है। वह भी शत्रु राशि में तथा केतु के केन्द्रीय प्रभाव में भी है। गुरु वक्री होने से कुछ हद तक अपने प्रभाव से बुध को दूषित भी कर रहा है। उस पर आठवां भाव स्वयं तिहरे पाप मध्य/पाप दबाव में है। क्योंकि नौवें भाव में तो राहू, शनि, सूर्य स्वयं ही विराजमान हैं तथा सातवें भाव में मारकेश गुरु की व राहू की पूर्ण दृष्टि होने के साथ-साथ लग्नेश चन्द्र की भी पूर्ण दृष्टि है जो यद्यपि उच्च का है किन्तु शुक्र की राशि में होने से स्वयं में उस शुक्र का (जो शनि से प्रभावित है) प्रभाव लिए हुए है तथा गुरु अधिष्ठित राशि का स्वामी होने से न केवल शनि, मंगल, सूर्य से दृष्ट गुरु का भी प्रभाव लिए हुए है बल्कि मारकेश भी हो गया है। उस पर शुक्र की आंशिक दृष्टि भी सप्तम भाव पर है। यहां तक कि बुध की दूसरी राशि (मिथुन) भी राहू के केन्द्रीय प्रभाव में है। अतः बुध में कुछ हद तक राहू का भी प्रभाव शामिल होगा। इस प्रकार बुध का पंचमेश होकर अष्टम भाव में बैठना ही पांचवें भाव का अहित करने को बहुत था। अब तो हालात और भी खराब हैं।
पाठक देख रहे हैं कि पांचवां भाव, पंचमेश, सिंह राशि व राशीश सूर्य चारों ही प्रबल तथा बहुगुने पाप प्रभाव में हैं (जिससे हृदयाघात होना निश्चित हुआ।) ऊपर से अष्टम भाव, लग्न, सप्तम भाव, द्वादश भाव तथा द्वितीय भाव और अष्टमेश, लग्नेश, सप्तमेश, द्वादशेश व द्वितीयेश (सभी मारक भाव व मारकेश)-इस योग में प्छटव्स्टम् हो रहे हैं तथा पाप पीड़ित हैं । अतः जातक की मृत्यु प्रथम हृदयाघात में ही निश्चित हो गई। (मंगल की महादशा, गुरु के अन्तर व बुध के प्रत्यंतर में जातक की मृत्यु 11 फरवरी 2001 को प्रथम हृदयाघात से ही हुई। जबकि डेढ़ घंटे पूर्व फोन पर बात करते समय वे एकदम चुस्त-दुरुस्त थे।)
विशेष-इस कुण्डली में भारी विडम्बना व दुर्भाग्य की बात यह है कि गुरु, मंगल तथा चंद्र तीन-तीन ग्रह कुंडली में उच्च के होते हुए भी तीनों ही मारकेश बन गए हैं (मंगल तो डबल मारकेश हो गया है। गुरु डबल मारकेश के समान हो गया है। चंद्र मारकेश हो गया है।) इसके अलावा सूर्य, शनि, शुक्र, बुध, केतु व राहू भी मारकेशों से सम्बद्ध होने से मारकेश के तुल्य हो गए हैं। यानी सभी ग्रह मारकेश बन गए हैं।
रोग ज्योतिष का प्रयोग-उदाहरण 2
प्रस्तुत कुंडली एकबालक ’शिवांश’ की है। यह मेरे मित्र और एक एडवर्टाइजिंग एजेन्सी के मालिक का पुत्र है। इस बालक को सुनने व बोलने में समस्या है। साथ ही इसके दिल में सूराख भी था, जिसका ’अपोलो’ में ऑपरेशन कराया जा चुका है। इस कुंडली में हम इस बालक के रोगों व समस्याओं का कारण उसकी लग्नकुंडली के माध्यम से रोग ज्योतिष के सिद्धांतों का मंगल में प्रयोग करके ढूंढेंगे। एक उदाहरण के रूप में।
श्रवण-वाणी-श्रवण शक्ति तथा वाणी का कारक बुध अपनी नीच राशि में बैठा है तथा शनि व केतु से दृष्ट है। यद्यपि उच्च के गुरु से भी दृष्ट है, किन्तु गुरु के साथ बैठा केतु उसके प्रभाव को दूषित कर रहा है (फिर भी यह गुरु का प्रताप है कि शक्ति समाप्त नहीं हो गई है, मात्र समस्या है)। क्योंकि गुरु को ’वागीश’ भी कहते हैं। उस पर गुरु की एक राशि मंगल की दृष्टि से और दूसरी शनि की दृष्टि से दुषित है। अतः स्वयं गुरु अपने में बहुत हद तक केतु, मंगल व शनि का प्रभाव लिए हुए है और शनि का प्रभाव तो स्वयं सूर्य व राहू का प्रभाव साथ में लेने से और घातक हो चुका है। अतः गुरु की दृष्टि बुध को विशेष लाभकारी नहीं रही।
वाणी का प्रतिनिधि भाव दूसरा तथा कानों का भाव तीसरा है। तीसरे भाव पर केतु तथा (उपरोक्त विश्लेषण के अनुसार दूषित हो चुके) गुरु की दृष्टि है तथा शनि स्वयं वहां राहू व सूर्य के साथ मौजूद है (साथ में सौम्य ग्रह शुक्र भी है। परन्तु केतु व गुरु की दृष्टि से तथा अपनी एक राशि में मंगल के बैठने से शुक्र की सौम्यता दूषित हो चुकी है। जिस पर शुक्र की दूसरी राशि ’तुला’ पर केतु व गुरु का केन्द्रीय प्रभाव तथा शनि की पूर्ण दृष्टि भी है और सूर्य की आंशिक दृष्टि भी)। तृतीयेश शनि स्वराशि में होते हुए भी सूर्य के साथ होने से अस्त है तथा पाप मध्य में (राहू व सूर्य) फंसा हुआ है। ऊपर से गुरु व केतु की दृष्टि से भी पीड़ित है। अतः वाणी तथा श्रवण शक्ति का कारक बुध (नीच का होने से विशेष रूप से वाणी व श्रवण शक्ति के रोग देगाध्कमी करेगा) तथा श्रवण शक्ति/कानों का भाव (तीसरा) और तीसरे भाव का स्वामी (शनि)-सभी भरपूर पाप प्रभाव में हैं। अब वाणी के प्रतिनिधि भाव द्वितीय व द्वितीयेश को देखें -
द्वितीय भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि है। जो वहां स्थित धनु राशि में विकृति व दोष उत्पन्न कर रही है। द्वितीय भाव का स्वामी गुरु अपने भाव से ’षडाष्टक’ होकर केतु के साथ बैठा है तथा स्वयं शनि, सूर्य, राहू तथा शत्रु शुक्र से दृष्ट है, अतः चौगुना पाप प्रभाव में आया हुआ है। सो नतीजे के तौर पर सहज ही कहा जा सकता है कि बालक को श्रवण तथा वाणी सम्बन्धी रोग/विकार/दोष/तकलीफ होगी। जो बुध, गुरु, शनि आदि की संयुक्त दशाओं में और भी बढ़ेगी अथवा परेशानी करेगी।
हृदय का छेद-हृदय का कारक सूर्य है। सिंह राशि, राशीश (सूर्य), पांचवां भाव तथा पंचमेश यहां अध्ययन के विषय होंगे। पंचमेश (गुरु) पर तो पाप प्रभाव पहले ही सिद्ध हो चुका है। पंचम भाव भी शनि व केतु से पूर्ण दृष्ट होने के कारण पाप प्रभाव में है। उस पर वहां अष्टमेश बुध भी नीच अवस्था में बैठा है, जो दूसरी राशि से भी किसी अच्छे भाव का स्वामी नहीं है। अब रही सिंह राशि व सूर्य राशि।
सूर्य-राहू, शुक्र व शनि तीन शत्रुओं के साथ शत्रु क्षेत्र में बैठा है। ऊपर से केतु तथा दूषित हो चुके गुरु से दृष्ट भी है। अतः अत्यंत दयनीय स्थिति में है। सिंह राशि पर मंगल की पूर्ण दृष्टि है तथा सूर्य, शनि, राहू, शुक्र की आंशिक दृष्टि है। वह पाप दबाव में भी है। क्योंकि एक ओर केतु बैठा है तथा दूसरी ओर राहू की दृष्टि है। उस पर राशीश सूर्य सिंह राशि से षडाष्टक है।
अतः हृदय के कारक, सिंह राशि, राशीश, पंचम भाव तथा पंचमेश पर पाप प्रभाव सिद्ध हुआ। जिससे हृदय सम्बन्धी रोग/कष्ट का होना निश्चित हो गया। (मैं समझता हूं कि बावजूद दूषित होने के गुरु का अपना भी सौम्य प्रभाव कुछ तो होगा। उच्च के गुरु की दृष्टि यदि लग्न, सूर्य तथा पंचम भाव पर न होती तथा स्वयं लग्नेश मंगल लग्न को न देख रहा होता तो हृदय के ऑपरेशन का परिणाम भी छम्ळ।ज्प्टम् हो सकता था। यह एक कड़वी बात है। परन्तु यह सत्य है। (तथापि मेरे मित्र श्री कपूरिया यदि इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो मैं उनसे इस कटु सत्य को कहने के लिए हृदय से क्षमाप्रार्थी हूं।)
रोग ज्योतिष का प्रयोग-उदाहरण 3
यह 27/4/03 को जन्मे एक बालक की लग्नकुंडली है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में मंगल जन्म होने से यह बालक गुरु की महादशा के शेष भोग्य काल (1 वर्ष, 10 माह, 6 दिन) लेकर मेरठ में पैदा हुआ है और मेरी पत्नी की सहेली का पुत्र है। उदाहरण के लिए यह कुंडली देखें-कुंडली में सूर्य, मंगल, गुरु व शुक्र-4 ग्रह उच्च के हैं। राहू तथा केतु भी वृष एवं वृश्चिक में उच्च के ही माने जाते हैं। इस प्रकार कुंडली में 6 ग्रह उच्च के हुए। जो सामान्यतः अतिशुभ एवं सौभाग्यपूर्ण स्थिति है। धन, वैभव, ऐश्वर्य, यश, भोग आदि की दृष्टि से अति उत्तम है। विशेषकर इसलिए क्योंकि जातक का लग्नेश गुरु उच्च राशि का है। किन्तु विडम्बना यह है कि गुरु अष्टम भाव में जा बैठा है। जो जातक के स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं है।
पीलिया रोग-सर्वप्रथम गुरु को ही लें। यह धनु तथा मीन का स्वामी है। धनु राशि से यह ‘षडाष्टकश् व मीन से ’नवपंचम’ है। मीन राशि में गुरु का शत्रु शुक्र उच्च का होकर बैठा है तथा अष्टम भाव का स्वामी चंद्र जो शुक्र व शनि का शत्रु है, साथ ही बैठा है। मीन राशि (चतुर्थ भाव) केतु व शनि से दृष्ट भी है। यद्यपि गुरु से भी दृष्ट है। अतरू मीन राशि/चतुर्थ भाव अशुभ स्थिति में तो नहीं है (क्योंकि चौथे भाव में चन्द्र व शुक्र शुभ तथा बली होते हैं) परन्तु सहज स्थिति में भी नहीं है।
धनु राशि/लग्न-जहां से गुरु ’षडाष्टक’ है-की स्थिति निर्बल है। क्योंकि लग्न पर शनि की पूर्ण दृष्टि है। (सूर्य, बुध, शुक्र, चन्द्र की आंशिक दृष्टियां भी हैं।) तथा लग्न/धनु राशि पाप दबाव में है। क्योंकि एक ओर मंगल बैठा है तथा राहू की दृष्टि भी है। दूसरी ओर केतु बैठा है तथा राहू की दृष्टि भी है। इस प्रकार यह पाप-दबाव भी डेढ़ गुना हो गया है। धनु राशि का सम्बन्ध जिगर, पीठ, नितम्ब व जांघों के जोड़ से है। धनु राशि तथा राशीश गुरु का पाप प्रभाव में होना इन अंगों में रोग/कष्ट का सूचक है (गुरु धनु राशि से षडाष्टक है। उच्च का होते हुए भी अष्टम भाव में है। उच्च के मंगल से पूर्णतः दृष्ट है। सूर्य व बुध-(बुध शत्रु है व सूर्य उच्च का है) केन्द्रीय प्रभाव में हैं। शत्रु शुक्र की आंशिक दृष्टि में है और केतु (उच्च के) से पूर्ण दृष्ट है। अतः दोहरे पाप प्रभाव में है तथा उच्च का होते हुए भी दयनीय हो गया है। किन्तु ’कन्फर्मेशन’ के लिए नौवां भाव तथा नवमेश भी देखें -
नवम भाव/सिंह राशि शनि से पूर्णतः दृष्ट है। राहू के केन्द्रीय प्रभाव में भी है (सूर्य व बुध की आंशिक दृष्टि में है) तथा उच्च के मंगल से पूर्णतः दृष्ट है। अतः शनि व मंगल की पूर्ण दृष्टि इसे दोहरे पाप प्रभाव में ला रही है। ऊपर से राहू का केन्द्रीय प्रभाव भी पड़ रहा है। नवमेश सूर्य अपने भाव से ’नवपंचम’ होकर यद्यपि उच्च की स्थिति में बैठा है। परन्तु उच्च के मंगल से पूर्णतः दृष्ट है और वक्री बुध के साथ है (बुध, शनि अधिष्ठित राशि का स्वामी होने से शनि का पाप प्रभाव साथ लिए हुए है)। लिहाजा नवम भाव तथा नवमेश दोनों पाप प्रभाव में सिद्ध होते हैं।
इस आधार पर कहा जा सकता है कि जातक को नितम्ब/जांघों के जोड़/पीठ/जिगर सम्बन्धी कष्ट/रोग/विकार निश्चित रूप से होंगे। और भी कन्फर्मेशन के लिए यदि इसे चन्द्रकुंडली से विचारें तो चन्द्रमा से नौवां भाव यानी लग्नकुंडली का बारहवां भाव केतु से अधिष्ठित व राहू से दृष्ट है तथा अष्टम भाव में पड़े गुरु से भी दृष्ट है। जो स्वयं में मंगल व सूर्य का प्रभाव लिए है। इस नवम भाव का स्वामी मंगल, राहू व गुरु से पूर्णतः दृष्ट है (गुरु की नीच दृष्टि से पीड़ित है) अतः हमारा निष्कर्ष कन्फर्म होता है। और यह कहा जा सकता है कि गुरु की महादशा/अंतर्दशा आदि में राहू/शनिध्मंगल का संयोग जब-जब होगा तब-तब जातक को जिगर/नितम्ब/पीठ आदि के रोग या कष्ट होंगे।
विशेष-पाठकों की जानकारी के लिए यह बालक गुरु की महादशा के शेष भोगकाल में राहू की अंतर्दशा तथा गुरु की प्रत्यंतरदशा लेकर पैदा हुआ था। समय से पूर्व पैदा हुआ था। निहायत कमजोर तथा पीलिया के रोग से ग्रस्त हुआ पैदा हुआ था और हफ्ते-दस दिन मशीन में ही रखकर इसके प्राण बचाए गए थे। इस समय भी इसका स्वास्थ्य पूर्णतः ठीक नहीं है। बालक रक्ताल्पता से पीड़ित है। अब प्रत्यंतर में गुरु हटकर शनि चल रहा है। बहरहाल गुरु की दशा समाप्त होने तक बालक पीड़ित ही रहेगा और इसे प्राण संकट भी बना रहेगा-क्योंकि लग्न व लग्नेश, जन्म राशि व राशीश, चन्द्रमा और गुरु दोनों न केवल पाप प्रभाव में हैं अपितु मारकेश भी हैं। शनि सप्तम भाव में बैठने तथा दूसरे भाव का स्वामी होने से डबल मारकेश है और बुध व मंगल को भी मारकेश बना रहा है। बुध सूर्य को तथा चन्द्रमा शुक्र को मारकेश बना रहा है। अतः गुरु की महादशा समाप्त होने के बाद आने वाली 19 वर्ष की शनि की महादशा भी जातक को खतरनाक गुजर सकती है और शनि के बाद आने वाली बुध की 17 वर्ष की दशा भी दिक्कत वाली होगी। क्योंकि गुरु ही नहीं, शनि व बुध भी मारकेश है। जातक का यूं भी अल्पायु योग है।
अन्य सम्भावनाएं-दूसरे भाव, बारहवें भाव तथा द्वादशेश (मंगल) के पाप प्रभाव में होने से (द्वितीयेश शनि पाप प्रभाव में नहीं है) तथा सूर्य व चन्द्र के पाप प्रभाव में होने से जातक को नेत्र रोग भी सम्भावित है (विशेषकर बाएं नेत्र सम्बन्धी)। वाणी का कारक बुध, द्वितीय भाव, द्वितीय राशि तथा राशीश शुक्र एवं वागीश गुरु पाप प्रभाव में हैं, जिससे वाणी सम्बन्धी रोग भी पूर्ण सम्भव हैं। (द्वितीयेश शनि पाप प्रभाव में नहीं है अतः यह शत-प्रतिशत निश्चित है।)
हृदय रोग/हृदयाघात आदि-तथापि हृदय सम्बन्धी कष्ट/रोग या विकार तीव्रता से सम्भावित है। क्योंकि हृदय का कारक सूर्य यद्यपि उच्च का है, परन्तु मंगल की राशि में है तथा मंगल से पूर्ण दृष्ट है जो स्वयं शनि की राशि में है। उस पर शनि अधिष्ठित राशि का स्वामी बुध वक्री स्थिति में सूर्य के साथ बैठकर उसे प्रभावित कर रहा है। अतः सूर्य पाप प्रभाव में सिद्ध होता है। सिंह राशि पर पहले हो पाप प्रभाव सिद्ध हो चुका है (जिसका विवेचन हम जिगर/पीलिया रोग के शीर्षक में अभी कर चुके हैं)। सिंह राशि का स्वामी सूर्य ही हृदय का कारक भी है। अतः कारक, राशि और राशीश तीनों पाप प्रभाव में हैं। अब पांचवें भाव व पंचमेश को देखें -
पांचवां भाव स्वयं सूर्य व वक्री बुध से अधिष्ठित तथा मंगल से पूर्णतः दृष्ट है। इस पर दोहरे पाप दबाव में भी है क्योंकि चौथे भाव में अष्टमेश चन्द्र व राहू अधिष्ठित राशि का स्वामी तथा षष्ठेश शुक्र (जो छठे से छठा यानी ग्यारहवें भाव का मालिक होने से प्रबल रोगदाता है) उच्च का होकर मौजूद है-तथा शनि व केतु की पूर्ण दृष्टि भी है। दूसरी ओर छटे भाव में राहू-केतु की दृष्टि के साथ स्वयं ही विराजमान है। अतः पांचवां भाव पाप दबाव में है।
पंचमेश (मंगल) यद्यपि उच्च का है। परन्तु अष्टमस्थ एवं मारकेश उच्च के गुरु की नीच दृष्टि से देखा जा रहा है तथा राहू से भी पूर्णतः दृष्ट है। (चौथा भाव जो छाती का प्रतिनिधि है, पहले ही पाप प्रभाव में सिद्ध हो चुका है और चतुर्थेश गुरु स्वयं अष्टमस्थ होकर मारकेश बना हुआ है)। अतः इस अध्ययन के आधार पर (यह चन्द्रकुंडली से भी कन्फर्म होता है तथा पांचवें से पांचवां भाव यानी नौवां भाव भावात् भावम् सूत्र के अनुसार देखने पर भी कन्फर्म होता है)। अतरू कहा जा सकता है कि जातक को हृदय सम्बन्धी रोग/कष्ट की भी निश्चित सम्भावना है, जो उसकी मृत्यु का कारण भी हो सकती है (क्योंकि अष्टम भाव, अष्टमेश, लग्न व लग्नेश के अलावा मारकेश भी इसमें इन्वॉल्व हो रहे हैं)। ऐसे में अन्य उपायों के अलावा जातक के निमित्त कम से कम सवा लाख ’महामृत्युञ्जय जप’ किया जाना परम आवश्यक है। तथा कुछ बड़ा होने पर इस जातक को सभी बुजुर्गों के चरण अवश्य स्पर्श करते रहना चाहिए।
मैं समझता हूं कि रोग ज्योतिष के सम्बन्ध में इन तीन कुंडलियों के विवेचन का उदाहरण पाठकों के लिए पर्याप्त होगा (स्थानाभाव के कारण अन्य कुण्डलियों का विवेचन तथा समस्त रोगों से सम्बन्धित सूत्र व रोग ढूंढने के अन्य उपयोगी नियमों की चर्चा आदि यहां स्थानाभाव के कारण सम्भव नहीं है। यदि पाठक चाहेंगे तो ’रोग ज्योतिष’ विषय पर किसी स्वतंत्र पुस्तक के अंतर्गत सब सूत्र एवं नियम सम्पूर्ण विवेचनों एवं भरपूर उदाहरणों सहित विस्तार से लेंगे)।
प्राचीन काल से ही ज्योतिष के द्वारा रोग को जानने की विद्या हमारे देश में प्रचलित है। कुंडली में ग्रहों की स्थिति पूरे जीवन में होने वाले रोगों की जानकारी देती हैं। जिस घर में जब कोई बीमार हो जाता है तो उस रोगी के साथ-साथ उस घर के सभी व्यक्ति मानसिक रूप से अशांति का अनुभव करने लगते है, प्राचीन समय से ज्योतिष शास्त्र रोगो का निदान करने में महत्पूर्ण भूमिका निभाता आया है, ज्योतिष के माध्यम से रोग की प्रकृति, उसका प्रभाव तथा उसके कारणों का विश्लेषण किया जा सकता है। ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के माध्यम से रोगो का निदान किया जा सकता है, ज्योतिष शास्त्र में , बारह राशियां नौ ग्रह और सत्ताईस नक्षत्रों के माध्यम से रोगों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है, कालपुरुष के विभिन्न अंगों पर राशियों का आधिपत्य होता है जिसके आधार पर हम किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं। जन्म कुंडली में स्थित प्रत्येक राशि तथा ग्रह शरीर के किसी न किसी अंग का प्रतिनिधित्व करता है, जिस ग्रह का जिस राशि पर दूषित प्रभाव होता है उससे संबंधित अंग पर रोग के प्रभाव का पता लगाया जा सकता है। इस संबंध में रोग की अवधि में किस ग्रह की महादशा चल रही है, ग्रह कुंडली में कौन से भाव में स्थित या दृष्ट है, ग्रह पापी है या शुभ है इन सब बातों से रोग की जानकारी प्राप्त होती है। जीवन में होने वाले रोगों को जानने के लिए ज्योतिषीय विश्लेषण के लिए हमारे शास्त्रों मे कई सूत्र दिए गए हैं।
ज्योतिष में रोग विचार-
कुंडली के प्रथम भाव से शारीरिक कष्टों एवं स्वास्थ्य का विचार होता है, और द्वितीय भाव व्यक्ति के खान-पान का सूचक है। तृतीय भाव से व्यक्ति के प्रारंभिक रोगों का विचार किया जाता है, और कुंडली के षष्ठ भाव से व्यक्ति के स्वास्थ्य का, रोग उत्पत्ति का विचार किया जाता है। षष्ठ भाव का कारक ग्रह मंगल, शनि हैं। अष्टम भाव का कारक ग्रह शनि है। इस भाव से आयु, दुर्घटना, मृत्यु और ऑपरेशन आदि का विचार किया जाता है। और भावत भावं सिद्धांत के अनुसार छठा भाव रोग का है, और छठे से छठा ग्यारहवां भाव होने के कारण इससे भी रोग का ही विचार किया जाता है| तथा रोग का मूल कारक शनि ग्रह को माना जाता है, रोग को समझने के लिए कुंडली में इन भावों, और रोग कारक शनि की स्थिति व इस भाव पर पड़ने वाले ग्रहों की स्थिति को समझना अति आवश्यक है| षष्ठ, अष्टम एवं द्वादश भाव के स्वामी जिस भाव में होते हैं उससे सम्बंधित अंग में पीड़ा होती है। किसी भी भाव का स्वामी ६, ८ या १२वें में स्थित हो तो उस भाव से सम्बंधित अंगों में पीड़ा होती है।
रोगों के कारण-
- यदि लग्न एवं लग्नेश की स्थिति अशुभ हो।
- यदि चंद्रमा का क्षीर्ण अथवा निर्बल हो या चन्द्रलग्न में पाप ग्रह बैठे हों ।
- यदि लग्न, चन्द्रमा एवं सूर्य तीनों पर ही पाप अथवा अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो।
- यदि पाप ग्रह शुभ ग्रहों की अपेक्षा अधिक बलवान हों।
रोग कब ठीक होगा:-
रोगकारक ग्रह की दशा अन्तर्दशा की समाप्ति के बाद रोग ठीक हो सकता है। लग्नेश, योगकारक ग्रह की दशा अन्तर्दशा प्रत्यन्तर्दशा प्रारम्भ हो जाए, तो रोग से छुटकारा प्राप्त हो सकता हैं। शनि सम्बन्धी रोग से जातक लम्बे समय तक पीड़ित रहता है। यदि राहु किसी रोग से सम्बंधित है, तो बहुत समय तक उस रोग का पता नही हो पाता है। ऐसे में रोग अधिक अवधि तक चलता है।
रोग मुक्ति के उपाय-
- प्रत्येक पूर्णिमा को शिव मंदिर जाकर भगवान शिव से अपने परिवार को सुखी रखने की प्रार्थना करें, और शिवलिंग पर विलपत्र अर्पित करें|
- पीपल के वृक्ष की सेवा करने से रोगो से मुक्ति मिलती है, रविवार को छोड़ कर अन्य सभी दिन स्नानादि कार्यो से निवृत होकर नियमित रूप से पीपल के वृक्ष पर मीठा जल अर्पित करें, इसके बाद रोग की निवृति के लिए प्रार्थना करें, शीघ्र ही लाभ होगा,
- लम्बे समय से रोग से ग्रस्त लोगों को हर माह कम से कम एक बार अपने सामर्थ्यानुसार किसी अस्पताल में जाकर दवा और फलों का वितरण करना चाहिए, इससे रोगी और उसके पारिवारिक सदस्य निरोग रहेंगे|
- काली हल्दी को मंगलवार और शनिवार के दिन या फिर अमावास्या के दिन बीमार व्यक्ति के सिर के ऊपर से सात बार वार कर इसे बहते जल में प्रवाहित करें, शीघ्र ही रोग से मुक्ति मिलेगी,
- प्रत्येक पूर्णिमा को शिवालय जाकर भोलेनाथ से अपनी आरोग्यता के लिए प्रार्थना करें, उसके बाद फल और मिठाई को गरीबों में बाँट दें,
- अगर रोग गंभीर और लम्बा हो तो रोगी के वजन के बराबर यह सभी खाद्य सामग्री गेहूं घी, तेल सहित तौलकर ब्रहाम्ण या किसी गरीब गृहस्थ को दें। तुलादान करने से आसाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है।
- रात्रि के समय शयन कक्ष में कपूर जलाने से बीमारियां, दुस्वप्न नहीं आते, पितृ दोष का नाश होता है एंव घर में शांति बनी रहती हैं।
- जटा वाले सात नारियल लेकर शुक्ल पक्ष के सोमवार के दिन ॐ नमः शिवाय मन्त्र का जाप करते हुए नदी में प्रवाहित करें, ऐसा करने से रोग से निवृति मिलती है,
- पूर्णिमा के दिन खीर बनाएं, चन्द्रमा और अपने पितरों को भोग लगाएं, कुछ खीर काले कुत्तों को दें। वर्ष भर पूर्णिमा पर ऐसा करते रहने से बीमारी तो दूर होती ही है साथ ही गृह क्लेश, और व्यापार हानि से भी मुक्ति मिलती हैं,
- तालाब, कूप या समुद्र में जहां मछलियाँ हो, उनको शुक्रवार से शुक्रवार तक आटे की गोलियां, शक्कर मिला कर मछलियों को डालें, रोगी ठीक होता चला जायेगा,
- एक रुपये का सिक्का रात को सिरहाने में रख कर सोएं और सुबह उठकर उसे किसी सुनसान जगह फेंक दें, रोग से मुक्ति मिल जाएगी।
- यदि किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य लगातार खराब रह रहा हो और कोई भी दवा असर न कर रही हो तो आक की जड़ लेकर उसे किसी कपड़े में कस कर बांध दें, फिर उस कपडे को रोगी के कान से बांध दें, बुखार उतर जायगा|
- यदि घर के छोटे बच्चे अधिक बीमार रहते हों, तो मोर पंख को पूरा जलाकर उसकी राख बना लें और उस राख से बच्चे को नियमित रूप से तिलक लगाएं तथा थोड़ी-सी राख चटा दें।
- यदि पर्याप्त उपचार करने के पश्चात भी रोग-पीड़ा शांत नहीं हो रही हो अथवा बार-बार एक ही रोग प्रकट होकर पीड़ित कर रहा हो तो ऐसे व्यक्ति को अपने वजन के बराबर गेहू का दान रविवार के दिन करना चाहिए। गेहूँ का दान जरूरतमंद एवं अभावग्रस्त व्यक्तियों को ही करना चाहिए।
- लंबे समय से बीमार इंसान के कमरे में उसे दक्षिण दिशा की तरफ सिर रखकर सुलाएं और दवाएं और पानी को भी इसी तरफ रखें। जब भी रोगी को दवा खिलाएं उसका मुख पूर्व की तरफ करके ही खिलाएं।
- कृष्ण पक्ष में चमकीला काला कपडा, उड़द तथा एक रुपये का सिक्का दान करें|
- हनुमान जी का पूजन करें, हनुमान चालीसा का पाठ करें, और प्रत्येक शनिवार को शनिदेव को तेल चढायें, व एक जोडी चप्पल किसी गरीब को दान करें|
- सभी रोगों में पीपल की सेवा से बहुत लाभ प्राप्त होता है, रविवार को छोड़कर नियमित रूप से पीपल के वृक्ष पर प्रात: मीठा जल चड़ाकर उसकी जड़ जो छूकर अपने माथे से लगायें, पुरुष पीपल की 7 परिक्रमा करें, स्त्री ना करें और अपने रोग को दूर करने की प्रार्थना करें अति शीघ्र लाभ मिलेगा|
- अशोक के पेड़ की तीन ताजी पत्तियों को लेकर प्रतिदिन सुबह चबाने से आपकी सेहत ठीक रहेगी और किसी भी तरह की चिंता से परेशानी नहीं होगीl