कुंडली दोष और उनके सटीक उपाय
कुंडली दोष और उनके सटीक उपाय
मातृ दोष और उसके उपाय
यदि कुंडली में चंद्रमा
पंचम भाव का स्वामी होकर शनि, राहु, मंगल आदि क्रूर ग्रहों से युक्त या आक्रान्त हो
और गुरु अकेला पंचम या नवम भाव में है तब मातृ दोष के कारण संतान सुख में कमी का
अनुभव हो सकता है.
मातृ दोष के शांति उपाय |
Remedies to pacify Matra Dosha
यदि किसी व्यक्ति की
कुंडली में मातृ दोष बन रहा है तब इसकी शांति के लिए गोदान करना चाहिए या चांदी के बर्तन में गाय का
दूध भरकर दान देना शुभ होगा. इन शांति उपायों के अतिरिक्त एक लाख गायत्री मंत्र का
जाप करवाकर हवन कराना चाहिए तथा दशमांश तर्पण करना चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन
कराना चाहिए, वस्त्रादि का दान अपनी
सामर्थ्य अनुसार् करना चाहिए. इससे मातृ दोष की शांति होती है.
मातृ दोष की शांति के लिए
पीपल के वृक्ष की 28 हजार परिक्रमा
करने से भी लाभ मिलता है.
भ्रातृ दोष और उसके उपाय
तृतीय भावेश मंगल यदि
किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु के साथ पंचम भाव में हो तथा पंचमेश व लग्नेश
दोनों ही अष्टम भाव में है तब भ्रातृ शाप के कारण संतान प्राप्ति बाधा तथा कष्ट का
सामना करना पड़ता है.
भ्रातृ दोष के शांति उपाय
| Remedies to pacify Bhratra Dosha
भ्रातृ दोष की शांति के
लिए श्रीसत्यनारायण का व्रत रखना चाहिए और सत्यनारायण भगवान की कथा कहनी या सुननी
चाहिए तथा विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके सभी को प्रसाद बांटना चाहिए.
ब्राह्मण श्राप या दोष
उसके उपाय
किसी व्यक्ति की कुंडली
में यदि धनु या मीन में राहु स्थित है और पंचम भाव में गुरु, मंगल व शनि हैं और नवम भाव का स्वामी अष्टम भाव
में है तब यह ब्राह्मण श्राप की कुंडली मानी जाती है और इस ब्राह्मण दोष के कारण
ही संतान प्राप्ति में बाधा, सुख में कमी या
संतान हानि होती है.
ब्राह्मण श्राप के शांति
उपाय | Remedies to pacify Brahman Dosha
ब्राह्मण श्राप की शांति
के लिए किसी मंदिर में या किसी सुपात्र ब्राह्मण को लक्ष्मी नारायण की मूर्तियों
का दान करना चाहिए. व्यक्ति अपनी शक्ति अनुसार किसी कन्या का कन्यादान भी कर सकता
है. बछड़े सहित गाय भी दान की जा सकती है. शैय्या दान की जा सकती है. सभी दान
व्यक्ति को दक्षिणा सहित करने चाहिए. इससे शुभ फलों में वृद्धि होती है और
ब्राह्मण श्राप या दोष से मुक्ति मिलती है.
मातुल श्राप और उसके उपाय
यदि किसी व्यक्ति की
कुंडली में पांचवें भाव में मंगल, बुध, गुरु तथा राहु हो तब मामा के श्राप से संतान
प्राप्ति में बाधा आती है.
मातुल श्राप के शांति
उपाय | Remedies to pacify Maatul Shraap
मातुल श्राप से बचने के
लिए किसी मंदिर में श्री विष्णु जी की प्रतिमा की स्थापना करानी चाहिए. लोगों की
भलाई के लिए पुल, तालाब, नल या प्याउ आदि लगवाने से लाभ मिलता है और
मातुल श्राप का प्रभाव कुछ कम होता है.
प्रेत श्राप और उसके उपाय
किसी व्यक्ति की कुंडली
में यदि पंचम भाव में शनि तथा सूर्य हों और सप्तम भाव में कमजोर चंद्रमा स्थित हो
तथा लग्न में राहु, बारहवें भाव में
गुरु हो तब प्रेत श्राप के कारण वंश बढ़ने में समस्या आती है.
यदि कोई व्यक्ति अपने
दिवंगत पितरों और अपने माता-पिता का श्राद्ध कर्म ठीक से नहीं करता हो या अपने
जीवित बुजुर्गों का सम्मान नहीं कर रह हो तब इसी प्रेत बाधा के कारण वंश वृद्धि
में बाधाएँ आ सकती हैं.
प्रेत श्राप के शांति
उपाय | Remedies to pacify Pret Shraap
प्रेत शांति के लिए भगवान
शिवजी का पूजन करवाने के बाद विधि-विधान से रुद्राभिषेक कराना चाहिए. ब्राह्मणों
को अन्न, वस्त्र, फल, गोदान आदि उचित दक्षिणा सहित अपनी यथाशक्ति अनुसार देनी चाहिए. इससे प्रेत
बाधा से राहत मिलती है.
गयाजी, हरिद्वार, प्रयाग आदि तीर्थ स्थानों पर स्नान तथा दानादि करने से लाभ
और शुभ फलों की प्राप्ति होती है.
महाविनाशकारी है केमद्रुम
दोष
यदि जन्म कुंडली में
चन्द्रमा किसी भी भाव में अकेला बैठा हो, उससे आगे और पीछे के भाव में भी कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम दोष बनता है।
केमद्रुम दोष में जन्म लेने वाला व्यक्ति
मानसिक रूप से हमेशा परेशान होता है। उससे
हमेशा एक Unknown Fear रहता है। उसके जीवन काल में अनेक उतार-चढ़ाव आते
हैं। व्यक्ति जीवन काल में उंचाईयां छूकर
धरातल पर आ जाता है। सब कुछ पाने के बाद
अपने ही द्वारा लिए गए निर्णयों द्वारा सब कुछ खो बैठता है। आर्थिक रूप से ऐसे व्यक्ति कमजोर ही रहते
हैं। जीवन में अनेकों बार आर्थिक संकट का
सामना करना पड़ता है।
ऐसे व्यक्ति खुद को बहुत
समझदार समझते हैं। उन्हें लगता है की उनसे
अधिक बुद्धिमान व्यक्ति कोई नहीं है। ऐसे व्यक्ति चिड़चिड़े और शक्की स्वभाव के होते
हैं। संतान से कष्ट पाते हैं परन्तु ऐसे व्यक्ति दीर्घायु होते हैं।
कुछ विद्वानो का मत है की
कुछ परिस्थितियों में केमद्रुम योग भंग या निष्क्रिय भी हो जाता है। जैसे की :
१ ) जन्म कुंडली में
केमद्रुम दोष हो परन्तु चन्द्रमा के ऊपर सभी ग्रहों की दृष्टि हो तो केमद्रुम दोष
के दुष्प्रभाव निष्क्रिय हो जाते हैं।
२) यदि चन्द्रमा शुभस्थान
(केंद्र या त्रिकोण ) में हो तथा बुद्ध, गुरु एवं शुक्र किसी अन्य भाव में एक साथ हो तो भी केमद्रुम दोष भंग हो जाता
है।
३) यदि दसवे भाव में उच्च
राशि का चन्द्रमा केमद्रुम दोष बना कर बैठा हो परन्तु उस पर गुरु की दृष्टि हो तो
भी केमद्रुम दोष भंग माना जायेगा।
४) यदि केंद्र में कहीं भी चन्द्रमा केमद्रुम दोष का निर्माण
कर रहा हो परन्तु उस पर सप्तम भाव से बली गुरु की दृष्टि पड़ रही हो तो भी केमद्रुम
दोष भंग हो जाता है।
यदि किसी भी जन्म कुंडली
में केमद्रुम दोष हो एवं इसके साथ-२ अन्य राज योग भी हों तो यह दोष उन् राजयोगों
के शुभ प्रभावों को भी नष्ट कर देता
है। इसीलिए यदि आपकी जन्म -पत्रिका में भी
केमद्रुम दोष है तो समय से इसका निदान करवा कर आप इसके दुष्प्रभावों से बच सकते
हैं।
केमद्रुम दोष के
दुष्प्रभावों को इन् उपायों द्वारा कम किया जा सकता है।
१ ) सोमवार का व्रत
रखें। सोमवार को शिवलिंग पर कच्चा दूध और
काले तिल मिश्रित जल का अभिषेक करें व ॐ
सौं सौमाय नमः मंत्र का जाप करें।
२ ) सोमवार को सफ़ेद चीजों
(चावल, दूध, सफ़ेद फूल, वस्त्र, कपूर, मोती रत्न ) का दान किसी सुपात्र व्यक्ति को
करें।
३ ) सर्वतोभद्र यन्त्र को
अपने घर के पूजा स्थान में स्थापित करें व
उसके समक्ष इस मंत्र का नित्य १ माला जाप करें।
" दुर्गे स्मृता
हरसि भीतिमशेष जन्तोः। स्वस्थै स्मृता मति मतीव शुभाम् ददासि । ।
दारिद्र्य दुःख भय हारिणि
कात्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्र चित्तः"। ।
४) अपने घर में कनकधारा
यन्त्र को स्थापित कर नित्य उसके आगे कनकधारा स्तोत्र का ३ बार पाठ करें।
५ ) दाहिने हाथ की
कनिष्टिका ऊँगली में सवा सात रत्ती का मोती रत्न चांदी की अंगूठी में शुक्ल पक्ष
के सोमवार को धारण करें ।
६ ) पूर्णिमा का व्रत
रखें।
कुंडली में एक प्रकार के
ग्रहण दोष
परिचय
हमारा जीवन चक्र ग्रहों
की गति और चाल पर निर्भर करता है. ज्योतिष शास्त्र इन्हीं ग्रहों के माध्य से जीवन
की स्थितियों का आंकलन करता है और भविष्य फल बताता है. ज्योतिष गणना में योग का
बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. कुछ योग शुभ स्थिति बताते हैं तो कुछ अशुभता का संकेत
देता है.
ग्रहण योग भी अशुभ योग की
श्रेणी में आता है. (Grahan yoga is an inauspicious yoga) ग्रहण योग को अशुभ योगों में बहुत ही खतरनाक और कष्टदायक
माना गया है. ज्योतिषशास्त्रियों की दृष्टि में यह योग काल सर्प योग से भी खतरनाक
और अशुभ फलदायी है (Grahan yog is considered even more harmful than the
kalsarp yoga). कालसर्प योग में जीवन में
उतार चढ़ाव दोनों आते हैं परंतु यह ऐसा योग है जिसमें सब कुछ बुरा ही होता है. इस
योग से प्रभावित व्यक्ति जीवन में हमेशा निराश और हताश रहता है.
ग्रहण योग का प्रभाव
जैसे सूर्य को ग्रहण लग
जाने पर अंधकार फैल जाता है और चन्द्रमा को ग्रहण लगने पर चांदनी खो जाती है उसी
प्रकार जीवन में बनता हुआ हुआ काम अचानक रूक जाता हो तो इसे ग्रहण योग का प्रभाव
समझ सकते हैं. हम में से बहुत से लोगों ने महसूस किया होगा कि उनका कोई महत्वपूर्ण
काम जब पूरा होने वाला होता है तो बीच में कोई बाधा आ जाती है और काम बनते बनते रह
जाता है. इस स्थिति के आने पर अक्सर हम अपनी किस्मत को कोसते हैं अथवा किसी की
नज़र लग गयी है ऐसा सोचते हैं. ज्योतिष शास्त्र की नज़र में यह अशुभ ग्रहण योग का
प्रभाव है.
ग्रहण योग निर्माण
ग्रहण योग (Grahan
Yoga उस स्थिति में बनता है
जबकि कुण्डली के द्वादश भावों में से किसी भाव में सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ
राहु व केतु में से कोई एक साथ बैठा हो या फिर सूर्य या चन्द्रमा के घर में राहु
केतु में से कोई मौजूद हो. अगर इनमें से किसी प्रकार की स्थिति कुण्डली में बन रही
है तो इसे ग्रहण योग कहेंगे. ग्रहण योग जिस भाव में लगता है उस भाव से सम्बन्धित
विषय में यह अशुभ प्रभाव डालता है. उदाहरण के तौर पर देखें तो द्वितीय भाव धन का
स्थान कहलता है. इस भाव में ग्रहण योग लगने से आर्थिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव
पड़ता है. व्यक्ति को धन की हमेंशा कमी महसूस होती है. इनके पास धन आता भी है तो
ठहरता नहीं है. इन्हें अगर धन मिलने की संभावना बनती है तो अचानक स्थिति बदल जाती
है और धन हाथ आते आते रह जता है.
ग्रहण दोष दो प्रकार के
होते है सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण ! सूर्य ग्रहण का उपाय उस समय किया जाता है
जब सूर्य ग्रहण का मध्य काल हो और चन्द्र ग्रहण का उपाय चन्द्र ग्रहण में किया
जाता है ! यहाँ मै सूर्य ग्रहण का उपाय बता रहा हूँ जो आप सूर्य ग्रहण के मध्य काल
में कर सकते है ! इस उपाय से राहू चन्द्र के घर में चला जाता है और शांत हो जाता
है और पिता के सुख और मान सम्मान में वृद्धि करता है ! सरकार की तरफ से लाभ मिलता
है और सूर्य का शुभ फल प्राप्त होता है !
1.यदि लग्न में राहू
हो या लग्न में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 100 ग्राम बादाम गिरी और एक सुखा नारीयलबहते पानी में बहाए !
2.यदि दुसरे भाव
में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 200 ग्राम बादाम और दो सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए !
3.यदि तीसरे भाव
में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 300 ग्राम बादाम गिरी और तीन सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए !
4.यदि चौथे भाव में
सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 400 ग्राम बादाम गिरी और चार सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए !
5.यदि पांचवे घर
में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 500 ग्राम बादाम गिरी और पांच सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए !
6.यदि छटे भाव में
सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 600 ग्राम बादाम गिरी और ६ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए !
7.यदि सातवे भाव
में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 700 ग्राम बादाम गिरी और ७ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए !
8.यदि आठवे भाव में
राहू और सूर्य एक साथ बैठे हो तो 800 ग्राम बादाम गिरी और ८ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए !
9.यदि नौवे भाव में
सूर्य और राहू एक साथ हो तो 900 ग्राम बादाम
गिरी और ९ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए !
10.यदि दशवे घर में
सूर्य और राहू एक साथ हो तो 1 किलो बादाम गिरी
और १० सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए !
11.यदि एकादश भाव
में सूर्य और राहू एक साथ हो तो 1100 ग्राम बादाम गिरी और ११ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ओं का समाधान होगा
प्रश्न कुंडली के आधार पर
देव पित्रादी दोष और निवारण
{१} प्रश्न के समय मेष लग्न आए तो पितृ दोस समझाना चाहिए इस दोष
का बुरा परिणाम गर्मी, तृष्णा,चिंता,बुखार ,वमन, और शर में पीड़ा होती है | इसकी शांति हेतु ब्राह्मिण भोजन, तर्पण, पिंडदान व पांच दिनो तक एक एक घड़ा जल पीपल कि जड़ो में डाले और पीपल कि पूजा
करे इससे पितृ-दोष कि शांति होगी व उपरोक्त दोष शांत हो जाते है |
{२} प्रश्न के समय वृषभ लग्न आए तो गोत्र का दोष जाने और इस दोष
से शरीर में ज्वर,ताप,तृष्णा, शक्ती का नाश, कान और नेत्र में विकार होते है, इसकी शांति हेतु चंडी पाठ, नेवेध्य और देवी
के लिए क्षीर का हवन कारने से पीडाए दूर होगी |
{३} मिथुन लग्न आये तो देवी का दोष समझना चाहिए इस दोष में भ्रम,
कमर दर्द शरीर में वाइरल फेवर कि तरह का दर्द
होता है इसकी शांति के लिए पिंड दान गुग्गल से १०८ आहुति देवे शांति मिलेगी |
{४} प्रश्न समय यदि कर्क लग्न आये तो भयंकर शाकिनी दोष इसमें
अजीरन, वायु और मुख तथा शिर कि
पीड़ा होती है उसकी शांति हेतु दूध और उर्द का नैवेध्ये करना और घी का दीपक करना
उससे दोषों का नाश होता है |
{५} यदि प्रश्न के समय सिंह लग्न का उदय हो प्रेत दोष समझे इससे
अग्निभय, उलटी व दस्त हो जाते है
इसकी शांति के लिए शास्त्रों में पुत्तल विधान करके ब्राह्मणों को भोजन ,पिंड दान और तिलों से तर्पण करके दोष कि शांति
करे |
{६} यदि कन्या लग्न आये ती पिछले जन्मो के कर्मो का दोष समझना
चाहिए इसमें पीड़ित व्यक्ति बकवास , मूर्छा, भ्रम, ताप, अज्ञात भय, दुर्भाग्य होने
का भय, fear of miss fortune, unknown fear, anti cipetry fear, fear of
death, इन दोषों कि शांति के लिए
ओम हों जूं सः लघु मृत्युंजय का जप और हवन करना चाहिए |
{७}तुला लग्न हों तो क्षेत्रपाल का दोष जानना चाहए इससे ताप,
पीड़ा आँखों लालीपन , इसकी शांति हेतू ब्राह्मणों को दान करना चाहिए घी,लालपुष्प, ,सिदूर,तिल, उर्द और लोहा इत्यादि |
{८} वृश्चिक लग्न हों तो बैताल का दोष समझाना चाहिए इसके लक्षण बकवास,भ्रम,और नेत्रो कि पीड़ा होती है इसकी शांति के लिए कनेर के पुष्प और गुग्गल सहित
घी कि आहुति देवे |
{९} धनु लग्न में महामारी का दोष जाने इसमें माथे में पीड़ा ,
ज्वर, शरीर पीड़ा सताती है शांति हेतु चंडी या क्षेत्रपाल कि पूजा करे|
{१०} मकर लग्न में मार्गनि ,या क्षेत्रपाल का दोष होता है इसमें आंख में पीड़ा, ताप और शरीर टूटता है शांति हेतु स्नान करके
दर्भ से बनाये पुतले कि लाल पुष्प से पूजा करके रुद्राभिषेक करने से दोष का नाश
होता है |
{११} कुम्भ लग्न आये तो पूर्वज या गोत्र देवी का दोष
जाने उससे ताप उद्वेग ,शोक , अतिषर वगेरह होता है | इसकी शांति के लिए पीपल में पानी डालना,पिंड दान करना,तिल तर्पण और ब्राह्मण भोजन करना चाहिए |
{१२} मीन लग्न में कर्कशा, शाकिनी का दोष जाने, उससे ह्रदय ,पेट में पीड़ा,
दह तथा ज्वर होता है , इसकी शांति के लिए ब्रह्म भोज तथा गुग्गल कि १०८ आहुति देना
चाहिए |
{१३} यदि १२ वे ८ वे भाव में सूर्य हों तो देव,
चन्द्रमा हों तो देवी का दोष , शुक्र हों तो जल देवी का दोष ,गुरु हों तो पितृ दोष , मंगल हों तो डाकिनी या तन्त्र विध्या से किसी के द्वारा कुछ
किया गया हों इस प्रकार समझे ,बुद्ध हों तो कुल
के देवता , शनि होतो कुल देवी का दोष
और राहू हों तो प्रेत दोष होता है इन सभी दोषों की शांति हेतु अपने ईस्ट मन्त्र का
जाप करे या लघु मृत्युंजय मन्त्र का जाप करना चाहिए |
कुण्डली में वाणी दोष
कभी-कभी आपकी कुण्डली में
वाणी दोष होता है जिस कारण आप गूंगे हो सकते हैं या बोल नहीं पाते हैं! वाणी दोष
होने पर आप अपनी अभिव्यक्ति नहीं कर पाते हैं। विचारों की अभिव्यक्ति वाणी द्वारा
ही होती है। मधुरभाषी सदैव सबको प्रिय होता है! नाम के बाद वाणी ही उसकी पहचान
बनाती है। वाणी दोष हो तो जीवन में एक अभाव सा रहता है, जीवन में एक प्रकार से कुछ खो सा जाता है जो सदेव सालता
रहता है। यह दोष व्यक्ति में पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण ही होता है।
दूसरा भाव वाणी का
प्रतिनिधत्व करता है और बुध ग्रह वाणी का कारक कहलाता है। दूसरा भाव, दूसरे भाव का स्वामी एवं वाणी कारक ग्रह बुध
यदि पाप ग्रह से युत, दृष्ट या अशुभ
भाव में स्थित हो तो वाणी दोष होता है। वाणी दोष जांचने के कुछ ज्योतिष योग इस
प्रकार हैं-
1. दूसरे भाव से
त्रिक भाव में वाणी कारक बुध स्थित हो तो यह योग होता है। अथवा द्वितीयेश त्रिक
भावों में हो तो वाणी दोष होता है। यहां त्रिक भावों की गिनती द्वितीय भाव से
होगी।
2. चन्द्र लग्न या
लग्न से त्रिक भाव में द्वितीयेश या वाणी कारक बुध स्थिति हो और पापग्रह से युत या
दृष्ट हो और किसी प्रकार की शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक गूंगा होता है।
3. द्वितीयेश बुध व
गुरु के साथ अष्टम भाव में हो तो जातक गूंगा होता है।
4. दूसरे भाव में
नीच ग्रह स्थित हो और उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो वाणी दोष होता है।
5. दूसरे भाव में
सूर्य, चन्द्र, राहु व पापयुत शुक्र की युति हो तो वाणी दोष
होता है।
6. शनि-चन्द्र की
युति दूसरे भाव में हो और उस पर सूर्य व मंगल की दृष्टि पड़े तो वाणी दोष होता है।
7. छठे भाव का
स्वामी या बुध चौथे, आठवें या बारहवें
स्थित हो और पापग्रह से दृष्ट हो तो वाणी दोष होता है या गूंगा होता है।
8. कर्क, वृश्चिक व मीन राशि में गए हुए बुध को अमावस का
चन्द्र देखे तो जातक गूंगा होता है या वाणी में दोष होता है।
9. बुध एवं छठे भाव
का स्वामी जब एक साथ युत होते हैं तो भी वाणी में दोष होता है।
10. छठे भाव का
स्वामी एवं गुरु ग्रह जब पहले भाव में स्थित हो तो जातक की वाणी में दोष होता है।
11. दूसरे भाव से
त्रिक भाव का स्वामी जिस राशि या नवांश में स्थित हो उससे त्रिकोण में जब गोचर में
शनि आएगा तब जातक को वाणी संबंधी समस्या से ग्रस्त होना पड़ेगा।
12. दूसरे भाव में
पापग्रह स्थित हो और दूसरे भाव का स्वामी नीच या अस्त होकर पापग्रहों से दृष्ट हो
व सूर्य-बुध की युति सिंह राशि में हो तो जातक को वाणी दोष होता है।
13. बुधाष्टक वर्ग
में बुध से दूसरे भाव में शून्य रेखा हो तो जातक को वाणी दोष होता है या वह गूंगा
होता है।
14. छठे भाव का
स्वामी और बुध पहले भाव में स्थित हों और पापग्रह से दृष्ट हो तो जातक गूंगा होता
है।
उक्त योगों में से एक या
एक से अधिक योग होने से वाणी दोष रहता है। जिन ग्रहों से योग बनता है वे योग कारक
ग्रह होते हैं। योगकारक ग्रहों की दशान्तर्दशा या प्रत्यन्तर्दशा में वाणी संबंधी
समस्या से ग्रस्त होना पड़ सकता है।
यदि ये योग हों और उन पर
किसी भी प्रकार से शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ती हो या योग कारक ग्रह उच्च या स्वराशि
में नवांश में हों तो यह योग भंग भी हो सकता है और वाणी दोष की समस्या नहीं भी हो
सकती है।
उक्त योगों को किसी भी
कुण्डली में विचार करके यह जान सकते हैं कि जातक को वाणी सम्बन्धी दोष होगा या
नहीं।
भकूट दोष
किसी भी सफल विवाह के लिए
उसका शुभ होना बेहद जरूरी होता है। विवाह के वक्त यदि कुंडली में भकूट दोष हो तो
भावी दम्पति का गुण मेलापक मान्य नहीं होता है, इसका मुख्य कारण यह है कि 36 गुणों में से भकूट के लिए 7 गुण निर्धारित हैं। भकूट दोष दाम्पत्य जीवन की जीवनश्ौली,
सामाजिकता, सुख-समृद्धि, प्रेम-व्यवहार, वंशवृद्धि आदि को
प्रभावित करता है। परन्तु इसका शास्त्र सम्मत परिहार (काट) यदि वर वधू की कुंडली
में उपलब्ध हो तो दोष का निवारण हो जाता है।
भकूट दोष का प्रभाव
भकूट दोष का निर्णय
बारीकी से किया जाना चाहिए। शास्त्रों में भकूट दोष निवारण के अनेक प्रमाण उपलब्ध
हैं। परिहार मिलने पर विवाह का निर्णय लेना शास्त्र सम्मत है। द्विर्द्वादश भकूट
में विवाह करने का फल निर्धनता होता है। नव-पंचम भकूट में विवाह करने सेे संतान के
कारण कष्ट होता है। षडाष्टक भकूट दोष के कारण विविध प्रकार के कष्टों के साथ
शारीरिक कष्ट की संभावना होती है। भकूट दोष के शास्त्र सम्मत परिहार उपलब्ध हो तो
दोष समाप्त हो जाता है और वैवाहिक जीवन सुखद व्यतीत होता है।
भकूट के आधार पर विवाह की
शुभाशुभता
शुद्ध भकूट और नाड़ी दोष
रहित 18 से अधिक गुण हों तो
विवाह शुभ मान्य होता है।
अशुद्ध भकूट
(द्विर्द्वादश, नवपंचम, षड़ाष्टक) होने पर भी यदि मित्र भकूट की श्रेणी
में हो तो 20 से अधिक गुण होने पर
विवाह श्रेष्ठ होता है।
शत्रु षड़ाष्टक (6-8)
भकूट दोष होने पर विवाह नहीं करें। दाम्पत्य
जीवन में अनिष्ट की संभावना रहेगी।
मित्र षड़ाष्टक भकूट दोष
में भी पति-पत्नी में कलह होती रहती है। अत: षड़ाष्टक भकूट दोष में विवाह करने से
बचना चाहिए।
नाड़ी दोष के साथ यदि
षड़ाष्टक भकूट दोष (चाहे मित्र षड़ाष्टक हो अथवा दोनो की राशियों का स्वामी एक ही
ग्रह हो) भी हो तो, विवाह कदापि नहीं
करें। शुद्ध भकूट से गण दोष का परिहार स्वत: हो जाता है।
भकूट दोष परिहार
वर-कन्या की राशि से आपस
में गणना करने पर द्विर्द्वादश (2-12) या एक दूसरे की राशि आगे पीछे हो, नव-पंचम (5-9) या षडाष्टक (6-8)
राशि गणना में हो तो, भकूट दोष होता है। इन तीनों स्थितियों में यदि दोनों के
राशि स्वामियों में शत्रुता हो तो भकूट दोष के कारण 7 में से शून्य अंक मिलेगा। लेकिन दोनों की राशियों का
स्वामी एक ही ग्रह हो अथवा उनके राशि स्वामियों में मित्रता होने पर विवाह की
अनुमति दी जा सकती है। इनके शास्त्र सम्मत परिहार ये हैं-
भकूट दोष होने पर भी यदि
वर-कन्या के राशि स्वामी एक ही हों या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो गणदोष एवं
दुष्ट भकूट दोष नगण्य हो जाता है।
वर-कन्या के राशि स्वामी
एक ही ग्रह हों, राशि स्वामियों
में परस्पर मित्रता हो, परस्पर तारा
शुद्धि हो, राशि सबलता हो, नवमांश पतियों में मित्रता हो तो यह पांच
प्रकार के परिहार भी दुष्ट भकूट दोष निवारक हैं। परन्तु इनमें परस्पर नाड़ी शुद्धि
होना चाहिए।
नवपंचम व द्विर्द्वादश
दुष्ट भकूट होने पर वर की राशि से गणना करने पर कन्या की राशि 5वीं हो तो अशुभ किन्तु 9वीं शुभ तथा वर से कन्या की राशि गणना में 2 हो तो अशुभ परन्तु 12वीं शुभ होती है। ऎसे में भकूट दोष होने पर भी विवाह
श्रेष्ठ होता है।
चाण्डाल योग या दोष
बृहस्पति और राहु जब साथ
होते हैं या फिर एक दूसरे को किन्ही भी भावो में बैठ कर देखते हो, तो गुरू चाण्डाल योग निर्माण होता है। चाण्डाल
का अर्थ निम्नतर जाति है। कहा गया कि चाण्डाल की छाया भी ब्राह्मण को या गुरू को
अशुद्ध कर देती है। गुरु चंडाल योग को संगति के उदाहरण से आसानी से समझ सकते हैं।
जिस प्रकार कुसंगति के प्रभाव से श्रेष्ठता या सद्गुण भी दुष्प्रभावित हो जाते
हैं। ठीक उसी प्रकार शुभ फल कारक गुरु ग्रह भी राहु जैसे नीच ग्रह के प्रभाव से अपने
सद्गुण खो देते है। जिस प्रकार हींग की तीव्र गंध केसर की सुगंध को भी ढक लेती है
और स्वयं ही हावी हो जाती है, उसी प्रकार राहु
अपनी प्रबल नकारात्मकता के तीव्र प्रभाव में गुरु की सौम्य, सकारात्मकता को भी निष्क्रीय कर देता है। राहु चांडाल जाति,
स्वभाव में नकारात्मक तामसिक गुणों का ग्रह है,
इसलिए इस योग को गुरु चांडाल योग कहा जाता है।
जिस जातक की कुंडली में गुरु चांडाल योग यानि कि गुरु-राहु की युति हो वह व्यक्ति
क्रूर, धूर्त, मक्कार, दरिद्र और कुचेष्टाओं वाला होता है। ऐसा व्यक्ति षडयंत्र
करने वाला, ईष्र्या-द्वेष, छल-कपट आदि दुर्भावना रखने वाला एवं कामुक
प्रवत्ति का होता है, उसकी अपने परिवार
जनो से भी नही बन पाती तथा वह खुद को अकेला महसूस करने लग जाता है और उसका मन
हमेशा व्याकुल रहता है।
उपाय - गुरु चांडाल योग
के जातक के जीवन पर जो भी दुष्प्रभाव पड़ रहा हो उसे नियंत्रित करने के लिए जातक
को भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए। एक अच्छा ज्योतिषी कुण्डली देख कर यह बता सकता
है कि हमे गुरु को शांत करना उचित रहेगा या राहु के उपाय जातक से करवाने पड़ेंगे।
अगर चाण्डाल दोष गुरु या गुरु के मित्र की राशि या गुरु की उच्च राशि में बने तो
उस स्थिति में हमे राहु देवता के उपाय करके उनको ही शांत करना पड़ेगा ताकि गुरु हमे
अच्छे प्रभाव दे सके। राहु देवता की शांति के लिए मंत्र-जाप पुरे होने के बाद हवन
करवाना चाहिए तत्पश्चात दान इत्यादि करने का विधान बताया गया है. अगर ये दोष गुरु
की शत्रु राशि में बन रहा हो तो हमे गुरु और राहु देवता दोनों के उपाय करने चाहिए
गुरु-राहु से संबंधित मंत्र-जाप, पूजा, हवन तथा दोनों से सम्बंधित वस्तुओं का दान करना
चाहिए।
अमावस्या योग या दोष
जब सूर्य और चन्द्रमा
दोनों कुण्डली के एक ही घर में विराजित हो
जावे तब इस दोष का निर्माण होता है। जैसे की आप सब जानते है की अमावस्या को
चन्द्रमा किसी को दिखाई नही देता उसका प्रभाव क्षीण हो जाता है। ठीक उसी प्रकार
किसी जातक की कुंडली में यह दोष बन रहा हो तो उसका चन्द्रमा प्रभावशाली नही रहता।
और चन्द्रमा को ज्योतिष में कुण्डली का प्राण माना जाता है और जब चन्द्रमा ही
प्रभाव हीन हो जाए तो यह किसी भी जातक के लिए कष्टकारी हो जाता है क्योंकि यही
हमारे मन और मस्तिक्ष का करक ग्रह है।
इसलिए अमावस्या दोष को महर्षि पराशर जी ने बहुत बुरे योगो में से एक माना है, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपने ग्रन्थ बृहत पराशर होराशास्त्र में बड़े विस्तार से की है तथा उसके उपाय बताये है। जोकि में आगे अपने ब्लॉग पर कुछ समय बाद प्रकाशित करूँगा। ज्योतिष में ऐसा माना जाता है कि सूर्य और चन्द्र दो भिन्न तत्व के ग्रह है सूर्य अग्नि तत्व और चन्द्र जल तत्त्व, इस प्रकार जब दोनों मिल जाते है तो वाष्प बन जाती है कुछ भी शेष नही रह जाता।
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