ज्योतिष तत्त्वज्ञान सागर की गागर

 ज्योतिष तत्त्वज्ञान सागर की गागर -  भाग 1


इस अंक में अलग अलग ज्योतिष युतियों एवं ग्रहो की स्थिति के तथ्यों का संक्षिप्त अध्यन  कड़ियों में प्रस्तुत करेंगे

चार_पांच_ग्रहो_के_बीच_बना_सम्बन्ध

कुंडली में जब चार या पांच ग्रह या पांच से ज्यादा ग्रह एक साथ युति या दृष्टि सम्बन्ध बनाकर बैठ जाते है तब उनका यह सम्बन्ध बहुत शक्तिशाली रूप ले लेता है जिसके परिणाम बहुत शुभ भी हो सकते है और बहुत अशुभ भी हो सकते है क्योंकि जब चार-पांच भावो के स्वामी एक साथ युति या दृष्टि सम्बन्ध बनाकर बैठते है तब वह ग्रह कई भावो के स्वामी होते है ऐसी स्थितो में कई भावेशों का सम्बन्ध एक साथ बन जाने से सबके परिणाम एक साथ मिले झूले शक्तिशाली मिलेंगे अब परिणाम शुभ होंगे या अशुभ यह सब ग्रहो के बीच बनने वाला दृष्टि सम्बन्ध किस स्तर का है किस तरह का है शुभ योगो में है या अशुभ योगो में है ग्रह किन भावो के स्वामी है इस बात पर निर्भर करेगा।सम्बन्ध शुभ हो या अशुभ फल बहुत शक्तिशाली और गंभीर मिलेंगे क्योंकि ऐसी स्थिति कई भावो के स्वामी एक साथ सम्बन्ध बनाकर आपस में एक दूसरे को सहयोग कर रहे होते है।चार या पाँच या पाँच से ज्यादा ग्रहो में यदि यह ग्रह आपस में केंद्र(1,4,7,10) त्रिकोण(5,9)और धन- लाभ(2-11) भावो के स्वामी होकर युति या दृष्टि सम्बन्ध बनाएंगे तब जातक को जीवन में बहुत कामयाबी और सफलता देंगे लेकिन यदि शुभ भावेशों के साथ अशुभ भाव के स्वामी भी साथ होंगे तब जीवन को संघर्षशील और निराशा से भर देते है।इसके आलावा जब भी चार-पाँच भावो के स्वामी एक साथ युति या दृष्टि सम्बन्ध में होते तब उनके बीच नैसर्गिक रूप से सम्बन्ध कैसा है यह भी बहुत मायने रखेगी बात जैसे, शनि राहु चंद्र गुरु सूर्य या युति या दृष्टि सम्बन्ध यह ग्रह आपस में पाप, शुभ और क्रूर गृह है जो कि सम्बन्ध इनका शुभ परिणाम भी दे सकता है और अशुभ भी ,निर्भर यह करेगा कि यह ग्रह कुंडली में किन भावो के स्वामी है।कहने का मतलब है यदि चार-पाँच ग्रहो में या पांच से ज्यादा ग्रह भी कुंडली में अनुकूल और शुभ स्थिति में सम्बन्ध बनाये होंगे तब बहुत शक्तिशाली हो जायेंगे और राजयोग आदि देंगे और अशुभ युति-दृष्टि सम्बन्ध होने पर शक्तिशाली होकर जीवन को संघर्ष से भरेंगे और कामयाबी न देकर मेहनत कराएँगे फल अनुकूल नही देंगे।                                                                                                                    उदारहण_अनुसार:- मेष की कुंडली में लग्नेश मंगल होता है, चन्द्र शुक्र चोथे सातवे भाव केंद्र के स्वामी, सूर्य पंचम भाव त्रिकोण का स्वामी, गुरु तरीक़ों का स्वामी होगा ऐसी स्थिति में मंगल चन्द्र सूर्य शुक्र और गुरु का यह युतु या दृष्टि सम्बन्ध बहुत शक्तिशाली राजयोग बनाएगा और जीवन में अच्छी कामयाबी देगा लेकिन यही साथ में शनि भी बैठ जाए जो की सूर्य मंगल चन्द्र के साथ शुभ फल नही देता तब जीवन को संघर्षमय असफलता देगा।इस तरह से जो भी 4से5 ग्रह या 5से ज्यादा ग्रह भी आपस में युति दृष्टि सम्बन्ध में है वह जातक को बहुत उचाईयो पर लेकर अच्छी कामयाबी भी दे सकते है और सम्बन्ध अशुभ है तब फल शुभ नही मिलेगा।चार या पांच ग्रहो के सम्बन्ध का मतलब होता है जीवन में बहुत महत्वपूर्ण घटनाये समय समय पर घटती रहना जिन भी जातक-जातिकाओ की कुंडली में  चार- पाँच या ज्यादा ग्रह एक साथ युति दृष्टि सम्बन्ध में होंगे उनका जीवन सामान्य से अलग होगा।

सूर्य_का_नीचभंग_फल                                                    

सूर्य तुला राशि में नीच होता है।सूर्य का नीचभंग सबसे ज्यादा दो स्थितियों में महत्वपूर्ण होगा एक जब सूर्य के साथ शुक्र बैठा हो और सूर्य के साथ शनि बैठा हो।मंगल भी सूर्य के साथ होगा युति में तब भी सूर्य का नीचभंग होगा।जब सूर्य के साथ शुक्र की युति होती है तब सूर्य का नीचभंग होना  लाजमी है लेकिन सूर्य शुक्र की युति में यदि शुक्र सूर्य से अस्त हो जाता है तब सूर्य शुक्र की तुला राशि में युति भी सूर्य का नीचभंग नही कर सकती क्योंकि जिस शुक्र के कारण सूर्य का नीचभंग होना था उस शुक्र को सूर्य ने अस्त कर दिया होता है ऐसी स्थिति को कहते है खुद के पैरो पर कुल्हाड़ी मारना, अधिकतर जातक ऐसा कर देते है कि आए हुए अवसर को अपनी गलती के कारण खो देते है वह यही स्थिति होती है।दूसरी स्थिति शुक्र सूर्य एक दूसरे की राशि में हो तब सूर्य का नीचभंग होगा और यह नीचभंग राजयोग देगा हलाकि लग्न अनुसार इस राशि परिवर्तन का कम या ज्यादा शुभ प्रभाव होगा।दूसरी स्थिति में जब तुला राशि में बैठे सूर्य के साथ शनि बैठता है जो कि तुला राशि शनि की उच्च राशि है तो सूर्य का नीचभंग हो जाता है ऐसी स्थिति में सूर्य का उच्च शनि के कारण नीचभंग तो होगा लेकिन सूर्य प्रकाश है और शनि अंधकार तो ऐसी स्थिति में सूर्य शनि का गुलाम बनकर ही शनि की स्थिति अनुसार फल देगा लेकिन नीच का  दोष सूर्य को नही लगेगा।लेकिन ऐसी स्थिति में शुक्र की तरह यदि सूर्य और शनि आपस में अंशानुसार बहुत नजदीक हो तब सूर्य शनि को अस्त कर देगा जो कि सबसे ख़राब स्थिति होगी क्योंकि जिस तुला राशि में बैठे उच्च शनि के कारण नीच सूर्य का नीचभंग होना था उसने अपने नीचभंग करने वाले शनि को ही अस्त कर दिया अब अस्त शनि के पास कोई बल और शुभता न होने से यह सूर्य का नीचभंग नही कर पायेगा और अशुभ रूप लेकर अशुभ फल देगा।शुक्र सूर्य की तुला राशि में युति में कम से कम 15अंशो का अंतर हो तब सबसे अच्छा सूर्य का नीचभंग होगा इसके आलावा सूर्य नवमांश कुंडली में अपनी उच्च राशि मेष में होगा तब सूर्य का नीचभंग सबसे ज्यादा प्रभावी होगा।नवमांश कुंडली में भी यदि तुला राशि में सूर्य के साथ शुक्र बैठेगा तब भी सूर्य का नीचभंग हो जायेगा चाहे लग्न कुंडली में सूर्य शुक्र की युति हो या न हो लेकिन  शुक्र अस्त नही हो।इसके आलावा सूर्य नवमांश में मेष, सिंह राशि का हो और लगबा कुंडली में शुक्र से युति करे लेकिन शुक्र अस्त न हो तब ऐसी स्थिति में सूर्य का नीचभंग सबसे शानदार फल देगा।फल क्या होगा और कैसे यह शुक्र सूर्य शनि किन भावो के स्वामी है उसी के अनुसार सूर्य का नीचभंग का फल मिलेगा।।                                                                      एक_उदाहरण_अनुसार: मकर लग्न में शुक्र पंचमेश और दशमेश होगा और शुक्र की तुला राशि 10वे भाव में होगी जो की सूर्य की नीच राशि है 10वे भाव तुला राशि में सूर्य शुक्र की युति जातक को सरकारी नोकरी दिलाने में सहायक बन जायेगी क्योंकि शुक्र दशमेश होकर दशम भाव में होगा और सरकारी नोकरी कारक  सूर्य शुक्र के साथ दशम भाव में नीचभंग राजयोग बनाएगा।इन दो शक्तिशाली राजयोगों के कारक जातक अच्छे पद पर कार्य करेगा।

सूर्य_बुध_राहु_सम्बन्ध                                                                                                                                         सूर्य बुध का सहयोगी और बुध सूर्य का सहयोगी ग्रह है राहु एक पाप ग्रह है।ज्योतिष में सूर्य के साथ राहु या केतु की युति ग्रहण योग बनाकर सूर्य सम्बन्ध अशुभ फल देती है लेकिन यह सम्बन्ध हर स्थिति में अशुभ फल नही देता।जब सूर्य बुध राहु या केतु युति सम्बन्ध बनाते है तब यह राजयोग तक भी देगा और अशुभ फल तक भी दे सकता है।सूर्य बुध राहु या केतु की युति में इनके बीच अंशो की स्थिति कैसी है , सूर्य बुध किन भावो के स्वामी होकर राहु या केतु से युति किए है? साथ ही सूर्य और बुध के भावो(घर) पर किस तरह के ग्रहो का प्रभाव है आदि? पर स्थिति निर्भर करती है तब ही इस सम्बन्ध का सही तरह से फल निलता है।सूर्य और बुध दोनों के युति सम्बन्ध से बुधादित्य जैसा शुभ योग बनता है जो राजयोग देने वाला शुभ योग है अब सूर्य बुध युति के साथ राहु या केतु का सम्बन्ध होने से यह बुधादित्य योग के प्रभाव में होने से शुभ फल देगा।यह सम्बन्ध शुभ फल कब देगा?, जब सूर्य और बुध के बीच ज्यादा से ज्यादा 24अंशो और कम से कम 15अंश का अन्तर हो और राहु या केतु पीड़ित न हो साथ ही राहु केतु का प्रभाव उन भावो पर न हो जिसके स्वामी सूर्य और बुध है तब यह सम्बन्ध विशेष शुभ फल कारक होगा यदि सूर्य के साथ बुध बहुत ज्यादा अस्त है तब राहु केतु के नकारात्मक फलो में वृद्धि रहेगी।यदि सूर्य और बुध दोनो में से एक केंद्र और दूसरा त्रिकोण का स्वामी है तब सूर्य बुध राहु या केतु की युति अच्छा राजयोग देगी और जातक के सुख, सोभाग्य, उन्नति जैसे राजयोग के रास्ते खोल देगी क्योंकि सूर्य बुध केंद्र त्रिकोण के स्वामी होने से राजयोग कारक बन जायेंगे इस राजयोग में राहु केतु की युति भी राजयोग का प्रभाव लेकर राजयोग कारक बनकर शुभ फल देने वाली बन जायेगी।लेकिन बुध अस्त, नीच राशि या पीड़ित नही होना चाहिए न ही सूर्य पीड़ित या नीच हो, सूर्य और बुध दोनों में से एक भी जितनी ज्यादा बली स्थिति में होंगे उतना ही राहु केतु की युति इनके साथ शुभ परिणाम देगी अन्यता अशुभ फल भी दे सकती है फल निर्भर करेगा सूर्य बुध की स्थिति पर।                                                                                उदाहरण अनुसार:- वृष लग्न में सूर्य चोथे भाव केंद्र का स्वामी होकर शुभ है बुध दूसरे और पाचवे भाव त्रिकोण का स्वामी बनकर शुभ होता है अब वृष लग्न में सूर्य और बुध की युति होने के साथ राहु या केतु की युति भी सूर्य बुध(बुधादित्य योग) में हो जाती है तब सूर्य बुध राहु या केतु युति सम्बन्ध शुभ फल, राजयोग देगा।राजयोग के फल कितने अच्छे और किस स्तर के होने यह कुंडली में सूर्य बुध कौन से भाव में युति किये है, कितने बली है आदि पर फल निर्भर करेगा।इसी तरह धनु लग्न में बुध सप्तम और दशम केन्द्रो का स्वामी और सूर्य नवम त्रिकोण का स्वामी होकर होकर शुभ होता है। राहु केतु की सूर्य बुध युति से यह सम्बन्ध राजयोग देने वाला और विशेष सफलता, ऊचाईयां, पद प्रतिष्ठा में वृद्धि करेगा क्योंकि नवा और दसवा भाव है ही उन्नति, सफलता, पद प्रतिष्ठा आदि जैसे शुभ फलो का।सूर्य बुध राहु या केतु की इस स्थिति में यह युति 6, 8, 12 भाव में नही होनी चाहिए इन भावो के आलावा अन्य भावो में विशेष शुभ फल देगी जिस भी भाव में यह सम्बन्ध बनेगा उस भव के विशेष अच्छे फल देगा लेकिन सूर्य और बुध के भावो पर राहु केतु की दृष्टि न हो और न ही सूर्य बुध के भावो में 6, 8, 12 भाव का स्वामी न बैठा हो क्योंकि इस भाव के स्वामी बैठने से भाव को बिगाड़ेंगे जिससे फल में गिरावट आएगी।सूर्य और बुध के भावो(घर) में शुभ योग बन रहे हो जैसे सिंह राशि या कन्या मिथुन राशि में गजकेसरी योग(चन्द्र गुरु युति), लक्ष्मी योग(मंगल चन्द्र युति), लक्ष्मी नारायण योग(शुक्र बुध युति) आदि जैसे शुभ योग सूर्य के भाव सिंह राशि में और बुध के भाव मिथुन या कन्या राशि में बन रहे हो या सूर्य बुध के भावो ने शुभ ग्रह शुक्र गुरु पूर्ण बली चन्द्र में से इक भी बैठा हो तब सूर्य बुध राहु या केतु की युति बेहद शानदार परिणाम देगी, इसी को कहेंगे की राजयोग जैसे शुभ फल और सूर्य बुध के भावो में शनि मंगल जैसे पाप/क्रूर ग्रह बैठे हो तब यह सम्बन्ध कुछ शुभता में कमी करेगा, फल निर्भर करेगा कुंडली में इनकी स्थिति पर।।                                                                                          कहने का मतलब है कुंडली में सूर्य बुध राहु या केतु की युति का फल शानदार और शुभ होगा या कुछ अशुभ होगा, यह सब सूर्य बुध राहु या केतु की युति किस तरह से कुंडली में बन रही है इस बात पर निर्भर करेगा।सूर्य बुध राहु केतु की दशस् में इस सम्बन्ध के फल विशेष रूप से फलित होकर जातक को मिलेंगे।

कुंडली में शनि का अस्त होना

अस्त ग्रह का मतलब होता है ग्रह का सूर्य के तेज(गर्मी) और प्रभाव से अंधकारमय हो जाना।राहु केतु छाया ग्रह होने से कभी अस्त नही होते है।जब कर्म प्रधान और अंधकार का प्रतीक शनि अस्त हो जाता है तब जातक की कुंडली में यह सबसे ज्यादा प्रभाव जातक के कार्य छेत्र जैसे नोकरी, व्यवसाय या जो भी कार्य छेत्र होता है या जातक करता है उस पर डालता है क्योंकि शनि नोकरी का और कार्य छेत्र में सफलता असफलता का कारक ग्रह है।जब यह किसी जातक की कुंडली में अस्त हो जाता है तब नोकरी हो या व्यापार या कोई भी कार्य छेत्र हो उसमे संघर्ष को बढ़ा देता है कुंडली में राजयोग, धनयोग आदि होने पर भी यह संघर्ष के बाद सफलता देगा क्योंकि यह कारक है कार्य छेत्र का।केंद्र या त्रिकोण भावो का स्वामी होकर शनि का अस्त होना ज्यादा नुकसान दायक है लेकिन 6, 8, 12 भावो का स्वामी होकर अस्त होता है तब ज्यादा ख़राब स्थिति वाले फल यह नही देता है।अस्त होकर यह जिस भी भाव में बैठेगा उस भाव के फल को भी पूरी तरह अपनी अस्त स्थिति के अनुसार प्रभावित करेगा।जैसे, दूसरे भाव(धन भाव) में यह बैठेगा तो रुपये पैसे और परिवार के लिए अशुभ फल देगा जैसा फिजूल खर्च धन न रुकना, परिवार में अशांति आदि।इस तरह से जिस भी भाव में यह बैठेगा उस भाव के फल में उताब चडाब करेगा।अब अस्त शनि की नवमांश कुंडली में स्थिति जरूर देखनी जरूरी होती है यदि नवमांश कुंडली में सूर्य से दो भाव दूर है या दो भाव से भी ज्यादा दूर है तब इसे अस्त होने का कोई खास दोष नही लगेगा और यह अपने फल देने में सक्षम होगा, फल कैसे होंगे यह शनि की भाव स्थिति, अन्य ग्रहो के साथ कुंडली कोई सम्बन्ध बन तो नही रहा और बन रहा है तो शुभ या अशुभ किस तरह से सम्बन्ध बन रहा है पर निर्भर करेगा साथ ही लग्न कुंडली में सूर्य और शनि के बीच कम से कम 10 से 11 अंशो का अंतर होगा तब भी इसको ज्यादा दोष अस्त का नही लगेगा।दशमांश कुंडली का स्वामी शनि है जब यह दशमांश कुंडली में बली हो और सूर्य से दूर होगा काफी तब भी इसे कोई अस्त दोष कार्य छेत्र को लेकर जैसे नोकरी व्यवसाय आदि के लिए नही लगेगा।इस तरह से शनि की अस्त स्थिति नवमांश दशमांश में शुभ हो जाये तब अस्त का दोष प्रभावहीन सा रह जायेगा।

गजकेसरी योग+विषयोग    

 गुरु और चन्द्रमा के सम्बन्ध से गजकेसरी योग बनता है जैसे की गुरु चन्द्र की युति हो या दोनों के बीच दृष्टि सम्बन्ध हो या चन्द्रमा से गुरु केंद्र में हो तब गजकेसरी योग बनेगा। चंद्र और शनि की युति या दृष्टि सम्बन्ध से विषयोग बनता है।जब भी कुंडली में एक साथ चन्द्र गुरु शनि के बीच युति/ दृष्टि सम्बन्ध बनेगा तब यह गजकेसरी योग और विषयोग दोनों ही योग बन जायेंगे।अब गजकेसरी योग शुभ योग होगा और विषयोग अशुभ योग है अब प्रश्न यह उठेगा की इस सम्बन्ध में गजकेसरी योग बनने से यह शुभ फल देगा या विषयोग बनने से अशुभ फल देगा क्योंकि योग शुभ-अशुभ दोनों बन रहे है तो जाहिर सी बात है फल शुभ-अशुभ दोनों तरह के होंगे लेकिन शुभ-अशुभ फलो में शुभ-अशुभ फल की मात्रा किसकी ज्यादा होगी यह बात दोनों योगो में से कौन ज्यादा बली है और कुंडली में लग्न अनुसार बली है पर निर्भर करेगा।यदि गुरु और चन्द्र का बल ज्यादा हुआ जैसे चन्द्र शुक्ल पक्ष या शुक्ल पक्ष के आस पास का होगा और गुरु भी बलवान हुआ साथ ही शनि कमजोर होगा तब गजकेसरी योग का फल मतलब गुरु चन्द्र युति का फल ज्यादा मिलेगा जो सामान्य शुभ ही होगा। लेकिन चन्द्र कमजोर हो जाए कृष्ण पक्ष का हुआ और गुरु भी कमजोर हो शनि बली या अशुभ भावो का स्वामी होकर चन्द्र गुरु के साथ सम्बन्ध बनाएगा तब विषयोग के अशुभ फलो में वृद्धि होगी।क्योंकि जो बलवान होता है वही कमजोर व्यक्ति पर दबाब बना सकता है ऐसे ही यह ग्रहो की स्थिति में होता है।इस दोहरे शुभ-अशुभ सम्बन्ध में एक बात ओर ध्यान में रखनी चाहिए कि तीनो ग्रहो के बीच सम्बन्ध में अंशो का अन्तर कितना और कैसा है? यदि गुरु और चन्द्र के बीच अंशो में अन्तर कम है और यह दोनों अंशो में बहुत नजदीक है और शनि चन्द्र के बीच अंशो में बहुत दूरी है तब यह अच्छा है ऐसी स्थिति में विषयोग का प्रभाव कम हो जायेगा और चन्द्र गुरु युति का प्रभाव बढ़ जायेगा।यदि नवमांश कुंडली में भी चन्द्र गुरु युति बन रही हो और शनि राहु केतु या सूर्य की युति चन्द्र के साथ नवमांश कुंडली में नही बन रही हो तब यह शुभ स्थिति होगी या चन्द्र नवमांश कुंडली में शुक्र बुध से युति या दृष्टि सम्बन्ध में हो या बली होकर किसी तरह के अशुभ प्रभाव में न हो तब भी इस सम्बन्ध के शुभ परिणाम बढ़ जायेंगे और अशुभ परिणाम नाम मात्र रह जायेंगे।इस सम्बन्ध में गुरु चन्द्र का बली होना ज्यादा जरूरी है।

राजयोग कब कितना फल देता है??

 राजयोग का मतलब ही होता जो सफलता, आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नति दे, साथ ही नोकरी, व्यापार, कार्य में कम समय में आसानी से सफल बना दे।कुंडली के केंद्र स्थान और त्रिकोण स्थानों का जब भी आपस में सम्बन्ध बनेगा वह राजयोग बन जायेगा, अब राजयोग कितना शक्तिशाली और कितना प्रभावी होगा यह इस स्थिति पर निर्भर करेगा कि जितने ज्यादा से ज्यादा केंद्र और त्रिकोण के स्वामी आपस में सम्वन्ध बनाएंगे यदि केवल एक ही केंद्र और एक ही त्रिकोण का स्वामी आपस में सम्बन्ध बनाएगा तब यह सम्बन्ध सामान्य राजयोग के फल देने वाला होगा।यदि एक से ज्यादा केंद्र के स्वामी और त्रिकोण के स्वामी सम्बन्ध बनाएंगे तब यह सम्बन्ध बहुत शक्तिशाली हो जायेगा क्योंकि केन्द्रेश और त्रिकोणेश को एक दूसरे का सहयोग मिलेगा।                                                       उदाहरण_अनुसार, मेष लग्न में जब गुरु जो की त्रिकोण का स्वामी है और चन्द्र केंद्र का स्वामी है तब केवल यह दोनों ही आपस में सम्बन्ध बनाये तब यह सामान्य होगा लेकिन इसी में शुक्र जो की केंद्र(सप्तम भाव) का स्वामी है का भी सम्बन्ध बन जाता है तब इस राजयोग में ज्यादा ताकत आ जायेगा यदि लग्नेश(जो केन्द्रेश भी है त्रिकोणेश भी) का सम्बन्ध भी बन जायेगा मतलब गुरु(त्रिकोण स्वामी)शुक्र- चन्द्र( केंद्र स्वामी)और मंगल(लग्नेश होकर केंद्र त्रिकोण) स्वामी होने से इन चारो का आपसी सम्बन्ध इतना शक्तिशाली राजयोग बनाएगा कि जातक एक बहुत अच्छा जीवन जीयेगा इन्ही   राजयोगों के साथ कोई नीचभंग राजयोग आदि बन जाए तब स्थिति बहुत बली हो जायेगी जैसे सोने पर सुहागा।जो भी केन्द्रेश त्रिकोणेश आपस में सम्बन्ध राजयोग बनाएंगे वह अस्त, पीड़ित, नवमांश कुंडली में नीच राशि में नही होने चाहिए साथ ही किसी तरह से 6 या 8 भावेश का सम्बन्ध राजयोग कारक ग्रहो से नही होना चाहिए वरना राजयोग मिलने में संघर्ष करना पड़ जाएगा।                                                                           राजयोग कौन से सम्बन्ध से ज्यादा प्रभावी होगा?                                                                                   पहली सबसे अच्छी स्थिति होती है,केन्द्रेश त्रिकोणेश आपस में युति सम्बन्ध बनायें,                                                                  दूसरी सबसे अच्छी स्थिति होती है, केंद्र और त्रिकोण के स्वामी आपस में स्थान परिवर्तन में हो, तीसरी, दृष्टि सम्बन्ध में हो।इस तरह से राजयोग बनने पर सबसे शुभ परिणाम देता है।

विवाह सुख कैसा होगा?

 कुंडली का सातवा भाव वैवाहिक जीवन और जीवनसाथी का है।यह भाव और इस भाव का स्वामी +लड़के की कुंडली में शुक्र और लड़की की कुंडली में गुरु विवाह का सुख है या नही इसकी पूरी तरह जानकारी दे देते है।सबसे पहले कुंडली का सातवा भाव और इस भाव का स्वामी देखेंगे यदि सप्तम भाव पर या सप्तमेश पर कम से कम दो या दो से ज्यादा पाप/क्रूर ग्रहो शनि मंगल राहु केतु ग्रहो का प्रभाव है और विवाह कारक शुक्र गुरु भी इन्ही पाप/क्रूर ग्रहो की चपेट में है तब विवाह सुख नही मिलता शादी होने के बाद भी उसमे दिक्कते होगी या पति-पत्नी अलग-अलग रहेंगे।यदि सप्तम भाव सप्तमेश पाप ग्रहो के प्रभाव में है लेकिन सप्तम भाव गुरु से द्रष्ट है तब पति-पत्नि दोनों अलग न हो लेकिन वैवाहिक जीवन सही नह चलेगा।सप्तमेश अस्त, नीच राशि या पाप ग्रहो से युक्त होकर अशुभ स्थिति में होगा तब वैवाहिक जीवन सही नही रहेगा।इसके विपरीत सप्तमेश और सप्तम भाव में जितना ज्यादा गुरु शुक्र बुध का प्रभाव होगा उतना ही वैवाहिक जीवन बढ़िया रहेगा।सप्तम भाव सप्तमेश जितने ज्यादा पाप ग्रहो से बचे होंगे गुरु शुक्र बली होंगे लड़की-लड़के की कुंडली में उतना ही वैवाहिक जीवन मधुर और सुखमय होगा।विवाह संबंधी ग्रह सप्तमेश केंद्र त्रिकोण में कारक गुरु शुक्र भी केंद्र त्रिकोण में या लग्न अनुसार अपने शुभ भाव में होंगे उतना ही वैवाहिक जीवन बढ़िया रहेगा।इसके आलावा नवमांश कुंडली का लग्न लग्नेश+सप्तम भाव सप्तमेश और वही कारक लड़के के लिए शुक्र+लड़की के लिए गुरु बली होंगे और नवमांश कुंडली का सप्तम भाव, नवमांश लग्न, लग्नेश इन्ही ग्रहो से युक्त होगा उतना ही वैवाहिक जीवन सुख रहेगा, पाप ग्रहो के प्रभाव में होंगे से शुभ ग्रहो के प्रभाव में न होंने से वैवाहिक जीवन में दिक्कते रहेगी।लग्न कुंडली और नवमांश कुंडली दोनों में ही शादी की स्थिति बढ़िया होने से सोने पर सुहागा जैसे फल मिलेंगे यदि लग्न और नवमांश दोनों में ही शादी की स्थिति ख़राब होगी तो लाख कोशिश करने के बाद भी विवाह सुख नही मिलेगा।यदि लग्न और नवमांश दोनों कुंडलियो में से एक भी शादी के लिए अनुकूल है तब शादी सामान्य ठीक ही रहेगी।इसके आलावा कुंडली का दूसरा भाव, चौथा भाव और बारहवां भाव भी वैवाहिक जीवन के सुख वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दूसरा भाव परिवार वृद्धि का है, परिवारिक सुख है, चौथा भाव घर गृहस्थी है तो बारहवा भाव शैय्या सुख है यह भाव और सभी सुख वैवाहिक जीवन के सहयोगी भाव और वैवाहिक सुख के अंग है यदि इन चीजो में भी कमी है तब वैवाहिक जीवन में तनाब या सुख में कमी होना अनिवार्य हो जाता है।केवल सप्तम भाव और सप्तमेश शुभ है लेकिन यह भावेश शुभ स्थिति में नही होंगे तो शादी तो चलेगी लेकिन किसी न किसी कारण से परिवार सुख(द्वितीय भाव) घर-गृहस्थी(चतुर्थ भाव), शैय्या सुख(द्वादश भाव)में कमी रहेगी।इस तरह वैवाहिक जीवन की पूरी जीवनी कैसी रहेगी यह जातक की कुंडली में बनने वाली भाव और ग्रहो की स्थिति पर निर्भर करता है।

शनिका नीचभंग राजयोग

नीचभंग राजयोग ग्रह की स्थिति को राजयोग सम्बन्ध शुभ फल देने की स्थिति में लाकर रख देता है।शनि एक ऐसा ग्रह है जिसका नीचभंग स्वयं के कारण न हो तब यह कभी भी शुभ फल नही देता है।शनि मेष राशि में नीच का होता है और नीचभंग किसी ग्रह का तब ही होता है जब नीच ग्रह के साथ उस नीच राशि में बैठे ग्रह का उच्चाधिपति साथ हो या उस राशि का स्वामी साथ बैठा हो।शनि मंगल की राशि मेष में नीच होता है ऐसी स्थिति में सूर्य का परम् शत्रु सूर्य मेष राशि में उच्च और मंगल बैठने पर ही शनि का नीचभंग होगा या मंगल शनि को देखेगा आदि तब शनि का नीचभंग होगा।लेकिन यहाँ इस स्थिति हुआ शनि का नीचभंग संघर्ष और दिक्कते ही करेगा क्योंकि मंगल शनि से शनि की शत्रुता है और दोनों ही शनि के विरोधी ग्रह है।अब नीच का शनि यदि मंगल सूर्य के द्वारा नीचभंग की स्थिति को प्राप्त करता मतलब शनि का नीचभंग होता है तब शनि मंगल या सूर्य का दास बन जाएगा और सूर्य मंगल शनि को अपना दास बनाकर फल देगे जो संघर्षशील और अशुभ होंगे जिससे जातक को कोई संतुष्टि नही मिलेंगी।जिन भी जातको का शनि कुंडली में नीच राशि में है तब शनि का यदि खुद के कारण नीचभंग होता है जैसे नवमांश कुंडली में शनि उच्च हो जाए, नीच नवमांश में वर्गोत्तम हो जाए या नीच शनि और मंगल का आपस में राशि परिवर्तन हो जैसे शनि मेष में है और मंगल मकर या कुम्भ में हो तब यह नीचभंग अच्छा फल देगा।लेकिन मंगल की युति या दृष्टि सम्बन्ध से हुआ शनि का नीचभंग किसी तरह से अनुकूल फल नही देगा, इसके आलावा यदि मेष राशि में बैठे हुए शनि को मंगल अपनी आठवीं दृष्टि से देखे तब भी यह नीचभंग सामान्य अच्छा फल देगा, अब यदि राशि परिवर्तन या मंगल की दृष्टि से शनि का नीचभंग हो जाए और शनि को शुक्र गुरु देखे तो नीचभंग हुए शनि के फल बहुत शानदार होंगे क्योंकि एक तो शनि का नीचभंग होगा जो शनि को बल देगा और दूसरी ओर शुभ ग्रहो की दृष्टि का बल शनि को मिलने से शनि के अंदर शुभता और बल मिलेगा ऐसी स्थिति में शनि के फल शुभ होंगे लेकिन अब शनि की कुण्डली में भाव स्थिति क्या है? कौसे भावो का स्वामी होकर कहा बैठा है आदि उसी अनुसार फल देगा।इस तरह से शनि का नीचभंग कुंडली में कैसे हो रहा है और किस तरह से इन सब पर शनि के नीचभंग के फल मिलेंगे और सबसे मुख्य बात राजयोग नीचभंग होने पर तब ही मिलेगा जब नीचभंग और नीचभंग करने वाले ग्रह की स्थिति भी शुभ होगी।

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