राहू-केतु विशेष विचारणीय सम्पूर्ण विवेचन

 

राहू-केतु विशेष विचारणीय सम्पूर्ण विवेचन 

ज्योतिष में कुंडली देखते समय राहू-केतु का गहन विचार भी परम आवश्यक है। क्योंकि ये विलक्षण ग्रह हैं तथा दीर्घकालिक/आकस्मिक/गम्भीर रोगों में इनमें से किसी की प्छटव्स्टम्डम्छज् अवश्य होती है।

      तथ्य 1-राहू-केतु सदैव वक्री तथा एक-दूसरे से 180 पर रहते हैं, यह पाठकों को याद होगा। सदा वक्री होने से अंगों या वस्तुओं का टेढ़ा/वक्र करने का गुण इन्हीं दो ग्रहों में पाया जाता है। जैसे अस्थिवक्रता (हाथ/पैर/गर्दन/उंगली आदि टेढ़े होना), दांतों का वक्र/टेढ़ा होना तथा दृष्टिवक्रता (भेंगापन) आदि में राहू/केतु का प्रभाव अवश्य ही शामिल होता है। (वैसे ज्योतिष में मंगल का भी एक नाम ’वक्र’ है। अतः मंगल भी कुछ परिस्थितियों में, एक हद तक टेढ़ा करने का प्रभाव रखता है।)

      तथ्य 2-राहू तथा केतु आकस्मिकता के धनी हैं। अतः अचानक होने वाले रोगों/घटनाओं-दुर्घटना, हड्डी टूटना, हार्ट अटैक, दौरा पड़ना आदि में राहू केतु का भी प्रभाव अवश्य शामिल रहता है। (विशेषकर राहू का। क्योंकि तोड़ना/भग्न करना/तोड़कर अलग करना राहू का गुण है। जबकि मंगल दुर्घना में प्छटव्स्टम् होगा तो हड्डी नहीं तोड़ेगा अपितु खून बहाएगा। घाव/कटना/चुभना/छिलना/क्षतविक्षत होना/चीरफाड़/व्च्म्त्।ज्प्व्छ होना आदि मंगल के प्रभाव से होंगे। मांस का फटना/कटना या मांसपेशियों की समस्या भी मंगल से सम्बन्ध रखती है)। हृदयाघात भी आकस्मिक रूप से होता है। किन्तु हृदय का कारक सूर्य है। अतः सूर्य पर राहू का प्रभाव, सिंह राशि तथा पांचवें भाव पर राहू केतु का प्रभाव तथा पंचमेश का भी पाप प्रभाव में होना हृदयाघात अवश्य करा देगा। इसी प्रकार अन्य रोगों में समझें।

      तथ्य 3-इसी प्रकार विषकांड में राहू की इन्वॉल्वमेंट अवश्यम्भावी है। जबकि अग्निकांड में सूर्य/मंगल की इन्वॉल्वमेंट होती है (यदि बिजली का शॉर्टसर्किट आदि होने से आग लगती है तो मंगल अन्यथा प्रायः सूर्य अग्निकांड के लिए जिम्मेदार होता है)। इसके अलावा राहू केतु में पृथकताजन्य प्रभाव भी है जो रोग के अलावा भी अन्य सभी मामलों में असर दिखाता है। शनि तथा सूर्य में भी यह प्रभाव पाया जाता है। मंगल व सूर्य में मारक प्रभाव भी रहता है। विशेषकर मंगल में। सूर्य में शोषक/दाहक प्रभाव अधिक रहता है)। राहू नशे का कारक भी हैं। तम्बाकू, मदिरा, स्मैक आदि राहू की कृपा से ही जातक के साथ चिपकते हैं। यद्यपि शनि भी कई मामलों में नशे को और ले जाता है। क्योंकि शनिवत् राहू कुजवत् केतु सूत्र के अनुसार शनि व राहू तथा मंगल व केतु के स्वभाव व गुण प्रायः समान ही होते हैं।

      नियम 1-राहू व केतु जिन राशियों में बैठते हैं (फलित ज्योतिष के अनुसार अकेले होने पर उन राशियों के अनुसार ही फल अधिक देते हैं । परन्तु रोग ज्योतिष इससे एक कदम आगे की बात करता है)। उन राशियों के स्वामी भी राहू केतु के प्रभाव को अपनी दृष्टि में धारण करके अपने प्रभाव के साथ दृष्ट ग्रह/भाव पर डालते हैं। (क्योंकि राहू-केतु छाया ग्रह होने से स्वयं किसी राशि के स्वामी नहीं हैं।) उदाहरण के लिए राहू यदि कर्क राशि में हो तो चन्द्रमा को अपने प्रभाव से दूषित कर देगा। ऐसी स्थिति में चन्द्र यदि शुक्र के साथ बैठा हो या शुक्र पर दृष्टि डाले तो स्वभाव से सौम्य तथा किसी से शत्रुता न रखने के बाद भी चन्द्रमः शुक्र पर राहू का पृथकताजन्य प्रभाव डालेगा तथा जातक को पत्नी/कामसुख से पृथक करने की दिशा में सक्रिय होगा।

      नियम 2-राहू व केतु जिन ग्रहों के साथ युति करें या जिन ग्रहों से दृष्ट हों-उन ग्रहों का प्रभाव भी स्वयं में धारण कर लेते हैं (क्योंकि वे छायाग्रह हैं) और अपनी दृष्टि द्वारा उनका प्रभाव भी दृष्ट भाव/ग्रह पर डालते हैं। उदाहरण के लिए राहू यदि मंगल के साथ युति करे या मंगल से दृष्ट हो और स्वयं गुरु को देखे तो राहू के अपने पृथकताजन्य प्रभाव में मंगल का मरणात्मक प्रभाव भी शामिल होकर गुरु पर पड़ेगा। नतीजे के तौर पर गुरु जिनका कारक/प्रतिनिधि होगा (जैसे बड़ा भाई, पुत्र, पति अथवा यकृत, नितम्ब, पीट आदि)-उनकी आयु/टिकाऊपन में बहुत हद तक हानि होगी। यदि उनसे सम्बन्धित भाव, भावेश, राशि तथा राशिपति भी पाप प्रभाव में हुए तो उनको खोना पड़ सकता है, या उनको भीषण कष्ट/मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है। अथवा वे गम्भीर रूप से रोग ग्रस्त हो सकते हैं।

      अतः रोग ज्योतिष में तो खासकर राहू व केतु पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है (मैंने तो फलित ज्योतिष में भी मात्र राहू-केतु की ही स्थिति, दृष्टि व युति आदि का विचार करके सम्पूर्ण फलादेश करने वाले सुयोग्य ज्योतिषी देखे हैं। जिनका फलकथन मात्र इन दो ग्रहों के ही अध्ययन मात्र से सटीक निकलता है)। अतः इनको छायाग्रह समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनका विशेष अध्ययन अनिवार्य है।

राहु बनाता है चतुर राजनेता

राहु बनाता है चतुर राजनेता राजनीति एक ऐसा क्षेत्र बनता जा रहा है, जहाँ कम परिश्रम में भरपूर पैसा व प्रसिद्धि दोनों ही प्राप्त होते हैं। ढेरों सुख-सुविधाएँ अलग से मिलती ही है। और मजा ये कि इसमें प्रवेश के लिए किसी विशेष शैक्षणिक योग्यता की भी जरूरत नहीं होती। राजनीति में जाने के लिए भी कुंडली में कुछ विशेष ग्रहों का प्रबल होना जरूरी है। राहु को राजनीति का ग्रह माना जाता है। यदि इसका दशम भाव से संबंध हो या यह स्वयं दशम में हो तो व्यक्ति धूर्त राजनीति करता है। अनेक तिकड़मों और विवादों में फँसकर भी अपना वर्चस्व कायम रखता है। राहु यदि उच्च का होकर लग्न से संबंध रखता हो तब भी व्यक्ति चालाक होता है। राजनीति के लिए दूसरा ग्रह है गुरु- गुरु यदि उच्च का होकर दशम से संबंध करें, या दशम को देखें तो व्यक्ति बुद्धि के बल पर अपना स्थान बनाता है। ये व्यक्ति जन साधारण के मन में अपना स्थान बनाते हैं। चालाकी की नहीं वरन् तर्कशील, सत्य प्रधान राजनीति करते हैं। बुध के प्रबल होने पर दशम से संबंध रखने पर व्यक्ति अच्छा वक्ता होता है। बुध गुरु दोनों प्रबल होने पर वाणी में ओज व विद्वत्ता का समन्वय होता है। ऐसे व्यक्तियों की भाषण कला लोकप्रिय होती है। उसी के बल पर वे जनमानस में अपना स्थान बनाते हैं। हमेशा की तरह राजनीति में भी चमकने के लिए सूर्य का प्रबल होना जरूरी है। सूर्य लग्न, चतुर्थ, नवम या दशम में हो तो व्यक्ति उच्च पद को आसीन होता है, राजनीतिक पटल पर उभरता है और लोगों के मन पर राज करता है। यदि कुंडली में कारक ग्रह शनि हो (वृषभ, तुला लग्न में) तो शनि का मजबूत होना जरूरी है। शनि स्थायित्व, स्थिरता देता है। शनि प्रधान ऐसे व्यक्तियों को धर्म व न्याय का साथ देना चाहिए, सत्य की राजनीति करना चाहिए अन्यथा शनि का कोप उन्हें धरातल पर ला फेंक सकता है। इस प्रकार कुंडली का निरीक्षण कर संबंधित ग्रहों को मजबूत किया जा सकता है और राजनीति में परचम लहराए जा सकते हैं।

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