ज्योतिष गणित खंड
ज्योतिष गणित खंड
यहां हम कुण्डली निर्माण के विषय में संक्षिप्त चर्चा करेंगे। सामान्यतः सड़क छाप ज्योतिषियों या मंदिर के पंडितों द्वारा जो जन्मकुण्डलियां बनाई जाती हैं.-उनको ’टेवा’ कहा जाता है। यद्यपि वे शुद्ध नहीं होते तथा सूक्ष्म रूप से सही भी नहीं होते फिर भी स्थूल रूप से वो कम से कम विवाह के समय पेलापक विचार में काम आ जाते हैं। इसके अलावा टेवों का अन्य विशेष उपयोग नहीं होता। भ्रमवश जातक उसे ही जन्मकुंडली समझ लेते हैं।टेवा-टेवा बनाने की विधि बहुत सरल है। जिस वर्ष जातक का जन्म हुआ है, उस वर्ष का पंचांग देखकर सब ग्रहों को उनकी तात्कालिक राशियों में बैठा दिया जाता है। (वह सब प्रत्येक दिन के प्रातः 5ः30 बजे के ’ग्रह स्पष्ट तालिका’ जो पंचांग में दी गई होती है-द्वारा सरलता से जाना जा सकता है। ’दैनिक लग्न सारिणी’ भी पंचांग में प्रतिदिन की उपलब्ध होती है। जिसके द्वारा जन्म समय का लग्न निर्धारण सहज ही हो जाता है-इस प्रकार टेवा तैयार करने में 5 मिनट भी नहीं लगते, परन्तु टेवे के हिसाब से किए गए फलादेश व उपाय कभी सटीक नहीं होते, क्योंकि वे अशुद्ध होते हैं।
टेवों में न तो लग्न शुद्धि किया जाता है, न समय शुद्धि की जाती है, न भाव स्पष्ट तथा ग्रह स्पष्ट किए जाते हैं और प्रायरू ग्रहों की दशा अन्तर्दशा का बोध भी नहीं कराया जाता। अतः टेवों की विश्वसनीयता सदैव संदिग्ध होती है। टेवों के कारण ही किया गया फलादेश गलत निकलता है तथा उपाय लाभ नहीं कर पाते। परिणामतरू ज्योतिषशास्त्र पर अश्रद्धा और अविश्वास उत्पन्न होता है। अतः सही फलादेश और सटीक उपायों के निर्धारण के लिए अति आवश्यक है कि जन्मकुण्डली को पूर्णतः तथा शुद्ध रूप से बनाया जाए, न कि टेवा बनाकर काम चला दिया जाए। आगे हम शुद्ध व पूर्ण कुंडली बनाने की विधि कहेंगे।
शुद्ध लग्न ज्ञात करना
शुद्ध व सम्पूर्ण कुण्डली निर्माण की प्रामाणिक विधि
शुद्ध कुंडली बनाने के लिए सर्वप्रथम समय शुद्धि तथा स्थान शुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। कुंडली निर्माण के लिए हमें जातक से तीन प्रामाणिक व सटीक सूचनाएं चाहिए। (यह जितनी सटीक होंगी, कुंडली उतनी ही सटीक बनेगी)
1. जन्म समय (ज्प्डम् व्थ् ठप्त्ज्भ्) ज्ण्व्ण्ठण्
2. जन्म तिथि (क्।ज्म् व्थ् ठप्त्ज्भ्) क्ण्व्ण्ठण्
3. जन्म स्थान (च्स्।ब्म् व्थ् ठप्त्ज्भ्) त्ण्व्ण्ठण्
(प्रश्नकुंडली बनाते समय भी इन तीनों की आवश्यकता होगी। क्योंकि प्रश्न एक जातक के रूप में कब जन्मा, कहां जन्मा-इसके आधार पर प्रश्न का भविष्य/उत्तर ज्ञात किया जाता है। किन्तु तब हम इन तथ्यों को क्व्फध्ज्व्फध्च्व्फ कहेंगे। यानी ठप्त्ज्भ् के स्थान पर क्वेश्चन (फनमेजपवद) आ जाएगा।
थ्।ब्.1 स्डज् करेक्शन-जो समय जातक के परिवार वाले बताते हैं। वह प्ैज् (प्छक्प्।छ ैज्।छक्।त्क् ज्प्डम्) होता है। इसे हमें स्व्ब्।स् ज्प्डम् (स्थानीय समय) में बदलना होता है। इसे हम स्थानीय समय शुद्धि/स्व्ब्।स् ज्प्डम् ब्व्त्त्म्ब्ज्प्व्छ (स्डज्) कहते हैं। इसके लिए विधि इस प्रकार है -
स्डज् ब्व्त्त्म्ब्ज्प्व्छ का आधार ज्व्ठ होता है। इसके तीन ैज्म्च्ै हैं।
1. जिस स्थान में जन्म है। वहां का लांगीट्यूट देखें। भारत का केन्द्र वाराणसी को माना गया है। वहां का लांगीट्यूट 82ः30’ है। अतः यदि जातक के जन्म स्थान का लांगीट्यूट इससे कम हो तो उसे 82ः30’ में से घटाएं। अधिक हो तो 82ः30’ में जोड़ें। (इस ैज्म्च् का आधार च्व्ठ है)। उदाहरण के लिए जातक क्म्स्भ्प् में जन्मा है। क्म्स्भ्प् का लांगीट्यूट 77ः13’ है। यह 82ः30’ से कम है। अतः इसे 82ः30’ में से घटाएंगे। उत्तर आया-82ः30’ (-) 77ः13’ = 5ः17’ उदाहरण-क्व्ठ.5.5.02, ज्व्ठ.9ः50 ।ड च्व्ठ.क्म्स्भ्प्
सूत्र-लांगीट्यूट ऑफ फ्लेस (-) जोनल लांगीट्यूट ()4
(अंश)(कला)(कला)(विकला)
सूत्र-एक डिग्री = 4 मिनट तथा एक मिनट = 4 सेकंड
अब 5: 17 को सूत्र के आधार पर बदला 5: 17
4:4
20: 68
तो 20: 68 प्राप्त हुआ यानी 21: 08
(20 $ 1ः8) इसको प्ैज् (जातक के जन्म समय में से घटाया तो उत्तर प्राप्त हुआ।
9ः50ः00 - (21ः08) 21: .8
9ः50ः00
-21: 08
9ः28ः52
इस प्रकार ’प्लेस करैक्शन’ करके हमें शुद्ध समय 9ः28ः52 प्राप्त हुआ।
त्प्ैन्स्ज् व्थ् प्.ैज्म्च् प्ै . 9रू28रू52
।। - पंचांग/अफै मरीज में मध्याह्न 12ः00 बजे का ’साम्पातिक काल/साइडेरियल टाइम (विश्व मापक समय) आकाश घड़ी के हिसाब से दिया गया होता है। या 5ः30 प्रातः के हिसाब से।
सूत्र-यदि जातक का जन्म समय ।ड है तो उसे 12 में घटा देते हैं । च्ड है तो 12 में उसे जोड़ देते हैं।
अतः उपरोक्त उदाहरण में जन्म समय क्योंकि ।ड है। अतः इसे 12 में से घटाएंगे तो उत्तर 2ः31ः08 प्राप्त होगा।
12ः00ः00
9ः28ः52 (-)
2ः31ः08
इससे पता चलता है कि जातक साइडेरियल टाइम से कितना पहले/बाद में उत्पन्न हुआ (इस ैज्म्च् का आधार क्व्ठ है)।
त्प्ैन्स्ज् व्थ् प्प् . ैज्म्च् प्ै . 2रू31रू08 ठम्थ्व्त्म् डप्क्छव्न्छ
।।।- पहला ैज्म्च् (च्व्ठ) पर आधारित था। दूसरा स्टेप (ज्व्ठ) पर आधारित था। यह तीसरा ैज्म्च् भी ज्व्ठ पर ही आधारित है। इससे भ्व्न्त्ै ब्न्त्त्म्ब्ज्प्व्छ की जाती है।
इसके लिए ’ज्।ठस्म्ै व्थ् ।ैब्म्छक्।डै’ की जरूरत पड़ेगी। उसमें च्।ळम्-5 पर ज्।ठस्म्.प्ट (ब्न्त्त्म्ब्ज्प्व्छ थ्व्त् भ्व्न्त्ै - डप्छन्ज्म्ै) दी गई है। वहां 2ः31ः08 की ब्न्त्त्म्ब्ज्प्व्छ देखी। दो घंटे की करेक्शन 20 सेकंड है। 31 मिनट की 5 सेकंड तथा 8 सेकंड के लगभग 2 सेकंड हुए। यानी-20$5$2=27 सेकंड जोड़ने पड़ेंगे (2ः31ः08 में) करेक्शन के लिए। क्योंकि ज्।ठस्म् में यह करेक्शन प्लस ($) में दी गई है। अतः 2ः31ः35 प्राप्त हुआ।
2ः31ः08
($)ः27ः
2ः31ः35
यानी-त्प्ैन्स्ज् व्थ् प्प्प् . ैज्म्च् प्ै- 2ः31ः35
अर्थात् स्डज् ब्न्त्त्म्ब्ज्प्व्छ के बाद, अथवा- त्म्ैन्स्ज् व्थ् थ्।ब्ज्व्त्-1 हमें- 2ः31ः35 मिला। इसे हम घंटे, मिनट सेकंड में ऐसे लिखेंगे।
2ीः31उः35े (थ्।ब्.1)
थ्।ब्.2 ैज्म्च्.1 अब थ्।ब्ज्व्त्.2, क्व्ठ पर आधारित है। ’ज्।ठस्म् व्थ् ।ैब्म्छक्।छज्ै’ की ज्।ठस्म्ै . प् व प्प् की मदद से यह करेक्शन की जाएगी। जो कि च्।ळम् 2,3 व 5 पर दी गई है। इनमें ज्।ठस्म्-1 दिन तथा महीनों की करैक्शन के लिए है। ज्।ठस्म्.प्प् वर्ष की करैक्शन के लिए तथा ज्।ठस्म्.प्प्प् स्थान की करैक्शन के लिए हैं। इस उदाहरण में है-टेबल-1 से हमें दिन तथा महीनों की करैक्शन 2ः50ः41 मिली। टेबल-1 से वर्ष शुद्धि हमें ($) 1ः11 मिली तथा टेबल -।।। से स्थान (दिल्ली) की शुद्धि हमें ($) 0.3 मिली। अतः इनको जोड़ने पर 2ः51ः55 आया।
अतः हम कहेंगे -
2ः50ः41
($)01ः11
2ः51ः55
त्म्ैन्स्ज् व्थ्थ्।ब्ज्व्त् . प्प्प्ै . 2भ्रू51डरू55े
ैज्म्च्.प्प् अब हम इन दोनों थ्।ब्ज्व्त्ै की मदद से म्च्व्ब्भ् (इष्टकाल) ज्ञात करेंगे। इसके लिए सूत्र इस प्रकार हैं
ईपोक = थ्।ब्.प् को थ्।ब्ज्.प्प् में से घटाएं।
अतः
2ः51ः55 (थ्।ब् . प्प् त्म्ैन्स्ज्)
(-)2ः31ः35 (थ्।ब् . प् त्म्ैन्स्ज्)
0ः20ः20
यानी म्च्व्ब्भ्/अभीष्टकाल-0ीरू20उरू20े°
यदि थ्।ब्.प्ए थ्।ब्.प्प् से बड़ा है और घटाना सम्भव नहीं है तो थ्।ब् . 1 से 24 (एक दिन) घंटे उधार लेकर थ्।ब् . प्प् को घटाना चाहिए तथा यदि ज्व्ठ (च्ड) है तो थ्।ब्.प्प् ($) थ्।ब्.1 करना चाहिए। ज्व्ठ (।ड) हो जैसा कि यहां है तो थ्।ब्.प्प् में से थ्।ब्.प् घटा देना चाहिए। जैसा कि किया गया है।
थ्।ब्ज्व्त्.3 ैज्म्च्.1. अब तीसरा कदम उठाएंगे तो म्च्व्ब्भ् (अभीष्ट काल/ईस्टम्) पर आधारित है। इसके द्वारा हमें थ्प्छ।स् त्म्ैन्स्ज् के रूप में शुद्ध लग्न ज्ञात होगा।
इस भाग में म्च्व्ब्भ् के माध्यम से ’साम्पातिक काल’ (साइडेरियल टाइम) जानने के लिए लांगीट्यूट की बजाय लेटीट्यूट की मदद लेनी होगी। (यह सभी जानकारी पंचांग/एफेमरी आदि में उपलब्ध होती है।) प्रस्तुत उदाहरण में दिल्ली का लेटीट्यूट लिया जाएगा, जो कि 28ः39’ है।
स्मरणीय तथ्य यह है कि अब तक के परिणाम घंटे, मिनट, सेकंड में थे। किन्तु अब परिणाम राशि, अंश व कला में होंगे। (अंश व कला को भी इंगलिश में मिनट व सेकंड ही कहते हैं। अतः पाठक भ्रमित न हों)। अतः हम अब श्ज्।ठस्म् व्थ्।ैब्म्छक्म्छज्ैश् में पृष्ठ 48 पर दी गई साम्पातिक काल तालिका में ’असेन्डेन्ट फॉर दिल्ली’ देखेंगे।
हमारा ईपोक-0 घंटा 20 मिनट 20 सेकंड था। पृष्ठ 48 की तालिका में हमें 0 घंटे 20 मिनट के लिए 2ः23ः37 प्राप्त हुआ। यानी 2 राशि, 23 अंश तथा 37 कला। (राशि को ैप्ळम्छ कहते हैं। अतः इसे इस प्रकार लिखेंगे- 2ेरू2337
20 सेकंड के लिए 4’ प्राप्त हुआ। इसे ऊपर जोड़ेंगे।
व्ीरू 20उ 2े रू 23 रू 37श्
20े 4 ;़द्ध
उत्तर प्राप्त हुआ- 2: 3: 41 त्म्ैन्स्ज् व्थ् ैज्म्च् . प्
इसे हम ’लग्नकाल’ (।ैब्म्छक्म्छज् व्छ म्च्व्ब्भ्) कहेंगे। इसका अर्थ हुआ दो राशि पूर्ण करके तीसरी राशि के 23 अंश व 41 कला लग्न पार कर चुका था।
ैज्म्च्.प्प् . लग्न काल प्राप्त हुआ है किन्तु यह शुद्ध नहीं है। अतः लग्न शुद्धि के लिए ’अयनांश शोधन’ (ल्म्।त् ब्न्त्त्म्ब्ज्प्व्छ) करना होगा। इसके लिए श्ज्।ठस्म्ै व्थ् ।ैब्म्छक्।छज्ैश् का च्।ळम् 6 देखेंगे।
’अयनांश शोधन’ की टेबल में 2002 की शुद्धि हमें 0ः54’ (-) प्राप्त हुई। अतः इसको लग्नकाल में से घटाएंगे -
2ः3ः41
0ः54(-)
2ः22ः47
इससे थ्प्छ।स् त्म्ैन्स्ज् के रूप में जातक का शुद्ध लग्न ज्ञात होगा। जो कि-2ः22ः47 है।
शुद्ध लग्न-2ेरू2247
इसका अर्थ जातक का जन्म मिथुन लग्न के 22ः47’ पर हुआ। (क्योंकि दो राशि- मेष, वृष पार करके तीसरी राशि मिथुन के 22ः47’ पर जातक जन्मा। सो मिथुन लग्न की कुण्डली बनेगी-
शुद्ध लग्न-2ेरू2247
नोट-जन्म दिल्ली से बाहर का हो तो उसी शहर के पंचांग की जरूरत पड़ेगी। अथवा ज्।ठस्म् व्थ् ।ैब्म्छक्म्छज् के च्।ळम्-5 तथा 101 से ब्प्ज्ल् ब्व्त्त्म्ब्ज्प्व्छ भी करेगा (अयनांश शुद्धि से पूर्व)।
इस प्रकार लग्न शुद्धि करके शुद्ध लग्न जाना जाता है। यह सब कार्य - ज्।ठस्म् व्थ् ।ैब्म्छक्म्छज् (छब् स्।भ्प्त्प्) की सहायता से किया जाता है।
अब कुंडली में ग्रहों को बैठाने/जानने के लिए हमें ’ग्रह स्पष्ट’ करने होंगे।
ग्रह स्पष्ट करना
इसके लिए हमें जन्म वर्ष के पंचांग/एफेमरी की आवश्यकता पड़ती है। सर्वप्रथम चंद्रमा फिर सूर्यादि शेष ग्रहों के अंश ज्ञात करने चाहिए।
पंचांग/एफेमरी (2002) में 5 मई को चन्द्र के ग्रह स्पष्ट देखे जो कि 9ेरू28रू13रू32ष् है। यानी जातक की जन्म तिथि पर चन्द्रमा 9 राशि पूर्ण करके दसवीं (मकर) राशि में 28 अंश, 13 कला व 32 विकला चल चुका था। किन्तु यह 5ध्5ध्02 की प्रातः 5ः30 की स्थिति है। क्योंकि पंचांग/एफेमरी के सभी ग्रह स्पष्ट प्रातः 5ः30 के दिए जाते हैं। जबकि जातक का जन्म 9ः50 का है। यानी ग्रह स्पष्ट के समय से 4 घंटे 20 मिनट बाद का। इस बीच चन्द्रमा कुछ आगे चल चुका होगा। सही स्थिति जानने के लिए चन्द्र की गति या अन्तर स्पष्ट करना होगा।
इसके लिए जन्मतिथि से अगले दिन का चन्द्र स्पष्ट देखेंगे। जो कि 10ेः10ः12ः44 था। यानी -
लांगीट्यूट ऑफ मून ऑन-5/5/02-9ः28ः13ः32
लांगीट्यूट ऑफ मून ऑन--6/5/02-10ः10ः12ः44
नीचे वाले में से ऊपर वाले को घटा दें तो चन्द्रमा का अन्तर/गति स्पष्ट हो जाएगी। जो इस प्रकार है -
मोशन ऑफ मून इन 24 अवर्स - 0ेः11ः5912
यह 24 घंटे का अंतर हुआ। हमें 4 घंटे 20 मिनट का अन्तर ज्ञात करना है। अतः इसके लिए हम एफेमरी के पीछे दी गई (च्।ळम्-156,157) स्व्ळ . ज्।ठस्म् व ।छज्प्.स्व्ळ ज्।ठस्म् का सहारा लेंगे। वहां से हमें 4 घंटे 20 मिनट का अन्तर 0ः10 प्राप्त हुआ। अतः इसे 24 घंटे के अंतर में जोड़ देंगे-
24 घंटे का चन्द्र अन्तर - 0ः11ः59ः12
4 घंटे 20 मिनट का अन्तर 0ः10 ($)
5/5/02 प्रातः 9ः50 पर चन्द्र स्पष्ट 10ेरू0रू20रू32
(1 राशि - 30 के आधार को स्मरण रखें)।
चन्द्रमा स्पष्ट होने से ज्ञात हुआ कि जातक की जन्म राशि कुम्भ है। क्योंकि जातक के जन्म के समय चन्द्रमा 10 राशि पूर्ण करके ग्यारहवीं राशि में 23 कला 32 विकला चल चुका था।
नोट-यदि चन्द्र स्पष्ट को सटीक न निकालकर प्रातः 5ः30 की ही स्थिति कुंडली में लिख दी जाती, जैसा कि ’टेवों’ में प्रायः किया जाता है तो जातक की जन्म राशि मकर होती (क्योंकि तब चन्द्रमा 9 राशि पूर्ण कर दसों में 28 अंश 13 कला 32 विकला चल चुका था)। जबकि अब कुम्भ राशि हो गई है। इस प्रकार फलादेश गलत हो जाता है।
विशेष-इसी विधि से अन्य सभी ग्रहों को स्पष्ट कर लेना चाहिए। राहू-केतु सदैव 180 के अन्तर पर ही होते हैं। अतः राहू को स्पष्ट करके 6 राशि जोड़ने पर केतु स्वतः स्पष्ट हो जाता है। (यहां स्थानाभाव के कारण हम सभी ग्रहों को स्पष्ट करके नहीं दिखा रहे हैं।) चन्द्रमा के अंश स्पष्ट तो परमावश्यक होते हैं, क्योंकि यह सर्वाधिक तीव्रगामी ग्रह है और उसी से जातक की जन्म राशि का निर्धारण होता है।
ग्रह स्पष्ट कर लेने के बाद भाव स्पष्ट भी किए जाते हैं। इसकी विधि इस प्रकार है -
भाव स्पष्ट करना
लग्न शुद्धि द्वारा हमने सटीक लग्न ज्ञात किया। ग्रहस्पष्ट द्वारा ग्रहों की सटीक स्थितियों को स्पष्ट किया। भाव स्पष्ट में हम यह देखते हैं कि औसतन 30 का होने वाला एक भाव सटीक रूप से कितने अंशों का है। अथवा कोई भाव या ग्रह सन्धि में तो नहीं आ रहा ?
नियम-1-भाव स्पष्ट करने के लिए सर्वप्रथम दशम भाव को स्पष्ट किया जाता है। यह आधारभूत नियम है।
नियम-2-दशम भाव को स्पष्ट करने का आधार अभीष्ट काल (म्च्व्ब्भ्) होता है।
यहां कुछ रमरणीय तथ्य ध्यान रखें।
ऽ लग्न निकालने में लैटिट्यूट देखना पड़ता है। जबकि भाव स्पष्ट के लिए लांगीट्यूट देखा जाता है।
ऽ म्च्व्ब्भ् घंटे, मिनट, सेकंड/घटी, पल, विपल में निकाला जाता है। जबकि भाव स्पष्ट राशि, अंश तथा कला, विकला में निकाले जाते हैं (कला, विकला को भी म्छळस्प्ैभ् में मिनट, सेकंड ही कहते हैं तथा पल-विपल को भी। पहले बता चुके हैं, पाठक भ्रमित न हों)।
ऽ ज्।ठस्म् व्थ् ।ैब्म्छक्म्छज् के पृष्ठ-48 की ज्।ठस्म् की मदद से भावों को स्पष्ट किया जाता है।
प्रश्न उठ सकता है कि लग्न ज्ञात करने के बाद सर्वप्रथम दशम भाव ही क्यों स्पष्ट करते हैं ? इसका कारण है 180 या सरल रेखा। क्योंकि एक राशि 30 की है अतः 6 राशियां 306 180°की होती हैं। अतः लग्न जानने से सातवां भाव स्वतः जाना जाता है और दशम भाव जानने से चौथा भाव स्वतः जान लिया जाता है। इस प्रकार केन्द्र के चारों भाव स्पष्ट हो जाते हैं।
विधि-ग्जी ज्।ठस्म् व्थ् ।ैब्म्छक्म्छज्ै में पीछे दिए गए भ्व्न्ैम् की टेबल द्वारा जाना। दसवां भाव- 3े.14.35 है। अयनांश शुद्धि के बाद यह - 3-13-41 हुआ।
सूत्र - दशम भाव स्पष्ट $ 6 = चतुर्थ भाव स्पष्ट
लग्न स्पष्ट $ 6 सप्तम भाव स्पष्ट
उपरोक्त सूत्र के आधार पर चौथे भाव तथा सातवें भाव को स्पष्ट कर लिया। चौथा भाव हुआ-9ेरू13रू41 (3ः13ः41$6) और सातवां हुआ-12ेरू11रू56 (6ः11ः56$6)
इस प्रकार केन्द्र के चारों भाव-1,4,7,10 स्पष्ट हुआ।
सूत्र - (ग्यारह भाव)-लग्न(-) दशम » 3 $ दशम-एकादश।
(बारह भाव)-लग्न (-) दशम » 3 $ एकादश द्वादश।
उपरोक्त सूत्र के अनुसार ग्यारहवां तथा बारहवां भाव स्पष्ट किया जाएगा। ग्यारहवां भाव स्पष्ट होने से उसमें 6 जोड़कर पांचवां तथा बारहवें में 6 जोड़कर छठा भाव स्पष्ट कर लिया जाएगा। क्योंकि जैसे दशम व चतुर्थ तथा लग्न व सप्तम आमने-सामने (180) होने के कारण एक-दूसरे से 6 राशि के अन्तर पर होते हैं।
उसी प्रकार ग्यारहवां तथा पांचवां भी और बारहवां तथा छठा भी एक-दूसरे के आमने-सामने (180) पर होने से 6 राशि के अन्तर पर होते हैं ।
सूत्र - (आठवां भाव) चतुर्थ (-) लग्न » 3 $ सप्तम अष्टम।
(नौवां भाव) चतुर्थ (-) लग्न » 3 $ अष्टम नवम।
उपरोक्त सूत्र के आधार पर आठवां तथा नौवां भाव ज्ञात करेंगे। इनसे क्रमशः 180 दूर होने के कारण परिणामों में 6 राशि जोड़ देने से क्रमशरू दूसरा तथा तीसरा भाव स्पष्ट होंगे। इस प्रकार पहले लग्न फिर दशम फिर चतुर्थ व सप्तम। फिर एकादश, द्वादश तथा पंचम व षष्ठम तथा बाद में अष्टम, नवम और द्वितीय व तृतीय भाव स्पष्ट होने से पूरी कुंडली के भाव स्पष्ट हो जाते हैं।
लग्न स्पष्ट, ग्रह स्पष्ट तथा भाव स्पष्ट कर लेने के बाद फिर सन्धि स्पष्ट करनी होती है।
सन्धि स्पष्ट करना
एक भाव के अन्त और दूसरे भाव के आरम्भ के बीच का अन्तर सन्धि है। फलित को सटीक बनाने के लिए यह जानना अति आवश्यक होता है कि कोई ग्रह कहीं सन्धि में न आ रहा हो। इसे एक्यूरेट तरीके से तब तक नहीं जाना जा सकता, जब तक कि सन्धि स्पष्ट न की जाए।
स्थूल रूप से एक राशि/भाव 30 का होता है। अतः जो ग्रह 29 से ऊपर अथवा 1 से नीचे हो उसको सन्धि में माना जाता है। परन्तु भाव स्पष्ट करने से किसी भाव के सटीक अंश ज्ञात होते हैं। तब कोई भाव 31 या 32 का अथवा 28 या 29 का भी हो सकता है। यद्यपि कुल मिलाकर बारह भाव/राशि 360 की ही होगी। परन्तु कोई भाव/राशि मामूली सी छोटी/बड़ी भी हो जाती है। अतः सन्धि स्पष्ट अवश्य करनी चाहिए अन्यथा फलित सटीक नहीं होता।
सन्धि सूत्र- प्रथम भाव (-) दशम भाव (») 6 = सन्धि ।
अथवा-प्रथम (-) दशम (») 3 (») 2 = सन्धि ।
नियम-सन्धि को भाव में जोड़ने पर भाव की सन्धि ज्ञात हो जाती है।
उदाहरण के लिए प्रथम भाव-6े.11.56 है और दशम भाव 3े.13.41 हैं। तो प्रथम भाव की सन्धि-6े.27.13.30 तथा दशम भाव की सन्धि- 3े.28.23.30 होगी। यानी पहला व दशम भाव पूरे 30 के न होकर क्रमश- 27.13.30 के तथा 28.23.30 के होंगे। (यानी प्रथम भाव में 26) या 27 का ग्रह भी सन्धि में होगा। जबकि 1 का संधि में नहीं होगा और दशम भाव में 27) का ग्रह भी सन्धि में होगा। जबकि 1) का नहीं होगा।) इसी प्रकार सब भावों की सन्धि स्पष्ट की जानी चाहिए।
यह सम्पूर्ण व सटीक लग्नकुंडली बनाने की विधि है। आजकल इतने झमेले में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। कम्प्यूटरकृत कुडली 5 मिनट में तैयार हो जाती है। केवल विश्वसनीयता के लिए सूर्य, चन्द्र आदि की स्थिति से कुण्डली को क्रॉस-चेक कर लेना चाहिए। अथवा बहुत संदेह हो तो लग्न स्पष्ट करके देख लेना चाहिए। लग्न सही है तो आगे की गणना पर भी भरोसा किया जा सकता है। (बेहतर तो यह है कि कम्प्यूटर पर भी किसी प्रामाणिक तथा विश्वस्त सॉफ्टवेयर/पैकेज के माध्यम से कुण्डली बनवाई जाए ताकि विश्वसनीयता अधिकाधिक हो)।
कुंडली के ग्रहों में आने वाले 1 का अन्तर भी सटीक फल में बाधा डालता है। क्योंकि 16 वर्गों में कुंडलियां बनाते समय जब एक-एक भाव में कई खण्ड किए जाते हैं। जब 1 का अन्तर भी बहुत बड़ा हो जाता है और ग्रह किसी भाव से किसी भाव में पहुंच जाता है। अतः सटीक फलादेश के लिए गणित का सटीक होना भी उतना ही जरूरी है, जितना फलित सिद्धांतों का सटीक प्रयोग करना।
षडवर्ग/प्रमुख कुंडलियां बनाना
लग्नकुंडली के आधार पर 16 अन्य कुंडलियां भी विशेष/गहन तथा सूक्ष्म निरीक्षण के लिए बनाई जाती हैं। इनमें 6 प्रमुख होती हैं। पाठकों को पहले इनके बारे में बताया जा चुका है। यहां हम पूर्णता की दृष्टि से तथा पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए प्रमुख कुंडलियों के निर्माण की विधि भी दे रहे हैं।
लग्नकुंडली को म्छळस्प्ैभ् में क्.1 भी कहते हैं। क्योंकि इसमें डिग्री/अंश का एक ही विभाग किया जाता है। होरा कुंडली को क्.2 कहते हैं। इसमें अंश/डिग्री के दो विभाग किए जाते हैं। द्रेष्काण कुंडली को क्.3 कहते हैं। इसमें अंश के तीन विभाग होते हैं। इसी प्रकार क्रमशरू क्.4ए क्.5 आदि कुंडलियां होती हैं। सप्तमांश कुंडली क्.7, नवमांश क्.9 तथा दशमांश क्.10 आदि कहलाती हैं। क्योंकि इनमें डिग्री/अंश के उतने ही विभाग किए जाते हैं।
सूर्य या चन्द्रकुंडली में अंश विभाजित नहीं करते। मात्र सूर्य/चन्द्र को उसकी राशि सहित लग्न मानकर शेष कुंडली को छुपा दिया जाता है। इस विषय में पहले बताया जा चुका है। सुदर्शन चक्र में लग्नकुंडली, सूर्यकुंडली व चन्द्र कुंडली संयुक्त रूप से बनाई जाती है। ताकि सुदर्शन पद्धति के अनुसार फलों को कसा जा सके।
यहां हम होरा कुंडली, नवमांश कुंडली, द्रेष्काण कुंडली तथा दशमांश कुंडली को बनाना सिखाएंगे। क्योंकि ये क्रमशः धन, जीवनसाथी, भाई तथा कार्य व्यवसाय की स्थिति देखने में उपयोगी होती हैं।
होरा कुण्डली- क्.2
यह जातक के जीवन में धन को स्थिति देखने के लिए काम आती है। इस कुंडली में दो खण्ड/दो भाव ही होते हैं तथा सूर्य व चन्द्र की (5 व 4) दो ही राशियां होती हैं। अतः यह कुंडली बनानी सर्वाधिक आसान है। मात्र इसी कुण्डली में राहू तथा केतु अधिकतर एक ही भाव में, साथ-साथ आ सकते हैं।
होरा कुंडली में क्योंकि दो खण्ड (एक राशि/भाव के दो भाग) किए जाते हैं, अतः एक भाग 15 का होता है। प्रथम होरा-0 से 15 तथा दूसरी 15 से 30।
सूत्र-समराशि हो तो पहली होरा चन्द्र की दूसरी सूर्य की होगी।
विषम राशि हो तो पहली सूर्य की दूसरी चन्द्र की होरा होगी।
उदाहरण के लिए जातक की लग्न कुंडली माना इस प्रकार है
लग्न-5े.02.02
सूर्य-11-10-38
चन्द्र-5-02-03
(त्) मंगल-3-25-06
बुध-10-13-55
गुरु-8-05-04
शुक्र-0-25-04
(त्) शनि-3-23-04
राहू-0-21-36
केतु-0-21-36
लग्नकुंडली
यहां लग्न समराशि है अतः प्रथम होरा चन्द्र की व दूसरी सूर्य की होगी। इसके आधार पर प्रथम भाव में चन्द्र की राशि व दूसरे भाव में सूर्य की राशि लिखेंगे। क्योंकि लग्न के अंश प्रथम होरा 0-15 के अन्तर्गत है
अब आगे चलें -
होरा कुंडली
चन्द्र समराशि में है तथा 15 से कम है। अतः प्रथम होरा में आएगा। (सो उसे प्रथम भाव/कर्क राशि में बैठा देंगे) इसी प्रकार सूर्य समराशि में है अतः पहली होरा चन्द्र की होगी। सूर्य के अंश 15 से कम है अतः इसे भी प्रथम होरा/कर्क राशि में बैठाएंगे। मंगल भी सम राशि में है अतः थम होरा कर्क की होगी। परन्तु मंगल का अंश क्योंकि 15 से अधिक है (2506) अतः दूसरी होरा सिंह राशि में इसे बैठाना होगा। बुध विषम राशि में है, अतः प्रथम हो। सूर्य की होगी। बुध के अंश या 15 से कम है (1355) अतः इसे पहली होरा सूर्य राशि में बैठाना पड़ेगा। गुरु विषम राशि में है अतः पहली होरा सूर्य की होगी, किन्तु अंश 15 से कम है, अतः पहली होरा में जाएगा। शुक्र विषम राशि में है, अतः पहली होरा सूर्य की होगी। किन्तु अंश 15 से अधिक है अतः दूसरी होरा में जाएगा। शनि सम राशि का होने से पहली होरा चन्द्र की होगी। किन्तु अंश 15 से अधिक होने पर दूसरी होरा सिंह राशि में आएगी। राहू विषम राशि में है। अतः पहली होरा सूर्य की होगी। पर अंश 15 से अधिक है। अतः दूसरी होरा में कर्क राशि में जाएगा! केतु विषम राशि में है अतः प्रथम होरा सूर्य की होगी, किन्तु अंश 15 से अधिक होने से दूसरी होरा में कर्क राशि में जाएगा। अतः जातक की होरा कुंडली चित्रानुसार होगी।
होरा कुंडली में ग्रह स्थिति
इससे स्पष्ट है कि लग्नेश चन्द्र (मन) तथा सूर्य (आत्मा) दोनों शत्रुओं के बीच घिरे होने से धन की स्थिति अच्छी न रहेगी।
नवमांश कुंडली-क्-9
नवमांश कुंडली यद्यपि जीवनसाथी के लिए होती है। किन्तु यह इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे जातक की ’सप्लीमेंट्री’ कुंडली भी कहा जाता है। इसमें प्रत्येक राशि के 9 खण्ड करते हैं। अतः इसे क्-9 अथवा नवमांश कहा जाता है।
एक राशि क्योंकि 30 की होती है। अतः उसके 9 खण्ड करने पर एक खण्ड 3ः20 का होता है। अतरू एक नवमांश 3ः20 का होता है। नवमांश कुंडली के निर्माण सूत्र इस प्रकार है -
सूत्र - 1. यदि चर राशि हो तो-ैज्।त्ज् थ्त्व्ड प्ज् ैम्स्थ्
2. स्थिर राशि हो तो-ैज्।त्ज् थ्त्व्ड प्ग्जी भ्व्न्ैम्
3.-द्विस्वभाव राशि हो तो-ैज्।त्ज् थ्त्व्ड टजी भ्व्न्ैम्
नवमांश विभाजन
प्रथम नवमांश- 0 से 320 तक
द्वितीय नवमांश- 320 से 640 तक
तृतीय नवमांश- 640 से 1000 तक
चतुर्थ नवमांश- 1000 से 1320 तक
पंचम नवमांश- 1320 से 1640 तक
पार नवमांश- 1640 से 2000 तक
सप्तम नवमांश- 2000 से 2320 तक
आष्टम नवमांश- 2320 से 2640 तक
नवम नवमांश- 2640 से 3000 तक
उपरोक्त विधि के अनुसार नवमांश कुंडली बनानी चाहिए। इसके अलावा एक और विधि है-उसके अनुसार जिस ग्रह की जितनी राशि गुजर चुकी है। उसे 9 से गुणा करें । जो फल आएगा वही नवमांश चल रहा होगा। उन दोनों को जमा करके बारह से भाग दें। शेष फल ही उत्तर होगा। इसी सूत्र से लग्न तथा गृह स्थिति भी निकाली जाती है। सूत्र इस प्रकार है -
सूत्र- गुजरी राशि 9 वर्तमान नवमांश
गुजरी राशि $ वर्तमान नवमांश » 12 (शेष फल ही उत्तर)
विशेष-लग्न कुंडली तथा नवमांश में जो ग्रह उसी राशि में जहां का तहां रहे वह ’वर्गोत्तम’ कहा जाता है।
उदाहरण-जिस लग्नकुंडली की हमने होरा कुंडली बनाई थी। उसी की नवमांश कुंडली इस प्रकार होगी -
नवमांश कुंडली
चन्द्र द्विस्वभाव राशि में है। अतः 5वें भाव से गिनेंगे। दूसरे शब्दों में चन्द्र अपनी राशि से 5 राशि आगे जाएगा। यानी दसवीं राशि से। चन्द्र के अंश 2-03 हैं। यानी वह प्रथम नवमांश 3-20 के भीतर है। अतः वहीं यानी दसवीं राशि में ही रहेगा। लग्न भी द्विस्वभाव है। अतरू अपने से 5वीं राशि आगे जाएगा। अंश प्रथम नवमांश के भीतर है। अतः दसवीं राशि में ही रहेगा।
शनि कर्क (चर) राशि में है अतः ैज्।त्ज् थ्त्व्ड प्ज् ैम्स्थ् के अनुसार वहीं से आरम्भ होगा। किन्तु उसके अंश सातवें नवमांश में हैं (23-4 है जो सातवें नवमांश-20-00 से 23-20 के अन्तर्गत आते हैं)। अतः अपने से 7 राशि आगे जाने के कारण यह भी दसवीं राशि में ही आएगा। इसी प्रकार सूर्य द्विस्वभाव राशि में है। अतः 5 राशि आगे आएगा (कर्क में)। सूर्य के अंश चौथे नवमांश में हैं। अतः कर्क से 4 आगे गिनने पर सातवीं राशि में आएगा। गुरु भी द्विस्वभाव राशि में है तथा दूसरे नवमांश में है। अतः 5 राशि आगे मेष से दो आगे गिनने पर वृष राशि आएगा। मंगल चर राशि में है। अतः वहीं रहेगा, परन्तु अंश आठवें नवमांश में है। अतः अपने से 8 आगे होकर ग्यारहवीं राशि में आएगा। इसी प्रकार शेष ग्रहों को भी पाठक स्वतः (अभ्यास के लिए) नवमांश कुंडली में स्थापित करें (बुध, शुक्र, राहू, केतु को) तो नवमांश कुंडली पूर्ण होगी। पूर्णता को जांचने के लिए नवमांश कुंडली हम यहां पर दे रहे हैं
नोट-यहां बुध लग्न कुंडली में भी कुम्भ राशि में है और नवमांश में भी कुम्भ में ही है। अतः ’वर्गोत्तम’ कहलाएगा।
द्रेष्काण कुंडली- क्.3
जातक के छोटे भाई-बहनों की स्थिति अथवा उनसे जातक का सम्बन्ध कैसा रहेगा, यह विचारने के लिए द्रेष्काण कुंडली- क्.3 की आवश्यकता पड़ती है। जैसा कि बता चुके हैं। इसमें एक राशि के तीन विभाग करते हैं। अतः एक द्रेष्काण 10 का होता है।
प्रथम द्रेष्काण-010 तक
दूसरा द्रेष्काण-1020 तक
तीसरा द्रेष्काण-2030तक
सूत्र
1. प्रथम द्रेष्काण-ैज्।त्ज् थ्त्व्ड प्ज्ैम्स्थ्
2. द्वितीय द्रेष्काण-ैज्।त्ज् थ्त्व्ड टजी भ्व्न्ैम्
3. तृतीय द्रेष्काण-ैज्।त्ज् थ्त्व्डप् ग्जी भ्व्न्ैम्
उदाहरण के लिए पीछे दी गई कुंडली की ही द्रेष्काण कुंडली इस प्रकार बनाएंगे--
लग्न प्रथम द्रेष्काण (10 से कम) में है। अतः ैज्।त्ज् थ्त्व्ड प्ज्ैम्स्थ् सूत्र के अनुसार वहीं रहेगी। यानी कन्या लग्न की ही द्रेष्काण कुंडली भी बनेगी। चन्द्र की प्रथम द्रेष्काण में होने से कन्या राशि में ही रहेगा। सूर्य दूसरे द्रेष्काण में है। अतः अपने से 5 घर आगे चौथी राशि में आ जाएगा। मंगल तीसरे द्रेष्काण में है, अतः अपने से नौवीं राशि मीन में आ जाएगा। बुध दूसरे द्रेष्काण में है अतः अपनी से पांचवीं राशि मिथुन में आएगा। जबकि गुरु प्रथम द्रेष्काण में ही होने से वहीं का वहीं यानी धनु राशि में रहेगा। शनि, शुक्र, राहू, केतु को पाठक अपने अभ्यास के लिए स्वयं द्रेष्काण कुंडली में बैठाएं। पूर्णता की जांच के लिए हम यहां पर पिछले जातक की द्रेष्काण कुंडली दे रहे हैं।
द्रेष्काण कुंडली
नोट-यहां पर चन्द्र तथा गुरु वर्गोत्तम होगा। क्योंकि वे लग्न कुंडली में भी और द्रेष्काण में भी उन्हीं राशियों में है।
दशमांश कुंडली-जातक के व्यवसाय का विचार इस कुंडली से करते हैं। इसमें एक राशी (30) के दस खण्ड किए जाते हैं। अतः एक दशमांश 3का होता है। यथा -
प्रथम दशमांश - 0 से 3
दूसरा दशमांश - 3 से 6
तीसरा दशमांश - 6 से 9
चौथा दशमांश - 9 से 12
पांचवां दशमांश - 12 से 15
छठा दशमांश - 15 से 18
सातवां दशमांश - 18 से 21
आठवां दशमांश - 21 से 24
नवां दशमांश - 24 से 27
दसवां दशमांश - 27 से 30
नियम-विषम राशि उसी भाव से प्रारंभ करें, सम राशि, नवम भाव से प्रारंभ करें।
होरा, नवमांश व द्रेष्काण कुंडलियों वाले उदाहरण की ही दशमांश कुंडली इस प्रकार बनेगी -
दशमांश कुंडली
लग्न-सम राशि प्रथम दशमांश है। अतः लग्न की राशि से नवम राशि की लग्न होगी यानि वृष लग्न।
सूर्य-समराशि चौथा दशमांश है। अतः जहां सूर्य है वहां से नौवें भाव। राशि से चतुर्थ भाव में आएगा यानी कुम्भ में।
चंद्र-समराशि प्रथम दशमांश है। अतः लग्न की भांति वृष में ही होगा।
मंगल-समराशि नवम दशमांश है। अतः अपने से नवम भाव से नवम जाएगा यानी वृश्चिक में।
बुध-विषम राशि पांचवां दशमांश है। अतः अपने भाव से पांचवें में आ जाएगा यानी मिथुन में।
गुरु-विषम राशि द्वितीय दशमांश होने से अपने से दूसरे भाव में आएगा यानी मकर में।
शुक्र-विषम राशि नवम दशमांश है। अतः अपने से नौवें भाव में यानी धनु राशि में आ जाएगा।
शनि-समराशि आठवां दशमांश है। अतः अपने से नौवें भाव से आठवें में आएगा यानी तुला में।
इसी प्रकार राहू विषम राशि आठवां नवांश होने से अपने से आठवें यानी वृश्चिक में होगा तथा केतु भी विषम राशि आठवां दशांश होने से अपने से आठवें यानी वृष में जाएगा।
सप्तमांश कुंडली-जातक की संतति के विषय में सप्तमांश कुंडली विचारी जाती है। इसमें एक राशि (30) के सात खण्ड करते हैं। अतः एक सप्तमांश लगभग 4-17-8 का होता है। यथा-
प्रथम सप्तमांश - 0 से 4-17-8 तक
दूसरा सप्तमांश - 4-17-8 से 8-34-16 तक
तीसरा सप्तमांश - 8-34-16 से 12-51-24 तक
चौथा सप्तमांश - 12-51-24 से 17-8-32 तक
पांचवां सप्तमांश - 17-8-32 से 21-25-40 तक
छठा सप्तमांश - 21-25-40 से 25-42-48 तक
सातवां सप्तमांश - 25-42-48 से 29-59-56 तक
नोट-अंतिम 4 विकला भी अतिसूक्ष्म होने से अंतिमध्सातवें सप्तमांश में ही जोड़ दिए जाते हैं (अतः 30 पूर्ण हो जाते हैं)।
नियम 1-विषम राशि-उसी भाव से आरम्भ करें।
नियम 2-सम राशि-सातवें भाव से आरम्भ करें
पिछले उदाहरण की ही सप्तमांश कुंडली इस प्रकार बनेगी -
सप्तमांश कुंडली
लग्न-समराशि, प्रथम सप्तमांश है। अतः अपने से सातवें भाव में आएगी यानी मीन राशि की लग्न होगी।
सूर्य-समराशि, तीसरा सप्तमांश है। अतः अपने से सातवें भाव से तीसरे भाव/राशि में आएगा। यानी वृश्चिक राशि में।
चन्द्र-समराशि, प्रथम सप्तमांश होने से लग्न की ही भांति मीन का होगा।
मंगल-सम राशि, छठा सप्तमांश है। अतः अपने से सातवें से छठे भाव में आएगा। यानी मिथुन राशि में।
बुध-विषम राशि, चौथा सप्तमांश है। अतः वहीं से चौथे भाव आएगा, जहां बैठा है यानी वृष में।
गुरु-विषम राशि, दूसरा सप्तमांश है। अतः अपने से दूसरे यानी मकर में आएगा।
शुक्र-विषम राशि, छठा सप्तमांश है। अतः अपने से छठे भाव में यानी कन्या राशि में आएगा।
शनि-समराशि, छठा सप्तमांश है। अतः अपने से सातवें भाव से छठे भाव में आएगा। यानी मिथुन में।
राहू-विषम राशि, छठा सप्तमांश है। अतः अपने से छठे यानी कन्या राशि में आएगा। इसी प्रकार केतु
केतु-विषम राशि, छठा सप्तमांश होने से अपने से छठे भाव यानी मीन राशि में आ जाएगा।