कर्म और भाग्य को लेकर एक द्वंद का विवेचन

 कर्म और भाग्य को लेकर एक द्वंद का विवेचन


उद्योगिनं पुरूषसिंहमुपैति लक्ष्मी ,

दैवं हि दैवम् इति कापुरूषा वदन्ति ।

दैवं निहत्य कुरू पौरूषम् आत्मशक्त्या,

यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोअत्र दोष: ।।

कर्मवादी कहते हैं उद्योगिनं पुरुष सिंह मुपैति लक्ष्मी अर्थात सोते हुए सिंह के मुँह में कही कोई मृग आ सकते हैं ?

और

भाग्यवादी कहते हैं "भाग्यं फलति सर्वत्र न च विद्या न च पौरुषं " अर्थात भाग्य ही सर्वत्र होता है जिसके सामने विद्या और पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो जाते हैं

"भाग्य कर्म का ही फल होता है, हां,

कर्म का फल होता है - कुछ फल तुरंत मिलता है, कुछ फल बाद में ! जैसे - खाना खाया (कर्म) तुरंत फल - भूख मिटना, बाद का फल - स्वास्थ्य लाभ या स्वास्थ्य हानि , शौच ( मल-मूत्र आदि) !

ऐसे ही कई कर्म, अन्य कर्मों के जनक हो जाते हैं ! जैसे - स्वास्थ्य हानि हुई - प्रदूषण होगा, रोग का इलाज ( कर्म) !

जो हमारा आज या अभी का किया नहीं है, उसमे कोई बाहरी परिस्थिति अवस्था या आभाव उसपर काम करके उसे विफल करदेगा या कम या बिना कुछ किये प्राप्त हो वो ये अकस्मात् प्रभाव हमारा भोग बन जाता है , ‘ प्रारब्ध’ ( भाग्य) कहलाता है !

भाग्य को भाग (हिस्सा) भी कह सकते हैं ! जो पहले (पूर्व जन्मों) से लेकर आजतक के हमारे कर्मों तथा हमारे द्वारा प्रभावितों के कर्मों से, समय और परिस्थिति अनुसार उत्पन्न हो रहे, फलों का हमारा हिस्सा हमारा भाग्य है !

कर्मों से भाग्य का निर्माण होता है !ईस तर्क से तो एक नया तर्क निकलेगा अत: कर्मों से भाग्य में परिवर्तन कर सकते हैं !

चूँकि भाग्य में हमारा वश नहीं है , परंतु कर्म में हमारा वश है !पूर्वजन्म से भी संबद्ध होने के कारण लोग इसके रहस्य को समझ नहीं पाते किन्तु मनुष्य का एक कर्त्तव्य है की पूर्व जन्म या पूर्व कर्म का निस्तारण इस जन्म में करे सुकर्म अकरम और कर्मकांड से और वेदो के अंग ज्योतिष, आयुर्वेद आदि प्राच्य विद्याओ से ...जो आपको सही समय आपकी स्थिति और परिस्तिति के अनुसार एक रोड मैप तैयार करने में मदद करता है फिर आप कर्म करे अत: इच्छानुकूल भ(परिणाम) के लिये , उचित कर्मों का चयन व संपादित कर, अपना भाग्य विधाताबना जा सकता है !

कर्म वर्तमान है, भाग्य भूतकालिक है ! और हम वर्तमान में रहते हैं, अतएव वर्तमान कर्मों को सुधारिये, व आने वाला भविष्य) सुधरा मिलेगा ! भाग्य, भोग्तितिक्षा अनुसार भोग लीजिये ! आगे भी वर्तमान कालिक कर्म, भाग्य रूप में मिलेंगे !

अत: भविष्य का भाग्य आज के कर्म से बदला जा सकता है !

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

जैसे सोते हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते, सिंह को शिकार करना पड़ता है, वैसे ही किसी कार्य की मात्र इच्छा करने से वह सिद्ध नहीं होता, उद्यम करने से ही सिद्ध होता है।

कर्म तो है ही सभी लोग स्वाश लेते है ये भी एक कर्म है कैसे असंख्यों कर्म है

जो विवेकपूर्ण शास्त्र सम्मत लोकहित धर्मानुकूल और ज्ञानोचित हो और जिसकी आवश्यता ही वो निष्काम भाव से किया गया कर्म अकर्म होजाता है

जिसका कोई दोष नहीं लगता और पुण्य उदै होता है

जो कर्म स्वयं के लाभ या व्यक्तिगत लाभ और अहंकार या स्वयं को ही सही सिद्ध करने या किसी को ठेस पोहचाने या स्वयं की प्रभुता हेतु किये जाये जो शास्त्र सम्मत नहीं और प्रकृति और सृष्टि को आहात करे और मनमाने ढंग से स्वयं की प्रक्रिया, स्वयंभू और अहंकार या ईर्ष्यातमक प्रतिस्पर्धा से करे वो विकर्म कहलायेंगे और ये स्वयं के साथ दुसरो को भी हानि पोहोचायेगा

इसलिए लोकहित करे लोकप्रेम करे लोकसंग्रह करे और स्वयं को विद्यार्थी की तरह विनम्र रखे और विनम्र का मतलब स्पर्धा रोष क्रोध नहीं आनंदित होना है

जीवन रथ न तो केवल भाग्य के पहिये से चलता न हीं केवल कर्म के पहिये से, वह सही से चलता है तो ज्ञान कर्म दोनों के सापेक्ष और सामजस्य और संगठन के साथ सामान आवृतन और गति एवं एक दशा और दिशा से चलने पर निश्चित, ऐच्छिक विजयश्री प्राप्ती की संभावना अत्यधिक बढ़जाती है,

ज्योतिष कर्म से विमुख होने का शास्त्र ही नहीं, जो लोग,इसे नहीं समझते वे इसे मिथ्या मानते है जबकि ये एक कार्मिक शास्त्र है, ज्योतिष आपको सही कर्म करने को प्रेरित करता है और दशा दिशा का निर्देशन करता है, आप कर्म करिये और भाग्य साथ न दे तो भी कुछ न मिलेगा, और भाग्य चमकाए और कर्म ही न करे तो भी कुछ हासिल न होगा , इस लिए कर्म कीजिये किन्तु ज्ञान और भाग्य को धारण करके इसी भाग्य रुपी प्रकाश रश्मियों से त्वरित लाभ के लिए प्रकृति देवी ने रत्न बनाये है उन्हें जन्म कुंडली के सही निर्धारण, और सही गणना से एकसाथ धारण करने पर लाभ की मात्रा और सफलता की सम्भावना अत्यधिक बढ़ जाती है l

हम और आप सभी व्यक्ति अपनी-अपनी बुद्धि अनुसार कर्म करते हैं लेकिन जब कोई व्यक्ति आपको कर्म की सही दिशा दिखाएं तो भाग्य भी साथ देने लगता है, या स्वयं खुद की जाग्रति से भी अपने भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान और नियोजन करना भी हमें नर से नारायण बना देता है

अपनी ग्रह दशा के अनुसार , अपनी जन्म कुंडली के अ कर्म करने लगा जिसके कारण भाग्य ने मेरा साथ दिया और मुझे सफलता पर सफलता कर्म ( सही दिशा में कर्म ) करके भाग्य द्वारा मिलती गई , कर्म जरूरी है लेकिन सही दिशा में कर्म भाग्य बनता है ज्योतिष उस दिए की तरह है जो मार्ग में रौशनी दिखाए कुंडली से कर्मो के कारण जनित दोषो का वैदिक और सनातनिक ढंग से निस्तारण करके उनका क्षमन होता है ...जिस प्रकार डॉक्टर हकीम वकील या मास्टर आपको गाइड करता है आपके प्रोफाइल को देख कर उसी प्रकार ज्योतिष भी सफल सुफल और चैतन्य जीवन को प्रदर्शित करता है राजा महाराज के समय में ज्योतिष मुख्य विभाग था और राज ज्योतिष का परामर्श सभी कार्यो और निर्णय में प्रयोग लिया जाता है ...

भाग्य कुछ नहीं है केवल कर्म ही है ऐसा कहने वालों का मत केवल मेहनती पुरुष के पास ही सदैव लक्ष्मी जाती है तो मज़दूर अमीर क्यों और ठेकेदार पैसे वाला कैसे

इसलिए भाग्य और कर्म रथ के हिस्से है एक में घोड़े जूते है पीछे दो पहिये है

घोड़े कर्म है, पहिये भाग्य, सारथि बुद्धि, वल्गाएँ विवेक और रथी आत्मा है

अब कर्म करने वाले घोड़े खूब दौड़े तो वो खायी में फेक देंगे तो सारथि उनको कण्ट्रोल करेगा ये है मन और उसकी बुद्धि

वो उन घोड़ो की दिशाए बदल देगा वल्गाओ को चयन करके खींचने से ...

यहाँ तक कर्म बुद्धि और ज्ञान साथ है किन्तु अगर रथ का पहिया खुलके टूट जाये तो ...क्या ...ये पहिये भाग्य है मित्र

कर्म के साथ भाग्य को मानने वाले लोगों का मत :- भाग्यं फलति सर्वत्र ,न च विद्या न पौरुषम्।।

कहा गया है -

समुद्र-मथने लेभे हरिःलक्ष्मीं हरो विषम्।

भाग्यं फलति सर्वत्र ,न च विद्या न पौरुषम्।।

अर्थात् समुद्र-मंथन में विष्णु को लक्ष्मी मिलीं और शिव को विष. मायने यह कि भाग्य का ही फल सभी जगह मिलता है, विद्या और उद्योग का नहीं.

(कर्म तो दोनों भगवानों का सामान्य है एक को लक्ष्मी दूसरे को विश की प्राप्ति हुई)

इसलिये भाग्य और कर्ममिलकर, मनुष्य के भविष्य का भाग्य निर्धारित होता है! और यह क्रम हमेशा से चलते आ रहा है ! और चलता रहेगा !

ज्योतिष का प्रयोग तो वैद्य की चिकित्सा की तरह आपको बीमार ही न होने देना ऐसा प्रबंध है ....जो आप को वर्तमान परिस्थिति में कब कैसा कौनसा कर्म किस प्रक्रिया से और कौशल के साथ सिद्ध करे

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