भाव भावेश एवं योग BHAV एवं YOG

भाव भावेश एवं योग BHAV एवं YOG


भाव योग BHAV YOG कुण्डली पर दृष्टिपात करते ही  जिज्ञासा यह ज्ञात करने की होती है कि ग्रहो मे, राशियो मे कौनसी विशिष्टता है, उनकी स्थिति क्या इंगित करती है। यही योग है। कुण्डली मे व्याप्त योग की गुणवत्ता कितनी है। वह कितना प्रभावकारी है, इसका आकलन भी आवश्यक है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि मानव की जिज्ञासा ने ही उसे ज्योतिष शास्त्र की इस ‘‘योग’’ विधा की ओर प्रवृत्त किया। मानव ने आकाशीय ग्रह-पिण्डो का अध्ययन कर उसके निश्चित सिद्धान्त प्रतिपादित किये।

कालान्तर मे हमारे ऋषि गण ज्योतिविज्ञान की अनेकानेक गुत्थिया सुलझाते गये तब जो सत्य प्राद्भूत हुआ, वह अनिर्वचनीय और सत्यता के अधिकाधिक सन्निकट था। ग्रहो के माध्यम से भूत, वर्तमान और भविष्य उनके समक्ष स्वयम् साकार हो गये और इसी तत्व को समझने के कारण वे ‘‘दिव्यद्रष्टा’’ ऋषि कहलाये।

किसी भी विधा के सिद्धान्त समझ लेने मात्र से उस विधा मे पारंगत नही हुआ जा सकता, उसके साथ-साथ प्रयोगो की महत्ता भी अनिवार्य है तभी वह विधा व्यवहार मे सटीक उतरती है। 

कुण्डली अपने आप मे जीवन का सम्पूर्ण चित्र है। इसके बारह भाव मानव जीवन की समस्त आवश्यकता को समेट लेते है, लेकिन जब तक सिद्धान्तो के आधार पर प्रयोगो की सहयता से रहस्यो को स्पष्ट न किया जाय, कुण्डली रहस्यात्मक बनी रहती है। आर्ष ऋषियो, आचार्यो ने इन रहस्यो को स्पष्ट करने के लिये योगो का सहारा लिया। 

यहा यह भी आकलन आवश्यक है कि कुण्डली का स्तर क्या है। जैसे एक निर्धन, एक सामान्य धनी और एक महाधनी तीनो जातक की कुण्डली मे ‘‘राजयोग’’ है, तो क्या तीनो जातक मे राजयोग का फल समान होगा या अलग-अलग होगा? वस्तुतः अनुभव मे यही आता है कि तीनो जातक मे राजयोग का फल और प्रभाव भिन्न भिन्न होगा। 

जिज्ञासा वश प्रश्न है क्यो? इसके कई कारण है जैसे कुण्डली और नवांश मे भिन्न-भिन्न लग्न, ग्रहो की अलग-अलग स्थिति व बलबलादि राजयोग के विभिन्न प्रकार, राशियो के ग्रहो से सम्बन्ध, अन्य योगादि। 

योग मुख्यतः तीन प्रकार से बनते है:-

1. ग्रहो का ग्रहो से सम्बन्ध होने पर।

2. ग्रहो का राशियो से सम्बन्ध होने पर।

3. राशियो का राशियो से सम्बन्ध होने पर।

राशि तथा ग्रहो से बनकर योग मानव-कुण्डली पर विशेष प्रभाव रखते

है। इन योगो मे भी मुख्यतः तीन प्रकार के होते है।

1. शुभ योग, 2. अशुभ योग, 3. राजयोग। 

योग                                           

ज्योतिषियो का नित्य अनुभव है कि यदि कुण्डली से देखा जावे तो जातक की स्थिति सामान्य दिखाई देती है किन्तु वास्तविक परिस्थिति अत्युत्तम रहती है। साथ ही अत्युत्तम कुण्डली होकर भी प्रत्यक्ष परिस्थिति विपरीत रहती है। यह ऐसा क्यो? इस विचित्रता का कारण क्या है? 

 जातक के जन्म के पूर्व जो जो शुभाशुभ कर्म है उसका अथवा उसके धर के व्यक्तियो का उसके ऊपर पडता प्रभाव है। जातक की कुण्डली पर उसकी धर्मपत्नी की कुण्डली का प्रभाव और परिणाम भी होता है। जातक के पूर्वजो का किये-धरे का भी परिणाम भी उस पर होता रहता है। 

जातक की कुण्डली का निरीक्षण ग्रहो पर से किया जाता है परन्तु भाव गत ग्रह तथा महादशा से कुछ भी बोध नही हो पाता है। इससे निश्चितीकरण कठिन है। इस कारण ग्रहो के परस्पर बने सम्बन्ध भी देखना आवश्यक है। इसलिये ग्रह योगो का महत्व प्रबल है अतएव कुण्डली मे निहित योगो का अध्ययन कर तदनुसार ही फलाफल स्पष्ट करे। 

प्राचीन आचार्यो ने राशि चक्र (भगण) के 360 अंश माने तथा उन अंशो के विभाग निर्मित किये जिन्हे योग संज्ञा दी गई है। 360 अंशो को 1-2-3-4-5-6-7-8-9-10-11-12 अंको से विभाजित कर जहा शेष शून्य रहे, वह योग रूप मे माना गया। 

(1) 0 अथवा 1 से 360 को विभाजित किया जाय तो निःशेष विभाजन होकर भागाकार वही आता है। यह युति है याने दोनो ग्रह एक ही अंश पर या एक ही भाव मे होते है। 0 से जगत निर्माण हुआ है। अर्थात युति सर्व योगो की आद्य जननी है। 0-1 दोनो परब्रम्ह है। इस पर सूर्य का अधिकार होने से यह योग सकारात्मक कहलाता है। कुण्डली मे जिस प्रमाण मे शुभाशुभ ग्रहो की युति सम्भव है उस प्रमाण मे फल प्राप्ति सम्भव है। द्विग्रह, त्रिग्रह, चतुग्र्रह, पंचग्रह और षष्ठग्रह की युति के अलग-अलग फल शास्त्रकारो ने विस्तार से बताये है। 

(2) अंक 2 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 180 आता है। यह 360 के विरुद्ध दिशा मे है इसे प्रतियोग कहते है। यह भी युति योग के समान ही तीव्र है परन्तु यह नकारात्मक योग कहलाता है। इस प्रतियोग मे एक परिणाम स्पष्ट दिखाई देता है वह यह है कि एक ओर संरक्षण तो दूसरी ओर नाश है। इस कारण इस पर चन्द्रमा का अधिकार है। इसको माया भी कहते है। अपने संरक्षण मे सामने जो है उसका नाश करना पडेगा। उपर्युक्त दोनो योगो मे आयु दौड-धूप करते करते बिताना है। 

(3) अंक 3 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 120 आता है। इसे पंचम योग कहते है। यह परब्रम्ह$माया अथवा इन दोनो से त्रिगुण की उत्पत्ति सम्भव हुई है। त्रिगुण (1$1$1) का द्योतक है। इस पर मंगल का अधिकार है। इसे अत्यन्त शुभ योग मानते है। यह योग दर्शाता है कि पूर्वजन्म का दैवयोग सुन्दर है, इस योग मे प्रयत्नवाद नही है। यह दैववादी मंगल का गुणधर्म दर्शाता है, जो पूर्व कर्मानुसार स्वयम् प्राप्त होता है।  

(4) अंक 4 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 90 आता है। इसे चतुर्थ केन्द्र योग कहते है। इस पर बुध का अधिकार है। पाश्चात्य मतो से इस पर हर्षल का अधिकार है। इसे अशुभ मानते है। जीवन मे दौड-धूप तथा अपार कष्ट और अन्त मे विजय इस प्रकार केन्द्र योग का आपत्ति-विपत्ति संधर्ष मय गुणधर्म है। 1$3त्र4 ब्रह्म-माया-त्रिगुण कार्य है। 

(5) अंक 5 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 72 आता है शेष शून्य रहता है। इस पर गुरु का अधिकार है। भारतीय ज्योतिष मे यह योग सम्मिलित नही है। इसे पाश्चात्य ज्योतिष मे चक्र पंचमांश ;ठप्फन्प्छज्स्म्द्ध कहते है। यह योग बुद्धि प्राधान्य होता है। 

(6) अंक 6 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 60 आता है और शेष शून्य बचता है। इस अंक पर शुक्र का अधिकार है। यह योग ऐश्वर्य दर्शक योग है। यह द्वितीय योग है। इस योग को प्राचीन शास्त्रकारो ने ‘‘अनफा-सुनफा’’ संज्ञा दी है ऐसा दिखता है। 


(7) अंक 7 से 360 को विभाजित करने पर 51 अंश 25 कला 42 विकला आता है। यह योग पाश्चात्य ज्योतिष मे नही माना जाता है क्योकि निःशेष विभाजित नही होता है। भारतीय ज्योतिषी इस योग का फल कथन करते है। यह योग द्विद्र्वादश योग के समान ही किंचित अशुभ है। 

(8) अंक 8 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 45 आता है और शेष शून्य बचता है। इसे सार्द्ध केन्द्र (ैम्डप् ैफन्।त्म्) कहते है। इस पर राहु का अधिकार है। विदेशी ज्योतिषी इसे साधारण शुभ मानते है। यह योग पाश्चात्य ज्योतिष मे माना जाता है। 

(9) अंक 9 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 40 आता है। इस योग का प्राचीन तथा अर्वाचीन शास्त्रकारो ने कही पर भी वर्णन नही किया है। यह साधारण शुभ माना जाता है। इस अंक पर केतु का अधिकार माना जाता है। 

(10) अंक 10 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 36 होता है और बाकी शून्य रहता है। इस योग को इंग्लैन्ड के ‘‘एलन लियो’’ ही मानते है। इस पर रवि का अधिकार है। यह योग निर्बल माना जाता है। प्रायः इसका विचार नही करते है। अंक 9-10 के योग अति तीव्र होते है। यदि पापग्रहो मे हो तो फल अत्यन्त अशुभ मिलता है और शुभ ग्रहो मे हो तो अत्यधिक शुभ फल प्राप्त होता है। इसे ‘‘सेमी क्यून्टाईल’’ कहते है। 

(11) अंक 11 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 32 अंश 43 कला 38 विकला आता है। यह योग नही माना जाता है क्योकि निःशेष विभाजित नही होता है और शेष रह जाता है। इस योग को प्राचीन और अर्वाचीन शास्त्रकार नही मानते है। इस पर चन्द्र का अधिकार है। इस योग का फल चाहे शुभ हो या अशुभ हो बहुत ही तीक्ष्ण होता है। 

(12) अंक 12 से 360 को विभाजित करने पर भागाकार 30 आता है और शेष शून्य रहता है। इसे राश्यान्तर कहते है। इस अंक पर मंगल का अधिपत्य है। यह योग शुभ माना जाता है।  

इनमे से कुछ योग प्रचलित नही है और न कभी प्रचलित होगे। हमारे शास्त्राकारो ने केवल युति, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ यानि केन्द्र, पंचम, षष्ठ तथा प्रतियोग, सप्तम यानि केन्द्र, अष्टम, नवम, दशम यानि केन्द्र, लाभयोग और द्वादशयोग ही बतलाये है। रुढ प्रचलित भाषा मे उनका उच्चारण जोडी-जोडी से किया जाता है। जैसे नवम-पंचम आदि। 

उपरोक्त अंको से वृत्त विभाजन द्वारा निष्पन्न योग पाश्चात्य ज्योतिष मे विशेषतया प्रचलित है। ये दृष्टि योग-पहलू Aspect  कहलाते है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र की परिभाषा मे योग को जोडी-जोडी से कथन करने की पद्धति है। जैसे कि:- द्वितीय-द्वादश (द्विद्र्वादश), तृतीय-एकादश (त्रिरेकादश), चतुर्थ-दशम (केन्द्र), पंचम-नवम (नवपंचम या त्रिकोण), षष्ठ-अष्टम (षडाष्टक), सप्तम-सप्तम (सम सप्तक या प्रतियोग) इनको भावयोग या भावेश दृष्टियोग भी कहते है। इनके अतिरिक्त युतियोग और राशि परिवर्तन योग (अन्योन्य आश्रय योग) का भी विचार किया जाता है। परन्तु इस प्रकार के कथन से एक दोष का निर्माण होता है वह यह कि हमेशा हम शीध्रगति ग्रह से मंदगति तक गिनते है किन्तु यहा इसके विपरीत होता है यानि मंदगति से शीध्रगति होता है। चन्द्र सर्वाधिक शीध्रगति ग्रह है। चन्द्र से आरम्भ कर सर्व ग्रह क्रमशः इस प्रकार है  चन्द्र-बुध-शुक्र-सूर्य-मंगल-गुरु-शनि।

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 द्विर्द्वादश योग - जब दो भावेश (ग्रह) एक दूसरे से 2 तथा 12 वे स्थान पर हो तो द्विर्द्वादश योग होता है। यह योग अशुभ है और दरिद्रता सूचक होता है। चन्द्र से द्वितीय मे बुध, गुरु, शुक्र शुभ। बुध से द्वितीय मे गुरु, शनि शुभ। शुक्र से द्वितीय मे गुरु शुभ। मंगल से द्वितीय मे गुरु, शनि शुभ होते है। चन्द्र से द्वादश मे सूर्य, शनि, राहु शुभ। सूर्य से द्वादश मे मंगल, शनि शुभ। गुरु से द्वाद्वश मे शनि शुभ होते है। शेष अशुभ है। द्विद्र्वादश (2-12 या 12-2) मेष-मीन, वृषभ-मिथुन, कर्क-सिंह, कन्या-तुला, वृश्चिक-धनु, मकर-कुम्भ शुभ है। शेष सभी अशुभ है।  

त्रिरेकादश - जब दो भावेश (ग्रह) एक दूसरे से 3 तथा 11 वे स्थान पर हो तो त्रिरेकादश योग होता है। अर्थात् एक ग्रह दूसरे से तृतीय स्थान पर तथा दूसरा पहले से ग्यारहवे स्थान पर हो तो लाभ योग होता है। यह शुभ, सम्पत्ति दायक होता है। चन्द्र से तीसरे बुध, मंगल, सूर्य, शनि, राहु शुभ। सूर्य, बुध, शुक्र से तीसरे मंगल, शनि शुभ। मंगल, गुरु से तीसरे शनि शुभ होते है।

चन्द्र से ग्यारहवे शुक्र, गुरु शुभ। सूर्य, बुध, मंगल, शुक्र से ग्यारहवे गुरु शुभ होते है।त्रिरेकादश (3-11 या 11-3) मेष-मिथुन, मिथुन-सिंह, सिंह-तुला, तुला-धनु, धनु-कुम्भ शुभ तथा वृषभ-मीन, कर्क-कन्या, मकर-मीन साधारण शुभ है। 

केन्द्र योग - जब दो भावेश (ग्रह) एक दूसरे से (परस्पर) 4 तथा 10 वे स्थान पर हो तो केन्द्र योग होता है। यह अत्यन्त अशुभ योग है। कुछ विशेष परिस्थितियो मे साधारण शुभ भी माना गया है। कुण्डली के जिन स्थानो पर ग्रह यह योग बनाते है उन स्थानो का फल अशुभ ही होता है। केवल चन्द्र से चतुर्थ गुरु साधारण शुभ शेष सभी ग्रहो का परस्पर चतुर्थ अशुभ ही होता है। चन्द्र से दशम मे बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, गुरु, शनि, राहु शुभ। सूर्य, बुध, शुक्र से दशम मे मंगल, गुरु शुभ। मंगल से दशम मे गुरु, शनि शुभ। गुरु से दशम मे शनि शुभ होते है। केन्द्र (4-10 या 10-4) वृश्चिक-कुम्भ, धनु-मीन, कुम्भ-वृषभ, मीन-मिथुन साधारण शुभ है, शेष सभी अशुभ है। 

त्रिकोण योग - जब दो भावेश (ग्रह) एक दूसरे से 5 तथा 9 वे स्थान पर हो तो त्रिकोण योग होता है। इसे नवम-पंचम भी कहते है। यह दोनो स्थान का शुभ फल देता है। जातक को धन, वैभव, विभूति, कीर्ति देता है। चन्द्र से (दोनो स्थान) बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, गुरु शुभ। सूर्य से मंगल, शनि (9 वे), गुरु शुभ। बुध से मंगल (5 वे) गुरु शुभ। शुक्र से मंगल, गुरु, शनि। मंगल से गुरु, शनि (9 वे) शुभ होते है। त्रिकोण (5-9 या 9-5) मिथुन-तुला, सिंह-धनु,   तुला-कुम्भ, वृश्चिक-मीन, धनु-मेष, कुम्भ-मिथुन, मीन-कर्क शुभ है। शेष सभी अशुभ है। 

षडाष्टक योग - जब दो भावेश (ग्रह) एक दूसरे से 6 तथा 8 वे स्थान पर हो तो षडाष्टक योग होता है। यह योग अशुभ है तथा दुःख और कष्ट देता है। दोनो स्थानो का फल सामान्य या निर्बल हो जाता है। चन्द्र से छठे स्थान मे बुध, शुक्र, मंगल शुभ। सूर्य से छठे मंगल, शनि शुभ। बुध से शनि शुभ। मंगल से छठे शनि शुभ होते है। शेष सभी अशुभ होते है। इन राशियो मे प्रीति षडाष्टक होता है 1 मेष-वृश्चिक, 2 मिथुन-मकर, 3 सिंह-मीन, 4 तुला-वृषभ, 5 धनु-कर्क, 6 कुम्भ-कन्या। शेष राशियो का शत्रु षडाष्टक होता है। 


प्रति योग - जब दो भावेश (ग्रह) एक दूसरे से सातवे स्थान पर हो तो प्रतियोग या समसप्तक योग होता है। इसमे ग्रह आमने सामने होते है। यह योग स्थान भेद से शुभ फल देता है, किन्तु पापग्रह का समसप्तक योग दोनो स्थान के फल मे न्यूनता करता है। चन्द्र से सप्तम सूर्य, शनि शुभ होता है। शेष सभी अशुभ है। प्रति योग मिथुन-धनु, कर्क-मकर, सिंह-कन्या, तुला-मेष शुभ है। 


युति योग - जब दो या अधिक भावेश (ग्रह) एक ही राशि मे हो तो युति योग होता है। इस योग का फल ग्रहो के अनुसार शुभ या अशुभ होता है।


अन्योन्य आश्रय योग - जब दो भावेश (ग्रह) एक दूसरे की राशि मे हो तो अन्योन्य आश्रय योग होता है। इसे राशि परिवर्तन योग कहते है। यह योग शुभ है। अर्थात् एक ग्रह दूसरे के गृह मे और दूसरा पहले के गृह मे होता है इस प्रकार दोनो एक-दूसरे को आश्रय देते है। इसमे दोनो स्थान का शुभ फल ही होता है। इस प्रकार ग्रह स्थित स्थान पर अशुभ फल नही देते है। 

इसी प्रकार मेलापक मिलान मे षडाष्टक, नवम -पंचम , द्विर्द्वादश  योग दोष पूर्ण माने गए है।               

जन्म पत्रिका अध्ययन मे इन भाव योगो का भी विचार करे।

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