सिद्ध कुंजिका स्तोत्र साधना के गुप्त रहस्य
श्री दुर्गा सप्तसती नामक पुस्तक में अत्यंत एवं अति दुर्लभ गोपनीय से भी अति गोपनीय रहस्यों का भी रहस्य है। इस मंत्र के प्रभाव से देवी का जप (पाठ) सफल होता है। इसमें कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, ध्यान, न्यास, पूजा-अर्चन भी आवश्यक नहीं है।
करे.इसके बाद हूं शत्रुनाशिनी हूँ फट मन्त्र क ५ मिनट तक निम्बू पर त्राटक करते हुए जाप करे.फिर पुनः ११ पाठ करे.इसके बाद निम्बू कही भूमि मे गाङ दे.शत्रु बाधा समाप्त हो जायेगी।
रोग नाश
नित्य कुंजिका के ११ पाठ करके काली मिर्च अभिमंत्रित कर ले.इसके बाद रोगी पर से इसे ७ बार घुमाकर घर के बहार फैक़ दे.कुछ दिन प्रयोग करने से सभी रोग शांत हो जाते है.
आकर्षण
कुंजिका का ९ बार पाठ करे तत्पश्चात क्लीं ह्रीं क्लीं मन्त्र क १०८ बार जाप करे तथा पुनः ९ पाठ कुंजिका के करे और जल अभीमंत्रित कर ले.इस जल को थोड़ा पि जाएं और थोड़े से मुख धो ले.सतत करते रहने से साधक मे आकर्षण शक्ति का विकास होता है.
स्वप्न शांति
जिन लोगो को बुरे स्वप्न आते है उनके लिए ये प्रयोग उत्तम है.किसी भी समय एक सिक्का ले और थोड़े क़ाले तिल ले.३ दिनों तक नित्य २१ पाठ कुंजिका के कर और इन्हे अभिमंत्रित करे.इसके बाद दोनों को एक लाल वस्त्र मे बांध कर तकिये के निचे रखकर सोये।धीरे धीरे बुरे स्वप्न आना बन्द हो जायेंगे।
तंत्र सुरक्षा
बुधवार के दिन एक लोहे कि कील ले और इसकी समक्ष कुंजिका के २१
पाठ करे प्रत्येक पाठ कि समाप्ति पर कील पर एक कुमकुम कि बिंदी लगाये इसके बाद इस कील को लाल वस्त्र मे लपेट कर घर के मुख्य द्वार के बाहर भूमि मे गाढ़ दे.इससे घर तंत्र क्रियायों से सुरक्षित रहेगा।
उपरोक्त सभी प्रयोग सरल है परन्तु ये तभि प्रभावी होंगे जब आप स्वयं के लिए कुंजिका को जागृत कर लेंगे।अतः सर्वप्रथम कुंजिका को जागृत करे इसकी बाद हि कोइ प्रयोग करे.शीघ्र ही अन्य प्रयोग भि बतायेँगे। तब तक के लिए.
जय अम्बे
दुर्गा सप्तशती में वर्णित सिद्ध कुंजिका स्तोत्र एक अत्यंत चमत्कारिक और तीव्र प्रभाव दिखाने वाला स्तोत्र है। जो लोग पूरी दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते वे केवल कुंजिका स्तोत्र का पाठ करेंगे तो उससे भी संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का फल मिल जाता है। जीवन में किसी भी प्रकार के अभाव, रोग, कष्ट, दुख, दारिद्रय और शत्रुओं का नाश करने वाले सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ नवरात्रि में अवश्य करना चाहिए। लेकिन इस स्तोत्र का पाठ करने में कुछ सावधानियां भी हैं, जिनका ध्यान रखा जाना आवश्यक है।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ की विधि
कुंजिका स्तोत्र का पाठ वैसे तो किसी भी माह, दिन में किया जा सकता है, लेकिन नवरात्रि में यह अधिक प्रभावी होता है। कुंजिका स्तोत्र साधना भी होती है, लेकिन यहां हम इसकी सर्वमान्य विधि का वर्णन कर रहे हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन से नवमी तक प्रतिदिन इसका पाठ किया जाता है। इसलिए साधक प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर अपने पूजा स्थान को साफ करके लाल रंग के आसन पर बैठ जाए। अपने सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर देवी दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। सामान्य पूजन करें।
अपनी सुविधानुसार तेल या घी का दीपक लगाए
अपनी सुविधानुसार तेल या घी का दीपक लगाए और देवी को हलवे या मिष्ठान्न् का नैवेद्य लगाएं। इसके बाद अपने दाहिने हाथ में अक्षत, पुष्प, एक रुपए का सिक्का रखकर नवरात्रि के नौ दिन कुंजिका स्तोत्र का पाठ संयम-नियम से करने का संकल्प लें। यह जल भूमि पर छोड़कर पाठ प्रारंभ करें। यह संकल्प केवल पहले दिन लेना है। इसके बाद प्रतिदिन उसी समय पर पाठ करें।
कुंजिका स्तोत्र के लाभ
धन लाभ👉 जिन लोगों को सदा धन का अभाव रहता हो। लगातार आर्थिक नुकसान हो रहा हो। बेवजह के कार्यों में धन खर्च हो रहा हो उन्हें कुंजिका स्तोत्र के पाठ से लाभ होता है। धन प्राप्ति के नए मार्ग खुलते हैं। धन संग्रहण बढ़ता है।
शत्रु मुक्ति👉 शत्रुओं से छुटकारा पाने और मुकदमों में जीत के लिए यह स्तोत्र किसी चमत्कार की तरह काम करता है। नवरात्रि के बाद भी इसका नियमित पाठ किया जाए तो जीवन में कभी शत्रु बाधा नहीं डालते। कोर्ट-कचहरी के मामलों में जीत हासिल होती है।
रोग मुक्ति👉 दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ जीवन से रोगों का समूल नाश कर देते हैं। कुंजिका स्तोत्र के पाठ से न केवल गंभीर से गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है, बल्कि रोगों पर होने वाले खर्च से भी मुक्ति मिलती है।
कर्ज मुक्ति👉 यदि किसी व्यक्ति पर कर्ज चढ़ता जा रहा है। छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है, तो कुंजिका स्तोत्र का नियमित पाठ जल्द कर्ज मुक्ति करवाता है।
सुखद दांपत्य जीवन👉 दांपत्य जीवन में सुख-शांति के लिए कुंजिका स्तोत्र का नियमित पाठ किया जाना चाहिए। आकर्षण प्रभाव बढ़ाने के लिए भी इसका पाठ किया जाता है।
इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक
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देवी दुर्गा की आराधना, साधना और सिद्धि के लिए तन, मन की पवित्रता होना अत्यंत आवश्यक है। साधना काल या नवरात्रि में इंद्रिय संयम रखना जरूरी है। बुरे कर्म, बुरी वाणी का प्रयोग भूलकर भी नहीं करना चाहिए। इससे विपरीत प्रभाव हो सकते हैं।
कुंजिका स्तोत्र का पाठ बुरी कामनाओं, किसी के मारण, उच्चाटन और किसी का बुरा करने के लिए नहीं करना चाहिए। इसका उल्टा प्रभाव पाठ करने वाले पर ही हो सकता है।
साधना काल में मांस, मदिरा का सेवन न करें। मैथुन के बारे में विचार भी मन में न लाएं।
श्री दुर्गा सप्तशती में से हम आपको एक एसा पाठ बता रहे हैं, जिसके करने से आपकी सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। इस पाठ को करने के बाद आपको किसी अन्य पाठ की आवश्यकता नहीं होगी। यह पाठ है..सिद्धकुंजिकास्तोत्रम्। समस्त बाधाओं को शांत करने, शत्रु दमन, ऋण मुक्ति, करियर, विद्या, शारीरिक और मानसिक सुख प्राप्त करना चाहते हैं तो सिद्धकुंजिकास्तोत्र का पाठ अवश्य करें। श्री दुर्गा सप्तशती में यह अध्याय सम्मिलित है। यदि समय कम है तो आप इसका पाठ करके भी श्रीदुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ जैसा ही पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। नाम के अनुरूप यह सिद्ध कुंजिका है। जब किसी प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा हो, समस्या का समाधान नहीं हो रहा हो, तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करिए। भगवती आपकी रक्षा करेंगी।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र की महिमा
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भगवान शंकर कहते हैं कि सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ करने वाले को देवी कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास और यहां तक कि अर्चन भी आवश्यक नहीं है। केवल कुंजिका के पाठ मात्र से दुर्गा पाठ का फल प्राप्त हो जाता है।
क्यों है सिद्ध
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इसके पाठ मात्र से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि उद्देश्यों की एक साथ पूर्ति हो जाती है। इसमें स्वर व्यंजन की ध्वनि है। योग और प्राणायाम है।
संक्षिप्त मंत्र
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ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥ ( सामान्य रूप से हम इस मंत्र का पाठ करते हैं लेकिन संपूर्ण मंत्र केवल सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में है)
संपूर्ण मंत्र यह है
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ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ऊं ग्लौं हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।
कैसे करें
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सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को अत्यंत सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। प्रतिदिन की पूजा में इसको शामिल कर सकते हैं। लेकिन यदि अनुष्ठान के रूप में या किसी इच्छाप्राप्ति के लिए कर रहे हैं तो आपको कुछ सावधानी रखनी होंगी।
1👉 संकल्प: सिद्ध कुंजिका पढ़ने से पहले हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर संकल्प करें। मन ही मन देवी मां को अपनी इच्छा कहें।
2👉 जितने पाठ एक साथ ( 1, 2, 3, 5. 7. 11) कर सकें, उसका संकल्प करें। अनुष्ठान के दौरान माला समान रखें। कभी एक कभी दो कभी तीन न रखें।
3👉 सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के अनुष्ठान के दौरान जमीन पर शयन करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें।
4👉 प्रतिदिन अनार का भोग लगाएं। लाल पुष्प देवी भगवती को अर्पित करें।
5👉 सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में दशों महाविद्या, नौ देवियों की आराधना है।
सिद्धकुंजिका स्तोत्र के पाठ का समय
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👉 रात्रि 9 बजे करें तो अत्युत्तम।
2👉 रात को 9 से 11.30 बजे तक का समय रखें।
आसन
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लाल आसन पर बैठकर पाठ करें
दीपक
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घी का दीपक दायें तरफ और सरसो के तेल का दीपक बाएं तरफ रखें। अर्थात दोनों दीपक जलाएं
किस इच्छा के लिए कितने पाठ करने हैं
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1👉 विद्या प्राप्ति के लिए....पांच पाठ ( अक्षत लेकर अपने ऊपर से तीन बार घुमाकर किताबों में रख दें)
2👉 यश-कीर्ति के लिए.... पांच पाठ ( देवी को चढ़ाया हुआ लाल पुष्प लेकर सेफ आदि में रख लें)
3👉 धन प्राप्ति के लिए....9 पाठ ( सफेद तिल से अग्यारी करें)
4👉 मुकदमे से मुक्ति के लिए...सात पाठ ( पाठ के बाद एक नींबू काट दें। दो ही हिस्से हों ध्यान रखें। इनको बाहर अलग-अलग दिशा में फेंक दें)
5👉 ऋण मुक्ति के लिए....सात पाठ ( जौं की 21 आहुतियां देते हुए अग्यारी करें। जिसको पैसा देना हो या जिससे लेना हो, उसका बस ध्यान कर लें)
6👉 घर की सुख-शांति के लिए...तीन पाठ ( मीठा पान देवी को अर्पण करें)
7👉 स्वास्थ्यके लिए...तीन पाठ ( देवी को नींबू चढाएं और फिर उसका प्रयोग कर लें)
8👉 शत्रु से रक्षा के लिए..., 3, 7 या 11 पाठ ( लगातार पाठ करने से मुक्ति मिलेगी)
9👉 रोजगार के लिए...3,5, 7 और 11 ( एच्छिक) ( एक सुपारी देवी को चढाकर अपने पास रख लें)
10👉 सर्वबाधा शांति- तीन पाठ ( लोंग के तीन जोड़े अग्यारी पर चढ़ाएं या देवी जी के आगे तीन जोड़े लोंग के रखकर फिर उठा लें और खाने या चाय में प्रयोग कर लेंl
केवल कुंञ्जिका के पाठ मात्र से ही दुर्गा पाठ का फल प्राप्त हो जाता है। इस कुंजिका को हमेशा गोपनीय रखना चाहिए। जगत जननी जगदम्बा के विशेष भक्तो को ही देना चाहिए।इस अति उत्तम कुंजिका स्त्रोत के केवल पाठ मात्र से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि उद्देश्यो को सिद्ध करता है।
(मारण - काम, क्रोध का नाश, मोहन - ईस्ट देव का मोहन, वशीकरण - मन का वशीकरण, स्तम्भन - इन्द्रियों के विषयो के प्रति उदासीन, उच्चाटन - मोक्ष प्राप्ति के लिए छटपटाहट)
पहले कुंजिका स्त्रोत्र को साधक वर्ग अपनी सुविधानुसार इसके अधिक जप भी पूर्ण कर लें तो सफलता का प्रतिशत और अधिक बढ़ ही जाता है अस्तु आलस्य एवं प्रमाद का त्याग करके पूर्ण श्रद्धा भाव एवं समर्पण से सम्पन्न करना चाहिए ।
भगवान शिव ने पार्वती से कहा है कि दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ का जो फल है वह सिर्फ कुंजिकास्तोत्र के पाठ से प्राप्त हो जाता है। कुंजिकास्तोत्र का मंत्र स्वयंसिद्ध है इसलिए इसे सिद्ध करने की जरूरत नहीं है। जो साधक संकल्प लेकर इसके मंत्रों का जप करते हुए दुर्गा मां की आराधना करते हैं मां उनकी इच्छित मनोकामना पूरी करती हैं। इसमें ध्यान रखने योग्य बात यह है कि कुंजिकास्तोत्र के मंत्रों का जप किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं करना चाहिए। किसी को क्षति पहुंचाने के लिए कुंजिकास्तोत्र के मंत्र की साधना करने पर साधक का खुद ही अहित होता है।
इसके द्वारा आज्ञा चक्र का जागरण होता है इसमें आज्ञा चक्र के बीजो अक्षरों का समावेश है और अद्भुत तरीके से मूलाधार चक्र और कुण्डलिनी जागृत करने के सभी बीज अक्षर मंत्रो का उल्लेख है ।
यह स्तोत्र अपने आप में सिद्ध माना जाता हैं. इसके गुप्त रहस्य ही इस मंत्र की महिमा को स्पष्ट करते हैं. सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के गुप्त रहस्य हमने नीचे दिए हैं.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र रुद्रयामल तंत्र से निकला हुआ स्तोत्र हैं.सिद्ध कुंजिका स्तोत्र भगवान शिव ने पार्वती माता को गुप्त तरीके से बताया था.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के बिना दुर्गा सप्तशती पाठ करना निष्फल माना जाता हैं.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र करने से दुर्गा सप्तशती पाठ करने का सम्पूर्ण लाभ मिलता हैं.
भगवान शिव ने पार्वती माता को यह स्तोत्र देने से पहले कहा था की यह स्तोत्र किसी अभक्त को नहीं देना हैं.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र प्रतिदिन करने से सभी प्रकार के मंत्र सिद्ध हो जाते हैं.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं.
मेघनाद ने लक्ष्मण के सामने विजय प्राप्त करने के लिए इस स्तोत्र का गुप्तपाठ किया था.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के यह कुछ गुप्त रहस्य हैं. यह स्तोत्र भगवान शिव के द्वारा दिया गया हैं. इसका प्रयोग करने से मनुष्य की सभी कष्टों का निवारण होता हैं. अब हम आपको सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के चमत्कारी लाभ तथा प्रयोग विधि बताएगे.
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सिद्ध कुंजिका स्तोत्र से चमत्कारी लाभ / फायदे
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ मिलते है:
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से सभी मंत्र सिद्ध हो जाते हैं.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र विभिन्न प्रकार की साधना में भी प्रभावशाली है.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से सभी प्रकार की समस्या का निवारण होता हैं. और मनुष्य के कष्ट दूर होते हैं.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से सम्पूर्ण चंडी पाठ का फल मिलता हैं.
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से कीलक, ध्यान, अर्चन, न्यास, सूक्त आदि का लाभ मिलता हैं.
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सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ विधि और प्रयोग
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ ऐसे ही नहीं किया जाता हैं. इस स्तोत्र को विधि-विधान पूर्वक करने से ही इसका शुभ फल मिलता हैं. सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ करने की सम्पूर्ण विधि हमने मंत्र सहित नीचे दी हैं.
सबसे पहले प्रात:काल शौच स्नान आदि करके निवृत हो जाए.
आप इस पाठ को नवरात्री या किसी शुभ दिन पर कर सकते हैं. जिस दिन पाठ करे उस दिन माँ दुर्गा की प्रतिमा के आगे घी का दीपक जलाए.
अब माँ दुर्गा को धुप आदि जलाए और उनका श्रृंगार करे. अब माँ दुर्गा को प्रसाद का भोग लगाए.
माँ दुर्गा को पुष्प अर्पित करे तथा उनसे प्रार्थना करे. उसके पश्चात आसन बिछाकर उनका ध्यान करे.
यह सभी प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करे.
प्रार्थना करने के दौरान आपको एक मंत्र जाप करना है. जो हमने नीचे दिया हैं.
प्रातः पूजन के समय किसी भी माला से 3 माला नवार्ण मंत्र की करें, इससे यदि साधना काल में आपसे कोई त्रुटि हो रही होगी तो वो त्रुटि समाप्त हो जायेगी। वैसे ये आवश्यक अंग नहीं है फिर भी साधक चाहें तो कर सकते हैं। – 6)― साधना गोपनीय रखे गुरु तथा मार्गदर्शक के अतिरिक्त किसी अन्य को साधना समाप्त होने तक कुछ न बताएं, ना ही साधना सामाप्त होने तक किसी से कोई चर्चा करें। – 7)― जहां तक सम्भव हो साधना में सभी वस्तुए लाल ही प्रयोग करें। – जब साधक उपरोक्त विधान के अनुसार कुंजिका को जागृत कर लें, तब इसके माध्यम से कई प्रकार के काम के प्रयोग किये जा सकते हैं। यहां कुछ प्रयोग दिये ज रहे है।- सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के प्रयोग― -धन प्राप्ति― – किसी भी शुक्रवार की रात्रि में मां का सामान्य पुजन करें, इसके बाद कुंजिका के 9 पाठ करें इसके पश्चात, नवार्ण मन्त्र से अग्नि में 21 आहुति सफेद तिल से प्रदान करें। नवार्ण मंत्र में “श्रीं” बीज आवश्य जोड़े। “श्रीं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमः स्वाहा”, आहुति के बाद पुनः 9 पाठ करें, इस प्रकार 9 दिनों तक करने से धनागमन के मर्ग खुलने लगते है। -शत्रु मुक्ति― – शनिवार रात्रि में काले वस्त्र पर एक निम्बू स्थापित करें तथा इस पर शत्रु का नाम काजल से लिख दें, और इस निम्बू के समक्ष ही सर्व प्रथम 11 बार कुंजिका का पाठ करें, इसके बाद “हुं शत्रुनाशिनी हुं फट” इस मन्त्र का 5 मिनट तक निम्बू पर त्राटक करते हुए जाप करें, फिर पुनः 11 पाठ करें, इसके बाद निम्बू कहीं भूमि में गाड़ दें, शत्रु बाधा समाप्त हो जायेगी। -रोग नाश― – नित्य कुंजिका के 11 पाठ करके काली मिर्च अभिमंत्रित कर लें, इसके बाद रोगी पर से इसे 7 बार घुमाकर घर के बाहर फेंक दें। कुछ दिन प्रयोग करने से सभी रोग शांत हो जाते है। -आकर्षण प्रयोग― – कुंजिका का 9 बार पाठ करें तत्पश्चात “क्लीं ह्रीं क्लीं” मन्त्र का 108 बार जाप करें तथा पुनः 9 पाठ कुंजिका के करें और जल अभीमंत्रित कर लें, इस जल को थोड़ा पी जाएं और थोड़े से मुख धो लें, सतत करते रहने से साधक में आकर्षण शक्ति का विकास होता हैं। -दुस्वप्न शांति― – जिन लोगों को बुरे स्वप्न आते है उनके लिए ये प्रयोग उत्तम है, किसी भी समय एक सिक्का लें और थोड़े काले तिल लें, 3 दिनों तक नित्य 21 पाठ कुंजिका के करें और इन्हे अभिमंत्रित करें, इसके बाद दोनों को एक लाल वस्त्र मे बांध कर तकिये के निचे रखकर सोये। धीरे-धीरे बुरे स्वप्न आना बन्द हो जायेंगे। – तंत्र सुरक्षा― – बुधवार के दिन एक लोहे कि कील लें और इसके समक्ष कुंजिका के 21 पाठ करें प्रत्येक पाठ की समाप्ति पर कील पर एक कुमकुम कि बिंदी लगाये इसके बाद इस कील को लाल वस्त्र मे लपेट कर घर के मुख्य द्वार के बाहर भूमि में गाढ़ दें, इससे घर तंत्र क्रियायों से सुरक्षित रहेगा। –
पहले गणेश पूजन
ॐ ऐंश्रींह्रींक्लींग्लींग्लौंगं गणपतये वर वरदे नमः
विनियोग :
ॐ अस्य श्री कुन्जिका स्त्रोत्र मंत्रस्य सदाशिव ऋषि: ।
अनुष्टुपूछंदः ।
श्रीत्रिगुणात्मिका देवता ।
ॐ ऐं बीजं ।
ॐ ह्रीं शक्ति: ।
ॐ क्लीं कीलकं ।
मम सर्वाभीष्टसिध्यर्थे जपे विनयोग: ।
ऋष्यादि न्यास:
श्री सदाशिव ऋषये नमः शिरसि ।
अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे ।
त्रिगुणात्मक देवतायै नमः हृदि ।
ऐं बीजं नमः नाभौ ।
ह्रीं शक्तयो नमः पादौ ।
क्लीं कीलकं नमः सर्वांगे ।
सर्वाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः नमः अंजलौ।
करन्यास:
ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा ।
क्लीं मध्यमाभ्यां वषट ।
चामुण्डायै अनामिकाभ्यां हुं ।
विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां वौषट ।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकर प्रष्ठाभ्यां फट ।
हृदयादिन्यास:
ऐं हृदयाय नमः ।
ह्रीं शिरसे स्वाहा ।
क्लीं शिखायै वषट ।
चामुण्डायै कवचाय हुं ।
विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट ।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरप्रष्ठाभ्यां फट ।
ध्यानं: सिंहवाहिन्यै त्रिगुणात्मिका चामुंडा
रक्तनेत्री, रक्तप्रिया, रक्तपुष्पमालाधारिणी
लालवस्त्र भूषिता रक्तनेत्रा मधुपात्रधारणी
मेघगर्जिनि अट्टटाहसिनी दानवकुलघातिनी
दासरक्षिणी रणप्रिया खेटक खड़गधारिणी
कल्याणी जगतजननी देवी भव-भयहारिणी
शिव उवाच:
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभम भवेत् ॥1॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥2॥
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥ 3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।
पाठमात्रेण संसिद्ध् येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥4॥
अथ मंत्र:
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।"
॥ इति मंत्रः॥
"नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनी ॥1॥
नमस्ते शुम्भन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनी ॥2॥
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3॥
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥ 4॥
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणी ॥5॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6॥
हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥7॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥ 8॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्र सिद्धिं कुरुष्व मे॥
फलश्रुति:
इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥
कालीपुत्र वदामि सत्यं सत्यं पुनः सत्यं ।
स्तोत्रं परमाद्भुतं सर्वकाले न लेशमात्र शंसयं ।।
। श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम् ।
इसके बाद भैरव जी को नमस्कार मन्त्र का जप इन में से कोई भी
1.ॐभ्रं भैरवाय नमः
2.'ॐ ह्रीं भ्रं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।'
3. ॐ भ्रं कालभैरवाय हूं फट्
4.'ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:।'
6 'ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं।'
7ॐ भयहरणं च भैरव:।'
8ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्।'
काल भैरव कवच पाठ
ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः।
पातु मां बहुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु।।
पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा।
आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः।।
नैऋत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे।
वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेशवरः।।
भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा।
संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः।।
ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः।
सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः।।
रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु।
जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च।।
डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः।
हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः।।
पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरव।
मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा।।
महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा।
वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा।।
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