माँ आशापूरा की महिमा उनकी कथा देव स्थान के महत्व मन्त्र ध्यान स्तोत्र चालीसा
माँ आशापूरा की महिमा मन्त्रिक वैदिक और तांत्रिक साधना मन्त्र ध्यान स्तोत्र चालीसा
"आशापुरा माता मंदिर की महिमा जहां मोदी भी पहुंचे मत्था टेकने पीएम मोदी ने जिस आशापुरा मंदिर में दर्शन करने के बाद चुनावी जनसभाओं को संबोधित किया उसके भी बड़ी संख्या में अनुयायी हैं. आशापुरा को कच्छ की कुलदेवी माना जाता है और बड़ी तादाद में इलाके के लोगों की उनमें आस्था है.
आशापुरा को कच्छ की कुलदेवी माना जाता है और बड़ी तादाद में इलाके के लोगों की उनमें आस्था है.
आशापुरा माता को कई समुदायों द्वारा कुलदेवी के रूप में माना जाता है, और मुख्यत: नवानगर, राजकोट, मोरवी, गोंडल बारिया राज्य के शासक वंश चौहान, जडेजा राजपूत, कच्छ, की कुलदेवता है साथ ही साथ पुष्करणा ब्राम्हणो के विशा या बिस्सा
वीडा, विडंगा, मापारा, रत्ता, टेटर और वैश्यों में भण्डारियो की कुल देवी माँ है
गुजरात में आशापुरा माता का मुख्य मंदिर कछ में माता नो मढ़ (भुज से 95 किलोमीटर दूर) पर स्थित है. वहां पर कछ के गोसर और पोलादिया समुदाय के लोग भी आशापुरा माता को अपनी कुलदेवता मानते हैं.
14वीं शताब्दी में निर्मित आशापुरा माता मंदिर जडेजा राजपूतों की प्रमुख कुलदेवी आशापुरा माता को समर्पित है. इस मंदिर का निर्माण जडेजा साम्राज्य के शासनकाल के दौरान किया गया था.
आशापुरा देवी मां को अन्नपूर्णा देवी का अवतार माना जाता है. आशापुरा देवी मां के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है. ऐसी मान्यता है कि आशापुरा देवी मां से जो भी मुराद मांगी जाती है, वह जरूर पूरी होती है. गुजरात में कई अन्य समुदाय भी आशापुरा देवी को अपनी कुलदेवी के तौर पर पूजते हैं.
अत्यधिक प्राचीन इस मंदिर को कई बार भूकंप से क्षति भी पहुंची है. पहली बार 1819 में और दूसरी बार 2001 में आए भूकंप से मंदिर क्षतिग्रस्त हो चुका है. मंदिर के भीतर 6 फीट ऊंची लाल रंग की आशापुरा माता की मूर्ति स्थापित है. साल भर श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए मंदिर में जुटते हैं. नवरात्र के दौरान इस मंदिर में खूब चहल-पहल देखने को मिलती है.
आशापुरा देवी मां का उल्लेख पुराणों औऱ रूद्रयमल तंत्र में भी मिलता है. इस मंदिर में पूजा की शुरूआत कब हुई, इसका कोई ठोस प्रमाण तो नहीं मिलता है लेकिन 9वीं शताब्दी ईस्वी में सिंह प्रांत के राजपूत सम्मा वंश के शासनकाल के दौरान आशापुरा देवी की पूजा होती थी. इसके बाद कई और समुदायों ने भी आशापुरा देवी की पूजा करना शुरू कर दी.
राजस्थान में पोखरण, मादेरा, और नाडोल मे आशापुरा माता के मंदिर हैं. ये देवरिये या थान कहलाते है ये मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के बडे केंद्र हैं.
हिमालय मे निवास करने वाली आध्या शक्ति अंबिका के अनेकों स्वरूप है, जोकि दुस्टों का विनाश और भक्तो की रक्षार्थ विविध रूप धारण करती है। इन्ही स्वरूपो मे 64 योगिनियों की लीलाए ब्रम्हांड मे विध्यमान है। श्री माँ आशापूरा भी आध्या शक्ति माँ अंबिका का ही एक स्वरूप है।
आदि काल मे महिशासुर नामक दैत्य ने शिव और ब्रम्हा से तपस्या कर अनेकों शक्तियाँ
प्राप्त कर्ली और उनही शक्तियों का दुरुपयोग कर संतजनों, भक्तो, देव, नर, आदि सभी योनियो को आक्रांत करने लगाl सभी देवता समूह ने इस्स समस्या के निराकरण और महिशासुर के अंत हेतु भगवान शिव से प्राथना की तब ईश्वर शिव परगते और उन सभी को माँ आदि जगदंबा की आराधना करने को कहा और सभी प्रार्थना कर माँ को सच्चे मान से पुकारा माँ प्रसन्न हुई और एक विशाल अग्नि परवत सी विराट छवि लिए रौद्र रूप मे सिंह पर विराजमान अस्ट भौजी, रूप मे धनुषबान, खड़ग, कमंडल, गदा, शंख, चक्र, त्रिशूल, अभयमुद्रा, लिए, देवो के सामने प्रगटी, तब देवो ने अपनी एवं समस्त श्रुस्टी की समस्या बने महिशासुर का वर्णन किया, तब माता क्रूध हो हुंकार भर्ती हुई देवताओ के शत्रु महिशासुर का वध करने हेतु उद्रित हुई, तब माँ मे और महिशासुर मे भयंकर युद्ध छिड़ गया और कुछ ही क्षण मे माता ने उसकी सारी सेना का नाश करदीय ये देख सबको भय देने वाला वो राक्षस
खुद भयभीत हो कर आज के भारत के
गुजरात प्रांत की कच्छ की खाड़ी के जा छिपा और तब सब कुछ जानने वाली माता ने वाहा आकार उस दैत्य से युद्ध की या तब से वो कच्छ के रण क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ और वही माँ ने सभी देवताओ की एखी आशा, ईच्छा, को पूर्ण करते हुवे महिशासुर का वध किया, और इस्स्प्रकार देवो की आशा पूरी करने वाली ॥माँ आशापूरा के नाम से विख्यात हुई, और देवताओ का दुख भय पीड़ा और दारिद्र हरलिया, जिस जगह महिसासुर का वध हुआ वो, वर्तमान मे “माता नो मढ” के नाम से प्रसिद्ध है जहा देश देवी माँ आशपुरा का मंदिर है, महिशासुर के अंतिम समय मे, शरागत हो कर माँ से वर मांगा की माँ मेरे पापो को हरलों और मेरा मारना सार्थक कारदो, और मांगा मेरे शरीश के रस रक्त अस्ति मेदा से सनी इस्स धुली का धूप सदा आपकी पूजा मे चढ़े, तब माता ने प्रसन्न होकर धूप उत्पन्न कर के उस धुली को जलाया जिससे चारो ओर दिव्य सुघन्ध फेल गयी, उसी धूप को माँ ने “आशपुरा धूप” का नाम दियाl कच्छ के जाडेजा वंश के प्रथम राजवी खंगारजी प्रथम को माँ आशपुरा की कृपा से राज पद प्राप्त हुआ, इससी कारण कच्छ का राजवंशीय परिवार माँ आशपुरा को अपनी कुलदेवी के रूप मे स्वीकार करता है l
पुष्टिकरना ब्रांहणों के विशा या बिस्सा, विगेई, विडंग, टेटर, रत्ता, व बिल्ला नामक ब्रांहण जो सिद्धणी, नागाणी, घड़ियाली, गोगिया, मपारा, जाती लगाते, इन सभी की कुल देवी माँ आशपुरा ही है, इंका वेद सामवेद है, शाख कौथुमी, सूत्र लाटयायन, गोत्र शूनक(शनकश), प्रवर भार्गव शौन होत्र गार्त्मदेती त्रय है, गणेश- गणनायक है, भैरव-गोराभैरव है, कुलदेवी माँ आशपुरा है, दृस्ति सौम्य-द्रौम्य, मूर्ति ब्रम्हा-विष्णु की है l
आदि काल मे वेदो की रचना पूरवाहिनी सरस्वती नदी के तट पर हुई थी और पश्चिमी राजस्थान मरू स्थल न हो कर समुद्र क्षेत्र था और, जिसका प्रमाण हररपा मोहेंजोदडो की सभ्यताओ की खोज मे भी मिलता है ऐसी पुस्टी हुई है की जिस जगह सरस्वती नदी का प्रवाह तटवर्ती क्षेत्र और हिन्द महा सागर का मिलन होता था वहा ओजस्वी, तेजस्वी, वीर, दबंग, ज्योतिष एवं संगीत आदि कलाओ के ज्ञाता समृद्ध बुद्धि जीवी, विद्या, कर्मकांड, वेदो तंत्रो मंत्रो आदि प्राच्य विद्या के जानकार ब्रामहन वर्ग जिनको भार्गव ऋषि ने वेदो मे लिखी बातो की पुस्टी का कार्य दिया था, रहते थे, जो पूर्वकाल मे पुष्टिकरना और आधुनिक काल मे पुशकरना ब्रामहन कहलाए, इनहि ब्रांहनों की जाती विशा जो अब बिस्सा कहलाती है, वो भी वही सभी के साथ रहते थे, किन्तु प्रकृतिक आपदा या किवदंती अनुसार भगवान राम के सागर के ना मानने पर उठाए गए परमाणु अग्नि अस्त्र के प्रयोग से त्रेता मे यहा सम्पूर्ण समुन्द्र का जल सुख गया और ये क्षेत्र मरुपरदेश मे परिवर्तित होगया, भूवैज्ञानिक भी इससी बातकी पुस्टि कर चुके है l जिसका परिणाम बाढ़मेर, जैसलमर, मरू क्षेत्र मे मिले तेल, और गॅस के भंडार है जो पौराणिक जीवाशम के रसाईनिक प्रक्रिया का परिणाम है l इन सभी परिवर्तन के चलते ये सभी लोग कच्छ से उत्तर पूर्व की ओर प्रवर्तन करने लगे और चलते चलते पोकरण मे आकार बसे और (पोकरना भी कहलाए) l कालांतर मे वे फैलते हुवे कर्णावती, जामनगर, राजकोट, काठियावाड़ तथा उत्तर में पंजाब से उत्तराखंड, पूर्व में बंगाल और दक्षिण में कर्नाटक तक फैलगए, किन्तु पुष्करणा ब्रांहणों के बाहुल्य क्षेत्र बने जोधपुर, जैसलमर, बीकानेर,पोकरण, फलोदी, नागौर, मेड़ता और इनके निकट वरती गाव जहा बिस्सा जाती भी साथ ही साथ फैली, और इन सभी के चलते बी बिस्सों के वैदिक संस्कारो जैसे मुंडन झडुला , विवाह उपरांत जाति लगाना, इत्यादि के लिए माँ आशापूरा के स्थान सुदूर कच्छ जाना कठिन होगया तब बिस्सा कुल शिरोमणि परम आदरणीय रुण जी और भूण जी नामक दो भाइयो ने कछ भुज के माता नु मढ जाकर माता को तपस्या से प्रसन्न कर पोकरण लाने का बीड़ा उठाया और पैदल ही पोकरण से कच्छ भुज जाकर घोर तपस्या से माता को प्रसन्न कर वर के रूप मे माता को साथ चलने और पोकरण मे स्थापित होने का वर मांगा जिसको माँ ने ममता से स्वीकृति देदी और कहा "तुम चलो में तुम्हारे पीछे पीछे आती हु", तब रुण जी और भूण जी काहा "माँ आप पीछे चल रही है इसके क्या लक्षण चिन्ह होंगे", तब माँ ने कहा की "मेरी ज्योति हवा मे तुम्हारे आगे आगे चलती रहेगी और मेरे सिंह के नुपूर की ध्वनि पदचाप के साथ सुनाई देती रहेगी", किन्तु माँ ने रुण जी और भूण जी से विनिमय मे प्रतिज्ञा भी रक्खी की यदि तुम दोनों पीछे मुड़कर देखोगे तो मे वही स्थापित और भूमि मे विलीन हो जाऊँगी और वे दोनों स्तंभो मे परिवर्तित हो जायेंगे इसलिए पीछे न मुड़ना, दोनों ने प्रतिज्ञा स्वीकार कर के यात्रा आरंभ की और ऐसा हमने पूर्वजो से सुना है की वो गए जब 12 वर्ष के थे और आए जब वयोवृद्ध हो चले, यात्रा प्रारम्भ हुई और चलते चलते कच्छ से पोकरण का लगभग सम्पूर्ण मार्ग पार किया किन्तु महामाया की ईच्छा और माया के वशिभूत होकर पोकरण से 1 मील पहले, जब माँ का शेर पानी पीने के लिए तलाब मे रुक गया और नूपुर की आवाज़ बंद होगई आर ज्योति जो निरंतर चल रही थी स्थिर होगई तब, माया वश प्रतिज्ञा को भुला कर उन्होने पीछे मूड कर देख लिया और वही माँ आशपुरा, भूमि मे प्रवीस्ट हो गयी, और दोनों बंधु पाषाण के स्तम्भ मे परिवर्तित होगए, इस घटना मे जब माता भू प्रविस्ट हो रही थी तब उनका चीर पीछे रहगाया और वो एक पाषाण की दिव्य शीला मे परिवर्तित होगया, ये स्थान जहा ये घटना घटी, जो वर्तमान मे पोकरण शहर से 1 मील की दूरि पर विशाल देवरे के रूप मे आशपुरा माता जी का देवरा ,मंदिर व थान बन गया हैl जैसा की मंदिर के पुजारी महंत जी के द्वारा विदित हुआ है की यह घटना संवत 1315 ईस्वी के माघ माह की शुक्ल पक्ष तृतीया को घटी थी l इससी दिन को पोकरण मे माँ आशपुरा के प्राकट्य दिवस (पाठोत्सव) के रूप मे धूम धाम से मनाया जाने लगा l भाद्रपद की अस्टमी व दशमी को भी जात झाडूले आदि की रसमे बिस्सों के परिवारों द्वारा सम्पन्न होती है l पोकरण,जोधपुर, बीकानेर, जैसलमर, फलोदी, जयपुर, नागौर, मेड़ता ,पाली, आदि निकटवरती क्षेत्रो से बिस्सों का महापड़ाव,स्नेहमिलन, माँ की भक्ति महाकुंभ सा लग जाता है और एकादशी को महा प्रसादी होती है जिसे ‘कढ़ायी’ भी कहते है l आज भी बिस्सा वंश की कुलवधुए घूँघट निकाल कर, और पुत्रीय सिरढाक कर, तीव्र ध्वनि वाले विशीस्ट नूपुरो का निषेध करके मंदिर मे प्रवेश करती है l तथा पुत्र रत्न की प्राप्ति के पश्चात जीवन भर मेहंदी का स्पर्श नहीं करती ऐसी लोक मान्यता आज भी प्रचलित है l बालक का झडूला जब तक न हो तब तक उसको केसरिया वस्त्र ही पहनाये जाते है l
वर्तमान मे माताजी के मंदिर के पास धर्मशालाओ का निर्माण भी हुआ है और आधुनिकत प्रणाली से चहुमुखी विकास अग्रसर है l बिस्सो के अलावा भी सभी लोग अपनी दर्शन ,मनौती, पूजा, जात, झडूला, होम, हवन हेतु भारतवर्ष एवं विदेशो से भी आते है l
॥श्री गणेशायनमः ॥
अथ मूलमंत्र-ॐ ह्रीं आशापूराय नमः ।।
अनेन मन्त्रेंण प्राणायामश्यं कुर्यात् ।।
।। अथ हृदयादि न्यासः ।।
ॐ ॥ ह्रां हृदयाये नमः ।।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहाः ॥ ॐ ह्रुं शिखायै वषट् ।।
ॐ ह्रैं कवचाय हुम् ॥ ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ॥
ॐ ह्रः अस्त्राय फट् ।।१।।
।। अथ करन्यासः ।।
ॐ ह्रां अगुष्ठाभ्यां नमः ।। ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।।
*ह मध्यमाभ्या नमः ॥ ॐहै अनामिकाभ्यां नमः ।।
*ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।। ॐ ह्रः करतलकरप्रष्ठाभ्यांनमः ।।
॥ अथ ध्यानम।।
प्राशापूरां जगद्धात्रीं रक्तवस्त्रां चतुर्भुजाम् ।।
खड्गचापत्रिशूल श्च गदा बाणादिभिर्युताम् ।।
मृगेन्द्रवाहिनी देवी भक्तानामभयंकरीम् ।।
कच्छभुजप्रसिद्धां तां ध्याये पोकरणस्थिताम् ।
श्री अम्बा भुवनेश्वरीं भगवती कात्यायनी कालिका, कौमारी कमलोद्भवां कविकलां कामेश्वरौं कामदाम् ॥ छिन्नां पूर्णपरा गिरीश बगुलां मातंगिनीं तारणों, श्री चक्र प्रिय विन्दु तर्पण परां श्री राज राजेश्वरीम् ।।२।।
॥ इति देवी ध्यात्वा यथाशक्ति जपं कुर्यात् ।
अथ मूलमंत्र-ॐ ह्रीं आशापूराय नमः ।।
माँ आशापुराजी का सबसे प्रिय दिन शनिवार है।
इस दिन माँ के इस मंत्र का जाप करने से सभी
मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे: ।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे ।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे: ।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे: ।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे: ।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे: ।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे: ।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे: ।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे: ।
ॐ ऐंग ह्लिम क्लिं आशापुराय: विच्चे: ।
अथ आशापुरा स्तोत्रम्
ॐ अस्य श्री आशापूराअष्टोतरशतनामस्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिरनुरुप छन्दः श्री आशापुरा देवता सर्वाभिष्टसिध्यर्थे पाठे
विनियोगः ।। १॥
इति पठित्वा जलं त्यजेत्
।। अथाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ।।
आशा पूरा महामाया ह्यभेदा चैन्दवी कला ।।
आदि विद्या चादिभूता ह्यादिसिद्धि प्रदायिनी ॥ १॥
'अष्टसिद्धिप्रदा देवीं नवनिधि प्रदायिनी ।।
अन्नपूर्णा महा गौरी लक्ष्मी प्रणवरूपिणी ।। २ ।।
कमला विमला नित्या सर्वशोक निवारिणी ।।
कामक्षा भैरवी भीमा विजया च ह्य माजया ॥ ३॥
'गायत्री गोमती गंगा गीता गोत्रविवधिनी ।।
गिरिजा चंद्रघंटा च पद्मावती सरस्वती ।। ४ ।।
चामुंडा चंडिका चण्डी चूडामणिश्च चर्चिका ।।
भगिनी चक्र पाणेश्च चराचर निवासिनी ।।५।।
धन धान्या च गौ रूपा धनाढ्या धनदायिनी ।।
धर्मशा धर्मलीना च धर्मराजप्रसादिनी ॥ ६॥
धमरूप मय्यी दिव्या धर्माधर्म विचारिणी॥
सुधर्मा धर्म मर्मज्ञा घर्मिष्ठा धर्मगोचरी ॥ ७ ॥
बज्रहस्ता महामाया दुर्गा नारायणी शिवा ।।
नवंदा निर्मला नोला नवभक्ति प्रदायिनी ॥८॥
"परा विद्या परा सिद्धिः परसैन्य विनाशिनी ।।
पुष्पा पुष्पवती पुण्या परब्रह्मस्वरूपिणी ।। ६ ।।
ब्रह्माणी ब्रह्मशक्तिहि विष्णुशक्तिश्च वैष्णवी।
बैकुण्ठा वासिनी चाम्बा बैकुंठपददायिनी ॥ १० ॥
पंचवक्त्रा महाकाली कच्छभुजनिवासिनी॥
भारती भद्रकाली च कालरात्रिः कपालिनी ॥ ११ ।।
मंगला ललिता चार्या जगद्वश्यां च मोहिनी ।
महारात्रिर्महादेवी महाविद्या महोदरी ॥ १२ ॥
यज्ञकी हविर्भोक्त्री यज्ञरक्षणतत्परा॥
यज्ञे च साक्षिणी श्यामा यज्ञ कर्म फलप्रदा ॥ १३ ॥
सुफला सत्यसंकल्पा सत्यासत्य विचारिणी।
सत्यसंपद् प्रदात्री च सत्यलोकनिवासिनी ॥ १४ ।
दारिद्रयहारिणी माता सर्वदुःखविमोचिनी ।
सर्वरोग प्रहंत्री च सर्व पाप विनाशिनी ।। १५ ।।
'इदंस्तोत्रं महत्पुण्यं सर्व सौभाग्यवर्द्धनम् ।।
प्रातः काले च मध्याह्न सायं काले पठेन्नरः ।।
आशापूरा प्रसादेन तस्यसिद्धिर्भविष्यति ॥
किमत्र बहुनोक्त न सत्यं सत्यं न संशय ।
॥ इति श्री पुष्टिकरज्ञातीय विशा कुलभूषण पंडित द्वारिकादासात्मजेन श्रीनाथ शास्त्रिणां विरचितं श्री आशापूराऽष्टोतरशतनामस्तोत्रम् ॥
आशापूरा चालीसा
श्री गुरु गणपती और शारदा, नमन करू धर ध्यान ll
माँ महिमा अर्पण करू , मिले अभय वरदान ll
जय जय माँ जगदंब भवानी, तेरी महिमा कोहू ना जानी ll
जो कोई ध्यावे आशापूरा, वो जन कबहु ना रहे अधूराll
कुलदेवी तू जग हितकारी, पतित पावनी है महातारी ll
धौले गढ़ बैठी महा रानी, वरमुद्रा मे लगे सुहानीll....................(1)
रूण भूण ने की अरदासा, पूरण करदी उनकी आशा ll
भारतवर्ष कच्छ की खाड़ी, रुण भुण संग चली भवानीll
सन तेहरा सौ पंद्र: माही, माघ सुधि की तीज सुहाई ll
मरुप्रदेश पोकण मे पधारी, दर्शन पावे जाहा नर नारीll.................(2)
शीश मुकुट अरु गले मुंडमाला, भाल तिलक अरु नयन विशाला ll
केसरी वस्त्र लगे मन भावन, सौम्य स्वरूप है तेरा पावन ll
कुंडल कनक कर्ण छवि राजे, गल मोतियाँ की माला विराजे ll
सिंह पीठ पर चढ़ी भवानी, अस्ट्भुजी तू लगे सुहानीll........................(3)
चामुंडा चूड़ामणि अम्बा, भक्त तारणी जय जगदंबा ll
गौरूपा गिरिजा महामाया, तेरापार नहीं कोई पाया ll
शिवदूती कपालिनी काली, जग जननी संतान प्रतिपालि ll
रक्तदंती भ्रामरी भवानी, अस्टसिद्धि नवनिधि प्रदानीll........................(4)
शक्तिरूप है बड़ा निराला, गले मुंड अरु मुख विकरालाll
चक्रगदा धनुष कर धरणि, भक्त जनन की तू दुख हरनीll
खड़ग त्रिशूल जब हाथ सुहाई, देव असुर सब करे दुहाई ll
तेरो बल माँ नहीं कोई जानी, पार न पावे असुर अज्ञानीll......................(5)
असूरन जब जब की अनिताई, तब वध कर माँ कीन्ही सहायी ll
मधु कैटभ महिसासुर मारे, रक्तबीज को मार पछारे ll
शुंभ निशुंभ दो दैत्य विशाला, किन्हों वध ले परसा भाला ll
काली रूप धरे जब रानी, असुर संहारे जग कल्याणीll.............................(6)
युद्ध विजय कर देवी आई, देव गणों ने मंगल गायी ll
यक्षनाग गंधर्व यश गावे, पुलकित होकर पर्व मनावे ll
हर्षित ध्वनि चहूदिशी छाई, जय जय हो जय अम्बे मायी ll
जय आशपुरा जय नारायणी, किसविध महिमा करू बखानी ll...........................(7)
महातम्य मारकन्ड्य बतावे, पौराणिक यहा कथा सुनावे ll
सुरथ वैश्य हर्षित चितलाई, मृदा मूरत तब दौ बनाई ll
सरिता तट पर थापित किनहा, शने शने अन जल ताज दीन्हा ll
प्रसन्न भई तब देवी भवानी, मनवांछित फल दियो दयानि ll.......................(8)
शंख नाद घंटा ध्वानि बाजे, सिंह नाद गर्जन कर साजेll
मात मुमुक्षी देवी प्रतिपालि, जय दुर्गा जय काली कपाली ll
जय क्षमे क्षमा शिव प्यारी, अर्ध अंगमे शिव ने धारी ll
यज्ञ कर्म जीतने जग जानी, स्वाहा नाम पे पूरन मानीll............................(9)
जो नर सत चित ध्यान लगावे, भक्त नरोत्तम वो ही कहावे ll
धूप दीप नैवैध्य अरगजा, करहूं पूजन नित्या गवरजा ll
नटवरलाल बाल तेरो मायी, भक्ति ज्ञान का बोध कराईll
आशपुरा हे आद्यभावनी , नत मस्तक हु तोरे चरणों माही ll ..............................(10)
माँ पद राज सिरधारी के निर्भय हुआ है बाल ll
न्योछावर माँ चरणन मे बिस्सा नटवारलाल ll