पंचांग में तिथियों वार और नक्षत्रों का सम्पूर्ण विवेचन

 पंचांग तिथियों वार और नक्षत्रों का सम्पूर्ण विवेचन

और उनके देवता तथा उनके पूजन का फल

ज्योतिष 5 पक्ष तिथि वार

पंचांग                         

भारत मे पंचांग का अपना विशिष्ट स्थान है।भारत व्रत, त्यौहार, उत्सव, मांगलिक कार्येा का देश है।  ये यहा की संस्कृति मे रचे-बसे है। पंचांग का मूल उद्देश्य विभिन्न व्रत, त्यौहार, उत्सव, मांगलिक कार्य की जांच करना है।

हिन्दू प्रणाली से पंचांग के विभिन्न तत्वो के संयोजन से शुभ और अशुभ क्षण (योग) का गठन करना है। इसके आलावा सप्ताह के दिन, तिथि, योग, नक्षत्र, करण आदि को विशिष्ट गतिविधियो के लिए निर्धारित किये  गये   उनके उतार-चढाव का ज्ञान है। एक शुभ समय निर्धारित करने के लिए पंचांग शुद्धि मौलिक है।  इसके अलावा अनुकूल पारगमन, शुद्ध लग्न, अशुभ योगो की अनुपस्थिति, अनुकूल दशा (हिंदू प्रगति), कर्ता का नाम, प्रस्ताव, मंत्रो का जप, गतिविधि की जगह, सामाजिक रीति-रिवाज, सगुन, श्वास के तरीके का परिक्षण भी पंचांग की मौलिकता  है।  

पञ्चाङ्ग परिभाषा- जिस पत्रक द्वारा कलान्तर्गत वार, तिथि, योग, नक्षत्र, करण इन पांचो  का ज्ञान हो उसे  पंचाग कहते  है। वैसे सौर, चांद्र, बृहस्पतस्य, सावन, नाक्षत्र इन पांच प्रकार के काल के अंगो का ज्ञान जिस पद्धति से हो उसे भी पंचांग कहते है। पंचांग का शाब्दिक अर्थ है :- पञ्च + अंग अर्थात जिसके पांच अंग हो।इनके आलावा भी पंचाग मे अयन, ऋतु, मास, पक्ष, ग्रह, ग्रहो के उदयास्तादि, लग्न सारणिया, विवाहादि अनेक प्रकार के मुहूर्त्त, व्रत त्योहारो का दिन समय, वर्ष फल, राशि फल आदि अनेक जानकारिया दी रहती है। 

उत्पत्ति : वैदिक अनुष्ठानो के लिये समय शुद्धि और समय रखना महत्वपूर्ण था और वैदिक युग मे खगोलीय पिण्डो पर नजर रखना और भविष्यवाणी के लिये समय रखना, अनुष्ठानो के लिये दिन और समय तय करना ज्योतिष का क्षेत्र था। यह अध्ययन छह मे एक प्राचीन वेदांग या वेदो से जुडी सहायक विज्ञान मे से था। प्राचीन भारतीय संस्कृति ने वेदिक अनुष्ठानो के लिए पद्धति और दिनदर्शक (पंचांग) रखने के लिए एक परिष्कृत समय विकसित किया।
कुछ का मानना है कि समय रखने की यह पद्धति "मेसोपोटामिया" मे विकसित हुई। चायनीज योंकिओ ओहाशी का कहना है कि यह वेदांग क्षेत्र प्राचीन भारत मे वास्तविक खगोलीय अध्ययन से विकसित हुआ है। वैदिक ज्योतिष विज्ञान के ग्रंथो को दूसरी और तीसरी शताब्दी सीई मे चीनी भाषा मे अनुवादित किया गया था, और खगोल विज्ञान पर ऋग्वेदिक मार्ग झू जियानियान और झी कियान के कार्यो मे पाये जाते हैं।
वैदिक ग्रंथो मे समय-सारिणी के साथ-साथ सौर और चंद्रमा आंदोलनो की प्रकृति का उल्लेख किया गया है। उदाहरण के लिए कौशितकी ब्राह्मण अध्याय 1 9.3 मे सूर्य के सापेक्ष स्थान मे 6 महीने के लिए उत्तर की दिशा मे बदलाव, और दक्षिण मे 6 महीने के लिए बदलाव का उल्लेख है।

भारतीय ज्योतिष गणित पद्धति का आधार भारतीय खगोल वेत्ताओ द्वारा ग्रह, तिथि इत्यादि के लिए बनाये गए आर्ष सिद्धांत है। और इन्ही आर्ष सिद्धान्तो पर भारत के विभिन्न स्थानो से कई पंचांग विभिन्न मतो अनुसार बनाये जाते है। भारत मे आजकल जो सिद्धांत प्रचलन मे है उनके अनुसार दृश्य गणना पर ग्रह इत्यादि पंचांगो मे दर्शित स्थानो पर नही दिखते, इसका बोध प्राचीन खगोल वेत्ताओ को रहा होगा ! भारत वर्ष धर्म प्राण देश है और धार्मिक कृत्यादि के लिये "आर्ष सिद्धान्तो" पर आधारित तिथ्यादि मान ही प्रामाणिक है।
सूक्ष्मकाल का ज्ञान आशक्य है, किन्तु फिर भी वास्तविकता के समीप का ज्ञान हो वही श्रेष्ठ है। प्रायः ग्रहो की गति मे वैलक्षण्य होने से कालांतर मे तिथ्यादि मान मे अन्तर हो जाया करता है, इसलिए प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थो मे संसोधन होता आया है और आज भी इसकी आवश्यकता है।

आजकल पंचांग के विषय मे भारत मे मतभेद चल रहे है। वर्तमान समय मे प्राचीन पंचांग पद्धति सिद्ध ग्रहो के संचार मे काफी अन्तर आ गया है वे प्रत्यक्ष ग्रह से नही मिल पाते इसलिए नवीन वेदोलब्ध पद्धति सिद्ध सूक्ष्मासन्न होने से वही ग्रहण करना चाहिये।
आजकल ग्रीनविच पंचांग अनुसार बने ग्रह इत्यादि जैसे पंचांग बनाने की सम्मति कई एक विद्वानो की है और कई एक बनाते भी है उनका मत है कि जब सब ग्रह इत्यादि प्रत्यक्ष है तो सब विषय प्रत्यक्ष सिद्ध लेना चाहिये। परन्तु इन पंचांगों मे भी अयनांश का मतभेद है। पाश्चात्य देशो मे सायन और भारत मे निरयण सिद्धांत से पंचांग बनाये जाते है। दोनो मे अयनांश का अंतर है। किन्तु भारत मे प्रचलित अलग-अलग सिद्धान्तो के अनुसार अयनांशो मे अंतर है और भारत मे ही लगभग 12 प्रकार के अयनांश प्रचलित है।

विभिन्न मतो अनुसार 'शका: 1895 वर्षारम्भ पर अयनांश निम्नांकित थे।
➤ ग्रहलाघव मत 23 अंश, 41 कला, 00 विकला, गति 60 विकला प्रतिवर्ष।
➤ केतकर मत 21 अंश, 02 कला, 57 विकला, गति 50 विकला 13 प्र. वि. प्रति वर्ष।
➤ मकरन्दिय मत 21 अंश, 39 कला, 36 विकला, गति 54 विकला प्रति वर्ष।
➤ सिद्धांत सम्राट मत 20 अंश, 40 कला, 17 विकला, गति 51 विकला प्रति वर्ष।

पंचांग सुधार समिति calendar reform committee भारतीय राष्ट्रिय पंचांग I N C
भारतीय स्वतंत्रता के बाद सन 1952 मे भारत सरकार ने एक पंचांग सुधार समिति calendar reform committee का गठन मेघनाथ शाह और एन सी लाहिरी की प्रमुखता मे किया। इसके निष्कर्ष अनुसार भारत सरकार ने शक: संवत को भारतीय संवत की मान्यता दी और चैत्रादि को मासारम्भ माना, तदनुसार 22 मार्च 1957 से एक चैत्र 1879 शक: गणना प्रारम्भ है। इसके मास तथा उनके दिन इस प्रकार है :-
(1) चैत्र 30 / 31* (2) वैशाख 31 (3) ज्येष्ठ 31 (4) आषाढ़ 31 (5 ) श्रावण 31 (6) भाद्रपद 31 (7) आश्विन 3 0   (8) कार्तिक 30 (9) अगहन 30 (10) पौष 30 (11) माघ 30 (12) फाल्गुन 30 * लीप ईयर 31
इसी समिति की सिफारिश अनुसार "चित्रा पक्षीय" अयनांश को मान्य किया। इस अनुसार ईसवी सन 285 या शक: 207 मे अयनांश शून्य था अर्थात सायन और निरयण भचक्र का प्रारम्भ मेष राशि के वसंत संपात बिंदु से साथ-साथ था। यह समय 22 मार्च 285 रविवार भारतीय प्रामाणिक समय I S T 21 घण्टे 27 मिनिट था। इस समय चित्रा नक्षत्र SPICA STAR के सायन निरयण दोनो की लम्बाई 180 । 00 । 03 थी। इसी दिन मध्यम सूर्य की लम्बाई 360 अंश थी।
पंचाग सुधार समिति के सुझाव अनुसार भारत सरकार अधीन भारतीय खगोल एेफेमेरीज ने अयनांश 5". 8 कम कर चित्रा पक्षीय अयनांश को ग्रहण किया। इसी सिफारिस अनुसार 21 मार्च 1956 से अयनांश 23 अंश 15 कला  प्रचलन मे है। इसी मे सन 1985 मे अत्यंत अल्प 0". 658 का सुधार किया गया। इस प्रकार 01 जनवरी 2010 को अयनांश 24 अंश, 00 कला, 05 विकला और गति 50 विकला प्रतिवर्ष थी।

पंचांगीय सिद्धांत
भारत मे प्रायः तीन सिद्धांत प्रचलित है। 1 दक्षिण भारत  मे आर्यसिद्धांत, 2 मध्य भारत मे ब्रम्ह सिद्धांत, 3 उत्तर भारत मे सूर्य सिद्धांत और सूर्य सिद्धान्तानुसार बने करण ग्रंथो का। इनमे ब्रम्ह सिद्धांत और सूर्य सिद्धांत प्रायः तुल्य ही है। किन्तु ब्रम्ह सिद्धांत, वशिष्ठ सिद्धांत, वराह मिहर, कमलाकर आदि विद्वानो के अनुसार योग्य नही है। इसलिए सूर्य सिद्धांत  पद्धति सिद्ध या प्रत्यक्ष वेधोपलब्ध या केवल सूर्य सिद्धान्तीय गणित ही मान्य है।

भारत मे ग्रहलाघव, मकरंदीय, ब्रम्हपक्षीय, सौरपक्षीय, वधोपलब्ध, दृश्यपक्षीय, चित्रापक्षीय, खगोलसिद्ध, निरयण भारतीय पद्धतिसिद्ध इत्यादि कई प्रकार के पंचांग विभिन्न स्थानो से प्रकाशित होते है। ग्रहलाघवी और मकरंदीय पंचांग गणित सरल है। समयानुसार संशोधन और मतैक्यता की आवश्यकता है। साधारण ज्योतिषी को गणित की अशुद्धता से बचने के लिये अपना निकटवर्ती पंचांग लेना चाहिये।
वर्तमान मे ज्योतिष सॉफ्टवेयर का प्रचलन है। इनमे विभिन्न अयनांश दी रहती है। अतः सर्वमान्य चित्रा पक्षीय या एन सी लाहिरी अयनांश लेना चाहिये। इनमे दैनिक पंचांग भी दिया रहता है इसे अक्षांश, देशांश से अपने स्थान का बना सकते है।

पंचांग परिचय
भारतीय पंचांग विदेशो के अलमनक almanac या एेफेमेरीज ephemeris से भिन्न प्रकार के होते है। इनमे से अधिकतर आर्षसिद्धान्तो के अनुकूल धर्मकृत्योपयोगी होते है। ये पंचांग किसी स्थान विशेष के अक्षांश, देशांश द्वारा बनाये जाते है। प्रयोग मे हमेशा निकटवर्ती पंचांग ही लेना चाहिये। प्रत्येक पंचांग में दी विधि से उसे स्थानीय पंचाग  बना सकते है।
प्रत्येक पंचांग मे दिये गये तिथ्यादि मान (तिथि, योग, नक्षत्र, करण) सूर्योदय काल से समाप्ति काल घटी पल अथवा घंटा मिनिट मे दिया रहता है। एक अहोरात्र मे दो करण होते है, पंचाग मे सूर्योदय से जो प्रथम करण होता उसका समाप्ति काल दिया रहता उसके बाद उस तिथि के द्वितीय दल का करण होता है।  किसी-किसी पंचाग में दोनो करण दिये रहते है। नक्षत्र, योग, कारण प्रायः संकेतित शब्दो में लिखे रहते है और कई के संकेतित शब्द समान होते है अतएव ध्यान रखे।
इसके अलावा प्रत्येक दिन की चन्द्र राशि और राशि प्रवेश का समय दिया रहता है। इसके साथ जहा का पंचांग हो वहा का सूर्योदय, सूर्यास्त भारतीय प्रामाणिक समय घंटा मिनिट मे दिया रहता है। साथ ही विभिन्न प्रकार की तारीखे रहती है। अधिकतर पंचांगो मे उस दिन का प्रातः स्पस्ट रवि, दिनमान, रात्रिमान, मिश्रमान आदि तथा उसी कालम मे आगे व्रतादि, मुहूर्त, ग्रहो का राशि या नक्षत्र प्रवेश का समय व उदय अस्त, वक्री-मार्गी आदि जानकारिया दी रहती है।
अधितर पंचांग प्रत्येक पृष्ठ पर 15 दिन (पाक्षिक) का पंचांग देते है, सबसे ऊपर माह, पक्ष, संवत, शक:, अंग्रेजी तारीख, सूर्य का अयन, गोल, ऋतु आदि दिया रहता है। कुछ पंचागो मे प्रतिदिन और कुछ मे सातदिन (साप्ताहिक) ग्रह स्पस्ट दिए रहते है।  कुछ पंचांग मिश्रकाल और कुछ अन्य इष्ट के ग्रह देते है।  ग्रहो की दैनिक गति, उदयास्त, वक्री-मार्गी, नक्षत्र प्रवेश आदि भी देते है।
कुछ पंचाग दैनिक लग्न प्रवेश, चंद्र के नवमांश प्रवेश का समय, संक्राति फल, ग्रह का नवांश चरण प्रवेश, शर, क्रांति, दैनिक योग, ग्रहण, आदि देते है। इसके अलावा कई पंचांग सूर्य क्रांति सारिणी, विभिन्न स्थानो की लग्न सारिणी,  दशम सारिणी, साम्पतिक काल, अयनांश, मुहूर्त, वर्ष फल, राशि फल, व्रत का निर्णय इत्यादि देते है।

⊛ पंचांग मे वृद्धि तिथि लिखकर दूसरे दिन का नक्षत्र, योग, करण लिखते है किन्तु क्षय तिथि केवल लिख देते है उसके आगे कुछ नहीं लिखते है।
⊛ जब एक ही दिन में दो तिथि सम्मलित हो तो जो तिथि सूर्योदय के समय हो उसका मान लिखकर आगे के कालम मे नक्षत्र आदि का मान लिखते है। उसके नीचे कुछ पंचांग सम्मलित (विलोम) तिथि का मान लिखकर वही वार और नक्षत्रादि कुछ नही लिखते है।   
⊛ प्रत्येक पंचांग मे उसमे समावेश किये गये विषयो की जानकारी दी रहती है उसे देख लेना आवश्यक है। 
⊛ पंचांगों मे प्रयुक्त सांकेतिक शब्द :
दि. मा. = दिनमान। ति. = तिथि।  घ. = घटी। प. = पल।  वि. = विपल।  घं. = घण्टा। मि. = मिनिट।  से. = सेकण्ड।  न. = नक्षत्र।  यो. = योग।  क. = करण। अं. = अंग्रेजी तारीख।  रा. = राष्ट्रीय (भारतीय) तारीख।         भा. ता. = भारतीय तारीख।  ता. = तारीख।  ई. = ईसवी।  सू. उ. = सूर्य उदय।  र. उ. = रवि उदय।  सू. अ. = सूर्य अस्त।  र. अ. = रवि अस्त।  मि. मा. = मिश्रमान (मध्यरात्रि) पू. = पूर्व।  प. = पश्चिम।  उ. = उत्तर।  द. = दक्षिण।  भ. = भद्रा।  उ. उपरान्त। व. = वक्री। मा. = मार्गी।  शू. = शून्य। अ. = अमृत।  ब. =बंगला। प्रा. स्प. सू. = प्रातः स्पस्ट सूर्य। मेषार्क = मेष मे अर्क। व. वर्ष। मा. = मास। दि. = दिन। मा. मार्गी। व. = वक्री।

पाश्चात्य पंचांग  - अलमनक almanac या एेफेमेरीज ephemeris
यह इंग्लैंड मे ग्र्रीनविच  की वेधशाला observatory के आधार पर तैयार किया जाता है। इसमे हर्षल, न्येपचुन,  प्लूटो ग्रह की स्थति भी दी रहती है। ग्रह और राशि के नाम की जगह उनके चिन्ह दिए रहते है। दृष्टि aspect आदि भी चिन्ह मे दिये जाते है।
➧ अलमनक आंकड़े  : प्रत्येक 12. 5 मिनिट मे सॅटॅलाइट से प्रसारित और जी पी एस रिसीवर से प्राप्त आंकड़े होते है, ये स्थूल होते है। ये आंकड़े कई महीनो तक माने जाते है।
➧ एेफेमेरीज आंकड़े  : प्रत्येक 30 सेकण्ड मे सॅटॅलाइट से प्रसारित और जी पी एस रिसीवर से प्राप्त आंकड़े होते है, ये सूक्ष्म होते है। ये 30 मिनिट ही मान्य होते है
⊛ सावन दिन apparent day- इसमे सूर्य के मध्यान्ह से दूसरे दिन के मध्यान्ह तक का समय सावन दिन कहलाता है। इसका मान कम-ज्यादा होता रहता है अतः मध्यम मान निकल कर दिया जाता है।
⊛ मध्यम सावन दिन - इसका काल 24 घण्टा होता है। सूर्य की गति 59'-8" मानकर सूर्य विषुववृत्त घूमता है ऐसा माना गया है। यह मध्यम सूर्य मध्यान्ह मे आकर अस्त होता है दूसरे दिन फिर उदय होकर फिर मध्यान्ह मे आता है. अतः एक मध्यान्ह से दूसरे दिन की मध्यान्ह तक 24 घण्टा मानते है।
⊛ नाक्षत्र दिन sidereal day - मध्यान्ह मे तारा आदि उदय होकर मध्यान्ह तक आने का समय नाक्षत्र दिन या नाक्षत्र काल कहलाता है। इस नाक्षत्र काल को ही साम्पात्तिक काल sidereal time कहते है। वेधशाला मे देखने को यह घड़ियाल रहती है। सम्पातिक काल पृथ्वी की दैनिक गति से बनता है। यह सावन काल मान से 23 घण्टा   56 मिनिट 4. 40906 सेकण्ड   का होता है। यह हमेशा एकसा रहता है। 
⊛ मध्यम सूर्य - इसका उदय ठीक 6 बजे, 12 बजे मध्यान, 18 बजे अस्त होता है।
  
संवत्सर 
संवत्सर वैदिक साहित्य जैसे ऋग्वेद और अन्य प्राचीन ग्रंथों मे "वर्ष" के लिए संस्कृत शब्द है। मध्ययुगीन साहित्य मे, एक संवत्सर "बृहस्पति वर्ष" को संदर्भित करता है, जो एक वर्ष बृहस्पति ग्रह की सापेक्ष स्थिति के आधार पर होता है। 
प्राचीन पाठ सूर्य सिद्धांत अनुसार बृहस्पति वर्ष की गणना 361.026721 दिन या पृथ्वी आधारित सौर वर्ष की तुलना मे 4.232 दिन कम है।  इस अंतर के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक 85 सौर वर्ष (~ 86 जोवियन वर्ष) मे लगभग एक बार, नामित संवत्सर मे से एक को निकाला जाता है (एक छाया वर्ष के रूप मे छोड़ दिया जाता है) इससे दोनो कैलेंडर समक्रमिक हो जाते है।  हालांकि, समक्रमिक का विवरण उत्तर और दक्षिण भारतीय कैलेंडर के बीच थोड़ा भिन्न होता है। संवत्सरो का क्रम चांद्र वर्ष और बृहस्पति मत मे एक जैसा ही रहता है। संवत्सरो का महत्व पंचांग मे वर्ष के नामकरण तथा उनके नाम अनुसार वर्ष के फल मे विशेष है। संवत्सर 60 होते है और ब्रम्ह विंशतिका, विष्णु विंशतिका, चन्द्र विंशतिका  प्रत्येक मे 20 संवत्सर होते है।

ब्रम्हविंशतिका                  विष्णुविंशतिका                  चन्द्रविंशतिका
01 प्रभव                          21 सर्वजीत                        41 प्लवङ्ग
02 विभव                         22 सर्वधारी                        42 कीलक
03 शुक्ल                          23 विरोधी                         43 सौम्य
04 प्रमोद                         24 विकृत                           44 साधारण
05 प्रजापति                     25 खर                               45 विरोधकृत
06 अंगिरा                        26 नंदन                            46 परिधावी
07 श्रीमुख                        27 विजय                          47 प्रमादी
08 भाव                           28 जय                              48 आनन्द
09 युवा                           29 मन्मथ                          49 राक्षस 
10 धाता                          30 दुर्मुख                           50 नल
11 ईश्वर                          31 हेमलम्ब                        51 पिंगल 
12 बहुधान्य                     32 विलम्ब                         52 कालयुक्त
13 प्रमाथी                        33 विकारी                         53 सिद्धार्थ
14 विक्रम                        34 शर्वरी                            54 रौद्र
15 वृष                             35 प्लव                            55 दुर्मति
16 चित्रभानु                     36 शुभकृत                         56 दुन्दभि
17 सुभानु                        37 शोभन                           57 रुधिरोदारी
18 तारण                         38 क्रोधी                            58 रक्ताक्ष
19 पार्थिव                        39 विश्वावसु                       59 क्रोधन
20 व्यय                           40 पराभव                         60 क्षय 

संवत्सर की गणना
१  शलिवाहन शक: मे 12 जोड़कर 60 का भाग दे, जो शेष बचे वह उपरोक्त क्रम मे संवत्सर होता है। इसकी गणना चैत्र शुक्ल प्रतिप्रदा शक: वर्ष से होती है।
२ विक्रम संवत मे 9 जोड़कर 60 का भाग दे, जो शेष बचे वह उपरोक्त क्रम मे संवत्सर होता है। इसकी गणना विक्रम सम्वत अनुसार होती है।  जैसे कही चैत्र से तो कही कार्तिक होती है।
३ बृहस्पति मत से गणना शक: को दो जगह रखकर 22 से गुना करे, फिर पहले गुणन फल मे 4251 जोड़कर 1875 का भाग दे लब्धि अंक को दूसरी जगह की संख्या मे जोड़ना योगफल मे 60 का भाग देना जो शेष बचे वही बृहस्पति मत से गत संवत्सर होगा, उससे आगे का जन्म संवत्सर होगा।
संवत्सर का भोग्य - पहली जगह के शेष मे 12 का गुणा कर 1875 का भाग दे, लब्धि माह होगे शेष मे 30 का गुणा करे योगफल मे 1875 का भाग दे लब्धि दिन होगे।  इसे 12 माह मे से घटाने पर भोग्य काल होगा।

वर्ष   काल प्रकार
यो तो सूर्यादि रश्मिवश काल सात प्रकार के होते है परन्तु व्यवहार मे केवल पांच प्रकार के आते है। 1 सौर,           2 चांद्र, 3 सावन, 4 नाक्षत्र 5 बृहस्पतस्य।
1 सौर काल - प्रत्येक नक्षत्र के साथ सूर्य से जो काल में विलक्षणता आती है वह सौर काल है।
2 चांद्र काल - चंद्र के शुक्ल से जो काल मे हानि वृद्धि होती है उसे चंद्र काल कहते है।
3 सावन काल - सूर्य के उदय अस्त से जो काल मे विलक्षणता आती है उसे सावन काल कहते है। यह सामान्यतया वर्ष कहलाता है।
4 नाक्षत्र काल - प्रत्येक नक्षत्र के साथ चन्द्रमा से काल में जो विलक्षणता आती है उसे नक्षत्र काल कहते है।
5 बृहस्पति काल - गुरु ग्रह के नक्षत्रो के साथ जो काल मे विलक्षणता आती है उसे बृहस्पति काल कहते है।

सौर वर्ष - सूर्य के द्वादश राशि 360 अंश के भोग से एक सौर वर्ष होता है। यह सूर्य की गति पर आधारित है। इसका प्रारम्भ सायन सूर्य की मेष संक्रांति या वैशाखी से होता है। एक सम्पूर्ण वर्ष 365 दिन, 15 घटी, 22 पल, 52. 30 विपल अथवा 365 दिन, 6 घण्टा 9 मिनिट, 9 सेकण्ड का होता है। 
चांद्र वर्ष - यह चन्द्रमा की गति पर आधारित होता है। यह 360 तिथि का होता है। एक चान्द्र वर्ष मे 354 अहोरात्र या सावन होते है। यह सौर वर्ष से कम दिनो का है। 
चंद्र नक्षत्र वर्ष - यह चन्द्रमा के 27 नक्षत्रो को भोगने से बनता है। एक चांद्र नक्षत्र वर्ष 327 दिन, 10 घंटा, 38 मिनिट, 18. 12 सेकण्ड का होता है।
सावन वर्ष - यह 360 दिन-रात / सावन / अहोरात्र का एक वर्ष  है। एक अहोरात्र 60 घटी या 24 घण्टे का होता है। 
बृहस्पतस्य वर्ष - यह मध्यम बृहस्पति के एक राशि का भोग काल समय है।  यह 361 अहोरात्र का होता है। इसे संवत्सर भी कहते है। संवत्सर 60 होते है।

वर्षमान - वर्तमान शोध अनुसार एक वर्ष 365 दिन, 6 घण्टा, 9 मिनिट, 10.5 सेकंड का होता है। अन्य सिद्धान्तो अनुसार वर्षमान निम्नानुसार है :-

        मत                                        दिवस      घटी       पल         विपल        प्र. वि.
1    आर्य सिद्धांत                              365        15         31          30             00
2    सूर्य सिद्धांत वराह मिहिर                 365        15         31          31             24
3    पोलिश सिद्धांत                           365        15        30           00             00
4    लोमेश सिद्धांत                            365        14        48           00             00
5    सिद्धांत शिरोमणि                        365        15        30           22             30
6    ब्रम्हगुप्त सिद्धांत                          365        15        30           22             30
7    ग्रह लाघव                                  365        15        31           30             00
8    सन सिद्धान्त सायन                     365        15        02           53             00
9    आधुनिक शोध                            365        15        22           56             37                    

सूर्य से अयन
सूर्य भी अपनी परिधि पर चक्कर लगा रहा है इसी वजह से वर्ष मे दो अयन उत्तरायण (सौम्यायन) और दक्षिणायन (याम्यायन) होते है।  स्थूल मान से प्रत्येक अयन छह माह का होता है। पंचाग कार्यो और ज्योतिष कार्यो मे इनका बहुत महत्व है।
उत्तरायण - इसे सौम्यायन भी कहते है। सूर्य के मकर से मिथुन राशि तक परिभ्रमण का काल उत्तरायण है। इसका काल सायन सूर्य की मकर संक्राति 22 दिसम्बर से कर्क संक्रांति तक होता है। यह समय देवताओ का दिन और राक्षसो की रात्रि का है। उत्तरायण मे सभी शुभ कार्य, गृह प्रवेश, विवाह, देव प्रतिष्ठा, धार्मिक कृत्य, दीक्षा, मुण्डन, यज्ञोपवीत संस्कार, शिक्षा आदि शुभ है।
उत्तरायण फलादेश - जिसकी मृत्यु उत्तरायण में होती है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है, ऐसा शास्त्रो का मत है । पौराणिकता अनुसार महाभारत मे भीष्म पितामह ने अपने प्राण उत्तरायण मे त्यागे थे। उत्तरायण मे जन्म लेने वाला जातक प्रसन्नचित्त, धार्मिक, पतिव्रता, सुन्दर, तथा विवेकी होता है। उसे कुटुंब सुख, श्रेष्ठ भार्या तथा पुत्र की प्राप्ति होती है। ऐसा जातक हमेशा सदाचारी, श्रद्धावान, दीर्घायु होता है।

दक्षिणायन - इसे याम्यायन भी कहते है। सूर्य के कर्क राशि से धनु भ्रमण का समय दक्षिणायन है। इसका काल सायन सूर्य की कर्क संक्रांति 21 जून से मकर संक्रांति तक होता है। इस समय असुरो का दिन और सुरो की रात्रि होती है। इसमे समस्त अशुभ कार्य सफल होते है।
दक्षिणायन फलादेश - जातक के मन का रहस्य पाना मुश्किल है।  इसमे उत्पन्न जातक आलोचक, अपनी चीजो और पैसो को सम्हाल कर रखने वाला, कृषक, भागीदारी से उन्नति करने वाला, पशु पालक, अच्छे भोजन और अच्छे वस्त्र के प्रति विशेष रुचिवान होता है।

ऋतुऐ
सामान्यतया वर्ष मे तीन ऋतुऐ होती है वर्षा, शीत, ग्रीष्म।  किन्तु सायन सूर्य के मकरादि दो-दो राशि भोग के कारण छह ऋतुऐ होती है। (1) 10 -11 मकर-कुम्भ शिशिर, (2) 12-1 मीन-मेष वसन्त, (3) 2-3 वृषभ-मिथुन ग्रीष्म, (4) 4-5 कर्क-सिंह वर्षा, (5) 6-7 कन्या तुला शरद, (6) 8-9 वृश्चिक-धनु हेमन्त।

जातक फलादेश
1 शिशिर ऋतु - जातक परोपकारी, न्यायप्रिय, मितभाषी, अधिक मित्र वाला, अपमान नही सहने वाला, जल प्रिय, सुन्दर स्वरुप, स्वस्थ, विलम्ब से कार्य करने वाला, साधु हृदयी, कामी होता है।
2 वसन्त ऋतु - जातक पुष्ट शरीरी, स्वस्थ स्नायु वाला, तीव्र घ्राण शक्ति वाला, उद्योगी, मनस्वी, तेजस्वी, बहुत कार्य करने वाला, देशाटन करने वाला, रसो का ज्ञाता होता है।
3 ग्रीष्म ऋतु - जातक क्रश शरीरी, भोगी, लेखक, स्वाध्यायी, प्रवास का शौकीन, बहुत कार्य प्रारम्भ करने वाला, क्रोधहीन, क्षुधातुर, कामी, लाम्बाकद, शठ, सुखी-दु:खी, अपवित्र होता है।
4 वर्षा ऋतु -  जातक ईमली, आवंला, दही आदि खट्टे पदार्थो का शौकीन, माता से विशेष प्रेमवान, गुणी,     भोगी, राजमान्य, जितेन्द्रिय, चतुर, मतलबी होता है।
5  हेमन्त ऋतु - जातक कामवासना युक्त, व्यसनी, पेट रोगी, श्रद्धावान, हीरे जवाहरात का शौकीन, परिवार पालक, व्यापारी, कृषक, धन-धान्य युक्त, तेजस्वी, लोक मान्य होता है।
6 शरद ऋतु - जातक योगी, आध्यत्मिक, सत्संगी, कार्य कुशल, पुष्ट शरीरी, रोगी, तेजहीन, भयभीत, निष्ठूर, छोटी और मोटी  गर्दन वाला, लोभी, अंत मे संसार से विरक्त होता है।

मास
मेषादि राशियो मे सूर्य के रहने से जिस-जिस चंद्र मास में अमावस्या होती है, वे क्रम से 12 मास होते है। इनके नाम इस प्रकार है :- 1-चैत्र 2-वैशाख, 3-ज्येष्ठ, 4-आषाढ़, 5-श्रावण, 6-भाद्र, 7-आश्विन, 8-कार्तिक, 9-मार्गशीर्ष, 10-पौष, 11-माघ, 12-फाल्गुन।
इनका नाम सादृश्य है और इनसे कोन से दिन कोन सा नक्षत्र होगा, इसका अनुमान कर सकते है। जिस मॉस की पूर्णिमा पर जो नक्षत्र होता है उससे उस मास का नाम निश्चित किया गया है। जैसे चैत्र मास की पूर्णिमा पर चित्रा नक्षत्र होने से चैत्र नामकरण हुआ। इसी प्रकार अन्य नक्षत्रो से विभिन्न मास का नाम निश्चित किया गया है। इन्हे नक्षत्र संज्ञक मास भी कहते है।
वैदिक मास - तैत्तिरीय संहिता मे 12 महीनो के नाम मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभस, नभस्य, इष, ऊर्ज, सहस, सहस्य, तपस, तपस्य आये है।
इसी प्रकार ईसवी सन के 12 महीनो के नाम 1- जनवरी, 2- फरवरी, 3- मार्च, 4- अप्रैल, 5- मई, 6- जून, 7- जुलाई, 8- अगस्त, 9- सितम्बर, 10- अक्टूम्बर, 11- नवम्बर, 12- दिसम्बर। इन महीनो और ईसवी सन  को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता है।

मासज्ञान
1 चांद्र मास  - शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से कृष्ण पक्ष की अमावश्या तक एक चान्द्र मास होता है।
2 सौर मास  -  सूर्य की एक राशि संक्रमण से दूसरी राशि संक्रमण तक का समय सौर मास है।
3 सावन मास - कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तक का सावन मास है।
4 नक्षत्र मास - नक्षत्र से नक्षत्र  तक चंद्र भ्रमण का समय चैत्रादि नक्षत्र मास कहलाता है।

कार्य भेद से मास ज्ञान - विवाहादि कार्यो मे सौर मास, यज्ञादि मे सावन मास या सावन संज्ञक मास, पितृ कार्य मे  चांद्र संज्ञक मास, व्रतादि मे नक्षत्र संज्ञक मास ग्रहण करना चाहिये।

चंद्र मास निर्णय - चांद्र मास दो प्रकार का होता है। 1- अमांत 2- पूर्णिमान्त
1- अमांत मास - यह शुक्ल प्रतिपदा से कृष्ण अमावस्या तक होता है। यह समस्त दक्षिण भारत तथा महाराष्ट्र मे प्रचलित है।
2- पूर्णिमान्त मास - यह कृष्ण प्रतिपदा से शुक्ल पूर्णिमा तक होता है।  यह समस्त उत्तर भारत में प्रचलित है।
➧ टिप्पणी :- अमांत और पूर्णिमान्त मास मे उत्तर भारत मे मास गणना मे एक माह का अंतर आ जाता है।  उत्तर भारत मे चैत्र कृष्ण हुआ तो दक्षिण भारत मे फाल्गुन कृष्ण कहेगे।  अतः दक्षिण भारत या महाराष्ट्र मे कृष्ण पक्ष मे एक माह का अंतर होता है जबकि शुक्ल पक्ष मे कोई अंतर नही होता है।

क्षयमास व मलमास ज्ञान
इसके निर्णय मे चंद्र मास लिया जाता है। जिस मास मे सूर्य की संक्राति नही हो अर्थात जिस मास मे सूर्य की राशि परिवर्तन नही हो वह अधिमास या मलमास कहलाता है। जिस मास में सूर्य की दो संक्रान्ति हो जाय वह क्षयमास होता है। क्षयमास कभी-कभी होता है। यह केवल कार्तिक, अगहन, पौष माह मे ही होता है।
सौर मास और चांद्र मास के वर्ष मे लगभग दस दिवस का अंतर है। इस अंतर को दूर करने का उपाय नही किया होता तो चांद्र मास का कोई ठिकाना नही रहता, गर्मियो के महीने सर्दियो और वर्षा मे आते रहते जैसे यवनो के रमजान।
इसलिए भारतीय खगोल वेत्ताओ ने प्रति तीसरे वर्ष एक अधिक मास रखकर इस अनिश्चिता को दूर कर लिया, तथा कोई सूक्ष्म अन्तर नही रहे इस हेतु क्षयमास की योजना रखी। इस प्रकार प्रत्येक 19 वर्ष और 141 वर्ष मे एक चान्द्र मास क्षीण कर दिया यानि उस वर्ष मे चान्द्र वर्ष बारह माह का नही होकर ग्यारह माह का होता होता है।  इस प्रकार 160 वर्षो मे दो चंद्र मास क्षीण (क्षय या कम) होने से गणित का सूक्ष्म अन्तर भी ठीक हो जाता है। निश्चय ही यह भारतीय खगोल वेत्ताओ की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का परिचायक है।

मास फलादेश
चैत्र - जातक सुन्दर, सुन्दर स्वरुप, अहंकारी, उत्तम कार्यवान, लाल नेत्र, गुस्सैल, स्त्री के निकट चंचल, सदा हर्ष युक्त होता है।
बैशाख - जातक भोगी कामी, धनवान, प्रसन्नचित्त, क्रोधी, सुन्दर नेत्र, सुन्दर रूप, सुहृदय, स्वतंत्र, संधर्षशील, महत्वाकांक्षी होता है।
ज्येष्ठ - जातक सुन्दर, देशांतर मे समय व्यतीत करने वाला (परदेशी) दीर्घायु, बुद्धिमान, धनवान, पवित्र ह्रदयी   परिश्रमी, स्पस्ट भाषी, ललित कला प्रेमी होता है।
आषाढ़ - जातक संततिवान, धर्म का आदरी / धर्मज्ञ, सम्पत्ति नष्ट होने से पीड़ित, अल्पसुखी, सुन्दर वर्ण, कार्य कुशल, धनसंचयी, द्विस्वभाव, स्थिर होता है।
श्रावण - जातक लाभ-हानि, सुख-दुःख मे सामान चित्तवाला, सुन्दर, स्थूल देह, क्रान्तिकारी, समाज प्रमुख, कार्य कुशल, देशप्रेमी, पथप्रदर्शक होता है।
भाद्रपद - जातक तत्त्ववेत्ता या दर्शनशास्त्री, यांत्रिक या शिल्पज्ञ, निश्चयी, व्यवहार कुशल,साहसी, रुचिवान, सर्वदा प्रसन्नचित्त, वाचाल, कोयल के समान वाणी वाला, शीलवान होता है।

आश्विन - जातक सुखी, सुन्दर, कवि, पवित्र आचरणी, गुणी, धनी,   कामी, माता-पिता भक्त, गुरु-ईश्वर- राष्ट्र प्रेमी, धुनी, चरित्रवान होता है।
कार्तिक - जातक सजग, उदार, मनमौजी, ईमानदार, परिश्रमी, विख्यात, दीर्घ रोग रोगी, कलाकार, धनवान, सुकार्यो मे व्ययी, व्यापारी, बुद्धि व हृदय हीन होता है।
मार्गशीर्ष - जातक प्रियवक्ता, धनी, धर्मात्मा, मित्रवान, पराक्रमी, परोपकारी, साहसी, चतुर, दयालु, संवेदनशील, धैर्यवान, शांत, आलोचक, न्यायप्रिय होता है।
पौष - जातक स्वाभिमानी, साहसी, चतुर, लोभी, व्यसनी, विद्वान, प्रबंधक, शत्रुहंता, स्वेच्छाचारी, प्रतापी, पितर देवता को नही मानने वाला, ऐश्वर्यवान, पहलवान होता है।
माघ - जातक गौरवर्ण, विद्यावान, देशाटन करने वाला, वीर, कटुभाषी, कामी, रणधीर, कार्यदक्ष, क्रोधी, स्वार्थी, व्यसनी, राजनीतिज्ञ, व्यापारी, अनायाश  धन प्राप्त करने वाला, कुटुम्ब पौषक होता है।
फाल्गुन - जातक आत्मविश्वासी, भ्रात सुखहीन, तीव्र बुद्धि, पारखी, भयातुर, रोगी, कर्जहीन, समाजसेवी, अवगुणी, धन-विद्या-सुख से युक्त, विदेश भ्रमण करने वाला होता है।
मल / अधिक मास - जातक सांसारिक, विषय रहित, चरित्रवान, तीर्थयात्री, उच्च दृष्टिवान, निरोगी, स्वहितैषी, सुन्दर होता है।
क्षय मास - जातक अल्प विद्या-बुद्धि वाला, धनधान्य रहित, सुखहीन, बहु विधि युक्त होता है।

पक्ष ज्ञान
एक चंद्र मास मे दो पक्ष होते है। 1- शुक्ल पक्ष (सुदी या चादन पक्ष) जिसमे चन्द्रमा वृद्धि की ओर अग्रसर रहता है। 2- कृष्ण पक्ष (वदी या अंधेर पक्ष) जिसमे चन्द्रमा घटने लगता है।
पक्ष फलादेश
⧫  शुक्ल पक्ष - शुक्ल पक्ष मे उत्पन्न जातक चन्द्रमा के सामान सुन्दर, धनवान, उद्यमी, शास्त्रज्ञ, हसमुख, शांतिप्रिय, संतान सुखी होता है। यदि चन्द्रमा छठे या आठवे स्थान पर हो तो पीड़ा होती है। शुक्ल पक्ष मे रात्रि का जन्म हो तो सब अरिष्टो का नाश होता है।
⧫ कृष्ण पक्ष - कृष्ण पक्ष मे उत्पन्न जातक निर्दयी, खराब मुख वाला, स्त्री का द्वेषी, बुद्धिहीन, मनमानी करने वाला, व्यसनी, काम वासनायुक्त, चंचल, दुसरो से पालित, साधारण जानो मे रहने वाला, कलाह प्रिय होता है।  यदि जन्म कुंडली मे चन्द्रमा छठे आठवे हो तो 8, 16, 32 वे वर्ष में शारारिक पीड़ा, जल से भय, आतंरिक ज्वर इत्यदि होते है।

वार
एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय पर्यन्त सावन दिन या भू दिन कहलाता है।  इसी को वार कहते है। सूर्यादि सात ग्रह ही क्रम से इन वारो के स्वामी है।  यही क्रम सारे विश्व मे प्रचलित है।  वार सात होते है, जिनसे सप्ताह बनता है। 1 रविवार (ईतवार) 2 सोमवार (चंद्रवार) 3 मंगलवार (भौमवार) 4 बुधवार (सौम्यवार) 5 गुरवार (बृहस्पतिवार) 6 शुक्रवार (भृगुवार) 7 शनिवार (मंदवार)
⧫  ये वार दो प्रकार से व्यवहार में लाये जाते है।
1. तिथि, योग, करण, नक्षत्र का समाप्ति काल, दिनमान, अहोरात्र गणना, इष्ट, सूतक इत्यादि मे सूर्योदय से माना जाता है।
2. यात्रा, विवाह, उत्सव, पर्व, गृह, कृषि, शुभ कार्य, धार्मिक कृत्य, दैनन्दिनी इत्यादि मे प्रयुक्त स्वस्थान (स्थानीय समय) से माना जाता है।

⦁⦁  स्वस्थान का वार प्रवेश ज्ञान 
जो विहित या निषिद्ध वार कहा गया है वह सदा सूर्योदय से नही होता, कभी सूर्योदय पहले या बाद मे वार  प्रवेश होता है।  इसका मध्यम मान 60 घटी या 24 घंटा है। मध्य रेखा 82-30 से अपना अभीष्ट स्थान जितने मिनिट सेकण्ड देशांतर हो उसमे पूर्व हो तो छह घण्टा जोडने से या पश्चिम हो तो छह घण्टा घटाने पर जो आवे, उतने ही स्वस्थानीय घंटा, मिनिट, सेकंड पर नित्य प्रातःकाल उस स्थान पर वार प्रवत्ति होगी। 
उदहारण :-  हाटपीपल्या का देशांश 76 - 18 है। देशांतर (82-30 - 76-18 = 06.12 x  4 = 24 48) संस्कार ऋण  24 मिनट 48 सेकण्ड है।  अतएव 6 - 0 - 0 मे से  0 - 24 - 48 घटाने पर प्रत्येक दिन प्रातः 5 घण्टा 35 मिनिट 32 सेकण्ड पर हाटपिपल्या मे वार प्रवृत्ति होगी। 

⦁⦁ क्षण वार या होरा ज्ञान 
प्रायः सूर्योदय से ही वार का व्यवहार करते है। जो विहित वार या निषिद्ध वार कहे गये है वे भी दो प्रकार के होते है। 1 स्थूल वार - यह पूर्ण 60 घटी या 24 घंटे का होता है। 2 सूक्ष्म वार - यह प्रत्येक एक घंटे का होता है। यही सूक्ष्म वार क्षण वार या होरा कहलाता है। यदि स्थूल वार प्रशस्त हो और सूक्ष्म वार निषिद्ध हो तो उस समय कार्य का परित्याग कर देना चाहिये तथा सूक्ष्म वार प्रशस्त और स्थूल वार निषिद्ध हो तो उस समय कार्य किया जा सकता है।
उपर्युक्त्त वार प्रवत्ति एक-एक घण्टा (होरा = 2 ½) का क्षण वार होता है। प्रथम घंटा उसी वारेश का क्षण वार होता है, उससे आगे क्रम से छह के अन्तर से घंटे-घंटे वारेश के क्षण वार होते है। होरा क्रम इस प्रकार है :- 1 सूर्य          2 शुक्र, 3 बुध, 4 चंद्र, 5 शनि, 6 गुरु, 7 मंगल।  जैसे रविवार को प्रथम होरा सूर्य, द्वितीय शुक्र आदि, इस प्रत्येक छठे वार की होरा क्रम 24 घण्टे  तक रहेगा।  होरा क्रम सभी स्थानो पर समान होता है। इसे काल होरा भी कहते है। इसी क्रम अनुसार स्थानीय सारणी बनाई जा सकती है।
⦁ होरा फल
चंद्र, बुध, गुरु की होरा शुभ, सूर्य की होरा सामान्य, मंगल, शनि की होरा अशुभ है। मंगल की होरा मे युद्ध, वाद-विवाद, बुध की होरा मे ज्ञान प्राप्ति, गुरु की होरा मे विवाह, शुक्र की होरा मे प्रवास, भोग-विलास शनि की होरा मे द्रव्य संग्रह करना श्रेष्ठ है।

जन्म वार फलादेश
वारो की संज्ञा सात है, जो ग्रहो के नाम के द्योतक है। रविवार - स्थिर, सोमवार - चर, मगलवार - उग्र, बुधवार - सम, गुरूवार - लघु, शुक्रवार - मृदु, शनिवार - तीक्ष्ण सज्ञक है।
रविवार - जातक सहृदयी, निडर, करतबी, सफल, स्पस्ट भाषी, महत्वाकांक्षी, सत्वगुणी, प्रवास प्रिय, स्थिर बुद्धि, स्वाभिमानी, आकर्षक, सुन्दर नेत्र, परम चतुर, तेजस्वी, उत्साही, अल्प रोम, कलह प्रिय, होता है।  जातक को 1, 6, 13, 32 वे माह में कष्ट होता है तथा आयु 55 से 60 वर्ष होती है किसी-किसी की आयु ज्यादा होती है। 
सोमवार - जातक कार्यो मे व्यस्त, शान्त नही बैठने वाला, श्रद्धावान, उद्योगी, परिश्रमी,  राज्य कार्यरत, समाज कल्याणी, धार्मिक, वात-कफ पीड़ित, सद्चरित्र, सुख-दुःख समान भोगने वाला, कामी, बुद्धिमान, धनवान, गोल चेहरा होता है।  जातक को 8, 11 वे माह मे पीड़ा, 16, 17  वे वर्ष कष्ट तथा आयु 84 वर्ष होती है।
मंगलवार - जातक क्रोधी, साहसी, लम्बाकद, चंचल, तमोगुणी, कल्पक, पित्त प्रकृति, शक्ति का उपासक, व्यापारी, वचन का पक्का, विरुद्ध बात पर शीध्र गर्म होने वाला, अस्थिर, व्यसनाधीन, कुटिल, कृषक, सेना नायक या सैनिक होता है। जातक को 2, 32 वे वर्ष में कष्ट, कुछ सर्वदा रोगी रहते है। आयु 84 वर्ष होती है।
बुधवार - जातक स्वार्थसिद्धि मे चतुर, कला-वाणिज्य या विज्ञान का कार्य करने का शौक़ीन, विद्यावासंगी, स्पस्ट भाषी, रजोगुण प्रधान, लेखक या लेखन से आजीविका, बुद्धिमान, धनवान होता है। घर की जबाबदारी छोटी उम्र मे ही आ पड़ती है।  8 वे माह, 8 वे वर्ष मे पीड़ा, आयु 64 वर्ष या अधिक होती है।
गुरवार - जातक विद्या कार्य या संसोधन से गौरान्वित, अभिलाषी, स्व हिम्मत से व्यापारी, स्व योगयता से उन्नतिवान, माता-पिता, गुरु ईश्वर भक्त, लोकप्रिय, धर्मपरायण, सेवाभावी, देशप्रेमी, धनवान, विवेकी, अध्यापक या राजमंत्री, सत्वगुण प्रधान होता है। जातक  जन्म के 7, 13,16 वे माह मे कष्ट सहकर 84 वर्ष तक जीवित रहता है।
6  शुक्रवार - जातक चंचलचित्त, देवो का निंदक, धनोपार्जन प्रेमी, क्रीडारत, बुद्धिमान, वक्ता, सुन्दर, विशेष प्रकार के केश, केशो के प्रति चिंतित, सफ़ेद वस्त्र शौकीन, कार्य मे सूक्ष्मता का ध्यान रखने वाला, गायन-वादन प्रेमी, काव्य-कला निपुण, नृत्य प्रवास या चलचित्र के प्रति आकर्षित, मस्त प्रकृति पर धन को तुच्छ समझने वाला, स्त्रियो के प्रति आकर्षित, प्रीति विवाह पसंद, सम्भल कर चलने वाला होता है। जातक की देह निरोगी और  60 से 70 वर्ष आयु होती है।
7 शनिवार - जातक भाई या कुटुम्ब विरोधी, निश्चयी, झगड़ालू, विद्याव्यसनी होता है। इससे मित्र पड़ोसी रिश्तेदार ईर्ष्या रखते है। भलाई करने पर बुराई मिलती है। जस को तस वाला, खर्चीला, साहसी, होता है। हृष्ट- पुष्ट रहता शतायु होता है।  

*** भारतीय मत से वार की गणना सूर्योदय से सूर्योदय तक होती है। अंग्रेजी पद्धति में वार की गणना मध्यरात्रि से मध्यरात्रि तक होती है। मुसलमानी मत से वार की गणना सूर्यास्त से सूर्यास्त तक होती है।

तिथि
सूर्य व चंद्र की गति का अंतर ही तिथि है। भू केंद्रीय दृष्टि से जब सूर्य व चन्द्रमा एक ही स्थान पर होते है तो सूर्येन्दु एक साथ उदय व अस्त होते है। यही कारण है कि अमावस्या को चन्द्रमा दिखाई नही देता है। तदनन्तर सूर्य से चंद्र की गति अधिक होने से चन्द्र 12-12 अंश पूर्व की और आगे चलता है, तो प्रतिपदादि एक-एक तिथि होती है पन्द्रह तिथि पर (180 अंश प्रतियुति) पूर्ण चंद्र दृश्य होता है एवं तीस तिथि (30 x 12 = 360) पाश्चात्य पुनः सूर्येन्दु संयोग होता है अर्थात अमावस्या होती है।
राशि मंडल मे प्रत्येक तिथि का अंशमान 12 तुल्य ही है।  किन्तु सूर्य-चंद्र की गति (चन्द्रमा की गति 55 से 60 घटी) मे न्यूनाधिकता होने से प्रत्येक तिथि में घट-बढ़ होती है। जिन तिथियो मे घट-बढ़ होती है वे तिथिया क्षय वृद्धि कहलाती है। प्रायः पंचाग या एफेमेरीज मे क्षय तिथि नही लिखते तथा वृद्धि वृद्धि तिथि दो बार लिखते है।

क्षय व वृद्धि तिथि 
क्षय व वृद्धि तिथि के घटी पल कितने हो इस पर मतमतान्तर है। भारतीय ज्योतिष की विशेषता तिथि का यह सबसे अंधकार पक्ष है जो विवाद मूलक है।
◾ प्राचीनवादी विद्वान् उच्चै रुदघोषित "बाणवृद्धि रस क्षय:" का अर्थ है कि तिथि का परमाधिक मान 60 घटी से ऊपर पांच घटी यानि 65 घटी एवं परमाल्प मान 60 घाटी से कम 6 घटी यानि 54 घटी होता है। यह उनके ही पंचागो मे यत्र तत्र सर्वत्र चरितार्थ नही होता, इसे क्या कहा जाय ? यह नियम कहा  से प्रारम्भ हुआ इसका कोई उल्लेख नही है।  यह विचारणीय है।
बाण शब्द का अर्थ है पांच की संख्या के लिये प्रतीकात्मक उक्ति यानि 5 का अंक। इसी तरह रस, वैशिषिक दर्शन के अनुसार रस छह है - कटु, अम्ल, मधुर, लवण, तिक्त, और कषाय। वही काव्य के रस आठ है - श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, विभीत्स, अदभुत। इसमे शांत और वासल्य मिलाने पर दस रस हो जाते है। अतएव रस का अर्थ 6 या 8 या 10 अंक लेवे ? यह भी विचारणीय हो जावेगा।
◾बाणवृद्धि तथा रसक्षय शब्द अनुकूल नही है।  इनकी जगह " पञ्चवृद्धि स्त्थाषटक्षयः" कहना अधिक उचित होगा अर्थात 5 वृद्धि और 6 क्षय। कुछ प्राचीन विद्वान् 65 घटी 30 पल परमवृद्धि एवं 53 घटी 45 पल परमाल्प मान भी मानते है।
◾ उत्तरोत्तर आचार्यो ने गणित की स्थूलता को सूक्ष्मता के लिए " सप्तव्रद्धि: दश क्षय:" लिया, यह सिद्धांत ठीक है। इसका अर्थ है 7 घटी वृद्धि व 10 घटी क्षय लेवे। किन्तु प्रचीनवादी शास्त्रज्ञ विद्वान् "बाणवृद्धि रस क्षय:" को ही प्रामाणिक मानते है।

◾◾भारत के विभिन्न सम्प्रदायो मे तिथि मान्यता भिन्न-भिन्न है। यह विषय व्रत, पर्व, त्यौहार, उत्सव आदि हेतु अधिक प्रासंगिक है।
वैष्णव सम्प्रदायी तिथि मान 54 घटी से एक पल भी ज्यादा या कम है तो व्रतादि दूसरे दिन करते है। तथा सूर्योदय पर जो तिथि रहती है उस अनुसासर ही व्रतादि करते है। स्मार्त (शिव) सम्प्रदायी जिस समय तक वह तिथि हो उसी दिन व्रतादि करते है। निम्बार्क सम्प्रदायी कपाल वेध मानते है। अन्य केवल उदय तिथि (सूर्योदय पर) लेते है।  कुछ तिथि समाप्ति पश्चात दूसरी तिथि प्रारम्भ होने पर उसी वार को वह व्रत करते है।
जैन ज्योतिष अनुसार 6 घटी वाली उदय तिथि मान्य है।  सूर्योदय पश्चात जो तिथि 6 घटी तक हो उसे पूर्ण माना है।  जो तिथि 6 घटी या 3 मुहूर्त (मुहूर्त = 48 मिनिट) से कम हो वह मान्य नही है। जिस दिन दो तिथिया होगी उनमे प्रथम तिथि मान्य होगी, दूसरी को क्षय (अवम) तिथि मानते है। जो तिथि दो दिन तक होती है, उनमे प्रथम दिन की तिथि ग्राह्य है दूसरे दिन की तिथि को वृद्धि तिथि मानते है। कुछ सूर्यास्त पश्चात ४८ मिनिट (एक मुहूर्त) रहे उसे ग्राह्य करते है।

प्रत्येक चंद्र मास मे दो पक्ष होते है 1 कृष्ण पक्ष 2 शुक्ल पक्ष। प्रत्येक पक्ष मे 15 तिथि होती है। 1 एकम (प्रतिपदा) 2 दूज (द्वितीया) 3 तीज(तृतीया) 4 चौथ (चतुर्थी) 5 पाचम (पंचमी) 6 छठ (षष्ठी) 7 सातम (सप्तमी)    8 आठम (अष्टमी) 9 नौमी (नवमी) 10 दशम (दशमी) 11 ग्याहरस (एकादशी) 12 बारहरस (द्वादशी) 13 तेरहस (त्रयोदशी) 14 चौहदस (चतुर्दशी) 15 पंचदशी (पूनम / अमावस्या)
शुक्ल पक्ष की पंचदशी को पूर्णिमा भी कहते है। कृष्ण पक्ष की पंचदशी को अमावस / अमावस्या या दर्श कहते है और 30 भी लिखते है।  प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक रहने वाली अमावस्या को सिनीवाली, चतुर्दशी से विद्ध को दर्श और एकम से युक्त अमावस्या को कहु कहते है।

सत तिथिया                1, 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 तथा पूर्णिमा ये सत तिथिया है।
असत तिथिया             4, 6, 8, 12, 14 तथा अमावस्या  असत तिथियां है।
मास शून्य तिथिया     निम्न तिथियां शुभ नही मानी जाती है। इनमे कार्य सफल नही होता और इन तिथियो पर जन्मा जातक का जीवन पूर्णतया सुखी व सफल नही होता है।

सिद्धा तिथिया - ये तिथिया यदि इन वार पर पड़े तो उत्तम, किये कार्य सफल होते है। इन तिथियों पर जन्मा जातक सुखी और सफल होता है।  मंगलवार - 3, 8, 13 बुधवार - 2, 7, 12 गुरवार - 5, 10, 15 (पूनम) शुक्रवार -   1, 6, 11 शनिवार - 4, 9, 14 .
अशुभ तिथिया - ये तिथियां उन वार पर पड़े तो अशुभ, कार्य असफल होता है अतः ये ताज्य है। इन तिथियो पर जन्मा जातक को जीवन मे विघ्न बाधाये प्रमुखता से रहती है। रविवार - 4, 12  सोमवार - 6, 11 मंगलवार -     5, 7 बुधवार - 2, 3, 8 गुरवार - 6, 8, 9 शुक्रवार - 8, 9, 10 शनिवार - 7, 9, 11 . 
दग्धा, विष, हुताशन  तिथिया - निम्नांकित तिथि निम्न वारो पर हो तो अशुभ और हानिकारक होती है।

पर्व तिथियां - कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या  शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा और सूर्य संक्रांति की तिथि पर्व तिथि कहलाती है इन तिथियो पर मंगल या शुभ कार्य ताज्य है।
प्रदोष तिथिया - अर्ध रात्रि पूर्व द्वादशी,  रात्रि के  4½ घण्टे पूर्व षष्ठी, और रात्रि समाप्त होने के 3 घण्टे पूर्व तृतीया प्रदोष तिथि कहलाती है। इनमे सभी शुभ कार्य वर्जित है।
प्रदोष काल - माह की त्रयोदशी को सांयकाल प्रदोष काल होता है।  ऐसी मान्यता है कि शिव अपने कैलाश स्थित रजत भवन मे इस समय नृत्य करते है और देवतागण उनके गुणो का स्तवन करते है। (सांयकाल यानि सूर्यास्त के पूर्व  01 घंटे 12 मिनिट और पश्चात 01 घंटे 12 मिनिट यानि कुल 02 घण्टा 24 मिनिट या 06 घटी, 
व्रतराज ग्रन्थ में सूर्यास्त से तीन घंटा पूर्व के समय को प्रदोष काल माना गया है।)

तिथियो की संज्ञाएे - तिथियो की संज्ञाऐ पांच है।  (1) नन्दा - 1, 6, 11 (2) भद्रा - 2, 7, 12 (3) जया - 3, 8, 13    (4) रिक्ता - 4, 9, 14 (5) पूर्णा 5, 10, 15  पक्षरन्ध्र 4, 6, 8, 9, 12, 14 .
नंदा - तिथि में जन्मा जातक मानी, विद्वान, ज्ञानी, देव भक्त, कुटुम्बियो का स्नेही होता है।  इनमे चित्रकारी, वास्तु, तंत्र-मन्त्र, कृषि, विवाह, गृहारम्भ, उत्सव आदि कार्य सिद्ध होते है।
भद्रा - तिथि में जन्मा जातक बंधुओ में मान्य, राज्याश्रित (अधिकारी, सचिव) धनवान, भव बंधन से भयभीत, परोपकारी होता है। इनमे विवाह, यात्रा, सवारी, यज्ञ, शांतिकर्म, वस्त्राभूषण आदि सिद्ध होते है।
जया - तिथि मे जन्मा जातक राजमान्य (राजयपाल, मन्त्री) पुत्र पौत्रादि से युक्त, वीर, शांत, दीर्घायु, मनस्वी होता है। इनमे यात्रा, विवाह,  गृह, युद्ध यात्रा, कृषि, विजयोपयोगी युद्ध, आदि सिद्ध होते है।
रिक्ता - तिथि में जन्मा जातक तर्क करने वाला, प्रमादी, गुरु व विद्वान निंदक, शस्त्राभ्यासी, घमंडी, नाशक कामी होता है।  इनमे शुभ कार्यो मे सफलता नही मिलती है किन्तु विष, अग्नि, शस्त्र, मारण लड़ाई, युद्ध, विनाश आदि क्रूरकर्म सिद्ध होते है।
पूर्णा - तिथि मे जन्मा जातक पूर्ण धनी, वेद वे शास्त्र ज्ञाता, सत्यवक्ता, शुद्धःचित्त, बहु विषयज्ञ होता है। इनमे सब कार्य सफल होते है।  केवल पूनम को उपनयन वर्जित है।

तिथि फलादेश 
एकम - जातक परिश्रमी, प्रतिज्ञापालक तथा कलाप्रेमी होता है।  दूज - जातक बलवान, धनवान, धर्म व संस्कृति का पालक, खर्चीला होता है। तीज - जातक प्रबलवक्ता, चंचल, राष्ट्रप्रेमी होता है। चतुर्थी - जातक आशावादी, कार्यनिपुण, गूढ़विद्या प्रवीण, चतुर, कंजूस होता है। पंचमी - जातक विद्या से पूर्ण, कामवासना युक्त, कृश शरीर, कमजोर, प्रधान, चिकित्सक या न्यायाधीश या अभिभाषक की योग्यता वाला होता है।
छठ - जातक विद्यावान, क्रोधी, शिक्षाशास्त्री, कलाविद, स्पष्ट भाषी होता है। सप्तमी - जातक कफ विकारी, गौरव प्राप्त करने वाला, धन से तंग, श्रेष्ट नेता, अपमान नही सहने वाला होता है। अष्टमी - जातक कफ प्रकृति वाला, स्व स्त्री से प्रीतिवान, व्यसनी, पराक्रमी, स्वस्थ, वीर, अनियमी, देवी-देवता का इष्टवान होता है। नवमी - जातक धर्म पालक, मंत्रविद्या प्रेमी, स्त्री व पुत्र से परेशान, कुटुम्ब से क्लेश, ईश्वर भक्त होता है।  दशमी - जातक भाग्यवान, वक्ता, योजक, लोकप्रिय, कलाप्रिय, कर्मठ होता है।
एकादशी - जातक प्रतिष्ठा से चलने वाला, धार्मिक, ईश्वरवादी, विवाह से सुखी, कल्पक, खर्चीला, माता का प्रिय, स्पष्ट भाषी होता है। द्वादशी - जातक ज्ञाता, कल्पक, बुद्धिमान, पूर्ण विद्या प्राप्त करने वाला, राष्ट्रप्रेमी, सुखी होता है। त्रयोदशी - जातक लोभी, कामवासना युक्त, धनवान, नृत्य-नाट्य का शौकीन होता है। चतुर्दशी - जातक क्रोधी, कार्य करके पछताने वाला, सस्था संचालक, किसी विद्या मे प्रवीण, सुखाभिलाषी होता है। पूनम - जातक यशस्वी,  हृदयी, कुटुम्ब को सुख देने वाला, ईमानदार, कुल गौरवी, नीतिज्ञ, सत्यवचनी, गुरु को मानने वाला होता है। अमावस - जातक ईश्वर भक्त, विश्व बंधुत्व की भावना रखने वाला, कुटुम्ब प्रेमी, धनवान किन्तु धन से अनाशक्त, विवाह से सुखी होता है।

मानसागरी अनुसार तिथि फलादेश 
प्रतिपदा - जातक दुर्जन संगी, कुल कलंकी, व्यसनी होता है। द्वितीया  - जातक पर स्त्री गामी, सत्य और शौच से रहित, स्नेह हीन होता है। तृतीया - जातक चेष्टाहीन, विकल, धनहीन, ईर्ष्यालु होता है।  चतुर्थी - जातक भोगी, दानी, मित्र प्रेमी, विद्वान, धनि, संतान युक्त होता है। पंचमी - जातक व्यव्हार ज्ञाता गुणग्राही, माता-पिता का भक्त, दानी, भोगी, अल्प प्रेम करने वाला होता है। षष्ठी - जातक देश-विदेश भ्रमणशील, झगड़ालू, उदर रोग पीड़ित होता है। सप्तमी - जातक अल्प मे ही संतुष्ट, तेजस्वी, सौभाग्यशाली, गुणवान, संतान व धन संपन्न होता है।  अष्टमी - जातक धर्मात्मा, सत्यवक्ता, भोगी दयावान कार्यकुशल होता है।
नवमी - जातक देवभक्त, पुत्रवान, धनी, स्त्री मे आशक्त, शास्त्राभ्यासी होता है।  दशमी - जातक धर्म अधर्म का ज्ञाता, देशभक्त, यज्ञ कराने वाला, तेजस्वी, सुखी होता  है। एकादशी - जातक स्वल्प मे संतुष्ट, राजा से मान्य (शासकीय ठेकेदार, वितरक, कार्यकारी) पवित्र, धनवान, पुत्रवान बुद्धिमान होता है। द्वादशी - जातक चंचल, अस्थिरबुद्धि, कृश शरीरी, परदेश भ्रमणशील होता है।  त्रयोदशी - जातक महासिद्ध पुरुष, महाविद्वान,   शास्त्राभ्यासी, जितेन्द्रिय, परोपकारी होता है। चतुर्दशी - जातक धनवान, उद्योगी, वीर, वचनबद्ध, राजमान्य, यशस्वी होता है।  पूर्णिमा - जातक सम्पत्तिवान, मतिमान, भोजनप्रिय, उद्योगी पर स्त्री में आसक्त होता है। अमावस्या - जातक दीर्घसूत्री, द्वेषी, कुटिल, मुर्ख, पराक्रमी, गुप्तविचारी होता है।

योग 
भूकेन्द्रीय दृष्टि से सूर्य और चन्द्रमा की गति का जोड़ ही योग कहलाता है। यह योग एक नक्षत्र तुल्य 800 कला का ही होता है। सूर्य चंद्र की गति के कारण एक योग अधिक से अधिक 60 घटी तथा कम से कम 50 घटी का होता है।  ये दैनिक योग भी कहलाते है। योग 27 होते है तथा इनका क्रम 24 से 26 दिन मे पूरा होता है। इनके नाम इस प्रकार है :-

➧ इनमे विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिध तथा वैघृति ये नौ योग अशुभ है शेष शुभ है।

योग फलादेश 
1 विष्कुम्भ - सुन्दर रूप, भाग्यवान, आभूषणो से पूर्ण, बुद्धिमान, पवित्र, कार्यदक्ष, पण्डित।
2 प्रीति - स्त्रियो का प्रिय, तत्वज्ञ, महा उत्साही, स्व प्रयोजनार्थ उद्योगी, ललनाओ का स्नेही।
3 आयुष्मान - मानी, धनवान, कवि, दीर्घायु, बलवान, शत्रुहन्ता, युद्ध में विजयी, पशु-पक्षी प्रेमी।
4 सौभाग्य - जातक राज्य मंत्री, सर्व कार्य दक्ष, स्रियो का वल्ल्भ होता है।
5 शोभन - जातक अति सुन्दर, पुत्र-स्त्री युक्त, सर्व कार्य मे तत्पर, रण उत्सुक होता है।
6 अतिगण्ड - मातृहन्ता, तीनो प्रकार (योग, नक्षत्र, लग्न) के गण्डान्त मे उत्पन्न जातक कुलनाशक होता है।
7  सुकर्मा - जातक सत्कर्म करने वाला, सबका प्रिय, सुशील, स्नेही, भोगी, गुणी होता है।
8  घृति - सुखी, यश पुष्टि और धन से युक्त, धैर्यवान, भाग्यवान, धनवान, विद्यावान, गुणवान।
9 शूल - जातक शूल रोगी, धर्मात्मा, शास्त्रवेत्ता, विद्या और धन उपार्जन मे कुशल, यज्ञ कर्ता।

10 गण्ड - जातक गण्ड योग से पीड़ित, क्लेश युक्त, बड़ा माथा, लघु देह, वीर, भोगी होता है।
11 वृद्धि - जातक सुन्दर, स्त्री-पुत्रादि से युक्त, धनवान, बलवान, भोगी होता है।
12 ध्रुव - जातक दीर्घायु, सुन्दर, स्थिर विचारो वाला, स्थिर कार्य करने वाला, प्रिय, बलवान होता है।
13 व्याघात - जातक सर्वज्ञ, लोकमान्य, विख्यात, कष्टमय जीवन, पूजित, सब कार्य करने वाला होता है।
14 हर्षण - महा भाग्यवान, राजमान्य, ढीढ, धनवान, विद्या और शास्त्र मे निपुण होता है।
15 वज्र - जातक वज्र मुष्ठि, विद्या और शास्त्रो मे निपुण,  धन-धान्य से युक्त, पराक्रमी होता है।
16 सिद्धि - जातक समस्त कार्यो मे सफल, दानी, भोगी, सुखी, मनोहर, रोग-शोक युक्त होता है।
17 व्यतिपात - जातक कष्ट से जीने वाला, यदि जीवत रह जाय तो यश, सुख आदि से उत्तम होता है।
18 जातक बलवान, शिल्प और शास्त्र ज्ञाता, चित्रकार, संगीत और नृत्य मे निपुण होता है।

19 परिध - स्वकुल की उन्नति करने वाला, शास्त्रज्ञाता,  कवि, प्रियभाषी, वक्ता, दयावान, भोगी होता है।
20  शिव - जातक सर्व कल्याण से युक्त, लोकमान्य, (शिव के सामान) बुद्धिमान होता है।
21 सिद्ध -  सिद्धि देने वाला, मंत्रशास्त्र प्रवर्तक, सुन्दर स्त्री युक्त, सब प्रकार की संपत्ति युक्त होता है।
22 साध्य - जातक मानसिक सिद्ध, दीर्घसूत्री, यश, सुख युक्त, लोक   प्रसिद्ध, सबका प्रिय होता है।
23 शुभ - जातक सुन्दर मुखी, धनवान, ज्ञान विज्ञानं युक्त, दानी, बुद्धिमानो का पूजक होता है।
24 शुक्ल - जातक सभी कला मे सर्व कला मे निपुण, वीर, धनवान/ प्रतापी,  सवका प्रिय होता है।
25 ब्रम्ह - जातक प्रकांड विद्वान्, वेद शास्त्रो मे पारंगत, निपुण, ब्रम्यज्ञानी होता है।
26 ऐन्द्र - जातक राजकुल हो तो राजा, अन्य कुल मे धनाढ्य, अल्पायु, सुखी, भोगी, गुणवान होता है।
27 वैघृति - जातक उत्साही, क्षुधालु, लोगो की भलाई करने पर भी अप्रिय होता है।

करण 
तिथि के आधे भाग को करण कहते है। इस प्रकार प्रत्येक तिथि में दो करण होते है।  ये करण ग्यारह होते है।    1 बव, 2 बालव, 3 कोलाव, 4 तैतिल, 5 गर, 6 वणिज, 7 विष्टि, 8 शकुनि, 9 चतुष्पाद, 10 नाग, 11 किस्तुघ्न। इनमे क्रम एक से सात तक चर करण तथा आठ से ग्यारह तक स्थिर करण है।
करण ज्ञान - कृष्ण पक्ष की तिथि को दो गुणा कर 7 से भाग देने पर 1 आदि शेष रहने बवादि चार करण होते है तथा उत्तरार्ध मे अग्रिम करण होता है। शुक्ल पक्ष की तिथि की संख्या में 2 का गुना कर गुणनफल मे से 2 घटाने पर शेष मे 7 का भाग देने पर शेषांक से तिथि का पूर्वार्ध करण तथा उत्तरार्ध का अग्रिम करण होता है। 

➧ नॉट :- कृष्णपक्ष के उत्तरखण्ड / उत्तरार्ध (द्वितीय भाग) मे हमेशा शकुनि करण तथा अमावस्या के प्रथम दल (पूर्वार्ध) मे चतुष्पद व द्वितीय दल मे नाग करण होता है।  शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध मे सदा किस्तुघ्न तदनन्तर प्रतिपदा के उत्तरार्ध से क्रमशः बव, बालव आदि क्रम रहता है। 
              
➧ भद्रा या विष्टि के 12 नाम इस प्रकार है। 1 दग्धा, 2 दधिमुख, 3 भद्रा, 4 महामारी, 5 खरानता,  6 कालरात्रि,     7 महारुद्रा, 8 विशिष्ट, 9 कुल पुत्रिका, 10 भैरवी, 11 महाकाली,  12 असुरक्षकर। ये नाम फलानुरूप ही है अर्थात इन नामो अनुसार ही फल होता है।
विष्टि करण को ही भद्रा कहते है।  इसमे सभी शुभ कार्य ताज्य है। जातक के लिए भी शुभ नही है। शुक्ल पक्ष मे अष्टमी व पूर्णिमा के पूर्व दल (तिथि का प्रथम भाग) मे, चतुर्थी व एकादश के पर दल (द्वितीय भाग) तथा कृष्ण पक्ष मे तीज़ व दशमी के पर दल मे, सप्तमी व चतुर्दशी  के पूर्व दल में भद्रा होती है। इस प्रकार एक मास मे आठ भद्रा होती है।  वारो के अनुसार इनका फल होता है।

जन्म करण फलादेश :
01 बव - जातक मानी, धर्मात्मा, शुभ स्थिर कार्य करने वाला होता है।
02 बालव - जातक विद्या अर्थ सुख से सम्पन्न, राज्य मान्य, तीर्थ प्रेमी, देव भक्त होता है।
03 कौलव - जातक सबसे प्रीतिवान, मित्रगणो का संगी, और स्वभिमानी होता है।
04 तैतिल - जातक सौभाग्यशाली, धनवान, सबसे स्नेह करने वाला, अनेक गृह युक्त होता है।
05 गर - जातक कृषक, गृह कार्य में तत्पर, इच्छित वस्तु उद्योग से प्राप्त कर लेता है।
06 वणिज - जातक वाणिज्य से आजीविका वाला, देशांतर से अभीष्ट वस्तु प्राप्त करने वाला होता है।
07 विष्टि - जातक अनुचित कर्म करने वाला, पर स्त्री गामी, विष कार्य मे प्रवीण होता है।
08 शकुनि - जातक पौष्टिक कार्य निपुण, औषधि निर्माता, वैद्य वृत्ति से आजीविका करने वाला होता है।
09  चतुष्पद - जातक चौपायो का सेवक व पालक, पशु चिकित्सक, देव विद्वान् भक्त होता है।
10 नाग- जातक मल्लाह प्रेमी, कठिन कार्यकारी, अभागा, चंचल, नेत्र वाला होता है।
11 किस्तुघ्न - शुभ कार्यो मे तत्पर,  तुष्टि, पुष्टि, अभीष्ट, मंगल सिद्धि वाला होता है।

चन्द्र मास के दो पक्ष, ३० तिथियां एवं सप्ताह के ७ वार।

पक्ष व तिथि

तिथि

दो नये चन्द्रोदय के मध्य के समय को चन्द्र मास कहते है और यह 29.5 दिन के समकक्ष होता है. एक चन्द्र मास में 30 तिथि अथवा चन्द्र दिवस होते हैं. तिथि को समझने के लिए हम यह भी कह सकते है कि चन्द्र रेखांक को सूर्य रेखांक से 12 अंश उपर जाने में लिए जो समय लगता है वह तिथि है.

इसलिए प्रत्येक नये चन्द्र और पूर्ण चन्द्र के बीच में कुल चौदह तिथियां होती हैं. शून्य को नया चन्द तथा पन्द्रहवीं तिथि को पूर्णिमा कहते हैं. तिथियां शून्य यानि अमावस्या से शुरु होकर पूर्णिमा तक एक क्रम में चलती है और फिर पूर्णिमा से शुरु होकर अमावस्या तक उसी क्रम को दूबारा पूरा करती हैं तो एक चन्द्र मास पूरा होता है.

सभी तिथियों की अपनी एक अध्यात्मिक विशेषता होती है जैसे अमावस्या पितृ पूजा के लिए आदर्श होती है, चतुर्थी गणपति की पूजा के लिए, पंचमी आदिशक्ति की पूजा के लिए, छष्टी कार्तिकेय पूजा के लिए, नवमी राम की पूजा, एकादशी व द्वादशी विष्णु की पूजा के लिए, तृयोदशी शिव पूजा के लिए, चतुर्दशी शिव व गणेश पूजा के लिए तथा पूर्णमा सभी तरह की पूजा से सम्बन्धित कार्यकलापों के लिए अच्छी होती है.

सूर्य और चंद्रमा के अंतराल (दूरी) से तिथियां निर्मित होती हैं। अमावस्या के दिन सूर्य एवं चंद्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं। अत: उस दिन सूर्य और चंद्रमा का भोग्यांश समान होता है। चंद्रमा अपनी शीघ्र गति से जब 12 अंश आगे बढ़ जाता है तो एक तिथि पूर्ण होती है- भक्या व्यर्कविधोर्लवा यम कुभिर्याता तिथि: स्यात्फलम्। जब चंद्रमा सूर्य से 24 अंश की दूरी पर होता है तो दूसरी तिथि होती है। इसी तरह सूर्य से चंद्रमा 180 अंश की दूरी पर होता है तो पूर्णिमा तिथि होती है और जब 360 अंश की दूरी पर होता है तो अमावस्या तिथि होती है।

तिथि क्षय एवं वृद्धि- ग्रहों की आठ प्रकार की गति होती है। इत: ग्रहों की विभिन्न गतियों के कारण ही तिथि क्षय एवं वृद्धि होती है। एक तिथि का क्षय 63 दिन 54 घटी 33 कला पर होती है। जिसमें एक सूर्योदय हो वह शुद्ध, जिसमें सूर्योदय न हो वह क्षय और जिसमें दो सूर्योदय हो वह वृद्धि तिथि कहलाती है। क्षय और वृद्धि तिथियां शुभ कार्यों में वर्ज्य और शुद्ध तिथि शुभ होती है। तिथियों की गणना शुक्ल पक्ष से प्रारंभ होती है।

तिथियों की नन्दादि संज्ञा

, ६ व ११ नन्दा

, ७ व १२ भद्रा

, ८ व १३ जया

, ९ व १४ रिक्ता

, १०, १५ व ३० पूर्णा।

सूर्य से चन्द्र की दूरी ही तिथियों का आधार है। १२ अंश की दूरी से एक तिथि का निर्माण होता है। जब सूर्य और चन्द्र एक ही अंश (३४९ वें अंश से ००० या ३६० अंश तक) पर हो तो अमावस्या और अधिकतम (१६९ वें अंश से १८० अंश तक) दूरी पर हों तो पूर्णिमा होती है। ३६०÷१२=३० तिथियां।

तिथियां संख्या में कुल तीस हैं, पंद्रह तिथियां शुक्ल पक्ष (बढ़ता चन्द्र/सुदी) की तथा १५ तिथियां कृष्ण पक्ष (घटता चन्द्र/बदी) की हैं।

पक्ष १५ तिथियों (लगभग १५ दिन) का होता है। चाँद के महीने में दो पक्ष होते, एक जब चन्द्र घट रहा होता है और दूसरा जब चन्द्र बढ़ रहा होता है। घटते पक्ष को कृष्ण तथा बढ़ते पक्ष को शुक्ल कहते हैं।

दोनो पक्षों की प्रतिपदा (पहली) से चतुर्दशी (चौदहवीं) तक की चौदह तिथियों ने नाम व स्वामी देवता एक समान है। इसलिए प्रतिपदा से पूर्णिमा तक शुक्लपक्ष की पंद्रह तिथियां तथा अमावस्या सहित कुल सोलह नाम हैं। लेकिन अमावस्या के लिए संख्या ३० का प्रयाग करते हैं सोलह का नहीं, क्योंकि अमवस्याशुक्लपक्ष की पंद्रहवीं तिथि (पूर्णिमा) के बाद कृष्णपक्ष की पंद्रहवीं तिथि अर्थात् तीसवीं तिथि है।

उत्तर भारत में कृष्णपक्ष को चन्द्र मास का प्रथम पक्ष तथा शुक्ल पक्ष को दूसरा मानते हैं, इस प्रकार अमावस्या की संख्या १५ तथा पूर्णिमा की संख्या ३० होनी चाहिए, लेकिन है उल्टा और ये सिर्फ प्रचलन की बात नहीं, शास्त्रों में भी उल्टा ही लिखा है। आप जानते तो हैं लेकिन शायद आपने इस बात पर ध्यान न दिया हो कि हमारा पंचांग शुक्ल पक्ष से ही आरंभ होता है, लेकिन हर महीना कृष्ण पक्ष से। कहने का मतलब यह है कि हमारा नया वर्ष महीने के बीच से शुरु होता है। यदि हर नये विक्रमी संवत् का पहला पक्ष शुक्ल होता है तो महीने का पहला पक्ष भी शुक्ल ही होना चाहिए था, न कि कृष्ण पक्ष। हालांकि ज्योतिष में ढेरों बिना तर्क की बातें हैं जैसे कि दशालेकिन परिणामों को देखकर विश्वास करना ही पड़ता है। लेकिन चान्द्र मास का कृष्ण पक्ष से आरंभ होना; न तो तर्क है और न ही कोई परिणाम। हालांकि कुछ लोग तर्क देते हैं पूरणमासी”, लेकिन ये नामकरण तो प्रचलन के बाद का है।

मैं यहां उत्तर भारत में प्रचलित और प्रमाणिक ग्रंथों के मतानुसार लिख रहा हूँ। १६ कलाओं के सोलह नाम तथा सोलह ही देवता है। जोकि इस प्रकार हैं-

तिथियां देवता मतांतर से

१. प्रतिपदा अग्नि देव ब्रह्मा

२. द्वितीया ब्रह्मा विधाता

३. तृतीया गौरी विष्णु

४. चतुर्थी गणेश यम

५. पंचमी नाग देव चन्द्रमा

६. षष्ठी कार्तिकेय

७. सप्तमी सूर्य देव इन्द्र

८. अष्टमी शिव वसु/दुर्गा

९. नवमी दुर्गा अष्टवसु/सर्प

१०. दशमी यमराज/धर्मराज

११. एकादशी विश्वेदेव शिव

१२. द्वादशी विष्णु सूर्य

१३. त्रयोदशी कामदेव

१४. चतुर्दशी शिव कलि

१५. पूर्णिमा चन्द्रमा विश्वदेव

३०. अमावस्या पितृ

विभाजन के समय प्रतिपद् आदि सभी तिथियां अग्नि आदि देवताओं को तथा सप्तमी भगवान सूर्य को प्रदान की गई। जिन्हें जो तिथि दी गई, वह उसका ही स्वामी कहलाया। अत: अपने दिन पर ही अपने मंत्रों से पूजे जाने पर वे देवता अभीष्ट प्रदान करते हैं। सूर्य ने अग्नि को प्रतिपदा, ब्रह्मा को द्वितीया, यक्षराज कुवेर को तृतीया और गणेश को चतुर्थी तिथि दी है। नागराज को पंचमी, कार्तिकेय को षष्ठी, अपने लिए सप्तमी और रुद्र को अष्टमी तिथि प्रदान की है। दुर्गादवी को नवमी, अपने पुत्र यमराज को दशमी, विश्वेदेवगणों को एकादशी तिथि दी गई है। विष्णु को द्वादशी, कामदेव को त्रयोदशी, शंकर को चतुर्दशी तथा चंद्रमा को पूर्णिमा की तिथि दी है। सूर्य के द्वारा पितरों को पवित्र, पुण्यशालिनी अमावास्या तिथि दी गई है। ये कही गई पंद्रह तिथियां चंद्रमा की हैं। कृष्ण पक्ष में देवता इन सभी तिथियों में शनै: शनै: चंद्रकलाओं का पान कर लेते हैं। वे शुक्ल पक्ष में पुन: सोलहवीं कला के साथ उदित होती हैं। वह अकेली षोडशी कला सदैव अक्षय रहती है। उसमें साक्षात सूर्य का निवास रहता है। इस प्रकार तिथियों का क्षय और वृद्धि स्वयं सूर्यनारायण ही करते हैं। अत: वे सबके स्वामी माने जाते हैं। ध्यानमात्र से ही सूर्यदेव अक्षय गति प्रदान करते हैं।

तिथि तथा वार से योग से तिथियों की नन्दा आदि है- नन्दा को शुक्रवार; भद्रा को बुधवार; जया को मंगलवार; रिक्ता को शनिवार तथा पूर्णा को गुरुवार हो तो वह तिथि सिद्धाकहलाती है।हर तिथि के होते हैं अलग-अलग देवता

हमारे शास्त्रों में तिथि को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जिस तिथि के जो देवता बताये गये हैं, उन देवताओं की पूजा, उपासना उसी तिथि में करने से सभी देवता उपासक से प्रसन्न हो उसकी अभिलाषा को पूर्ण करते हैं।

शुक्ल पक्ष की तिथि

शून्य अंश से 12 अंश तक प्रतिपदा

12 से 24 अंश तक द्वितीया

24 से 36 अंश तक तृतीया

36 से 48 अंश तक चतुर्थी

48 से 60 अंश तक पंचमी

60 से 72 अंश तक षष्ठी

72 से 84 अंश तक सप्तमी

84 से 96 अंश तक अष्टमी

96 से 108 अंश तक नवमी

108 से 120 अंश तक दशमी

120 से 132 अंश तक एकादशी

132 से 144 अंश तक द्वादशी

144 से 156 अंश तक त्रयोदशी

156 से 168 अंश तक चतुर्दशी

168 से 180 अंश तक पूर्णिमा

कृष्ण पक्ष की तिथि-(ह्रास मान अंशों के अनुसार)

180 से 168 अंश तक प्रतिपदा

168 से 156 अंश तक द्वितीया

156 से 144 अंश तक तृतीया

144 से 132 अंश तक चतुर्थी

132 से 120 अंश तक पंचमी

120 से 108 अंश तक षष्ठी

108 से 96 अंश तक सप्तमी

96 से 84 अंश तक अष्टमी

84 से 72 अंश तक नवमी

72 से 60 अंश तक दशमी

60 से 48 अंश तक एकादशी

48 से 36 अंश तक द्वादशी

36 से 24 अंश तक त्रयोदशी

24 से 12 अंश तक चतुर्दशी

12 से शून्य अंश तक अमावस्या

(कृष्ण पक्ष की गणना 180 अंश चंद्रमा से 360 अंश के संक्रमण के दौरान ह्रास मान अंशों की गति के अनुसार किया जाता है)

तिथि विवरण

प्रतिपदा तिथि- यह वृद्धि और सिद्धप्रद तिथि है। स्वामी अग्नि देवता, नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ। इस तिथि में कूष्माण्ड दान एवं भक्षण त्याज्य है।

द्वितीया- यह सुमंगला और कार्य सिद्धिकारी तिथि है। इसके स्वामी ब्रह्मा हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में कटेरी फल का दान और भक्षण त्याज्य है।

तृतीया तिथि- यह सबला और आरोग्यकारी तिथि है। इसकी स्वामी गौरी जी हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में नमक का दान व भक्षण त्याज्य है।

चतुर्थी तिथि- यह खल और हानिप्रद तिथि है। इसके स्वामी गणेश जी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में तिल का दान और भक्षण त्याज्य है।

पंचमी तिथि- यह धनप्रद व शुभ तिथि है। इसके स्वामी नागराज वासुकी हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ और कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में खट्टी वस्तुओं का दान और भक्षण त्याज्य है।

षष्ठी तिथि- कीर्तिप्रद तिथि है। इसके स्वामी स्कंद भगवान हैं। नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण पक्ष में मध्यम फलदायी, तैल कर्म त्याज्य।

सप्तमी तिथि- मित्रप्रद व शुभ तिथि है। इसके स्वामी भगवान सूर्य हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, आंवला त्याज्य।

अष्टमी तिथि- बलवती व व्याधि नाशक तिथि है। इसके देवता शिव जी हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, नारियल त्याज्य।

नवमी तिथि- उग्र व कष्टकारी तिथि है। इसकी देवता दुर्गा जी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, काशीफल (कोहड़ा, कद्दू) त्याज्य।

दशमी तिथि- धर्मिणी और धनदायक तिथि है। इसके देवता यम हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, त्याज्य कर्म परवल है।

एकादशी तिथि- आनंद प्रदायिनी और शुभ फलदायी तिथि है। इसके देवता विश्व देव हैं। नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म दाल है।

द्वादशी तिथि- यह यशोबली और सर्वसिद्धिकारी तिथि है। इसके देवता हरि हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म मसूर है।

त्रयोदशी तिथि- यह जयकारी और सर्वसिद्धिकारी तिथि है। इसके देवता मदन (कामदेव) हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म बैंगन है।

चतुर्दशी तिथि- क्रूरा और उग्रा तिथि है। इसके देवता शिवजी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म मधु है।

पूर्णिमा तिथि- यह सौम्य और पुष्टिदा तिथि है। इसके देवता चंद्रमा हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में पूर्ण शुभ, त्याज्य कर्म घृत है।

अमावस्या तिथि- पीड़ाकारक और अशुभ तिथि है। इसके स्वामी पितृगण हैं। फल अशुभ है, त्याज्य कर्म मैथुन है।

शुभ ग्राह्य तिथियां

बच्चे नाम रखना- प्रतिपदा (कृष्ण पक्ष) तथा इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों की 2, 3, 7, 10, 11, 12 13वीं तिथि तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।

विद्यारंभ- शुक्ल पक्ष में 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12, 13वीं तिथि तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।

मुण्डन संस्कार- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 13 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।

दुकान एवं बहीखाता प्रारंभ करना- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 7, 10, 12, 13वीं तिथि तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।

नौकरी आरंभ करना- दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।

वाहन खरीदने के लिए- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।

गृहारंभ एवं शिलान्यास- नींव खोदने एवं मकान बनवाने के लिए कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।

नूतन घर में प्रवेश- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।

भूमि खरीदने के लिए- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 5, 6, 10, 11, 13 तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।

विवाह मुहूर्त- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।

(अधिकांश कार्यों में 4, 9, 14 तिथियों को जिन्हें रिक्ता नाम से ख्याति है, त्याज्य माना गया है। )

विशेष-

यदि रविवार को द्वादशी तिथि हो तो क्रकच और दग्धा नाम कुयोग तथा प्रतिपदा, षष्ठी व एकादशी होने पर मृत्युदा (पीड़ाकारक) योग होता है। इस दिन शेष सभी तिथियां शुभ हैं।

सोमवार को एकादशी होने पर क्रकच और दग्धा कुयोग और द्वितीया, सप्तमी तथा द्वादशी होने पर मृत्युदा योग होता है। शेष सभी तिथियां शुभ हैं।

मंगलवार को दशमी होने क्रकच और पंचमी होने पर दग्ध नामक कुयोग तथा प्रतिपदा, षष्ठी व एकादशी होने पर मृत्युदा नामक योग होता है। तृतीया, अष्टमी तथा त्रयोदशी होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।

बुधवार को नवमी होने पर क्रकच, तृतीया होने पर दग्ध नामक कुयोग और तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी होने पर मृत्युदा नामक योग होता है। द्वितीया, सप्तमी व द्वादशी होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।

गुरुवार को अष्टमी, षष्ठी होने पर क्रमश: क्रकच और दग्ध कुयोग तथा चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी होने पर मृत्युदा योग, पंचमी, दशमी, पूर्णिमा होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।

शुक्रवार को सप्तमी होने पर क्रकच, अष्टमी होने पर दग्ध नाम कुयोग, द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी होने पर मृत्युदा योग और प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।

शनिवार को षष्ठी होने पर क्रकच और नवमी होने पर दग्ध नामक कुयोग तथा पंचमी, दशमी पूर्णिमा होने पर मृत्युदा योग और चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।

(उपरोक्त दोष मध्याह्न के पश्चात न्यून हो जाते हैं और यदि सर्वार्थसिद्धि योग, अमृत योग, रवियोग इत्यादि दोषसंघ निवारक योग होता है तो तिथि जन्म दोष समाप्त हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त चंद्रबल यदि उत्तम है तो भी तिथि के कारण उत्पन्न कुयोगों का निवारण हो जाता है- क्रकचो मृत्यु योगाख्यो दिने दग्ध तथैव च। चंद्रे शुभे क्षयं यान्ति वृक्षा वज्राहता इव।।)

एक दिन को तिथि कहा गया है जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक की होती है। चंद्र मास में ३० तिथियाँ होती हैं, जो दो पक्षों में बँटी हैं। शुक्ल पक्ष में एक से चौदह और फिर पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा सहित कुल मिलाकर पंद्रह तिथि। कृष्ण पक्ष में एक से चौदह और फिर अमावस्या आती है। अमावस्या सहित पंद्रह तिथि।

तिथियों के नाम निम्न हैं- पूर्णिमा (पूरनमासी), प्रतिपदा (पड़वा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी (पंचमी), षष्ठी (छठ), सप्तमी (सातम), अष्टमी (आठम), नवमी (नौमी), दशमी (दसम), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और अमावस्या (अमावस)।

हिन्दू काल गणना के अनुसार मास में ३० तिथियाँ होतीं हैं, जो दो पक्षों में बंटीं होती हैं। चन्द्र मास एक अमावस्या के अन्त से शुरु होकर दूसरे अमावस्या के अन्त तक रहता है. अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र का भौगांश बराबर होता है. इन दोनों ग्रहों के भोंगाश में अन्तर का बढना ही तिथि को जन्म देता है. तिथि की गणना निम्न प्रकार से की जाती है.

हमारे पर्व-त्योहार हिन्दी तिथियों के अनुसार ही होते हैं, इसके पीछे एक विशेष कारण है। पर्व-त्योहारों में किसी विशेष देवता की पूजा की जाती है। अतः स्वाभाविक है कि वे जिस तिथि के अधिपति हों, उसी तिथि में उनकी पूजा हो। यही कारण है कि उस विशेष तिथि को ही उस विशिष्ट देवता की पूजा की जाए। तिथियों के स्वामी संबंधी वर्णन निम्न है :

प्रतिपदा- अग्नयादि देवों का उत्थान पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को होता है। अग्नि से संबंधित कुछ और विशेष पर्व प्रतिपदा को ही होते हैं।

द्वितीया- प्रजापति का व्रत प्रजापति द्वितीया इसी तिथि को होता है।

तृतीया- चूँकि गौरी इसकी स्वामिनी है, अतः उनका सबसे महत्वपूर्ण व्रत हरितालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को ही महिलाएँ करती हैं।

चतुर्थी- गणेश या विनायक चतुर्थी सर्वत्र विख्यात है। यह इसलिए चतुर्थी को ही होती है, क्योंकि चतुर्थी के देवता गणेश हैं।

पंचमी- पंचमी के देवता नाग हैं, अतः श्रावण में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की दोनों चतुर्थी को नागों तथा मनसा (नागों की माता) की पूजा होती है।

षष्ठी- स्वामी कार्तिक की पूजा षष्ठी को होती है।

सप्तमी- देश-विदेश में मनाया जाने वाला सर्वप्रिय त्योहार प्रतिहार षष्ठी व्रत (डालाछठ) यद्यपि षष्ठी और स्वामी दोनों दिन मनाया जाता है, किंतु इसकी प्रधान पूजा (और उदयकालीन सूर्यार्घदान) सप्तमी में ही किया जाता है। छठ पर्व के निर्णय में सप्तमी प्रधान होती है और षष्ठी गौण। यहाँ ज्ञातव्य है कि सप्तमी के देवता सूर्य हैं।

वस्तुतः सायंकालीन अर्घ्य में हम सूर्य के तेजपुंज (सविता) की आराधना करते हैं, जिन्हें 'छठमाई' के नाम से संबोधित करके उन्हें प्रातःकालीन अर्घ्य ग्रहण करने के लिए निमंत्रित किया जाता है, जिसे ग्रामीण अंचलों में 'न्योतन' कहा जाता है, पुनः प्रातःकालीन सूर्य को 'दीनानाथ' से संबोधित किया जाता है।

तिथि = चन्द्र का भोगांश - सूर्य का भोगांश

शुक्ल पक्ष में १-१४ और पूर्णिमा-शुक्ल पक्ष हिन्दू काल गणना अनुसार पूर्णिमांत माह के द्वितीयार्ध पक्ष (१५ दिन) को कहते हैं। यह पक्ष अमावस्या से पूर्णिमा तक होता है।

पूर्णिमा

चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है।

वैशाख की पूर्णिमा के दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती है।

ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन वट सावित्री मनाया जाता है।

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू-पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। इसी दिन कबीर जयंती मनाई जाती है।

श्रावण की पूर्णिमा के दिन रक्षाबन्धन का पर्व मनाया जाता है।

भाद्रपद की पूर्णिमा के दिन उमा माहेश्वर व्रत मनाया जाता है।

अश्विन की पूर्णिमा के दिन शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।

कार्तिक की पूर्णिमा के दिन पुष्कर मेला और गुरुनानक जयंती पर्व मनाए जाते हैं।

मार्गशीर्ष की पूर्णिमा के दिन श्री दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है।

पौष की पूर्णिमा के दिन शाकंभरी जयंती मनाई जाती है। जैन धर्म के मानने वाले पुष्यभिषेक यात्रा प्रारंभ करते हैं। बनारस में दशाश्वमेध तथा प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर स्नान को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

माघ की पूर्णिमा के दिन संत रविदास जयंती, श्री ललित और श्री भैरव जयंती मनाई जाती है। माघी पूर्णिमा के दिन संगम पर माघ-मेले में जाने और स्नान करने का विशेष महत्व है।

फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन होली का पर्व मनाया जाता है।

कृष्ण पक्ष में १-१४ और अमावस्या-कृष्ण पक्ष हिन्दू काल गणना अनुसार पूर्णिमांत माह के उत्तरार्ध पक्ष (१५ दिन) को कहते हैं। यह पक्ष पूर्णिमा से अमावस्या तक होता है।

अमावस्या

· पंचांग के अनुसार माह की ३०वीं और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है जिस दिन चंद्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता। इस दिन का भारतीय जनजीवन में अत्यधिक महत्व हैं। हर माह की अमावस्या को कोई न कोई पर्व अवश्य मनाया जाता हैं। सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। भाद्रपद अमावस्या के दिन पोला मनाया जाता है।

· कार्तिक अमावस्या के दिन दीपावली पर्व मनाया जाता हैं।

· पाँच अंगो के मिलने से पंचाग बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं:-

1) तिथि (Tithi)

2) वार (Day)

3) नक्षत्र (Nakshatra)

4) योग (Yog)

5) करण (Karan)

चान्द्र मास (Chand Masa) में कुल 30 तिथियाँ होती हैं जिनमें 15 तिथियाँ शुक्ल पक्ष (Shukla Pakshya) और 15 कृष्ण पक्ष (Krishna Pakshya) की होती हैं. तिथियाँ निम्न प्रकार से हैं:-

1) प्रतिपदा (Pratipada) (परिवा/ पडिवा/ परमा)

2) द्वितीया (दूज/ दोज)

3) तृतीया (तीज)

4) चतुर्थी (चौथ)

5) पंचमी (पाँचे)

6) षष्टी (षष्ट/ छटें/ छट)

7) सप्तमी (सातें)

8) अष्टमी (आठें)

9) नवमी (नमें)

10) दशमी (दसें)

11) एकादशी (ग्यारस)

12) द्वादशी (बारस)

13) त्रयोदशी (तेरस)

14) चतुर्दशी ( चौदस)

15) पूर्णिमा (पूनों)

30) अमावस्या (अमावस)

तिथियाँ शुक्लपक्ष (Shukla Pakshya) की प्रतिपदा (Pratipada) से गिनी जाती है. पूर्णिमा (Purnima) को 15 तथा अमावस्या (Amabasya) को 30 तिथि कहते हैं. जिस दिन सूर्य व चन्द्रमा में 180º का अन्तर (दूरी) होता है अर्थात सूर्य व चन्द्र आमने सामने होते हैं तो वह पूर्णिमा तिथि कहलाती है. और जब सुर्य व चन्द्रमा एक ही स्थान पर होते हैं अर्थात का अन्तर होता है तो अमावस्या तिथि कहलाती है. भचक्र का कुलमान (Kulman) 360º है, तो एक तिथि=360»30=12º अर्थात सूर्य-चन्द्र में 12º का अन्तर पडने पर एक तिथि होती है.

उदाहरण स्वरुप से 12º तक प्रतिपदा (शुक्ल पक्ष) 12º से 24º तक द्वितीय तथा 330º से 360º तक अमावस्या इत्यादि. भारतीय ज्योतिष की परम्परा में तिथि की वृद्धि एंव तिथि का क्षय भी होता है. जिस तिथि में दो बार सूर्योदय आता है वह वृद्धि तिथि कहलाती है तथा जिस तिथि में एक भी सूर्योदय न हो तो उस तिथि का क्षय हो जाता है. उदाहरण के लिए एक तिथि सूर्योदय से पहले प्रारम्भ होती है तथा पूरा दिन रहकर अगले दिन सूर्योदय के 2 घंटे पश्चात तक भी रहती है तो यह तिथि दो सूर्योदय को स्पर्श कर लेती है. इसलिए इस तिथि में वृद्धि हो जाती है . इसी प्रकार एक अन्य तिथि सूर्योदय के पश्चात प्रारम्भ होती है तथा दूसरे दिन सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाती है, क्योंकि यह तिथि (Tithi) एक भी सूर्योदय को स्पर्श नहीं करती अतः क्षय होने से तिथि क्षय (Tithikshya) कहलाती है.

ये युगादि तिथियाँ बताई गयी हैं, अब मन्वन्तर की प्रारंभिक तिथियों का श्रवण कीजिये । अश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक की द्वादशी, चैत्र और भाद्र की तृतीया, फाल्गुन की अमावस्या, पौष की एकादशी, आषाढ़ की पूर्णिमा, कार्तिक की पूर्णिमा, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठ की पूर्णिमा ये मन्वन्तर की आदि तिथियाँ हैं, जो दान के पुण्य को अक्षय करने वाली हैं ।

 

पक्ष और ग्रहण के सम्बन्ध में जानकारी

एक महीने में दो पक्ष होते है -----पहला पक्ष कृष्ण पक्ष और दूसरा पक्ष शुक्ल पक्ष |

कृष्ण पक्ष में अमावस्या होती है और शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा होती है | जब भी ग्रहण होते है तो अमावस्या को सूर्य ग्रहण होता है | पूर्णिमा को चन्द्र ग्रहण होता है |

पूर्णिमा के बाद का पहला दिन [ प्रतिपदा ] कृष्ण पक्ष का होता है, जबकि अमावस्या के बाद का पहला दिन [ प्रतिपदा ] शुक्ल पक्ष का होता है |

तिथियों की पूर्ण जानकारी

तिथियाँ १५ होती है और पक्ष में भी १५ होती है |

तिथियों के स्वामी ---- प्रतिपत का स्वामी = अग्नि , द्वितीय का = ब्राह्ग , तृतीया का स्वामी = पार्वती शिव , चतुर्थ का स्वामी = गणेशजी , पंचमी का स्वामी =सर्पदेव ( नाग ) , षष्ठी का स्वामी = कार्तिकेय , सप्तमी का स्वामी = सूर्यदेव , अष्टमी का स्वामी = शिव , नवमी का स्वामी = दुर्गाजी , दशमी का स्वामी = यमराज , एकादशी का स्वामी = विश्वदेव , द्वादशी का स्वामी = विष्णु भगवान , त्रयोदशी का स्वामी = कामदेव , चतुर्दशी का स्वामी = शिव , पूर्णिमा का स्वामी = चन्द्रमा , अमावस्या का स्वामी = पित्रदेव |

नोट -- जिस देवता की जो विधि कही गई है उस तिथि में उस देवता की पूजा , प्रतिष्ठा , शांति विशेष हितकर होती है |

तिथियों के अनुसार शुभ जानकारी --

नंदा

प्रतिपदा

षष्ठी

एकादशी

भद्रा

द्वितीया

सप्तमी

द्वादशी

जया

तृतीया

अष्टमी

त्रयोदशी

रिक्ता

चतुर्थी

नवमी

चतुर्दशी

पूर्ण

पंचमी

दशमी

पूर्णिमा

नोट -- शुक्ल पक्ष में नंदा , भद्रा , जया , रिक्त , और पूर्ण क्रम से अशुभ , मध्य और शुभ होती है |

अर्थात शुक्ल पक्ष में ऊपर लिखी हुई

प्रथम खंड की पांच तिथियाँ अशुभ होती है |

द्वितीया खंड की पाँच तिथियाँ मध्यम

और तृतीया के पाँच तिथियाँ उत्तम होती है |

इसी तरह कृष्ण पक्ष में--

प्रथम खंड की पाँच तिथियाँ शुभ होती है |

द्वितीया की पाँच तिथियाँ मध्य होती है |

तृतीया से पाँच तिथियाँ अशुभ होती है |

सामान्यत: तिथियों को ५ पांच श्रेणियों में बांटा गया है |

१. नंदा तिथि : दोनों पक्षों की प्रतिपदा , षष्ठी व् एकादशी (१,,११,) नंदा तिथि कहलाती है | तिथि गंडांत काल /समय प्रथम घटी या शुरुआत के २४ मिनट को छोड़कर सभी मंगल कार्यों के लिए इन तिथियों को शुभ माना जाता है |

२. भद्रा तिथि : दोनों पक्षों की द्वितीया , सप्तमी , व् द्वादशी (२,,१२,) भद्रा तिथि कहलाती है | व्रत,जप, ताप, दान-पुण्य,

जैसे धार्मिक कार्यों के लिए ही शुभ मानी जाती है |

३. जया तिथि : दोनों पक्षों की तृतीया, अष्टमी , व् त्रयोदशी (३,,१३,) जया तिथि कहलाती है | गायन , वादन जैसे शुभ कार्य ही किये जा सकते हैं |

४. रिक्ता तिथि : दोनों पक्षों की चतुर्थी , नवमी,व् चतुर्दशी (४,,१४,) रिक्ता तिथि कहलाती है | तीर्थ यात्राएँ, मेले आदि के लिए ठीक होती हैं |

५. पूर्णा तिथि : दोनों पक्षों की पंचमी , दशमी, पूर्णिमा, और अमावस (५,१०,१५,३०,) पूर्णा तिथि कहलाती हैं | तिथि

गंडांत काल तिथि के अंतिम एक घटी या अंतिम २४ मिनट को छोड़कर सभी प्रकार के मंगल कार्यों के लिए ये तिथियाँ

शुभ मानी जाती हैं |

ऋतु (Seasons) : वर्ष में कुल ६ ऋतुएँ होती हैं , एक ऋतु की अवधि दो मास की होती है | अलग अलग ऋतुओं में अलग - अलग मौसम होता है

ऋतुओं में मौसम एवं अवधि की समय सारिणी

क्र. ऋतु चंद्रमास अवधि अंग्रेजी मास अवधि मौसम

१. बसंत चैत्र व् वैशाख मध्य मार्च से मध्य मई सौम्य

२. ग्रीष्म ज्येष्ठ व् आषाढ़ मध्य मई से मध्य जुलाई तीव्र गर्मी

३. वर्षा श्रावण व् भाद्रपद मध्य जुलाई से मध्य सितम्बर वर्षा वाला

४. शरद आश्विन व् कार्तिक मध्य सितम्बर से मध्य नवम्बर अधिक ठण्ड

५. हेमंत मार्गशीर्ष व् पौष मध्य नवम्बर से मध्य जनवरी हिमपात

६. शिशिर माघ व् फाल्गुन मध्य जनवरी से मध्य मार्च सौम्य

विशेष तिथियाँ : उपरोक्त तिथियों में कुछ तिथियाँ विशेष कहलाती हैं | जिनमें कुछ तिथियाँ अच्छी व् मंगलमय होती हैं

एवं कुछ तिथियाँ अशुभ या शुभ कार्यों के लिए वर्जित होती हैं | ये तिथियाँ निम्न प्रकार से हैं :

१. युगादि तिथियाँ :सतयुग प्रारम्भ तिथि कार्तिक शुक्ल नवमी , त्रेतायुग प्रारम्भ तिथि वैशाख शुक्ल तृतीया ,

द्वापरयुग प्रारम्भ तिथि माघ कृष्ण पक्ष अमावस ,कलियुग प्रारम्भ तिथि भाद्रपद कृष्ण पक्ष त्रयोदशी आदि तिथियाँ हैं |

२. सिद्धा तिथियाँ : मंगलवार की ३,, १३, तृतीया , अष्टमी, त्रयोदशी, बुधवार की २,, १२ द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी, गुरूवार की ५,१०,१५, पंचमी, दशमी, पूर्णिमा, व् अमावस , शुक्रवार की १,,११, प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी, और शनिवार की ४,,१४, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी , तिथियाँ सिद्धा तिथियाँ कहलाती हैं तथा सभी कार्यों के लिए शुभ मानी जाती हैं |

३. पर्व तिथियाँ : कृष्ण पक्ष की तीन तिथियाँ अष्टमी, चतुर्दशी, और अमावस तथा शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि और

संक्रान्ति तिथि पर्व तिथि कहलाती हैं |इनको शुभ मुहूर्त के लिए छोड़ दिया जाता है |

४. प्रदोष तिथियाँ : द्वादशी तिथी अर्धरात्रि पूर्व , षष्ठी तिथि रात्रि से ४ चार घंटा ३० तीस मिनट पूर्व, एवं तृतीया तिथि रात्रि से ३ तीन घंटा पूर्व समाप्त होने की स्थिति में प्रदोष तिथियाँ कहलाती हैं , इनमें सभी शुभ कार्य वर्जित हैं |

५. दग्धा , विष, हुताशन , तिथियाँ : दग्ध, विष, हुताशन, तिथियाँ क्रमशः रविवार को १२,, १२, सोमवार को ११,,, मंगलवार को ५,,७ बुधवार को ३,,, गुरूवार को ६,,, शुक्रवार को ८,,१०, शनिवार को ९,,११, होती हैं | उपरोक्त सभी वारों में जो तिथियाँ आती हैं वो क्रमशः दग्धा , विष, हुताशन तिथियों में आती हैं | ये सभी तिथियाँ अशुभ और हानिकारक मानी जाती हैं |

६. वृद्धि तिथि : सूर्योदय के पूर्व प्रारम्भ होकर अगले दिन सूर्योदय के बाद समाप्त होने वाली तिथि वृद्धि तिथि कहलाती है| इसे तिथि वृद्धि भी कहते हैं, सभी मुहूर्तों के लिए ये अशुभ होती है |

७. क्षय तिथि : सूर्योदय के पश्चात प्रारम्भ होकर अगले दिन सूर्योदय से पूर्व समाप्त होने वाली तिथि क्षय तिथि कहलाती है | इसे तिथि क्षय भी कहते हैं , ये तिथि भी सभी मुहूर्तों के लिए अशुभ होती है |

८. गंड तिथि : सभी पूर्णा तिथियों ५,१०,१५,३०, यानी पंचमी , दशमी, पूर्णिमा , अमावस कि अंतिम एक घटी या २४

मिनट तथा नंदा तिथियों १,,११, यानी प्रतिपदा , षष्ठी, एकादशी की प्रथम एक घटी या २४ मिनट गंड तिथियों की

श्रेणी में आती हैं | इन्हें तिथि गंडांत भी कहते हैं | इन तिथियों की उक्त घटी अथवा २४ मिनट को सभी मुहूर्तों के लिए वर्जित माना जाता है , अतः इस समय में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए |

प्रतिपदा: प्रथम तिथि

इसे प्रथम तिथि भी कहा गया है, इस तिथि के स्वामी अग्नि देव हैं। इनकी उपासना से घर में धन-धान्य, आयु, यश, बल, मेधा आदि की वृद्धि होती है।

द्वितीया

इस तिथि के स्वामी ब्रह्मा जी हैं। इस दिन किसी ब्रह्मचारी ब्राह्मण की पूजा करना एवं उन्हें भोजन, अन्न वस्त्र का दान देना श्रेयस्कर होता है।

तृतीया

इस तिथि में गौरी जी की पूजा करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है। कुबेर जी भी तृतीया के स्वामी माने गये हैं। अतः इनकी भी पूजा करने से धन-धान्य, समृद्धि प्राप्त होती है।

चतुर्थी

इस तिथि के स्वामी श्री गणेश जी हैं जिन्हें प्रथम पूज्य भी कहा जाता है। इनके स्मरण से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं।

पंचमी

इस तिथि के स्वामी नाग देवता हैं। इस दिन नाग की पूजा से भय तथा कालसर्प योग शमन होता है।

षष्ठी

इस तिथि के स्वामी स्कंद अर्थात् कार्तिकेय हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति मेधावी, सम्पन्न एवं कीर्तिवान होता है। अल्पबुद्धि एवं हकलाने वाले बच्चे के लिए कार्तिकेय की पूजा करना श्रेयस्कर होता है। जिनकी मंगल की दशा हो या कोई कोर्ट केस में फंसा हो उसके लिए कार्तिकेय की पूजा श्रेष्ठ फलदायी है।

सप्तमी

इस तिथि के स्वामी सूर्य हैं। सूर्य आरोग्यकारक माने गये हैं साथ ही जगत के रक्षक भी। इसलिए अच्छे स्वास्थ्य एवं आरोग्यता हेतु विशेषकर जिसे आंखों की समस्या हो उसके लिए इस दिन चाक्षुषी विद्या का पाठ करना माना गया है।

अष्टमी

इस दिन के स्वामी रुद्र हैं। अतः इस तिथि में वृषभ से सुशोभित भगवान सदाशिव का पूजन करने से सारे कष्ट एवं रोग दूर होते हैं।

नवमी

इस तिथि के दिन दुर्गा जी की पूजा करने से यश में वृद्धि होती है। साथ ही किसी प्रकार की ऊपरी बाधा एवं शत्रु नाश के लिए आज के दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए।

दशमी

इस तिथि के देवता यमराज हैं। इस दिन इनकी पूजा करने से ये सभी बाधाओं को दूर करते हैं एवं मनुष्य का नरक तथा अकाल मृत्यु से उद्धार करते हैं।

एकादशी

इस तिथि के देवता विश्वेदेवा हैं। इनकी पूजा करने से वो भक्तों को धन धान्य एवं भूमि प्रदान करते हैं।

द्वादशी

इस तिथि के स्वामी श्री हरि विष्णु जी हैं। इनकी पूजा करने से मनुष्य समस्त सुखों को भोगता है, साथ ही सभी जगह पूज्य एवं आदर का पात्र बनता है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना होता है। परंतु इस दिन तुलसी तोड़ना निषिद्ध है।

त्रयोदशी

इस तिथि के स्वामी कामदेव हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति रूपवान होता है एवं उम व सुंदर पत्नी प्राप्त करता है। साथ ही वैवाहिक सुख भी पूर्णरूप से मिलता है।

चतुर्दशी

इसके स्वामी भगवान शिव हैं। अतः प्रत्येक मास की चतुर्दशी विशेषकर कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन शिव जी की पूजा, अर्चना एवं रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव मनोकामना पूर्ण करते हैं एवं समस्त ऐश्वर्य एवं सम्प प्रदान करते हैं।

पूर्णिमा

इस तिथि के देवता चंद्र हैं। इनकी पूजा करने से मनुष्य का समस्त संसार पर आधिपत्य होता है। विशेषकर जिनकी चंद्र की दशा चल रही हो उनके लिए पूर्णिमा का व्रत रखना एवं चंद्र को अघ्र्य देना सुख में वृद्धि करता है। जिनके बच्चे अक्सर सर्दी जुकाम, निमोनिया आदि रोगों से ग्रसित हों उनकी मां को एक वर्ष तक पूर्णिमा का व्रत रखना चाहिए तथा चंद्र को अघ्र्य देकर अपना व्रत करना चाहिए।

अमावस्या

इस तिथि पर पितरों का आधिपत्य है। अतः इस दिन अपने पितरों की शांति हेतु अन्न वस्त्र का दान देना एवं श्राद्ध करना श्रेयस्कर है। इससे प्रसन्न हो पितर देवता अपने कुल की वृद्धि हेतु संतान एवं धन समृद्धि देते हैं।

कैसे करे पूजन

रोज सुबह जल्दी उठें और ब्रहम मुहूर्त में स्नान के बाद घर के मंदिर में ही तिथि के स्वामी की पूजा का प्रबंध करें। अगर मंदिर में तिथि स्वामी की मूर्ति या फोटो न हो तो उनके नाम का ध्यान करते हुए मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करें। पूजा में कुमकुम, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती, फूल, अक्षत चावल, प्रसाद के लिए फल, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, शक्कर, पान, दक्षिणा आदि अवश्य रखें। पूजा में धूप-दीप जलाएं और परेशानियों को दूर करने की प्रार्थना करें।

वार

वारों का निर्धारण होरा से होता है, जिस दिन पहली होरा जिस ग्रह की होती है उसी ग्रह के नाम पर वह दिन होता है। एक अहोरात्र में चौबीस होराएं होती हैं। पच्चीसवीं होरा जिस ग्रह की होती है अगला दिन उसी ग्रह के नाम पर होता है।

वार स्वामी देवता नियंत्रक देवता

१. रविवार सूर्य/रुद्र सूर्य देव

२. सोमवार गौरी चन्द्र देव

३. मंगलवार सकन्द/गणेश मंगल देव

४. बुधवार विष्णु बुध देव

५. गुरुवार ब्रह्मा/सरस्वती बृहस्पति देव

६. शुक्रवार इन्द्र/लक्ष्मी शुक्राचार्य

७. शनिवार यम/शिव शनि देव

देवता जिस प्रकार उपासकों की अभीष्ट कामना पूर्ण करते हैं, संक्षेप में वह इस प्रकार है:

प्रतिपदा तिथि में अग्निदेव की पूजा करके अमृतरूपी घृत का हवन करे तो उस हवि से समस्त धान्य और अपरिमित धन की प्राप्ति होती है। द्वितीया को ब्रह्मा की पूजा करके ब्रह्मचारी ब्राह्मण को भोजन कराने से मनुष्य सभी विद्याओं में पारंगत हो जाता है। तृतीया तिथि में धन के स्वामी कुबेर का पूजन करने से मनुष्य निश्चित ही विपुल धनवान बन जाता है तथा क्रय-विक्रयादि व्यापारिक व्यवहार में उसे अत्यधिक लाभ होता है। चतुर्थी तिथि में भगवान गणेश का पूजन करना चाहिए। इससे सभी विघ्नों का नाश हो जाता है। पंचमी तिथि में नागों की पूजा करने से विष का भय नहीं रहता, स्त्री और पुत्र प्राप्त होते हैं और श्रेष्ठ लक्ष्मी भी प्राप्त होती है। षष्ठी तिथि में कार्तिकेय की पूजा करने से मनुष्य श्रेष्ठ मेधावी, रूपसंपन्न, दीर्घायु और कीर्ति को बढ़ानेवाला हो जाता है। सप्तमी तिथि को चित्रभानु नामवाले भगवान सूर्यनारायण का पूजन करना चाहिए, ये सबके स्वामी एवं रक्षक हैं। अष्टमी तिथि को वृषभ से सुशोभित भगवान सदाशिव की पूजा करनी चाहिए, वे प्रचुर ज्ञान तथा अत्यधिक कांति प्रदान करते हैं। भगवान शंकर मृत्य्हरण करनेवाले, ज्ञान देने वाले और बंधनमुक्त करने वाले हैं। नवमी तिथि में दुर्गा की पूजा करके मनुष्य इच्छापूर्वक संसार-सागर को पार कर लेता है तथा संग्राम और लोकव्यवहार में वह सदा विजय प्राप्त करता है। दशमी तिथि को यह की पूजा करनी चाहिए, वे निश्चित ही सभी रोगों को नष्ट करने वाले और नरक तथा मृत्यु से मानव का उद्धार करने वाले हैं। एकादशी तिथि को विश्वेदेवों की भली प्रकार से पूजा करनी चाहिए। वे भक्त को संतान, धन-धान्य और पृथ्वी प्रदान करते हैं। द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु की पूजा करके मनुष्य सदा विजयी होकर समस्त लोक में वैसे ही पूज्य हो जाता है, जैसे किरणमालौ भगवान सूर्य पूज्य हैं। त्रयोदशी में कामदेव की पूजा करने से मनुष्य उत्तम भार्या प्राप्त करता है तथा उसकी सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। चतुर्दशी तिथि में भगवान देवदेवेश्वर सदाशिव की पूजा करके मनुष्य समस्त ऐश्वर्यों से समन्वित हो जाता है तथा बहुत से पुत्रों एवं प्रभूत धन से संपन्न हो जाता है। पौर्णमासी तिथि में जो भक्तिमान मनुष्य चंद्रमा की पूजा करता है, उसका संपूर्ण संसार पर अपना आधिपत्य हो जाता है और वह कभी नष्ट नहीं होता। अपने दिन में अर्थात् अमावास्या में पितृगण पूजित होने पर सदैव प्रसन्न होकर प्रजावृद्धि, धन-रक्षा, आयु तथा बल-शक्ति प्रदान करते हैं। उपवास के बिना भी ये पितृगण उक्त फल को देनेवाले होते हैं। अत: मानव को चाहिए कि पितरों को भक्तिपूर्वक पूजा के द्वारा सदा प्रसन्न रखे। मूलमंत्र, नाम-संकीर्तन और अंश मंत्रों से कमल के मध्य में स्थित तिथियों के स्वामी देवताओं की विविध उपचारों से भक्तिपूर्वक यथाविधि पूजा करनी चाहिए तथा जप-होमादि कार्य संपन्न करने चाहिए। इसके प्रभाव से मानव इस लोक में और परलोक में सदा सुखी रहता है। उन-उन देवों के लोकों को प्राप्त करता है और मनुष्य उस देवता के अनुरूप हो जाता है। उसके सारे अरिष्ट नष्ट हो जाते हैं तथा वह उत्तम रूपवान, धार्मिक, शत्रुओं का नाश करनेवाला राजा होता है।हमारे शास्त्रों में तिथि को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जिस तिथि के जो देवता बताये गये हैं, उन देवताओं की पूजा उपासना उसी तिथि में करने से सभी देवता उपासक से प्रसन्न हो उसकी अभिलाषा को पूर्ण करते हैं। प्रतिपदा: इसे प्रथम तिथि भी कहा गया है, इस तिथि के स्वामी अग्नि देव हैं। इनकी उपासना से घर में धन-धान्य, आयु, यश, बल, मेधा आदि की वृद्धि होती है। द्वितीया: इस तिथि के स्वामी ब्रह्मा जी हैं। इस दिन किसी ब्रह्मचारी ब्राह्मण की पूजा करना एवं उन्हें भोजन, अन्न वस्त्र का दान देना श्रेयस्कर होता है। तृतीया: इस तिथि में गौरी जी की पूजा करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है। कुबेर जी भी तृतीया के स्वामी माने गये हैं। अतः इनकी भी पूजा करने से धन-धान्य, समृद्धि प्राप्त होती है। चतुर्थी: इस तिथि के स्वामी श्री गणेश जी हैं जिन्हें प्रथम पूज्य भी कहा जाता है। इनके स्मरण से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं। पंचमी: इस तिथि के स्वामी नाग देवता हैं। इस दिन नाग की पूजा से भय तथा कालसर्प योग शमन होता है। षष्ठी: इस तिथि के स्वामी स्कंद अर्थात् कार्तिकेय हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति मेधावी, सम्पन्न एवं कीर्तिवान होता है। अल्पबुद्धि एवं हकलाने वाले बच्चे के लिए कार्तिकेय की पूजा करना श्रेयस्कर होता है। जिनकी मंगल की दशा हो या कोई कोर्ट केस में फंसा हो उसके लिए कार्तिकेय की पूजा श्रेष्ठ फलदायी है। सप्तमी: इस तिथि के स्वामी सूर्य हैं। सूर्य आरोग्यकारक माने गये हैं साथ ही जगत के रक्षक भी। इसलिए अच्छे स्वास्थ्य एवं आरोग्यता हेतु विशेषकर जिसे आंखों की समस्या हो उसके लिए इस दिन चाक्षुषी विद्या का पाठ करना माना गया है। अष्टमी: इस दिन के स्वामी रुद्र हैं। अतः इस तिथि में वृषभ से सुशोभित भगवान सदाशिव का पूजन करने से सारे कष्ट एवं रोग दूर होते हैं। नवमी: इस तिथि के दिन दुर्गा जी की पूजा करने से यश में वृद्धि होती है। साथ ही किसी प्रकार की ऊपरी बाधा एवं शत्रु नाश के लिए आज के दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए। दशमी: इस तिथि के देवता यमराज हैं। इस दिन इनकी पूजा करने से ये सभी बाधाओं को दूर करते हैं एवं मनुष्य का नरक तथा अकाल मृत्यु से उद्धार करते हैं। एकादशी: इस तिथि के देवता विश्वेदेवा हैं। इनकी पूजा करने से वो भक्तों को धन धान्य एवं भूमि प्रदान करते हैं। द्वादशी: इस तिथि के स्वामी श्री हरि विष्णु जी हैं। इनकी पूजा करने से मनुष्य समस्त सुखों को भोगता है, साथ ही सभी जगह पूज्य एवं आदर का पात्र बनता है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना होता है। परंतु इस दिन तुलसी तोड़ना निषिद्ध है। त्रयोदशी: इस तिथि के स्वामी कामदेव हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति रूपवान होता है एवं उम व सुंदर पत्नी प्राप्त करता है। साथ ही वैवाहिक सुख भी पूर्णरूप से मिलता है। चतुर्दशी: इसके स्वामी भगवान शिव हैं। अतः प्रत्येक मास की चतुर्दशी विशेषकर कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन शिव जी की पूजा, अर्चना एवं रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव मनोकामना पूर्ण करते हैं एवं समस्त ऐश्वर्य एवं सम्प प्रदान करते हैं। पूर्णिमा: इस तिथि के देवता चंद्र हैं। इनकी पूजा करने से मनुष्य का समस्त संसार पर आधिपत्य होता है। विशेषकर जिनकी चंद्र की दशा चल रही हो उनके लिए पूर्णिमा का व्रत रखना एवं चंद्र को अघ्र्य देना सुख में वृद्धि करता है। जिनके बच्चे अक्सर सर्दी जुकाम, निमोनिया आदि रोगों से ग्रसित हों उनकी मां को एक वर्ष तक पूर्णिमा का व्रत रखना चाहिए तथा चंद्र को अघ्र्य देकर अपना व्रत करना चाहिए। अमावस्या: इस तिथि पर पितरों का आधिपत्य है। अतः इस दिन अपने पितरों की शांति हेतु अन्न वस्त्र का दान देना एवं श्राद्ध करना श्रेयस्कर है। इससे प्रसन्न हो पितर देवता अपने कुल की वृद्धि हेतु संतान एवं धन समृद्धि देते हैं।

इसी प्रकार सभी नक्षत्र-देवता जो नक्षत्रों में ही व्यवस्थित हैं, वे पूजित होने पर समस्त अभीष्ट कामनाओं को प्रदान करते हैं। अश्विनी नक्षत्र में अश्विनीकुमारों की पूजा करने से मनुष्य दीर्घायु एवं व्याधिमुक्त होता है। भरणी नक्षरे में कृष्णवर्ण के सुंदर पुष्पों से बनी हुई मान्यादि और होम के द्वारा पूजा करने से अग्निदेव निश्चित ही यथेष्ट फल देते हैं। रोहिणी नक्षत्र में ब्रह्मा की पूजा करने से वह साधका की अभिलाषा पूरी कर देते हैं। मृगशिरा नक्षत्र में पूजित होने पर उसके स्वामी चंद्रदेव उसे ज्ञान और आरोग्य प्रदान करते हैं। आर्द्रा नक्षत्र में शिव के अर्चन से विजय प्राप्त होती है। सुंदर कमल आदि पुष्पों से पूजे गए भगवान शिव सदा कल्याण करते हैं।

पुनर्वसु नक्षत्र में अदिति की पूजा करनी चाहिए। पूजा से संतृप्त होकर वे माता के सदृश रक्षा करती हैं। पुष्य नक्षत्र में उसके स्वामी बृहस्पति अपनी पूजा से प्रसन्न होकर प्रचुत सद्बुद्धि प्रदान करते हैं। आश्लेषा नक्षत्र में नागों की पूजा करने से नागदेव निर्भय कर देते हैं, काटते नहीं। मघा नक्षत्र में हव्य-कव्य के द्वारा पूजे गए सभी पितृगण धन-धान्य, भृत्य, पुत्र तथा पशु प्रदान करते हैं। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में पूषा की पूजा करने पर विजय प्राप्त हो जाती है और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में भग नामक सूर्यदेव की पुष्पादि से पूजा करने पर वे विजय कन्या को अभीप्सित पति और पुरुष को अभीष्ट पत्नी प्रदान करते हैं तथा उन्हें रूप एवं द्रव्य-संपदा से संपन्न बना देते हैं। हस्त नक्षत्र में भगवान सूर्य गंध-पुष्पादि से पूजित होने पर सभी प्रकार की धन-संपत्तियां प्रदान करते हैं। चित्रा नक्षत्र में पूजे गए भगवान त्वष्टा शत्रुरहित राज्य प्रदान करते हैं। स्वाती नक्षत्र में वायुदेव पूजित होने पर संतुष्ट जो परम शक्ति प्रदान करते हैं। विशाखा नक्षत्र में लाल पुष्पों से इंद्राग्नि का पूजन करके मनुष्य इस लोक में धन-धान्य प्राप्त कर सदा तेजस्वी रहता है।

अनुराधा नक्षत्र में लाल पुष्पों से भगवान मित्रदेव की भक्तिपूर्वक विधिवत पूजा करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और वह इस लोक में चिरकाल तक जीवित रहता है। ज्येष्ठा नक्षत्र में देवराज इंद्र की पूजा करने से मनुष्य पुष्टि बल प्राप्त करता है तथा गुणों में, धन में एवं कर्म में सबसे श्रेष्ठ हो जाता है। मूल नक्षत्र में सभी देवताओं और पितरों की भक्तिपूर्वक पूजा करने से मानव स्वर्ग में अचलरूप से निवास करता है और पूर्वोक्त फलों को प्राप्त करता है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में अप्-देवता (जल) की पूजा और हवन करके मनुष्य शारीरिक तथा मानसिक संतापों से मुक्त हो जाता है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में विश्वेदेवों और भगवान विश्वेश्वर कि पुष्पादि द्वारा पूजा करने से मनुष्य सभी कुछ प्राप्त कर लेता है।

श्रवण नक्षत्र में श्वेत, पीत और नीलवर्ण के पुष्पों द्वारा भक्तिभाव से भगवान विष्णु की पूजा कर मनुष्य उत्तम लक्ष्मी और विजय को प्राप्त करता है। धनिष्ठा नक्षत्र में गन्ध-पुष्पादि से वसुओं के पूजन से मनुष्य बहुत बड़े भय से भी मुक्त हो जाता है। उसे कहीं भी कुछ भी भय नहीं रहता। शतभिषा नक्षत्र में इन्द्र की पूजा करने से मनुष्य व्याधियों से मुक्त हो जाता है और आतुर व्यक्ति पुष्टि, स्वास्थ्य और ऐश्वर्य को प्राप्त करता है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में शुद्ध स्फटिक मणि के समान कांतिमान अजन्मा प्रभु की पूजा करने से उत्तम भक्ति और विजय प्राप्त होती है। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र मेँ अहिर्बुध्न्य की पूजा करने से परम शांति की प्राप्ति होती है। रेवती नक्षत्र श्वेत पुष्प से पूजे गए भगवान पूषा सदैव मंगल प्रदान करते हैं और अचल धृति तथा विजय भी देते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार भक्ति से किए गए पूजन से ये सभी सदा फल देने वाले होते हैं। यात्रा करने की इच्छा हो अथवा किसी कार्य को प्रारंभ करने की इच्छा हो तो नक्षत्र-देवता की पूजा आदि करके ही वह सब कार्य करना उचित है। इस प्रकार करने पर यात्रा में तथा क्रिया में सफलता होती है - ऐसा स्वयं भगवान सूर्य ने कहा हैं l

तिथियों को समझे

भारतीय ज्योतिष विज्ञान का मुख्य उद्देश्य आत्मकल्याण के साथ ही लोक व्यवहार को

भी सुव्यवस्थित करना है। लोक व्यवहार की व्यवस्था के लिए ज्योतिष विज्ञान में दो प्रमुख सिद्धांत हैं, गणित ज्योतिष एवं फलित ज्योतिष।

यद्यपि गणित ज्योतिष के शुद्ध गणित के अतिरिक्त करण, तंत्र एवं सिद्धांत नामक तीनभेद हैं और फलित ज्योतिष के जातक, ताजिक, मुहूर्त, प्रश्न एवं शकुन नामक पांच भेद हैं।

यहां पर ज्योतिष के लिए पांच तत्त्व रूपों में तिथि, नक्षत्र योग, करण एवं राशियों व दिनों

का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।

तिथि : चंद्रमा की एक कला को तिथि कहा जाता है। इसका चंद्र एवं सूर्य के अंतरांशों

से मान निकाला जाता है। प्रतिदिन सूर्य एवं चंद्रमा के भ्रमण में बारह अंशों का अंतर होताहै। यही अंतरांश का मध्यम मान है।

अमावस्या से लेकर प्रतिपदा और पूर्णमासी तक की तिथियां शुक्ल पक्ष की होती हैं।

पूर्णमासी और प्रतिपदा से लेकर अमावस्या की तिथियां कृष्ण पक्ष की होती हैं। ज्योतिष विज्ञानमें तिथियों की गणना शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से (लेकर) आरंभ होती हैं तथा अमावस्या मेंपूर्ण (समाप्त) होती हैं।हिंदू पंचांग में काल गणना का प्रमुख हिस्सा होती हैं तिथियां। तिथियों के अनुसार ही व्रत-त्योहार तय किए जाते हैं। कोई भी शुभ कार्य करने से पहले शुभ तिथियां देखी जाती है। ये शुभ-अशुभ तिथियां आखिर होती क्या हैं और किस तिथि का क्या महत्व है आइये जानते हैं।

प्रत्येक हिंदू माह में 15-15 दिन के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष होते हैं। प्रत्येक पक्ष में प्रतिपदा से लेकर पंद्रहवीं तिथि तक की संख्या होती है। शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक और कृष्ण पक्ष में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक। इस तरह दोनों पक्षों में 15-15 दिन होते हैं। अब इनमें से कुछ तिथियां शुभ मानी गई हैं, तो कुछ अशुभ। अशुभ तिथियों में कोई भी शुभ कार्य सम्पन्न नहीं किया जाता है।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार तिथियों को मुख्य रूप से पांच भागों में बांटा गया है। ये पांच भाग हैं नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा। क्रमानुसार पहली तिथि यानी प्रतिपदा होगी

नंदा, द्वितीया भद्रा, तृतीया जया, चतुर्थी रिक्ता और पंचमी पूर्णा।

नंदा तिथि: प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी नंदा तिथि कहलाती हैं। इन तिथियों में व्यापार-व्यवसाय प्रारंभ किया जा सकता है। भवन निर्माण कार्य प्रारंभ करने के लिए यही तिथियां सर्वश्रेष्ठ मानी गई हैं।

भद्रा तिथि: द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी भद्रा तिथि कहलाती हैं। इन तिथियों में धान, अनाज लाना, गाय-भैंस, वाहन खरीदने जैसे काम किए जाना चाहिए। इसमें खरीदी गई वस्तुओं की संख्या बढ़ती जाती है।

जया तिथि: तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी जया तिथियां कहलाती हैं। इन तिथियों में सैन्य, शक्ति संग्रह, कोर्ट-कचहरी के मामले निपटाना, शस्त्र खरीदना, वाहन खरीदना जैसे काम कर सकते हैं।

रिक्ता तिथि: चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी रिक्ता तिथियां कहलाती हैं। इन तिथियांें में गृहस्थों को कोई कार्य नहीं करना चाहिए। तंत्र-मंत्र सिद्धि के लिए ये तिथियां शुभ मानी गई हैं।

पूर्णा तिथि: पंचमी, दशमी और पूर्णिमा पूर्णा तिथि कहलाती हैं। इन तिथियों में मंगनी, विवाह, भोज आदि कार्यों को किया जा सकता है।

शून्य तिथि

उपरोक्त पांच प्रकार की तिथियों के अलावा कुछ तिथियों को शून्य तिथि माना गया है। इन तिथियों में विवाह कार्य नहीं किए जाते हैं। बाकी अन्य कार्य किए जा सकते हैं। ये तिथियां हैं

चैत्र मास में दोनों पक्षों की अष्टमी एवं नवमी, वैशाख में दोनों पक्षोंकी द्वादशी, ज्येष्ठ मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी एवं शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी, आषाढ़ में कृष्ण पक्ष की षष्ठी एवं शुक्ल पक्ष की सप्तमी, श्रावण मास में दोनों पक्षों की द्वितीया एवं तृतीया,भाद्रपद में दोनों पक्षों की प्रतिपदा एवं द्वितीया, अश्विन मास में दोनों पक्षों की दशमी एवंएकादशी, कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की पंचमी एवं शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी, मार्गशीर्ष मास

में दोनों पक्षों की सप्तमी एवं अष्टमी, पौष मास में दोनों पक्षों की चतुर्थी एवं पंचमी, माघमें कृष्ण पक्ष की पंचमी एवं शुक्ल पक्ष की षष्ठी एवं फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थीएवं शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि मास शून्य तिथियां मानी गई है। मास शून्य तिथियों में कार्यकरने पर कोई सफलता नहीं मिलती। चैत्र कृष्ण अष्टमी, वैशाख कृष्ण नवमी, ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी, ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, आषाढ़ कृष्ण षष्ठी, श्रावण कृष्ण द्वितीया और तृतीया, भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा एवं द्वितीया, आश्विन कृष्ण दशमी और एकादशी, कार्तिक कृष्ण पंचमी एवं शुक्ल चतुर्दशी, अगहन कृष्ण सप्तमी व अष्टमी, पौष कृष्ण चतुर्थी एवं पंचमी, माघ कृष्ण पंचमी और माघ शुक्ल तृतीया।

अमावस्या के सिनीबाली, दर्श, कुहू तीन भेद होते हैं। प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक रहने

वाली अमावस्या को सिनीबाली, चतुर्दशी से युक्त अमावस्या को दर्श तथा प्रतिपदा से युक्तअमावस्या को कुहू कहते हैं।

इन के भी आगे होती है सिद्धा तिथियां

जो सभी प्रकार के कार्य सिद्धि प्रदायक होती है

सिद्धा तिथियां : मंगलवार को तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी, बुधवार को द्वितीया, सप्तमी,द्वादशी, गुरुवार को पंचमी, दशमी, पूर्णमासी, शुक्रवार को प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी, शनिवारको चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी तिथियां सिद्धि देने वाली होती हैं। इन तिथियों में किया गया कार्यसिद्धि-प्रदायक होता है।

विभिन्न वारों में दग्धा, विष एवं हुताशन का विभिन्न तिथियों एवं वारों से निम्न प्रकार से संबंध जोड़ा गया है। इन तिथियों में कार्य करने से विघ्न बाधा का सामना करना पड़ता है, लेख के साथ दि गयी सारणी चित्र दिया गया है

आमतौर पर अंग्रेजी तरीखें 24 घंटे में बदलती है। मतलब यह कि उनके अनुसार रात की 12 बजे दिन बदल जाता है जो कि अवैज्ञानिक है। भारतीय पंचांग के अनुसार सूर्योदय से दिन बदलते हैं। जिन्हें सावन दिन कहते हैं, मतलब सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक।

जहां तक सवाल तिथि का है तो यह हिन्दू पंचाग अनुसार एक तिथि उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक की होती है। इसका मतलब यह कि कोई तिथि 19 घंटे की होगी तो कोई तिथि 24 घंटे की भी हो सकती है। अब यदि कोई तिथि 19 घंटे की होगी तो इसका मतलब है कि मध्यांतर में ही या मध्य रात्रि में ही तिथि बदल जाएगी। आपने देखा होगा चांद को दिन में भी।

जहां तक तिथि का प्रश्न है तो वह सूर्य और चंद्रमा के अंतर से तय की जाती है लेकिन उसकी गणना भी सूर्योदय से ही की जाती है। उसी तिथि को मुख्य माना जाता है जो उदय काल में हो। प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष में 15 तिथियां होती है, लेकिन क्योंकि सौर दिन से चंद्र दिन छोटा होता है इसलिए कई बार एक दिन में दो या तीन तिथियां भी पड़ सकती हैं।

इसमें तिथियों की तीन स्थितियां बनती हैं। जिस तिथि में केवल एक बार सूर्योदय होता है उसे सुधि तिथि कहते हैं, जिसमें सूर्योदय होता ही नहीं यानी वह सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है उसे क्षय तिथि कहते हैं, इसमें एक दिन में तीन तिथियां हो जाती है और तीसरी स्थिति वो जिसमें दो सूर्योदय हो जाए उसे तिथि वृद्धि कहते हैं।

प्रत्येक तिथि और वार का हमारे मन और मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है। इस तिथि के प्रभाव को जानकर ही व्रत और त्योहारों को बनाया गया। जन्मदिन का सही समय या तारीख तिथि ही है। हिन्दू सौर-चंद्र-नक्षत्र पंचांग के अनुसार माह के 30 दिन को चन्द्र कला के आधार पर 15-15 दिन के 2 पक्षों में बांटा गया है- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।

शुक्ल पक्ष के अंतिम दिन को पूर्णिमा कहते हैं और कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन को अमावस्या। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा माह की 15वीं और शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि है जिस दिन चन्द्रमा आकाश में पूर्ण रूप से दिखाई देता है। पंचांग के अनुसार अमावस्या माह की 30वीं और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है जिस दिन चन्द्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता है।

30 तिथियों के नाम निम्न हैं:- पूर्णिमा (पूरनमासी), प्रतिपदा (पड़वा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी (पंचमी), षष्ठी (छठ), सप्तमी (सातम), अष्टमी (आठम), नवमी (नौमी), दशमी (दसम), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और अमावस्या (अमावस)। पूर्णिमा से अमावस्या तक 15 और फिर अमावस्या से पूर्णिमा तक 30 तिथि होती है। तिथियों के नाम 16 ही होते हैं।

0.अमावस्या (अमावस) के देवता हैं अर्यमा जो पितरों के प्रमुख हैं। अमावास्या में पितृगणों की पूजा करने से वे सदैव प्रसन्न होकर प्रजावृद्धि, धन-रक्षा, आयु तथा बल-शक्ति प्रदान करते हैं। यह बलप्रदायक तिथि हैं।

1. प्रतिपदा (पड़वा) के देवता हैं अग्नि। इस तिथि में अग्निदेव की पूजा करने से धन और धान्य की प्राप्ति होती है। यह वृद्धिप्रदायक तिथि है।

2. द्वितीया (दूज) के देवता हैं ब्रह्मा। इस तिथि में ब्रह्मा की पूजा करने से मनुष्य विद्याओं में पारंगत होता है। यह शुभदाथि है।

3. तृतीया (तीज) के देवता हैं यक्षराज कुबेर। इस तिथि में कुबेर का पूजन करने से व्यक्ति धनवान बन जाता है। यह बलप्रदायक तिथि हैं।

4. चतुर्थी (चौथ) के देवता हैं शिवपुत्र गणेश। इस तिथि में भगवान गणेश का पूजन से सभी विघ्नों का नाश हो जाता है। यह खला तिथि हैं।

5. पंचमी (पंचमी) के देवता हैं नागराज। इस तिथि में नागदेवता की पूजा करने से विष का भय नहीं रहता, स्त्री और पुत्र प्राप्ति होती है। यह लक्ष्मीप्रदा तिथि हैं।

6. षष्ठी (छठ) के देता हैं कार्तिकेय। इस तिथि में कार्तिकेय की पूजा करने से मनुष्य श्रेष्ठ मेधावी, रूपवान, दीर्घायु और कीर्ति को बढ़ाने वाला हो जाता है। यह यशप्रदा अर्थात सिद्धि देने वाली तिथि हैं।

7. सप्तमी (सातम) के देवता हैं चित्रभानु। सप्तमी तिथि को चित्रभानु नाम वाले भगवान सूर्यनारायण का पूजन करने से सभी प्रकार से रक्षा होती है। यह मित्रवत, मित्रा तिथि हैं।

8. अष्टमी (आठम) के देवता हैं रुद्र। इस तिथि को भगवान सदाशिव या रुद्रदेव की पूजा करने से प्रचुर ज्ञान तथा अत्यधिक कांति की प्राप्ति होती है। इससे बंधन से मुक्त भी मिलती है। यह द्वंदवमयी तिथि हैं।

कृष्ण पक्ष वाली भैरव पूजन और शुक्ल पक्ष वाली अस्टमी को भैरवी पूजन

9. नवमी (नौमी) की देवी हैं दुर्गा। इस तिधि में जगतजननी त्रिदेवजननी माता दुर्गा की पूजा करने से मनुष्य इच्छापूर्वक संसार-सागर को पार कर लेता है तथा हर क्षेत्र में सदा विजयी प्राप्त करता है। यह उग्र अर्थात आक्रामकता देने वाली तिथि हैं।

10. दशमी (दसम) के देवता हैं यमराज। इस तिथि में यम की पूजा करने से नरक और मृत्यु का भय नहीं रहता है। यह सौम्य अर्थात शांत तिथि हैं।

11.एकादशी (ग्यारस) के देवता हैं विश्वेदेवगणों और विष्णु। इस तिथि को विश्वेदेवों पूजा करने से संतान, धन-धान्य और भूमि आदि की प्राप्ति होती है। यह आनन्दप्रदा अर्थात सुख देने वाली तिथि हैं।

12. द्वादशी (बारस) के देवता हैं विष्णु। इस तिथि को भगवान विष्णु की पूजा करने से मनुष्य सदा विजयी होकर समस्त लोक में पूज्य हो जाता है। यह यशप्रदा तिथि हैं।

13. त्रयोदशी (तेरस) के देवता हैं त्रयोदशी और शिव। त्रयोदशी में कामदेव की पूजा करने से मनुष्य उत्तम भार्या प्राप्त करता है तथा उसकी सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। यह जयप्रदा अर्थात विजय देने वाली तिथि हैं।

14. चतुर्दशी (चौदस) के देवता हैं शंकर। इस तिथि में भगवान शंकर की पूजा करने से मनुष्य समस्त ऐश्वर्यों को प्राप्त कर बहुत से पुत्रों एवं प्रभूत धन से संपन्न हो जाता है। यह उग्र अर्थात आक्रामकता देने वाली तिथि हैं।

15. पूर्णिमा (पूरनमासी) के देवता हैं चंद्रमा। इस तिथि में चंद्रदेव की पूजा करने से मनुष्य का सभी जगह आधिपत्य हो जाता है। यह सौम्या तिथि हैं।

कहते हैं कि कृष्ण पक्ष में देवता इन सभी तिथियों में शनै: शनै: चंद्रकलाओं का पान कर लेते हैं। वे शुक्ल पक्ष में पुन: सोलहवीं कला के साथ उदित होती हैं। वह अकेली षोडशी कला सदैव अक्षय रहती है। उसमें साक्षात सूर्य का निवास रहता है। इस प्रकार तिथियों का क्षय और वृद्धि स्वयं सूर्यनारायण ही करते हैं। अत: वे सबके स्वामी माने जाते हैं।

English
https://visitecard.com/card/pankajbissa
Hindi
https://visitecard.com/card/pankaj_bissa


 

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नवरात्री में देवी के दिव्य पाठ एवं 7 शक्तिशाली रक्षक पाठ

समपूर्ण नरसिंह आराधना जयंती विशेष

सम्पूर्ण गणेश उपासना स्तोत्र मन्त्र सहित