दीपावली की श्री लक्ष्मी पूजा सम्पूर्ण विधि
दीपावली की श्री लक्ष्मी पूजा सम्पूर्ण विधि
जहाँ परिवार में कलह नहीं होती, स्त्रियों का सम्मान होता है, धन का सहीउपयोग होता है, जहाँ भ्रष्ट आचरण नहीं होता है, वहाँ श्री लक्ष्मीजी का स्थाईनिवास होता है। अपने बारे में विचार करें कि क्या लक्ष्मजी को आपके यहाँस्थाई रूप से निवास करना चाहिये ? श्री लक्ष्मीजी की कृपा प्राप्त करने केलिये लक्ष्मी के योग्य बनना पड़ता है। लक्ष्मीजी सभी अपनी कृपा करें... सभी
को सुख-समृद्धि एवं वैभव प्रदान करें...
श्री लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी की पूजा
लक्ष्मी जी धन की देवी हैं, इसलिये अपवाद स्वरूप ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो
लक्ष्मी जी की पूजा करके धन प्राप्त करने का आशीर्वाद प्राप्त न करना चाहेगा। लक्ष्मी जी
का पूजन करने वालों को यह ज्ञात होना चाहिये कि कभी भी लक्ष्मी जी की अकेले की पूजा नहीं करनी चाहिये। आमतौर पर लक्ष्मी जी के साथ गणेशजी की पूजा को रेखांकित किया जाता है। मेरा मानना है कि आप जब भी लक्ष्मी जी का पूजन करें तो इनके साथ गणेशजी एवं सरस्वती जी का भी पूजन करें। श्री लक्ष्मीजी की पूजा के साथ श्रीहरि विष्णुजी की पूजा के बारे में पहले बताया गया है। लक्ष्मी जी जब प्रसन्न होती हैं तो साधक को बहुत अधिक धन-वैभव प्रदान कर देती हैं। कभी-कभी अधिक मात्रा में प्राप्त धन के कारण कुछ व्यक्तियों में अहंकार एवं घमण्ड उत्पन्न हो जाता है। आगे चलकर यही उसके विनाश का कारण भी बन जाता है। ऐसी स्थिति में उसकी बुद्धि को स्थिर एवं सही रखने के लिये देवी सरस्वती के आशीर्वाद की आवश्यकता रहती है। सरस्वती जी बुद्धि, ज्ञान, शिक्षा आदि की देवी हैं। बिना ज्ञान के कई बार अधिक धन प्राप्त करने के उपरांत भी व्यक्ति इसे गंवा देता है। धन प्राप्त करने के पश्चात् इसे सुरक्षित रखने तथा वृद्धि करने में बुद्धि कौशल की आवश्यकता रहती है जो सरस्वती जी की पूजा से सहज ही प्राप्त हो जाती है। धन में वृद्धि के लिये आवश्यक रूप से व्यक्ति इसे किसी व्यवसाय आदि में लगायेगा, घर की समृद्धि में लगायेगा और परिवार के मांगलिक कार्यों में लगायेगा। यहाँ पर किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न नहीं हो, किसी प्रकार का विघ्न अथवा अमंगल नहीं हो, इसके लिये गणेशजी सदा हमारी रक्षा करते हैं और किसी भी प्रकार के संकट से हमें उबार लेते हैं। इसलिये लक्ष्मी जी के साथ-साथ गणेशजी की भी पूजा अवश्य की जानी चाहिये। जब अधिक धन आता है तो अनेक प्रकार की समस्यायें भी उसके साथ-साथ चली आती हैं। इनसे मुक्त रहकर सुख-समृद्धि के साथ जीवन जीयें, इसके लिये आवश्यक है कि लक्ष्मी जी, सरस्वती जी तथा गणेश जी की सम्मिलित रूप से पूजा करें। यहाँ आपको एक बात और ध्यान में रखनी चाहिये कि जब भी आप धन सम्बन्धी कामना के लिये लक्ष्मी जी का पूजन करते हैं तो इसके लिये लक्ष्मी जी के ऐसे चित्र का प्रयोग नहीं करें जिसमें वे खड़ी अवस्था में हों। इसके लिये लक्ष्मी जी का वह चित्र प्राप्त करें जिसनें वे बैठी हुई मुद्रा में हों और दोनों तरफ से हाथी उन पर पुष्प वर्षा कर रहे हों। ऐसी तस्वीर में गणेशजी तथा सरस्वती जी भी हों तो अति उत्तम है अन्यथा अलग से इनकी तस्वीर लगाकर पूजन करें। यह पूजा आपके लिये अवश्य ही फलदायी सिद्ध होगी। दीपावली तथा महालक्ष्मी पूजन
दीपावली का त्यौहार हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्यौहार है और सबसे महत्त्वपूर्ण भी है। दीपावली के दिन धन की देवी श्रीलक्ष्मीजी की विशेष पूजा की जाती है। दीपावली की
रात्रि को कालरात्रि कहा गया है, इस कारण तांत्रिकों, मांत्रिकों के लिये तो यह रात्रि बहुत ही अधिक महत्त्व की हो जाती है। इस रात्रि को वे विभिन्न सिद्धियां एवं शक्तियां प्राप्त करने के लिये अनुष्ठान तथा साधनायें करते हैं। सामान्य एवं विशेष, सभी मनुष्यों के लिये यह पर्व धन की देवी लक्ष्मीजी की पूजा-साधना करके धन तथा समस्त प्रकार की सुख-समृद्धि की कामना करने का है। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि लक्ष्मीजी उसके घर आये, और फिर कभी न जाये, इसलिये लक्ष्मीजी के स्वागत के लिये सम्पूर्ण घर की साफ-सफाई की जाती है, गंदगी-कचरा बाहर कर दिया जाता है, घर को सजाया जाता है, परिवार के सभी सदस्य नये वस्त्र पहन कर, स्वादिष्ट मिष्ठानों के साथ लक्ष्मीजी का स्वागत करने को आतुर हो उठते हैं। पूरी निष्ठा भावना के साथ लक्ष्मीजी की पूजा की जाती है। परिवार के सभी सदस्य पूजा में भाग लेते हैं और माता रानी लक्ष्मीजी से सुख, समृद्धि, यश, वैभव आदि की कामना करते हैं। दीपावली पर्व की एक और विशेषता है कि यह केवल पर्व न होकर पर्वों का समूह है। दीपावली के दो दिन पहले से इनका प्रारम्भ हो जाता है और दो दिन बाद तक पर्व मनाये जाते हैं। इसका प्रारम्भ त्रयोदशी अर्थात् तेरस को धनतेरस के रूप में होता है। चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। अमावस्या को महापर्व दीपावली मनाई जाती है।एकम अर्थात् पड़वा को गोवर्धन पूजा तथा द्वितीया को भाईदोज पर्व मनाया जाता है। दीपावली की पूजा का विशेष महत्त्व है, इसलिये यहाँ पर इस पूजा के बारे में विधि-विधान से बताया जा रहा है। आपको अगर पूजन में आये श्लोक एवं मंत्रों को संस्कृत में बोलने में समस्या आये तो हिन्दी में भी बोला जा सकता है।धन्वन्तरि पूजन (धनतेरस) सभी हिंदू परिवार प्रातःकाल गाय व बछड़े की पूजा करते हैं। प्राचीनकाल से ही यह विधान रहा है कि इस दिन गाय का दूध, दही, घी, मावा, बैलों की खेती से उत्पन्न होने वाला गेहूँ, जौ, चावल आदि अन्न नहीं खाया जाता। यह गाय माता व उसके बछड़ों द्वारा हजारों वर्षों से खेती एवं पशु दुग्ध आदि की रूप में की गई सेवा
की कृतज्ञता ज्ञापन तथा कृष्ण द्वारा गौ पूजन का प्रतीक है। धनतेरस के दिन नये स्वर्ण, रजत, ताम्र, पीतल, कांसे के बर्तन तथा नये आभूषण खरीदे जाते हैं। शाम को वैद्य
गाय व आयुर्वेद से संबंधित लोग विष्णु के अवतार धन्वन्तरि की पूजा करते हैं, इसके
साथ जड़ी-बूटियों व तैयार दवाइयों की पूजा भी की जाती है। घरों में एक दीपक जलाकर उसमें धन का प्रतीक कौड़ी डालकर घर की देहली पर तथा पाँच दीपक पूजा घर, रसोई, तुलसी को, शयन कक्ष और निवास कक्ष में जलाये जाते हैं।
धन्वन्तरि की स्तुति में अग्रांकित श्लोक पढ़ते हैं-
आविर्बभूव कलशंदधदर्णवाद्यः पीयूषपूर्णममरत्वकृते सुराणां, रूग्जाल जीर्ण
जनताजनित प्रशंसो धन्वन्तरिः स भगवान् भविकाय भूयात्
इस पूजा से भगवान धन्वन्तरि प्रसन्न होकर दीर्घायु तथा रोग रहित सुखमय जीवन प्रदान करते हैं।
रूपचतुर्दशी-नरक चौदस-भौमासुर वध
दिवस धनतेरस के एक दिन पश्चात् अर्थात् छोटी दीपावली के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। उस दिन सभी सुहागिन स्त्रियाँ प्रातःकाल उबटन, दूध से स्नान, सिर धोने आदि के बाद नवीन वस्त्र तथा आभूषण पहनती हैं। उस दिन पत्नियां स्वयं रति देवी
बन जाती हैं। इसी दिन भगवान कृष्ण ने गरूड़ पर बैठकर सत्यभामा के साथ
नरकासुर अथवा भौमासुर दैत्य का वध कर उसके बंदी गृह में कैद सोलह हजार एक
सौ राज कन्याओं को छुड़ाकर उनसे विवाह किया था। सायंकाल दीप पूजन, रजत
मुद्रा, स्वर्ण मुद्रा पूजन किया जाता है तथा कम से कम सात दीपक रखे जाते हैं। एक
दीपक चौराहे पर, एक घर की देहली पर, बाकी घर के विभिन्न कक्षों में जलाये जाते
प्रार्थना की जाती है।
श्री महालक्ष्मी पूजन
महालक्ष्मी की पूजा सबसे बड़ी पूजा है, इसलिये इसे पूरे मनोयोग से सम्पन्न करें।
पूजा आप चर लग्न में करना चाहते हैं अथवा स्थिर लग्न में, इस बारे में निश्चय कर लें। पूजाहैं। भगवान कृष्ण के दर्शन व से पूर्व काम में आने वाली समस्त वस्तुओं की व्यवस्था करके रख लें। पूजा से पूर्व जिस
कमरे में पूजा करनी है, उसे ठीक प्रकार से साफ कर लें। गंगाजल द्वारा शुद्ध जल में थोड़ा मिलाकर स्थान को शुद्ध एवं पवित्र कर लें। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
परिवार के अन्य सदस्य भी पूजा के लिये तैयार हो जायें। अब कमरे की पूर्व अथवा उत्तर की तरफ मुँह करके सूती अथवा ऊनी आसन पर बैठ जायें। परिवार के अन्य सदस्यों के बैठने के लिये दरी-चादर बिछा लें। आपके साथ-साथ बाकी सदस्य भी बैठ जायें। अब आप 3-5 मिनट प्राणायाम की स्थिति में बैठ जायें। अपने सामने एक बाजोट रखें। इसके ऊपर सवा मीटर लाल रेशमी वस्त्र बिछा लें। सबसे पहले अपने ठीक सामने दीवार का सहारा लेते हुये श्री लक्ष्मी-गणेश की तस्वीर को स्थान दें और हाथ जोड़ें। शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक रखें जो पूजा पूर्ण होने तक अखण्ड रूप से प्रज्ज्वलित रहे। अगर आपके पूजास्थल में श्रीयंत्र अथवा दक्षिणावर्ती शंख भी स्थापित हैं तो उन्हें गंगाजल अथवा शुद्ध जल में कुछ बूंदें गोमूत्र की मिलाकर एक चौड़े पात्र में ठीक से स्नान कराकर स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें। श्रीलक्ष्मी-गणेशजी की तस्वीर के आगे गेहूँ की छोटी ढेरी बनाकर
यंत्र अथवा दक्षिणावर्ती शंख को स्थान दें। ध्यान रहे कि पूजा में दक्षिणावर्ती शंख को गेहूँ अथवा सप्तधान्य पर स्थान दें और पूजास्थल में स्टेण्ड पर अर्थात् आसन पर स्थान दें। नीचे नहीं रखें। अंब आँखें बंद कर श्री गणेशजी का ध्यान करें, श्री लक्ष्मीजी का ध्यान करें और फिर दीपक प्रज्ज्वलित कर दें। गुग्गुल की धूप अथवा अगरबत्ती लगायें।
दीपावली पर किया जाने वाला लक्ष्मी-गणेश पूजन सदा नये चित्र या मूर्ति द्वारा किया जाता है। कुछ विद्वान इससे अलग विचार रखते हैं। उनके अनुसार अगर आपके
पूजाघर में श्रीलक्ष्मी-गणेशजी की फ्रेम की हुई मूर्ति है, रजत अथवा स्वर्ण की लक्ष्मीजी
की छोटी प्रतिमा है तो उसी के द्वारा प्रत्येक वर्ष पूजा करनी चाहिये। पूजा के बाद
इनको घर के पूजाघर में रख दें। जो साधक इस विचार को नहीं मानते, वे हर वर्ष
नई फोटो से पूजा कर सकते हैं। आप चाहें तो नयी चांदी, मिट्टी की मूर्तियाँ अथवा
नया चित्र प्राप्त कर लें। बाजोट पर गणेशजी की मूर्ति अपने दाहिनी तरफ तथा
लक्ष्मीजी को बायीं तरफ स्थापित करें। पत्नी पति के बायीं तरफ बैठे। लक्ष्मीजी की
मूर्ति की बगल में किसी नये कांसी, पीतल, तांबे, चांदी के पात्र में केशरयुक्त श्वेत चंदन
रखे। पूजन का सभी सामान, जलपात्र, धूपदान, बिना बांस की तीली वाली सुगंधित
अगरबत्ती, कपूर, घी में डूबी रूई की बत्ती, केशर युक्त चंदन की कटोरी, रिक्त पात्र,
पंचमेवा, साबुत चावल (अक्षत), साबुत सुपारी, पुष्पमालायें, खुले पुष्प, यदि संभव होतो कमल पुष्प, दो साबुत बड़े गन्ने, गाय का कच्चा दूध, गाय के दूध से जमाया दही,
गाय का घी, शहद, शक्कर (बूरा), चांदी के बर्तन में बनाया गया पंचामृत, मोली, रोली, लाल चंदन घिसा हुआ, सिंदूर, कुंकुम, इत्र, दूब, भोग के लिए मिठाइयाँ, सर्वौषधि (साबुत धनिया, हल्दी, कमलगट्टे, मंजीठ, मेवा एक साथ मिलाये हुए), ऋतुफल
खासकर सीताफल, केले, अनार, अंगूर आदि, भुने हुए नवीन अन्न (लावा खील, चावल मक्का, ज्वार भुने हुए), दक्षिणा के लिए नकद राशि, आभूषण आदि संभालकर
यथास्थान रखें। पूजा स्थल पर बांदरवाल आदि बांधे। रंग बिरंगी रोशनी के बल्ब
लगायें। आप सभी पूजा के लिए बैठकर
सर्वप्रथम दूब को पानी में भिगोकर पूजन की सारी सामग्री को मंत्र पढ़कर पवित्र करें।
मंत्र इस प्रकार है-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वयः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।ॐ पुंडरीकाक्षः पुनातु पुंडरीकाक्षः पुनातु पुंडरीकाक्षः पुनातु ।।
पवित्र करने के लिए तीन बार जल के छींटे दें।
अब संकल्प पढ़ें-
कार्तिक मासे, कृष्ण पक्षे, अमावस्यादां तिथौ, शनि वासरे अमुक नक्षत्रे। (अपना नाम, पिता का नाम, गोत्र आदि बोलने के बाद) सपरिवारो हइं/ सपत्नि को हइं, श्रुति स्मृति पुराणोंक्त फल प्राप्ति कामनया सर्व पाप
निवृत्तिपूर्वकं स्थिर लक्ष्मी प्राप्त्यर्थम् गौरी गणपत्यादि पूजनं पूर्वकं महालक्ष्मी पूजनं
कुबेर पूजनं च करिष्ये। श्री महालक्ष्मी प्रीयतां ।
अब गणेश, लक्ष्मी के चित्र या मूर्तियाँ
नई हैं तो इनमें प्राण प्रतिष्ठा करनी है अर्थात् वास्तव में देवी, गणेश बन जायें इसका
उपाय करना है क्योंकि प्राण प्रतिष्ठा के बिना इस मूर्ति तथा बाजार में बिकने वाली
मूर्ति या अखबार में छपी निर्जीव तस्वीर में कोई अन्तर नहीं है। अतः प्राण-प्रतिष्ठा
मंत्र इस प्रकार है-
प्राण-प्रतिष्ठा मंत्र-
ॐ मनो जूतिर्जषतामाज्यस्येबृहस्पतिर्यज्ञमिमं तमोत्वरिष्ठं यंज्ञ समीमं दधातु।विश्वे देवास इह मादयन्तामों-म्प्रतिष्ठ।।ॐ अस्यैः प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यैः प्राणाक्षरन्तु च। अस्यै देवत्व मर्चायै मामहेति च कश्चन।।
अब गणेशजी का ध्यान करें।
ध्यान- गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जंबूफल चारू भक्षणम्। उमासुतं शोक विनाश कारकं, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम् ।।
गणेश के साथ माँ गौरी का ध्यान भी करें-
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम् ।।
हे विघ्न विनाशक गणेश और माता गौरी अंबिका मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
आप मेरे पूजा स्थान पर आकर मेरी पूजा स्वीकार करें। श्री गणेश आवाह्यामि - हाथ
में चार-पाँच दाने चावल तथा एक पुष्प गणेशजी के सामने अर्पित करें, यह उन्हें
निमंत्रण है। गौरी आवाह्यामि- गणेश जी के दायीं ओर पुष्प चावल से गौरी देवी आवाहन करें। इस प्रकार बिना मंत्र बोले ही क्रमशः गणेशम्बिकाभ्यां नमः । आसनं समर्पयामि, पाद्यं समर्पयामि, अर्ध्य समर्पयामि, आचमनं समर्पयामि बोलते हुए हर चीज के लिए पुष्प व अक्षत गणेश और गौरी को चढ़ाते जायें।
हर बार गणेशाम्बिकाभ्यां नमः जरूर बोलें।
अब दोनों गणेश व अंबिका जी को स्नान, दुग्ध स्नान, दही स्नान, घृत स्नान, मधु
स्नान, शर्करा स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्ध जल स्नान करवाना है। ये सभी चीजें आपके
सामने रखी हैं अर्थात् इनकी व्यवस्था आपको पहले ही करके रखनी है। आप दूब से दूध, दही, घी, शहद की बूंदें गणेश व अंबिका को चढ़ायें। चुटकी से शर्करा (बूरा)
चढ़ायें। फिर दूब से पंचामृत, गंधोदक व शुद्धोदक चढ़ायें ।
बोलें- ॐ गणेशाम्बिकाभ्यां
नमः। जल स्नानं समर्पयामि। इसके पश्चात् ॐ गणेशाम्बिकाभ्यां बोलते हुये आगे
लिखे अनुसार दुग्ध स्नानं समर्पयामि, दधि स्नानं समर्पयामि, घृत स्नानं समर्पयामि,
मधु स्नानं समर्पयामि, शर्करा स्नानं समर्पयामि, पंचामृत स्नानं समर्पयामि,
गंगोदक स्नानं समर्पयामि, शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि बोलें।
इससे दोनों के सभी स्नान पूर्ण हुए। स्नान के बाद आचमन भी करायें। अब दोनों को वस्त्र समर्पण (मोली सूत के लाल, पीले धागों से बने) पहले की तरह मंत्र बोलकर समर्पण करें। वस्त्रों के बाद गणेश को जनेऊ चढ़ायें और श्री गणेशाय यज्ञोपवीत समर्पयामि कहें। फिर गणेश मूर्ति को श्वेत केशर युक्त चंदन, लाल चंदन, रोली तथा साबुत चावल चढ़ायें।
बोलें श्री गणेशाय मलय चंदनं, रक्त चंदनं, कुंकुम, अक्षतानि समर्पयामि। ये चारों
ही चीजें गौरी वाले स्थान पर भी चढ़ायें, बोलें- अंबिकाये गंध, अक्षतान समर्पयामि।
गणेश जी को पुष्पमाला समर्पण करें। पुष्पानि समर्पयामि कहें। गौरी को फल अर्पित करें। दोनों को दूब चढ़ायें। दोनों को जरा-जरा सिंदूर भी चढ़ायें। दोनों को अबीर
(गुलाल) इत्र, हल्दी चूर्ण चढ़ायें। सभी के साथ गणेशाय/अंबिकाये समर्पयामि बोलें।
गणेश व गौरी को धूपदान में खेई गई धूप या अगरबत्तियां दिखायें, फिर जलते हुए घी के दीये की तरफ हाथ से संकेत करते हुए धूपं आघ्रापयामि। दीपं दर्शयामि बोलें। अब गणेश-अंबिका के निमित्त भोग (मिठाई) अलग-अलग छोटे-छोटे पात्रों या दोनों
में रखें और नैवेद्यं समर्पयामि कहें। दोनों को आचमन करायें। दोनों को ऋतुफल भेंट
करें। आचमन करायें। पान या इलायची, सुपारी भेंट करें। फिर दक्षिणा (रुपया) अर्पण
करें। इस प्रकार हमने लक्ष्मी पूजा के अनिवार्य अंग गणेश तथा अंबिका की पूजा संपन्न कर ली है। आप इसे और भी संक्षिप्त करना चाहे तो ॐ श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः
गंधं (चंदन), पुष्पं (फूल), धूपं (अगरबत्ती), दीपं (दीपक दिखाना), नैवेद्यं समर्पयामि,
दोनों के लिए अलग-अलग बोलकर पंचोपचार की संक्षिप्त पूजा कर सकते हैं। इतना भी नहीं कर सकते हैं तो मानसिक पूजा ही करें। इसमें आप गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य के लिए मनसा कल्पितं गंधं, धूपं आदि बोल सकते हैं।
सोलह मातृका पूजन
अब सोलह मातृशक्तियों (मातृकाओं) का पूजन करें। हम हिंदुओं में प्रत्येक पूजा
में सर्वप्रथम गणपति तथा साथ में अंबिका पूजन, फिर सोलह मातृकाओं का पूजन होता है। इसके लिए एक चौड़ी थाली में या बाजोट पर कपड़ा बिछाकर पांच लाइन खड़ी व पांच लाइन आड़ी बनाकर सोलह खाने बनाकर एक-एक खाने में एक-एक पात शक्ति की पूजा की जाती है। दाहिनी ओर के पहले खाने में एक स्थान गणेश जी को होता है। हाथ में फूलों की पंखुरी तथा चंदन या रोली लगे अक्षत ले लें। बायें हाथ
में इन्हें रखें तथा प्रत्येक मातृका का नाम बोलकर दायें हाथ से एक-एक खाने में
चढ़ाते जायें- ॐ गणपतये नमः, ॐ गौर्यै नमः (ये दोनों पहले खाने येँ), क
पद्माये नमः, ॐ शच्यै नमः, ॐ मेधायै नमः, ॐ सावित्र्यै नमः, ॐ विजयायै
नमः, ॐ जयायै नमः, ॐ देवसेनायै नमः, ॐ स्वधायै नमः, ॐ स्वाहायै नमः, ॐ
मातृभ्यो नमः, ॐ लोकमातृभ्यो नमः, ॐ धृत्यै नमः, ॐ पुष्टयै नमः, ॐ तुष्टय
नमः, ॐ आत्मनः कुल देवतायै नमः, ॐ। इन मातृकाओं की पूजा के बाद घी मिले
गुड़ व मिठाई का भोग लगायें। नारियल चढ़ाकर प्रणाम करें।
नवग्रह पूजन
सोलह मातृकाओं के बाद एक पात्र में चार खड़ी, चार आड़ी रेखायें खींच नवग्रह
का मंडल बनायें। इनमें क्रमशः सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु को
स्थापित करके जल के छीटें दें। फिर रोली के छीटें दें। फिर पुष्प व अक्षत चढ़ाकर
पूजा करें। इनकी प्रार्थना करें कि आप हमारा कल्याण करें, हमारा शुभ हो-
ब्रह्मा मुरारि स्त्रिपुरांतकारी भानु शशि भूमि सुतो बुधश्च ।गुरुश्च शुक्र: शनि राहु केतवः सर्वे ग्रहाः शांतिकराः भवंतु ।। सूर्य शौर्य मथेन्दुरिन्द्र पदवीं सन्मंगलं मगलेः ।सदबुद्धिच बुधो गुरुश्च गुरुतां शुक्रः सुखंशं शनि ।।राहु बाहुबलं तनोतु सततं केतु कुलस्योन्नतिं ।नित्यं प्रीतिकरा भवन्तु ममते सर्वेऽदुनुकूला ग्रहाः ।।
सभी ग्रहों को ॐ सूर्याय नमः । ॐ चन्द्राय नमः । ॐ भोमाय नमः । ॐ बुधाय
राहवे नमः। ॐ केतवे
नमः। ॐ गुरवे नमः। ॐ शुक्राय नमः। ॐ शनये नमः। ॐ
नमः कहकर क्रमशः प्रणाम करें। नवग्रह पूजन के बाद कलश पूजन करें। जो जल
का भरा तांबे या पीतल का लोटा है, उसकी पूजन प्रारंभ करें।
कलश पूजन
कलश पर रोली से स्वस्तिक (सातिया) चित्र बनायें। कलश के गले पर तीन धागे
वाली मोली बांधे। जिस जगह कलश रखना हो उस भूमि या लकड़ी के बाजोट पर
आठ पंखुरी वाला कमल पुष्प, रोली या चंदन से बनायें। इस पुष्प पर सप्तधान्य या गेहूँ, जौ, चावल में से कोई एक लगभग 50-60 ग्राम बिछायें। इस अनाज पर कलश
दूब छोड़ दें। इस पर पंच पल्लव (बड़, गूलर, पीपल, आम व पाखड़ के पत्ते) रखें।
(लोटा) रखे। इस कलश में थोड़ा जल, घुला हुआ चंदन, कुछ सर्वोषधि, जरा सी हरी
कलश में डाब (कुश) थोड़ी सी मिट्टी छोड़ें, मिट्टी पवित्र स्थान से लाई गई हो। एक
साबुत सुपारी, स्वर्ण या रजत मुद्रा तथा कोई रत्न (नगीना) भी रख दें। इस पर एक नवीन कपड़ का टुकड़ा रखे। इस कपड़े पर चावल भरा लोटे का ढक्कन रख इन चावलों पर नारियल रखे। कलश की पूजा में वरुण देव को ध्यान कर आमंत्रित कर कलश में विराजने को कहें। कलश में अक्षत व पुष्प छोड़ें। फिर इसी तरह कलश में चारों वेद, सारे तीर्थ, सारी पवित्र नदियों, सातों समुद्रों, पृथ्वी के सभी महाद्वीपों, सभी देवता देवियों का आवाहन कर अक्षत पुष्प से पूजाकर इन्हें कलश के सामने छोड़ दें। अब कलश को पानी के छींटे दे स्नान करायें। चंदन लगायें, चावल चढ़ायें, पुष्प चढ़ायें, मोली चढ़ायें, भोग लगायें तथा हाथ जोड़ दक्षिणा सामने रखें। कल्पना करें कि कलश तथा उसमें विराजमान वरुण आपकी पूजा स्वीकार कर रहे हैं। कलश को प्रणाम करें। अब प्रधान महालक्ष्मी तथा द्रव्य लक्ष्मी का पूजन किया जाना है। नई मूर्ति या चित्र की प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक है। मंत्र पहले लिखे हैं, बोलें व प्राण प्रतिष्ठा करें। अब माँ लक्ष्मी का ध्यान करें। इस मंत्र को अवश्य याद कर लें व बोलें अथवा फिर पुस्तक से देख-देखकर पढ़ें-
महालक्ष्मी के ध्यान मंत्र -
या सा पद्मासन स्था विपुल कटितरी पद्म पत्रायताक्षी गंभीरावर्त नाभि स्तरभर नमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया। या लक्ष्मी दिव्य रूपैर्मणिगण खचितैः स्नापिता हेमकुंभैः
सा नित्यं पद्महस्ता मम वस्तु गृहे सर्वमांगल्य युक्ता ।।१।।
ॐ हिरण्य वर्णा हरिणीं सुवर्ण रजत स्रजाम् ।
चंद्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो ममावह।। २ ।।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः कहकर ध्यानार्थ पुष्प समर्पण करें। अब महालक्ष्मीजी के भी
देवी दुर्गा या गणेश जी की तरह ही सब कार्य आवाहन, आसन, पाद्य, अर्ध्य, आचमन,
स्नान, दुग्ध, दधि, घृत, मधु, शर्करा स्नान, पंचामृत स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्ध जल
स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, (श्वेत चंदन, रक्त चंदन) सिंदूर, कुंकुम, इत्र, अक्षत, पुष्प
माला, पुष्प, दूर्वा से पूजन करना है। विधि वही रहेगी। महालक्ष्मीजी के सामान्य मंत्र
जाता महालक्ष्म्यै नमः बोलना है। महालक्ष्मी पूजा से संबंधित श्रीसूक्त के विशेष मंत्र
अलग से लिखा जा रहा है। लक्ष्मी पूजा के पश्चात् श्रीसूक्त का पाठ भी अवश्य करें।
आवाह्न मंत्र-
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मी मनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ।।
आसन मंत्र-
ॐ अश्वपूर्वा रथमध्यां हस्तिनाद
श्रियं देवी मुपह्वये श्री र्मा देवी
पाद्य मंत्र-
प्रवोधिनीम् ।जुषताम् ।।कां सोस्मितां हिरण्य प्राकारमार्द्रा ज्वलन्त तृप्तां तर्पयंतीम् ।
पद्येस्थितां पद्यवर्णा तामिहोपद्धये श्रियम् ।।
अर्ध्य मंत्र-
चन्द्रां प्रभासां यशसां ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव जुष्टामुदाराम् ।तां पद्यर्नोम शरणं महं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ।।
आचमन मंत्र-
आदित्यवर्णे तपसोधि जातो वनस्पति स्तववृक्षोऽथ बिल्बः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तुमायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मी ।।
स्नान मंत्र -
मंदाधिन्याः समानीतैर्हेमाम्मोरूह वासितैः ।
स्नानं कुरूष्वे देवेशि सलिलैश्च सुगंधिमिः ।।
दुग्ध स्नान मंत्र-
पयः पृथिकांपय औषधिषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः ।पदस्वतीः प्रदिशाः संतु महृयम् ।।
दधि स्नान मंत्र -
दधि क्रावणों अकारिषं जिष्णो रश्वस्य वाजिनः ।सुरभि नो मुखाकर प्रण आयुंषि तारिषत् ।।
घृत स्नान मंत्र-
घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसां पावानः पिबतांतरि क्षस्य हविरसि स्वाहा ।
दिश प्रदिश आदिशो विदिश उछिशो दिग्भ्यः स्वाहा ।।
मधु स्नान मंत्र-
मधुवात ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः संत्वौषधीर। मधुनक्त मुतोषसो
मधुमत्पार्थिवं रजः। मधु द्यौ रस्तुनः पिता। मधुमान्नो वनस्पति र्मधुमाँ अस्तु सूर्यः ।
माध्वीर्गावो भवन्तुनः।।
शर्करा स्नान मंत्र -
ॐ प्रयां रसमुद्धय सं सूर्ये संतं समाहितम् ।
अप रसस्य यो रसस्तं वो गृहहणा भ्युत्र ममुपयाम गृहीतो असीन्द्रियाय त्वा जुष्ट गृहह्णाम्येषते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम् ।।
पंचामृत स्नान मंत्र-
ॐ पंच नद्यः सरस्वतीमणियन्ति सस्त्रेतसः ।
सरस्वती तु पंचधा सो देशे अभवत् सरित् ।।
गंधोदक स्नान तथा शुद्धोदक स्नान पूर्व में लिखे गये दुर्गा पूजा वाले मंत्रों से ही
करायें। वस्त्र धारण, उपवस्त्र धारण (लंहगा, साड़ी, दुपट्टा, चोली आदि)-
ॐ उपैतुमां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोसि राष्ट्रेआरमिन् कीर्तिमृद्धिं ददातुमे ।।
अब देवी को मधुपर्क अर्पित करें।
मधुपर्क दुर्गा देवी को अर्पित नहीं करते।
मधुपर्क के लिये एक पत्ते या दोने में शहद, दही, घी लें। इनका मिश्रण कांसी के पात्र
में करें एवं महालक्ष्मी को भेंट करें।
मधुपर्क का मंत्र है-
कांस्ये कांस्येन पिहितो दधि मध्वाज्य संयुतः मधुपर्को मयानीतः पूजार्थप्रतिगृह्यताम् महालक्ष्म्यै नमः ।मधुपर्क समर्पयामि गृह्यताम्। आचमनीयं जलं समर्पयामि।
आभूषण अर्पित करें अर्थात् लक्ष्मीजी को गले में हार, मुकुट आदि धारण करायें
मंत्र पढ़ें-
ॐ क्षुत्पिपा सामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् । अभूतिम समृद्धि च सर्वां निर्णुद में गृहात।।आभूषण के बाद
श्वेत रक्त चंदन समर्पण करें, इसका मंत्र पढ़ें-
ॐ गंधणां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप हये श्रियम् ।।
अब सिंदूर, कुंकुम (रोली), अक्षत (चावल) क्रमशः लक्ष्मीजी को चढ़ायें। इसका
मंत्र पढ़ें-
ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघना सो वात प्रमियः पतयन्ति यह्वाः । घृतस्य धारा अरूषोन वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ।।
अब इत्र लगायें। पुष्प माला पहनायें तथा आस-पास पुष्प सजायें। लक्ष्मीजी को
कमल पुष्प प्रिय हैं, संभव हो तो कमल पुष्प चढ़ायें। इस मंत्र को पढ़ें-
ॐ मनसः काम माकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।पशूरूपमन्नस्य मपि श्रीः श्रयतां यशः ।।
अब देवी को दूर्वा अर्पित करें-
कांडत्कांडा़त्प्ररोहन्ती परूषः परूषस्परि।
एवानो दूर्वे प्रतनु सहस्त्रेण शतेन च।।
ॐ महालक्ष्म्ये नमः दूर्वा समर्पयामि। लक्ष्मी पूजा तो हो गई परन्तु मातेश्वरी
के ग्यारह अंगों की पूजा करनी है-
ॐ चपलायै नमः। पांवों में चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दाने चढ़ायें।
ॐ चंचलायै नमः। घुटनों पर चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दाने चढ़ायें।
ॐ कमलायै नमः। कमर पर चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दाने चढ़ायें।
ॐ कात्यायन्यै नमः । नाभि पर चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दाने चढ़ायें।
ॐ जगन्मात्रे नमः । पेट पर चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दाने चढ़ायें।
ॐ विश्ववल्लभायै नमः। छाती पर चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दाने
ॐ कमलवासिन्यै नमः। दोनों हाथों पर चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दानेचढ़ायें।
ॐ पद्माननाये नमः। मुख पर चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दाने चढ़ायें।
ॐ कमल पत्राक्ष्यै नमः। नेत्रों पर चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दानेचढ़ायें ।
ॐ श्रिये नमः । सिर पर चंदन, फूलों की पंखुरी, चावल के दाने चढ़ायें।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। सम्पूर्ण देवी शरीर पर उक्त सामान चढ़ायें-बिखेरें।
इस प्रकार महालक्ष्मी के अंग-प्रत्यंगों की पूजा की जाती है। अब देवी की मूर्ति
के आस-पास आठों दिशाओं में आठों सिद्धियों की जो लक्ष्मी की चेरियाँ हैं, उनकी
पूजा करें। पूर्व दिशा में ॐ अणिमा सिद्धये नमः। अग्निकोण दिशा में ॐ महिम्ने
नमः। दक्षिण दिशा में ॐ गरिम्णे नमः। नैऋत्य कोण में लधिम्ने नमः। पश्चिम दिशा
में ॐ ईशिताये नमः। ईशान कोण में ॐ वशिताये नमः । इन आठों स्थानों पर जल
के छीटें, पुष्प, अक्षत, रोली के छीटें देकर आठों सिद्धियों की पूजा पूर्ण करें। अब लक्ष्मी के आठ स्वरूपों की पूजा भी इसी प्रकार से करें। प्रत्येक लक्ष्मी के नाम के साथ जल, पुष्प, चंदन, अक्षत का मिश्रण क्रमशः उपरोक्त आठों दिशाओं में करें-
ॐ आद्यलक्ष्म्यै नमः । ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम।। ॐ सौभाग्य लक्ष्मयै नमः। ॐ
अमृतलक्ष्म्यै नमः। ॐ कामलक्ष्म्यै नमः। ॐ सत्यलक्ष्म्यै नमः । ॐ भोगलक्ष्म्यै नमः।
ॐ योगलक्ष्म्यै नमः। सभी को प्रणाम करें। अब मंत्र पढ़कर धूप अगरबत्ती जलायें-
ॐ कर्दमेन पूजा भूता मपिसंभवकर्दम
श्रियंवासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्।
घृत का दीप प्रज्ज्वलित कर माता को दिखायें व मंत्र पढ़ें-
ॐ आपः सृजन्तु स्निगधानि चिक्लीत वसमे गृहै। निचदेवीं मातरं श्रियं वासम में कुले।
दीप प्रज्वलित करने के बाद महालक्ष्मी को नैवेद्य (भोग) अर्पण करें। इसका मंत्र है-
ॐ आर्द्रा पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पद्मालिनीम् ।चन्द्रां हिरण्मयी लक्ष्मीं जातवेदो अकावत ।
हे माँ लक्ष्मी नैवेद्य ग्रहण करें। बीच में कुछ जल पीजिये अथवा भोजन के पश्चात्
मुख, हाथ धोयें। हे माँ, हाथों को इस चंदन के लेप से भली प्रकार साफ करें। (साबुन
के बजाय चंदन से मलें)। अब आचमन करें। अब अनार, केले, सेव, सीताफल आदि।
फल ग्रहण करें। फल ग्रहण करायें। अब पान लौंग, इलायची, सुपारी लक्ष्मीजी की सेवा
में अर्पित करें। इससे मुखवास करें व मंत्र पढ़ें-
ॐ आर्द्रा यः करिणी यष्टिं सुवर्णा हेममालिनीम् ।
सूर्या हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवहः।।
तांबूल समर्पयामि
अब माता जी को दक्षिणा स्वरूप नकद भेंट करें। इसका मंत्र है-
ॐ तांम आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावोदास्यो
अश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ।।
इसके बाद कपूर जलाकर, घी की बत्ती से तथा जल के कलश से आरती करें।
आरती कर लक्ष्मीजी की एक बार परिक्रमा करें। प्रार्थना करें। सभी साष्टांग प्रणाम
करें। एक-दूसरे को तिलक लगायें। छोटे अपने बड़ों का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद
लें। बड़े छोटों को उपहार दें। एक-दूसरे को मिष्ठान्न खिलायें।यह घर पर तथा कार्यालय, दुकान आदि पर पूर्णतः शास्त्र सम्मत लक्ष्मी पूजन तो हो गयी परन्तु इसके साथ-साथ इसी के अंग भूत पहली विनायक महाकाली
(दवात) लेखनी, सरस्वती (पुस्तक तथा बही खाता), कुबेर, व्यापारी की तराजू तथा
तोलने के बाट तथा दीपावली के दीपकों की पूजा बाकी रह गई तो जो व्यापारी,कार्यालय, दुकान पर करते हैं, उनके लाभार्थ इनका पूजन भी लिखा जा रहा है। ऑफिस, दुकान, गद्दी आदि में दीवारों पर सिंदूर से
श्री गणेशाय नमः । श्री महालक्ष्म्यै
नमः लिखें, दरवाजे के दोनों तरफ स्वस्तिक बनायें तथा शुभ, लाभ आदि लिखें । इन
लिखे हुए स्थान की पूजा ॐ देहली विनायकाय नमः मंत्र बोलकर जल के छीटें,
रोली के छीटें, अक्षत (साबुत चावल) व फूलों से करें। कलमदान या दवात को नई
स्याही से भर लक्ष्मीजी के सामने रखकर उस पर फूल, चावल, मोली, रोली चढ़ायें ।
सिंदूर से स्वस्तिक बनायें तथा गर्दन पर मोली बांधें मंत्र बोलें ॐ महाकाल्यै नमः उन्हें
प्रणाम कर यह मंत्र बोलें कि-
कालिके त्वं जगन्मातर्मसि रूपेण वर्तसे।
उत्पन्नां त्वंच लोकानां व्यवहार प्रसिद्धये ॥
या कालिका रोगहराः सुवन्धा भक्तैः समस्तेर्व्यवहार दक्षेः।
जनेर्जनानां भयहारिणीच सा लोक माता मम सोंख्यदास्तु ।।
दवात, स्याही, इंक केस की पूजा के बाद कलम, होल्डर, पेन, बालपेन स्थित
देवी की पूजा ॐ लेखनी स्थायैदेव्यै नमः बोलकर पेन, पेंसिल को रोली, चंदन, पुष्प,
चावल तथा मोली बांधकर करें । प्रार्थना मंत्र पढ़ें-
लेखनी निर्मिता पूर्व ब्रह्मणा परमेष्ठिना।
लोकानां च हितार्थाय तस्मात्वां पूजयाम्यहम् ।।
शास्त्राणां व्यवहाराणां विद्याानामाप्नुयात् यतः ।अतस्त्वां पूजयिष्यामि ममहस्ते स्थिरा भवः ।।
अब बही खाते एकाउण्ट्स बुक तथा उनके बैग में रोली या केसर मिले चंदन
से स्वस्तिक बनायें। बैग में हल्दी की पांच गांठें, धनिया, कमलगट्टा, अक्षत, दूर्वा, नकद
राशि रखकर उसमें
सरस्वती का पंचोपचार से (गंध, पुष्प, वस्त्र, मोली, अक्षत) पूजनकरें। पूजन के समय मंत्र बोलें ॐ वीणा पुस्तक धारिये। श्री सरस्वत्यै नमः अबसरस्वती का ध्यान मंत्र बोलें-
या कुंदेन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता ।या वीणा वर दंड मंडित करा या श्वेत पद्नासना ।।या बृहमाच्युत शंकर प्रभृतिभिर्देवैः सदा वंदिता ।सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ।।
कुबेर पूजन
गल्ले, तिजोरी, मनीकेस आदि पर रोली से स्वस्तिक बनायें। उसमें कुबेर
(देवताओं के खजाने के स्वामी देवता) का आवाह्न करें-
आह्वयामि देव त्वां इहायाहि कृपां कुरू।
कोशं वर्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर ।।
ॐ कुबेराय नमः बोलते हुए जल के छीटें दें। रोली, मोली, पुष्प, अक्षत चढ़ाकर
पूजा करें। अंत में प्रार्थना करें-
धनदाय नमस्तुभ्यं निधि पद्नाधि पायच।
भगवन्त्वत्प्रसादेन धनधान्यादिसंपद।।
हल्दी, धनिया, कमलगट्टे, रुपया, दूब आदि वाली थैली या गल्ले या तिजोरी में
रखकर श्री कुबेर देवाय नमः बोलें और प्रणाम करें।
बाट, तराजू, इलेक्ट्रिकल्स, स्केल आदि पूजन
आपके कार्यालय, दुकान, व्यवसाय में सहयोगी कंप्यूटर, टाईप मशीन, कैलक्युलेटर,
स्टेथस्कोप, बी. पी. यंत्र, तराजू, बांट आदि उपकरणों की पूजा करें। जो हों उन पर
स्वस्तिक का चिह्न रोली से बनायें, मोली बांधें, जल के छीटें दें, रोली लगायें, फल व
चावल चढ़ायें। नमस्कार करें- ॐ तुला, मंत्रदि नामधिष्टातृदेवताये नमः।
मंत्र पढ़ें -
नमस्ते सर्वदेवानां शक्तित्वे सत्यमाश्रिता ।
साक्षीभूता जगदात्री निर्मिता विश्वयोगिना ।।
एक थाल में कम से कंम ग्यारह अधिक संभव हो इक्कीस, इक्यावन दीपक
सजायें। उनको लक्ष्मीजी के सामने रख प्रज्ज्वलित करें। प्रणाम कर कहें
ॐ दीपावल्यै
नमः। सभी दीपकों का आंशिक रूप से जल के छीटों, रोली, चंदन, अक्षत व पुष्पों से
पूजन कर दीपकों के थाल में दक्षिणा
(सिक्का) अर्पण करें-
ॐ ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युत् अग्निश्च तारकाः।सर्वेषा ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः ।
अब सभी देवों को गन्ना, संतरा, अनार, सेव, सिंघाड़ा,, सीताफल, चावल की
खील आदि चढ़ायें। सूखा मेवा चढ़ायें। घर में अन्यत्र जलाये जाने वाले सजावटी
दीपक जलायें। थाली के दीपक पानी रखने के स्थान, रसोई, घर के मंदिर, हर कमरे,
खिड़की आदि पर सजायें। अब थाल में घी का दीपक व कपूर सजा कर आरती करें।
आरती में घर के सब सदस्य खड़े हों। ॐ जय लक्ष्मी माता वाली आरती गायें।
मंत्र पुष्पांजलि
आरती के बाद सभी लोग हाथ में अक्षत, पुष्प, कोई एक-एक छोटा-बड़ा फल
आदि लेकर खड़े रहें तथा आगे लिखे मंत्रों से सभी पूजित गणेश, लक्ष्मी आदि को मंत्र
पुष्पांजलि दें-
ॐ यज्ञेन यज्ञभयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।ते ह नाकं महिमानः सचन्तयत्र पूर्वे साध्याः सन्तिदेवाः ।।
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणायकुर्महै मे कामान् कामकानाय महयं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु।कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ।।
ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं ।राजयं महाराज्य माधिपत्य मयं समन्त पर्यायी स्यातः सार्वभौम ।।
सार्वायुषान्तादापरार्धात पृथिव्यै समुद्र पर्यन्ताया एकराडित तदप्येष श्लोकेऽभिगीतो मरूतः परिवेश्टारो मरूत्रसया वसन् गृहे।
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभसद इति ।
ॐ विश्वतश्चक्षुरूत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरूत विश्व तस्पात्।
सं बाहुभ्यां धमति सं तपयैर्द्यावाभूमि जनयमन देव एकः ।।
ॐ महालक्ष्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि ।तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।।
(यह लक्ष्मी गायत्री मंत्र है)
अब सभी प्रणाम कर स्तुति करें कि-
ॐ या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः ।
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।।
श्रद्धा सतां कुलजन प्रभवस्थ लज्जा।
तां त्वां नताः स्म परिपालम देवि विश्वतम् ।।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। मंत्र पुष्पांजलि समर्पयामि। सभी लोग हाथ के पुष्प आदि
को देवी के सामने डाल दें। अब सभी माता से प्रार्थना करें। कोई कमी या गलती हो
गई हो तो क्षमा प्रार्थना करें। देवी प्रसन्नतापूर्वक घर में स्थाई रूप से विराजें, आयु, स्वास्थ्य, सद्भाव, शत्रुनाश, घर पर धन-समृद्धि परिवार में वृद्धि हो, यह कामना करें।देवी मैं/हम किसी योग्य नहीं, पर तू हमारा कल्याण करे।
इसके बाद गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करे
|| श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् अथ ध्यानम ||
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्ष:स्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमौत्तिकं करतले वेणुं करे कंकणम ।
सर्वाड़्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलि –
र्गोपस्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणि: ।।1।।
फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं
श्रीवत्साड़्कमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम ।
गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसंघावृतं
गोविन्दं कलवेणुवादनपरं दिव्याड़्गभूषं भजे ।।2।।
|| श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् इति ध्यानम ||
|| श्रीगोपाल सहस्त्रनाम ||
ऊँ क्लीं देव: कामदेव: कामबीजशिरोमणि: ।
श्रीगोपालको महीपाल: सर्वव्र्दान्तपरग: ।।1।।
धरणीपालको धन्य: पुण्डरीक: सनातन: ।
गोपतिर्भूपति: शास्ता प्रहर्ता विश्वतोमुख: ।।2।।
आदिकर्ता महाकर्ता महाकाल: प्रतापवान ।
जगज्जीवो जगद्धाता जगद्भर्ता जगद्वसु: ।।3।।
मत्स्यो भीम: कुहूभर्ता हर्ता वाराहमूर्तिमान ।
नारायणो ह्रषीकेशो गोविन्दो गरुडध्वज: ।।4।।
गोकुलेन्द्रो महाचन्द्र: शर्वरीप्रियकारक: ।
कमलामुखलोलाक्ष: पुण्डरीक शुभावह: ।।5।।
दुर्वासा: कपीलो भौम: सिन्धुसागरसड़्गम: ।
गोविन्दो गोपतिर्गोत्र: कालिन्दीप्रेमपूरक: ।।6।।
गोपस्वामी गोकुलेन्द्रो गोवर्धनवरप्रद: ।
नन्दादिगोकुलत्राता दाता दारिद्रयभंजन: ।।7।।
सर्वमंगलदाता च सर्वकामप्रदायक: ।
आदिकर्ता महीभर्ता सर्वसागरसिन्धुज: ।।8।।
गजगामी गजोद्धारी कामी कामकलानिधि: ।
कलंकरहितश्चन्द्रो बिम्बास्यो बिम्बसत्तम: ।।9।।
मालाकार: कृपाकार: कोकिलास्वरभूषण: ।
रामो नीलाम्बरो देवो हली दुर्दममर्दन: ।।10।।
सहस्राक्षपुरीभेत्ता महामारीविनाशन: ।
शिव: शिवतमो भेत्ता बलारातिप्रपूजक: ।।11।।
कुमारीवरदायी च वरेण्यो मीनकेतन: ।
नरो नारायणो धीरो राधापतिरुदारधी: ।।12।।
श्रीपति: श्रीनिधि: श्रीमान मापति: प्रतिराजहा ।
वृन्दापति: कुलग्रामी धामी ब्रह्मसनातन: ।।13।।
रेवतीरमणो रामाश्चंचलश्चारुलोचन: ।
रामायणशरीरोsयं रामी राम: श्रिय:पति: ।।14।।
शर्वर: शर्वरी शर्व: सर्वत्रशुभदायक: ।
राधाराधायितो राधी राधाचित्तप्रमोदक: ।।15।।
राधारतिसुखोपेतो राधामोहनतत्पर: ।
राधावशीकरो राधाह्रदयांभोजषट्पद: ।।16।।
राधालिंगनसंमोहो राधानर्तनकौतुक: ।
राधासंजातसम्प्रीती राधाकामफलप्रद: ।।17।।
वृन्दापति: कोशनिधिर्लोकशोकविनाशक: ।
चन्द्रापतिश्चन्द्रपतिश्चण्डकोदण्दभंजन: ।।18।।
रामो दाशरथी रामो भृगुवंशसमुदभव: ।
आत्मारामो जितक्रोधो मोहो मोहान्धभंजन ।।19।।
वृषभानुर्भवो भाव: काश्यपि: करुणानिधि: ।
कोलाहलो हली हाली हेली हलधरप्रिय: ।।20।।
राधामुखाब्जमार्तण्डो भास्करो विरजो विधु: ।
विधिर्विधाता वरुणो वारुणो वारुणीप्रिय: ।।21।।
रोहिणीह्रदयानन्दी वसुदेवात्मजो बलि: ।
नीलाम्बरो रौहिणेयो जरासन्धवधोsमल: ।।22।।
नागो नवाम्भोविरुदो वीरहा वरदो बली ।
गोपथो विजयी विद्वान शिपिविष्ट: सनातन: ।।23।।
पर्शुरामवचोग्राही वरग्राही श्रृगालहा ।
दमघोषोपदेष्टा च रथग्राही सुदर्शन: ।।24।।
वीरपत्नीयशस्राता जराव्याधिविघातक: ।
द्वारकावासतत्त्वज्ञो हुताशनवरप्रद: ।।25।।
यमुनावेगसंहारी नीलाम्बरधर: प्रभु: ।
विभु: शरासनो धन्वी गणेशो गणनायक: ।।26।।
लक्ष्मणो लक्षणो लक्ष्यो रक्षोवंशविनशन: ।
वामनो वामनीभूतो बलिजिद्विक्रमत्रय: ।।27।।
यशोदानन्दन: कर्ता यमलार्जुनमुक्तिद:
उलूखली महामानी दामबद्धाह्वयी शमी ।।28।।
भक्तानुकारी भगवान केशवोsचलधारक: ।
केशिहा मधुहा मोही वृषासुरविघातक: ।।29।।
अघासुरविनाशी च पूतनामोक्षदायक: ।
कुब्जाविनोदी भगवान कंसमृत्युर्महामखी ।।30।।
अश्वमेधो वाजपेयो गोमेधो नरमेधवान ।
कन्दर्पकोटिलावण्यश्चन्द्रकोटिसुशीतल: ।।31।।
रविकोटिप्रतीकाशो वायुकोटिमहाबल: ।
ब्रह्मा ब्रह्माण्डकर्ता च कमलावांछितप्रद: ।।32।।
कमली कमलाक्षश्च कमलामुखलोलुप: ।
कमलाव्रतधारी च कमलाभ: पुरन्दर: ।।33।।
सौभाग्याधिकचित्तोsयं महामायी महोत्कट: ।
तारकारि: सुरत्राता मारीचक्षोभकारक: ।।34।।
विश्वामित्रप्रियो दान्तो रामो राजीवलोचन: ।
लंकाधिपकुलध्वंसी विभिषणवरप्रद: ।।35।।
सीतानन्दकरो रामो वीरो वारिधिबन्धन: ।
खरदूषणसंहारी साकेतपुरवासन: ।।36।।
चन्द्रावलीपति: कूल: केशी कंसवधोsमर: ।
माधवी मधुहा माध्वी माध्वीको माधवो मधु: ।।37।।
मुंजाटवीगाहमानो धेनुकारिर्धरात्मज: ।
वंशी वटबिहारी च गोवर्धनवनाश्रय: ।।38।।
तथा तालवनोद्देशी भाण्डीरवनशंखहा ।
तृणावर्तकथाकारी वृषभनुसुतापति: ।।39।।
राधाप्राणसमो राधावदनाब्जमधुव्रत: ।
गोपीरंजनदैवज्ञो लीलाकमलपूजित: ।।40।।
क्रीडाकमलसन्दोहो गोपिकाप्रीतिरंजन: ।
रंजको रंजनो रड़्गो रड़्गी रंगमहीरुह ।।41।।
काम: कामारिभक्तोsयं पुराणपुरुष: कवि: ।
नारदो देवलो भीमो बालो बालमुखाम्बुज: ।।42।।
अम्बुजो ब्रह्मसाक्षी च योगीदत्तवरो मुनि: ।
ऋषभ: पर्वतो ग्रामो नदीपवनवल्लभ: ।।43।।
पद्मनाभ: सुरज्येष्ठो ब्रह्मा रुद्रोsहिभूषित: ।
गणानां त्राणकर्ता च गणेशो ग्रहिलो ग्रही ।।44।।
गणाश्रयो गणाध्यक्ष: क्रोडीकृतजगत्रय: ।
यादवेन्द्रो द्वारकेन्द्रो मथुरावल्लभो धुरी ।।45।।
भ्रमर: कुन्तली कुन्तीसुतरक्षी महामखी ।
यमुनावरदाता च कश्यपस्य वरप्रद: ।।46।।
शड़्खचूडवधोद्दामो गोपीरक्षणतत्पर: ।
पांचजन्यकरो रामी त्रिरामी वनजो जय: ।।47।।
फाल्गुन: फाल्गुनसखो विराधवधकारक: ।
रुक्मिणीप्राणनाथश्च सत्यभामाप्रियंकर: ।।48।।
कल्पवृक्षो महावृक्षो दानवृक्षो महाफल: ।
अंकुशो भूसुरो भामो भामको भ्रामको हरि: ।।49।।
सरल: शाश्वत: वीरो यदुवंशी शिवात्मक: ।
प्रद्युम्नबलकर्ता च प्रहर्ता दैत्यहा प्रभु: ।।50।।
महाधनो महावीरो वनमालाविभूषण: ।
तुलसीदामशोभाढयो जालन्धरविनाशन: ।।51।।
शूर: सूर्यो मृकण्डश्च भास्करो विश्वपूजित: ।
रविस्तमोहा वह्निश्च वाडवो वडवानल: ।।52।।
दैत्यदर्पविनाशी च गरुड़ो गरुडाग्रज: ।
गोपीनाथो महीनाथो वृन्दानाथोsवरोधक: ।।53।।
प्रपंची पंचरूपश्च लतागुल्मश्च गोपति: ।
गंगा च यमुनारूपो गोदा वेत्रवती तथा ।।54।।
कावेरी नर्मदा तापी गण्दकी सरयूस्तथा ।
राजसस्तामस: सत्त्वी सर्वांगी सर्वलोचन: ।।55।।
सुधामयोsमृतमयो योगिनीवल्लभ: शिव: ।
बुद्धो बुद्धिमतां श्रेष्ठोविष्णुर्जिष्णु: शचीपति: ।।56।।
वंशी वंशधरो लोको विलोको मोहनाशन: ।
रवरावो रवो रावो बालो बालबलाहक: ।।57।।
शिवो रुद्रो नलो नीलो लांगुली लांगुलाश्रय: ।
पारद: पावनो हंसो हंसारूढ़ो जगत्पति: ।।58।।
मोहिनीमोहनो मायी महामायो महामखी ।
वृषो वृषाकपि: काल: कालीदमनकारक: ।।59।।
कुब्जभाग्यप्रदो वीरो रजकक्षयकारक: ।
कोमलो वारुणो राज जलदो जलधारक: ।।60।।
हारक: सर्वपापघ्न: परमेष्ठी पितामह: ।
खड्गधारी कृपाकारी राधारमणसुन्दर: ।।61।।
द्वादशारण्यसम्भोगी शेषनागफणालय: ।
कामश्याम: सुख: श्रीद: श्रीपति: श्रीनिधि: कृति: ।।62।।
हरिर्हरो नरो नारो नरोत्तम इषुप्रिय: ।
गोपालो चित्तहर्ता च कर्ता संसारतारक: ।।63।।
आदिदेवो महादेवो गौरीगुरुरनाश्रय: ।
साधुर्मधुर्विधुर्धाता भ्राताsक्रूरपरायण: ।।64।।
रोलम्बी च हयग्रीवो वानरारिर्वनाश्रय: ।
वनं वनी वनाध्यक्षो महाबंधो महामुनि: ।।65।।
स्यमन्तकमणिप्राज्ञो विज्ञो विघ्नविघातक: ।
गोवर्धनो वर्धनीयो वर्धनी वर्धनप्रिय: ।।66।।
वर्धन्यो वर्धनो वर्धी वार्धिन्य: सुमुखप्रिय: ।
वर्धितो वृद्धको वृद्धो वृन्दारकजनप्रिय: ।।67।।
गोपालरमणीभर्ता साम्बुकुष्ठविनाशन: ।
रुक्मिणीहरण: प्रेमप्रेमी चन्द्रावलीपति: ।।68।।
श्रीकर्ता विश्वभर्ता च नारायणनरो बली ।
गणो गणपतिश्चैव दत्तात्रेयो महामुनि: ।।69।।
व्यासो नारायणो दिव्यो भव्यो भावुकधारक: ।
श्व: श्रेयसं शिवं भद्रं भावुकं भविकं शुभम ।।70।।
शुभात्मक: शुभ: शास्ता प्रशस्ता मेघनादहा ।
ब्रह्मण्यदेवो दीनानामुद्धारकरणक्षम: ।।71।।
कृष्ण: कमलपत्राक्ष: कृष्ण: कमललोचन: ।
कृष्ण: कामी सदा कृष्ण: समस्तप्रियकारक: ।।72।।
नन्दो नन्दी महानन्दी मादी मादनक: किली ।
मिली हिली गिली गोली गोलो गोलालयी गुली ।।73।।
गुग्गुली मारकी शाखी वट: पिप्पलक: कृती ।
म्लेक्षहा कालहर्ता च यशोदायश एव च ।।74।।
अच्युत: केशवो विष्णुर्हरि: सत्यो जनार्दन: ।
हंसो नारायणो लीलो नीलो भक्तिपरायण: ।।75।।
जानकीवल्लभो रामो विरामो विघ्ननाशन: ।
सहस्रांशुर्महाभानुर्वीरबाहुर्महोदधि: ।।76।।
समुद्रोsब्धिरकूपार: पारावार: सरित्पति: ।
गोकुलानन्दकारी च प्रतिज्ञापरिपालक: ।।77।।
सदाराम: कृपारामो महारामो धनुर्धर: ।
पर्वत: पर्वताकारो गयो गेयो द्विजप्रिय: ।।78।।
कमलाश्वतरो रामो रामायणप्रवर्तक: ।
द्यौदिवौ दिवसो दिव्यो भव्यो भाविभयापह: ।।79।।
पार्वतीभाग्यसहितो भ्राता लक्ष्मीविलासवान ।
विलासी साहसी सर्वी गर्वी गर्वितलोचन: ।।80।।
मुरारिर्लोकधर्मज्ञो जीवनो जीवनान्तक: ।
यमो यमादिर्यमनो यामी यामविधायक: ।।81।।
वसुली पांसुली पांसुपाण्डुरर्जुनवल्लभ: ।
ललिताचन्द्रिकामाली माली मालाम्बुजाश्रय: ।।82।।
अम्बुजाक्षो महायज्ञो दक्षश्चिन्तामणिप्रभु: ।
मणिर्दिनमणिश्चैव केदारो बदरीश्रय: ।।83।।
बदरीवनसम्प्रीतो व्यास: सत्यवतीसुत: ।
अमरारिनिहन्ता च सुधासिन्धुर्विधूदय: ।।84।।
चन्द्रो रवि: शिव: शूली चक्री चैव गदाधर: ।
श्रीकर्ता श्रीपति: श्रीद: श्रीदेवो देवकीसुत: ।।85।।
श्रीपति: पुण्डरीकाक्ष: पद्मनाभो जगत्पति: ।
वासुदेवोsप्रमेयात्मा केशवो गरुडध्वज: ।।86।।
नारायण: परं धाम देवदेवो महेश्वर: ।
चक्रपाणि: कलापूर्णो वेदवेद्यो दयानिधि: ।।87।।
भगवान सर्वभूतेशो गोपाल: सर्वपालक: ।
अनन्तो निर्गुणोsनन्तो निर्विकल्पो निरंजन: ।।88।।
निराधारो निराकारो निराभासो निराश्रय: ।
पुरुष: प्रणवातीतो मुकुन्द: परमेश्वर: ।।89।।
क्षणावनि: सर्वभौमो वैकुण्ठो भक्तवत्सल: ।
विष्णुर्दामोदर: कृष्णो माधवो मथुरापति: ।।90।।
देवकीगर्भसम्भूतयशोदावत्सलो हरि: ।
शिव: संकर्षण: शंभुर्भूतनाथो दिवस्पति: ।।91।।
अव्यय: सर्वधर्मज्ञो निर्मलो निरुपद्रव: ।
निर्वाणनायको नित्योsनिलजीमूतसन्निभ: ।।92।।
कालाक्षयश्च सर्वज्ञ: कमलारूपतत्पर: ।
ह्रषीकेश: पीतवासा वासुदेवप्रियात्मज: ।।93।।
नन्दगोपकुमारार्यो नवनीताशन: प्रभु: ।
पुराणपुरुष: श्रेष् शड़्खपाणि: सुविक्रम: ।।94।।
अनिरुद्धश्वक्ररथ: शार्ड़्गपाणिश्चतुर्भुज: ।
गदाधर: सुरार्तिघ्नो गोविन्दो नन्दकायुध: ।।95।।
वृन्दावनचर: सौरिर्वेणुवाद्यविशारद: ।
तृणावर्तान्तको भीमसाहसो बहुविक्रम: ।।96।।
सकटासुरसंहारी बकासुरविनाशन: ।
धेनुकासुरसड़्घात: पूतनारिर्नृकेसरी ।।97।।
पितामहो गुरु: साक्षी प्रत्यगात्मा सदाशिव: ।
अप्रमेय: प्रभु: प्राज्ञोsप्रतर्क्य: स्वप्नवर्धन: ।।98।।
धन्यो मान्यो भवो भावो धीर: शान्तो जगदगुरु: ।
अन्तर्यामीश्वरो दिव्यो दैवज्ञो देवता गुरु: ।।99।।
क्षीराब्धिशयनो धाता लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणाग्रज: ।
धात्रीपतिरमेयात्मा चन्द्रशेखरपूजित: ।।100।।
लोकसाक्षी जगच्चक्षु: पुण्य़चारित्रकीर्तन: ।
कोटिमन्मथसौन्दर्यो जगन्मोहनविग्रह: ।।101।।
मन्दस्मिततमो गोपो गोपिका परिवेष्टित: ।
फुल्लारविन्दनयनश्चाणूरान्ध्रनिषूदन: ।।102।।
इन्दीवरदलश्यामो बर्हिबर्हावतंसक: ।
मुरलीनिनदाह्लादो दिव्यमाल्यो वराश्रय: ।।103।।
सुकपोलयुग: सुभ्रूयुगल: सुललाटक: ।
कम्बुग्रीवो विशालाक्षो लक्ष्मीवान शुभलक्षण: ।।104।।
पीनवक्षाश्चतुर्बाहुश्चतुर्मूर्तीस्त्रिविक्रम: ।
कलंकरहित: शुद्धो दुष्टशत्रुनिबर्हण: ।।105।।
किरीटकुण्डलधर: कटकाड़्गदमण्डित: ।
मुद्रिकाभरणोपेत: कटिसूत्रविराजित: ।।106।।
मंजीररंजितपद: सर्वाभरणभूषित: ।
विन्यस्तपादयुगलो दिव्यमंगलविग्रह: ।।107।।
गोपिकानयनानन्द: पूर्णश्चन्द्रनिभानन: ।
समस्तजगदानन्दसुन्दरो लोकनन्दन: ।।108।।
यमुनातीरसंचारी राधामन्मथवैभव: ।
गोपनारीप्रियो दान्तो गोपिवस्त्रापहारक: ।।109।।
श्रृंगारमूर्ति: श्रीधामा तारको मूलकारणम ।
सृष्टिसंरक्षणोपाय: क्रूरासुरविभंजन ।।110।।
नरकासुरहारी च मुरारिर्वैरिमर्दन: ।
आदितेयप्रियो दैत्यभीकरश्चेन्दुशेखर: ।।111।।
जरासन्धकुलध्वंसी कंसाराति: सुविक्रम: ।
पुण्यश्लोक: कीर्तनीयो यादवेन्द्रो जगन्नुत: ।।112।।
रुक्मिणीरमण: सत्यभामाजाम्बवतीप्रिय: ।
मित्रविन्दानाग्नजितीलक्ष्मणासमुपासित: ।।113।।
सुधाकरकुले जातोsनन्तप्रबलविक्रम: ।
सर्वसौभाग्यसम्पन्नो द्वारकायामुपस्थित: ।।114।।
भद्रसूर्यसुतानाथो लीलामानुषविग्रह: ।
सहस्रषोडशस्त्रीशो भोगमोक्षैकदायक: ।।115।।
वेदान्तवेद्य: संवेद्यो वैधब्रह्माण्डनयक: ।
गोवर्धनधरो नाथ: सर्वजीवदयापर: ।।116।।
मूर्तिमान सर्वभूतात्मा आर्तत्राणपरायण: ।
सर्वज्ञ: सर्वसुलभ: सर्वशास्त्रविशारद: ।।117।।
षडगुणैश्चर्यसम्पन्न: पूर्णकामो धुरन्धर: ।
महानुभाव: कैवल्यदायको लोकनायक: ।।118।।
आदिमध्यान्तरहित: शुद्धसात्त्विकविग्रह: ।
आसमानसमस्तात्मा शरणागतवत्सल: ।।119।।
उत्पत्तिस्थितिसंहारकारणं सर्वकारणम ।
गंभीर: सर्वभावज्ञ: सच्चिदानन्दविग्रह: ।।120।।
विष्वक्सेन: सत्यसन्ध: सत्यवान्सत्यविक्रम: ।
सत्यव्रत: सत्यसंज्ञ सर्वधर्मपरायण: ।।121।।
आपन्नार्तिप्रशमनो द्रौपदीमानरक्षक: ।
कन्दर्पजनक: प्राज्ञो जगन्नाटकवैभव: ।।122।।
भक्तिवश्यो गुणातीत: सर्वैश्वर्यप्रदायक: ।
दमघोषसुतद्वेषी बाण्बाहुविखण्डन: ।।123।।
भीष्मभक्तिप्रदो दिव्य: कौरवान्वयनाशन: ।
कौन्तेयप्रियबन्धुश्च पार्थस्यन्दनसारथि: ।।124।।
नारसिंहो महावीरस्तम्भजातो महाबल: ।
प्रह्लादवरद: सत्यो देवपूज्यो भयंकर: ।।125।।
उपेन्द्र: इन्द्रावरजो वामनो बलिबन्धन: ।
गजेन्द्रवरद: स्वामी सर्वदेवनमस्कृत: ।।126।।
शेषपर्यड़्कशयनो वैनतेयरथो जयी ।
अव्याहतबलैश्वर्यसम्पन्न: पूर्णमानस: ।।127।।
योगेश्वरेश्वर: साक्षी क्षेत्रज्ञो ज्ञानदायक: ।
योगिह्रत्पड़्कजावासो योगमायासमन्वित: ।।128।।
नादबिन्दुकलातीतश्चतुर्वर्गफलप्रद: ।
सुषुम्नामार्गसंचारी सन्देहस्यान्तरस्थित: ।।129।।
देहेन्द्रियमन: प्राणसाक्षी चेत:प्रसादक: ।
सूक्ष्म: सर्वगतो देहीज्ञानदर्पणगोचर: ।।130।।
तत्त्वत्रयात्मकोsव्यक्त: कुण्डलीसमुपाश्रित: ।
ब्रह्मण्य: सर्वधर्मज्ञ: शान्तो दान्तो गतक्लम: ।।131।।
श्रीनिवास: सदानन्दी विश्वमूर्तिर्महाप्रभु: ।
सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्ष: सहस्त्रपात: ।।132।।
समस्तभुवनाधार: समस्तप्राणरक्षक: ।
समस्तसर्वभावज्ञो गोपिकाप्राणरक्षक: ।।133।।
नित्योत्सवो नित्यसौख्यो नित्यश्रीर्नित्यमंगल: ।
व्यूहार्चितो जगन्नाथ: श्रीवैकुण्ठपुराधिप: ।।134।।
पूर्णानन्दघनीभूतो गोपवेषधरो हरि: ।
कलापकुसुमश्याम: कोमल: शान्तविग्रह: ।।135।।
गोपाड़्गनावृतोsनन्तो वृन्दावनसमाश्रय: ।
वेणुवादरत: श्रेष्ठो देवानां हितकारक: ।।136।।
बालक्रीडासमासक्तो नवनीतस्यं तस्कर: ।
गोपालकामिनीजारश्चोरजारशिखामणि: ।।137।।
परंज्योति: पराकाश: परावास: परिस्फुट: ।
अष्टादशाक्षरो मन्त्रो व्यापको लोकपावन: ।।138।।
सप्तकोटिमहामन्त्रशेखरो देवशेखर: ।
विज्ञानज्ञानसन्धानस्तेजोराशिर्जगत्पति: ।।139।।
भक्तलोकप्रसन्नात्मा भक्तमन्दारविग्रह: ।
भक्तदारिद्रयदमनो भक्तानां प्रीतिदायक: ।।140।।
भक्ताधीनमना: पूज्यो भक्तलोकशिवंकर: ।
भक्ताभीष्टप्रद: सर्वभक्ताघौघनिकृन्तन: ।।141।।
अपारकरुणासिन्धुर्भगवान भक्ततत्पर: ।।142।।
इति श्रीराधिकानाथसहस्त्रं नाम कीर्तितम ।
स्मरणात्पापराशीनां खण्डनं मृत्युनाशनम ।।143।।
वैष्णवानां प्रियकरं महारोगनिवारणम ।
ब्रह्महत्यासुरापानं परस्त्रीगमनं तथा ।।144।।
परद्रव्यापहरणं परद्वेषसमन्वितम ।
मानसं वाचिकं कायं यत्पापं पापसम्भवम ।।145।।
सहस्त्रनामपठनात्सर्व नश्यति तत्क्षणात ।
महादारिद्र्ययुक्तो यो वैष्णवो विष्णुभक्तिमान ।।146।।
कार्तिक्यां सम्पठेद्रात्रौ शतमष्टोत्तर क्रमात ।
पीताम्बरधरो धीमासुगन्धिपुष्पचन्दनै: ।।147।।
पुस्तकं पूजयित्वा तु नैवेद्यादिभिरेव च ।
राधाध्यानाड़िकतो धीरो वनमालाविभूषित: ।।148।।
शतमष्टोत्तरं देवि पठेन्नामसहस्त्रकम ।
चैत्रशुक्ले च कृष्णे च कुहूसंक्रान्तिवासरे ।।149।।
पठितव्यं प्रयत्नेन त्रौलोक्यं मोहयेत्क्षणात ।
तुलसीमालया युक्तो वैष्णवो भक्तित्पर: ।।150।।
रविवारे च शुक्रे च द्वादश्यां श्राद्धवासरे ।
ब्राह्मणं पूजयित्वा च भोजयित्वा विधानत: ।।151।।
पठेन्नामसहस्त्रं च तत: सिद्धि: प्रजायते ।
महानिशायां सततं वैष्णवो य: पठेत्सदा ।।152।।
देशान्तरगता लक्ष्मी: समायातिं न संशय: ।
त्रैलोक्ये च महादेवि सुन्दर्य: काममोहिता: ।।153।।
मुग्धा: स्वयं समायान्ति वैष्णवं च भजन्ति ता: ।
रोगी रोगात्प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात ।।154।।
गुर्विणी जनयेत्पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
राजानो वश्यतां यान्ति किं पुन: क्षुद्रमानवा: ।।155।।
सहस्त्रनामश्रवणात्पठनात्पूजनात्प्रिये ।
धारणात्सर्वमाप्नोति वैष्णवो नात्र संशय: ।।156।।
वंशीतटे चान्यवटे तथा पिप्पलकेsथवा ।
कदम्बपादपतले गोपालमूर्तिसन्निधौ ।।157।।
य: पठेद्वैष्णवो नित्यं स याति हरिमन्दिरम ।
कृष्णेनोक्तं राधिकायै मया प्रोक्तं पुरा शिवे ।।158।।
नारदाय मया प्रोक्तं नारदेन प्रकाशितम् ।
मया त्वयि वरारोहे प्रोक्तमेतत्सुदुर्लभम् ।।159।।
गोपनीयं प्रयत्नेन् न प्रकाश्यं कथंचन ।
शठाय पापिने चैव लम्पटाय विशेषत: ।।160।।
न दातव्यं न दातव्यं न दात्व्यं कदाचन ।
देयं शिष्याय शान्ताय विष्णुभक्तिरताय च ।।161।।
गोदानब्रह्मयज्ञादेर्वाजपेयशस्य च ।
अश्वमेधसहस्त्रस्य फलं पाठे भवेदध्रुवम् ।।162।।
मोहनं स्तम्भनं चैव मारणोच्चाटनादिकम ।
यद्यद्वांछति चित्तेन तत्तत्प्राप्नोति वैष्णव: ।।163।।
एकादश्यां नर: स्नात्वा सुगन्धिद्रव्यतैलकै: ।
आहारं ब्राह्मणे दत्त्वा दक्षिणां स्वर्णभूषणम् ।।164।।
तत आरम्भकर्ताsसौ सर्व प्राप्नोति मानव: ।
शतावृत्तं सहस्त्रं च य: पठेद्वैष्णवो जन: ।।165।।
श्रीवृंदावनचन्द्रस्य प्रासादात्सर्वमाप्नुयात ।
यदगृहे पुस्तकं देवि पूजितं चैव तिष्ठति ।।166।।
न मारी न च दुर्भिक्षं नोपसर्गभयं क्वचित ।
सर्पादि भूतयक्षाद्या नश्यन्ति नात्र संशय: ।।167।।
श्रीगोपालो महादेवि वसेत्तस्य गृहे सदा ।
गृहे यत्र सहस्त्रं च नाम्नां तिष्ठति पूजितम् ।।168।।
|| इति श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् ||
गोपाल सहस्त्रनाम पाठ विधि
अपने घर के पूजा स्थल में भगवान कृष्ण के गोपाल स्वरुप की फोटो स्थापित कर विधिवत पूजा करने के बाद गोपाल सहस्त्रनाम पाठ को हप रोज सुबह एवं शाम को समय निर्धारित कर एक या तीन बार करें । गोपाल सहस्त्रनाम पाठ करने असाध्य रोग भी ठीक हो जाता हैं, और अगर आप किसी भारी कर्ज में डूबे हो तो नियमित इसका पाठ करने से कुछ ही दिनों में कर्ज से मुक्ति मिल जाती हैं । कहते श्रीकृष्ण के गोपाल स्वरूप का ध्यान करते हुए गोपाल सहस्त्रनाम पाठ किया जाये तो शीघ्र ही लाभ होने लगता हैं ।
गोपाल सहस्त्रनाम स्त्रोत पाठ करने से लाभ
संतान प्राप्ति के लिए गोपाल सहस्नाम स्त्रोत का पाठ विधि पूर्वक करना चाहिए। यदि स्वयं न कर पाएं तो किसी योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं। गोपाल सहस्त्रनाम का नित्य पाठ करने से रोगों से छुटकारा मिलता है। अगर आप कर्ज में डूबे हैं तो प्रतिदिन गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करें। जीवन में कई बार एक के बाद एक समस्याएं आने लगती हैं। ऐसे समय में गोपाल सहस्त्रनाम स्त्रोत का पाठ करना चाहिए।
मान्यता है कि गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करने से जेल से जल्दी में मुक्ति मिल जाती है। रूपये, पैसों व धन-दौलत से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए भी गोपाल सहस्त्रनाम स्त्रोत का पाठ करना चाहिए।
गोपाल सहस्त्रनाम पाठ आपको सुबह-सुबह नहाने के बाद श्री कृष्णा की मूर्ति के सामने करना चाहिए, ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए अनेक मंत्र, स्तुति और स्त्रोतों की रचना की गई है। इन्हीं में से एक है गोपाल सहस्त्रनाम स्त्रोत। भगवान् श्री कृष्णा की साधना में श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् को बेहद प्रभावशाली माना जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करने से मनुष्य की सभी मनोकामना पूर्ण होती है।
श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ कैसे करे हिन्दू धरम शास्त्रों के अनुसार सुबह जल्दी स्नान करके भगवान् श्री कृष्णा की तस्वीर या मूर्ति के सामने श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करे। सर्व प्रथम भगवान् श्री कृष्णा का आवाहन करें और भगवान् श्री कृष्णा को सर्व प्रथम आसन अर्पित करें। तत्पश्चात पैर धोने के लिए जल समर्पित करें आचमन अर्पित करें ,स्नान हेतु जल समर्पित करें ,तिलक करें , धुप -दीप दिखाएं ,प्रसाद अर्पित करें, आचमन हेतु जल अर्पित करें, तत्पश्चात नमस्कार करें। तत्पश्चात श्री गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करे ।.
श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् से सम्बंधित कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर-
श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् क्या है?
भगवान श्री कृष्ण के गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का तात्पर्य- भगवान श्री कृष्ण के हजारों नाम है जिनमें से उनका एक गोपाल नाम भी हैं, गोपाल का अर्थ है गाय का पालन करने वाला ||
श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का क्या मतलब है?
ऐसी मान्यता हैं कि भगवान श्री कृष्ण का गोपाल नाम बहुत ही अद्भुत, चमत्कारी एवं शुभ फल प्रदान करने वाला है, हमारे ऋषि-मुनियों ने हमेशा गोपाल नाम से ही श्रीकृष्ण के हज़ार नामों की स्तुति की हैं, जिसे शास्त्रों में श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् के नाम से जाना जाता हैं ||
क्या श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करने से रोगों से मुक्ति मिलती है?
गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् पाठ एकमात्र ऐसा पाठ है जिसे करने से मनुष्य भयंकर से भयंकर रोग से, हर प्रकार के कर्ज से, हर प्रकार की चिंता, अवसाद आदि से मुक्ति पा सकता है ||
श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करने से क्या लाभ है?
गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करने से रोगी रोग मुक्त हो जाता है, बंदी के जेल से मुक्त होने के लिए भी गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ अद्भुत परिणाम देने वाला है, गरीबी से ग्रसित व्यक्ति इसका पाठ के करने से धन वैभव का अधिकारी बनता है ||
श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करने की विधि क्या है?
श्रीगोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करने की सामान्य विधि- आप अपने घर में भगवान कृष्ण के गोपाल स्वरुप की फोटो स्थापित कर विधिवत पूजा करने के बाद गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ को हर रोज सुबह एवं शाम को समय निर्धारित कर एक या तीन बार नियमित रूप से करें, गोपाल सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करने असाध्य एवं असह्य रोग भी ठीक हो जाता हैं, और अगर आप कर्ज में डूबे हो तो नियमित इसका पाठ करने से कुछ ही दिनों में कर्ज से मुक्ति मिल जाती हैं ||